॥ नाहं स्मरामि कृष्णं तु राधास्मरणवर्जितम् ॥
कबीर दास जी - पद
Kabir Das Ji - Pads
Pads (3)
Beet Gaye Din Bhajan Bina Re
padKabir Das Ji
बीत गए दिन भजन बिना रे ।
बाल अवस्था खेल में खोयो, जब यौवन तब मान घना रे ॥
लागा लोभ जागत नहिं कबहूँ, माया मोह की फाँस तना रे ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, अंत समय का कौन बना रे ॥
Man Re Tan Kagad Ka Putla
padKabir Das Ji
मन रे तन कागद का पुतला ।
लागे बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करे क्या इतना ॥
माटी का इक ढेला भैया, पवन चले उड़ि जाना ।
इस देही का गर्व न कीजै, पलक झपक मर जाना ॥
जो कछु है सो अभी कर ले रे, कल का नहीं ठिकाना ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, राम नाम लिपटाना ॥
Pande Bujhi Piyahu Tum Pani
padShrijirasik
पाँड़े बूझि पियहु तुम पानी।
जिहि मिटिया के घरमहै बैठे, तामहँ सिस्ट समानी।
छपन कोटि जादव जहँ भींजे, मुनिजन सहस अठासी॥
पैग पैग पैगंबर गाड़े, सो सब सरि भा माँटी।
तेहि मिटिया के भाँड़े, पाँड़े, बूझि पियहु तुम पानी॥
मच्छ−कच्छ घरियार बियाने, रुधिर−नीर जल भरिया।
नदिया नीर नरक बहि आवै, पसु−मानुस सब सरिया॥
हाड़ झरि झरि गूद गरि गरि, दूध कहाँ तें आया।
सो लै पाँड़े जेवन बैठे, मटियहिं छूति लगाया॥
बेद कितेब छाँड़ि देउ पाँड़े, ई सब मन के भरमा।
कहहिं कबीर सुनहु हो पाँड़े, ई तुम्हरे हैं करमा॥
पाँड़े, यह तुम्हारी मूर्खता है कि तुम पहले जाति पूछते हो, फिर उसके हाथ का पानी पीते हो। तुम जिस मिट्टी के घर में बैठे हो उसमें सारी सृष्टि समाई हुई है। छप्पन करोड़ यादव और अठासी हज़ार मुनि यहाँ डूब गए और क़दम−क़दम पर गड़े हुए पैग़म्बरों की लाशें सड़कर मिट्टी हो गई है। अरे पाँड़े, ये बर्तन उसी मिट्टी के हैं और तुम जाति पूछकर पानी पीते हो। इस पानी में मगर, कछुए और घड़ियाल बच्चे देते हैं और उनका ख़ून पानी में मिल जाता है। इस नदी के पानी में सारा नर्क (गंदी चीज़ें) बहकर आता है और जानवर और इंसान सब इसमें सड़ते हैं। जब हड्डी और गूदा गल जाता है तब दूध बनता है। इस दूध को लेकर पाँड़े भोजन करने बैठते हैं लेकिन सारी छुआछूत मिट्टी में मानते हैं। हे पाँड़े, वेद और क़ुरान सबको छोड़ दो। ये सब दिल का धोखा है। कबीर कहते हैं कि ये तुम्हारे कर्म हैं जो तुम्हारे सामने आते हैं।