॥ नाहं स्मरामि कृष्णं तु राधास्मरणवर्जितम् ॥
श्रीजी रसिक - पद
Shriji Rasik - Pads
Pads (20)
Jidhar Bhi Dekhta Hu Mujhko Najar Vo Ghanshyam Aa Rha Hai
padBindu ji
जिधर भी देखता हूँ मुझको नजर वो घनश्याम आ रहा है।
जगत की हर वस्तुओं में, प्रकाश अपना दिखा रहा है।।
ग्रहादि, नक्षत्र रवि सुधाकर, निशा दिवस वायु व्योम जल।
अनेक रंगों के रूप धरकर, सभी के दिल को लुभा रहा है।।
सघन निर्जन में, वन चमन में, घरों में, धामों में धान्यधन में।
हरेक तन में, हरेक मन में, वो नन्द नन्दन समा रहा है।।
कभी वो माखन चुरा रहा है, कभी वो गायें चरा रहा है।
कभी वो वंशी बजा रहा है, कभी वो गीता सुना रहा है।।
कभी मिला वो कृष्ण राम बनकर, हरेक अवतार नाम बनकर। तो 'बिन्दु' भी उसका धाम बनकर, दृगों में बसा रहा है।।
Dasha Mujh Deen Ki Bhagawan
padBindu ji
दशा मुझ दीन की भगवन् सम्हालोगे तो क्या होगा।
अगर चरणों की सेवा में लगा लोगे तो क्या होगा।।
नामी पातकी हूँ और नामी पाप हर तुम हो।
जो लज्जा दोनों नामों की, बचा लोगे तो क्या होगा।।
जिन्होंने तुमको करुणाकर पतित पावन बनाया है।
उन्हीं पतितों को तुम पावन बना लोगे तो क्या होगा।।
यहाँ सब मुझसे कहते हैं तू मेरा है! तू मेरा है।
मैं किसका हूँ? ये झगड़ा तुम चुका लोगे तो क्या होगी।।
अजामिल, गीध, गणिका, जिस दया गंगा में तरते हैं।
उसी में 'बिन्दु' सा पापी मिला लोगे तो क्या होगा।।
Adhamo Ko Naath Ubarana
padBindu ji
अधमों को नाथ उबारना, तुम्हें याद हो कि न याद हो।
मद खल जनों का उतारना, तुम्हें याद हो कि न याद हो।।
प्रह्लाद जब मरने लगा, खंजर पै सिर धरने लगा।
उस दिन खम्भ बिदारना, तुम्हें याद हो कि न याद हो।।
धृतराष्ट्र के दरबार में, दुःखी द्रौपदी की पुकार में।
साड़ी के थान सँवारना, तुम्हें याद हो कि न याद हो।।
सुरराज ने जो किया प्रलय, ब्रजधाम बसने के समय।
गिरिवर नखों पर धारना, तुम्हें याद हो कि न याद हो।।
दृग् 'बिन्दु' जिनके निराश हों, केवल तुम्हारी आश हो।
उनकी दशायें सुधारना, तुम्हें याद हो कि न याद हो।।
Jay Jagpati Jay Janpati Raghukul Pati Ram
padBindu ji
जय जगपति, जय जनपति रघुकुलपति राम।
शोभित श्रीसिय समेत, छविधर , अभिराम ।।
जय कृपाल प्रणतपाल, दायक विश्राम।
घन सम तन द्युति ललाम, सुगति शान्ति धाम ।।
भूमि भार, हरन हार, जय अनन्त नाम।
त्रिभुवन विख्यात विमल पावन गुण ग्राम।।
नेति नेति गावत ऋग्, यजु, अथर्व, साम।
पूर्ण 'बिन्दु' पूर्ण सिन्धु परम पूर्ण काम।।
He Dayamay Deendayal Aj
padBindu ji
हे दयामय, दीनदयाल, अज, विमल निष्काम हो।
जगपति, जग व्याप्त, जगदाधार, जग विश्राम हो।।
