॥ राधे राधे ॥
भक्ति और प्रेम का पावन संगम
प्रभु की भक्ति वह अनमोल रस है, जो अशांत मन को परम शांति और जीवन को सार्थकता प्रदान करता है। 'श्रीजी रसिक' का यह प्रांगण उसी भक्ति रस में सराबोर होने का एक निस्वार्थ प्रयास है। यहाँ शब्दों के माध्यम से नहीं, बल्कि आत्मा के भावों से ईश्वर की वंदना की जाती है। जब हृदय से भजन के बोल और श्रद्धा से श्लोक का उच्चारण होता है, तो वह सीधी पुकार बनकर श्री हरि के श्रीचरणों तक पहुँचती है। आइए, इस आध्यात्मिक यात्रा में हमारे साथ जुड़ें और अपनी आत्मा को ईश्वरीय प्रेम से सिंचित करें।
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Shrijirasik
श्री सूर्य देव चालीसा ॥
॥ दोहा ॥
कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अङ्ग,
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के सङ्ग॥
॥ चौपाई ॥
जय सविता जय जयति दिवाकर,
सहस्त्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर॥
भानु पतंग मरीची भास्कर,
सविता हंस सुनूर विभाकर॥
विवस्वान आदित्य विकर्तन,
मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥
अम्बरमणि खग रवि कहलाते,
वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥ 4
सहस्त्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि,
मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥
अरुण सदृश सारथी मनोहर,
हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥
मंडल की महिमा अति न्यारी,
तेज रूप केरी बलिहारी॥
उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते,
देखि पुरन्दर लज्जित होते॥8
मित्र मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर,
सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥
पूषा रवि आदित्य नाम लै,
हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥
द्वादस नाम प्रेम सों गावैं,
मस्तक बारह बार नवावैं॥
चार पदारथ जन सो पावै,
दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥12
नमस्कार को चमत्कार यह,
विधि हरिहर को कृपासार यह॥
सेवै भानु तुमहिं मन लाई,
अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥
बारह नाम उच्चारन करते,
सहस जनम के पातक टरते॥
उपाख्यान जो करते तवजन,
रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥16
धन सुत जुत परिवार बढ़तु है,
प्रबल मोह को फंद कटतु है॥
अर्क शीश को रक्षा करते,
रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत,
कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥
भानु नासिका वासकरहुनित,
भास्कर करत सदा मुखको हित॥20
ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे,
रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा,
तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥
पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर,
त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥
युगल हाथ पर रक्षा कारन,
भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥24
बसत नाभि आदित्य मनोहर,
कटिमंह, रहत मन मुदभर॥
जंघा गोपति सविता बासा,
गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥
विवस्वान पद की रखवारी,
बाहर बसते नित तम हारी॥
सहस्त्रांशु सर्वांग सम्हारै,
रक्षा कवच विचित्र विचारे॥28
अस जोजन अपने मन माहीं,
भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं ॥
दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै,
जोजन याको मन मंह जापै॥
अंधकार जग का जो हरता,
नव प्रकाश से आनन्द भरता॥
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही,
कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥32
मंद सदृश सुत जग में जाके,
धर्मराज सम अद्भुत बांके॥
धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा,
किया करत सुरमुनि नर सेवा॥
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों,
दूर हटतसो भवके भ्रम सों॥
परम धन्य सों नर तनधारी,
हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥36
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन,
मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥
भानु उदय बैसाख गिनावै,
ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥
यम भादों आश्विन हिमरेता,
कातिक होत दिवाकर नेता॥
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं,
पुरुष नाम रविहैं मलमासहिं॥40
॥ दोहा ॥
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य,
सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥
Shrijirasik
।।मनुस्मृति नवम अध्याय।।
पुरुषस्य स्त्रियाश्चैव धर्मेवर्त्मनि तिष्ठतोः ।
संयोगे विप्रयोगे च धर्मान्वक्ष्यामि शाश्व तान् ॥ 1 ॥
भृगु जी ने कहा, विप्रो, मैं अब आपको धर्म का पालन करने वाले स्त्रियों व पुरुषों के साथ-साथ एवं अलग-अलग रहने के सनातन धर्मों के विषय में बतलाता हूं। एकाग्रचित्त होकर सुनें।
अस्वतन्त्राः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशम् ।
विषयेषु च सज्जन्त्यः संस्थाप्याः आत्मनोवशे ।। 2 ।।
जो स्त्रियां विषयों में आसक्त रहती हैं, उनके पतियों द्वारा उन्हें सदैव अपने नियन्त्रण में रखना चाहिए।
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्राः न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ ३ ॥
बाल्यावस्था में स्त्री की रक्षा पिता करता है, यौवनावस्था में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है। वह सदा (किसी न किसी के) अधीन रहती है क्योंकि वह स्वतंत्रता के योग्य नहीं।
कालेऽदाता पितावाच्यो वाच्यश्चानुपयन्यतिः ।
मृते भर्तरि पुत्रस्तु वाच्यो मातुररक्षिता ॥ 4 ॥
वह पिता जो उचित समय आने पर कन्या का विवाह नहीं करता, वह पति जो ऋतुकाल में अपनी पत्नी से सहवास नहीं करता तथा वह पुत्र जो पिता की मृत्यु के पश्चात् मां का भरण-पोषण नहीं करता ये सब निश्चित रूप से निन्दा योग्य हैं।
सूक्ष्मेभ्योऽपि प्रसङ्गेभ्यः स्त्रियोरक्ष्या विशेषतः ।
द्वयोर्हि कुलयोः शोकमावहेयुररक्षिताः ॥ 5 ॥
स्त्रियों को बिगडने के छोटे से मौके से भी यत्न एवं कठोरतापूर्वक बचाना चाहिए क्योंकि न बचाने से पतित स्त्रियां पिता व पति दोनों के कुल पर कलंक तुल्य होती हैं।
इमं हि सर्ववर्णानां पश्यन्तो धर्ममुत्तमम् ।
यतन्ते रक्षितुं भार्यां भर्तारो दुर्बला अपि ॥ 6 ॥
स्त्री पर नियंत्रण रखना सभी वर्षों में उत्तम धर्म के रूप में देखा जाता है। अतः दुर्बल पतियों का भी कर्तव्य है कि वे अपनी पत्नी को वश में रखने का भरसक प्रयत्न करें।
स्वां प्रसूतिं चरित्रं च कुलमात्मानमेव च।
स्वं च धर्म प्रयत्नेन जायां रक्षन् हि रक्षति ॥ 7 ॥
जो पुरुष यत्नपूर्वक अपनी स्त्री की रक्षा करता है वही अपनी संतान, चरित्र, कुल, स्वयं अपनी तथा अपने धर्म की रक्षा करने में समर्थ हो पाता है।
पतिभार्या सम्प्रविश्य गर्भोभूत्वेह जायते।
जायायास्तद्धि जायात्वं यदस्यां जायते पुनः ॥ ४ ॥
पत्नी के गर्भ में प्रविष्ट होकर पति ही समय आने पर इस संसार में जन्म लेता है। पुनः जनने के कारण ही पत्नी को 'जाया' की संज्ञा दी जाती है।
यादृशं भजते हि स्त्री सुतं सूते तथाविधम् । तस्मात्प्रजाविशुद्धयर्थं स्त्रियं रक्षेत्प्रयत्नतः ॥ १॥
जिस प्रकार के पुरुष से स्त्री सहवास करती है, उसी तरह के (उत्तम, मध्यम अथवा अधम) पुत्र को जन्म देती है। अतः स्त्री की रक्षा व उत्तम संतानोत्पत्ति के लिए पति को सदैव प्रयत्नरत रहना चाहिए।
न कश्चिद्योषितः शक्तः प्रसह्य परिरक्षितुम् ।
एतैरुपाययोगैस्तु शक्यास्ताः परिरक्षितुम् ॥ 10 ॥
बल व शक्ति से अथवा जबरदस्ती कोई भी पुरुष स्त्रियों की दुराचरण से रक्षा नहीं कर सकता। केवल समझाने-बुझाने तथा आगे बताए गए उपायों का पालन करने से ही ऐसा संभव हो सकता है।
अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये चैव नियोजयेत् ।
शौचे धर्मेऽन्नपक्त्यां च पारिणाह्यस्य योजने ॥ 11 ॥
धन को जमा एवं खर्च करना, घर की स्वच्छता, भोजन बनाना तथा घर की सभी वस्तुओं की देखरेख का काम स्त्रियों के सुपुर्द कर देना चाहिए। इस प्रकार स्त्रियां घर से बाहर भ्रमण नहीं कर पातीं।
अरक्षिता गृहे रुद्धाः पुरुषैराप्तकारिभिः ।
आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः ।। 12 ।।
जो स्त्रियां सच्चरित्र के संरक्षण में घर में ही रहती हैं वे भी सुरक्षित रहती हैं। वही स्त्रियां सर्वाधिक सुरक्षित हैं जो स्वयं अपनी रक्षा करती हैं।
पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम्।
स्वप्नोऽन्यगेहेवासश्च नारीणां दूषणानि षट् ॥ 13 ॥
मदिरापान, दुष्ट पुरुष का संसर्ग, पति से अलग वास, व्यर्थ इधर-उधर भ्रमण करना, असमय एवं देर तक सोते रहना व दूसरे के घर में रहना- ये छः दोष स्त्रियों को दूषित कर देते हैं।
नैता रूपं परीक्षन्ते नासां वयसि संस्थितिः ।
सुरूपं वा विरूपं वा पुमानित्येव भुञ्जते ।। 14 ।।
ऐसा करने वाली स्त्रियां पुरुष के रूप अथवा आयु का कोई विचार नहीं करतीं। इन्हें तो केवल पुरुष के पुरुष होने से ही मतलब है और वे किसी भी पुरुष के समक्ष संसर्ग के लिए उपस्थित हो जाती हैं।
पाँश्चल्याच्चलचित्ताच्च नस्नेह्याच्च स्वभावतः ।
रक्षिता यत्नतोऽपीह भर्तृष्वेता विकुर्वते ।। 15 ॥
स्त्रियां चूंकि स्वभाव से ही पर पुरुषों पर रीझने वाली, चंचल व अस्थिर अनुराग वाली होती हैं अतः यत्नपूर्वक रक्षित होने पर भी वे पति को धोखा दे देती हैं।
एवं स्वभावं ज्ञात्वाऽऽसां प्रजापतिनिसर्गजम् ।
परमं यत्नमातिष्ठेत्पुरुषो रक्षणं प्रति ॥ 16 ।।
जब से ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की तब से लेकर आज तक स्त्रियों के स्वभाव को ऐसा ही जानकार पुरुषों का कर्तव्य है कि वे स्त्रियों की रक्षा के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहें।
शय्यासनमलङ्कारः कामं क्रोधमनार्जवम् ।
द्रोहभावं कुचर्या च स्त्रिभ्यो मनुरकल्पयत् ॥ 17 ।।
मनु महाराज के विचार में ब्रह्मा जी ने स्त्रियों में कुछ प्रवृत्तियां सहज ही पायी हैं जैसे-उत्तम शय्या व आभूषणों का मोह, काम, क्रोध, जटिल स्वभाव, ईर्ष्या, द्रोह भाव के कुचर्या।
नास्ति स्त्रीणां क्रियामन्त्रैरिति धर्मे व्यवस्थितिः ।
निरिन्द्रियाः ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमितिस्थितिः ।। 18 ॥
शास्त्र की यह मर्यादा है कि स्त्रियों के जातकर्म व नामकर्म संस्कारों में वेदमंत्रों का उच्चारण न हो। निरेन्द्रिय व अमंत्रा होने के कारण स्त्रियों की स्थिति ही असत्य रूप होती है।
तथा च श्रुतयो बह्वयो निगीता निगमेष्वपि।
स्वालक्षण्यपरीक्षार्थं तासां शृणुत निष्कृतीः ॥ 19 ॥
वेदों में स्त्रियों के सहज दुराचरण के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। उन दोषों से स्त्रियों को किस प्रकार पवित्र किया जाए- इस संदर्भ में कुछ बातें यहां वर्णित हैं।
यन्मे माता प्रलुलुभे विचरन्त्यऽपतिव्रता।
तन्मे रेतः पिता वृक्तामित्यस्यैतन्निदर्शनम् ।। 20 ॥
वेदों का एक प्रसंग है- मां के बुरे विचारों से खिन्न पुत्र कहता है- परपुरुष की आकांक्षा से अपवित्र हुई मेरी मां की योनि का मेरे पिता के वीर्य द्वारा शोधन होना चाहिए।
ध्यायत्यनिष्टं यत्किञ्चित्पाणिग्राहस्य चेतसा ।
तस्यैष व्यभिचारस्य निह्नवः सम्यगुच्यते ॥ 21 ॥
यदि विवाहिता स्त्री के हृदय में परपुरुष से सहवास की कामना उठती है तो वैचारिक व्यभिचार के पाप के शुद्धीकरण का मंत्र इस प्रकार है।
यादृग्गुणेनभर्चा स्त्री संयुज्येत यथाविधिः ।
तादृग्गुणा सा भवति समुद्रेणेव निम्नगाः ।। 22 ।।
स्त्रियां पति के अनुरूप ही समाज में अपनी प्रतिष्ठा बनाती हैं ठीक जिस प्रकार नदियां समुद्र में विलीन होकर समुद्र का ही रूप ले लेती हैं।
अक्षमाला वसिष्ठेन संयुक्ताऽधमयोनिजा ।
शारंगी मन्दपालेन जगामभ्यर्हणीयताम् ।। 23 ।।
नीच कुल में जन्मी अक्षमाला ने महर्षि वशिष्ठ से विवाह करके तथा सामान्य कुल की शारंगी ने मन्दपाल से विवाह कर समाज में अति प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त किया।
एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्टप्रसूतयः ।
उत्कर्षं योषिताः प्राप्ताः स्वैः स्वैः भर्तृगुणैः शुभैः ।। 24 ।।
अधम योनि में जन्म लेकर भी अपने पतियों के सदाचरण व कल्याणकारी गुणों से समाज में प्रतिष्ठा पाने वाली अनेक स्त्रियां हुई हैं।
एषोदिता लोकयात्रा नित्यंस्त्रीपुंसयोः शुभा।
प्रेत्येह च सुखोदर्कान्ग्रजा धर्मान्निबोधतः ।। 25 ।।
भृगु जी ने कहा- ब्राह्मणो! यह उपर्युक्त स्त्री-पुरुषों के नित्य लोक-व्यवहार का वर्णन था। अब मैं आपसे इस लोक एवं परलोक में सुख देने वाली संतान का धर्म कहता हूं।
प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हाः गृहदीप्तयः ।
स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन ।। 26 ।।
स्त्रियां चूंकि संतान को जन्म देती हैं अतः वे शुभ, पूजनीय व घर की आभा हैं। घर में स्त्री व लक्ष्मी के बीच कोई विशेष अंतर नहीं।
उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम्।
प्रत्यहं लोकयात्रायाः प्रत्यक्षं स्त्रीनिबन्धनम् ॥ 27 ॥
स्त्री ही संतान को जन्म देने, उसका पालन-पोषण करने, प्रतिदिन के लोक व्यवहार, वृद्धों की सेवा व अतिथि सत्कार तथा धर्मानुष्ठानादि इन सभी कार्यों का आधार स्तम्भ है।
अपत्यं धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तमा ।
दाराधीनस्तथा स्वर्गः पितृणामात्मनश्च हि ॥ 28 ।।
गृहस्थ जीवन के सभी कार्य अर्थात् संतानोत्पत्ति, धर्मकार्य, सेवा, उत्तम रति, पितरों का उद्धार व स्वर्ग के दिव्य सुखों की प्राप्ति- ये सब स्त्री के ही अधीन हैं अर्थात् स्त्री के माध्यम से ही संभव हैं।
पतिं वा नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता ।
सा भर्तृलोकमवाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते ।। 29 ।।
जो स्त्री अपने मन, वचन व शरीर को संयत रखती है तथा पति से इतर पुरुष की इच्छा भी नहीं करती वह स्त्री इस लोक में 'पतिव्रता' अर्थात् साध्वी कही जाती है तथा मृत्यु उपरांत पतिलोक को प्राप्त करती है।
व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोके प्राप्नोति निन्द्यताम् ।
शृगालयोनिं चाप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते ॥ ३० ॥
यदि विवाहित स्त्री परपुरुष का संग करती है तो वह इस लोक में निन्दित होती है, अनेक योनि सम्बन्धी रोगों से ग्रस्त हो जाती है तथा मृत्यु के बाद गीदड़ी के रूप में जन्म लेती है।
पुत्रं प्रत्युदितं सद्भिः पूर्वजैश्च महर्षिभिः ।
विश्वजन्यमिमं पुण्यमुपन्यासं निबोधत ॥ 31 ॥
भृगु जी ने कहा-विप्रो ! प्राचीन श्रेष्ठ मुनियों ने पुत्र के सम्बन्ध में जो शुभ, पवित्र व लोकहितकारी मत रखे हैं- अब आप उनको सुनें।
भर्तुः पुत्रं विजानन्ति श्रुतिद्वैधं तु भर्तरि ।
आहुरुत्पादकं केचिदपरे क्षेत्रिणं विदुः ।। 32 ।।
लोग जानते ही हैं कि पुत्र, पति का ही रूप होता है किंतु संतान को उत्पन्न करने वाला या स्त्री का स्वामी- इन दोनों में से किसकी संतान को मान्यता देनी चाहिए-इस विषय में मतभेद हो सकते हैं।
क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृतः पुमान् । क्षेत्रबीजसमायोगात्सम्भवः सर्वदेहिनाम् ॥ 33 ॥
