॥ नाहं स्मरामि कृष्णं तु राधास्मरणवर्जितम् ॥
Krishna - कथा
धार्मिक कथाएं
कथा (20)
Gajendra Moksha Katha
kathaShrijirasik
गजेंद्र और ग्राह मुक्ति कथा
वैकुण्ठ के द्वारपाल जय और विजय पूर्व जन्म में कौन थे?
क्षीरसागर में एक त्रिकूट नामक एक प्रसिद्ध एवं श्रेष्ठ पर्वत था। उसकी ऊँचाई आसमान छूती थी। उसकी लम्बाई-चौड़ाई भी चारों ओर काफी विस्तृत थी। उसके तीन शिखर थे, पहला सोने का, दूसरा चाँदी का तीसरा लोहे का। इनकी चमक से समुद्र, आकाश और दिशाएँ जगमगाती रहती थीं।
इनके अलावा उसकी और कई छोटी चोटियाँ थीं जो रत्नों और कीमती धातुओं से बनी हुई थीं। सब ओर से समुद्र की लहरें आकर इस पर्वत के निचले भाग से टकरातीं जिससे प्रतीत होता कि समुद्र इनके पाँव पखार रहा था।
पर्वत की तलहटी में तरह-तरह के जंगली जानवर बसेरा बनाए हुए थे। इसके ऊपर बहुत सी नदियाँ और सरोवर भी थे।
इस पर्वतराज त्रिकूट की तराई में एक तपस्वी महात्मा रहते थे जिनका नाम वरुण था। महात्मा वरुण ने एक अत्यन्त सुन्दर उद्यान में अपनी कुटी बनाई थी। इस उद्यान का नाम ऋतुमान था। इसमें सब ओर अत्यन्त ही दिव्य वृक्ष शोभा पा रहे थे, जो सदा फलों-फूलों से लदे रहते थे।
इस उद्यान में एक बड़ा-सा सरोवर भी था जिसमें सुनहले कमल भी खिले रहते थे तथा विविध जाति के कुमुद, उत्पल, शतदल कमल अपनी अनूठी छटा बिखराते थे। हंस, चक्रवाक और सारस आदि पक्षी झुण्ड के झुण्ड भरे हुए थे। मछली और कछुवों के खिलवाड़ से कमल के फूल जो हिलते थे उससे उसका पराग झड़कर सरोवर जल को अत्यन्त सुगन्धित कर देता था।
कदम्ब, नरकुल, बेंत, बेन आदि वृक्षों से यह घिरा रहता था। कुन्द कुरबक, अशोक, सिरस, वनमल्लिका, सोनजूही, नाग, हरसिंहार, मल्लिका शतपत्र, माधवी और मोगरा आदि सुन्दर-सुन्दर पुष्प वृक्षों से प्रत्येक ऋतु में यह महात्मा वरुण का सरोवर शोभायमान रहता था।
क्षीरसागर से त्रिकूट पर्वत पर सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा था। एक बार एक दर्दनाक घटना घट गई। इस पर्वत के घोर जंगल में एक विशाल मतवाला हाथी रहता था। वह कई शक्तिशाली हाथियों का सरदार था। उसके पीछे बड़े-बड़े हाथियों के झुण्ड के झुण्ड चलते थे।
इस गजराज से, उसके महान् बल के कारण बड़े से बड़े हिंसक जानवर भी डरते थे किन्तु एक बात यह भी थी कि उसकी कृपा से लंगूर, भैंसे, भेड़िए, हिरण, रीछ, वनैले कुत्ते, खरगोश आदि छोटे जीव निर्भय होकर घूमा करते थे क्योंकि उसके रहते कोई भी हिंसक जानवर उस पर आक्रमण करने का साहस नहीं कर सकता था।
गजराज मदमस्त था। उसके सिर के पास से टपकते मद का पान करने के लिए भँवरे उसके साथ गूँजते जाते थे।
एक दिन बड़े जोर की धूप थी। वह प्यास से व्याकुल हो गया। अपने झुण्ड के साथ वह उसी सरोवर में उतर पड़ा जो त्रिकूट की तराई में स्थित था। जल उस समय अत्यन्त शीतल एवं अमृत के समान मधुर था। पहले तो उस गजराज ने अपनी सूँड़ से उठा-उठा जी भरकर इस अमृत-सदृश्य जल का पान किया। फिर उसमें स्नान करके अपनी थकान मिटाई।
इसके पश्चात उसका ध्यान जलक्रीड़ा की ओर गया। वह सूँड़ से पानी भर-भर अन्य हाथियों पर फेंकने लगा और दूसरे भी वही करने लगे। मदमस्त गजराज सबकुछ भूलकर जल क्रीड़ा का आनन्द उठाता रहा। उसे पता नहीं था कि उस सरोवर में एक बहुत बलवान ग्राह भी रहता था।
उस ग्राह ने क्रोधित होकर उस गजराज के पैर को जोरों से पकड़ लिया और उसे खींचकर सरोवर के अन्दर ले जाने लगे। उसके पैने दातों के गड़ने से गजराज के पैर से रक्त का प्रवाह निकल पड़ा जिससे वहाँ का पानी लाल हो आया।
उसके साथ के हाथियों और हथिनियों को गजराज की इस स्थिति पर बहुत चिंता हुई। उन्होंने एक साथ मिलकर गजराज को जल के बाहर खींचने का प्रयास किया किंतु वे इसमें सफल नहीं हुए। वे घबराकर ज़ोर-ज़ोर से चिंघाड़ने लगे। इस पर दूर-दूर से आकर हाथियों के कई झुण्डों ने गजराज के झुण्डों से मिलकर उसे बाहर खींचना चाहा किन्तु यह सम्मिलित प्रयास भी विफल रहा।
सभी हाथी शान्त होकर अलग हो गए। अब ग्राह और गजराज में घोर युद्ध चलने लगा दोनों अपने रूप में काफी बलशाली थे और हार मानने वाले नहीं थे।
कभी गजराज ग्राह को खींचकर पानी से बाहर लाता तो कभी ग्राह गजराज को खींचकर पानी के अन्दर ले जाता किन्तु गजराज का पैर किसी तरह ग्राह के मुँह से नहीं छूट रहा था बल्कि उसके दाँत गजराज के पैर में और गड़ते ही जा रहे थे और सरोवर का पानी जैसे पूरी तरह लाल हो आया था।
गज और ग्राह के बीच युद्ध कई दिनों तक चला। अन्त में अधिक रक्त बह जाने के कारण गजराज शिथिल पड़ने लगा। उसे लगा कि अब वह ग्राह के हाथों परास्त हो जाएगा।
उसको इस समय कोई उपाय नहीं सूझा और अपनी मृत्यु को समीप पाकर उसे भगवान नारायण की याद आयी। पूर्व जन्म की निरंतर भगवद आराधना के फलस्वरूप उसे भगवत्स्मृति हो आई।
उसने निश्चय किया कि मैं कराल काल के भय से चराचर प्राणियों के शरण्य सर्वसमर्थ प्रभु की शरण ग्रहण करता हूँ। इस निश्चय के साथ गजेन्द्र मन को एकाग्र कर पूर्वजन्म में सीखे श्रेष्ठ स्त्रोत द्वारा गजेंद्र मोक्ष स्तुति करने लगा।
उसने एक कमल का फूल तोड़ा और उसे आसमान की ओर इस तरह उठाया जैसे वह उसे भगवान को अर्पित कर रहा हो। अब तक वह ग्राह द्वारा खींचे जाने से सरोवर के मध्य गहरे जल में चला गया था और उसकी सूड़ का मात्र वह भाग ही ऊपर बचा था जिसमें उसने लाल कमल-पुष्प पकड़ रखा था।
उसने अपनी शक्ति को पूरी तरह से भूलकर और अपने को पूरी तरह असहाय घोषित कर नारायण को पुकारा। भगवान समझ गए कि इसे अपनी शक्ति का मद जाता रहा और वह पूरी तरह से मेरा शरणागत है।
जब नारायण ने देखा कि मेरे अतिरिक्त यह किसी को अपना पक्षक नहीं मानता तो नारायण के `ना` के उच्चारण के साथ ही वह गरुण पर सवार होकर चक्र धारण किए हुए सरोवर के किनारे पहुँच गए। उन्होंने देखा कि गजेन्द्र डूबने ही वाला है। वह शीघ्रता से गरुण से कूद पड़े।
इस समय तक बहुत से देवी-देवता भी भगवान के आगमन को समझकर वहाँ उपस्थित हो गए थे। सभी के देखते ही देखते भगवान ने गजराज और गजेन्द्र को एक क्षण में सरोवर से खींचकर बाहर निकाला। देवताओं ने आश्चर्य से देखा, उन्होंने सुदर्शन से इस तरह ग्राह का मुँह फाड़ दिया कि गजराज के पैर को कोई क्षति नहीं पहुँची।
ग्राह देखते-देखते तड़प कर मर गया और गजराज भगवान की कृपा-दृष्टि से पहले की तरह स्वस्थ हो गया।
ब्रह्मादि देवगण श्री हरि की प्रशंसा करते हुए उनके ऊपर स्वर्गिक सुमनों की वृष्टि करने लगे। सिद्ध और ऋषि-महर्षि परब्रह्म भगवान विष्णु का गुणगान करने लगे।
ग्राह दिव्य शरीर-धारी हो गया। उसने भगवान विष्णु के चरणो में सिर रखकर प्रणाम किया और भगवान विष्णु के गुणों की प्रशंसा करने लगा।
भगवान विष्णु के मंगलमय वरद हस्त के स्पर्श से पाप मुक्त होकर अभिशप्त गन्धर्व ने प्रभु की परिक्रमा की और उनके त्रेलोक्य वन्दित चरण-कमलों में प्रणाम कर अपने लोक चला गया।
भगवान विष्णु ने गजेन्द्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया। गन्धर्व, सिद्ध और देवगण उनकी लीला का गान करने लगे।
गजेन्द्र की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने सबके समक्ष कहा: प्यारे गजेन्द्र ! जो लोग ब्रह्म मुहूर्त में उठकर तुम्हारी की हुई स्तुति से मेरा स्तवन करेंगे, उन्हें मैं मृत्यु के समय निर्मल बुद्धि का दान करूँगा।
यह कहकर भगवान विष्णु ने पार्षद रूप में गजेन्द्र को साथ लिया और गरुडारुड़ होकर अपने दिव्य धाम को चले गए।
गज-ग्राह दोनों की अगले जन्मो की कहानी?
गज-ग्राह को अपनी भक्ति और विष्णु के हाथों मुक्ति के चलते वैकुण्ठ में स्थान मिला दोनों इस लोक में द्वारपाल हुए जिनका ही नाम जय और विजय हुआ। आगे सनत कुमारो के श्राप के चलते दोनों हिरण्याक्ष - हिरण्यकश्यपु, रावण - कुम्भकर्ण और शिशुपाल - दन्तवक्र हुए थे।
गज-ग्राह दोनों की पूर्व जन्मो की कहानी?
ऋषि कपिल का नाम तो सबने सुन ही रखा है जिनके वंशज ऋषभ देव से जैन धर्म का प्रादुर्भाव हुआ था, वो कपिल मुनि महर्षि कर्दम के पुत्र थे। कर्दम ऋषि की पत्नी का नाम देवहुति था, उन्ही के गर्भ से कपिल मुनि जन्मे थे लेकिन उन्ही देवहुति को कर्दम जी से पहले और भी संताने थी।
उन्ही कर्दम और देवहुति के कपिल मुनि से दो बड़े पुत्र और थे जो कि वेदज्ञ थे, एक बार एक राजा के यहाँ यज्ञ संपन्न कर आये दोनों को जब धन मिला तो उसके लिए विवाद हो गया था। तब दोनों ने एक दूसरे को ग्राह और गज होने का श्राप दे दिया, दोनों विष्णु भक्त थे और दोनों की बात सच भी हुई।
लेकिन मौत से पहले उन्होंने तपस्या कर विष्णु जी को प्रसन्न कर लिया और वरदान में मुक्ति माँग ली और इसीलिए अगले जन्म में उन्हें पूर्व जन्म का स्मरण था और दोनों ने भगवान विष्णु के हाथो मुक्ति पाई।
॥ जय श्री विष्णु हरि ॥
Bhagavad Geeta Chapter 18
kathaShrijirasik
अध्याय अठारह: मोक्ष संन्यास योग
संन्यास में पूर्णता और शरणागति का योग
भगवद्गीता का अंतिम अध्याय सबसे बड़ा है और इसमें कई विषयों को सम्मिलित किया गया है। अर्जुन संन्यास और त्याग के संबंध में प्रश्न पूछता है। दोनों शब्द एक ही मूल के हैं जिसका अर्थ 'परित्याग करना' है। संन्यासी वह है जो गृहस्थ जीवन में प्रवेश नहीं करता और समाज को त्याग कर निरंतर साधना का अभ्यास करता है। त्यागी वह है जो कर्म में तो संलग्न रहता है लेकिन कर्म-फल का भोग करने की इच्छा का त्याग करता है। (यही गीता का मुख्य अभिप्राय है) श्रीकृष्ण इस दूसरे प्रकार के त्याग की संतुति करते हैं। वे कहते हैं कि यज्ञ, दान, तपस्या और कर्त्तव्य पालन संबंधी कार्यों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए क्योंकि ये ज्ञानी को शुद्ध करते हैं। इनका संपादन केवल कर्त्तव्य पालन की दृष्टि से करना चाहिए। इन कार्यों को कर्म फल की आसक्ति के बिना संपन्न किया जाता है।
तत्पश्चात् श्रीकृष्ण उन तीन हेतुओं का गहन विश्लेषण करते हैं जो कर्म, कर्म के तीन संघटक तत्त्व और कर्म फल की प्राप्ति के पाँच कारकों को प्रेरित करते हैं। वे प्रत्येक की तीन गुणों के अंतर्गत विवेचना करते हैं। वे कहते हैं कि जो अल्पज्ञानी है वे स्वयं को अपने कार्यों का कारण मानते हैं, लेकिन विशुद्ध बुद्धि युक्त जीवात्मायें स्वयं को अपने कार्यों का कर्ता और भोक्ता नहीं मानती हैं। अपने कर्मों के फलों से सदैव विरक्त रहने के कारण वे उनके बंधन में नहीं पड़ते। आगे इस अध्याय में यह बताया गया है कि हमारे उद्देश्यों और कर्मों में भिन्नता क्यों पाई जाती है? पुनः इसमें प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता की श्रेणियों का वर्णन किया गया है। फिर यह अध्याय बुद्धि, दृढ संकल्प और सुख के संबंध में भी समान विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसके बाद यह अध्याय उन लोगों का वर्णन करता है जिन्होंने आध्यात्मिक जीवन में पूर्णता की
अवस्था प्राप्त कर ली है और ब्रह्म में लीन हो गए हैं। इस अध्याय में यह भी कहा गया है कि ऐसे ब्रह्मज्ञानी भी भक्ति द्वारा ही अपनी पूर्णता को प्राप्त करते हैं। इसलिए भगवान के दिव्य व्यक्तित्त्व को केवल भक्ति द्वारा जाना जा सकता है।
इसके बाद श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि भगवान सभी जीवों के हृदय में स्थित हैं और उनके कर्मों के अनुसार वे उन्हें गति प्रदान करते हैं। यदि हम उनका स्मरण करते हुए अपने सभी कर्म उन्हें समर्पित करते हैं, तथा उनका आश्रय लेकर उन्हें अपना लक्ष्य बनाते हैं तब उनकी कृपा से हम सभी प्रकार की कठिनाइयों को पार कर लेंगे। लेकिन यदि हम अभिमान से प्रेरित होकर अपनी इच्छानुसार कर्म करते है तब हम सफलता प्राप्त नहीं कर पाएंगे।
अंत में श्रीकृष्ण यह प्रकट करते हैं कि सभी धर्मों का त्याग कर केवल भगवान की भक्ति द्वारा उनके समक्ष शरणागत होना ही गुह्यतम ज्ञान है। जो आडम्बर-हीन और भक्त नहीं हैं, यह ज्ञान उन्हें नहीं प्रदान करना चाहिए क्योंकि वे इसकी अनुचित व्याख्या करेंगे और इसका दुरूपयोग कर आवश्यक कर्मों का त्याग करेंगे। यदि हम यह गुह्य ज्ञान पात्र जीवात्मा को प्रदान करते है तब भगवान अति प्रसन्न होते हैं।
इसके बाद अर्जुन भगवान से कहता है कि उसका मोह नष्ट हो गया है और वह उनकी आज्ञाओं का पालन करने के लिए तत्पर है। अंत में संजय जो धृतराष्ट्र को श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हो रहे संवादों को सुना रहा था, व्यक्त करता है कि वह इन संवादों को सुनकर अत्यंत विस्मित है। जैसे ही वह भगवान के शब्दों और उनके विश्व रूप का स्मरण करता है, वैसे ही उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।भगवद्गीता का समापन करते हुए वह कहता है कि विजय सदैव वहीं होती है जहाँ भगवान और उसके भक्त होते हैं और इस प्रकार से सत्य, प्रभुता और समृद्धि भी वहीं होती है क्योंकि परम सत्य का प्रकाश सदैव असत्य के अंधकार को परास्त कर देता है।
अर्जुन उवाच |
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् |
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन || 1||
अर्जुन ने कहा-हे महाबाहु। मैं संन्यास और त्याग के संबंध में जानना चाहता हूँ। हे केशिनिषूदन, हे हृषीकेश! मैं दोनों के बीच का भेद जानने का भी इच्छुक हूँ।
अर्जुन, श्रीकृष्ण को 'केशिनिषूदन' कहकर संबोधित करता है जिसका अर्थ केशी नामक असुर का संहार करने वाला है। भगवान श्रीकृष्ण ने केशी नामक असुर का वध किया था जिसने एक पागल घोड़े का रूप धारण करके ब्रिजभूमि में आतंक मचा रखा था। संशय भी एक बे-लगाम घोड़े के समान है जो मन-मस्तिष्क में निरंतर दौड़ लगाता रहता है तथा भक्ति की फुलवारी को नष्ट कर देता है। अर्जुन इंगित करता है कि "जैसे आपने केशी नामक राक्षस का वध किया था उसी प्रकार मेरे मन-मस्तिष्क में उठने वाले संशय का भी दमन कीजिए।" अर्जुन का प्रश्न अत्यंत मार्मिक है। वह संन्यास की प्रकृति के बारे में जानना चाहता है जिसका अर्थ 'कर्मों का त्याग' करना है। वह त्याग की प्रकृति जिसका अर्थ 'कर्म-फलों को भोगने की इच्छाओं का त्याग करने से है' के संबंध में भी जानना चाहता है। आगे वह 'पृथक्' शब्द का प्रयोग करता है जिसका अर्थ भिन्नता है। अतः वह इन दोनों शब्दों के बीच के अंतर को भी जानना चाहता है।
अर्जुन श्रीकृष्ण को "हृषीकेश" कह कर संबोधित कर रहा है जिसका अर्थ "इन्द्रियों का स्वामी" है। अर्जुन का लक्ष्य महाविजय करना है, जिसे मन और इन्द्रियों को वश में करके ही संपूर्ण किया जा सकता है। यह वही विजय अभियान है जिससे पूर्ण शांति की अवस्था प्राप्त की जा सकती है। पुरुषोतम भगवान श्रीकृष्ण स्वयं इसके प्रमाण हैं।
इस संबंध में पिछले अध्यायों में भी वर्णन किया जा चुका है। श्लोक 5.13 तथा 9.28 में श्रीकृष्ण संन्यास के संबंध में और श्लोक 4.20 तथा 12.11 में त्याग के बारे में वर्णन कर चुके थे।लेकिन यहाँ पर वे इसे अन्य दृष्टिकोण से निरूपित कर रहे हैं। उदाहरणार्थ एक उद्यान के विभिन्न हिस्से हमारे मन में विभिन्न प्रकार के भाव उत्पन्न करते हैं जबकि पूरा उद्यान सम्मिलित रूप से एक अलग प्रकार का दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। भगवद्गीता भी कुछ इसी प्रकार से है। प्रत्येक अध्याय को एक योग रूप में निर्दिष्ट किया गया है तथा अठारहवें अध्याय को पूरी भगवद्गीता का सार कहा जा सकता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण संक्षिप्त रूप में मूलभूत सिद्धांतों तथा सत्य का वर्णन कर रहे हैं जिन्हें पिछले 17 अध्यायों में भी प्रस्तुत किया गया था। अब वे सबका सकल निष्कर्ष स्थापित करते हैं। संन्यास तथा विरक्ति के विषयों पर चर्चा करने के उपरांत भगवान श्रीकृष्ण प्रकृति के तीनों गुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं और यह बतलाते हैं कि किस प्रकार से ये जीवात्माओं के कार्यों को प्रभावित करते हैं। वे पुनः कहते हैं कि केवल सत्त्वगुण को पोषित करना ही उपयुक्त है। तत्पश्चात् वे यह निष्कर्ष देते हैं कि भगवान के प्रति अनन्य भक्ति ही हमारा परम कर्त्तव्य है और इसे प्राप्त करना ही मानव जीवन का लक्ष्य है।
श्रीभगवानुवाच |
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदु: |
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणा: || 2||
भगवान ने कहाः काम्य कर्मों के परित्याग को विद्वान लोग 'संन्यास' कहते हैं और सभी कर्मों के फलों के त्याग को बुद्धिमान लोग त्याग कहते है।
'कवयः' का अर्थ विद्वान लोग हैं। भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति कर्मों के त्याग को संन्यास कहते हैं। जो कर्मों का त्याग सांसारिक भोगों से विरक्त रहने के लिए करते हैं और संन्यासी जीवन में प्रवेश करते है, उन्हें कर्म संन्यासी कहा जाता है। वे कुछ नित्य कर्म करते रहते है, जैसे कि शरीर की देख भाल के लिए किए जाने वाले दैनिक कार्य। लेकिन वे धन सम्पदा, संतति, पद प्रतिष्ठा, सत्ता, इत्यादि से संबंधित कर्म त्याग देते हैं। ऐसे कार्य जीवात्मा को कर्मो के जाल में फंसा देते है और बार-बार पुनर्जन्म की ओर ले जाते हैं।
'विचक्षणाः' बुद्धिमान लोग होते हैं। श्रीकृष्ण यहाँ यह बताते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति त्याग पर बल देते हैं जिसका अर्थ आंतरिक संन्यास है। इसका तात्पर्य वैदिक शास्त्रों में उल्लिखित कर्त्तव्यों का त्याग करना नहीं है। बल्कि इसके विपरीत इनसे प्राप्त होने वाले फलों की इच्छा का त्याग करने से है। अतः फल की आसक्ति का त्याग करने की मनोवृति को त्याग कहा जाता है जबकि कर्मों का त्याग करना संन्यास कहलाती है। संन्यास और त्याग दोनों आत्मज्ञान के उचित विकल्प प्रतीत होते हैं। इन दोनों प्रकार के कर्मों में से श्रीकृष्ण किस कार्य की संस्तुति करते हैं? आने वाले श्लोकों में वे और अधिक स्पष्टता से इसकी व्याख्या करेंगे।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण: |
यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यमिति चापरे || 3||
कुछ मनीषी यह कहते हैं कि समस्त प्रकार के कर्मों को दोषपूर्ण मानते हुए उन्हें त्याग देना चाहिए। किन्तु अन्य विद्वान यह आग्रह करते हैं कि यज्ञ, दान, तथा तपस्या जैसे कर्मों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए।
सांख्य दर्शन के अनुयायी लौकिक जीवन को यथाशीघ्र और यथासंभव त्याग देने के पक्ष में हैं। उनका मत है कि समस्त कार्यों का परित्याग कर देना चाहिए क्योंकि ये सब इच्छाओं से प्रेरित होते हैं, जो आगे हमें जन्म और मृत्यु के चक्र में फंसाते हैं। वे यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि समस्त कार्य स्वाभाविक रूप से कुछ दोष युक्त होते हैं जैसे कि अप्रत्यक्ष हिंसा। उदाहरण के लिए यदि कोई अग्नि जलाता है तब सदैव यह संभावना बनी रहती है कि कीट इसमें जल सकते हैं। अतः ऐसे लोग केवल शरीर की देखभाल को छोड़कर सभी कर्मों से विरत रहने को उचित मानते हैं। वे यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि वेदों में भी दो परस्पर विरोधी निर्देश देखने को मिलते हैं।
यदि उनमें से कोई विशेष विधि हो तब सामान्य निर्देश को त्याग देना चाहिए। उदाहरण के लिए, वेद हमें यह निर्देश देते हैं-"मा हिस्स्यात् सर्वा भूतानि" अर्थात किसी भी जीवित प्राणी की हत्या न करो। यह एक सामान्य निर्देश है। वही वेद यह भी निर्देश देते हैं कि अग्नि यज्ञ सम्पन्न करो। यह एक विशेष निर्देश हैं। जिसमें संभावना बनी रहती है कि अग्नियज्ञ संपन्न करते समय कुछ कीट-आदि भूल से उसमें मर सकते हैं। परन्तु मीमांसक (मीमांसा दर्शन के अनुयायी) मानते हैं कि यज्ञ सम्पन्न करने के विशेष निर्देश यथावत् रहने चाहिए और इसका पालन अवश्य होना चाहिए भले ही इससे हिंसा न करने के समान्य निर्देश का विरोध होता हो। इसलिए मीमांसक कहते हैं कि हमें यज्ञ, दान तथा तपस्या का कभी त्याग नहीं करना चाहिए।
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम |
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविध: सम्प्रकीर्तित: || 4||
हे भरतश्रेष्ठ! अब त्याग के विषय में मेरा अंतिम वचन सुनो। हे मनुष्यों में सिंह! त्याग की तीन प्रकार की श्रेणियों का वर्णन किया गया है।
संन्यास का महत्त्व है क्योंकि यह उच्च अवस्था का आधार है। केवल निकृष्ट इच्छाओं का त्याग करके ही हम उच्च इच्छाओं को पोषित कर सकते हैं। इसी प्रकार निम्न प्रकार के कर्मो को त्याग कर ही हम स्वयं को उच्च कर्त्तव्यों हेतु समर्पित कर सकते हैं तथा ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ सकते हैं। पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा था कि त्याग की परिभाषा के संबंध में लोगों के भिन्न-भिन्न मत हैं। पिछले श्लोक में दो विरोधी विचारों का वर्णन करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब अपना मत प्रकट करते हैं जोकि निष्कर्षस्वरूप है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि अब वे त्याग को तीन श्रेणियों में (श्लोक 7 से 9 में वर्णित) विभक्त करते हुए विषय की व्याख्या करेंगे। उन्होंने अर्जुन को व्याघ्र कह कर संबोधित किया है जिसका अर्थ है 'मनुष्यों मे सिंह' क्योंकि संन्यास ग्रहण करना निडर मनुष्यों की पहचान है। संत कबीर कहते हैं
तीर तलवार से जो लडै सो शूरवीर नहीं होय।
माया तज भक्ति करै, शूर कहावे सोय।
"तीर तलवारों के साथ लड़ने से कोई निडर नही बनता। केवल वही मनुष्य बहादुर है जो माया को त्याग कर भक्ति में तल्लीन रहता है।"
यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् |
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् || 5||
यज्ञ, दान, तथा तपस्या का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए। इन्हें निश्चित रूप से सम्पन्न करना चाहिए। यज्ञ, दान तथा तपस्या महात्माओं को भी शुद्ध करते हैं।
यहाँ पर श्रीकृष्ण निष्कर्ष सुनाते हुए कहते हैं कि हमें उन कार्यो का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए जो हमें उन्नत करते हैं और मानव जाति के लिए लाभप्रद होते हैं। ऐसे कार्य अगर समुचित चेतना में संपन्न किए जाये तब ये हमें कर्म बंधन में नहीं डालते, अपितु हमें आध्यात्मिक उन्नति में सहायता करते हैं। यह समझने के लिए हम एक (कैटरपिलर) का उदाहरण लेते हैं। अपनी काया-पलट करने के लिए वह एक कोश (ककुन) बुनता है और वह स्वयं को इसमें बंद कर लेता है। बाद में जब वह तितली बन जाता है तब वह कोश को भेदकर आकाश में उड़ जाता है। इस संसार में हमारी स्थिति भी ऐसी है। उस कैटरपिलर के समान हम वर्तमान में इस संसार में आसक्त हैं और सदगुणों से वंचित है। अपने उत्थान हेतु हमें इस प्रकार के कार्यों को सम्पन्न करना चाहिए जो हमारे भीतर आंतरिक परिवर्तन कर सकें। यज्ञ, दान और तप कर्म भी ऐसे ही कार्य हैं। कभी-कभी ये कर्म बंधन में डालने वाले भी प्रतीत होते हैं, लेकिन ये कैटरपिलर के कोश के समान हैं। ये हमारी अशुद्धता को नष्ट कर हमें भीतर से पवित्र बनाते हैं तथा इस भौतिक संसार के चक्र को तोड़ने में सहायता करते हैं। अतः श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह उपदेश देते हैं कि इस प्रकार के कार्यों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए। अपितु उचित मनोवृत्ति के साथ हमें इनका निष्पादन करना चाहिए।
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च |
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् || 6||
ये सब कार्य आसक्ति और फल की कामना से रहित होकर संपन्न करने चाहिए। हे अर्जुन! यह मेरा स्पष्ट और अंतिम निर्णय है।
यज्ञ, दान तथा तपस्या को परमपिता भगवान की भक्ति के रूप में संपन्न करना चाहिए। यदि ऐसी चेतना उत्पन्न नहीं होती तब इन कार्यों को अपना कर्त्तव्य मानकर बिना किसी कामना के सम्पन्न करना चाहिए। एक माँ अपने सुखों को त्याग कर अपनी सन्तति की देखभाल करती है। वह बच्चे को अपने स्तन से दूध पिलाती है तथा बच्चे का पालन पोषण करती है। उसे अपने बच्चे का पालन पोषण करने से कुछ हानि नहीं होती बल्कि ऐसा करके वह अपने मातृत्व को पूर्ण करती है। उसी प्रकार से गाय दिनभर घास चरती रहती है, जिससे उसके थनों में दूध आता है। और इस दूध को वह अपने बछड़े को पिला देती है। गाय इस प्रकार अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करके हीन नहीं हो जाती बल्कि लोग उसे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। चूँकि ये सभी कार्य नि:स्वार्थ भावना से किए जाते है इसलिए इन्हें पवित्र माना जाता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि ज्ञानवान लोगों को इसी प्रकार की निःस्वार्थ भावना से कल्याणकारी कार्य करने चाहिए। अब वे आगे के तीन श्लोकों में त्याग की तीन श्रेणियों का वर्णन करेंगे।
नियतस्य तु सन्न्यास: कर्मणो नोपपद्यते |
मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तित: || 7||
नियत कर्मों को कभी त्यागना नहीं चाहिए। मोहवशात् नियत कार्यों के त्याग को तमोगुणी कहा जाता है।
निषिद्ध कर्मों का त्याग उचित है और कर्मफलों की इच्छा का त्याग भी उचित है। किंतु नियत कर्त्तव्यों का त्याग कभी उचित नहीं कहा जा सकता। निर्दिष्ट कर्त्तव्यों के पालन से मन को शुद्ध करने में सहायता मिलती है और यह हमें तमोगुण से रजोगुण में ले जाते हैं। इनका परित्याग करना मूर्खतापूर्ण कृत्य है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि नियत कर्तव्यों का परित्याग करने वाले मनुष्य को तमोगुणी कहा जाता है।
संसार में हम सबके कुछ अनिवार्य कर्त्तव्य हैं। इनका पालन करने से मनुष्यों को कई गुण विकसित करने में सहायता मिलती है, जैसे कि उत्तरदायित्व का निर्वहन करना, मन और इन्द्रियों पर संयम रखना, कष्ट सहन करना और परिश्रम करना इत्यादि। अज्ञानता के कारण किया गया परित्याग आत्मा को पतन की ओर ले जाता है। ये नियत कर्त्तव्य व्यक्ति की चेतना के स्तर के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। एक साधारण मनुष्य के लिए धन अर्जित करना, परिवार का पालन पोषण करना, स्नान करना, भोजन ग्रहण करना इत्यादि नियत कर्त्तव्य होते हैं। जब कोई मनुष्य थोड़ा उन्नत हो जाता है तब, ये कर्त्तव्य परिवर्तित हो जाते हैं। उन्नत आत्मा के लिए यज्ञ, दान और तप ही कर्त्तव्य हैं।
दु:खमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्यजेत् |
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् || 8||
नियत कर्त्तव्यों को कष्टप्रद समझकर किया गया त्याग रजोगुणी कहलाता है। ऐसा त्याग कभी लाभदायक या फलप्रद नहीं होता।
जीवन में उन्नति करने का अर्थ उत्तरदायित्वों का बढ़ना है, उनका त्याग करना नहीं है। अनुभवहीन लोग प्रायः इस सत्य को समझ नहीं पाते। दुःखो से छुटकारा पाने की इच्छा और पलायनवादी प्रवृत्ति साधकों को उत्तरदायित्वों का त्याग करने को प्रेरित करती है। जीवन निर्वाह कभी कष्ट रहित नहीं होता। उन्नत साधक वे नहीं होते, जो कुछ न करने के कारण शांत रहते हैं। बल्कि इसके विपरीत यदि उन्हें कोई बड़ा कार्यभार सौंपा जाता है तब वे उसको बिना विचलित हुए संपन्न करते हैं। श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह घोषित करते हैं कि अपने नियत कर्त्तव्यों को क्लेशप्रद समझकर त्याग देना रजोगुणी त्याग कहा जाता है।
प्रारम्भ से ही भगवद्गीता में कर्म करने का उपदेश दिया गया है। अर्जुन अपने कर्त्तव्य को अप्रिय और कष्टदायक समझता है जिसके परिणामस्वरूप वह युद्ध से पलायन करना चाहता है। श्रीकृष्ण इसे अज्ञानता और दुर्बलता कहते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन के भीतर आंतरिक परिवर्तन लाने हेतु उसे प्रोत्साहित करते हैं जिससे कि वह अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें। वे अर्जुन को प्रेरित करते हैं ताकि वह अपने ज्ञान चक्षुओं को विकसित कर सके। भगवद्गीता को सुन कर उसने अपने क्षत्रिय धर्म को नहीं बदला बल्कि उसने अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करने के लिए अपनी चेतना को विकसित किया। इससे पूर्व उसका ध्येय अपनी सुख-सुविधा और यश के लिए हस्तिनापुर का राज्य प्राप्त करना था। बाद में उसने भगवान की भक्ति रूपी परम कर्तव्य का पालन किया।
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन |
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्त्विको मत: || 9||
जब कोई व्यक्ति कर्मों का निष्पादन कर्त्तव्य समझ कर और फल की आसक्ति से रहित होकर करता है तब उसका त्याग सत्त्वगुणी कहलाता है।
श्रीकृष्ण अब श्रेष्ठ त्याग का वर्णन करते हैं जिसमें हम फल की कामना किए बिना निरंतर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते रहते है। इसे वे सर्वोत्कृष्ट त्याग के रूप में चित्रित करते हैं जो सत्त्वगुण में स्थित होकर किया जाता है। आध्यात्मिक उत्थान के लिए त्याग अनिवार्य है। लेकिन समस्या यह है कि त्याग के बारे में लोगों की धारणा सही नहीं है और वे इसे केवल बाह्य कर्मों का त्याग करना ही मानते हैं। ऐसा त्याग पाखण्ड की ओर ले जाता है जिसमें कोई व्यक्ति बाह्य रूप से तो त्याग का चोला ओढ़ता है लेकिन आंतरिक रूप से विषयों का चिंतन करता रहता है। भारत में कई साधु लोग इसी श्रेणी में आते हैं जिन्होंने संसार का त्याग भवत्प्राप्ति के लिए किया। किन्तु उनका मन तब तक विषयों से पूर्णतः विरक्त नहीं हुआ था और इसलिए उन्हें वैराग्य का फल प्राप्त नहीं हुआ। फलस्वरूप उन्हें यह ज्ञात हुआ कि उनके कर्म उन्हें उच्च आध्यात्मिक जीवन की ओर अग्रसर नहीं कर पाये। यह दोष उनके निर्णय में था। उन्होंने पहले त्याग किया और बाद में आंतरिक विरक्ति का प्रयास किया। इस श्लोक के उपदेश के अनुसार हमें विपरीत विधि का पालन करना है अर्थात् पहले आंतरिक विरक्ति विकसित करनी चाहिए और फिर बाह्य त्याग करना चाहिए।
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते |
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय: || 10||
वे जो न तो अप्रिय कर्म को टालते हैं और न ही कर्म को प्रिय जानकर उसमें लिप्त होते हैं ऐसे मनुष्य वास्तव में त्यागी होते हैं। वे सात्त्विक गुणों से संपन्न होते है और कर्म की प्रकृति के संबंध में उनमें कोई संशय नहीं होता।
सात्त्विक अवस्था में स्थित लोग प्रतिकूल परिस्थितियों में दुःखी नहीं होते और न ही अनुकूल परिस्थितियों के प्रति आसक्त होते हैं। वे सभी परिस्थितियों में अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं और न तो वे सुखद परिस्थिति में प्रसन्नता व्यक्त करते हैं और न ही कष्टमय जीवन में खिन्नता प्रकट करते हैं। वे उस सूखे पत्ते के समान नहीं होते जो हवा के झोकों से इधर-उधर उड़ते रहते हैं बल्कि वे समुद्र में स्थित उन सरकंडों के समान होते हैं जो प्रत्येक लहर को समान रूप से सहन करते हैं। अपने समभाव को बनाए रखते हुए क्रोध, लालच, ईर्ष्या और मोह के वश में न होकर वे परिस्थिति रूपी लहरों को अपने आस-पास उठते और गिरते हुए देखते रहते हैं। बाल गंगाधर तिलक भगवद्गीता के ज्ञाता और प्रसिद्ध कर्मयोगी थे। महात्मा गांधी से पूर्व वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के मुखिया थे। जब उनसे पूछा गया कि भारत के स्वतंत्र होने पर वह कौन-सा पद ग्रहण करना चाहेंगे-प्रधानमंत्री या विदेशमंत्री का? उन्होंने उत्तर दिया कि "मेरी इच्छा विभिन्न तर्क पद्धतियों पर पुस्तक लिखने की है। मैं इसे पूरा करूँगा।" एक बार पुलिस ने उन्हें शांति भंग करने के आरोप में बंदी बना लिया। तब उन्होंने अपने मित्र को कहा कि वह यह ज्ञात करें कि उन्हें किस धारा के अंतर्गत बन्दी बनाया गया और कारागार में आकर उन्हें इस संबंध में सूचित करें। जब उनका मित्र लौट कर आया तब वे कारागार के कक्ष में गहन निद्रा में थे। एक अन्य अवसर पर जब वे अपने कार्यालय में थे तब उनके लिपिक ने उन्हें सूचित किया कि उनका बड़ा पुत्र गंभीर रूप से बीमार है। भावनाओं में बहने के बजाय उन्होंने लिपिक से डॉक्टर को बुलाने को कहा। आधे घंटे के पश्चात् उनके मित्र ने वहाँ आकर उन्हें वही सूचना दी। तब उन्होंने कहा कि "मैंने उसे देखने के लिए डॉक्टर को बुलाने के लिए कह दिया है। इसके अतिरिक्त मैं और क्या कर सकता हूँ?" इन घटनाओं से विदित होता है कि वे अप्रिय परिस्थितियों में भी धैर्यवान बने रहे। वे अपने कार्यों को कुशलतापूर्वक संपन्न करने में इसलिए सफल रहे क्योंकि वे आंतरिक रूप से शांत चित्त थे। यदि वे निराश हो जाते तब वे कारागार में कैसे चैन से सो पाते अथवा अपने काम में कैसे ध्यान दे पाते।
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषत: |
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते || 11||
देहधारी जीवों के लिए पूर्ण रूप से कर्मों का परित्याग करना असंभव है लेकिन जो कर्मफलों का परित्याग करते हैं, वे वास्तव में त्यागी कहलाते हैं।
यहाँ पर यह तर्क भी प्रस्तुत किया जा सकता है कि कर्मफलों का त्याग करने से श्रेष्ठ यह है कि सभी कार्यों का त्याग कर दिया जाये क्योंकि इससे ध्यान में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होगी। श्रीकृष्ण इसे अस्वीकृत करते हुए कहते हैं कि देहधारी जीवात्माओं के लिए अकर्मण्य रहना असंभव है। सभी को शरीर की देखभाल के लिए मूलभूत कार्यों जैसे खाने, सोने, स्नान इत्यादि का निष्पादन करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त खड़ा होना, बैठना, सोचना, चलना, वार्तालाप करना इत्यादि को टाला नहीं जा सकता। यदि हम बाह्य कर्मों के परित्याग को त्याग समझते हैं तब वास्तव में कोई भी त्यागी नहीं हो सकता। तथापि श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि यदि कोई कर्मफलों के प्रति आसक्ति का त्याग करता है तभी उसे पूर्ण त्यागी माना जा सकता है।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मण: फलम् |
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित् || 12||
जो विषयों के प्रति आसक्त होते हैं उन्हें मृत्यु के पश्चात् भी सुखद, दुःखद और मिश्रित तीन प्रकार के कर्मफल प्राप्त होते हैं लेकिन जो अपने कर्मफलों का त्याग करते हैं, उन्हें न तो इस लोक में और न ही मरणोपरांत ऐसे कर्मफल भोगने पड़ते हैं।
मृत्यु के उपरांत आत्मा तीन प्रकार के फल प्राप्त करती है-(1) इष्टम्-अर्थात् स्वर्गलोक के सुखद अनुभव। (2) अनिष्टम्-अर्थात् नरक लोक के दुःखों का अनुभव। (3) मिश्रम्- अर्थात् पृथ्वी लोक पर मानव के रूप में मिश्रित अनुभव। वे जो पुण्य कार्य करते हैं उन्हें स्वर्ग का लोक प्राप्त होता है तथा जो पापमय कार्य करते हैं उन्हें नरक लोकों में भेजा जाता है। जो दोनों प्रकार के मिश्रित कार्य करते हैं उन्हें मानव के रूप में पृथ्वी लोक पर वापस भेज दिया जाता है। यह सब तभी होता है जब कर्मों का निष्पादन कर्मफल की कामना से किया जाता है। जब कर्म फल की इच्छाओं का परित्याग कर दिया जाता है और कार्यों का संपादन केवल भगवान के प्रति कर्त्तव्य पालन की दृष्टि से किया जाता है तब कर्मों के ऐसे प्रतिफल प्राप्त नहीं होते। इस संसार में भी इसी प्रकार का नियम मान्य है। यदि एक व्यक्ति दूसरे को मारता है तो इसे हत्या माना जाता है तथा जिसके लिए मृत्युदंड भी दिया जा सकता है। हालांकि यदि सरकार किसी कुख्यात हत्यारे अथवा चोर को जीवित या मृत प्रस्तुत करने की घोषणा करती है तब कानून की दृष्टि में ऐसे व्यक्ति की हत्या को अपराध नहीं माना जाता बल्कि ऐसे व्यक्ति को मारने वाले को सरकार द्वारा पुरस्कृत किया जाता है तथा हत्या करने वाले को सम्मानित भी किया जाता है। समान रूप से जब हम स्वार्थ का परित्याग कर अपने कर्मों का संपादन करते हैं तब हमें कर्मों के फलों को भोगना नहीं पड़ता।
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे |
साङ् ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् || 13||
हे अर्जुन! अब मुझसे सांख्य दर्शन के सिद्धांतानुसार कर्मों को संपूर्ण करने में पाँच हेतुओं को समझो। वे यह बोध कराते हैं कि कर्मों के फलों को कैसे नियंत्रित किया जाए।
यह जान लेने पर कि फल की आसक्ति के बिना भी कर्म किया जा सकता है, एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि 'कर्म कैसे बनता है?" श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वे अब इसी प्रश्न का उत्तर देने जा रहे हैं क्योंकि यह ज्ञान कर्म फलों से विरक्ति प्रदान करने में सहायता करेगा। साथ ही वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि कर्म के इन पाँच अंगो का वर्णन सांख्य दर्शन में भी किया जा चुका है। सांख्य दर्शन कपिल मुनि द्वारा प्रतिपादित है। कपिल मुनि भगवान के अवतार थे तथा पृथ्वी पर कर्दम मुनि और देवहूति के पुत्र के रूप में अवतरित हुए थे। उन्होंने जिस सांख्य दर्शन को प्रतिपादित किया वह विश्लेषणात्मक तर्क शक्ति पर आधारित है। यह शरीर में तथा संसार में पाए जाने वाले तत्त्वों के विश्लेषण द्वारा आत्मज्ञान कराता है। यह कर्म के विश्लेषण द्वारा उसके कारण और परिणाम का भी बोध कराता है।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् |
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् || 14||
शरीर, कर्ता, विभिन्न इन्द्रियाँ, अनेक प्रकार की चेष्टाएँ और विधि अर्थात् भगवान-ये पाँच कर्म के कारक तत्त्व हैं।
इस श्लोक में 'अधिष्ठानम्' का अर्थ 'निवास स्थान' है तथा इसका तात्पर्य शरीर से है क्योंकि कर्म केवल तभी किए जा सकते हैं जब आत्मा शरीर में स्थित हो। कर्ता का अर्थ है-कार्य को करने वाला और यह आत्मा का बोध कराता है। आत्मा स्वयं कर्मों का सम्पादन नहीं करती बल्कि यह प्राण शक्ति सहित मन, शरीर तथा बुद्धि के तंत्र को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। अहम् के प्रभाव के कारण यह अपनी पहचान अपने कर्मों के साथ करती है। इसलिए शरीर द्वारा सम्पन्न किये गये कार्यों के लिए आत्मा उत्तरदायी होती है और इसे कर्ता और ज्ञाता दोनों कहा जाता है। प्रश्नोपनिषद् में कहा गया है-"एष हि द्रिष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते (4.9)" अर्थात् यह आत्मा ही है जो देखती है, स्पर्श करती है, सुनती है, अनुभव करती है, स्वाद लेती है, सोचती और समझती है। इसलिए आत्मा को ज्ञाता और कर्मों का कर्त्ता दोनों माना गया है। ब्रह्मसूत्र में भी कहा गया है-"ज्ञोऽत एव (2.3.18)" अर्थात् यह सत्य है कि आत्मा ज्ञाता है। ब्रह्मसूत्र में पुनः वर्णन किया गया है, “कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् (2.3.33)" अर्थात् आत्मा कर्मों की कर्ता है और शास्त्रों द्वारा इसकी पुष्टि भी की गई है।" उपर्युक्त उद्धरणों से यह स्पष्ट होता है कि आत्मा भी कर्मों की संपति में एक कारक है। कर्मों का निष्पादन करने के लिए इन्द्रियों का प्रयोग किया जाता है। इन्द्रियों के बिना आत्मा स्वाद, स्पर्श, देखने, सुनने, सूंघने और ध्वनि इत्यादि से संबंधित क्रियाओं का अनुभव नहीं कर सकती। इसके अतिरिक्त हाथ, पाँव, मुँह, लिंग और गुदा-ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। इनकी सहायता से ही आत्मा विभिन्न प्रकार के कार्य संपूर्ण करती है। इस प्रकार इन्द्रियाँ भी कार्यों को पूर्ण करने के कारकों में सम्मिलित हैं। कर्म के सभी उपादानों के होने पर भी यदि कोई चेष्टा नहीं करता तब कोई भी कर्म नहीं किया जा सकता। वास्तव में प्रयास करना अति महत्त्वपूर्ण है जिसका चाणक्य पंडित ने अपने नीति सूत्र में उल्लेख किया है, "उत्साहवतां शत्रवोपि वशीभवन्ति" अर्थात् पर्याप्त प्रयास द्वारा दुर्भाग्य भी सौभाग्य में परिवर्तित हो जाता है। "निरुत्वाछाय दैवं पतिता" अर्थात् "बिना उचित् प्रयास के सौभाग्य भी दुर्भाग्य में परिवर्तित हो जाता है। अतः चेष्टा भी कर्म का एक अन्य घटक है। परमात्मा शरीर में साक्षी के रूप में निवास करता है। मनुष्य के पूर्व कर्मों के आधार पर वह विभिन्न प्रकार के लोगो को कर्मों का संपादन करने के लिए भिन्न-भिन्न योग्यताएँ प्रदान करता है जिससे कि वे कर्म कर सकें। इसे कोई भगवान का विध न भी कह सकता है। उदाहरण के लिए कुछ लोग ऐसी कुशलता से संपन्न होते हैं जिससे वे अपार धन सम्पदा अर्जित कर सकते हैं। जटिल परिस्थितियों में भी वे अपनी विलक्षण प्रतिभा के बल पर लोगों को चकित कर देते हैं। मुश्किलों का सामना करते हुए भी वे भाग्यशाली रहते हैं। ऐसी विलक्षण बुद्धि उन्हें भगवान द्वारा प्रदान की जाती है। इसी प्रकार से खेल, संगीत, कला, साहित्य इत्यादि क्षेत्रों से संबद्ध अन्य लोग भी भगवान द्वारा प्रदत्त विशिष्ट प्रतिभा से संपन्न होते हैं। यह भगवान ही हैं जो लोगों को उनके पूर्व कर्मों के अनुसार विशेष योग्यताएँ प्रदान करते हैं। अतः उन्हें भी कर्मों के लिए उत्तरदायी कारकों में एक कारक के रूप में कहा गया है।
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नर: |
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतव: || 15||
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु य: |
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान स पश्यति दुर्मति: || 16||
शरीर, मन या वाणी से जो भी कार्य संपन्न किया जाता है भले ही वह उचित हो या अनुचित, उसके ये पाँच सहायक कारक हैं। वे जो इसे नहीं समझते और केवल आत्मा को ही कर्ता मानते हैं, वे वस्तुओं को उनके वास्तविक रूप में नहीं देख सकते।
कर्म तीन प्रकार के हैं-कायिक (वे कार्य जो शरीर द्वारा संपन्न किए जाते हैं), वाचिक (वे कर्म जो वाणी द्वारा संपादित होते हैं) तथा मानसिक (वे कार्य जो मन से किये जाते हैं।) इनमें से प्रत्येक श्रेणी के पुण्य या पापमय कार्य के लिए पिछले श्लोक में वर्णित पाँच कारक उत्तरदायी होते हैं। अहम् के कारण हम स्वयं को अपने कार्यों का कर्ता मानने लगते हैं। उदाहरणार्थ “मैंने यह उपलब्धि प्राप्त की।", "मैंने यह कार्य संपूर्ण किया।", "मैं यह करूंगा।" कर्तापन के भ्रम के कारण हम इस प्रकार कहते हैं। इस ज्ञान को प्रकट करने का श्रीकृष्ण का उद्देश्य आत्मा के अहम् को नष्ट करना है। इसलिए वे कहते हैं कि जो केवल आत्मा को कर्म के कारक के रूप में देखते हैं वे वस्तुओं को उनके वास्तविक रूप में नहीं देखते। यदि भगवान द्वारा आत्मा को शरीर नहीं दिया जाता तब यह कुछ नहीं कर सकती थी। यदि भगवान शरीर को ऊर्जा प्रदान नहीं करते तब यह भी कुछ नहीं कर सकता था। केनोपनिषद् में वर्णन किया गया है
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते।
"ब्रह्म का वर्णन वाणी द्वारा नहीं किया जा सकता बल्कि उसकी प्रेरणा से वाणी वर्णन करने की शक्ति प्राप्त करती है।"
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्
(केनोपनिषद्-1.5)
"ब्रह्म को मन और बुद्धि से नहीं जाना जा सकता, उनकी शक्ति द्वारा मन और बुद्धि कार्य करते हैं"
यच्चक्षुषा न पश्यति येन चढूंषि पश्यति
(केनोपनिषद्-1.6)
"ब्रह्म को नेत्रों द्वारा देखा नहीं जा सकता, उसकी प्रेरणा से आंखें देखती हैं।"
यच्छ्रोत्रेण न श्रुणोति येन श्रोत्रमिदम् श्रुतम्
(केनोपनिषद्-1.7)
"ब्रह्म को कानों द्वारा सुना नहीं जा सकता, उसकी शक्ति के कारण कान सुनते हैं।"
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते
(केनोपनिषद्-1.8)
"ब्रह्म प्राण शक्ति से क्रियाशील नहीं होता, उसकी प्रेरणा से प्राण शक्ति कार्य करती हैं।"
इसका अर्थ यह नहीं है कि कर्मो के निष्पादन में आत्मा की कोई भूमिका नहीं होती है। यह आत्मा किसी कार चालक के समान है जो गाड़ी के स्टीयरिंग व्हील को नियंत्रित करते हुए यह निर्णय करता है कि कार को किस दिशा में कितनी गति से चलाना है। समान रूप से आत्मा भी शरीर, मन और बुद्धि के कर्मों को नियंत्रित करती है। लेकिन वह स्वयं किसी कार्य को संपन्न नहीं करती। यदि हम स्वयं को अपने समस्त कर्मों को संपन्न करने का एकमात्र कारण मानते हैं तब हम स्वयं को अपने समस्त कर्मों का भोक्ता बनाना चाहेंगे। लेकिन जब हम स्वयं को कर्तापन के भाव से मुक्त कर लेते हैं तब हम अपने प्रयासों का श्रेय भगवान को देते हैं और उनके द्वारा प्रदान किए गए सुख साधनों को हम उनकी कृपा के रूप में स्वीकार करते हैं। तब हमें यह अनुभव होता है कि हम अपने कर्मों के भोक्ता नहीं हैं और सभी कर्म भगवान के सुख के लिए हैं। अगले श्लोक में किए गए वर्णन के अनुसार यह ज्ञान हमें यज्ञ, दान और तपस्या जैसे सभी कर्मों को श्रद्धा और भक्ति भाव से संपन्न कर इन्हें भगवान को समर्पित करने में सहायता करता है।
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते |
हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते || 17||
जो कर्तापन के अहंकार से मुक्त होते हैं और जिनकी बुद्धि मोहग्रस्त नहीं है, वे जीवों को मारते हुए भी न तो जीवों को मारते हैं और न कर्मों के बंधन में पड़ते हैं।
पिछले श्लोक में मोहित बुद्धि का वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण अब विशुद्ध बुद्धि का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि विशुद्ध बुद्धि से युक्त मनुष्य कर्ता होने के मिथ्या अभिमान से मुक्त रहते हैं। वे अपने कर्मों का फल भी नहीं भोगना चाहते इसलिए वे जो कर्म करते हैं उसमें आसक्त नहीं होते।
पहले भी श्लोक 5.10 में उन्होंने कहा था कि जो कर्म-फलों से विरक्त रहते हैं वे कभी पाप से ग्रस्त नहीं होते। भौतिक दृष्टि से वे कार्य में संलग्न प्रतीत होते हैं लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से वे आसक्ति से मुक्त होते हैं और इसलिए वे कर्म फलों के बंधनो में नहीं पड़ते।
मुगलकाल में रहीम खानखाना प्रसिद्ध संत कवि थे। जन्म से मुसलमान होने पर भी वे भगवान कृष्ण के परम भक्त थे। जब भी वे भिक्षा देते तब वे अपनी आंखे झुका लेते थे। उनकी इस आदत के संबंध में एक रोचक घटना है। यह कहा जाता है कि संत तुलसी दास ने रहीम द्वारा इस प्रकार से दान देने के बारे में सुन रखा था और उन्होंने उनसे पूछाः
ऐसी देनी देन ज्यों, कित सीखे हो सैन
ज्यों-ज्यों कर ऊंच्यो करो, त्यों-त्यों नीचे नैन
"श्रीमान्, तुमने इस प्रकार से भिक्षा देने की कला कहाँ से सीखी? तुम्हारे हाथ उतने ही ऊपर की ओर होते हैं जितनी नीचे तुम्हारी दृष्टि।" रहीम ने इसका अति विनम्रता से उत्तर दिया
देनहार कोई और है, भेजत है दिन-रैन
लोग भरम हम पर करें, याते नीचे नैन
"देने वाला कोई और है जो दिन रात देता है किन्तु संसार इसका श्रेय मुझे देता है इसलिए मैं अपनी आँखों को नीचे झुका लेता हूँ।" यह बोध होना कि हम अपनी उपलब्धियों के लिए उत्तरदायी नहीं हैं, हमें कर्तापन के भाव से मुक्त करता है।
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना |
करणं कर्म कर्तेति त्रिविध: कर्मसंग्रह: || 18||
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता-ये कर्म को प्रेरित करने वाले तीन कारक हैं। करण,कर्म और कर्ता-ये कर्म के तीन घटक हैं।
कर्मयोग के अंतर्गत श्रीकृष्ण ने इसके अंगों का वर्णन किया था। उन्होंने कर्मों के फलों की व्याख्या की थी और उनसे मुक्त होने की प्रक्रिया का वर्णन किया था। अब वे कर्मों को प्रेरित करने वाले तीन कारकों की चर्चा करते हैं। ये ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता हैं। संयुक्त रूप से इन्हें 'ज्ञानत्रिपुटी' अर्थात् ज्ञान की त्रिमूर्ति कहा जाता है।
'ज्ञान' कर्म का प्रेरक है। यह ज्ञाता को 'ज्ञेय' की जानकारी देता है। यह त्रिवेणी संयुक्त रूप से कर्म को प्रेरित करती है। उदाहरणार्थ नियोक्ता द्वारा दिए जाने वाले धन का ज्ञान कर्मचारी को उत्साह से काम करने के लिए प्रेरित करता है। विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में स्वर्ण की खोज ने श्रमिकों में सोने की खानों में प्रवास करने की उद्विग्नता उत्पन्न की। ओलंपिक में पदक प्राप्त करने के महत्त्व का ज्ञान खिलाड़ियों को वर्षों तक अभ्यास करने के लिए प्रेरित करता है। ज्ञान और कार्य की गुणवत्ता का सीधा संबंध होता है।
उदाहरणार्थ किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से प्राप्त की गई डिग्री का जीविका प्राप्त करने में अत्यंत महत्त्व होता है। प्रतिष्ठित निगम और कम्पनियाँ जानती हैं कि उच्च शिक्षा प्राप्त लोग अधिक कुशलता से कार्य कर सकते हैं। इसलिए कई संस्थान अपने कर्मचारियों की कार्यकुशलता को विकसित करने के लिए निवेश करते हैं। यथा सेमिनारों, संगोष्ठियों और कार्यशालाओं में अपने कर्मचारियों को भेजकर उनके कार्य की गुणवत्ता, कार्य क्षमता और कार्यकुशलता को और अधिक बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।
इसकी दूसरी श्रेणी को 'कर्मत्रिपुटी' का नाम दिया गया है जिसमें कर्ता, (कार्य करने वाला) करण (कर्म के उपादान) और स्वयं कर्म सम्मिलित है। संयुक्त रूप से कर्म की यह त्रिपुटी कर्म तत्त्व का निर्माण करती है। कर्ता 'कर्म के उपादानों' का प्रयोग कर्म को सम्पन्न करने के लिए करता है। यह विश्लेषण करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब कर्म को तीन गुणों से संबंद्ध बताते हैं जिससे यह समझाया जा सके कि हम लोग क्यों एक दूसरे से भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं।
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदत: |
प्रोच्यते गुणसङ् ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि || 19||
सांख्य दर्शन में ज्ञान, कर्म और कर्ता की तीन श्रेणियों का उल्लेख किया गया है और तदनुसार प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार इनका भेद निरूपित किया गया है। इन्हें सुनो।
श्रीकृष्ण एक बार पुनः प्रकृति के तीन गुणों का वर्णन करते हैं। 14वें अध्याय में उन्होंने इन तीन गुणों का परिचय दिया था और बताया था कि किस प्रकार से ये आत्मा को जन्म और मृत्यु के संसार में बांधे रखते हैं। फिर 17वें अध्याय में उन्होंने यह बताया था कि किस प्रकार से ये तीनों गुण लोगों की श्रद्धा और उनके भोजन को प्रभावित करते हैं। उन्होंने यज्ञ, दान और तपस्या की तीन श्रेणियों की भी व्याख्या की थी। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण तीन गुणों के अनुसार तीन प्रकार के ज्ञान, कर्म और कर्ता की विवेचना करेंगे।
भारतीय दर्शन शास्त्र की छः विचार पद्धतियों में से एक सांख्य दर्शन जिसे पुरुष प्रकृतिवाद भी कहा जाता है, को प्रकृति के विश्लेषण में प्रमाण में स्वीकार किया जाता है। इसमें आत्मा को पुरुष कहा जाता है। इसमें पुरुष बहुत्ववाद का सिद्धांत है। प्रकृति एक भौतिक शक्ति है जिसमें सभी भौतिक वस्तुएँ सम्मिलित हैं।
सांख्य दर्शन में वर्णित है कि पुरुष द्वारा प्रकृति का भोग करने की इच्छा ही सभी दुःखों का मूल कारण है। जब यह भोग प्रवृत्ति शांत हो जाती है तब पुरुष माया शक्ति के बन्धनों से मुक्त हो जाता है और शाश्वत आनंद पाता है। सांख्य दर्शन भगवान के अस्तित्त्व को स्वीकार नहीं करती। अतः यह परम सत्य को जानने के लिए पर्याप्त नहीं है तथापि प्रकृति (भौतिक शक्ति) के विषय में श्रीकृष्ण इसे प्रामाणिक ग्रंथ के रूप में देखते हैं।
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते |
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानम् विद्धि सात्त्विकम् || 20||
जिस ज्ञान द्वारा व्यक्ति सभी जीवों में एक अविभाजित अविनाशी सत्ता को देखता है उसे सात्त्विक ज्ञान कहते हैं।
सृष्टि भौतिक पदार्थों और विभिन्न प्रकार के जीवों का संगम है। किन्तु इस विविधता का आधार परम भगवान ही हैं। जो मनुष्य इस ज्ञान दृष्टि से संपन्न हैं वे सृष्टि के निर्माण के पीछे उसी प्रकार एकीकृत शक्ति को देखते हैं जिस प्रकार से एक विद्युत् अभियंता विभिन्न प्रकार के विद्युत् उपकरणों में एक समान विद्युत् को प्रवाहित होते देखता है और एक सुनार एक ही सोने को विभिन्न प्रकार के आभूषणों में देखता है। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन किया गया है
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्
(श्रीमद्भागवतम्-1.2.11)
"परम सत्य को जानने वाले कहते हैं कि सृष्टि में केवल एक ही सत्ता है।" चैतन्य महाप्रभु ने चार मापदण्डों के आधार पर श्रीकृष्ण को भगवान कहते हुए उन्हें 'अद्वय ज्ञान तत्त्व' (जिसके समान दूसरा कोई नहीं) कह कर संबोधित किया है।
1. सजातीय भेद शून्यः श्रीकृष्ण अपने ही विभिन्न रूपों जैसे राम, शिव, विष्णु इत्यादि में एक समान ही हैं अर्थात् ये एक ही भगवान की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। सभी आत्माओं में भी एक श्रीकृष्ण हैं। आत्मा उनका अंश है, जिस प्रकार आग की लपटें आग के लघु अंश हैं।
2. विजातीय भेद शून्यः माया भगवान से पृथक् है। वह जड़ है जबकि भगवान चेतन हैं। तथापि माया भगवान की शक्ति है और शक्ति अपने शक्तिमान से ठीक उसी प्रकार अभिन्न होती है जिस प्रकार से अग्नि की शक्ति, गर्मी और प्रकाश उससे भिन्न नहीं हैं।
3. स्वगत भेद शून्यः इसका तात्पर्य भगवान के शरीर के विभिन्न अंगों का उनसे पृथक् न होने से है। उनके शरीर का कोई भी अंग अन्य अंगों का कार्य भी कर सकता है। ब्रह्मसंहिता में वर्णन है
अङानि यस्य सकलेन्द्रियवृत्ति मन्ति
पश्यन्ति पान्ति कलयन्ति चिरम् जगन्ति । (ब्रह्मसंहिता-5.32)
"भगवान अपने प्रत्येक अंग से देख, सूंघ, खा और सोच भी सकते हैं।" इस प्रकार से भगवान के शरीर के सभी अंग उनसे पृथक् नहीं है।
4. स्वयं सिद्धः (किसी अन्य सत्ता की सहायता की आवश्यकता न होना) माया और आत्मा दोनों अपने अस्तित्त्व के लिए भगवान पर निर्भर हैं। अगर वे इन्हें शक्ति प्रदान न करते तब इन दोनों का अस्तित्त्व समाप्त हो गया होता। अन्य शब्दों में भगवान परम स्वतंत्र हैं और उन्हें अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए किसी अन्य सत्ता की आवश्यकता नहीं पड़ती।
परम पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण उपर्युक्त चारों विशेषताओं से परिपूर्ण हैं और इस प्रकार वे 'अद्वय ज्ञान तत्त्व' हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वे सृष्टि में व्याप्त सभी वस्तुओं में विद्यमान हैं। इस ज्ञान में स्थिर होकर जब हम संपूर्ण सृष्टि को भगवान के साथ एकीकृत रूप में देखते हैं तब ऐसा ज्ञान सात्त्विक कहलाता है और इस ज्ञान पर आधारित प्रेम पक्षपातपूर्ण या राष्ट्रीय न होकर सार्वभौमिक होता है।
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् |
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् || 21||
जिस ज्ञान द्वारा कोई मनुष्य भिन्न-भिन्न शरीरों में अनेक जीवित प्राणियों को पृथक्-पृथक् और असंबद्ध रूप में देखता है उसे राजसी माना जाता है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण अब राजसी ज्ञान के संबंध में बता रहे हैं। राजसी ज्ञान से परिपूर्ण जीव संसार को भगवान के साथ संबद्ध हुए नहीं देख पाता अपितु वह प्राणियों को उनके जातिगत भेदभाव के साथ वर्ग, पंथ, धर्म, राष्ट्रीयता आदि के आधार पर अनेक के रूप में देखता है। इस प्रकार का ज्ञान मानव समाज को कई अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित करता है। जब ज्ञानों का एकीकरण हो जाता है तब यह सत्त्वगुणी कहलाता है और जब ज्ञान विभाजित हो जाता है तब इसे रजोगुणी कहा जाता है।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् |
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् || 22||
वह ज्ञान जिसमें मनुष्य ऐसी धारणा रखता है मानो वह संपूर्ण के सदृश हो और जो ज्ञान न तो किसी कारण या सत्य पर आधारित है उसे तामसिक ज्ञान कहते हैं।
जब बुद्धि तमोगुण के प्रभाव से कुंठित हो जाती है तब यह निकृष्ट अवधारणा में इस प्रकार से निष्ठ हो जाती है जैसे कि वही पूर्ण सत्य है। ऐसी विचारधारा के कारण लोग प्रायः कटट्रवादी बन जाते हैं और जो वे समझते हैं उसे ही सत्य मानने लगते हैं। उनका ज्ञान न तो तर्कसंगत और न ही शास्त्रों या सत्य पर आधारित होता है। किन्तु फिर भी वे अपने विचारों को दूसरों पर थोपना चाहते हैं। मानव सभ्यता के इतिहास में ऐसे अनेक उन्मादियों को देखा गया है जो स्वयं को भगवान का संदेशवाहक, अनुयायी और उनके विधान का रक्षक बनने का ढोंग करते रहे हैं। वे दूसरों को धर्म परिवर्तन के लिए फुसलाते हैं और अपने समान मति वाले अनुयायी ढूंढ लेते हैं। इस प्रकार से वे 'एक अंधा दूसरे अंधे को मार्ग दिखाने' वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं। तथापि भगवान और धर्म की सेवा के नाम पर वे समाज में विघटन उत्पन्न करते हैं और भाईचारे की भावना में बाधा उत्पन्न करते हैं।
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषत: कृतम् |
अफलप्रेप्सुना कर्म यतत्सात्त्विकमुच्यते || 23||
जो कर्म शास्त्रों के अनुसार है, राग और द्वेष की भावना से रहित और फल की कामना के बिना संपन्न किया जाता है, वह सत्त्वगुण प्रकृति का होता है।
तीन प्रकार के ज्ञान की विवेचना करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब तीन प्रकार के कर्मों का वर्णन करते हैं। इतिहास में कई सामाजिक वैज्ञानिकों और दार्शनिकों ने उचित कर्म के संबंध में अपना-अपना मत प्रकट किया है। उनमें से कुछ के महत्त्वपूर्ण मत और दर्शन का निम्न प्रकार से उल्लेख किया जा रहा है
1. ग्रीस के एपिक्युरियन (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) के अनुसार "खाना, पीना और आनंद भोगना ही उचित कर्म था।"
2. इंग्लैंड के हौब्स (1588-1679) तथा फ्रांस के हैल्वेटिस (1715-1771) का दर्शन और अधिक परिष्कृत था। उन्होंने कहा कि यदि सब स्वार्थी बन जाते हैं और दूसरों का ध्यान नहीं रखते तब संसार में अराजकता फैल जाएगी। इसलिए उन्होंने कहा कि अपने ज्ञान की तुष्टि के साथ-साथ हमें अन्य लोगों का भी ध्यान रखना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि पति अस्वस्थ है तो पत्नी को उसकी देखभाल करनी चाहिए और यदि पत्नी अस्वस्थ है तो पति को उसका ध्यान रखना चाहिए। लेकिन उन मामलों में जहाँ दूसरों की सहायता करने से हमारे निजी हितों का ह्रास होता है तब उनके अनुसार ऐसी स्थिति में अपने निजी हितों को प्राथमिकता प्रदान करनी चाहिए।
3. जोसफ बटलर (1692-1752) का दर्शन इनसे श्रेष्ठ था। उन्होंने कहा कि अपने हितों की सिद्धि करके दूसरों की सेवा का विचार अनुचित था। परोपकार करना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। सिंहनी स्वयं भूखी रहकर भी अपने शावकों को दूध पिलाती है। इसलिए दूसरों की सेवा को प्राथमिकता देनी चाहिए। तथापि बटलर की यह अवधारणा भौतिक दु:खों की निवृत्ति तक ही सीमित थी। यदि कोई व्यक्ति भूखा हो तो उसे भोजन खिलाया जा सकता है किन्तु इससे समस्या का पूर्ण निवारण नहीं होता क्योंकि वह व्यक्ति छः घंटे बाद पुनः भूख से व्याकुल हो जाएगा।
4. बटलर के पश्चात् जेरेमी बेन्थम (1748-1832) तथा जॉन स्टुअर्ट मिल (1806-1873) का आगमन हुआ। उन्होंने एक अन्य सिद्धांत की अनुशंसा करते हुए कहा कि वही कार्य किया जाए जो बहुसंख्यक लोगों के हित में हो। उन्होंने उचित अनुचित आचरण का निर्धारण करने के लिए बहुमत को स्वीकार करने का सुझाव दिया। लेकिन यदि बहुमत गलत हो तब यह दर्शन असफल सिद्ध हो जाएगा। क्योंकि एक हजार अज्ञानी मिलकर भी एक विद्वान के विचारों की गुणवत्ता की समानता नहीं कर सकते।
कुछ दार्शनिकों ने यह कहा की कि अपने अंतःकरण की आवाज को सुनो। उन्होंने सुझाव दिया कि उचित आचरण निर्धारित करने का यह उत्तम मार्ग है। किन्तु समस्या यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का अंत:करण विभिन्न प्रकार का होता है। एक ही परिवार के दो बच्चों के अलग-अलग नैतिक मूल्य और उनका अंत:करण भिन्न-भिन्न होगा। साथ ही किसी भी व्यक्ति का अंत:करण परिवर्तित होता रहता है। यदि एक हत्यारे से पूछा जाए कि लोगों की हत्या करके क्या उसे बुरा लगता है? वह उत्तर देता है, "आरंभ में मुझे बुरा लगता था किन्तु बाद में ऐसा करना मुझे मच्छरों को मारने के समान मोक्ष-संन्यास योग नगण्य लगने लगा। ऐसा करने से मुझे कोई पश्चात्ताप नहीं होता।" उचित कार्य के संबंध में महाभारत बताती है
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
श्रुतिः स्मृति सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।।
(महाभारत-5.15.17)
"यदि तुम किसी के बुरे व्यवहार की आशा नहीं करते तब तुम्हें दूसरों के साथ भी वैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। सदैव यह सुनिश्चित करो कि तुम्हारा आचरण शास्त्रों के अनुसार है।" दूसरों के साथ भी वैसा व्यवहार करो जैसे आचरण की तुम उनसे अपेक्षा करते हो। बाइबिल में भी वर्णन है-"दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा कि वे तुम्हारे साथ करते हैं।" (लुका 6.31) यहाँ श्रीकृष्ण भी यही कहते हैं कि शास्त्रों के अनुसार किए गये कार्य सात्त्विक है। वे कहते हैं कि ऐसा कार्य राग और द्वेष की भावना और कर्मफल की इच्छा से रहित होकर करना चाहिए।
यत्तुकामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुन: |
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् || 24||
जो कार्य स्वार्थ की सिद्धि से प्रेरित होकर, अभिमान और तनाव ग्रस्त होकर किए जाते हैं वे रजोगुणी प्रकृति के होते हैं।
रजोगुण की प्रवृत्ति इन्द्रिय सुखों का अधिक से अधिक भोग करने की तीव्र उत्कंठा उत्पन्न करती है। इसलिए रजोगुण के प्रभाव में किया गया कार्य अनेक प्रकार की अभिलाषाओं से प्रेरित होता है। इसमें कठिन परिश्रम अनिवार्य है और यह शारीरिक और मानसिक थकान देता है। रजोगुणी कार्यों का उदाहरण कॉर्पोरेट जगत है। कर्मचारी लगातार तनाव की शिकायत करते हैं। ऐसा इस लिए होता है क्योंकि उनके कार्य सत्ता, प्रतिष्ठा और धन प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रेरित होते हैं। नेताओं, अभिभावकों और व्यवसायिक लोगों के कार्य भी रजोगुण के प्रभाव में किए जाते हैं।
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् |
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते || 25||
जो कार्य मोहवश और अपनी क्षमता का आंकलन, परिणाम, हानि और दूसरों की क्षति पर विचार किए बिना आरम्भ किए जाते हैं, वे तमोगुणी कहलाते हैं।
जिनकी बुद्धि अज्ञानता से आच्छादित होती है, वे उचित और अनुचित के संबंध में असावधान रहते हैं। वे केवल स्वयं में और अपने निजी स्वार्थों में रुचि रखते हैं। वे धन और संसाधनों का दुरुपयोग करने में तथा दूसरों को कष्ट देने में संकोच नहीं करते। श्रीकृष्ण ने इसके लिए 'क्षयम्' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ 'क्षीण' है। तामसिक कार्य किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य और शक्ति के क्षीण होने का कारण बनते हैं। यह प्रयास, समय और संसाधनों का दुरुपयोग है। जुआ, चोरी, भ्रष्टाचार, मदिरापान इत्यादि इसके उदाहरण हैं।
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित: |
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते || 26||
वह जो अहंकार और मोह से रहित होता है, उत्साह और दृढ़ निश्चय से युक्त होता है, ऐसे कर्ता को सत्त्वगुणी कहा जाता है।
श्रीकृष्ण ने पहले ही कहा था कि कर्म के तीन संघटक हैं-ज्ञान, कर्म और कर्ता। इनमें से ज्ञान और कर्म की श्रेणियों का वर्णन करने के पश्चात् अब वे कर्ताओं की तीन श्रेणियों का वर्णन करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि सत्त्वगुण में स्थित लोग अकर्मण्य नहीं होते बल्कि वे उत्साह और दृढ़ निश्चय के साथ कार्य करते हैं। उनके द्वारा संपन्न किए गए कार्य उपयुक्त चेतना से युक्त होते हैं।
सात्त्विक कर्ता 'मुक्तसङ्ग' होते हैं अर्थात् वे संसारिक पदार्थों से आसक्त नहीं होते और न ही वे यह विश्वास करते हैं कि संसारिक पदार्थ आत्मा को तृप्त कर सकते हैं। इसलिए वे महान उद्देश्यों के लिए कार्य करते हैं। चूंकि उनकी मनोभावना शुद्ध होती है, अतः वे अपने प्रयत्नों में उत्साह और धृति (दृढ़ निश्चय) से युक्त होते हैं। अपनी इस मनोवृति के कारण कार्य करते हुए उनकी ऊर्जा का कम से कम क्षय होता है। इस प्रकार से वे अपने महान उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अथक परिश्रम करने में समर्थ होते हैं। यद्यपि वे महान कार्य करते हैं तथापि वे 'अनहंवादी' अर्थात् अहंकार से मुक्त रहते हैं और अपनी सफलताओं का श्रेय भगवान को देते हैं।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचि: |
हर्षशोकान्वित: कर्ता राजस: परिकीर्तित: || 27||
जब कोई कर्ता कर्म-फल की लालसा, लोभ, हिंसक प्रवृत्ति, अशुद्धता, हर्ष एवं शोक से प्रेरित होकर कार्य करता है, उसे रजोगुणी कहा जाता है।
यहाँ राजसिक कर्ता का वर्णन किया गया है। सात्त्विक कर्त्ता आध्यात्मिक विकास की इच्छा से प्रेरित होते हैं किन्तु राजसिक कर्ता भौतिक लाभों के लिए गहन अभिलाषा रखते हैं। वे यह अनुभव नहीं करते कि संसार में सब कुछ अस्थायी है और एक दिन ये सब पीछे छूट जाएगा। राग के कारण वे शुद्ध मनोभावना से संपन्न नहीं होते। उन्हें यह विश्वास होता है कि वे जो सुख चाहते हैं, वे सुख उन्हें संसार के पदार्थों में मिल सकते हैं। इसलिए जो उन्हें प्राप्त होता है उससे वे संतुष्ट नहीं होते। वे 'लुब्ध:' होते हैं अर्थात् उनमें और अधिक पाने की लालसा बनी रहती है। जब वे यह देखते हैं कि अन्य लोग उनसे अधिक सफलता प्राप्त कर रहे है, तब वे 'हिंसात्मक' हो जाते हैं अर्थात् ईष्यापूर्वक दूसरों को कष्ट पहुंचाने में संकोच नहीं करते एवं अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु वे कभी-कभी नैतिकता का त्याग करते हैं और इसलिए वे 'अशुचि' अर्थात् अपवित्र हो जाते हैं। जब उनकी इच्छाओं की पूर्ति होती है तब वे हर्षित हो जाते हैं। जब वे निरुत्साहित हो जाते हैं तब दुःखी हो जाते हैं और इस प्रकार से उनका जीवन 'हर्षशोकान्वित' अर्थात् हर्ष और शोक से मिश्रित हो जाता है।
अयुक्त: प्राकृत: स्तब्ध: शठो नैष्कृतिकोऽलस: |
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते || 28||
जो कर्ता अनुशासनहीन, अशिष्ट, हठी, कपटी, आलसी तथा निराश होता है और टाल मटोल करता है, वह तमोगुणी कहलाता है।
श्रीकृष्ण अब तामसिक कर्ता का निरूपण करते हैं। तामसिक प्रवृत्ति के मनुष्यों का मन नकारात्मक विचार से कलुषित रहता है और इस प्रकार वे 'अयुक्तः' अर्थात् अनुशासनहीन हो जाते हैं। शास्त्रों में उचित और अनुचित आचरण के लिए निर्देश दिए गए हैं। परन्तु अज्ञानता के द्वारा प्रेरित कर्त्ता 'स्तब्धः' होते हैं क्योंकि वे तर्क बुद्धि को अवरुद्ध कर देते हैं। इसलिए वे प्रायः शठ: अर्थात् धुर्त और 'नैष्कृतिको' (नीच) होते हैं। वे प्राकृतः (अशिष्ट) होते हैं क्योंकि वे अपनी पशु प्रवृत्ति को नियंत्रित नहीं करते। यद्यपि उन्हें कर्तव्यों का निर्वहन करना होता है किन्तु वे प्रयास को श्रम साध्य और कष्टदायक समझते हैं। इसलिए वे 'अलसः' अर्थात् आलसी और 'दीर्घ-सूत्री' अर्थात् टालमटोल करने वाले होते हैं। उनके विचार किसी अन्य की तुलना में उन्हें अधिक प्रभावित करते हैं जो उन्हें दुःखी और हताश करते हैं। श्रीमद्भागवतम् में भी इस प्रकार से वर्णन किया गया है
सात्त्विकः कारकोऽसंङ्गी रागान्धो राजसः स्मृतः।
तामसः स्मृतिविभ्रष्टो निर्गुणो मदपाश्रयः
(श्रीमदभागवतम्-11.25.26)
"जो कर्ता अनासक्त होते हैं वे सात्त्विक प्रकृति के होते हैं। वे जो केवल कर्म और कर्म फलों के प्रति आसक्त होते हैं वे राजसिक कहलाते हैं और जो विवेक रहित होते हैं वे तामसिक कहलाते हैं। लेकिन जो कर्ता मेरे शरणागत होता है वह इन तीनों गुणों से परे हो जाता है।"
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु |
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय || 29||
हे अर्जुन! अब मैं प्रकृति के तीनों गुणों के अनुसार तुम्हें विभिन्न प्रकार की बुद्धि तथा वृति के विषय में विस्तार से बता रहा हूँ। तुम उसे सुनो।
श्रीकृष्ण ने पिछले नौ श्लोकों में कर्म के संघटकों का वर्णन किया और यह बताया कि तीन घटकों में प्रत्येक की तीन श्रेणियाँ हैं। अब वे कार्य की गुणवत्ता और मात्रा को प्रभावित करने वाले दो कारकों का वर्णन करते हैं जो न केवल कर्म को प्रेरित करते हैं बल्कि उसे नियंत्रित भी करते हैं। ये कारक हैं-बुद्धि और धृति। बुद्धि विवेक शक्ति है जो उचित और अनुचित में भेद करती है। धृति मार्ग में आनेवाली कठिनाइयों और बाधाओं के पश्चात् भी कार्य को संपूर्ण करने के लिए अडिग रहने का दृढ़ संकल्प है। प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार इन दोनों की तीन श्रेणियाँ हैं। श्रीकृष्ण अब इन दोनों गुणों और इनके तीन प्रकार के वर्गीकरण की चर्चा करते हैं।
प्रवृत्तिंच निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये |
बन्धं मोक्षं च या वेत्तिबुद्धि: सा पार्थ सात्त्विकी || 30||
हे पृथापुत्र! जिसके द्वारा यह जाना जाता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित है, क्या कर्त्तव्य है और क्या अकरणीय है, किससे भयभीत होना चाहिए और किससे भयभीत नहीं होना चाहिए, और क्या बंधन में डालने वाला है और क्या मुक्ति देने वाला है वह बुद्धि सात्त्विकी है।
हम निरन्तर निर्णय करने हेतु अपनी स्वतंत्र इच्छा का प्रयोग करते हैं और हमारे समेकित विकल्प यह निर्धारित करते हैं कि हम क्या बनेंगे। रॉबर्ट फ्रॉस्ट ने अपनी कविता 'रोड नॉट टेकन' में इसका सजीव ढंग से वर्णन किया है
मैं आहें भर कर कहूँगा,
आज से युगों-युगों तक कहीं,
वन में दो अलग-अलग मार्ग और मैं था,
मैंने उस मार्ग को चुना,
जिस पर कम लोग यात्रा करते थे
और इसी से यह परिणाम हुआ।
उपर्युक्त विकल्प का चयन करने के लिए विवेक शक्ति का होना आवश्यक है। अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश विवेक शक्ति से युक्त करने के लिए दिया गया था। आरम्भ में अर्जुन अपने कर्त्तव्य पालन के संबंध में उलझन में था। अपने स्वजनों के प्रति अत्यधिक मोह के कारण वह उचित और अनुचित का निर्णय कर पाने में किंकर्तव्यविमूढ था। अपनी दुर्बलता और भय के कारण वह भगवान के शरणागत होता है और उनसे प्रार्थना करता है कि वे उसे उचित कर्त्तव्य का ज्ञान प्रदान करें। भगवान के दिव्य ज्ञान द्वारा अर्जुन को उस समय विवेक शक्ति विकसित करने में सहायता प्राप्त हुई। तब उन्होंने उसे अपना अंतिम निर्णय सुनाया-"मैंने तुम्हें वह ज्ञान बताया है जो सभी रहस्यों में गुह्यतम है। इसका गहनता से मंथन करो और फिर अपनी इच्छा अनुसार तुम्हें जो उचित लगे वही करो।" (श्लोक 18.63)
सत्त्वगुण बुद्धि को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करता है इसलिए उचित और अनुचित कर्म और विचारों में भेद करना सरल हो जाता है। सात्त्विक बुद्धि वह है जो हमें यह बोध और किस प्रकार के कार्यो का त्याग करना चाहिए। यह हमारी कमियों के कारण का बोध कराती है और उन्हें दूर करने का उपाय भी बताती है।
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च |
अयथावत्प्रजानाति बुद्धि: सा पार्थ राजसी || 31||
हे पार्थ! जो धर्म और अधर्म तथा उचित और अनुचित आचरण के बीच भेद करने में भ्रमित रहती है। ऐसी बुद्धि राजसिक कहलाती है।
आसक्ति के कारण राजसिक बुद्धि मिश्रित हो जाती है। कई बार यह स्पष्ट देखती है लेकिन निजी स्वार्थ आड़े आने पर यह दूषित और भ्रमित हो जाती है। उदाहरणार्थ कुछ लोग अपने व्यवसाय में अति प्रवीण होते हैं किन्तु पारिवारिक संबंधों में उनका आचरण बचकाना होता है। वे अपनी जीविका के मोर्चे पर तो सफल होते हैं घरेलू मोर्चे पर असफल रहते हैं क्योंकि उनका मोह उन्हें उचित निर्णय लेने और सदाचरण का पालन करने से रोकता है। राग और द्वेष, पसंद और नापसंद से ग्रसित राजसी बुद्धि उचित निर्णय लेने में असमर्थ होती है। यह महत्त्वपूर्ण और तुच्छ, स्थायी और अस्थायी तथा मूल्यवान और निरर्थक के बीच उलझी रहती है।
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता |
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी || 32||
जो बुद्धि अंधकार से आच्छादित रहती है, अधर्म में धर्म, असत्य में सत्य की कल्पना करती है, वह तामसिक प्रकृति की होती है।
तामसिक बुद्धि उत्कृष्ट ज्ञान से रहित होती है, इसलिए यह अधर्म को धर्म समझती है। उदाहरणार्थ एक शराबी शराब से मिलने वाले नशे में आसक्त हो जाता है। इसलिए उसकी मलिन बुद्धि अंधकार के कुहरे से ढक जाती है और वह अपनी दुर्गति को अनुभव नहीं कर पाता और शराब की अगली बोतल का क्रय करने के लिए अपनी संपत्ति को बेचने में चिंता नहीं करता। तामसिक बुद्धि के कारण उसकी निर्णय लेने और तर्क वितर्क करने की क्षमता नष्ट हो जाती है।
धृत्या यया धारयते मन:प्राणेन्द्रियक्रिया: |
योगेनाव्यभिचारिण्या धृति: सा पार्थ सात्त्विकी || 33||
जो धृति योग से विकसित होती है और जो मन, प्राण शक्ति और इन्द्रियों को स्थिर रखती है उसे सात्त्विक धृति (संकल्प) कहते हैं।
धृति अर्थात् संकल्प, मन और बुद्धि की आंतरिक शक्ति है जिसके कारण हम बाधाओं के बाबजूद अपने मार्ग पर अडिग रहते हैं। धृति हमारी दृष्टि को लक्ष्य की ओर केन्द्रित करती है और हमारी यात्रा में आने वाली दुर्गम बाधाओं को पार करने के लिए शरीर, मन और बुद्धि की प्रच्छन्न शक्तियों को एकत्रित करती है। श्रीकृष्ण अब तीन प्रकार के संकल्प की व्याख्या करते हैं। योग के अभ्यास द्वारा मन अनुशासित हो जाता है तथा शरीर और इन्द्रियों को वश में करने की क्षमता विकसित करता है। दृढ़ संकल्प तब विकसित होता है जब कोई इन्द्रियों का दमन और प्राण को अनुशासित करना तथा मन पर नियंत्रण रखना सीख लेता है। मन को नियंत्रित करना सात्त्विक धृति है।
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन |
प्रसङ्गेन फलाकाङ् क्षी धृति: सा पार्थ राजसी || 34||
वह धृति जिसके द्वारा मनुष्य आसक्ति और कर्म फल की इच्छा से कर्तव्य पालन करता है, सुख और धन प्राप्ति में लिप्त रहता है, वह राजसी धृति कहलाती है।
दृढ़ता केवल योगियों में ही नहीं पायी जाती। सांसारिक लोग भी अपने कार्यों को दृढ़ता से करते हैं। किंतु उन जीवात्माओं का दृढ़-संकल्प सांसरिक उन्नति से प्रसन्न होने की इच्छा से प्रेरित होता है। उनका ध्यान इन्द्रियों के सुखों को पाने और धन अर्जन की ओर केंद्रित होता है क्योंकि धन इन सब प्रकार के भौतिक सुखों को प्राप्त करने का एकमात्र साधन है। इसलिए ऐसे लोग अपने पूर्ण जीवन धन में आसक्त रहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि फल भोगने की इच्छाओं से प्रेरित धृति राजसी प्रकृति की होती है।
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च |
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृति: सा पार्थ तामसी || 35||
दुर्बद्धिपूर्ण संकल्प जिसमें निंदा, भय, दुःख, मोह, निराशा और कपट का त्याग नहीं किया जाता उसे तमोगुणी घृति कहा जाता है।