दिवस निशि जिसको, प्रबल भय रोग की, हो यंत्रणा।
उस दुखी जन के लिए तुम वास्तविक सुख धाम हो ।।
क्लेश इस कलिकाल का उसको कभी व्यापे नहीं।
हृदय में जिसके तुम्हारा, ध्यान आठो याम हो।।
एक ही अभिलाषा है पूरी इसे कर दो प्रभो।
मेरी रसना पर सदा रस 'बिन्दु' मय तव नाम हो ।।
Prabhu Ji Tum Chandan Hum Pani
padShriji Rasik
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी ।
जाकी अंग-अंग बास समानी ॥
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा ।
जैसे चितवत चंद चकोरा ॥
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती ।
जाकी जोति बरै दिन राती ॥
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा ।
जैसे सोनहिं मिलत सुहागा ॥
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा ।
ऐसी भक्ति करै रैदासा ॥
Chaturang Chamu Ati Chabi Viraj
padसुंदरी कुंवर बाई
चतुरंग चमू अति छबि विराज, मणि कनक साजि गराज बाज।
पुनि दुरद पीठ राजें निशान, धुनि होत दुंदुभी छन लजान॥
केउ चलै गंजन पर गुनी नाम, जावें जो कीर्ति कीनी सुराम।
पुनि चढ़े अश्व शोभित अपार, छत्रें सुभट साजे सिंगार॥
पखरैत किते हय पै सवार, जिन जिरह टोप आवै अपार।
राज अनंत सौंवत सुढंग, कर गहें चाप कटि कसि निषंग॥
सुंदर स्वर की शोभा अनूप, सुरजन विमान नहीं लगत जूप।
कसि कमर अमर से चले बीर, अति भई बाहिनी की जु भीर॥
पैदल दल शोभा के समूह, लखि चकित रहत सुर विविध जूह।
है कितों कटक नाहिन प्रमान, सोभा समुदु मनो उमड़ आन॥
Mai Tuv Pastar Renu Rasili
padललित किशोरी
मैं तुव पदतर-रेनु, रसीली।
तेरी सरवरि कौन करि सकै, प्रेममई मूरति गरबीली॥
कोटहहु पानबारने करिकै उरिन न तोसों प्रीत-रगीली।
अपनी प्रेम-छटा करुना करि, दीजै दीनदयाल छबीली॥
का मुख करौं बड़ाई राई, ‘ललितकिशोरी' केलि-हठीली।
प्रीति दसांस सतांस तिहारी, मो मै नाहिंन नेह नसीली॥
Chhavi Aavan Mohanlal ki
padरहीम दास
छबि आवन मोहनलाल की।
काछे काछनि कलित मुरलि कर पीत पिछौरी साल की॥
बंक तिलक केसर को कीन्हो द्युति मानौं बिधु बाल की।
बिसरत नाहिं सखी मो मन सों चितवनि नैन बिसाल की॥
नीकी हँसनि अधर सधरनि छबि छीनी सुमन गुलाब की।
जल सों डारि दियो पुरइनि पै डोलनि मुकतामाल की॥
आप मोल बिन मोलनि डोलनि बोलनि मदन गोपाल की।
यह सरूप निरखै सोइ जानै यहि रहीम के हाल की॥
Sumiro Mai Ramdoot Hanuman
padदुलनदास
सुमिरौं मैं रामदूत हनुमान।
समरथ लायक जन सुख-दायक, कर मुसकिल औसान॥
सील सुजल बल तेज अमित जाके, छबि गुन ज्ञान निधान।
भक्ति तिलक जा के सीस बिराजत, बाजत नाम निसान॥
जो कछु मो मन सोच होत तब, धरौं तुम्हारो ध्यान।