स्त्री को क्षेत्ररूप तथा पुरुष को बीजरूप समझा जाता है। क्षेत्र व बीज के समायोग से ही सभी देहधारियों की उत्पत्ति संभव होती है।
विशिष्टं कुत्रचिबीजं स्त्रीयोनिस्त्वेव क्वचित्।
उभयं तु समं यत्र सा प्रसूतिः प्रशस्यते ।। 34 ।।
कुछ परिस्थितियों में बीज-विशिष्ट होता है तो कुछ में स्त्री का योनिरूप क्षेत्र। जहां दोनों की समान स्थिति हो वहीं श्रेष्ठ संतान का जन्म होता है।
बीजस्य चैव योन्याश्च बीजमुत्कृष्टमुच्यते ।
सर्वभूतप्रसूतिर्हि बीजलक्षणलक्षिता ।। 35 ।।
बीज व क्षेत्र में बीज को ही श्रेष्ठ कहा गया है क्योंकि सभी जीवों के जन्म को बीज के लक्षणों के अनुरूप ही देखा जाता है।
यादृशं तूप्यते बीजं क्षेत्रे कालोपपादिते।
तादृग्रोहति तत्तस्मिन्बीजं स्वैर्व्यञ्जितैर्गुणैः ॥ 36 ॥
जिस प्रकार का बीज उचित ऋतु में क्षेत्र में रोपा जाता है उसी प्रकार के गुणों से युक्त होकर ही वह क्षेत्र में जन्म लेता है।
इयं भूमिर्हि भूतानां शाश्वती योनिरुच्यते ।
न च योनिगुणान् कांश्चिद्बीजं पुश्यति पुष्टिषु ।। 37 ॥
इस धरती को प्राणियों की उत्पत्ति करने वाली सनातन योनि माना गया है। बीज योनि के गुणों को संवर्द्धित नहीं करता बल्कि अपने ही गुणों को प्रकाशित करता है।
भूमावप्येककेदारे कालोप्तानि कृषीबलैः ।
नानारूपाणि जायन्ते बीजानीह स्वभावतः ।। 38 ॥
जिस प्रकार किसान एक ही खेत में समयानुसार भिन्न-भिन्न बीज रोपते हैं तथा उन्हीं बीजों के अनुरूप फसल प्राप्त करते हैं- यह इस बात की पुष्टि करता है कि फसल में क्षेत्र के नहीं बीज के गुण आते हैं।
ब्रीहयः शालयोमुद्गस्तिला माषास्तथा यवाः ।
यथा बीजं प्ररोहन्ति लशुनानीक्षवस्तथा ॥ 39 ॥
जिस प्रकार के बीज बोए जाते हैं- धान, मूंग, तिल, उड़ जौ, लहसुन तथा ईखादि-वैसी ही फसल पैदा होती है।
अन्यदुप्तं जातमन्यदित्येतन्नोपपद्यते ।
उप्यते यद्धि यद्बीजं तत्तदेव प्ररोहति ।। 40 ।।
बोया कुछ और जाए लेकिन पैदा कुछ और हो - ऐसा कदापि नहीं होता। जिस वस्तु का बीज बोया जाता है वही वस्तु पैदा होती है।
तत्प्राज्ञेन विनीतेन ज्ञानविज्ञानवेदिना।
आयुष्कामेनष्वतव्यं न जातु परयोषिति ॥ 41 ।।
जो पुरुष बुद्धिमान, शिष्ट, विज्ञानवेत्ता और दीर्घायु आकांक्षी है उसे कभी भी पराए क्षेत्र में (परायी स्त्री) में बीजारोपण नहीं करना चाहिए।
नश्यतीषुर्यथाविद्धः खेविद्धमनुविध्ययः ।
तथा नश्यति वैक्षिप्तं बीजं परपरिग्रहे ।। 42 ।।
जिस प्रकार पहले से ही बिंधे मृग को बींधने के लिए छोडा गया बाण व्यर्थ होता है-ठीक उसी प्रकार दूसरे क्षेत्र में रोपा गया गया बीज भी निष्फल हो जाता है।
पृथोरषीमां पृथिवीं भार्या पूर्वविदो विदुः ।
स्थाणुच्छेदस्य केदारमाहुः शल्यवतो मृगम् ॥ 43 ।।
इस विषम धरातल वाली पृथ्वी को राजा पृथु ने समतल किया था- इसीलिए इस धरती का नाम हुआ-पृथ्वी ।
एतावानेव पुरुषो यज्जायात्मा प्रजेति ह।
विप्राः प्राहुस्तथा चैतद्या भर्त्ता सा स्मृताङ्गना ।।॥ 44 ॥
वेदवेत्ता ब्राह्मणों के अनुसार स्त्री, स्वयं पुरुष व संतान- इन तीनों को संयुक्त रूप से पुरुष कहा जाता है। इस प्रकार पति ही पत्नी है और पति ही पुत्र है।
न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या विमुच्यते ।
एवं धर्म विजानीमः प्राक्प्रजापतिनिर्मितम् ॥ 45 ।।
पति चाहे स्त्री को बेच दे या उसका परित्याग कर दे, किन्तु वह उसकी पत्नी ही कहलाती है- प्रजापति द्वारा स्थापित यही सनातन धर्म है।
सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते।
सकृदाह ददामीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् ॥ 46 ॥
इस संसार में धन का बंटवारा, कन्या दान व वचन एक बार ही किया जाता है, सत्पुरुष इन विषयों में बदलते नहीं।
यथा गोऽश्वोष्टदासीषु महिष्यजाविकासु च।
नोत्पादकः प्रजाभागी तथैवान्याङ्गनास्वपि ॥ 47 ॥
दूसरे की स्त्री में बीजारोपण करने वाला व्यक्ति संतान का स्वामी उसी प्रकार नहीं कहलाता जिस प्रकार गाय, अश्व, ऊंटनी, दासी, भैंस व बकरी में संतानोत्पत्ति करने वाले पशु एवं उसके स्वामी संतान के मालिक नहीं बन सकते।
येऽक्षेत्रिणः बीजवन्तः परक्षेत्रप्रवापिणः ।
ते वै सस्यस्य जातस्य न लभन्ते फलं क्वचित् ॥ 48 ।।
दूसरों के खेत में बीज बोने वाले जन उस खेत में होने वाले अन्न-धान्यादि के अधिकारी नहीं होते, ठीक उसी प्रकार दूसरे की पत्नी से संतान उत्पन्न करने वाले का संतान पर कोई अधिकार नहीं बनता।
यदन्यगोषु वृषभो वत्सानां जनयेच्छतम्।
गोमिनामेव ते वत्साः मोघं स्कन्दितमाषभम् ॥ 49 ॥
दूसरे की गायों से सौ बछडों को जन्म देने वाले सांड या उसके मालिक का उन पर कोई अधिकार नहीं होता बल्कि गाय के स्वामी का उन पर अधिकार होता है। अतः सांड द्वारा वीर्य का आरोपण व्यर्थ जाता है।
तथैवाऽक्षेत्रिणो बीजं परक्षेत्रप्रवापिणः ।
कुर्वन्ति क्षेत्रिणामर्थं न बीजीलभते फलम् ॥ 50 ॥
इसी प्रकार जिस व्यक्ति के पास अपना खेत नहीं, वह यदि दूसरे के खेत में बीजारोपण करता है तो वह खेत के स्वामी के लिए ही लाभप्रद होता है। बीज वाले व्यक्ति का फल पर कोई अधिकार नहीं बनता।
फलं त्वनभिसन्धाय क्षेत्रिणां बीजिनां तथा।
प्रत्यक्षं क्षेत्रिणामर्थो बीजाद्योनिर्गरीयसी ।। 51 ॥
बीज वाला व्यक्ति यदि फल का विभाजन किए बिना दूसरे के खेत में बीज रोपता है तो प्रत्यक्षतः उससे खेत के स्वामी को ही लाभ मिलता है। इसीलिए योनि को बीज से अधिक शक्तिशाली समझा जाता है।
क्रियाभ्युपगमात्त्वेतद्बीजार्थं यत्प्रदीयते।
तस्येह भागिनौ दृष्टौ बीजी क्षेत्रिक एव च ॥ 52 ॥
यदि फल के विभाजन का निर्णय करके ही दूसरे के खेत में बीज बोया जाता है तो पूर्व निश्चित निर्णय के अनुसार ही खेत का स्वामी फल का अधिकारी होता है।
ओघवाताहृतं बीजं यस्य क्षेत्रे प्ररोपति।
क्षेत्रिकस्यैव तद्बीजं न वप्ता लभते फलम् ॥ 53 ॥
यदि बीज हवा के तेज झोंके से दूसरे खेत में जा गिरता है तो उस बीज के फल पर बीज वाले का नहीं वरन् खेत के स्वामी का अधिकार होता है।
एष धर्मों गवाश्वस्य दास्युष्ट्राजाविकस्य च।
विहङ्गमहिषीणां च विज्ञेयः प्रसवं प्रति ॥ 54 ॥
पशुओं अर्थात् गाय, घोड़ी, ऊंटनी, बकरी, भेड़, पक्षी और भैंसादि तथा दासी के संदर्भ में भी संतान विषयी यही नियम सर्वमान्य है।
एतद्वः सारफल्गुत्वं बीजयोन्योः प्रकीर्तितम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि योषितां धर्ममापदि ॥ 55 1
महर्षियो। बीज व योनि की प्रधानता अप्रधानता का मैंने विस्तार से विवरण दिया। अब मैं आपात्काल में स्त्रियों के धर्म के सम्बन्ध में आपको बतलाता हूं।
भ्रातुर्येष्ठस्य भार्या या गुरुपल्यनुजस्य सा।
यवीयसस्तु या भार्या स्नुषा ज्येष्ठस्य सा स्मृता ।। 56 ॥
छोटे भाई के लिए बड़े भाई की पत्नी गुरु पत्नी तुल्य है और छोटे भाई की पत्नी बड़े भाई के लिए पुत्रवधू जैसी होती है।
ज्येष्ठो यवीयसो भार्यां यवीयान् वाग्रजस्त्रियम् ।
पतितौ भवतो गत्वा नियुक्तावप्यनापदि ॥ 57 ॥
यदि बड़ा भाई छोटे भाई की पत्नी तथा छोटा भाई बड़े भाई की पत्नी से संकट की परिस्थिति (संतान के अभाव) के अलावा नियोग विधि से भी सम्भोग करता है तो वे दोनों धर्मभ्रष्ट हो जाते हैं।
देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रियासम्यङ् नियुक्तया । प्रजेप्सिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये ।। 58 ॥
जो स्त्री संतान न होने के कारण संतान की इच्छा से नियोग के लिए प्रस्तुत होती है, उससे स्त्री के देवर अथवा सजातीय पुरुष को सहवास कर लेना चाहिए।
विधवायां नियुक्तस्तु घृताक्तो वाग्तोनिशि ।
एकमुत्पादयेत्पुत्रं न द्वितीयं कथञ्चन ॥ 59 ॥
जो पुरुष छोटे अथवा बड़े भाई की विधवा स्त्री से नियोग करता है उसे रात्रि में शरीर पर घी मलकर तथा मौन रहकर सहवास करना चाहिए और ऐसा केवल एक पुत्र उत्पन्न करने के उद्देश्य से करना चाहिए।
द्वितीयमेके प्रजनं मन्यन्तेस्त्रीषु तद्विदः ।
अर्निर्वृत्तं नियोगार्थं पश्यन्तोधर्मतस्तयोः ।। 60 ।।
जो विद्वान नियोग से संतानोत्पत्ति के नियमों की गहन जानकारी रखते हैं उनका यह भी विचार है कि नियोग के उद्देश्य की पूर्ति न होने पर (अर्थात् प्रथम पुत्र के रोगी होने पर) दूसरा पुत्र उत्पन्न करना धर्मोचित ही है।
विधवायां नियोगार्थे निर्वृत्ते तु यथाविधि।
गुरुवच्च स्नुषावच्च वत्तेयातां परस्परम् ॥ 61।।
जब विधवा स्त्री से नियोग द्वारा पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है तो छोटा भाई बडे भाई की पत्नी से गुरु पत्नी तुल्य व बड़ा भाई छोटे भाई की पत्नी से पुत्रवधू जैसा ही व्यवहार करे।
नियुक्तौ यौ विधिं हित्वा वर्त्तयातां तु कामतः ।
तावुभौ पतितौ स्यातां स्नुषागगुरुतल्पगौ ।। 62 ॥
यदि नियोग के उद्देश्य से नियुक्त छोटा व बड़ा भाई अपनी भाभियों से विधि को त्याग कर सुख-भोग के लिए सहवास करने लगते हैं तो वे धर्म से भ्रष्ट हो जाते हैं। बड़ा भाई पुत्रवधू से तथा छोटा भाई गुरु पत्नी से सहवास करने के लिए दण्डनीय हो जाते हैं।
अन्यस्मिन्विधवा नारी नियोक्तव्या द्विजातिभिः ।
अन्यस्मिन्हि नियुञ्जाना धर्म हन्युः सनातनम् ।। 63 ॥
द्विजातीय अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य वर्ण की विधवा स्त्री को अपने वर्ण से भिन्न पुरुष से नियोग नहीं करना चाहिए। ऐसे नियोग से उत्पन्न संतान धर्म का विनाश करने वाली होती है।
नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित्।
न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुनः ॥ 64 ।।
जो वेद मंत्र विवाह के सम्बन्ध में कहे गए हैं, उनमें न तो नियोग का वर्णन है और न ही विधवा विवाह का।
अयं द्विजैर्हिविद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः ।
मनुष्याणामपि प्रोक्तो वेने राज्यं प्रशासति ॥ 65 ॥
नियोग का प्रयोग राजा वेन के शासनकाल में अवश्य हुआ था लेकिन तब भी विद्वज्जनों ने इसे पशुधर्म कहा था और मनुष्यों के लिए निषिद्ध बताया था।
स महीमखिलां भुञ्जन् राजर्षिप्रवरः पुरा।
वर्णानां संकरं चक्रे कामोपहतचेतनः ।। 66 ।।
जो राजा वेन सम्पूर्ण धरती को भोगने वाला तथा श्रेष्ठ राजर्षि के रूप में सम्मानित तथा आदरणीय था, कामवासना के वशीभूत हो उसी राजा ने वर्णसंकर संतान उत्पन्न करने के दुष्चक्र का आरंभ किया।
ततः प्रभृति यो मोहात्प्रमीतपतिकां स्त्रियम् ।
नियोजयत्यरत्यार्थं तं विगर्हन्ति साधवः ॥ 67 ।।
साधु व विद्वान तभी से राजा वेन के इस दुष्कर्म को देखकर संतान के मोह के वशीभूत हो विधवा से नियोग करने की भी भर्त्सना करते हैं।
यस्याः नियेत कन्यायाः वाचा सत्ये कृते पतिः ।
तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः ।। 68 ॥
यदि कन्या के विवाह के पश्चात् उसके पति की मृत्यु हो जाए तो कन्या के देवर द्वारा विधि-विधान पूर्वक उसे ग्रहण किया जाना चाहिए।
यथा विध्यधिगम्यैनां शुक्लवस्त्रां शुचिव्रताम्।
मिथो भजेतां प्रसवात्सकृत्सकृदृतावृतौ ।। 69 ॥
पवित्र व्रत वाली तथा शुक्ल वस्त्रधारी भाभी से देवर संतानोत्पत्ति के उद्देश्य की पूर्ति हो जाने तक संसर्ग करे तथा स्त्री के गर्भवती होते ही वे दोनों अलग हो जाएं।
न दत्त्वा कस्यचित्कन्यां पुनर्दद्याद्विचक्षणः ।
दत्त्वा पुनः प्रयच्छन् हि प्राप्नोति पुरुषोऽनृतम् ॥ 70 ॥
विवेकशील पुरुष को चाहिए कि एक बार अपनी कन्या का (विवाह में) दान कर पुनः उसका विवाह न करे। जो व्यक्ति एक बार कन्यादान करके फिर उससे इन्कार कर देता है और अपनी कन्या किसी दूसरे को दे देता है वह झूठ बोलने का अपराध करता है।
विधिवत्प्रतिगृह्यापि त्यजेत्कन्यां विगर्हिताम्।
व्याधितां विप्रदुष्टां वा छद्मनाचोपपादिताम् ॥ 71 ॥
यदि विधिपूर्वक विवाह में ग्रहण की गई कन्या निन्दित, रोगग्रस्त या छलपूर्वक दी गई सिद्ध होती है तो वह परित्याग के योग्य ही होती है।
यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्यायोपपादयेत् ।
तस्य तद्वितथं कुर्यात् कन्या दातुर्दुरात्मनः ।। 72 ।।
जो कन्या दोषपूर्ण है-उसके दोषों को बिना बताए उसका सम्बन्ध विवाह में स्थापित करने वाले दुष्ट व्यक्ति के इस काम को निष्फल कर देना चाहिए अर्थात् विवाह सम्बन्ध विच्छेद कर देना चाहिए।
विधाय वृत्तिं भार्यायाः प्रवसेत कार्यवान्नरः ।
अवृत्तिकर्षिता हि स्त्री प्रदुष्येत्थितिमत्यपि ।। 73 ॥
यदि व्यक्ति को कार्यवश विदेश जाना पड़ता है तो उसे अपने पीछे पत्नी के भरण-पोषण का समुचित प्रबंध करके जाना चाहिए क्योंकि भूख से पीड़ित स्त्री शील व सदाचार युक्त हो, तो भी पतित हो सकती है।
विधाय प्रोषिते वृत्तिं जीवेन्नियममास्थिता।
प्रोषितो त्वविधायैव जीवेच्छिल्पैरगर्हितैः ।। 74 ।।
पुरुष यदि पत्नी के भरण-पोषण का उचित प्रबन्ध करके ही विदेश जाता है तो पत्नी को संयम व नियम अनुसार ही आचरण करना चाहिए।
प्रोषितो धर्मकार्यार्थ प्रतीक्ष्योऽष्टौ नरः समाः।
विद्यार्थं षड्यशसोऽर्थं वा कामार्थत्रींस्तुवत्सरान् ।। 75 ।।
पति धर्म कार्य के लिए विदेश जाता है तो पत्नी आठ वर्ष, विद्या-यशोपलब्धि के लिए पति के विदेश जाने पर छः वर्ष तथा व्यापार के उद्देश्य से पति द्वारा विदेश गमन पर पत्नी को तीन वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए।
संवत्सरं प्रतीक्षेत द्विषन्तीं योषितं पतिः ।
ऊर्ध्वं संवत्सरात्त्वेनां दायं हृत्वा न संवसेत् ॥ 76 ॥
पति का कर्त्तव्य है कि वह द्वेष करने वाली पत्नी (में परिवर्तन) की एक वर्ष तक प्रतीक्षा करे। यदि वह इस अवधि में स्वयं को न बदल पाए तो पति को उसके सारे आभूषण छीनकर उससे सम्बन्ध विच्छेद कर लेना चाहिए।
अतिक्रामेत्प्रमत्तं या मत्तं रोगार्तमेव वा।
सा त्रीन्मासान्परित्याज्या विभूषण परिच्छदा ॥ 77 ॥
जो स्त्री अपने आलसी, नशा करने वाले अथवा रोगग्रस्त पति की आज्ञा का उल्लंघन करती है उसे तीन माह के लिए वस्त्राभूषण उतार कर अलग कर देना चाहिए।
उन्मत्तं पतितं क्लीवमबीजं पापरोगिणम् ।
न च त्यागोऽस्ति द्विषन्त्याश्च न दाया प्रवर्तनम् ।। 78 ॥
यदि पत्नी पागल, पतित, नपुंसक, क्षीणवीर्य, रोगग्रस्त, पाप कर्मों में रत तथा पति से घृणा करने वाली हो तो भी पति उसका परित्याग न करे न ही उसका धन छीने।
मद्यपाऽसाधुवृत्ता वा प्रतिकूला च या भवेत्।
व्याधिताबाधि वेत्तव्या हिंसार्थघ्नी च सर्वदा ॥ 79 ॥
किंतु यदि पत्नी मदिरापान करने वाली, व्यभिचारिणी, पति के विरुद्ध चलने वाली, रोगग्रस्त, भूताविष्ट व उत्पात मचाने वाली हो तो पति द्वारा दूसरा विवाह करने का विधान है।
वन्ध्याऽष्टमेधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजा।
एकादशे स्त्री जननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ।। 8० ॥
पत्नी यदि वन्ध्या हो, मृत बच्चों को अथवा केवल कन्याओं को ही जन्म दे तो विवाह के क्रमशः आठवें, दसवें व ग्यारहवें वर्ष में पति दूसरा विवाह करने का अधिकारी है। कटुभाषिणी स्त्री का पति तत्काल दूसरा विवाह कर सकता है।
या रोगिणीस्यात्तुहिता संपन्ना चैव शीलतः ।
साऽनुज्ञाप्याधिवेत्तव्या नावमान्या च कर्हिचित् ॥ 81 ॥
स्त्री के बहुत दिनों से रोगी होने पर किन्तु चरित्र की धनी तथा पति का हित चाहने वाली होने पर पति को चाहिए कि वह पत्नी की अनुमति लेकर ही दूसरा विवाह करे।
अधिविन्ना तु या नारीनिर्गच्छेद्रुषिता गृहात् ।
सा सद्यः सन्निरोधव्या त्याज्या वा कुलसन्निधौ ।। 82 ।।