अज्ञानी और अहंकारी लोगों में भी दृढ़ता पायी जाती है। लेकिन यह एक प्रकार का हठ है जो भय, निराशा और अहंकार के कारण उत्पन्न होती है। उदाहरणार्थ कुछ लोग भय से ग्रस्त होते हैं और वे इसके इतनी दृढ़तापूर्वक जकड़े रहते हैं, जैसे कि यह उनके व्यक्तित्त्व का अविभाज्य अंग है। कुछ लोग अपने जीवन को इसलिए नारकीय बना देते हैं क्योंकि वे अपनी अतीत की निराशाओं के साथ संसक्त रहते हैं। वे जानते हैं कि इससे उनके जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा किन्तु फिर भी वे उन्हें भुलाना नहीं चाहते। कुछ लोग ऐसे लोगों से झगड़ा करने में लगे रहते हैं जो उनके अहम् को ठेस पहुँचाते हैं और उनके विचारों के विरूद्ध चलते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन विषयों पर आधारित धृति अर्थात् संकल्प तमोगुणी होता है।
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ |
अभ्यासाद्रमते यत्र दु:खान्तं च निगच्छति || 36||
हे अर्जुन! अब तुम मुझसे तीन प्रकार के सुखों के संबंध में सुनो जिनसे देहधारी आत्मा आनन्द प्राप्त करती है और सभी दुःखों के नाश तक भी पहुँच सकती है।
पिछले श्लोकों में श्रीकृष्ण ने कर्म के घटकों की चर्चा की थी। इसके पश्चात् उन्होंने उन कारकों का वर्णन किया जो कर्म को प्रेरित और नियंत्रित करते हैं। अब वे कर्म के लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। सांसारिक आत्माओं के कर्मो का परम लक्ष्य सुख की खोज है। सभी सुखी रहना चाहते हैं और अपने कार्यों से पूर्णता, शांति और संतोष की खोज करते हैं। परन्तु प्रत्येक व्यक्ति के कर्म में उनके संघटक कारकों का अंतर होता है, इसी कारण उनके द्वारा सम्पन्न कार्यों से प्राप्त होने वाले सुखों की श्रेणी में भी अंतर होता है। श्रीकृष्ण अब सुख की तीन श्रेणियों का वर्णन करते हैं।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् |
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् || 37||
जो आरम्भ में विष के समान लगता है लेकिन अंत में जो अमृत के समान हो जाता है उसे सात्त्विक सुख कहते हैं। यह शुद्ध बुद्धि से उत्पन्न होता है जो आत्म ज्ञान में स्थित होती है।
आंवला स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। इसमें दस संतरों से भी अधिक विटामिन-सी होता है। लेकिन बच्चे इसे नापसंद करते हैं क्योंकि इसका स्वाद कड़वा होता है। उत्तर भारत में माता-पिता बच्चों को इसका सेवन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और एक ऐसी कहावत भी है-“आंवले का खाया और बड़ों का कहा, बाद में पता चलता है।" अर्थात् “आंवले का सेवन और बड़ों का परामर्श" इन दोनों का लाभ भविष्य में ज्ञात होता है। वास्तव में आंवला खाने के कुछ क्षणों के पश्चात् उसका कड़वापन समाप्त हो जाता है और मिठास का अनुभव होता है। प्राकृतिक रूप से विटामिन-सी का सेवन करने से निःसंदेह दीर्घकालीन लाभ प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि सात्त्विक सुख भी ऐसा ही होता है जो आरम्भ में कड़वा लगता है और अंत में सुख के रूप में इसका स्वाद अमृत बन जाता है। वेदों में सात्त्विक सुखों का 'श्रेय' के रूप में उल्लेख किया गया है जोकि वर्तमान में दुःखद और अंततः लाभकारी होता है। इसके विपरीत 'प्रेय' है जो आरम्भ में सुखद लेकिन अंततः हानिकारक होता है। 'श्रेय' और 'प्रेय' के संबंध में कठोपनिषद् में वर्णन है
अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषम् सिनीतः।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते
(कठोपनिषद्-1.2.1-2)
"दो प्रकार के मार्ग होते हैं-एक लाभप्रद और दूसरा सुखद। ये दोनों मनुष्य को अलग दिशाओं की ओर ले जाते हैं। सुखद मार्ग प्रारम्भ में आनन्द प्रदान करता है लेकिन इसका अंत पीड़ादायक होता है। अज्ञानी लोग सुख और विनाश के पाश में बंधते हैं लेकिन बुद्धिमान इस धोखे में नहीं आते और लाभप्रद मार्ग का चयन करते हैं और अंततः सुख प्राप्त करते हैं।
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् |
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् || 38||
इन्द्रियों द्वारा उसके विषयों के संपर्क से उत्पन्न सुख को रजोगुणी कहा जाता है। ऐसा सुख आरम्भ में अमृत के सदृश लगता है और अंततः विष जैसा हो जाता है।
राजसिक सुख इन्द्रियों और उसके विषयों के संपर्क से उत्पन्न होता है। लेकिन ऐसा आनंद अल्प काल तक रहता है और परिणामस्वरूप अपने पीछे लोभ, चिंता आदि दोष छोड़ जाता है और माया के आवरण का और अधिक गाढ़ा कर देता है। संसारिक क्षेत्र में भी सफलता के लिए राजसिक सुखों का त्याग करना अनिवार्य है। क्षणभंगुर सुख से दूर रहने की चेतावनी के रूप में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू अपने पुस्तकालय में रखी हुई पुस्तक में लिखित 'स्टॉपिंग बाई वुड्स ऑन ए स्नोइंग इवनिंग' कविता की पंक्तियों का अक्सर अपयोग करते थे।
वन सुन्दर, अंधकारमय और घने हैं,
परन्तु मुझे कई वचनों को पूरा करना है,
और विश्राम करने से पूर्व मुझे कई लक्ष्यों को प्राप्त करना है,
और विश्राम करने से पूर्व मुझे कई लक्ष्यों को प्राप्त करना है,
नित्य और दिव्य आनन्द का मार्ग भोग नहीं है बल्कि त्याग, तपस्या और अनुशासन है।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मन: |
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् || 39||
जो सुख आदि से अंत तक आत्मा को आच्छादित करता है और जो निद्रा, आलस्य और असावधानी से उत्पन्न होता है वह तामसिक सुख कहलाता है।
तामसिक सुख निम्न कोटि का और प्रारंभ से अंत तक मूर्खता से परिपूर्ण होते हैं। यह आत्मा को अज्ञानता के अंधकार में धकेलता है। चूँकि इनसे सुख की थोड़ी सी अनुभूति होती है अतः लोग इसमें आसक्त हो जाते हैं। इसी कारण से धूम्रपान करने वाले यह जानते हुए कि यह उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, उन्हें धूम्रपान की लत को छोड़ना कठिन लगता है। वे इस व्यसन से प्राप्त होने वाले सुख को त्यागने में असमर्थ रहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे सुख जो निद्रा, आलस्य और असावधानी से उत्पन्न होते हैं वे तामसिक प्रकृति के होते हैं।
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुन: |
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै: || 40||
पृथ्वी और स्वर्ग के उच्च लोकों में रहने वाला कोई भी जीव प्रकृति के इन तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त नहीं होता।
श्वेताश्वतरोपनिषद् में माया शक्ति का विस्तृत वर्णन करते हुए माया शक्ति को त्रिरंगी कहा गया है
अजामेकां लोहिताशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः।
अजो टेको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः
(श्वेताश्वतरोपनिषद् -405)
"माया शक्ति के तीन रंग हैं-श्वेत, लाल और काला अर्थात् यह सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण सहित त्रिगुणी है। यह असंख्य जीवों के लिए माँ के गर्भ के समान है। यह भगवान जो पूर्ण सर्वज्ञ हैं, द्वारा अस्तित्त्व में लायी जाती है और उनका संयोग प्राप्त करती है। भगवान इस भौतिक शक्ति माया से कोई संबंध नहीं रखता। वह स्वतंत्र रूप से अपनी दिव्य लीलाओं में आनन्द लेता है किन्तु जीव माया का भोग करते हैं और बंधनों में पड़ जाते हैं।" माया का प्रभुत्व नरक के निम्न लोकों से स्वर्ग के ब्रह्मलोक तक होता है। चूँकि प्रकृति के तीन गुण-सत्त्व, रजस् और तमस् मायाशक्ति के अंतर्निहित हैं अतः ये सभी भौतिक लोकों में पाये जाते हैं। इसलिए इन लोकों के प्राणी चाहे वे पृथ्वी लोक के मनुष्य हों या स्वर्गलोक के देवता ही क्यों न हों, सभी तीन गुणों के अधीन रहते हैं। अंतर केवल इन गुणों के तुलनात्मक अनुपात में है। नरक लोकों के निवासियों में तमोगुण की प्रबलता होती है, पृथ्वीलोक पर निवास करने वाले में रजोगुण की प्रधानता होती है और स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओं में सत्त्वगुण की प्रबलता होती है। अब इन तीन तत्त्वों का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करेंगे कि मानव जाति में क्यों भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रकृति देखने को मिलती है।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप |
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै: || 41||
हे शत्रुहंता! ब्राह्मणों, श्रत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के कर्तव्यों को इनके स्वरूप के अनुसार तथा प्रकृति के तीन गुणों के अनुरूप विभाजित किया गया है, (न कि इनके जन्म के अनुसार।)
किसी ने ठीक ही कहा है कि उपयुक्त व्यवसाय की खोज एक उपयुक्त जीवन साथी की खोज करने के समान है। लेकिन हम स्वयं अपने लिए उपयुक्त व्यवसाय की कैसे खोज करें? यहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार लोगों का स्वभाव भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है जिससे उनके व्यक्तित्त्व का निर्माण होता है और इसलिए विभिन्न प्रकार के दायित्व उनके लिए सुविधाजनक होते हैं। 'स्वभाव-प्रभवैगुणौ' (मानव स्वभाव और गुण पर आधारित कर्म) के अनुसार वर्णाश्रम धर्म पद्धति समाज की वैज्ञानिक व्यवस्था थी। इस पद्धति के अनुसार समाज में चार आश्रम थे जिन्हें जीवन की चार अवस्थाएँ भी कहा जाता है और चार वर्ण अर्थात् चार व्यावसायिक श्रेणियाँ थी। जीवन की चार अवस्थाएँ इस प्रकार से थीं-(1) ब्रह्मचर्य आश्रम-(विद्यार्थी जीवन) जो जन्म से 25 वर्ष तक की आयु होता था। (2) गृहस्थ आश्रम-यह वैवाहिक जीवन था। यह 25 वर्ष की आयु से 50 वर्ष की आयु तक था। (3) वानप्रस्थ आश्रम- यह 50 वर्ष से 75 वर्ष तक की आयु तक था। इस अवस्था में मनुष्य अपने परिवार के साथ रहता था लेकिन वैराग्य का अभ्यास भी करता था। (4) संन्यास आश्रम-यह 75 वर्ष से आगे की अवस्था थी जिसमें मनुष्य अपनी घर गृहस्थी के दायित्वों का त्याग करता था और पवित्र स्थानों में निवास करते हुए मन को भगवान में तल्लीन करता था।
चार वर्णों में ब्राह्मण (पुरोहित वर्ग), अत्रिय वर्ग (योद्धा और शासक वर्ग), वैश्य (व्यापार और कृषि वर्ग वाले), शूद्र (कर्मचारी वर्ग) आते थे। वर्णों में कोई बड़ा या छोटा नहीं माना जाता था। भगवान ही समाज का केन्द्र थे और सभी अपने-अपने स्वाभाविक गुणों के अनुसार काम करते थे और भगवत्प्राप्ति के लिए प्रगति करते हुए अपने जीवन को सफल बनाते थे। इस प्रकार वर्णाश्रम पद्धति में विविधता में एकता थी। विविधता प्रकृति में अंतनिर्हित है और इसे कोई समाप्त नहीं कर सकता। हमारे शरीर में विभिन्न अंग है और ये सब भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य करते हैं। सभी अंगों से एक समान कार्य करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। इन सबको अलग-अलग समझना अज्ञानता नहीं है बल्कि तथ्यात्मक ज्ञान है। समान रूप से मानव जाति के बीच भी विविधता की उपेक्षा नहीं की जा सकती। समाजवादी देशों में समानता सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है लेकिन वहाँ भी राजनीतिक दलों के नेता हैं जो विचारधारा तैयार करते हैं। वहाँ भी सेना है जो बंदूकों का प्रयोग करती और देश की सुरक्षा करती है। वहाँ किसान भी हैं जो खेती-बाड़ी करते हैं। इन देशों में औद्योगिक श्रमिक भी हैं जो यांत्रिक कार्य करते हैं। समाजवादी देशों में समानता के प्रयासों के बाबजूद भी व्यवसाय के चार वर्ग विद्यमान हैं। वर्णाश्रम पद्धति ने मानवों में विविधता को मान्यता दी और लोगों के स्वभाव के अनुकूल वैज्ञानिक ढंग से उनके कर्त्तव्य और व्यवसाय निर्धारित किए।
यद्यपि समय व्यतीत होने के साथ-साथ वर्णाश्रम पद्धति विकृत हो गयी और वर्गों का निर्धारण स्वभाव की अपेक्षा जन्म के आधार पर होने लगा। ब्राह्मणों के बच्चों ने स्वयं को ब्राह्मण कहना आरम्भ कर दिया भले ही वे अपेक्षित गुणों से संपन्न हों या न हों। उच्च तथा निम्न जाति की अवधारणा भी विकसित हुई और उच्च जातियों के लोग निम्न जातियों को हेय दृष्टि से देखने लगे। जब यह पद्धति कठोर और जन्म आधारित हो गयी तब यह विरूपित हो गयी। यह एक समाजिक दोष था जो समय के साथ उभरा और यह वर्णाश्रम पद्धति का मूल उद्देश्य नहीं था।
अगले कुछ श्लोकों में इस पद्धति के मूल वर्गीकरण के अनुसार श्रीकृष्ण लोगों के स्वभावों को उनके कर्म के स्वाभाविक गुणों के साथ चित्रित करेंगे।
शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च |
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् || 42||
शान्ति, संयम, तपस्या, शुद्धता, धैर्य, सत्यनिष्ठा, ज्ञान, विवेक तथा परलोक में विश्वास-ये सब ब्राह्मणों के स्वाभाविक गुण हैं।
सात्त्विक गुणों की प्रधानता से संपन्न लोग ब्राह्मण कहलाते थे। उनके मुख्य कार्य तपस्या करना, मन की शुद्धि का अभ्यास करना, भक्ति करना और दूसरों को अपने आदर्शों से प्रेरित करना था। इसलिए उनमें सहिष्णुता, विनम्रता और आध्यात्मिक मनोवृति होती थी। उनसे स्वयं अपने लिए और अन्य वर्गों के लिए यज्ञों का निष्पादन करने की अपेक्षा की जाती थी। उनकी प्रकृति उन्हें ज्ञान की ओर प्रवृत्त करती थी। इसलिए शिक्षा प्रदान करना और ज्ञान को पोषित करना तथा इसे सब के साथ बांटना भी उनकी वृत्ति के अनुकुल था। यद्यपि वे स्वयं राज्य के प्रशासनिक कार्यों में भाग नहीं लेते थे लेकिन वे अधिकारियों को मार्गदर्शन प्रदान करते थे। चूंकि वे शास्त्रों के ज्ञान से संपन्न थे इसलिए सामाजिक और राजनीतिक विषयों के संबंध में उनके विचारों का अत्यधिक महत्त्व था।
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् |
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् || 43||
शूरवीरता, शक्ति, धैर्य, रण कौशल, युद्ध से पलायन न करने का संकल्प, दान देने में उदारता नेतृत्व क्षमता-ये सब क्षत्रियों के स्वाभाविक गुण हैं।
क्षत्रिय उन्हें कहते थे जिनमें रजोगुण प्रधान तथा सत्त्वगुण गौण होता था। इन गुणों ने उन्हें शासक, नायक, निडर, नेतृत्ववान और दानवीर बनाया। उनके गुण सैन्य और नेतृत्व संबंधी कार्यों के अनुकूल थे और उन्होंने शासक वर्ग तैयार किया और देश पर शासन किया। फिर भी ब्राह्मणों को अधिक ज्ञानी और पवित्र मानते थे इसलिए उन्होंने सदैव ब्राह्मणों का मान-सम्मान किया और वैचारिक, आध्यात्मिक और नीतिगत विषयों में उनसे परामर्श प्राप्त किया।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् |
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् || 44||
कृषि, गोपालन और दुग्ध उत्पादन तथा व्यापार, वैश्य लोगों के स्वाभाविक कार्य हैं। शूद्रों के श्रम और सेवा स्वाभाविक कर्म हैं।
वैश्यों में रजोगुण की प्रधानता तथा तमोगुण गौण होता है। इसलिए उनकी रुचि व्यापार और कृषि के माध्यम से अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण करने और धनोपार्जन में थी। वे देश की अर्थव्यवस्था को संभालते थे और अन्य वर्गों के लिए रोजगार उत्पन्न करते थे। उनसे समाज के वंचित लोगों के लिए धन सम्पदा दान करने की अपेक्षा की जाती थी। शूद्रों में तमोगुण की प्रधानता होती है। उनकी रुचि विद्वत्ता प्राप्त करने और प्रशासनिक कार्यों या व्यावसायिक उद्यमों में नहीं होती थी। उनके लिए उन्नति का मार्ग समाज की सेवा करना था। कलाकार, तकनीशियन, श्रमिक, दर्जी, कारीगर नाई इत्यादि इस वर्ग में सम्मिलित हैं।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर: |
स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु || 45||
अपने स्वाभाविक कर्तव्यों का पालन करने से मनुष्य पूर्णता प्राप्त कर सकता है। अब मुझसे यह सुनो कि निर्धारित कर्तव्यों का पालन करते हुए मनुष्य कैसे पूर्णता प्राप्त करता है।
स्व-धर्म हमारे गुणों और हमारे जीवन की अवस्थाओं पर आधारित होते हैं। इन्हें सम्पन्न करना यह सिद्ध करता है कि हम अपने शरीर और मन की योग्यताओं का उपयोग रचनात्मक ढंग से करते हैं। यह आध्यात्मिक विकास की ओर ले जाता है और समाज एवं आत्मा के लिए लाभदायक होता है। चूंकि हमारे कर्त्तव्य हमारे स्वभाव के अनुरूप होते हैं इसलिए इनका निर्वहन करने में हम स्वयं को सहज अनुभव करते हैं। फिर जब हमारी क्षमता बढ़ती है तब स्व-धर्म भी परिवर्तित हो जाता है और हम अगली कक्षा में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार से हम अपने उत्तरदायित्व का निष्ठापूर्वक निर्वहन कर उन्नति की ओर अग्रसर होते हैं।
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् |
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव: || 46|।
अपनी स्वाभाविक वृत्ति का निर्वहन करते हुए उस स्रष्टा भगवान की उपासना करो जिससे सभी जीव अस्तित्त्व में आते हैं और जिसके द्वारा सारा ब्रह्माण्ड प्रकट होता है। इस प्रकार से अपने कर्मों को सम्पन्न करते हुए मनुष्य सरलता से सिद्धि प्राप्त कर सकता है।
भगवान की सृष्टि में सभी जीवात्माओं का समान महत्त्व है। सृष्टि संचालन की उनकी दिव्य योजना सभी जीवों के विकास के लिए है। हम उनकी योजना रूपी विशाल चक्र में छोटे चक्रदंत के रूप में जुड़ते हैं और वे हमें क्षमता के अनुकूल ही अपेक्षा रखते हैं। इसलिए यदि हम अपने स्वभाव और अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने स्व-धर्म का पालन करते हैं तभी हम अपने शुद्धिकरण के लिए उनकी दिव्य योजना में अपनी भूमिका का निर्वहन कर सकेंगे। जब हम भक्तिपूर्ण चेतना से युक्त होकर अपना कार्य सम्पन्न करते हैं तब हमारा कार्य पूजा का रूप बन जाता है।
एक कथा जिसे मार्कण्डेय ऋषि ने महाभारत के वन पर्व में युधिष्ठिर को सुनाई थी, यह दर्शाती है कि कोई भी कर्त्तव्य अशुद्ध नहीं होता किस चेतना के द्वारा हम इसे संपन्न करते हैं, वही इसके महत्त्व को निर्धारित करती है। इस कथा में यह वर्णन किया गया है कि एक युवा संन्यासी वन में गया और वहाँ उसने दीर्घकाल तक घोर तपस्या की। कुछ वर्षों बाद एक दिन वृक्ष के ऊपर से एक कौवे का मल तपस्वी पर गिरा। उसने कौवे पर क्रोध से दृष्टि डाली और फिर कौवा पृथ्वी पर गिर कर मर गया। संन्यासी ने समझा कि उसकी तपस्या के फलस्वरूप उसमें उनके शक्तियाँ प्रकट हुई हैं। वह घमंड में चूर हो गया। कुछ समय बाद वह किसी के घर भिक्षा मांगने गया। उस घर की गृहिणी द्वार पर आई और उसने संन्यासी से कुछ समय तक प्रतीक्षा करने का अनुरोध किया क्योंकि वह अपने बीमार पति की देखभाल में लगी हुई थी। इससे संन्यासी क्रोधित हो गया और उसने उस स्त्री पर क्रोध भरी दृष्टि डाली और सोंचने लगा-"तुम जैसी नीच स्त्री ने मुझसे प्रतीक्षा करवाने का दुःसाहस कैसे किया, तुम्हें मेरी शक्तियों का ज्ञान नहीं?" भिक्षु के मन का अभिप्राय जानकर स्त्री ने उसे उत्तर दिया-"मुझे क्रोध से मत देखो, मैं कोई कौवा नहीं जो तुम्हारे दृष्टि डालने से जल जाऊंगी।" संन्यासी ने चौंककर पूछा कि वह इस घटना के संबंध में कैसे जानती है? गृहिणी ने कहा कि उसने कभी कोई तपस्या नहीं की, लेकिन उसने अपने दायित्वों का निर्वहन समर्पण भाव से किया है। इसी के बल पर वह प्रबुद्ध हुई और उसके विचारों को जानने में सक्षम हुई। उसने उस संन्यासी को धर्मात्मा व्याध से भेंट करने को कहा, जो मिथिला नगर में रहता था और यह भी कहा कि धर्म के विषय में वह उसके प्रश्न का उत्तर देगा। संन्यासी ने नीच माने जाने वाले व्याध से भेंट करने की अपनी झिझक समाप्त की और वह मिथिला पहुँचा। व्याध ने उसे समझाया कि हमारा स्वधर्म हम सबके पूर्व कर्मों और क्षमताओं पर आधारित है। यदि हम अपने स्वाभाविक कर्त्तव्य का निर्वहन करने के लिए अपनी इच्छाओं और निजी स्वार्थों का त्याग करते हैं और मार्ग में आने वाले क्षणिक सुखों और दुःखों से ऊपर उठते हैं तब हम स्वयं को शुद्ध कर सकेंगे और अध्यात्म की अगली कक्षा में प्रवेश करेंगे। अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करने व उनसे विमुख न होने से आत्मा उत्तरोत्तर अपनी स्थूल चेतना से दिव्य चेतना में उन्नति करती है। व्याध द्वारा दिए व्याख्यान को महाभारत में व्याध गीता के रूप में जाना जाता है।
यह उपदेश स्वाभाविक रूप से अर्जुन के लिए था क्योंकि वह युद्ध करने के अपने धर्म को निंदनीय समझ कर युद्ध से विमुख होना चाहता था। इस श्लोक में श्रीकृष्ण उसे उपदेश देते हैं कि समुचित चेतना में अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए वह परमेश्वर की उपासना करगा और सरलता से पूर्णता प्राप्त कर लेगा।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् || 47||
अपने धर्म का पालन त्रुटिपूर्ण ढंग से करना अन्य के कार्यों को उपयुक्त ढंग से करने की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है। अपने स्वाभाविक कर्तव्यों का पालन करने से मनुष्य पाप अर्जित नहीं करता।
जब हम अपने स्वधर्म (निश्चित व्यावसायिक कर्त्तव्य) का पालन करते हैं तब उससे दो प्रकार से लाभ होता है। पहला यह हमारी मनोवृत्ति के अनुरूप होता है। यह हमारे व्यक्तित्त्व के लिए उसी प्रकार से अनुकूल होता है जैसे किसी पक्षी का आकाश में उड़ना और मछली का जल में तैरना। पुनश्च यह मन के लिए सहज होता है जिसके परिणामस्वरूप हमारी चेतना सहजता से भक्ति में तल्लीन हो सकती है।
यदि हम अपने कर्त्तव्यों को दोषपूर्ण समझ कर उनका त्याग कर देते हैं और अपने स्वभाव के प्रतिकूल अन्य लोगों का कार्य सम्पन्न करने लगते हैं, तब हम अपने स्वाभाविक प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। अर्जुन की स्थिति एकदम ऐसी ही थी। उसका क्षत्रियोचित स्वभाव उसे सैन्य और प्रशासनिक कार्यों में प्रवृत्त करता था। परिस्थितियाँ उसे ऐसी स्थिति में ले गयी जहाँ उसके लिए धर्म की मर्यादा हेतु युद्ध में भाग लेना अनिवार्य था। यदि वह अपने कर्त्तव्य पालन से विमुख हो जाता और युद्ध क्षेत्र से भाग कर वन में तपस्या करने लगता, तब ऐसा करने पर उसे आध्यात्मिक दृष्टि से भी कोई लाभ प्राप्त नहीं होता क्योंकि वन में भी वह अपने स्वाभाविक गुणों का त्याग नहीं कर पाता। यह भी संभावना थी कि वह वन में जाकर आदिवासियों को एकत्रित कर लेता और उनका राजा बन जाता। इसकी अपेक्षा उसके लिए यह उचित होगा कि वह अपने स्वाभाविक कर्त्तव्यों का पालन करता रहे और अपने कर्मफल भगवान को समर्पित कर उनकी उपासना करे। जब कोई आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त करता है तब स्व-धर्म स्वतः परिवर्तित हो जाता है फिर यह शारीरिक स्तर पर टिका नहीं रहता बल्कि आत्मा का धर्म बन जाता है। इस अवस्था में अपने स्वाभाविक कर्तव्यों का त्याग करना और पूर्ण रूपेण भक्ति में तल्लीन होना किसी के लिए औचित्यपूर्ण हो सकता है क्योंकि अब यह उस व्यक्ति का स्व-धर्म बन जाता है। ऐसी पात्रता से युक्त लोगों के लिए श्रीकृष्ण भगवद्गीता के अंत में इस प्रकार से अपना अंतिम निष्कर्ष देते हैं-"सभी प्रकार के धर्मों का त्याग करो और केवल मेरी शरण ग्रहण करो" (18.66)। फिर भी जब तक हम उस अवस्था तक नहीं पहुंचते तब तक इस श्लोक में प्रदत्त उपदेश का पालन करना होगा। श्रीमद्भागवत पुराण में भी ऐसा वर्णन किया गया है
तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।
मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ।।
(श्रीमदभागवदम्-11.20.9)
"हमें तब तक अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए जब तक भगवान की लीलाओं के श्रवण-कीर्तन और स्मरण द्वारा हमारे मन में भगवान की भक्ति के प्रति रुचि विकसित न हो जाए।"
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् |
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता: || 48||
किसी को भी अपने स्वभाविक कर्त्तव्यों का परित्याग नहीं करना चाहिए चाहे उनमें दोष भी क्यों न हो। हे कुन्ती पुत्र! वास्तव में सभी प्रकार के कर्म कुछ न कुछ बुराई से आवृत रहते हैं जैसे आग धुंए से ढकी रहती है।
कभी-कभी लोग कर्त्तव्य पालन से इसलिए पीछे हटते हैं क्योंकि वे इनमें दोष देखते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि कोई भी कार्य दोष रहित नहीं है जैसे धुआँ स्वाभाविक रूप से अग्नि के ऊपर रहता है। उदाहरणार्थ हम लाखों जीवाणुओं की हत्या किए बिना श्वास नहीं ले सकते। जब हम कृषि के लिए खेत जोतते हैं तब हम असंख्य सूक्ष्म जीवों को नष्ट करते हैं। जब हम व्यापार में प्रतिस्पर्धा करते हुए सफलता प्राप्त करते हैं तब हम अन्य लोगों को धन सम्पदा से वंचित करते हैं। जब हम भोजन करते हैं तब हम दूसरों को भोजन से वंचित करते हैं। चूँकि स्व-ध म क्रियाशीलता पर बल देता है इसलिए यह दोषों से रहित नहीं हो सकता। लेकिन स्व-धर्म के लाभ उसके दोषो से कहीं अधिक हैं। इसके लाभ का उदाहरण मार्क अलिबयन जो हार्वड बिजनेस स्कूल के प्राध्यापक थे ने 'मेकिंग ए लाइफ, मेकिंग ए लिविंग' नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपने एक अध्ययन में वर्ष 1960 से 1980 तक की अवधि के दौरान एक विद्यालय के पन्द्रह सौ स्नातकों के भविष्य को परखा। स्नातकों के दो समूह बनाये गये। 'क' श्रेणी में उन स्नातकों को रखा गया जो पहले धन सम्पदा अर्जित करना चाहते थे ताकि वे बाद में उन कार्यों को बाद में संपन्न कर सकें जो उनकी इच्छा के अनुरूप थे। इस श्रेणी में 83 प्रतिशत स्नातक सम्मिलित हुए। 'ख' श्रेणी का चयन उन स्नातकों ने किया जिन्होंने सर्वप्रथम अपनी रुचि और हित के कार्यों की ओर ध्यान दिया और उसी के अनुरूप प्रयास किए क्योंकि वे पूर्ण रूप से आश्वस्त थे कि इससे धन संपदा अपने आप प्राप्त होगी। 'ख' श्रेणी में सत्रह प्रतिशत स्नातक सम्मिलित हुए थे। बीस वर्षों के पश्चात् एक सौ बीस लोग करोड़पति बनें जिनमें से केवल एक 'क' श्रेणी के स्नातकों में था, जो पहले धनोपार्जन करना चाहते थे और एक सौ स्नातक 'ख' श्रेणी के थे जिन्होंने सर्वप्रथम अपनी रुचि के अनुसार कार्य संपन्न किए थे। अत्यधिक संख्या में धनवान बने लोगों ने अपने कार्यों के प्रति कृतज्ञता और निष्ठा प्रकट की। जिन्हें सम्पन्न करने में वे तल्लीन रहे। मार्क अलिबयन ने निष्कर्ष निकाला कि अधिकतर लोग यह समझते हैं कि काम और मनोरंजन के बीच में अंतर है। लेकिन यदि वे अपनी पसंद का कार्य करते हैं तब कार्य मनोरंजन बन जाता है और फिर उन्हें अपने जीवन में कभी अपने काम को टालना नहीं पड़ता। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को ऐसे काम को करने और उसका त्याग न करने का उपदेश देते हैं जो उसके स्वभाव के अनुकूल हो, भले ही वह दोषपूर्ण ही क्यों न हो। लेकिन कार्य को समुचित चेतना के साथ सम्पन्न किया जाना चाहिए जिसका वर्णन अगले श्लोक में किया जाएगा।
असक्तबुद्धि: सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृह: |
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति || 49||
वे जिनकी बुद्धि सदैव अनासक्त रहती है, जिन्होंने अपने मन को वश में कर लिया है जो वैराग्य के अभ्यास द्वारा कामनाओं से मुक्त हो जाते हैं, वे कर्म से मुक्ति प्राप्त करते हैं।
इस अंतिम अध्याय में श्रीकृष्ण ने पूर्व्वर्णित कई सिद्धान्तों को दोहराया है। इस अध्याय के आरम्भ में उन्होंने अर्जुन को समझाया था कि जीवन के उत्तरदायित्व से विमुख होना न तो संन्यास है और न ही त्याग है। अब वे अकर्मण्यता की अवस्था या नैष्कर्म्यसिद्धि का वर्णन करते हैं। इस अवस्था को संसार के बीच में रहते हुए भी स्वयं को घटनाओं और परिणामों से विरक्त रख कर अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए प्राप्त किया जा सकता है। यह उसी प्रकार से है जैसे एक पुल के नीचे से बहने वाला पानी एक ओर से प्रवेश करता है और दूसरी ओर निकल जाता है। पुल न तो जल को प्राप्त करता है और न ही इसका वितरक होता है। उसी प्रकार से कर्मयोगी अपने कर्तव्य का निर्वहन करतें हैं लेकिन अपने मन को घटनाओं के प्रवाह से अप्रभावित रखते हैं। वे अपने कर्तव्य का भली भांति निर्वहन करने के लिए उत्कृष्ट प्रयास करते हुए उन्हें भगवान की आराधना के रूप में देखते हैं लेकिन वे अंतिम निर्णय भगवान पर छोड़ देते हैं और इस प्रकार से जो भी घटित होता है, उससे संतुष्ट और अविचलित रहते हैं।
यहाँ इस विषय को एक सरल कथा द्वारा स्पष्ट किया जाता है। एक व्यक्ति की दो पुत्रियाँ थी। एक का विवाह किसान के साथ हुआ था और दूसरी का विवाह ईंट के भट्टे के मालिक से हुआ था। एक दिन पिता ने अपनी पहली पुत्री से पर बातचीत की और यह पूछा कि वह कैसी है? उसने उत्तर दिया-"पिताजी हम आर्थिक कठिनाइयों में जीवन निर्वाह कर रहे हैं। कृपया भगवान से प्रार्थना करें कि आने वाले महीनों में अच्छी वर्षा हो।" इसके बाद उस व्यक्ति ने अपनी दूसरी पुत्री को फोन किया तब उसकी पुत्री ने बताया-"हम आर्थिक तंगी में है कृपया भगवान से यह प्रार्थना करें कि इस वर्ष वर्षा न हो ताकि सूर्य की तेज धूप निकलने से ईटों का अधिक उत्पादन हो सके।" पिता ने दोनों पुत्रियों की एक दूसरे से विपरीत प्रार्थनाओं को सुना और सोंचा-"केवल भगवान ही जानता है कि क्या अच्छा है। इसलिए उसे जो अच्छा लगे वही करे।" भगवान की ऐसी इच्छाओं को स्वीकार करने से संसार में निरन्तर घट रही घटनाओं की धारा में मग्न होने के बाबजूद भी हमारे भीतर कर्म-फलों के प्रति विरक्ति उत्पन्न होगी।
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे |
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा || 50||
हे अर्जुन! अब मैं तुम्हें यह समझाऊंगा कि जो सिद्धि प्राप्त कर चुका है वह भी दृढ़ता से दिव्य ज्ञान में स्थित होकर कैसे ब्रह्म को भी पा सकता है।मुझसे संक्षेप में सुनो।
सैद्धांतिक ज्ञान को समझना एक विषय है लेकिन उसे व्यवहार में लाना अलग विषय है। यह कहा जाता है कि अच्छे विचार कौड़ियों के भाव मिलते हैं लेकिन यदि हम इन्हें व्यवहार में नहीं लाते तब यह व्यर्थ ही है। सैद्धांतिक ज्ञान से युक्त पंडितों को शास्त्रों का ज्ञान कंठस्थ हो सकता है किन्तु फिर भी वे उसकी वास्तविक अनुभूति से वंचित रहते हैं। दूसरी ओर एक कर्मयोगी को प्रतिदिन शास्त्रों के सत्य का आभास करने का अवसर प्राप्त होता है। इस प्रकार से कर्मयोग के निरन्तर पालन के परिणामस्वरूप आध्यात्मिक ज्ञान की अनुभूति होती है और जब कोई कार्य करते हुए नैष्कर्म्यसिद्धि या अकर्मण्यता प्राप्त करता है तब उसे दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। इस ज्ञान में स्थित होकर कर्मयोगी भगवत्प्राप्ति करते हैं। ऐसा कैसे होता है? श्रीकृष्ण इसकी व्याख्या अगले कुछ श्लोकों में करेंगे।
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च |
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च || 51||
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस: |
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रित: || 52||
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् |
विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते || 53||
कोई भी मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है जब वह विशुद्ध बुद्धि और दृढ़ता से इन्द्रियों को संयत रखता है, शब्द और अन्य विषयों का परित्याग करता है, राग और द्वेष को दूर रखता है। ऐसा व्यक्ति जो एकांत वास करता है, अल्प भोजन करता है, शरीर, मन और वाणी पर नियंत्रण रखता है, सदैव ध्यान में लीन रहता है, वैराग्य का अभ्यास करता है, अहंकार, अहिंसा, अभिमान, कामनाओं, स्वामित्व की भावना और स्वार्थ से मुक्त रहता है और जो शांति में स्थित है वह ब्रह्म के साथ एक होने का अधिकारी है।
श्रीकृष्ण यह समझा रहे हैं कि समुचित चेतना में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने से हम सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। अब वे भगवत्प्राप्ति के लिए आवश्यक तत्त्वों का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि भगवत्प्राप्ति की अवस्था में हमारी बुद्धि शुद्ध होकर दिव्य ज्ञान में स्थित हो जाती है। पसंद और नापसंद में लिप्त न होने से मन वश में हो जाता है। इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं और वाणी तथा शरीर के आवेग नियंत्रित हो जाते हैं। शरीर की क्रियाएँ जैसे भोजन ग्रहण करना और निद्रा आदि संतुलित हो जाती हैं। मन को निरंतर भगवत्विषयों में तल्लीन करने वाला योगी अत्यंत शांत होता है और कामनाओं के बंधनों, क्रोध और लोभ से मुक्त रहता है। ऐसा योगी परम ब्रह्म को प्राप्त करता है।
ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ् क्षति |
सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् || 54||
परम ब्रह्म में स्थित मनुष्य शांति प्राप्त करता है, वह न तो शोक करता है और न ही कोई कामना करता है। वह सभी के प्रति समभाव रखता है, ऐसा परम योगी मेरी भक्ति को प्राप्त करता है।
यहाँ श्रीकृष्ण भगवत्प्राप्ति की अवस्था के विवरण का समापन करते हैं। ब्रह्मभूतः शब्द का अर्थ ब्रह्म की अनुभूति की अवस्था है। उसमें स्थित होकर मनुष्य प्रसन्नात्मा हो जाता है अर्थात् कष्टदायक अनुभवों से अप्रभावित रहता है। 'न शोचति' का अर्थ यह है कि न तो किसी प्रकार का शोक करना है और न ही किसी प्रकार की अपूर्णता का अनुभव करना है। 'न काङ्क्षति' का अर्थ किसी व्यक्ति द्वारा अपने सुखों को पाने के लिए भौतिक पदार्थों की लालसा न करना है। ऐसा योगी सभी को समान दृष्टि से देखता है और सभी में ब्रह्म का अनुभव करता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य परम ज्ञान की अवस्था में स्थित हो जाता है। हालांकि श्रीकृष्ण इस श्लोक को एक अनोखा मोड़ में समाप्त करते हैं। वे कहते हैं कि ज्ञान की इस अवस्था को प्राप्त करने के पश्चात् मनुष्य 'परा भक्ति' अर्थात् भगवान का दिव्य प्रेम प्राप्त करता है। ज्ञानी प्रायः कहते हैं कि भक्ति केवल भगवद् अनुभूति के मध्यवर्ती उपाय के रूप में की जानी चाहिए। उनके अनुसार भक्ति केवल अंतःकरण की शुद्धि करती है और अंत में केवल ज्ञान रह जाता है। इसलिए वे यह तर्क देते हैं कि जो दृढ़ बुद्धि से युक्त होते हैं वे भक्ति की उपेक्षा करते हैं और केवल ज्ञान को पोषित करते हैं लेकिन यह श्लोक ऐसे विचार का निषेध करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मज्ञान की अनुभूति होने के बाद परा भक्ति विकसित होती है। वेदव्यास ने श्रीमद्भागवतम् में इसी प्रकार की व्याख्या की है।
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकी भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः।।
(श्रीमद्भागवतम् -1.7.10)
"वे ज्ञानी पुरूष जो 'आत्माराम' हैं अर्थात् जो अपनी आत्मा में रमण करते हैं, आत्म ज्ञान में स्थित होते हैं और माया के बंधनों से मुक्त होते हैं। वे भी भगवान की भक्ति प्राप्त करने की इच्छा रखती हैं। भगवान वे मुक्त आत्माओं को भी आकर्षित करते हैं।" अनेक ज्ञानियों के उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया था और निराकार ब्रह्म के ध्यान में स्थित हो गए थे किन्तु जब उन्होंने भगवान के दिव्य गुणों की झलक देखी तब वे स्वाभाविक रूप से भक्ति की ओर आकर्षित हुए। प्रत्येक युग के ऐसे ज्ञानियों के उदाहरण इस प्रकार से हैं-
ब्रह्मा के चार पुत्र-सनत्कुुमार कुमार, सनातन कुमार, सनक कुमार और सनंदन कुमार सतयुग के महान ज्ञानी थे। वे जन्म से ही आत्मज्ञानी थे और सदैव निराकार ब्रह्मानंद में निमग्न रहते थे। जब चारों कुमार एक बार भगवान विष्णु के बैकुण्ठ लोक में गए, तब भगवान के चरणारविंद से मिली हुई तुलसी की पत्तियों की सुगंध से सुवासित वायु ने उनके नाक में प्रवेश किया, जिससे उनका हृदय रोमांचित हुआ और तत्क्षण उनकी निर्गुण ब्रह्म में लीन समाधि टूट गयी और वे भगवान विष्णु के दिव्य प्रेम में निमज्जित हो गये। उन्होंने भगवान से वरदान देने की प्रार्थना करते हुए कहा-
कामं भवः स्ववृजिनैर्निरयेषु नः स्ता
च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत।
(श्रीमदभागवत-3.15.49)
"हे भगवान, यदि हमारे मन को आपके चरण कमलों से निर्गत दिव्य प्रेमानंद का रसपान करने का अवसर प्राप्त होता रहे तब आप चाहे हमें नरकादि योनियों में भी क्यों न भेज दें। इसकी भी हमें कोई चिंता नहीं है।" जरा विचार करें कि निराकार ब्रह्म की अनुभूति होने के पश्चात् भी इन महान ज्ञानियों ने भगवान के साकार रूप का आनंद प्राप्त करने के लिए नरक में निवास करने की इच्छा व्यक्त की थी। अब त्रेता युग पर दृष्टि डाली जाए। इस युग के सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी राजा जनक थे। वह के पिता थे जो भगवान राम की प्रिया थीं। राजा जनक विदेह के नाम से भी जाने जाते हैं क्योंकि वह दैहिक चेतना से एकदम परे थे। उनका मन सदैव निराकार और निर्गुण ब्रह्म में तल्लीन रहता था। एक दिन विश्वामित्र ऋषि भगवान राम और लक्ष्मण के साथ उनके महल में गए। उस समय क्या घटित हुआ इसका रामचरितमानस में अति सुंदरता से वर्णन किया गया है
इनहिँ बिलोकत अति अनुरागा, बरबस ब्रह्मसुखहिँ मन त्यागा।
(रामाचरितमानस)
भगवान राम को देख कर राजा जनक की निराकार ब्रह्मानंद से विरक्ति हो गई और उनके भीतर परमेश्वर के साकार रूप के लिए गहन प्रीति उत्पन्न हो गयी।" इस प्रकार से त्रेता युग के महान ज्ञानी राजा जनक ने भी भक्ति के मार्ग को स्वीकार किया।
द्वापर युग के महाज्ञानी शुकदेव वेदव्यास ऋषि के पुत्र थे। पुराणों में वर्णन है कि वे इतने सिद्ध थे कि बारह वर्षों तक यह सोच कर अपनी माँ के गर्भ में रहे कि बाहर आने पर माया शक्ति उन पर हावी हो जाएगी।
अंत में नारद मुनि ने आकर उनकी माँ के कान में उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि ऐसा कुछ नहीं होगा और उन्हें अब गर्भ से बाहर निकलना चाहिए। अंततः वह अपनी योग शक्ति द्वारा गर्भ से बाहर आए और उन्होंने बारह वर्ष की आयु के समान अपने शरीर का विस्तार कर लिया और गृहस्थी को त्याग कर वन में रहने लगे। यहाँ वह शीघ्र ही निर्विकल्पक समाधि की अवस्था में पहुंच गए। कुछ वर्षों के पश्चात् जब वेदव्यास के कुछ शिष्य वन में लकड़ियाँ काट रहे थे तब उन्होंने शुकदेव को समाधि की अवस्था में देखा। उन्होंने वापस जाकर ऋषि वेदव्यास को सारा वृतांत सुनाया तब उन्होंने शुकदेव के कान में यह श्लोक सुनाने को कहा जिसमें श्रीकृष्ण के साकार रूप के सौंदर्य का वर्णन है-
बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं
बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।
रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै
वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.21.5)
"श्रीकृष्ण के सिर पर मोरपंखी मुकुट सुशोभित है और उनका भेष एक श्रेष्ठ नर्तक के समान दिख रहा है। उनके कान पीले-पीले पुष्पों से सुशोभित हो रहे हैं। उन्होंने गले में सुगंधित पुष्पों से बनी वैजयंती माला पहन रखी है। बांसुरी के छिद्रों में वे अपने अधरों से अमृत भर रहे हैं। उनके पीछे-पीछे ग्वाल बाल उनकी कीर्ति का गान कर रहे हैं और उनके पद चिह्नों से वृन्दावन अति रमणीय स्थान बन गया है।" शुकदेव ने जब भगवान के अनुपम सौंदर्य को सुना तब यह विचार किया कि ऐसे सौंदर्यशाली भगवान उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए वह पुनः समाधि में लीन हो गए। शिष्यों ने लौटकर ऋषि वेदव्यास को इसकी जानकारी दी तब वेदव्यास ने उन्हें एक अन्य श्लोक शुकदेव के कानों में पुनः सुनाने को कहा-
पूतना लोकबालघ्नी राक्षसी रुधिराशना।
जिघांसयापि हरये स्तनं दत्त्वाऽऽप सद्गतिम्।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.6.35)
"श्रीकृष्ण इतने दयालु हैं कि उन्होंने अपने स्तन से विष पिलाने वाली पूतना का उद्धार करके उसे अपने लोक में भेज दिया।" उपर्युक्त श्लोक जब शुकदेव के कानों में प्रविष्ट हुआ उस समय वे निराकार ब्रह्म के ध्यान में लीन थे। अचानक उनका चित्त भगवान कृष्ण की महिमा के गुणगान में लीन हो गया। वे भगवान के साकार रूप के दिव्य आनंद में इतने मगन हो गए कि वे समाधि से उठकर अपने पिता वेदव्यास के पास आए। वहाँ उन्होंने उनसे श्रीमद्भागवतम् का श्रवण किया जो भक्ति से परिपूर्ण है। बाद में गंगा के तट पर उन्होंने इसे अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित को सुनाया। इस प्रकार से द्वापरयुग के महाज्ञानी शुकदेव भी भक्ति के पथ की ओर अग्रसर हुए।
जगद्गुरु शंकराचार्य को कलियुग का महान ज्ञानी माना जाता है। अद्वैतवाद का व्यापक रूप से प्रचार करके उन्होंने अद्वितीय ख्याति प्राप्त की। इसमें उन्होंने कहा कि केवल एक ही सत्ता है और वह निर्गुण, निर्विशेष और निराकार ब्रह्म है। हालांकि इस तथ्य से इससे अनभिज्ञ हैं कि 20 वर्ष से 32 वर्ष की आयु तक उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण, भगवान राम, दुर्गा माता आदि की स्तुति सैकड़ों श्लोक लिखे। इसके अतिरिक्त उन्होंने भारत के चारों कोनों में स्थित चारों धामों का दर्शन किया और सभी में भगवान के साकार रूप की पूजा की। प्रबोध सुधाकर में उन्होंने इस प्रकार से उल्लेख किया-
काम्योपासनायार्थयन्त्यनुदिनं किञ्चितफलं स्वेप्सितं
केचित् स्वर्गमथापवर्गमपरे योगादियज्ञादिभिः।
अस्माकं यदुनन्दनाङ्घ्रियुगलध्यानावधा - नार्थिनाम्
किं लोकेन दमेन किं नृपतिना स्वर्गापवगैर्श्च किम्।।
(श्लोक 250)
"वे जो स्वर्गलोक की प्राप्ति हेतु पुण्य कर्म करते हैं, वे ऐसा कर सकते हैं। वे जो ज्ञानमार्ग या अष्टांग योग के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करना चाहें, वे भी अपने मार्ग का करें। किंतु, मैं इन दोनों मार्गो की इच्छा नहीं करता। मैं केवल श्रीकृष्ण के चरण कमलों के अमृत में स्वयं को डुबोना चाहता हूँ। मैं संसारिक और स्वर्ग के सुखों की कामना नहीं करता हूँ और न ही मेरी मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा है। मैं एक रसिक हूँ जो भगवान के दिव्य प्रेम से आनंदित होता है।" वास्तव में शंकराचार्य भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। उन्होंने अपने भाष्यों में जो उपदेश दिए वह तत्कालीन युग की आवश्यकता थी। जब वे पृथ्वी पर प्रकट हुए तब पूरे भारत वर्ष में बौद्ध धर्म प्रचलित था। ऐसे दौर में बौद्धों का वेदों में विश्वास पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए उन्होंने अपने भाष्य में भक्ति का उल्लेख नहीं किया। लेकिन बाद में उन्होंने अनेक स्तुतियों में भगवान के साकार रूप का सुन्दर वर्णन किया और अपनी आंतरिक भक्ति को प्रकट किया। इस प्रकार से शंकराचार्य कलियुग में एक ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने ज्ञान की सर्वोत्तम अवस्था प्राप्त की थी और बाद में उन्होंने भक्ति भी की।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत: |
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् || 55||
मेरी प्रेममयी भक्ति द्वारा ही कोई मुझे वास्तविक रूप में जान पाता है। तब सत्य के रूप में मुझे जानकर मेरा भक्त मेरे पूर्ण चेतन स्वरूप को प्राप्त करता है।
श्रीकृष्ण ने पिछले श्लोक में कहा था कि दिव्य ज्ञान में स्थित होकर ही कोई भक्ति को कर सकता है। अब वे कहते हैं कि केवल भक्ति द्वारा ही कोई भगवान के वास्तविक स्वरूप को जान सकता है। ज्ञानी को पहले निर्गुण, निर्विशेष और निराकार रूप में भगवान की अनुभूति हो चुकी होती है लेकिन ज्ञानी को भगवान के साकार रूप की अनुभूति नहीं होती। इसका कारण यह है कि भगवान के साकार रूप को कर्म, ज्ञान और अष्टांग योग द्वारा जाना नहीं जा सकता। यह प्रेम ही है जो इनकी अनुभूति का द्वार खोलता है। श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं कि भगवान के रूप, गुण, लीलाओं, धामों और संतो के रहस्य को केवल शुद्ध भक्ति द्वारा ही समझा जा सकता है। केवल भक्त ही भगवान को जान पाते हैं क्योंकि वे प्रेम चक्षुओं से युक्त होते हैं। पद्मपुराण में इसी के संबंध में एक सुन्दर उदाहरण दिया गया है। जाबालि नाम के एक ऋषि ने अत्यंत तेजस्विनी और शांत कन्या को वन में ध्यान में मग्न देखा। ऋषि ने उससे अपनी पहचान प्रकट करने और तपस्या का प्रयोजन बताने का अनुरोध किया। उस कन्या ने इसका इस प्रकार से उत्तर दिया-
ब्रह्मविद्याह्मतुला योगींद्रैर्या च मृग्यते ।
साहं हरिपदाम्भोजकाम्यया सुचिरं तपः।।
चराम्यस्मिन् वने घोरे ध्यायन्ती पुरुषोत्तमम्।
ब्रह्मानन्देन पूर्णाहं तेनानन्देन तृप्तधीः।।
तथापि शून्यमात्मानं मन्ये कृष्णरतिं विना ।
(पद्मपुराण)
"मैं ब्रह्म विद्या हूँ। महान योगी और तपस्वी मुझे जानने के लिए कठोर तपस्या करते हैं लेकिन मैं स्वयं साकार भगवान के चरण कमलों में प्रेम विकसित करने के लिए घोर तपस्या कर रही हूँ। मैं परिपूर्ण हूँ और ब्रह्म के आनन्द से तृप्त हूँ। फिर भी भगवान कृष्ण के अनुराग के बिना मैं स्वयं को शून्य समझती हूँ।" इसलिए भगवान के साकार रूप के आनन्द में निमज्जित होने के लिए केवल ज्ञान ही पर्याप्त नहीं होता। भक्ति द्वारा ही कोई इस रहस्य को जान सकता है तथा भगवान को प्राप्त कर सकता है।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय: |
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् || 56||
मेरे भक्त सभी प्रकार के कार्यों को करते हुए भी मेरी पूर्ण शरण ग्रहण करते हैं। तथा वे मेरी कृपा से मेरा नित्य एवं अविनाशी धाम प्राप्त करते हैं।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह व्याख्या की थी कि भक्ति द्वारा भक्त उन्हें प्राप्त करते हैं। वे सभी में भगवान के संबंध को स्वीकार करते हैं। वे भौतिक संपत्तियों को भगवान की संपत्ति के रूप में देखते हैं। वे सभी जीवों को भगवान के अभिन्न अंग के रूप में देखते हैं और स्वयं को भगवान का तुच्छ सेवक समझते हैं। इस दिव्य चेतना में वे कर्मों का त्याग नहीं करते बल्कि वे कर्ता और कर्म का भोक्ता होने के अहम् का त्याग करते हैं। वे सभी कार्यों को परमेश्वर की सेवा के रूप में देखते हैं और उनके सम्पादन के लिए भगवान का आश्रय लेते हैं। तथा अपने शरीर का त्याग करके वे भगवान के दिव्य लोक में जाते हैं। जिस प्रकार भौतिक क्षेत्र माया शक्ति से निर्मित होता है, उसी प्रकार से आध्यात्मिक क्षेत्र योगमाया शक्ति से बना है। इसलिए यह सभी प्रकार के मायिक दोषों से मुक्त होता है। यह सत्, चित् और आनंद होता है अर्थात् नित्य या अविनाशी, सर्वज्ञ और आनन्द से परिपूर्ण होता है। अपने दिव्य धाम के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने 15वें अध्याय के छठे श्लोक में कहा था, "न तो सूर्य, न चन्द्रमा और न ही अग्नि मेरे दिव्य लोक को प्रकाशित कर सकती है। एक बार वहाँ जाने के पश्चात् कोई पुनः संसार में लौट कर नहीं आता।"
आध्यात्मिक क्षेत्र में भगवान के विभिन्न स्वरूपों के अपने निजी लोक हैं जहाँ वे अपने भक्तों के साथ नित्य मधुर लीलाएँ करते हैं। वे जो उनकी नि:स्वार्थ सेवा करते हैं, वे अपने आराध्य भगवान के स्वरूप वाले लोक में जाते हैं। इस प्रकार से भगवान श्रीकृष्ण के भक्त गोलोक को जाते हैं। विष्णु भगवान के भक्त वैकुण्ठ लोक, भगवान श्रीराम के भक्त साकेत लोक, भगवान शिव की आराधना करने वाले शिव लोक और माता दुर्गा के भक्त देवी लोक में जाते हैं। वे भक्त जो भगवान को प्राप्त कर उनके दिव्य लोकों में प्रवेश करते हैं वे उनकी ऐसी दिव्य लीलाओं में भाग लेते हैं।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पर: |
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: सततं भव || 57||
अपने सभी कर्म मुझे समर्पित करो और मुझे ही अपना लक्ष्य मानो। बुद्धियोग का आश्रय लेकर अपनी चेतना को सदैव मुझमें लीन रखो।
योग का अर्थ 'जुड़ना' है और बुद्धियोग का अर्थ 'बुद्धि को भगवान के साथ एकीकृत करना' है। बुद्धि का यह एकीकरण तब होता है जब यह दृढ़ विश्वास हो जाए कि जो भी कुछ अस्तित्त्व में है वह सब कुछ भगवान से उत्पन्न हुआ है और उसी से संबद्ध है, तथा उसी की संतुष्टि के लिए है। आइए अब हम अपनी संरचना में बुद्धि की स्थिति को समझें। हमारे शरीर में एक अंत:करण है जिसे आम बोलचाल की भाषा में हृदय भी कहा जाता है। इसके चार स्वरूप हैं। जब इसमें विचार उत्पन्न होते हैं तब हम इसे मन कहते हैं। जब यह विश्लेषण करता है और निर्णय लेता है तब इसे बुद्धि कहा जाता है। जब यह किसी विषय या व्यक्ति में आसक्त हो जाता है तब हम इसे चित्त कहते हैं और जब यह अपनी पहचान शरीर के गुणों के साथ करता है और अभिमानी हो जाता है तब इसे अहंकार कहते हैं।
इस आंतरिक तंत्र में बुद्धि का स्थान प्रमुख होता है। यह निर्णय लेती है जबकि मन इसके निर्णयों के अनुसार कामनाएँ उत्पन्न करता है और चित्त अनुराग के विषयों में आसक्त हो जाता है। उदाहरणार्थ यदि बुद्धि यह निर्णय करती है कि सुरक्षा ही अति महत्वपूर्ण है तब मन सदैव जीवन की सुरक्षा की चिन्ता करता है। प्रतिदिन हम अपनी बुद्धि से मन को नियंत्रित करते हैं। इसलिए हमारा क्रोध अधोगामी होता है। अधिकारी निर्देशक पर चिल्लाता है लेकिन इसकी प्रतिक्रिया में निर्देशक उस पर नहीं चिल्लाता क्योंकि बुद्धि को यह बोध होता है कि इससे उसकी जीविका छिन जाएगी और वह अपना क्रोध प्रबंधक पर निकालता है। प्रबंधक निर्देशक के साथ झगड़ा नहीं करता। उसे फोरमैन पर चिल्लाने से राहत मिलती है। फोरमैन अपना सारा क्रोध श्रमिक को डांट कर निकालता है। श्रमिक अपनी कुंठा पत्नी पर उतारता है। पत्नी बच्चों पर चिल्लाती है। अतः प्रत्येक स्थिति में हम देखते हैं कि कहाँ क्रोध करना हानिकारक होता है और कहाँ नहीं। उपर्युक्त उदाहरण यह दर्शाते हैं कि हमारी बुद्धि में मन को नियंत्रित करने की क्षमता होती है। इसलिए हमें अपनी बुद्धि को उपयुक्त ज्ञान के साथ पोषित करना चाहिए और इसका प्रयोग इस प्रकार से करना चाहिए कि यह मन को उचित दिशा की ओर जाने के लिए मार्गदर्शन प्रदान कर सके। इस प्रकार से श्रीकृष्ण का बुद्धियोग से अभिप्राय दृढ़ निश्चय को इस प्रकार से विकसित करने से है कि सभी पदार्थ भगवान के सुख के लिए हैं। निश्चयात्मक बुद्धियुक्त ऐसे मनुष्य का चित्त सरलता से भगवान में अनुरक्त हो जाता है।
मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि |
अथ चेत्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि || 58||
यदि तुम सदैव मेरा स्मरण करते हो तब मेरी कृपा से तुम सभी कठिनाइयों और बाधाओं को पार कर लोगे। यदि तुम अभिमान के कारण मेरे उपदेश को नहीं सुनोगे तब तुम्हारा विनाश हो जाएगा।
पिछले श्लोक में अर्जुन को क्या करना चाहिए इसका उपदेश देने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब उनके उपदेशों का अनुसरण करने और अनुसरण न करने के परिणामों का वर्णन करते हैं। जीवात्मा को यह नहीं सोंचना चाहिए कि वह भगवान से से स्वतंत्र है। यदि हम मन को भगवान में स्थिर करके भगवान की पूर्ण शरणागति ग्रहण करते हैं तब उनकी कृपा से सभी प्रकार की कठिनाइयों और बाधाओं का समाधान हो जाएगा। यदि हम अभिमान के कारण भगवान के उपदेशों की अवहेलना करते हैं और यह सोचते हैं कि हम भगवान और शास्त्रों के ज्ञान की अपेक्षा अधिक जानते हैं तब हम मानव जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल हो जाएंगे क्योंकि न तो कोई भगवान से श्रेष्ठ है और न ही कोई उपदेश भगवान के उपदेश की तुलना में श्रेष्ठ है।
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे |
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति || 59||
यदि तुम अहंकार से प्रेरित होकर यह सोचते हो कि “मैं युद्ध नहीं लड़ूँगा' तो तुम्हारा निर्णय निरर्थक हो जाएगा। तुम्हारा स्वाभाविक क्षत्रिय धर्म तुम्हें युद्ध लड़ने के लिए विवश करेगा।
यहाँ श्रीकृष्ण चेतावनी भरे वचन बोलते हैं। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने के लिए पूर्णरूप से स्वतंत्र हैं। आत्मा एक स्वतंत्र भूमिका का निर्वहन नहीं कर सकती। यह भगवान की सृष्टि पर आश्रित है। यह प्रकृति के तीन गुणों के प्रभाव में रहती है। गुणों के संयोजन से हमारा स्वभाव बनता है और इसके प्रभाव के अनुसार हम कार्य करने के लिए बाध्य होते हैं। इसलिए हम यह कहने के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं है कि "मैं वैसा करूंगा जैसी मेरी इच्छा होगी।" हमें भगवान और शास्त्रों के उपदेशों तथा अपनी प्रकृति के अनुसार श्रेष्ठ का चयन करना चाहिए। इस संदर्भ में एक छोटा सा कथानक इस प्रकार से है। तीस वर्षों की सेवा अवधि पूरी करने के पश्चात् एक सेवानिवृत्त सैनिक लौट कर अपने घर आया।
एक दिन वह कॉफी की दुकान पर खड़ा होकर काफी का सेवन कर रहा था। तब उसके मित्र को एक उपहास सूझा। वह पीछे से चिल्लाया 'सावधान'। आदेश पर प्रतिक्रिया दर्शाना सैनिक के स्वभाव का अंग बन चुका था। उसने अनायास अपने हाथों से कप नीचे फेंक दिया और अपने दोनों हाथों को अपने बगल में करके वह सावधान मुद्रा में खड़ा हो गया। श्रीकृष्ण अर्जुन को चेतावनी देते हैं कि स्वभाव से वह एक योद्धा है और यदि वह अहम् के कारण उनके उपदेश को सुनने और उसका अनुपालन करने का निर्णय नहीं करता तब भी उसका क्षत्रिय धर्म उसे युद्ध लड़ने के लिए विवश करेगा।
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्ध: स्वेन कर्मणा |
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् || 60||
हे अर्जुन! मोहवश जिस कर्म को तुम नहीं करना चाहते उसे तुम अपनी प्रवृत्ति से बाध्य होकर करोगे।
अपने चेतावनी भरे शब्दों में श्रीकृष्ण पुनः पिछली बात पर प्रकाश डालते हैं। वे कहते हैं-"अपने पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण तुम क्षत्रिय हो।" महानायक, शूरवीरता और देशभक्ति जैसे तुम्हारे जन्मजात गुण तुम्हें युद्ध लड़ने के लिए बाध्य करेंगे। इसलिए योद्धा के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए तुम्हें पूर्व जन्म और इस जन्म में प्रशिक्षित किया गया है। क्या यह संभव है कि तुम अपनी आंखों के सामने दूसरों पर अन्याय होता देखकर अकर्मण्य हो जाओगे? तुम्हारा धर्म और तुम्हारी प्रकृति ऐसी है कि तुम जहाँ भी बुराई को देखोगे उसका प्रबलता से विरोध करोगे, इसलिए तुम्हारे लिए यही लाभकारी है कि तुम अपने स्वभाव से बाध्य होकर कार्य करने के स्थान पर मेरे उपदेशों के अनुसार कर्म करो।
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति |
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया || 61||
हे अर्जुन! परमात्मा सभी जीवों के हृदय में निवास करता है। उनके कर्मों के अनुसार वह माया द्वारा निर्मित यंत्र पर सवार आत्माओं को निर्देशित करता है।
आत्मा की परतंत्रता पर बल देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं-"अर्जुन! भले ही तुम मेरी आज्ञा का पालन करो या न करो, तुम्हारी स्थिति सदैव मेरे अधीन रहेगी। जिस शरीर में तुम रहते हो वह यंत्र मेरी माया शक्ति से निर्मित है। तुम्हारे पूर्व जन्मों को पात्रता के अनुसार तुम्हें मैंने शरीर प्रदान किया है। मैं इसमें स्थित रहता हूँ और तुम्हारे विचारों, शब्दों, और कर्मों का लेखा-जोखा रखता हूँ। इस प्रकार से वर्तमान में जो कर्म तुम करते हो उसका आंकलन करते हुए मैं तुम्हारे भविष्य का निर्णय करता हूँ। यह मत सोंचा कि तुम मुझसे किसी भी प्रकार से स्वतंत्र हो। इसलिए अर्जुन तुम्हारे हित में यही है कि तुम मेरी शरण ग्रहण करो।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत |
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् || 62||
हे भारत! पूर्ण अनन्य निष्काम से केवल उसकी शरण ग्रहण करो। उसकी कृपा से तुम पूर्ण शांति और उसके नित्यधाम को प्राप्त करोगे।
भगवान पर निर्भरता के कारण आत्मा को अपनी वर्तमान दुर्दशा से बाहर निकलने और चरम लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उनकी कृपा पर आश्रित होना चाहिए। इसके लिए स्वयं का प्रयास कभी पर्याप्त नहीं हो सकता। यदि भगवान अपनी कृपा प्रदान करते हैं तब वे जीवात्मा को अपना दिव्य ज्ञान प्रदान कर उसे माया शक्ति के बंधन से मुक्त कर देते हैं। श्रीकृष्ण बल देते हुए कहते हैं कि उनकी कृपा से ही कोई शाश्वत परमानंद और अविनाशी लोक प्राप्त करता है। अतः यह कृपा प्राप्त करने के लिए जीवात्मा को भगवान के शरणागत होना आवश्यक है। संसार में भी कोई पिता अपने पुत्र को अपनी सभी संपत्तियाँ तब तक हस्तांतरित नहीं करता जब तक वह इनका समुचित रूप से सदुपयोग करने के योग्य नहीं हो जाता। समान रूप से भगवान की कृपा शर्तरहित नहीं है। इसके लिए कुछ नियम है जिसके आधार पर वे कृपा करते हैं। यदि भगवान अपनी कृपा प्रदान करते समय इन नियमों का पालन नहीं करते तब लोगों का उन पर से विश्वास टूट जाएगा।
इसे एक उदाहरण द्वारा समझें-एक पिता के दो पुत्र थे। फसल उगाने के मौसम में वह अपने दोनों पुत्रों को खेत में कड़ा परिश्रम करने का आदेश देता है। एक पुत्र दिन भर सूर्य की तेज धूप में पसीना बहाकर परिश्रम करता है। जब रात्रि को वह घर पहुँचता है तब पिता कहता है-"मेरे पुत्र तुमने बहुत अच्छा काम किया। तुम आज्ञाकारी, अति परिश्रमी और निष्ठावान हो। यह तुम्हारा पुरस्कार है। यह 500 रुपये लो और इसको जैसे चाहो वैसे व्यय करो।" दूसरे पुत्र ने कुछ नहीं किया और पूरा दिन बिस्तर पर पड़ा रहा, मदिरा पान तथा धूम्रपान करता रहा और अपने पिता के लिए अपशब्द बोलता रहा। मान लो कि यदि रात को उसका पिता उससे कहता है-"चिंता मत करो। तुम भी मेरे पुत्र हो। यह 500 रुपये लो और आनंद मनाओ।" इसका परिणाम यह होगा कि पहले पुत्र की कड़ा परिश्रम करने की प्रेरणा समाप्त हो जाएगी। वह कहेगा-"यदि मेरे पिता का पुरस्कार देने का यही मापदण्ड है तब मैं भी परिश्रम क्यों करू? मैं भी कुछ नहीं करूँगा क्योंकि फिर भी मुझे 500 रुपये प्राप्त होंगे।" समान रूप से यदि भगवान हमारी पात्रता पर विचार किए बिना अपनी कृपा प्रदान करते हैं तब जो लोग पहले ही संत बन चुके हैं वे शिकायत करेंगे-"यह कैसी बात है? हमने कई जन्मों तक स्वयं को शुद्ध करने का प्रयास किया और तब हम भगवान की कृपा प्राप्त करने के पात्र बन पाए लेकिन इस व्यक्ति ने बिना पात्रता प्राप्त किए कृपा प्राप्त कर ली। फिर क्या हमारे प्रयास निरर्थक थे?" भगवान कहते हैं-"मैं इस प्रकार के अन्यायपूर्ण ढंग से व्यवहार नहीं करता, मेरी कुछ शाश्वत शर्ते हैं जिसके आधार पर मैं अपनी कृपा प्रदान करता हूँ। मैंने इसकी घोषणा सभी ग्रंथो में की है।" श्वेताश्वतरोपनिषद् में निम्न प्रकार से वर्णन किया है-
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.18)
"हमें उस परमेश्वर की शरण ग्रहण करनी चाहिए जिसने ब्रह्मा आदि को जन्म दिया है। उनकी कृपा के कारण आत्मा और बुद्धि प्रकाशित होती है।" श्रीमद्भागवतम् में भी इस प्रकार से वर्णन किया गया है-
मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम्।
याहि सर्वात्मभावेन मया स्या ह्यकुतोभयः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.12.15)
"हे उद्धव! सभी प्रकार की लौकिक, सामाजिक और धार्मिक परंपराओं का त्याग करो और सभी आत्माओं की परम आत्मा की शरण ग्रहण करो। केवल तभी तुम इस संसार रूपी महा सागर को पार कर सकोगे और सर्वथा निडर हो जाओगे।" भगवद्गीता के 7वें अध्याय के 14वें श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह भी कहा था-"मेरी दिव्य शक्ति माया प्रकृति के तीन गुणों से निर्मित हैं और इसको पार करना अत्यंत कठिन है लेकिन वे जो मेरे शरणागत हो जाते हैं वे इसे सरलता से पार कर लेते हैं।"
रामायण में भी ऐसा वर्णन किया गया है
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।
"जिस क्षण जीवात्मा भगवान के शरणागत हो जाती है उसी क्षण उसके अनन्त जन्मों के संचित कर्म उसकी कृपा द्वारा नष्ट हो जाते हैं।" भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए उनके शरणागत होने की अनिवार्यता के सिद्धांत को दोहराया गया है। शरणागति का विस्तृत अर्थ क्या है? इसे हरि भक्ति विलास, भक्ति रसामृत सिंधु, वायु पुराण और अहिर्बुध्न्य संहिता में निम्न प्रकार से समझाया गया है-
आनुकूल्यस्य सङ्कल्प प्रतिकूल्यस्य वर्जनम्
रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्वे वरणं तथा।
आत्मनिक्षेपकार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः।।
(हरि भक्तिविलास 11.676)
उपर्युक्त श्लोक में भगवान की शरणागति के छः स्वरूपों का वर्णन किया गया है-
1. केवल भगवान की इच्छा में इच्छा रखनाः स्वाभाविक रूप से हम भगवान के दास हैं और दास का यह धर्म है कि वह अपने स्वामी की इच्छा को पूर्ण करें। इसलिए भगवान के शरणागत भक्त के रूप में हमें भगवान की दिव्य इच्छा के अनुरूप ही अपनी इच्छा रखनी चाहिए। एक सूखा पत्ता वायु पर पूर्ण रूप से निर्भर हो जाता है। यदि वायु चाहे तो उसे ऊपर उठा दे, नीचे गिरा दे या उसे आगे या पीछे ले जाए या फिर उसे पृथ्वी पर फेंक दे। लेकिन सूखा पत्ता इसकी कोई शिकायत नहीं करता। समान रूप से हमें भी भगवान के सुख में सुखी रहना सीखना चाहिए।
2. भगवान की इच्छा के विरुद्ध इच्छा न करनाः इस जीवन में हमें अपने पूर्व और वर्तमान जन्म के फल प्राप्त होते हैं। किंतु कर्मों के फल अपने आप नहीं प्राप्त होते। भगवान हमारे कर्मों का लेखा जोखा रखते हैं और उचित समय पर उनके फल प्रदान करते हैं। चूंकि भगवान स्वयं फल वितरित करते हैं इसलिए हमें धैर्यपूर्वक उन्हें स्वीकार करना चाहिए। प्रायः जब लोग धन, यश, सुख और संसार के भोग विलास प्राप्त करते है तब वे भगवान के प्रति आभार प्रकट करते हैं। किन्तु यदि वे कष्ट पाते हैं तब इसका दोष भगवान को देते हैं-" भगवान ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?" दूसरी प्रकार की शरणागति के स्वरूप का तात्पर्य भगवान हमें जो भी प्रदान करें उस पर असंतोष प्रकट न करने से है।
3. यह दृढ़ विश्वास होना कि भगवान सदैव हमारी रक्षा करते हैं: भगवान हमारे शाश्वत पिता हैं। वे सृष्टि के सभी जीवों की देखभाल करते हैं। पृथ्वी लोक पर खरबों चींटियाँ हैं और सभी को नियमित रूप से भोजन की आवश्यकता पड़ती है। क्या हमने कभी उनमें से कुछ हजार चींटियों को अपने बगीचे में भूख से मरते हुए देखा? भगवान सुनिश्चित करते हैं कि इन सबको भोजन मिलता रहे। दूसरी ओर हाथी प्रतिदिन ढेरों भोजन करते हैं। भगवान इनके लिए भी भोजन की व्यवस्था करते हैं। सांसारिक पिता अपने बच्चों की चिंता और उनका पालन-पोषण करता है। तब हम यह संदेह क्यों करें कि हमारा शाश्वत पिता हमारी देख भाल करेगा या नहीं? भगवान के संरक्षण में दृढ़तापूर्वक विश्वास करना शरणागति का तीसरा स्वरूप है।
4. भगवान के प्रति कृतज्ञता की भावना रखनाः भगवान द्वारा हमें अनेक उपहार प्राप्त होते हैं। पृथ्वी जिस पर हम चलते हैं। सूर्य का प्रकाश जिससे हम देखते हैं तथा वायु जिससे हम श्वास लेते हैं और जल जिसका हम सेवन करते हैं। यह सब हमें भगवान द्वारा प्रदान किया जाता है। वास्तव में भगवान के कारण ही हमारा अस्तित्त्व है। वे हमें जीवन और हमारी आत्मा को चेतना प्रदान करते हैं। हम भगवान को इसके एवज में कोई कर नहीं देते लेकिन हमें भगवान जो भी कुछ प्रदान करते हैं उन सब के लिए हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिए।
इसके विपरीत भावना बनाना अकृतज्ञता है। उदाहरणार्थ पिता अपने पुत्र के लिए बहुत कुछ करता है। इसके लिए पुत्र को अपने पिता के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए लेकिन अगर बच्चा यह प्रतिक्रिया व्यक्त करता है, "मुझे अपने पिता का आभारी क्यों होना चाहिए? इनके पिता ने इनका पालन पोषण किया और यह मेरा कर रहे है।" यह सांसारिक पिता के प्रति अकृतज्ञता है। अपने शाश्वत पिता भगवान द्वारा प्रदत्त अमूल्य उपहारों के लिए उनके प्रति कृतज्ञ होना शरणागति का चौथा स्वरूप हैं।
5. सभी वस्तुओं को भगवान से संबंधित माननाः भगवान ने समस्त संसार की सृष्टि की है। संसार हमारे जन्म से पूर्व से अस्तित्त्व में है और मृत्यु के पश्चात् भी अस्तित्त्व में रहेगा। इसलिए केवल भगवान ही सभी वस्तुओं के वास्तविक स्वामी हैं। जब हम यह सोचते हैं कि कोई वस्तु हमारी है तब हम भगवान के प्रभुत्व को विस्मृत कर देते हैं। इस विषय को इस प्रकार से समझा जा सकता है। जब आप अपने घर में नहीं होते तब कोई आपके घर में प्रवेश करता है। वह आपके कपड़े पहनता है, आपके रैफ्रिजरेटर से खाने पीने की चीजें उठा कर उनका सेवन करता है और आपके बिस्तर पर सो जाता है। जब आप लौट कर घर आते हैं तब उससे क्रोध से पूछते हैं-“तुम मेरे घर में क्या कर रहे हो?" वह कहता है-"मैंने तुम्हारे घर की किसी वस्तु को क्षतिग्रस्त नहीं किया है। मैंने सभी वस्तुओं का भली भांति उपयोग किया है। तुम मुझ पर क्रोधित क्यों हो रहे हो?" तब आप उत्तर देंगे, "भले ही तुमने किसी वस्तु को क्षतिग्रस्त नहीं किया है लेकिन ये सब मेरी है। तुमने मेरी अनुमति के बिना इनका उपयोग किया, तुम चोर हो।" समान रूप से संसार के सभी पदार्थ भगवान के हैं। इस बात को ध्यान में रखो। इस प्रकार से स्वामित्व की भावना को त्यागना शरणागति का पांचवा स्वरूप है।
6. समर्पण की भावना का भी समर्पण करनाः यदि हम अपने द्वारा किए गए शुभ कार्यों पर अभिमान करते हैं तब यह अभिमान हमारे हृदय को अपवित्र करता है और हमने जो भी अच्छा कार्य किया है उसे भी विनष्ट कर देता है। इसी कारण विनम्रता बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है। "यदि मैं कुछ उअच्छा कर पाया तो यह केवल भगवान द्वारा मेरी बुद्धि को उचित दिशा में प्रेरित करने के कारण संभव हुआ। यदि ऐसा न होता तब मैं इसे न कर पाता।" विनम्रता की ऐसी भावना रखना शरणागति का छठा स्वरूप है। यदि हम शरणागति के इन छः बिन्दुओं का पूर्ण रूप से अनुसरण करते हैं तब हम भगवान की शर्तों को पूरा कर पाएंगे और वे हम पर अपनी कृपा बरसायेंगे।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया |
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु || 63||
इस प्रकार से मैंने तुम्हे यह ज्ञान समझाया जो सभी गुह्यों से गुह्यतर है। इस पर गहनता के साथ विचार करो और फिर तुम जैसा चाहो वैसा करो।
गुह्य ज्ञान वह है जो बहुसंख्यक लोगों को ज्ञान नहीं होता। भौतिक विज्ञान के अधिकतर सिद्धांत कुछ शताब्दी पूर्व तक गूढ़ रहस्य थे और कुछ अभी तक भी रहस्य बने हुए हैं। आध्यात्मिक ज्ञान अत्यंत गहन है और प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा इसे समझा नहीं जा सकता। इसे गुरु और शास्त्रों के माध्यम से सीखा जा सकता है, इसलिए इसे रहस्य कहा जाता है। दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने आत्मा के ज्ञान को प्रकट किया था जो गुह्य अर्थात् रहस्यमयी ज्ञान है। 7वें और 8वें अध्याय में उन्होंने अपनी शक्तियों के ज्ञान की व्याख्या की जो गुह्यतर हैं अर्थात् अति रहस्यमयी हैं। नौवें और उसके बाद के अध्यायों में उन्होंने अपनी भक्ति का ज्ञान प्रकट किया जोकि गुह्यतम है अर्थात् सर्वाधिक गूढ़ है। इसी अध्याय के 55वें श्लोक में उन्होंने बताया कि केवल भक्ति द्वारा ही उन्हें उनके साकार रूप में पाया जा सकता है। श्रीकृष्ण अब भगवद्गीता का समापन कर रहे हैं। अर्जुन को अति गुह्यतम ज्ञान देने के बाद अब वे अठारहवें अध्याय के अंतिम श्लोकों में अपना दिव्य उपदेश देते हुए निर्णय का चुनाव अर्जुन पर छोड़ देते है। वे कहते हैं मैंने तुम्हें गहन और गुह्य ज्ञान समझाया है। अब निर्णय तुम्हारे हाथ में है। भगवान राम ने भी अयोध्या वासियों के सम्मुख यही वचन बोले थे।
एक बार रघुनाथ बोलाए।
गुरु द्विज पुरबासी सब आए।।
(रामचरितमानस)
"एक बार भगवान राम ने सब अयोध्यावासियों को बुलाया। गुरु वसिष्ठ सहित सभी उन्हें सुनने के लिए आए।" अपने उपदेश में भगवान श्रीराम ने उन्हें मानव जीवन के लक्ष्य को समझाया और उसे पूरा करने का मार्ग बताया। अंत में उन्होंने निष्कर्ष देते हुए कहा-
नहि अनीति नहि कछु प्रभुताई।
सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई।।
(रामचरितमानस)
"मैंने तुम्हें जो उपदेश दिया वह न तो अनीतिपूर्ण है और न ही बाध्यकर है। इसे ध्यान से सुनो, इस पर चिंतन करो और आगे जो तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो।"
इस प्रकार भगवान ने जीवात्मा को उपलब्ध विकल्पों में से चयन करने की स्वतंत्र इच्छा प्रदान की है। यह अधिकार नियमरहित नहीं है। कोई भी यह निर्णय नहीं कर सकता कि “मैं संसार का अति बुद्धिमान मनुष्य बनूंगा।" पूर्व और वर्तमान जन्मों के अनुसार हमारे विकल्प भी सीमित होते हैं। फिर भी कुछ सीमा तक हम स्वतंत्र इच्छा से युक्त होते हैं क्योंकि हम भगवान के हाथों के कोई यंत्र नहीं है। कई बार लोग प्रश्न करते हैं कि यदि भगवान हमें स्वतंत्र इच्छा प्रदान नहीं करते तब हम कोई भी बुरा कार्य न करते। लेकिन तब हम कोई अच्छा कार्य भी नहीं कर सकते थे। अच्छे कार्य के अवसर के साथ सदैव बुरा करने का जोखिम बना रहता है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह समझना है कि भगवान चाहते हैं हम उनसे अपार प्रेम करें और प्रेम केवल वहीं संभव हो सकता है जहाँ विकल्प हो। मशीन प्रेम नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास चयन करने की स्वतंत्रता नहीं होती। सर्वव्यापी भगवान ने हमें स्वतंत्र इच्छा दी और हमारे लिए कई विकल्पों की व्यवस्था की ताकि हम भगवान का चयन करें और अंततः अपना प्रेम उन पर न्यौछावर करें। सर्वशक्तिमान भगवान जीवात्मा को ईश्वर से प्रेम करने और उसी ईश्वर के शरणागत होने के लिए कदापि बाध्य नहीं करते बल्कि इसका निर्णय सांसरिक जीवात्मा को स्वयं लेना पड़ता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन का ध्यान उसकी इस स्वतंत्र इच्छा की ओर आकर्षित करने का प्रयास करते हैं और उसे चुनने के लिए कहते हैं।
सर्वगुह्यतमं भूय: शृणु मे परमं वच: |
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् || 64||
पुनः मेरा परम उपदेश सुनो जो सबसे श्रेष्ठ गुह्य ज्ञान है। मैं इसे तुम्हारे लाभ के लिए प्रकट कर रहा हूँ क्योंकि तुम मेरे प्रिय मित्र हो।
शिक्षक को गूढ विषय की जानकारी हो सकती है किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि वह इसे शिष्यों को भी बताएँ। इसे संझा करने से पूर्व वह कई चीजों पर विचार करता है जैसे क्या विद्यार्थी इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए तत्पर हैं, क्या वे इसे समझ पाएंगे और इससे उन्हें क्या लाभ होगा? भगवद्गीता के आरंभ में अर्जुन अपने सम्मुख खड़ी समस्याओं के कारण उलझन में था और उसने श्रीकृष्ण को मार्गदर्शन प्रदान करने का आग्रह किया। श्रीकृष्ण ने अठारह अध्यायों में थोड़ा-थोड़ा करके उसके ज्ञान को उन्नत किया। यह ज्ञात होने के पश्चात् कि अर्जुन उनके उपदेशों को भली भांति समझ चुका है, अब श्रीकृष्ण आश्वस्त होते हैं कि वह अंतिम और अति गहन ज्ञान को अच्छी तरह से ग्रहण करने के योग्य हो गया होगा। आगे वे कहते हैं- " इष्टोऽसि मे दृढमिति" इसका अर्थ यह है कि मैं तुम्हें इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि तुम मेरे परम प्रिय मित्र हो। इसलिए मुझे तुम्हारी अत्यधिक चिंता है और मैं वास्तव में तुम्हारा हित चाहता हूँ।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे || 65||
सदा मेरा चिंतन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी अराधना करो, मुझे प्रणाम करो, ऐसा करके तुम निश्चित रूप से मेरे पास आओगे। मैं तुम्हें ऐसा वचन देता हूँ क्योंकि तुम मेरे अतिशय प्रिय मित्र हो।
नौंवे अध्याय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को वचन दिया था कि वे उसे अति गुह्य ज्ञान प्रदान करेंगे और फिर उसके पश्चात् भक्ति की महिमा का वर्णन करेंगे। यहाँ वे पुनः नौवें अध्याय के 34 वें श्लोक की प्रथम पंक्ति को दोहराते हैं और अर्जुन को उनकी भक्ति में लीन होने के लिए कहते हैं। श्रीकृष्ण के लिए गहन प्रेम विकसित कर मन को सदैव उनकी भक्ति में तल्लीन रखने से अर्जुन सुनिश्चित रूप से अपने परम लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा। भगवान की भक्ति में पूर्णतया तल्लीन होने का सबसे उपर्युक्त उदाहरण राजा अम्बरीष का है। श्रीमद्भागवतम् में इसे इस प्रकार से वर्णित किया गया है
स वै मनः कृष्णपदारविन्दयोर्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने ।
करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु श्रुतिं चकाराच्युतसत्कथोदये ।।
मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने दृशौ तभृत्यगात्रस्पर्शेऽङ्गसंङ्गमम् ।
घ्राणं च तत्पादसरोजसौरभे श्रीमत्तुलस्या रसनां तदर्पिते ।।
पादौ हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे शिरो हृशीकेशपदाभिवन्दने।
कामं च दास्ये न तु कामकाम्यया यथोत्तमश्लोकजनाश्रया रतिः।।
(श्रीमद्भागवतम्-9.4.18-20)
"अम्बरीष ने भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों में अपने मन को तल्लीन रखा। उसने अपनी सुन्दर वाणी को भगवान की अप्रतिम महिमा का गुणगान करने में, अपने दोनों हाथों को भगवान के मंदिर को स्वच्छ करने में और अपने कानों को भगवान की दिव्य लीलाओं को ध्यानपूर्वक सुनने में लगाया। उसने अपनी आंखों को भगवान की मूर्ति देखने, अपने अंगों से भक्तों के शरीर को स्पर्श करने, अपनी नासिका को भगवान के चरण कमलों में अर्पित तुलसी की सुगंध लेने में, अपनी जिह्वा को भगवान को अर्पित प्रसाद का स्वाद चखने, अपने पावों को भगवान के तीर्थ स्थानों की यात्रा करने में और अपने शीश को भगवान के चरणों में झुकाने में लगाया। उन्होंने सभी प्रकार की सामग्रियों जैसे फूल, माला और चंदन की लकड़ियाँ भगवान की सेवा में अर्पित की। उन्होंने यह सब किसी निजी स्वार्थ के लिए नहीं किया। बल्कि शुद्धिकरण द्वारा केवल भगवान की निःस्वार्थ सेवा प्राप्त करने के लिए किया। सच्चे हृदय से भगवान की भक्ति में लीन होने का उपदेश सभी शास्त्रों का सार है और सभी प्रकार के ज्ञान से श्रेष्ठ है। तथापि श्रीकृष्ण द्वारा प्रकट यह ज्ञान अति गुह्य नहीं था क्योंकि वे पहले भी इसका उल्लेख कर चुके हैं। अब वे अगले श्लोक में इस परम रहस्य को प्रकट करेंगे।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: || 66|
सभी प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और केवल मेरी शरण ग्रहण कर दो। मैं तुम्हें समस्त पाप कर्मों से मुक्त कर दूंगा, डरो मत।
अब तक श्रीकृष्ण अर्जुन को एक साथ दो काम करने के लिए कहते आये हैं- वह अपने मन को भक्ति में तल्लीन करे और शरीर से अपने सांसारिक कर्तव्यों का निर्वहन करे। इस प्रकार से वे अर्जुन से यह चाहते थे कि वह अपने क्षत्रिय धर्म का त्याग न करे लेकिन साथ-साथ भक्ति भी करता रहे। यह कर्मयोग का सिद्धांत है। अपने इस उपदेश के विपरीत अब श्रीकृष्ण कहते हैं कि अपने सांसारिक धर्मों का पालन करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है। अर्जुन सभी सांसारिक कर्त्तव्यों का त्याग कर सकता है और केवल भगवान की शरणागति ग्रहण कर सकता है। यह कर्म संन्यास का सिद्धान्त है। यहाँ कोई यह प्रश्न कर सकता है कि यदि हम अपने समस्त सांसारिक धर्मों का त्याग करते है तब फिर क्या हमें पाप नहीं लगेगा?
