॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhagavat Gita Chapter 16
श्रीमद्भगवत गीता षोडश अध्याय
अध्याय सोलह: दैवासुर सम्पद् विभाग योग
दैवीय और आसुरी प्रकृति में भेद का योग
इस अध्याय में श्रीकृष्ण दैवीय और आसुरी दो प्रकार की प्रकृति का वर्णन करते हैं। दैवीय गुण धार्मिक ग्रंथों के उपदेशों के अनुसरण, सत्त्वगुण को पोषित करने और अध्यात्मिक अभ्यास द्वारा मन को शुद्ध करने से विकसित होते हैं। ये दैवीय गुणों में वृद्धि करते हैं और अंततः भगवत्प्राप्ति तक पहुँचाते हैं। इसके विपरीत संसार में आसुरी प्रवृत्ति भी पायी जाती है, जो मोह अर्थात् आसक्ति और अज्ञानता के गुणों से तथा भौतिक विचारों द्वारा विकसित होती है। यह हमारे व्यक्तित्व में अवगुणों का पोषण करती है और अंततः आत्मा को नारकीय अवस्था में धकेलती है।
यह अध्याय दैवीय गुणों से सम्पन्न पुण्यात्माओं के निरूपण से शुरू होता है। आगे इसमें आसुरी गुणों का भी वर्णन किया गया है जिनका अति सतर्कता के साथ त्याग करना चाहिए, क्योंकि ये आत्मा को पुनः अज्ञानता और 'संसार' अर्थात् जीवन और मृत्यु के चक्र में खींचते हैं। श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं कि क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं किया जाना चाहिए, इसका निर्णय करने का अधिकार केवल वेद शास्त्रों का ही माना जाता है अतः हमें भी वेदों के वाक्यों को मानना चाहिए। हमें इन वैदिक शास्त्रों के विधि-निषेधों को समझना चाहिए और तदनुसार इस संसार में अपने कार्यों का निष्पादन और दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।
श्रीभगवानुवाच |
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति: |
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् || 1||
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम् |
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् || 2||
तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहोनातिमानिता |
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत || 3||
परम पुरुषोत्तम भगवान् ने कहाः हे भरतवंशी! निर्भयता, मन की शुद्धि, अध्यात्मिक ज्ञान में दृढ़ता, दान, इन्द्रियों पर नियंत्रण, यज्ञों का अनुष्ठान करना, धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन, तपस्या और स्पष्टवादिता, अहिंसा, सत्यता, क्रोधहीनता, त्याग, शांतिप्रियता, दोषारोपण से मुक्त, सभी जीवों के प्रति करूणा का भाव, लोभ से मुक्ति, भद्रता, लज्जा, स्थिरता, शक्ति, क्षमाशीलता, धैर्य, पवित्रता, शत्रुता के भाव से मुक्ति और प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्ति होना, ये सब दिव्य प्रकृति से संपन्न लोगों के गुण हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण दैवीय प्रकृति के छब्बीस गुणों का वर्णन करते हैं। परम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए तथा अपने आध्यात्मिक अभ्यास के अंग के रूप में हमें इन गुणों का पोषण करना चाहिए।
निर्भयताः यह वर्तमान और भविष्य के दुःखों की चिन्ता से मुक्त होने की अवस्था है। अत्यधिक आसक्ति भय का कारण होती है। धन संपदा में आसक्ति घोर दरिद्रता भय उत्पन्न करती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रति आसक्ति अपयश के भय का कारण होती है। दुर्व्यसनों में आसक्ति पाप के फल का भय उत्पन्न करती है और शरीर के सुखों के प्रति आसक्ति से अस्वस्थ होने का भय सताता है। अतः विरक्ति और भगवान की शरणागति सभी भयों को नष्ट करती है।
मन की शुद्धिः यह आंतरिक शुद्धिकरण की अवस्था है। मन विचारों, कल्पनाओं, भावुकता आदि को जन्म और प्रश्रय देता है। जब यह नैतिक, सकारात्मक और उन्नत होते हैं तब मन शुद्ध हो जाता है और जब ये अनैतिक और कुत्सित होते हैं तब मन को अशुद्ध माना जाता है। मोह के कारण भौतिक पदार्थों के प्रति आसक्ति और अज्ञानता मन को दूषित करती है, जबकि भगवान में प्रीति मन को शुद्ध करती है।
आध्यात्मिक ज्ञान में दृढ़ताः यह कहा जाता है कि "तत्त्वविस्मरणात् भेकिवत्" अर्थात् "जब मनुष्य यह भूल जाता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित है तब वह पशु बन जाता है।" इसलिए अध्यात्मिक सिद्धांतो के प्रति जागृत रहने के लिए सदाचार के पथ पर चलना चाहिए।
दान पुण्यः इसका तात्पर्य धन-सम्पदा आदि को शुभ कार्य के लिए दान करने से है। वास्तविक दान वही है जो न केवल "मैं दाता हूँ" की भावना से मुक्त होकर किया जाए बल्कि इसे भगवान द्वारा प्रदत्त अवसर समझ कर उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता की भावना से युक्त होकर करना चाहिए। द्रव्य का दान शरीर के पालन पोषण हेतु किया जाता है, जिससे दूसरों को थोड़ी ही सहायता प्राप्त होती है। आध्यात्मिक दान आत्मा के स्तर पर किया जाता है, जो उन सभी प्रकार के दुःखों के कारणों का निवारण करता है जो भगवान से विमुख होने के कारण सहन करने पड़ते हैं। इसे भौतिक दान से श्रेष्ठ माना जाता है।
इन्द्रिय संयमः मन को सांसारिक मोह में डालने में इन्द्रियाँ कुशल होती हैं। ये जीवों को इन्द्रिय तृप्ति के लिए उकसाती हैं इसलिए धर्म के मार्ग का अनुसरण करने के लिए और परम लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु तुच्छ इन्द्रिय सुखों का त्याग करना आवश्यक है। इस प्रकार से इन्द्रियों पर संयम रखना भगवत्प्राप्ति के मार्ग पर चलने के लिए आवश्यक गुण है।
यज्ञ परायणताः इसका तात्पर्य वैदिक कर्त्तव्यों और सामाजिक दायित्वों का पालन करना है। यज्ञों को तभी परिपूर्ण माना जाता है जब इन्हें भगवान के सुख के लिए संपन्न किया जाता है।
शास्त्रों का अध्ययन करनाः दिव्य गुणों को विकसित करने से शास्त्रों के उन्नत ज्ञान का बुद्धि द्वारा धारण किया जाता है। जब बुद्धि सही ज्ञान से प्रकाशित हो जाती है तब मनुष्य के कर्म स्वतः उत्कृष्ट हो जाते हैं।