यदि दूसरी स्त्री के आने से पहली पत्नी रूठ कर घर छोड़कर जाने लगे तो उसे या तो समझा कर घर पर रोक लेना चाहिए या उसे शांतिपूर्वक उसके मायके पहुंचा देना चाहिए।
प्रतिषिद्धापि चेद्या तु मद्यसभ्युदयेष्वपि ।
प्रेक्षासमाजं गच्छेद्वा सा दण्ड्या कृष्णलानि षट् ॥ 8३ ॥
जो स्त्री विवाहादि समारोहों में रोके जाने पर भी मदिरापान करे या नाच-तमाशे में जाए तो उस पर छः कृष्णल राजदण्ड लगाने का विधान है।
यदि स्वांश्चापरांश्चैव विन्देरन्योषितो द्विजाः ।
तासां वर्णक्रमेण स्याज्यैष्ठं पूजा च वेश्म च ॥ 84 ॥
जो द्विजातीय पुरुष अपनी जाति की स्त्रियों से या अन्य जाति की स्त्रियों से विवाह करते हैं उनकी कुलीनता वर्णक्रम से ही मानी जानी चाहिए अर्थात् वह ब्राह्मण जो क्षत्रिय स्त्री से विवाह करता है उस ब्राह्मण की अपेक्षा हीन है जो ब्राह्मणी से विवाह करे।
भर्तुः शरीरशुश्रूषां धर्मकार्य च नैत्यिकम् ।
स्वा चैव कुर्यात्सर्वेषां नाऽस्वजातिः कथञ्चन ॥ 85 ॥
पति की सेवा-शुश्रूषा करना तथा प्रतिदिन के धर्म कार्य सजातीय स्त्री को करने चाहिए, विजातीय स्त्री को नहीं। उदाहरण के लिए यदि क्षत्रिय पुरुष ने क्षत्रिय तथा वैश्य कन्या से विवाह किया है तो पुरुष की सेवा तथा यज्ञादि में उसके साथ बैठने का अधिकार केवल क्षत्रिय कन्या को ही होता है।
यस्तु तत्कारयेन्मोहात्सजात्या स्थितयाऽन्यया।
यथा ब्राह्मणचाण्डालः पूर्वद्रष्टस्तथैव सः ॥ 86 ।।
यदि एक व्यक्ति सजातीय को छोड़कर मोहवश अन्य जाति वालों से सेवादि कार्य कराए तो वह ब्राह्मण के चाण्डाल रूप में पतित होने जितना ही भ्रष्ट हो जाता है।
उत्कृष्टायाभिरूपाय वराय सदृशाय च।
अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद्यथाविधिः ।। 87 ।।
यदि सभी तरह से श्रेष्ठ गुण सम्पन्न, सुन्दर, सदाचारी व समान कुल गौरव वाला वर उपलब्ध हो तो उससे अपनी उस कन्या का भी विवाह कर देना चाहिए जो अभी युवा न हुई हो।
काममामरणात्तिष्ठेत् गृहे कन्यर्तुमत्यपि।
न चैवेनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ॥ 88 ।।
चाहे कन्या ऋतुमती होकर जीवन पर्यंत पिता के घर कुंआरी ही रहती रहे किंतु उसका विवाह गुणहीन अयोग्य पुरुष से नहीं करना चाहिए।
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत् कुमार्यतुमती सती।
ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद्विन्देत सदृशं पतिम् ॥ 89 ।।
ऋतुमती होने के पश्चात् कन्या तीन वर्षों तक पिता द्वारा वर चुने जाने की प्रतीक्षा करे। यदि इस समय में पिता ऐसा न कर पाए तो कन्या को स्वयं किसी योग्य व्यक्ति के साथ विवाह कर लेना चाहिए।
अदीयमाना भर्तारमधिगच्छेद्यदि स्वयम् ।
नैनः किञ्चिदवाप्नोति न च यं साधिगच्छति ॥ 9० ॥
उपर्युक्त अवधि के पश्चात् पिता द्वारा विवाह में न दी गई कन्या स्वयं अपने लिए वर चुन ले तो न तो वह स्वयं पाप करती है न ही उससे विवाह करने वाला कोई पाप करता है।
अलङ्कारं नाददीत पित्र्यं कन्या स्वयंवरा।
मातृकभ्रातृदत्तं वा स्तेना स्याद्यदि तं हरेत् ॥ 91 ||
जो कन्या स्वयं अपने लिए वर निश्चित करती है उसे माता, पिता व भाई द्वारा दिए गए आभूषणों को ले जाने का अधिकार नहीं है। उनके दिए गए अलंकारों को न लौटाना चोरी के समान है।
पित्रे न दद्याच्छुल्कं तु कन्यामृतुमतीं हरन्। स हि स्वाम्यादतिक्रामेदृतूनां प्रतिरोधनात् ॥ 92 ॥
जो पुरुष ऋतुमती कन्या का हरण करता है उसे कन्या के पिता को शुल्क देने की जरूरत नहीं, क्योंकि कन्या के लिए उचित वर न खोज पाने के कारण पिता शुल्क के अधिकार से वंचित हो जाता है।
त्रिंशद्वर्षेद्वहेत्कन्यां हृद्यां द्वादशवार्षिकीम् । त्र्यष्टवर्षोष्ठवर्षां वा धर्मे सीदति सत्वरः ॥ 93 ॥
यदि तत्काल कर्म न करने से धर्म रक्षा में रुकावट उत्पन्न होती हो तो तीस व चौबीस वर्ष के पुरुष को क्रमशः बारह व आठ वर्ष की कन्या का पाणिग्रहण कर लेना चाहिए।
देवदत्तां पतिर्भार्यां विन्दते नेच्छत्यात्मनः ।
तां साध्वीं बिभृयान्नित्यं दीनां प्रियमाचरन् ।। 94 ।।
वास्तविकता यह है कि पुरुष स्वेच्छा से नहीं, वरन् देवों द्वारा पूर्व-निर्धारित स्त्री को ही पत्नी रूप में पाता है। देवों के प्रति अपनी श्रद्धा दर्शाने के लिए पुरुष का कर्तव्य है कि वह अपने पर निर्भर पत्नी का भरण-पोषण करे।
प्रजनार्थं स्त्रियः सृष्टा सन्तानार्थं च मानवाः ।
तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतोपल्यासहोदितः ॥ 95 ।।
पुरुषों को गर्भ आरोपण व स्त्रियों को गर्भधारण करना संतान उत्पन्न करने के उद्देश्य से ही ईश्वर द्वारा निर्धारित किया गया है। इसी कारण से वेदों में भी स्त्री व पुरुष के सहधर्म का विवरण है।
कन्यायां दत्तशुल्कायां नियेत् यदि शुल्कदः ।
देवराय प्रदातव्या यदि कन्याऽनुमन्यते ॥ 96 ।।
यदि कन्या का शुल्क देने वाला संयोगवश मृत्यु को प्राप्त होता है तो कन्या की सहमति प्राप्त कर उसका विवाह मृत पुरुष के भाई के साथ कर दिया जाना चाहिए।
आददीत न शूद्रोऽपि शुल्कं दुहितरं ददन् ।
शुल्कं हि गृह्णन्कुरुते छन्नं दुहितृ विक्रयम् ॥ 97 ॥
द्विजातियों को ही नहीं वरन् शूद्र को भी अपनी कन्या के विवाह के दौरान वर पक्ष से कोई शुल्क नहीं लेना चाहिए। कन्या के बदले शुल्क लेना तो एक प्रकार उसका विक्रय करना है जो गंभीर पाप कर्म है।
एतत्तु न परे चक्कुर्नापरे जातु साधवः ।
यदन्यस्य प्रतिज्ञाय पुनरन्यस्य दीयते ॥ 98 ॥
प्राचीनकाल में तथा वर्तमान में भी सज्जन पुरुष यदि एक बार कन्या दान कर देते हैं तो फिर दूसरे को नहीं देते।
नानुशुश्रुम जात्वेतत्पूर्वेष्वपि जन्मसु ।
शुल्कसंज्ञेन मूल्येन छन्नं दुहितृविक्रयम् ॥ 99 ।।
ब्राह्मणो ! शुल्क के रूप में मूल्य लेकर प्रच्छन्न रूप से कन्या को बेचने का प्रचलन हमने अपने पूर्वजों से कभी नहीं सुना।
अन्योऽन्यस्याव्यभिचारो हि भवेदामरणान्तिकः ।
एष धर्मः समासेन ज्ञेयः स्त्रीपुंसयोः परः ।। 100 ।।
परस्पर विवाह होने के बाद भी विषय भोग में लिप्त न होने को ही स्त्री-पुरुष का उत्तम धर्म मानना चाहिए।
तथा नित्यं यतेयातां स्त्रीपुंसौ तु कृतक्रियौ।
यथा नाभिचरेतां तौ वियुक्तावितरेतरम् ॥ 101 ।।
एक बार यदि स्त्री-पुरुष दम्पति बन जाते हैं तो उनका निरंतर प्रयास रहना चाहिए कि वे पति-पत्नी बने रहें, कभी एक-दूसरे से अलग न हों।
एष स्त्रीपुंसयोरुक्तो धर्मो यो रतिसंहितः ।
आपद्यपत्यप्राप्तिश्च दायभागं निबोधत् ॥ 102 ॥
भृगु जी ने कहा- हे ऋषियो! स्त्री व पुरुष के पारस्परिक प्रेमयुक्त धर्म व आपात्काल में संतान प्राप्ति के नियमों के सम्बन्ध में मैंने आपको जानकारी दी। अब मैं आपको सम्पत्ति के अधिकार सम्बन्धी विधान का विवरण देता हूं।
ऊर्ध्वं पितुश्च मातुश्च समेत्य भ्रातरः समम् ।
भजेरन्यैतृकं रिक्थमनीशास्ते हि जीवतोः ।। 103 ।।
माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् सभी भाइयों को उनकी सम्पत्ति समान रूप से विभाजित कर लेनी चाहिए। किंतु यदि माता-पिता जीवित हैं तो पुत्रों को ऐसा कोई अधिकार नहीं कि वे उनकी सम्पत्ति आपस में बांटें।
ज्येष्ठ एव तु गृह्णीयात्पित्र्यं धनमशेषतः ।
शेषास्तमुपजीवेयुर्यथैवं पितरं तथा ।। 104 ॥
दूसरा विधान यह है कि माता-पिता की मृत्यु के बाद उनकी सारी सम्पत्ति बड़े पुत्र के अधिकार में चली जाए तथा सभी छोटे पुत्र बड़े भाई के संरक्षण में वैसे ही रहें जैसे पिता के संरक्षण में रहते थे।
ज्येष्ठेन जातमात्रेण पुत्रो भवति मानवः ।
पितृणामनृणश्चैव स तस्मात्सर्वमर्हति ।। 105 ॥
ज्येष्ठ पुत्र महत्वपूर्ण इसलिए होता है क्योंकि उसके जन्मते ही मनुष्य पुत्र वाला हो जाता है तथा पितृऋण से मुक्त भी। अतः बड़ा पुत्र ही पिता की सम्पूर्ण सम्पत्ति का अधिकारी माना गया है।
यस्मिन्नृणं सन्नयति येन चानन्त्यमश्नुते।
स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान्विदुः ।। 106 ।।
धर्म से उत्पन्न सच्चा पुत्र वही है जिसके जन्म से मनुष्य पितृऋण से मुक्त हो जाए व मोक्ष-प्राप्ति का अधिकारी बने अन्यथा शेष तो कामवासना की तृप्ति में रत माता-पिता के 'कामज पुत्र' होते हैं।
पितेव पालयेत्पुत्रान्ज्येष्ठो भ्रातृन् यवीयसः ।
पुत्रवच्चापिवर्तेरन् ज्येष्ठे भ्रातरि धर्मतः ।। 107 ।।
बड़े भाई का कर्तव्य है कि वह पिता की भांति अपने छोटे भाइयों का पालन-पोषण करे तथा छोटे भाइयों का कर्तव्य है कि वे बड़े भाई से पिता तुल्य व्यवहार करें।
ज्येष्ठः कुलं वर्धयति विनाशयति वा पुनः ।
ज्येष्ठः पूज्यतमो लोके ज्येष्ठः सद्भिरगर्हितः ।। 108 ।।
बड़े पुत्र से कुल बढ़ता है और वही कुल का विनाश करता है। इसी कारण संसार में ज्येष्ठ पुत्र को पूजनीय माना गया है तथा सत्पुरुष द्वारा उसकी कदापि निंदा नहीं की जाती।
यो ज्येष्ठो ज्येष्ठवृत्तिः स्यान्मातेव स पितेव सः ।
अज्येष्ठवृत्तिर्यस्तु स्यान्न सम्पूज्यस्तु बन्धुवत् ॥ 109 ॥
ज्येष्ठ भाई को सदा ज्येष्ठ वृत्ति अर्थात् बड़प्पन दिखलाना चाहिए। उसे माता-पिता के समान ही छोटे भाइयों की देखभाल करनी चाहिए। यदि ज्येष्ठ भ्राता बड़प्पन नहीं दिखलाता, तो वह साधारण रिश्तेदारों जितना भी आदरणीय नहीं रहता।
एवं सहवसेयुर्वा पृथग्वा धर्मकाम्यया।
पृथग्विवर्धते धर्मस्तस्माद्धर्ष्या पृथक्क्रिया ।। 110 ॥
इस तरह (माता-पिता की मृत्यु के बाद) सभी भाई सम्पत्ति का विभाजन किए बिना साथ-साथ रहें या फिर धर्मानसार सम्पत्ति का बंटवारा करके अलग-अलग रहें।
ज्येष्ठस्य विंशउद्धारः सर्वद्रव्याच्च यद्वरम् ।
ततोऽर्थः मध्यमस्य स्यात्तुरीयं यवीयसः ।। 111 ।।
उद्धार भाग के अतिरिक्त सभी द्रव्यों से उत्तम सम्पत्ति का एक भाग बड़े भाई को मिलना चाहिए। शेष सम्पत्ति का बंटवारा इस प्रकार करें। ज्येष्ठ को बीसवां भाग, मंझले को चालीसवां भाग, छोटे को अस्सीवां और उसके बाद के शेष भाइयों को एक सौ आठवां भाग मिलना चाहिए।
ज्येष्ठश्चैव कनिष्ठश्च संहरेतां यथोदितम् ।
येऽन्येज्येष्ठकनिष्ठाभ्यां तेषां स्यान्मध्यमं धनम् ॥ 112 ॥
जैसा कि बताया गया है, ज्येष्ठ व कनिष्ठ भ्राता अपना-अपना भाग लें तथा दोनों के बीच मंझले भाइयों को धन का मध्यम भाग प्रदान करें।
सर्वेषां धनजातानामाददीताग्रयमग्रजः ।
यच्च सातिशयं किञ्चिद्दशतश्चाप्नुयाद्वरम् ॥ 113 ॥
ज्येष्ठ भ्राता ही (सम्पत्ति में) सभी धनों में सर्वश्रेष्ठ, सर्वाधिक व दुर्लभ द्रव्य का अधिकारी होता है।
उद्धारो न दशस्वस्ति सम्पन्नानां स्वकर्मसु।
यत्किञ्चिदेव देयं तु ज्यायसे मानवर्धनम् ।। 114 ।।
सम्पत्ति की दस श्रेष्ठ वस्तुओं का एकमात्र अधिकारी बड़ा भाई होता है। ऐसा नियम पिता की सम्पत्ति के सम्बन्ध में है। माता-पिता के जीवनकाल में यदि भाइयों ने स्वयं कुछ अर्जित अथवा संगृहीत किया है तो बड़े भाई को देना या न देना इच्छा पर निर्भर करता है। दरअसल ज्येष्ठ भ्राता को जो कुछ भी दिया जाता है वह उसके प्रति सम्मान सूचक होता है। उनकी
एवं समुद्धतोद्धारे समानांशान्प्रकल्पयेत् ।
उद्धारेऽनुद्धते त्वेषामियं स्यादंशकल्पना ॥ 115 ॥
बड़े भाई को देने के लिए उद्धार भाग निकालने के बाद शेष सम्पत्ति के समान भाग कर लें। यदि उद्धार भाग नहीं निकाला जाता तो आगे बताई रीति से बंटवारा करें।
एकाधिकं हरेज्येष्ठः पुत्रोऽध्यर्धं ततोऽनुजः ।
अंशमंशं यवीयांस इति धर्मो व्यवस्थितः ॥ 116 ॥
बड़ा भाई दो भाग, उससे छोटा भाई डेढ़ भाग तथा शेष सभी भाइयों को एक-एक भाग ग्रहण करना चाहिए।
स्वेभ्योंऽशेभ्यस्तु कन्याभ्यः प्रदद्युर्भातरः पृथक् । स्वात्स्वादंशाच्चतुर्भागं पतिताः स्युरदित्सवः ॥ 117 ।।
सभी भाइयों का कर्तव्य है कि वे अपने-अपने सम्पत्ति भाग का चौथा भाग बहिनों को प्रदान करें। ऐसा न करने वाले भाइयों को पतित कहा जाता है।
अजाविकं सैकशफं न जातु विषमं भजेत्।
अजाविकं तु विषमं ज्येष्ठस्यैव विधीयते ॥ 118 ।।
यदि भाई चार हों तथा पशुओं अर्थात् बकरी, भेड़, घोड़ा आदि की संख्या विषम हो-तो उनका विभाजन नहीं करना चाहिए बल्कि वे सभी पशु बड़े भाई को समर्पित कर देने चाहिए।
यवीयान् ज्येष्ठभार्यायां पुत्रमुत्पादयेद्यदि ।
समस्तत्र विभागः स्यादिति धर्मोव्यवस्थितः ।। 119 ॥
अगर ज्येष्ठ भाई की पत्नी से छोटा भाई नियोग द्वारा पुत्र को जन्म देता है तो उस सम्पत्ति का विभाजन दोनों में समान रूप से करना चाहिए। यही विधान है।
उपसर्जनं प्रधानस्य धर्मतो नोपपद्यते ।
पिता प्रधानं प्रजने तस्माद्धर्मेण तं भजेत् ॥ 120 ।।
धर्मानुसार ज्येष्ठ पुत्र की प्रधानता सिद्ध नहीं है। वास्तव में सम्पत्ति के संवर्द्धन में पिता ही प्रधान होता है। अतः धर्म यही कहता है कि पिता ही सेवा योग्य है।
पुत्रः कनिष्ठो ज्येष्ठायाः कनिष्ठायां च पूर्वजः ।
कथं तत्र विभागः स्यादिति चेत्संशयो भवेत् ॥ 121 ।।
यदि पहली पत्नी से छोटा पुत्र और दूसरी पत्नी से बड़ा पुत्र पैदा हुआ हो तो सम्पत्ति के विभाजन में उत्पन्न दुविधा को कैसे दूर किया जाए उसकी विधि आगे वर्णित है।
एकं वृषभमुद्धारं संहरेत् सः पूर्वजः ।
ततोऽपरे ज्येष्ठवृषास्तदूनानां स्वमातृतः ।। 122 ।।
प्रथम विवाहिता पत्नी से जन्मा छोटा पुत्र एक अतिरिक्त बैल पाने का अधिकारी है। शेष सम्पत्ति में से माताओं के विवाह के क्रमानुसार ही पुत्र अपना-अपना भाग लें।
ज्येष्ठस्तु जाते ज्येष्ठायां हरेवृषभषोडशाः।
ततः स्वमातृतः शेषाः भजेरन्निति धारणा ॥ 123 ।।
प्रथम पत्नी से जन्मे बड़े पुत्र को सोलह अतिरिक्त बैल मिलने चाहिए। तत्पश्चात् शेष भाई अपनी माताओं के विवाह के क्रमानुसार अपना-अपना भाग लें-यही नियम है।
सदृशस्त्रीषु जातानां पुत्राणामविशेषतः ।
न मातृतोज्यैष्ठ्यमस्ति जन्मतो ज्यैष्ठ्यमुच्यते ।। 124 ।।
सजातीय स्त्रियों से (अर्थात् सभी पत्नियां यदि एक ही जाति की हों) जन्मे पुत्रों में माता के विवाह के क्रमानुसार ज्येष्ठता नहीं माननी चाहिए। ऐसी स्थिति में जन्म से ही जो ज्येष्ठ है उसे बड़ा पुत्र मानना चाहिए।
जन्मज्यैष्ठ्ययेन चाह्वानं सुब्रह्मण्यास्वापि स्मृतम्।
यमयोश्चैव गर्भेषु जन्मतोज्येष्ठता स्मृता ।। 125 ।।
जिन वेद मंत्रों में बड़े पुत्र द्वारा देवों के आह्वान का वर्णन है या जुड़वां पुत्रों में कौन बड़ा है-यह निर्णय करने के नियम वर्णित हैं- उनमें जन्म को ही ज्येष्ठ व कनिष्ठ के निर्णय का आधार समझा गया है।
अपुत्रोऽनेन विधिना सुतां कुर्वीत पुत्रिकाम्।
यदपत्यं भवेदस्यां तन्मम स्यात्स्वधाकरम् ।। 126 ।।
जिस पुरुष के पुत्र न हो वह अपनी कन्या को पुत्रिका बनाए और उसके विवाह के समय घोषणा करे कि उसके गर्भ से जन्मा पुत्र ही मेरा श्राद्ध-तर्पण करने का अधिकारी होगा।
अनेन तु विधानेन पुरा चक्रेऽथ पुत्रिकाः ।
विवृद्धयर्थं स्ववंशस्य स्वयं दक्षः प्रजापतिः ।। 127 ।।
प्राचीनकाल में प्रजापति दक्ष ने भी इसी प्रकार अपनी पुत्रियों से जन्मे पुत्रों से वंश का संवर्द्धन किया था।
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।
सोमाय राज्ञे सत्कृत्य प्रीतात्मा सप्तविंशतिम् ।। 128 ।।
प्रसन्नतापूर्वक व सत्कार करके प्रजापति दक्ष ने अपनी दस कन्याओं का विवाह धर्म से. तेरह का कश्यप से और सत्ताईस पुत्रियों का विवाह चन्द्रमा से इसी प्रकार किया था अर्थात् उनके गर्भ से उत्पन्न पुत्रों को ग्रहण किया था।
यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा।
तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्योधनं हरेत् ।। 129 ।।
मनुष्य भी पुत्र रूप में जन्म लेता है और कन्या भी पुत्र तुल्य होती है तो फिर कन्या के रहते पुत्र का धन पराए लोग कैसे ले सकते हैं?