तब तुम निकटहिं अहौ सहायक, कहँ लगि करौं बखान॥
रहौं असंक भरोस तुम्हारे, निस दिन साँझ बिहान।
दूलन दास के परम हितू तुम, पवन-तनय बलवान॥
Aaju Hari Khelat Fagu Bani
padनंददास
आजु हरि खेलत फागु बनी।
इत गोरी रोरी भरि भोरी, उत गोकुल को धनी॥
चोवा कों ढोवा भरि राख्यो केसर-कीच घनी।
अबिर गुलाल उड़ावत गावत, सारी जात सनी॥
हाथन लसत कनक पिचकारी, ग्वालन छूट छनी।
नंददास प्रभु होरी खेलत, मुरि-मुरि जात अनी॥
Piya Sang jagi Vrishbhanu Dulari
padछीतस्वामी
पिय संग जागी वृषभानु दुलारी।
अंग-अंग आलस जंभात अति, कुंज सदन ते भवन सिधारी॥
मारग जात मिली सखी आरैं, तब ही सकुचि तन दसा बिसारी।
छीतस्वामी सौं कहति भामिनी,
तोहि मिले निसि गिरिवर धारी॥
Piya Ram Rasu Piya Re
padShrijirasik
पीआ राम रसु पीआ रे॥टेक॥
भरि भरि देवै सुरति कलाली, दरिआ दरिआ पीना रे।
पीवतु पीवतु आपा जग भूला, हरि रस मांहि बौराना रे॥
दर परि बिसरि गयौ रैदास, जनमनि सद मतवारी रे।
पलु पलु प्रेम पियाला चालै, छूटे नांहि खुमारी रे॥
मैं राम रूपी रसायन पी रहा हूँ। सुरति-कलाली मुझे रामरस से भर−भर कर प्याला दे रही है और मैं मानो इस रस का दरिया ही पीता जा रहा हूँ। इस रस का पान करते−करते मैं अपने अहंभाव और संसार को भूलकर मतवाला हो रहा हूँ। रैदास कहते हैं कि इस रस को पीने से मैं अपना घर−द्वार भूलकर जन्मों-जन्मों के लिए उस सच्ची ख़ुमारी में मस्त हो गया हूँ। लगातार प्रेम−रस का प्याला पीया जा रहा है जिसकी ख़ुमारी नहीं उतरती है।
Mai To Khelu Prabhu Ke Sang Hori Rangbhari
padShrijirasik
मैं तो खेलूं प्रभु के संग होरी रंगभरी।
जित देखूं तित रम रहौ रे सबमें व्यापक है हरी॥
सब कुछ भयो दयो सुख जनको अद्धुत लीला करी।
नाना जतन किये मिलबे के प्रीतम पाए हम घरी॥
पावत ही सब भ्रम भय भागे आवागमन छूटीलरी।
जीवन्मुक्त भयो मन मेरो व्याधा सब आशा जरी॥
अमरलोक पद फगुआ पाओ जन्म मरण विपता टली।
चरणदास गुरु किरपा कीन्हीं सहजो सब आनंद रली॥
मैं तो परमात्मा के साथ रंग भरी होली खेल रही हूँ। जहाँ देखूँ, वहाँ वह व्याप्त है, वह तो घट-घट में व्याप्त है। हरि ने अपनी लीला से से मनुष्य-मात्र को सुखी किया है। मैंने अनेक यत्न किए, परमात्मा को पाने के लिए मैं मारी-मारी फिरी लेकिन वह प्रीतम तो मेरे घर में ही था। अर्थात वह तो मेरे मन में ही समाया हुआ था। उसका साक्षात्कार करने मात्र से मेरे सारे भ्रम दूर हो गए और मेरा सांसारिक आवागमन छूट गया। मेरा मन जीवन-मुक्त हो गया और लालसा और कामनाओं की सारी व्याधियाँ जल गईं। मैंने अमरपद पाया और जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो गई। सहजो बाई कहती है कि गुरु चरणदास ने मुझ पर कृपा की जिससे मेरा मन आनंद से सराबोर हो गया।