श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि डरो मत, वे उसे सभी पापों से दोष मुक्त कर देंगे और उसे माया से भी मुक्ति प्रदान करेंगे।
श्रीकृष्ण के उपदेश को समझने के लिए हमें धर्म के अर्थ को जानना होगा। यह शब्द 'धृ' धातु से बना है। जिसका अर्थ है 'धारण करने योग्य' या 'उत्तरदायित्व, कर्त्तव्य, विचार और वे कार्य जो हमारे लिए उपयुक्त' है। वास्तव में दो प्रकार के धर्म हैं-शारीरिक धर्म और आध्यात्मिक धर्म। ये दोनों प्रकार के धर्म 'आत्मा' को समझने की दो विभिन्न धारणाओं पर आधारित हैं। जब हम शरीर के रूप में अपनी पहचान करते है, तब हमारी शारीरिक उपाधियों, दायित्वों, कर्तव्यों और नियमों के अनुसार हमारा धर्म निर्धारित होता है। इसलिए शारीरिक माता-पिता की सेवा करना, सामाजिक और राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों का निर्वहन आदि सब शारीरिक धर्म हैं। इसे अपर धर्म या शारीरिक धर्म भी कहते हैं। इस धर्म में ब्राह्मण, क्षत्रिय धर्म आदि भी सम्मिलित है लेकिन जब हम अपनी पहचान आत्मा के रूप में करते हैं तब हमारे वर्ण और आश्रम नहीं होते। आत्मा का पिता, माता, सखा, प्रियतम और आश्रय सब भगवान होता है। इसलिए हमारा एकमात्र धर्म प्रेममयी भक्ति से भगवान की सेवा करना है। इसे परधर्म या आध्यात्मिक धर्म भी कहा जाता है। यदि कोई शारीरिक धर्म का त्याग करता है तब इसे कर्त्तव्य से विमुख होने के कारण पाप माना जाता है। लेकिन जब कोई अपने शारीरिक
धर्म का त्याग करता है और आध्यात्मिक धर्म का आश्रय लेता है तब इसे पाप नहीं माना जाता है।
श्रीमद्भागवतम् में इस प्रकार का वर्णन किया गया है
देवर्षिभूताप्तनृणां पितृणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्।
सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्
(श्रीमद्भागवतम्-11.5.41)
इस श्लोक में यह समझाया गया है कि जो भगवान के शरणागत नहीं होते उन पर पाँच प्रकार के ऋण होते हैं। ये ऋण है-स्वर्ग के देवताओं के प्रति, ऋषियों के प्रति, पितरों के प्रति, अन्य मनुष्यों के प्रति और अन्य जीवों जैसे अतिथियों और कुटुम्बियों के प्रति। वर्णाश्रम पद्धति में इन सब ऋणों से स्वयं को मुक्त करने के लिए विविध प्रकार की प्रक्रियाएँ निश्चित की गयी हैं। लेकिन जब हम भगवान के शरणागत होते हैं तब हम इन सभी ऋणों से स्वतः मुक्त हो जाते हैं। जिस प्रकार से वृक्ष की जड़ को जल देने से जल स्वतः उसकी शाखाओं, तनों, पत्तियों, पुष्पों और फलों को प्राप्त हो जाता है। समान रूप से भगवान के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने से हम स्वतः सभी के प्रति अपने कर्त्तव्यों को पूरा कर लेते हैं। इसलिए यदि हम समुचित रूप से आध्यात्मिक धर्म में स्थित हो जाते हैं तब शारीरिक धर्म का त्याग करने से कोई पाप नहीं लगता। वास्तव में पूर्ण और सच्चे हृदय से आध्यात्मिक धर्म में लीन रहना ही परम लक्ष्य है।
श्रीमद्भागवतम् में निम्न प्रकार से वर्णन किया गया है
आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयाऽऽदिष्टानपि स्वकान्।
धर्मान् सन्त्यज्य यः सर्वान् मां भजेत स सत्तमः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.11.32)
"मैंने शास्त्रों में शारीरिक धर्म का पालन करने के संबंध में असंख्य उपदेश दिए हैं लेकिन जो इनमें दोष देखते हैं और केवल मेरी भक्तिपूर्ण सेवा में तल्लीन रहने के लिए अपने सभी निर्धारित कर्मों का त्याग कर देते हैं। मैं उन्हें मेरा सबसे उत्तम साधक मानता हूँ। रामायण में हमने भी पढ़ा है कि लक्ष्मण किस प्रकार अपने शारीरिक कर्तव्यों को त्याग कर भगवान राम के साथ वन में गए।
गुरु पितु मातु न जानहु काहू। कहहु सुभाऊ नाथ पतियाऊ।।
मोरे सबहिं एक तुम स्वामी। दीनबन्धु उर अन्तरयामी।।
"हे भगवान! कृपया मुझ पर विश्वास करें। मैं अपने गुरु, पिता, माता आदि को नहीं जानता। जहाँ तक मैं जानता हूँ, तुम पतितों के रक्षक और सभी के हृदयों की बात जानने वाले अन्तर्यामी हो तथा मेरे स्वामी और सब कुछ हो" प्रह्लाद ने भी इसी प्रकार से कहा
माता नास्ति पिता नास्ति नास्ति मे स्वजनो जनः
"मैं किसी माता, पिता और कुटुम्ब को नहीं जानता, भगवान ही मेरे सब कुछ हैं।" भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्रमशः उच्च उपदेश दिए। आरम्भ में उन्होंने अर्जुन को कर्म करने को कहा अर्थात् योद्धा के रूप में शारीरिक धर्म का पालन करने का उपदेश दिया। (श्लोक 2.31) लेकिन शारीरिक धर्म के पालन से भगवत्प्राप्ति नहीं होती। इससे स्वर्ग के उच्च लोक प्राप्त होते हैं और एक बार जब पुण्य कर्म क्षीण हो जाते हैं तब मनुष्य को लौट कर पुनः संसार में आना पड़ता है। इसलिए फिर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का पालन करने का उपदेश दिया। इसका तात्पर्य शरीर से संसारिक कर्तव्यों का निर्वहन और मन से आध्यात्मिक धर्म का पालन करना है। उन्होंने अर्जुन को से साथ युद्ध लड़ने और मन से भगवान का स्मरण करने को कहा (श्लोक 8.7)। भगवद्गीता में कर्मयोग का यह उपदेश मुख्य है। अब अंत में श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म संन्यास का उपदेश देते हैं जिसका तात्पर्य सभी सांसारिक कर्तव्यों का त्याग करना और आध्यात्मिक धर्म को अंगीकार करना है। अर्जुन को केवल योद्धा के रूप में अपने धर्म का पालन करना चाहिए बल्कि उसे ऐसा इसलिए करना चाहिए क्योंकि भगवान उससे यह करवाना चाहते हैं।
लेकिन श्री कृष्ण ने अर्जुन को यह उपदेश पहले क्यों नहीं दिया? उन्होंने पाँचवे अध्याय के दूसरे श्लोक में कर्मयोग को कर्म संन्यास से श्रेष्ठ बताने वाले अपने कथन के विपरीत अब कर्म संन्यास की स्पष्ट रूप से प्रशंसा क्यों की? भगवान श्रीकृष्ण अगले श्लोक में इसे भली भांति समझाएंगे।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन |
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति || 67||
यह उपदेश उन्हें कभी नहीं सुनाना चाहिए जो न तो संयमी है और न ही उन्हें जो भक्त नहीं हैं। इसे उन्हें भी नहीं सुनाना चाहिए जो आध्यात्मिक विषयों को सुनने के इच्छुक नहीं हैं और विशेष रूप से उन्हें भी नहीं सुनाना चाहिए जो मेरे प्रति द्वेष रखते हैं।
पिछले अध्याय में श्रीकृष्ण ने यह समझाया था कि यदि कोई भगवान की प्रेममयी भक्ति में स्थित हो जाता है तब सांसारिक कर्तव्यों का त्याग करने से उसे कोई पाप नहीं लगता। लेकिन इसमें एक समस्या है। यदि हम अभी तक भगवान की प्रेममयी भक्ति में स्थित नहीं हो पाए है और अपरिपक्व अवस्था में ही अपने संसारिक दायित्वों से विमुख हो जाते हैं तब हम न तो इस लोक के और न ही परलोक के रहेंगे। अतः कर्म संन्यास केवल उनके लिए है जो इसके पात्र हैं। हमारी पात्रता क्या है? इसका निर्धारण हमारा आध्यात्मिक गुरु ही कर सकता है जो हमारी क्षमताओं और इस मार्ग में आने वाली कठिनाइयों के संबंध में जानता है। यदि कोई विद्यार्थी स्नातक बनना चाहता है तब ऐसा नहीं होता कि वह सीधे स्नातक की डिग्री वितरित वाले समारोह में उपस्थित हो जाए। हमें इसके लिए प्रथम कक्षा से क्रमशः अध्ययन करना पड़ेगा। समान रूप से बहुसंख्यक लोग कर्मयोग के पात्र हैं किंतु यदि वे अपरिपक्व अवस्था में संन्यास लेते हैं तब यह मूर्खता होगी। उन्हें यह निर्देश देना उत्तम होगा कि वह पहले अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करें और साथ-साथ भक्ति का अभ्यास भी करते रहें। इसी कारण से श्रीकृष्ण इस श्लोक में कहते हैं कि यह गुह्य ज्ञान जो उसे प्रदान किया गया है वह सबके लिए नहीं है। अन्य लोगों को यह ज्ञान देने से पूर्व उनकी पात्रता को परखना चाहिए।
यह संदेश जागरूकता शब्द विशेष रूप से पिछले श्लोक के गुह्य उपदेशों पर लागू होता है किंतु सामान्य रूप से यह भगवद्गीता का व्यापक सन्देश है। यदि इसे भगवान श्रीकृष्ण से द्वेष रखने वाले व्यक्ति को सुनाया जाता है तब वह यह प्रतिक्रिया देगा-"श्रीकृष्ण अभिमानी हैं। वह अर्जुन को अपनी स्तुति करने के लिए कहते रहते हैं।" इस उपदेश का अनर्थ करने से श्रद्धाविहीन श्रोता को इस दिव्य संदेश से हानि होगी। पद्मपुराण में इस प्रकार से कहा गया है
अश्रद्दधाने विमुखेऽप्यशृण्वति यश् चोपदेशः शिवनामापराधः।
(पद्म पुराण)
" श्रद्धाविहीन श्रोता और भगवान से द्वेष रखने वाले को यह अलौकिक उपदेश देकर हम उन्हें अपराधी बनाने का कारण बनेंगे।" इसलिए श्रीकृष्ण उपर्युक्त श्लोक में श्रोताओं की अयोग्यताओं का वर्णन करते हैं।
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति |
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय: || 68||
वे जो इस अति गुह्य ज्ञान को मेरे भक्तो को देते हैं, वे अति प्रिय कार्य करते हैं। वे निःसंदेह मेरे धाम को आएंगे।
श्रीकृष्ण अब भगवद्गीता के संदेश को समुचित रूप से प्रचारित करने के फल का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि ऐसे प्रचारक सर्वप्रथम पराभक्ति प्राप्त करते हैं और तत्पश्चात् उन्हें पा लेते हैं।
भक्ति में तल्लीन होने का अवसर पाना भगवान की विशेष कृपा है। लेकिन अन्य लोगों को भक्ति करने में सहायता करने का अवसर प्राप्त होना उससे भी बड़ी कृपा है, जिससे भगवान की और भी विशेष कृपा प्राप्त होती है। जब हम अच्छे विचारों को दूसरों के साथ बांटते हैं तब हम भी इससे लाभान्वित होते हैं। जब हम अपने ज्ञान को दूसरों के साथ बांटते हैं तब भगवान की कृपा से हमारा ज्ञान भी बढ़ता है। प्रायः दूसरों को भोजन खिलाने से हम कभी भूखे नहीं रह सकते। संत कबीर ने भी ऐसा कहा है-
दान दिए धन न घटे, नदी घटे न नीर
अपने हाथ देख लो यों क्या कहे कबीर ?
"दान देने से धन की कमी नहीं होती और नदी से जल लेने से नदी सूख नहीं जाती। मैं यह सब निराधार नहीं कह रहा। इसे तुम स्वयं संसार में देख सकते हो।" इस प्रकार से जो भगवद्गीता के अध्यात्मिक ज्ञान को दूसरों के साथ बांटते हैं वे स्वयं सर्वोत्तम कृपा प्राप्त करते हैं।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम: |
भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि || 69||
कोई भी मनुष्य उनसे अधिक मेरी सेवा नहीं करता और इस पृथ्वी पर मुझे उनसे प्रिय न तो कोई है और न ही होगा।
सभी प्रकार के उपहारों में आध्यात्मिक ज्ञान का उपहार सर्वश्रेष्ठ है। राजा जनक ने अपने गुरु से पूछा था-"जो अलौकिक ज्ञान आपने मुझे प्रदान किया वह इतना अमूल्य है कि मैं आपका ऋणी हो गया हूँ। इसके एवज में मैं आपको क्या दे सकता हूँ?" गुरु अष्टवक्र ने उत्तर दिया-"कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जिसे देकर तुम इस ऋण से उऋण हो सकते हो क्योंकि मैंने तुम्हें जो ज्ञान दिया है वह दिव्य है और तुम्हारे अधिकार में जो कुछ भी है वह सब भौतिक है। संसारिक पदार्थों से दिव्य ज्ञान के मूल्य को कभी नहीं चुकाया जा सकता लेकिन तुम एक काम कर सकते हो। यदि तुम्हें ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा प्रकट करने वाला कोई पुरुष मिलता है तब तुम उसे अपना ज्ञान बाँटों।" यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि भगवद्गीता के ज्ञान को बांट कर कोई भी व्यक्ति भगवान की सर्वोत्तम सेवा कर सकता है। तथापि वे जो भगवद्गीता पर प्रवचन देते हैं उन्हें यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि वे कोई महान कार्य कर रहे हैं। एक शिक्षक की उचित मनोवृति यह होनी चाहिए कि वह स्वयं को भगवान के हाथों में एक कठपुतली के समान समझे और सबका श्रेय भगवान की कृपा को दे।
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयो: |
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति: || 70||
और मैं यह घोषणा करता हूँ कि जो हमारे पवित्र संवाद का अध्ययन करेंगे वे ज्ञान के समर्पण द्वारा (अपनी बुद्धि द्वारा) मेरी पूजा करेंगे, ऐसा मेरा मत है।
श्रीकृष्ण बार-बार अर्जुन से कहते हैं कि वह अपनी बुद्धि उन्हें समर्पित कर दे (श्लोक 8.7, 12.8)। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हम अपनी बुद्धि का प्रयोग करना बंद कर दें। बल्कि इसका अर्थ यह है कि हम अपनी उत्कृष्ट क्षमता के साथ अपनी बुद्धि का प्रयोग जो भगवान की इच्छा है, उसकी पूर्ति के लिए करें। इसे हम भगवद्गीता के संदेश से समझ सकते हैं। इसलिए वे जो इस पवित्र संवाद का अध्ययन करते हैं वे अपनी बुद्धि के द्वारा भगवान की पूजा करते हैं।
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नर: |
सोऽपि मुक्त: शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् || 71||
वे जो श्रद्धायुक्त तथा द्वेष रहित होकर इस ज्ञान को सुनते हैं वे भी पापों से मुक्त हो जाते हैं और मेरे पवित्र लोकों को पाते हैं जहाँ पुण्य आत्माएं निवास करती हैं।
सभी ऐसी बद्धि से संपन्न नहीं होते कि वे श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच के संवाद के गहन अर्थ को समझ सकें। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि ऐसे मनुष्य जो श्रद्धायुक्त होकर केवल इन्हें सुन भी लेते हैं उन्हें भी इसका लाभ प्राप्त होगा। जगद्गुरु शंकराचार्य के शिष्य सानंद की कथा से इस विषय को समझा जा सकता है। वह अनपढ़ था और अन्य शिष्यों के समान अपने गुरु के उपदेशों को समझ नहीं सकता था। लेकिन जब शंकराचार्य अपना प्रवचन देते थे तब वह ध्यानपूर्वक और श्रद्धायुक्त होकर उन्हें सुनता था। एक दिन वह नदी दिन के दूसरे तट पर अपने गुरु के वस्त्र धो रहा था। कक्षा का समय होने पर अन्य शिष्यों ने प्रार्थना की-"गुरुजी, कृपया कक्षा आरम्भ करें।" शंकराचार्य ने उत्तर दिया कि प्रतीक्षा करें क्योंकि सानंद यहाँ नहीं आया है।" शिष्यों ने कहा, "लेकिन गुरुजी, वह कुछ भी नहीं समझ पाता है।" शंकराचार्य ने कहा-"लेकिन फिर भी वह पूर्ण श्रद्धा के साथ मेरे प्रवचन सुनता है और इसलिए मैं उसे निराश नहीं कर सकता।"
तब श्रद्धा की शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए शंकराचार्य ने पुकारा-"सानंद, कृपया यहाँ आओ।" अपने गुरु के शब्दों के सुनकर उसने कोई हिचक नहीं की। वह पानी पर दौड़ने लगा। जनश्रुति है कि वह जहाँ कहीं पर अपने पांव रखता था वहाँ कमल के पुष्प उसकी सहायता के लिए तैरने लगते। वह नदी पार कर दूसरे तट पर आ गया और उसने अपने गुरु को प्रणाम किया। उस समय उसके मुख से संस्कृत में गुरु की महिमा की स्तुति निर्गत हुई। अन्य शिष्य उसको सुनकर अचंभित हुए। चूंकि उसके पैरों के नीचे कमल के पुष्प खिले रहते थे इसलिए उसका नाम 'पदम्पाद पड़ गया' जिसका अर्थ 'अपने पैरों के नीचे कमल के पुष्पों वाला पुरुष' है। सानंद शंकराचार्य के चार प्रमुख शिष्यों सुरेश्वराचार्य, हस्तामलक और तोटकाचार्य में से एक था। उपर्युक्त श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि वे जो उनके पवित्र संवाद को केवल पूर्ण श्रद्धा के साथ सुनते है, वे शनैः शनैः पवित्र हो जाते हैं।
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा |
कच्चिदज्ञानसम्मोह: प्रनष्टस्ते धनञ्जय || 72||
हे पार्थ! क्या तुमने एकाग्रचित्त होकर मुझे सुना? हे धनंजय! क्या तुम्हारा अज्ञान और मोह नष्ट हुआ?
श्रीकृष्ण ने अर्जुन के गुरु की भूमिका का निर्वहन किया। गुरु का कर्तव्य है कि वह यह परखे कि उसके शिष्य ने विषय को पूर्णरूप से ग्रहण किया है या नहीं? श्रीकृष्ण के प्रश्न करने का करने का अभिप्राय यह था कि यदि अर्जुन इस ज्ञान को समझ नहीं पाया तब ऐसी स्थिति में वे उसे पुनः विस्तारपूर्वक समझाने के लिए तैयार हैं।
अर्जुन उवाच |
नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत |
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव || 73||
अर्जुन ने कहाः हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है। अब मैं ज्ञान में स्थित हूँ। मैं संशय से मुक्त हूँ और मैं आपकी आज्ञाओं के अनुसार कर्म करूंगा।
प्रारम्भ में अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में था। संशययुक्त वह अपने कर्तव्य पालन के प्रति उलझन में था। शोकाकुल होकर वह अपने रथ पर एक ओर बैठ गया और उसने अपने शस्त्रों को नीचे रख दिया। वह यह स्वीकार कर लेता है कि वह अपने उन दुःखों का निदान नहीं ढूंढ पा रहा जो उसके शरीर और इन्द्रियों पर आक्रमण कर रहे थे। लेकिन अब वह स्वयं में पूर्णतया परिवर्तन देखता है और घोषित करता है कि वह ज्ञान में स्थित हो गया है और अब वह व्यथित नहीं है। उसने स्वयं को भगवान की इच्छा के अधीन कर दिया और कहा कि वह वही करेगा जैसा श्रीकृष्ण उसे आदेश देंगे। यह भगवद्गीता के संदेश का ही प्रभाव था। तथापि आगे उसने कहा "त्वत्प्रसादान्मयाच्युत" जिसका यह अर्थ है-“हे श्रीकृष्ण! यह केवल आपका उपदेश ही नहीं है बल्कि यह आपकी कृपा है जिससे मेरा अज्ञान दूर हुआ है।"
लौकिक ज्ञान में कृपा की आवश्यकता नहीं होती। हम शिक्षण संस्थानों को या शिक्षकों को शुल्क देकर ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान का इस प्रकार क्रय विक्रय नहीं किया जा सकता। यह कृपा द्वारा ही प्रदान किया जा सकता है और इसे विनम्रतापूर्वक श्रद्धा से प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार यदि हम भगवद्गीता पर अभिमान की भावना से चर्चा करते हैं कि “मैं अति बुद्धिमान हूँ। मैं इसके संदेश की कुल उपयोगिता का मूल्यांकन करूँगा।" तब हम इसे समझने में कभी समर्थ नहीं हो पाएंगे। हमारी बुद्धि इस ग्रंथ में दोष ढूंढकर उनपर अपना ध्यान केंद्रित करेगी और इसी तरह हम संपूर्ण ग्रंथ को त्रुटिपूर्ण मानते हुए अस्वीकार कर देंगे।
भगवद्गीता पर अनेक भाष्य लिखे गए और इसके दिव्य संदेश के असंख्य पाठक हैं। लेकिन इनमें से कितने लोग अर्जुन के समान प्रबुद्ध हुए? यदि हम वास्तव में यह ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं तब केवल इसे पढ़ना पर्याप्त नहीं बल्कि श्रद्धा से युक्त होकर प्रेमपूर्वक समर्पण द्वारा भगवान की कृपा प्राप्त करनी होगी। तब हम उनकी कृपा से भगवद्गीता का अभिप्राय समझ सकेंगे।
सञ्जय उवाच |
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मन: |
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् || 74||
संजय ने कहाः इस प्रकार से मैंने वासुदेव श्रीकृष्ण और उदारचित्त पृथापुत्र अर्जुन के बीच अद्भुत संवाद सुना। यह इतना रोमांचकारी संदेश है कि इससे मेरे शरीर के रोंगटे खड़े हो गए हैं।
इस प्रकार संजय भगवद्गीता के दिव्य उपदेश के अवसान की ओर आता है। वह अर्जुन को महात्मा कहकर संबोधित करता है क्योंकि उसने श्रीकृष्ण के उपदेशों और आज्ञाओं को ग्रहण किया। इसलिए वह श्रेष्ठ विद्वान बन गया। संजय अब अभिव्यक्त करता है कि उनके दिव्य संवादों को सुनकर वह इस प्रकार से अचंभित और स्तंभित हुआ जिससे उसके शरीर के रोंगटे खड़े हो गये जो भाव भक्ति का एक लक्षण है।
भक्तिरसामृतसिंधु में इस प्रकार से वर्णन किया गया है-
स्तम्भ स्वेदोऽथ रोमाञ्चः स्वरभेदोऽथ वेपथुः।
वैवर्ण्यमश्रुप्रलय इत्यष्टौ सात्त्विकाः स्मृताः।।
"भाव भक्ति के आठ लक्षण हैं-जड़वत् हो जाना, पसीना निकलना, रोंगटे खड़े होना, वाणी अवरुद्ध होना कांपना, मुख का रंग पीला पड़ना, आँसू बहाना और मूर्च्छित होना।" संजय भक्तिपूर्ण मनोभावनाओं की इतनी गहन अनुभूति कर रहा है कि दिव्य आनन्द से उसके शरीर के रोंगटे खड़े हो गये। अब कोई यह प्रश्न कर सकता है कि संजय के लिए युद्ध क्षेत्र में अत्यंत दूर हो रहे इस वार्तालाप को सुनना कैसे संभव हुआ? इसका वर्णन वह अगले श्लोक में करता है।
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् |
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयत: स्वयम् || 75||
वेदव्यास की कृपा से मैंने इस परम गुह्य योग को साक्षात् योगेश्वर श्रीकृष्ण से सुना।
श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास देव को ऋषि वेदव्यास के नाम से भी जाना जाता है। वे संजय के आध्यात्मिक गुरु थे। अपने गुरु की कृपा से संजय को दिव्य दृष्टि का वरदान प्राप्त हुआ था। इसलिए वह हस्तिनापुर के राजमहल में बैठकर कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर घटित घटनाओं को देख सके। यहाँ संजय स्वीकार करटी हैं कि यह उनके गुरु की कृपा थी जिसके कारण उन्हें स्वयं योग के स्वामी श्रीकृष्ण से योग के परम ज्ञान का श्रवण करने का अवसर प्राप्त हुआ।
ब्रह्मसूत्र, पुराणों, महाभारत आदि के रचयिता वेदव्यास भगवान के अवतार थे और वे स्वयं सभी प्रकार की दिव्य शक्तियों से संपन्न थे। इस प्रकार से उन्होंने न केवल श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुए वार्तालाप को सुना बल्कि संजय और धृतराष्ट्र के बीच हुई वार्ता को भी सुना। अतः उन्होंने भगवद्गीता का संकलन करते हुए दोनों के संवादों को भी सम्मिलित किया।
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् |
केशवार्जुनयो: पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहु: || 76||
हे राजन्! जब-जब मैं परमेश्वर श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुए इस चकित कर देने वाले अद्भुत संवाद का स्मरण करता हूँ तब-तब मैं पुनः पुनः हर्षित होता हूँ।
आध्यात्मिक अनुभूति ऐसा आनन्द प्रदान करती है जो सकल सांसारिक सुखों से कई गुणा अधिक संतोषप्रद होती है। संजय इस सुख से प्रमुदित हो रहा था और इसे वह धृतराष्ट्र के साथ भी सांझा करता है। इस अद्भुत संवाद को ध्यान में रखकर और उसका स्मरण करके उसे दिव्य आनन्द की अनुभूति हो रही है, जिससे इस ग्रंथ में निहित ज्ञान की प्रतिष्ठा और भगवान की लीला, जिसका संजय साक्षी था, की दिव्यता प्रकट होती है।
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरे: |
विस्मयो मे महानराजन्हृष्यामि च पुन: पुन: || 77||
भगवान श्रीकृष्ण के अति विस्मयकारी विश्व रूप का स्मरण कर मैं अति चकित और बार-बार हर्ष से रोमांचित हो रहा हूँ।
अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से उनके विराट रूप का दर्शन करने के लिए दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई थी उस रूप को विरले योगी ही देख सकते हैं। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि वे उसे अपना विराट रूप दिखा रहे हैं क्योंकि अर्जुन उनका भक्त और सखा था और इसलिए वह उनका अति प्रिय था। संजय भी भगवान के विराट रूप को देख सके क्योंकि सौभाग्यवश वह भगवान की लीला में सूत्रधार की भूमिका का निर्वहन कर रहे थे। जीवन में कई बार ऐसे अवसर आते हैं जब हमें अकारण कृपा प्राप्त होती है। यदि हम उचित ढंग से इसका प्रयोग करते हैं तब हम तीव्रता से अपनी साधना में उन्नति करते हैं। संजय ने जो देखा उसका वह बार-बार चिन्तन कर रहा है और भक्ति की धारा में बह रहा है।
यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: |
तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्रुवा नीतिर्मतिर्मम || 78||
जहाँ योग के स्वामी श्रीकृष्ण और श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन हैं वहाँ निश्चित रूप से अनन्त ऐश्वर्य, विजय, समृद्धि और नीति होती है, ऐसा मेरा मत है।
इस गहन कथन को संप्रेषित करते हुए भगवद्गीता का समापन होता है। धृतराष्ट्र युद्ध के परिणाम से भयभीत था। संजय उसे सूचित करता है कि शक्ति और दोनों पक्षों की सेना के सैनिकों की संख्या का आंकलन करना व्यर्थ है। इस युद्ध का एक ही निर्णय हो सकता है कि विजय सदैव उसी पक्ष की होगी जहाँ भगवान और उसके सच्चे भक्त हैं और इसलिए अच्छाई, प्रभुता, समृद्धि और प्रचुरता भी वहीं होगी।
भगवान स्वतंत्र हैं एवं संसार के स्वामी हैं और श्रद्धा तथा पूजा के परम लक्ष्य हैं। "न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते" (श्वेताश्वतरोपनिषद् 6.8) अर्थात् उनके बराबर कोई नहीं, कोई भी उनसे बड़ा नहीं। तात्पर्य यह है कि उनसे बड़ा तो दूर उनके समान ही कोई नहीं दिखता। अपनी अतुलनीय महिमा को प्रकट करने के लिए उन्हें एक माध्यम की आवश्यकता होती है। जो जीवात्मा उनके शरणागत होती है वह भगवान के महिमामण्डन के लिए माध्यम बनती है। इसलिए परमेश्वर और उनके सच्चे भक्त जहाँ उपस्थित रहते हैं वहाँ परम सत्य का प्रकाश सदैव असत्य के अंधकार को परास्त कर देता है।
।। श्रीमद्भागवत गीता अष्टदश अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
Bhagavad Geeta Chapter 17
kathaShrijirasik
अध्याय सत्रह: श्रद्धा त्रय विभाग योग
श्रद्धा के तीन विभागों के ज्ञान का योग
चौदहवें अध्याय में श्रीकष्ण ने माया के तीन गुणों की व्याख्या की थी और यह भी समझाया था कि किस प्रकार से ये मनुष्यों पर प्रभाव डालते हैं। इस सत्रहवें अध्याय में श्रीकृष्ण विस्तारपूर्वक गुणों के प्रभाव के विषय में बताते हैं। सर्वप्रथम वह श्रद्धा के विषय पर चर्चा करते हैं और यह बताते हैं कि कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो श्रद्धा विहीन हो क्योंकि यह मानवीय प्रकृति का निहित स्वरूप है। लेकिन मन की प्रकृति के अनुसार व्यक्तियों की श्रद्धा सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक होती है। उनकी श्रद्धा की प्रकृति ही उनकी जीवन शैली का निर्धारण करती है। लोग अपनी रुचि के अनुसार ही अपने भोजन का चयन करते हैं।
श्रीकृष्ण भोजन को तीन श्रेणियों में विभाजित करते हैं तथा प्रत्येक भोजन के हमारे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा करते हैं। तत्पश्चात् वह यज्ञ के विषय में यह बताते हैं कि प्रकृति के तीन गुणों में यज्ञ किस प्रकार विभिन्न रूप से सम्पन्न होता है। इस अध्याय में आगे तपस्या के विषय में बताया गया है तथा शरीर, वाणी एवं मन के तप की व्याख्या की गई है। प्रत्येक तपस्या का स्वरूप सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण के प्रभाव के कारण भिन्न होता है। तत्पश्चात् दान पर चर्चा की गई है तथा इसके तीन विभागों का वर्णन किया गया है।
अंततः श्रीकृष्ण “ओम-तत्-सत्" शब्दों की प्रासंगिकता तथा अर्थ के विषय पर प्रकाश डालते हैं जो परम सत्य के विभिन्न रूपों के प्रतीक हैं। 'ओउम्' पद ईश्वर के निराकार रूप की अभिव्यक्ति है। 'तत्' का उच्चारण, परमपिता परमात्मा को अर्पित की जाने वाली क्रियाओं तथा वैदिक रीतियों के लिए किया जाता है, 'सत्' शब्दांश का तात्पर्य सनातन भगवान तथा धर्माचरण है। एक साथ प्रयोग करने पर ये अलौकिक सत्ता का बोध कराते हैं। इस अध्याय का अंत इस सिद्धांत से होता है कि यदि यज्ञ, तप और दान विधि-निषेधों की उपेक्षा करते हुए किए जाते हैं, तब ये सभी कृत्य निरर्थक सिद्ध होते हैं।
अर्जुन उवाच |
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विता: |
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तम: || 1||
अर्जुन ने कहा-हे कृष्ण! उन लोगों की स्थिति क्या होती है जो शास्त्रों की आज्ञाओं की उपेक्षा करते हैं, किन्तु फिर भी श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं? उनकी श्रद्धा, क्या सत्त्वगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी होती है?
पिछले अध्याय में श्रीकृष्ण ने दैवीय और आसुरी प्रकृति में अंतर को में बताया था। अध्याय के अंत में वे यह बताते हैं कि जो व्यक्ति शास्त्रों के विधि-निषेधों की उपेक्षा करता है तथा शारीरिक और मानसिक आवेगों का अनुसरण करता है, वह व्यक्ति कभी भी जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। इस प्रकार वे लोगों को शास्त्रों में दिए गए दिशा-निर्देशों का अनुसरण करने तथा तदनुसार कर्म करने की प्रशंसा करते हैं। इस से यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि वैदिक शास्त्रों का अनुसरण किए बिना भगवान की पूजा करने वाले लोगों की आस्था किस प्रकार की होती है? विशेष रूप से अर्जुन माया के तीन गुणों का अभिप्राय समझना चाहता है।
श्रीभगवानुवाच |
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा |
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु || 2||
भगवान ने कहा-"प्रत्येक प्राणी स्वाभाविक रूप से श्रद्धावान है। यह श्रद्धा सात्त्विक राजसिक अथवा तामसिक हो सकती है। अब इस संबंध में मुझसे सुनो।"
कोई भी व्यक्ति श्रद्धा विहीन नहीं हो सकता क्योंकि यह मानव का स्वरूप है। जिन व्यक्तियों की धर्मग्रन्थों में आस्था नहीं है वे भी श्रद्धाहीन नहीं हैं क्योंकि उनकी आस्था अन्यत्र ओर होती है। यह श्रद्धा चाहे उनकी बुद्धि की तार्किक क्षमता के प्रति हो अथवा उनकी इन्द्रियों के बोध पर आश्रित हो सकती है। उदाहरण के लिए लोग यह कहते हैं कि "मैं भगवान पर इसलिए विश्वास नहीं करता क्योंकि मैं उन्हें देख नहीं सकता।" इसका अर्थ है कि उन्हें भगवान में विश्वास नहीं है किन्तु उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास है। अतः वे मानते हैं कि जब वे किसी वस्तु को देख नहीं पाते तब उन्हें उसके अस्तित्व का बोध नहीं होता। यह भी एक प्रकार की श्रद्धा है। कोई दूसरा कहता है-"मैं प्राचीन ग्रंथों की प्रामाणिकता में विश्वास नहीं रखता। इसके स्थान पर मैं आधुनिक विज्ञान के सिद्धांतों को स्वीकार करता हूँ।" यह भी एक प्रकार का विश्वास है क्योंकि पिछली कुछ शताब्दियों में विज्ञान के सिद्धांतों में परिवर्तन आया है। यह संभव है कि हम वर्तमान में जिन वैज्ञानिक सिद्धांतों को मान रहे हैं, हो सकता है कि भविष्य में वे गलत सिद्ध हों। इन्हें सत्य मानना भी श्रद्धा ही है।
भौतिक शास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर चार्ल्स एस. टाउन्स ने इसे बहुत ही सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है-"विज्ञान में भी श्रद्धा की आवश्यकता है, हम नहीं जानते कि हमारे तर्क ठीक हैं, मैं नहीं जानता कि क्या आप वहाँ पर हो, आप भी नहीं जानते कि मैं यहाँ पर हूँ। हम केवल इन सबकी कल्पना कर सकते हैं। मुझे विश्वास है कि विश्व वैसा ही है जैसा कि वह दिखाई देता है, और मैं इसतरह विश्वास करता हूँ कि आप वहाँ पर हैं। मैं इसे किसी प्रकार से सिद्ध नहीं कर सकता। फिर भी मुझे कार्य निष्पादन के लिए एक निश्चित तंत्र को स्वीकार करना पड़ेगा। यह विचार कि 'धर्म ही आस्था है' तथा 'विज्ञान ही ज्ञान है' के संबंध में मेरा यह मानना है कि यह बिल्कुल अनुचित है क्योंकि हम वैज्ञानिक भी बाह्य जगत के अस्तित्वों में तथा अपने तर्कों की मान्यता में विश्वास करते हैं। इस में हम अपने को सहज अनुभव करते हैं तथापि ये सभी श्रद्धा ही है। भले ही कोई भौतिक वैज्ञानिक, सामाजिक विचारक, आध्यात्मिक विचारक अथवा तत्त्वज्ञानी हो, वह ज्ञान में श्रद्धा की आवश्यकता को अस्वीकार नहीं कर सकता।
अब श्रीकृष्ण इस बात की व्याख्या करते है कि भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग क्यों विभिन्न क्षेत्रों में अपनी आस्था रखते हैं।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत |
श्रद्धामयोऽयं पुरूषो यो यच्छ्रद्ध: स एव स: || 3||
सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके मन के अनुरूप होती है। यह श्रद्धा वैसी ही होती है जैसे वे वास्तव में है।
पिछले श्लोक में यह समझाया गया था कि हम सब की आस्था किसी एक स्थान में होती है जहाँ हम अपनी श्रद्धा को स्थिर करते हैं। और जिस आस्था का हम चयन करते हैं वही हमारे जीवन को दिशा प्रदान करती है। वे लोग जो यह मानते हैं कि विश्व में धन ही सबसे महत्त्वपूर्ण है, वे इसे जोड़ने में अपना पूरा जीवन लगा देते हैं। वे लोग जो इस बात में विश्वास रखते हैं कि प्रतिष्ठा से बढ़कर कोई वस्तु नहीं है वे लोग राजनीतिक तथा सामाजिक पदों को प्राप्त करने में ही अपना समय और ऊर्जा लगा देते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो श्रेष्ठ गुणों के आधीन में विश्वास रखते हैं और उनकी प्राप्ति के लिए प्रत्येक वस्तु का त्याग करने के लिए तत्पर रहते हैं।
महात्मा गांधी को सत्य और अहिंसा के बल में विश्वास था तथा दृढ़-संकल्प के बल पर ही उन्होंने अहिंसक आंदोलनों का सूत्रपात किया था। इसके परिणामस्वरूप विश्व के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य से भारत को स्वतंत्र करवाने में सफलता प्राप्त हुई। जो लोग भगवत्प्राप्ति के लिए गहन श्रद्धा विकसित करते हैं, वे उसकी खोज में अपने भौतिक जीवन का त्याग कर देते हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण समझाते हैं कि हमारी श्रद्धा की प्रकृति ही हमारे जीवन की दिशा को निर्धारित करती है और हमारी श्रद्धा का गुण हमारे मन की प्रकृति द्वारा निर्धारित होता है।
इस प्रकार अर्जुन के प्रश्न के प्रत्युत्तर में श्रीकृष्ण श्रद्धा के विभिन्न प्रकारों की व्याख्या करते हैं।
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसा: |
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जना: || 4||
सत्त्वगुण वाले स्वर्ग के देवताओं की पूजा करते हैं, रजोगुण वाले यक्षों तथा राक्षसों की पूजा करते हैं, तमोगुण वाले भूतों और प्रेतात्माओं की पूजा करते हैं।
ऐसा कहा गया है कि सज्जन व्यक्ति अच्छाई की ओर तथा दुर्जन व्यक्ति बुराई की ओर आकर्षित होते हैं। तमोगुण वाले भूतों और प्रेतात्माओं की निकृष्ट और दुष्ट प्रकृति को जानने के पश्चात् भी उनकी ओर आकर्षित होते हैं। रजोगुण वाले यक्षों (शक्ति तथा धन सम्पदा प्रदान करने वाले देवताओं के समान) और राक्षसों (इन्द्रिय सुख, प्रतिशोध तथा प्रचंड क्रोध से युक्त शक्तिशाली) की ओर आकर्षित होते हैं। निकृष्ट स्तर की पूजा के औचित्य पर विश्वास करते हुए वे इन निकृष्ट प्राणियों को प्रसन्न करने के लिए पशुओं की बलि भी देते हैं। सत्त्वगुण वाले स्वर्ग के देवताओं की पूजा करते हैं। उनमें वे सद्गुणों की अनुभूति करते हैं। किंतु आराधना पूर्ण तभी होती है जब वह भगवान को अर्पित की जाती है।
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जना: |
दम्भाहङ्कारसंयुक्ता: कामरागबलान्विता: || 5||
कर्षयन्त: शरीरस्थं भूतग्राममचेतस: |
मां चैवान्त:शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् || 6||
कुछ लोग अहंकार और दंभ से अभिप्रेरित होकर शास्त्रों की आज्ञाओं के विरुद्ध कठोर तपस्या करते हैं। कामना और आसक्ति से प्रेरित होकर वे न केवल अपने शरीर को कष्ट देते हैं बल्कि मुझे, जो उनके शरीर में परमात्मा के रूप में स्थित रहता हूँ, को भी कष्ट पहुँचाते हैं। ऐसे मूर्ख लोगों को पैशाचिक प्रवृति वाला कहा जाता है।
कुछ लोग आध्यात्मिकता के नाम पर अनर्थक तपस्या करते हैं। कठोर अनुष्ठानों के नाम पर कुछ लोग कांटों की सेज पर लेटते हैं या कुछ लोग अपने शरीर के आर-पार शूल चुभो लेते हैं। अन्य लोग कई वर्षों तक अपना एक हाथ हवा में उठाकर रखते हैं। उनको यह विश्वास होता है कि ऐसा करने से उन्हें आध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त हो जाएंगी। कुछ सूर्य की ओर निरंतर देखते रहते हैं बिना यह सोचे समझे कि इससे उनके नेत्रों को क्षति पहुँच सकती है। अन्य लोग भौतिक सुखों की कामना में उपवास रखते हैं और अपनी काया को निस्तेज कर लेते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं-“हे अर्जुन! तुमने मुझसे उन लोगों की स्थिति के विषय में पूछा था जो कि शास्त्रों के विधि-निषेधों की उपेक्षा करते हुए भी श्रद्धा के साथ आराधना करते हैं। किन्तु ऐसी श्रद्धा ज्ञान से वंचित होती है। ऐसे लोगों को अपनी पद्धतियों में दृढ़ विश्वास होता है लेकिन उनकी यह आस्था तमोगुण अर्थात् अज्ञानता के कारण होती है। जो लोग अशिष्ट आचरण करते हैं और स्वयं के शरीर को यातनाएँ देते हैं वे अपने भीतर निवास करने वाले परमात्मा का निरादर करते हैं। ये कृत्य शास्त्रों के विरुद्ध हैं।"
श्रद्धा की तीन श्रेणियों की व्याख्या करने के पश्चात् श्रीकृष्ण इन श्रेणियों के अनुरूप भोजन, क्रिया-कलाप, समर्पण, दान आदि के संबंध में बताते हैं।
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रिय: |
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु || 7||
लोग अपनी रुचि के अनुसार भोजन करना पसंद करते हैं। इसी प्रकार से उनकी रुचि यज्ञ, तपस्या तथा दान के संबंध में भी सत्य है। अब मुझसे इनके भेदों के संबंध में सुनो।
मन और शरीर एक दूसरे पर अपना प्रभाव डालते हैं। लोग जैसा करते हैं उसका वैसा ही प्रभाव उनके स्वभाव और मन पर पड़ता है। छांदोग्य उपनिषद में बताया गया है कि जो भोजन हम करते हैं, उसमें से सबसे ठोस भाग मल के रूप में निकलता है, सूक्ष्म भाग मांस बन जाता है तथा सूक्ष्मतम भाग मन बन जाता है (6.5.1)। इसमें पुनः वर्णन किया गया है-" आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि" (7.26.2) अर्थात् शुद्ध भोजन करने से मन शुद्ध होता है। यह भी सत्य है कि शुद्ध मन वाले लोग ही शुद्ध भोजन पसंद करते हैं।
आयु:सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धना: |
रस्या: स्निग्धा: स्थिरा हृद्या आहारा: सात्त्विकप्रिया: || 8||
सत्त्वगुणी लोग ऐसा भोजन पसंद करते हैं, जिससे आयु, सद्गुणों, शक्ति, स्वास्थ्य, प्रसन्नता तथा संतोष में वृद्धि होती है। ऐसे खाद्य पदार्थ रसीले, सरस, पौष्टिक तथा प्राकृतिक रूप से स्वादिष्ट होते हैं।
चौदहवें अध्याय के छठे श्लोक में श्रीकृष्ण ने व्याख्या की है कि सत्त्व गुण शुद्ध, प्रकाशवान तथा शांत है और यह प्रसन्नता तथा संतोष की भावना उत्पन्न करता है। सत्व गुण में खाद्य पदार्थों का भी वैसा ही प्रभाव होता है। उपरोक्त श्लोक में इन खाद्य पदार्थों का वर्णन 'आयुः सत्त्व' के साथ किया गया है जिसका तात्पर्य आयु बढ़ने से है। इन पदार्थों से स्वास्थ्य, सद्गुण, प्रसन्नता तथा संतोष प्राप्त होता है। ऐसे खाद्य पदार्थों में अनाज, दालें, सेम, फल, सब्जियाँ, दुग्ध तथा अन्य शाकाहारी पदार्थ सम्मिलित हैं। अतः शाकाहारी आहार, सत्वगुणों को विकसित करने के लिए लाभकारी है। सात्त्विक गुण से युक्त अनेक चिंतकों तथा दार्शनिकों ने इतिहास में इस विचार को बार-बार दोहराया है-
"शाकाहार का प्रचलन बढ़ रहा है, मस्तिष्क की स्पष्टता तथा भय ने मनुष्य को शाकाहारी बनने की प्रेरणा दी है। मांस का भक्षण करना हत्या है-बेंजामिन फ्रैंकलिन"
"क्या यह धिक्कार की बात नहीं है कि मनुष्य मांसाहारी जीव है? यह सत्य है कि जानवरों का शिकार करके मनुष्य अच्छी तरह से जीवनयापन कर सकता है किन्तु यह अधम है। मैं मानता हूँ कि मानव जाति उन्नति के क्रम में जानवरों को खाना छोड़ देते हैं। उसी प्रकार जैसे कि सभ्य लोगों के सम्पर्क में आने से जनजातियों ने एक-दूसरे को मारकर खाना छोड़ दिया है-हेनरी डेविड थोरो (वाल्डेन)" ।
"शाकाहार ने हमें मानसिक रूप से अशक्त तथा कार्य करने में अक्षम बना दिया है। मैं किसी भी अवस्था में मांसाहार को उचित नहीं समझता हूँ-महात्मा गांधी"
पाइथागोरस ने भी कहा है कि "मेरे मित्रों, अपने शरीर को मांसादि खाद्य पदार्थों से दूषित मत करो। हमारे पास धान्य तथा सेब आदि उपलब्ध हैं। ऐसी सब्जियाँ हैं जिन्हें अग्नि पर रखकर पकाया तथा नरम किया जा सकता है। इस पृथ्वी के पास अखाद्य पदार्थों का समृद्ध भंडार है और यह तुम्हें ऐसे भोज्य पदार्थ उपलब्ध करवाती है जिसमें कोई रक्त अथवा हत्या वाली वस्तु सम्मिलित नहीं है। केवल कुछ जंगली जानवर ही मांस से अपनी क्षुधा शांत करते हैं, क्योंकि घोड़े (अश्व), मवेशी तथा भेड़े भी घास पर ही आश्रित हैं।"
जॉर्ज बर्नाड शॉ ने कहा है कि "मैं अपने उदर को मृत पशुओं का कब्रिस्तान नहीं बनाना चाहता हूँ।"
पशुओं की हिंसा के संबंध में गोवध जघन्य अपराध है। गाय मानव जाति के लाभ हेतु दूध प्रदान करती है इसलिए यह माता के तुल्य है। दूध देने में अक्षम गायों को मारना एक असंवेदनशील, असभ्य और अकृतज्ञतापूर्ण कृत्य है
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिन: |
आहारा राजसस्येष्टा दु:खशोकामयप्रदा: || 9||
अत्यधिक कड़वे, खट्टे, नमकीन, गर्म, तीखे, शुष्क तथा मिर्च युक्त दाहकारक व्यंजन रजो गुणी व्यक्तियों को प्रिय लगते हैं ऐसे भोज्य पदार्थों के सेवन से पीड़ा, दुःखः तथा रोग उत्पन्न होते हैं।
जब शाकाहारी भोजनों को अत्यधिक मिर्च, शर्करा, नमक इत्यादि के साथ पकाया जाता है तब ये राजसिक बन जाते हैं। इनका वर्णन करते हुए 'अति' शब्द के प्रयोग को सभी विशेषणों के साथ जोड़ा जा सकता है। इस प्रकार राजसिक भोजन बहुत कड़वे, बहुत खट्टे, बहुत नमकीन, बहुत गर्म, बहुत तीक्ष्ण, बहुत शुष्क, अधिक मिर्च युक्त इत्यादि हैं। ये सभी भोजन अस्वास्थ्य, उत्तेजना और विषाद उत्पन्न करते हैं। राजसिक लोगों को ये भोजन अच्छे लगते हैं किन्तु सत्त्वगुणी व्यक्तियों को ये अरुचिकर लगते हैं। खाने का उद्देश्य स्वाद लेने का न होकर शरीर को स्वस्थ तथा सशक्त बनाना होना चाहिए। एक पुरानी कहावत है-"जीने के लिए खाना चाहिए न कि खाने के लिए जीना चाहिए।" इस प्रकार बुद्धिमत्ता इसमें है कि हम केवल ऐसा भोजन करें जो उत्तम स्वास्थ्य के अनुकूल हो और जिसके प्रभाव से हमारा मन शांत हो।
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् |
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् || 10||
अधिक पके हुए, बासी, सड़े हुए, प्रदूषित तथा अशुद्ध भोजन तमोगुणी व्यक्तियों के प्रिय भोजन हैं।
ऐसे भोज्य पदार्थ जिन्हें पकाये हुए एक याम (तीन घंटे) से अधिक की अवधि हो गयी हो, उन्हें तामसिक भोजन की श्रेणी में रखा जाता है। ऐसे भोज्य पदार्थ जो अशुद्ध, अस्वादिष्ट अथवा दुर्गंध वाले हैं, वे भी इसी श्रेणी में आते हैं। अशुद्ध भोज्य पदार्थों में भी सभी प्रकार के मांस उत्पाद भी सम्मिलित हैं। प्रकृति ने मानव शरीर की रचना शाकाहारी प्राणी के रूप में ही की है। मनुष्यों के दांत मांसभक्षी जानवरों जैसे बड़े नहीं होते और उनका जबड़ा चौड़ा नहीं होता जिससे कि वह मांस को फाड़ सकें। मांसभक्षी जानवरों की आंतें छोटी होती हैं जिसके कारण मांस को आगे पहुँचने में बहुत कम समय लगता है जो बहुत तीव्रता से गलता तथा सड़ता है। इसके विपरीत मनुष्यों का पाचन तंत्र बड़ा होता है जो वनस्पतियों से प्राप्त भोजन को धीरे-धीरे तथा उत्तम ढंग से पचाता है। मांसभक्षी जानवरों का उदर अधिक अम्लीय होता है, जो कच्चे मांस को पचाने में सहायता करता है। मांसाहारी जानवरों का स्वेद (पसीना) उनके रोमछिद्रों से नहीं निकलता। इसके स्थान पर वे अपने शरीर का तापमान अपनी जिह्वा से नियंत्रित करते हैं जबकि शाकाहारी जानवर तथा मनुष्य अपने शारीरिक तापमान को अपनी त्वचा से स्वेद (पसीना) निकालकर नियंत्रित करते हैं। मांसाहारी जानवर पानी को घूँट में पीने के स्थान पर जिह्वा से पीते हैं। इसके विपरीत शाकाहारी जानवर पानी को घूँट भरकर पीते हैं। मनुष्य भी पानी घूँट से पीता है, जीभ से नहीं पीता है। इन सभी शारीरिक लक्षणों से ज्ञात होता है कि भगवान ने मनुष्यों की रचना मांसाहारी जानवरों के समान नहीं की है। परिणास्वरूप मांस को मनुष्यों के लिए अशुद्ध भोजन माना गया है। मनुस्मृति में कहा गया है कि मांस का सेवन करने से पाप कर्म उत्पन्न होते हैं-
मां स भक्षयितामुत्र यस्य मासं इहाद्म्य अहं।
एतन् मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिण:।।
(मनुस्मृति-5.55)
'मांस' शब्द का तात्पर्य है-मैं जिसका मांस खा रहा हूँ वह अगले जीवन (योनि) में मुझे खाएगा।
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते |
यष्टव्यमेवेति मन: समाधाय स सात्त्विक: || 11||
धर्मशास्त्रों की आज्ञा के अनुसार किसी फल की अपेक्षा किए बिना, मन की दृढ़ता के साथ अपना कर्त्तव्य समझते हुए किया गया यज्ञ सत्त्वगुणी प्रकृति का है
यज्ञ की प्रकृति भी तीन गुणों वाली है। श्रीकृष्ण सत्त्वगुणी अवस्था में यज्ञ करने को समझाते हुए अपनी व्याख्या आरंभ करते हैं। अफलाकाङ्क्षिभिः शब्द का अर्थ बिना किसी फल की अपेक्षा किए यज्ञ करना है। विधिदृष्टः शब्द का अर्थ यह है कि वैदिक धर्मग्रन्थों के विधि-निषेधों के अनुसार ही यज्ञ करना चाहिए। यष्टव्यमेवेति का अर्थ है कि इसे केवल भगवान की आराधना के लिए किया जाना चाहिए। जब यज्ञ इस विधि से सम्पन्न किया जाता है तब इसे सत्त्वगुण की श्रेणी में रखा जाता है।
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् |
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् || 12||
हे श्रेष्ठ भरतवंशी! जो यज्ञ भौतिक लाभ अथवा दंभपूर्ण उद्देश्य के साथ किया जाता है उसे रजोगुणी श्रेणी का यज्ञ समझो।
यदि यज्ञ का अनुष्ठान बड़े धूमधाम के साथ किया जाता है तब यह एक व्यवसाय का रूप ले लेता है क्योंकि इसके पीछे स्वार्थ की एक ही भावना रहती है-"मुझे इसके प्रतिफल में क्या प्राप्त होगा?" शुद्ध भक्ति वहाँ होती है जहाँ प्रतिफल के रूप में कुछ भी पाने की इच्छा नहीं होती। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञ को उत्सव के रूप में सम्पन्न किया जा सकता है किन्तु यदि यह प्रतिष्ठा, अभ्युदय इत्यादि को पाने की इच्छा से किया जाता है तब फिर यह राजसी प्रकृति का कहलाता है।
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् |
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते || 13||
श्रद्धा विहीन होकर तथा धर्मग्रन्थों की आज्ञाओं के विपरीत किया गया यज्ञ जिसमें अन्न अर्पित न किया गया हो, मंत्रोच्चारण न किए गए हों तथा दान न दिया गया हो, ऐसे यज्ञ की प्रकृति तमोगुणी होती है।
जीवन के प्रत्येक क्षण में मनुष्यों के पास कर्म के अनेक विकल्प होते हैं। ऐसे कई कर्म हैं जो समाज तथा हमारे लिए हितकारी हैं तथा इसके साथ-साथ ऐसे कई कर्म भी हैं जो अन्य लोगों तथा हमारे लिए हानिकारक हैं किन्तु इसका निर्णय कौन करेगा कि क्या लाभकारी है और क्या हानिकारक? यदि कोई विवाद उत्पन्न होता है तो इसे सुलझाने का क्या आधार है? यदि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं निर्णय लेने लगेगा तो बड़ा उपद्रव हो जाएगा। अतः धर्मशास्त्र हमारे मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते हैं तथा जब कभी शंका होती है तब किसी क्रिया की उपयुक्तता को जानने के लिए हम इन धर्मशास्त्रों की सहायता लेते हैं। किन्तु तामसिक व्यक्तियों का इन धर्म शास्त्रों में कोई विश्वास नहीं होता। वे धार्मिक समारोह का तो आयोजन करते हैं लेकिन धर्मग्रन्थों के विधानों की उपेक्षा करते हैं।
भारत में प्रत्येक धार्मिक उत्सव में देवताओं की आराधना बड़ी धूमधाम के साथ की जाती है। समारोह की बाह्य भव्यता-भड़कीली सजावट, चमकदार पण्डाल तथा शोरगुल वाले संगीत के पीछे पास-पड़ोस से दान एकत्रित करने का उद्देश्य होता निहित है। इसके अतिरिक्त पुरोहितों को सम्मान के रूप में दक्षिणा देने संबंधी वैदिक विधि-निषेधों का पालन भी नहीं किया जाता। जिस यज्ञ में धर्मग्रंथों की उपेक्षा की जाती है और आलस्य, उदासीनता अथवा विद्रोह के कारण धर्मशास्त्रों के नियमों का पालन नहीं किया जाता और स्वतः निर्णय की प्रक्रिया अपनाई जाती है, वह यज्ञ तमोगुण की श्रेणी में आता है। वास्तव में इस प्रकार की आस्था, भगवान तथा धर्मशास्त्रों में अविश्वास का एक दूसरा रूप है।।
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् |
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते || 14||
परमपिता परमात्मा, ब्राह्मणों, आध्यात्मिक गुरु, बुद्धिमान तथा श्रेष्ठ सन्तजनों की पूजा यदि पवित्रता, सादगी, ब्रह्मचर्य तथा अहिंसा के साथ की जाती है तब इसे शरीर की तपस्या कहा जाता है।
'तप' शब्द का तात्पर्य है अग्नि पर तपाना या पिघलाना। शुद्धिकरण की प्रक्रिया में धातुओं को गर्म किया जाता है तथा पिघलाया जाता है ताकि अशुद्धता ऊपर आ जाए और उसे हटाया जा सके। जब स्वर्ण को अग्नि में रखा जाता है तब इसकी अशुद्धता नष्ट हो जाती है एवं इसकी चमक और बढ़ जाती है। इसी प्रकार वेदों में कहा गया है-“अतप्ततर्नुनतदा भिश्नुते" (ऋग्वेद 9.8.3.1) अर्थात तप से शरीर को शुद्ध किए बिना कोई भी व्यक्ति योग की अंतिम अवस्था तक नहीं पहुँच सकता। निष्ठापूर्वक तप करने से मनुष्य इस लोक से परलोक तक अपने जीवन का उत्थान कर सकते हैं। ऐसा तप बिना किसी दिखावा के शुद्ध भावना के साथ आध्यात्मिक गुरु तथा धर्मशास्त्रों के मार्गदर्शन के अनुसार किया जाना चाहिए।
श्रीकृष्ण अब ऐसे तप का वर्गीकरण शरीर, वाणी और मन के तप के रूप में करते हैं। इस श्लोक में वह शरीर के तप के संबंध में बताते हैं। जब यह शरीर सात्त्विक जनों एवं पुण्यात्माओं की सेवा के लिए समर्पित होता है तब सामान्यतः सभी प्रकार के इन्द्रिय भोग तथा विशेष रूप से कामदोष का परिहार हो जाता है तब यह शरीर के तप के रूप में प्रकाशित होता है। ऐसा तप शुचिता, सादगी से युक्त होना चाहिए और यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इससे किसी अन्य को कोई दुःख न पहुँचे। यहाँ पर ब्राह्मण उसे नहीं कहा गया है जो जन्म से ब्राह्मण हैं बल्कि वे ऐसे मनुष्य हैं जो सात्त्विक गुणों से सम्पन्न हैं। इसका वर्णन श्लोक 18.42 में भी किया गया है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् |
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते || 15||
ऐसे शब्द जो दुःख का कारण नहीं बनते, सच्चे, अहानिकर तथा हितकारी होते हैं। तथा वैदिक ग्रन्थों के स्वाध्याय को वाणी का तप कहा गया है।
वाणी के तप का तात्पर्य उच्चारित किए जाने वाले वे शब्द हैं जो श्रोता के लिए सच्चे, अहानिकर, आनन्ददायक तथा हितकारी होते हैं। वैदिक मंत्रों का अनुवाचन करना भी वाणी के तप में सम्मिलित है। प्रजापति मनु ने लिखा है-
सत्यम् ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः।।
(मनुस्मृति-4.138)
"सत्य को इस प्रकार से कहना चाहिए जिससे दूसरों को प्रसन्नता हो। सत्य को इस प्रकार नहीं बोलना चाहिए जिससे किसी अन्य का अहित हो। कभी भी असत्य नहीं बोलना चाहिए भले ही यह प्रिय ही क्यों न हो। यह नैतिकता और सनातन धर्म है।"
मन: प्रसाद: सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रह: |
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते || 16||
विचारों की शुद्धता, विनम्रता, मौन, आत्म-नियन्त्रण तथा उद्देश्य की निर्मलता इन सबको मन के तप के रूप में चित्रित किया गया है।
शरीर तथा वाणी की तुलना में मन का तप अधिक श्रेष्ठ है। यदि हम अपने मन को नियंत्रित करना सीख लेते हैं तब शरीर तथा वाणी स्वतः ही नियंत्रित हो जाएंगे। किन्तु यदि हम इसके विपरीत व्यवहार करते हैं तब आवश्यक नहीं कि मन नियंत्रित हो। वस्तुतः किसी व्यक्ति की अंतः चेतना को उसकी मन की अवस्था ही निर्धारित करती है। श्रीकृष्ण ने श्लोक 6.5 में बताया था-"मन की शक्ति द्वारा स्वयं को उन्नत करो और स्वयं को नीचा न समझो क्योंकि तुम्हारा मन तुम्हारा मित्र भी हो सकता है और शत्रु भी।"
मन एक बगीचे के सदृश है जिसे या तो भली प्रकार विकसित किया जा सकता है अथवा जिसे जंगल की तरह रहने दिया जा सकता है। किसान अपने खेत को जोतते हैं और इसमें फल, फूल तथा सब्जियों उगाते हैं। इसके साथ-साथ वे यह भी सुनिश्चित करते हैं कि यह खरपतवार से भी मुक्त रहें। इसी प्रकार से हमें अपने मन से नकारात्मक विचारों को निकालते हुए उसे उत्तम विचारों द्वारा उन्नत बनाना चाहिए। यदि हम क्रोधयुक्त, द्वेषयुक्त, घृणास्पद, दोषपूर्ण, निर्मम, जटिल तथा आलोचनात्मक विचारों को अपने मन में स्थान देंगें तब इनका हमारे व्यक्तित्व पर दुष्प्रभाव पड़ेगा। हम तब तक कोई भी रचनात्मक कार्य नहीं कर सकते जब तक हम अपने मन को नियंत्रित करना तथा इसे क्रोध, घृणा, वैमनस्य इत्यादि से उत्तेजित होने से दूर रखना नहीं सीख लेते। ये वही खरपतवार है जो हमारे हृदयों में दिव्य कृपा के प्रस्फुटन के मार्ग को अवरुद्ध करते हैं।
लोग मानते हैं कि उनके विचार अदृश्य हैं और मन के भीतर होने के कारण उनका कोई बाह्य महत्व नहीं है तथा वे अन्य लोगों की दृष्टि से परे हैं। वे इस बात को नहीं समझते कि विचार न केवल उनके आंतरिक चरित्र का बल्कि उनके बाह्य चरित्र का भी निर्माण करते हैं। अतः हम किसी को देखकर कहते हैं-"वह बहुत सादा तथा विश्वसनीय व्यक्ति लगता है" और किसी अन्य व्यक्ति के लिए कहते हैं-"वह बहुत ही धूर्त तथा धोखेबाज लगता है उससे तो दूर ही रहो।" यह विचार ही थे जिन्हें लोगों ने अपने हृदय में प्रश्रय दिया और वे ही मूर्त रूप में उनके व्यक्तित्त्व के रूप में प्रकट हुए। रॉल्फ वॉल्डो इमर्सन ने कहा था कि "हमारे नेत्रों की झलक में, हमारी प्रसन्नताओं में, हमारे अभिवादनों में और हाथों के स्पर्श में हमारा व्यक्तित्व चित्रित है। हमारे पापकर्म हमें दूषित करते हैं, समस्त अच्छी धारणाओं का विनाश करते हैं। लोग नहीं जानते कि वे क्यों हमारा विश्वास नहीं करते। बुराई आंखों पर पर्दा डालती है, हमारे कोपलों की लालिमा को मंद करती है, हमारी नाक नीची करवाती है और राजा को कलंकित कर उसके मस्तक पर 'हे मूर्ख, मूर्ख' लिखती है।" विचारों का चरित्र के साथ संबध करने वाले अन्य कथन इस प्रकार हैं-
अपने विचारों पर ध्यान दें क्योंकि यही शब्द बन जाते हैं।
अपने शब्दों पर ध्यान दें क्योंकि यही आपकी प्रतिक्रिया बन जाते हैं।
अपनी क्रियाओं पर ध्यान दें क्योंकि यही आपकी आदतें बन जाती हैं।
अपनी आदतों पर ध्यान दें क्योंकि इन्हीं आदतों से आपका चरित्र निर्माण होता है।
अपने चरित्र पर ध्यान दें क्योंकि यही आपका भाग्य बनाता है।
यह समझना आवश्यक है कि प्रत्येक नकारात्मक विचार जिन्हें हम अपने मन में प्रश्रय देते हैं उनसे हम स्वयं को हानि पहुँचाते हैं। साथ ही प्रत्येक सकारात्मक विचार जिनपर हम अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं, उनसे हमारा उत्थान होता है। हेनरी वान डाईक ने अपनी कविता 'थॉट्स आर् थिंग्स' में इसे विशद रूप से व्यक्त किया है
मैं इसे सत्य मानता हूँ कि सभी विचार वस्तुमात्र हैं।
वे शरीर, श्वासों और पंखों से युक्त हैं।
वे जिन्हें हम अपने गोपनीय विचार कहते हैं।
वह चौगुनी गति से पृथ्वी के दूरस्थ स्थान पर।
अपने गौरव और संतापो को पीछे छोड़ते हुए पटरियों छूटने के समान आगे बढ़ते हैं।
हम विचारों द्वारा अपना भविष्य निर्माण करते हैं।
परंतु ये शुभ या अशुभ हैं।
यह कोई नहीं जानता इसलिए अपनी नियति का चयन करो और प्रतीक्षा करो।
प्रेम से प्रेम बढ़ता है और घृणा से घृणा उत्पन्न होती है।
प्रत्येक विचार जिन पर हम अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं उनके फल हमें प्राप्त होते हैं तथा प्रत्येक विचार से हमारे भाग्य का निर्माण होता है। इसी कारण नकारात्मक भावों से मन को हटाकर सकारात्मक भावों को मन के भीतर स्थान देने को मन का तप कहा गया है।
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरै: |
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तै: सात्त्विकं परिचक्षते || 17||
जब धर्मनिष्ठ व्यक्ति उत्कृष्ट श्रद्धा के साथ किसी प्रकार की लालसा के बिना उपर्युक्त तीन प्रकार की तपस्याएँ करते हैं, तब इन्हें सत्त्वगुणी टैप कहा जाता है।
शरीर, वाणी और मन की तपस्याओं का चित्रण करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब उनके उन लक्षणों का उल्लेख करते हैं, जब ये सत्त्वगुण में सम्पन्न की जाती हैं। वे कहते हैं कि भौतिक लाभों को प्राप्त करने के उद्देश्य से सम्पन्न की गई तपस्या अपनी पवित्रता को खो देती है। इसलिए इसे निःस्वार्थ भाव और बिना फल की आसक्ति से सम्पन्न करना चाहिए। सफलता और असफलता दोनों ही स्थितियों में तपस्या के महत्व को स्वीकार करना चाहिए। आलस्य या असुविधा के कारण इसका अभ्यास स्थगित नहीं किया जाना चाहिए।
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् |
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् || 18||
जब किसी तपस्या को मान-सम्मान प्राप्त करने के लिए दंभपूर्वक सम्पन्न किया जाता है तब यह राजसी कहलाती है। इससे प्राप्त होने वाले लाभ अस्थायी तथा क्षणभंगुर होते हैं।
स्वयं के शुद्धिकरण के लिए यद्यपि तपस्या एक उत्तम साधन है किंतु सभी व्यक्ति इसका उपयोग शुद्ध भावना से नहीं करते। एक राजनीतिज्ञ अपने भाषणों के लिए कड़ा परिश्रम करता है। यह भी तप का एक प्रकार है किंतु इसके पीछे उसका उद्देश्य पद तथा प्रतिष्ठा पाना होता है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति सम्मान, यश और अति प्रशंसा प्राप्त करने के लिए स्वयं को आध्यात्मिक गतिविधियों में व्यस्त रखता है तो इसके पीछे भी कोई भौतिक उद्देश्य जुड़ा होता है किंतु इसका माध्यम भिन्न होता है। ऐसी तपस्या को राजसी श्रेणी में रखा गया है जो सम्मान, सत्ता अथवा अन्य भौतिक प्रतिफलों को प्राप्त करने के लिए सम्पन्न की जाती है।
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तप: |
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् || 19||
वह तप जो भ्रमित विचारों वाले व्यक्तियों द्वारा किया जाता है तथा जिसमें स्वयं को यातना देना तथा दूसरों का अनिष्ट करना सम्मिलित हो, उसे तमोगुणी कहा जाता है।
'मूढग्राहेणात्मनो' शब्द ऐसे व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त है जो भ्रमित मत अथवा विचारों वाले होते हैं। जो तप के नाम पर बिना सोचे समझें स्वयं को यातना देते हैं और दूसरों को भी आहत करते हैं। इनके हृदय में धर्मग्रन्थों में दिए गये उपदेशों के प्रति कोई आदर नहीं होता और न ही ये शरीर की क्षमताओं के विषय में जानते हैं। इस प्रकार के तपों से कोई भी सकारात्मक सिद्धि प्राप्त नहीं होती क्योंकि इन्हें शारीरिक चेतना के साथ सम्पन्न किया जाता है तथा इनका उद्देश्य केवल अपना प्रचार करना होता है।
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे |
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् || 20||
जो दान बिना प्रतिफल की कामना से यथोचित समय और स्थान में किसी सुपात्र को दिया जाता है वह सात्त्विक दान माना जाता है।
अब दान के तीन भेदों का वर्णन किया जा रहा है। सामर्थ्यानुसार दान देना मनुष्य का कर्तव्य माना गया है। भविष्य पुराण में कहा गया है “दानमेकम् कलौ युगे" अर्थात् कलि के युग में दान देना परमावश्यक है। रामचरितमानस में भी ऐसा कहा गया है-
प्रगट चारी पद धर्म के कलि महँ एक प्रधान।
येन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान।।
"धर्म के चार पाद हैं। कलियुग में इनमें से एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, वह है यथासंभव दान करना।" दान करने से कई प्रकार के लाभ होते हैं। दान देने से हमारा भौतिक वस्तुओं से मोह कम होता है। सेवाभाव में वृद्धि होती है। इससे हृदय विशाल होता है तथा अन्य लोगों के प्रति करुणा की भावना जागृत होती है। अतः अधिकांश धार्मिक सम्प्रदायें अपनी आय का 10वां भाग दान में हैं। स्कंदपुराण में उल्लेख किया गया है-
न्यायोपार्जितवित्तस्य दशमांशेन धीमतः।
कर्तव्यो विनियोगश्च ईश्वरप्रीत्यर्थमेव च।।
"उचित साधनों द्वारा और श्रेष्ठ बुद्धि बल द्वारा अर्जित की गई संपत्ति में से 10वां भाग अपना कर्त्तव्य मानकर दान में दे देना चाहिए। अपने दान को भगवान की प्रसन्नता के लिए अर्पित करो।" इस श्लोक में श्रीकृष्ण द्वारा वर्णित हेतुओं के अनुसार दान को उचित अथवा अनुचित, श्रेष्ठ अथवा निम्न श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। जब उचित समय पर तथा उपयुक्त स्थान पर किसी सुपात्र को मुक्त हृदय से दान दिया जाता है, तब इसे सत्त्वगुणात्मक माना जाता है।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुन: |
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् || 21||
लेकिन अनिच्छापूर्वक अथवा फल प्राप्त करने की अपेक्षा से दिए गये दान को रजोगुणी कहा गया है।
श्रेष्ठतम भाव तो यह है कि बिना किसी के कहे दान करना चाहिए। दूसरा श्रेष्ठ भाव यह है कि दान की मांग करने पर प्रसन्नतापूर्वक दान दे दिया जाए। तीसरा भाव है कि मांगे जाने पर संकुचित भाव से दान देना या बाद में पश्चात्ताप करना कि 'मैंने इतना क्यों दे दिया?' या 'मैं अल्प राशि देकर भी छुटकारा पा सकता था।' श्रीकृष्ण इस प्रकार के दान को रजोगुण की श्रेणी में रखते हैं।
अदेशकाले यद्दानमपात्रेश्यश्च दीयते |
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् || 22||
ऐसा दान जो अपवित्र स्थान तथा अनुचित समय पर कुपात्र व्यक्तियों को या बिना आदर भाव के अथवा अवमानना के साथ दिया जाता है, उसे तमोगुणी दान माना जाता है।
तमोगुण में उचित स्थान, व्यक्ति, भावना अथवा समय का विचार किए बिना दान किया जाता है। इससे किसी प्रकार के उद्देश्य की प्राप्ति नहीं होती। उदाहरणार्थ यदि धन को किसी मदिरापान करने वाले व्यक्ति को दिया जाता है, तब वह इसका प्रयोग मदिरा क्रय करने में करेगा तथा किसी की हत्या करेगा। हत्यारे को कर्मों के नियमों के अनुसार निश्चय दंड मिलेगा। किंतु जिस व्यक्ति ने यह दान दिया है वह भी इस अपराध का दोषी होगा और दंड का भागी बनेगा। यह तमोगुण के प्रभाव में किए गए दान का एक उदाहरण है जो किसी कुपात्र को दिया गया था।
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध: स्मृत: |
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिता: पुरा || 23||
सृष्टि के आरंभ से 'ॐ-तत्-सत्' इन शब्दों को परम सत्य की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति माना गया है। इन्हीं से पुरोहित, (ब्राह्मण) वेद तथा यज्ञ की उत्पत्ति हुई है।
इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने माया के तीन गुणों के अनुसार- यज्ञ, तप तथा दान की व्याख्या की हैं। इन तीन गुणों में तमोगुण आत्मा को अज्ञानता, शिथिलता तथा निष्क्रियता में डालता है। रजोगुण व्यक्ति को उत्साहित करता है तथा उसे असंख्य इच्छाओं से जोड़ता है। सत्त्वगुण निर्मल, प्रकाशवान तथा गुणों का विकास करता है। किंतु सत्त्वगुण माया के अधिकार क्षेत्र में है अतः हमें इसके साथ भी सम्बद्ध नहीं होना चाहिए बल्कि हमें सत्त्वगुण को सोपान के रूप में प्रयोग करके लोकातीत अवस्था को प्राप्त करना चाहिए। इस श्लोक में श्रीकृष्ण तीन गुणों से भी परे जाने का वर्णन करते हैं और 'ओम्-तत्-सत्' शब्दों के संबंध में बताते हैं। ये शब्द परम सत्य के विभिन्न पक्षों का निरूपण करते हैं। आगे के श्लोकों में वे उन तीन शब्दों के महत्त्व की व्याख्या करते हैं।
तस्माद् ॐ इत्युदाहृत्य यज्ञदानतप:क्रिया: |
प्रवर्तन्ते विधानोक्ता: सततं ब्रह्मवादिनाम् || 24||
इसलिए यज्ञ, दान और तपस्या आदि का शुभारम्भ वेदों के निर्देशानुसार 'ओम्' का उच्चारण करते हुए होता है।
ओम् पद भगवान के निराकार रूप की एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। यह निराकार ब्रह्म के नाम के रूप में स्वीकृत है। यह वह मूल ध्वनि है जो सृष्टि में व्याप्त रहती है। इसका शुद्ध उच्चारण खुले मुख के साथ 'आ', ओष्ठों को सिकोड़कर 'ऊ' तथा ओष्ठों को पीछे लाकर 'म' ध्वनि निकालने से होता है। इसे मांगलिक कार्यों के संपादन में अनेक वैदिक मंत्रों के आरंभ में रखा गया है।
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतप:क्रिया: |
दानक्रियाश्च विविधा: क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभि: ||
ऐसे व्यक्ति जो किसी फल की कामना नहीं करते किन्तु भौतिक कष्टों से मुक्त रहना चाहते हैं वे तप, यज्ञ तथा दान आदि करते समय 'तत्' शब्द का उच्चारण करते हैं।
हमारे द्वारा किए जाने वाले कर्मों का फल देना भगवान के हाथ में है। अतः यज्ञ, तप तथा दान परमपिता परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए किए जाने चाहिए। श्रीकृष्ण 'तत्' शब्द की महिमा बताते हैं। तप, यज्ञ तथा दान के साथ 'तत्' उच्चारित करना यह दर्शाता है कि ये कृत्य भौतिक लाभों के लिए नहीं अपितु भगवत्प्राप्ति के लिए तथा आत्मा के नित्य कल्याण के लिए सम्पन्न किए जाने चाहिए।
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते |
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्द: पार्थ युज्यते || 26||
यज्ञे तपसि दाने च स्थिति: सदिति चोच्यते |
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते || 27||
सत् शब्द का अर्थ नित्यत्व और साधुत्व है। हे अर्जुन! इसका प्रयोग शुभ कर्मों को सम्पन्न करने समय किया जाता है। तप, यज्ञ तथा दान जैसे कार्यों को सम्पन्न करने में प्रयुक्त होने के कारण इसे 'सत्' शब्द द्वारा वर्णित किया जाता है। अतः ऐसे किसी भी उद्देश्य के लिए किए जाने वाले कार्य के लिए 'सत्' नाम दिया गया है।
अब श्रीकृष्ण 'सत्' शब्द की महिमा का व्याख्यान कर रहे हैं। 'सत्' शब्द के कई अर्थ हैं तथा ऊपर के दो श्लोकों में इनमें से कुछ का उल्लेख किया गया है। सत् का प्रयोग शाश्वत साधुत्व और धर्म के अर्थ में किया जाता है। जो सदैव विद्यमान रहता है वह भी सत् है। श्रीमद्भागवतम् में कहा गया है-
सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये।
सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.2.26)