मातुस्तु यौतक यत्स्यात्कुमारी भाग एव सः ।
दौहित्र एव च हरेदपुत्रस्याखिलं धनम् ।। 130 ।।
जो धन माता के द्वारा जोड़ा जाता है वह पुत्री का ही होता है। इस प्रकार जो पुरुष पुत्रहीन है उसकी सारी सम्पत्ति का अधिकारी उसका नाती होता है।
दौहित्रो ह्यखिलं रिक्थमपुत्रस्य पितुहरेत् ।
स एव दद्याद् द्वौ पिण्डौ पित्रे मातामहाय च ।। 131 ।।
यदि कोई व्यक्ति पुत्रहीन है तो उसकी सारी सम्पत्ति पर उसके नाती का ही अधिकार होता है। वही अपने पिता व नाना को पिण्डदान करता है।
पौत्रदौहित्रयोलोंके विशेषोऽस्ति धर्मतः ।
तयोर्हि मातापितरौ सम्भूतौ तस्य देहतः ।। 132 ।।
वस्तुतः पौत्र व नाती में कोई फर्क नहीं है। एक का पिता और एक की माता- समान माता-पिता से ही उत्पन्न होते हैं।
पुत्रिकायां कृतायां तु यदि पुत्रोऽनुजायते ।
समस्तत्रविभागः स्याज्येष्ठता नास्ति हि स्त्रियः ।। 133 ।।
नाती अर्थात् पुत्री के पुत्र को यदि गोद लिया जाता है और तब पुत्र का जन्म होता है तो दोनों में सम्पत्ति को समान रूप से बांट देना चाहिए। नाती को ज्येष्ठ नहीं माना जाता।
अपुत्रायां मृतायां तु पुत्रिकायां कथञ्चन।
धनं तत्पुत्रिकाभर्त्ता हरेतैवाऽविचारयन् ।। 134 ।।
यदि पुत्री को पुत्रिका बना लेने के पश्चात् कन्या का पुत्रवती हुए बिना ही देहान्त हो जाता है तो कन्या का पति ही कन्या के पिता की सारी सम्पत्ति प्राप्त करने का अधिकारी बन जाता है।
अकृता वा कृत्ता वापि यं विन्देत्सदृशात्सुतम्।
पौत्रा मातामहस्तेन दद्यात्पिण्डं हरेद्धनम् ॥ 135 ।।
चाहे कन्या को पुत्रिका बनाएं या न बनाएं, सजातीय दामाद से पुत्र पाने पर पुरुष पुत्रवान् कहलाता है। वही बालक नाना को पिण्ड दान करता है। इसलिए नाना की सम्पत्ति भी उसे ही मिलनी चाहिए।
पुत्रेण लोकान् जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते।
अथ पुत्रस्य पौत्रेण ब्रध्नस्याप्नोति विष्टपम् ।। 136 ।।
व्यक्ति के जब पुत्र होता है तो वह लोक विजयी बन जाता है, पौत्र के जन्म से वह अनंतकाल तक सुखानंद उठाने का अधिकारी बनता है और प्रपौत्र का जन्म उसे आदित्य लोक में वास करने का अधिकारी बनाता है।
पुन्नाम्ना नरकस्तस्मात्त्रायते पितरं. सुतः ।
तस्मात्पुत्र इतिप्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा ।। 137 ।।
'पु' शब्द से अभिप्राय है 'नरक' तथा 'त्र' का अर्थ है 'रक्षक'। अतः पितरों - की नरक से रक्षा करने वाले को ही ब्रह्मा जी ने 'पुत्र' कहा है।
पौत्रदौहित्रयोर्लोके विशेषो नोपपद्यते ।
दौहित्रोऽपिह्यमुत्रैनं सन्तारयति पौत्रवत् ॥ 138 ।।
मनुष्य को चाहिए कि वह पौत्र तथा दौहित्र में कोई फर्क न समझे क्योंकि दौहित्र भी पौत्र के समान ही नाना का कल्याणकारक होता है।
मातुः प्रथमतः पिण्डं निर्वपेत्पुत्रिकासुतः ।
द्वितीयं तु पितुस्तस्यास्तृतीयं तत्पितुः पितुः ।। 139 ॥
दौहित्र द्वारा प्रथम पिण्ड अपनी मां को, दूसरा नाना को तथा तीसरा नाना के -पिता को दिया जाना चाहिए।
उपपन्नो गुणैः सर्वैः पुत्रो यस्य तु दत्रिमः ।
स हरेतैव तद्रिक्थं सम्प्राप्तोऽप्यन्यगोत्रतः ।। 140 ।।
यदि दत्तक पुत्र दूसरे गोत्र का हो तो भी शिक्षा, विनय व शीलादि गुणों से युक्त होने पर वह अपने धर्मपिता की सम्पूर्ण सम्पत्ति का उत्तराधिकारी बन जाता है।
गोत्ररिक्थे जनयितुर्न हरेत्त्रिमः क्वचित् ।
गोत्रारिक्थानुगः पिण्डो व्यपैति ददतः स्वधा ।। 141 ॥
जो पुत्र दूसरे को दे दिया जाए वह अपने पिता व गोत्र को पुनः नहीं अपना सकता। वह जिसका पिण्डदान करता है. उसी का धन व गोत्र उसे प्राप्त होता है। वह अपने पिता का पिण्डदान नहीं करता। फलस्वरूप पिण्डदान से ही उत्तराधिकार का निर्णय हो जाता है।
अनियुक्तः सुतश्चैव पुत्रिण्याप्तश्च देवरात् ।
उभौ तौ नार्हतो भागं जारजातककामजौ ।। 142 ॥
नियोग विधि के बगैर जन्मा पुत्र तथा लड़की के देवर से नियोग विधि द्वारा जन्मा दौहित्र-दाय भाग के अधिकारी नहीं माने जाते। इन्हें जार से उत्पन्न व कामज ही समझना चाहिए।
नियुक्तायामपि पुमान्नार्या जातोऽविधानतः ।
नैवार्हः पैतृकं रिक्थं पतितोत्पादितो हि सः ।। 143 ।।
बिना विधान के नियुक्ता स्त्री से जन्मा पुत्र भी अपने पिता का उत्तराधिकारी नहीं होता क्योंकि धर्मभ्रष्ट रूप से उत्पन्न ऐसा बालक तो परित्याग योग्य ही होता है।
हरेत्तत्र नियुक्तायां जातः पुत्रो यथौरसः ।
क्षेत्रिकस्य हि तद्बीजं धर्मतः प्रसवश्च सः ॥ 144 ॥
नियुक्ता स्त्री तथा नियम पालन करने वाले पुरुष के विधान पूर्वक संसर्ग से जन्मा औरस पुत्र ही अपने पिता की सम्पत्ति पर अधिकार रखता है। चूंकि उसका जन्म धर्मानुकूल विधि से होता है। अतः वह क्षेत्र वाले के बीज से ही जन्मा माना जाता है।
धनं यो बिभृयाद्भातुर्मतस्य स्त्रियमेव च।
सोऽपत्यं भ्रातुरुत्पाद्य दद्यात्तस्यैव तद्धनम् ।। 145 ।।
जो पुरुष अपने मृत भाई की पत्नी व उसके धन पर अधिकार कर लेता है उसे भाभी से संतान उत्पन्न करके भाई का धन भतीजे को सौंप देना चाहिए।
याऽनियुक्ताऽन्यतः पुत्रं देवराद्वाप्यवाप्नुयात्।
तं कामजमरिक्थीयं वृथोत्पन्नं प्रचक्षते ॥ 146 ।।
जो पुत्र नियोग बगैर ही देवर से या अन्य किसी पुरुष से उत्पन्न हो उसे कामज व व्यर्थ ही समझा जाता है। ऐसे पुत्र का पिता की सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता।
एतद् विधानं विज्ञेयं विभागस्यैकयोनिषु।
बह्वीषु चै जातानां नानास्त्रीष् निबोधत ।।। 147 ।।
भूगु जी ने कहा- विप्रो ! समाज में सजातीय स्त्री के गर्भ से उत्पन्न हुए पूत्रों निर्धारित नियमों के बारे में बतलाता हं जिसमें एक ही पति द्वारा अनेक स्त्रियों के में धन के विभाजन का यही विधान है। अब मैं आपको उस परिस्थिति के लिए गर्भ से पुत्र प्राप्ति हुई हो।
ब्राह्मणस्यानुपूर्येण चतस्त्रस्तु यदि स्त्रियः ।
तासां पुत्रेषु जातेषु विभागोऽयं विधिः स्मृतः ।। 148 ॥
यदि एक ब्राह्मण का चार विभिन्न वर्णों की स्त्रियों से विवाह हुआ है तो उन चारों से उत्पन्न पुत्रों के बीच धन का विभाजन इस प्रकार करना चाहिए।
कीनाशो गो वृषो यानमलङ्कारश्च वेश्म च।
विप्रस्यौद्धारिकं देयमेकांशश्च प्रधानतः ।। 149 ॥
ब्राह्मण पत्नी के गर्भ से जन्मे पुत्र को कृषि योग्य बैल, गाय, अश्वादि, वाहन, आभूषण, घर व विशिष्ट दुर्लभ पदार्थ दे देने चाहिए।
त्र्यंशदायाद्धरेद्विप्रः द्वावंशौ क्षत्रियासुतः ।
वैश्याजः सार्धमेवांशमंशं शूद्रासुतो हरेत् ॥ 150 ॥
पिता द्वारा अर्जित धन का तीन, दो, डेढ़ व दशम भाग के अधिकारी क्रमशः ब्राह्मणी, क्षत्रिया तथा वैश्य व शूद्र पत्नियों के पुत्र होते हैं।
सर्वं वा रिक्थजातं तद्दशधा परिकल्प्य च।
धम्र्यं विभागं कुर्वीत विधिनाऽनेन धर्मवित् ॥ 151 ।।
धर्मात्मा पुरुष ब्राह्मणी के पुत्र के लिए विशेष रूप से कुछ निकाले बिना ही सम्पूर्ण धन के दस भाग करे और आगे बताई जा रही विधि द्वारा इसका बंटवारा करे।
चतुरोंऽशन्हरेद्विप्र स्त्रीनंशान्क्षत्रियासुतः ।
वैश्यापुत्रो हरेद्धयंशमंशं शूद्रासुतो हरेत् ॥ 152 ॥
उन दस भागों में से ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्य पत्नी व शूद्र स्त्री से उत्पन्न पुत्रों को क्रमशः चार, तीन, दो और एक भाग ग्रहण करना चाहिए।
यद्यपि स्यात्तु सत्पुत्रोऽप्यसत्पुत्रोऽपि वा भवेत् ।
नाधिकं दशमादद्याच्छूद्रापुत्राय धर्मतः ॥ 153 ॥
जो ब्राह्मण पुत्र शूद्र पत्नी के गर्भ से जन्मा है, वह चाहे कितना भी योग्य अथवा अयोग्य हो, पिता की सम्पत्ति के दसवें भाग से ज्यादा सम्पत्ति पाने का अधिकारी नहीं होता।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्रापुत्रो न रिक्थभाक् ।
यदेवास्य पिता दद्यात्तदेवास्य धनं भवेत् ॥ 154 ।।
शूद्र स्त्री के गर्भ से ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य पुरुषों द्वारा उत्पन्न पुत्र का अपने पिता की सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता। पिता द्वारा अपनी इच्छा से दिया गया धन ही उसका भाग होता है।
समवर्णाषु ये जाताः सर्वे पुत्राः द्विजन्मनाम्।
उद्धारं ज्यायसे दत्त्वा भजेरन्नितरे समम् ॥ 155 ।।
सजातीय पत्नियों से उत्पन्न सभी पुत्रों को ज्येष्ठ भ्राता के लिए विशिष्ट भाग निकाल कर पिता की शेष सम्पत्ति को समान रूप से विभाजित कर लेना चाहिए।
शूद्रस्य तु सवर्णैव नान्या भार्या विधीयते।
तस्यां जाताः समांशाः स्युर्यदि पुत्रशतं भवेत् ।। 156 ।।
शूद्र पुरुष के लिए यह विधान है कि वह केवल शूद्र स्त्री से ही विवाह कर सकता है, अन्य से नहीं। उस शूद्रा के यदि सौ पुत्र हुए हों तो वे सभी पिता की सम्पत्ति में समान भाग के अधिकारी हैं।
पुत्रान् द्वादश यानाह नृणांस्वायम्भुवः मनुः ।
तेषां षड्बन्धदायादाः षडदायादबान्धवा ।। 157 ॥
स्वायम्भुव मनु ने जो वर्णन किया है उसके अनुसार मनुष्य के बारह पुत्रों में छः भाई पिता की सम्पत्ति के अधिकारी है और छः नहीं।
औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिम एव च।
गूढोत्पन्नोऽपविद्धश्च दायादा बान्धवाश्च षट् ॥ 158 ॥
पिता के दाय भाग के अधिकारी छः पुत्र इस प्रकार हैं, (1) अपनी धर्मपत्नी से औरस पुत्र (2) नियोग से उत्पन्न पुत्र (3) दत्तक पुत्र (4) दूसरे की सहमति से अपनाया हुआ उसका पुत्र (5) गुप्त रूप से जन्मा पुत्र (6) तथा माता-पिता द्वारा परित्यक्त तथा किसी अन्य द्वारा अपनाया गया पुत्र।
कानीनश्च सहोढश्च क्रीतः पौनर्भवस्तथा ।
स्वयंदत्तश्च शौद्रश्च षडदायाद बान्धवा ॥ 159 ।।
पिता की सम्पत्ति के अधिकारी जो पुत्र नहीं होते वे इस प्रकार हैं, (1) अविवाहित कन्या का पुत्र (2) विवाह के साथ ही स्त्री द्वारा लाया गया पुत्र (3) खरीदा हुआ (4) स्त्री के द्वितीय विवाह से जन्मा पुत्र (5) बिना मांगे ही किसी के द्वारा दिया गया तथा (6) शूद्र स्त्री से जन्मा पुत्र।
यादृशं फलमाप्नोति कुप्लवैः सन्तरञ्जलम् ।
तादृशं फलमाप्नोति कुपुत्रैः सन्तरस्तमः ॥ 160 ॥
कुपुत्रों से सद्गति चाहने वाले उसी प्रकार नरक जाते हैं जिस प्रकार टूटी हुई नाव से समुद्र पार करने की चाह रखने वाला डूब जाता है।
यद्येकरिक्थिनौ स्यातामौरसक्षेत्रजौ सुतौ।
यस्य यत्पैतृकं रिक्थं स तद् गृह्णीत नेतरः ।। 161 ।।
नियोग विधि से प्राप्त किए गए पुत्र के बाद यदि औरस पुत्र भी उत्पन्न हो जाता है तो दोनों अपने-अपने पिता की सम्पत्ति का भाग ही ग्रहण करें। उन्हें एक-दूसरे का भाग हड़पने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।
एक एवौरसः पुत्रः पित्र्यस्य वसुनः प्रभुः ।
शेषाणामानृशंस्यार्थं प्रदद्यात् प्रजीवनम् ॥ 162 ।।
वास्तविकता तो ये है कि एक औरस पुत्र ही पिता की सम्पत्ति का अधिकारी होता है। शेष पुत्रों को दयावश इतना दे देना चाहिए कि वे जीवन यापन कर सकें।
षष्ठं तु क्षेत्रजस्यांशं प्रदद्यात् पैतृकाद्धनात् ।
औरसो विभजन्दायं पित्र्यं पञ्चमेव वा ॥ 163 ॥
औरस पुत्र द्वारा क्षेत्रज पुत्र को पैतृक कुल सम्पत्ति का पांचवां एवं छठा भाग प्रदान करना चाहिए।
औरसक्षेत्रजौ पुत्रौ पितृरिक्थस्य भागिनौ।
दशापरेतु क्रमशो गोत्ररिक्थांशभागिनः ॥ 164 ।।
इसी प्रकार पैतृक धन क्षेत्रज व औरस पुत्रों में बांटना चाहिए। यदि पिता के अन्य दस प्रकार के पुत्र भी हों तो वे केवल गोत्रधन के ही अधिकारी हैं।
स्वक्षेत्रे संस्कृतायां तु स्वयमुत्पादयेद्धि यम् ।
तमौरसं विजानीयात्पुत्रं प्रथमकल्पितम् ॥ 165 ।।
वह पुत्र जो विवाहिता स्त्री से अपने वीर्य का आधान करके प्राप्त किया जाता है, वही औरस पुत्र है-उसे ही अपनी प्रथम संतान मानना चाहिए।
यस्तल्पजः प्रमीतस्य क्लीबस्य व्याधितस्य वा।
स्वधर्मेण नियुक्तायां सपुत्रः क्षेत्रजः स्मृतः ॥ 166 ।।
यदि पुरुष मृत, क्लीव (नपुंसक) अथवा गंभीर रोग से ग्रस्त हो तो उसकी स्त्री से नियोग विधि द्वारा उत्पन्न पुत्र ही 'क्षेत्रज' कहा जाता है।
माता पिता वा दद्यातां यमद्भिः पुत्रमापदि ।
सदृशं प्रीतिसंयुक्तं ज्ञेयो दत्रिमः सुतः ॥ 167 1
कोई विपत्ति आ पडने पर माता-पिता जिस सजातीय व्यक्ति को संकल्प करके अपना पुत्र बिना कुछ लिए-दिए दे देते हैं-वही 'दत्तक' पुत्र समझा जाता है।
सदृशं तु प्रकुर्याद्यं गुणदोषविचक्षणम्।
पुत्रं पुत्रगुणैर्युक्तं सः विज्ञेयश्च कृत्रिमः ।। 168 ॥
गुणदोष के पार जिस सजातीय बालक को 'पुत्र' मान लिया जाता है वह 'कृत्रिम' पुत्र कहलाता है।
उत्पद्यते गृहे यस्य न य ज्ञायेत कस्य सः ।
स गृहे गूढउत्पन्नस्तस्य स्यद्यस्य तल्पजः ।। 169 ।।
जिस बालक के जन्म पर घर में उसके माता-पिता का निश्चय न हो, उसे 'गूढ़ उत्पन्न' पुत्र कहा जाता है और जो कोई भी उसे स्वीकार कर लेता है, वही उसका संरक्षक हो जाता है।
मातृपितृभ्यामुत्सृष्टः ययोरन्यतरेण वा।
यं पुत्रं परिगृह्णीयादपविद्धः स उच्यते ।। 170 ॥
माता-पिता द्वारा अथवा उनमें से किसी एक द्वारा त्यक्त अथवा किसी आवश्यकता वाले व्यक्ति द्वारा परिगृहीत पुत्र को 'अपविद्ध' समझें।
पितृवेश्मनि कन्या तु यं पुत्रं जनयेद्रहः ।
तं कानीनं वदेन्नाम्ना वोढः कन्यासमुद्भवम् ।। 171 ।।
कन्या यदि पिता के घर में गुप्त रूप से बालक को जन्म देती है और उसके बाद बालक का पिता कन्या से विवाह करके उसे अपना लेता है तो वह बालक 'कानीन' पुत्र कहा जाता है।
या गर्भिणी संस्क्रियते ज्ञाताऽज्ञातापि वा सती ।
वोढुः सगर्भो भवति सहोढ इति चोच्यते ।। 172 ।।
अनजाने में अथवा जान-बूझकर यदि गर्भवती कन्या से विवाह किया जाता है तो उसके गर्भ से जन्मा बालक उसी का होता है जिसने कन्या से विवाह किया है। इस बालक को 'सहोढ' कहा जाता है।
क्रीणीयाद्यस्त्वपत्यार्थं मातापित्रोर्यमन्तिकात्।
सः क्रीतकः सुतस्त्वस्य सदृशोऽपि वा ॥ 173 ॥
माता-पिता से मूल्य देकर खरीदा गया अथवा लगभग वैसा ही (अर्थात् माता-पिता को कीमत ने देकर उनकी इच्छा से) लिया गया बालक 'क्रीतक पुत्र' कहा जाता है।
या पत्या वा परित्यक्ता विधवा वा स्वयमिच्छ्या। उत्पादेयत्पुनर्भूत्वा स पौनर्भव उच्यते ।। 174 ॥
पति द्वारा परित्यक्त अथवा विधवा स्त्री अपनी इच्छा से किसी दूसरे व्यक्ति के साथ विवाह करके पुत्र को जन्म देती है तो ऐसे पुत्र को 'पौनर्भव' कहा जाता है।
सा चेदक्षतयोनिः स्याद्गतप्रत्यागतापि वा।
पौनर्भवेन भर्त्रा सा पुनः संस्कारमर्हति ।। 175 ॥