तपस्याः मन, शरीर और इन्द्रियों की प्रवृत्ति ऐसी होती है कि यदि हम इन्हें संतुष्ट करते हैं तब ये और अधिक सुख प्राप्त करने की लालसा करते हैं और यदि हम इन पर अंकुश लगाते हैं, तब ये अनुशासित हो जाते हैं। इअतः शरीर, मन और बुद्धि को शुद्ध करने के लिए कष्ट सहन करना तपस्या है।
अहिंसाः इसका अर्थ अन्य लोगों के जीवन में विचारों, वाणी और कर्मों द्वारा बाधा न पहुँचना है।
स्पष्टवादिताः वाणी और आचरण में निष्कपटता मन को निर्मल करती है और मन में श्रेष्ठ विचारों को अंकुरित करती है। 'सादा जीवन उच्च विचार' यह कहावत स्पष्टवादिता के लाभों को समुचित रूप से चित्रित करती है।
सत्यताः इसका अर्थ अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए तथ्यों का विरूपण न करना है। भगवान परम सत्य हैं, इसलिए सत्य परायणता का अभ्यास हमें उनकी ओर ले जाता है जबकि झूठ भले ही लाभदायक हो, लेकिन हमें भगवान से विमुख करता है।
क्रोध मुक्त होनाः क्रोध करना मन का विकार है। क्रोध तब उत्पन्न होता है जब सुख की कामनाओं की पूर्ति में बाधा उत्पन्न होती है और परिस्थितियाँ हमारी अपेक्षाओं के अनुकूल नहीं होती। वैराग्य को विकसित कर भगवान की इच्छा में इच्छा रखने से क्रोध को वश में किया जा सकता है।
त्यागः माया का संबंध भगवान है और यह भगवान के सुख के लिए है। इसलिए संसार के वैभव किसी अन्य के उपभोग के लिए नहीं बल्कि भगवान उपभोग के लिए हैं। इसी ज्ञान में स्थित होना त्याग है।
शांतिप्रियताः सद्गुणों को धारण करने के लिए मानसिक शांति आवश्यक है। इसके कारण ख़राब परिस्थितियों में भी हममें आंतरिक संतुलन बनाए रखने की क्षमता होती है।
दोषारोपण से बचनाः संपूर्ण संसार और इसके पदार्थ गुणों और दुर्गुणों का मिश्रण हैं। दूसरों में दोष ढूंढने से मन मलिन होता है और दूसरों में गुण देखने से मन शुद्ध होता है। संत महापुरुषों की प्रकृति अपने भीतर अवगुणों का और दूसरों में गुणों का अवलोकन करने की होती है।
सभी जीवों के प्रति करुणाः जैसे-जैसे मनुष्य अपने भीतर आध्यात्मिकता विकसित करते हैं वैसे वैसे वे स्वार्थ की भावना से ऊपर उठकर सभी जीवों के लिए सहानुभूति का भाव विकसित करते हैं। करुणा का भाव दूसरों के दुःखों को देख कर उत्पन्न होता है।
लोभ से मुक्तिः शरीर की देखभाल हेतु आवश्यक पदार्थों से अधिक संग्रह करने की लोभ है। इसके प्रभाव से लोग विपुल धन-सम्पदा एकत्रित करते हैं यह जानते हुए भी कि मृत्यु के समय सब कुछ यहीं छूट जाएगा। इस प्रकार लोभ से मुक्ति जुमें आंतरिक शांति की ओर ले जाती है।
भद्रताः रूखा व्यवहार करने की प्रवृत्ति भावनाओं के प्रति संवेदनशून्यता के कारण उत्पन्न होती है। लेकिन जैसे-जैसे कोई आध्यात्मिक उन्नति करता है, वैसे वैसे वह अपने अशिष्ट आचरण को त्याग देता है। सौम्यता आध्यात्मिक उन्नति का लक्षण है।
लज्जाः 'शास्त्रों और समाज के नियम के विरुद्ध कर्म करने में आत्मग्लानि का भाव होना लज्जा है।' संत महापुरुषों की प्रकृति ही ऐसी होती है जो पापजन्य कर्मों के लिए मनुष्य को आत्मग्लानि का बोध कराती है।
अस्थिरहीनताः किसी भी कार्य का आरंभ शुद्ध भावना से करना चाहिए, लेकिन यदि हम प्रलोभन या विपत्तियों द्वारा विचलित हो जाते हैं तो हम अपनी यात्रा पूरी नहीं कर पाते। मार्ग में आने वाली विपत्तियों का सामना बिना विचलित हुए करने से ही सत्य के मार्ग में सफलता मिलती है।
शक्तिः मन की शुद्धता से हमें उच्च आदर्शों और सच्ची श्रद्धा से कर्म करने की प्रेरणा प्राप्त होती है। इसलिए महापुरुष अपने हाथ में लिए कार्य को असीम शक्ति और उत्साह के साथ सम्पन्न करते हैं।
क्षमा और सहनशीलताः दूसरों के अपराधों को बिना किसी प्रतिशोध की भावना से सहन करने की क्षमता ही सहनशीलता है। क्षमाशीलता द्वारा व्यक्ति दूसरों द्वारा दिए गए घावों को भर लेता है अन्यथा ये सड़ने लगते हैं और मन को व्यथित करते हैं।
धैर्यः प्रतिकूल परिस्थितियों के आने पर मन और इन्द्रियों के क्लांत हो जाने पर भी लक्ष्य प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय धौर्य है। संसार के सभी बड़े कार्य उन लोगों के द्वारा संपन्न किए गए हैं जो निराशा के समय में और परिस्थितियों के प्रतिकूल होने पर भी प्रयासरत रहे। श्री अरविंद ने इसका वर्णन किया है-"तुम्हें कठिनाइयों से भी अधिक दृढ़ होना होगा क्योंकि अन्य कोई उपाय नहीं है।" ।
शुद्धताः इसका अर्थ आंतरिक और बाह्य शुद्धता है। पुण्यात्मा जन बाह्य शुद्धता पर भी बल देते हैं क्योंकि यह आंतरिक शुद्धता का सोपान होती है। जार्ज बर्नाड शॉ ने कहा है, "अपने हृदय को स्वच्छ और उज्ज्वल रखना चाहिए, तुम एक झरोखे हो जिसमें तुम ब्रह्माण्ड देख सकते हो।"
शत्रुता का भाव न रखनाः दूसरों के प्रति शत्रुता का भाव हमारे मन में विष घोलता है और यह आध्यात्मिक मार्ग की उन्नति में बाधा उत्पन्न करता है। दूसरों के प्रति विद्वेष की भावना से मुक्ति और अन्य लोगों को अपने समान समझने की भावना, उनके भीतर सदा भगवान को देखने से प्राप्त होती है।
घमंड रहित होनाः आत्म प्रशंसा, डींग मारना, आडंबर आदि सभी घमंड से उत्पन्न होते हैं। महापुरुष किसी प्रकार का घमंड नहीं करते बल्कि वे अपने सद्गुणों को भगवान की कृपा मानते हैं। इसलिए वे आत्मप्रशंसा से दूर रहते हैं।
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च |
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् || 4||
हे पार्थ! पाखण्ड, दम्भ, अभिमान, क्रोध, निष्ठुरता और अज्ञानता आसुरी प्रकृति वाले लोगों के गुण हैं।
श्रीकृष्ण अब आसुरी प्रकृति से युक्त लोगों के छः लक्षणों की व्याख्या करते हैं। वे पाखंडी होते हैं। इसका तात्पर्य है कि वे दूसरों को प्रभावित करने के लिए शुभ लक्षणों से संपन्न न होते हुए भी सदाचरण का प्रदर्शन करते है। यह कृत्रिम (जेकिल एंड हाइड) व्यक्तित्व है जोकि आंतरिक रूप से तो अशुद्ध है किंतु बाहर से शुद्धता की प्रतीति कराता है।