Kahan Na Huva
padShrijirasik
कवण न हूवा! कवण न होयसी? किण न सह्यो दुख भारूँ।
कवण न गइया कवण न जासी, कवन रह्या संसारूँ।
अनेक-अनेक चलंता दीठा, कलिका माणस कौण विचारूँ।।
जो चित होता सो चित नाहीं, भल खोटा संसारूँ।
किसकी माई किसका भाई, किसका पख परवारूँ॥
भूली दुनियां मर-मर जावै न चीन्हों करताऊं।
विष्णु-विष्णु तू भण रे प्राणी! बल-बल बारंबारूँ॥
कसणीं कसवा भूल न बहवा, भाग परापति सारूँ।
गीता नाद कविता नाऊं, रंग फटा रस टारूँ॥
फोकट प्राणी भूरमे भूला, भलजे यों चीन्हों करतारूँ।
जामण मरण बिगावो चूकै, रतन काया ले पार पहुंचै तो आवागवण निवारूँ॥
इस संसार से कौन उत्पन्न नहीं हुआ? भविष्य में भी कौन नहीं होगा? और इस संसार में जन्म लेकर किसने संसार के दुःख रूप भार को सहन नहीं किया? इस संसार से कौन नहीं गया? ऐसा कौन है जो इस संसार से प्रस्थान नहीं करेगा? और ऐसा कौन है जो इस संसार में स्थिर रहा? इस संसार से अनेकानेक महान व्यक्तियों को जब जाते हुए देखा है तब कलियुग के बेचारे अल्पायु मनुष्य की तो गणना ही क्या है? माता के गर्भस्थ प्राणी के चित में जो ईश्वर था वह जन्मने पर प्राणी के हृदय में नहीं रहा—प्राणी अपने हृदयस्थल ईश्वर को भूल गया, फिर वह संसार में बुरा हो गया। इस संसार में कौन किसकी माँ है? कौन किसका भाई है? और कौन किसका कुटुंब-परिवार है? संसार के लोग मोहासक्ति में बार-बार मर-मर जाते हैं क्योंकि उन्होंने परमात्मा को नहीं पहचाना। हे प्राणी! तू परमात्मा का बार-बार तथा निरंतर 'विष्णु-विष्णु' उच्चारण कर। तुम संयम की “कसणी” कसो और संसार की भूल में मत बहो! मनुष्य को प्राप्ति तो अपने भाग्य के अनुसार होती है। गीता का उद्घोष मात्र लौकिक कवियों की कविता नहीं मनुष्य पर चढ़े लौकिक रंग को फाड़कर वास्तविक रस तत्व को अलग करती है। हे प्राणी! तुम व्यर्थ में ही भ्रम में पड़े हो, क्या तुमने परमात्मा की पहचान कर ली है! उसकी पहचान कर लेने से जन्म-मरण से मुक्त होकर व्यक्ति भवसागर से पार हो सकता है और अपना आवागमन मिटा सकता है।
Sadho So Satguru Mohe Bhave
padShrijirasik
साधो सो सतगुरु मोंहि भावै।
सत्त प्रेम का भर भर प्याला,आप
पिवै मोंहि प्यावै।
साधो सो सतगुरु मोहिं भावै...
परदा दूर करै आँखिन का,ब्रह्म
दरस दिखलावै।
जिस दरसन में सब लोक दरसै,
अनहद सबद सुनावै।
साधो सो सतगुरु मोहिं भावै...
एकहि सब सुख-दु:ख दिखलावै,
सबद में सुरत समावै।
कहैं कबीर ताको भय नाहीं,
निर्भय पद परसावै।
साधो सो सतगुरु मोहिं भावै...