ऐसी स्त्री का यदि अपने पूर्व पति से सम्बन्ध ही न हुआ हो या एकाध बार पति के पास जाकर लौट आई हो तो वह जिससे संतान उत्पन्न करती है, उसके साथ उसका विवाह संभव है।
मातृपितृविहीनो यस्त्यक्तो वा स्यादकारणात्।
आत्मानं स्पर्शयेद्यस्मै स्वयंदत्तस्तु सः स्मृतः ।। 176 ॥
माता-पिता द्वारा निरपराध बालक को यदि छोड़ दिया जाता है अथवा माता-पिता विहीन बालक स्वेच्छा से जिस किसी को अपना संरक्षक मान लेता है वह उसका 'स्वयंदत्त' पुत्र कहा जाता है।
यम्ब्राह्मणस्तु शूद्रायां कामादुत्पादयेत्सुतम्।
स पारयन्येव शवस्तस्मात्पारशवः स्मृतः ।। 177 ॥
शूद्र स्त्री के गर्भ से ब्राह्मण द्वारा उत्पन्न बालक 'पारशव' अथवा 'शौद्र' कहलाता है क्योंकि वह जीवित होते हुए भी शव के समान ही है।
दास्यां वा दासदास्यां वा यः शूद्रस्य सुतो भवेत्।
सोऽनुज्ञातो हरेदंशमिति धर्मो व्यवस्थितः ॥ 178 ॥
वह शूद्र पुत्र जो दासी अर्थात् दास की स्त्री से जन्मा है, अपने पिता की सम्पत्ति में भाग रखता है-यही शास्त्रों का विधान है।
क्षेत्रजादीन्सुतानेतानेकादश यथोदितान् ।
पुत्रप्रतिनिधीनाहुः क्रियालोपान्मनीषिणः ।। 179 ।।
उपर्युक्त क्षेत्रजादि ग्यारह प्रकार के पत्रों को 'पुत्र' इसलिए कहा गया है ताकि माता-पिता के पिण्डदान की क्रिया लुप्त न हो।
य एतेऽभिहिताः पुत्राः प्रसङ्गादन्यबीजजाः ।
यस्य ते बीजतो जातास्तस्य ते नेतरस्य तु ॥ 180 ।।
जिन अन्य क्षेत्रज पुत्रों का औरस के प्रसंग से वर्णन किया गया है, वस्तुतः वे जिनके वीर्य से जन्म लेते हैं, उन्हीं के पुत्र होते हैं।
भ्रातृणामेक जातानामेकश्चेत्पुत्रवान् भवेत्।
सर्वांस्तांस्तेन पुत्रेण पुत्रिणो मनुरब्रवीत् ॥ 181 ॥
मनु महाराज का मत है कि सगे भाइयों में से यदि एक भाई के भी पुत्र हों तो सभी भाइयों को पुत्र वाला ही मानना चाहिए तथा उन्हें क्षेत्रजादि पुत्रों की प्राप्ति का प्रयत्न नहीं करना चाहिए।
सर्वासामेकपत्नीनामेका चेत्पुत्रिणी भवेत्।
सर्वास्तास्तेन पुत्रेण प्राह पुत्रवतीर्मनुः ।। 182 ।।
इसी प्रकार एक पुरुष की अनेक पत्नियों में से यदि एक भी पुत्रवती हो जाती है तो सभी स्त्रियों को पुत्रवती ही समझना चाहिए-ऐसा ही मनु जी का मत है।
श्रेयसः श्रेयसोऽलाभे पापीयान् रिक्थमर्हति ।
बहवश्चेत्तु सदृशाः सर्वेरिक्थस्य भागिनः ।। 183 ।।
यदि औरसादि पुत्र न हों तो अन्य प्रकार के पुत्र पिता की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होते हैं। समान स्थिति वाले अनेक पुत्र होने की परिस्थिति में, सम्पत्ति का बराबर विभाजन कर देना चाहिए।
न भ्रातरो न पितरः पुत्राः रिक्थहराः पितुः ।
पिता हरेदपुत्रस्य रिक्थं भ्रातर एव च ॥ 184 ।।
जो व्यक्ति पुत्रवान् है उसकी सम्पत्ति के अधिकारी केवल पुत्र ही होते हैं पिता व भाई नहीं। सभी प्रकार के पुत्रों से विहीन व्यक्ति की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी निश्चित रूप से पिता तथा भाई ही होते हैं।
त्रयाणामुदकं कार्यं त्रिषु पिण्डः प्रवर्तते।
चतुर्थः सम्प्रदातैषां पञ्चमो नोपपद्यते ॥ 185 ॥
पहले तीन प्रकार के पुत्रों को पिण्ड व उदक तर्पण का तथा चौथे प्रकार के पुत्र को केवल पिण्डदान का अधिकार होता है। पांचवें प्रकार के पुत्र को ऐसा कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता।
अनन्तरः सपिण्डाद्यास्तस्य तस्य धनं भवेत् ।
अतऊर्ध्वं सकुल्यः स्यादाचार्यः शिष्य एव वा ॥ 186 ।।
जो पुरुष पुत्रहीन है उसकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी उसके निकट सम्बन्धी (सपिण्डी) होते हैं। यदि वे भी न हों तो दूर के सम्बन्धी, उनके अभाव में आचार्य तथा आचार्य के भी न होने पर शिष्य उसकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होते हैं।
सर्वेषामप्यभावे तु ब्राह्मणाः रिक्थभागिनः ।
त्रैविद्यः शुचयो दान्तास्तथा धर्मो न हीयते ॥ 187 ॥
यदि पूर्व वर्णित-तीनों प्रकार के लोग अनुपस्थित हों तो सम्पत्ति के उत्तराधिकारी तीनों वेदों के ज्ञाता, सदाचारी व संयमी ब्राह्मण ही होते हैं। इस प्रकार धर्म की हानि नहीं होती।
अहार्यं ब्राह्मणद्रव्यं राज्ञा नित्यमितिस्थितिः ।
इतरेषां तु वर्णानां सर्वाभावे हरेन्नृपः ॥ 138 ।।
यदि ब्राह्मण संतानहीन हो तो उसकी सम्पत्ति ब्राह्मणों में ही विभाजित कर देनी चाहिए। राजा उसे अपने अधिकार में न ले किंतु अन्य वर्णों के पूर्व वर्णित उत्तराधिकारियों में योग्य ब्राह्मण भी उपलब्ध न हो तो राजा सम्पत्ति पर अधिकार कर ले। शास्त्रों का यही विधान है।
संस्थितस्यानपत्यस्य सगोत्रात्पुत्रमाहरेत् ।
तत्र यद्रिक्थजातं स्यात्तत्तस्मिन्प्रतिपादयेत् ।। 189 ।।
यदि कोई ब्राह्मण संतानविहीन ही मर जाता है तो राजा को चाहिए कि वह किसी समान गोत्र वाले व्यक्ति को समझाकर उसके पुत्र को मृत ब्राह्मण का पुत्र घोषित कर दे तथा उसी बालक को उत्तराधिकार में ब्राह्मण की सारी सम्पत्ति दे दे।
द्वौ तु यौ विवदेयातां द्वाभ्यां जातौ स्त्रियः धने।
तयोर्यद्यस्य पित्र्यं स्यात्तत्सः गृह्णीत नेतरः ॥ 190 ॥
यदि दो पिताओं व एक माता से जन्मे पुत्रों में पिता की सम्पत्ति के बंटवारे को लेकर मतभेद हो तो दोनों पिताओं के पुत्रों को अपने-अपने पिता का धन दिलवाया जाए-एक को दूसरे का धन कदापि नहीं।
जनन्यां संस्थितायां तु समं सर्वे सहोदराः ।
भजेरन्मातृकं रिक्थं भगिन्यश्च सनाभयः ।। 191 ॥
सभी भाई तथा बहिनें मां की मृत्यु के पश्चात् उसकी सम्पत्ति अपने बीच समान रूप से विभाजित कर लें।
यास्तासां स्युर्दुहितरस्तासामपि यथार्हतः । मातामह्या धनात्किञ्चित्प्रदेयं प्रीतिपूर्वकम् ।। 192 ।।
पुत्रियों की अविवाहित कन्याओं को भी नानी के धन से प्रेम-पूर्वक थोड़ा-बहुत धन प्रदान करना चाहिए।
अध्यग्न्यध्यावाहनिकं दत्तञ्च प्रीतिकर्मणि ।
भ्रातृमातृपितृप्राप्तं षड्विधं स्त्रीधनं स्मृतम् ॥ 193 ॥
विवाद के समय अग्नि के समक्ष माता-पिता द्वारा दिया गया धन, गृह-प्रवेश, पुत्र-जन्मादि समारोहों में बुलाकर दिया गया धन, प्रीतिकर्म एवं समयान्तर में पति द्वारा दिया गया धन, पिता, माता तथा भाई द्वारा दिया गया धन- ये छः प्रकार के स्त्री धन हैं।
अन्वाधेयं च यद्दत्तं पत्याप्रीतेन चैव यत् ।
हा पत्यौजीवति वृत्तायाः प्रजायास्तद्धनं भवेत् ।। 194 ।।
विवाह में तथा उसके बाद पति के परिवार वालों द्वारा तथा पति द्वारा प्रेमपूर्वक स्त्री को दिए गए धन पर संतान का अधिकार तो होता है पर पति का अधिकार नहीं होता।
ब्राह्मदैवार्षगन्धर्वप्राजापत्येषु यद्वसु ।
अप्रजायामतीतायां भर्तुरेव तदिष्यते ।। 195 ।।
ब्राह्म, दैव, आर्ष, गान्धर्व तथा प्राजापत्य- इन पांच प्रकार के विवाहों में पति
के जीवित रहते यदि स्त्री पुत्रविहीन ही मृत्यु को प्राप्त हो, तो पूर्व वर्णित छः प्रकार के स्त्री धन पर पति का अधिकार माना जाता है।
यत्त्वस्याः स्याद्धनं दत्तं विवाहेष्वासुरादिषु।
अप्रजायामतीतायां मातापित्रोस्तदिष्यते ।। 196 ।।
यदि विवाह असुरादि रीति से हुआ है तो पति के जीवित रहते संतानविहीन स्त्री की मृत्यु के बाद स्त्री धन पर माता-पिता का अधिकार होता है पति का नहीं।
स्त्रियां तु यद्भवेद्वित्तं पित्रा दत्तं कथञ्चन।
ब्राह्मणीतद्धरेतकन्या यदपत्यस्य वा भवेत् ॥ 197 ॥
यदि ब्राह्मणी की कन्या है तो पिता द्वारा किसी भी रूप में दिए गए अथवा स्त्री द्वारा स्वयं अर्जित धन पर उसी का अधिकार समझा जाता है।
न निर्धारं स्त्रियः कुर्युः कुटुम्बाद्बहुमध्यगात्।
स्वकादपि च वित्ताद्धि स्वस्य भर्तुरनाज्ञया ।। 198 ।।
परिवार के अथवा पति की आज्ञा बिना अपने धन से स्त्री को लोभवश व्यापार नहीं करना चाहिए।
पत्यौ जीवति यः स्त्रीभिरलङ्कारोधृतोभर्वेत् ।
न तं भजेरन्दायादाः भजमानाः पतन्ति ते । 199 ।।
स्त्री ने पति के जीवनकाल में जो भी आभूषण पहने हों उसका बंटवारा नहीं करना चाहिए। ऐसा करने पर उत्तराधिकारी धर्मभ्रष्ट हो जाते हैं।
अनंशौ क्लीबपतितौ जात्यन्धबधिरौ तथा।
उन्मत्तजडमूकाश्च ये च केचिन्निन्द्रियः ।। 200 ।।
जो पुत्र नपुंसक, धर्मभ्रष्ट जाति से निष्कासित, जन्मान्ध, बहरा, पागल, मूर्ख, गूंगा, निरिन्द्रीय हो-वह अपने पिता का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता।
सर्वेषामपि तु न्याय्यं दातुंशक्त्या मनीषिणा।
ग्रामाच्छादनमत्यन्तं पतितो ह्यददद् भवेत् ॥ 201 ॥
विवेकशील व्यक्ति को चाहिए कि उपर्युक्त बन्धुओं को सामर्थ्यानुसार जीवन भर भोजन वस्त्रादि दे। ऐसा न करने वाला धर्मभ्रष्ट हो जाता है।
यद्यर्थिता तु दारैः स्यात्क्लीवादीनां कथञ्चन।
तेषामुत्पन्नतन्तू नामपत्यं दायमर्हति ।। 202 ।।
जैसा कि सम्पत्ति के अनधिकारी पहले बताए गए हैं, यदि उनमें से कोई विवाह कर लेता है, तो उसकी संतान को उनका भाग मिलना चाहिए।
यत्किञ्चित्पितरि प्रेते धनं ज्येष्ठोऽधिगच्छति ।
भागो यवीयसां तत्र यदि विद्यानुपालितः ॥ 203 ।।
ज्येष्ठ भाई को पिता की मृत्यु के पश्चात् जो धन मिलता है उसमें छोटे भाई यदि गुणी हों तो उन्हें भी उनका भाग देना चाहिए।
अविद्यानां तु सर्वेषामीहातश्चेद्धनं भवेत् ।
समस्तत्र विभागः स्यादपित्र्य इति धारणा ॥ 204 ॥
सभी विवेकशील भाइयों द्वारा पैतृक धन के अतिरिक्त जो कुछ उन्होंने श्रम से अर्जित किया है उसे आपस में बराबर बांट लेना चाहिए।
विद्याधनं तु तद्यस्य तत्तस्यैव धनं भवेत्।
मैत्र्यमौद्वाहिकं चैव माधुपर्किकमेव च ।। 205 ।।
जो धन विद्या से, मित्रों से तथा विवाह में कन्या पक्ष से मिले तथा मधुपर्क दान में मिलता है उस पर केवल उसी व्यक्ति विशेष का अधिकार होता है।
भ्रातृणां यस्तु नेहेत धनं शक्तः स्वकर्मणा।
सनिर्भाज्यः स्वकादंशात्किञ्चिद्दत्वोपजीविनम् ।। 206 ।।
यदि भाइयों में से एक अपने श्रम से धनार्जन करना चाहता हो और अपने भाइयों के भाग से कुछ भी नहीं लेना चाहता, उसको उसके अंश का निर्वाह योग्य धन देकर अलग कर दें।
अनुपघ्नन्पितृद्रव्यं श्रमेण यदुपार्जितम्।
स्वयमीहितलब्धं तन्नाकामोदातुमर्हति ।। 207 ॥
जो भाई पिता के धन को व्यय नहीं करता और अपने परिश्रम से ही धनार्जन करता है यदि उसकी इच्छा न हो तो वह अपने भाइयों में धन बांटने को बाध्य नहीं होता।
पैतृकं तु पिता द्रव्यमनवाप्तं यदाप्नुयात्।
न तत्पुत्रैर्भजेत्सार्धमकामः स्वयमर्जितम् ॥ 208 ।।
यदि पहले न पाए धन को पिता अपने परिश्रम से प्राप्त करने में सफल हो जाए तो इच्छा न होने पर उस धन को तथा अर्जित धन को अपने पुत्रों में विभाजित न करे।
विभक्ताः सह जीवन्तो विभजेरन् पुनर्यदि ।
समस्तत्र विभागः स्याज्ज्यैष्ठ्यं तत्र न विद्यते ।। 209 ॥
यदि एक बार सम्पत्ति विभाजन हो जाता है, उसके बाद फिर सभी भाई संयुक्त रूप से व्यापार करने लगते हैं, तो फिर से बंटवारा होने पर सभी भाइयों को समान भाग मिलना चाहिए। बड़ा भाई कुछ भी अतिरिक्त पाने का अधिकारी नहीं होता।
येषां ज्येष्ठः कनिष्ठो वा हीयेतांश प्रदानतः ।
नियेतान्यतरोवापि तस्य भागो न लुप्यते ॥ 210 ॥
यदि कोई छोटा अथवा बड़ा भाई अपना भाग किसी कारणवश लेने से वंचित रह जाए या मर जाए तो भी उसके भाग का लोप नहीं होता।
सोदर्याः विभजेरंस्तं समेत्य सहिताः समम्।
भ्रातरो ये च संसृष्टाः भगिन्यश्च सनाभयः ।। 211
यदि कोई भाई संन्यास ले लेता है या मृत्यु को प्राप्त होता है तो उसके शेष सगे भाई व सगी बहिनों को मिलकर पैतृक सम्पत्ति का समान भाग कर लेना चाहिए।
यो ज्येष्ठोविनिकुर्वीत लोभाद्भातृन्यवीयसः ।
सोऽज्येष्ठो स्यादभागश्च नियन्तव्यश्च राजभिः ।। 212 ।।
राजा का कर्तव्य है कि छोटे भाइयों को ठगने वाले ज्येष्ठ भाई को उसके अधिकार से वंचित करके उसे दण्ड दे।
सर्व एव विकर्मस्था नार्हन्ति भ्रातरो धनम्।
न चाऽदत्त्वाकनिष्ठेभ्योज्येष्ठः कुर्वीतयौतुकम् ।। 213 ॥
जो भाई शास्त्र विरोधी आचरण करते हैं वे पैतृक धन के उत्तराधिकारी होने के योग्य नहीं। ज्येष्ठ भाई द्वारा अपने छोटे भाइयों को उनका भाग दिए बिना पैतृक धन को व्यापार में नहीं लगाना चाहिए।
भ्रातृणामविभक्तानां यद्युत्थानं भवेत्सह।
न पुत्रभागं विषमं पिता दद्यात्कथञ्चन ।। 214 ।।
यदि सभी भाई मिल-जुलकर रहते हैं तथा संयुक्त रूप से धनार्जन करते हैं उन्हें बंटवारे में विषमता नहीं बरतनी चाहिए अर्थात् समान रूप से विभाजन करना चाहिए।
ऊर्ध्व विभागाज्जातस्तु पित्र्यमेव हरेद्धनम् ।
संसृष्टास्तेन वा ये स्युर्विभजेत स तैः सह ।। 215 ।।
पिता अपने जीवनकाल में ही अपने धन का पुत्रों में बंटवारा कर दे और इसके बाद यदि उसके पुत्र उत्पन्न हो जाए तो वह पुत्र अपने पिता की बची हुई सम्पत्ति का ही अधिकारी होता है। जो भाई पिता के साथ रहते हों, उनके साथ भी विभाजन सम्भव है।
अनपत्यस्य पुत्रस्य माता दायमवाप्नुयात् ।
मातर्यपि च वृत्तायां पितुर्माता हरेद्धनम् ॥ 216 ।।
पुत्र यदि संतान रहित है तो उसका दाय भाग मां को लेना चाहिए और माता की मृत्यु पर उसकी दादी को।
ऋणे धने च सर्वस्मिन्प्रविभक्ते यथाविधि।
पश्चादृश्येत यत्किञ्चित्तत्सर्वं समतां नयेत् ।। 217 ॥
यदि ऋण व धन का सभी भाइयों में उचित विभाजन हो गया हो और उसके बाद कुछ नया पता चले तो उसे भी समान रूप से विभाजित कर लेना चाहिए।
वस्त्रं पत्रमलङ्कारं कृतान्नमुदकं स्त्रियः।
योगक्षेमं प्रचारं च न विभाज्यं प्रचक्षते ॥ 218 ॥
वस्त्र, वाहन, आभूषण, पका हुआ अन्न व जल, स्त्रियां और निर्वाह की अन्य विविध आवश्यक वस्तुएं विभाजन योग्य नहीं होतीं।
अयमुक्तो विभागो वः पुत्राणां च क्रियाविधिः ।
क्रमशः क्षेत्रजादीनां द्यूतधर्म निबोधत ॥ 219 ॥
भृगु जी बोले-विप्रो ! औरस - क्षेत्रज आदि पुत्रों के बीच पिता की सम्पत्ति विभाजन संबंधी विधान के बारे में मैंने आपको बताया। अब मैं आपको द्यूत के विषय में निश्चित नियमों के बारे में बतलाता हूं।
द्यूतं समाह्वयं चैव राजा राष्ट्रान्निवारयेत्।
राज्यान्तकरणावेतौ द्वौ दोषौ पृथिवीक्षिताम् ।। 220 ॥
अपने राज्य में राजा द्वारा द्यूत व समाह्वय को निषेध कर देना चाहिए। ये दोनों ही राज्य के लिए विनाशकारी तत्व हैं।
प्रकाशमेतत्तास्कर्यं यद्देवनरासुराह्वयौ।
तयोर्नित्यं प्रतीघाते नृपतिर्यत्नवान्भवेत् ।। 221 ।।
द्यूत व समाह्वय दोनों ही खुलेआम डकैती के बराबर हैं और देवों, मनुष्यों व असुरों का सर्वस्व विनाश कर देते हैं। अतः इन दोनों दोषों को दूर करने में राजा सदा प्रयत्नशील रहे- यही विधान है।
