॥ राधे राधे ॥

चतुरंग चमू अति छबि विराज, मणि कनक साजि गराज बाज।
पुनि दुरद पीठ राजें निशान, धुनि होत दुंदुभी छन लजान॥
केउ चलै गंजन पर गुनी नाम, जावें जो कीर्ति कीनी सुराम।
पुनि चढ़े अश्व शोभित अपार, छत्रें सुभट साजे सिंगार॥
पखरैत किते हय पै सवार, जिन जिरह टोप आवै अपार।
राज अनंत सौंवत सुढंग, कर गहें चाप कटि कसि निषंग॥
सुंदर स्वर की शोभा अनूप, सुरजन विमान नहीं लगत जूप।
कसि कमर अमर से चले बीर, अति भई बाहिनी की जु भीर॥
पैदल दल शोभा के समूह, लखि चकित रहत सुर विविध जूह।
है कितों कटक नाहिन प्रमान, सोभा समुदु मनो उमड़ आन॥
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