Chalan Lage Thumuk Thumuk Nandlal
padShrijirasik
चलन लागे, ठुमुकि ठुमुकि नँदलाल ।
ठड़े होत पग द्वैक चलत पुनि,
गिरि गिरि परत गुपाल।
पुनि घुटुरुवनि गवनि तहँ पहुँचत,
जहँ देहरी विशाल।
कर-पद-उदर सबै छल बल करि,
लाँघन चह ततकाल ।
लाँघि न सकेउ मचायेउ रोदन,
दौरीं मातु बेहाल ।
बंक भृकुटि जेहि प्रलय सोइ कर,
लीला बाल रसाल ।
जनि रोवहिं मेरो लाल काल हीं,
देहरिहि देउँ निकाल ।
इमि 'कृपालु' कहि हरि दुलरावति, देहरिहिं ताड़ति ताल ॥
**भावार्थ-** (यशोदा जी की कामना के अनुसार श्रीकृष्ण थोड़ा-थोड़ा चलने लगे, उस समय की लीला का दृश्य) श्रीकृष्ण ठुमुक-ठुमुक कर थोड़ा-थोड़ा चलने लगे किन्तु अभी अधिक अभ्यास नहीं है, अतएव अपने आप खड़े होकर दो- एक पग चलते हैं, फिर बार-बार गिर पड़ते हैं । बार-बार गिरने से थककर फिर घुटने के बल चलते हुए द्वार की बड़ी ऊँची-देहरी के पास पहुँच जाते हैं । अपने हाथ, पेट एवं पैर सभी का बल लगाकर अनेक प्रकार से प्रयत्न करके तत्क्षण ही उस ऊँची देहरी को लाँघना चाहा, किन्तु नहीं लाँघ सके । इसके परिणामस्वरूप खीझकर रोने लगे । रोने की आवाज सुनकर, प्रेम विहल होकर मैया ने श्रीकृष्ण के पास दौड़ कर उनको उठा लिया । कवि कहता है कि जिसकी भूकुटि विलास से प्रलय हो जाता है, आज वही देहरी न लाँघ सकने की क्या ही मधुर बाललीला कर रहा है । मैया ने कहा, 'मेरे लाल ! अब न रोवो, मैं कल ही देहरी को निकलवा दूंगी ।' 'श्री कृपालु जी महाराज' कहते हैं कि इस प्रकार कह-कहकर यशोदा अपने लाला को गोद में झुलाती हुई अनेक प्रकार से दुलार करती हैं एवं देहरी को हाथ की ताली बजाकर मारने का बहाना करती हैं, ताकि अबोध श्रीकृष्ण को शान्ति मिल जाये।
Mithi Vrindavan Ki Seva
padShrijirasik
मीठी वृन्दावन की सेवा,
श्यामा श्यामहि नीकी लागत,ज्यों
बालकहि कलेवा
मिठी वृन्दावन की सेवा
मिठी....
1.बेलि हमारी कुल देवी सब,विटप गुल्म सब देवा
मिठी वृन्दावन की सेवा
श्यामा श्यामहि नीकी लागत,ज्यों बालकहि कलेवा
मिठी....
2.कुंज निकुंजनि कुसुम पुंज रचि,सैंन ऐंन मधुमेवा
मनि कंचन भाजंन सोहे,अंग धुंम को खेवा
मिठी वृन्दावन की सेवा
श्यामा श्यामहि नीकी लागत,ज्यों बालकहि कलेवा
मिठी वृन्दावन की सेवा
मिठी....
3.और धरम अकरम से लागत,बिन माला लगत ज्यौं जनेवा
श्यामा श्यामहि नीकी लागत,ज्यों बालकहि कलेवा
मिठी वृन्दावन की सेवा
मिठी....
4.बिहरत सदा दुल्हिंन दुल्हा,अंग अंग मधु पेवा
व्यास रास आकाश बिरत दोऊ,मानहु प्रेम परेवा
मिठी वृन्दावन की सेवा
श्यामा श्यामहि नीकी लागत,ज्यों बालकहि कलेवा
मिठी वृन्दावन की सेवा
मिठी वृन्दावन की सेवा
मिठी....