अप्राणिभिर्यत्क्रियते तल्लोके द्यूतमुच्यते ।
प्राणिभिः क्रियतेयस्तु सः विज्ञेयः समाह्वयः ।। 222 ।।
जिस खेल में कौड़ी, रुपया, पैसा- इन निर्जीव वस्तुओं से हार-जीत का निश्चय हो-वह खेल जुआ कहलाता है। पशु-पक्षी, स्त्री व पुरुषादि सजीव प्राणियों को दांव पर रखकर खेले जाने वाले खेल का नाम समाह्वय है।
द्यूतं समाह्वयं चैव यः कुर्यात्कारयेत वा।
तान्सर्वान्धातयेद्राजा शूद्रांश्च द्विजलिङ्गनीः ।। 223 ।।
जो लोग द्यूत व समाह्वय जैसे खेलों का आयोजन करवाते हैं या जो शूद्र ब्राह्मण के चिह्न धारण करते हैं. उनको राजा द्वारा मृत्युदण्ड देना चाहिए अथवा कठोर शारीरिक दण्ड देना चाहिए।
कितवान्कुशीलवान्क्रूरान्याषण्डस्थांश्च मानवान् । विकर्मस्थान्शौण्डिकांश्च क्षिप्रं निर्वासयेत्पुरात् ।। 224 ।।
राजा को उन मनुष्यों को नगर से निर्वासित कर देना चाहिए जो जुआ खेलते हैं, धूर्त, क्रूर, पाखण्डी होते हैं तथा घृणित कार्य करते हैं।
एते राष्ट्र वर्तमाना राज्ञः प्रच्छन्नतस्कराः ।
विकर्म क्रिययानित्य बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः ॥ 225 ॥
वास्तविकता तो ये है कि ऐसे लोग राज्य में प्रच्छन्न डाकू होते हैं और वे हमेशा अपने कुकर्मों से भोली-भाली प्रजा को कष्ट देते रहते हैं।
द्यूतमेतत्पुराकल्पे दृष्टं वैरकरं महत्।
तस्माद्यूतं न सेवेत हास्यार्थमपि बुद्धिमान् ।। 226 ।।
इतिहास साक्षी है कि द्यूत वह घृणित कृत्य है जो खिलाडियों में शत्रुता पैदा कर देता है। अतः विवेकशील पुरुष को मनोरंजन के लिए भी द्यूत-क्रीड़ा में भाग नहीं लेना चाहिए।
प्रच्छन्नं वा प्रकाशं वा तन्निषेवेत यो नरः ।
तस्य दण्डविकल्पः स्याद्यथेष्टं नृपतेस्तथा ।। 227 ।।
राजा उन लोगों को यथोचित एवं यथेष्ट दण्ड दे जो प्रच्छन्न अथवा प्रकट रूप से जुआ खेलते हैं।
क्षत्रविद् शूद्रयोनिस्तु दण्डं दातुमशक्नुवन्।
आनृण्यं कर्मणा गच्छेद्विप्रो दद्याच्छन्नैः शनैः ।। 228 ।।
द्यूत खेलने के अपराध में जो क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र दरिद्रतावश राजदण्ड देने में असमर्थ हों, उन्हें राजा की सेवा करके राजदण्ड से उऋण होना चाहिए। किन्तु ब्राह्मण को चाहिए कि वह धीरे-धीरे भुगतान करने की सुविधा जुटाए।
स्त्री बालोन्मत्तवृद्धानां दरिद्राणां च रोगिणाम्। शिफाविदलरज्ज्वाद्यै विद्ध्यान्नृपतिर्दमम् ।। 229 ।।
जो स्त्री, बालक, पागल, वृद्ध, गरीब व रुग्ण जुआ खेलें उन्हें राजा को बेंतों,चाबुकों व रस्सियों से पिटवाना चाहिए और उन्हें बांध कर रखना चाहिए।
ये नियुक्तास्तुकार्येषु हन्युः कार्याणि कार्यिणाम्।
धनोष्मणा पञ्चमानांस्तान्निस्वान्कारयेन्नृपः ।। 230 ।।
राजा को चाहिए कि वह उन लोगों का सब कुछ छीनकर उन्हें सेवा निवत्त कर दे जो द्यूत आदि कार्यों को रोकने के लिए नियुक्त होने पर भी रिश्वत आदि लेकर इसके निवारण की बजाय इसके प्रसारण में लगे हों।
कूटशासनकर्तृश्च प्रकृतीनां च दूषकान् ।
स्त्रीबालब्राह्मणघ्नांश्च हन्याद् द्विट्सेविनस्तथा ।। 231 ॥
राजा के चिह्न की नकल से अपना मतलब निकालने वालों, प्रजा को भ्रष्ट करने में रत लोगों, स्त्रियों, बालकों व ब्राह्मणों की हत्या करने वाले और शत्रु से सांठ-गांठ करने वाले लोगों को राजा द्वारा शीघ्र अति शीघ्र मरवा डालना चाहिए।
तीरितं चानुशिष्टं च यत्र क्वचन तद्भवेत्।
कृतं तद्धर्मतो विद्यान्न तद्भूयो निवर्तयेत् ।। 232 ।।
जिस विवाद का अंतिम निर्णय हो चुका हो और अपराधी दण्ड भी भोग चुका हो, उस विवाद को किसी भी प्रकार पुनः नहीं उठने देना चाहिए।
अमात्याः प्राङ्गिङ्ङ्गवाको वा यत्कुर्युः कार्यमन्यथा । तत्स्वयंनृपतिः कुर्यात्तान्सहस्त्रं च दण्डयेत् ।। 233 ।।
उस सुलझे हुए विवाद को जो वादी या प्रतिवादी मंत्री अथवा वकील के माध्यम से फिर उठाना चाहें, तो राजा को इसकी अनुमति नहीं देनी चाहिए और उन पर एक हजार रुपए का दण्ड लगाना चाहिए।
ब्रह्महा च सुरापश्च स्तेयी च गुरुतल्पगः ।
एते सर्वे पृथग्ज्ञेयाः महापातकिनो नराः ।। 234 ।।
जो व्यक्ति ब्राह्मण को मारे, मदिरापान करे, चोरी व गुरु पत्नी से व्यभिचार करे-उसे महापापी मनुष्य मानें।
चतुर्णामपि चैतेषां प्रायश्चित्तमकुर्वताम् ।
शरीरं धनसंयुक्तं दण्डं धर्यं प्रकल्पयेत् ॥ 235 ।।
इन चार प्रकार के पापों का प्रायश्चित न करने पर राजा द्वारा अपराधी को धर्मानुसार शारीरिक व आर्थिक दण्ड देना चाहिए।
गुरुतल्पे, भगः कार्यः सुरापाने सुराध्वजः ।
स्तेयेऽश्वपदकं कार्यं ब्रह्मण्यशिराः पुमान् ॥ 236 ॥
जो पापी गुरु पत्नी से व्यभिचार करे, मदिरापान करे तथा चोर हो उसके मस्तक पर तपे हुए लोहे से क्रमशः भग, सुरापात्र तथा कत्ते के पैर का चिह्न अंकित कर देना चाहिए।
असम्भोज्याः ह्यसंयाज्याः असम्पाठ्याऽविवाहिनः ।
चरे युः पृथिवीं दीनाः सर्वधर्मबहिष्कृताः ।। 237 ।।
ये तीन प्रकार के व्यक्ति पंक्ति में बैठा कर भोजन कराने, स्वाध्याय, यज्ञ-यागादि करने के अधिकारी नहीं होते। न ही इनके साथ विवाह सम्बन्ध स्थापित करने चाहिए। सभी धर्मों से बहिष्कृत लोग इस धरती पर दीन-हीन रूप में ही विचरण करते हैं।
ज्ञातिसम्बन्धिनस्त्वेते त्यक्तव्याः कृतलक्षणाः ।
निर्देयाः निर्नमस्कारास्तन्मनोरनुशासनम् ।। 238 ।।
भग, सुरापात्र तथा कुत्ते के पैर के चिह्न से अंकित लोगों को सम्बन्धियों व बिरादरी वालों द्वारा त्यज देना चाहिए। ये दया के योग्य नहीं होते, न ही इन्हें नमस्कार करना चाहिए। मनु महाराज द्वारा उक्त यही नियम है।
प्रायश्चित्तं तु कुर्वाणाः सर्ववर्णाः यथोदितम्।
नाङ्कया राज्ञा ललाटे स्युर्दाप्यास्तूत्तमसाहसम् ।। 239 ।।
सभी वर्गों के वे लोग जो शास्त्रोक्त रीति से प्रायश्चित करते हैं, उन पर ये चिह्न अंकित नहीं करने चाहिए। उन पर केवल 'उत्तम साहस' का दण्ड ही लगाना चाहिए।
आगः सु ब्राह्मणस्यैव कार्यो मध्यमसाहसः ।
विवास्योवा भवेद्राष्टात्सद्रव्यः सपरिच्छदः ।। 240 ।।
यदि ब्राह्मण इस प्रकार का अपराध करे तो उसे मध्यम साहस का दण्ड देना = चाहिए या उसे उसके धनादि सहित देश से निष्कासित कर देना चाहिए।
इतरे कृतवन्तस्तु पापान्येतान्यऽकामतः ।
सर्वस्वहारयर्हन्ति कामतस्तु प्रवासनम् ।। 241 ।।
अन्य वर्णों के लोगों द्वारा यदि विवशता में ये कुकर्म किए गए हों तो राजा को उनका सर्वस्व छीन लेना चाहिए और यदि स्वेच्छा से ये कर्म किए गए हों तो उस व्यक्ति को देश से निर्वासित कर देना चाहिए।
ना ददीत नृपः साधुर्महापातकिनो धनम्।
अददानस्तु तल्लोभात्तेन दोषेण लिप्यते ॥ 242 ।।
महापापी के धन को राजा कदापि ग्रहण न करे। जो राजा लोभवश इस धन को स्वीकारता है वह भ्रष्ट व पापी हो जाता है।
अप्सु प्रवेश्य तं दण्डं वरुणायोपपादयेत्।
श्रूतवृत्तोपपन्ने वा ब्राह्मणे प्रतिपादयेत् ।। 243 ।।
यदि राजा इन महापापियों का दण्ड स्वीकार भी कर लेता है, तो उसे जल से धोकर वरुण के यज्ञ में लगा देना चाहिए या वेद-विद्या में लगे विद्वानों को दान कर देना चाहिए।
ईशोदण्डस्य वरुणो राज्ञां दण्डधरोहि सः ।
ईशः सर्वस्य जगतो ब्राह्मणः वेदपारगः ।। 244 ।।
वेद विद्या में निपुण विद्वान ब्राह्मण उसी प्रकार इस सारे संसार का स्वामी होता है जिस प्रकार दण्ड के स्वामी वरुण का प्रतिनिधि तुल्य राजा दण्ड देने का अधिकारी होता है।
यत्र वर्जयते राजा पापकृद्भ्यो धनागमम्।
तत्र कालेन जायन्ते मानवाः दीर्घजीविनः ।। 245 ।।
उस देश के प्रजाजन दीर्घायु होते हैं, जिस देश का राजा इन पापियों के धन को स्वीकार नहीं करता।
निष्पद्यन्ते च सस्यानि यथोप्तानि विशां पृथक् ।
बालाश्च न प्रमीयन्ते विकृतं न च जायते ।। 246 ।।
जो राजा पापियों के धन को ग्रहण नहीं करता, उसके राज्य में धान्य प्रचुर मात्रा में पैदा होते हैं, बालक नहीं मरते और अन्य प्रकार के विकार भी नहीं होते।
ब्राह्मणान्बाधमानं तु कामादऽऽवरवर्णजम्। हन्याच्चित्रैर्वधोपायैरुद्वेजनकरैर्नृपः 11 247 ।।
जो व्यक्ति जानबूझ कर ब्राह्मणों को कष्ट दे, निरर्थक मार-पीट करे उसको तथा शूद्रादि को राजा द्वारा कठोर उपायों से नियंत्रित करना चाहिए।
यावानऽवध्यस्य वधेत्तावान्वध्यस्य मोक्षणे ।
अधर्मो नृपतेर्दृष्टो धर्मस्तु विनियच्छतः ।। 248 ।।
जो वध करने योग्य है उसको राजा द्वारा छोड़े जाने पर वैसा ही पाप लगता है जैसा कि अवध्यों के वध पर। ऐसा धर्मशास्त्रों में कहा गया है। दोनों ही स्थितियों में धर्म की अवज्ञा पाप है।
उदितोऽयं विस्तरशो मिथो विवदमानयोः ।
अष्टादशसु मार्गेषु व्यवहारस्य निर्णयः ।। 249 ।।
भृगु जी ने कहा- महर्षियो ! इस प्रकार मैंने आपको को सुलझाने की विधि बतलाई। अट्ठारह तरह के विवादों
एवं धर्याणि कार्याणि सम्यक्कुर्वन्महीपतिः । देशानलब्धांल्लिप्सेत लब्धांश्च परिपालयेत् ॥ 250 ।।
इस प्रकार धर्मकार्यों की भली-भांति देख-रेख करते हुए राजा को अप्राप्त देशों को विजित करने का तथा प्राप्त देशों की रक्षा का प्रयास करना चाहिए।
सम्यग्निविष्टदेशस्तु कृतदुर्गश्च शास्त्रतः ।
कण्टकोद्धरणे नित्यमातिष्ठेद्यत्नमुत्तमम् ।। 251 ।।
जो राज्य भली-भांति बसा हुआ हो उसे राजा को शास्त्रोक्त रीति से दुर्गादि बनवा कर सुरक्षित कर लेना चाहिए तथा शत्रुओं व डाकुओं के नाश के लिए निरंतर श्रेष्ठ प्रयत्न करते रहना चाहिए।
रक्षणादार्यवृत्तानां कण्टकानां च शोधनात् ।
नरेन्द्रास्त्रिदिवं यान्ति प्रजापालनतत्पराः ।। 252 ।।
वही राजा स्वर्ग की प्राप्ति करता है जो सज्जनों की रक्षा और चोर-डाकुओं से प्रजा की रक्षा करते हुए प्रजा के पालन में उद्यत रहता हो।
आशसंस्तस्करान्यस्तु बलिं गृह्णाति पार्थिवः ।
तस्य प्रक्षुभ्यते राष्ट्र स्वर्गाच्च परिहीयते ॥ 253 ।।
जो राजा प्रजा से केवल कर वसूलता रहे और चोर-डाकुओं को दण्ड न देता हो-उसकी प्रजा में क्षोभ फैलता है और वह राजा नरक को प्राप्त होता है।
निर्भयं तु भवेदस्य राष्ट्र बाहुबलाश्रितम् ।
तस्य तद्वर्धते नित्यं सिच्यमान इव द्रुमः ।। 254 ।।
जिस राज्य की प्रजा अपने राजा के बाहुबल से सुरक्षित रहती है, वह राज्य ठीक उसी प्रकार बढ़ता है जिस प्रकार नियमित रूप से सींचा गया वृक्ष फलता-फूलता है।
द्विविधांस्तस्करान्विद्यात्हरन् द्रव्याऽपहारकान् । प्रकाशांश्चाऽप्रकाशांश्च चारचक्षर्महीपतिः ।। 255 ।।
जो राजा प्रजा की देख-रेख करता है उसे गुप्त रूप से गुप्तचरों द्वारा तथा प्रकट रूप में दूसरों का धन छीनने वाले चोरों पर नजर रखनी चाहिए।
प्रकाशवञ्चकास्तेषां नाम पण्योपजीविनः ।
प्रच्छन्नवञ्चकास्त्वेते ये स्तेनाऽटविकादयः ।। 256 ।।
जो व्यापारी अनेक प्रकार के कारोबार करते हैं वे प्रकट अर्थात् प्रत्यक्ष चोर होते हैं तथा चोर व जंगलों में रहने वाले लुटेरे प्रच्छन्न चोर होते हैं।
उत्कोचकाश्चोपधिका पञ्चकाः कितवास्तथा ।
मङ्गलादेशवृत्ताश्च भद्राश्चेक्षणिकैः सह ।। 257 ।।
असम्यक्कारिणश्चैव महामात्राश्चिकित्सकाः ।
शिल्पोपचारयुक्ताश्च निपुणाः पण्ययोषितः ।। 258 ।।
एवमादीन्विजानीयात्प्रकाशांल्लोककण्टकान् । निगूढचारिणश्चान्याननार्यालिङ्गिनस्तथा II 259 ।।
राजा को चाहिए कि वह गुप्तचरों के माध्यम से प्रकट चोरों की खबर भी रखे। ये प्रकट चोर इस प्रकार के होते हैं- रिश्वतखोर, धमका कर धन ऐंठने वाले, धोखेबाज, जुआरी, राजा के नाम पर भलाई होने की सूचना देकर धन लूटने वाले, भद्र उपायों से लूटने वाले, ज्योतिष के नाम पर धोखा देने वाले, उच्च कर्मचारी, चिकित्सक, धूर्त व्यक्ति तथा वेश्याएं।
प्रत्यक्ष रूप से प्रजा को ठगने वाले और आर्य वेश में विचरण करते अनार्यों की सूचना राजा के पास होनी चाहिए।
तान्विदित्वा सुचरितैर्मूढैस्तत्कर्मकारिभिः ।
चारैश्चानेकसंस्थानैः प्रोत्साद्य वशमानयेत् ।। 260 ।।
पूर्वोक्त ठगों जैसा ही काम करने वाले तथा अनेक विविध सूचनाएं देने वाले गुप्तचरों द्वारा राजा को चोरों को पकड़वा कर अपने नियंत्रण में कर लेना चाहिए।
तेषां दोषानभिख्याप्य स्वे स्वे कर्मणि तत्त्वतः ।
कुर्वीत शासनं राजा सम्यक्सारापराधतः ।। 261 ॥
इस प्रकार के प्रत्यक्ष व प्रच्छन्न चोरों को पकड़वा कर राजा को उन्हें उनके दोषों से अवगत कराना चाहिए तत्पश्चात् उनके अपराध व सामर्थ्य के अनुसार शारीरिक तथा आर्थिक दण्ड निश्चित करना चाहिए।
न हि दण्डादृते शक्यः कर्तुं पापविनिग्रहः ।
स्तेनानां पापबुद्धीनां निभृतं चरतां क्षितौ ।। 262 ॥
यह सम्भव नहीं कि साधु वेश में विचरने वाले चोर-डाकुओं व पापकर्म करने वालों को दण्डित किए बगैर ही पाप पर अंकुश लगाया जा सके।
सभाप्रपापूपशाला वेशमद्यन्नविक्रयाः ।
चतुष्पथाश्चैत्यवृक्षाः समाजा प्रेक्षणानि च ।। 263 ।।
जीर्णोद्यानान्यरण्यानि कारुकावेशनानि च।
शून्यानि चाप्यगाराणि वनान्युपवनानि च ।। 264 ।।
एवं विद्यान्नृपो देशान्गुल्मैः स्थावरजङ्गमैः ।
तस्करप्रतिषेधार्थं चौरैश्चाप्यनुचारयेत् ।। 265 ।।
निम्नलिखित स्थानों पर तस्करी रोकने के लिए राजा द्वारा स्थिर व चलती-फिरती चौकसी टुकड़ियां रखवानी चाहिए तथा गुप्तचरों की नियुक्ति भी आवश्यक है, लोगों के एकत्रित होने का स्थान, प्याऊ, हलवाई की दुकान, वेश्यालय, मदिरालय, अनाज मण्डी, चौराहा, विशाल व सुप्रसिद्ध वृक्ष, लोगों के मेले का स्थान, तमाशे के स्थान, उजड़ी वाटिका, घने वन, शिल्पगृह, बाग-बगीचे, उजड़े हुए घर, वन-उपवनादि ।
तत्सहायैरनुगतैर्नानाकर्मप्रवेदिभिः ।
विद्यादुत्सादयेच्चैव निपुणैः पूर्वतस्करैः ।। 266 ।।
चोरों के सहायकों और उनके कार्यों को जानने वाले तथा पहले चोर रहे किन्तु अब राजा की सेवा में नियुक्त गुप्तचरों द्वारा राजा को डाकुओं की सूचना एकत्रित कर उन्हें पकड़ कर दण्ड देना चाहिए। इस प्रकार राजा तस्करी जैसे कृत्य को जड़ से समाप्त कर दे।
भक्ष्यभोज्योपदेशैश्च ब्राह्मणानां च दर्शनैः ।
चौर्यकर्मापदेशैश्च कुर्युस्तेषां समागमम् ॥ 267 ।।
जासूसों द्वारा तस्करों को उत्तम भोजन खिलाने, ब्राह्मण के दर्शन के बहाने तथा चोरों को चोरी आदि कार्य करने के बहाने पूर्व निर्धारित स्थान पर लाकर पकड़वा देना चाहिए।
ये तत्र नोपसर्पेयुर्मूलप्रणिहिताश्च ये।
तान्प्रसह्य नृपो हन्यात् समित्रज्ञातिबान्धवान् ।। 268 ।।
यदि पकड़े जाने के भय से तस्कर जासूसों के जाल में न आएं तथा गुप्तचरों के साथ रहते हुए भी चतुराई से बच निकलें तो राजा द्वारा उन्हें सैनिक भेजकर बलपूर्वक पकड़वा लेना चाहिए और मित्रों तथा सम्बन्धियों समेत उनका वध कर देना चाहिए।
