॥ राधे राधे ॥

जिधर भी देखता हूँ मुझको नजर वो घनश्याम आ रहा है।
जगत की हर वस्तुओं में, प्रकाश अपना दिखा रहा है।।
ग्रहादि, नक्षत्र रवि सुधाकर, निशा दिवस वायु व्योम जल।
अनेक रंगों के रूप धरकर, सभी के दिल को लुभा रहा है।।
सघन निर्जन में, वन चमन में, घरों में, धामों में धान्यधन में।
हरेक तन में, हरेक मन में, वो नन्द नन्दन समा रहा है।।
कभी वो माखन चुरा रहा है, कभी वो गायें चरा रहा है।
कभी वो वंशी बजा रहा है, कभी वो गीता सुना रहा है।।
कभी मिला वो कृष्ण राम बनकर, हरेक अवतार नाम बनकर। तो 'बिन्दु' भी उसका धाम बनकर, दृगों में बसा रहा है।।
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