"हे भगवान! आप सत्य संकल्प हैं क्योंकि आप केवल परम सत्ता ही नहीं बल्कि ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्ति के तीन चरणों-सृजन, स्थिति और लय में भी सत्य स्वरूप हैं। तुम सबके मूल हैं, और इसका अंत भी हैं। आप सभी सत्यों का सार हैं और आप वे नेत्र भी हैं जिससे सत्य को देखा जा सकता है। इसलिए हम आपके 'सत्' अर्थात् परम सत्य के शरण गत हैं, कृपया हमारी रक्षा करें।"
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् |
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह || 28||
हे पृथा पुत्र! जो भी यज्ञकर्म या तप बिना श्रद्धा के किए जाते हैं वे 'असत्' कहलाते है। ये इस लोक और परलोक दोनों में व्यर्थ जाते हैं।
सभी वैदिक अनुष्ठानों का पालन श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए। इस तथ्य को दृढ़ता से स्थापित करने के लिए श्रीकृष्ण अब बिना श्रद्धा के साथ किए जाने वाले वैदिक कर्मकाण्डों की निरर्थकता पर प्रकाश डालते हैं। वे कहते हैं कि वे जो धर्मग्रंथों पर विश्वास किए बिना कर्म करते हैं वे इस जन्म में अच्छे फल प्राप्त नहीं करते क्योंकि उनके कार्य सुचारु रूप से निष्पादित नहीं होते, क्योंकि वे वैदिक ग्रंथों के विधि-निषेधों का पालन नहीं करते। इसलिए उन्हें अगले जन्म में भी शुभ फल प्राप्त नहीं होते। अतः किसी की श्रद्धा उसके मन और बुद्धि की पूर्व वासनाओं पर आधारित नहीं होनी चाहिए। अपितु यह वैदिक ग्रंथों और गुरु के आप्तवचन पर आधारित होनी चाहिए। यही सत्रहवें अध्याय का सार है।
।। श्रीमद्भगवत गीता का सत्रहवां अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
Bhagavat Gita Chapter 16
kathaShrijirasik
अध्याय सोलह: दैवासुर सम्पद् विभाग योग
दैवीय और आसुरी प्रकृति में भेद का योग
इस अध्याय में श्रीकृष्ण दैवीय और आसुरी दो प्रकार की प्रकृति का वर्णन करते हैं। दैवीय गुण धार्मिक ग्रंथों के उपदेशों के अनुसरण, सत्त्वगुण को पोषित करने और अध्यात्मिक अभ्यास द्वारा मन को शुद्ध करने से विकसित होते हैं। ये दैवीय गुणों में वृद्धि करते हैं और अंततः भगवत्प्राप्ति तक पहुँचाते हैं। इसके विपरीत संसार में आसुरी प्रवृत्ति भी पायी जाती है, जो मोह अर्थात् आसक्ति और अज्ञानता के गुणों से तथा भौतिक विचारों द्वारा विकसित होती है। यह हमारे व्यक्तित्व में अवगुणों का पोषण करती है और अंततः आत्मा को नारकीय अवस्था में धकेलती है।
यह अध्याय दैवीय गुणों से सम्पन्न पुण्यात्माओं के निरूपण से शुरू होता है। आगे इसमें आसुरी गुणों का भी वर्णन किया गया है जिनका अति सतर्कता के साथ त्याग करना चाहिए, क्योंकि ये आत्मा को पुनः अज्ञानता और 'संसार' अर्थात् जीवन और मृत्यु के चक्र में खींचते हैं। श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं कि क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं किया जाना चाहिए, इसका निर्णय करने का अधिकार केवल वेद शास्त्रों का ही माना जाता है अतः हमें भी वेदों के वाक्यों को मानना चाहिए। हमें इन वैदिक शास्त्रों के विधि-निषेधों को समझना चाहिए और तदनुसार इस संसार में अपने कार्यों का निष्पादन और दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।
श्रीभगवानुवाच |
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति: |
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् || 1||
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम् |
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् || 2||
तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहोनातिमानिता |
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत || 3||
परम पुरुषोत्तम भगवान् ने कहाः हे भरतवंशी! निर्भयता, मन की शुद्धि, अध्यात्मिक ज्ञान में दृढ़ता, दान, इन्द्रियों पर नियंत्रण, यज्ञों का अनुष्ठान करना, धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन, तपस्या और स्पष्टवादिता, अहिंसा, सत्यता, क्रोधहीनता, त्याग, शांतिप्रियता, दोषारोपण से मुक्त, सभी जीवों के प्रति करूणा का भाव, लोभ से मुक्ति, भद्रता, लज्जा, स्थिरता, शक्ति, क्षमाशीलता, धैर्य, पवित्रता, शत्रुता के भाव से मुक्ति और प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्ति होना, ये सब दिव्य प्रकृति से संपन्न लोगों के गुण हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण दैवीय प्रकृति के छब्बीस गुणों का वर्णन करते हैं। परम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए तथा अपने आध्यात्मिक अभ्यास के अंग के रूप में हमें इन गुणों का पोषण करना चाहिए।
निर्भयताः यह वर्तमान और भविष्य के दुःखों की चिन्ता से मुक्त होने की अवस्था है। अत्यधिक आसक्ति भय का कारण होती है। धन संपदा में आसक्ति घोर दरिद्रता भय उत्पन्न करती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रति आसक्ति अपयश के भय का कारण होती है। दुर्व्यसनों में आसक्ति पाप के फल का भय उत्पन्न करती है और शरीर के सुखों के प्रति आसक्ति से अस्वस्थ होने का भय सताता है। अतः विरक्ति और भगवान की शरणागति सभी भयों को नष्ट करती है।
मन की शुद्धिः यह आंतरिक शुद्धिकरण की अवस्था है। मन विचारों, कल्पनाओं, भावुकता आदि को जन्म और प्रश्रय देता है। जब यह नैतिक, सकारात्मक और उन्नत होते हैं तब मन शुद्ध हो जाता है और जब ये अनैतिक और कुत्सित होते हैं तब मन को अशुद्ध माना जाता है। मोह के कारण भौतिक पदार्थों के प्रति आसक्ति और अज्ञानता मन को दूषित करती है, जबकि भगवान में प्रीति मन को शुद्ध करती है।
आध्यात्मिक ज्ञान में दृढ़ताः यह कहा जाता है कि "तत्त्वविस्मरणात् भेकिवत्" अर्थात् "जब मनुष्य यह भूल जाता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित है तब वह पशु बन जाता है।" इसलिए अध्यात्मिक सिद्धांतो के प्रति जागृत रहने के लिए सदाचार के पथ पर चलना चाहिए।
दान पुण्यः इसका तात्पर्य धन-सम्पदा आदि को शुभ कार्य के लिए दान करने से है। वास्तविक दान वही है जो न केवल "मैं दाता हूँ" की भावना से मुक्त होकर किया जाए बल्कि इसे भगवान द्वारा प्रदत्त अवसर समझ कर उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता की भावना से युक्त होकर करना चाहिए। द्रव्य का दान शरीर के पालन पोषण हेतु किया जाता है, जिससे दूसरों को थोड़ी ही सहायता प्राप्त होती है। आध्यात्मिक दान आत्मा के स्तर पर किया जाता है, जो उन सभी प्रकार के दुःखों के कारणों का निवारण करता है जो भगवान से विमुख होने के कारण सहन करने पड़ते हैं। इसे भौतिक दान से श्रेष्ठ माना जाता है।
इन्द्रिय संयमः मन को सांसारिक मोह में डालने में इन्द्रियाँ कुशल होती हैं। ये जीवों को इन्द्रिय तृप्ति के लिए उकसाती हैं इसलिए धर्म के मार्ग का अनुसरण करने के लिए और परम लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु तुच्छ इन्द्रिय सुखों का त्याग करना आवश्यक है। इस प्रकार से इन्द्रियों पर संयम रखना भगवत्प्राप्ति के मार्ग पर चलने के लिए आवश्यक गुण है।
यज्ञ परायणताः इसका तात्पर्य वैदिक कर्त्तव्यों और सामाजिक दायित्वों का पालन करना है। यज्ञों को तभी परिपूर्ण माना जाता है जब इन्हें भगवान के सुख के लिए संपन्न किया जाता है।
शास्त्रों का अध्ययन करनाः दिव्य गुणों को विकसित करने से शास्त्रों के उन्नत ज्ञान का बुद्धि द्वारा धारण किया जाता है। जब बुद्धि सही ज्ञान से प्रकाशित हो जाती है तब मनुष्य के कर्म स्वतः उत्कृष्ट हो जाते हैं।
तपस्याः मन, शरीर और इन्द्रियों की प्रवृत्ति ऐसी होती है कि यदि हम इन्हें संतुष्ट करते हैं तब ये और अधिक सुख प्राप्त करने की लालसा करते हैं और यदि हम इन पर अंकुश लगाते हैं, तब ये अनुशासित हो जाते हैं। इअतः शरीर, मन और बुद्धि को शुद्ध करने के लिए कष्ट सहन करना तपस्या है।
अहिंसाः इसका अर्थ अन्य लोगों के जीवन में विचारों, वाणी और कर्मों द्वारा बाधा न पहुँचना है।
स्पष्टवादिताः वाणी और आचरण में निष्कपटता मन को निर्मल करती है और मन में श्रेष्ठ विचारों को अंकुरित करती है। 'सादा जीवन उच्च विचार' यह कहावत स्पष्टवादिता के लाभों को समुचित रूप से चित्रित करती है।
सत्यताः इसका अर्थ अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए तथ्यों का विरूपण न करना है। भगवान परम सत्य हैं, इसलिए सत्य परायणता का अभ्यास हमें उनकी ओर ले जाता है जबकि झूठ भले ही लाभदायक हो, लेकिन हमें भगवान से विमुख करता है।
क्रोध मुक्त होनाः क्रोध करना मन का विकार है। क्रोध तब उत्पन्न होता है जब सुख की कामनाओं की पूर्ति में बाधा उत्पन्न होती है और परिस्थितियाँ हमारी अपेक्षाओं के अनुकूल नहीं होती। वैराग्य को विकसित कर भगवान की इच्छा में इच्छा रखने से क्रोध को वश में किया जा सकता है।
त्यागः माया का संबंध भगवान है और यह भगवान के सुख के लिए है। इसलिए संसार के वैभव किसी अन्य के उपभोग के लिए नहीं बल्कि भगवान उपभोग के लिए हैं। इसी ज्ञान में स्थित होना त्याग है।
शांतिप्रियताः सद्गुणों को धारण करने के लिए मानसिक शांति आवश्यक है। इसके कारण ख़राब परिस्थितियों में भी हममें आंतरिक संतुलन बनाए रखने की क्षमता होती है।
दोषारोपण से बचनाः संपूर्ण संसार और इसके पदार्थ गुणों और दुर्गुणों का मिश्रण हैं। दूसरों में दोष ढूंढने से मन मलिन होता है और दूसरों में गुण देखने से मन शुद्ध होता है। संत महापुरुषों की प्रकृति अपने भीतर अवगुणों का और दूसरों में गुणों का अवलोकन करने की होती है।
सभी जीवों के प्रति करुणाः जैसे-जैसे मनुष्य अपने भीतर आध्यात्मिकता विकसित करते हैं वैसे वैसे वे स्वार्थ की भावना से ऊपर उठकर सभी जीवों के लिए सहानुभूति का भाव विकसित करते हैं। करुणा का भाव दूसरों के दुःखों को देख कर उत्पन्न होता है।
लोभ से मुक्तिः शरीर की देखभाल हेतु आवश्यक पदार्थों से अधिक संग्रह करने की लोभ है। इसके प्रभाव से लोग विपुल धन-सम्पदा एकत्रित करते हैं यह जानते हुए भी कि मृत्यु के समय सब कुछ यहीं छूट जाएगा। इस प्रकार लोभ से मुक्ति जुमें आंतरिक शांति की ओर ले जाती है।
भद्रताः रूखा व्यवहार करने की प्रवृत्ति भावनाओं के प्रति संवेदनशून्यता के कारण उत्पन्न होती है। लेकिन जैसे-जैसे कोई आध्यात्मिक उन्नति करता है, वैसे वैसे वह अपने अशिष्ट आचरण को त्याग देता है। सौम्यता आध्यात्मिक उन्नति का लक्षण है।
लज्जाः 'शास्त्रों और समाज के नियम के विरुद्ध कर्म करने में आत्मग्लानि का भाव होना लज्जा है।' संत महापुरुषों की प्रकृति ही ऐसी होती है जो पापजन्य कर्मों के लिए मनुष्य को आत्मग्लानि का बोध कराती है।
अस्थिरहीनताः किसी भी कार्य का आरंभ शुद्ध भावना से करना चाहिए, लेकिन यदि हम प्रलोभन या विपत्तियों द्वारा विचलित हो जाते हैं तो हम अपनी यात्रा पूरी नहीं कर पाते। मार्ग में आने वाली विपत्तियों का सामना बिना विचलित हुए करने से ही सत्य के मार्ग में सफलता मिलती है।
शक्तिः मन की शुद्धता से हमें उच्च आदर्शों और सच्ची श्रद्धा से कर्म करने की प्रेरणा प्राप्त होती है। इसलिए महापुरुष अपने हाथ में लिए कार्य को असीम शक्ति और उत्साह के साथ सम्पन्न करते हैं।
क्षमा और सहनशीलताः दूसरों के अपराधों को बिना किसी प्रतिशोध की भावना से सहन करने की क्षमता ही सहनशीलता है। क्षमाशीलता द्वारा व्यक्ति दूसरों द्वारा दिए गए घावों को भर लेता है अन्यथा ये सड़ने लगते हैं और मन को व्यथित करते हैं।
धैर्यः प्रतिकूल परिस्थितियों के आने पर मन और इन्द्रियों के क्लांत हो जाने पर भी लक्ष्य प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय धौर्य है। संसार के सभी बड़े कार्य उन लोगों के द्वारा संपन्न किए गए हैं जो निराशा के समय में और परिस्थितियों के प्रतिकूल होने पर भी प्रयासरत रहे। श्री अरविंद ने इसका वर्णन किया है-"तुम्हें कठिनाइयों से भी अधिक दृढ़ होना होगा क्योंकि अन्य कोई उपाय नहीं है।" ।
शुद्धताः इसका अर्थ आंतरिक और बाह्य शुद्धता है। पुण्यात्मा जन बाह्य शुद्धता पर भी बल देते हैं क्योंकि यह आंतरिक शुद्धता का सोपान होती है। जार्ज बर्नाड शॉ ने कहा है, "अपने हृदय को स्वच्छ और उज्ज्वल रखना चाहिए, तुम एक झरोखे हो जिसमें तुम ब्रह्माण्ड देख सकते हो।"
शत्रुता का भाव न रखनाः दूसरों के प्रति शत्रुता का भाव हमारे मन में विष घोलता है और यह आध्यात्मिक मार्ग की उन्नति में बाधा उत्पन्न करता है। दूसरों के प्रति विद्वेष की भावना से मुक्ति और अन्य लोगों को अपने समान समझने की भावना, उनके भीतर सदा भगवान को देखने से प्राप्त होती है।
घमंड रहित होनाः आत्म प्रशंसा, डींग मारना, आडंबर आदि सभी घमंड से उत्पन्न होते हैं। महापुरुष किसी प्रकार का घमंड नहीं करते बल्कि वे अपने सद्गुणों को भगवान की कृपा मानते हैं। इसलिए वे आत्मप्रशंसा से दूर रहते हैं।
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च |
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् || 4||
हे पार्थ! पाखण्ड, दम्भ, अभिमान, क्रोध, निष्ठुरता और अज्ञानता आसुरी प्रकृति वाले लोगों के गुण हैं।
श्रीकृष्ण अब आसुरी प्रकृति से युक्त लोगों के छः लक्षणों की व्याख्या करते हैं। वे पाखंडी होते हैं। इसका तात्पर्य है कि वे दूसरों को प्रभावित करने के लिए शुभ लक्षणों से संपन्न न होते हुए भी सदाचरण का प्रदर्शन करते है। यह कृत्रिम (जेकिल एंड हाइड) व्यक्तित्व है जोकि आंतरिक रूप से तो अशुद्ध है किंतु बाहर से शुद्धता की प्रतीति कराता है।
आसुरी गुण वालों का स्वभाव अहंकार से परिपूर्ण और दूसरों के प्रति अशिष्ट होता है। वे अपनी उपलब्धियों और उपाधियों जैसे धन, शिक्षा, सौन्दर्य, पद-प्रतिष्ठा आदि पर गर्व करते हैं। मन पर नियंत्रण न होने के कारण वे शीघ्र क्रोधित हो जाते हैं। कामवासना और लालच के कारण कुंठाग्रस्त रहते हैं। वे निर्दयी और कठोर होते हैं तथा दूसरों के दुःखों में संवेदनशील नहीं होते। उन्हें आध्यात्मिक सिद्धांतों का ज्ञान नहीं होता और वे अधर्म को धर्म मानते हैं।
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता |
मा शुच: सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव || 5||
दैवीय गुण मुक्ति की ओर ले जाते हैं जबकि आसुरी गुण निरन्तर बंधन का कारण होते हैं। हे अर्जुन! शोक मत करो क्योंकि तुम दैवीय गुणों के साथ जन्मे हो।
दो प्रकार की प्रकृतियों का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण दोनों के परिणामों को व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि आसुरी गुण मनुष्य को 'संसार' की बेड़ियों में जकड़ लेते हैं जबकि दैवीय गुणों द्वारा बंधनों को काटने में सहायता मिलती है। आध्यात्मिक मार्ग पर सफलतापूर्वक चलने के लिए साधक को कई बिन्दुओं पर ध्यान रखना आवश्यक होता है। यहाँ तक कि यदि कोई एक भी आसुरी गुण जैसे अभिमान, पाखंड आदि रह जाता है तो यह असफलता का कारण बन सकता है। इसलिए हमें दैवीय गुणों को विकसित करना चाहिए। दैवीय गुणों के बिना हमारी आध्यात्मिक उन्नति पुनः हवा हो सकती है। उदाहरणार्थ धौर्य न होने पर हम विपत्ति आने पर अपना लक्ष्य छोड़ देंगे और क्षमाशीलता के बिना मन विद्वेष से युक्त हो जाएगा। तब वह भगवान में तल्लीन नहीं हो पाएगा। लेकिन यदि हम दैवीय गुणों से सम्पन्न रहते हैं तब प्रगति के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं का सामना करने के लिए हम तैयार रहेंगे। इस प्रकार से सद्गुणों को विकसित करना और अवगुणों का उन्मूलन करना आध्यात्मिक विकास का अभिन्न अंग है। अपने प्रतिदिन के निजी कार्यकलापों की दैनिकी (डायरी) लिखना एक उपयोगी पद्धति जो हमारी दुर्बलताओं को दूर करने में सहायता करती है। कई सफल लोगों ने अपने संस्मरणों और कार्य-कलापों को डायरी में लिखा ताकि उन्हें सफलता प्राप्त करने में अपेक्षित गुणों को विकसित करने में सहायता मिल सके। महात्मा गांधी और बेंजामिन फ्रैंकलिन् दोनों ने अपनी आत्मकथाओं में ऐसा उल्लेख किया है। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि यदि हम अपनी भक्ति को पुष्ट करते हैं तब समय के साथ हम स्वाभाविक रूप से इन दैवीय गुणों को प्राप्त कर लेगें। यह सत्य है लेकिन प्रारंभ में ही से भक्ति मार्ग की ओर अग्रसर होते हुए सभी प्रकार के नकारात्मक लक्षणों से मुक्त रहना कठिन है। इनमें से कोई भी अवगुण हमारी प्रगति में बाधा डाल सकता है। अधिकांश लोगों के लिए धीरे-धीरे भक्ति भावना को विकसित करना ही उपयोगी होता है जिससे दैवीय गुणों को विकसित करने और आसुरी गुणों का उन्मूलन करने में भी सफलता मिलती है। इसलिए हमें भक्ति के अंग के रूप में श्रीकृष्ण द्वारा इस अध्याय में वर्णित दैवीय गुणों को अपने भीतर विकसित करने के लिए निरन्तर कार्य करना होगा और आसुरी गुणों का त्याग करना होगा।
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च |
दैवो विस्तरश: प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु || 6||
संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं-एक वे जो दैवीय गुणों से सम्पन्न हैं और दूसरे वे जो आसुरी प्रकृति के हैं। मैं दैवीय गुणों का विस्तार से वर्णन कर चुका हूँ अब तुम मुझसे आसुरी स्वभाव वाले लोगों के संबंध में सुनो।
सभी जीवात्माएँ अपने पूर्व जन्म की प्रवृतियों को अपने साथ बनाए रखती हैं। वे जिन्होंने पूर्व जन्मों में सद्गुणों को अर्जित किया और सराहनीय कार्य किए वे दैवीय गुणों के साथ जन्म लेते हैं। जबकि जो पिछले जन्मों में पापमय कार्यों में लिप्त रहे और जिन्होंने अपने मन को अपवित्र रखा वे वर्तमान जीवन में भी उसी प्रकार की प्रवृत्ति पाते हैं। इसी कारण से संसार में जीवों की प्रकृति में विविधता स्पष्ट दिखाई देती है। दैवीय और आसुरी गुण इस विविधता की दो चरम सीमाएँ हैं। स्वर्ग में रहने वाले लोग अधिक सद्गुणों से सम्पन्न होते हैं जबकि आसुरी लक्षणों से युक्त लोगों का प्राबल्य निम्न लोकों में होता है। मनुष्यों में दैवीय और आसुरी लक्षणों का मिश्रण होता है। एक कसाई के जीवन में भी कभी-कभी दयालुता का क्षण दिखाई देता है और कभी-कभी प्रबुद्ध आध्यात्मिक साधकों के गुणों में भी विकार देखने को मिलते हैं। यह कहा जाता है कि सतयुग में देवता और राक्षस अलग-अलग लोकों में रहते थे। त्रेतायुग में वे एक ही लोक पर रहते थे और द्वापरयुग में वे एक ही परिवार में रहे तथा कलियुग में ईश्वरीय और आसुरी गुण एक साथ मनुष्यों के हृदय में रहते हैं। मानव जीवन की यही महिमा है कि एक ओर सद्गुण उसे ऊपर उठाकर भगवान की ओर ले जाते हैं वहीं दूसरी ओर दुर्गुण उसे पतन की ओर ले जाति हैं। दैवीय गुणों की व्याख्या करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब आसुरी गुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन करेंगे ताकि इनकी सही पहचान करके हम इनसे दूर रह सकें।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा: |
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते || 7||
वे जो आसुरी गुणों से युक्त होते हैं वे यह समझ नहीं पाते कि उचित और अनुचित कर्म क्या हैं। इसलिए उनमें न तो पवित्रता, न ही सदाचरण और न ही सत्यता पायी जाती है।
धर्म में व्यवहारविधि निहित होती है जो मनुष्य के कल्याण के अनुकूल होती है। अधर्म में वे कार्य सम्मिलित होते हैं जो पतन की ओर ले जाते हैं और समाज की क्षति का कारण बनते हैं। इसलिए इसके प्रभुत्व में आये हुए लोग उचित और अनुचित कर्म क्या हैं? के संबंध में सदैव विचलित रहते हैं। इसका एक उदाहरण पाश्चात्य दर्शन की वर्तमान विचारधारा है। पुनर्जागरण के पश्चात् विकसित विभिन्न विचारधाराओं जैसे ज्ञान का युग, मानवतावाद अनुभववाद, समाजवाद और संदेहवाद के बाड़े आए पाश्चात्य दर्शन के वर्तमान युग को 'उत्तर आधुनिकतावाद' का नाम दिया गया है। उत्तर आधुनिकतावाद का प्रचलित मत यह है कि संसार में कोई भी परम सत्य नहीं है। 'सारी सत्ताएँ व्यावहारिक है' यह उत्तर आधुनिकतावाद के दर्शन का नारा बन चुका है। हम प्रायः ऐसी उक्ति सुनते हैं कि “यह तुम्हारे लिए सत्य हो सकता है, लेकिन मेरे लिए सत्य नहीं हैं।" सत्य को एक व्यक्तिगत दृष्टिकोण के रूप में या ऐसी अनुभूति के रूप में देखा जाता है जो मनुष्य की निजी सीमाओं से बंधी है। यह दृष्टिकोण नैतिकता से संबंधित विषयों को भी प्रभावित करता है जो उचित और अनुचित आचरण का ज्ञान कराते हैं। यदि संसार में परम सत्य जैसा कुछ भी नहीं है तब संसार में किसी विषय के संबंध में भी कोई निश्चित नैतिक औचित्य और अनौचित्य नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में लोगों का यह कहना तर्कसंगत प्रतीत होता है कि "यह तुम्हारे लिए उचित हो सकता है किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि यह मेरे लिए भी उचित है।" ऐसा विचार हमें आकर्षक लग सकता है किन्तु यदि इसकी तार्किकता को देखा जाए तब यह निरर्थक और विनाशकारी सिद्ध होता है। उदाहरणार्थ क्या यह उचित है कि यदि कोई लाल बत्ती होने पर यातायात (ट्रैफिक) लाईट की उपेक्षा करे? ऐसा करने वाला व्यक्ति अन्य लोगों के जीवन को जोखिम में डाल देगा। क्या इसे उचित माना जा सकता है? यदि कोई व्यक्ति घनी आबादी वाले क्षेत्र में आत्मघाती बम विस्फोट करे। भले ही उसकी बुद्धि भ्रष्ट करके उसे यह समझाया गया हो कि वह जो कर रहा है वह उचित है, लेकिन क्या समाज और मानवता की दृष्टि से इसे उचित कार्य माना जा सकता है? यदि कोई भी ऐसा विचार या क्रिया चरम सत्य नहीं है तब कोई यह नहीं कह सकता है कि 'उसे यह करना चाहिए' या 'उसे यह नहीं करना चाहिए।' अधिकांश लोग यह तर्क दे सकते हैं कि -'अनेक लोग इस काम को अच्छा नहीं समझते। इसलिए यह ग़लत है। 'सापेक्षवादियों के दृष्टिकोण के अनुसार कोई यह भी कह सकता है कि 'तुम्हारे लिए यह उचित हो सकता है लेकिन हमारे लिए निश्चित रूप से यह उचित नहीं है।' नैतिकता के दृष्टिकोण से परम सत्य को न मानने के विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि आसुरी प्रकृति वाले लोग क्या उचित है अथवा क्या अनुचित, के संबंध में विचलित रहते हैं और इस प्रकार से उनमें न तो शुद्धता, न सत्य और न ही सदाचरण होता है। श्रीकृष्ण अगले श्लोक में ऐसे लोगों के विचारों का वर्णन करेंगे।
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् |
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् || 8||
वे कहते हैं, संसार परम सत्य से रहित और आधारहीन है तथा यह भगवान से रहित है। यह दो विपरीत लिंगों के परस्पर समागम से उत्पन्न होता है और कामेच्छा के अतिरिक्त इस संसार का कोई अन्य कारण नहीं है।
अनैतिक आचरण से दूर रहने के दो मार्ग हैं। प्रथम मार्ग आत्मसंयम के द्वारा अधर्म से विरक्त रहना। दूसरा मार्ग भगवान के भय के कारण पाप कर्मों से दूर रहना। केवल इच्छा शक्ति द्वारा बहुत कम लोगों में ही पाप कर्मों से विरक्त रहने का समक्षय होता है। अधिकांश लोग दण्ड के भय से बुरे कर्मों से दूर रहते हैं। उदाहरणार्थ राष्ट्रीय राजमार्ग पर जिस समय वाहन चालकों को पुलिस की मोबाईल वैन खड़ी होने का पता होता है तब चालक शीघ्र अपने वाहन को धीमा कर देते हैं। लेकिन जब उन्हें यह प्रतीत होता है कि अब पकड़े जाने का कोई जोखिम नहीं है, तब वे वाहन की गति को बढ़ाने में कोई संकोच नहीं करते। इस प्रकार यदि हम भगवान में विश्वास रखते हैं तब उनके भय के कारण हम अनैतिक आचरण से बचे रहते हैं। इसके विपरीत यदि हम भगवान में विश्वास नहीं करते तब भी उनके सभी विधि-विधान हम पर लागू होंगे और हमें अपने दुर्व्यवहार का परिणाम भुगतना पड़ेगा।
आसुरी स्वभाव वाले लोग शास्त्रों की आज्ञाओं और आचार नियमों का पालन नहीं करते जोकि भगवान में विश्वास करने का स्वाभाविक सिद्धांत है। इसके विपरीत वे इस मत का प्रचार करते हैं कि कोई भगवान नहीं है और संसार में नैतिक व्यवस्था का कोई आधार नहीं है। वे 'महा विस्फोटक सिद्धांत' (बिग बैंग थ्योरी) का प्रचार करते हैं जिसकी अवधारणा यह है कि संसार का सृजन सृष्टि के शून्य समय पर आकस्मिक विस्फोट के कारण हुआ और इसलिए संसार में कोई भगवान नहीं है। ऐसे सिद्धांत पश्चाताप और परिणामों के भय के बिना उन्हें कामुक तृप्तियों में संलग्न रहने की अनुमति देते हैं। इन्द्रिय तुष्टि के विभिन्न रूपों में यौन संलिप्तता सबसे प्रबल है। इसका कारण भौतिक क्षेत्र आध्यात्मिक क्षेत्र के विकृत प्रतिबिंब के समान है। आध्यात्मिक क्षेत्र में दिव्य प्रेम, मुक्त आत्माओं के कर्मों और भगवान के साथ उनके साक्षात्कार का आधार है। इसका विकृत प्रतिबिंब काम-वासना भौतिकता में संलिप्त विशेषकर रजोगुण के प्रभुत्व में रहने वाली आत्माओं की चेतना पर हावी हो जाता है। इस प्रकार आसुरी मनोवृति वाले व्यक्ति भोग-विलास और कामुकतापूर्ण जीवन में लिप्त रहने को मानव जीवन के उद्देश्य के रूप में देखते हैं।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धय: |
प्रभवन्त्युग्रकर्माण: क्षयाय जगतोऽहिता: || 9||
ऐसे विचारों द्वारा पथ भ्रष्ट आत्माएँ अल्प बुद्धि और क्रूर कृत्यों के कारण संसार की शत्रु बन जाती हैं और इसके विनाश का कारण बनती हैं।
आत्मज्ञान से वंचित आसुरी मनोवृति वाले लोग अपनी दूषित बुद्धि द्वारा विकृत विचार रखते हैं। इसका उदाहरण भौतिकवादी दार्शनिक चार्वाक का सिद्धांत है जिसने यह कहा
यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः
"जब तक जीवित रहो आनन्द से रहो। अगर घी का सेवन करने से तुम्हें आनन्द मिलता है तब तुम ऐसा ही करो भले ही इसके लिए तुम्हें ऋण ही क्यों न लेना पड़े। जब शरीर का अंतिम संस्कार हो जाता है, तब तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं रहता और तुम पुनः लौट कर संसार में नहीं आते इसलिए तुम कर्मों के परिणाम की चिंता न करो।"
इस प्रकार से आसुरी मानसिकता वाले लोग आत्मा की नित्यता और कर्मों के प्रतिफल को अस्वीकार करते हैं ताकि वे स्वार्थ की पूर्ति और क्रूर कृत्य कर सकें। यदि उन्हें अन्य मनुष्यों पर शासन करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है, तब वे उन पर उसी प्रकार से अपने भ्रामक विचार थोपते हैं। वे अपने स्वार्थमय लक्ष्य का अनुग़मन करने में संकोच नहीं करते भले ही इसके परिणाम दूसरों के लिए दुःखद और संसार के लिए विनाशकारी हों। इतिहास गवाह है कि जो शासक सत्य के प्रतिकूल विचारों से प्रेरित थे वे मानव समाज को कष्ट प्रदान करने वाले और संसार के लिए विध्वंसकारी सिद्ध हुए।
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता: |
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता: || 10||
अतृप्त काम वासनाओं, पाखंड युक्त गर्व और अभिमान में डूबे आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्य अपने झूठे सिद्धांतों से संसक्त रहते हैं। इस प्रकार वे भ्रमित होकर अशुभ संकल्प के साथ काम करते हैं।
अतृप्त काम वासनाओं को प्रश्रय दे कर आसुरी वृत्ति वाले लोग अपने हृदय को अत्यंत दूषित करते हैं। वे पूर्णतया ढोंगी बन जाते हैं अर्थात् जो वे वास्तव में नहीं हैं वैसा होने का अभिनय करते हैं। उनकी मोहित बुद्धि अनुचित विचारों को ही अंगीकार करती है और उनका अभिमान उनमें यह भ्रम उत्पन्न करता है कि उनके बराबर कोई नहीं है। क्षणभंगुर सुखों की प्राप्ति के लिए उनकी बुद्धि तुच्छता, स्वार्थ और अभिमान से ग्रसित हो जाती है। इस प्रकार से वे शास्त्रों की आज्ञाओं का निरादर करते हैं और जो उचित है उसके विपरीत आचरण करते हैं।
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिता: |
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता: || 11||
वे अंतहीन चिंताओं से पीड़ित रहते हैं। फिर भी वे आश्वस्त रहते हैं कि कामनाओं की तृप्ति और धन सम्पत्ति का संचय ही जीवन का परम लक्ष्य है।
भौतिक प्रवृत्ति वाले लोग प्रायः आध्यात्मिक मार्ग को अत्यन्त श्रमसाध्य मानने के कारण उसकी अवहेलना करते हैं और अपने चरम लक्ष्य से दूर हो जाते हैं। वे सांसारिक मार्ग का अनुसरण करते हैं, जो शीघ्र तृप्ति प्रदान करता है, लेकिन वे अंत तक संसार में और अधिक संघर्ष करते रहते हैं। भौतिक पदार्थ को प्राप्त करने की इच्छाएँ उन्हें कष्ट देती हैं और वे फिर भी अपनी अभिलाषाओं की पूर्ति हेतु योजनाएँ बनाते हैं। जब उन्हें मनचाही वस्तु प्राप्त हो जाती है, तब वह कुछ समय के लिए राहत का अनुभव करते हैं। लेकिन बाद में नई इच्छायें जन्म लेती हैं। वह अपनी सुख-सुविधाओं के छिन जाने की चिंता करने लगते हैं और उन्हें बचाने के लिए परिश्रम करते हैं। अंततः जब आसक्त वस्तु से अलगाव हो जाता है, तब उन्हें दुःख ही प्राप्त होता है। इसलिए ऐसा कहा गया है-
या चिन्ता भुवि पुत्र पौत्र भरणाव्यापार सम्भाषणे
या चिन्ता धन धान्य यशसाम् लाभे सदा जायते।
सा चिन्ता यदि नन्दनन्दन -पदद्वंद्वार विन्देक्षणं
का चिन्ता यमराज भीम सदनद्वारप्रयाणे विभो।।
(सूक्ति सुधाकर)
"लोग बच्चों और पोते-पोतियों को पाने की इच्छा, व्यावसाय में व्यस्त रहने, धन संपदा संचित करने और यश प्राप्त करने के लिए तनाव झेलते हैं। यदि वे भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अनुराग और उत्साह विकसित करेंगें तब उन्हें कभी मृत्यु के देवता यमराज की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। इसके परिणामस्वरूप वे जन्म और मृत्यु के चक्र को पार कर लेंगे" किन्तु आसुरी स्वभाव वाले लोग इस अटल सत्य को स्वीकार नहीं करते क्योंकि उनकी बुद्धि यह समझती है कि सांसारिक सुखों में ही परम सुख की अनुभूति हो सकती है। वे यह नहीं देख पाते कि मृत्यु उन्हें दयनीय अवस्था में धकेलने और भावी जन्मों में और अधिक कष्टों में डालने की योजना बना रही है।
आशापाशशतैर्बद्धा: कामक्रोधपरायणा: |
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्जयान् || 12||
सैंकड़ों कामनाओं के बंधनों में पड़ कर काम वासना और क्रोध से प्रेरित होकर वे अवैध ढंग से धन का संग्रह करने में जुटे रहते हैं। यह सब वे इन्द्रिय तृप्ति के लिए करते हैं।
संसार में धन आनन्द प्राप्त करने का साधन है इसलिए भौतिकवादी लोग जो कामनाओं द्वारा प्रेरित होते हैं वे अपने जीवन में धन संग्रह करने को प्राथमिकता देते हैं। वे धन अर्जन के लिए अवैद्य तरीकों को अपनाने में भी संकोच नहीं करते। इसलिए उनके अनैतिक आचरण के लिए दोहरा दण्ड निर्धारित है। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन किया गया है
यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ।।
(श्रीमद्भागवतम्-7.14.8)
"कोई भी व्यक्ति उतना हि धन रखने का अधिकारी है जितना उसकी उदरपूर्ति के लिए पर्याप्त है और शेष उसे धन पुण्य कार्यों के लिए दान करना चाहिए। यदि कोई अपनी आवश्यकताओं से अधिक धन का संग्रह करता है, तब वह भगवान की दृष्टि में चोर कहलाता है और इसके लिए उसे दण्ड भोगना पड़ता है। यह दण्ड क्या होगा?" सर्वप्रथम तो मृत्यु के समय उसके द्वारा अर्जित की गई धन संपत्ति उसके साथ नहीं जाएगी। यह उससे छीन ली जाएगी। पुनः कर्मों के विधान के अनुसार धन अर्जन करने के लिए किए गए पापों के लिए भी दंड भोगना पड़ेगा। जब कोई तस्कर पकड़ा जाता है तब केवल उसका सामान ही जब्त नहीं किया जाता है बल्कि कानून का उल्लंघन करने के लिए उसे दण्ड भी दिया जाता है।
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् |
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् || 13||
असौ मया हत: शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि |
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी || 14||
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया |
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिता: || 15||
आसुरी स्वभाव वाला व्यक्ति सोचता है-"मैंने आज इतनी संपत्ति प्राप्त कर ली है और मैं इससे अपनी कामनाओं की पूर्ति कर सकूँगा। यह सब कुछ मेरा है और कल मेरे पास इससे भी अधिक धन होगा। मैंने अपने एक शत्रु का नाश कर दिया है और मैं अन्य शत्रुओं का भी विनाश करूंगा। मैं स्वयं भगवान के समान हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं शक्तिशाली हूँ, मैं सुखी हूँ। मैं धनाढ्य हूँ और मेरे सगे-संबंधी भी कुलीन वर्ग से हैं। मेरे बराबर कौन है? मैं देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करूँगा, दान दूंगा, मैं सुखों का भोग करूँगा।" इस प्रकार से वे अज्ञानता के कारण मोह ग्रस्त रहते हैं।
सभी प्रकार की नैतिकता की उपेक्षा कर आसुरी व्यक्ति यह समझते हैं कि उन्हें जो भी सुखप्रद प्रतीत होता है उसका उपभोग करना उनका अधिकार है। वे महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करने का प्रयास करते हैं। वे यह समझते हैं कि वेदों में वर्णित कर्म उन्हें भौतिक रूप से समृद्ध बनाने में सहायक हैं। वे प्राचुर्य सुख समृद्धि और यश प्राप्त करने हेतु धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन करते हैं। किन्तु जिस प्रकार से गिद्ध ऊंची उड़ान भरता है, लेकिन अपनी दृष्टि नीचे की ओर स्थिर रखता है, वैसे ही असुर व्यक्तियों की समाज में प्रतिष्ठा तो बढ़ती है लेकिन उनके कार्य निकृष्ट प्रकृति के होते हैं। ऐसे लोग शक्ति की पूजा करते हैं और 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' के सिद्धांत में विश्वास रखते हैं। इसलिए वे अपनी कामनाओं की पूर्ति में आने वाली बाधाओं को समाप्त करने हेतु दूसरे लोगों को चोट पहुंचाने में भी संकोच नहीं करते हैं। सुक्ति सुधाकर में चार प्रकार के मनुष्यों का वर्णन किया गया है-
एके सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थान् परित्यज्य ये।
सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये।।
ते मी मानव राक्षसाः परहितं स्वार्थाय निध्नंति ये।
ये तुभंति निरार्थकं परहितं ते के न जानीमहे ।।
पहले प्रकार के मनुष्यों में वे पुण्यात्मा हैं जो दूसरों के कल्याण के लिए अपने निजी हित का त्याग करते हैं। दूसरी श्रेणी में साधारण लोग आते हैं जो दूसरे लोगों का कल्याण करने में विश्वास रखते हैं बशर्ते कि इससे उनका कोई अनिष्ट न होता हो। तीसरी श्रेणी असुर लोगों की है जो अपने हितों की पूर्ति हेतु दूसरों को क्षति पहुँचाने में कोई हिचक नहीं करते। चौथी श्रेणी के लोग भी होते हैं जो (केवल आनन्द के लिए) अकारण लोगों को कष्ट देते हैं। इनके लिए कोई उपयुक्त श्रेणी नहीं हैं। श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से निकृष्ट मानसिकता वाले असुर लोगों का वर्णन किया है। घमंड में अंधे होकर वे इस प्रकार से सोचते हैं-"मैं धनी और कुलीन परिवार में जन्मा हूँ। मैं धनाढ्य और शक्तिशाली हूँ और अपनी इच्छानुसार जो चाहूँ वह कर सकता हूँ। मुझे भगवान के सामने झुकने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि मैं स्वयं भगवान के समान हूँ।"
अधिकतर बार जब लोग 'मैं' शब्द कहते हैं तब यह उनका अभिमान बोलता है वे नहीं। अहंकार में अपने मतों के साथ अपनी पहचान, बाह्य स्वरूप, असंतोष इत्यादि समाविष्ट हैं। इस अहम् से निजी व्यक्तित्व का निर्मित होता है और इसके प्रभाव के कारण लोगों की पहचान विचारों, भावनाओंऔर स्मृतियों के साथ परिलक्षित होती है जिन्हें वह अपने अभिन्न अंग के रूप में देखते हैं। अहम् का एकत्व स्वामित्व की भावना के साथ होता है, किंतु धन संपदा से प्राप्त संतुष्टि प्रायः अल्पकालिक होती है। इसके साथ 'अपर्याप्त' का गहन असंतोष छिपा रहता है। इस अतृप्त अभिलाषा के परिणामस्वरूप बेचैनी, अशांति, उदासी, चिंता और असंतोष उत्पन्न होता है जिससे परम सत्ता की और अधिक विकृत धारणा उत्पन्न होती है। यह आगे चलकर उनके 'मैं' के बोध को आत्मा से दूर कर देती है। 'अहम्' हमारे जीवन में एक बड़ा भ्रम उत्पन्न करता है यह जो हम नहीं है वह होने का विश्वास दिलाता है। इसलिए धार्मिक पाथ पर उन्नति करने के लिए सभी धार्मिक परम्पराएँ और संत हमें अहंकारी विचारों का त्यागकर देने का आग्रह करते हैं। ते चिंग ने उपदेश दिया-"पर्वत बनने के स्थान पर तुम घाटी बनो।" नारेथ के जीसस ने भी कहा था "जब तुम्हें आमंत्रित किया जाए तब सबसे नीचे के आसन पर बैठो ताकि जब मेजबान आए तब वह तुमसे यह कह सके कि मित्र ऊपर का आसन ग्रहण करो।" (अध्याय-6) जो कोई स्वयं को उन्नत करता है वह विनम्र हो जाता है और जो कोई स्वयं को विनम्र करता है वह महान हो जाता है (लुका 14.10.11)। संत कबीर ने इसका अतिसुंदरता से वर्णन किया है
ऊंचे पानी न टिके नीचे ही ठहरायें।
नीचा होय सो भरि पी, ऊंचा प्यासा जाय।।
"जल कभी ऊपर की ओर नहीं बहता वह स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बहता है वे जो विनीत और आडंबरहीन होते हैं वे पूर्णतः तृप्त हो जाते हैं और जो पाखंडी और अहंकारी होते हैं वे प्यासे रह जाते हैं।"
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता: |
प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ || 16||
ऐसी कल्पनाओं से पथभ्रष्ट होकर और मोह के जाल में फँसकर तथा विषय भोग की तृप्ति के आदी होकर वे घोर नरक में गिरते हैं
अहंकार के प्रभाव के कारण लोगों के सत्त्व की पहचान अपने मन के रूप में होती है और वे अपने व्यर्थ और विचारों में सीमित हो जाते हैं। वे अपने उस मन के अधीन हो जाते हैं जो टूटे हुए ध्वनि संग्रहणों के समान बजता रहता है और वे इस भ्रम में रहते हैं कि उनके विचार उनके लिए ही बने हैं। दूषित मन का प्रिय स्वरूप शिकायत करना है। वह रिरियाना और कुढ़ना भी पसंद करता है, न केवल लोगों के संबंध में बल्कि परिस्थितियों के संबंध में भी। उसके साथ ये चिंतायें होती हैं-'यह नहीं होना चाहिए था', 'मैं यहाँ नहीं रहना चाहता', 'मेरे साथ अनुचित व्यवहार हो रहा है' इत्यादि। सभी शिकायतें एक छोटी कहानी हैं जिन्हें मन बुनता है और मनुष्य इनमें पूर्णतः विश्वास करता है। मस्तिष्क केवल दुःखद, या दूसरों के जीवन की पीड़ायुक्त कहानियाँ सुनाता है। इस प्रकार से निकृष्ट व्यक्ति अहम् के प्रभाव के कारण अपने आन्तरिक वचनों को स्वीकार कर लेता है। जब शिकायत ज्यादा गंभीर हो जाती है तब यह असंतोष और घृणा में परिवर्तित हो जाती है। असंतोष का अर्थ कटुता, क्रोध, द्वेष, उत्तेजना या अप्रसन्नता है। जब असंतोष अधिक समय तक उपस्थित रहता है तब यह शिकायत में परिवर्तित हो जाता है। शिकायत अतीत की घटनाओं से जुड़ी एक नकारात्मक भावना है जो मनमें अनुचित विचारों द्वारा जीवित रहती है-'किसी ने मेरे साथ क्या किया" आदि इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि आसुरी व्यक्ति जो अहम् द्वारा उत्पन्न भ्रम के जाल में रहना पसंद करते हैं, वे निम्न विचारों से विचलित हो जाते हैं। परिणामस्वरूप ऐसे मनुष्य अपने भाग्य को निस्तेज बनाते हैं। मनुष्य अपनी पसंद के अनुसार कर्मों का चयन करने के लिए स्वतंत्र है किंतु वे अपने कर्मों का फल चुनने के लिए स्वतंत्र नहीं है। भगवान जीवात्मा को उसके कर्म के अनुसार फल प्रदान करते हैं।
रामचरितमानस में निम्न प्रकार से वर्णन किया गया है-
कर्म प्रधान विश्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फल चाखा।।
"संसार में कर्मों का बहुत महत्त्व है। जीवात्मा जो भी कर्म करती है बाद में उसके फल भोगती है।" इसलिए सभी जीवात्माओं को अपने कर्मों के प्रतिफलों का सामना करना पड़ता है। बाइबिल में इस प्रकार से वर्णन किया गया है-"तुम यह जान लो कि तुम्हारे पाप तुम्हें मिल जाएँगे" (संख्या- 32.33)। इस प्रकार से अगले जन्म में भगवान उन लोगों को त्याग देते हैं जो आसुरी गुणों को पोषित करते हैं। इस संबंध में एक अत्यंत सरल सिद्धांत इस प्रकार से है-
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्य-गुण-वृत्तिस्था अधो।तिष्ठन्ति तामसाः।।
"वे जो सात्त्विक मानसिकता के अंतर्गत कर्म करते हैं वे जीवन में उच्चस्तर तक उन्नति करते हैं और रजोगुण की मानसिकता के प्रभाव में कर्म करने वाले मध्यक्षेत्र में रहते हैं तथा तामसिक मनोवृत्ति के अधीन कर्म करने वाले मनुष्य पाप आदि अन्य कार्यों में प्रवृत्त होकर जीवन के निम्न स्तर तक जाते हैं।"
आत्मसम्भाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता: |
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् || 17||
ऐसे आत्म अभिमानी और हठी लोग अपनी संपत्ति के मद में चूर होकर शास्त्रों के विधि-विधानों का आदर न करते हुए केवल आडम्बर करते हुए यज्ञों का अनुष्ठान करते हैं।
सद्गुणी मनुष्य आत्मा की शुद्धि और भगवान को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करते हैं। विडंबना यह है कि इसका अनुकरण करते हुए आसुरी गुणों वाले व्यक्ति भी यज्ञों, अनुष्ठानों एवं कर्मकाण्डों का आयोजन करते हैं लेकिन अशुद्ध भावना के साथ और अनुचित प्रयोजनों के लिए। ऐसे आसुरी आचरण वाले व्यक्ति समाज की दृष्टि में स्वयं को अच्छा दिखाने के लिए बड़े धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन करते हैं। वे शास्त्रों की आज्ञाओं का भी पालन नहीं करते बल्कि वे स्वयं की ख्याति के लिए और मिथ्या अभिमान का प्रदर्शन करने के धार्मिक अनुष्ठान करते हैं जबकि शास्त्रों के निर्देश इस प्रकार से है
गृहितस्य भवेद् वृद्धिः कीर्तितस्य भवेत् क्षयः
(महाभारत)
"यदि हम अपने द्वारा संपन्न किए गए अच्छे कार्य का प्रचार करते हैं तब उसकी श्रेष्ठता कम हो जाती है और यदि हम इसे गोपनीय रखते हैं तब इसका मूल्य कई गुणा बढ़ता है।" इस श्लोक में श्रीकृष्ण आसुरी लोगों के कर्मकाण्डों का यह कहकर निरादर करते हैं कि इनका आयोजन अशुद्धता से किया जाता है।
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता: |
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका: || 18||
अहंकार, शक्ति, दम्भ, कामना और क्रोध से अंधे मनुष्य अपने और अन्य लोगों के शरीरों में उपस्थित मेरी उपस्थिति की निंदा करते हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों के और लक्षणों का वर्णन करते हैं। वे अधम, क्रूर, और धृष्ट होते हैं। उनमें सदाचार नहीं होता और वे सभी में दोष ढूढने में आनंदित होते हैं। ऐसे आसुरी स्वभाव वाले व्यक्ति स्वयं को अत्यंत महत्त्वपूर्ण समझते हैं और दूसरों से ईर्ष्या करते हैं। अगर कभी कोई उनकी योजनाओं का विरोध करता है, तब वे क्रोधित होकर उन्हें कष्ट पहुँचाते हैं और इस तरह से स्वयं को भी कष्ट देते हैं। परिणामस्वरूप वे परमात्मा की उपेक्षा और अपमान करते हैं जो सभी के हृदयों में स्थित है।
तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान् |
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु || 19||
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि |
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् || 20||
इन दुष्ट और निर्दयी व्यक्तियों को मैं निरन्तर जीवन-मृत्यु के चक्र में आसुरी प्रकृति के गर्मों में डालता हूँ। ये अज्ञानी आत्माएँ बार-बार आसुरी प्रकृति के गर्थों में जन्म लेती हैं। मुझ तक पहुँचने में असफल होने के कारण हे अर्जुन! वे शनैः-शनैः अधम गति प्राप्त करते हैं।
श्रीकृष्ण पुनः आसुरी मनोवृत्ति के परिणामों का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि अगले जन्म में वे उन्हें आसुरी परिवारों में ही जन्म देते हैं जहाँ उन्हें वैसा ही आसुरी परिवेश मिलता है। वही वे अपनी निकृष्ट प्रवृत्ति को पूर्णतः अभिव्यक्त करते हैं। इस श्लोक द्वारा हम यह कह सकते हैं कि जन्में योनि, लोक और परिवेश का चयन करना जीवात्मा के हाथ में नहीं होता है। इस संबंध में भगवान मनुष्य के कर्मों के अनुसार निर्णय करते हैं। इस प्रकार से आसुरी लोग निकृष्ट योनियों जैसे सर्पो, छिपकलियों और बिच्छुओं की योनियों में धकेले जाते हैं जो बुरी मानसिकता के पाते हैं।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: |
काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् || 21||
काम, क्रोध और लोभ जीवात्मा को नरक की ओर ले जाने वाले तीन द्वार हैं इसलिए सबको इनका त्याग करना चाहिए।
श्रीकृष्ण अब आसुरी प्रवृत्ति के मूल कारणों का वर्णन करते हैं तथा काम, क्रोध और लोभ को इसमें पारगणित करते हैं। इससे पहले श्लोक 3.36 में अर्जुन ने पूछा था कि लोग न चाहते हुए भी पाप करने के लिए क्यों प्रेरित होते हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें बलपूर्वक पाप कर्मों में लगाया जाता है। श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि यह लोभ ही है जो बाद में क्रोध में परिवर्तित हो जाती है और यह हमारा सर्वनाश करने वाली शत्रु है। श्लोक 2.62 की टिप्पणी में किए गए वर्णन के अनुसार लोभ काममें भी परिवर्तित होता है। इस प्रकार काम, क्रोध और लोभ ही वो आधार हैं जहाँ से आसुरी गुण विकसित होते हैं। ये मन में कटुता उत्पन्न करते हैं और इसे अन्य सभी अवगुणों के लिए उपयुक्त स्थान बनाते हैं। परिणामस्वरूप श्रीकृष्ण इन्हें नरक के द्वार के रूप में चित्रित करते हैं और अपने विनाश से बचने के लिए इनसे दूर रहने का उपदेश देते हैं। आत्मकल्याण के इच्छुक लोगों को इन तीनों से दूर रहना चाहिए।
एतैर्विमुक्त: कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नर: |
आचरत्यात्मन: श्रेयस्ततो याति परां गतिम् || 22||
जो इन तीन द्वारों से मुक्त होते हैं, वे अपने के कल्याण के लिए चेष्टा करते हैं और अपने परम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण काम, क्रोध और लोभ का परित्याग करने के परिणाम का वर्णन करते हैं। जब तक ये विद्यमान रहते हैं तब तक मनुष्य सुखों के प्रति आकर्षित होते हैं। वे आरंभ में तो सुखद लगते हैं परन्तु अंत में कटु हो जाते हैं। लेकिन जब हमारी कामनाएँ क्षीण होती हैं तब बुद्धि मोह से मुक्त हो जाती है और वह प्रेय मार्ग की व्यर्थता को समझने लगती है तब फिर मनुष्य श्रेय मार्ग की ओर आकर्षित होता है जो वर्तमान में दुःखद प्रतीत होता है लेकिन अंत में सुखद बन जाता है। जो लोग श्रेय मार्ग की ओर आकर्षित होते हैं उनके लिए ज्ञान का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। वे अपनी आत्मा के कल्याण की चेष्टा आरंभ करते हैं एवं वे परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होते हैं।
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: |
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् || 23||
वे जो इच्छाओं के आवेग से कर्म करते हैं और शास्त्रों के विधि-निषेधों को नहीं मानते वे न तो सिद्धि प्राप्त करते हैं और न ही परम लक्ष्य की प्राप्ति करते हैं।
शास्त्र मानव को आत्मज्ञान की यात्रा के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करते हैं। वे हमें ज्ञान और बुद्धि प्रदान करते हैं। वे हमें यह उपदेश देते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। यह निर्देश दो प्रकार के होते हैं जिन्हें विधि और निषेध कहा जाता है। कर्मों का पालन करने संबंधी निर्देशों को विधि कहा जाता है। कर्मों का अनुपालन न करने संबंधी निर्देशों को निषेध कहा जाता है। इन दोनों प्रकार की आज्ञाओं का निष्ठापूर्वक पालन करने से मनुष्य परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है। किन्तु आसुरी प्रकृति के मनुष्यों का मार्ग शास्त्रों के उपदेशों के विपरीत होता है। वे निषिद्ध कर्मों में संलग्न रहते हैं और विहित कर्मों से दूर रहते हैं।
ऐसे लोगों का उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण घोषणा करते हैं कि जो वास्तविक मार्ग का त्याग करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं वे अपनी इच्छाओं के आवेगों द्वारा प्रेरित होते हैं, और वे न तो सच्चा ज्ञान और न ही पूर्ण आनन्द तथा न ही माया के बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ |
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि || 24||
इसलिए कार्य और अकार्य का निश्चय करने के लिए शास्त्रों में वर्णित विधानों को स्वीकार करो और शास्त्रों के निर्देशों को समझो तथा तदनुसार संसार में अपने कर्तव्यों का पालन करो।
अब श्रीकृष्ण इस अध्याय के उपदेशों का सार प्रस्तुत करते हैं। दैवीय और आसुरी प्रवृत्ति की तुलना करते हुए वे स्पष्ट करते हैं कि आसुरी प्रवृत्ति नारकीय जीवन की ओर ले जाती है। वे सिद्ध करते हैं कि शास्त्रों के विधि निषेधों का अनादर करके कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। अब वे यह कहते हैं कि किसी भी कर्म के औचित्य या अनौचित्य का ज्ञान वैदिक शास्त्रों द्वारा होता है।
कभी-कभी कुछ सज्जन लोग भी कहते हैं कि “मैं विधि-नियमों का पालन नहीं करता, मैं आपनी इच्छा के अनुसार कर्म करता हूँ।" मन का अनुसरण करना अच्छी बात है लेकिन वे यह कैसे सुनिश्चित करेंगे कि उनका मन उन्हें पथ-भ्रष्ट नहीं कर रहा है। कहा गया है-"नर्क का मार्ग शुभ विचारों से शुरू होता है।" इसका तात्पर्य यह है कि ऐसे अशुभ कर्म जो भ्रम के कारण मन को शुभ प्रतीत होते हैं, हमारे लिए नरक का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इस प्रकार शास्त्रों को ध्यान में रखते हुए हमें यह देखना चाहिए कि क्या हमारा अंत:करण वास्तव में उचित दिशा में जा रहा है। मनुस्मृति में भी उल्लेख किया गया है-
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति ।
(मनुस्मृति-12.97)
"भूत, वर्तमान और भविष्य से संबंधित किसी सिद्धांत की प्रामाणिकता वेदों पर ही आश्रित है।" इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को शास्त्रों को समझने और तदनुसार कर्म करने का उपदेश देते हुए अपने कथनों का समापन करते हैं।
।। श्रीमद्भागवत गीता का सोलहवां अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
Bhagavad Geeta Chapter 15
kathaShrijirasik
अध्याय-पन्द्रह: पुरुषोत्तम योग
सर्वोच्च दिव्य स्वरूप योग
पिछले अध्याय में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया था कि माया के तीन गुणों से रहित होकर ही जीव अपने दिव्य लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इन गुणों से परे जाने का सबसे उत्तम उपाय भगवान की अनन्य भक्ति में तल्लीन होना है। ऐसी भक्ति में तल्लीन होने के लिए हमें मन को संसार से विरक्त कर उसे केवल भगवान में अनुरक्त करना होगा। इसलिए संसार की प्रकृति को समझना अति आवश्यक है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन की संसार के प्रति विरक्ति विकसित करने में उसकी सहायतार्थ उसे भौतिक संसार की प्रकृति को प्रतीकात्मक शैली में समझाते हैं। वे भौतिक संसार की तुलना उल्टे 'अश्वत्थ' के वृक्ष से करते हैं। देहधारी आत्मा इस वृक्ष की उत्पत्ति के स्रोत आदि को समझे बिना एक जन्म से दूसरे जन्म में इस वृक्ष की शाखाओं में घूमती रहती है। इस वृक्ष की जड़ें ऊपर की ओर होती हैं क्योंकि इसका स्रोत भगवान है। वेदों में वर्णित सकाम कर्मफल इसके पत्तों के समान हैं। इस वृक्ष को माया के तीनों गुणों द्वारा सींचा जाता है। ये गुण विषयों को जन्म देते हैं जोकि वृक्ष की ऊपर लगी कोंपलों के समान हैं। कोंपलों से जड़ें फूट कर प्रसारित होती हैं जिससे वृक्ष और अधिक विकसित होता है। इस अध्याय में इस प्रतीकात्मकता को विस्तृत रूप से वर्णित किया गया है जिससे कि यह ज्ञात हो सके कि कैसे देहधारी आत्मा इस संसार रूपी वृक्ष की अज्ञानता के कारण निरंतर बंधनो में फंसी रहकर कष्ट सहन कर रही है। इसलिए श्रीकृष्ण समझाते हैं कि विरक्ति रूपी कुल्हाड़ी से इस वृक्ष को काट डालना चाहिए। फिर हमें वृक्ष के आधार की खोज करनी चाहिए जोकि स्वयं परमेश्वर हैं। परम स्रोत भगवान को खोजकर हमें इस अध्याय में वर्णित पद्धति के अनुसार उनकी शरणागति ग्रहण करनी चाहिए तभी हम भगवान के दिव्य लोक को पा सकेंगे जहाँ से हम पुनः इस लौकिक संसार में नहीं लौटेंगे। श्रीकृष्ण आगे वर्णन करते हैं कि उनका अभिन्न अंश होने के कारण जीवात्माएँ दिव्य हैं। किन्तु माया के बंधन के कारण वे मन सहित छः इन्द्रियों के साथ संघर्ष करती रहती हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि आत्मा दिव्य है किन्तु फिर भी वह विषयों के भोग का आनंद लेती है। श्रीकृष्ण यह भी बताते हैं कि मृत्यु होने पर आत्मा अपने वर्तमान जन्म के मन और सूक्ष्म इन्द्रियों सहित नये शरीर में प्रवेश करती है। अज्ञानी न तो शरीर में आत्मा की उपस्थिति का अनुभव करते हैं और न ही मृत्यु होने पर उन्हें आत्मा के देह को त्यागने का आभास होता है। किन्तु योगी ज्ञान चक्षुओं और मन की शुद्धता के साथ इसका अनुभव करते हैं। इसी प्रकार भगवान भी अपनी सृष्टि में व्याप्त हैं लेकिन ज्ञान चक्षुओं से ही उनकी उपस्थिति का अनुभव किया जा सकता है। यहाँ श्रीकृष्ण प्रकट करते हैं कि संसार में भगवान के अस्तित्व को और उनकी अनन्त महिमा को जो सर्वत्र प्रकाशित है, कैसे जान सकते हैं। इस अध्याय का समापन क्षर, अक्षर, पुरुषोत्तम शब्दों की व्याख्या के साथ होता है। क्षर भौतिक जगत की नश्वर वस्तुएँ हैं। अक्षर भगवान के लोक में निवास करने वाली मुक्त आत्माएँ हैं। पुरुषोत्तम का अर्थ परमात्मा है जो संसार का नियामक और निर्वाहक है। वह विनाशी और अविनाशी पदार्थों से परे है। हमें अपना सर्वस्व उस पर न्योछावर करते हुए उसकी आराधना करनी चाहिए।
श्रीभगवानुवाच |
ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् |
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् || 1||
पुरुषोतम भगवान ने कहाः संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष की जड़ें ऊपर की ओर तथा इसकी शाखाएँ नीचे की ओर होती हैं। इसके पत्ते वैदिक मंत्र हैं और जो इस वृक्ष के रहस्य को जान लेता है उसे वेदों का ज्ञाता कहते हैं।
अश्वत्थ शब्द का अर्थ है- जो अगले दिन तक यथावत् नहीं रहता। इस शब्द का अर्थ निरन्तर परिवर्तित होना भी है। संसार भी अश्वत्थ वृक्ष के समान है क्योंकि यह नित्य परिवर्तनशील है। संस्कृत शब्दकोश में संसार को निम्न प्रकार से परिभाषित किया गया है- "संसृतिति संसारः" अर्थात जो निरंतर परिवर्तनशील है वह संसार है। "गच्छतीति जगत्" अर्थात् जो निरंतर गतिमान है वह जगत है। संसार में केवल परिवर्तन ही नहीं होता बल्कि एक दिन इसका विनाश भी होता है और यह भगवान में विलीन हो जाता है। इसलिए इसका प्रत्येक पदार्थ अस्थायी या अश्वत्थ है।
अश्वत्थ का एक अन्य अर्थ पीपल का वृक्ष भी है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि जीवात्मा के लिए भौतिक जगत एक विशाल अश्वत्थ वृक्ष है। प्रायः वृक्षों की जड़ें नीचे की ओर तथा शाखाएँ ऊपर की ओर होती हैं किन्तु इस वृक्ष की जड़ ऊपर की ओर अर्थात् भगवान से उत्पन्न होती है और सी पर आश्रित है। इसके तने और शाखाएँ नीचे की ओर बढ़ते हैं जिसमें माया के सभी लोकों में व्याप्त सभी प्राणी सम्मिलित हैं। इसके पत्ते वैदिक मंत्र (छन्दांसि) हैं जिनका उच्चारण धार्मिक कर्मकाण्डों के अवसर पर किया जाता है। ये इस वृक्ष को आसव (भोजन) प्रदान करते हैं। इन वैदिक मंत्रों में वर्णित यज्ञों को संपन्न कर जीवात्मा स्वर्ग में जाती है और जब उसके पुण्य कर्म क्षीण हो जाते हैं तब वह वापस पृथ्वी पर लौट आती है। इस प्रकार से इस वृक्ष के पत्ते उसे जन्म और मृत्यु के चक्र में निरन्तर घुमाते रहते। संसार के रूप में इस वृक्ष को 'अव्ययम्' अर्थात् अविनाशी कहा जाता है क्योंकि इसका प्रवाह निरन्तर बना रहता है और जीवात्मा इसके आदि और अन्त का अनुभव नहीं कर पाती। जिस प्रकार से समुद्र का जल बाष्प होकर बादल बन जाता है फिर पृथ्वी पर बरसता है तत्पश्चात् पुनः समुद्र में मिल जाता है। उसी प्रकार जन्म और मृत्यु का चक्र शाश्वत होता है। वेदों में भी इस वृक्ष का उल्लेख किया गया है-
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः
(कठोपनिषद्-2.3.1)
"अश्वत्थ वृक्ष जिसकी जड़ें ऊपर की ओर और शाखाएँ नीचे की ओर की है, शाश्वत है।"
ऊर्ध्वमूलम् अर्वाक्शाखम् वृक्षम् यो सम्प्रति ।
न स जातु जन: श्रद्धयात्मृत्युत्युर्मा मर्यादिति
(तैत्तिरीयारणायक-1.11.5)
"वे लोग जो यह जानते हैं कि इस वृक्ष की जड़ें ऊपर की ओर तथा शाखाएँ नीचे की ओर हैं, वे मानते हैं कि मृत्यु उनका विनाश नहीं कर सकती है।" वेद इस वृक्ष का वर्णन इस उद्देश्य से करते हैं कि हमें इस वृक्ष को काटने का प्रयास करना चाहिए। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो इस 'संसार' वृक्ष को काट डालने के रहस्य समझता है वह वेदों का ज्ञाता (वेदवित्) है।
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवाला: |
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके || 2||
इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर तथा नीचे की ओर फैली हुई हैं जी त्रिगुणों द्वारा पोषित होती हैं। इन्द्रियों के विषय कोंपलों के समान हैं। जो वृक्ष की जड़ें नीचे की ओर भी फली होती हैं जो मानव को कर्म से बाँधती हैं।
श्रीकृष्ण प्राकृतिक सृष्टि की तुलना अश्वत्थ वृक्ष के साथ कर रहे हैं। इस वृक्ष का मुख्य तना मानव शरीर है जो कर्मयोनि है। इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे दोनों ओर बढ़ती है। यदि जीवात्मा पाप कर्म करती है तब वह या तो पशु योनि या फिर निम्न योनियों में पुनर्जन्म लेती है। ये नीचे की शाखाएँ हैं। यदि जीवात्मा पुण्य कर्म करती है तब यह स्वर्ग लोक में गंधर्व, देवता आदि के रूप में जन्म लेती है। ये ऊपर की शाखाएँ हैं। वृक्ष को जल से सींचा जाता है लेकिन संसार रूपी इस वृक्ष की सिंचाई माया के तीनों गुणों से होती है। ये तीन गुण इन्द्रिय विषयों को जन्म देते हैं जो वृक्ष पर लगी कोंपलों (विषयप्रवालाः) के समान हैं। कोंपलों का कार्य अंकुरित होना है जिससे वृक्ष और अधिक विकसित होता है। अश्वत्थ वृक्ष पर कोंपलें अंकुरित होकर सांसारिक कामनाओं को बढ़ाती हैं जो वृक्ष की वायवीय जड़ों के समान हैं। बरगद के वृक्षों की विशेषता यह है कि ये अपनी शाखाओं से वायवीय जड़ों को नीचे भूमि पर ले जाते हैं। अतः इसकी वायवीय जड़ें दूसरा तना बन जाती हैं जिससे बरगद का वृक्ष विशाल आकार में फैलता है।
कोलकाता के बॉटनिकल गार्डन में सबसे बड़े आकार के बरगद के वृक्ष को 'दि ग्रेट बॅनियन' के नाम से जाना जाता है। यह वृक्ष चार एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है। वृक्ष के शिखर की 1100 गज की परिधि है और लगभग इसकी 3300 वायवीय जड़ें नीचे भूमि की ओर हैं। भौतिक जगत के विषय वृक्ष की कोंपलों के समान हैं। वे अंकुरित होती हैं और मनुष्यों में इन्द्रिय सुख की कामनाओं को भड़काती हैं। इन कामनाओं की तुलना वृक्ष की वायवीय जड़ों से की जाती है। ये वृक्ष को विकसित करने के लिए उसे आसव (भोजन) प्रदान करती हैं। भौतिक सुखों की कामनाओं से प्रेरित होकर मनुष्य कर्म करने में संलग्न रहता है। किन्तु इन्द्रियाँ कभी पूर्ण रूप से तृप्त नहीं होतीं। इसके विपरीत जैसे-जैसे हम कामनाओं की पूर्ति करते हैं वैसे-वैसे उनमें वृद्धि होती है। इस प्रकार से कामनाओं की पूर्ति हेतु संपन्न किए गए कर्म इन्हें और अधिक बढ़ाते हैं। परिणामस्वरूप इस वृक्ष का आकार बढ़ता जाता है और यह असीमित रूप से विकसित होता रहता है। इस प्रकार ये जड़ें आत्मा को और अधिक भौतिक चेतना में उलझाती हैं।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा |
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा || 3||
तत: पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूय: |
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यत: प्रवृत्ति: प्रसृता पुराणी || 4||
इस संसार में इस वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का बोध नहीं हो सकता और न ही इसके आदि, अंत और अस्तित्व को जाना जा सकता है। अतः इस गहन जड़ों वाले अश्वत्थ वृक्ष को विरक्ति रूपी शस्त्र से काट देना चाहिए। तभी कोई इसके आधार को जान सकता है। वह आधार परम प्रभु हैं जिनसे ब्रह्माण्ड का अनादिकाल से प्रवाह हुआ है और उनकी शरण ग्रहण करने पर फिर कोई इस संसार में लौट कर नहीं आता।
देहधारी जीवात्माएँ 'संसार' में डूबी रहती हैं अर्थात् निरंतर जन्म और मृत्यु के चक्र में घूमती रहती हैं और इस अश्वत्थ वृक्ष की प्रकृति को समझने में असमर्थ रहती हैं। वे इस वृक्ष की कोंपलों को अति आकर्षक समझती हैं अर्थात् वे इन्द्रिय विषयों का भोग करने के लिए लालायित रहती हैं और इनके भोग की कामना को विकसित करती हैं। इन कामनाओं की पूर्ति के लिए वे कठोर परिश्रम करती हैं किंतु उनके प्रयास इस वृक्ष को और अधिक विकसित करते हैं। जब कामनाओं की तृप्ति की जाती है तब वे लोभ के रूप में दोगुनी गति से पुनः उदित होती हैं। जब इनकी पूर्ति में बाधा आती है तब वे क्रोध का कारण बनती हैं, जिससे बुद्धि भ्रमित हो जाती है तथा अज्ञानता गहन हो जाती है।
श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि अश्वत्थ वृक्ष के रहस्य को केवल कुछ लोग ही समझ पाते हैं। सामान्य लौह कहते हैं-“मैं राम प्रसाद का सुपुत्र हरि प्रसाद इत्यादि हूँ और अमुक देश के नगर में निवास करता हूँ। मैं अधिक से अधिक सुख प्राप्त करना चाहता हूँ। इसलिए मैं अपनी शारीरिक चेतना के अनुसार काम करता हूँ किन्तु मुझे धोखे में रखा गया और मैं अब व्यथित हो गया हूँ।" वृक्ष की उत्पत्ति और प्रकृति को समझे बिना मनुष्य व्यर्थ के कार्यों और प्रयासों में संलग्न रहते हैं। भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य पाप कर्म करता है और निम्न योनियों में जन्म लेता है। कभी-कभी भौतिक सुखों के भोग की प्रवृत्ति वृक्ष के पत्तों की ओर आकर्षित करती है जोकि वेदों में वर्णित धार्मिक अनुष्ठान हैं। इन धार्मिक कार्मकाण्डों में संलग्न होकर मनुष्य केवल कुछ समय के लिए स्वर्ग लोक जाता है और अपने पुण्य कर्म समाप्त होने पर वह पुनः पृथ्वी लोक पर लौट आता है। इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं-
कृष्ण भूलि सेइ जीव अनादि-बहिर्मुख
अतएव मायातारे देय संसार-दुःख।।
कभु स्वर्गे उठाय, कभु नरके डुबाय
दण्ड्य जाने राजा येन नदीते चुभाय
(चैतन्य चरितामृत, मध्य लीला-20.117-118)
"आत्मा अनन्त काल से भगवान को भुलाए हुए है, इसलिए माया उसे संसार के दुःख भोगने के लिए विवश कर देती है। कभी-कभी यह आत्मा को स्वर्ग लोक देती है और कभी इसे नीचे नरक के लोकों में गिरा देती है। यह प्राचीन काल में राजाओं द्वारा दी जाने वाली यातनाओं के समान है। यातना के रूप में प्राचीन काल में राजा किसी व्यक्ति के सिर को पानी में तब तक डुबाने का ओदश देते थे जब तक कि उसका दम न घुट जाए और फिर उसे कुछ अंतराल के लिए मुक्त कर देते थे। जीवात्मा की स्थिति भी इसी के समान है। इसे स्वर्ग में केवल अस्थायी रूप से राहत मिलती है और फिर पुनः इसे पृथ्वी पर गिरा दिया जाता है।" इस प्रकार से अनन्त जन्म व्यतीत हो जाते हैं। भौतिक सुखों को प्राप्त करने के सभी प्रयासों का परिणाम केवल वृक्ष की जड़ों को और अधिक विकसित करना ही है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस वृक्ष को काटने वाला शस्त्र विरक्ति है। 'असङ्ग' शब्द का अर्थ विरक्ति है और यह जीवात्मा के कष्टों का उपाय है। माया के तीन गुणों से भड़की इच्छाओं का विनाश विरक्ति रूपी शस्त्र से किया जा सकता है। यह शस्त्र इस आत्म ज्ञान से निर्मित होना चाहिए-"मैं शाश्वत जीव हूँ न कि भौतिक शरीर। मैं जिस शाश्वत दिव्य आनन्द को प्राप्त करना चाहता हूँ उन्हें इन भौतिक पदार्थों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। जिन इच्छाओं को मैंने यह सोचकर प्रश्रय दिया कि मैं शरीर हूँ, उन्होंने केवल मुझे जन्म और मृत्यु के चक्र में ही स्थिर रखा है। इस में कोई राहत नहीं है।" जब कोई विरक्ति पश्चात् विकसित करता है तब वृक्ष का विकास अवरूद्ध हो जाता है और यह सूख जाता है। इसके पश्चात हमें इस वृक्ष के आधार को खोजना चाहिए जोकि जड़ों से ऊपर है। यह आधार परमेश्वर है।
जैसा कि श्रीकृष्ण ने पहले कहा था-"मैं ही भौतिक और आध्यात्मिक सृष्टि का स्रोत हूँ और सभी कुछ मुझसे उत्पन्न होता है। जो बुद्धिमान लोग इसे जानते हैं वे पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ मेरी आराधना करते हैं।" (श्लोक 10.8) इस प्रकार वृक्ष के मूल स्रोत को जानने के लिए हमें इस श्लोक में वर्णित पद्धति के अनुसार समर्पण करना होगा-"मैं सब कुछ उन पर छोड़ता हूँ जिनसे यह ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ है।" इस प्रकार से जिस वृक्ष को समझना अत्यंत कठिन था उसे अब इस विधि से समझा जा सकता है।
श्रीकृष्ण ने पहले कहा था-"मेरी दिव्य शक्ति माया को पार करना अत्यंत कठिन है लेकिन जो मेरे शरणागत हो जाते हैं वे इसे सरलता से पार कर लेते हैं।" (श्लोक 7.14) इसलिए परम प्रभु की शरण ग्रहण करने पर यह अश्वत्थ वृक्ष नष्ट हो जाएगा। फिर हम पुनः जन्म लेकर संसार में नहीं आएंगे और मृत्यु के पश्चात् भगवान के दिव्य लोक में जाएंगे। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण यह प्रकट करेंगे कि शरणागति क्यों आवश्यक है?