न होढेन बिना चौरं घातयेद्धार्मिको नृपः ।
सहौढं सोपकरणं च घातयेदविचारयन् ।। 269 ।।
यदि चोरी का अपराध सिद्ध नहीं होता है तो धर्म का पालन करने वाले राजा का कर्तव्य है कि वह चोर को मृत्युदण्ड न दे किन्तु प्रत्यक्ष में चोरी का प्रमाण देखते ही राजा तत्काल चोर का वध करवा दे।
ग्रामेष्वपि च ये किञ्चिच्चौराणां भक्तदायकाः । भाण्डावकाशदाश्चैव सर्वांस्तानपि घातयेत् ।। 270 ।।
जो लोग तस्करों को गांव में भोजन, पात्र, शरण व आश्रय देते हैं राजा को उन सभी लोगों का वध करवा देना चाहिए।
राष्ट्रेषु रक्षाधिकृतां सामस्तांश्चैव चोदितान् ।
अभ्याघातेषु मध्यस्थांशिष्याञ्चौरानिवद्रुतम् ।। 271 ।।
जो लोग राज्य की रक्षा में और सीमा की सुरक्षा के लिए नियुक्त किए गए हों यदि वे भी गुप्त रूप से तस्करी के कर्म में संलग्न पाए जाते हैं तो राजा को उन्हें भी तत्काल मरवा देना चाहिए।
यश्चापि धर्मसमयात्प्रच्युतो धर्मजीविनः ।
दण्डेनैव तमप्योषेत् स्वकाद्धर्माद्धि विच्युतम् ।। 272 ।।
जो व्यक्ति न्याय के आसन पर बैठकर चरित्र से भ्रष्ट हो जाता है उस पतित व्यक्ति को राजा द्वारा दण्ड मिलना चाहिए।
ग्रामघाते हिताभङ्गे पथियोषाभिमर्शने। शक्तितोनाभिधावन्तोनिर्वास्याः सपरिच्छदाः ।। 273 ।।
गांव के आसपास रहने वाले लोग यदि गांव लूटने वालों, आगजनी करने वालों और राह चलती स्त्रियों को छेड़ने वाले लोगों को पकड़ने में मदद नहीं करते, राजा को उन्हें सपरिवार राज्य से निष्कासित कर देना चाहिए।
राज्ञः कोषोपहतॄश्च प्रतिकूलेषु च स्थितान् । घातयेद्विविधैर्दण्डैररीणां चोपजापकान् ॥ 274 ।।
जो लोग राजा के खजाने में चोरी करते हैं, राजा की अवज्ञा करते हैं तथा शत्रुओं से मिले हुए होते हैं उन्हें राजा द्वारा प्राणघातक दण्ड दिया जाना चाहिए।
सन्धिं छित्त्वा तु ये चौर्य रात्रौ कुर्वन्ति तस्कराः ।
तेषांछित्त्वा नृपो हस्तौ तान् शूले विनिवेशयेत् ।। 275 ॥
जो डाकू रात में घरों में सेंध लगाकर चोरी करते हैं, राजा को उनके हाथ कटवा देने चाहिए और उन्हें सूली पर चढ़ा देना चाहिए।
अंगुलीग्रन्थिभेदस्य छेदयेत्प्रथमे ग्रहे।
द्वितीये हस्तचरणौ तृतीये वधमर्हति ।। 276 ।।
यदि कोई जेबकतरा पहली बार चोरी करते हुए पकड़ा जाए तो उसकी उंगलियां कटवा देनी चाहिए, दूसरी बार पकड़े जाने पर हाथ-पैर काट देने चाहिए तथा तीसरी बार पकड़े जाने पर उसको मृत्युदण्ड देना ही उचित है।
अग्निदान्भक्तदांश्चैव तथा शस्त्रावकाशदान् ।
सन्निधातूंश्चैव मोषस्य हन्याच्चौरमिवेश्वरः ।। 277 ।।
जो भी लोग इस प्रकार के चोरों को अग्नि, भोजन, शस्त्र, वस्त्र व आसरा देते हैं, राजा को उन्हें भी चोरों के समान मृत्युदण्ड ही देना चाहिए।
तडागभेदकं हन्यादप्सु शुद्धवधेन वा।
यद्वापि प्रतिसंस्कुर्याद् दाप्यस्तूत्तमसाहसम् ।। 278 ।।
जो व्यक्ति तालाब तोड़ डाले उसे पानी में डुबा देना चाहिए अथवा प्राणदण्ड देना चाहिए। यदि तालाब तोड़ने वाला उसकी मरम्मत कराने के लिए सहर्ष तैयार हो तो उस पर उत्तम साहसिक का दण्ड लगाना चाहिए।
कोष्ठागारमायुधागारं देवतागारभेदकान् ।
हस्त्यश्वरथहतूंश्च हन्यदेवाऽविचारयन् ।। 279 ।।
उन चोरों को तत्काल मृत्युदण्ड दे देना चाहिए जो राजा के धान्यागार, शस्त्र भण्डार तथा मंदिरों को तोड़ते हैं तथा हाथी-घोड़े व रथों को चुराते हैं।
यस्तु पूर्वनिविष्टस्य तडागस्योदकं हरेत् ।
आगमं वाप्यपां भिन्द्यात्स दाप्यः पूर्वसाहसम् ।। 280 ।।
जो चोर पहले से बने हुए तालाब के पानी को चुराते हैं, जल के स्त्रोत में तोड़-फोड़ करते हैं और तड़ागों को सुखा देते हैं, राजा उन पर एक सहस्त्र पण का दण्ड लगाए।
समुत्सृजेद्राजमार्गे यस्त्वऽमेध्यमनापदि ।
स द्वौ कार्षापणौ दद्यादमेध्यं चाशुशोधयेत् ।। 281 ।।
सड़क पर कूड़ा फेंकने वाले लोगों को रोग-दुख की स्थिति को छोड़कर दो कार्षाय का दण्ड देना चाहिए और गंदगी को तुरंत साफ करवा देना चाहिए।
आपद्गतोऽथवा वृद्धो गर्भिणी बाल एव वा।
परिभाषणमर्हन्ति तच्च शोध्यमिति स्थितिः ॥ 282 |
यदि कोई विपत्तिग्रस्त, वृद्ध, गर्भवती महिला तथा बच्चा सड़क पर कचरा फेंके तो उन्हें सिर्फ धमकाना चाहिए और गंदगी को साफ करवा लेना चाहिए-शास्त्रों द्वारा यही नियम निर्धारित किया गया है।
चिकित्सकानां सर्वेषां मिथ्या प्रचरतां दमः ।
अमानुषेषु प्रथमो मानुषेषु च मध्यमः ।। 283 ।।
जो चिकित्सक गलत-सलत इलाज करते हैं उन्हें भी दण्ड देना चाहिए। पशु-पक्षियों का गलत इलाज करने वाले पर 'प्रथम' तथा मनष्यों की गलत चिकित्सा करने वाले पर 'मध्यम' दण्ड लगाना चाहिए।
संक्रमध्वजयष्टीनां प्रतिमानां च भेदकः ।
प्रतिकुर्याच्च तत्सर्वं पञ्चदद्याच्छतानि च ।। 284 ॥
लकड़ी के पुल, ध्वज की लकड़ी व प्रतिमा को तोड़ने वाले व्यक्ति पर पांच सौ पणों का दण्ड लगाने का विधान है और उन्हें फिर से बनवाने का निर्देश भी देने का नियम है।
अदूषितानां द्रव्याणां दूषणे भेदने तथा।
मणीनामपवेधे च दण्डः प्रथमसाहसः ।। 285 ॥
उन लोगों पर हजार पणों का दण्ड लगाया जाए जो सद् पदार्थों को दूषित करते हैं और मणियों को गलत ढंग से बींधते हैं।
समैर्हि विषमं वस्तु चरेद्वैमूल्यतोऽपि वा।
समाप्नुयाद्दमं पूर्व नरोमध्यममेव वा ।। 286 ।।
जो व्यापारी उचित मूल्य पर घटिया या कम परिमाण की वस्तु बेचे उसे 'पूर्व साहस' या 'मध्यम साहस' दण्ड मिलना चाहिए।
बन्धनानि च सर्वाणि राजा मार्गे निवेशयेत् ।
दुःखिताः यत्र दृश्येरन्विकृताः पापकारिणः ।। 287 ।।
ऐसे मार्गों पर राजा द्वारा बन्दी गृह बनवाने चाहिए जहां से चोर-डाकुओं व लुटेरों से सताए गए लोग उन लोगों को सड़ता हुआ देखें जिन्होंने उन्हें कष्ट दिया।
प्राकारस्य च भेत्तारं परिखाणां च पूरकम् ।
द्वाराणां चैव भङ्क्तारं क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ।। 288 ।।
उन लोगों को जल्द ही राज्य से निकाल देना चाहिए जो दीवार को तोडकर खाइयों को भर तथा द्वारों को तोड कर दुश्मन के आने का रास्ता बनाते हैं।
अभिचारेषु सर्वेषु कर्त्तव्यो द्विशतो दमः।
मूलकर्मणि चानाप्तेः कृत्यासु विविधासु च ।। 289 ।।
जो व्यक्ति सभी प्रकार के अभिचारों के प्रयोक्ता हों उनका कर्तव्य है कि उन्हें दो सौ पणों का दण्ड दे। दस प्रकार के विविध दुष्ट प्रयोगों के कर्ता को दो सौ पणों का दण्ड देना चाहिए चाहे मूल कर्म से अभीष्ट मनुष्य की मौत न हुई हो।
अबीजविक्रयी चैव बीजोत्कृष्टं तथैव च।
मर्यादाभेदकश्चैव विकृतं प्राप्नुयाद्वधम् ।। 290 11
अच्छे बीजों में घटिया बीज मिलाकर बेचने वाले तथा परम्परागत नियमों की मर्यादा का उल्लंघन करने वाले मनुष्य को मृत्युदण्ड देना ही उचित है।
सर्वकण्टकपापिष्ठं हेमकारं तु पार्थिवः ।
प्रवृत्तमानमन्याये छेदयेल्लवशः क्षुरैः ।। 291 |
सुनार, जो सभी पापियों का शिरोमणि है, यदि अन्याय करता है तो राजा को चाहिए कि वह चाकू से उसके टुकड़े-टुकड़े करवा डाले।
सीताद्रव्यापहरणे शास्त्राणामौषधस्य च।
कालमासाद्यकार्यं च राजा दण्डं प्रकल्पयेत् ।। 292 ।।
अपराधी द्वारा हल, कुदाल आदि शस्त्रों, धन व औषधियों को चुराते हुए क्या स्थिति थी व चोरी की क्या मात्रा थी- इसके अनुसार ही राजा अपराधी के लिए दण्ड निर्धारित करे।
स्वाम्यमात्यौ पुरं राष्ट्र कोशदण्डौ सुहृत्तथा।
सप्तप्रकृतयो होताः सप्ताङ्गं राज्यमुच्यते ॥ 293 ।।
राज्य के सात अंग या सात प्रकृतियां इस प्रकार हैं- राजा, मंत्री, नगर, राष्ट्र, राजकोश, दण्डाधिकारी व मित्र।
सप्तानां प्रकृतीनां तु राज्यस्यासां यथाक्रमम् ।
पूर्वं पूर्व गुरुतरं जानीयाद्वयसनं महत् ।। 294 ।।
इन सात प्रकृतियों में से क्रमशः पूर्व-पूर्व पर आई विपत्ति को अपेक्षाकृत अधिक वृहद् व गंभीर मानना चाहिए।
सप्ताङ्गस्येह राज्यस्य विष्टब्धस्य त्रिदण्डवत् । अन्योऽन्यगुणवैशिष्यान्न किञ्चिदतिरिच्यते ।। 295 ।।
राज्य की सात प्रकृतियां एक-दूसरे के सहारे ठीक उसी प्रकार टिकी होती है जिस प्रकार तीन डण्डे एक-दूसरे के सहारे खडे रहते हैं। यह न समझना चाहिए कि इन सातों में से किसी की अहमियत कम है। वास्तविकता तो यह है कि इन सातों की समग्र स्थिति में ही राज्य सुरक्षित व स्थिर रहकर समृद्ध बनता है।
तेषु तेषु च कृत्येषु यत्तदङ्गं विशिष्यते।
येन यत्साध्यते कार्य तत्तस्मिन् श्रेष्ठमुच्यते ।। 296 ।।
जिस समय जिस अंग का प्रयोग होता है उस समय उसकी विशेषता अधिक हो जाती है। प्रजा का कार्य जिस समय जिससे सिद्ध हो, उस समय वही उत्तम होता है।
चारेणोत्साहयोगेन विक्रययैव च कर्मणाम्।
स्वशक्तिं परशक्तिं च नित्यं विद्यान्महीपतिः ।। 297 ।।
गुप्तचरों, उत्साह की परीक्षा करने वाले कर्मों तथा अन्य विशेष कार्यों के सहयोग से राजा निरंतर अपनी तथा अपने शत्रु की सामर्थ्य को तौलता रहे।
पीडनानि च सर्वाणि व्यवसनानि तथैव वा।
आरभेत ततः कार्यं संचिन्त्यगुरुलाघवम् ।। 298 ।।
किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पहले राजा को भविष्य में सम्भावित सभी प्रकार की व्यथाओं, कष्टों, बाधा, महत्व व हीनता के बारे में भली-भांति सोच लेना चाहिए।
आरभेतैव कर्माणि श्रान्तःश्रान्तः पुनःपुनः ।
कर्मण्यारभमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषेवते ।। 299 ।।
राजा का कर्तव्य है कि एक कार्य को सम्पन्न करके कुछ विश्राम करे और फिर दूसरे-तीसरे कार्य को प्रारम्भ कर दे क्योंकि लक्ष्मी उसी को प्राप्त होती है जो कर्मों में उद्यत रहता है।
कृतं त्रेतायुगं चैव द्वापरं कलिरेव च।
राज्ञोवृत्तानि सर्वाणि राजा हि युगमुच्यते ॥ 300 II
राजा की ही चेष्टाओं के नाम हैं- सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग। राजा को ही युग कहा गया है अर्थात् वह राज्य की जैसी व्यवस्था करता है, युग को उसी प्रकार का नाम दे दिया जाता है।
कलिः प्रसुप्तो भवति सः जाग्रद्वापरं युगम् ।
कर्मस्वभ्युद्यतस्त्रेता विचरंस्तु कृतं युगम् ॥ 301 |
कलियुग, द्वापर, त्रेता व सत्ययुग क्रमशः राजा के निरुद्यम होने, जागने, कर्म में तत्पर होने तथा शास्त्रोक्त कर्मानुष्ठान करने का ही नाम है।
इन्द्रस्यार्कस्य वायोश्च यमस्य वरुणस्य च।
चन्द्रस्याग्नेः पृथिव्याश्च तेजोवृत्तं तपश्चरेत् ।। 302 ।।
राजा को इन्द्र, सूर्य, वायु, यम, वरुण, चन्द्र, अग्नि व पृथ्वी के सामर्थ्य रूप कर्मों का वहन करना चाहिए।
वार्षिकांश्चतुरो मासान्यथेन्द्रोऽभिप्रवर्षति ।
तथाभिवर्षेत्राष्ट्र कामैरिन्द्रव्रतं चरन् ।। 303 ।।
राजा को अपने राज्य में अभीष्ट पदार्थों की वर्षा ठीक उसी प्रकार करनी चाहिए जिस प्रकार इंद्र देव चार मास वर्षा करते हैं।
अष्टौमासान्यथादित्यस्तोयं हरति रश्मिभिः ।
तथा हरेत्करंराष्ट्रान्नित्यमर्कव्रतं हि तत् ॥। 304 ।।
राजा को प्रजा से वैसे ही कर वसूली करनी चाहिए जिस प्रकार सूर्य आठ माह तक अपनी किरणों से धरती से जल ग्रहण कर लेता है।
प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः ।
तथा चारैः प्रवेष्टव्यं व्रतमेतद्धि मारुतम् ॥ 305 ।।
राजा को दूतों के माध्यम से सभी प्रजाजनों की मनोवृत्ति की खबर उसी प्रकार रखनी चाहिए जिस प्रकार वायु सभी जीवों में प्रविष्ट होकर घूमता रहता है।
यथायमः प्रियद्वेष्यो प्राप्तेकाले नियच्छति ।
तथा राज्ञा नियन्तव्याः प्रजास्तद्धि यमव्रतम् ।। 306 ।।
अपराध करने वाले मित्रों व शत्रुओं दोनों को राजा द्वारा समान रूप से दण्ड मिलना चाहिए ठीक उसी प्रकार जैसे यमराज समय आने पर प्रिय अथवा अप्रिय सभी को एक ही तरह से अपना ग्रास बनाता है।
वरुणेन यथा पाशैर्बद्ध एवाभिदृश्यते ।
तथा पापन्निगृह्णीयाद् व्रतमेतद्धि वारुणम् ॥ 307 ।।
राजा को पापियों को उसी प्रकार बंदी बनाकर रखना चाहिए जिस प्रकार वरुणदेव धर्मभ्रष्ट जनों को अपने पाश में बांध कर रखते हैं।
परिपूर्ण यथा चन्द्रं दृष्ट्वा हृष्यन्ति मानवाः ।
तथाप्रकृतयो अस्मिन् सः चान्द्रव्रतिकोनृपः ।। 308 ।।
राजा के दर्शन से प्रजा का प्रसन्न होना ही राजा का चंद्रव्रत निभाना है, जिस प्रकार लोग पूर्ण चन्द्र को देख कर हर्षित होते हैं।
प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्यात्पापकर्मसु।
दुष्टसामन्तहिंस्त्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतम् ॥ 309 ।।
राजा का आग्नेय व्रत यही है कि वह पापियों के लिए सदैव प्रताप युक्त व तेजस्वी रहे तथा दुष्ट सामंतों के लिए हिंसक।
यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम् ।
तथा सर्वाणि भूतानि बिभ्रतः पार्थिवं व्रतम् ॥ 310 ।।
राजा का पृथ्वी धर्म यही है कि जिस प्रकार पृथ्वी सभी प्राणियों को समान रूप से धारण करती है उसी प्रकार राजा को भी अपनी प्रजा का समान रूप से पालन करना चाहिए।
एतैरुपायैरन्यैश्च युक्तो नित्यमतन्द्रितः ।
स्तेनान्राजा निगृह्णीयात्स्वराष्ट्र पर एव च ॥ 311 ।।
इन्हीं तथा अन्य विविध उपायों द्वारा राजा को सदा उत्साहपूर्वक अपने राज्य के चोरों व दूसरे राज्य में शरणागत विद्रोहियों को बंदी बनाना चाहिए।
परामप्यापदं प्राप्तो ब्राह्मणान्न प्रकोपयेत् ।
ते होनं कुपिताः हन्युः सद्यः सबलवाहनम् ।। 312 ।।
राजा यदि परम संकट की परिस्थिति में हो तो भी उसे ब्राह्मणों को कुपित नहीं करना चाहिए क्योंकि कुपित ब्राह्मण सेना व वाहन सहित राजा का विनाश कर डालते हैं।
यैः कृतः सर्वभक्षोऽग्निरपेयश्च महोदधिः ।
क्षयीचाप्यायितः सोमः को न नश्येत्प्रकोप्य तान् ॥ 313 ॥
उन ब्राह्मणों को रुष्ट करने से भला कौन कुपित न होगा जिन्होंने आग को सर्वभक्षी, समुद्र को अपेय और क्षय होने वाले चंद्र को अमृतमय बना दिया।
लोकानन्यान्सृजेयुर्ये लोकपालांश्च कोपिताः ।
देवान्कुर्युरदेवांश्चकः क्षिण्वस्तान्समृध्नुयात् ॥ 314 ।।
कुपित होने पर जिन्होंने दूसरे लोक व लोकपालों का सृजन कर दिया तथा देवों को अपूज्य बना दिया उन उत्तम ब्राह्मणों को कष्ट देकर कौन समृद्ध हो सकता है अर्थात् कोई नहीं।
यामुपाश्रित्य तिष्ठन्ति लोकाः देवाश्च सर्वदा।
ब्राह्म चैव धनं येषां को हिंस्यात्ताञ्जिजीविषुः ।। 315 ।।
जिन ब्राह्मणों का आश्रय लेकर देवता व लोक स्थित हैं तथा वेद ही जिनका धन हैं, उन्हें त्रास देने का साहस कौन जिजीविषा रखने वाला मूर्ख करेगा ?