आसुरी गुण वालों का स्वभाव अहंकार से परिपूर्ण और दूसरों के प्रति अशिष्ट होता है। वे अपनी उपलब्धियों और उपाधियों जैसे धन, शिक्षा, सौन्दर्य, पद-प्रतिष्ठा आदि पर गर्व करते हैं। मन पर नियंत्रण न होने के कारण वे शीघ्र क्रोधित हो जाते हैं। कामवासना और लालच के कारण कुंठाग्रस्त रहते हैं। वे निर्दयी और कठोर होते हैं तथा दूसरों के दुःखों में संवेदनशील नहीं होते। उन्हें आध्यात्मिक सिद्धांतों का ज्ञान नहीं होता और वे अधर्म को धर्म मानते हैं।
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता |
मा शुच: सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव || 5||
दैवीय गुण मुक्ति की ओर ले जाते हैं जबकि आसुरी गुण निरन्तर बंधन का कारण होते हैं। हे अर्जुन! शोक मत करो क्योंकि तुम दैवीय गुणों के साथ जन्मे हो।
दो प्रकार की प्रकृतियों का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण दोनों के परिणामों को व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि आसुरी गुण मनुष्य को 'संसार' की बेड़ियों में जकड़ लेते हैं जबकि दैवीय गुणों द्वारा बंधनों को काटने में सहायता मिलती है। आध्यात्मिक मार्ग पर सफलतापूर्वक चलने के लिए साधक को कई बिन्दुओं पर ध्यान रखना आवश्यक होता है। यहाँ तक कि यदि कोई एक भी आसुरी गुण जैसे अभिमान, पाखंड आदि रह जाता है तो यह असफलता का कारण बन सकता है। इसलिए हमें दैवीय गुणों को विकसित करना चाहिए। दैवीय गुणों के बिना हमारी आध्यात्मिक उन्नति पुनः हवा हो सकती है। उदाहरणार्थ धौर्य न होने पर हम विपत्ति आने पर अपना लक्ष्य छोड़ देंगे और क्षमाशीलता के बिना मन विद्वेष से युक्त हो जाएगा। तब वह भगवान में तल्लीन नहीं हो पाएगा। लेकिन यदि हम दैवीय गुणों से सम्पन्न रहते हैं तब प्रगति के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं का सामना करने के लिए हम तैयार रहेंगे। इस प्रकार से सद्गुणों को विकसित करना और अवगुणों का उन्मूलन करना आध्यात्मिक विकास का अभिन्न अंग है। अपने प्रतिदिन के निजी कार्यकलापों की दैनिकी (डायरी) लिखना एक उपयोगी पद्धति जो हमारी दुर्बलताओं को दूर करने में सहायता करती है। कई सफल लोगों ने अपने संस्मरणों और कार्य-कलापों को डायरी में लिखा ताकि उन्हें सफलता प्राप्त करने में अपेक्षित गुणों को विकसित करने में सहायता मिल सके। महात्मा गांधी और बेंजामिन फ्रैंकलिन् दोनों ने अपनी आत्मकथाओं में ऐसा उल्लेख किया है। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि यदि हम अपनी भक्ति को पुष्ट करते हैं तब समय के साथ हम स्वाभाविक रूप से इन दैवीय गुणों को प्राप्त कर लेगें। यह सत्य है लेकिन प्रारंभ में ही से भक्ति मार्ग की ओर अग्रसर होते हुए सभी प्रकार के नकारात्मक लक्षणों से मुक्त रहना कठिन है। इनमें से कोई भी अवगुण हमारी प्रगति में बाधा डाल सकता है। अधिकांश लोगों के लिए धीरे-धीरे भक्ति भावना को विकसित करना ही उपयोगी होता है जिससे दैवीय गुणों को विकसित करने और आसुरी गुणों का उन्मूलन करने में भी सफलता मिलती है। इसलिए हमें भक्ति के अंग के रूप में श्रीकृष्ण द्वारा इस अध्याय में वर्णित दैवीय गुणों को अपने भीतर विकसित करने के लिए निरन्तर कार्य करना होगा और आसुरी गुणों का त्याग करना होगा।
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च |
दैवो विस्तरश: प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु || 6||
संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं-एक वे जो दैवीय गुणों से सम्पन्न हैं और दूसरे वे जो आसुरी प्रकृति के हैं। मैं दैवीय गुणों का विस्तार से वर्णन कर चुका हूँ अब तुम मुझसे आसुरी स्वभाव वाले लोगों के संबंध में सुनो।
सभी जीवात्माएँ अपने पूर्व जन्म की प्रवृतियों को अपने साथ बनाए रखती हैं। वे जिन्होंने पूर्व जन्मों में सद्गुणों को अर्जित किया और सराहनीय कार्य किए वे दैवीय गुणों के साथ जन्म लेते हैं। जबकि जो पिछले जन्मों में पापमय कार्यों में लिप्त रहे और जिन्होंने अपने मन को अपवित्र रखा वे वर्तमान जीवन में भी उसी प्रकार की प्रवृत्ति पाते हैं। इसी कारण से संसार में जीवों की प्रकृति में विविधता स्पष्ट दिखाई देती है। दैवीय और आसुरी गुण इस विविधता की दो चरम सीमाएँ हैं। स्वर्ग में रहने वाले लोग अधिक सद्गुणों से सम्पन्न होते हैं जबकि आसुरी लक्षणों से युक्त लोगों का प्राबल्य निम्न लोकों में होता है। मनुष्यों में दैवीय और आसुरी लक्षणों का मिश्रण होता है। एक कसाई के जीवन में भी कभी-कभी दयालुता का क्षण दिखाई देता है और कभी-कभी प्रबुद्ध आध्यात्मिक साधकों के गुणों में भी विकार देखने को मिलते हैं। यह कहा जाता है कि सतयुग में देवता और राक्षस अलग-अलग लोकों में रहते थे। त्रेतायुग में वे एक ही लोक पर रहते थे और द्वापरयुग में वे एक ही परिवार में रहे तथा कलियुग में ईश्वरीय और आसुरी गुण एक साथ मनुष्यों के हृदय में रहते हैं। मानव जीवन की यही महिमा है कि एक ओर सद्गुण उसे ऊपर उठाकर भगवान की ओर ले जाते हैं वहीं दूसरी ओर दुर्गुण उसे पतन की ओर ले जाति हैं। दैवीय गुणों की व्याख्या करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब आसुरी गुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन करेंगे ताकि इनकी सही पहचान करके हम इनसे दूर रह सकें।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा: |
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते || 7||
वे जो आसुरी गुणों से युक्त होते हैं वे यह समझ नहीं पाते कि उचित और अनुचित कर्म क्या हैं। इसलिए उनमें न तो पवित्रता, न ही सदाचरण और न ही सत्यता पायी जाती है।