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा: |
द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदु:खसंज्ञै
र्गच्छन्त्यमूढा: पदमव्ययं तत् || 5||
वे जो अभिमान और मोह से मुक्त रहते हैं एवं जिन्होंने आसक्ति पर विजय पा ली है, जो निरन्तर अपनी आत्मा और भगवान में लीन रहते हैं, जो इन्द्रिय भोग की कामना से मुक्त रहते हैं और सुख-दुःख के द्वन्द्वों से परे हैं, ऐसे मुक्त जीव मेरा नित्य ध मि प्राप्त करते हैं।
श्रीकृष्ण अब बताते हैं कि इस वृक्ष के आधार, भगवान की शरणागति कैसे ग्रहण करें। वे कहते हैं कि मनुष्य को सर्वप्रथम अज्ञानता से उत्पन्न अभिमान का त्याग करना चाहिए। देहधारी जीव भ्रम के कारण यह सोचता हैं कि "मैं सब का स्वामी हूँ जो कुछ भी मेरे स्वामित्व में है, भविष्य में मेरे पास उसमें और अधिक होगा। यह सब कुछ मेरे सुख के लिए है।" जब तक हम अज्ञानता से उत्पन्न घमण्ड के नशे में चूर रहते हैं तब तक हम स्वयं को भौतिक सुखों का भोक्ता समझते हैं। ऐसी अवस्था में हम भगवान का अनादर करते हैं और भगवान की इच्छा में समर्पित हाने की इच्छा नहीं करते। ज्ञान के द्वारा हमें स्वयं को भोक्ता मानने की भावना का त्याग करना चाहिए। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि भौतिक सुखों और पदार्थों का संबंध भगवान से है और ये सब उनकी सेवा के लिए हैं। आत्मा भगवान की दासी है इसलिए विषयों को भोगने की भावना को सेवा की मनोभावना में परिवर्तित कर देना चाहिए। इसके लिए हमें सांसारिक आसक्तियों का त्याग करना चाहिए जो हमारे मन को संसार में आसक्त और भगवान से विमुख करती हैं। हमें निष्काम सेवा भावना से मन को भगवान में अनुरक्त करना चाहिए और स्वयं को भगवान का शाश्वत दास समझना चाहिए। पद्मपुराण में वर्णन है-
दासभूतमिदं तस्य जगत् स्थावर जंगमम्।
श्रीमन्नारायणस्वामी जगतान्प्रभुरीश्वरः।।
"भगवान नारायण इस संसार के नियामक और स्वामी हैं। सभी चर और अचर तथा सृष्टि के सभी तत्त्व उनके सेवक हैं।" इसलिए हम जितनी भगवान की सेवा की इच्छा उत्पन्न करते हैं, उतना ही भोक्ता होने का हमारा भ्रम दूर होगा और हृदय शुद्ध होगा। कृपालु जी महाराज हृदय की शुद्धता के लिए इसे सबसे शक्तिशाली साधन मानने पर बल देते हैं-
सौ बातन की बात इक, धरु मुरलीधर ध्यान।
बढ़वहु सेवा-वासना, यह सौ ज्ञानन ज्ञान।।
(भक्ति शतक-74)
"शुद्धिकरण के लिए सैकड़ों उपायों में से सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि मन को मुरली मनोहर श्रीकृष्ण में तल्लीन किया जाए और उनकी सेवा करने की इच्छा बढ़ायी जाय। यह ज्ञान हजारों है।"
एक बार जब हम अपने हृदय को शुद्ध कर लेते हैं और भगवान की सेवा में स्थित हो जाते हैं तब क्या होता है? श्रीकृष्ण उपर्युक्त श्लोक में वर्णन करते हैं कि ऐसी सिद्ध आत्माएँ अनन्त काल के लिए भगवद्धाम में चली जाती है। जब भगवान प्राप्त हो जाती है तब मायिक क्षेत्र का आगे कोई महत्व नहीं रहता। फिर आत्मा अन्य महापुरुषों के साथ भगवान के दिव्यलोक में निवास करने के योग्य हो जाती है जैसे कारागार किसी नगर के एक छोटे से भू-भाग पर स्थित होता है वैसे ही समस्त भौतिक क्षेत्र भगवान की सारी सृष्टि का एक चौथाई भाग है, जबकि आध्यात्मिक क्षेत्र तीन चौथाई है। वेद में वर्णन है-
पादोऽस्य विश्वा भूतानि, त्रिपादस्य अमृतं दिवि
(पुरुष सुक्तम मंत्र-3)
संसार माया से निर्मित है, लेकिन यह सृष्टि का एक चौथाई भाग है। अन्य तीन भाग जन्म और मृत्यु से परे भगवान के नित्य लोक हैं। श्रीकृष्ण अगले श्लोक में भगवान के नित्य धाम की व्याख्या करते हैं।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावक: |
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम || 6||
न तो सूर्य, न ही चन्द्रमा और न ही अग्नि मेरे सर्वोच्च लोक को प्रकाशित कर सकते हैं। वहाँ जाकर फिर कोई पुनः इस भौतिक संसार में लौट कर नहीं आता।
यहाँ श्रीकृष्ण दिव्य क्षेत्र के स्वरूप की संक्षिप्त जानकारी देते हैं। इस आध्यात्मिक क्षेत्र को प्रकाशित करने के लिए सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि यह स्वतः प्रकाशित है। भौतिक क्षेत्र माया से निर्मित है। जबकि दिव्य क्षेत्र का निर्माण योगमाया द्वारा होता है। यह माया के द्वंद्वों और दोषों से परे और सभी प्रकार से पूर्ण है। यह सत्-चित-आनन्द अर्थात् नित्य, सर्वज्ञ और आनन्दस्वरूप है। दिव्य क्षेत्र में एक आध्यात्मिक आकाश है जिसे परव्योम कहते हैं जिसमें भगवान के ऐश्वर्य और वैभवों से सम्पन्न असंख्य लोक हैं। भगवान के अनन्त रूप जैसे-कृष्ण, राम, नारायण आदि के इस आध्यात्मिक आकाश में अपने-अपने लोक हैं। वहाँ वे नित्य अपने भक्तों के साथ निवास करते हैं और दिव्य लीलाएँ करते हैं। ब्रह्मा श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहते हैं-
गोलोक-नाम्नि निज-धाम्नि तले च तस्य
देवी महेश-हरि-धामसु तेषु तेषु।
ते ते प्रभाव-निचया विहिताश्च येन
गोविन्दम् आदि-पुरुषम् तमहं भजामि ।।
(ब्रह्मसंहिता श्लोक-43)
"इस आध्यात्मिक आकाश में गोलोक भगवान श्रीकृष्ण का निजी लोक है। आध्यात्मिक आकाश में नारायण, शिव, दुर्गा आदि के लोक भी सम्मिलित हैं। मैं परम पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करता हूँ जिनके वैभवों की महिमा से यह संभव है।" श्रीकृष्ण के दिव्य धाम गोलोक के संबंध में ब्रह्मा पुनः वर्णन करते हुए कहते हैं
आनन्द-चिन्मय-रस-प्रतिभाविताभिस्
ताभिर्य एव निज-रूपतया कलाभिः।
गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो
गोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि।।
(ब्रह्मसंहिता श्लोक-37)
"मैं परम प्रभु गोविन्द की आराधना करता हूँ जो गोलोक में राधा, जो उनके ही अपने रूप का विस्तार है, के साथ निवास करते हैं। उनकी नित्य सहचारिणी सखियाँ हैं जो सदैव आनंद से परिपूर्ण रहती हैं और चौंसठ कलाओं से संपन्न हैं।" वे भक्त जो भगवान को पा लेते हैं वे उनके सर्वोच्च लोक में जाते हैं और उनकी लीलाओं में भाग लेते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो जीवात्मा वहाँ प्रवेश करती है वह 'संसार' अर्थात् जीवन-मृत्यु के संसार को पार कर लेती है।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: |
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति || 7||
इस जीवलोक की आत्माएँ मेरा शाश्वत अणु अंश हैं। लेकिन माया के बंधन के कारण वे मन सहित छः इन्द्रियों के साथ संघर्षरत करती हैं।
श्रीकृष्ण ने पहले यह समझाया था कि जो उनके लोक में जाते हैं वे पुनः संसार में लौटकर नहीं आते। अब वे उन जीवात्माओं का वर्णन करते हैं जो माया में रहती हैं। सर्वप्रथम वे कहते हैं कि वे जीवात्माएँ उनका अणु अंश हैं। भगवान का अंश दो प्रकार के होते हैं-
1. स्वांशः ये भगवान के अवतार हैं, जैसे राम, नृसिंह, वराह आदि। ये श्रीकृष्ण से भिन्न नहीं हैं इसलिए इन्हें स्वांश कहा जाता है। इसका तात्पर्य अभिन्न अंश है।
2. विभिन्नांशः ये प्रत्यक्ष रूप से भगवान के अंश नहीं हैं बल्कि
ये उनकी (जीव शक्ति) हैं। इस श्रेणी में सभी आत्माएँ सम्मिलित हैं। श्रीकृष्ण ने 7वें अध्याय के 5वें श्लोक में कहा था-“हे महाबाहों अर्जुन! माया से परे मेरी एक अन्य परा शक्ति है। वह जीवात्मा है जो इस संसार में जीवन का आधार है।"
आगे विभिन्नांश आत्माओं की तीन श्रेणियों का वर्णन इस प्रकार है
1. नित्य सिद्धः ये वो आत्माएँ हैं जो सदैव से मुक्त अवस्था में हैं और अनन्त काल से भगवान के लोक में वास कर रही हैं और उनकी लीलाओं में भाग लेती हैं।
2. साधन सिद्धः ये हमारी जैसी आत्माएँ हैं जो पहले संसार में रहती थीं लेकिन उन्होंने कठोर साधना एवं भक्ति द्वारा भगवान को प्राप्त किया। अब वे अनन्त काल के लिए भगवान के दिव्य लोक में वास करती हैं और भगवान की दिव्य लीलाओं में भाग लेती हैं।
3. नित्य बद्धः ये आत्माएँ अनन्त काल से माया में निवास कर रही हैं। ये पाँच इन्द्रियों और मन के विषयों में लिप्त रहती हैं।
कटोपनिषद् में वर्णन है-
पशञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभू:
(कठोपनिषद्-2.1.2)
"स्रष्टा ब्रह्मा ने हमारी इन्द्रियों को ऐसा बनाया है कि वे बाह्य संसार में आकर्षित रहती हैं।" नित्य बद्ध आत्माओं के लिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे मन और इन्द्रियों की तृप्ति के लिए संघर्ष कर रही हैं और कष्ट पा रही हैं। वे अब अगले श्लोक में यह व्याख्या करेंगे कि मृत्यु होने के पश्चात् जब आत्मा दूसरे शरीर में प्रवेश करती है तब मन और इन्द्रियों की क्या अवस्था होती है।
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वर: |
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् || 8||
जिस प्रकार से वायु सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है, उसी प्रकार से आत्मा जब पुराने शरीर का त्याग करती है और नये शरीर में प्रवेश करती है उस समय वह अपने साथ मन और इन्द्रियों को भी ले जाती है।
यहाँ आत्मा के देहांतरण की प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। इसके लिए वायु का उदाहरण दिया गया है जो फूलों की सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है। मृत्यु होने पर आत्मा स्थूल शरीर को छोड़ देती है लेकिन यह अपने साथ सूक्ष्म और कारण शरीर, जिसमें मन और इन्द्रियाँ भी सम्मिलित हैं, को अपने साथ ले जाती है। दूसरे अध्याय के 28वें श्लोक में तीन प्रकार के शरीरों का वर्णन किया गया था।
आत्मा को प्रत्येक जीवन में नया शरीर मिलता है और मन भी उसके साथ अनंत जन्मों से निरन्तर यात्रा करता रहता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जो लोग जन्म से अन्धे होते हैं वे भी स्वप्न किस प्रकार देख पाते हैं। स्वप्न प्रायः हमारे विचारों के विरूपण का परिणाम है वो जागृत अवस्था में असंबद्ध रहते हैं किंतु निद्रावस्था के दौरान संबद्ध हो जाते है। उदाहरण के लिए यदि कोई उड़ते हुए पक्षी को देख कर कहता है कि “यदि मैं पक्षी होता तब कितना अच्छा होता।" तब स्वप्न में वह मानव शरीर में स्वयं को उड़ता हुआ पाता है। ऐसा जागृत अवस्था के विरूपित विचारों का स्वप्नावस्था से संबद्ध होने के कारण हुआ। इसके अतिरिक्त जन्मांध व्यक्ति जिसने कभी कोई रूप या आकार नहीं देखा वह भी इन्हें स्वप्न में देख सका क्योंकि जागृत अवस्था की धारणाएँ अनन्त जन्मों से अवचेतन मन में संचित होती हैं। यह निरूपण करने के पश्चात् कि आत्मा शरीर का त्याग करते समय मन और इन्द्रियों को भी अपने साथ ले जाती है, अब आगे वे यह व्याख्या करेंगे कि वह इनका साथ क्या उपयोग करती है।
श्रोत्रं चक्षु: स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च |
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते || 9||
कान, आंख, त्वचा, जिह्वा और नासिका के समूह मन को अधिष्ठित कर देहधारी आत्मा इन्द्रिय विषयों का भोग करती है।
आत्मा दिव्य होने के कारण प्रत्यक्ष रूप से स्वाद, स्पर्श, देख, सूंघ या सुन नहीं सकती तब फिर यह इन भोगों को कैसे ग्रहण कर सकती है? इसका उत्तर है-इन्द्रियाँ और मन इसमें उसकी सहायता करते हैं। इन्द्रियाँ और मन वास्तव में जड़ हैं लेकिन ये आत्मा की चेतना से चेतनावत् हो जाते हैं। इसलिए वे पदार्थों, परिस्थितियों, विचारों और व्यक्तियों के संपर्क से सुख-दुःख की अनुभूति करते हैं। अहंकार के कारण आत्मा अपनी पहचान मन और इन्द्रियों के रूप में करती है और परोक्ष रूप से उसके आनन्द की अनुभूति करती है।
आत्मा दिव्य है किन्तु वह जिन सुखों की अनुभूति करती है वे भौतिक हैं। इन्द्रियाँ और मन आत्मा को चाहे कितना भी सुख प्रदान करें किन्तु फिर भी वह अतृप्त रहती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसने अभी तक अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया और इसकी आनन्द प्राप्त करने की खोज जारी रहती है। अमरीकी दार्शनिक रॉल्फ वॉल्डो एमर्सन ने इसका अति सुंदरता से वर्णन किया है-"हम मानते हैं कि मानव जीवन दुःखखमय है लेकिन हमें कैसे ज्ञात हुआ कि यह दुःखमय है? इस असहजता और इस असंतोष का कारण क्या है? इस अभाव और अज्ञानता की अनुभूति के द्वारा आत्मा अपना विलक्षण रूप प्रकट करती है?" अन्य विख्यात दार्शनिक मेस्टर एक्खर्ट लिखते हैं, “आत्मा में कुछ तो ऐसा है जो सभी से परे दिव्य और सरल है। यह केवल परम सार के द्वारा संतुष्ट हो सकती है।"
जिस असीम नित्य और दिव्य आनन्द को आत्मा प्राप्त करना चाहती है वह उसे केवल भगवान से प्राप्त हो सकता है। जब किसी को यह अनुभव हो जाता है, तब वही इन्द्रियाँ जो मन के बंधन का कारण थीं वे भगवान की ओर अग्रसर हो जाता हैं और इनका उपयोग भक्ति के साधन के रूप में किया जाता है। इसका अद्भुत उदाहरण संत तुलसीदास हैं जिन्होंने हिन्दी में रामचरितमानस की रचना की है। अपनी युवावस्था में उनकी अपनी पत्नी में अत्यंत आसक्ति थी। एक बार वह कुछ दिनों के लिए अपने मायके रहने चली गयी। जब तुलसीदास में उनसे मिलने की उत्कंठा उत्पन्न हुई तब वह अपने ससुराल की ओर चल दिए। लेकिन मार्ग में पड़ने वाली नदी का बहाव अत्यंत तीव्र था और कोई नाविक भी उन्हें नदी पार कराने के लिए तैयार नहीं हुआ क्योंकि उस समय मूसलाधार वर्षा हो रही थी। एक मृत शव नदी में तैर रहा था। अपनी पत्नी से मिलने की तीव्र इच्छा में तुलसीदास ने उसे लकड़ी का टुकड़ा समझा। उन्होंने लाश से लिपट कर नदी पार की। अपनी पत्नी से मिलने की इच्छा उन पर इतनी हावी हो गयी थी कि घर के बाहर की दीवार पर लटके हुए सर्प को तुलसीदास ने ध्यानपूर्वक नहीं देखा और सोचा कि वह रस्सी होगी। इसलिए वह मुख्य द्वार को खटखटा कर समय व्यर्थ करने के स्थान पर साँप को पकड़ कर दीवार पर चढ़ गए। जब उन्होंने खिड़की से कमरे में प्रवेश किया तब उनकी पत्नी ने उनसे पूछा कि उन्होंने नदी कैसे पार की और कैसे दीवार से ऊपर चढ़ कर आए। तब तुलसीदास ने बाहर उन वस्तुओं की ओर संकेत किया जिन्हें उन्होंने भूलवश लकड़ी का लट्ठा और रस्सी समझा था। उनकी पत्नी मृत शव और साँप को देखकर आश्चर्यचकित रह गयी। उसने कहा-"आपकी रक्त और मांस से बने शरीर में इतनी आसक्ति है। यदि आपने भगवान को पाने की ऐसी उत्कंठा प्रकट की होती तब तुम्हें इस संसार में जन्म न लेना पड़ता।" पत्नी के शब्दों से तुलसीदास को इतना आघात पहुंचा कि उन्हें अपनी मूर्खता का आभास हो गया और उनमें संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न हुआ। वह घर गृहस्थी को त्याग कर भक्ति में तल्लीन होने के लिए निकल पड़े। उन्होंने स्वयं को भगवान की भक्ति में निमग्न कर दिया। उन्होंने अपनी उन इच्छाओं को जिन्होंने अतीत में उन्हें कष्ट दिया था, उन्हें भगवान की भक्ति में तल्लीन कर दिया।
इस प्रकार भक्ति के कारण वे महान कवि संत तुलसीदास कहलाए। बाद में उन्होंने रामचरित मानस की रचना की जिसमें उन्होंने इस प्रकार से वर्णन किया-
कामिहि नारि पियारि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरन्तर प्रिय लागहू मोहि राम।।
(रामचरितमानस)
"जिस प्रकार से कामी पुरुष को सुंदर स्त्री प्रिय लगती है और लोभी को धन प्यारा लगता है उसी प्रकार से मेरा मन और इन्द्रियाँ भगवान राम की इच्छा करती रहें।
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् |
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: || 10||
अज्ञानी जन आत्मा का उस समय अनुभव नहीं कर पाते जब यह इन्द्रिय विषयों का भोग करती है और न ही उन्हें इसके शरीर से प्रस्थान करने का बोध होता है लेकिन वे जिनके नेत्र ज्ञान से युक्त होते हैं वे इसे देख सकते हैं।
यद्यपि आत्मा हमारे हृदय में रहती है और मन एवं इन्द्रियों की भावनाओं को ग्रहण करती है किन्तु इसे प्रत्येक मनुष्य जान नहीं पाता। इसका कारण यह है कि आत्मा भौतिक पदार्थ नहीं है और इसे भौतिक इन्द्रियों से देखा और स्पर्श नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिक अपने उपकरणों द्वारा प्रयोगशाला में इसका पता नहीं लगा सकते, इसलिए वे भूलवश निष्कर्ष निकालते हैं कि शरीर ही आत्मा है। यह एक मकैनिक द्वारा यह ज्ञात करने के प्रयास के समान है कि कार कैसे चलती है। वह पिछले पहियों की गति की ओर देखता है फिर त्वरक, अग्निशमन स्विच और स्टीरिंग व्हील का निरीक्षण करता है। वह इन सबको कार की गति के कारणों के रूप में चिह्नित करता है पर यह अनुभव नहीं कर पाता कि कार चलाने का काम कार चालक करता है। समान रूप से आत्मा के ज्ञान के बिना वैज्ञानिक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि शरीर के सभी अंग सम्मिलित रूप से शरीर की चेतना के स्रोत हैं।
किन्तु जो अध्यात्मिक मार्ग पर चलते हैं वे ज्ञान के चक्षुओं से यह देखते हैं कि आत्मा शरीर के अंगों को सक्रिय करती है। जब यह शरीर से प्रस्थान करती है तब शरीर के विभिन्न अंग जैसे हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े इत्यादि यहीं रह जाते हैं और शरीर में चेतना का कोई अस्तित्व नहीं रहता। चेतना आत्मा का लक्षण है। जब तक आत्मा शरीर में उपस्थित रहती है तब तक चेतना शरीर में रहकर उसे जीवित रखती है और आत्मा द्वारा शरीर त्याग करने पर वह भी शरीर को छोड़ देती है। ज्ञान रूपी चक्षु से संपन्न ज्ञानी मनुष्य ही इसे देख सकते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि अज्ञानी मनुष्य आत्मा की दिव्यता से अनभिज्ञ रहते हैं और भौतिक शरीर को आत्मा समझते हैं।
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् |
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतस: || 11||
भगवत्प्राप्ति के लिए प्रयासरत योगी यह जान लेते हैं कि आत्मा शरीर में प्रतिष्ठित है किन्तु जिनका मन शुद्ध नहीं है वे प्रयत्न करने के बावजूद भी इसे जान नहीं सकते।
ज्ञान अर्जन का प्रयास करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह भी आवश्यक है कि हमारे प्रयास उचित दिशा की ओर निर्देशित भी हो। मनुष्य यह सोंचने की भूल करते हैं कि वे भगवान को उन्हीं साधनों द्वारा जान सकते हैं जिनके द्वारा उन्होंने संसार को जाना है। अपनी इन्द्रियों के अनुभव और अपनी बुद्धि के आधार पर वे सभी प्रकार के ज्ञान को उचित और अनुचित घोषित करने का निर्णय करते हैं। यदि उनकी इन्द्रियाँ किसी पदार्थ का अनुभव नहीं कर पाती और उनकी बुद्धि उसे समझ नहीं पाती तब फिर वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उस पदार्थ का कोई अस्तित्व नहीं हो सकता। इस सिद्धान्त को स्पष्ट करते हुए, एलेक्सिस कार्रल ने अपनी पुस्तक, 'मैन द अननोन' में लिखा है-"हमारे मन में ऐसी वस्तुओं को अस्वीकार करने की प्रवृत्ति होती है जो वैज्ञानिक या दार्शनिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं होती। आखिरकार सभी वैज्ञानिक भी मानव मात्र हैं। वे अपने परिवेश और पूर्वाग्रहों से युक्त होते हैं। वे यह विश्वास करते हैं कि जिन तथ्यों को वर्तमान सिद्धांतों द्वारा समझाया नहीं जा सकता उनका कोई अस्तित्व नहीं होता। आधुनिक युग के वैज्ञानिक सिद्धियों और अन्य आध्यात्मिक सिद्धान्तों को अंधविश्वास के रूप में देखते हैं। अप्रामाणिक प्रतीत होने वाले तथ्य दबा दिए जाते हैं।"
न्याय दर्शन में इस प्रकार के विचार को कूप-मंडूक-न्याय कहते हैं। कुएँ में रहने वाला एक मेढ़क अपने रहने के स्थान से भली-भांति परिचित था। एक दिन राणा केन्क्रिवोर (समुद्र में रहने वाली एक मेढ़क ) उस कुएँ में कूद कर आ गया। फिर दोनों मेढ़क आपस में वार्तालाप करने लगे। कुएँ के मेढ़क ने समुद्र में रहने वाले मेढ़क से पूछा-"वह समुद्र कितना बड़ा है जहाँ से तुम आये हो"? उसने उत्तर दिया "वह बहुत विशाल है।" "क्या इस कुएँ से पाँच गुणा अधिक आकार का है?" "नहीं इससे भी अधिक" "क्या इससे दस गुणा विशाल?" "नहीं यह तो कुछ नहीं है"? "क्या सौ गुणा अधिक"? "नहीं, इससे भी कहीं अधिक विशाल।" कुएँ के मेढ़क ने कहा, "तुम झूठ बोल रहे हो, कोई वस्तु मेरे कुएँ से सौ गुणा अधिक विशाल कैसे हो सकती है?" कुएँ में रहने वाले मेंढक की बुद्धि जीवन भर कुएँ में रहने के कारण संकुचित हो चुकी थी। इसलिए वह विशाल महासागर की कल्पना नहीं कर सका। समान रूप से सीमित बुद्धि के कारण सांसारिक लोग अलौकिक आत्मा के अस्तित्व की संभावना को स्वीकार नहीं करते। लेकिन जो आध्यात्मिक मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे यह अनुभव करते हैं कि उनकी भौतिक बुद्धि की परिधि से परे भी कोई ज्ञान हो सकता है। वे विनम्रता और विश्वास के साथ आध्यात्मिक मार्ग पर चलना आरंभ करते हैं और इसे ही अपना उद्देश्य समझने लगते हैं। जब उनका मन शुद्ध हो जाता है तब स्वाभाविक रूप से उन्हें आत्मा की उपस्थिति का बोध होने लगता है। फिर अनुभव द्वारा उन्हें शास्त्रों की सत्यता की अनुभूति होती है।
जिस प्रकार से इन्द्रियाँ आत्मा का बोध नहीं कर सकती उसी प्रकार से भगवान भी उनकी परिधि में नहीं हैं। इसलिए आत्मा और भगवान को ज्ञान रूपी चक्षुओं से जाना जा सकता है। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान के अस्तित्व का बोध कराने की विधि स्पष्ट करेंगे।
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् |
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् || 12||
यह जान लो कि मैं सूर्य के तेज के समान हूँ जो पूरे ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है। सूर्य का तेज और अग्नि की दीप्ति मुझसे ही उत्पन्न होती है।
यह मानवीय स्वभाव है कि हमें जो महत्त्वपूर्ण प्रतीत होता है उसके प्रति हम आकर्षित होते हैं। शरीर, पति पत्नी, बच्चों और संपत्ति को महत्त्वपूर्ण मानते हुए हम उनके प्रति आकृष्ट होते हैं।
श्रीकृष्ण बताते हैं कि सृष्टि में जो कुछ भी सारभूत दिखाई देता है वह सब उनकी शक्ति है। वे कहते हैं कि सूर्य की दीप्ति उनके अधीन है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सूर्य प्रतिक्षण भारी मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन करता है। वह अरबों वर्षों से ऐसा कर रहा है फिर भी उसकी इस ऊर्जा न तो कम हुई है और न ही उसकी ऊर्जा उत्सर्जन प्रक्रिया में कोई दोष आया है। यह सोंचना कि सूर्य किसी महा विस्फोट के कारण में अस्तित्व में आया होगा, अनुभवहीनता है। सूर्य भगवान की एक विभूति है।
समान रूप से चन्द्रमा रात्रि में आकाश को प्रकाशित करता है। यद्यपि हम वैज्ञानिक दृष्टि से यह निष्कर्ष तो निकाल सकते हैं कि चन्द्रमा का प्रकाश केवल सूर्य के प्रकाश के प्रतिबिम्ब पर आश्रित है, लेकिन यह अद्भुत व्यवस्था भगवान की विभूति से ही संपन्न होती है और चन्द्रमा भगवान की विभूतियों में से एक है। इस संदर्भ में केनोपनिषद में एक कथा वर्णित है। इसमें देवताओं और दैत्यों के बीच दीर्घकाल तक हुए युद्ध का वर्णन किया गया है, जिसमें अंत में देवताओं ने विजय प्राप्त की थी। अपनी विजय से देवताओं में अभिमान आ गया और वे सोचने लगे कि उन्होंने अपनी शक्ति से असुरों पर विजय प्राप्त की है। उनके अभिमान को नष्ट करने के लिए भगवान आकाश में यक्ष के रूप में प्रकट हुए। वे अत्यंत दीप्तिमान था। स्वर्ग के राजा इन्द्र ने सबसे पहले उन्हें देखा और वह यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि मात्र एक यक्ष का तेज उससे अधिक है। उसने अग्नि देवता को उस यक्ष के बारे में पता लगाने के लिए भेजा। अग्नि ने यक्ष के पास आकर कहा-“मैं अग्निदेव हूँ और मुझमें समस्त ब्रह्माण्ड को क्षणभर में जलाकर भस्म कर देने की शक्ति है। कृपया आप बतायें कि आप कौन है?" यक्ष के रूप में भगवान ने उसके सामने घास का तिनका रखा और कहा-"कृपया इसे जलाएँ" उसे देखकर अग्निदेव हँसने लगा, "क्या यह एक छोटा-सा तिनका मेरी शक्ति का परीक्षण करेगा?" और फिर जैसे ही उस तिनके को जलाने के लिए उसने प्रयत्न किया तब भगवान ने उसके भीतर की शक्ति के स्रोत को समाप्त कर दिया। बेचारा अग्निदेव ही जब सर्दी से कांपने लगा तब उस तिनके को जलाने का प्रश्न ही कहाँ रहा? अपनी विफलता से लज्जित होकर वह इन्द्र के पास लौट आया।
तब इन्द्र ने वायु देवता को यक्ष की वास्तविकता ज्ञात करने के लिए भेजा। वायु देवता ने वहाँ जाकर घोषणा की-"मैं वायु का देवता हूँ और क्षण भर में संपूर्ण संसार को उलट-पलट सकता हूँ। अब कृपया अवगत कराएँ कि आप कौन हों?" "यक्ष बने भगवान ने उसके सामने घास का तिनका रखा और आग्रह किया-"कृपया इसे हिला कर दिखाएँ।" वायुदेव तीव्र गति से आगे बढ़े किंतु उसी दौरान भगवान ने उसकी शक्ति के स्रोत को बंद कर दिया। बेचारे वायुदेव को उस समय एक कदम भी आगे बढ़ना कठिन लगने लगा तब तिनके जैसी किसी वस्तु को हिलाना कैसे संभव होता? अंत में जब इन्द्र वहाँ आया तब भगवान अर्तध्यान हो गये और उनके स्थान पर वहाँ भगवान की योगमाया शक्ति उमा प्रकट हुईं। जब इन्द्र ने उमा से उस यक्ष के संबंध में पूछा तब उसने उत्तर दिया कि वे आपके परम पिता भगवान थे, जिनसे आप सब स्वर्ग के देवता अपनी शक्तियाँ प्राप्त करते हैं। वो तुम्हारा घमंड नष्ट करने आये थे।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा |
पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक: || 13||
पृथ्वी पर व्याप्त होकर मैं सभी जीवों को अपनी शक्ति द्वारा पोषित करता हूँ। चन्द्रमा के रूप में मैं सभी पेड़-पौधों और वनस्पतियों को जीवन रस प्रदान करता हूँ।
Ok
'गाम्' शब्द का अर्थ पृथ्वी और 'ओजसा' शब्द का अर्थ शक्ति है। भगवान की शक्ति से यह पृथ्वी विभिन्न प्रकार के चर-अचर जीवन रूपों के निवास के लिए और उन्हें जीवित रखने में समर्थ होती है। उदाहरणार्थ बचपन से हम सोंचा करते थे कि समुद्र का जल खारा क्यों होता है? यदि समुद्र का जल खारा नहीं होता तब इससे प्रचुर मात्रा में रोग फैलते और जलीय जीव इसमें जीवित नहीं रह पाते। अतः इसके साथ संबद्ध सिद्धांत जो भी हो लेकिन समुद्र का पानी भगवान की इच्छा के कारण खारा है। नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक जॉर्ज बाल्ड ने अपनी पुस्तक 'ए यूनिवर्स दैट ब्रीडस लाईफ' में लिखा है, "यदि हमारे ब्रह्माण्ड के भौतिक गुणों में से कोई एक गुण भी जैसा वो है उससे कुछ भिन्न होता तब वर्तमान में दृश्यमान जीवन यहाँ सम्भव नहीं होता।"
श्रीकृष्ण के कथन से स्पष्ट है कि यह भगवान की ही शक्ति है जो पृथ्वी लोक में जीवों के लिए उपयुक्त पदार्थों की व्यवस्था करती है। इसके अतिरिक्त चन्द्रमा की चांदनी जिसमें अमृत की गुणवत्ता है, सभी पेड़-पौधों जैसे जड़ी-बूटियाँ, सब्जियाँ, फल और अनाज को पोषित करती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ही चांदनी को पोषण करने की विशेषता प्रदान करते हैं।
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित: |
प्राणापानसमायुक्त: पचाम्यन्नं चतुर्विधम् || 14||
: मैं सभी जीवों के उदर में जठराग्नि के रूप में रहता हूँ, श्वास और प्रश्वास के संयोजन से चार प्रकार के भोजन को मिलाता और पचाता हूँ।
वैज्ञानिक पाचन का श्रेय पित्ताशय, अग्न्याशय, यकृत इत्यादि को देते हैं। इस श्लोक के अनुसार यह भी एक हीन सोच है। इन सभी रसों के पीछे भगवान की ही शक्ति है जो पाचन क्रिया को सुचारु बनाने का काम करती है। 'वैश्वानर' शब्द का अर्थ 'जठराग्नि' है जो भगवान की शक्ति से प्रज्जवलित होती है। बृहदारण्यकोपनिषद् में भी वर्णन किया गया है-
अयमग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते
(बृहदारण्यकोपनिषद्-5.9.1)
"भगवान आमाशय के भीतर की अग्नि है जो जीवों के भोजन को पचाती है।"
इस श्लोक में निम्नांकित चार प्रकार के भोजन का उल्लेख किया गया है-(1) भोज्यः इन में दाँतों से चबाये जाने वाले भोजन जैसे चपाती, फल इत्यादि हैं, (2) पेयः यह निगले जाते हैं। जैसे–दूध, जल, जूस इत्यादि, (3) चोष्य: ये खाद्य पदार्थ चूसे जाते हैं। जैसे-गन्ना, नींबू, इत्यादि, (4) लेह्यः यह खाद्य पदार्थ चाट कर खाये जाते हैं, जैसे शहद, चूर्ण इत्यादि।
12वें से 14वें श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह वर्णन किया है कि भगवान जीवन के सभी पहलुओं को संभव बनाते हैं। वे पृथ्वी को जीवों के रहने योग्य बनाते हैं। वे वनस्पतियों के पोषण हेतु चन्द्रमा को शक्ति प्रदान करते हैं और वे चार प्रकार के भोजनों को पचाने हेतु जठराग्नि बन जाते हैं। अब वे अगले श्लोक में यह निरूपण करते हुए कि केवल वे ही सभी प्रकार के ज्ञान का लक्ष्य हैं, इस विषय का समापन करते हैं।
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च |
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् || 15||
मैं समस्त जीवों के हृदय में निवास करता हूँ और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति होती है। केवल मैं ही सभी वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ, मैं वेदांत का रचयिता और वेदों का अर्थ जानने वाला हूँ।
भगवान ने हमारे भीतर ज्ञान और स्मृति का अद्भुत तंत्र रचा है। हमारा मस्तिष्क (हार्डवेयर) और मन (सॉफ्टवेयर) के समान है। हम प्रायः इस तंत्र को उपेक्षित दृष्टि से देखते हैं। सर्जन मस्तिष्क का प्रत्यारोपण कर अपनी उपलब्धि पर गर्व करते हैं किंतु वे यह चिंतन नहीं करते कि मस्तिष्क रूपी इस अद्भुत तंत्र की संरचना कैसे हुई? आधुनिक युग में अभी भी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ प्रौद्योगिकी में सभी प्रकार की प्रगति के बावजूद भी कम्प्यूटर की मानव मस्तिष्क के साथ तुलना नहीं की जा सकती। उदाहरणार्थ सॉफ्टवेयर इंजीनियर अभी तक चेहरा पहचानने की तकनीक की खोज में जुटे हुए हैं किन्तु मानव मस्तिष्क लोगों को उनके चेहरों पर आए परिवर्तन के बावजूद भी सरलता से उनकी पहचान कर लेता है। हम प्रायः लोगों को यह कहते हुए पाते हैं, “ओ प्रिय मित्र, इतने सालों बाद के पश्चात तुमसे मिलकर प्रसन्नता हुई जब हम पिछली बार मिले थे उस समय और अब में तुममें बहुत परिवर्तन दिखाई दे रहा है।" यह दर्शाता है कि मानव मस्तिष्क परिवर्तित चेहरों की कई वर्षों बाद भी पहचान कर लेता है जबकि कम्प्यूटर अपरिवर्तित चेहरों की भी ठीक प्रकार से पहचान नहीं कर सकता। वर्तमान में इंजिनियर अभी भी स्कैनर सॉफ्टवेयर पर काम कर रहे हैं जो टाईप की गई सामग्री को बिना त्रुटि के समझ सकें। इसके विपरीत मनुष्य दूसरों की सांकेतिक हस्तलिपि भी सरलता से समझ सकता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्मृति और ज्ञान के अद्भुत गुण उन्हीं से प्राप्त होते हैं।
इसके अतिरिक्त वे मनुष्य को विस्मृति की शक्ति भी प्रदान करते हैं। जिस प्रकार आवांछित लेख नष्ट कर दिए जाते हैं, उसी प्रकार लोग व्यर्थ की स्मृति को भुला देते हैं क्योंकि ऐसा न करने से मस्तिष्क सूचनाओं के समुद्र अवरुद्ध से अवरूद्ध हो जाएगा। उद्धव श्रीकृष्ण से कहते हैं-
त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तेऽत्र शक्तितः
(श्रीमदभागवतम्-11.22.28)
"केवल आपसे जीवों में ज्ञान का उदय होता है और आपकी ही शक्ति से ज्ञान विलुप्त हो जाता है।" इस आंतरिक ज्ञान के अतिरिक्त उस ज्ञान का बाह्य स्रोत शास्त्र हैं और श्रीकृष्ण ने इन ग्रंथों में भी उसी प्रकार से अपनी महिमा प्रकट की है। उन्होंने ही सृष्टि के आरम्भ में वेदों को प्रकट किया। चूंकि भगवान दिव्य हैं और बुद्धि की परिधि से परे हैं इसलिए वेद भी दिव्य हैं। इसलिए केवल वे ही इनका वास्तविक अर्थ जानते हैं और यदि वे किसी पर कृपा करते हैं तब वह भाग्यशाली आत्मा भी वेदों को जान लेती है। वेदव्यास जो भगवान के अवतार थे, ने वेदान्त दर्शन लिखा। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे वेदान्त के रचयिता हैं। अंततः वह कहते हैं कि यद्यपि वेदों में बहुसंख्यक भौतिक और आध्यात्मिक उपदेश सम्मिलित हैं और वैदिक ज्ञान का उद्देश्य भगवान को जानना है। धार्मिक अनुष्ठानों का उल्लेख भी उनमें इसी प्रयोजनार्थ किया गया है। वे भौतिक संसार में आसक्त लोगों को लुभाते हैं और उन्हें भगवान की ओर ले जाने से पूर्व मध्यवर्ती उपायों की व्यवस्था करते हैं। कठोपनिषद् (1.2.15) में वर्णित है-" सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति" अर्थात् "सभी वैदिक मंत्र भगवान की ओर संकेत करते हैं।" हम सभी वैदिक मंत्रों का स्मरण करना, तथा उनका उपर्युक्त छंदों में उच्चारण सीख सकते हैं। सभी धार्मिक अनुष्ठानों को सम्पन्न करने में हम दक्ष और ध्यान में लीन होना सीख सकते हैं। यहाँ तक कि हम अपनी कुण्डलिनी शक्ति को भी जागृत कर सकते हैं। यदि फिर भी हम भगवान को नहीं जान पाते, इसका अर्थ है कि हम वेदों के वास्तविक अभिप्राय को नहीं समझे हैं। दूसरी ओर वे जो भगवान के प्रति प्रेम विकसित करते हैं, स्वतः सभी वेदों के अभिप्राय को समझ जाते हैं। इस संबंध में जगद्गुरु श्री कृपालुजी जी महाराज ने वर्णन किया है-
सर्व शास्त्र सार यह गोविंद राधे।
आठों याम मन हरि गुरु में लगा दे।।
(राधा गोविन्द गीत)
"सभी शास्त्रों का सार मन को दिन-रात भगवान की भक्ति में तल्लीन करना है।"
इस अध्याय के पहले श्लोक से 15वें श्लोक तक श्रीकृष्ण ने सृष्टि रूप वृक्ष की व्याख्या की है। अब इस विषय का समापन करते हुए वे अगले दो श्लोकों में इस ज्ञान को सही परिप्रेक्ष्य में रखकर क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम शब्दों की व्याख्या करेंगे।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च |
क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते || 16||
सृष्टि में दो प्रकार के जीव हैं-क्षर और अक्षर। भौतिक जगत के सभी जीव नश्वर हैं और मुक्त जीव अविनाशी हैं।
संसार में माया जीवात्मा को भौतिक देह के बंधन में डालती है। आत्मा स्वयं अविनाशी है और बारंबार शरीर की जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया का अनुभव करती रहती है। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि भौतिक संसार में देहधारी जीव भी क्षर हैं। इसमें अणु-जीवाणु से लेकर स्वर्ग के देवता भी सम्मिलित हैं।
इसके अतिरिक्त भगवान के लोक में वास कर रही आत्माएँ भी हैं। ये आत्माएँ अविनाशी शरीर से युक्त हैं जो जन्म और मृत्यु का अनुभव नहीं करती और उन्हें अक्षर (अविनाशी) की श्रेणी में रखा गया है।
उत्तम: पुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृत: |
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वर: || 17||
इनके अतिरिक्त एक परम सर्वोच्च रास्ता है जो अक्षय परमात्मा है। वह तीनों लोकों में नियंता के रूप में प्रविष्ट होता है और सभी जीवों का पालन पोषण करता है।
संसार और आत्मा का निरूपण करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण भगवान के संबंध में चर्चा करते हैं जो संसार तथा नश्वर और अविनाशी जीवों से परे हैं। शास्त्रों में उन्हें परमात्मा के नाम से पुकारा जाता है। 'परम' विशेषण स्पष्ट करता है कि परमात्मा आत्मा या जीवात्मा से भिन्न है। यह श्लोक उन अद्वैतवादी दार्शनिकों का खण्डन करता है, जो जीवात्मा को ही परम आत्मा मानते हैं। जीवात्मा अणु है और यह केवल अपनी देह में ही व्याप्त रहती है जबकि परमात्मा विभु हैं और सब प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं। वे उनके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं और उचित अवसर पर उसका फल प्रदान करते हैं। वे जीवात्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक रहते हैं चाहे वह कोई भी शरीर धारण करे। अगर जीवात्मा कुत्ते की योनि में जन्म लेती है तब भी परमात्मा उसके साथ रहते हैं और पूर्व कर्मों के अनुसार उसे फल देते हैं।
संसार में कुत्तों के भाग्य में भी विषमता देखने को मिलती है। कुछ आवारा कुत्ते भारत की गलियों में नारकीय जीवन व्यतीत करते हैं जबकि अन्य पालतू कुत्ते संयुक्त राज्य अमेरिका में विलासिता पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। यह विषमता पूर्व संचित कर्मों के परिणामस्वरूप पायी जाती है। परमात्मा ही हमें हमारे कर्मों का प्रतिफल प्रदान करते हैं और प्रत्येक जन्म में आत्मा जिस भी योनि में जाती है वे उसके साथ रहते हैं। परमात्मा जो सभी जीवों के हृदय में निवास करते हैं वे अपने चतुर्भुजधारी क्षीरोदकशायी विष्णु के साकार रूप में भी प्रकट रहते हैं। हिन्दी में एक सुप्रसिद्ध कहावत है-"मारने वाले के दो हाथ, बचाने वाले के चार हाथ।" अर्थात् किसी को मारने वाले के दो हाथ होते हैं लेकिन उसकी रक्षा करने वाले के चार हाथ होते हैं। यह चतुर्भुज धारी स्वरूप परमात्मा के संदर्भ में कहा जाता है।
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तम: |
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित: पुरुषोत्तम: || 18||
मैं नश्वर सांसारिक पदार्थों और यहाँ तक कि अविनाशी आत्मा से भी परे हूँ इसलिए मैं वेदों और स्मृतियों दोनों में ही दिव्य परम पुरूष के रूप में विख्यात हूँ।
पिछले कुछ श्लोकों में श्रीकृष्ण ने विस्तारपूर्वक यह प्रकट किया था कि प्रकृति के सभी भव्य पदार्थ उनकी ही महिमा की अभिव्यक्तियाँ हैं। वे केवल दृश्य जगत का सृजन मात्र नहीं करते। वे मायाशक्ति और दिव्य आत्माओं से परे है। यहाँ उन्होंने अपने स्वरूप को पुरुषोत्तम के रूप में अभिव्यक्त किया है। अब कोई यह संदेह कर सकता है कि श्रीकृष्ण और परम सत्ता क्या एक ही हैं? ऐसे किसी भ्रम की संभावना को हटाने के लिए श्रीकृष्ण इस श्लोक में स्वयं को उत्तम पुरुष एकवचन में प्रस्तुत करते हैं। आगे वे कहते हैं कि वेदों में भी इस प्रकार की उदघोषणा की गयी है-
कृष्ण एव परो देवस्तं ध्यायेत् तं रसयेत् तं यजेत तं भजेद्
(गोपालतापिन्युपनिषद्)
"भगवान श्रीकृष्ण परम प्रभु हैं, उनका ध्यान करो उनकी भक्ति में परम आनन्द पाओ और उनकी आराधना करो" आगे पुनः वर्णन किया गया है:
योऽसै परं ब्रह्म गोपालः
(गोपालतापिन्युपनिषद्)
"गोपाल परम पुरुष हैं।" अब कोई भगवान विष्णु, भगवान राम, भगवान शिव आदि की स्थिति के संबंध में पूछ सकता है? ये सब एक ही परम पुरुष के विभिन्न रूप हैं। ये सब भगवान की अभिव्यक्तियाँ हैं।
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् |
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत || 19||
वे जो संशय रहित होकर मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानते हैं, वास्तव में वे पूर्ण ज्ञान से युक्त हैं। हे अर्जुन! वे पूर्ण रूप से मेरी भक्ति में तल्लीन रहते हैं।
श्रीमद्भागवतम् में भगवान के तीन स्वारोपों का वर्णन किया गया है।
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ।।
(श्रीमद्भागवतम्-1.2.11)
"तत्त्ववेत्ता कहते हैं कि केवल एक ही परम सत्ता है जो विश्व में ब्रह्म, परमात्मा और भगवान तीन रूपों में प्रकट है। ये तीन अलग-अलग सत्ता नहीं हैं बल्कि एक ही परम सत्ता की तीन अभिव्यक्तियाँ हैं। उदाहरणार्थ जल, बर्फ और भाप तीन अलग-अलग तत्त्व दिखाई देते हैं किन्तु ये तीनों एक ही तत्त्व के तीन रूप हैं। समान रूप से ब्रह्म भगवान का सर्वत्र व्यापक निराकार रूप है। वे जो ज्ञानयोग के मार्ग का अनुसरण करते हैं वे भगवान के ब्रह्म रूप की उपासना करते हैं। परमात्मा परम सत्ता का वह रूप है जिसमें वे सभी जीवों के हृदयों में निवास करते हैं। अष्टांग योग द्वारा भगवान की अनुभूति परमात्मा के रूप में की जाती है। भगवान परमेश्वर का वह स्वरूप है जिसमें वे साकार रूप में प्रकट होकर अपनी मधुर लीलाएँ प्रदर्शित करते हैं। भक्ति के मार्ग में परम प्रभु की अनुभूति भगवान के रूप में की जाती है। इसकी व्याख्या पहले भी श्लोक संख्या 12.2 में की गई है। इस अध्याय के 12वें श्लोक से श्रीकृष्ण ने भगवान के इन तीनों स्वरूपों का वर्णन किया है। 12वें श्लोक से 14वें में सर्वत्र व्यापक ब्रह्म की प्रकृति और श्लोक 15 में परमात्मा का स्वरूप और 17वें तथा 18वें श्लोक में भगवान के स्वरूप का उल्लेख किया गया है। अब इनमें से कौन-सी अनुभूति सर्वश्रेष्ठ और पूर्ण है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे जो भक्ति के माध्यम से उन्हें पुरुषोत्तम भगवान के रूप में जानते हैं वास्तव में उन्हें ही उनका पूर्ण ज्ञान होता है। भगवान की अनुभूति सर्वश्रेष्ठ है। इसका विस्तृत विवरण जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज ने भक्ति शतक में किया है।
तीन रूप श्रीकृष्ण को, वेदव्यास बताय।
ब्रह्म और परमात्मा, अरू भगवान कहाय।।
(भक्ति शतक-21)
"वेदव्यास के अनुसार परम सत्ता की अभिव्यक्ति ब्रह्म, परमात्मा और भगवान के रूप में होती है।" वे आगे इन तीन अभिव्यक्तियों का वर्णन करते हैं।
सर्वशक्ति संपन्न हो, शक्ति विकास न होय।
सत चित आनंद रूप जो, ब्रह्म कहावे सोय।।
(भक्ति शतक-22)
"ब्रह्म के रूप में भगवान की असीम शक्तियाँ प्रकट नहीं होती हैं। वह केवल शाश्वत ज्ञान और आनन्द प्रकट करता है।"
सर्वशक्ति संयुक्त हो, नाम रूप गुण होय।
लीला परिकर रहित हो, परमात्मा है सोय।।
(भक्ति शतक-23)
"परमात्मा के रूप में भगवान अपना रूप, नाम और गुण प्रकट करते हैं किन्तु वे लीलाएँ नहीं करते और उनके परिकर नहीं होते।"
सर्वशक्ति प्राकट्य हो, लीला विविध प्रकार।
विहरत परिकर संग जो, तेहि भगवान पुकार ।।
(भक्ति शतक-24)
परम पिता के उस स्वरूप को जिसमें वे अपनी सभी शक्तियाँ प्रकट करते हैं और अपने भक्तों के साथ अनेक प्रकार की लीलाएँ करते हैं, को भगवान कहते हैं। कृपालु जी महाराज के उपर्युक्त श्लोकों में स्पष्ट किया गया है कि ब्रह्म और परमात्मा की अभिव्यक्ति में भगवान अपनी सभी शक्तियाँ प्रकट नहीं करते। परम सत्ता की पूर्ण अनुभूति के स्वरूप में ही संभव भगवान हैं जिसमें वे अपने सभी नामों, रूपों, गुणों, लीलाओं धामों और संतों को प्रकट करते हैं। 12वें अध्याय के दूसरे श्लोक में एक ट्रेन के उदाहरण द्वारा इसकी व्याख्या की गयी है। इस प्रकार जो उन्हें भगवान के रूप में जानते हैं, उन्हें वास्तव में परम पुरुषोतम भगवान का पूर्ण ज्ञान हो जाता है।
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ |
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत || 20||
हे निष्पाप अर्जुन! मैंने तुम्हें वैदिक ग्रंथों का अति गुह्य सिद्धान्त समझाया है। इसे समझकर मनुष्य प्रबुद्ध हो जाता है और अपने प्रयासो में परिपूर्ण हो जाता है।
इस अध्याय का अंतिम श्लोक 'इति' शब्द से प्रारंभ होता है जिसका अर्थ 'ये' है। श्रीकृष्ण उल्लेख करते हैं कि "मैंने तुम्हें इन बीस श्लोकों में सभी वेदों का सार समझाया है। संसार की प्रकृति की विवेचना से आरंभ करते हुए मैंने तुम्हें पदार्थ और आत्मा के बीच के अंतर का बोध कराया और अंततः परम पुरुष का भी ज्ञान कराया। अब मैं तुम्हें आश्वस्त करता हूँ कि जो भी इस ज्ञान को अंगीकार करता है वह प्रबुद्ध हो जाता है। ऐसी आत्मा समस्त कर्तव्यों के अंतिम लक्ष्य भगवान को प्राप्त कर लेती है।"
।। श्रीमद्भगवत गीता पंचदश अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
Bhagavad Gita Chapter 14
kathaShrijirasik
अध्याय चौदह: गुण त्रय विभाग योग
त्रिगुणों के ज्ञान का योग
पिछले अध्याय में आत्मा और शरीर के बीच के अन्तर को विस्तार से समझाया गया था। इस अध्याय में माया शक्ति का वर्णन किया गया है जो शरीर और उसके तत्त्वों का स्रोत है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि माया सत्त्व, रजस, और तमस तीन गुणों से निर्मित है। शरीर, मन और बुद्धि जो प्राकृत शक्ति से बने हैं उनमें भी तीनों गुण विद्यमान होते हैं और हम में इन गुणों का अनुपात हमारे व्यक्तित्व का निर्धारण करता है। सत्त्व गुण शांत स्वभाव, सद्गुण और शुद्धता को इंगित करता है तथा रजो गुण कामनाओं और को बढ़ाता है एवं तमो गुण भ्रम, आलस्य, और निद्रा का कारण है। जब तक आत्मा मुक्त नहीं होती तब तक उसे माया शक्ति की प्रबल शक्तियों से निपटना पड़ता है। मुक्ति इन तीन गुणों से परे है।
आगे श्रीकृष्ण इन बंधनों को काटने का एक सरल उपाय बताते हैं। परम शक्तिशाली भगवान इन तीनों गुणों से परे अर्थात् गुणातीत हैं। यदि हम मन को उनमें अनुरक्त करते हैं तब हमारा मन भी दिव्यता की ओर बढ़ता है। इस बिन्दु पर अर्जुन तीन गुणों से परे होने की अवस्था प्राप्त व्यक्तियों के गुण-विशेषताओं के संबंध में पूछता है तब श्रीकृष्ण सहानुभूतिपूर्वक ऐसी प्रबुद्ध आत्माओं के लक्षणों का निरूपण करते हैं। वे बताते हैं कि महापुरुष सदैव संतुलित रहते हैं और वे संसार में तीन गुणों के कार्यान्वयन को देखकर व्यक्तियों, पदार्थों तथा परिस्थितियों में प्रकट होने वाले उनके प्रभाव से विचलित नहीं होते। वे सभी पदार्थों को भगवान की शक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं जो अंततः उनके नियंत्रण में होती है। इसलिए सांसारिक परिस्थितियाँ न तो उन्हें हर्षित और न ही उन्हें दुखी कर सकती हैं। इस प्रकार बिना विचलित हुए वे अपनी आत्मा में स्थित रहते हैं। श्रीकृष्ण भक्ति की महिमा और हमें तीन गुणों से परे ले जाने की इसकी क्षमता का स्मरण कराते हुए इस अध्याय का समापन करते हैं।
श्रीभगवानुवाच |
परं भूय: प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् |
यज्ज्ञात्वा मुनय: सर्वे परां सिद्धिमितो गता: || 1||
परमेश्वर ने कहाः अब मैं पुनः तुम्हें श्रेष्ठ ज्ञान के विषय में बताऊँगा जो सभी ज्ञानों में सर्वश्रेष्ठ है और सभी ज्ञानों का परम ज्ञान है, जिसे जानकर सभी महान संतों ने परम सिद्धि प्राप्त की है।
पिछले अध्याय में श्रीकृष्ण ने यह कहा था कि सभी प्राणी आत्मा और शरीर का संयोजन हैं। उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि प्रकृति ही पुरुष (आत्मा) के लिए कर्म क्षेत्र उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी है। वे आगे कहते हैं कि यह सब कुछ उस भगवान के निर्देशन में होता है जो सभी जीवों के शरीर में वास करते हैं। इस अध्याय में वे माया के तीन गुणों के संबंध में विस्तार से प्रकाश डालेंगे। इस ज्ञान को पाकर और इसे अपनी चेतना में आत्मसात् कर हम परम सिद्धि की प्राप्ति की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागता: |
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च || 2||
वे जो इस ज्ञान की शरण लेते हैं, वे मुझे प्राप्त होंगे और वे सृष्टि के समय न तो पुनः जन्म लेंगे और न ही प्रलय के समय उनका विनाश होगा।
श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि वे जो ज्ञान प्रदान करेंगे और जो उस ज्ञान को अपने भीतर समाहित कर लेंगे उन्हें पुनः मां के गर्भ रूपी कारावास का दुःख सहन नहीं करना पड़ेगा। वे आत्यन्तिक प्रलय के समय भगवान के उदर में प्रसुप्त अवस्था में भी नहीं रहें न ही अगले सृष्टि चक्र में वे पुनः जन्म लेंगे। वास्तव में माया शक्ति के तीनों गुण बंधन का कारण हैं और इनका ज्ञान बंधनों से मुक्ति पाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
श्रीकृष्ण जो भी शिक्षा प्रदान करते हैं वे बार-बार उसके परिणामों की उद्घोषणा करते हैं ताकि उनके विद्यार्थी उसमें तन्मय हो जाएँ। 'न व्यथन्ति' शब्द का अर्थ 'वे दुःख का अनुभव नहीं करेंगे' है। 'साधर्म्यमागताः' शब्द का तात्पर्य यह है कि वे स्वयं भगवान जैसी 'दिव्य प्रकृति प्राप्त कर लेते है।' जब आत्मा माया शक्ति के बंधन से मुक्त हो जाती है तब वह भगवान की दिव्य शक्ति 'योगमाया' के प्रभुत्व में आ जाती है। यह दिव्य शक्ति उसे भगवान के दिव्य ज्ञान, प्रेम और आनन्द से युक्त कर देती है जिसके फलस्वरूप जीवात्मा भगवान के समान बन जाती है और भगवान जैसे गुण प्राप्त कर लेती है।
मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् |
सम्भव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत || 3||
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या: |
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता || 4||
हे भरत पुत्र! प्रकृति, गर्भ स्वरूपा है। मैं इसी प्रकृति में जीवात्मा को गर्भस्थ करता हूँ जिससे समस्त जीवों का जन्म होता है। हे कुन्ती पुत्र! सभी योनियाँ जो जन्म लेती है, माया उनकी गर्भ है और मैं उनका बीज प्रदाता जनक हूँ।
जैसा कि 7वें और 8वें अध्याय में वर्णन किया गया है कि भौतिक सृष्टि में सर्जन, स्थिति और प्रलय का चक्र चलता रहता है। प्रलय के दौरान जो जीवात्माएँ भगवान से विमुख होती हैं वे महाविष्णु के उदर में प्रसुप्त अवस्था में समा जाती हैं। प्रकृति भी अव्यक्त अवस्था में भगवान के महोदर में चली जाती है। जब भगवान सृष्टि करने की इच्छा करते हैं तब वे प्रकृति पर दृष्टि डालते हैं। परिणामस्वरूप यह व्यक्त होने लगती है और फिर क्रमिक रूप से महान, अहंकार, पंचतन्मात्राओं और पंच महाभूतों की उत्पत्ति होती है। दूसरे सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की सहायता से प्राकृतिक शक्ति विविध जीवों को उत्पन्न करती है और भगवान आत्माओं को उन उपयुक्त शरीरों में रखता है जो उनके पूर्व कर्मों द्वारा निर्धारित होता है। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि प्रकृति गर्भ के समान है और आत्माएँ शुक्राणुओं के समान हैं। वे आत्माओं को प्रकृति के गर्भ में भेजते हैं। ऋषि वेदव्यास श्रीमद्भागवतम् में इसी प्रकार का वर्णन करते हैं-
दैवात्क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ पर:पुमान्।
आधत्त वीर्यं सासूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम्।।
(श्रीमद्भागवतम्-3.26.19)
"भगवान आत्माओं को प्रकृति के गर्भ में स्थापित करता है। तब जीवात्मा के कर्मों से उत्प्रेरित होकर माया शक्ति उनके लिए उपयुक्त शरीर तैयार करती है। वह सभी आत्माओं को संसार में नहीं भेजती बल्कि केवल भगवान से विमुख आत्माओं को भौतिक जगत में भेजती है।"
सत्त्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा: |
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् || 5||
हे महाबाहु अर्जुन! माया शक्ति सत्त्व, रजस और तमस तीन गुणों से निर्मित है। ये गुण अविनाशी आत्मा को नश्वर शरीर के बंधन में डालते हैं।
यह समझाने के पश्चात् कि सभी जीव पुरुष और प्रकृति द्वारा जन्म लेते हैं। अब श्रीकृष्ण अगले 14 श्लोकों में यह समझाएंगे कि प्रकृति किस प्रकार से आत्मा को बंधन में डालती है। यद्यपि यह दिव्य है तथापि शरीर के साथ इसकी पहचान इसे माया शक्ति के बंधन में डाल देती है। प्राकृत शक्ति सत्त्व, रजस और तमस तीनों गुणों से युक्त होती है। इसलिए शरीर, मन और बुद्धि जो प्रकृति द्वारा निर्मित होते हैं उनमें भी तीन गुण समाविष्ट होते हैं।
इस संबंध में त्रिरंग (RGB) प्रिटिंग के उदाहरण पर विचार किया जा सकता है। अगर मशीन द्वारा कागज पर कोई रंग अधिक डाल दिया जाता है तब चित्र में वह रंग अधिक गाढ़ा दिखता है। उसी प्रकार से प्रकृति भी तीन रंगों वाली है। व्यक्ति के आंतरिक विचारों, बाह्य परिस्थितियों, पूर्व संस्कारों और अन्य तत्त्वों के आधार पर कोई एक गुण उस व्यक्ति पर हावी हो जात है। तब वह गुण उस व्यक्ति के व्यक्तित्व पर अपनी छाया छोड़ता है। श्रीकृष्ण अब जीवों पर तीनों गुणों के प्रभाव का वर्णन करेंगे।
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् |
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ || 6||
इनमें से सत्त्वगुण शुद्ध होने के कारण प्रकाश प्रदान करने वाला और पुण्य कर्मों से युक्त है। हे निष्पाप अर्जुन! यह आत्मा में सुख और ज्ञान के भावों के प्रति आसक्ति उत्पन्न कर उसे बंधन में डालता है।
'प्रकाशकम' शब्द का अर्थ 'प्रकाशित करना' है। 'अनामयम्' शब्द का अर्थ 'स्वास्थ्य और अच्छाइयों से युक्त होना है।' विस्तृत रूप से इसका अर्थ है-'शांत स्वभाव' अर्थात् पीड़ा के कारणों, असहजता या दुःखों से रहित होना है। सत्त्वगुण शांत और प्रकाशवान है। सत्त्वगुण किसी के व्यक्तित्व में सद्गुण उत्पन्न करते हैं और बुद्धि को ज्ञान से आलोकित करते हैं। यह मनुष्य को स्थिर, संतुष्ट, दानी, दयालु, सहायक, और शांत बनाते हैं। यह उत्तम स्वास्थ्य बनाए रखते हैं और हमें रोग मुक्त करते हैं। सत्त्वगुण शांति और प्रसन्नता के कारण उत्पन्न होते हैं और इनमें आसक्ति होने से ये आत्मा को माया के बंधन में डालते हैं।
आइए इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझे। एक यात्री जंगल से जा रहा था तब तीन डाकुओं ने उस पर हमला किया। पहले डाकू ने कहा कि इसकी हत्या करके इसका सारा धन छीन लेते हैं। दूसरे ने कहा कि इसकी हत्या न करके इसे केवल बांधकर इसकी सारी सम्पत्ति लूट लेते हैं। दूसरे डाकू के परामर्श के अनुसार उन्होंने उसे रस्सियों से बांधकर उसकी सारी सम्पत्ति लूट ली। जब सभी डाकू कुछ दूर आगे निकल गये तब तीसरा डाकू लौटकर उसी स्थान पर आया जहाँ उन्होंने यात्री को बांधा था। उसने यात्री की रस्सियाँ खोल दी और उसे जंगल के किनारे पर ले गया और कहा–'मैं स्वयं यहाँ से बाहर नहीं जा सकता लेकिन यदि तुम इस मार्ग पर आगे चलोगे तब तुम इस जंगल से बाहर निकल जाओगे।'
पहला डाकू तमोगुणी था जो अज्ञानता का स्वरूप है जो वास्तव में स्वयं का पतन कर उस व्यक्ति की हत्या करना चाहता था। दूसरा डाकू रजोगुणी है जो कि वासना का स्वरूप है। जो जीवों में आसक्ति बढ़ाती है और आत्मा को सांसारिक कामनाओं से बांधती है। तथा तीसरा डाकू सत्त्वगुणी था जो अच्छाई का गुण है और जो मनुष्य में बुराइयों को कम करता है तथा आत्मा को सदाचार के मार्ग पर ले जाता है। किंतु सत्त्वगुण माया के क्षेत्र के भीतर है। इसमें हमारी आसक्ति नहीं होनी चाहिए अपितु हमें इसका प्रयोग दिव्यता की ओर कदम बढ़ाने के लिए करना चाहिए। इन तीनों से परे शुद्ध सत्त्व है जो सत्त्वगुण की चरम अवस्था है। यह भगवान की योगमय शक्ति का गुण है जो माया से परे है। जब आत्मा भगवत्प्राप्ति कर लेती है तब भगवान अपनी कृपा से आत्मा को शुद्ध सत्त्व प्रदान करते हैं तथा इन्द्रिय, मन और बुद्धि को दिव्य बनाते हैं।
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् |
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् || 7||
हे अर्जुन! रजोगुण की प्रकृति रागात्मिका है। यह सांसारिक इच्छाओं और आसक्ति से उत्पन्न होता है और आत्मा को कर्म के प्रतिफलों से बांधता है।
श्रीकृष्ण अब रजोगुण को समझाते हुए वर्णन करते हैं कि यह किस प्रकार आत्मा को जगत् से बांधता है। पतंजलि योग दर्शन शारीरिक कार्यकलापों में रजो गुण की मुख्य अभिव्यक्ति स्वीकार में करता है। यहाँ श्रीकृष्ण आसक्ति और कामना के रूप में इस का वर्णन करते हैं। रजोगुण इन्द्रिय सुखों के लिए वासना को दीप्त करता है। यह शारीरिक और मानसिक सुखों के लिए कामनाओं को बढ़ाता है। यह सांसारिक पदार्थों में आसक्ति बढ़ाता है। रजोगुण से प्रभावित होकर मनुष्य पद, प्रतिष्ठा, भविष्य, परिवार और गृहस्थ के कार्यों में व्यस्त हो जाता है। वह इन्हें सुख के स्रोत के रूप में देखता है और इनकी प्राप्ति के लिए अथक परिश्रम करने के लिए प्रेरित होता है। इस प्रकार से रजोगुण कामनाओं को बढ़ाता है। ये कामनाएँ आगे और अधिक भड़कती हैं। ये दोनों एक-दूसरे का पोषण करते हैं और आत्मा को सांसारिक जाल में फंसा देते हैं। इस जाल को काटने का मार्ग भक्तियोग अर्थात् अपने कर्म-फल भगवान को अर्पित करना है। यह संसार से विरक्ति उत्पन्न करता है और रजोगुण के प्रभाव को शांत करता है।
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् |
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत || 8||
हे अर्जुन! तमोगुण अज्ञानता के कारण उत्पन्न होता है और यह देहधारियों जीवात्माओं के लिए मोह का कारण है। यह सभी जीवों को प्रमाद, आलस्य और निद्रा द्वारा भ्रमित करता है।
तमोगुण सत्त्वगुण के विपरीत है। इससे प्रभावित व्यक्ति को निद्रा, आलस्य, नशा, हिंसा और जुआ खेलने जैसे कृत्यों से सुख मिलता है। वे उचित और अनुचित में अन्तर करने का विवेक खो देते हैं? वे अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए अनैतिक व्यवहार का आश्रय लेने में भी संकोच नहीं करते। अपने कर्त्तव्यों का पालन करना उनके लिए बोझ बन जाता है और वे उनकी उपेक्षा करते हैं। इसके अतिरिक्त आलस्य और निद्रा के प्रति उनका झुकाव और अधिक बढ़ जाता है। इस प्रकार से तमोगुण आत्मा को अज्ञानता के गहन अंधकार की ओर ले जाता है जिससे यह अपनी आध्यात्मिक पहचान, जीवन के लक्ष्य, तथा आत्म उत्थान के अवसर को भूल जाती है।
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रज: कर्मणि भारत |
ज्ञानमावृत्य तु तम: प्रमादे सञ्जयत्युत || 9||
सत्त्वगुण सांसारिक सुखों में बांधता है, रजोगुण आत्मा को सकाम कर्मों की ओर प्रवृत्त करता है और तमोगुण ज्ञान को आच्छादित कर आत्मा को भ्रम में रखता है।
सत्त्वगुण की प्रबलता से भौतिक जीवन के कष्ट कम हो जाते हैं और सांसारिक इच्छाएँ शांत हो जाती हैं। यह संतुष्टि की भावना को बढ़ाता है। यह शुभ तो है किन्तु इसका नकारात्मक पहलू भी हो सकता है। उदाहरणार्थ वे जो संसार में कष्ट पाते हैं औरअपने मन में उठने वाली कामनाओं से विक्षुब्ध रहते हैं, वे अपनी समस्याओं के समाधान के लिए प्रेरित होते हैं। और यह प्रेरणा उन्हें आध्यात्मिक मार्ग की ओर ले जाती है। किन्तु सत्त्वगुण से सम्पन्न लोग सरलता से आत्म संतुष्ट तो हो जाते हैं, लेकिन वे आगे उन्नति कर सिद्ध अवस्था को प्राप्त करने में रुचि नहीं लेते।
सत्त्वगुण बुद्धि को ज्ञान से भी प्रकाशित करता है। यदि यह आध्यात्मिक ज्ञान से युक्त नहीं होता तब ऐसे ज्ञान के फलस्वरूप अभिमान उत्पन्न होता है और यह अभिमान भगवान की भक्ति के मार्ग में बाधक बन जाता है। यह प्रायः वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों आदि में दिखाई देता है। उनमें सामान्य रूप से सत्त्वगुण की प्रधानता होती है क्योंकि वे अपना समय और ऊर्जा ज्ञान को पोषित करने में लगाते हैं। फिर भी वे जो ज्ञान अर्जित करते हैं वह प्रायः उन्हें घमण्डी बना देता है और वे यह अनुभव करने लगते हैं कि ज्ञानप्राप्ति से परे कोई सत्य नहीं है। इस प्रकार से इन्हें धार्मिक ग्रंथों और महापुरुषों के प्रति श्रद्धा विकसित करना कठिन प्रतीत होता है। रजोगुण की प्रधानता जीवात्मा को अथक परिश्रम करने के लिए प्रेरित करती है। संसार के प्रति उनकी आसक्ति, अधिक सुख प्राप्त करने की इच्छा, प्रतिष्ठा, सम्पत्ति और शारीरिक सुख उन्हें संसार में कठोर परिश्रम करने के लिए प्रेरित करते हैं।
रजोगुण पुरुष और स्त्री में परस्पर आकर्षण बढ़ाता है और काम वासना को उत्पन्न करता है। कामवासना की तुष्टि हेतु पुरुष और स्त्री वैवाहिक संबंध बनाते है और गृहस्थी के कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं। घर की देखभाल और रख-रखाव के लिए धन की आवश्यकता होती है इसलिए वे आर्थिक स्थिरता के लिए कड़ा परिश्रम करते हैं। इस प्रकार से वे अनेक कार्यों में संलग्न रहते हैं लेकिन प्रत्येक क्रिया उन्हें माया में बांधती हैं।
तमोगुण मनुष्य की बुद्धि को आच्छादित कर लेता है और सुख की कामना अब विकृत रूप से प्रकट होती है। उदाहरणार्थ, हम सभी जानते हैं कि धूम्रपान करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सिगरेट के पैकेट पर चेतावनी लिखी होती है। धूम्रपान करने वाले उसे पढ़ते हैं किन्तु फिर भी धूम्रपान करना नहीं छोड़ते। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनकी बुद्धि अपनी विवेक शक्ति खो देती है और धूम्रपान का आनन्द लेने के लिए वे स्वयं को हानि पहुँचाने में संकोच नहीं करते। किसी ने उपहास करते हुए कहा है-'सिगरेट के एक छोर पर आग से सुलगी हुई पाइप है तथा उसके दूसरे छोर पर मूर्खता है।' यही तमोगुण का प्रभाव है जो आत्मा को अज्ञानता के अंधकार में ले जाता है।
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत |
रज: सत्त्वं तमश्चैव तम: सत्त्वं रजस्तथा || 10||
कभी-कभी सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण को अभिभूत करता है और कभी-कभी रजोगुण सत्त्व गुण और तमोगुण पर हावी हो जाता है और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि तमोगुण सत्त्व गुण और रजोगुण पर हावी हो जाता है।
श्रीकृष्ण अब यह बताते हैं कि किसी व्यक्ति का स्वभाव किस प्रकार से तीनों गुणों में घूमता रहता है। माया में ये तीनों गुण विद्यमान हैं और हमारा मन इसी शक्ति से निर्मित है इसलिए हमारे मन में तीनों गुण भी उसी प्रकार से विद्यमान होते हैं। इनकी तुलना एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करने वाले तीन पहलवानों से की जा सकती है। इनमें से प्रत्येक एक-दूसरे को परास्त करते रहते हैं और इसलिए कभी-कभी एक शीर्ष पर और कभी दूसरा और कभी तीसरा शीर्ष पर होता है। इस प्रकार से तीनों गुण मनुष्य के स्वभाव पर प्रभाव डालते हैं।बाह्य परिवेश, चिन्तन और पिछले जन्मों के संस्कारों के प्रभाव के कारण एक गुण हावी होना प्रारम्भ कर देता है। इन गुणों में से किसी गुण का प्रभाव कितने समय तक रहता है इसके लिए कोई नियम नहीं है। कोई एक गुण मन और बुद्धि पर एक क्षण के लिए या एक घंटे की अवधि या दीर्घ काल तक हावी रह सकता है। यदि किसी पर सत्त्व गुण हावी होता है, तब वह मनुष्य शांतिप्रिय, संतोषी, उदार, दयालु, सहायक, सुस्थिर और सुखी हो जाता है। जब रजोगुण की प्रधानता होती है तब कोई मनुष्य कामुक, उत्तेजित और महत्त्वाकांक्षी हो जाता है। दूसरों की उन्नति से ईर्ष्या करता है और इन्द्रिय सुखों के लिए उत्साहित करता है। जब तमोगुण प्रधान हो जाता है तब मनुष्य पर निद्रा, आलस्य, घृणा, क्रोध, असंतोष, हिंसा और संदेह हावी हो जाते हैं।
उदाहरणार्थ मान लीजिए कि "आप अपने पुस्तकालय में बैठकर अध्ययन कर रहे हैं। वहाँ किसी प्रकार का कोई सांसारिक विघ्न नहीं है और आपका मन सात्त्विक हो जाता है। अपना अध्ययन समाप्त करने के पश्चात् जब आप अपने विश्राम कक्ष में जाकर टेलीविजन का स्विच ऑन करते हैं। तब टेलीविजन पर दिखाये जा रहे सभी दृश्य आपके मन को राजसी बना देते हैं और सांसारिक सुखों के लिए आपकी लालसा को बढ़ाते हैं। जब आप अपनी पसंद का चैनल देख रहे होते हैं तब परिवार का कोई सदस्य आकर चैनल बदल देता है। यह विघ्न आपके मन में तमोगुण की उत्पत्ति का कारण बनता है और आप क्रोध से भर जाते हैं।
इस प्रकार से मन तीनों गुणों के बीच झूलता रहता है और उनकी विशेषताओं को ग्रहण करता हो।
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते |
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत || 11||
लोभ: प्रवृत्तिरारम्भ: कर्मणामशम: स्पृहा |
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ || 12||
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च |
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन || 13||
जब शरीर के सभी द्वार ज्ञान से आलोकित हो जाते हैं तब इसे सत्वगुण की अभिव्यक्ति मानो। जब रजोगुण प्रबल होता है तब हे अर्जुन! लोभ, सांसारिक सुखों के लिए परिश्रम, बचैनी और उत्कंठा के लक्षण विकसित होते हैं। हे अर्जुन! जड़ता, असावधानी और भ्रम यह तमोगुण के प्रमुख लक्षण हैं।
श्रीकृष्ण पुनः कहते हैं कि किस प्रकार से तीन गुण किसी जीव की सोच को प्रभावित करते हैं। सत्त्वगुण सद्गुणों के विकास और ज्ञान के आलोक की ओर ले जाता है। रजोगुण लोभ और सांसारिक उपलब्धियों के लिए कार्यों में व्यस्तता तथा मन को बैचेनी की ओर ले जाता है।
तमोगुण के कारण बुद्धि में भ्रम, आलस्य, मादक पदार्थों और हिंसा के प्रति रुचि उत्पन्न होती है। वास्तव में ये गुण भगवान और अध्यात्म मार्ग के प्रति हमारी मनोवृति को भी प्रभावित करते हैं। जब हमारे मन में सत्त्व गुण की प्रबलता होती है, तब हम यह सोचना आरम्भ करते हैं-"मुझे अपने गुरु की अत्यंत अनुकंपा प्राप्त हुई है इसलिए मुझे तीव्रता से अपनी साधना में प्रगति करनी चाहिए क्योंकि मानव जीवन अनमोल है और इसे लौकिक कार्यों में व्यर्थ नहीं करना चाहिए।" जब रजोगुण प्रबल होता है तब हम सोचते हैं-"मुझे अध्यात्म के मार्ग पर निश्चित रूप से प्रगति करनी चाहिए लेकिन इतनी भी क्या शीघ्रता है? वर्तमान में मुझे कई दायित्वों का निर्वहन करना है जो कि अधिक महत्वपूर्ण हैं।" जब तमोगुण का गुण हावी हो जाता है तब हम यह सोचने लगते हैं-"मुझे यह विश्वास नहीं है कि कोई भगवान है भी या नहीं क्योंकि उसे किसी ने कभी नहीं देखा है। इसलिए साधना में समय क्यों व्यर्थ किया जाए।" यहाँ यह बात विचारणीय है कि एक ही व्यक्ति के विचार भक्ति के संबंध में ऐसे उच्चत्तम और निम्नतम स्तर तक कैसे जाते रहते हैं।
तीन गुणों के कारण मन का अस्थिर होना स्वाभाविक है। हालाँकि हमें ऐसी परिस्थितियों में निराश नहीं होना चाहिए, अपितु इसके विपरीत हमें यह समझना चाहिए कि ऐसा क्यों होता है और इससे ऊपर उठने की चेष्टा करनी चाहिए। साधना का अभिप्राय यह है कि मन में इन तीनों गुणों के प्रवाह का सामना किया जाए और इसे भगवान और गुरु के प्रति श्रद्धा भक्ति को बनाए रखने के लिए बाध्य करना चाहिए। यदि हमारी चेतना पूरे दिन दिव्य चेतना में स्थित रहती है, तब फिर साधना करना आवश्यक नहीं होता। यद्यपि मन की स्वाभाविक भावनाएँ संसार की ओर प्रवृत होती हैं फिर भी हमें बुद्धि के सहयोग से इन्हें आध्यात्मिक क्षेत्र में लाने के लिए प्रयत्न करना होगा। आरम्भ में यह कठिन होगा किन्तु अभ्यास द्वारा ऐसा करना सरल हो जाता है। यह कार चलाने के समान है। आरम्भ में कार चलाना कठिन लगता है लेकिन अभ्यास द्वारा कार चलाना सहज हो जाता है।
श्रीकृष्ण अब इन तीनों गुणों द्वारा प्राप्त गन्तव्यों के संबंध में और इन्हें पार करने के लिए अर्थात् गुणातीत होने की आवश्यकता को व्यक्त करना आरम्भ करते हैं।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् |
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते || 14||
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते |
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते || 15||
जिनमें सत्त्वगुण की प्रधानता होती है वे मृत्यु पश्चात् ऋषियों के ऐसे उच्च लोक में जाते हैं जो रजोगुण और तमोगुण से मुक्त होता है। रजोगुण की प्रबलता वाले सकाम कर्म करने वाले लोगों के बीच जन्म लेते हैं और तमोगुण में मरने वाले पशुओं में जन्म लेते है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जीवात्मा का भविष्य उसके व्यक्तित्व के गुणों पर आधारित होता है। भगवान के कर्म नियमों के अनुसार हम वही प्राप्त करते हैं जिसके हम पात्र होते हैं। जो सद्गुणों और ज्ञान को विकसित करते हैं तथा दूसरों के प्रति सेवा की भावना रखते है वे पुण्यवान, विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं इत्यादि के परिवारों में जन्म लेते हैं या वे स्वर्ग के उच्च लोकों में जाते हैं। जो अपने आपको लोभ, धन लोलुपता और सांसारिक महत्त्वकांक्षाओं के अधीन कर लेते हैं वे प्रायः व्यावसायिक परिवारों में जन्म लेते हैं। वे जिनकी रुचि मादक पदार्थों के सेवन, हिंसा, आलस्य और कर्त्तव्य का परित्याग करने में होती है, वे मदिरापान करने वाले और अनपढ़ लोगों के परिवार में जन्म लेते हैं अन्यथा उन्हें आध्यात्मिक विकासवाद की सीढ़ी से नीचे उतरने के लिए बाध्य होना पड़ता है और वह पशुओं की योनियों में जन्म लेते हैं।
कई लोग पूछते हैं कि एक बार मानव रूप में जन्म लेने पर क्या वापस निम्न योनियों में धकेले जाना संभव है? इस श्लोक से ज्ञात होता है कि आत्मा के लिए मानव योनी आरक्षित नहीं रहती। वे जो मानव जीवन का सदुपयोग नहीं करते वे पुनः पशुओं की निम्न योनियों में जन्म लेते रहते हैं। इस प्रकार से सभी विकल्प हर समय खुले रहते हैं। आत्मा अपने गुणों के आधार पर अपने आध्यात्मिक विकास के लिए ऊपर उठ सकती है, समान स्तर पर रह सकती है और यहाँ तक कि नीचे भी गिर सकती है।
कर्मण: सुकृतस्याहु: सात्त्विकं निर्मलं फलम् |
रजसस्तु फलं दु:खमज्ञानं तमस: फलम् || 16||
ऐसा कहा जाता है कि सत्त्वगुण में सम्पन्न किए गये कार्य शुभ फल प्रदान करते हैं, रजोगुण के प्रभाव में किए गये कर्मों का परिणाम पीड़ादायक होता है तथा तमोगुण से सम्पन्न किए गए कार्यों का परिणाम अंधकार है।
सत्त्वगुणों से प्रभावित लोग शुद्धता, सदाचार और नि:स्वार्थ भावना से परिपूर्ण होते हैं। इसलिए उनके कर्मों का सम्पादन शुद्ध मनोभावना और निःस्वार्थ भाव से युक्त होता है और इसके परिणाम उन्हें आत्मिक उत्थान और संतोष प्रदान करते हैं। वे जो रजोगुण से प्रभावित होते हैं वे अपनी इन्द्रियों और कामनाओं से उद्वेलित होते हैं। अपने कार्य के पीछे उनका उद्देश्य स्वयं और अपने संबंधियों की उन्नति तथा इन्द्रियों का तुष्टिकरण करना होता है। इस प्रकार से उनके कार्य उन्हें इन्द्रिय सुखों की ओर ले जाते हैं जो आगे चलकर उनकी इन्द्रिय तृप्ति की वासनाओं को और अधिक भड़काते हैं। वे जिनमें तमोगुण की प्रधानता होती है वे शास्त्रों और स्मृतियों का सम्मान नहीं करते। इस प्रकार वे तुच्छ सुखों के लिए पापमयी कार्य करते हैं जो आगे चलकर उन्हें दुःखसागर में डुबा देते हैं।
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च |
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च || 17||
सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ और तमोगुण से अज्ञानता, प्रमाद और मोह उत्पन्न होता है।
तीनों गुणों से प्राप्त होने वाले परिमाणों में भिन्नता का उल्लेख करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण इसके कारणों को व्यक्त करते हैं। सत्त्वगुण विवेक बुद्धि को बढ़ाता है तथा उचित और अनुचित के बीच भेद करने की क्षमता प्रदान करता है। यह इन्द्रियों को तुष्ट करने के लिए उत्पन्न काम-वासनाओं को शांत करता है तथा सुख और संतोष की भावना उत्पन्न करता है। इससे प्रभावित लोग बौद्धिक गतिविधियों और उत्तम विचारों की ओर प्रवृत्त होते हैं। सत्त्वगुण बुद्धिमत्ता को बढ़ावा देता है। रजोगुण इन्द्रियों को भड़काता है और मन को निरंकुश बनाकर उसे तृष्णाओं में घुमाता रहता है। जीव इसके फन्दे में फंस जाता है तथा अधिक धन और सुख प्राप्त करने के लिए अधिक परिश्रम करने लगता है। तमोगुण जीव को जड़ता और अविद्या से ढक देता है। अज्ञानता में डूबा व्यक्ति कुत्सित और अधम कार्य करने लगता है और उसके बुरे परिणाम भुगतता है।
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा: |
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसा: || 18||
सत्त्वगुण में स्थित जीव उच्च लोकों में जाते हैं, रजोगुणी पृथ्वी लोक पर और तमोगुणी नरक लोकों में जाते हैं
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जीवात्मा का पुनर्जन्म उन गुणों से संबद्ध होता है जिनकी प्रबलता उनके व्यक्तित्व में प्रदर्शित होती है। इसकी तुलना विद्यालय (स्कूल) की शिक्षा पूरी कर महाविद्यालय (कॉलेज) में प्रवेश करने वाले छात्र से की जा सकती है। हमारे देश में अनेक महाविद्यालय हैं। वे छात्र जो निर्धारित मापदण्डों पर खड़े उतरते हैं उन्हें प्रतिष्ठित महाविद्यालयों में प्रवेश मिलता है जबकि अपेक्षाकृत कम अंक पाने वाले छात्रों को अन्य कॉलेजों में प्रवेश मिलता है। इसी प्रकार से श्रीमद्भागवतम् में भी वर्णन किया गया है-
सत्त्वे प्रलीनाः स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलयाः।
तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणाः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.25.22)
वे जो सत्त्वगुणी हैं, उच्च लोकों में जाते हैं। रजोगुणी पृथ्वी लोक पर पुनः जन्म लेते हैं और जो तमोगुणी हैं वे निम्न लोकों में जाते हैं जबकि वे जो तीनों गुणों से परे हो जाते हैं, मुझे प्राप्त करते हैं।
नान्यं गुणेभ्य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति |
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति || 19||
जब बुद्धिमान व्यक्ति को यह ज्ञात हो जाता है कि सभी कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों के अलावा कोई अन्य कर्ता नहीं है और जो मुझे इन तीन गुणों से परे देखते हैं, वे मेरी दिव्य प्रकृति को प्राप्त करता है।
श्रीकृष्ण त्रिगुणों के बंधनों को काटने का सरल समाधान प्रस्तुत करते हैं। संसार के सभी जीव इन तीनों गुणों के चुंगल में फंसे रहते हैं और इसलिए ये गुण ही सभी कार्यों के वास्तविक कर्ता हैं। लेकिन सर्वशक्तिमान भगवान इनसे परे हैं। इसलिए उन्हें त्रिगुणातीत अर्थात् माया के तीन गुणों से परे कहा जाता है। इस प्रकार से भगवान की सभी विशेषताएँ उनके नाम, गुण, लीलाएँ और संत भी गुणातीत होते हैं। यदि हम अपने मन को इन तीन गुणों से युक्त किसी व्यक्ति या पदार्थ में आसक्त करते हैं, तब उसका परिणाम उनके गुणों के अनुसार हमारे मन और बुद्धि पर पड़ता है। लेकिन यदि हम अपने मन को दिव्य क्षेत्र में अनुरक्त करते हैं तब वह गुणातीत होकर दिव्य बन जाता है। वे जो इस सिद्धांत को समझते हैं वे सांसारिक पदार्थों और लोगों के साथ अपनी आसक्ति और संबंधों को शिथिल करना आरम्भ कर देते हैं और अपने संबंधों को भगवान और गुरु में दृढ़ करते हैं। इससे वे गुणातीत होने में समर्थ हो जाते हैं और भगवान की दिव्य प्रकृति को पाते हैं। इसे आगे श्लोक 14.26 में विस्तार से समझाया गया है।
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् |
जन्ममृत्युजरादु:खैर्विमुक्तोऽमृतमश्रुते || 20||
शरीर से संबद्ध माया के त्रिगुणों से मुक्त होकर जीव जन्म, मृत्यु, रोग, बुढ़ापे और दुःखों से मुक्त हो जाता है तथा अमरता प्राप्त कर लेता है।
यदि हम गंदे कुएँ के जल का सेवन करते हैं तब हमारा पेट खराब हो जाता है। समान रूप से यदि हम तीन गुणों द्वारा प्रभावित होते हैं, तब हम उनके परिणामों को भोगते हैं। 'रोग, बुढ़ापा, मृत्यु और संसार में बार-बार जन्म लेना' ये चारों सांसारिक जीवन के मुख्य दुःख हैं।
इन्हें देखकर सर्वप्रथम महात्मा बुद्ध ने अनुभव किया कि संसार दुःखों का घर है और तब वह दुःखों से मुक्त होने के मार्ग की खोज के लिए निकले। वेदों में मनुष्यों के लिए कई आचार संहिताएँ, सामाजिक दायित्व, कर्मकाण्ड, और नियम निर्धारित किए गए हैं। कर्तव्यों और आचार संहिता को एक साथ कर्म-धर्म या वर्णाश्रम धर्म या शारीरिक धर्म कहा जाता है। ये हमें तमोगुण और रजोगुण से ऊपर सत्त्वगुण तक उठाने में सहायता करते हैं किन्तु सत्त्वगुण तक पहुंचना ही पर्याप्त नहीं है क्योंकि यह भी बंधन का कारण है। सत्वगुण की तुलना सोने की जंजीरों से बंधे होने से की जा सकती है। हमारा लक्ष्य संसार रूपी कारागार से मुक्त होना है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब हम गुणातीत हो जाते हैं तब फिर माया जीव पर हावी नहीं हो सकती और उसे बंधन में नहीं डाल सकती। इस प्रकार से आत्मा जन्म मरण के चक्कर से मुक्ति पाकर अमरता को प्राप्त करती है। वास्तव में आत्मा सदैव अमर है। किन्तु भौतिक शरीर के साथ इसकी पहचान इसे जन्म और मृत्यु के भ्रम जाल में डालकर कष्ट देती है। यह भ्रम आत्मा की सनातन प्रकृति के विरुद्ध है। इसलिए सांसारिक मोह हमारे आंतरिक अस्तित्व के लिए कष्टप्रद है क्योंकि भीतर से हम सब अमरता प्राप्त करना चाहते हैं।
अर्जुन उवाच |
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो |
किमाचार: कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते || 21||
अर्जुन ने पूछा-हे भगवान! वे जो इन तीनों गुणों से परे हो जाते हैं उनके लक्षण क्या हैं? वे किस प्रकार से गुणों के बंधन को पार करते हैं?
अर्जुन ने श्रीकृष्ण से तीनों गुणों से परे होने के संबंध में सुना इसलिए अब वह इन गुणों के संबंध में तीन प्रश्न पूछता है। लिङ्ग शब्द का अर्थ 'लक्षण' है। अर्जुन का प्रथम प्रश्न यह है-"गुणातीत होने वालों के लक्षण क्या हैं?" उसका दूसरा प्रश्न यह है कि "ऐसे गुणातीत व्यक्तियों का 'आचरण' कैसा होता है?" अर्जुन द्वारा पूछा गया तीसरा प्रश्न यह है कि “जीव तीनों गुणों से परे किस प्रकार होता है?" श्रीकृष्ण अगले श्लोकों में इन प्रश्नों का उचित उत्तर देते हैं।
श्रीभगवानुवाच |
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव |
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति || 22||
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते |
गुणा वर्तन्त इत्येवं योऽवतिष्ठति नेङ्गते || 23||
भगवान ने कहा-हे अर्जुन! तीनों गुणों से रहित मनुष्य न तो प्रकाश, (सत्त्वगुण का उदय) न ही कर्म, (रजोगुण से उत्पन्न) और न ही मोह (तमोगुण से उत्पन्न) होने पर इनसे घृणा करते हैं और न ही इनके अभाव में इनकी लालसा करते हैं। वे गुणों की प्रकृति से उदासीन रहते हैं और उनसे विक्षुब्ध नहीं होते। यह जानकर कि केवल गुण ही क्रियाशील हैं, वे बिना विचलित हुए रहते हैं।
श्रीकृष्ण अब तीनों गुणों से परे हो चुके मनुष्यों के लक्षणों को स्पष्ट करते हैं। ऐसे मनुष्य यह देखते हैं कि संसार में गुण ही कार्य कर रहे हैं और व्यक्तियों, पदार्थों और आस-पास की परिस्थितियों में उनके प्रभाव प्रकट हो रहे हैं। अतः वे उनसे विक्षुब्ध नहीं होते। सिद्ध व्यक्ति जब तमोगुण के संपर्क में आते है तब वे उससे द्वेष नहीं करते और उसमें फंसते भी नहीं हैं। संसारी मानुष संसारिक विषयों की अत्यधिक चिंता करते हैं। वे अपना समय और ऊर्जा संसार के पदार्थों और संसार की घटनाओं के चिंतन में लगाते हैं। दूसरी ओर सिद्ध आत्माएँ मानव कल्याण के लिए भी प्रयास करती हैं। वे ऐसा इसलिए करती है क्योंकि उनका स्वभाव ही दूसरों की सहायता करना होता है। वे अनुभव करती हैं कि संसार का अंतिम संचालन भगवान के हाथों में है। अतः उन्हें केवल अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए और शेष सब भगवान पर छोड़ देना चाहिए। संसार में आकर हमारा प्रथम कर्त्तव्य यह है कि हम स्वयं को शुद्ध करें। फिर शुद्ध मन के साथ हम स्वाभाविक रूप से उत्तम और संसार के लिए हितकारी कार्य करेंगे। जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था-"वह परिवर्तन लाओ स्वयं में जिसे तुम संसार में देखना चाहते हो।"
श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति स्वयं को गुणों की क्रियाशीलता से परे मानते हैं। जब प्रकृति के गुण अपनी प्रवृत्ति के अनुसार संसार में कार्यों को सम्पन्न करते हैं तब वे न तो दुःखी और न ही हर्षित होते है। वास्तव में जब वे इन गुणों को अपने मन में भी देखते हैं तब भी वे विचलित नहीं होते। मन माया से निर्मित है और माया के तीनों गुण उसमें निहित होते हैं। इसलिए स्वाभाविक रूप से मन को इन गुणों और इनके विचारों के प्रभुत्व में रहना पड़ता है।
समस्या यह है कि हम मन को स्वयं से अलग नहीं समझते और इसलिए जब मन क्षुब्ध करने वाले विचार बनाता है तब हम अनुभव करते हैं-"ओ, मैं नकारात्मक दृष्टिकोण से सोच रहा हूँ।" हम बुरे विचारों से जुड़ते है और उन्हें अपने भीतर स्थान और स्वयं को क्षति पहुँचाने की अनुमति देते हैं। इसकी अति तब होती है जब हमारा मन भगवान और गुरु के विरुद्ध विचार बनाता है और हम उन्हें अपने विचार मान लेते हैं। उस समय हमें मन को अपने से अलग तत्त्व के रूप में देखना चाहिए, तभी हम नकारात्मक विचारों से दूर हो सकेंगे। तब हम इस प्रकार मन के विचारों को अस्वीकार करेंगे-“मैं ऐसे विचारों को कोई महत्त्व नही दूंगा जो मेरी भक्ति में सहायक नहीं हैं।" महापुरुष गुणों के प्रभाव से मन में उठने वाले सभी नकारात्मक विचारों से दूर रहता है।
समदु:खसुख: स्वस्थ: समलोष्टाश्मकाञ्चन: |
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति: || 24||
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो: |
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते || 25||
वे जो सुख और दुःख में समान रहते हैं, जो आत्मस्थित हैं, जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने के टुकड़े को समान दृष्टि से देखते हैं, जो प्रिय और अप्रिय घटनाओं के प्रति समता की भावना रखते हैं। जो निंदा और प्रशंसा को समभाव से स्वीकार करते हैं, जो मान-अपमान की स्थिति में सम भाव रहते हैं। जो शत्रु और मित्र के साथ एक जैसा व्यवहार करते हैं, जो सभी भौतिक व्यापारों का त्याग कर देते हैं-वे तीनों गुणों से ऊपर उठे हुए (गुणातीत) कहलाते हैं।
भगवान के समान आत्मा भी तीनों गुणों से परे है। शारीरिक चेतना में रहते हुए हमारी पहचान शरीर के दुःख और सुख के साथ होती है जिसके परिणामस्वरूप हम उत्साह और निराशा की भावनाओं में झूलते रहते हैं। लेकिन जो भगवत्प्राप्ति कर लेते हैं वे अपनी पहचान न तो शरीर के सुखों और न ही दुःखों के साथ करते हैं। ऐसे आत्मनिष्ठ तत्त्वज्ञानी संसार के द्वंद्वो को समझते हुए उनसे अछूते रहते हैं। इस प्रकार से वे निर्गुण हो जाते हैं। इससे उन्हें समदृष्टि प्राप्त होती है, जिसके द्वारा वे पत्थर के टुकड़े, पृथ्वी के ढेले, स्वर्ण, अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों, आलोचनाओं और प्रशंसा सबको एक समान देखते हैं।
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते |
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते || 26||
जो लोग विशुद्ध भक्ति के साथ मेरी सेवा करते हैं, वे माया के तीनों गुणों से ऊपर उठ जाते हैं और ब्रह्म पद को पा लेते हैं।
तीनों गुणों से परे स्थित महापुरुषों के लक्षणों की व्याख्या करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब माया के तीन गुणों से परे होने का एक मात्र उपाय प्रकट कर रहे हैं। उपर्युक्त श्लोक में इंगित किया गया है कि केवल आत्मा का ज्ञान और शरीर के साथ उसकी भिन्नता को जानना ही पर्याप्त नहीं है। गुणातीत होने के लिए भक्तियोग की सहायता से मन परम प्रभु श्रीकृष्ण में स्थिर करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप मन श्रीकृष्ण के समान निर्गुण हो जाएगा।
कई लोग यह सोचते हैं कि यदि मन को भगवान के साकार रूप पर स्थिर किया जाता है तब यह निर्गुण नहीं हो सकेगा और इसे जब निराकार ब्रह्म में अनुरक्त करते हैं, तब मन माया के गुणों से परे होता है। किन्तु यह श्लोक इस मत का खण्डन करता है। भगवान का साकार रूप अनन्त गुणों से सम्पन्न है और ये सभी गुण दिव्य हैं तथा माया से परे हैं। इसलिए भगवान का साकार रूप भी निर्गुण है। ऋषि वेदव्यास ने यह स्पष्ट किया है कि भगवान का साकार रूप किस प्रकार से निर्गुण है।
अस्तु निर्गुण इत्युक्तः शास्त्रेषु जगदीश्वरः।
प्रकृतैर्हेसंयुक्तै-र्गुणैर्हीनत्वमुच्यते।। (पद्म पुराण)
"शास्त्रों में जहाँ भी भगवान का उल्लेख निर्गुण के रूप में किया गया है उसका अर्थ यह है कि वह भौतिक विशेषताओं से रहित है। फिर भी उनका दिव्य स्वरूप गुणों से रहित नहीं है। वे अनन्त गुणों का स्वामी हैं।" इस श्लोक से साधना का ध्येय भी प्रकट होता है। साधना का अर्थ शून्यता पर ध्यान क्रेंडिट करना नहीं है। मायासे परे की सत्ता भगवान है। इसलिए जब हमारे ध्यान का लक्ष्य भगवान होते हैं, वही वास्तव में साधना है।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च |
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च || 27||
मैं ही उस निराकार ब्रह्म का आधार हूँ जो अमर, अविनाशी, शाश्वत धर्म और असीम दिव्य आनन्दस्वरूप है।
पिछले श्लोक में किए गए उल्लेखानुसार श्रीकृष्ण और निराकार ब्रह्म के बीच के संबंधों पर प्रश्न उत्पन्न हो सकते हैं। पहले भी यह व्यक्त किया जा चुका है कि सर्वशक्तिमान भगवान के व्यक्तित्व के निराकार और साकार दो स्वरूप हैं। यहाँ श्रीकृष्ण व्यक्त करते हैं कि जिस ब्रह्म की उपासना ज्ञानी करते हैं, वह भगवान के साकार रूप से प्रकटित ज्योति पुंज है। पद्मपुराण में वर्णन है-
यन्नखंदुरुचिर्ब्रह्म ध्ये ब्रह्मादिभिः सुरैः।
गुणत्रयमतीतं तम वन्दे वृन्दावनेश्वरम् ।।
(पद्मपुराण, पाताल खण्ड-77.60)
वृंदावन के भगवान श्रीकृष्ण के चरणों के नखों से प्रकटित ज्योति परब्रह्म है जिसका ध्यान ज्ञानी और स्वर्ग के देवता करते हैं। चैतन्य महाप्रभु ने भी इसी प्रकार से वर्णन किया है-
ताँहार अंगेर शुद्ध किरन-मंडल
उपनिषद् कहे तांरे ब्रह्म सुनिर्मल
(चैतन्य चरितामृत, अदि लीला-2.12)
भगवान के दिव्य शरीर की 'प्रभा' का ही वर्णन उपनिषदों में ब्रह्म के रूप में किया गया है। इस प्रकार श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि तीनों गुणों के रोग की रामबाण औषधि भगवान के साकार रूप की निश्चल भक्ति में लीन होना है
।। श्रीमद्भगवत गीता चतुर्दश अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
Bhagavad Geeta Chapter 13
kathaShrijirasik
अध्याय तेरह: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग
योग द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभेद को जानना
भगवद्गीता में कुल अठारह अध्याय हैं। इनका तीन खण्डों में विभाजन किया जा सकता है। प्रथम खण्ड के छः अध्यायों में कर्मयोग का वर्णन किया गया है। दूसरे खण्ड में भक्ति की महिमा और भक्ति को पोषित करने का की विधि वर्णन हुआ है। इसमें भगवान के ऐश्वर्यों का भी वर्णन किया गया है। तीसरे खण्ड के छः अध्यायों में तत्त्वज्ञान पर चर्चा की गयी है। यह तीसरे खण्ड का प्रथम अध्याय है। यह दो शब्दों क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (शरीर का ज्ञाता) से परिचित कराता है। हम शरीर को क्षेत्र के रूप में और शरीर में निवास करने वाली आत्मा को शरीर के ज्ञाता के रूप में स्वीकार कर सकते हैं। किंतु क्षेत्र का अर्थ वास्तव में अधिक व्यापक हैं। इसमें मन, बुद्धि, अहंकार और माया (प्राकृत) शक्ति के अन्य सभी घटक भी सम्मिलित हैं, जिनसे हमारा व्यक्तित्त्व निर्मित होता है। अतः देह के अंतर्गत आत्मा को छोड़कर हमारे व्यक्तित्व के सभी पहलू सम्मिलित हैं। जिस प्रकार किसान खेत में बीज बो कर खेती करता है। इसी प्रकार से हम अपने शरीर को शुभ-अशुभ विचारों और कर्मों से पोषित करते हैं और अपना भाग्य बनाते हैं।
महात्मा बुद्ध ने कहा है-"हम जैसा सोचते हैं वही हमारे सामने परिणाम के रूप में आ जाता है" इसलिए हम जैसे सोचते हैं वैसे बन जाते हैं। महान अमेरिकी विचारक राल्फ वाल्डो एमर्सन ने कहा है-"विचार ही सभी कर्मों का जनक है।" इसलिए हमें शुभ विचारों और कर्मों से अपने शरीर को पोषित करने की विधि सीखनी चाहिए। इसके लिए शरीर और शरीर के ज्ञाता के बीच के भेद को जानना आवश्यक है।
इस अध्याय में श्रीकृष्ण इस भेद का विस्तृत विश्लेषण करते हैं। वे माया के उन तत्त्वों की गणना करते हैं जिनसे शरीर की रचना होती है। वे शरीर में होने वाले भावनाओं, मत, दृष्टिकोण आदि का वर्णन करते हैं। वे उन गुणों और विशेषताओं का भी उल्लेख करते हैं जो मन को शुद्ध और उसे ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करते हैं। इस ज्ञान से आत्मा की अनुभूति करने में सहायता मिलती है। तत्पश्चात् इस अध्याय में भगवान के स्वरूप का अद्भुत वर्णन किया गया है। भगवान विरोधी गुणों के अधिष्ठाता हैं, अर्थात् वे एक ही समय में विरोधाभासी गुणों को प्रकट करते हैं। इस प्रकार से वे सृष्टि में सर्वत्र व्यापक भी हैं और सभी के हृदयों में भी निवास करते हैं। इसलिए वे सभी जीवों की परम आत्मा हैं। आत्मा, परमात्मा और माया शक्ति का वर्णन करने के पश्चात् श्रीकृष्ण आगे यह व्याख्या करते हैं कि जीवों द्वारा किए जाने वाले कर्मों के लिए इनमें से कौन उत्तरदायी है? और संसार में कारण और कार्य का करता कौन है? वे जिन्हें इसे भेद का बोध हो जाता है और जो भली भांति कर्म के कारण को जान लेते हैं, वही वास्तव में देखते हैं और केवल वही दिव्य ज्ञान में स्थित हो जाते हैं। वे सभी जीवों में परमात्मा को देखते हैं और इसलिए वे किसी को अपने से हीन नहीं समझते। वे एक ही माया शक्ति में स्थित विविध प्रकार के प्राणियों को देख सकते हैं और जब वे सभी अस्तित्त्वों में एक ही सत्ता को देखते हैं तब उन्हें ब्रह्म की अनुभूति होती है।
अर्जुन उवाच |
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च |
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव || 1||
अर्जुन ने कहा-हे केशव! मैं यह जानने का इच्छुक हूँ कि प्रकृति क्या है और पुरुष क्या है तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ क्या है? मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि वास्तविक ज्ञान क्या है और इस ज्ञान का लक्ष्य कौन है?
श्रीभगवानुवाच |
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते |
एतद्यो वेत्ति तं प्राहु: क्षेत्रज्ञ इति तद्विद: || 2||
परम पुरुषोतम भगवान ने कहाः हे अर्जुन! इस शरीर को क्षेत्र (कर्म क्षेत्र) के रूप में परिभाषित किया गया है और जो इस शरीर को जान जाता है उसे क्षेत्रज्ञ (शरीर का ज्ञाता) कहा जाता है।
श्रीकृष्ण शरीर और आत्मा के बीच के भेद के विषय पर चर्चा आरम्भ करते हैं। आत्मा दिव्य है। यह न तो खा, देख, सूंघ, सुन और स्वाद ले सकती है और न ही स्पर्श कर सकती है। यह इन सब क्रियाकलापों को शरीर, मन और बुद्धि के माध्यम से करती है जिन्हें कर्म क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया गया है। आधुनिक विज्ञान में हमें 'उर्जा शक्ति का क्षेत्र' जैसे प्रयोग मिलते हैं। किसी चुम्बक के चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र होता है जो बिजली उत्पन्न करता है। आवेशित बिजली के चारों ओर बल क्षेत्र होता है। इसी प्रकार शरीर मनुष्य के कर्मों का आयतन है। इसलिए इसे क्षेत्र (कर्म क्षेत्र) कहा जाता है। आत्मा शरीर, मन और बुद्धि से भिन्न है किन्तु यह अपनी दिव्य प्रकृति को भुला बैठी है और अपनी पहचान इन भौतिक अस्तित्त्वों के रूप में करती है। किन्तु फिर भी इसे शरीर का ज्ञान होता है इसलिए इसे क्षेत्रज्ञ अर्थात् शरीर के क्षेत्र को जानने वाला कहा जाता है। यह शब्दावली आत्मज्ञानी ऋषियों द्वारा दी गयी है जो आत्मज्ञान में स्थित थे और जिन्होंने शरीर से पृथक् अपनी पहचान को जान लिया था।
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत |
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम || 3||
हे भरतवंशी! मैं समस्त शरीरों के कर्म क्षेत्रों का भी ज्ञाता हूँ। कर्म क्षेत्र के रूप में शरीर को तथा, आत्मा और भगवान को इस शरीर के ज्ञाता के रूप में जान लेना मेरे मतानुसार वास्तविक ज्ञान है।
आत्मा केवल अपने शरीर के कर्म क्षेत्र को जानती है। यहाँ तक कि आत्मा को अपने क्षेत्र की भी अपूर्ण जानकारी ही होती है। भगवान सभी आत्माओं के शरीरों के ज्ञाता हैं, क्योंकि वे परमात्मा के रूप में सभी जीवों के हृदय में वास करते हैं। सभी के शरीरों से संबंधित भगवान का ज्ञान पूर्ण होता है। इन विभेदों की व्याख्या करते हुए श्रीकृष्ण हमें प्राकृत शरीर, आत्मा और परमात्मा तीन अस्तित्त्वों की एक दूसरे से तुलना करते हुए इनकी स्थिति को स्पष्ट करते हैं। इस श्लोक के दूसरे भाग में वह ज्ञान की परिभाषा देते हैं, "आत्मा, परमात्मा और शरीर तथा इनके बीच के अन्तर को समझना वास्तविक ज्ञान है।" ऐसी स्थिति में पी.एच.डी. और डी.लिट. के डिग्रीधारी स्वयं को चाहे विद्वान मानते हों किन्तु यदि वे शरीर, आत्मा और परमात्मा के भेद को नहीं समझ पाते तो श्रीकृष्ण की परिभाषा के अनुसार वे वास्तव में ज्ञानी नहीं हैं।
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् |
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु || 4||
सुनो अब मैं तुम्हें समझाऊंगा कि कर्म क्षेत्र और इसकी प्रकृति क्या है, इसमें कैसे परिवर्तन होते है और यह कहाँ से उत्पन्न हुआ है, कर्म क्षेत्र का ज्ञाता कौन है और उसकी शक्तियाँ क्या हैं?
