॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Man Re Tan Kagad Ka Putla
मन रे तन कागद का पुतला
Kabir Das Ji
Kavi: Kabir Das Ji
मन रे तन कागद का पुतला ।
लागे बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करे क्या इतना ॥
माटी का इक ढेला भैया, पवन चले उड़ि जाना ।
इस देही का गर्व न कीजै, पलक झपक मर जाना ॥
जो कछु है सो अभी कर ले रे, कल का नहीं ठिकाना ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, राम नाम लिपटाना ॥
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