धर्म में व्यवहारविधि निहित होती है जो मनुष्य के कल्याण के अनुकूल होती है। अधर्म में वे कार्य सम्मिलित होते हैं जो पतन की ओर ले जाते हैं और समाज की क्षति का कारण बनते हैं। इसलिए इसके प्रभुत्व में आये हुए लोग उचित और अनुचित कर्म क्या हैं? के संबंध में सदैव विचलित रहते हैं। इसका एक उदाहरण पाश्चात्य दर्शन की वर्तमान विचारधारा है। पुनर्जागरण के पश्चात् विकसित विभिन्न विचारधाराओं जैसे ज्ञान का युग, मानवतावाद अनुभववाद, समाजवाद और संदेहवाद के बाड़े आए पाश्चात्य दर्शन के वर्तमान युग को 'उत्तर आधुनिकतावाद' का नाम दिया गया है। उत्तर आधुनिकतावाद का प्रचलित मत यह है कि संसार में कोई भी परम सत्य नहीं है। 'सारी सत्ताएँ व्यावहारिक है' यह उत्तर आधुनिकतावाद के दर्शन का नारा बन चुका है। हम प्रायः ऐसी उक्ति सुनते हैं कि “यह तुम्हारे लिए सत्य हो सकता है, लेकिन मेरे लिए सत्य नहीं हैं।" सत्य को एक व्यक्तिगत दृष्टिकोण के रूप में या ऐसी अनुभूति के रूप में देखा जाता है जो मनुष्य की निजी सीमाओं से बंधी है। यह दृष्टिकोण नैतिकता से संबंधित विषयों को भी प्रभावित करता है जो उचित और अनुचित आचरण का ज्ञान कराते हैं। यदि संसार में परम सत्य जैसा कुछ भी नहीं है तब संसार में किसी विषय के संबंध में भी कोई निश्चित नैतिक औचित्य और अनौचित्य नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में लोगों का यह कहना तर्कसंगत प्रतीत होता है कि "यह तुम्हारे लिए उचित हो सकता है किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि यह मेरे लिए भी उचित है।" ऐसा विचार हमें आकर्षक लग सकता है किन्तु यदि इसकी तार्किकता को देखा जाए तब यह निरर्थक और विनाशकारी सिद्ध होता है। उदाहरणार्थ क्या यह उचित है कि यदि कोई लाल बत्ती होने पर यातायात (ट्रैफिक) लाईट की उपेक्षा करे? ऐसा करने वाला व्यक्ति अन्य लोगों के जीवन को जोखिम में डाल देगा। क्या इसे उचित माना जा सकता है? यदि कोई व्यक्ति घनी आबादी वाले क्षेत्र में आत्मघाती बम विस्फोट करे। भले ही उसकी बुद्धि भ्रष्ट करके उसे यह समझाया गया हो कि वह जो कर रहा है वह उचित है, लेकिन क्या समाज और मानवता की दृष्टि से इसे उचित कार्य माना जा सकता है? यदि कोई भी ऐसा विचार या क्रिया चरम सत्य नहीं है तब कोई यह नहीं कह सकता है कि 'उसे यह करना चाहिए' या 'उसे यह नहीं करना चाहिए।' अधिकांश लोग यह तर्क दे सकते हैं कि -'अनेक लोग इस काम को अच्छा नहीं समझते। इसलिए यह ग़लत है। 'सापेक्षवादियों के दृष्टिकोण के अनुसार कोई यह भी कह सकता है कि 'तुम्हारे लिए यह उचित हो सकता है लेकिन हमारे लिए निश्चित रूप से यह उचित नहीं है।' नैतिकता के दृष्टिकोण से परम सत्य को न मानने के विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि आसुरी प्रकृति वाले लोग क्या उचित है अथवा क्या अनुचित, के संबंध में विचलित रहते हैं और इस प्रकार से उनमें न तो शुद्धता, न सत्य और न ही सदाचरण होता है। श्रीकृष्ण अगले श्लोक में ऐसे लोगों के विचारों का वर्णन करेंगे।
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् |
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् || 8||
वे कहते हैं, संसार परम सत्य से रहित और आधारहीन है तथा यह भगवान से रहित है। यह दो विपरीत लिंगों के परस्पर समागम से उत्पन्न होता है और कामेच्छा के अतिरिक्त इस संसार का कोई अन्य कारण नहीं है।
अनैतिक आचरण से दूर रहने के दो मार्ग हैं। प्रथम मार्ग आत्मसंयम के द्वारा अधर्म से विरक्त रहना। दूसरा मार्ग भगवान के भय के कारण पाप कर्मों से दूर रहना। केवल इच्छा शक्ति द्वारा बहुत कम लोगों में ही पाप कर्मों से विरक्त रहने का समक्षय होता है। अधिकांश लोग दण्ड के भय से बुरे कर्मों से दूर रहते हैं। उदाहरणार्थ राष्ट्रीय राजमार्ग पर जिस समय वाहन चालकों को पुलिस की मोबाईल वैन खड़ी होने का पता होता है तब चालक शीघ्र अपने वाहन को धीमा कर देते हैं। लेकिन जब उन्हें यह प्रतीत होता है कि अब पकड़े जाने का कोई जोखिम नहीं है, तब वे वाहन की गति को बढ़ाने में कोई संकोच नहीं करते। इस प्रकार यदि हम भगवान में विश्वास रखते हैं तब उनके भय के कारण हम अनैतिक आचरण से बचे रहते हैं। इसके विपरीत यदि हम भगवान में विश्वास नहीं करते तब भी उनके सभी विधि-विधान हम पर लागू होंगे और हमें अपने दुर्व्यवहार का परिणाम भुगतना पड़ेगा।
आसुरी स्वभाव वाले लोग शास्त्रों की आज्ञाओं और आचार नियमों का पालन नहीं करते जोकि भगवान में विश्वास करने का स्वाभाविक सिद्धांत है। इसके विपरीत वे इस मत का प्रचार करते हैं कि कोई भगवान नहीं है और संसार में नैतिक व्यवस्था का कोई आधार नहीं है। वे 'महा विस्फोटक सिद्धांत' (बिग बैंग थ्योरी) का प्रचार करते हैं जिसकी अवधारणा यह है कि संसार का सृजन सृष्टि के शून्य समय पर आकस्मिक विस्फोट के कारण हुआ और इसलिए संसार में कोई भगवान नहीं है। ऐसे सिद्धांत पश्चाताप और परिणामों के भय के बिना उन्हें कामुक तृप्तियों में संलग्न रहने की अनुमति देते हैं। इन्द्रिय तुष्टि के विभिन्न रूपों में यौन संलिप्तता सबसे प्रबल है। इसका कारण भौतिक क्षेत्र आध्यात्मिक क्षेत्र के विकृत प्रतिबिंब के समान है। आध्यात्मिक क्षेत्र में दिव्य प्रेम, मुक्त आत्माओं के कर्मों और भगवान के साथ उनके साक्षात्कार का आधार है। इसका विकृत प्रतिबिंब काम-वासना भौतिकता में संलिप्त विशेषकर रजोगुण के प्रभुत्व में रहने वाली आत्माओं की चेतना पर हावी हो जाता है। इस प्रकार आसुरी मनोवृति वाले व्यक्ति भोग-विलास और कामुकतापूर्ण जीवन में लिप्त रहने को मानव जीवन के उद्देश्य के रूप में देखते हैं।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धय: |
प्रभवन्त्युग्रकर्माण: क्षयाय जगतोऽहिता: || 9||
ऐसे विचारों द्वारा पथ भ्रष्ट आत्माएँ अल्प बुद्धि और क्रूर कृत्यों के कारण संसार की शत्रु बन जाती हैं और इसके विनाश का कारण बनती हैं।
आत्मज्ञान से वंचित आसुरी मनोवृति वाले लोग अपनी दूषित बुद्धि द्वारा विकृत विचार रखते हैं। इसका उदाहरण भौतिकवादी दार्शनिक चार्वाक का सिद्धांत है जिसने यह कहा
यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः
"जब तक जीवित रहो आनन्द से रहो। अगर घी का सेवन करने से तुम्हें आनन्द मिलता है तब तुम ऐसा ही करो भले ही इसके लिए तुम्हें ऋण ही क्यों न लेना पड़े। जब शरीर का अंतिम संस्कार हो जाता है, तब तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं रहता और तुम पुनः लौट कर संसार में नहीं आते इसलिए तुम कर्मों के परिणाम की चिंता न करो।"