श्रीकृष्ण अब स्वयं कई प्रश्न करते हैं और अर्जुन को ध्यानपूर्वक उनका उत्तर सुनने के लिए कहते हैं।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधै: पृथक् |
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितै: || 5 ||
ऋषियों ने अनेक रूप से क्षेत्र का और क्षेत्रज्ञ का वर्णन किया है। इसका उल्लेख विभिन्न वैदिक स्तोत्रों और विशेष रूप से ब्रह्मसूत्र में ठोस तर्क और अनेक साक्ष्यों द्वारा प्रकट किया गया है।
ज्ञान बुद्धि को तभी संतुष्ट करता है जब उसकी अभिव्यक्ति स्पष्ट, सटीक और ठोस तर्कों द्वारा की जाती है। पुनः इसे आत्मप्रमाण के रूप से स्वीकार करने हेतु इसकी पुष्टि आप्त्वकता द्वारा करना आवश्यक है। आध्यात्मिक ज्ञान की प्रामाणिकता के लिए वेदों का प्रमाण दिया जाता है।
वेद यह केवल कुछ पुस्तकों का नाम नहीं है। वेद भगवान का शाश्वत ज्ञान है। जब भगवान संसार की रचना करते हैं तब वे जीवात्माओं के कल्याण के लिए वेदों को प्रकट करते हैं।
बृहदारण्यकोपनिषद् (4.5.11) में वर्णन है “निःश्वसितमस्य वेदाः" अर्थात् वेद भगवान के श्वास से प्रकट हुए हैं।" सर्वप्रथम भगवान ने इनका ज्ञान ब्रह्मा जी के हृदय में प्रकट किया। वहाँ से वे 'श्रुति' परम्परा द्वारा पृथ्वी पर आए इसलिए इनको दूसरा नाम 'श्रुति' है अर्थात् 'श्रवण द्वारा प्राप्त ज्ञान।' कलियुग के आरम्भ में महर्षि वेदव्यास जो स्वयं भगवान का अवतार थे, उन्होंने वेदों को ग्रंथ का रूप दिया और इन्हें चार भागों-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में विभाजित किया। इसलिए उनका नाम है वेदव्यास कहलाया अर्थात् 'वह जिन्होंने वेदों का विभाजन किया।' यह ध्यातव्य कि वेदव्यास जी वेदों के संपादक नहीं है वेदों का विभाजन मात्र करने वाले हैं। इसलिए वेदों को कहा जाता है जिसका अर्थ है कि 'किसी व्यक्ति द्वारा रचित न होना।'
भूतम् भव्यं भविष्यच्च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति
(मनुस्मृति-12.97)
"कोई भी आध्यात्मिक सिद्धान्त वेदों द्वारा अवश्य प्रमाणित होना चाहिए। वेदों के ज्ञान के विस्तार के लिए कई ऋषियों ने ग्रंथ लिखे और वे सभी वैदिक ग्रंथों के समूह में सम्मिलित हो गये क्योंकि वे वेदों के अनुगत थे। कुछ महत्त्वपूर्ण वैदिक ग्रंथों का विवरण निम्नांकित है।
इतिहासः ये ऐतिहासिक ग्रंथ हैं। इनकी संख्या दो है-एक रामायण और एक महाभारत। इनमें भगवान के दो महान अवतारों का वर्णन है। रामायण की रचना ऋषि वाल्मीकि ने की थी और इसमें भगवान राम की लीलाओं का वर्णन किया गया है। यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि वाल्मीकि ने इसकी रचना भगवान श्रीराम की लीलाओं के प्रदर्शन से पूर्व की थी। महर्षि वाल्मीकि दिव्य दृष्टि से सम्पन्न थे जिसके कारण वे संसार में भगवान राम द्वारा अवतार लेने से पूर्व राम के अवतार काल में होने वाली लीलाओं को पहले से देख सके। उन्होंने रामायण में लगभग 24000 श्लोक लिखे। इन श्लोकों में विभिन्न संबंधों जैसे कि पुत्र, भाई, पत्नी, राजा और दंपति के लिए आदर्श आचरण की शिक्षा भी निहित है। रामायण भारत की कई क्षेत्रीय भाषाओं में भी लिखी गयी जिससे जनमानस में इसकी लोकप्रियता बढ़ती गयी। इनमें से सबसे अधिक लोकप्रिय रामायण परम रामभक्त गोस्वामी तुलसीदास द्वारा अवधी में रचित रामचरितमानस है।
ऋषि वेदव्यास ने महाभारत की रचना की। इसमें एक लाख श्लोक हैं और इसे विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य माना गया है। श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का वर्णन महाभारत का मूल विषय हैं। इसमें भरपूर ज्ञान भी निहित है। महाभारत में सभी आश्रमों से संबंधित कर्त्तव्यों का ज्ञान, पथ प्रदर्शन और भगवान की भक्ति का विस्तृत वर्णन किया गया है। भागवद्गीता महाभारत का एक भाग है। यह अति लोकप्रिय ग्रंथ है क्योंकि इसमें आध्यात्मिक ज्ञान का सार निहित है जिसका विशद वर्णन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने किया है। इसका विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है। भगवद्गीता पर अनेक भाष्य लिखे गये हैं।
पुराणः महर्षि वेदव्यास ने अठारह पुराण लिखे। इन सब में कुल चार लाख श्लोक हैं। इनमें भगवान के विभिन्न अवतारों और उनके भक्तों का वर्णन है। पुराणों में भरपूर तत्त्वज्ञान है। ये ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, स्थिति और उसके संहार तथा पुनः सृष्टि, मानव जाति के इतिहास, स्वर्ग के देवताओं और संतों की वंशावली का वर्णन करते हैं। इनमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण भागवतपुराण या श्रीमद्भागवतम् है। यह वेदव्यास द्वारा रचित अंतिम ग्रंथ है जिसमें उन्होंने यह उल्लेख किया है कि वे इस ग्रंथ में भगवान के निष्काम प्रेम रूपी परम धर्म को प्रकट कर रहे हैं। तात्त्विक दृष्टि से जहाँ भगवद्गीता समाप्त होती है वहीं श्रीमद्भागवतम् शुरू होती है।
षड् दर्शनः छः ऋषियों ने हिन्दू दर्शन के विशेष पहलुओं पर प्रकाश डालने वाले छः ग्रंथों की रचना की। इन्हें षट्दर्शन के नाम से जाना जाता है।
1. मीमांसाः जैमिनि महर्षि द्वारा रचित इस ग्रंथ में कर्मानुष्ठानों और धर्मानुष्ठानों का वर्णन किया गया है।
2. वेदान्त दर्शनः वेदव्यास द्वारा इस दर्शन में परम सत्य के स्वरूप का वर्णन किया गया
3. न्याय दर्शनः महर्षि गौतम द्वारा इस दर्शन में जीवन और परम सत्य को जानने की
पद्धति का निरूपण किया गया है।
4. वैशेषिक दर्शनः महर्षि कणाद द्वारा सत्रबद्ध यह दर्शन ब्रह्माण्ड का तथा इसके विभिन्न तत्त्वों का विश्लेषण करता है।
5. योग दर्शनः महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित इस दर्शन में योगासनों से आरम्भ करते हुए अष्टांग योग के अनुपालन द्वारा कैवल्य-प्राप्ति का वर्णन किया गया है।
6. सांख्य दर्शनः महर्षि कपिल ने प्रकृति, जो माया शक्ति का आदि रूप है, द्वारा ब्रह्माण्ड के विकास और माया के मूल तत्त्वों का वर्णन किया गया है।
उपर्युक्त ग्रंथों के अतिरिक्त हिन्दू संस्कृति में अन्य सैकड़ों ग्रंथ हैं। यहाँ इन सबका वर्णन करना संभव नहीं है। संक्षेप में यह कह सकते हैं कि वैदिक ग्रंथ दिव्य ज्ञान की अथाह निधि है, जिसमें मानव जाति का कल्याण निहित है। इन सब में ब्रह्म सूत्र (वेदान्त दर्शन) को आत्मा, शरीर और परमात्मा के ज्ञान के विषय पर परम प्रमाण माना गया है। 'वेद' का अर्थ वैदिक ज्ञान है और अन्त का अर्थ 'सार' है। परिणामस्वरूप वेदान्त से तात्पर्य 'वैदिक ज्ञान का सार से है। यद्यपि वेदान्त दर्शन महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित है, किन्तु फिर भी कई विद्वानों ने इसे दार्शनिक शास्त्रार्थ हेतु प्रमाण के रूप में स्वीकार किया और इस पर भाष्य लिखे ताकि आत्मा और परमात्मा के संबंध में अपना भिन्न दार्शनिक दृष्टिकोण स्थापित किया जा सके। जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा वेदान्त दर्शन पर लिखा गया भाष्य शारीरक भाष्य के नाम से जाना जाता है जो अद्वैत दर्शन परम्परा की नींव है। उनके अनुयायियों में कई जैसे वाचस्पति मिश्र और पद्मपाद ने इस पर विस्तार से अपनी टिक्कायें लिखी हैं। जगद्गुरु निम्बार्काचार्य ने 'वेदांत पारिजात सौरभ' लिखा जिसमें द्वैत-अद्वैतवाद की विचारधारा की व्याख्या की गयी है। जगद्गुरु रामानुजाचार्य के भाष्य को "श्री भाष्य' कहा जाता है जो विशिष्ट-अद्वैतवाद का आधार व्यक्त करता है। जगद्गुरु मध्वाचार्य द्वारा लिखा गया भाष्य 'ब्रह्मसूत्र भाष्यम्' कहलाता है जो द्वैतवाद के सिद्धान्त की नींव है। महाप्रभु वल्लभाचार्य ने अणु भाष्य लिखा जिसमें शुद्ध द्वैतवाद दर्शन को स्थापित किया गया। इसके अतिरिक्त अन्य प्रसिद्ध भाष्यकार भट्ट भास्कर, यादव प्रकाश, केशव, नीलकंठ, विज्ञान भिक्षु और बलदेव विद्याभूषण हैं।
चैतन्य महाप्रभु स्वयं वेदों के विद्वान थे, परन्तु उन्होंने वेदांत दर्शन पर कोई भाष्य नहीं लिखा। उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि महर्षि वेदव्यास ने स्वयं घोषित किया है कि उनका अंतिम ग्रंथ श्रीमद्भागवत ही इसका पूर्ण भाष्य है।
अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां सर्वोपनिषदामपि
"श्रीमद्भागवतम् में वेदान्त दर्शन और सभी उपनिषदों का सार और अर्थ प्रकट हुआ है।" इसलिए वेदव्यास के प्रति श्रद्धाभाव और सम्मान के कारण चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं को वेदान्त पर अलग से भाष्य लिखने के योग्य नहीं समझा।
महाभूतान्यङ्कारो बुद्धिरव्यक्त मेव च |
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचरा: || 6||
कर्म का क्षेत्र पाँच महातत्त्वों-अहंकार, बुद्धि और अव्यक्त, ग्यारह इन्द्रियों (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियों और मन) और इन्द्रियों के पाँच विषयों से निर्मित है।
कर्म के क्षेत्र का निर्माण करने वाले चौबीस तत्त्व-पंचमहाभूत (पाँच महातत्त्व-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश), पाँच-तन्मात्राएँ (पांच विषय-रस, स्पर्श, गंध, रूप और शब्द) पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाक्, हस्त, पांव, लिंग, गुदा), पाँच ज्ञानन्द्रियाँ (कान, नेत्र, जिह्वा, त्वचा और नासिका) मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति सम्मिलित हैं। यहाँ श्रीकृष्ण ने 'दशैकम्' शब्द जिसका अर्थ 'दस और एक' है का प्रयोग ग्यारह इन्द्रियों की संख्या दर्शाने के लिए किया है। इनमें वे मन को भी पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों के साथ सम्मिलित करते हैं। इससे पहले 10वें अध्याय के 22वें श्लोक में उन्होंने उल्लेख किया था कि वे इन्द्रियों में 'मन' हैं। आश्चर्य हो सकता है कि पाँच विषयों को कर्म क्षेत्र में क्यों सम्मिलित किया गया है जबकि ये शरीर के बाहर रहते हैं। इसका कारण यह है कि मन इन्द्रिय के विषयों के चिन्तन में व्यस्त रहता है और ये पाँच विषय सूक्ष्म रूप से मन में रहते हैं। इसलिए जब हम नींद में स्वप्न देखते हैं, तो स्वप्नावस्था में हम देखते, सुनते और अनुभव करते हैं तथा सूंघते हैं, जबकि हमारा स्थूल शरीर बिस्तर पर होता है। इससे ज्ञात होता है कि इन्द्रियों के स्थूल अंग भी सूक्ष्म रूप से मन में व्याप्त रहते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण यहाँ इन्हें भी सम्मिलित करते हैं क्योंकि वे आत्मा के पूर्ण कर्मक्षेत्र का वर्णन कर रहे हैं। कुछ ग्रंथ शरीर का विश्लेषण करते समय इन्द्रियों के पाँच विषयों को सम्मिलित नहीं करते। इनके स्थान पर इनमें पाँच प्राण (जीवन शक्ति) को सम्मिलित किया गया है। यह केवल श्रेणीकरण से संबंधित अन्तर है न कि दार्शनिक।
इस ज्ञान को आवरणों के रूप में भी समझाया गया है। शरीर के क्षेत्र में पाँच कोष (आवरण) हैं, जो इसे आच्छादित करते हैं।
1. अन्नमय कोषः यह स्थूल आवरण है। यह पाँच महाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) से बना है।
2. प्राणमय कोषः यह प्राणों का आवरण है। यह पाँच प्रकार की जीवन दायिनी शक्तियों (प्राण, आपान व्यान, समान, उदान) से निर्मित है।
3. मनोमय कोषः यह मानसिक आवरण है। यह मन और पाँच कर्मेन्द्रियों (वाक्, हस्त, पाँव, लिंग और गुदा) से बना है।
4. विज्ञानमय कोषः यह बुद्धि का आवरण है। यह कोष बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियों (कान, आँख, जिह्वा, त्वचा और नासिका) से बना है।
5. आनन्दमय कोषः यह आनंद का आवरण है जो कि अहंकार से बना है यह हमारी पहचान शरीर, मन और बुद्धि तंत्र के साथ कराता है।
इच्छा द्वेष: सुखं दु:खं सङ्घातश्चेतना धृति: |
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् || 7||
इच्छा और द्वेष, सुख और दुःख, शरीर, चेतना और इच्छा शक्ति ये सब कार्य क्षेत्र तथा उसके विकार में सम्मिलित हैं। श्रीकृष्ण अब इस क्षेत्र के गुणों और उसके विकारों को स्पष्ट करते हैं।
शरीरः कर्मक्षेत्र में शरीर सम्मिलित है। लेकिन इसमें इसके अतिरिक्त और भी बहुत कुछ सम्मिलित है। शरीर में जन्म से मृत्यु तक छः प्रकार के विकार होते हैं-अस्ति (गर्भावस्था में जीवन) जायते (जन्म), वर्धते (विकास), विपरिणमाते (प्रजनन), अपक्षीयते (क्षीण होना), विनश्यति (मृत्यु) अर्थात् यह गर्भावस्था में रहता है, जन्म लेता है, विकसित होता है, उत्पन्न करता है, क्षीण होता है और अन्त में मृत्यु को प्राप्त होता है। शरीर भगवान या संसार में सुख की खोज करने वाली आत्मा की सहायता करता है।
चेतनाः यह जीवन दायिनी शक्ति है और आत्मा में स्थित रहती है। यह जब तक शरीर में रहती है उसे जीवन शक्ति प्रदान करती है। जिस प्रकार यदि हम अग्नि में लोहे की छड़ डालते हैं, तब छड़ अग्नि से ऊष्मा प्राप्त कर लाल हो जाती है। उसी प्रकार से आत्मा शरीर को चेतना प्रदान कर उसे सजीव बनाती है। इसलिए कृष्ण चेतना को भी क्षेत्र में सम्मिलित करते हैं।
इच्छाशक्ति:-यह दृढ़ संकल्प है जो शरीर के सभी घटक तत्त्वों को सक्रिय करती है और उन्हें उपयुक्त दिशा की ओर केन्द्रित करती है। यह इच्छाशक्ति आत्मा को लक्ष्य प्राप्त करने में समर्थ बनाती है। इच्छा बुद्धि का गुण है जो आत्मा द्वारा प्रेरित होती है। सत्त्व, रजस् और तमोगुण के प्रभाव से इच्छा के स्वरूप का वर्णन 18वें अध्याय के 33वें से 35वें श्लोक में किया गया है।
कामनाः यह मन और बुद्धि की एक क्रिया है जो किसी वस्तु किसी स्थिति और किसी व्यक्ति आदि की प्राप्ति के लिए लालसा उत्पन्न करती है। सामान्यतः हम कामना को महत्त्व नहीं देते लेकिन कल्पना करें कि यदि कामनाएँ न होती तब जीवन की प्रवृत्ति किस प्रकार से भिन्न होती? इसलिए कर्म क्षेत्र का निर्माण करने वाले परमात्मा ने कामना को इसके अंश के रूप में इसमें सम्मिलित किया और इसलिए इसका विशेष उल्लेख करना स्वाभाविक है। बुद्धि किसी पदार्थ की महत्ता का विश्लेषण करती है और मन इसके प्रति अभिलाषाओं को प्रश्रय देता है जब किसी को आत्मज्ञान हो जाता है तब सभी लौकिक कामनाएँ शांत हो जाती हैं और फिर शुद्ध मन केवल भगवत्प्राप्ति की कामना करने लगता है। लौकिक कामनाएँ बंधन का कारण होती हैं और आध्यात्मिक कामनायें मुक्ति की ओर ले जाती हैं।
द्वेषः यह मन और बुद्धि की एक अवस्था है जो ऐसे पदार्थ, व्यक्ति और परिस्थितियों के प्रति विरक्ति उत्पन्न करती है जो उसे अप्रिय लगते हैं और उनसे बचने का प्रयास करती है।
सुखः यह सुख और आनन्द का भाव है जिसकी अनुभूति प्रिय और अनुकूल परिस्थितियों तथा कामनाओं की पूर्ति होने पर होती है। मन सुख की प्राप्ति करता है और आत्मा भी इस सुख का अनुभव करती है क्योंकि यह समय की पहचान मन के साथ युक्त मानती है। किंतु लौकिक सुख आत्मा की क्षुधा को कभी शान्त नहीं कर सकते और वह तब तक असंतुष्ट रहती है जब तक वह भगवान के दिव्य आनंद की प्राप्ति नहीं करती।
दुःख: यह मानसिक पीड़ा है। मन अप्रिय और प्रतिकूल परिस्थितियों में इसका अनुभव करता है।
अब श्रीकृष्ण ऐसे गुण और विशेषताओं का वर्णन करते हैं जो किसी को ज्ञान प्राप्त करने के योग्य बनाते हैं। इस प्रकार वे सर्वश्रेष्ठ मानव शरीर को प्राप्त करते हैं।
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् |
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रह: || 8||
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च |
जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम् || 9||
असक्तिरनभिष्वङ्ग: पुत्रदारगृहादिषु |
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु || 10||
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी |
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि || 11||
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम् |
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा || 12||
नम्रता, आडंबरों से मुक्ति, अहिंसा, क्षमा, सादगी, गुरु की सेवा, मन और शरीर की शुद्धता, दृढ़ता और आत्मसंयम, विषयों के प्रति उदासीनता, अहंकार रहित होना, जन्म, रोग, बुढ़ापा और मृत्यु के दोषों पर ध्यान देना, अनासक्ति, स्त्री, पुरुष, बच्चों और घर सम्पत्ति आदि वस्तुओं के प्रति ममता रहित होना। जीवन में वांछित और अवांछित घटनाओं के प्रति समभाव, मेरे प्रति अनन्य और अविरल भक्ति, एकान्त स्थानों पर रहने की इच्छा, लौकिक जनों के प्रति विमुखता, आध्यात्मिक ज्ञान में स्थिरता और परम सत्य की खोज, इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और जो भी इसके प्रतिकूल हैं उसे मैं अज्ञान कहता हूँ।
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान प्राप्त करना केवल बौद्धिक प्रक्रिया नहीं है। पुस्तकीय ज्ञान किसी के चरित्र में परिवर्तन नहीं लाता किंतु आध्यात्मिक ज्ञान, के लिए हृदय की शुद्धता आवश्यक है। (यहाँ हृदय का उल्लेख शारीरिक अवयव के रूप में नहीं) मन और बुद्धि का कई बार हृदय के रूप में उल्लेख किया जाता है।
उपर्युक्त पाँच श्लोक गुण, प्रवृत्तियों, व्यवहार और मनोवृत्तियों का वर्णन करते हैं जो हमारे जीवन को शुद्ध करते हैं और उसे ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करते हैं।
नम्रताः जब हमें अपने क्षेत्र अर्थात् शरीर के गुणों जैसे सौंदर्य, बुद्धि, प्रतिभा, सामर्थ्य आदि पर अहंकार हो जाता है, तब हम यह भूल जाते हैं कि ये सब गुण हमें भगवान ने ही कृपापूर्वक प्रदान किए हैं। अहंकार के परिणामस्वरूप हमारी चेतना हमें भगवान से विमुख कर देती है। यह आत्मज्ञान के मार्ग में एक बड़ी बाधा है क्योंकि अहंकार मन और बुद्धि को प्रभावित करके पूरे क्षेत्र को दूषित कर देता है।
आडम्बर से मुक्तिः आडम्बर कृत्रिम व्यक्तित्व को विकसित करते हैं। मनुष्य के भीतर दोष होते हैं लेकिन वह बाहर से मुखौटा लगाए रखता है। बाह्य रूप से सदाचार का प्रदर्शन खोखला होता है।
अहिंसाः ज्ञान की प्राप्ति हेतु सभी प्राणियों के प्रति आदर भाव रखना आवश्यक है। इसके लिए अहिंसा का पालन करना भी आवश्यक है। इसलिए धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है-“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् " अर्थात् यदि तुम किसी विशेष तरह के व्यवहार को स्वयं के लिए पसंद नहीं करते तो उनके साथ भी वैसा व्यवहार न करो।"
क्षमाः इसका तात्पर्य दुर्भावना मुक्त होना हैउन लोगों के प्रति भी जो हमारा अहित करते हैं और हमें कष्ट पहुँचाते हैं। वास्तव में दुर्भावना को मन में प्रश्रय देना हमारे लिए अधिक हानिकारक होता है। क्षमाशीलता के कारण विवेकी मनुष्य का मन शुद्ध हो जाता है।
सरलताः इसका तात्पर्य विचारों, वाणी और कर्मों की सरलता से है। विचारों की सरलता में छल, शत्रुता और कुटिलता से रहित होना सम्मिलित है। इसी प्रकार वाणी की सरलता में उपहास, निंदा, वृथा वार्तालाप, अतिशयोक्ति वर्णन न करने जैसी वृत्तियों से दूर रहना, कर्मों में सरलता में, सादा जीवन व्यतीत करना और सद्व्यवहार आदि सम्मिलित हैं।
गुरु की सेवाः गुरु से हमें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है। गुरु से दिव्यज्ञान प्राप्त करने के लिए शिष्य को गुरु के प्रति भक्ति, समर्पण और श्रद्धा युक्त होना चाहिए। गुरु की सेवा द्वारा शिष्य नम्रता और अनन्यता विकसित करता है जिससे प्रसन्न होकर गुरु उसे दिव्य ज्ञान प्रदान करता है। इसलिए श्रीकृष्ण ने चौथे अध्याय के 34वें श्लोक में यह कहा है कि "आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर श्रद्धा भक्ति के साथ उनकी सेवा करते हुए उनसे परम सत्य के बारे में जानों। ऐसा सिद्ध संत दिव्य ज्ञान प्रदान करेगा क्योंकि उसने परम सत्य का अनुभव किया है।"
शरीर और मन की शुद्धताः आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार की शुद्धता अति आवश्यक है। शाण्डिल्य उपनिषद् में वर्णन है-"शौचम् नाम द्विविधम्-बाह्यमांतर चेति (1.1)।" अर्थात् शुद्धता आंतरिक और बाह्य दो प्रकार की होती है।" बाह्य शुद्धता स्वास्थ्य की देखभाल, मन को व्यवस्थित करने में सहायता करती है लेकिन मानसिक शुद्धता का महत्त्व और अधिक होता है। इसे मन को पूर्णरूप से भगवान में केन्द्रित करके प्राप्त किया जा सकता है। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने इसका विशद वर्णन किया है-
मायाधीन मलिन मन, है अनादि कालीन।
हरि विरहानल धोय जल, करु निर्मल बनि दीन।।
(भक्ति शतक-79)
"हमारा मायिक मन अनंत जन्मों से अशुद्ध है। इसे अति दीन बनकर भगवान के विरह की अग्नि में तपाकर निर्मल करो"।
दृढ़ताः भगवत्प्राप्ति ऐसा लक्ष्य नहीं है जिसे एक दिन में प्राप्त कर लिया जाए। दृढ़ता का अर्थ यह है कि जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता तब तक हम अपने मार्ग पर निरंतर स्थिर बने रहें। शास्त्रों में वर्णन है-"चरैवेति चरैवेति, चरन् वै मधु विन्दति" अर्थात् आगे बढ़ते चलो, आगे बढ़ते चलो क्योंकि जो पराजय स्वीकार नहीं करते वे अंत में अनंत लाभ पाते हैं।"
आत्मसंयमः यह हमें ऐसे लौकिक सुखों के पीछे भागने से रोकता है जो मन और बुद्धि को दूषित करते हैं। आत्मसंयम व्यक्ति को दुर्व्यवसनों में लिप्त होने से रोकता है।
विषयों के प्रति उदासीनता:- यह आत्म संयम से आगे की अवस्था है। इसमें हमें स्वयं को बलपूर्वक रोकना पड़ता है। उदासीनता से तात्पर्य इन्द्रिय भोग से प्राप्त होने वाले आनंद से रहित होना है जो भगवत्प्राप्ति के मार्ग की अड़चन है।
अहंभाव से मुक्तिः अहंभाव 'मैं', 'मुझे' और 'मेरा' का बोध है। इसका वर्णन अविद्या के रूप में किया जाता है क्योंकि यह शारीरिक स्तर पर होता है और स्वयं की पहचान शरीर के साथ करने से उत्पन्न होता है। इसे 'अहम् चेतना' भी कहा जाता है। सभी सभी संत यह घोषणा करते हैं कि भगवान को अपने हृदय में लाने के लिए हमें अहंभाव से मुक्त होना चाहिए-
जब मैं था तब हरि नाहीं, अब हरि हैं, मैं नाहीं।
प्रेम गली अति सांकरी, यामें द्वे न समाहीं (संत कबीर)।।
"जब मैं अर्थात् अहम् था तब मेरे भीतर भगवान नहीं थे। अब भगवान हैं और 'मैं' अर्थात् अहं नहीं है। दिव्य प्रेम का मार्ग बहुत संकरा है जिसमें 'मैं' और 'भगवान' दोनों नहीं रह सकते।"
ज्ञान योग और अष्टांग-योग के मार्ग में अहम् से मुक्ति प्राप्त करने के लिए अनेक साधनाएँ हैं लेकिन भक्ति योग के मार्ग में इससे मुक्त होना अत्यंत सरल है। हम अहं (अहंचेतना) के सामने 'दास' जोड़ देते हैं और इसे दासोहम् (मैं भगवान का सेवक हूँ) बना देते हैं। अब मैं अर्थात् अहं हानिकारक नहीं रहता और अहं चेतना भगवत् चेतना में परिवर्तित हो जाती है।
जन्म, रोग, बुढ़ापा और मृत्यु के दोषों को पहचानना: यदि बुद्धि यह निर्णय न कर सके कि सांसारिक संपत्ति या आध्यात्मिक संपदा में से क्या अधिक महत्त्वपूर्ण है, तब दृढ़ इच्छा को विकसित करना कठिन हो जाता है। किंतु जब बुद्धि संसार की नीरसता जान लेती है, तब यह अपने संकल्प के प्रति दृढ़ हो जाती है। इस दृढ़ता को पाने के लिए हमें उन कष्टों का निरन्तर चिंतन करना चाहिए जो जीवन के अविभाज्य अंग हैं। यह वही सिद्धान्त है जिसे महात्मा बुद्ध ने आध्यात्मिक मार्ग पर स्थापित किया है। उन्होने एक रोगी व्यक्ति को देखा और सोचा कि संसार में रोग है, “मैं भी एक दिन रोग ग्रस्त हो जाऊंगा"। तत्पश्चात् उन्होंने एक बूढ़े व्यक्ति को देखा और कहा, “यहाँ बुढ़ापा भी है तब मैं भी एक दिन बूढ़ा हो जाऊंगा" तत्पश्चात उन्होंने एक मृत व्यक्ति को देखा और अनुभव किया कि “यह भी जीवन का सत्य है। इसका तात्पर्य है कि मुझे भी एक दिन मरना होगा।" बुद्ध की बुद्धि इतनी अद्भुत थी कि जीवन के इन सत्यों के एक ही बार दर्शन से उन्होंने संसार त्याग करने का निश्चय कर लिया। चूँकि हमारे पास ऐसी बुद्धि नहीं है इसलिए हमें बार-बार इन सत्यों का चिन्तन करना चाहिए ताकि संसार की नीरसता के सत्य को अपने हृदय में स्थिर कर सकें।
अनासक्तिः इसका तात्पर्य संसार से विरक्ति विकसित करने से है। हमारे पास एक ही मन है और यदि हम इसे आध्यात्मिक लक्ष्य में लीन रखना चाहते हैं तब हमें इसे संसार के पदार्थों और व्यक्तियों से विमुख करना पड़ता है। साधक सांसारिक आसक्ति को भगवत्प्रीति में परिवर्तित कर देता है।
पति-पत्नी, बच्चों और घरआदि के प्रति मोह रहित होनाः ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ मन शीघ्रता से आसक्त हो जाता है। स्वाभाविक रूप से हर व्यक्ति परिवार और घर को 'मेरा' के रूप में पहचानता है। इसलिए ये मन में शीघ्र ही घर कर जाते हैं और मन को बंधन में डाल देते हैं। आसक्ति के कारण हम अपने परिवार से अच्छे व्यवहार की अपेक्षा करते हैं और जब हमारी इच्छा पूरी नहीं हो पाती तब हमें मानसिक पीड़ा होती है। हमें परिवार में एक दूसरे के साथ बिछुड़ना पड़ता है और आपस में संबंध विच्छेद भी होते रहते हैं। यदि परिवार के कुछ लोग किसी अन्य स्थान पर चले जाते हैं तब वे अस्थायी रूप से बिछड़ जाते हैं और यदि किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है तब यह वियोग स्थायी होता है। ये सारे अनुभव और ऐसी आशंकाएँ मन पर भारी बोझ डालती हैं और मन को खींच कर भगवान से दूर ले जाती हैं। इसलिए हमें असीम आनन्द प्राप्त करने हेतु पति या पत्नी, बच्चों तथा घर संपदा के विषय में नहीं उलझना चाहिए। हमें आसक्ति रहित होकर उनके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए उसी प्रकार जैसे कि एक नर्स अस्पताल में निष्काम भाव से अपना कार्य करती है या अध्यापक विद्यार्थियों के प्रति अपने धर्म का पालन करता है।
वांछित एवं अवांछित घटनाओं में समभाव रहनाः प्रिय और अप्रिय घटनाएँ उसी प्रकार घटती हैं, जैसे कि दिन और रात। ऐसा ही जीवन है। इन द्वैतों से ऊपर उठने के लिए हमें संसार के प्रति विरक्ति उत्पन्न कर आध्यात्मिकता को बढ़ाना सीखना चाहिए। हमें जीवन के परिवर्तनों में स्थिर रहने की क्षमता विकसित करनी चाहिए और सफलता में अत्यधिक प्रफुल्लित नहीं होना चाहिए।
मेरे प्रति अविरल और अनन्य भक्ति का भावः विरक्ति से तात्पर्य केवल यह है कि मन संसार की ओर नहीं जा रहा है। लेकिन जीवन का महत्त्व इससे कहींअधिक है। वास्तव में जीवन का अर्थ अभीष्ट कार्यों में व्यस्त रहना है। जीवन का लक्ष्य मन की भगवान के कमल चरणों पर अर्पित करना है। इसलिए श्रीकृष्ण ने यहाँ इस पर प्रकाश डाला है।
एकांत वास में रूचिः- सांसारिक लोगों की भांति भक्तों को अकेलापन दूर करने के लिए किसी के साथ की आवश्यकता नहीं होती। वे एकान्तवास पसंद करते हैं ताकि उनका मन भगवान में लीन हो सके। इसलिए वे स्वाभाविक रूप से एकान्त स्थानों का चयन करते हैं, जहाँ वे अधिक गहनता से स्वयं को श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान के चिन्तन में लीन कर सकें।
समाज से विमुखताः भौतिकवादी मनुष्य सांसारिक लोगों और सांसारिक कार्यकलापों में आनंद ढूँढता है। लेकिन जो दिव्य चेतना विकसित करता है, वह इन गतिविधियों से स्वाभाविक दूरी बनाए रखता है और इसलिए लौकिक समाज से विमुख रहता है। यदि भगवान की सेवार्थ संसार में सम्मिलित होना अनिवार्य होता है तब भक्त इसे सहर्ष स्वीकार करता है, और मानसिक रूप से इससे अप्रभावित रहता है।
आध्यात्मिक ज्ञान में निष्ठाः सैद्धान्तिक रूप से कुछ भी जानना पर्याप्त नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति यहजानता है कि क्रोध करना बुरा है, किन्तु फिर भी वह इसे अपने भीतर बार-बार प्रवेश करने का मार्ग प्रदान करता है। हमें अपने जीवन में आध्यात्मिक ज्ञान को क्रियान्वित करना सीखना चाहिए। केवल एक बार श्रवण करने से ऐसा तुरन्त नहीं होता। श्रवण करने के पश्चात हमें बार-बार इनका चिन्तन करना चाहिए। परम सत्य पर बार-बार विचार करने से वह आध्यात्मिक ज्ञान पुष्ट होता है जिसकी श्रीकृष्ण यहाँ चर्चा कर रहें हैं।
परम सत्य की खोजः पशु भी खाने, सोने, मैथुन क्रिया और आत्म रक्षा की गतिविधियों में संलग्न रहते हैं। भगवान ने विशेषकर मनुष्य को ज्ञान शक्ति से संपन्न किया है। हमें शारीरिक सुखों में लिप्त रहने की अपेक्षा इन प्रश्नों पर विचार करने के योग्य बनना होगा—'मैं कौन हूँ? मैं इस संसार में क्यों आया हूँ? इस संसार की रचना कैसे हुई भगवान से मेरा क्या संबंध है? मैं अपने जीवन के लक्ष्य को कैसे पूर्ण करुंगा।' सत्य की ऐसी तात्त्विक खोज हमारे विचारों को परिशुद्ध करके हमें पाशविक स्तर से ऊपर उठाती है और अध्यात्म के विज्ञान का श्रवण और अध्ययन करने के लिए प्रेरित करती है। उपर्युक्त वर्णित सभी प्रकार के गुण, प्रवृत्तियाँ, व्यवहार और मनोदृष्टि ज्ञान की ओर ले जाते हैं। इसके विपरीत घमंड, पाखण्ड, हिंसा, प्रतिशोध, छल-कपट, गुरु का अनादर, शरीर और मन की अस्वच्छता, अस्थिरता, आत्म विश्वास की कमी, इन्द्रिय विषयों की लालसा, पति, पत्नी, बच्चों और गृहस्थ जीवन में आसक्ति हमें बंधन की ओर धकेलती है। ऐसी मनोवृत्ति आत्म ज्ञान से हमें दूर कर देती है। इसलिए श्रीकृष्ण इसे अज्ञानता और अंधकार कहते हैं।
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते |
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते || 13||
अब मैं तुम्हें वह बताऊंगा जो जानने योग्य है और जिसे जान लेने के पश्चात् जीव अमरत्व प्राप्त कर लेता है। यह जेय तत्त्व अनादि ब्रह्म है जो सत् और असत् से परे है।
दिन और रात एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और एक का दूसरे के बिना कोई अस्तित्त्व नहीं होता। इसलिए जहाँ कोई रात्रि नहीं है वहाँ दिन भी नहीं हो सकता। इस कारण वहाँ केवल शाश्वत प्रकाश होगा। समान रूप से ब्रह्म के प्रकरण में 'सत्' शब्द पर्याप्त नहीं है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ब्रह्म सत् और असत् संबंधी शब्दों से परे है। ब्रह्म अपने निराकार और निर्गुण स्वरूप में ही ज्ञानियों की आराधना का केंद्र होता है। उनका साकार स्वरूप भक्तों की आराधना का आधार होता है। शरीर के भीतर निवास करने वाले स्वरूप को परमात्मा कहा जाता है। ब्रह्म की ये तीनों अभिव्यक्तियाँ एक ही हैं। 14वें अध्याय के 27वें श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है-
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च
"मैं ही निराकार ब्रह्म का आधार हूँ।" इस प्रकार से निराकार ब्रह्म और भगवान का साकार रूप दोनों एक ही परमात्मा के दो स्वरूप हैं। दोनों सर्वत्र व्याप्त हैं और इसलिए इन दोनों को सर्वव्यापक कहा जा सकता है। इनका वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण भगवान में प्रकट होने वाले विरोधाभासी गुणों की व्याख्या करते हैं।
सर्वत: पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् |
सर्वत: श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति || 14||
भगवान के हाथ, पाँव, नेत्र, सिर, तथा मुख सर्वत्र हैं। उनके कान भी सभी ओर हैं क्योंकि वे ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु में व्याप्त हैं।
प्रायः लोग तर्क देते हैं कि भगवान के हाथ, पैर, आंखें और कान नहीं होते लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं कि भगवान में यह सब कुछ है और वो भी असंख्य मात्रा में। हम भगवान की प्रभुता को अपने सीमित ज्ञान में बाँध नहीं सकते। वह ‘कर्तुम्, अकुर्तम् अन्यथा कर्तुम् समर्थ है' अर्थात् वे संभव को असंभव कर सकते हैं और असंभव को संभव में परिवर्तित कर सकते है। ऐसे शक्तिशाली भगवान के लिए यह कहना कि उनके हाथ, पाँव नहीं होते उन्हें निरीह बताने जैसा है। भगवान के अंग और इन्द्रियाँ दिव्य हैं जबकि हमारी इन्द्रियाँ तथा अंग मायिक अर्थात् भौतिक हैं। भौतिकता और दिव्यता के बीच अन्तर यह है कि हमारी इन्द्रियाँ एक ही शरीर में सीमित हैं जबकि भगवान के असंख्य हाथ, पाँव, नेत्र और कान होते हैं। हमारी इन्द्रियाँ एक स्थान पर स्थित रहती हैं और भगवान की सर्वत्र व्याप्त हैं। इसलिए संसार में जो हो रहा है, भगवान उसे देख सकते हैं और जो कभी भी कहा गया हो उसे वे सुन सकते हैं। यह इसलिए संभव होता है क्योंकि वे सृष्टि में सर्वत्र व्यापक हैं।
छान्दोग्योपनिषद् में भी वर्णन है कि “सर्वम् खल्विदम् ब्रह्म" (3.14.1) अर्थात् सर्वत्र ब्रह्म है इसलिए वह ब्रह्माण्ड में कहीं भी अर्पित किए जाने वाले भोग को स्वीकार करता है और अपने भक्तों द्वारा किसी भी स्थान पर की जाने वाली प्रार्थना को सुनता है तथा तीनों लोकों में घटित होने वाली घटनाओं का साक्षी है। यदि उसके असंख्य भक्त एक ही समय पर उसकी आराधना करते हैं तो उसे उन सबकी प्रार्थना को स्वीकार करने में भी कोई कठिनाई नहीं होती
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् |
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च || 15||
यद्यपि वे समस्त इन्द्रिय विषयों के गोचर हैं फिर भी इन्द्रिय रहित रहते हैं। वे सभी के प्रति अनासक्त होकर भी सभी जीवों के पालनकर्ता हैं। यद्यपि वे निर्गुण है फिर भी प्रकृति के तीनों गुणों के भोक्ता हैं।
यह कहने के पश्चात् कि भगवान की इन्द्रियाँ सर्वत्र हैं अब श्रीकृष्ण इसके सर्वथा विपरीत कहते हैं कि वे इन्द्रियों से रहित हैं। यदि हम इसे लौकिक तर्क द्वारा समझने का प्रयास करते हैं तब हम इसमें विरोधाभास पाएंगे। हमें यह जानना होगा कि भगवान अनंत इन्द्रियों से युक्त और इन्द्रियों से रहित दोनों एक साथ कैसे हो सकते हैं? किन्तु दिव्य भगवान के लिए लौकिक तर्क लागू नहीं होता। भगवान एक ही समय में दो विरोधाभासी गुणों के अधिष्ठाता हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण में वर्णन है-
विरुद्ध-धर्मो रूपोसावैश्वर्यात् पुरुषोत्तमः
"परमात्मा असंख्य विरोधाभासी गुणों के अधिष्ठान हैं।" इस श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान के अनंत विरोधाभासों में से कुछ का उल्लेख करते हैं। वे भौतिक इन्द्रियों से रहित हैं इसलिए यह कहना उचित है कि उनकी इन्द्रियाँ नहीं हैं। 'सर्वेन्द्रियविवर्जितम्' का अर्थ है कि वे भौतिक इन्द्रियों से रहित हैं लेकिन वे दिव्य इन्द्रियों के स्वामी हैं। वे सर्वत्र व्याप्त हैं। परिणामस्वरूप यह कहना भी उचित है कि भगवान की इन्द्रियाँ सर्वत्र हैं। 'सर्वेन्द्रियगुणाभासम्' का अर्थ है कि वे इन्द्रियों से कर्म करते हैं और इन्द्रियों के विषयों को भी ग्रहण करते हैं। इन दोनों गुणों से युक्त भगवान के स्वरूप का श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णन किया गया है।
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-3.19)
भगवान के भौतिक हाथ, पाँव, नेत्र और कान नहीं होते फिर भी वे ग्रहण करते हैं, चलते हैं, देखते हैं और सुनते हैं। आगे श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सृष्टि के रक्षक हैं पर फिर भी उससे विरक्त रहते हैं। विष्णु रूप में भगवान सारी सृष्टि का पालन पोषण करते हैं। वे सबके हृदयों में बैठकर उनके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं और उनका फल देते हैं। भगवान विष्णु के आधिपत्य में ब्रह्मा प्रकृति के नियमों का निर्माण करते हैं ताकि सृष्टि का संचालन सुचारु रूप से हो सके। विष्णु के आधिपत्य में स्वर्ग के देवता वायु, पृथ्वी, जल, वर्षा आदि की व्यवस्था करते हैं जो कि हमारे जीवन के लिए अनिवार्य है। इसलिए भगवान सबके रक्षक हैं। चूँकि वे अपने आप में पूर्ण हैं इसलिए सबसे विरक्त रहते हैं। वेदों में उन्हें आत्माराम कहकर संबोधित किया गया है जिसका अर्थ यह है कि 'वह जो अपनी आत्मा में रमण करने वाला है और जिसे कोई भी बाहर की वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ती।' माया अर्थात् प्राकृत शक्ति भगवान की दासी है और उनके सुख के लिए उनकी सेवा करती है। इसलिए वे प्रकृति के तीनों गुणों के भोक्ता हैं। साथ ही वह निर्गुण अर्थात् तीनों गुणों से परे हैं क्योंकि गुण मायिक है जबकि भगवान दिव्य हैं।
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च |
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् || 16||
भगवान सभी के भीतर एवं बाहर स्थित हैं चाहे वे चर हों या अचर। वे सूक्ष्म हैं इसलिए वे हमारी समझ से परे हैं। वे अत्यंत दूर हैं लेकिन वे सबके निकट भी हैं।
श्रीकृष्ण ने यहाँ जैसा वर्णन किया है उसी प्रकार से एक वैदिक मंत्र में भी भगवान के विशिष्ट रूप का वर्णन इस प्रकार से किया गया है-
तदेजति तन्नैजति तद्रे तद्वन्तिके तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः।
(ईशोपनिषद मंत्र-5)
"परम ब्रह्म दौड़ नहीं सकता फिर भी दौड़ता है। वह दूर है लेकिन वह निकट भी है। वह सभी के भीतर स्थित है लेकिन वह सबके बाहर भी स्थित है।" इस अध्याय के तीसरे श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह कहा था कि भगवान को जानना ही वास्तविक ज्ञान है। किन्तु यहाँ वे कहते हैं कि परमात्मा समझ से परे है। यहाँ पुनः विरोधाभास प्रतीत होता है लेकिन उनके कथन का अर्थ यह है कि भगवान को इन्द्रियों, मन और बुद्धि द्वारा नहीं जाना जा सकता। परन्तु यदि भगवान किसी पर अपनी कृपा करते हैं तब वह भाग्यशाली आत्मा उसे जान सकती है।
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् |
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च || 17||
यद्यपि भगवान सभी जीवों के बीच विभाजित प्रतीत होता है किन्तु वह अविभाज्य है। परमात्मा सबका पालनकर्ता, संहारक और सभी जीवों का जनक है।
भगवान के स्वरूप में उनकी विभिन्न शक्तियाँ सम्मिलित हैं। सभी व्यक्त और अव्यक्त पदार्थ केवल उनकी शक्ति का विस्तार हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि वे उन सब में है जो अस्तित्त्व में है। तदनुसार श्रीमद्भागवतम् में ऐसा वर्णन है-
द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च।
वासुदेवात्परो ब्रह्मन्न चान्योऽर्थोऽस्ति तत्त्वतः।।
(श्रीमद्भागवतम्-2.5.14)
सृष्टि के विभिन्न रूप-काल, कर्म, जीवों की प्रकृति और सृष्टि के सभी भौतिक पदार्थ सब स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं। सृष्टि में कुछ भी ऐसा नहीं जो उनसे विलग हो।
भगवान सृष्टि के पदार्थों के बीच विभाजित प्रतीत होते हैं लेकिन फिर भी वे अविभाजित रहते हैं। उदाहरणार्थ आकास अपने में निहित पदार्थों में विभाजित प्रतीत होता है। किन्तु वास्तव में आकास की एक ही सत्ता है जो कि सृष्टि के आरम्भ में प्रकट हुआ। पुनः जल में सूर्य का प्रतिबिंब विभक्त दिखाई देता है और जबकि सूर्य अविभाजित रहता है। जैसे समुद्र से लहरें निकलती हैं और फिर उसी में विलीन हो जाती हैं। इस प्रकार से भगवान संसार की रचना करते हैं, उसका पालन करते हैं और बाद में उसको अपने में लीन कर लेते हैं। इसलिए वे समान रूप से सबके सृजक, पालन कर्ता और संहारक के रूप में दिखाई देते हैं।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमस: परमुच्यते |
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् || 18||
वे समस्त प्रकाशमयी पदार्थों के प्रकाश स्रोत हैं, वे सभी प्रकार की अज्ञानता के अंधकार से परे हैं। वे ज्ञान हैं, वे ज्ञान का विषय हैं और ज्ञान का लक्ष्य हैं। वे सभी जीवों के हृदय में निवास करते हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण विभिन्न प्रकार से भगवान की प्रभुता को स्थापित करते हैं। संसार में विभिन्न प्रकाशमान वस्तुएँ हैं जैसे सूर्य, चन्द्रमा, आभूषण इत्यादि। यदि इन्हें स्वतंत्र छोड़ दिया जाए तब ये स्वयं अपनी शक्ति से प्रकाशित नहीं हो सकते। जब भगवान इन्हें शक्ति प्रदान करते हैं केवल तभी ये किसी को प्रकाशित कर सकते हैं। वेदों में कहा गया है
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति
(कठोपनिषद्-2.2.15)
"भगवान ही सभी वस्तुओं को प्रकाशित करते हैं। उसी के प्रकाश से सभी प्रकाशमान वस्तुएँ प्रकाश फैलाती हैं।"
सूर्यस्तपति तेजसेन्द्रः
(वेद)
"उसी के तेज से सूर्य और चन्द्रमा चमकते हैं।" दूसरे शब्दों में सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश भगवान से मांगा गया है। इनका प्रकाश किसी भी दिन लुप्त हो सकता है लेकिन भगवान का अपना दिव्य प्रकाश लुप्त नहीं हो सकता। भगवान के तीन अनूठे नाम है-वेद-कृत, वेद-वित्, वेद-वैद्य है 'वे वेद-कृत् हैं' इसका तात्पर्य है-'वे जो वेद प्रकट करते हैं', 'वे वेद-वित् हैं' जिसका अर्थ है-वह जो वेदों के ज्ञाता हैं। 'वे वेद-वेद्य हैं।' इसका अर्थ है-वे जो वेदों द्वारा जाने जा सकते हैं। इस प्रकार से श्रीकृष्ण भगवान का निरूपण ज्ञेय (जानने योग्य विषय) ज्ञानगम्य (ज्ञान का लक्ष्य) और ज्ञान (सत्य ज्ञान) के रूप में किया गया है।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति
(कठोपनिषद्-2.2.15)
"भगवान ही सभी वस्तुओं को प्रकाशित करते हैं। उसी के प्रकाश से सभी प्रकाशमान वस्तुएँ प्रकाश फैलाती हैं।"
सूर्यस्तपति तेजसेन्द्रः
(वेद)
"उसी के तेज से सूर्य और चन्द्रमा चमकते हैं।" दूसरे शब्दों में सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश भगवान से मांगा गया है। इनका प्रकाश किसी भी दिन लुप्त हो सकता है लेकिन भगवान का अपना दिव्य प्रकाश लुप्त नहीं हो सकता। भगवान के तीन अनूठे नाम है-वेद-कृत, वेद-वित्, वेद-वैद्य है 'वे वेद-कृत् हैं' इसका तात्पर्य है-'वे जो वेद प्रकट करते हैं', 'वे वेद-वित् हैं' जिसका अर्थ है-वह जो वेदों के ज्ञाता हैं। 'वे वेद-वेद्य हैं।' इसका अर्थ है-वे जो वेदों द्वारा जाने जा सकते हैं। इस प्रकार से श्रीकृष्ण भगवान का निरूपण ज्ञेय (जानने योग्य विषय) ज्ञानगम्य (ज्ञान का लक्ष्य) और ज्ञान (सत्य ज्ञान) के रूप में किया गया है।
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासत: |
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते || 19||
इस प्रकार मैंने तुम्हें कर्म क्षेत्र की प्रकृति, ज्ञान का अर्थ और ज्ञान के लक्ष्य का ज्ञान कराया है। इसे वास्तव में केवल मेरे भक्त ही पूर्णतः समझ सकते हैं और इसे जानकर वे मेरी दिव्य स्वरूप को प्राप्त होते हैं।
श्रीकृष्ण अपने कथनों का समापन इस विषय को समझने के परिणामों का उल्लेख करते हुए करते हैं। अतः एक बार पुनः वह भक्ति की श्रेष्ठता बताते हैं और कहते हैं कि केवल मेरे भक्त ही वास्तव में इस ज्ञान को समझ सकते हैं। वे जो भक्ति रहित होकर कर्म, ज्ञान, अष्टांग योग आदि का पालन करते हैं वे भगवद्गीता के अर्थ को नहीं समझ सकते। भक्ति भगवान की ओर ले जाने वाले सभी मार्गों का आवश्यक अंग हैं। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने इसका सुन्दर निरूपण इस प्रकार से किया है-
जो हरि सेवा हेतु हो, सोई कर्म बखान।
जो हरि भगति बढ़ावे, सोई समुझिय ज्ञान।।
(भक्ति शतक-66)
"भगवान की भक्ति के लिए किया गया प्रत्येक कार्य ही वास्तविक कर्म है और जो भगवान के लिए प्रेम बढ़ाता है वही सच्चा ज्ञान है।" भक्ति केवल भगवान को जानने में ही हमारी सहायता नहीं करती बल्कि यह भक्त को भगवान जैसा बना देती है। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि भक्त मेरी प्रकृति को जान लेते हैं। वैदिक ग्रंथों में भी बार-बार इस पर बल दिया गया है। वेदों में वर्णन है-
भक्तिरेवैनम् नयति भक्तिरेवैनम् पश्यति भक्तिरेवैनम्
दर्शयति भक्तिवशः पुरुषः भक्तिरेव भयसि (माथर श्रुति)
"केवल और केवल शुद्ध भक्ति ही भगवान की ओर ले जा सकती है। केवल भक्ति द्वारा ही हम भगवान को देख सकते हैं। भक्ति ही हमें भगवान के सम्मुख ले जा सकती है। भगवान क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग भक्ति के अधीन हैं इसलिए केवल भक्ति करो। आगे मुण्डकोपनिषद् में इस प्रकार से वर्णन किया गया है
उपासते पुरुषम् ये ह्याकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः (3.2.1)
"वे जो परमपुरुषोत्तम भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं और सभी लौकिक कामनाओं का त्याग कर देते हैं वे जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।" श्वेताश्वतरोपनिषद् में पुनः वर्णन किया गया है
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्था प्रकाशन्ते महात्मनः।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.23)
"वे जो धैर्यपूर्वक भगवान की भक्ति करते हैं और समान रूप से गुरु की भी भक्ति करते हैं। ऐसे संत पुरूषो के हृदय में भगवान की कृपा से वैदिक ग्रंथों का ज्ञान स्वतः प्रकट हो जाता है।" अन्य वैदिक ग्रंथ भी इसे दृढ़तापूर्वक दोहराते हैं-
न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.14.20)
श्रीकृष्ण कहते हैं, "उद्धव! मुझे अष्टांग योग, सांख्य दर्शन के अध्ययन, धार्मिक ग्रंथों के ज्ञान को पोषित करने, तपस्या और विरक्ति द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। केवल एक भक्ति द्वारा ही मुझे कोई जीत सकता है।" भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने श्लोक 8.22, 11.54 इत्यादि में इसे दोहराया है। 18वें अध्याय के 55वें श्लोक में वे कहते हैं-"केवल प्रेममयी भक्ति से ही कोई यह जान सकता है कि मैं वास्तव में क्या हूँ? भक्ति द्वारा मेरे स्वरूप को जानने के पश्चात् ही कोई मेरे दिव्य क्षेत्र में प्रवेश पा सकता है।" रामचरितमानस में भी वर्णन किया गया है-
रामहि केवल प्रेम पियारा, जान लेऊ जो जाननिहारा
"पप्रभु श्रीराम केवल प्रेम द्वारा प्राप्त होते हैं। इस सत्य को वही जानते हैं जो इसे वास्तव में जानना चाहते हैं।" इस सिद्धान्त को अन्य सम्प्रदायों में भी इसी प्रकार से महत्व दिया गया है। यहूदी टोराह में लिखा है-“तुम भगवान से प्रेम करो, पूर्ण रूप से अपने हृदय, अपनी आत्मा और अपनी पूर्ण सामर्थ्य से।" नाज़ारेथ के जीसस ने क्रिश्चियन 'न्यू टेस्टामेन्ट' में इस आज्ञा को सबसे महत्वपूर्ण आज्ञा के रूप में पालन करने के लिए दोहराया है (मार्क 12.30)। गुरुग्रंथ साहिब में वर्णन किया गया है-
हरि सम जग महान वस्तु नहीं, प्रेम पंथ सों पंथ।
सद्गुरु सम सज्जन नहीं, गीता सम नहीं ग्रंथ।।
"भगवान के समान कोई व्यक्तित्त्व नहीं है। भक्ति के मार्ग के समान कोई अन्य मार्ग नहीं है, कोई भी मनुष्य गुरु के बराबर नहीं है और किसी भी ग्रंथ की तुलना गीता से नहीं की जा सकती।"
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि |
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् || 20||
प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) दोनों अनादि हैं। शरीर में होने वाले सभी परिवर्तन और प्रकृति के तीनों गुणों की उत्पत्ति माया शक्ति से होती है।
भौतिक शक्ति को माया या प्रकृति कहा जाता है। भगवान की शक्ति होने के कारण यह तब से अस्तित्त्व में है जब से भगवान हैं। दूसरे शब्दों में आत्मा भी शाश्वत है और यहाँ इसे पुरुष कहा गया है जबकि भगवान को परम पुरुष कहा गया है। आत्मा भी भगवान की शक्ति का विस्तार है
शक्तित्वेन अंशात्वं त्यञ्जयति
(परमात्मा संदर्भ-39)
"आत्मा भगवान की जीव शक्ति का अंश है"। माया शक्ति जड़ शक्ति है और जीव शक्ति चेतन शक्ति है। यह दिव्य और अपरिवर्तनीय है। यह विभिन्न जन्मों में और जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में अपरिवर्तित रहती है। एक जन्म में शरीर जिन परिवर्तनों को जीता है वे है- अस्ति अर्थात् गर्भावस्था जायते (जन्म), वर्धते (विकास), विपरिणमते (प्रजनन), अपक्षीयते (क्षीणता) और विनश्यति (मृत्यु) है। शरीर में ये परिवर्तन माया शक्ति जिसे प्रकृति या माया कहा जाता है, द्वारा लाए जाते हैं। इससे प्रकृति के तीन गुण सत्व, रजस, और तमस और इनके अनंत प्रकार के मिश्रणों की उत्पत्ति होती है।
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते |
पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते || 21||
सृष्टि के विषय में माया शक्ति ही कारण और परिणाम के लिए उत्तरदायी है और सुख-दुःख की अनुभूति हेतु जीवात्मा को उत्तरदायी बताया जाता है।
माया शक्ति ब्रह्मा के निर्देशानुसार असंख्य तत्त्वों और प्राणियों की सृष्टि करती है। वेद में वर्णन है कि संसार में 84 लाख योनियाँ पायी जाती हैं। इन सबके रूपों का परिवर्तन द्वारा होता है इसलिए यह प्राकृत शक्ति संसार के सभी कारणों और परिणामों के लिए उत्तरदायी है। आत्मा अपने पूर्व कर्मों के अनुसार शरीर अर्थात् कर्म क्षेत्र प्राप्त करती है और यह अपनी पहचान शरीर, मन और बुद्धि के रूप में करती है इसलिए यह शरीर के सुखों की कामना करती है। जब इन्द्रियाँ अपने विषयों के संपर्क में आती है तब मन सुखद अनुभूति का बोध करता है क्योंकि आत्मा अपनी पहचान मन के रूप में करती है इसलिए वह परोक्ष रूप से इस सुखद अनुभूति का आनंद लेती है। इस प्रकार से आत्मा को मन, इन्द्रियों और बुद्धि द्वारा सुख और दुःख दोनों की अनुभूति का बोध होता है। इसकी तुलना स्वप्नावस्था से की गयी है।
एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई।
जदपि असत्य देत दुःख अहई।।
(रामचरितमानस)
जौं सपनें सिर काटइ कोई।
बिनु जागें न दूरि दुख होई।।
(रामचरितमानस)
संसार भगवान द्वारा पोषित है। यह असत्य का भ्रम उत्पन्न करता है और आत्मा को दुःख देता है। जैसे किसी का स्वप्न में सिर कट गया हो इससे उसे तब तक कष्ट होता रहता है जब तक कि स्वप्न देखने वाला वह व्यक्ति नींद से जाग नहीं जाता और स्वप्न समाप्त नहीं हो जाता। इस स्वप्नावस्था में शरीर के साथ अपनी पहचान करने वाली आत्मा को अपने पूर्व और वर्तमान के कर्मों के अनुसार सुख और दुःख की अनुभूति होती है। परिणामस्वरूप इसे दोनों प्रकार के अनुभवों के लिए उत्तरदायी माना जाता है।
पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङक्ते प्रकृतिजान्गुणान् |
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु || 22||
पुरुष अर्थात् जीव प्रकृति में स्थित हो जाता है, प्रकृति के तीनों गुणों के भोग की इच्छा करता है, उनमें आसक्त हो जाने के कारण उत्तम और अधम योनियों में जन्म लेता है।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह व्यक्त किया था कि पुरुष (आत्मा) सुख और दुःख का अनुभव करने के लिए उत्तरदायी है। अब वे बताते हैं कि ऐसा कैसे होता है? स्वयं को शरीर मान लेने से आत्मा ऐसी गतिविधियों की ओर क्रियाशील हो जाती है जो शारीरिक सुखों के भोग की ओर ले जाती है। चूंकि शरीर माया से निर्मित है इसलिए यह माया शक्ति, जो कि तीन गुणों सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से बनी है, का भोग करना चाहता है। अहंकार के कारण आत्मा स्वयं को कर्त्ता और शरीर के भोक्ता के रूप में पहचानने लगती है। शरीर, मन और बुद्धि सभी कार्य करते हैं लेकिन आत्मा उन सबके लिए उत्तरदायी ठहरायी जाती है। जैसे यदि किसी बस की दुर्घटना हो जाती है तब बस के पहियों और स्टेयरिंग को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। बस की किसी प्रकार की क्षति के लिए बस का चालक उत्तरदायी होता है। समान रूप से इन्द्रियाँ मन, बुद्धि आत्मा द्वारा क्रियाशील होते हैं तथा ये उसके प्रभुत्व में कार्य करते हैं। इस प्रकार से आत्मा शरीर द्वारा किए गए सभी कार्यकलापों के लिए कर्मफल का संचय करती है। अनन्त जन्मों के कर्मों का संचित भण्डार ही इसके बार-बार उत्तम और निम्न योनियों में जन्म का कारण बता है।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वर: |
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुष: पर: || 23||
इस शरीर में परमेश्वर भी रहता है। उसे साक्षी, अनुमति प्रदान करने वाला, सहायक, परम भोक्ता, परम नियन्ता और परमात्मा कहा जाता है।
अब तक श्रीकृष्ण द्वारा शरीर के भीतर जीवात्मा की स्थिति का वर्णन किया गया है। अब इस श्लोक में वे परमात्मा की स्थिति का वर्णन करते हैं, जो शरीर के भीतर भी निवास करता है। उन्होंने श्लोक संख्या 13.2 में भी इसी प्रकार से परमात्मा शब्द का उल्लेख किया था जब उन्होंने बताया था कि जीवात्मा केवल अपने शरीर की ज्ञाता है जबकि परमात्मा अनन्त शरीरों के ज्ञाता हैं। सभी प्राणियों में स्थित परमात्मा भगवान विष्णु के साकार रूप में भी प्रकट होते हैं। विष्णु के परमात्मा संसार के पोषण के लिए उत्तरदायी हैं। भगवान विष्णु क्षीर सागर में साकार रूप में रहते हैं। वह अपना विस्तार कर सभी प्राणियों के हृदय में परमात्मा के रूप में वास करते हैं। सभी के हृदय में बैठकर वे सबके कर्मों को देखते हैं और उनके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं तथा उचित समय पर उनका फल प्रदान करते हैं। वे प्रत्येक जन्म में जीवात्मा को चाहे जो भी शरीर मिले, सदैव उसके साथ रहते हैं। वे सर्प, सुअर या कीड़े मकोडों के शरीर में रहने में कोई संकोच नहीं करते। मुंडकोपनिषद् में वर्णन है-
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।।
समाने वृक्षे पुरूषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः
(मुंडकोपनिषद्-3.1.1-2)
"शरीर रूपी वृक्ष के घोंसले में दो पक्षी रहते हैं। वे आत्मा और परमात्मा हैं। जीवात्मा परमात्मा की ओर पीठ किए हुए है और वृक्ष के फलों को भोगने में मग्न हैं। जब मीठे फल आते हैं तो यह सुख का अनुभव करती है और जब फल कड़वे आते हैं तो तब दुःखी हो जाती है। परमात्मा जीवात्मा का मित्र अवश्य है लेकिन वह हस्तक्षेप नहीं करता वह केवल बैठकर देखता रहता है। यदि जीवात्मा परमात्मा सम्मुख हो जाती है तब उसके सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं।" जीवात्मा भगवान के सम्मुख होने या विमुख रहने के लिए स्वतंत्र है। इस स्वतंत्रता के अनुचित प्रयोग से जीवात्मा बंधन में फंस जाती है जबकि इसका सदुपयोग सीखकर यह भगवान की नित्य सेवा प्राप्त कर सकती है और असीम आनन्द पा सकती है।
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणै: सह |
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते || 24||
वे जो परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति के सत्य और तीनों गुणों की प्रकृति को समझ लेते हैं वे पुनः जन्म नहीं लेते। उनकी वर्तमान स्थिति चाहे जैसी भी हो, वे मुक्त हो जाते हैं।
अज्ञानता आत्मा को अधोगति की ओर ले जाती है। अपनी दिव्य पहचान को भूल कर यह भौतिक चेतना में डूब जाती है। इसलिए अपनी वर्तमान स्थिति से अपना पुनरूत्थान करने के लिए इसका जागना आवश्यक है। श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी ऐसा वर्णन किया गया है कि सृष्टि में तीन तत्त्व हैं
संयुक्तमेतत् क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः।
अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावात् ज्ञात्वा देवम् मुच्यते सर्वपाशैः।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-1.8)
सृष्टि में तीन तत्त्व विद्यमान हैं। सदैव परिवर्तनशील मायिक जगत्, अपरिवर्तनशील आत्मा और दोनों का स्वामी परमात्मा। इन तत्त्वों की अज्ञानता जीवात्मा के बंधन का कारण है जबकि इनका ज्ञान माया की बेड़ियों को काट कर उससे अलग करने में सहायता करता है। श्रीकृष्ण जिस ज्ञान के संबंध में चर्चा कर रहे हैं, वह कोई कोरा पुस्तकीय ज्ञान नहीं है बल्कि सिद्ध ज्ञान है। इस ज्ञान का बोध तभी होता है जब हम पहले ही इन तीन तत्त्वों का सैद्धान्तिक ज्ञान अपने गुरु और धर्म ग्रंथों से प्राप्त कर लें और तत्पश्चात् साधना में संलग्न हों। श्रीकृष्ण अब अगले श्लोक में तीन साधना विधियों का वर्णन करेंगे।
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना |
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे || 25||
कुछ लोग ध्यान द्वारा अपने हृदय में बैठे परमात्मा को देखते हैं और कुछ लोग ज्ञान के संवर्धन द्वारा जबकि कुछ अन्य लोग कर्म योग द्वारा देखने का प्रयत्न करते हैं।
विविधता भगवान की सृष्टि की विशेषता है। वृक्ष के दो पत्ते भी एक समान नहीं होते। उसी प्रकार से किन्हीं दो मनुष्यों के अंगुलियों के निशान भी एक जैसे नहीं होते। समान रूप से सभी जीवात्माएँ भी अद्वितीय हैं और उनके विशिष्ट लक्षण हैं जिन्हे उन्होंने अपनी जन्म मृत्यु की अनूठी यात्राओं में प्राप्त किया है। इसी प्रकार से आध्यात्मिक क्षेत्र में भी सभी लोग एक प्रकार के साधाना की ओर आकर्षित नहीं होते। श्रीमद्भगवद्गीता और अन्य धार्मिक ग्रंथों की सुन्दरता यह है कि ये मनुष्यों को मानव जाति में निहित विविध ताओं का बोध कराते हैं और इन्हें अपने उपदेशों में समायोजित करते हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण बताते हैं कि कुछ साधक अपने मन से जूझते हैं और इसे अपने वश में लाने का प्रयत्न करते रहते हैं। वे अपने हृदय में स्थित भगवान का ध्यान करने की ओर आकर्षित होते हैं। जब उनका मन उनके भीतर स्थित भगवान में स्थिर हो जाता है तब वे अपने अनंत आध्यात्मिक आनंद से सराबोर हो जाते हैं। अन्य लोगों को अपनी बुद्धि का प्रयोग करने में संतोष प्राप्त होता है। आत्मा, शरीर मन, बुद्धि और अहंकार में भेद का विचार उन्हें अत्यंत प्रभावित करता है। वे श्रवण, मनन और निध्यासन की प्रक्रिया द्वारा और अधिक विश्वास से आत्मा, परमात्मा और माया के संबंध में ज्ञान वृद्धि करते हैं। जबकि कुछ लोग जब किसी कार्य में लीन होते हैं तो वे भगवान द्वारा उन्हें प्रदत्त गुणों और योग्यताओं को उसकी सेवा में करने का प्रयास करते हैं। अपनी श्वास के अंतिम क्षण का भी उपयोग भगवान की सेवा में अर्पित करने से अधिक उन्हें कुछ भी संतुष्ट नहीं कर सकता। इस प्रकार से सभी साधक पनी शक्तियों का उपयोग भगवान की अनुभूति के लिए करते हैं। ज्ञान, कर्म आदि की सफलता तभी होती है जब वह भगवान की भक्ति से युक्त और उनके सुख के लिए हो।
श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है:
सा विद्या तन्मतिर्यया
(4.29.49)
"सच्चा ज्ञान वह है जो भगवान के लिए प्रेम उत्पन्न करे। कर्म की सार्थकता तभी होती है जब यह भगवान के सुख के लिए किया जाता है।"
अन्ये त्वेवमजानन्त: श्रुत्वान्येभ्य उपासते |
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणा: || 26||
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो आध्यात्मिक मार्ग से अनभिज्ञ होते हैं लेकिन वे संत पुरुषों से श्रवण कर भगवान की आराधना करने लगते हैं। वे भी धीरे-धीरे जन्म और मृत्यु के सागर को पार कर लेते हैं।
संतों से भक्ति विषय का श्रवण करने वाले पुरुष भी धीरे-धीरे जन्म और मृत्यु के समुद्र को पार कर सकते हैं। कुछ लोग साधना पद्धति से अनभिज्ञ होते हैं लेकिन वे दूसरों के द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान का श्रवण करते हैं और फिर आध्यात्मिक मार्ग की ओर आकर्षित होते हैं। वास्तव में, अधिकतर वही लोग आध्यात्मिक मार्ग की ओर अग्रसर हुए जिन्हें आध्यात्मिक ज्ञान की औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं थी। लेकिन किसी मध्यम से उन्हें जब इस संबंध में कुछ पढ़ने और श्रवण करने का अवसर मिला तब उनमें भगवान की भक्ति के प्रति रुचि उत्पन्न हुई और उन्होंने अपनी आध्यात्मिक यात्रा प्रारम्भ की।
वैदिक परम्परा में संतों की वाणी के श्रवण को आध्यात्मिक कल्याण के उपाय के रूप में विशेष महत्त्व दिया गया है। श्रीमद्भागवत् में परीक्षित ने शुकदेव से प्रश्न किया कि हम अपने हृदय को कैसे शुद्ध कर सकते हैं? जैसे कि काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या द्वेष आदि। शुकदेव उत्तर देते हैं-
श्रृण्वतां स्वकथां कृष्ण:पुण्यश्रवणकीर्तनः।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-1.2.17)
"परीक्षित! संतों से केवल भगवान के दिव्य नामों, रूपों, लीलाओं, गुणों, धामों और उनके संतों का श्रवण करो। इससे तुम्हारे हृदय में विद्यमान अनंत जन्मों की मैल स्वतः नष्ट हो जाएगी।" जब हम किसी सही स्रोत से श्रवण करते हैं तब हम प्रामाणिक ज्ञान प्राप्त करते हैं और जिस संत से हम यह श्रवण करते हैं उसके प्रति भी हमारे भीतर अटूट श्रद्धा उत्पन्न होने लगती है। संतों का श्रवण करना श्रद्धा उत्पन्न करने का सरल मार्ग है। आध्यात्मिक साधना हेतु संतों से मिलने की उत्सुकता भी हमें निर्मल करती है। भक्ति के लिए उत्साह ऐसा बल प्रदान करती है जो साधकों की लौकिक चेतना को समाप्त करने और साधना के मार्गकी बाधाओं को दूर करने में सहायता करती है। श्रद्धा और उत्साह ऐसी आधारशिलाएँ हैं जिन पर भक्ति रूपी भवन टिका रहता है।
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्वं स्थावरजङ्गमम् |
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ || 27||
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ! चर और अचर जिनका अस्तित्व तुम्हें दिखाई दे रहा है वह कर्म क्षेत्र और क्षेत्र के ज्ञाता का संयोग मात्र है।
श्रीकृष्ण ने यहाँ 'यावत् किञ्चित्' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ है 'जो भी कुछ अस्तित्त्व में हैं' चाहे वह विशाल ही या अति सूक्ष्म हो। सबका जन्म 'क्षेत्रज्ञ' अर्थात् शरीर के ज्ञाता और क्षेत्र अर्थात् कर्म क्षेत्र के संयोग से होता है। अब्राहमिक परम्परा मानव शरीर में आत्मा के अस्तित्त्व को स्वीकार करती है किन्तु अन्य प्राणियों में आत्मा के अस्तित्त्व को स्वीकार नहीं करती। यह विचारधारा अन्य जीवों के प्रति हिंसा को बढ़ावा देती है। किन्तु वैदिक दर्शन में यह कहा गया है कि जहाँ भी चेतना है वहाँ आत्मा रहती है। इसके बिना कुछ भी चेतन नहीं रह सकता। 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में सर जी. सी. बोस ने एक खोज द्वारा यह सिद्ध किया था कि पेड़-पौधे भी भावनाओं का अनुभव करते हैं और वे भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। इनके अनुसंधान ने सिद्ध किया कि मधुर संगीत पौधों के विकास में वृद्धि कर सकता है। जब एक शिकारी वृक्ष पर बैठी चिड़िया को मारता है तब वृक्ष में होने वाला कम्पन्न यह दर्शाता है कि वृक्ष चिड़िया के लिए दुःखी होता है। जब किसी उद्यान का माली उद्यान में प्रवेश करता है तब पेड़ पौधे हर्षित होने लगते हैं। पेड़ के कम्पनों में होने वाले परिवर्तनों से ज्ञात होता है कि यह चैतन्य है और यह भावनाओं का अनुभव करता है। ये सब टिप्पणियाँ यहाँ श्रीकृष्ण के इस कथन की पुष्टि करती हैं कि सभी प्राणियों में चेतना होती है तथा वे सभी आत्मा और शरीर का संयोगरूप हैं।
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् |
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति || 28||
जो परमात्मा को सभी जीवों में आत्मा के साथ देखता है और जो इस नश्वर शरीर में दोनों को अविनाशी समझता है, केवल वही वास्तव में देखता है।।
श्रीकृष्ण ने पहले 'यः पश्यति स पश्यति' का प्रयोग किया था जिसका अर्थ है कि केवल वही वास्तव में देखता है जो ऐसा देखता है। अब वे कहते हैं कि शरीर के भीतर केवल आत्मा के अस्तित्त्व को देखना ही पर्याप्त नहीं है। भगवान परमात्मा के रूप में सभी शरीर में निवास करते हैं। सभी जीवों के हृदय में परमात्मा स्थित हैं, इसका उल्लेख पहले भी इस अध्याय के 23वें श्लोक में किया गया है। इसके अतिरिक्त भगवद्गीता के 10वें अध्याय के 20वें और 18वें अध्याय के 61वें श्लोक में और उसी प्रकार से अन्य वैदिक ग्रंथों में भी इस का वर्णन किया गया है।
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.11)
"भगवान एक है, वह सभी के हृदयों में रहता है, वह सर्वव्यापी है। वह आत्माओं की परम आत्मा है।"
भवान् हि सर्वभूतानामात्मा साक्षी स्वदृग् विभो
(श्रीमद्भागवतम्-10.86.31)
"भगवान सभी के भीतर साक्षी और स्वामी के रूप में निवास करता है।"
राम ब्रह्म चिन्मय अबिनासी। सर्व रहित सब उर पुर बासी।।
(रामचरितमानस)
"भगवान श्रीराम अविनाशी और सबसे परे हैं। वह सभी जीवों के हृदय में निवास करते हैं।" परमात्मा सदैव जीवात्मा के साथ रहते हैं। श्रीकृष्ण अब यह व्यक्त करेंगे कि सभी जीवों में भगवान की उपस्थिति का अनुभव करने से साधक के जीवन में किस प्रकार परिवर्तन होता है।
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् |
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् || 29||
वे जो भगवान को सर्वत्र और सभी जीवों में समान रूप से स्थित देखते हैं वे अपने मन से स्वयं की हानि नहीं करते। इस प्रकार से वे अपने परम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।
मन की प्रकृति सुख की कामना करना है और माया की उपज होने के कारण सहज रूप से इसकी रूचि सांसारिक सुखों में होती है। अगर हम अपने मन की इच्छाओं की पूर्ति करते हैं तब हम गहन लौकिक चेतनाओं में फँस जाते हैं। इस अधोपतन को रोकने के लिए बुद्धि की सहायता से मन पर अंकुश लगाना पड़ता है। इसके लिए बुद्धि को सच्चे ज्ञान से युक्त करना आवश्यक है।
वे लोग जो भगवान को सभी जीवों में प्रकट परमात्मा के रूप में देखना सीख लेते हैं और इस सत्य ज्ञान से जीवन निर्वाह करते हैं, वे फिर कभी दूसरों से व्यक्तिगत लाभ और सुख की अपेक्षा नहीं करते। वे न तो दूसरे के अच्छे कार्यों के कारण उनके प्रति आसक्त होते हैं और न ही उनके द्वारा स्वयं को किसी भी प्रकार की क्षति पहुँचाने के कारण उनसे द्वेष करते हैं। अपितु इसके विपरीत वे सभी को भगवान के अंश के रूप में देखते हैं और अन्य लोगों का सम्मान और उनकी सेवा करने का मनोभाव बनाए रखते हैं। जब उन्हें अपने भीतर भगवान की उपस्थिति का बोध हो जाता है तब वे स्वाभाविक रूप से दुर्व्यवहार, धोखा-धड़ी, और दूसरों को अपमानित करने जैसे विकारों से दूर रहते हैं। उनके लिए राष्ट्रीयता, योनि, जाति, लिंगभेद, पद प्रतिष्ठा, रंग भेद, अमीर-गरीब आदि सबका अन्तर व्यर्थ हो जाता है। इस प्रकार से वे सभी जीवों में भगवान की उपस्थिति का बोध करते हुए अपने मन को शुद्ध करते हैं और अंततः परम लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं।
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वश: |
य: पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति || 30||
जो यह समझ लेते हैं कि शरीर के समस्त कार्य माया द्वारा सम्पन्न होते हैं तथा देहधारी आत्मा वास्तव में कुछ नहीं करती। केवल वही वास्तव में देखते हैं।
तंत्र भागवत में वर्णन है-“अहड्कारात् तु संसारो भवेत् जीवस्य न स्वतः" अर्थात् शरीर होने का अहंकार और कर्ता होने का अभिमान आत्मा को जीवन और मृत्यु के संसार में फंसा लेता है। अहंकार के कारण हम अपनी पहचान शरीर के रूप में करते हैं और हम शरीर के कार्यों को आत्मा पर आरोपित करते हैं तथा यह सोचते हैं कि 'मैं यह कर रहा हूँ। लेकिन महापुरुष को सदा ही यह बोध होता है कि खाने-पीने, वार्तालाप इत्यादि कार्य केवल शरीर द्वारा सम्पन्न किए जाते हैं। किन्तु फिर भी आत्मा शरीर द्वारा किए गए कार्यों के उत्तरदायित्व से विलग नहीं रह सकती। जिस प्रकार से कोई राष्ट्राध्यक्ष स्वयं न लड़ते हुए देश द्वारा लड़े जाने वाले युद्ध के निर्णय के लिए उत्तरदायी होता है। उसी प्रकार से आत्मा भी जीवित प्राणियों के कार्यों के लिए उत्तरदायी होती है भले ही वे कार्य शरीर, मन और बुद्धि द्वारा सम्पन्न किए गए हों। इसी कारण से साधक को इन दोनों पक्षों को मन में अवश्य ही रखना चाहिए। महर्षि वसिष्ठ ने राम को यह उपदेश दिया था, “कर्ता बहिरकर्ता अंतर्लोके विहर राघव (योग वासिष्ठ)" अर्थात् राम! कर्म करते समय बाह्य रूप से ऐसा परिश्रम करो जैसा कि इसका परिणाम तुम पर निर्भर हो लेकिन आंतरिक दृष्टि से स्वयं को अकर्ता समझो।
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति |
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा || 31||
जब वे सभी प्राणियों को एक ही परमात्मा में स्थित देखते हैं और उन सबको उसी से उत्पन्न समझते हैं तब वे ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करते हैं।
महासागर स्वयं को कई रूपों में प्रकट करता है, जैसे कि लहर, झाग, ज्वार, छोटी लहर, इत्यादि। जब कोई इन सबको प्रथम बार देखता है तब वह यह निष्कर्ष निकालता है कि इन सब में भिन्नता है लेकिन अगर किसी को महासागरीय विषयों का ज्ञान होता है तब वह इन सभी विविधताओं में निहित एकत्व को देखता है। समान रूप से ब्रह्माण्ड में कई योनियाँ हैं-अणु से लेकर (अमीबा) तक और अति शक्तिशाली स्वर्ग के देवता तक। ये सब एक ही परमात्मा से जन्मे हैं। आत्मा भगवान का अंश है और यह शरीर में वास करती है जो माया शक्ति से निर्मित है। योनियों में भिन्नता आत्मा के कारण से नहीं होती अपितु माया शक्ति द्वारा प्रकट विभिन्न शरीरों के कारण होती है। जन्म के समय सभी जीवों के शरीरों की रचना प्राकृत शक्ति द्वारा होती है और मृत्यु होने पर उनके शरीर उसी में विलीन हो जाते हैं। जब हम सभी प्राणियों को एक ही माया शक्ति से जन्मे हुए देखते हैं तब हमें इन विविधताओं के पीछे एकत्व की अनुभूति होती है। चूँकि प्रकृति भगवान की शक्ति है, यह ज्ञान हमें सभी अस्तित्त्वों में व्याप्त एक परमात्मा को देखने में समर्थ बनाता है। यह ब्रह्म की अनुभूति की ओर ले जाता है।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय: |
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते || 32||
परमात्मा अविनाशी है और इसका कोई आदि नहीं है और यह प्रकृति के गुणों से रहित है। हे कुन्ती पुत्र! यद्यपि यह शरीर में स्थित है किन्तु यह न तो कर्म करता है और न ही माया शक्ति से दूषित होता है।
भगवान सभी प्राणियों के शरीर में परमात्मा के रूप में निवास करते हैं। उनकी कभी शरीर के रूप में पहचान नहीं होती और न ही वे इसके अवस्थाओं से प्रभावित होते हैं। भौतिक शरीर में उनकी उपस्थिति उन्हें भौतिक नहीं बनाती और न ही वे कर्म के नियम तथा जन्म-मृत्यु के कालचक्र के अधीन होते हैं। जबकि दूसरी ओर आत्मा इन सबका अनुभव करती है।
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते |
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते || 33||
आकाश सबको अपने में धारण कर लेता है लेकिन सूक्ष्म होने के कारण जिसे यह धारण किए रहता है उसमें लिप्त नहीं होता। इसी प्रकार से यद्यपि आत्मा चेतना के रूप में पूरे शरीर में व्याप्त रहती है फिर भी आत्मा शरीर के धर्म से प्रभावित नहीं होती।
जीवात्मा अहंकार के कारण स्वयं की पहचान शरीर के रूप में करते हुए निद्रा, स्वाद, भ्रमण, थकावट और ताजगी आदि का अनुभव करती है। अब कोई यह पूछ सकता है कि शरीर में होने वाले परिवर्तन उसमें रहने वाली आत्मा को दूषित क्यों नहीं करते? श्रीकृष्ण इसे आकाश के उदाहरण के साथ स्पष्ट करते हैं। आकाश सब कुछ धारण करता है किंतु फिर भी उससे अप्रभावित रहता है क्योंकि यह धारण किए जाने वाले स्थूल पदार्थ से सूक्ष्म है। समान रूप से आत्मा सूक्ष्म है। भौतिक शरीर से जुड़ने के पश्चात् भी इसकी दिव्यता अक्षय रहती है।
यथा प्रकाशयत्येक: कृत्स्नं लोकमिमं रवि: |
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत || 34||
जिस प्रकार से एक सूर्य समस्त ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है उसी प्रकार से आत्मा पूरे शरीर को प्रकाशित करती है।
यद्यपि आत्मा जिस शरीर में रहती है उसे ऊर्जा प्रदान करती है फिर भी वह स्वयं अत्यंत सूक्ष्म है। "एषोऽणुरात्मा" (मुंडकोपनिषद्-3.1.9) “आत्मा का आकार अत्यंत अणु है।" श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णन ह
बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।
भागोजीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-5.9)
"यदि हम बाल के अग्र भाग के सौ टुकड़े करें और फिर इनमें से एक टुकड़े के पुनः सौ टुकड़े करें तब हम आत्मा के आकार को समझ सकते हैं। इनकी संख्या असंख्य है।" यह एक प्रकार से आत्मा की सूक्ष्मता को व्यक्त करने की विधि है। सूक्ष्म आत्मा उन शरीरों को कैसे गतिशील रखती है जो इतनी विशाल है। श्रीकृष्ण सूर्य की उपमा देकर इसे स्पष्ट करते हैं। यद्यपि सूर्य एक ही स्थान पर स्थिर रहता है किंतु वह सम्पूर्ण सौरमण्डल को अपने प्रकाश से प्रकाशित करता है। वेदांत दर्शन में भी ऐसा वर्णन किया गया ह
गुणाद्वा लोकवत्
(वेदांत दर्शन-2.3.25)
"हृदय में स्थित आत्मा समस्त क्षेत्र को चेतना प्रदान करती है।"
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा |
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् || 35||
जो लोग ज्ञान चक्षुओं से शरीर और शरीर के ज्ञाता के बीच के अन्तर और माया शक्ति के बन्धनों से मुक्त होने की विधि जान लेते हैं, वे परम लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं।
अब तक श्रीकृष्ण ने जो कुछ कहा उसका उपसंहार करते हुए वे क्षेत्र और क्षेत्र के ज्ञाता के विषय का समापन करते हैं। प्रकृति अर्थात् क्षेत्र (कर्म क्षेत्र) और आत्मा अर्थात् क्षेत्रज्ञ (क्षेत्र का ज्ञाता) के अंतर को जानना ही वास्तविक ज्ञान है। जो इस विवेक ज्ञान से सम्पन्न हो जाते हैं, वे स्वयं को भौतिक शरीर के रूप में नहीं देखते। वे अपनी पहचान भगवान के अणु अंश के रूप में करते हैं, इसलिए वे आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर चलते हैं और माया शक्ति के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
।। श्रीमद्भगवत गीता त्रयोदश अध्याय सम्पूर्ण हुआ ।।
Bhagavad Geeta Chapter 12
kathaShrijirasik
अध्याय बारह: भक्तियोग
भक्ति का विज्ञान
इस अध्याय में के अन्य मार्गों की अपेक्षा भक्ति मार्ग की सर्वोत्कृष्टता पर प्रकाश डाला गया है। इसका प्रारम्भ अर्जुन द्वारा श्रीकृष्ण से पूछे गए इस प्रश्न से होता है कि वह योग में किन्हें पूर्ण माने, क्या जो भगवान की साकार रूप में भक्ति करते हैं या वे जो निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं? इसका उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि दोनों मार्ग भगवत्प्राप्ति की ओर ले जाते हैं किन्तु वे उनकी साकार रूप की पूजा करने वाले भक्त का श्रेष्ठ योगी के रूप में सम्मान करते हैं। वे स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि मायाबद्ध जीवों के लिए उनके निराकार रूप की आराधना करना अत्यंत कठिन है जबकि साकार रूप की आराधना करने वाले भक्त भगवान के चिंतन में लीन हो जाते हैं और उनके प्रत्येक कर्म भगवान को समर्पित होते हैं। तथा वे शीघ्रता से जीवन मरण के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी बुद्धि उन्हें समर्पित करने और अपने मन को केवल उनकी प्रेममयी भक्ति में स्थिर करने के लिए कहते हैं।
किन्तु ऐसा प्रेम प्रायः सरलतया लभ्य नहीं होता। इसलिए श्रीकृष्ण अन्य विकल्प देते हुए कहते हैं कि यदि अर्जुन अपने मन को पूर्ण रूप से भगवान में एकाग्र करने की अवस्था प्राप्त नहीं कर सकता तब भी उसे निरन्तर अभ्यास द्वारा पूर्णता की अवस्था को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। भक्ति को निरन्तर प्रयास द्वारा ही पोषित किया जा सकता है। यदि अर्जुन इतना भी नहीं कर सकता तब भी उसे पराजय स्वीकार नहीं करनी चाहिए अपितु इसके विपरीत उसे केवल श्रीकृष्ण के सुख के लिए अपने कर्त्तव्यों का पालन करने का अभ्यास करना चाहिए। यदि उसके लिए ऐसा करना भी संभव नहीं है तब उसे अपने कर्म फलों का त्याग कर देना चाहिए और अपनी आत्मा में स्थित हो जाना चाहिए। अब श्रीकृष्ण बताते हैं कि लौकिक कर्मों से श्रेष्ठ ज्ञान है और ज्ञान अर्जन से श्रेष्ठ ध्यान है। और ध्यान से श्रेष्ठ कर्म फलों का त्याग करना है, जो तुरन्त परम शांति प्राप्त की ओर ले जाता है। इस अध्याय के शेष श्लोकों में उनके प्रिय भक्तों के अद्भुत गुणों का वर्णन किया गया है जो भगवान को अत्यन्त प्रिय हैं।
अर्जुन उवाच |
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते |
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमा: || 1||
अर्जुन ने पूछा-आपके साकार रूप की आराधना करने वालों तथा आपके अव्यक्त निराकार रूप की आराधना करने वालों में से आप किसे श्रेष्ठ मानते हैं?
पिछले अध्याय में अर्जुन ने भगवान के विराट रूप को देखा था जिसमें समस्त ब्रह्माण्ड समाया हुआ था। उसे देखकर अब अर्जुन भगवान के गुण, विशेषता और लीलाओं सहित उनके साकार रूप को पसंद करता है। इसलिए वह यह जानने का उत्सुक है कि साकार रूप में भगवान की भक्ति करने वाले भक्त या वे जो उनके निराकार अव्यक्त ब्रह्म रूप की उपासना करते हैं, में से पूर्ण योगी कौन है?
