॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Piya Sang jagi Vrishbhanu Dulari
पिय संग जागी वृषभानु दुलारी
Shriji Rasik
Kavi: Shriji Rasik
पिय संग जागी वृषभानु दुलारी।
अंग-अंग आलस जंभात अति, कुंज सदन ते भवन सिधारी॥
मारग जात मिली सखी आरैं, तब ही सकुचि तन दसा बिसारी।
छीतस्वामी सौं कहति भामिनी,
तोहि मिले निसि गिरिवर धारी॥
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