इस प्रकार से आसुरी मानसिकता वाले लोग आत्मा की नित्यता और कर्मों के प्रतिफल को अस्वीकार करते हैं ताकि वे स्वार्थ की पूर्ति और क्रूर कृत्य कर सकें। यदि उन्हें अन्य मनुष्यों पर शासन करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है, तब वे उन पर उसी प्रकार से अपने भ्रामक विचार थोपते हैं। वे अपने स्वार्थमय लक्ष्य का अनुग़मन करने में संकोच नहीं करते भले ही इसके परिणाम दूसरों के लिए दुःखद और संसार के लिए विनाशकारी हों। इतिहास गवाह है कि जो शासक सत्य के प्रतिकूल विचारों से प्रेरित थे वे मानव समाज को कष्ट प्रदान करने वाले और संसार के लिए विध्वंसकारी सिद्ध हुए।
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता: |
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता: || 10||
अतृप्त काम वासनाओं, पाखंड युक्त गर्व और अभिमान में डूबे आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्य अपने झूठे सिद्धांतों से संसक्त रहते हैं। इस प्रकार वे भ्रमित होकर अशुभ संकल्प के साथ काम करते हैं।
अतृप्त काम वासनाओं को प्रश्रय दे कर आसुरी वृत्ति वाले लोग अपने हृदय को अत्यंत दूषित करते हैं। वे पूर्णतया ढोंगी बन जाते हैं अर्थात् जो वे वास्तव में नहीं हैं वैसा होने का अभिनय करते हैं। उनकी मोहित बुद्धि अनुचित विचारों को ही अंगीकार करती है और उनका अभिमान उनमें यह भ्रम उत्पन्न करता है कि उनके बराबर कोई नहीं है। क्षणभंगुर सुखों की प्राप्ति के लिए उनकी बुद्धि तुच्छता, स्वार्थ और अभिमान से ग्रसित हो जाती है। इस प्रकार से वे शास्त्रों की आज्ञाओं का निरादर करते हैं और जो उचित है उसके विपरीत आचरण करते हैं।
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिता: |
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता: || 11||
वे अंतहीन चिंताओं से पीड़ित रहते हैं। फिर भी वे आश्वस्त रहते हैं कि कामनाओं की तृप्ति और धन सम्पत्ति का संचय ही जीवन का परम लक्ष्य है।
भौतिक प्रवृत्ति वाले लोग प्रायः आध्यात्मिक मार्ग को अत्यन्त श्रमसाध्य मानने के कारण उसकी अवहेलना करते हैं और अपने चरम लक्ष्य से दूर हो जाते हैं। वे सांसारिक मार्ग का अनुसरण करते हैं, जो शीघ्र तृप्ति प्रदान करता है, लेकिन वे अंत तक संसार में और अधिक संघर्ष करते रहते हैं। भौतिक पदार्थ को प्राप्त करने की इच्छाएँ उन्हें कष्ट देती हैं और वे फिर भी अपनी अभिलाषाओं की पूर्ति हेतु योजनाएँ बनाते हैं। जब उन्हें मनचाही वस्तु प्राप्त हो जाती है, तब वह कुछ समय के लिए राहत का अनुभव करते हैं। लेकिन बाद में नई इच्छायें जन्म लेती हैं। वह अपनी सुख-सुविधाओं के छिन जाने की चिंता करने लगते हैं और उन्हें बचाने के लिए परिश्रम करते हैं। अंततः जब आसक्त वस्तु से अलगाव हो जाता है, तब उन्हें दुःख ही प्राप्त होता है। इसलिए ऐसा कहा गया है-
या चिन्ता भुवि पुत्र पौत्र भरणाव्यापार सम्भाषणे
या चिन्ता धन धान्य यशसाम् लाभे सदा जायते।
सा चिन्ता यदि नन्दनन्दन -पदद्वंद्वार विन्देक्षणं
का चिन्ता यमराज भीम सदनद्वारप्रयाणे विभो।।
(सूक्ति सुधाकर)
"लोग बच्चों और पोते-पोतियों को पाने की इच्छा, व्यावसाय में व्यस्त रहने, धन संपदा संचित करने और यश प्राप्त करने के लिए तनाव झेलते हैं। यदि वे भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अनुराग और उत्साह विकसित करेंगें तब उन्हें कभी मृत्यु के देवता यमराज की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। इसके परिणामस्वरूप वे जन्म और मृत्यु के चक्र को पार कर लेंगे" किन्तु आसुरी स्वभाव वाले लोग इस अटल सत्य को स्वीकार नहीं करते क्योंकि उनकी बुद्धि यह समझती है कि सांसारिक सुखों में ही परम सुख की अनुभूति हो सकती है। वे यह नहीं देख पाते कि मृत्यु उन्हें दयनीय अवस्था में धकेलने और भावी जन्मों में और अधिक कष्टों में डालने की योजना बना रही है।
आशापाशशतैर्बद्धा: कामक्रोधपरायणा: |
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्जयान् || 12||
सैंकड़ों कामनाओं के बंधनों में पड़ कर काम वासना और क्रोध से प्रेरित होकर वे अवैध ढंग से धन का संग्रह करने में जुटे रहते हैं। यह सब वे इन्द्रिय तृप्ति के लिए करते हैं।
संसार में धन आनन्द प्राप्त करने का साधन है इसलिए भौतिकवादी लोग जो कामनाओं द्वारा प्रेरित होते हैं वे अपने जीवन में धन संग्रह करने को प्राथमिकता देते हैं। वे धन अर्जन के लिए अवैद्य तरीकों को अपनाने में भी संकोच नहीं करते। इसलिए उनके अनैतिक आचरण के लिए दोहरा दण्ड निर्धारित है। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन किया गया है
यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ।।
(श्रीमद्भागवतम्-7.14.8)
"कोई भी व्यक्ति उतना हि धन रखने का अधिकारी है जितना उसकी उदरपूर्ति के लिए पर्याप्त है और शेष उसे धन पुण्य कार्यों के लिए दान करना चाहिए। यदि कोई अपनी आवश्यकताओं से अधिक धन का संग्रह करता है, तब वह भगवान की दृष्टि में चोर कहलाता है और इसके लिए उसे दण्ड भोगना पड़ता है। यह दण्ड क्या होगा?" सर्वप्रथम तो मृत्यु के समय उसके द्वारा अर्जित की गई धन संपत्ति उसके साथ नहीं जाएगी। यह उससे छीन ली जाएगी। पुनः कर्मों के विधान के अनुसार धन अर्जन करने के लिए किए गए पापों के लिए भी दंड भोगना पड़ेगा। जब कोई तस्कर पकड़ा जाता है तब केवल उसका सामान ही जब्त नहीं किया जाता है बल्कि कानून का उल्लंघन करने के लिए उसे दण्ड भी दिया जाता है।
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् |
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् || 13||
असौ मया हत: शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि |
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी || 14||
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया |
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिता: || 15||