अर्जुन का प्रश्न पुनः यह पुष्ट करता है कि भगवान के दो रूप हैं-एक सर्वव्यापक निराकार ब्रह्म रूप और दूसरा उनका साकार रूप। जो यह कहते हैं कि भगवान साकार रूप धारण नहीं कर सकते वे भगवान को अपूर्ण सिद्ध करते हैं और इसी प्रकार से जो यह कहते हैं कि भगवान केवल साकार रूप में विद्यमान रहते हैं वे भी भगवान को अपूर्ण ही सिद्ध करते हैं। भगवान पूर्ण और सिद्ध हैं इसलिए वे साकार और निराकार दोनों रूपों में रहते हैं। हम जीवात्माओं के व्यक्तित्त्व के भी दो पहलू हैं। आत्मा निराकार है फिर भी यह अनंत बार शरीर धारण करती है। यदि जीवात्माओं के दो स्वरूप संभव हैं तब फिर सर्वशक्तिमान परमात्मा अपनी इच्छानुसार जब चाहे साकार रूप धारण क्यों नहीं कर सकता? यहाँ तक कि ज्ञान योग के प्रबल समर्थक शंकराचार्य ने भी कहा है-
मूर्तम् चैवामूर्तम् द्वावेव ब्रह्मणो रूपे, इत्युपनिषत् तयोर्वा द्वौ
भक्तौ भगवदुपदिष्टौ, क्लेशादक्लेशाद्वा मुक्तिस्यादेरतयोर्मध्ये
"भगवान के साकार और निराकार दोनों रूप हैं। आध्यात्मिक मार्ग के साधक भी दो प्रकार के होते हैं-एक निराकार ब्रह्म के उपासक और दूसरे साकार रूप की आराधना करने वाले किन्तु निराकार रूप की उपासना अत्यंत कठिन है।"
श्रीभगवानुवाच |
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते |
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता: || 2||
भगवान ने कहा-वे जो अपने मन को मुझमें स्थिर करते हैं और सदैव पूर्ण श्रद्धा के साथ मेरी भक्ति में तल्लीन रहते हैं, मैं उन्हें सर्वश्रेष्ठ योगी मानता हूँ।
भगवान की निकटता अनेक प्रकार से अनुभव की जा सकती है। इसे एक उदाहरण से समझें। मान लो कि आप एक रेलवे प्लेटफार्म पर खड़े हैं। एक ट्रेन चमकती हुई हेडलाइट के साथ दूर से आ रही हैं। पहले आपको ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे कोई रोशनी चली आ रही है। जब ट्रेन कुछ समीप पहुंचती है तब तुम रोशनी के साथ ट्रेन की धुँधली छवि भी देखते हो। अंततः ट्रेन जब तुम्हारे सामने प्लेटफार्म पर आकर खड़ी हो जाती है तब तुम्हें अनुभव होता है-'ओह, यह तो ट्रेन है और मैं इसके भीतर लोगों को बैठे हुए देख सकता हूँ। 'यही ट्रेन दूर से एक रोशनी के समान दिखाई दे रही थी। जब यह कुछ समीप आई तो रोशनी के साथ एक आकृति दिखाई दी। अंत मे जब यह एकदम समीप आयी तब तुम्हें बोध हुआ कि यह ट्रेन है। यह वही ट्रेन थी लेकिन इसके समीप आते-आते तुम्हें इसके विभिन्न गुणों जैसे आकार, रंग, यात्री, कम्पार्टमेन्ट, इसके गेट और खिड़कियों का बोध होने लगा।" समान रूप से भगवान पूर्ण हैं और अनंत शक्तियों के स्वामी हैं। उनका स्वरूप दिव्य नामों, रूपों, लीलाओं, गुणों, संतों और लोकों से परिपूर्ण है किन्तु उनकी निकटता विभिन्न स्तरों पर अनुभव होती है जैसे ब्रह्म (निराकार रूप में भगवान की सर्वव्यापक अभिव्यक्ति) परमात्मा (सभी जीवों के हृदय में स्थित) और भगवान (साकार रूप) जिसके द्वारा वह पृथ्वी पर अवतार लेते हैं। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन किया गया है-
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञान मद्वयम्।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ।।
(श्रीमद्भागवतम्-1.2.11)
"सत्य को जानने वाले कहते हैं कि एक ही परम सत्ता संसार में तीन प्रकार से अर्थात् ब्रह्म, परमात्मा और भगवान के रूप में प्रकट होती है।" ये तीनों अलग-अलग नहीं है अपितु एक ही सर्वशक्तिमान की तीन भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। ये जल, भाप और बर्फ के समान हैं जो सब एक ही तत्त्व-हाईड्रोजन डाईआक्साइड के कण हैं लेकिन इनके भौतिक रूप अलग विभिन्न होते हैं। अगर कोई प्यासा व्यक्ति जल मांगता है तब यदि हम उसे बर्फ दें तो उससे उसकी प्यास नहीं बुझेगी। बर्फ और जल दोनों एक ही तत्त्व हैं किन्तु उनके भौतिक गुण भिन्न-भिन्न हैं। इस प्रकार ब्रह्म, परमात्मा और भगवान सभी एक ही परम प्रभु की अभिव्यक्तियाँ हैं किन्तु उनके गुण विभिन्न हैं। ब्रह्म भगवान का सर्वव्यापक रूप है जो सर्वत्र विद्यमान है। श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णन है-
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.11)
अनंत ब्रह्माण्डों में एक ही परम सत्ता है। वह सभी वस्तुओं और सभी जीवों में स्थित है। भगवान के इस सर्वव्यापक रूप को ब्रह्म कहते हैं। यह सत्-चित्-आनन्द अर्थात् नित्य, सर्वज्ञ और आनन्द स्वरूप है। अपने इस रूप में भगवान अनंत गुणों, अनंत सौंदर्य और मधुर लीलाओं को व्यक्त नहीं करते। वह एक दिव्य ज्योति है जो कि निर्गुण निर्विशेष और निराकार है। जो ज्ञान मार्ग का अनुसरण करते हैं वे भगवान के इसी स्वरूप की उपासना करते हैं।
परमात्माः यह भगवान का वह स्वरूप है जो सबके हृदय में स्थित है। श्लोक 18.61 में श्रीकृष्ण कहते हैं-हे अर्जुन! परमात्मा सभी जीवों के हृदयों में वास करता है। उनके कर्मों के अनुसार वह आत्माओं को निर्देश देता है जो माया शक्ति से निर्मित यंत्र पर सवार रहती हैं। हमारे हृदय में बैठकर भगवान हमारे सभी कर्मों को देखते हैं और उनका लेखा-जोखा रखते हैं और उचित समय पर उन कर्मों का फल देते हैं। हम जो कर्म करते हैं उसे भूल जाते हैं। भगवान हमारे सभी विचारों और कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं। उन्हें हमारे सभी विचारों, शब्दों, कार्यों और हमारे सभी जन्मों का स्मरण रहता है। न केवल इस जन्म में अपितु अनंत जन्मों में हम जहाँ भी रहे और हमने जो भी शरीर पाया वे सदैव हमारे साथ ही रहे। वे हमारे ऐसे मित्र हैं जो क्षण भर को भी हमारा साथ नहीं छोड़ते। हमारे हृदय में स्थित भगवान का यह स्वरूप परमात्मा है।
पतंजलि ने अपने योग दर्शन में जिस अष्टांग योग का उल्लेख किया है उसका उद्देश्य अपने भीतर स्थित भगवान की अनुभूति का प्रयास करना है और यह परमात्मा की ओर ले जाता है। जिस प्रकार ट्रेन दूर से एक रोशनी के रूप में दिखाई देती है और समीप आने पर वह झिलमिलाती रोशनी के साथ दिखाई देती है। उसी तरह परमात्मा की अनुभूति ब्रह्म की अपेक्षा अधिक समीपस्थ होती है। 'भगवान' परमेश्वर का वह स्वरूप है जो साकार रूप में प्रकट होता है।
श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है-
कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्।
जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.14.55)
"भगवान जो सभी आत्माओं की आत्मा हैं वे श्रीकृष्ण के रूप में संसार के कल्याणार्थ पृथ्वी पर साकार रूप में प्रकट हुए। संसार के कल्याण के लिए भगवान अपने सब मधुर नामों, रूपों, गुणों, धामों, लीलाओं और संतों के रूप में प्रकट होते हैं। ये गुण ब्रह्म और परमात्मा में भी उसी प्रकार से प्रकट होते हैं किन्तु अव्यक्त रहते हैं जैसे कि माचिस की तीली में आग केवल तभी प्रकट होती है जब उसे माचिस की डिबिया पर चिपकी ज्वलंत स्ट्रिप पर रगड़ा जाता है। उसी तरह भगवान की सभी शक्तियाँ जोकि अन्य स्वरूपों में अव्यक्त रहती हैं वे सब भगवान के स्वरूप में प्रकट होती हैं। भक्ति का मार्ग ही भगवान के वास्तविक स्वरूप की अनुभूति की ओर ले जाता है। यह भगवान की निकटतम अनुभूति का स्वरूप है वैसे ही जैसे कि रेलवे प्लेटफार्म पर खड़े व्यक्ति के सामने ट्रेन रूकने पर ट्रेन के भीतर और बाहर का दृश्य स्पष्ट दिखाई देता है। इसलिए श्लोक 18.55 में श्रीकृष्ण कहते हैं-"मुझ पुरुषोत्तम भगवान के वास्तविक स्वरूप को केवल भक्ति द्वारा ही जाना जा सकता है।" इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए स्पष्ट करते हैं कि उनके साकार रूप की भक्ति करने वाले भक्त ही श्रेष्ठ योगी हैं।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते |
सर्वत्रगमचिन्त्यञ्च कूटस्थमचलन्ध्रुवम् || 3||
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धय: |
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता: || 4||
लेकिन जो लोग अपनी इन्द्रियों का निग्रह करके सर्वत्र समभाव से मेरे परम सत्य, निराकार, अविनाशी, निर्वचनीय, अव्यक्त, सर्वव्यापक, अकल्पनीय, अपरिवर्तनीय, शाश्वत और अचल रूप की पूजा करते हैं, वे सभी जीवों के कल्याण में संलग्न रहकर मुझे प्राप्त करते हैं।
ऐसा कहने के पश्चात् कि उनके साकार रूप की पूजा करना उत्तम है अब श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि वे उनके निराकार रूप की आराधना को अस्वीकृत नहीं करते। वे जो उनके सर्वव्यापक, अनिर्वचनीय, अव्यक्त, अचिंतनीय, अचल, शाश्वत ब्रह्म के स्वरूप की पूजा करते हैं वे भी भगवान को पाते हैं। पृथ्वी पर विभिन्न प्रकृति वाले जीव हैं। जीवों की विविध प्रकृति की रचना करने वाले भगवान का व्यक्तित्त्व भी अनंत रूपों का स्वामी है। अपनी सीमित बुद्धि के कारण हम भगवान की अनंत अभिव्यक्तियों को श्रेणियों में वर्गीकृत करते हैं। तदनुसार वेदव्यास ने भगवान की अभिव्यक्तियों को ब्रह्म, परमात्मा और भगवान के रूप में वर्गीकृत किया है। कोई भी व्यक्ति इन रूपों में से किसी एक रूप की पूजा कर सकता है। किन्तु किसी को यह दावा नहीं करना चाहिए कि भगवान के किसी एक रूप की अवधारणा ही दोषरहित है और अन्य दोनों त्रुटिपूर्ण हैं। श्लोक 4.11 में श्रीकृष्ण ने कहा था कि जिसप्रकार से लोग मेरे प्रति भावना रखते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार का प्रतिफल प्रदान करता हूँ। हे पृथा पुत्र! सभी लोग किसी न किसी प्रकार से मेरे मार्ग का ही अनुसरण करते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण पुष्टि करते हैं कि उनके निराकार रूप की उपासना करने वाले उपासक भी उन्हें पाते हैं क्योंकि उनकी इच्छा परम सत्य भगवान की निर्गुण और निर्विशेष स्वरूप को प्राप्त करने को होने की होती है। इसलिए भगवान उन्हें अव्यक्त सर्वव्यापक ब्रह्म के रूप में मिलते हैं।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ||
अव्यक्ता हि गतिर्दु:खं देहवद्भिरवाप्यते || 5||
जिन लोगों का मन भगवान के निराकार रूप पर अनुरक्त होता है उनके लिए भगवान की अनुभूति का मार्ग अतिदुष्कर होता है। अव्यक्त रूप की उपासना देहधारी जीवों के लिए अत्यंत दुष्कर होती है।
श्रीकृष्ण पुनः अपने साकार रूप की उपासना की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि निराकार ब्रह्म की उपासना का मार्ग अत्यंत दुष्कर है। निराकार ब्रह्म की उपासना इतनी कठिन क्यों है? इसका प्रथम और महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि हम मनुष्य देहधारी हैं और अनंत जन्मों से साकार रूपों के साथ व्यवहार करने के आदी हो चुके हैं। अतः प्रेम करने के प्रयास में भी इसी प्रकार से यदि हम भगवान के साकार रूप पर अपने मन को केंद्रित करते हैं तो यह सुगमता से भगवान पर एकाग्र हो जाता है और भगवान के प्रति हमारे अनुराग को बढ़ाता है। किंतु इसके विपरीत निराकार रूप की उपासना में हमारी बुद्धि निराकार रूप को ग्रहण नहीं कर पाती क्योंकि मन और इन्द्रियों के सामने कोई स्थूल पदार्थ नहीं होता जिस पर वे अपना ध्यान केन्द्रित कर सकें। इसलिए भगवान का मनन करने का प्रयास और मन में भगवान की प्रीति को बढ़ाना दोनों कठिन हो जाते हैं। एक अन्य कारण से भी ब्रह्म की आराधना भगवान की उपासना की अपेक्षा कठिन है। इसके अंतर को 'मर्कट किशोर न्याय' अर्थात् 'बंदर के बच्चे' और 'मार्जर किशोर न्याय' अर्थात् बिल्ली के बच्चे के अन्तर से समझा जा सकता है। अपनी मां के पेट को कसकर पकड़ने का दायित्व बन्दर के बच्चे का ही होता है जबकि इसमें उसकी माँ कोई सहायता नहीं करती। जब मादा बंदर अपने बच्चे को लेकर वृक्ष की एक शाखा से दूसरी शाखा पर छलांग लगाती है तब माँ को कसकर पकड़ने का दायित्व बच्चे पर होता है। यदि वह ऐसा करने में समर्थ नहीं होता तब वह नीचे गिर सकता है। इसके विपरीत बिल्ली का बच्चा बहुत छोटा और कोमल होता है। लेकिन उसकी गर्दन से उसे मुँह से पकड़ कर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का दायित्व बिल्ली का होता है।
समान रूप से भगवान के निराकार रूप के उपासक की तुलना बंदर के बच्चे से की जा सकती है और साकार रूप के उपासक की तुलना बिल्ली के बच्चे से की जा सकती है। वे जो निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं, अपनी उपासना के मार्ग पर आगे बढ़ने का उत्तरदायित्व उन्हीं पर होता है क्योंकि ब्रह्म उन पर कोई कृपा नहीं करता। ब्रह्म केवल निराकार ही नहीं अपितु निर्गुण भी है। उसका वर्णन निर्गुण, निर्विशेष और निराकार के रूप में किया गया है। इससे बोध होता है कि ब्रह्म में कृपा का गुण व्यक्त नहीं होता। ज्ञानीजन जो निर्गुण, निर्विशेष और निराकार भगवान की उपासना करते हैं, उन्हें केवल अपने प्रयासों पर निर्भर रहना पड़ता है। दूसरी ओर भगवान का साकार रूप करुणा और दया का सागर है। इसलिए भगवान के साकार रूप की उपासना करने वाले भक्त अपनी साधना भक्ति द्वारा भगवान की दिव्य कृपा प्राप्त करते हैं और भगवान अपने भक्तों की रक्षा का दायित्व स्वयं ले लेते हैं। इसी आधार पर श्रीकृष्ण ने नौंवे अध्याय के 31वें श्लोक में यह कहा था-हे कुन्ती पुत्र! निडर होकर यह घोषणा करो कि मेरे भक्त का कभी पतन नहीं होता। श्रीकृष्ण इस कथन की पुष्टि अगले दो श्लोकों में करते हैं।
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्न्यस्य मत्परा: |
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते || 6||
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् |
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् || 7||
लेकिन जो अपने सभी कर्मों को मुझे समर्पित करते हैं और मुझे परम लक्ष्य समझकर मेरी आराधना करते हैं और अनन्य भक्ति भाव से मेरा ध्यान करते हैं, मन को मुझमें स्थिर कर अपनी चेतना को मेरे साथ एकीकृत कर देते हैं। हे पार्थ! मैं उन्हें शीघ्र जन्म-मृत्यु के सागर से पार कर उनका उद्धार करता हूँ।
श्रीकृष्ण दोहराते हैं कि उनके भक्त शीघ्र उनकी प्राप्ति करते हैं। सर्वप्रथम भगवान के साकार रूप की भक्ति वे अपने मन और इन्द्रियों को सुगमता से उसमें स्थिर करते हैं। वे अपनी जिह्वा और कानों को भगवान के दिव्य नामों का गुणगान करने और सुनने में लगाते हैं। अपनी आंखों को भगवान के दिव्य रूपों को देखने में और अपने शरीर को उन्हें सुख प्रदान करने वाले कार्यों में लगाकर तथा अपने मन को उनकी अद्भुत लीलाओं और गुणों के चिन्तन में व्यस्त कर एवं अपनी बुद्धि को उनकी महिमा के मनन में तल्लीन करते हैं। ऐसे भक्त भक्ति के मार्ग में आने वाली बाधाओं को हृदय से स्वीकार करते हैं। इसलिए भगवान शीघ्र उन पर अपनी कृपा दृष्टि करते हैं और उनके मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं। जो उनके साथ एक हो जाते हैं भगवान उनके अज्ञान को ज्ञान के दीपक द्वारा मिटा देते हैं। इस प्रकार भगवान स्वयं अपने भक्तों के रक्षक बन जाते हैं और उन्हें 'मृत्यु-संसार-सागरात्' अर्थात् जीवन और मृत्यु के सागर से पार लगा देते हैं।
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय |
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशय: || 8||
अपने मन को केवल मुझ पर स्थिर करो और अपनी बुद्धि मुझे समर्पित कर दो। इस प्रकार से तुम सदैव मुझ में स्थित रहोगे। इसमें कोई संदेह नहीं हैं।
यह व्याख्या करने के पश्चात् कि भगवान के साकार रूप की आराधना सर्वोत्कृष्ट है अब श्रीकृष्ण यह व्याख्या करना आरम्भ करते हैं कि उनकी आराधना कैसे की जाए। वे अर्जुन को दो उपदेशों का पालन करने के लिए कहते हैं। एक तो वह अपना मन उनमें स्थिर करें और अपनी बुद्धि उन्हें समर्पित कर दें। मन का कार्य कामनाएँ, आकर्षण और द्वेष उत्पन्न करना है। बुद्धि का कार्य विचार, विश्लेषण और विभेद करना है। वैदिक ग्रथों में मन के महत्त्व का बार-बार वर्णन किया गया है।
चेतः खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम्।
गुणेषु सक्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तये ।।
(श्रीमदभागवतम्-3.25.15)
"माया के बंधन में रहना या माया से मुक्त रहना इसका निश्चय मन ही करता है। यदि मन संसार में आसक्त है तब मनुष्य माया के बंधन में बंध जाता है और यदि मन संसार से विरक्त हो जाता है तब मनुष्य माया के बंधनों से मुक्त हो जाता है।"
मन एव मनुष्याणाम् कारणम् बंधमोक्ष्योः।
(पंचदशी)
"बंधन और मोक्ष मनःस्थिति द्वारा निर्धारित होते है। केवल शारीरिक भक्ति ही पर्याप्त नहीं है। हमें अपने मन को भगवान के चिंतन में लीन करना चाहिए क्योंकि मन को तल्लीन किए बिना मात्र शारीरिक गतिविधियों का कोई महत्त्व नहीं होता। उदाहरणार्थहम कोई प्रवचन सुनते हैं किन्तु यदि मन अन्यत्र भटकता है तब हमें यह बोध नहीं होता कि हमने क्या सुना। हमारे कानों में शब्द तो पड़ते हैं किन्तु वह हृदय में प्रविष्ट नहीं होते। यह दर्शाता है कि मन की तल्लीनता के बिना इन्द्रियों के कार्य निरर्थक हैं। दूसरे शब्दों में मन एक ऐसा यंत्र है जिसमें सभी इन्द्रियाँ सूक्ष्म रूप से रहती हैं। इसलिए वास्तविक क्रियाओं के बिना भी मन रूप, गंध, स्वाद, स्पर्श और शब्द का अनुभव करता है। उदाहरणार्थ जब हम रात को सो जाते हैं, उस समय हमारी इन्द्रियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं। किंतु जब हम स्वप्न देखते हैं तब हमारा मन सभी इन्द्रियों के विषयों का अनुभव करता है। इससे सिद्ध होता है कि मन स्थूल इन्द्रियों के बिना भी सभी विषयों का अनुभव करने में समर्थ होता है। इसलिए जब भगवान हमारे कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं तब वह हमारे मानसिक विचारों को महत्त्व देते हैं न कि शारीरिक कार्यों को। फिर भी मन से परे बुद्धि है। हम अपने मन को भगवान में तभी स्थिर कर सकते हैं जब हम अपनी बुद्धि उन्हें समर्पित करें। भौतिक जगत में भी जब विपरीत परिस्थितियों का सामना करने में हमारी बुद्धि समर्थ नहीं होती, तब हम अपने से अधिक बुद्धिमान व्यक्ति से मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। उदाहरणार्थ अस्वस्थ होने पर हम डॉक्टर के पास जाते हैं क्योंकि हमें स्वयं आयुर्विज्ञान की जानकारी नहीं होती। डॉक्टर हमारे लक्षणों और चिकित्सा रिपोर्टों की जांच कर रोग का पता लगाता है और तब वह औषधि देता है। समान रूप से जब हम किसी कानूनी विवाद में फंस जाते हैं तब हम वकील की सहायता लेते हैं। वकील हमें यह सिखाता है कि किस प्रकार से विरोधी पक्ष के वकील के प्रश्नों का उत्तर देना है। कानून की जानकारी न होने के कारण हमें वकील के प्रति अपनी बुद्धि का समर्पण करना पड़ता है और हम केवल उसके मार्गदर्शन पर चलते हैं। इसी प्रकार वर्तमान में हमारी बुद्धि कई विकारों से ग्रस्त है।
श्रीकृष्ण को मथुरा ले जाते समय कंस के दूत अक्रूर, बुद्धि के इन्हीं दोषों का वर्णन करते हुए कहते हैं-
अनित्यानात्मदुः खेषु विपर्ययमतिमुहम्।
(श्रीमद्भागवतम्-10.40.25)
अक्रूर ने कहा-"हमारी बुद्धि अज्ञान से ग्रस्त है। यद्यपि हम शाश्वत जीवात्माएँ हैं किन्तु हम केवल अपनी नश्वर देह की चिंता करते हैं। यद्यपि संसार के सभी पदार्थ नश्वर हैं किन्तु हम यही सोंचते हैं कि ये सदा हमारे साथ रहेंगे और इसलिए हम दिन-रात उनका संचय करने में रत रहते हैं। आगे जाकर अंततः इन्द्रिय सुख का परिणाम दुखदः होता है किन्तु फिर भी हम इस आशा से इनके पीछे भागते रहते हैं कि इनसे हमें सुख प्राप्त होगा।" हमारी बुद्धि के उपर्युक्त तीन विकारों को 'विपर्यय' या मिथ्या ज्ञान कहते हैं। इससे हमारी समस्या में बढ़ोतरी होती है क्योंकि हमारी बुद्धि अनंत जन्मों से इसी प्रकार दुर्विचारों को ग्रहण करने की आदी होती है। यदि हम अपनी बुद्धि के निर्देशानुसार अपना जीवन यापन करते हैं तब हम निश्चित रूप से दिव्य आध्यात्मिकता के मार्ग में होने में अधिक प्रगति नहीं कर सकेंगे। इस प्रकार यदि हम भगवान में मन को अनुरक्त कर आध्यात्मिक सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें उन्हें अपनी बुद्धि का समर्पण और उनके उपदेशों का पालन करना चाहिए। बुद्धि का समर्पण करने का अभिप्राय शास्त्रों और प्रामाणिक गुरु के माध्यम से प्राप्त भगवत्प्राप्ति के विज्ञान के अनुसार ही चिंतन करने से है।
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् |
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय || 9||
हे अर्जुन! यदि तुम दृढ़ता से मुझ पर अपना मन स्थिर करने में असमर्थ हो तो सांसारिक कार्यकलापों से मन को विरक्त कर भक्ति भाव से निरंतर मेरा स्मरण करने का अभ्यास करो।
मन को श्रीकृष्ण में स्थिर करना ही साधना की पूर्णता है किन्तु इस मार्ग के आरम्भ में हम पूर्ण होने की अभिलाषा नहीं कर सकते। इसलिए ऐसे लोगों को क्या करना चाहिए जो अपने मन को भगवान के प्रति पूर्ण रूप से स्थिर नहीं कर सकते। श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं कि उन्हें श्रद्धा भक्ति युक्त होकर उनका स्मरण करने का प्रयास करना चाहिए। जैसा कि कहा गया है-'अभ्यास मनुष्य को पूर्ण बनाता है' उसी प्रकार से इसे अभ्यास योग या बार-बार अभ्यास द्वारा भगवान के साथ एकीकृत होना कहा जाता है। हर समय मन भौतिक पदार्थों के चिन्तन में भटकता रहता है। ऐसी स्थिति में भक्त को भगवान के नाम, रूप, गुण, लीलाओं, धामों और संतो के स्मरण द्वारा इसे वापस लाकर भगवान के चिन्तन में लगाना चाहिए। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज अपने उपदेशों में साधक को बार-बार यह अभ्यास करने पर बल देते हैं-
जगत ते मन को हटा कर, लगा हरि में प्यारे
इसी का अभ्यास पुनि-पुनि, करु निरंतर प्यारे
(साधना करु प्यारे)
हे प्रिय साधक मन का ध्यान संसार से हटा कर इसे भगवान पर स्थिर करो। इसका निरंतर अभ्यास करो।
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव |
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि || 10||
यदि तुम मेरा स्मरण करने का अभ्यास नहीं कर सकते तब मेरी सेवा के लिए कर्म करने का अभ्यास करो। इस प्रकार तुम पूर्णता की अवस्था को प्राप्त कर लोगे।
भगवान का स्मरण करने के अभ्यास स्मरण करने की अपेक्षाकृत अत्यंत सरल है। हमारा मन माया से निर्मित है इसलिए यह स्वाभाविक रूप से संसार के भौतिक पदार्थों की ओर भागता है। किंतु इसे भगवान में अनुरक्त करने के लिए दृढ़ता से प्रयत्न करना आवश्यक होता है। हमें उन उपदेशों का श्रवण करना चाहिए जिनसे हम भगवान का चिंतन कर सकें और हमें अपने कार्यों में व्यस्त रहते हुए भी उनका अनुपालन करना चाहिए। लेकिन जब भगवान के ध्यान से मन हट जाए तब ऐसे लोगों को क्या करना चाहिए इसका उत्तर श्रीकृष्ण उपर्युक्त श्लोक में देते हैं। वे जो निरंतर भगवान का स्मरण नहीं कर सकते उन्हें अपने सभी कार्य केवल भगवान की सेवा के लिए ही करने चाहिए। वे जो भी कार्य करें उन्हें यह मनोभावना विकसित करनी चाहिए कि वे सब कार्यों का निष्पादन भगवान के सुख के लिए कर रहे हैं जैसा कि पिछले अध्याय के श्लोक 9.27 और 9.28 में वर्णन किया गया है। गृहस्थ जीवन में अधिक समय परिवार की देखभाल में व्यतीत होता है। किसी को भी अपना कार्य सुचारू रूप से अवश्य करना चाहिए लेकिन अपनी आंतरिक चेतना को भी बदलना चाहिए। इन कार्यों को दैहिक आसक्ति और परिवारिक मोह के कारण सम्पन्न करने की अपेक्षा हमें यह चेतना विकसित करनी चाहिए कि परिवार के सभी सदस्य भगवान की संतान हैं और भगवान के सुख के लिए उनकी देखभाल करना हमारा दायित्व है। हमें जीविका अर्जन का कार्य जारी रखना चाहिए लेकिन उन कार्यों को सम्पन्न करने की चेतना को परिवर्तित करना चाहिए। फिर हमारा धन अर्जन करने का उद्देश्य सांसारिक सुखों को प्राप्त करने की अपेक्षा इस दृढ़ भावना से युक्त होगा–'मैं चाहता हूँ कि मैं अपनी और परिवार के सदस्यों की देखभाल के लिए धन इसलिए अर्जित करूंगा जिससे मैं भगवान की भक्ति में लीन होने में समर्थ हो सकूँ और मैं जो भी धन अर्जित करूँगा उसे भगवान की सेवा के लिए दान करूंगा।' समान रूप में खाने, सोने, स्नान करने जैसी शारीरिक क्रियाओं का त्याग नहीं किया जा सकता किन्तु ऐसा करते हुए भी हम यह दिव्य चेतना विकसित कर सकते हैं-'मुझे अपने शरीर को स्वस्थ रखना है ताकि मैं अपने शरीर से भगवान की सेवा कर पाऊँ। इसलिए मैं सावधानीपूर्वक इसे स्वस्थ रखने का सभी प्रकार से प्रयास करूंगा।'
जब हम सभी कार्यों का अभ्यास भगवान के सुख के लिए करते हैं तब स्वाभाविक रूप से हमारे मन का स्वार्थभाव नष्ट होगा और हम उन कार्यों की ओर प्रवृत्त होगें जो अधिक सेवा भक्ति वाले होते हैं। इस प्रकार सभी कर्मों का निष्पादन केवल परमात्मा श्रीकृष्ण की संतुष्टि के लिए करना चाहिए जिससे हमारा मन स्थिर होकर शीघ्र भगवान की ओर केन्द्रित होने में समर्थ हो, तब धीरे-धीरे हमारे हृदय में भगवान का प्रेम प्रकट होगा और हम भगवान का निरंतर चिन्तन करने में सफल होंगे।
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रित: |
सर्वकर्मफलत्यागं तत: कुरु यतात्मवान् || 11||
यदि तुम भक्तियुक्त होकर मेरी सेवा के लिए कार्य करने में असमर्थ हो तब अपने सभी कर्मों के फलों का त्याग करो और आत्म स्थित हो जाओ।
इस अध्याय के 8वें श्लोक का आरम्भ करने के साथ श्रीकृष्ण ने अर्जुन के कल्याणार्थ तीन मार्ग बताए थे। तीसरे मार्ग में उन्होंने अर्जुन को उनकी सेवार्थ कार्य करने को कहा लेकिन इस प्रयोजन हेतु भी शुद्धता और निश्चयात्मक बुद्धि का होना आवश्यक है। जो लोग भगवान के साथ अपने संबंध के बारे में नहीं जानते और जिन्होनें भगवत्प्राप्ति को अपने जीवन का लक्ष्य नहीं बनाया है उनके लिए भगवान के सुख के लिए कार्य करना असंभव होता है।
इसलिए श्रीकृष्ण अब जीवात्मा के कल्याणार्थ चौथा मार्ग बताते हैं-"अर्जुन तुम पहले की भांति अपना कार्य करते रहो लेकिन उनके कर्म-फलों से विरक्त रहो।" ऐसी विरक्ति हमारे अंतःकरण को तमस् और रजस् गुणों से रहित करेगी और सत्त्वगुण की ओर ले जाएगी। इस प्रकार कर्म-फलों का त्याग करने का प्रयास हमारे मन से सांसारिकता को हटाने और बुद्धि को दृढ़ करने में सहायता करेगा। तब हमारी बुद्धि शीघ्रता से शुद्ध होगी और अलौकिक ज्ञान को समझने में समर्थ होगी और हम साधना के उच्च स्तर की ओर अग्रसर होने में समर्थ होंगे।
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते |
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् || 12||
शारीरिक अभ्यास से श्रेष्ठ ज्ञान है, ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान है और ध्यान से श्रेष्ठ कर्म फलों का परित्याग है और ऐसे त्याग से शीघ्र मन को शांति प्राप्त होती है।
कई लोग शारीरिक अभ्यास तक ही सीमित रहते हैं। उन्हें कर्मकाण्डों के पालन में आनन्द मिलता है लेकिन वे मन को भगवान में अनुरक्त नहीं करते। जब वे नया घर या नयी कार ख़रीदते हैं तब वे पंडित को बुलाकर अनुष्ठान करवाते हैं और जब पंडित पूजा करता है, उस समय वे दूसरे कमरों में बैठकर वार्तालाप करते हैं और चाय की चुस्कियाँ लेते हैं। उनके लिए भक्ति केवल कर्मकाण्डों के प्रदर्शन से अधिक और कुछ नहीं। यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करने की प्रवृत्ति है जो संस्कारवश हमें पूर्वजों से प्राप्त होती है। धार्मिक अनुष्ठान करना अनुचित नहीं है क्योंकि कुछ न करने से कुछ करना अच्छा होता है। आखिरकार ऐसे लोग बाह्य रूप से भक्ति में लीन तो रहते हैं। हालांकि श्रीकृष्ण कहते हैं कि शारीरिक अभ्यास से श्रेष्ठ आध्यात्मिक ज्ञान को पोषित करना है। इस ज्ञान से यह बोध होता है कि भगवत्प्राप्ति ही जीवन का लक्ष्य है न कि भौतिक उन्नति। जो ज्ञानयुक्त हो जाता है वह खोखली धार्मिक विधियों से परे हो जाता है और अंत:करण को शुद्ध करने की अभिलाषा विकसित करता है किन्तु केवल कोरे ज्ञान से मन की शुद्धि नहीं हो सकती। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि ज्ञान अर्जन करने से श्रेष्ठ मन को ध्यान की प्रक्रिया में लगाना है। वास्तव में ध्यान द्वारा हम मन को वश में कर सांसारिक सुखों के प्रति विरक्ति की भावना को विकसित कर सकते हैं। जब मन विरक्ति विकसित करता है तब हम अगले चरण का अभ्यास कर सकते हैं जो कि कर्म-फलों का परित्याग है। जैसा कि पिछले श्लोक में व्याख्या की गयी है कि इससे मन को सांसारिक विषयों से हटाने में और बुद्धि को दृढ़ कर उच्चावस्था की ओर ले जाने में सहायता मिलती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च |
निर्ममो निरहङ्कार: समदु:खसुख: क्षमी || 13||
सन्तुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चय: |
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्त: स मे प्रिय: || 14||
जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करते, सबके मित्र हैं, दयालु हैं, ऐसे भक्त मुझे अति प्रिय हैं क्योंकि वे स्वामित्व की भावना से रहित और मिथ्या अहंकार से मुक्त रहते हैं, दुःख और सुख में समभाव रहते हैं और सदैव क्षमावान होते हैं। वे सदा तृप्त रहते हैं, मेरी भक्ति में दृढ़ता से एकीकृत हो जाते हैं, वे आत्म संयमित होकर, दृढ़-संकल्प के साथ अपना मन और बुद्धि मुझे समर्पित करते हैं।
यह बताने के पश्चात् कि उनके साकार रूप की भक्ति श्रेष्ठ है, अब श्रीकृष्ण 13वें से 19वें श्लोक तक अपने प्रिय भक्तों की विशेषताओं का वर्णन करेंगे।
सभी जीवों के प्रति द्वेष भावना से मुक्तः भक्त सभी प्राणियों को भगवान के अंश के रूप में देखते हैं। यदि वे अपने मन में अन्य लोगों के प्रति ईर्ष्या के भाव को प्रश्रय देते हैं तब वे उसे भगवान के प्रति ईर्ष्या करना समझते हैं। ऐसे भक्त अपना अहित करने वाले लोगों के प्रति भी द्वेष भावना से मुक्त रहते हैं।
मैत्री और दया भावना से युक्तः भक्ति सभी जीवों में एकता की भावना उत्पन्न करती है क्योंकि सभी जीव एक ही भगवान की संतानें हैं। इस प्रकार से दूसरों को अपने से भिन्न देखने की धारणा समाप्त हो जाती है। यह भावना भक्तों में शालीनता और दूसरों के कष्टों के प्रति सहानुभूति विकसित करती है।
स्वामित्व एवं मिथ्या अहंकार से मुक्तः भक्ति का सबसे बड़ा शत्रु अहंकार है। अपने भीतर के अहं भाव को मिटाने का अभ्यास करके ही कोई आध्यात्मिक मार्ग पर उन्नति कर सकता है। निष्काम भक्त स्वाभाविक रूप से विनम्र रहते हैं और अहं भावना तथा अपने स्वामित्व के भाव को त्याग देते हैं और उसी प्रकार से शरीर के रूप में अपनी मिथ्या पहचान का उन्मूलन कर देते हैं।
सुख और दुःख में समभावः भक्त यह विश्वास करते हैं कि केवल प्रयास करना ही उनके हाथ में है और फल प्रदान करना भगवान के हाथ में होता है। इस प्रकार अपने कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाले अनुकूल या प्रतिकूल परिणाम को वे भगवान की इच्छा समझते हैं और उन्हें समभाव से स्वीकार करते हैं।
सदैव क्षमाशीलः भक्त कभी अपनी संतुष्टि के लिए अपने को कष्ट पहुँचाने वालों को दण्ड देने के संबंध में नहीं सोचते। दूसरों के प्रति ऐसे नकारात्मक विचारों से भक्ति नष्ट हो जाती है। इसलिए बुद्धिमान भक्त किसी भी परिस्थिति में इन विचारों को अंतःकरण में शरण देना अस्वीकार कर देते हैं और अधर्म करने वालों को दण्ड प्रदान करने का कार्य भगवान के ऊपर छोड़ देते हैं।
सदैव संतोषीः सुख समृद्धि से हमें संतोष प्राप्त नहीं होता अपितु इकेवल अपनी कामनाओं पर अंकुश लगाने से मिलता है। भक्त सांसारिक पदार्थों को सुख देने के साधन के रूप नहीं देखते और इसलिए भगवत्कृपा से उन्हें जो मिलता है उसी में संतुष्ट रहते हैं।
दृढ़संकल्प से मेरी भक्ति में एकीकृत होनाः जैसे कि पहले से व्याख्या की गयी है कि 'योग' का अर्थ जुड़ना है। भक्त योगी होते हैं क्योंकि उनकी चेतना भगवान में लीन रहती है। यह तल्लीनता यदा-कदा या सविराम नहीं होती अपितु दृढ़तापूर्वक निरंतर बनी रहती है क्योंकि वे भगवान के साथ अटूट संबंध स्थापित कर लेते हैं।
आत्मसंयमीः भक्त भगवान की प्रेममयी भक्ति में अपना मन अनुरक्त करते हैं। इस प्रकार से वह संसार से विरक्त हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप वे अपने मन और इन्द्रियों पर विजय पा लेते हैं।
दृढ़संकल्प युक्तः दृढ़ता का गुण स्थिर बुद्धि से प्राप्त होता है। भक्त शास्त्रों के ज्ञान और गुरु के उपदेशों को अपने साथ जोड़े रखते हैं। इससे बुद्धि इतनी दृढ़ हो जाती है कि यदि पूरा संसार भी दूसरे मार्ग पर जाने का परामर्श ही क्यों न दें तब भी वे अपने संकल्प से कदाचित् पीछे नहीं हटते।
मन और बुद्धि का समर्पणः जीव स्वभावतः भगवान की सेवक है और जैसे ही हम इस ज्ञान से प्रबुद्ध होते हैं तभी हम वास्तव में स्वयं को परमात्मा को समर्पित करते हैं। इस समर्पण में मन और बुद्धि का प्रमुख रूप से महत्त्व होता है। जब ये भगवान के प्रति समर्पित हो जाते हैं तब हमारे व्यक्तित्त्व के शेष सभी अवयव शरीर, कर्म इन्द्रियाँ, ज्ञानेन्द्रियाँ, सांसारिक पदार्थ और आत्मा भी स्वाभाविक रूप से भगवान की सेवा के लिए समर्पित हो जाते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिन भक्तों में ये गुण प्रदर्शित होते हैं वे उन्हें अत्यंत प्रिय लगते हैं।
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य: |
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो य: स च मे प्रिय: || 15||
वे जो किसी को उद्विग्न करने का कारण नहीं होते और न ही किसी के द्वारा व्यथित होते हैं। जो सुख-दुःख में समभाव रहते हैं, भय और चिन्ता से मुक्त रहते हैं मेरे ऐसे भक्त मुझे अति प्रिय हैं।
आत्मा प्राकृतिक रूप से शुद्ध है। समस्या यह है कि वर्तमान में यह अशुद्ध मन द्वारा आच्छादित है। एक बार जब यह अशुद्धता दूर हो जाती है, तत्पश्चात् आत्मा के श्रेष्ठ गुण स्वाभाविक रूप से प्रकाशित हो जाते हैं। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है:
यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चन सर्वैगुणैस्तत्र समासते सुराः।
हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहिः।।
(श्रीमद्भागवतम्-5.18.12)
"वे भक्त जो स्वयं को परमात्मा की भक्ति में तल्लीन कर लेते हैं उनके हृदय में समस्त स्वर्ग के देवताओं के अद्भुत गुण प्रकट होते हैं। किन्तु जो भगवान की भक्ति में लीन नहीं होते और केवल मन को तुच्छ बाहरी विषयों की ओर दौड़ाते हैं उनमें महापुरुषों के गुण नहीं आ सकते।" यहाँ श्रीकृष्ण कुछ और गुणों का वर्णन करते हैं जो उनके भक्तों में प्रकट होते हैं।
किसी की निराशा का कारण न होनाः भक्ति हृदय को पिघला कर उसे कोमल बना देती है। इसलिए भक्त स्वाभाविक रूप से सभी के साथ सद्व्यवहार करते हैं। इसके साथ-साथ वे सबके भीतर भगवान को विद्यमान देखते हैं और सबको भगवान के अंश के रूप में देखते हैं इसलिए वह कभी किसी को कष्ट पहुँचाने की नहीं सोंचते।।
किसी के द्वारा व्यथित न होनाः यद्यपि भक्त किसी को कष्ट नहीं देते किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि दूसरे उन्हें कष्ट पहुँचाने का प्रयास नहीं करते। अखिल विश्व के संतों के इतिहास से यह विदित होता है कि उनके जीवनकाल के दौरान जो लोग उनके कल्याणकारी कार्यों और सिद्धान्तों से भयभीत रहते थे वे प्रायः उन्हें उत्पीड़ित करते थे। लेकिन संतों ने सदैव अपने को कष्ट देने वालों के प्रति दयालुता का भाव ही दर्शाया। इसी प्रकार हम देखते है कि नाज़रेथ के यीशू ने सूली पर चढ़ते हुए यह प्रार्थना की थी-“हे परमात्मा इन्हें क्षमा कर देना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।" (लूक 23.24)।
सुख और दुःख में समभावः भक्त शास्त्रों के ज्ञान से सम्पन्न होते हैं और इसलिए वे जानते हैं कि सुख और दुःख दोनों जीवन के उतार-चढ़ाव हैं। जैसे ग्रीष्म और शरद् ऋतु का आना-जाना। इसलिए वे सुख-दुख दोनों को भगवान की कृपा के रूप में देखते हैं और सभी परिस्थितियों का उपयोग अपनी भक्ति बढ़ाने के लिए करते हैं।
भय और चिंता से मुक्तः भय और चिन्ता का कारण आसक्ति है। इससे हमारे भीतर भौतिक पदार्थों के भोग की इच्छा उत्पन्न होती है और इनके छिन जाने की चिन्ता हमें भयभीत करती है। जिस क्षण हमारे भीतर भौतिक पदार्थों के प्रति विरक्ति उत्पन्न होती है, उसी क्षण हम भय मुक्त हो जाते हैं। भक्त केवल आसक्ति रहित ही नहीं होते बल्कि वे भगवान की इच्छा के साथ सामंजस्य रखते हैं। इसलिए उन्हें भय और चिन्ता का अनुभव नहीं होता।
अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ: |
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्त: स मे प्रिय: || 16||
वे जो सांसारिक प्रलोभनों से उदासीन रहते हैं, बाह्य और आंतरिक रूप से शुद्ध, निपुण, चिन्ता रहित, कष्ट रहित और सभी कार्यकलापों में स्वार्थ रहित रहते हैं, मेरे ऐसे भक्त मुझे अति प्रिय हैं।
सांसारिक सुखों के प्रति उदासीनताः किसी निर्धन व्यक्ति के लिए 100 रुपये की हानि और लाभ एक महत्त्वपूर्ण विषय हो सकता है, किन्तु एक करोड़पति इसे कोई महत्त्व नहीं देगा और इस विषय पर आगे कुछ नहीं सोंचेगा। भक्त भगवान के दिव्य प्रेम से युक्त होते हैं और उससे सम्पन्न होने को ही वे परम निधि मानते हैं। वे भगवान की प्रेममयी सेवा को ही प्राथमिकता देते हैं। इसलिए वे सांसारिक सुखों के प्रति भी उदासीन रहते हैं।
बाह्य और आंतरिक रूप से शुद्धः चूंकि उनका मन निरंतर परम शुद्ध भगवान में तल्लीन रहता है इसलिए भक्त आंतरिक रूप से काम-वासना, क्रोध, लालच, शत्रुता इत्यादि विकारों से मुक्त हो जाते हैं। इस मन:स्थिति में वे स्वाभाविक रूप से अपने शरीर और आस-पास के वातावरण को भी शुद्ध रखते हैं। अतः प्राचीन कहावत के अनुसार 'स्वच्छता का द्वार हैं' को चरितार्थ करते हुए वे बाह्य रूप से भी शुद्ध रहते हैं।
कार्य-कुशलः भक्त सभी कार्यों को भगवान की सेवा के रूप में देखते हैं इसलिए वे ध्यानपूर्वक और अति सावधानी से अपने कार्य करते हैं। यह स्वाभाविक रूप से उन्हें कार्य कुशल बनाता है।
चिन्ता मुक्तः मन में यह विश्वास रखकर कि भगवान सदैव उनकी शरणागति के अनुसार उनकी रक्षा करते हैं वे चिन्ता मुक्त रहते हैं।
अव्यथितः चूंकि भक्त अपनी इच्छा भगवान को समर्पित कर देते हैं। अतः वे केवल अथक प्रयासों द्वारा अपने समस्त कार्यों को सम्पन्न करते हैं और उनका फल भगवान की इच्छा पर छोड़ देते हैं। इसलिए जो भी फल प्राप्त होता है उससे वे व्यथित नहीं होते और अपनी इच्छा को दिव्य इच्छा के अधीन मानते हैं।
सभी कार्यों को निः स्वार्थ भाव से सम्पन्न करनाः उनकी सेवा करने की मनोभावना उन्हें स्वार्थों से ऊपर उठाती है।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति |
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिय: || 17||
वे जो न तो लौकिक सुखों से हर्षित होते हैं और न ही सांसारिक दुःखों से निराश होते हैं तथा न ही किसी हानि के लिए शोक करते हैं एवं न ही लाभ की लालसा करते हैं, वे शुभ और अशुभ कर्मों का परित्याग करते हैं। ऐसे भक्त जो भक्ति भावना से परिपूर्ण होते हैं, मुझे अति प्रिय हैं।
लौकिक सुखों से हर्षित तथा संसार के दुःखों से निराश न होनाः यदि हम अंधकार में हैं और उस समय कोई दीपक दिखा कर हमारी सहायता करता है, ऐसे में हम स्वाभाविक रूप से प्रसन्न हो जाते हैं। फिर उस समय जब कोई दीपक को बुझा देता है तब हम निराश हो जाते हैं। लेकिन अगर हम दोपहर के समय सूर्य के प्रकाश में खड़े हैं उस समय यदि कोई हमें दीपक दिखाता है और कोई दूसरा उसे बुझा देता है तब हम उदासीन रहते हैं। समान रूप से भगवान के भक्त भगवान के दिव्य प्रेम और आनन्द से तृप्त रहते हैं इसलिए वे प्रसन्नता और निराशा से ऊपर उठ जाते हैं।
लाभ में हर्षित और हानि में शोक न करनाः ऐसे भक्त न तो सांसारिक सुखों के लिए लालायित होते हैं और न ही अप्रिय परिस्थितियों पर शोक करते हैं। नारद भक्ति दर्शन में वर्णन है:
यत्प्राप्य न किञ्चिद्वाञ्छति, न शोचति,
न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साही भवति ।।
(नारद भक्ति सूत्र-5)
1. "भगवान का प्रेम प्राप्त कर भक्त सुखद वस्तुओं को प्राप्त करने की न तो लालसा करते हैं और न ही उनसे वंचित होने पर शोक व्यक्त करते हैं। वे अपने को कष्ट पहुँचाने वालों से द्वेष नहीं करते। वे सांसारिक विषय भोगों को पसंद नहीं करते। वे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए चिन्तित नहीं होते। भक्त भगवान के आनन्द में मग्न रहते हैं" इसलिए तुलनात्मक दृष्टि से उन्हें सभी लौकिक पदार्थों से मिलने वाले सुख तुच्छ और नगण्य प्रतीत
होते हैं।
2. शुभ और अशुभ कर्मों का त्यागः भक्त प्रायः अशुभ कर्मों (विकर्मों) का त्याग करते हैं क्योंकि ये प्रकृति के विरूद्ध हैं और भगवान को अप्रसन्न करते हैं। शुभ कर्मों को श्रीकृष्ण शास्त्रों में उल्लिखित कर्मकाण्डों के रूप में परिभाषित करते हैं। भक्त द्वारा संपादित सभी कर्म, अकर्म बन जाते हैं क्योंकि इनका संपादन बिना किसी स्वार्थ के किया जाता है और ये भगवान को समर्पित होते हैं। अकर्म की व्याख्या चौथे अध्याय के 14वें से 20वें श्लोक में सविस्तार की गयी है।
3. भक्तिभाव से परिपूर्णः 'भक्तिमान्यः' का अर्थ 'भक्तिभाव से परिपूर्ण' होना है। दिव्य प्रेम वो है जो नित्य बढ़ता रहे। भक्ति रस के कवि कहते हैं कि 'प्रेम में पूर्णिमा नहीं' अर्थात् दिव्य प्रेम चन्द्रमा के समान नहीं है जो एक सीमा तक बढ़ता है और फिर घटता है बल्कि दिव्य प्रेम असीम रूप से बढ़ता है। इसलिए भक्त के हृदय में भगवान के लिए प्रेम का समुद्र समाया रहता है। अतः श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे भक्त मुझे अति प्रिय है।
सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो: |
शीतोष्णसुखदु:खेषु सम: सङ्गविवर्जित: || 18||
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् |
अनिकेत: स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नर: || 19||
जो मित्रों और शत्रुओं के लिए एक समान है, मान और अपमान, शीत और ग्रीष्म, सुख तथा दुःख, में समभाव रहते हैं, वे मुझे अति प्रिय हैं। जो सभी प्रकार के कुसंग से मुक्त रहते हैं जो अपनी प्रशंसा और निंदा को एक जैसा समझते हैं, जो सदैव मौन-चिन्तन में लीन रहते हैं, जो मिल जाए उसमें संतुष्ट रहते हैं, घर-गृहस्थी में आसक्ति नहीं रखते, जिनकी बुद्धि दृढ़तापूर्वक मुझमें स्थिर रहती है और जो मेरे प्रति भक्तिभाव से युक्त रहते हैं, वे मुझे अत्यंत प्रिय है। श्रीकृष्ण भक्तों की दस अन्य विशेषताओं का वर्णन करते हैं-
1. शत्रु और मित्र के साथ समान व्यवहारः भक्त सभी के साथ समता का व्यवहार करते हैं तथा शत्रुता और मित्रता की भावना को अपने उपर हावी नहीं होने देते। इस संबंध में प्रह्लाद की एक सुंदर कथा है। एक बार उनका पुत्र-विरोचन अपने गुरु के पुत्र सुधन्वा के साथ वाद-विवाद करने लगा। विरोचन ने कहा-“मैं तुमसे श्रेष्ठ हूँ क्योंकि मैं राजा का पुत्र हूँ।" सुधन्वा ने कहा-"ऋषि का पुत्र होने के कारण मैं तुमसे श्रेष्ठ हूँ।" दोनों युवा थे और अपने उतावलेपन में दोनों ने यह शर्त लगायी-"दोनों में से जो श्रेष्ठ घोषित होगा वही जीवित रहेगा और दूसरे को अपने प्राणों का त्याग करना होगा।" विरोचन ने पूछा-"इसका निर्णय कौन करेगा?" सुधन्वा ने कहा-"इसका निर्णय तुम्हारे पिता प्रह्लाद करेंगे।" विरोचन ने कहा- "ठीक है किन्तु तुम उन पर पक्षपात करने की शिकायत कर सकते हो।" सुन्धवा ने कहा-"मेरे पिता ऋषि अंगिरा ने बताया है कि तुम्हारे पिता प्रह्लाद प्रत्यक्ष न्याय की मूर्ति हैं और वह कभी मित्र और शत्रु में भेदभाव नहीं करेंगे।" दोनों बालक प्रह्लाद के पास गये। विरोचन ने पूछा-"पिता जी मैं श्रेष्ठ हूँ या सुधन्वा।" प्रह्लाद ने पूछा-"यह प्रश्न कैसे उत्पन्न हुआ।" विरोचन ने कहा "पिता जी हमने शर्त लगायी है कि जो भी श्रेष्ठ घोषित होगा वही जीवित रहेगा और दूसरे को अपने प्राण त्यागने पड़ेंगे।" प्रह्लाद प्रसन्न हुआ और कहा-"तुम्हारा मित्र सुधन्वा श्रेष्ठ है क्योंकि वह आपके पिता के गुरु का पुत्र है।" प्रह्लाद ने अपने सेवकों को आदेश दिया-"मेरे पुत्र को फांसी पर लटका कर मार दो।"
उसी क्षण सुधन्वा ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि 'प्रतीक्षा करो', उसने प्रह्लाद से कहा कि मेरा दूसरा प्रश्न यह है-“मैं श्रेष्ठ हूँ या आप।" प्रह्लाद ने उत्तर दिया कि "मेरा जन्म राक्षस परिवार में हुआ है जबकि तुम ऋषि पुत्र हो जो मेरे गुरु हैं इसलिए तुम श्रेष्ठ हो।" सुधन्वा ने पुनः पूछा “ऐसी स्थिति में क्या तुम मेरे आदेश का पालन करोगे? प्रह्लाद ने उत्तर दिया–“हाँ, निश्चय ही"। तब सुन्धवा ने कहा ठीक है तो फिर विरोचन को मुक्त कर दो" तब प्रह्लाद ने अपने सेवकों को उसी भाव से विरोचन को मुक्त करने का आदेश दिया जिस प्रकार से फांसी पर लटकाने के लिए दिया था।
यह देखकर स्वर्ग के देवताओं ने प्रह्लाद के राज-दरबार में पुष्पों की वर्षा की और प्रह्लाद द्वारा किए गए न्याय की प्रशंसा की। प्रह्लाद में निष्पक्ष न्याय करने का गुण स्वाभाविक रूप से भगवान का परम भक्त होने के कारण उत्पन्न हुआ था। इसलिए वह मित्र, सगे संबंधी, पुत्र, पोते और पराये लोगों के साथ समता का व्यवहार करता था।
मान-अपमान में समभावः श्रीकृष्ण पुनः कहते हैं कि भक्त, मान-अपमान की ओर ध्यान नहीं देते। यह उसी प्रकार से है कि जब कोई व्यक्ति व्यभिचार कर्म में संलिप्त हो जाता है, तब यह सोचता है कि कोई क्या कहेगा किन्तु जब संबंध गहन हो जाते हैं तब वह इसओर ध्यान नहीं देता कि इससे कितना अपयश होगा। इसी प्रकार से भक्त के हृदय में दिव्य प्रेम की ज्योति इतनी दीप्तिमान होकर जलती है कि उसके लिए लौकिक मान और अपमान का कोई महत्त्व नहीं रहता।
शीत और गर्मी तथा सुख और दुःख में समभावः भक्त अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में समभाव रहते हैं। वे जानते हैं कि दोनों में से कोई भी स्थिति स्थायी नहीं है। ये दिन और रात्रि की भांति आते-जाते रहते हैं। इसलिए वे इन द्वन्द्वों को महत्त्व नहीं देते। रामकृष्ण परमहंस के जीवन की एक घटना संतों की इस महानता का उदाहरण है। वृद्धावस्था में वे गले में कैन्सर से ग्रस्त थे। लोग उन्हें इसके उपचार हेतु काली माता की प्रार्थना करने के लिए कहते थे। उन्होंने कहा- "मेरा मन काली मां के प्रेम में निमग्न है। फिर मैं इस तुच्छ शरीर को कैंसर से बचाने के लिए प्रार्थना क्यों करूँ। जो भगवान की इच्छा होगी उसे होने दो।"
कुसंग से मुक्तः किसी भी व्यक्ति या वस्तु के संयोग को संग कहते हैं। संग दो प्रकार के होते है। जो संग हमारे मन को सांसारिकता की ओर ले जाता है उसे कुसंग कहते हैं और जो हमारे मन को सांसारिकता से दूर ले जाता है उसे सत्संग कहते हैं। चूँकि भक्त सांसारिक चिन्तन में आनन्द नहीं लेते इसलिए वे कुसंग की उपेक्षा कर सत्संग में लीन रहते हैं।
प्रशंसा और निंदा में एक समानः वे जो परिस्थितियों द्वारा प्रेरित होते हैं उनके लिए अन्य लोगों की प्रशंसा और निंदा बहुत मायने रखती है। किन्तु भक्त अपने अंतर के सिद्धांतों से प्रेरित होते हैं। इसलिए अन्य लोगों द्वारा की जाने वाली प्रशंसा और निंदा का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
मौन चिंतनः कौए और हंसों की पसंद एक दूसरे से विपरीत होती है। कौएँ गंदगी के ढेर से आकर्षित होते हैं जबकि हंसों का आकर्षण शांत झील आदि होती हैं। समान रूप से सांसारिक लोगों का मन लौकिक विषयों में अत्यंत आनन्द प्राप्त करता है। लेकिन संतों का मन शुद्ध होता है, इसलिए उन्हें सांसारिक विषय उसी प्रकार से आकर्षित नहीं करते जैसे कि वे गंदगी का ढेर हों। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे बातचीत नहीं करते। जिस प्रकार हंस झील की ओर आकर्षित होते हैं उसी प्रकार से उनका मन भगवान के नाम, गुण, रूप, लीलाओं और भगवान की महिमा के व्याख्यान जैसे विषयों की ओर आकर्षित होता है।
जो कुछ मिल जाए उसी में संतुष्ट होनाः शरीर की देखभाल के लिए भक्त न्यूनतम आवश्यकताओं के साथ जीवन निर्वाह करते हैं।
इस संबंध में संत कबीर का प्रसिद्ध दोहा इस प्रकार से है:
मालिक इतना दीजिए, जामे कुटुम्ब समाए।
मैं भी भूखा न रहू, साधु न भूखा जाए,।।
"हे भगवान मुझे केवल उतना ही दीजिए कि जिससे मेरे परिवार की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके और अपने द्वार पर आने वाले साधु को भी मैं कुछ दान दे सकूँ।"
घर-गृहस्थी से ममता रहितः जीवात्मा का पृथ्वी पर स्थायी निवास नहीं होता क्योंकि मृत्यु के पश्चात् यह संसार में ही रह जाता है। जब मुगल शहंशाह अकबर ने फतेहपुर सीकरी में अपनी राजधानी स्थापित की तब उसने मुख्य प्रवेश द्वार पर निम्नलिखित शब्द उत्कीर्ण करवाएँ-"यह संसार एक पुल है इसे पार करो किन्तु इस पर कोई घर न बनाओ।" इसी संबंध में जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने सुंदर वर्णन किया है-
जग में रहो ऐसे गोविन्द राधे।
धर्मशाला में यात्री रहें ज्यों बता दे।।
(राधा गोविन्द गीत)
"संसार में एक यात्री के समान रहो जो मार्ग में स्थित धर्मशाला में ठहरता है। वो यह जानता है कि अगली सुबह उसे इसे खाली करना पड़ेगा।" इस कथन को सत्य समझकर भक्त अपने निवास स्थान को अस्थायी निवास स्थान के रूप में देखता है।
दृढ़ बुद्धि के साथ मेरे प्रति समर्पणः भगवान और उनके साथ अपने नित्य संबंधों के प्रति भक्तों की गहन आस्था होती है। उनमें यह दृढ़ विश्वास होता है कि अगर वे भगवान के शरणागत होते हैं तब वे भगवान की कृपा से परम सत्य को पा सकते हैं। इसलिए वे न तो आकर्षणों और न ही एक मार्ग से दूसरे मार्ग पर भटक सकते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसी दृढ़ बुद्धि वाले भक्त मुझे अति प्रिय है।
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते |
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रिया: || 20||
वे जो यहाँ प्रकट किए गए इस अमृत रूपी ज्ञान का आदर करते हैं और मुझमें विश्वास करते हैं तथा निष्ठापूर्वक मुझे अपना परम लक्ष्य मानकर मुझ पर समर्पित होते हैं, वे मुझे अति प्रिय हैं।
श्रीकृष्ण अब अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए इस अध्याय का समापन करते हैं। इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने उनसे पूछा था कि वे साकार रूप की भक्ति करने वालों तथा ज्ञान मार्ग द्वारा निराकार ब्रह्म की भक्ति करने वालों में से किसे श्रेष्ठ मानते हैं। श्रीकृष्ण ने दूसरे श्लोक में यह उत्तर दिया कि वे उन्हें श्रेष्ठ योगी मानते हैं जो दृढ़तापूर्वक उनके साकार रूप की भक्ति में तल्लीन रहते हैं। इसके पश्चात् उन्होनें पहले तो भक्ति के प्रकारों की व्याख्या की और फिर अपने भक्तों की विशेषताओं का वर्णन किया। इसलिए अब वह समापन करते हुए कहते हैं कि आध्यात्मिकता का सर्वोच्च मार्ग भक्ति ही है। वे जो परमात्मा को अपना परम लक्ष्य मानते हैं और पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर भक्ति करते हैं, ऐसे भक्त भगवान को अतिप्रिय हैं।
।।श्रीमद्भगवत गीता द्वादश अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
Bhagavad Gita Chapter 11
kathaShrijirasik
अध्याय ग्यारह: विश्वरूप दर्शन योग
भगवान के विराट रूप के दर्शन का योग
पिछले अध्याय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन की भक्ति को पोषित करने के लिए अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन किया था। अध्याय के अन्त में वे स्पष्ट रूप से अपने विश्व रूप का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि उसमें दिखाई देने वाले सभी सौंदर्य, ऐश्वर्य, तेज और शक्तियों को उनके तेज का स्फुलिंग मानो।
इस अध्याय में अर्जुन श्रीकृष्ण से प्रार्थना करता है कि वे उसे अपने विश्व रूप या सभी ब्रह्माण्डों में व्याप्त अपने अनंत ब्रह्माण्डीय विराट रूप का दर्शन कराएँ। तब श्रीकृष्ण उस पर कृपा करते हुए उसे अपनी दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं जिसे प्राप्त कर अर्जुन देवों के देव श्रीकृष्ण के शरीर में सम्पूर्ण सृष्टि का अवलोकन करता है। फिर वह भगवान के अद्भुत अनंत स्वरूप में अनगनित मुख, आँखें, भुजाएँ, उदर देखता है। उनके विराट रूप का कोई आदि और अन्त नहीं है और वह प्रत्येक दिशा में अपरिमित रूप से बढ़ रहा है। उस रूप का तेज आकाश में एक साथ चमकने वाले सौ सूर्यों के प्रकाश से अधिक है। उस विराट रूप को देखकर अर्जुन के शरीर के रोम कूप सिहरने लगे। वह देखता है कि भगवान के भय से तीनों लोक भय से कांप रहें हैं। उसने देखा कि स्वर्ग के सभी देवता भगवान में प्रवेश कर उनकी शरण ग्रहण कर रहे हैं और सिद्धजन पवित्र वैदिक मंत्रों, प्रार्थनाओं और स्रोतों का पाठ कर भगवान की स्तुति कर रहे हैं।
आगे अर्जुन कहता है कि वह धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों को उनके सहयोगी राजाओं सहित उनके मुख में प्रवेश करते हुए उसी प्रकार से देख रहा है जैसे पतंग तीव्र गति से अग्नि की ज्वाला में प्रवेश कर अपना विनाश करता है। तब अर्जुन स्वीकार करता है कि भगवान के विश्व रूप को देखकर उसका हृदय भय से कांप रहा है और उसने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है। अर्जुन श्रीकृष्ण से उनके इस भयानक रूप की वास्तविकता जानना चाहता है जो कि उनके उस रूप जैसा नहीं था तथा जिसे वह अब से पहले अपने गुरु और मित्र के रूप में जानता था। इसका उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे काल के रूप में तीनों लोकों के संहारक हैं। वे घोषणा करते हैं कि कौरव पक्ष के महायोद्धा पहले ही उनके द्वारा मारे जा चुके हैं इसलिए अपनी विजय को सुनिश्चित मानते हुए उठो और युद्ध करो।
इसकी प्रतिक्रिया में अर्जुन अदम्य साहस और अतुल्य शक्ति से सम्पन्न भगवान के रूप में उनकी प्रशंसा करता है और पुनः उनकी वंदना करता है। वह कहता है कि यदि दीर्घकालीन मित्रता के दौरान श्रीकृष्ण को केवल मानव मानने के कारण उपेक्षित भाव से यदि उससे उनके प्रति कोई अपराध हो गया हो तो वे उसे क्षमा कर दें। वह उन्हें उस पर दया कर उन्हें एक बार पुनः अपना वास्तविक रूप दिखाने की प्रार्थना करता है।
श्रीकृष्ण उसकी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए पहले अपना चतुर्भुज नारायण रूप और तत्पश्चात् अपना दो भुजाओं वाला मनोहारी रूप धारण करते हैं। वे अर्जुन को बताते हैं कि अर्जुन भगवान के जिस विश्वरूप को देख चुका है उसका दर्शन करना अत्यंत दुर्लभ है। वेदों का अध्ययन करने से उनके साकार रूप को देखा नहीं जा सकता। उनके साकार रूप को न तो वेदों के अध्ययन द्वारा और न ही तपस्या, दान या अग्निहोत्र यज्ञों द्वारा देखा जा सकता है। अर्जुन, मैं जिस रूप में तुम्हारे समक्ष खड़ा हूँ उसे केवल विशुद्ध और अनन्य भक्ति से देखा जा सकता है और उसमें एकीकृत हुआ जा सकता है।
अर्जुन उवाच |
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् |
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम || 1||
अर्जुन ने कहा! मुझ पर करुणा कर आपके द्वारा प्रकट किए गए परम गुह्य आध्यात्मिक ज्ञान को सुनकर अब मेरा मोह दूर हो गया है।
अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण की विभूतियों को सुनकर और उसी प्रकार से परम पुरुषोत्तम भगवान के दिव्य स्वरूप को जानकर भाव विभोर हो गया और उसे अनुभव हुआ कि अब उसका मोह भंग हो चुका है। उसने स्वीकार कर लिया कि श्रीकृष्ण न केवल उसके प्रिय मित्र है बल्कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान भी हैं। अब इस अध्याय के प्रारम्भ में ही वह भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कृपापूर्वक प्रकट किए गए ज्ञान को कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करता है।
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया |
त्वत्त: कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् || 2||
मैने आपसे सभी प्राणियों की उत्पत्ति और संहार के संबंध में विस्तार से सुना है। हे कमल नयन! मैंने आपकी अविनाशी महिमा को भी जाना है।
अर्जुन समस्त भौतिक संसार की उत्पत्ति और नाश के स्रोत के रूप में उनकी महिमा की निरन्तर पुष्टि कर रहा है। वह श्रीकृष्ण को 'कमलपत्राक्ष' कहकर संबोधित करता है। इसका तात्पर्य है 'जिसके नेत्र कमल के समान विशाल कोमल, सुन्दर और मतवाले हैं।' उपर्युक्त श्लोक द्वारा अर्जुन सूचित करता है-“हे श्रीकृष्ण! मैंने आपसे आपकी अक्षय महिमा को सुना। यद्यपि आप सब में निवास करते हैं तथापि उनके दोषों से अछूते रहते हैं। यद्यपि आप परम नियन्ता हैं फिर भी आप अकर्ता हैं और हमारे कर्मों के लिए आप उत्तरदायी नहीं होते। आप हमें कर्मों का फल प्रदान करते हैं और आप सबके लिए निष्पक्ष और समान रहते हैं। आप परम साक्षी और कर्मों का फल प्रदान करने वाले न्यायाधीश हैं। इसलिए मैं निश्चयपूर्वक कहता हूँ कि आप ही सभी प्राणियों की आराधना का परम लक्ष्य हैं।
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर |
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम || 3||
हे परमेश्वर! आप वास्तव में वही हैं जिसका आपने मेरे समक्ष वर्णन किया है!, किन्तु हे परम पुरुषोत्तम! मैं आपके उस विराट रूप को देखने का इच्छुक हूँ।
अर्जुन ने श्रीकृष्ण को पुरुषोत्तम कहकर संबोधित किया है क्योंकि कोई और उनके समान नहीं है। प्रायः विद्वऽजनों को तार्किक विश्लेषण पर आधारित मत के अनुसार भगवान के साकार रूप की संकल्पना को स्वीकार करना कठिन प्रतीत होता है। वे भगवान को केवल निराकार ज्योति पुंज के रूप में अनुभव करते हैं और उसे गुण, धर्म, और लीला रहित मानते हैं। यदि हम अणु जीवात्माएँ साकार रूप से युक्त हैं तब फिर हमे परम प्रभु के साकार व्यक्तित्त्व को स्वीकार क्यों नहीं कर सकते? भगवान का केवल साधारण व्यक्तित्त्व ही नहीं है बल्कि विशिष्ट व्यक्तित्त्व भी है। इसलिए उन्हें परम पुरुषोत्तम कहा जाता है। भगवान और हमारे बीच असमानता यह है कि उनका व्यक्तित्त्व न केवल पूर्ण है बल्कि उनका सर्वत्र व्यापक निराकार रूप भी है जो गुण, रूप और लीला रहित है। अर्जुन स्पष्ट करता है कि वह भगवान के व्यक्तित्त्व को वैसा ही मानता है जैसा कि उन्होंने उसके समक्ष वर्णन किया है। वह उनके साकार रूप पर विश्वास करता है किन्तु फिर भी उनके सभी ऐश्वर्यों से परिपूर्ण अर्थात् विराट विश्वरूप को देखने की इच्छा व्यक्त करता है। वह उस रूप को स्वयं अपनी आंखों से देखना चाहता है।
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो |
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् || 4||
सभी अप्रकट शक्तियों के स्वामी हे भगवान! यदि आप यह सोचते हैं कि मैं इसे देखने में समर्थ हूँ तब मुझे अपना अविनाशी विराट स्वरूप दिखाने की कृपा करें।
पिछले श्लोक में अर्जुन ने परमेश्वर का दिव्य स्वरूप देखने की इच्छा व्यक्त की थी। अब वह उनकी स्वीकृति प्राप्त करने की इच्छा से कहता है कि हे योगेश्वर! मैंने अपनी इच्छा व्यक्त कर दी है। यदि आप मुझे सुयोग्य पात्र मानते हैं तो कृपया मुझे अपना विराट रूप दिखाएँ और मुझे अपना योग-ऐश्वर्य (रहस्यमयी ऐश्वर्य) भी दिखाएँ। योग जीवात्मा को परमात्मा से जोड़ने का विज्ञान है और जो इसका पालन करते हैं उन्हें योगी कहा जाता है। 10वें अध्याय के 17वें श्लोक में अर्जुन ने भगवान को योगी कहकर संबोधित किया था जिसका अर्थ 'योग का स्वामी' है। लेकिन अब उसने अपने संबोधन को योगेश्वर में परिवर्तित कर दिया क्योंकि वह कृष्ण भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा को बढ़ाना चाहता है।
श्रीभगवानुवाच |
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रश: |
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च || 5||
परमेश्वर ने कहा-हे पार्थ! अब तुम मेरे सैकड़ों और हजारों अद्भुत दिव्य रूपों को विभिन्न आकारों और बहुरंगी रूपों में देखो।
अर्जुन की प्रार्थना सुनकर श्रीकृष्ण अब उससे कहते हैं कि मेरे इस दिव्य विश्वरूप को देखो। उन्होंने 'पश्य' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ देखना है और जिससे यह इंगित होता है कि अर्जुन को ध्यान देना चाहिए। यद्यपि भगवान का रूप एक ही है किन्तु इसकी असंख्य विशेषताएँ हैं। ये बहुसंख्यक आकारों के असंख्य स्वरूपों और विविध रंगों से परिपूर्ण हैं।
श्रीकृष्ण ने 'शतशोऽथ सहस्रशः' वाक्यांश का प्रयोग इसलिए किया है कि वे असंख्य स्वरूपों, आकारों और बहुरंगी रूपों में विद्यमान रहते हैं। अर्जुन को यह कहने के पश्चात् कि मेरे विश्वरूप को अनंत आकारों और रंगों में देखो, अब श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि स्वर्ग के देवताओं और दूसरे अन्य आश्चर्यों को अब मेरे विराट शरीर में देखो।
पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा |
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत || 6||
हे भरतवंशी! आदिति के (बारह) पुत्रों, (आठ) वसुओं (ग्यारह) रुद्रों, (दो) अश्विनी कुमारों और उसी प्रकार से (उनचास) मरुतों और पहले कभी न प्रकट हुए अन्य आश्चर्यों को मुझमें देखो।
भगवान के विश्वरूप में केवल पृथ्वी पर विद्यमान आश्चर्य ही सम्मिलित नहीं हैं अपितु अन्य उच्च लोकों के आश्चर्य जिन्हें कभी एक साथ इस प्रकार से न देखा गया हो, भी सम्मिलित हैं। वे बताते हैं कि स्वर्ग के सभी देवता उनके दिव्य स्वरूप का एक छोटा-सा अंश है। उन्होंने अपने भीतर बारह आदित्यों, आठ वसुओं, ग्यारह रुद्रों, दो अश्विनी कुमार, और उसी प्रकार उनचास मरुत दिखाए। आदिति के 12 पुत्रों के नाम धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भाग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा और वामन हैं।
आठ वसुओं का नाम द्वारा, ध्रुव, सोम, अहः, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास हैं। ग्यारह रुद्रों में हार, बहुरूप, त्रयम्बक, अपराजित, वृषस्कपि, शम्भू, कपंर्दो, रैवत, मृगव्याध सर्व और कपाली हैं। जुड़वा जन्में अश्विनी कुमार भगवान के वैद्य हैं। उनचास मरुतों (वरुण देव) में सत्त्वज्योति, आदित्य, सत्यज्योति, तीर्थग्ज्योति, सज्योति, ज्योतिषमान, हरीत, ऋतजित, सत्यजीत्, सुषेण, सेनजित्, सत्यमित्र, अभिमित्र, हरिमित्र, कृत, सत्य, ध्रुव, धर्ता, विधर्ता, विद्याराय, ध्वांत, धुनि, उग्र, भीम, अभियू, साक्षिप, इद्रिक, अन्यद्रिक, याद्रिक, प्रतिकृत, ऋक्, समिति, समारंभ, इद्दक्ष, पुरुष, अन्यदृक्ष, चेतस, समित, समीदृक्ष, प्रतिदृक्ष, मारुति, सरत, देव, दिशा, यजुः, अनुद्रिक, सम, मानुष और विश आते हैं।
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् |
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि || 7||
हे अर्जुन! सभी चर और अचर सहित समस्त ब्रह्माण्डों को एक साथ मेरे विश्वरूप में देखो। इसके अतिरिक्त तुम कुछ और भी देखना चाहो तो वह सब मेरे विश्वव्यापी रूप में देखो।
श्रीकृष्ण से उनका विराट स्वरूप देखने का निर्देश सुनकर अर्जुन आश्चर्य में पड़ जाता है कि वह इसे कहाँ से देखे। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं वह इन्हें उनके इस परम विशिष्ट शरीर में देखे। जहाँ वह सभी ब्रह्माण्डों को उनके चर और अचर प्राणियों सहित देख सकता है। वह पूर्व में घटित और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं को भी देख सकता है। इस प्रकार से अर्जुन युद्ध में पांडवों की विजय और कौरवों की पराजय की घटना को भी देख सकता है जो कि ब्रह्माण्डीय योजना का एक अंश है।
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा |
दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्वरम् || 8||
परन्तु तुम अपनी आंखों से मेरे दिव्य ब्रह्माण्डीय स्वरूप को नहीं देख सकते हो। इसलिए मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूँ। अब मेरी दिव्य विभूतियों को देखो।
जब परमप्रभु संसार में अवतरित होते हैं तब उनके दो रूप होते हैं एक भौतिक स्वरूप जिसे भौतिक आंखों से देखा जा सकता है और दूसरा दिव्यरूप जिसे दिव्य दृष्टि से देखा जा सकता है। इस प्रकार से मनुष्य उन्हें पृथ्वी पर अवतार के रूप देखते तो हैं किन्तु वे केवल उनका शारीरिक रूप देखते हैं क्योंकि भगवान के दिव्य रूप को उनकी प्राकृत आंखें नहीं देख सकती। इसी कारण जब भगवान पृथ्वी पर अवतार लेकर प्रकट होते हैं उस समय मायाधीन जीवात्माएँ भगवान को पहचान नहीं पाती। श्रीकृष्ण ने नौवें अध्याय के 11वें श्लोक में उल्लेख किया है-"जब वे पृथ्वी पर साकार रूप में प्रकट होते हैं उस समय अज्ञानी लोग उन्हें पहचान नहीं पाते। यही सिद्धान्त उनके विश्वरूप पर भी लागू होता है।" इसलिए अर्जुन उनका विराट रूप देखना चाहता है। परन्तु अर्जुन कुछ नहीं देख सका क्योंकि उसकी आँखें भौतिक थीं। भौतिक आँखें उस सार्वभौमिक रूप को देखने में असमर्थ होती हैं और साधारण मनुष्य की बुद्धि उसे समझने के लिए पर्याप्त नहीं होती।
इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे अब उसे दिव्य दृष्टि प्रदान करेंगे जिसके द्वारा उनके सार्वभौमिक रूप को उसके समस्त वैभवों सहित देखा जाना संभव हो सकेगा। दिव्य आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करने का कार्य भगवान की कृपा से सम्पन्न होता है। अपनी कृपा द्वारा भगवान अपनी दिव्य दृष्टि, दिव्य मन और अपनी दिव्य बुद्धि को जीवात्मा की प्राकृत दृष्टि, प्राकृत मन और प्राकृत बुद्धि के साथ जोड़ देते हैं। तब दिव्य इन्द्रिय मन और बुद्धि से युक्त होकर जीवात्मा भगवान के दिव्य रूप को देखने का विचार कर उन्हें समझ सकती है।
सञ्जय उवाच |
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरि: |
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् || 9||
संजय ने कहा-हे राजन्! इस प्रकार से कहकर योग के स्वामी महा योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिव्य विश्वरूप दिखाया।
अर्जुन ने इस अध्याय के चौथे श्लोक में श्रीकृष्ण को योगेश्वर कह कर संबोधित किया था। अब वह एक विशेषण 'महा' जोड़कर उन्हें सभी योगियों का भगवान कह संबोधित कर रहा है। संजय को अपने गुरु वेदव्यास से दूर दृष्टि का वरदान प्राप्त था। उसने भी अर्जुन की भांति भगवान श्रीकृष्ण का विराट विश्वरूप देखा था। अगले चार श्लोकों में संजय, अर्जुन ने जो देखा था उसका वर्णन किया गया है। ऐश्वर्य शब्द का अर्थ 'वैभव' है। भगवान का विराट विश्वरूप उनके ऐश्वर्यों से परिपूर्ण है और इसे देखने से भय, विस्मय और श्रद्धा उत्पन्न होती है।
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् |
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् || 10||
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् |
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् || 11||
अर्जुन ने भगवान के दिव्य विराट रूप में असंख्य मुख और आंखों को देखा। उनका रूप अनेक दैवीय आभूषणों से अलंकृत था और वे कई प्रकार के दिव्य शस्त्रों को उठाए हुए था। उन्होंने उस शरीर पर अनेक मालाएँ और वस्त्र धारण किए हुए थे जिस पर कई प्रकार की दिव्य सुगंधियों लगी थी। वह स्वयं को आश्चर्यमय और अनंत भगवान के रूप में प्रकट कर रहे थे जिनका मुख सर्वव्याप्त था।
संजय अनेक और अनंत शब्दों का प्रयोग कर श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप का विस्तारपूर्वक वर्णन करता है। भगवान का विश्वरूप समस्त सृष्टि का शरीर है और इसलिए वह असंख्य मुखों, आंखों, मुँह, आकार रंगों और रूपों से युक्त है। मनुष्य की बुद्धि सभी वस्तुओं को काल, स्थान और रूप के आधार पर ग्रहण करने की आदि होती है। भगवान के विश्वरूप में सभी प्रकार के असाधारण आश्चर्य और चमत्कार प्रकट होते हैं और यह सीमाओं, स्थान और समय से परे है। इसलिए समुचित रूप से इसे आश्चर्यजनक कह कर परिभाषित किया जा सकता है।
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता |
यदि भा: सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मन: || 12||
यदि आकाश में हजारों सूर्य एक साथ उदित होते हैं तो भी उन सबका प्रकाश भगवान के दिव्य तेजस्वी रूप की समानता नहीं कर सकता।
संजय अब भगवान के दिव्य तेज का वर्णन करता है। इसकी चकित कर देने वाली दीप्ति का आभास कराने के लिए वह मध्याह्न में एक साथ हजारों चमकते हुए सूर्यों के प्रकाश से इसकी तुलना करता है। वास्तव में भगवान की प्रभा असीमित है और इसे सूर्य के तेज के समनन्तर नहीं कहा जा सकता। प्रायः वक्ता अप्रकट का अनुमान प्रकट की व्याख्या द्वारा करते हैं। संजय ने यहाँ हजारों सूर्यों की उपमा देकर अपने अनुभव को व्यक्त किया है कि भगवान के विश्वरूप के तेज के समतुल्य कोई नहीं है।
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा |
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा || 13||
अर्जुन ने परमात्मा के उस दिव्य शरीर में एक ही स्थान पर स्थित समस्त ब्रह्माण्डों को देखा।
भगवान के विश्वरूप के चमत्कारी दृश्यों का वर्णन करने के पश्चात् संजय कहता है कि यह सम्पूर्ण विश्व को समेटे हुए हैं। इससे अधिक आश्चर्य यह है कि अर्जुन ने श्रीकृष्ण के शरीर में समग्र अस्तित्त्वों का अवलोकन किया। उसने अनंत ब्रह्माण्डों की सृष्टि को उनकी आकाश गंगाओं और ग्रह प्रणालियों सहित परमेश्वर के दिव्य शरीर के एक अंश में देखा। अपनी बाल लीलाओं के दौरान श्रीकृष्ण ने अपनी माँ यशोदा को भी अपना विराटरूप दिखाया था। प्रभु अपने रहस्यमयी वैभव को छिपा कर भक्तों को आनन्द प्रदान करने हेतु एक छोटे बालक की भूमिका निभा रहे थे। श्रीकृष्ण को अपना पुत्र समझ कर यशोदा माता ने उन्हें लगातार मना करने के पश्चात् भी मिट्टी खाने के लिए कठोर दण्ड दिया और उन्हें अपना मुँह खोलने को कहा ताकि वह देख सकें कि उन्होंने मिट्टी खायी है या नहीं। किन्तु वह आश्चर्यचकित रह गयीं जब श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया शक्ति द्वारा अपना मुँह खोल कर उन्हें अपने विराटरूप का दर्शन कराया। यशोदा छोटे से बालक के मुँह में असंख्य वैभवों को देखकर बेसुध हो गयीं।
इस आश्चर्यजनक दृश्य के अवलोकन से वह मूर्छित हो गयीं और श्रीकृष्ण के स्पर्श से वह अपनी सामान्यावस्था में लौटीं जिस विराटरूप को श्रीकृष्ण ने माता यशोदा को दिखाया था, उसी रूप को वह अपने प्रिय मित्र अर्जुन के समक्ष प्रकट करते हैं। अब संजय श्रीकृष्ण के विराटरूप के संबंध में अर्जुन की प्रतिक्रिया का वर्णन करेंगे।
तत: स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जय: |
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत || 14||
विश्व रूप दर्शन योग तब आश्चर्य में डूबे अर्जुन के रोंगटे खड़े हो गए और वह मस्तक को झुकाए भगवान के समक्ष हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना करने लगा।
उस दृश्य को देखकर अर्जुन अवाक् रह गया। इस दृश्य ने उसके हृदय की तंत्रियों को झकझोर दिया। भक्तिमय मानो भाव कभी-कभी शारीरिक लक्षणों तथा हाव-भावों में प्रदर्शित होता है।
भक्तिग्रंथों में ऐसे आठ लक्षणों या 'अष्ट सात्विक भावों' का वर्णन किया गया है जो कभी-कभी भक्तों में प्रकट होते हैं जब उनका हृदय भक्ति से रोमांचित हो जाता है।
स्तंभः स्वेदोऽथ रोमाञ्च स्वरभेदो थ वेपथुः।
वैवर्णमश्रुप्रलय इत्यष्टो सात्विका: स्मृता:।।
(भक्तिरसामृतसिंधु)
स्तंभवत् होना, स्वेद, स्वर भंग, कम्पन, विवर्णता, (भस्मवर्ण होना) अश्रुपात, और प्रलय (मूर्छा) ये सब शारीरिक लक्षण हैं जिनके द्वारा अगाध प्रेम प्रकट होता है। यही अर्जुन ने अनुभव किया था जिससे उसके शरीर के रोम कूप सिहरने लगे। श्रद्धा के साथ नतमस्तक होकर और हाथ जोड़कर अर्जुन ने ये शब्द कहे। अर्जुन ने क्या कहा इसका वर्णन आगे 17 श्लोकों में किया जाएगा।
अर्जुन उवाच |
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् |
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् || 15||
अर्जुन ने कहा-मैंने आपके शरीर में सभी देवताओं और विभिन्न प्रकार के जीवों को देखा। मैंने वहाँ कमल पर आसीन ब्रह्मा और शिव तथा सभी ऋषियों और स्वर्ग के सर्पो को देखा।
अर्जुन ने कहा कि आपमें मैं तीनों लोको के अनंत जीवों को देख रहा हूँ। 'कमलासनस्थं' शब्द का प्रयोग ब्रह्मा के लिए किया गया है जो, ब्रह्माण्ड के कमल पर आसीन थे। भगवान शिव, विश्वामित्र जैसे ऋषि और वासुकि जैसे सर्प सभी भगवान के विराट रूप में दिखायी दे रहे थे।
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् |
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप || 16||
मैं सभी दिशाओं में अनगिनत भुजाएँ, उदर, मुँह और आँखों के साथ आपके सर्वत्र फैले हुए अनंतरूप को देखता हूँ। हे ब्रह्माण्ड के स्वामी! आपका रूप अपने आप में अनंत है, मुझे आप में कोई आरम्भ, मध्य और अंत नहीं दिखता।
अर्जुन ने इस श्लोक में दो संबोधनों का प्रयोग किया है-'विश्वेश्वर' का अर्थ 'ब्रह्माण्ड के नियामक' और 'विश्वरूप' का अर्थ 'सार्वभौमिक रूप' है।
अर्जुन ने कहा कि हे श्रीकृष्ण! ब्रह्माण्ड में केवल आपकी अभिव्यक्ति के सिवाय और कुछ नहीं है और आप परम गुरु भी हैं।
आगे वह अनुभव किए गए उस विश्वरूप की भव्यता के संबंध में अपनी अनुभूति को प्रकट करते हुए कहता है कि वह जिस ओर भी देखता है वह उस रूप के अंत का कोई निर्णय नहीं कर पाता क्योंकि उसे उसका आरम्भ भी नहीं मिलता। जब वह उस रूप का आरम्भ खोजना चाहता है तो वह सफल नहीं होता। जब वह मध्य में देखना चाहता है तो वह पुनः निष्फल रहता है और जब वह अंत पाना चाहता है भी कोई सीमा नहीं देख पाता।
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् |
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्
दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् || 17||
विश्व रूप दर्शन योग मैं मुकुट से सुशोभित, चक्र और गदा से सुसज्जित, शस्त्रों के साथ सर्वत्र दीप्तिमान लोक के रूप में आपके रूप को देख रहा हूँ। इस अग्नि में आपके तेज को देख पाना कठिन है, जो सभी दिशाओं से प्रस्फुटित होने वाले सूर्य के प्रकाश की भांति है।
प्राकृत आंखों से किसी अति दीप्तिमान वस्तु को देखने से आंखें चुंधिया जाती हैं। अर्जुन के समक्ष हजारों चमकते सूर्यों से अधिक दीप्तिमान विश्वरूप था। यह ठीक वैसा ही है जैसे सूर्य के प्रकाश में आंखें चुंधिया जाती हैं। उस विराट विश्वरूप को अर्जुन इसलिए देख सका क्योंकि उसे भगवान से दिव्य आंखें प्राप्त हुई थी। उस विश्वरूप के भीतर अर्जुन ने चार भुजाओं वाले विष्णु रूप को चार प्रसिद्ध आयुधों-गदा, चक्र, शंख और कमल के पुष्प सहित देखा।
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् |
त्वमव्यय: शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे || 18||
मैं आपको परम अविनाशी मानता हूँ। आप ही वेदादि शास्त्रों द्वारा ज्ञेय परम सत्य हो। आप समस्त सृष्टि के आधार हैं और सनातन धर्म के नित्य पालक और रक्षक हैं और अविनाशी परम प्रभु हैं।
अर्जुन ने कहा कि वह श्रीकृष्ण को परमप्रभु के रूप में स्वीकार करता है। वे समस्त सृष्टि के आश्रय हैं और शास्त्रों के माध्यम से जाने जाते हैं। कठोपनिषद् में वर्णन किया गया है-
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति
(कठोपनिषद्-1.2.15)
सभी वैदिक मंत्रों का उद्देश्य हमें भगवान की ओर सम्मुख करना है। वे सभी वेदों के अध्ययन का विषय हैं। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है-
वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः
(श्रीमद्भागवतम्-1.2.28)
'वैदिक ज्ञान' का उद्देश्य भगवान को पाना है। सभी प्रकार के यज्ञ और तपस्याएँ उन्हें प्रसन्न करने के लिए की जाती हैं। अर्जुन अपना अनुभव व्यक्त करते हुए कहता है कि भगवान का साकार रूप समस्त वैदिक ज्ञान का विषय है।
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् |
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं-
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् || 19||
आप आदि, मध्य और अंत से रहित हैं और आपकी शक्तियों का कोई अंत नहीं है। सूर्य और चन्द्रमा आप के नेत्र हैं और अग्नि आपके मुख के तेज के समान है और मैं आपके तेज से समस्त ब्रह्माण्ड को प्रकाशित होता हुआ देख रहा हूँ।
सोलहवें श्लोक में अर्जुन ने कहा था कि भगवान आदि, मध्य और अंत रहित है। अब जो कुछ उसने देखा उसे वह केवल तीन श्लोकों के पश्चात् इसे दोहराता है। यदि किसी कथन को विस्मय के कारण दोहराया जाता है तो उसे चमत्कार की अभिव्यक्ति के रूप में समझना चाहिए और उसे साहित्यिक दोष नहीं समझना चाहिए। उदाहरणार्थ किसी सांप को देखने के पश्चात् कोई चिल्ला कर कहता है-'देखो सांप! सांप! सांप!' इसी प्रकार अर्जुन भी आश्चर्यचकित होकर अपने कथनों को दोहराता है। भगवान वास्तव में आदि और अंत से रहित हैं क्योंकि स्थान, काल, कारण-कार्य-संबंध उन्हीं के नियंत्रण में हैं। इसलिए वे उनके परिणाम से परे हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य, चन्द्रमा और तारे अपनी ऊर्जा भगवान से प्राप्त करते हैं। इस प्रकार वे भगवान ही हैं जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को गतिशीलता प्रदान करते हैं।
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वा: |
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् || 20||
हे सभी जीवों के परम स्वामी! स्वर्ग और पृथ्वी के बीच के स्थान और सभी दिशाओं के बीच आप अकेले ही व्याप्त हैं। मैंने देखा है कि आपके अद्भुत और भयानक रूप को देखकर तीनों लोक भय से काँप रहे हैं।
अर्जुन कहता है कि हे सर्वव्यापी भगवान! आप सारी पृथ्वी और आकाश और उनके बीच के स्थान में तथा सभी दस दिशाओं में व्याप्त हैं। सभी जीव आपके भय से कांपते दिखाई दे रहे हैं। तीनों लोक भगवान के विश्वरूप के समक्ष आख़िर क्यों काँप रहे हैं, जबकि उन्होंने भगवान का विश्वरूप देखा ही नहीं हैं। यहाँ अर्जुन कहता है कि सभी भगवान के नियम के भय से कार्य कर रहे हैं। उनकी आज्ञाएँ अटल हैं और सभी उनका पालन करने के लिए बाध्य होते हैं।
कर्म प्रधान बिश्व करि राखा
जो जस करइ सो तस फल चाखा
(रामचरितमानस)
"संसार कर्म के नियमों के अधीन होता है। हम जो भी कर्म करते हैं उससे हमारे कर्मफल संचित होते हैं।" कर्म के नियमों के समान असंख्य नियम अस्तित्त्व में हैं। कई वैज्ञानिक खोज और अविष्कार करते हुए वैज्ञानिक सिद्धान्त बनाते हैं किन्तु वह नियम नहीं बना सकते। भगवान सर्वोच्च विधि निर्माता है और सभी उसके नियमों के अधीन हैं।
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति
केचिद्भीता: प्राञ्जलयो गृणन्ति |
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घा:
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभि: पुष्कलाभि: || 21||
स्वर्ग के सभी देवता आप में प्रविष्ट होकर आपकी शरण ग्रहण कर रहे हैं और कुछ भय से हाथ जोड़कर आपकी स्तुति कर रहे हैं। महर्षि और सिद्धजन पवित्र स्रोतों का पाठ कर अनेक प्रार्थनाओं के साथ आपकी स्तुति कर रहे हैं।
अर्जुन ने यहाँ श्रीकृष्ण के कालरूप को देखा अर्थात् उन्हें सब कालों के भक्षक के रूप में देखा। कालचक्र का विकराल रूप देवताओं सहित शक्तिशाली योद्धाओं का भी संहार कर देता है। अर्जुन ने उन्हें भगवान के कालरूप में प्रवेश करते हुए देखा। उसी समय उसने ऋषियों और पुण्यात्माओं को भगवान का चिंतन, और स्तुति करते हुए देखा।
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च |
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे || 22||
रुद्र, आदित्य, वसु, साध्यगण, विश्वदेव, दोनों अश्विनी कुमार, मरुत, पितर, गन्धर्व, यक्ष, असुर तथा सभी सिद्धजन आपको आश्चर्य से देख रहे हैं।
ये सभी महान विभूतियाँ भगवान की शक्ति द्वारा संचालित होती हैं और भगवान द्वारा सौंपे गये कर्त्तव्यों का कृतज्ञता से पालन करती हैं। अतः इनके लिए उल्लिखित है कि ये सब भगवान के ब्रह्माण्डीय रूप को आश्चर्यचकित होकर देख रहे हैं।
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुबाहूरुपादम् |
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोका: प्रव्यथितास्तथाहम् || 23||
हे सर्वशक्तिमान भगवान! अनेक मुख, नेत्र, भुजा, जांघे, पाँव, पेट तथा भयानक दांतों सहित आपके विकराल रूप को देखकर समस्त लोक भय से त्रस्त है और उसी प्रकार से मैं भी।
सभी ओर प्रभु के असंख्य हाथ, टांगें, मुख और उदर दिखाई दे रहे थे जिसका श्वेताश्वतरोपनिषद् में इस प्रकार से वर्णन किया गया है
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्
स भूमिम् विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-3.14)
"परम सत्ता के हजारों सिर, हजारों आंखें और हजारों पाँव हैं। उन्होंने समस्त ब्रह्माण्ड को अपने आवरण में समेट रखा है किन्तु फिर भी वे इससे परे हैं। वह सब मनुष्यों में नाभि से लगभग दस अंगुल ऊपर हृदय कमल में रहते हैं।" वे जो उन्हें देख रहे हैं और जो उन्हें देख चुके हैं, भयभीत हो चुके और भयतीत हो रहे हैं ये सभी भगवान के विश्वरूप के भीतर हैं। कठोपनिषद् में पुनः वर्णन किया गया है-
भयादस्याग्निस्तपति भयात्त्पति सूरयः।
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः।।
(कठोपनिषद्-2.3.3)
"भगवान के भय से अग्नि जलती है और सूर्य चमकता है। उन्हीं के भय के कारण वायु प्रवाहित होती है और इन्द्र धरती पर वर्षा करता है। यहाँ तक कि मृत्यु का देवता यमराज भी भगवान के समक्ष भय से कांपता है।"
नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् |
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो || 24||
हे विष्णु भगवान! आकाश को स्पर्श करते हुए अनेक रंगों, दीप्तिमान, मुख फैलाए और चमकती हुई असंख्य आंखों से युक्त आपके रूप को देखकर मेरा हृदय भय से कांप रहा है और मैंने अपना सारा धैर्य और मानसिक संतुलन खो दिया है।
भगवान के ब्रह्माण्डीय रूप को देखकर अर्जुन का श्रीकृष्ण के साथ संबंध का रूप परिवर्तित हो गया। पहले वह उन्हें अपने अंतरंग मित्र के रूप में देखता था और उनका परस्पर व्यवहार एक सहयोगी की भांति था। यह प्रेम की प्रकृति है। यह मन को इतनी गहनता से तल्लीन कर देता है कि भक्त अपने प्रियतम भगवान की सर्वज्ञता को भूल जाता है। यदि वह औपचारिकता बनाए रखता है तब वह प्रेम में परिपूर्णता प्रकट करने में असमर्थ रहता है।
उदाहरणार्थ एक पत्नी अपने पति से गहन प्रेम करती है। यद्यपि वह किसी राज्य का राज्यपाल हो तब भी पत्नी उसे पति के रूप में ही देखती है और इसी कारण से वह उससे घनिष्ठ संबंध बनाने में सफल हो सकती है। यदि उसकी बुद्धि यह निर्णय कर लेती है कि उसका पति तो राज्यपाल है फिर जब भी वह उसके सामने आएगा उसे तब उसकी सेवा के लिए तत्पर रहना और पड़ेगा औपचारिक रूप से उसका अधिक सम्मान करना होगा। इसलिए प्रियतम की औपचारिक स्थिति का ज्ञान प्रेम की भावनाओं में डूब जाता है। इस प्रकार की स्थिति भगवान के प्रति समर्पण भक्ति की दशा में होती है। ब्रज के ग्वालबाल ने श्रीकृष्ण को अपने अंतरंग सखा के रूप में देखते थे। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने उनकी श्रीकृष्ण के साथ की गई लीलाओं में इसका अति सुन्दर चित्रण किया है
देखो देखो री, ग्वाल बालन यारी
रिझवत खेल जिताय सखन को,
घोड़ा बनि बनि बनवारी
(प्रेम रस मदिरा रसिया माधुरी पद-7)
" श्रीकृष्ण और उनके बाल सखाओं के बीच मधुर प्रेम को तो देखो कि वे परस्पर खेलते हैं और जब श्रीकृष्ण खेल में हार जाते हैं तो वह भूमि पर बैठकर घोड़ा बनते हैं और सखा उनकी सवारी करते हैं"। अगर ग्वाल सखाओं को यह बोध हो जाता कि श्रीकृष्ण भगवान थे, तब वे कभी ऐसा करने का साहस नहीं करते। अतः भगवान भी अपने भक्तों के साथ अंतरंग संबंध को पसंद करते हैं जिससे कि वे प्रिय मित्र के संबंध को निभा सके। जब श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर प्रसिद्ध गोवर्धन पर्वत उठाने की लीला की जिसमें उन्होंने स्वर्ग के राजा इन्द्र द्वारा ब्रज भूमि पर की गयी मूसलाधार वर्षा से ब्रजवासियों की रक्षा करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी बाएँ हाथ की छोटी उंगली से उठा लिया था तब उनकी इस लीला से उनके ग्वालबाल मित्र प्रभावित नहीं हुए। उनकी दृष्टि में श्रीकृष्ण केवल उनके प्रिय मित्र थे और इसलिए उन्होंने विश्वास नहीं किया कि श्रीकृष्ण ने पर्वत उठाया था। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने इसका अत्यंत सुन्दर चित्रण किया है
नख धार्यो गोवर्धन गिरि जब, सखन कह्यो हम गिरिधारी
(प्रेम रस मदिरा रसिया माधुरी प्रद-7)
जब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपने बाएँ हाथ की छोटी उंगली से उठाया तब उनके ग्वाल सखाओं ने गोवर्धन पर्वत के तल पर छड़ी लगा दी और सोचने लगे कि वास्तव में उन्होंने इस पर्वत को उठाया था। तत्पश्चात् इन्द्र अपनी पराजय स्वीकार करते हुए हाथी पर बैठकर वहाँ आया। उसने श्रीकृष्ण को परमात्मा के रूप में न पहचानने तथा मूसलाधार वर्षा करने के लिए क्षमा मांगी। जब ग्वालबालों ने वहाँ स्वर्ग के राजा इन्द्र को आते देखा जो उनके मित्र के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए अपनी भूल के लिए क्षमा मांग रहा था। तब उन्हें बोध हुआ कि श्रीकृष्ण भगवान हैं और उन्होंने दूर से श्रीकृष्ण को भय से देखना आरम्भ कर दिया। उनकी मित्रता को भक्ति भावना, भय और श्रद्धा में परिवर्तित होता देखकर श्रीकृष्ण को शोक हुआ-"हमारे भीतर परस्पर प्रेम का आनन्द समाप्त हो चुका है। वे अब मुझे भगवान समझने लगे हैं।" अतः उन्होंने अपनी योगमाया शक्ति द्वारा ग्वालबालों ने जो भी देखा था उसे विस्मृत करा दिया और तब वे पुनः अनुभव करने लगे कि श्रीकृष्ण उनके मित्र के अलावा कुछ भी नहीं हैं।
अर्जुन श्रीकृष्ण का सख्य भाव वाला भक्त था। श्रीकृष्ण के साथ उसका व्यवहार एक मित्र जैसा था इसीलिए उसने श्रीकृष्ण को अपने रथ का सारथी बनाना स्वीकार किया था। अगर उसकी भक्ति इस सत्य से प्रेरित होती कि श्रीकृष्ण समस्त सृष्टि के परम स्वामी हैं तब अर्जुन उनसे कभी ऐसी निम्न सेवा न करवाता लेकिन अब उनके अनंत वैभव और कल्पनातीत समृद्धि को देखकर श्रीकृष्ण के प्रति उसका मैत्री भाव भय में परिवर्तित हो गया।
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि |
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास || 25||
प्रलय के समय की प्रचण्ड अग्नि के सदृश तुम्हारे अनेक मुखों के विकराल दांतों को देखकर मैं भूल गया हूँ कि मैं कहाँ हूँ और मुझे कहाँ जाना है। हे देवेश! आप ब्रह्माण्ड के आश्रयदाता हैं कृपया मुझ पर करुणा करो।
अर्जुन ने श्रीकृष्ण के जिस विश्वरूप को देखा वह केवल श्रीकृष्ण के व्यक्तित्त्व का अन्य स्वरूप मात्र हैं और उनसे भिन्न नहीं हैं। अनेक अद्भुत और आश्चर्यजनक भगवान की अभिव्यक्तियों को देखकर अर्जुन अब भयभीत हो जाता है और सोचने लगता है कि श्रीकृष्ण उस पर क्रोधित है। इसलिए वह उनसे दया करने की प्रार्थना करता है।
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्रा:
सर्वे सहैवावनिपालसङ्घै: |
भीष्मो द्रोण: सूतपुत्रस्तथासौ
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यै: || 26||
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि |
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गै: || 27||
मैं धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों को उनके सहयोगी राजाओं और भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण तथा हमारे पक्ष के सेना नायकों सहित आपके विकराल मुख में प्रवेश करता देख रहा हूँ। इनमें से कुछ के सिरों को मैं आपके विकराल दांतों के बीच पिसता हुआ देख रहा हूँ।
इस श्लोक में अर्जुन यह उल्लेख करता है कि भगवान के दांत कैसे हैं हम अपने दांतों से भोजन को चबाते हैं। भगवान के दाँत काल चक्र के रूप में सबको चबाकर मृत्यु का ग्रास बनाते हैं।
अमेरिका के कवि एच. डब्ल्यू. लोंगफैलो ने अपनी कविता में लिखा है-
यद्यपि भगवान की चक्कियाँ (दाँत) धीरे-धीरे पीसती हैं
लेकिन वे अत्यधिक छोटा-छोटा पीसती हैं,
यद्यपि वे धैर्य के साथ खड़े होकर प्रतीक्षा करते हैं
किन्तु वे सुनिश्चित रूप से सबको पीसते हैं।
अर्जुन ने कौरवों के सेना नायक-भीष्म, द्रोणाचार्य और अपनी सेना के सेना नायकों को तीव्रता से भगवान के मुख में प्रवेश करते हुए और उनके दांतों के बीच आते हुए देखा। उसने भगवान के विश्वव्यापी रूप में निकट भविष्य को देखा क्योंकि भगवान काल की सीमाओं से परे हैं। इसलिए भूत, वर्तमान और भविष्य उनमें हर समय दिखाई देते हैं। भीष्म कौरवों और पाण्डवों के प्रपितामह शांतनु और गंगा के पुत्र थे। अपने पिता के पुनर्विवाह हेतु उन्होंने राज्य सिंहासन का त्याग करने और जीवन पर्यन्त ब्रह्मचर्य का पालन करने की प्रतिज्ञा ली थी। भीष्म भली-भांति जानते थे कि दुर्योधन दुष्ट है और वह पाण्डवों के अधिकार को छीनना चाहता है। इसके पश्चात् भी वे दुर्योधन का समर्थन करते रहे। श्रीमद्भागवतम् में भीष्म द्वारा भगवान को की गयी प्रार्थना का वर्णन किया गया है जब वे अपने जीवन के अंतिम समय में बाणों की शैय्या पर लेटे हुए थे।
सपदि सखिवचो निशम्य मध्ये निजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य।
स्थितवति परसैनिकायुरक्षणा हृतवति पार्थसखे रतिर्ममास्तु ।।
(श्रीमद्भागवतम्-1.9.35)
"मेरा मन अर्जुन के प्रिय मित्र श्रीकृष्ण में एकाग्र हो जाए जो अपने मित्र के आग्रह पर तुरन्त ही पाण्डव-सेना और कौरव-सेना के मध्य रथ ले आये और वहाँ स्थित होकर जिन्होंने केवल अपनी दृष्टि से ही शत्रु पक्ष के सेना नायकों की आयु छीन ली। उन पार्थ सखा के चरणों में मेरी प्रीति बनी रहे।" अतः भीष्म पितामह को स्वयं बोध था कि भगवान के विरुद्ध युद्ध लड़ने का परिणाम मृत्यु होगा। द्रोणाचार्य कौरवों और पाण्डवों को सैन्य शिक्षा प्रदान करने वाले गुरु थे। वे इतने निष्पक्ष थे कि उन्होंने अपने पुत्र अश्वत्थामा की अपेक्षा अर्जुन को युद्धकला में अधिक निपुण बनाया किन्तु उन्होंने विवशतापूर्वक दुर्योधन का पक्ष लिया क्योंकि वे अपने जीवनयापन के लिए आर्थिक रूप से उस पर निर्भर थे। इसलिए द्रोणाचार्य ने भी युद्ध में मरने का निश्चय किया। उन्हें बोध था कि अपने भाग्य के अनुसार वे युद्ध में मृत्यु को प्राप्त होंगे।
कर्ण दुर्योधन का अंतरंग मित्र था और इसलिए उसने कौरवों के पक्ष में युद्ध लड़ा। उसमें भी महानायकों जैसे गुण थे। जब श्रीकृष्ण ने यह रहस्योद्घाटन किया कि वह कुन्ती का ज्येष्ठ पुत्र है और पाण्डव वास्तव में उसके भाई हैं तब उसने श्रीकृष्ण से कहा कि वे युधिष्ठिर को इस रहस्य के संबंध में कुछ न बताएँ क्योंकि वह मेरा वध युद्ध में पराजित हो जाएगा। यद्यपि उसने युद्ध में दुर्योधन का पक्ष लिया था किन्तु उसे भी यह ज्ञान था कि नियति के अनुसार उसे भी युद्ध में वीरगति प्राप्त होगी।
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगा:
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति |
तथा तवामी नरलोकवीरा
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति || 28||
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगा: |
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगा: || 29||
जिस प्रकार से नदियों की कई लहरें समुद्र में प्रवेश करती हैं उसी प्रकार से ये सब महायोद्धा आपके धधकते मुख में प्रवेश कर रहे हैं। जिस प्रकार से पतंग तीव्र गति से अग्नि में प्रवेश कर जलकर भस्म हो जाता है उसी प्रकार से ये सेनाएँ अपने विनाश के लिए तीव्र गति से आपके मुख में प्रवेश कर रही हैं।
महाभारत के युद्ध में कई बड़े राजा और योद्धा थे जिन्होंने अपने धर्म का पालन करते हुए युद्ध भूमि में वीरगति प्राप्त की। अर्जुन इनकी तुलना नदी की लहरों से करता है जो स्वेच्छा से समुद्र में मिल जाती हैं। उस युद्ध में कई लोग ऐसे भी थे जिन्होंने लोभ और निजी स्वार्थ के लिए युद्ध लड़ा। अर्जुन ने उनकी तुलना पतंगों से की है जो लालच के कारण अज्ञानतावश अग्नि में जलकर भस्म हो जाते हैं लेकिन दोनों स्थितियों में वे तीव्रता से सिर पर खड़ी मृत्यु के मुख में प्रवेश कर रहे हैं।
लेलिह्यसे ग्रसमान: समन्ता-
ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भि: |
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं
भासस्तवोग्रा: प्रतपन्ति विष्णो || 30||
तुम अपनी तीक्ष्ण जिह्वा से समस्त दिशाओं के जीव समूहों को चाट रहे और उन्हें अपने प्रज्जवलित मुखों में निगल रहे। हे विष्णु! तुम अपने सर्वत्र फैले प्रचंड तेज की किरणों से समस्त ब्रह्माण्ड को भीषणता से झुलसा रहे हो।
भगवान अपने सृजन, पालन और संहार की शक्ति द्वारा संसार को नियंत्रित करते हैं। भगवान के विश्वरूप में नियत भावी घटनाओं के दृश्य देखकर अर्जुन युद्ध में अपने शत्रुओं का विनाश देखता है। वह अपने अनेक सहयोगियों को भी मृत्यु का ग्रास बनते हुए देखता है। ऐसे अद्भुत दृश्य को देखकर जड़वत् अर्जुन अगले श्लोक में भगवान से प्रार्थना करता है।
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद |
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् || 31||
हे देवेश! कृपया मुझे बताएं कि अति उग्र रूप में आप कौन हैं? मैं आपको प्रणाम करता हूँ। कृपया मुझ पर करुणा करें। आप समस्त सृष्टियों से पूर्व स्थित आदि भगवान हैं। मैं आपको जानना चाहता हूँ और मैं आपकी प्रकृति और प्रयोजन को नहीं समझ पा रहा हूँ।
इससे पूर्व अर्जुन ने भगवान का विश्वरूप देखने की प्रार्थना की थी। जब श्रीकृष्ण ने उसे अपना विराटरूप दिखाया तब अर्जुन मोहित और व्यथित हो गया। उस अकल्पनीय ब्रह्माण्डीय दृश्य को देखकर अब अर्जुन भगवान की प्रकृति और प्रयोजन को जानने की हार्दिक अभिलाषा प्रकट करता है इसलिए वह प्रश्न करता है, “आप कौन हैं और आपका क्या प्रयोजन है?"