वृन्दावन वृन्दावन वृन्दावन रहिये-2
श्यामा श्याम श्यामा श्याम श्यामा श्याम
कहिये
Dekhu Sakhi Do Saavan Sang Bhay
padShrijirasik
देखु सखि, द्वै सावन सँग भाय।
सावन महँ जनु तनु धरि सावन, रस बरसावन आय।
इत सावन घनश्याम उतै जनु, तनु घनश्याम जनाय।
इत सावन दामिनि दमकनि उत, पीत - वसन फहराय।
इत सावन नभ इंद्र धनुष उत, मणिगण मुकुट लखाय।
इत सावन बरसावत जल उत, आनँद - जल बरसाया।
इत सावन तृण हरित अवनि उत, काछनि हरित सुहाय।
इत सावन दादुर धुनि उत पग, नूपुर शब्द सुनाय।
दोउ 'कृपालु' मनभावन सावन, हिलि मिलि भल छवि छाय॥
**भावार्थ** -अरी सखि ! देख, दो सावन एक साथ सुशोभित हो रहे हैं।ऐसा प्रतीत होता है कि एक सावन के महीने में दूसरा सावन मूर्तिमान बनकर आनन्द रस बरसाने आया है।(एक सावन से अभिप्राय सावन मास से है एवं दूसरे सावन से अभिप्राय श्यामसुन्दर से है) इधर सावन मास में काले बादल हैं और उधर काले बादलों के समान श्यामसुन्दर का शरीर है ।इधर सावन मास में बिजली चमक रही है उधर श्यामसुन्दर का पीताम्बर फहरा रहा है।इधर सावन मास में आकाश में इन्द्र धनुष चमक रहा है उधर श्यामसुन्दर के मुकुट में रंग बिरंगी मणियाँ चमक रही हैं।इधर सावन मास में पार्थिव जल बरस रहा है उधर श्यामसुन्दर के द्वारा दिव्यानन्द जल बरस रहा है।इधर सावन मास में पृथ्वी पर हरी घास सुशोभित है उधर श्यामसुन्दर की कमर में हरी काछनी सुशोभित है।इधर सावन मास में मेंढकों की ध्वनि हो रही है उधर श्यामसुन्दर के चरणों ने शोभित नूपुर की मधुर ध्वनि है ।इस प्रकार चेतन एवं अचेतन दोनों सावन मिलकर अनिर्वचनीय शोभा पा रहे हैं।
Maiya Mai To Mohini Rup Baneho
padShrijirasik
मैया मैं तो मोहिनि-रूप बनैहौं।
घघरा चुन्नटदार पहिरिहौं, चुनरी शीश धरैहौं।
बेंदी भाल लाल लगवैहौं, सेंदुर माँग भरैहौं।
वेणी गूँथि पहिरि नथ बेसर, सुरमा सुघर लगैहौं।
गर दुलरी, लर हार मोतियन, उर कंचुकी कसैहौं।
कर करपत्र चुरी कंकण-मणि, मेहँदी लाल रचैहौं।
घूँघट को पट घनो काढ़िहौं, लाजन लाज लजैहौं।
नाँव साँवरी सखी धेरैहौं, गति हंसहुँ सकुचैहौं।
कालि छली चंद्रावलि अलि मोहिं, आजु छलन हौं जैहौं।
छलि 'कृपालु' इमि चन्द्रावलि कहँ, हौं तेहि मजा चखैहौं॥
**भावार्थ** - श्यामसुन्दर अपनी मैया से कहते हैं कि मैं तो मोहिनी रूप बनाऊँगा। चुन्नटदार लहँगा पहिनकर सिर पर चुनरी ओढूँगा। भाल में लाल बिन्दी लगवाऊँगा एवं माँग में सिन्दूर भराऊँगा। बालों की वेणी गूँथ कर नाक में नथ एवं बेसर पहनूँगा। आँखों में सुरमा लगा लूँगा। गले में दुलरी एवं मोतियों के हार पहन कर वक्ष स्थल में चोली धारण करूँगा। हाथ में करपत्र, चूड़ी एवं मणिमय कंकण पहन कर लाल मेहँदी रचाऊँगा। खूब लम्बा घूँघट काढ़ कर लज्जा का ऐसा अभिनय करूँगा कि साक्षात् लज्जा भी लज्जित हो जायगी। अपना नाम साँवरी सखि रखकर चाल से राजहंस को भी
लज्जित करूँगा। कल मुझे चन्द्रावलि सखि ने छला है, आज मैं भी उसे छलूँगा। 'कृपालु' के शब्दों में श्यामसुन्दर कहते हैं कि इस प्रकार चन्द्रावलि को छल कर उसे मुझे छलने का भली भाँति मजा चखाऊँगा।