आसुरी स्वभाव वाला व्यक्ति सोचता है-"मैंने आज इतनी संपत्ति प्राप्त कर ली है और मैं इससे अपनी कामनाओं की पूर्ति कर सकूँगा। यह सब कुछ मेरा है और कल मेरे पास इससे भी अधिक धन होगा। मैंने अपने एक शत्रु का नाश कर दिया है और मैं अन्य शत्रुओं का भी विनाश करूंगा। मैं स्वयं भगवान के समान हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं शक्तिशाली हूँ, मैं सुखी हूँ। मैं धनाढ्य हूँ और मेरे सगे-संबंधी भी कुलीन वर्ग से हैं। मेरे बराबर कौन है? मैं देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करूँगा, दान दूंगा, मैं सुखों का भोग करूँगा।" इस प्रकार से वे अज्ञानता के कारण मोह ग्रस्त रहते हैं।
सभी प्रकार की नैतिकता की उपेक्षा कर आसुरी व्यक्ति यह समझते हैं कि उन्हें जो भी सुखप्रद प्रतीत होता है उसका उपभोग करना उनका अधिकार है। वे महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करने का प्रयास करते हैं। वे यह समझते हैं कि वेदों में वर्णित कर्म उन्हें भौतिक रूप से समृद्ध बनाने में सहायक हैं। वे प्राचुर्य सुख समृद्धि और यश प्राप्त करने हेतु धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन करते हैं। किन्तु जिस प्रकार से गिद्ध ऊंची उड़ान भरता है, लेकिन अपनी दृष्टि नीचे की ओर स्थिर रखता है, वैसे ही असुर व्यक्तियों की समाज में प्रतिष्ठा तो बढ़ती है लेकिन उनके कार्य निकृष्ट प्रकृति के होते हैं। ऐसे लोग शक्ति की पूजा करते हैं और 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' के सिद्धांत में विश्वास रखते हैं। इसलिए वे अपनी कामनाओं की पूर्ति में आने वाली बाधाओं को समाप्त करने हेतु दूसरे लोगों को चोट पहुंचाने में भी संकोच नहीं करते हैं। सुक्ति सुधाकर में चार प्रकार के मनुष्यों का वर्णन किया गया है-
एके सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थान् परित्यज्य ये।
सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये।।
ते मी मानव राक्षसाः परहितं स्वार्थाय निध्नंति ये।
ये तुभंति निरार्थकं परहितं ते के न जानीमहे ।।
पहले प्रकार के मनुष्यों में वे पुण्यात्मा हैं जो दूसरों के कल्याण के लिए अपने निजी हित का त्याग करते हैं। दूसरी श्रेणी में साधारण लोग आते हैं जो दूसरे लोगों का कल्याण करने में विश्वास रखते हैं बशर्ते कि इससे उनका कोई अनिष्ट न होता हो। तीसरी श्रेणी असुर लोगों की है जो अपने हितों की पूर्ति हेतु दूसरों को क्षति पहुँचाने में कोई हिचक नहीं करते। चौथी श्रेणी के लोग भी होते हैं जो (केवल आनन्द के लिए) अकारण लोगों को कष्ट देते हैं। इनके लिए कोई उपयुक्त श्रेणी नहीं हैं। श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से निकृष्ट मानसिकता वाले असुर लोगों का वर्णन किया है। घमंड में अंधे होकर वे इस प्रकार से सोचते हैं-"मैं धनी और कुलीन परिवार में जन्मा हूँ। मैं धनाढ्य और शक्तिशाली हूँ और अपनी इच्छानुसार जो चाहूँ वह कर सकता हूँ। मुझे भगवान के सामने झुकने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि मैं स्वयं भगवान के समान हूँ।"
अधिकतर बार जब लोग 'मैं' शब्द कहते हैं तब यह उनका अभिमान बोलता है वे नहीं। अहंकार में अपने मतों के साथ अपनी पहचान, बाह्य स्वरूप, असंतोष इत्यादि समाविष्ट हैं। इस अहम् से निजी व्यक्तित्व का निर्मित होता है और इसके प्रभाव के कारण लोगों की पहचान विचारों, भावनाओंऔर स्मृतियों के साथ परिलक्षित होती है जिन्हें वह अपने अभिन्न अंग के रूप में देखते हैं। अहम् का एकत्व स्वामित्व की भावना के साथ होता है, किंतु धन संपदा से प्राप्त संतुष्टि प्रायः अल्पकालिक होती है। इसके साथ 'अपर्याप्त' का गहन असंतोष छिपा रहता है। इस अतृप्त अभिलाषा के परिणामस्वरूप बेचैनी, अशांति, उदासी, चिंता और असंतोष उत्पन्न होता है जिससे परम सत्ता की और अधिक विकृत धारणा उत्पन्न होती है। यह आगे चलकर उनके 'मैं' के बोध को आत्मा से दूर कर देती है। 'अहम्' हमारे जीवन में एक बड़ा भ्रम उत्पन्न करता है यह जो हम नहीं है वह होने का विश्वास दिलाता है। इसलिए धार्मिक पाथ पर उन्नति करने के लिए सभी धार्मिक परम्पराएँ और संत हमें अहंकारी विचारों का त्यागकर देने का आग्रह करते हैं। ते चिंग ने उपदेश दिया-"पर्वत बनने के स्थान पर तुम घाटी बनो।" नारेथ के जीसस ने भी कहा था "जब तुम्हें आमंत्रित किया जाए तब सबसे नीचे के आसन पर बैठो ताकि जब मेजबान आए तब वह तुमसे यह कह सके कि मित्र ऊपर का आसन ग्रहण करो।" (अध्याय-6) जो कोई स्वयं को उन्नत करता है वह विनम्र हो जाता है और जो कोई स्वयं को विनम्र करता है वह महान हो जाता है (लुका 14.10.11)। संत कबीर ने इसका अतिसुंदरता से वर्णन किया है
ऊंचे पानी न टिके नीचे ही ठहरायें।
नीचा होय सो भरि पी, ऊंचा प्यासा जाय।।
"जल कभी ऊपर की ओर नहीं बहता वह स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बहता है वे जो विनीत और आडंबरहीन होते हैं वे पूर्णतः तृप्त हो जाते हैं और जो पाखंडी और अहंकारी होते हैं वे प्यासे रह जाते हैं।"
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता: |
प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ || 16||
ऐसी कल्पनाओं से पथभ्रष्ट होकर और मोह के जाल में फँसकर तथा विषय भोग की तृप्ति के आदी होकर वे घोर नरक में गिरते हैं