अविद्वांश्च विद्वांश्च ब्राह्मणोदैवतं महत्।
प्रणीतश्चाऽप्रणीतश्च यथाऽग्निदैवतं महत् ।। 316 ।।
ब्राह्मण चाहे विद्वान हो अथवा मूर्ख निस्संदेह महत्वपूर्ण व पूजनीय होता है जिस प्रकार प्रणीत तथा अप्रणीत दोनों ही प्रकार की अग्नि पवित्र व महान होती है।
श्मशानेष्वपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति ।
हूयमानश्च यज्ञेषु भूय एवाभिवर्धते ॥ 317 ।।
श्मशान में प्रज्वलित अग्नि दूषित नहीं होती। वही अग्नि यज्ञ व हवनादि में पुनः अभिवृद्धि को प्राप्त होती है।
एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तन्ते सर्वकर्मसु।
सर्वथा ब्राह्मणाः पूज्याः परमं दैवतं हि तत् ।। 318 ॥
ठीक इसी प्रकार ब्राह्मण चाहे सभी प्रकार के अनिष्ट कर्म करता हुआ क्यों न विचरे, फिर भी परमदेव होने के कारण वह पूजनीय होता है।
क्षत्रस्यातिप्रवृद्धस्य ब्राह्मणान्प्रति सर्वशः ।
ब्रह्मणैव सन्नियन्तृ स्यात्क्षत्रं हि ब्रह्मसम्भवम् ॥ 319 ॥
प्रबुद्ध ब्राह्मणों को चाहिए कि वे ब्राह्मणों को सताने वाले क्षत्रियों को वश में रखें चूंकि ब्राह्मण जिनका पथ-प्रदर्शन करते हैं, वही क्षत्रिय प्रगति कर पाते हैं।
अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम्।
तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ।। 320 ।।
अग्नि, क्षत्रिय व लोहे का तेज क्रमशः जल, ब्राह्मण व पत्थर से उत्पन्न होते हैं और सभी स्थानों पर अपनी तीव्रता का प्रदर्शन करते हैं किंतु जो कारण उन्हें उत्पन्न करते हैं, उन्हीं से वे शांत भी हो सकते हैं।
नाऽब्रह्मक्षत्रमृघ्नोति नाऽक्षत्रं ब्रह्मवर्धते।
ब्रह्मक्षत्रं च संयुक्तमिह चामुत्र वर्धते ॥ 321 ॥
ब्राह्मण के बिना क्षत्रिय और क्षत्रिय के बिना ब्राह्मण उन्नति नहीं कर सकता। दोनों मिलकर ही इस लोक एवं परलोक में संवर्द्धित होते हैं।
दत्त्वा धनं तु विप्रेभ्यः सर्व दण्डं समुत्थितम्।
पुत्रे राज्यं समासृज्य कुर्वीत प्रयाणं रणे ॥ 322 ।।
दण्ड से प्राप्त धन ब्राह्मण को तथा अपना राज्य पुत्र को प्रदान कर राजा रण में प्रस्थान करे।
एवं चरन्सदा युक्तो राजधर्मेषु पार्थिवः ।
हितेषु चैव लोकस्य सर्वान्धृत्यान्नियोजयेत् ।। 323 ।।
इस प्रकार राजधर्म का पालन करते हुए राजा द्वारा प्रजाजनों के हित में सभी भृत्यों का प्रबन्ध करना चाहिए।
एषोऽखिलः कर्मविधिरुक्तो राज्ञः सनातनः ।
इमं कर्मविधिं विद्धिक्रमशो वैश्यशूद्रयोः ।। 324 ।।
महर्षियो ! राजा के सभी सनातन कर्तव्य व कर्मों के बारे में मैंने आपको बतलाया। इन्हें ही आप वैश्य व शूद्रों की कर्म विधि जानें।
वैश्यस्तु कृतसंस्कारः कृत्वा दारपरिग्रहम् ।
वार्तायां नित्ययुक्तः स्यात् पशूनां चैव रक्षणे ॥ 325 ॥
वैश्य यज्ञोपवीत संस्कार के बाद विवाह करे तथा पशुपालन एवं व्यापार का कार्य करे।
प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददे पशून् ।
ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः ॥ 326 ॥
वैश्य की सृष्टि कर स्वयं ब्रह्मा जी ने उसे पशु सौंपे हैं। ब्रह्मा जी ने ही ब्राह्मण एवं राजा को प्रजा की सुरक्षा का उत्तरदायित्व दिया है।
न च वैश्यस्य कामः स्यान्न रक्षेयं पशूनिति ।
वैश्येचेच्छति नान्येन रक्षितव्या कथञ्चन ॥ 327 ॥
पशु रक्षा के अपने कर्तव्य को न करने के बारे में वैश्य को सोचना भी नहीं चाहिए और यदि वैश्य ऐसा करता है (अर्थात् पशु रक्षा नहीं करता) तो अन्य वर्ण के व्यक्ति को यह कार्य नहीं करना चाहिए।
मणिमुक्ताप्रवालानां लौहानां तांतवस्य च।
गन्धानां च रसानां च विद्यादर्थं बलाबलम् ॥ 328 ।।
मणि मुक्ता, प्रवाल (मूंगा), लोहा, वस्त्र और कपूर आदि गंध व रसों के गुण-दोषों, भाव में उतार-चढ़ाव का पूरा ज्ञान रखना भी वैश्यों का कर्तव्य है।
बीजानामुप्तिविच्च स्यात्क्षेत्रदोषगुणस्य च।
मानयोगं च जानीयात्तुलायोगांश्च सर्वशः ।। 329 ।।
बीजों को किस प्रकार बोया जाए, खेत के क्या गुण-दोष हैं तथा सभी प्रकार के नाप-तोलों की जानकारी रखना भी वैश्यों का कर्तव्य कर्म है।
सारासारं च भाण्डानां देशानां च गुणागुणान्।
लाभालाभञ्च पण्यानां पशूनां परिवर्धनम् ॥ 330 ।।
भृत्यानां च भृतिं विद्याद्भाषाश्च विविधा नृणाम्।
द्रव्याणां स्थानयोगांश्च क्रयविक्रयमेव च ॥। 331 ।।
विभिन्न अन्नों के अच्छे-बुरे होने की जानकारी, विविध देशों में उसके गुण-दोष, सस्ते महंगे भाव, बिकने वाली वस्तुओं की लाभ-हानि, पशुओं के परिवर्धन के तरीके, नौकरों के भुगतान का तरीका, अनेक भाषाएं, विविध वस्तुओं के भण्डारण तथा क्रय-विक्रय की विधि वैश्य को आनी चाहिए।
धर्मेण च द्रव्यवृद्धावातिष्ठेद्यत्नमुत्तमम् ।
दद्याच्च सर्वभूतानामन्नमेव प्रयत्नतः ।। 332 ।।
उसे कर्मानुसार अपने धन के संवर्द्धन एवं सभी प्राणियों तक अन्न पहुंचाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।
विप्राणां वेदविदुषां गृहस्थानां यशस्विनाम्।
शुश्रूषैव तु शूद्रस्य धर्मो नैश्रेयसः परः ॥ 333 11
धर्म है। वेदों के ज्ञाता विद्वान, यशस्वी एवं गृहस्थ ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्र का
शुचिरुत्कृष्टशुश्रूषुर्मृद्वांगाऽनहंकृतः ।
ब्राह्मणाद्याश्रयो नित्यमुत्कृष्टां जातिमश्नुते ।। 334
जो शूद्र नित्य ब्राह्मणों की सेवा करता है, पवित्र, सदाचारी, परिश्रमी, विनम्र व अहंकार रहित होता है- वह उच्च जाति को प्राप्त कर लेता है।
एषोऽनापदि वर्णानामुक्तः कर्मविधिः शुभः ।
आपद्यपि हि यस्तेषां क्रमशस्तं निबोधत ।। 335 ।।
भृगु जी ने कहा, विद्वज्जनो! यह मैंने चारों वर्णों के सामान्य धर्म बतलाए। अब मैं आपको उनके आपातकालीन धर्म के बारे में बतलाऊंगा।
।। मनुस्मृति नवम अध्याय सम्पूर्ण ।।
इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वतपुङ्गवे विभूम्नि । स्वसुखमुपगते क्वचिद्विहर्तुं प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाहः ॥ १ ॥
त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं रविकरगौरवराम्बरं दधाने । वपुरलककुलावृताननाब्जं विजयसखे रतिरस्तुमेऽनवद्या ॥ २ ॥
युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्-कचलुलितश्रमवार्यलङ्कृतास्ये । मम निशितशरैर्विभिध्यमान-त्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ॥ ३ ॥
सपदि सखि वचो निशम्य मध्ये निजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य । स्थितवति परसैनिकायुरक्ष्णा हृतवति पार्थसखे रतिर्ममास्तु ॥ ४ ॥
व्यवहितपृतनामुखं निरीक्ष्य स्वजनवधाद्विमुखस्य दोषबुद्ध्या । कुमतिमहरदात्मविद्यया यः चरणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु ॥ ५ ॥
स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञा-मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः । धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्गु-र्हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥ ६ ॥
शितविशिखहतो विशीर्णदंशः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे । प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् गतिर्मुकुन्दः ॥ ७ ॥
ललितगतिविलासवल्गुहास-प्रणयनिरीक्षणकल्पितोरुमानाः । कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धाः प्रकृतिमगन्किल यस्य गोपवध्वः ॥ ८ ॥
मुनिगणनृपवर्यसङ्कुलेऽन्तः-सदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम् । अर्हणमुपपेद ईक्षणीयो मम दृशिगोचर एष आविरात्मा ॥ ९ ॥
तमिममहमजं शरीरभाजां हृदि हृदि धिष्ठितमात्मकल्पितानाम् । प्रतिदृशमिव नैकधार्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूत भेदमोहः ॥ १० ॥
Traditional
जय गुरु देव हरे जय गुरु देव हरे
अज्ञान से जो हमको तारे
ज्ञान का दीपक जलाया
अंधकार से प्रकाश में लाये
मोक्ष का मार्ग दिखाये
शिष्य हम आपके गुरु देव
चरणों में अर्पित तन मन धन
आशीर्वाद दो सदा प्रभु
जय गुरु देव हरे जय गुरु देव हरे
राधा कृष्ण के शाश्वत प्रेम का अनुभव करें इन विशेष दिव्य पदों व ब्रज साहित्य के माध्यम से।
Bindu ji
जय जगपति, जय जनपति रघुकुलपति राम।
शोभित श्रीसिय समेत, छविधर , अभिराम ।।
जय कृपाल प्रणतपाल, दायक विश्राम।
घन सम तन द्युति ललाम, सुगति शान्ति धाम ।।
भूमि भार, हरन हार, जय अनन्त नाम।
त्रिभुवन विख्यात विमल पावन गुण ग्राम।।
नेति नेति गावत ऋग्, यजु, अथर्व, साम।
पूर्ण 'बिन्दु' पूर्ण सिन्धु परम पूर्ण काम।।
Shrijirasik
एक
हरि आप हरो जन री भीर।
द्रोपदी री लाज राखी, आप बढ़ायो चीर।
भगत कारण रूप नरहरि, धर्यो आप सरीर।
बूढ़तो गजराज राख्यो, काटी कुण्जर पीर।
दासी मीराँ लाल गिरधर, हरो म्हारी भीर॥
दो
स्याम म्हाने चाकर राखो जी,
गिरधारी लाला म्हाँने चाकर राखोजी।
चाकर रहस्यूँ बाग लगास्यूँ नित उठ दरसण पास्यूँ।
बिन्दरावन री कुंज गली में, गोविन्द लीला गास्यूँ।
चाकरी में दरसण पास्यूँ, सुमरण पास्यूँ खरची।
भाव भगती जागीरी पास्यूँ, तीनूं बाताँ सरसी।
मोर मुगट पीताम्बर सौहे, गल वैजन्ती माला।
बिन्दरावन में धेनु चरावे, मोहन मुरली वाला।
ऊँचा ऊँचा महल बणावं बिच बिच राखूँ बारी।
साँवरिया रा दरसण पास्यूँ, पहर कुसुम्बी साड़ी।
आधी रात प्रभु दरसण, दीज्यो जमनाजी रे तीरां।
मीराँ रा प्रभु गिरधर नागर, हिवड़ो घणो अधीराँ॥
Shrijirasik
भजन बिनु कूकर−सूकर−जैसो।
जैसैं घर बिलाव के मूसा, रहत बिषय−बस वैसौ॥
बग−बगुली अरु गीध−गीधिनी, आइ जनम लियौ तैसौ।
उनहू कैं गृह, सुत, दारा हैं, उन्हैं भेद कहु कैसौ?
जीव मारि कै उदर भरत हैं, तिन कौ लेखौ ऐसौ।
सूरदास भगवंत−भजन बिनु, मनौ ऊँट−बृष−भैंसौ॥
भजन किए बिना तो कुत्ते या सूअर के समान मनुष्य-जीवन है। जैसे बिल्लीवाले घर में चूहे (सदा मृत्यु के ग्रास बने रहते हैं), वैसे ही (मनुष्य भी) विषय−वासना के वश हुआ मृत्यु के चंगुल में रहता है। जैसे बगुले−बगुली और गिद्ध−गिद्धनी जन्म लेते हैं, वैसे ही उसने भी पृथ्वी पर व्यर्थ जन्म लिया है। बगुले−गिद्ध आदि के भी घर, पुत्र, स्त्री आदि तो हैं ही; फिर मनुष्य का उनसे किस बात में भेद कहा जाए। जो लोग दूसरे जीवों को मार कर अपना पेट भरते हैं, उनकी गणना तो बगुले−गिद्ध में ही है। सूरदास कहते हैं−भगवान का भजन किए बिना तो मनुष्य ऊँट, बैल और भैंसे के समान ही है।
Shrijirasik
श्रीमद भागवत के अन्तर्गत आने वाले गोपियों के पञ्च प्रेम गीत (वेणुगीत, युगल गीत, प्रणय गीत, गोपी गीत और भ्रमर गीत) इनमें से गोपी गीत का वर्णन इस प्रकार है।
जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः
श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि ।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावका
स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते ॥1॥
शरदुदाशये साधुजातसत्स-
रसिजोदरश्रीमुषा दृशा ।
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका
वरद निघ्नतो नेह किं वधः ॥2॥
विषजलाप्ययाद्व्यालराक्षसा-
द्वर्षमारुताद्वैद्युतानलात् ।
वृषमयात्मजाद्विश्वतोभया
दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः ॥3॥
न खलु गोपिकानन्दनो भवा-
नखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् ।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये
सख उदेयिवान्सात्वतां कुले ॥4॥
विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते
चरणमीयुषां संसृतेर्भयात् ।
करसरोरुहं कान्त कामदं
शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम् ॥5॥
व्रजजनार्तिहन्वीर योषितां
निजजनस्मयध्वंसनस्मित ।
भज सखे भवत्किंकरीः स्म नो
जलरुहाननं चारु दर्शय ॥6॥
प्रणतदेहिनांपापकर्शनं
तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम् ।
फणिफणार्पितं ते पदांबुजं
कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम् ॥7॥
मधुरया गिरा वल्गुवाक्यया
बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण ।
विधिकरीरिमा वीर मुह्यती-
रधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः ॥8॥
तव कथामृतं तप्तजीवनं
कविभिरीडितं कल्मषापहम् ।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं
भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥9॥
प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं
विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम् ।
रहसि संविदो या हृदिस्पृशः
कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि ॥10॥
चलसि यद्व्रजाच्चारयन्पशून्
नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम् ।
शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः
कलिलतां मनः कान्त गच्छति ॥11॥
दिनपरिक्षये नीलकुन्तलै-
र्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम् ।
घनरजस्वलं दर्शयन्मुहु-
र्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि ॥12॥
प्रणतकामदं पद्मजार्चितं
धरणिमण्डनं ध्येयमापदि ।
चरणपङ्कजं शंतमं च ते
रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन् ॥13॥
सुरतवर्धनं शोकनाशनं
स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम् ।
इतररागविस्मारणं नृणां
वितर वीर नस्तेऽधरामृतम् ॥14॥
अटति यद्भवानह्नि काननं
त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम् ।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते
जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम् ॥15॥
पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवा-
नतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः ।
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः
कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥16॥
रहसि संविदं हृच्छयोदयं
प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम् ।
बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते
मुहुरतिस्पृहा मुह्यते मनः ॥17॥
व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते
वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम् ।
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां
स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम् ॥18॥
यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेष
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु ।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित्कू
र्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ॥19॥
हिन्दी भावार्थ
हे प्यारे ! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोकों से भी व्रज की महिमा बढ गयी है। तभी तो सौन्दर्य और मृदुलता की देवी लक्ष्मीजी अपना निवास स्थान वैकुण्ठ छोड़कर यहाँ नित्य निरंतर निवास करने लगी है , इसकी सेवा करने लगी है। परन्तु हे प्रियतम ! देखो तुम्हारी गोपियाँ जिन्होंने तुम्हारे चरणों में ही अपने प्राण समर्पित कर रखे हैं , वन वन भटककर तुम्हें ढूंढ़ रही हैं॥1॥
हे हमारे प्रेम पूर्ण ह्रदय के स्वामी ! हम तुम्हारी बिना मोल की दासी हैं। तुम शरदऋतु के सुन्दर जलाशय में से चाँदनी की छटा के सौन्दर्य को चुराने वाले नेत्रों से हमें घायल कर चुके हो । हे हमारे मनोरथ पूर्ण करने वाले प्राणेश्वर ! क्या नेत्रों से मारना वध नहीं है? अस्त्रों से ह्त्या करना ही वध है॥2॥
हे पुरुष शिरोमणि ! यमुनाजी के विषैले जल से होने वाली मृत्यु , अजगर के रूप में खाने वाली मृत्यु अघासुर , इन्द्र की वर्षा , आंधी , बिजली, दावानल , वृषभासुर और व्योमासुर आदि से एवम भिन्न भिन्न अवसरों पर सब प्रकार के भयों से तुमने बार- बार हम लोगों की रक्षा की है॥3॥
हे परम सखा ! तुम केवल यशोदा के ही पुत्र नहीं हो; समस्त शरीरधारियों के ह्रदय में रहने वाले उनके साक्षी हो,अन्तर्यामी हो । ! ब्रह्मा जी की प्रार्थना से विश्व की रक्षा करने के लिए तुम यदुवंश में अवतीर्ण हुए हो॥4॥
हे यदुवंश शिरोमणि ! तुम अपने प्रेमियों की अभिलाषा पूर्ण करने वालों में सबसे आगे हो । जो लोग जन्म-मृत्यु रूप संसार के चक्कर से डरकर तुम्हारे चरणों की शरण ग्रहण करते हैं, उन्हें तुम्हारे कर कमल अपनी छत्र छाया में लेकर अभय कर देते हैं । हे हमारे प्रियतम ! सबकी लालसा-अभिलाषाओ को पूर्ण करने वाला वही करकमल, जिससे तुमने लक्ष्मीजी का हाथ पकड़ा है, हमारे सिर पर रख दो॥5॥
हे वीर शिरोमणि श्यामसुंदर ! तुम सभी व्रजवासियों का दुःख दूर करने वाले हो । तुम्हारी मंद मंद मुस्कान की एक एक झलक ही तुम्हारे प्रेमी जनों के सारे मान-मद को चूर-चूर कर देने के लिए पर्याप्त हैं । हे हमारे प्यारे सखा ! हमसे रूठो मत, प्रेम करो । हम तो तुम्हारी दासी हैं, तुम्हारे चरणों पर न्योछावर हैं । हम अबलाओं को अपना वह परमसुन्दर सांवला मुखकमल दिखलाओ॥6॥
तुम्हारे चरणकमल शरणागत प्राणियों के सारे पापों को नष्ट कर देते हैं। वे समस्त सौन्दर्य, माधुर्यकी खान है और स्वयं लक्ष्मी जी उनकी सेवा करती रहती हैं । तुम उन्हीं चरणों से हमारे बछड़ों के पीछे-पीछे चलते हो और हमारे लिए उन्हें सांप के फणों तक पर रखने में भी तुमने संकोच नहीं किया । हमारा ह्रदय तुम्हारी विरह व्यथा की आग से जल रहा है तुम्हारी मिलन की आकांक्षा हमें सता रही है । तुम अपने वे ही चरण हमारे वक्ष स्थल पर रखकर हमारे ह्रदय की ज्वाला शांत कर दो ॥7॥
हे कमल नयन ! तुम्हारी वाणी कितनी मधुर है । तुम्हारा एक एक शब्द हमारे लिए अमृत से बढकर मधुर है । बड़े बड़े विद्वान उसमे रम जाते हैं । उसपर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं । तुम्हारी उसी वाणी का रसास्वादन करके तुम्हारी आज्ञाकारिणी दासी गोपियाँ मोहित हो रही हैं । हे दानवीर ! अब तुम अपना दिव्य अमृत से भी मधुर अधर-रस पिलाकर हमें जीवन-दान दो, छका दो ॥8॥
हे प्रभो ! तुम्हारी लीला कथा भी अमृत स्वरूप है । विरह से सताए हुये लोगों के लिए तो वह सर्वस्व जीवन ही है। बड़े बड़े ज्ञानी महात्माओं - भक्तकवियों ने उसका गान किया है, वह सारे पाप - ताप तो मिटाती ही है, साथ ही श्रवण मात्र से परम मंगल - परम कल्याण का दान भी करती है । वह परम सुन्दर, परम मधुर और बहुत विस्तृत भी है । जो तुम्हारी उस लीलाकथा का गान करते हैं, वास्तव में भू-लोक में वे ही सबसे बड़े दाता हैं ॥9॥
हे प्यारे ! एक दिन वह था , जब तुम्हारे प्रेम भरी हंसी और चितवन तथा तुम्हारी तरह तरह की क्रीडाओं का ध्यान करके हम आनंद में मग्न हो जाया करती थी । उनका ध्यान भी परम मंगलदायक है , उसके बाद तुम मिले । तुमने एकांत में ह्रदय-स्पर्शी ठिठोलियाँ की, प्रेम की बातें कहीं । हे छलिया ! अब वे सब बातें याद आकर हमारे मन को क्षुब्ध कर देती हैं ॥10॥
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