॥ राधे राधे ॥

आजु हरि खेलत फागु बनी।
इत गोरी रोरी भरि भोरी, उत गोकुल को धनी॥
चोवा कों ढोवा भरि राख्यो केसर-कीच घनी।
अबिर गुलाल उड़ावत गावत, सारी जात सनी॥
हाथन लसत कनक पिचकारी, ग्वालन छूट छनी।
नंददास प्रभु होरी खेलत, मुरि-मुरि जात अनी॥
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