अहंकार के प्रभाव के कारण लोगों के सत्त्व की पहचान अपने मन के रूप में होती है और वे अपने व्यर्थ और विचारों में सीमित हो जाते हैं। वे अपने उस मन के अधीन हो जाते हैं जो टूटे हुए ध्वनि संग्रहणों के समान बजता रहता है और वे इस भ्रम में रहते हैं कि उनके विचार उनके लिए ही बने हैं। दूषित मन का प्रिय स्वरूप शिकायत करना है। वह रिरियाना और कुढ़ना भी पसंद करता है, न केवल लोगों के संबंध में बल्कि परिस्थितियों के संबंध में भी। उसके साथ ये चिंतायें होती हैं-'यह नहीं होना चाहिए था', 'मैं यहाँ नहीं रहना चाहता', 'मेरे साथ अनुचित व्यवहार हो रहा है' इत्यादि। सभी शिकायतें एक छोटी कहानी हैं जिन्हें मन बुनता है और मनुष्य इनमें पूर्णतः विश्वास करता है। मस्तिष्क केवल दुःखद, या दूसरों के जीवन की पीड़ायुक्त कहानियाँ सुनाता है। इस प्रकार से निकृष्ट व्यक्ति अहम् के प्रभाव के कारण अपने आन्तरिक वचनों को स्वीकार कर लेता है। जब शिकायत ज्यादा गंभीर हो जाती है तब यह असंतोष और घृणा में परिवर्तित हो जाती है। असंतोष का अर्थ कटुता, क्रोध, द्वेष, उत्तेजना या अप्रसन्नता है। जब असंतोष अधिक समय तक उपस्थित रहता है तब यह शिकायत में परिवर्तित हो जाता है। शिकायत अतीत की घटनाओं से जुड़ी एक नकारात्मक भावना है जो मनमें अनुचित विचारों द्वारा जीवित रहती है-'किसी ने मेरे साथ क्या किया" आदि इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि आसुरी व्यक्ति जो अहम् द्वारा उत्पन्न भ्रम के जाल में रहना पसंद करते हैं, वे निम्न विचारों से विचलित हो जाते हैं। परिणामस्वरूप ऐसे मनुष्य अपने भाग्य को निस्तेज बनाते हैं। मनुष्य अपनी पसंद के अनुसार कर्मों का चयन करने के लिए स्वतंत्र है किंतु वे अपने कर्मों का फल चुनने के लिए स्वतंत्र नहीं है। भगवान जीवात्मा को उसके कर्म के अनुसार फल प्रदान करते हैं।
रामचरितमानस में निम्न प्रकार से वर्णन किया गया है-
कर्म प्रधान विश्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फल चाखा।।
"संसार में कर्मों का बहुत महत्त्व है। जीवात्मा जो भी कर्म करती है बाद में उसके फल भोगती है।" इसलिए सभी जीवात्माओं को अपने कर्मों के प्रतिफलों का सामना करना पड़ता है। बाइबिल में इस प्रकार से वर्णन किया गया है-"तुम यह जान लो कि तुम्हारे पाप तुम्हें मिल जाएँगे" (संख्या- 32.33)। इस प्रकार से अगले जन्म में भगवान उन लोगों को त्याग देते हैं जो आसुरी गुणों को पोषित करते हैं। इस संबंध में एक अत्यंत सरल सिद्धांत इस प्रकार से है-
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्य-गुण-वृत्तिस्था अधो।तिष्ठन्ति तामसाः।।
"वे जो सात्त्विक मानसिकता के अंतर्गत कर्म करते हैं वे जीवन में उच्चस्तर तक उन्नति करते हैं और रजोगुण की मानसिकता के प्रभाव में कर्म करने वाले मध्यक्षेत्र में रहते हैं तथा तामसिक मनोवृत्ति के अधीन कर्म करने वाले मनुष्य पाप आदि अन्य कार्यों में प्रवृत्त होकर जीवन के निम्न स्तर तक जाते हैं।"
आत्मसम्भाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता: |
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् || 17||
ऐसे आत्म अभिमानी और हठी लोग अपनी संपत्ति के मद में चूर होकर शास्त्रों के विधि-विधानों का आदर न करते हुए केवल आडम्बर करते हुए यज्ञों का अनुष्ठान करते हैं।
सद्गुणी मनुष्य आत्मा की शुद्धि और भगवान को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करते हैं। विडंबना यह है कि इसका अनुकरण करते हुए आसुरी गुणों वाले व्यक्ति भी यज्ञों, अनुष्ठानों एवं कर्मकाण्डों का आयोजन करते हैं लेकिन अशुद्ध भावना के साथ और अनुचित प्रयोजनों के लिए। ऐसे आसुरी आचरण वाले व्यक्ति समाज की दृष्टि में स्वयं को अच्छा दिखाने के लिए बड़े धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन करते हैं। वे शास्त्रों की आज्ञाओं का भी पालन नहीं करते बल्कि वे स्वयं की ख्याति के लिए और मिथ्या अभिमान का प्रदर्शन करने के धार्मिक अनुष्ठान करते हैं जबकि शास्त्रों के निर्देश इस प्रकार से है
गृहितस्य भवेद् वृद्धिः कीर्तितस्य भवेत् क्षयः
(महाभारत)
"यदि हम अपने द्वारा संपन्न किए गए अच्छे कार्य का प्रचार करते हैं तब उसकी श्रेष्ठता कम हो जाती है और यदि हम इसे गोपनीय रखते हैं तब इसका मूल्य कई गुणा बढ़ता है।" इस श्लोक में श्रीकृष्ण आसुरी लोगों के कर्मकाण्डों का यह कहकर निरादर करते हैं कि इनका आयोजन अशुद्धता से किया जाता है।
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता: |
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका: || 18||
अहंकार, शक्ति, दम्भ, कामना और क्रोध से अंधे मनुष्य अपने और अन्य लोगों के शरीरों में उपस्थित मेरी उपस्थिति की निंदा करते हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों के और लक्षणों का वर्णन करते हैं। वे अधम, क्रूर, और धृष्ट होते हैं। उनमें सदाचार नहीं होता और वे सभी में दोष ढूढने में आनंदित होते हैं। ऐसे आसुरी स्वभाव वाले व्यक्ति स्वयं को अत्यंत महत्त्वपूर्ण समझते हैं और दूसरों से ईर्ष्या करते हैं। अगर कभी कोई उनकी योजनाओं का विरोध करता है, तब वे क्रोधित होकर उन्हें कष्ट पहुँचाते हैं और इस तरह से स्वयं को भी कष्ट देते हैं। परिणामस्वरूप वे परमात्मा की उपेक्षा और अपमान करते हैं जो सभी के हृदयों में स्थित है।
तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान् |
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु || 19||
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि |
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् || 20||
इन दुष्ट और निर्दयी व्यक्तियों को मैं निरन्तर जीवन-मृत्यु के चक्र में आसुरी प्रकृति के गर्मों में डालता हूँ। ये अज्ञानी आत्माएँ बार-बार आसुरी प्रकृति के गर्थों में जन्म लेती हैं। मुझ तक पहुँचने में असफल होने के कारण हे अर्जुन! वे शनैः-शनैः अधम गति प्राप्त करते हैं।
श्रीकृष्ण पुनः आसुरी मनोवृत्ति के परिणामों का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि अगले जन्म में वे उन्हें आसुरी परिवारों में ही जन्म देते हैं जहाँ उन्हें वैसा ही आसुरी परिवेश मिलता है। वही वे अपनी निकृष्ट प्रवृत्ति को पूर्णतः अभिव्यक्त करते हैं। इस श्लोक द्वारा हम यह कह सकते हैं कि जन्में योनि, लोक और परिवेश का चयन करना जीवात्मा के हाथ में नहीं होता है। इस संबंध में भगवान मनुष्य के कर्मों के अनुसार निर्णय करते हैं। इस प्रकार से आसुरी लोग निकृष्ट योनियों जैसे सर्पो, छिपकलियों और बिच्छुओं की योनियों में धकेले जाते हैं जो बुरी मानसिकता के पाते हैं।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: |
काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् || 21||
काम, क्रोध और लोभ जीवात्मा को नरक की ओर ले जाने वाले तीन द्वार हैं इसलिए सबको इनका त्याग करना चाहिए।
श्रीकृष्ण अब आसुरी प्रवृत्ति के मूल कारणों का वर्णन करते हैं तथा काम, क्रोध और लोभ को इसमें पारगणित करते हैं। इससे पहले श्लोक 3.36 में अर्जुन ने पूछा था कि लोग न चाहते हुए भी पाप करने के लिए क्यों प्रेरित होते हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें बलपूर्वक पाप कर्मों में लगाया जाता है। श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि यह लोभ ही है जो बाद में क्रोध में परिवर्तित हो जाती है और यह हमारा सर्वनाश करने वाली शत्रु है। श्लोक 2.62 की टिप्पणी में किए गए वर्णन के अनुसार लोभ काममें भी परिवर्तित होता है। इस प्रकार काम, क्रोध और लोभ ही वो आधार हैं जहाँ से आसुरी गुण विकसित होते हैं। ये मन में कटुता उत्पन्न करते हैं और इसे अन्य सभी अवगुणों के लिए उपयुक्त स्थान बनाते हैं। परिणामस्वरूप श्रीकृष्ण इन्हें नरक के द्वार के रूप में चित्रित करते हैं और अपने विनाश से बचने के लिए इनसे दूर रहने का उपदेश देते हैं। आत्मकल्याण के इच्छुक लोगों को इन तीनों से दूर रहना चाहिए।
एतैर्विमुक्त: कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नर: |
आचरत्यात्मन: श्रेयस्ततो याति परां गतिम् || 22||
जो इन तीन द्वारों से मुक्त होते हैं, वे अपने के कल्याण के लिए चेष्टा करते हैं और अपने परम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण काम, क्रोध और लोभ का परित्याग करने के परिणाम का वर्णन करते हैं। जब तक ये विद्यमान रहते हैं तब तक मनुष्य सुखों के प्रति आकर्षित होते हैं। वे आरंभ में तो सुखद लगते हैं परन्तु अंत में कटु हो जाते हैं। लेकिन जब हमारी कामनाएँ क्षीण होती हैं तब बुद्धि मोह से मुक्त हो जाती है और वह प्रेय मार्ग की व्यर्थता को समझने लगती है तब फिर मनुष्य श्रेय मार्ग की ओर आकर्षित होता है जो वर्तमान में दुःखद प्रतीत होता है लेकिन अंत में सुखद बन जाता है। जो लोग श्रेय मार्ग की ओर आकर्षित होते हैं उनके लिए ज्ञान का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। वे अपनी आत्मा के कल्याण की चेष्टा आरंभ करते हैं एवं वे परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होते हैं।
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: |
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् || 23||
वे जो इच्छाओं के आवेग से कर्म करते हैं और शास्त्रों के विधि-निषेधों को नहीं मानते वे न तो सिद्धि प्राप्त करते हैं और न ही परम लक्ष्य की प्राप्ति करते हैं।
शास्त्र मानव को आत्मज्ञान की यात्रा के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करते हैं। वे हमें ज्ञान और बुद्धि प्रदान करते हैं। वे हमें यह उपदेश देते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। यह निर्देश दो प्रकार के होते हैं जिन्हें विधि और निषेध कहा जाता है। कर्मों का पालन करने संबंधी निर्देशों को विधि कहा जाता है। कर्मों का अनुपालन न करने संबंधी निर्देशों को निषेध कहा जाता है। इन दोनों प्रकार की आज्ञाओं का निष्ठापूर्वक पालन करने से मनुष्य परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है। किन्तु आसुरी प्रकृति के मनुष्यों का मार्ग शास्त्रों के उपदेशों के विपरीत होता है। वे निषिद्ध कर्मों में संलग्न रहते हैं और विहित कर्मों से दूर रहते हैं।
ऐसे लोगों का उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण घोषणा करते हैं कि जो वास्तविक मार्ग का त्याग करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं वे अपनी इच्छाओं के आवेगों द्वारा प्रेरित होते हैं, और वे न तो सच्चा ज्ञान और न ही पूर्ण आनन्द तथा न ही माया के बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ |
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि || 24||
इसलिए कार्य और अकार्य का निश्चय करने के लिए शास्त्रों में वर्णित विधानों को स्वीकार करो और शास्त्रों के निर्देशों को समझो तथा तदनुसार संसार में अपने कर्तव्यों का पालन करो।
अब श्रीकृष्ण इस अध्याय के उपदेशों का सार प्रस्तुत करते हैं। दैवीय और आसुरी प्रवृत्ति की तुलना करते हुए वे स्पष्ट करते हैं कि आसुरी प्रवृत्ति नारकीय जीवन की ओर ले जाती है। वे सिद्ध करते हैं कि शास्त्रों के विधि निषेधों का अनादर करके कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। अब वे यह कहते हैं कि किसी भी कर्म के औचित्य या अनौचित्य का ज्ञान वैदिक शास्त्रों द्वारा होता है।
कभी-कभी कुछ सज्जन लोग भी कहते हैं कि “मैं विधि-नियमों का पालन नहीं करता, मैं आपनी इच्छा के अनुसार कर्म करता हूँ।" मन का अनुसरण करना अच्छी बात है लेकिन वे यह कैसे सुनिश्चित करेंगे कि उनका मन उन्हें पथ-भ्रष्ट नहीं कर रहा है। कहा गया है-"नर्क का मार्ग शुभ विचारों से शुरू होता है।" इसका तात्पर्य यह है कि ऐसे अशुभ कर्म जो भ्रम के कारण मन को शुभ प्रतीत होते हैं, हमारे लिए नरक का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इस प्रकार शास्त्रों को ध्यान में रखते हुए हमें यह देखना चाहिए कि क्या हमारा अंत:करण वास्तव में उचित दिशा में जा रहा है। मनुस्मृति में भी उल्लेख किया गया है-
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति ।
(मनुस्मृति-12.97)
"भूत, वर्तमान और भविष्य से संबंधित किसी सिद्धांत की प्रामाणिकता वेदों पर ही आश्रित है।" इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को शास्त्रों को समझने और तदनुसार कर्म करने का उपदेश देते हुए अपने कथनों का समापन करते हैं।
।। श्रीमद्भागवत गीता का सोलहवां अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
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