श्रीभगवानुवाच |
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त: |
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा: || 32||
परम प्रभु ने कहा-“मैं प्रलय का मूलकारण और महाकाल हूँ। मैं जगत का संहार करने के लिए आता हूँ। तुम्हारे युद्ध में भाग नहीं लेने पर भी युद्ध में खड़े विरोधी पक्ष के योद्धा मारे जाएंगे।"
अर्जुन के प्रश्न ‘कि वे कौन हैं?' की प्रतिक्रिया में श्रीकृष्ण सर्वशक्तिशाली काल और ब्रह्माण्ड के विनाशक के रूप में अपना स्वरूप प्रकट करते हैं। 'काल' शब्द की उत्पत्ति 'कलयति' से हुई है जिसका सामानार्थी शब्द गणयति है। इसका अर्थ है "काल का स्मरण करते रहे हैं।" सृष्टि की सभी घटनाएँ काल के गर्भ में समा जाती है।
'ओपन हाइमर' जो प्रथम एटम बम बनाने में अग्रिम सदस्य थे और हिरोशिमा और नागासाकी के ध्वंस के साक्षी थे, उन्होंने श्रीकृष्ण के इस श्लोक उद्धृत किया है-'काल' रूप-मैं समस्त जगत का विनाशक हूँ। काल सभी जीवों के जीवन की गणना और उसे नियंत्रित करता है। वही यह निश्चित करेगा कि कब भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महानुभावों के जीवन का अन्त होगा। यह अर्जुन के युद्ध में भाग न लेने के बावजूद भी शत्रु सेना का विनाश कर देगा क्योंकि भगवान की संसार निर्माण की योजना के अनुसार ऐसा होना सभाविक है।
यदि योद्धा पहले से ही मरे हुए हैं तब फिर अर्जुन युद्ध क्यों लड़े? श्रीकृष्ण इसे अगले श्लोक में स्पष्ट करेंगे।
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् |
मयैवैते निहता: पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् || 33||
इसलिए उठो युद्ध करो और यश अर्जित करो। अपने शत्रुओं पर विजय पाकर राज्य का भोग करो। ये सब योद्धा पहले ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे श्रेष्ठ धनुर्धर! तुम तो मेरे कार्य को सम्पन्न करने का केवल निमित्त मात्र हो।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनकी इच्छा है कि कौरवों का विनाश हो और धर्म की मर्यादा के अनुसार हस्तिनापुर पर पाण्डव शासन करें। युद्ध के परिणाम स्वरूप उन्होंने पहले से ही अधर्मियों का विनाश और धर्म की विजय निश्चित कर दी है। संसार के कल्याण हेतु उनकी योजना को किसी भी उपाय द्वारा टाला नहीं जा सकता। अब वह अर्जुन को बताते हैं कि वह चाहते हैं कि अर्जुन उनके कार्य को सम्पन्न करने का निमित्त मात्र बने। भगवान को अपने कार्यों हेतु मनुष्य की सहायता की अपेक्षा नहीं होती जबकि मनुष्य भगवान की इच्छा को पूर्ण कर नित्य सुख पाता है। भगवान की सेवा के लिए कुछ ऐसे अवसर पाकर हम भगवान की विशेष कृपा प्राप्त करते हैं और भगवान के नित्य दास बनने के पात्र हो जाते हैं।
अर्जुन को यह स्मरण करवाते हुए कि धनुर्विद्या में उसे उन्हीं की कृपा से असाधारण कौशल प्राप्त हुआ है, श्रीकृष्ण अर्जुन को निमित्त बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इसलिए वे अर्जुन को 'सव्यसाचिन्' कहकर संबोधित करते हैं जिसका अर्थ श्रेष्ठ धनुर्धर होना है क्योंकि अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर था और किसी भी हाथ से बाण चलाने में समर्थ था।
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् |
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् || 34||
द्रोणाचार्य, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और अन्य महायोद्धा पहले ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। इसलिए बिना विक्षुब्ध हुए इनका वध करो, केवल युद्ध करो और तुम अपने शत्रुओं पर विजय पाओगे।
कौरवों की ओर से कई सेना नायक कभी युद्ध में पराजित नहीं हुए थे। जयद्रथ को वरदान प्राप्त था कि उसका वध होने पर जैसे ही उसका शीश भूमि पर गिरेगा, उसी समय उसका वध करने वाले प्रतिद्वंदी का शीश भी टुकड़े होकर भूमि पर जा गिरेगा। कर्ण के पास इन्द्र द्व रा दी गई 'शक्ति' नामक विशेष शस्त्र था जिसका प्रयोग कर वह किसी का भी वध कर सकता था किन्तु इसका प्रयोग केवल एक बार ही किया जा सकता था इसलिए कर्ण ने इसे अर्जुन का वध करने के लिए सुरक्षित रखा था। द्रोणाचार्य ने परशुराम, जो भगवान का अवतार थे, से सभी प्रकार के शस्त्रों का काट करने की विद्या ग्रहण की थी। भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था और वे स्वयं अपनी मृत्यु का समय और स्थान निश्चित कर सकते थे, किन्तु फिर भी भगवान ने जब भी युद्ध में किसी को मारना चाहा तब उन्हें कोई भी बचा न सका। इसलिए कहा जाता है
विंध्य न ईंधन पाईये, सागर जुडई न नीर।
परई उपस कुबेर घर, ज्यों विपक्ष रघुबीर।।
"अगर भगवान राम किसी के विरुद्ध होने का निर्णय कर लें तब तुम भले ही विंध्याचल वन में निवास करने लगो किन्तु वहाँ तुम्हें जलाने के लिए लकड़ियाँ प्राप्त नहीं होगी। अगर तुम समुद्र के किनारे भी रहो तब भी तुम्हें अपनी आवश्यकता के लिए जल उपलब्ध नहीं होगा। यदि तुम धन के देवता कुबेर के घर में वास करते हो तब तुम्हें पर्याप्त भोजन भी नहीं मिल सकता।" अगर भगवान किसी को मारना चाहें तब उस व्यक्ति को मृत्यु से बचाने के लिए कितने ही कड़े सुरक्षा प्रबन्ध भी क्यों न कर लिए जाएँ तब भी उसकी मृत्यु को टाला नहीं जा सकता। समान रूप से श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्होंने युद्ध के परिणाम का निर्णय पहले ही कर रखा है लेकिन वह चाहते हैं कि अर्जुन उनकी इच्छा को पूरा करने का माध्यम बने और युद्ध में विजयी होकर यश प्राप्त करे। जिस प्रकार भक्त भगवान का महिमा मण्डन करता है, उसी प्रकार से भगवान का स्वभाव भी अपने भक्त की प्रशंसा करने का होता है। इसलिए श्रीकृष्ण युद्ध में मिलने वाली विजय का श्रेय स्वयं नहीं लेना चाहते थे। उनकी इच्छा यह थी कि लोग यह कहें कि “अर्जुन ने शौर्य के साथ युद्ध लड़ते हुए पांडवों की विजय सुनिश्चित की।"
आध्यात्मिक जीवन में भी साधक प्रायः उस समय हतोत्साहित हो जाते हैं जब वे स्वयं के क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, काम-वासना, अहंकार आदि मनोविकारों को वश में करने में समर्थ नहीं पाते। उनके गुरु उन्हें प्रोत्साहित करते हुए कहते हैं "निराश न हो, उठो इन दोषों का सामना करो। लड़ो और तभी तुम अपने मन रूपी शत्रु पर विजय पाओगे, क्योंकि भगवान तुम्हें विजयी बनाना चाहते हैं।" तुम्हारे प्रयास केवल निमित्त मात्र होंगे क्योंकि भगवान अपनी कृपा से तुम्हारी विजय सुनिश्चित करने की योजना बना चुके। भगवान द्वारा कर्तव्य पालन करने के आह्वान को सुनकर अर्जुन ने क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की। इसकी व्याख्या अगले श्लोक में की गयी है।
सञ्जय उवाच |
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य
कृताञ्जलिर्वेपमान: किरीटी |
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं
सगद्गदं भीतभीत: प्रणम्य || 35||
संजय ने कहा- केशव के इन वचनों को सुनकर अर्जुन ने भय से कांपते हुए अपने दोनों हाथों को जोड़कर श्रीकृष्ण को नमस्कार किया और अवरुद्ध स्वर में भयभीत होकर श्रीकृष्ण से इस प्रकार कहा।
यहाँ अर्जुन को 'किरीटी' कह कर संबोधित किया गया है। उसने एक बार दो दानवों का वध करने के लिए इन्द्र की सहायता की थी। इन्द्र ने प्रसन्न होकर उसे एक चमकीला मुकुट उपहार में दिया। मुकुट राज सिंहासन का प्रतीक भी होता है और संजय ने वृद्ध धृतराष्ट्र के सामने यह शब्द प्रयोग कर उन्हें यह संकेत दिया कि उसके पुत्र कौरव प्रस्तुत युद्ध में पराजित होकर राजपाट खो देंगे।
अर्जुन उवाच |
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च |
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घा: || 36||
अर्जुन ने कहाः हे हृषीकेश! यह सत्य है कि आपके नाम श्रवण और यश गान से संसार हर्षित होता है। असुर गण आपसे भयभीत होकर सभी दिशाओं में भागते रहते हैं और सिद्ध महात्माओं के समुदाय आपको नमस्कार करते हैं।
इसमें और अगले चार श्लोकों में अर्जुन अनेक परिप्रेक्ष्यों में भगवान की महिमा का वर्णन करता है। उसने 'स्थाने' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ है-यह उचित है।
यह स्वाभाविक है कि प्रजा अपने राजा की महिमा का गुणगान कर प्रसन्न रहती है। यह भी स्वाभाविक है कि जो लोग अपने राजा से द्वेष रखते हैं वे उससे भयभीत होकर इधर-उधर भागते रहते हैं। राजा के लिए यह भी आवश्यक है कि उसके अनुचर, मंत्री आदि उसके प्रति निष्ठावान हों। अर्जुन भी इसके समान वर्णन करते हुए कहता है कि केवल यही उपयुक्त है कि संसार परम प्रभु की महिमा का गान करता है और असुर उनसे भयभीत रहते हैं और संत पुरुष श्रद्धा भक्ति युक्त होकर उनकी आराधना करते हैं।
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे |
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसतत्परं यत् || 37||
हे सर्वश्रेष्ठ! आप ब्रह्मा से श्रेष्ठ और आदि सृष्टा हो तब फिर वह आपको नमस्कार क्यों न करें? हे अनंत, हे देवेश, हे जगत के आश्रयदाता आप सभी कारणों के कारण और अविनाशी हैं। आप व्यक्त और अव्यक्त से परे अविनाशी सत्य हैं।
अर्जुन ने इस श्लोक में 'कस्माच्च तेन' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ 'वे क्यों न करे?' है। जब समस्त सृष्टि भगवान से उत्पन्न होती है और उनमें ही स्थित और वापस उन्हीं में विलीन हो जाती है तब फिर सभी जीवों को भगवान के प्रति कृतज्ञता क्यों नहीं दर्शानी चाहिए? वे ही सब कुछ हैं। सृष्टि में जो भी व्यक्त है वह सब कुछ भगवान ही है क्योंकि वे सब भगवान की शक्ति हैं। सृष्टि में जो अव्यक्त रह जाता है भगवान उसमें भी व्याप्त हैं क्योंकि यह उनकी अदृश्य शक्ति है। इसलिए वे व्यक्त और अव्यक्त दोनों से परे हैं क्योंकि वे सर्वशक्तिमान हैं और सभी शक्तियों का स्रोत और मूल हैं। इसलिए न तो भौतिक शक्ति और न ही जीवात्मा उनके विलक्षण व्यक्तित्त्व पर प्रभाव डाल सकती है। वे दोनों से श्रेष्ठ और परे हैं।
अर्जुन विशेष रूप से उल्लेख करता है कि वे ब्रह्मा से श्रेष्ठ हैं क्योंकि ब्रह्मा ब्रह्माण्ड में सबसे वरिष्ठ हैं। सभी जीव ब्रह्मा या उनके वंशजों की सन्तानें हैं जबकि ब्रह्मा स्वयं भगवान विष्णु की कमलनाल से उत्पन्न हुए थे जो श्रीकृष्ण का विस्तार हैं। इसलिए ब्रह्मा को संसार का वरिष्ठ प्रपितामह माना गया है। अतः यह उचित ही है कि ब्रह्मा भी भगवान को नमस्कार करें।
त्वमादिदेव: पुरुष: पुराणस्-
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् |
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप || 38||
आप ही सर्वात्मा और दिव्य सनातन पुरुष हैं, आप इस ब्रह्माण्ड के परम आश्रय हैं। आप ही सर्वज्ञ और जो कुछ भी जानने योग्य है वह सब आप ही है। आप ही परम धाम हैं। हे अनंत रूपों के स्वामी! केवल आप ही समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं।
अर्जुन श्रीकृष्ण को दिव्य सनातन पुरुष के रूप में संबोधित करता है जो सभी कारणों के कारण हैं। सभी वस्तुओं और सभी जीवन रूपों का कोई कारण या मूल होता है जिससे उनकी उत्पत्ति होती है। भगवान विष्णु का भी कारण है। यद्यपि वह भगवान का रूप हैं किन्तु उनका यह रूप श्रीकृष्ण का विस्तार है जबकि श्रीकृष्ण किसी के स्वरूप के विस्तार नहीं हैं। वे कारण रहित और सृष्टि में प्रकट सभी अस्तित्त्वों का मूल कारण हैं। इसलिए ब्रह्मा को उनकी आराधना करनी चाहिए।
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकरणम्।। (ब्रह्मसंहिता-5.1)
" श्रीकृष्ण परमात्मा का मूल स्वरूप हैं। वे सर्वज्ञ और आनंदस्वरूप हैं। वे सबके कारण और स्वयं कारण रहित हैं। वह सब कारणों के कारण हैं।" श्रीकृष्ण सर्वांतर्यामी हैं। वे सर्वज्ञ और ज्ञेय दोनों हैं। श्रीमद्भागवतम् (4.29.49) में वर्णन है- “सा विद्या तन्मतिर्यया" "वास्तविक ज्ञान वही है जो भगवान को जानने में सहायता करे।" जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं-
जो हरि सेवा हेतु हो, सोई कर्म बखान।
जो हरि भगति बढ़ावे, सोई समुझिय ज्ञान ।।
(भक्ति शतक श्लोक-66)
कोई भी कर्म यदि भगवान की सेवा के लिए किया जाता है उसे ही वास्तव में कर्म कहते हैं। जो ज्ञान भगवान से प्रेम को बढ़ाये वही वास्तविक ज्ञान है। अतः भगवान ज्ञाता और ज्ञेय दोनों हैं।
वायुर्यमोऽग्निर्वरुण: शशाङ्क:
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्व:
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते || 39||
आप वायु, यम, अग्नि, जल और चन्द्रमा के देवता हैं। आप ब्रह्मा के पिता और सभी जीवों के प्रपितामह हैं। अतः मैं आपको हजारों बार और बार-बार नमस्कार करता हूँ।
श्रीकृष्ण के प्रति अपार श्रद्धा से युक्त अर्जुन हजारों बार 'सहस्त्र' कहकर उनका अभिवादन करता है। भारत में दीपावली के त्योहार के दौरान हाथी, घोड़े, स्त्री-पुरुष और कुत्ते के आकार की मिठाइयाँ बनायी जाती हैं किन्तु सभी में एक सामग्री शक्कर ही होती है। समान रूप से स्वर्ग के देवताओं का अपना विभिन्न प्रकार का व्यक्तित्त्व होता है और वे संसार के संचालन हेतु विशिष्ट दायित्वों का निर्वहन करते हैं। किन्तु वही एक भगवान उन सबमें स्थित रहते हैं और उन्हें प्रदान की गयी विशेष शक्तियों द्वारा प्रकट होते हैं। एक अन्य उदाहरण देखें। विभिन्न प्रकार के आभूषण स्वर्ण से बनते हैं। उन सबका रूप विभिन्न होता है पर फिर भी वे सब स्वर्ण ही होते हैं इसलिए सम्पूर्ण स्वर्ण आभूषण नहीं होता किंतु सभी आभूषण स्वर्ण होते हैं। उसी प्रकार भगवान में ही सब देवता हैं लेकिन देवता भगवान नहीं हैं। अतः अर्जुन इस श्लोक में कहता है कि श्रीकृष्ण, वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा और ब्रह्मा भी हैं।
नम: पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्व: || 40||
हे अनंत शक्तियों के स्वामी। आपको आगे और पीछे और वास्तव में सभी ओर से नमस्कार है आप असीम पराक्रम और शक्ति के स्वामी हैं और सर्वव्यापी हैं। अतः आप सब कुछ हैं।
अर्जुन श्रीकृष्ण की महिमा का निरन्तर गान करते हुए इस प्रकार से यह घोषणा करता है कि वे 'अनंतवीर्य' और 'अनन्त विक्रम' अर्थात् अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी हैं। वह विस्मित होकर उन्हें सभी दिशाओं से बार-बार नमो-नमो कहकर नमस्कार करता है।
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति |
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि || 41||
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु |
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् || 42||
आपको अपना मित्र मानते हुए मैंने धृष्टतापूर्वक आपको हे कृष्ण, हे यादव, हे प्रिय मित्र कहकर संबोधित किया क्योंकि मुझे आपकी महिमा का ज्ञान नहीं था। उपेक्षित भाव से या प्रेमवश होकर यदि उपहासवश मैंने कभी विश्राम करते हुए, बैठते हुए, खाते हुए, अकेले में या अन्य लोगों के समक्ष आपका कभी अनादर किया हो तो उन सब अपराधों के लिए हे अचिन्त्य! मैं आपसे क्षमा याचना करता हूँ।
भगवान की प्रभुता को अद्वितीय घोषित करते हुए वेदों में वर्णन किया गया है-
अहमेवासमेवाग्रे नान्यत् किञ्चान्तरं बहिः
(श्रीमद्भागवतम्-6.4.47)
"मैं परम प्रभु सभी प्राणियों में स्थित हूँ। मेरे से परे और मेरे से बढ़कर कोई नहीं है"
विमोङ्कार परात्परः
(वाल्मीकि रामायण)
"अनादि शब्द 'ओम्' आपकी अभिव्यक्ति है। आप में महानतम हैं।"
वासुदेवः प्र: प्रभुः
(नारद पंचरात्र)
" श्रीकृष्ण परम भगवान हैं।"
न देवः केशवात् परः
(नारद पुराण)
"भगवान कृष्ण से बढ़कर कोई देवता नहीं है।"
विद्यात् तं पुरुषम् परम्
(मनुस्मृति-12.122)
"भगवान सभी व्यक्तित्त्वों में सर्वश्रेष्ठ और परम हैं" लेकिन जैसा कि इस अध्याय के श्लोक-24 में उल्लेख किया गया है कि जब प्रेम-प्रगाढ़ हो जाता है तो प्रेमी प्रियतम की औपचारिक पदवी को भूल जाता है। इस प्रकार से अर्जुन श्रीकृष्ण के साथ व्यतीत किए गए अंतरंग मित्रता के अविस्मरणीय क्षणों के आनन्द में निमग्न होने के कारण उनकी सर्वोच्च स्थिति से अनभिज्ञ था। श्रीकृष्ण का विश्वरूप देखकर अर्जुन अब यह सोंचकर दुःखी हो जाता है कि भगवान केवल उसके मित्र और अंतरंग सखा नहीं हैं बल्कि परम पुरुषोत्तम भगवान भी हैं जिनका देवता, गंधर्व, सिद्धगण आदि श्रद्धायुक्त होकर आदर सत्कार करते हैं। इसलिए वह यह सोंचकर शोक व्यक्त करता है कि उसने उन्हें केवल अपना मित्र समझकर उनका अनादर करने की धृष्टता की। प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्तियों के प्रति आदर प्रकट करने के लिए उनका प्रथम नाम नहीं लिया जाता। इसलिए अर्जुन व्याकुल हो जाता है कि उसने घनिष्ठता के कारण अपनी पद प्रतिष्ठा को श्रीकृष्ण के समतुल्य समझा और धृष्टतापूर्वक उन्हें स्नेहपूर्वक संबोधनों 'मेरे मित्र', 'मेरे सखा' और 'हे कृष्ण' जैसे संबोधनों से पुकारा। अतः वह अपने उन सब कृत्यों के लिए क्षमा याचना करता है जो उसने भगवान श्रीकृष्ण के व्यक्तित्त्व की दिव्यता की अज्ञानता के कारण किए।
पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् |
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिक: कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव || 43||
आप समस्त चर-अचर के स्वामी और समस्त ब्रह्माण्डों के जनक हैं। आप परम पूजनीय आध्यात्मिक गुरु हैं। हे अतुल्य शक्ति के स्वामी! जब तीनों लोकों में आपके समतुल्य कोई नहीं है तब आप से बढ़कर कोई कैसे हो सकता है।
अर्जुन कहता है कि श्रीकृष्ण महानतम और सर्वश्रेष्ठ हैं। पिता पुत्र से सदैव जयेष्ठ होता है। श्रीकृष्ण सभी जनकों के जनक हैं। समान रूप से वे विद्यमान सभी आध्यात्मिक गुरुओं के गुरु हैं। स्रष्टा ब्रह्मा प्रथम आध्यात्मिक गुरु थे जिन्होंने अपने शिष्यों को ज्ञान दिया और जो गुरु परम्परा के अंतर्गत निरन्तर जारी रहा। किन्तु ब्रह्मा ने श्रीकृष्ण से वैदिक ज्ञान अर्जित किया था। श्रीमद्भागवत् (1.1.1) में उल्लेख है- "तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये" अर्थात् श्रीकृष्ण ने प्रथम जन्मे ब्रह्मा के हृदय में वैदिक ज्ञान प्रकट किया। इसलिए वे परम आध्यात्मिक गुरु हैं। श्वेताश्वतरोपनिषद् में उल्लेख है-
न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते (श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.8)
"भगवान के समतुल्य कोई नहीं है और न ही कोई उनसे श्रेष्ठ है।" श्रीकृष्ण वेदों के ज्ञाता हैं यह मानकर अर्जुन उनके संबंध में उपर्युक्त गुणों का वर्णन कर रहा है।
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् |
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्यु:
प्रिय: प्रियायार्हसि देव सोढुम् || 44||
इसलिए हे पूजनीय भगवान! मैं आपके समक्ष नतमस्तक होकर और साष्टांग प्रणाम करते हुए आपकी कृपा प्राप्त करने की याचना करता हूँ। जिस प्रकार पिता पुत्र के हठ को सहन करता है, मित्र धृष्टता को और प्रियतम अपनी प्रेयसी के अपराध को क्षमा कर देता है उसी प्रकार से कृपा करके मुझे मेरे अपराधों के लिए क्षमा कर दीजिए।
अपने व्यवहार को अपराध मानते हुए अर्जुन क्षमा याचना कर रहा है। श्रीकृष्ण के साथ खेलते, खाते, उपहास, वार्तालाप और विश्राम करते हुए उसने ऐसा मान सम्मान नहीं दर्शाया जैसा कि सर्वशक्तिमान भगवान के प्रति दिखाया जाना अपेक्षित होता है। अपने प्रियजनों के साथ प्रेम संबंधों की अति घनिष्ठता के कारण किसी प्रकार के अनौपचारिक व्यवहार को कोई धृष्टता नहीं मानता।
किसी सामान्य अधिकारी को यह अधिकार नहीं होता कि वह देश के राष्ट्रपति का उपहास उड़ाए। किन्तु राष्ट्रपति का निजी मित्र यदि उसे तंग करे, उसका उपहास उड़ाये यहाँ तक कि उसे फटकार भी दे, तब भी राष्ट्रपति इस पर कोई आपत्ति नहीं करता अपितु इसके विपरीत वह अपने अंतरंग मित्र के उपहास को अधीनस्थ अधिकारियों से मिलने वाले सम्मान से अधिक महत्त्व देता है। हजारों लोग सेना नायक को सेल्युट करते हैं। उसी तरह अर्जुन के श्रीकृष्ण के साथ घनिष्ठ संबंध अपराधरूप नहीं थे अपितु वे मित्रतावश गहन प्रेम भक्ति से युक्त हाव भाव थे फिर भी वह निष्ठावान भक्त होने के कारण विनम्रतापूर्वक यह कहता है कि उससे अपराध हुआ है।
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे |
तदेव मे दर्शय देवरूप
प्रसीद देवेश जगन्निवास || 45||
पहले कभी न देखे गए आपके विराट रूप का अवलोकन कर मैं अत्यधिक हर्षित हो रहा हूँ और साथ ही साथ मेरा मन भय से कांप रहा है। इसलिए हे देवेश, हे जगन्नाथ! कृपया मुझ पर दया करें और मुझे पुनः अपना आनन्दमय स्वरूप दिखाएँ।
भक्ति दो प्रकार की होती है-एक ऐश्वर्य भक्ति और दूसरी माधुर्य भक्ति। ऐश्वर्य भक्ति में भगवान के सर्वशक्तिशाली स्वरूप के चिन्तन द्वारा भक्त भक्ति में तल्लीन होता है। ऐश्वर्य भक्ति में भय और श्रद्धा के भाव की प्रधानता होती है। ऐसी भक्ति में भगवान से दूरी और शिष्टाचार का पालन करना सदैव आवश्यक समझा जाता है। द्वारकावासी और अयोध्यावासी ऐश्वर्य भक्ति के उदाहरण हैं, जो श्रीकृष्ण और भगवान श्री राम का आदर-सम्मान अपने राजा के रूप में करते थे। सामान्य नागरिक अपने राजा के प्रति अत्यंत निष्ठावान और आज्ञाकारी होते हैं यद्यपि उनके उसके साथ कभी घनिष्ठ सम्बंध नहीं होते।
माधुर्य भक्ति में भक्त भगवान के साथ करीबी संबंध का अनुभव करते हैं। ऐसी भक्ति में यह भाव प्रमुख रहता है कि 'श्रीकृष्ण मेरे हैं और मैं उनका हूँ।' वृंदावन के ग्वाल-बाल जो श्रीकृष्ण से सखा भाव से प्रेम करते हैं, यशोदा और नंद बाबा जो कृष्ण से अपने पुत्र के रूप में प्रेम करते हैं और गोपियाँ जो उनसे अपने प्रियतम के रूप में प्रेम करती हैं, ये सब माधुर्य भक्ति के उदाहरण हैं। माधुर्य भक्ति ऐश्वर्य भक्ति की अपेक्षा अत्यंत मधुर है। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज वर्णन करते हैं-
सबै सरस रस द्वारिका, मथुरा अरु ब्रज माहिँ।
मधुर, मधुरतर, मधुरतम, रस ब्रजरस सम नाहिँ ।।
(भक्ति शतक श्लोक-70)
भगवान का दिव्य आनन्द उनके सभी रूपों में अत्यन्त मधुर होता है किन्तु फिर भी इसकी कुछ श्रेणियाँ हैं। भगवान की द्वारका की लीलाओं का आनंद 'मधुर' और मथुरा की लीलाओं का आनन्द 'अति मधुर' तथा ब्रज की लीलाओं का आंनद मधुरतम है।
माधुर्य भक्ति में भगवान के ऐश्वर्य और सर्वशक्तिशाली स्वरूप को भुला दिया जाता है। भक्त भगवान कृष्ण के साथ चार प्रकार से संबंध स्थापित करता है।
दास्य भावः श्रीकृष्ण हमारे स्वामी हैं और मैं उनका सेवक। स्वयं को श्रीकृष्ण का दास मानने जैसी रक्तक और पत्रक आदि की भक्ति दास्य भाव की भक्ति थी। भगवान को अपनी माता और अपना पिता मानने का भाव भी दास्य भक्ति की ही श्रेणी में है।
सख्य भावः श्रीकृष्ण हमारे सखा हैं और मैं उनका अंतरंग सखा हूँ। श्रीदामा, मधुमंगल, धनसुख, मनसुख की भक्ति सखा भाव की भक्ति थी।
वात्सल्य भावः श्रीकृष्ण हमारे बालक हैं और मैं उनका माता-पिता हूँ। यशोदा और नंद की भक्ति वात्सल्य भाव की भक्ति थी।
माधुर्य भावः श्रीकृष्ण हमारे प्रियतम और मैं उनकी प्रेयसी हूँ। वृंदावन की गोपियों की भक्ति माधुर्य भाव की भक्ति थी।
अर्जुन सखा भाव वाले भक्त हैं और भगवान के साथ बंधुत्व के संबंध का आनन्द पाते है। भगवान के विराटरूप और दिव्य रूप को देखकर अर्जुन को विस्मय और श्रद्धा का अनुभव होता है किन्तु फिर भी वह सख्य भाव का माधुर्य चाहता है जिसका आस्वाद ग्रहण करने का उसे पूर्व से ही अभ्यास था। इसलिए वह श्रीकृष्ण से अपने सर्वशक्तिमान विराट स्वरूप जिसे वह अब देख रहा है, को छिपाने और पुनः मानव रूप में प्रकट होने की प्रार्थना करता है।
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त-
मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव |
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन
सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते || 46||
हे सहस्र बाहु! यद्यपि आप समस्त सृष्टि में अभिव्यक्त हैं किन्तु मैं आपकी मुकुटधारी, चक्र और गदा उठाए हुए चतुर्भुज नारायण रूप के दर्शन करना चाहता हूँ।
श्रीकृष्ण की विशेष कृपा से अर्जुन ने भगवान का विश्वरूप देखा है जिसका दर्शन कोई सरलता से नहीं कर सकता। अर्जुन को यह अनुभव होता है कि श्रीकृष्ण उसके केवल मित्र ही नहीं है अपितु उससे बढ़कर भी उनका अनुपम व्यक्तित्त्व हैं। उनका दिव्य स्वरूप अनगिनत ब्रह्माण्डों को अपने में समेटे हुए है फिर भी वह उनके अनन्त ऐश्वर्यों के प्रति आकर्षित नहीं होता। सर्वशक्तिमान भगवान की ऐश्वर्य भक्ति करने में उसकी कोई रुचि नहीं है अपितु इसके विपरीत वह सर्वशक्तिमान भगवान का पुरुषोतम रूप देखना चाहता है ताकि वह उनके साथ पहले जैसे मित्रवत् संबंध बनाए रख सके। भगवान श्रीकृष्ण को 'सहस्रबाहु' संबोधन से पुकारने का तात्पर्य 'हजारों भुजाओं वाले' से है। अर्जुन अब भगवान श्रीकृष्ण से अपना 'चतुर्भुज रूप' अर्थात् चार भुजाओं वाला रूप दिखाने की प्रार्थना कर रहा है। एक अन्य अवसर पर श्रीकृष्ण अपने इस चतुर्भुज नारायण रूप में अर्जुन के सम्मुख प्रकट हुए थे। द्रौपदी के पांच पुत्रों के हत्यारे अश्वत्थामा को जब अर्जुन बांधकर उसे द्रौपदी के पास ले आया तब उस समय श्रीकृष्ण अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए थे।
निशम्य भीमगदितं द्रौपद्याश्च चतुर्भुजः।
आलोक्य वदनं सख्युरिदमाह हसन्निव।।
(श्रीमद्भागवतम्-1.7.52)
"चतुर्भुजधारी श्रीकृष्ण ने जब भीम, द्रौपदी और अन्य के कथनों को सुना तब वह अपने प्रिय मित्र अर्जुन की ओर देखकर मुस्कराने लगे।" भगवान से चतुर्भुज रूप में प्रकट होने की प्रार्थना कर अर्जुन यह भी पुष्टि कर रहा है कि भगवान का चतुर्भुज रूप उनके दो भुजा वाले रूप से भिन्न नहीं है।
श्रीभगवानुवाच |
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं
रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् |
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं
यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् || 47||
भगवान ने कहा-हे अर्जुन! तुम पर प्रसन्न होकर मैनें अपनी योगमाया शक्ति द्वारा तुम्हें अपना विश्व रूप दिखाया। तुमसे पहले किसी ने भी मेरे इस विराट रूप को नहीं देखा।
चूँकि अर्जुन भयभीत हो गया था इसलिए उसने यह विनती की कि भगवान अपने विराट रूप को छिपा लें। श्रीकृष्ण अब अर्जुन को धैर्य बंधाते हुए स्पष्ट करते हैं कि उन्होंने अपनी कृपा से उसे अपना विराट रूप देखने के लिए उसे दिव्य दृष्टि प्रदान की थी न कि दण्ड के रूप में क्योंकि वह उससे अति प्रसन्न थे। यद्यपि दुर्योधन और यशोदा ने भी भगवान के विराट रूप की झलक देखी थी किन्तु वह इतना व्यापक, गहन और विस्मयकारी नहीं था।
श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया शक्ति की सहायता से अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी। यह भगवान की दिव्य सर्वोच्च शक्ति है जिसका उल्लेख उन्होंने कई संदर्भो जैसे कि श्लोक 4.5 एवं 7.25 में किया है। इसी योगमाया शक्ति के कारण भगवान 'कर्तुम् अकर्तुम् अन्यथा कर्तुम् समर्थ' हैं अर्थात् वे एक ही समय में संभव को असंभव और असंभव को संभव कर सकते हैं। भगवान की यह दिव्य शक्ति उनके साकार रूप में भी प्रकट होती है और हिन्दू धर्म में ब्रह्माण्ड की मातृत्व शक्ति के रूप में राधा, दुर्गा, लक्ष्मी, काली, सीता, पार्वती आदि के रूप में इसकी पूजा की जाती है।
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै-
र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रै: |
एवंरूप: शक्य अहं नृलोके
द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर || 48||
हे कुरुश्रेष्ठ! न तो वेदों के अध्ययन से और न ही यज्ञ, कर्मकाण्डों, दान, पुण्य, यहाँ तक कि कठोर तप करने से भी किसी जीवित प्राणी ने मेरे विराटरूप को कभी देखा है जिसे तुम देख चुके हो।
भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि मनुष्य के स्वयं के प्रयत्नों द्वारा जैसे कि वैदिक ग्रंथो का अध्ययन करने, धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करने, घोर तपस्या करने, अन्न एवं जल का त्याग करने और उदारता से दान करने आदि प्रयास उनके विराटरूप का दर्शन करने हेतु तथा उनकी दिव्य दृष्टि प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार से पर्याप्त नहीं है। यह केवल और केवल उनकी दिव्य कृपा एवं उनकी उदारता से ही प्राप्त होती है। इसी प्रकार वेदों में इसे बार-बार दोहराया गया है।
तस्य ना रास्व तस्य नो धेहि
(यजुर्वेद)
"परम प्रभु की कृपा में निमज्जित हुए बिना कोई उसे नहीं देख सकता"। इसके पीछे का तर्क अत्यंत स्पष्ट है। जीवात्मा की भौतिक आँखें पंच महाभूतों से बनी हैं किन्तु भगवान दिव्य स्वरूप वाले हैं। उनके दिव्य स्वरूप का दर्शन करने के लिए जीवात्मा को दिव्य आँखें चाहिए। जब भगवान जीवात्मा पर कृपा करते हैं तब वे दिव्य शक्ति द्वारा हमारी आँखों को दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं और तभी जीवात्मा उन्हें देख सकती है। कोई वेदों और पुराणों का ज्ञाता यह भी कह सकता है कि संजय ने भी उस विराट रूप को देखा होगा जिसे अर्जुन ने देखा था। महाभारत में इस परिपेक्ष्य में उल्लेख मिलते हैं कि संजय के गुरु वेदव्यास की कृपा से संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई थी ताकि वह युद्ध में घटित होने वाली घटनाओं का विवरण धृतराष्ट्र को सुनाने में सक्षम हो सके। इसलिए उसने भी अर्जुन के समान भगवान का विराट रूप देखा किन्तु बाद में जब दुर्योधन का वध हुआ तब शोक संतप्त संजय की दिव्य दृष्टि भी लुप्त हो गयी थी।
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो
दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् |
व्यपेतभी: प्रीतमना: पुनस्त्वं
तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य || 49||
मेरे भयानक रूप को देखकर तुम न तो भयभीत हो और न ही मोहित हो। भयमुक्त और प्रसन्नचित्त होकर मेरे पुरुषोत्तम रूप को देखो।
श्रीकृष्ण निरन्तर अर्जुन को धीरज बंधाते हुए कह रहे हैं कि भयभीत होने की अपेक्षा तुम्हें मेरे विराट रूप का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होने पर आनंदित होना चाहिए। आगे वह कहते हैं कि अर्जुन अब भय मुक्त होकर पुनः मेरे पुरुषोत्तम रूप को देखो।
सञ्जय उवाच |
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा
स्वकं रूपं दर्शयामास भूय: |
आश्वासयामास च भीतमेनं
भूत्वा पुन: सौम्यवपुर्महात्मा || 50||
संजय ने कहाः ऐसा कहकर वासुदेव श्रीकृष्ण ने पुनः अपना चतुर्भुज रूप प्रकट किया और फिर अपना दो भुजाओं वाला सुन्दर रूप प्रदर्शित कर भयभीत अर्जुन को सांत्वना दी।
श्रीकृष्ण ने अपने विराटरूप को छिपा लिया और फिर वे अर्जुन के सम्मुख अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए जो स्वर्ण मुकुट, गदा, चक्र और कमल के पुष्प से विभूषित था। वह रूप समस्त दिव्य ऐश्वर्यों, गौरव, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता का पुंज था। श्रीकृष्ण का चतुर्भुज रूप उसी प्रकार से भय और श्रद्धा को उत्पन्न करता है जैसा कि किसी राज्य के नागरिकों का उनके राजा के प्रति होता है। किन्तु अर्जुन श्रीकृष्ण का सखा था इसलिए भय आदि के भाव से युक्त भक्ति उसे कभी संतुष्ट नहीं कर सकती थी। वह श्रीकृष्ण के साथ खेला, उनके साथ अन्न ग्रहण किया, अपने व्यक्तिगत रहस्यों को परस्पर बांटा। इस प्रकार की सख्य भाव की भक्ति ऐश्वर्य भक्ति से अत्यंत मधुर होती है। इसलिए अर्जुन की भक्ति की भावना को पुष्ट करने के लिए श्रीकृष्ण ने अंततः अपना चतुर्भुज रूप भी छिपा लिया और अपने मूल दो भुजाओं वाले मनोहारी रूप में आ गए। एक बार वृंदावन में श्रीकृष्ण गोपियों के साथ रासलीला कर रहे थे। किंतु जब वे अचानक उनके बीच में से ओझल हो गये तब गोपियाँ उनसे पुनः प्रकट होने की विनती करने लगी। उनके अनुनय-विनय को सुन श्रीकृष्ण वहाँ पुनः चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए। गोपियों ने उन्हें विष्णु भगवान समझा और उनका श्रद्धापूर्वक सत्कार किया किन्तु गोपियाँ उनके उस रूप पर मोहित न होकर उनके साथ और समय व्यतीत करना न चाहकर वहाँ से चली जाती हैं। उनका श्रीकृष्ण के विष्णु वाले रूप के प्रति कोई आकर्षण नहीं था क्योंकि वे भगवान श्रीकृष्ण को ही प्राण-प्रियतम के रूप में देखने की आदी थी। बाद में फिर जब राधा-रानी वहाँ प्रकट होती हैं तो उन्हें देखकर उनके प्रेम में विह्वल होकर श्रीकृष्ण के चतुर्भुजी रूप की दो भुजाएँ स्वतः लुप्त हो गयी और उन्होंने पुनः अपना दो भुजाओं वाला रूप धारण कर लिया।
अर्जुन उवाच |
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन |
इदानीमस्मि संवृत्त: सचेता: प्रकृतिं गत: || 51||
अर्जुन ने कहा-हे जनार्दन! आपके दो भुजा वाले मनोहर मानव रूप को देखकर मुझ में आत्मसंयम लौट आया है और मेरा चित्त स्थिर होकर सामान्य अवस्था में आ गया है।
श्रीकृष्ण के मनमोहक सुन्दर दो भुजाओं वाले रूप का दर्शन अर्जुन के सख्य भाव की पुष्टि और प्रबलता को व्यक्त करता है। इसलिए अर्जुन कहता है कि उसने अपना धैर्य पुनः प्राप्त कर लिया है और उसकी मनोदशा सामान्य हो गयी है। पाण्डवों के साथ श्रीकृष्ण की लीलाओं को देखकर नारद मुनि पहले ही अर्जुन के ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर को बता चुके थेः
गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम्
(श्रीमद्भागवतम्-7.15.75)
"श्रीकृष्ण आपके घर में आपके साथ भ्राता के रूप में निवास करते हैं।" इसलिए अर्जुन सौभाग्यवश श्रीकृष्ण के साथ परस्पर भाई और प्रिय सखा जैसा आचार व्यवहार करने का आदी था।
श्रीभगवानुवाच |
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम |
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिण: || 52||
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया |
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा || 53||
परम प्रभु ने कहा-मेरे जिस रूप का तुम अवलोकन कर रहे हो उसे देख पाना अति दुष्कर है। यहाँ तक कि स्वर्ग के देवताओं को भी इसका दर्शन करने की उत्कंठा होती है। मेरे इस रूप को न तो वेदों के अध्ययन, न ही तपस्या, दान और यज्ञों जैसे साधनों द्वारा देखा जा सकता है जैसाकि तुमने देखा है।
अर्जुन को अपना विराटरूप दिखाने और उसकी सराहना करने के पश्चात् तथा उसका दर्शन अन्यों के लिए दुर्लभ बताते हुए अब श्रीकृष्ण अपने साकार रूप के लिए अर्जुन के सख्य भाव के प्रेम को कम नहीं करना चाहते। वे इस पर बल देते हुए कहते हैं कि स्वर्ग के देवता भी भगवान को उनके दो भुजा वाले उस साकार रूप में देखना चाहते हैं जिस रूप में वे अर्जुन के समक्ष खड़े हैं। इस रूप को किसी प्रकार के वैदिक अध्ययनों, तपस्याओं और यज्ञों द्वारा देखा जाना संभव नहीं है। आध्यात्मिकता का मुख्य सिद्धान्त यह है कि भगवान को हम अपने प्रयत्नों या सामर्थ्य द्वारा नहीं जान सकते किन्तु जो भगवान की भक्ति में तल्लीन है ऐसे भक्त उनकी कृपा से उन्हें जानने की पात्रता प्राप्त कर लेते हैं। तब उनकी कृपा से वे उन्हें सुगमता से देखने में समर्थ हो जाते हैं। मुंडकोपनिषद् में वर्णन है-
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन
(मुंडकोपनिषद्-3.2.3)
"भगवान को आध्यात्मिक प्रवचनों या बुद्धि द्वारा जाना नहीं जा सकता। उसे विभिन्न प्रकार के उपदेशों को सुनकर भी नहीं जाना जा सकता"। अगर इन साधनों द्वारा भगवान के साकार रूप को जाना नहीं जा सकता तब फिर कैसे उन्हें इस रूप में देखा जा सकता है। अब आगे श्रीकृष्ण इसका रहस्योद्घाटन करेंगे।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन |
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप || 54||
हे अर्जुन! मैं जिस रूप में तुम्हारे समक्ष खड़ा हूँ उसे केवल अनन्य भक्ति से ही जाना जा सकता है। हे शत्रुहंता! इस प्रकार मेरी दिव्य दृष्टि प्राप्त होने पर ही कोई वास्तव में मुझमें एकीकृत हो सकता है।
इस श्लोक में भी श्रीकृष्ण इस पर बल देते हैं कि केवल और केवल भक्ति ही उन्हें प्राप्त करने का उचित साधन है। श्लोक संख्या 11.48 में उन्होंने कहा था कि केवल प्रेममयी भक्ति द्वारा ही उनके विराट रूप का दर्शन किया जा सकता है। अब इस श्लोक में भी श्रीकृष्ण अत्यधिक बल देकर कहते हैं-"मैं जिस दो भुजा वाले रूप में तुम्हारे समक्ष खड़ा हूँ उसकी अनुभूति केवल निष्काम भक्ति द्वारा ही की जा सकती है।" वैदिक ग्रंथों में भी इसे बार-बार दोहराया गया है
भक्तिरेवैनम् नयति भक्तिरेवैनम् पश्यति भक्तिरेवैनम्
दर्शयति भक्तिवशः पुरुषो भक्तिरेव गरीयसी
(माठर श्रुति)
"केवल भक्ति ही हमें भगवान के साथ एकीकृत करती है। उसके दर्शन में केवल भक्ति ही हमारी सहायता करेगी। उसे केवल भक्ति द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है। केवल भक्ति ही उसकी प्राप्ति में हमारी सहायता करेगी। भगवान सच्ची भक्ति में बंध जाते हैं, जो सभी मार्गों में सर्वोत्तम है।"
न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ।।
(श्रीमदभागवत् 11.14.20)
"उद्धव! मैं अपने भक्तों के वश में हो जाता हूँ और वे मुझे जीत लेते हैं किन्तु जो मेरी भक्ति में लीन नहीं हैं, वे चाहे अष्टांग योग का पालन करें, सांख्य दर्शन या अन्य दर्शनों का अध्ययन करें, पुण्य कर्म और तपस्या करें तब भी वे कभी मुझे नहीं पा सकते।"
भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयात्माप्रियःसताम्।
(श्रीमदभागवतम् 11.14.21)
"मैं केवल प्रेममयी भक्ति के द्वारा ही प्राप्य हूँ। जो श्रद्धा के साथ मेरी भक्ति में तल्लीन रहते हैं, वे मुझे बहुत प्रिय है।"
मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा।
किये जोग तप ज्ञान वैरागा।।
(रामचरितमानस)
"बिना भक्ति के कोई भी भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता चाहे कोई अष्टांग योग, तपस्या, ज्ञान और विरक्ति का कितना भी अभ्यास क्यों न कर ले।" 'भक्ति क्या है, इसका वर्णन श्रीकृष्ण अगले श्लोक में करेंगे।
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्त: सङ्गवर्जित: |
निर्वैर: सर्वभूतेषु य: स मामेति पाण्डव || 55||
वे जो मेरे प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, जो मुझ पर ही भरोसा करते हैं, आसक्ति रहित रहते हैं और किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं रखते, ऐसे भक्त निश्चित रूप से मुझे प्राप्त करते हैं।
नौंवें अध्याय के अंत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि अपने मन को मुझमें स्थिर और समर्पित करो। इस प्रकार की भक्ति को बढ़ाने के प्रयोजनार्थ वे अब अपने रहस्यों को प्रकट करना चाहते हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने इस पर बल दिया था कि भक्ति का मार्ग ही सर्वोत्कृष्ट है। अब वे अनन्य भक्ति में लीन भक्तों के पाँच लक्षणों को चिह्नांकित कर इस अध्याय का समापन करते हैं।
मेरे प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करने वाले: सिद्ध भक्त अपने कार्यों को लौकिकता और आध्यात्मिकता के रूप में विभाजित नहीं करते। वे प्रत्येक कार्य भगवान के सुख के लिए करते हैं इसलिए उनका प्रत्येक कर्म भगवान को अर्पित हो जाता है। संत कबीर कहते हैं
जहाँ जहाँ चलूं करूँ परिक्रमा, जो जो करूँ सो सेवा
जब सोऊँ करूँ दंडवत, जानूँ देव न दूजा
मैं जब चलता हूँ, तब प्रतीत होता है कि मैं परिक्रमा और भगवान की चिन्तन कर रहा हूँ। जब मैं काम करता हूँ, तो लगता है कि मैं भगवान की ही सेवा कर रहा हूँ और जब मैं सोता हूँ तब ऐसा प्रतीत होता है कि मैं दण्डवत् करता हूँ। इस प्रकार से मैं कोई ऐसा कर्म नहीं करता जो उन्हें समर्पित न हो।
मुझ पर आश्रितः जो साधना के बल पर भगवान को पाना चाहते हैं वे पूर्णतया भगवान के प्रति शरणागत नहीं होते। भगवान को केवल उनकी कृपा से ही पाया जा सकता है, न कि साधना से। उनके अनन्य भक्त उन्हें पाने के लिए अपनी भक्ति पर आश्रित नहीं होते। इसके विपरीत उन भक्तों का पूर्ण विश्वास केवल भगवान की कृपा पर ही होता है और वे अपनी प्रेममयी भक्ति को केवल भगवान की दिव्य कृपा प्राप्त करने के उपाय के रूप में देखते हैं।
वे मेरे प्रिय भक्त होते हैं: भक्त अन्य आध्यात्मिक क्रियाओं जैसे सांख्य ज्ञान को विकसित करने, अष्टांग योग, यज्ञ का अनुष्ठान इत्यादि का पालन करने की आवश्यकता नहीं समझते। इस प्रकार वे केवल अपने प्रियतम भगवान के साथ अपने संबंधों को प्रगाढ़ करते हैं। वे केवल सर्वात्मा भगवान को सभी वस्तुओं और व्यक्तियों में व्याप्त देखते हैं।
वे आसक्ति रहित होते हैः भक्ति के लिए मन की अनुरक्ति आवश्यक होती है। ऐसा तभी संभव है जब मन में संसार के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो इसलिए अनन्य भक्त सभी प्रकार की सांसारिक आसक्तियों से रहित होते हैं और मन को केवल भगवान में स्थिर करते हैं।
वे किसी प्राणी से द्वेष नहीं करतेः यदि मन द्वेष से भरा हो तब वह भगवान के प्रति अनन्य भक्ति में लीन नहीं हो सकता। इस प्रकार अनन्य भक्त अपने भीतर किसी प्रकार के विद्वेष को आश्रय नहीं देते। यदि कोई उन्हें कष्ट भी दे या उनका अनिष्ट भी करे। तो भी वे यह सोचते हैं कि भगवान सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं और सभी परिस्थितियों को उन्हीं से उत्पन्न मानकर वे अपना अहित करने वालों को भी क्षमा कर देते हैं।
।। श्रीमद्भगवत गीता एकादश अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
Bhagavad Geeta Chapter 10
kathaShrijirasik
अध्याय दस: विभूति योग
भगवान के अनन्त वैभवों की स्तुति द्वारा प्राप्त योग
इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने अपनी महिमा का वर्णन किया है जिससे अर्जुन को भगवान में ध्यान केन्द्रित करने में सहायता मिल सके। नौवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने भक्ति योग की व्याख्या करते हुए अपने वैभवों का वर्णन किया था। यहाँ इस अध्याय में वे अर्जुन के भीतर श्रद्धा-भक्ति को बढ़ाने के प्रयोजनार्थ अपनी अनन्त महिमा का पुनः वर्णन करते हैं। इन श्लोकों को पढ़ने से आनन्द की अनुभूति होती है और इनका श्रवण करने से मन प्रफुल्लित हो जाता है।
श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे सृष्टि में प्रकट प्रत्येक वस्तु का स्रोत हैं। मनुष्यों में विविध प्रकार के गुण उन्हीं से उत्पन्न होते हैं। सात महर्षि, चार ऋषि और चौदह मनुओं का जन्म उनसे हुआ और बाद में संसार के सभी मनुष्य इनसे प्रकट हुए। जो यह जानते हैं कि सबका उद्गम भगवान हैं, वे अगाध श्रद्धा के साथ उनकी भक्ति में तल्लीन रहते हैं। ऐसे भक्त उनकी महिमा का वर्णन कर पूर्ण संतुष्टि एवं मानसिक शांति प्राप्त करते हैं और अन्य लोगों को भी जगाते हैं क्योंकि उनका मन उनमें एकीकृत हो जाता है। इसलिए भगवान उनके हृदय में बैठकर उन्हें दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं ताकि वे उन्हें सुगमता से प्राप्त कर सकें।
श्रीकृष्ण से यह सब सुनकर अर्जुन कहता है कि उसे पूर्ण रूप से भगवान के स्वरूप का बोध हो गया है और वह यह घोषणा करता है कि भगवान श्रीकृष्ण संसार के परम स्वामी हैं। फिर वह भगवान से अनुरोध करता है कि वे पुनः अपनी अनुपम महिमा का और अधिक से अधिक वर्णन करें। इसका श्रवण करना अर्जुन के लिए अमृत का सेवन करने के समान है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ही सभी का आदि, मध्य और अन्त हैं। इसलिए कुछ उनकी शक्तियों की अभिव्यक्ति हैं। वे सौंदर्य, वैभव, शक्ति, ज्ञान और समृद्धि का अनन्त महासागर हैं। जब हम कहीं किसी असाधारण शक्ति को देखते हैं जो हमारी कल्पना से परे होती है और हमें आनन्द में निमग्न कर देती है तब हमें उसे और कुछ न मानकर भगवान की महिमा का स्फुलिंग मानना चाहिए। वे ऐसे विद्युत् गृह के समान हैं जहाँ से मानवजाति के साथ-साथ ब्रह्माण्ड के सभी पदार्थ ऊर्जा प्राप्त करते हैं। तत्पश्चात् शेष अध्याय में वे उन सभी श्रेष्ठ पदार्थों, व्यक्तित्वों और क्रियाओं का वर्णन करते हैं जो उनके विशाल वैभव को प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार से वे यह कह कर इस अध्याय का समापन करते हैं कि उन्होंने अभी तक अपनी जिस अनुपम महिमा का वर्णन किया है उससे उनकी अनन्त महिमा के महत्त्व का अनुमान नहीं लगाया जा सकता क्योंकि वे अनन्त ब्रह्माण्डों को अपने दिव्य स्वरूप के एक ही अंश में धारण किए हुए हैं। इसलिए हम मानवों को भगवान को ही, जो सभी प्रकार के वैभवों का स्रोत हैं, अपनी आराधना का लक्ष्य मानना चाहिए।
श्रीभगवानुवाच |
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वच: |
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया || 1||
श्री भगवान ने कहाः हे महाबाहु अर्जुन! अब आगे मेरे सभी दिव्य उपदेशों को पुनः सुनो। चूंकि तुम मेरे प्रिय सखा हो इसलिए मैं तुम्हारे कल्याणार्थ इन्हें प्रकट करूँगा।
श्रीकृष्ण अर्जुन द्वारा व्यक्त की गयी तीव्र उत्कंठा से प्रसन्न हुए। श्रीकृष्ण अब अपनी प्रेममयी भक्ति के लिए अर्जुन के मन में अनुराग को बढ़ाने के लिए कहते हैं कि वे अब अपनी महिमा और अद्वितीय गुणों का वर्णन करेंगे। उन्होंने 'प्रीयमाणाय' शब्द का प्रयोग किया है जिसका तात्पर्य 'तुम मेरे सबसे प्रिय और विश्वस्त मित्र हो इसलिए मैं तुम्हारे समक्ष इस अद्भुत ज्ञान को प्रकट कर रहा हूँ।'
न मे विदु: सुरगणा: प्रभवं न महर्षय: |
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश: || 2||
न तो स्वर्ग के देवता और न ही महान ऋषि मेरी उत्पत्ति या वैभव को जानते हैं क्योंकि मैं ही सभी देवताओं और महान ऋर्षियों का उद्गम हूँ।
एक पिता ही अपने पुत्र के जन्म और उसके जीवन के विषय में जानता है क्योंकि वह इसका साक्षी होता है। किन्तु पिता के जन्म और बचपन की जानकारी पुत्र के ज्ञान से परे होती है क्योंकि ये सब घटनाएँ उसके जन्म से पूर्व घट चुकी होती हैं। इस प्रकार से देवता और ऋषिगण उस भगवान के उद्गम की मूल प्रकृति को जान नहीं सकते। इसी प्रकार का वर्णन ऋग्वेद में किया गया है-
को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आ जाता कुत इयं विसृष्टिः ।
अर्वाग् देवा अस्य विसर्ज नेनाया, अथा को वेद यत आबभूव।।
(ऋग्वेद-10.129.6)
"संसार में कौन है जो स्पष्ट रूप से जान सकता है? कौन यह सिद्ध कर सकता है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कहाँ से प्रारम्भ हुई? कौन यह बता सकता है कि सृष्टि की उत्पत्ति कहाँ से हुई? देवताओं का जन्म सृष्टि के उपरान्त हुआ। इसलिए कौन जान सकता है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कहाँ से हुई?" उपनिषदों में भी वर्णन किया गया है
नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत्।
(ईषोपनिषद्-4)
"भगवान को स्वर्ग के देवता नहीं जान सकते क्योंकि वे उनसे पूर्व अस्तित्व में थे।" फिर भी अपने प्रिय मित्र की भक्ति को पुष्ट करने हेतु श्रीकृष्ण भगवान अब ऐसा गूढ ज्ञान प्रकट करेंगे-
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् |
असम्मूढ: स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते || 3||
वे जो मुझे अजन्मा, अनादि और समस्त ब्रह्माण्डों के स्वामी के रूप में जानते हैं, मनुष्यों में वे मोह रहित और समस्त बुराइयों से मुक्त हो जाते हैं।
यह कहकर कि उन्हें कोई नहीं जान सकता, श्रीकृष्ण अब कहते हैं कि कुछ लोग उन्हें जान सकते हैं। क्या यह उनके कथनों का विरोधाभास नहीं है? नहीं, क्योंकि उनके कहने का सही में तात्पर्य यह है कि स्वयं के प्रयत्नों द्वारा उन्हें कोई नहीं जान सकता लेकिन जब भगवान किसी पर कृपा करते हैं, तब वह सौभाग्यशाली जीवात्मा उन्हें जान सकती है। इस प्रकार वे सब जो भगवान को जान जाते हैं ऐसा केवल भगवान की कृपा से होता है, जैसा कि इस अध्याय के 10वें श्लोक में उल्लेख किया गया है। वे भक्त जिनका मन सदैव मेरी भक्ति में तल्लीन रहता है, मैं उन्हें ऐसा दिव्य और अप्रतिम ज्ञान प्रदान करता हूँ जिससे वे पुण्य आत्माएँ मुझे सुगमता से पा लेती हैं। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो मुझे परमेश्वर के रूप में जानते हैं, वे भ्रमित नहीं होते। ऐसी भाग्यशाली पुण्य आत्माएँ अपने वर्तमान और पूर्वजन्मों के कर्म फलों के बंधनों से मुक्त हो जाती हैं और भगवान की प्रेममयी भक्ति में लीन हो जाती हैं। वे अपने और जीवात्मा के बीच के भेद को स्पष्ट करते हुए घोषित करते हैं कि वे 'लोकमहेश्वरम्' सभी लोकों के परमस्वामी हैं। इसी प्रकार की उद्घोषणा 'श्वेताश्वतरोपनिषद्' में भी की गयी है।
तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् ।
पति पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम् ।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.7)
"परमात्मा सभी नियन्ताओं का नियामक है, वह सभी मानवों और ब्रह्माण्ड में विधित पदार्थों का परमेश्वर है। वह सभी प्रियों का प्रियतम है। वह संसार का नियामक और प्राकृत शक्ति से परे है।"
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोह: क्षमा सत्यं दम: शम: |
सुखं दु:खं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च || 4||
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयश: |
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधा: || 5||
जीवों में विविध प्रकार के गुण जैसे-बुद्धि, ज्ञान, विचारों की स्पष्टता, क्षमा, सत्यता, इन्द्रियों और मन पर नियंत्रण, सुख और दु:ख, जन्म-मृत्यु, भय, निडरता, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश केवल मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
इन दोनों श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण अपनी परम भगवत्ता और सृष्टि में व्याप्त सभी तत्त्वों पर अपने प्रभुत्व की पुष्टि कर रहे हैं। वे यह स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य की विविध प्रकार की चित्तवृत्ति, स्वभाव, रुचि आदि सब उनसे उत्पन्न होती है।
बुद्धिः परिस्थितियों का विश्लेषण करने की क्षमता।
ज्ञानम्: आत्मा और भौतिक पदार्थ के भेद को जानने की विवेक शक्ति।
असम्मोहः मोह-ममता से रहित।
क्षमाः स्वयं को कष्ट पहुँचाने वालों को क्षमा करना।
सत्यम्: सभी के कल्याणार्थ सत्य को प्रकट करना।
दमः से तात्पर्य इन्द्रियों को उनके विषयों के आकर्षण से रोकना है।
शमः अपने मन को अनावश्यक विचारों का चिन्तन करने से रोकना
सुखम्: प्रसन्नता के भाव।
दु:खमः वेदना के भाव।
भवः “मैं" अर्थात् शरीर के बोध होने का भाव।
अभावः मृत्यु का अनुभव।
भयः आने वाली विपत्तियों का भय।
अभयः भय से मुक्ति।
अहिंसाः वाणी, कर्म और विचारों से किसी को कष्ट न पहुँचाना।
समताः अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में समभाव होना।
तुष्टिः कर्म के अनुसार जो प्राप्त हो जाए, उसी में संतोष करना।
तपः वेदों के अनुसार आध्यात्मिक लाभार्थ स्वेच्छा से कष्ट सहना।
दानः अपनी सामर्थ्यानुसार धार्मिक और शुभ कार्यों के लिए दान करना।
यशः सद्गुणों से युक्त होने पर प्राप्त होने वाली प्रसिद्धि।
अपयशः दुर्गुणों और बुरे कार्यों में संलिप्त होने के कारण मिलने वाला अपयश।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्यों में ये सब गुण केवल उनके द्वारा निश्चित की गयी स्वीकृति के अनुसार प्रकट होते हैं इसलिए वे मनुष्यों में अच्छी और बुरी प्रवृत्तियाँ के स्रोत हैं। इसकी तुलना विद्युत् गृह द्वारा विभिन्न उपकरणों के उपयोग के लिए बिजली की आपूर्ति करने से की जा सकती है। एक ही विद्युतीय ऊर्जा विभिन्न उपकरणों में प्रवेश कर विविध प्रकार से प्रकट होती है। यह किसी उपकरण में ध्वनि, अन्यों में प्रकाश और किसी तीसरे में ताप उत्पन्न करती है। यद्यपि सभी उपकरणों में प्रकटीकरण विभिन्न है किन्तु उनकी आपूर्ति का स्रोत वही विद्युत् गृह ही होता है। उसी प्रकार से भगवान की शक्ति हमारे वर्तमान और पूर्वजन्मों के पुरुषार्थ के अनुसार सकारात्मक और नकारात्मक रूप में हमारे भीतर प्रकट होती है।
महर्षय: सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा |
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमा: प्रजा: || 6||
सप्त महर्षिगण और उनसे पूर्व चार महर्षि और चौदह मनु सब मेरे मन से उत्पन्न हुए हैं तथा संसार में निवास करने वाले सभी जीव उनसे उत्पन्न हुए हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण निरन्तर यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वे किस प्रकार से सभी के स्रोत हैं। पहले उन्होंने बीस भावों का उल्लेख किया। अब वे पच्चीस सिद्ध महानुभावों का वर्णन कर रहे हैं। इनमें सात महर्षि, चार ऋषि और चौदह मनु हैं। वे उनसे उत्पन्न ब्रह्माण्ड की वंशावली का भी निरूपण करते हैं।
ब्रह्मा की उत्पत्ति विष्णु की 'हिरण्यगर्भ' शक्ति (भगवान का वह रूप जो पंचमहाभूतों से निर्मित सृष्टि का पालन करता है।) से हुई। ब्रह्मा से चार महर्षि सनक, सनंदन, सनत्कुमार, सनातन उत्पन्न हुए। इन्हें चार कुमार भी कहा जाता है। हमारे ब्रह्माण्ड में चारों कुमार ब्रह्मा के सबसे ज्येष्ठ पुत्र हैं क्योंकि अकेले पिता के मन से इनका जन्म हुआ था। इसलिए इनकी माता नहीं थी। नित्य मुक्त आत्मा और योग विज्ञान के ज्ञाता होने के कारण वे आध्यात्मिक साधना द्वारा अन्य जीवों को सांसारिक बंधनों से मुक्त करवाने हेतु सहायता करने में समर्थ थे। चार कुमारों के पश्चात् सप्त महर्षियों का जन्म हुआ। ये मरीचि, अंगीरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ हैं। इन्हें मानव जाति की वृद्धि करने का दायित्व सौंपा गया था। इसके पश्चात् स्वायंभुव, स्वरोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सवर्णी, दक्षसवर्णी, ब्रह्मसवर्णी, धर्मसवर्णी, रुद्र-पुत्र, रौच्य और भौतयक नामक चौदह मनुओं का जन्म हुआ। इन सभी को स्वर्गलोक से मानव जाति के कल्याणार्थ शासन करने तथा वैदिक धर्म का प्रचार और उसकी रक्षा करने का अधिकार दिया गया। हम वर्तमान में सातवें मनु जिसे वैवस्वत मनु कहा जाता है, के युग में रह रहे हैं। इसलिए इस युग को वैवस्वत मनवन्तर कहा जाता है। वर्तमान कल्प (ब्रह्मा के दिन) में अभी सात और मनु हैं जिनका युग आना अभी शेष है। स्वर्गलोक में अनेक देवता हैं जो ब्रह्माण्ड की देखभाल करने के दायित्व का निर्वहन कर रहें हैं। ये सब दैव पुरुष ब्रह्मा के पुत्र और पौत्र हैं जो भगवान विष्णु से उत्पन्न हैं और वे भगवान श्रीकृष्ण के विस्तार से भिन्न नहीं हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि श्रीकृष्ण ही सभी पितामहों के पूर्वज प्रपितामह हैं।
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वत: |
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशय: || 7||
जो मेरी महिमा और दिव्य शक्तियों को वास्तविक रूप से जान लेता है वह अविचल भक्तियोग के माध्यम से मुझमें एकीकृत हो जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है।
'विभूति' शब्द ब्रह्माण्ड में प्रकट भगवान की परम शक्तियों से संबंधित है। 'योगम्' शब्द इन अद्भुत शक्तियों के साथ भगवान के संबंध का उल्लेख करता है। श्रीकृष्ण इस श्लोक में स्पष्ट करते हैं कि जब हम परमात्मा के वैभव से परिचित होकर उनकी दिव्य एवं अनुपम महिमा को स्वीकार कर लेते हैं तब हम वास्तव में उनकी भक्ति में लीन होने में रुचि लेते हैं। भगवान की महानता का ज्ञान होने से भक्तों का प्रेम पोषित होता है और उनकी श्रद्धाभक्ति बढ़ती है। प्रेम और ज्ञान में परस्पर सीधा संबंध होता है जैसा कि निम्न उदाहरण से प्रकट होता है-
'यदि आपका मित्र आपको चमकते काले पत्थर की गोली दिखाता है तब तुम्हें इसके महत्त्व की जानकारी नहीं होती और इसलिए आपके भीतर उस काले पत्थर के प्रति किसी प्रकार का लगाव उत्पन्न नहीं होता। लेकिन जब आपका मित्र आपको बताता है कि यह 'शालीग्राम' है तथा इसे किसी सिद्ध संत ने उसे उपहार के रूप में दिया है। 'शालीग्राम' एक विशेष प्रकार का प्राचीन पत्थर है जो भगवान विष्णु का प्रतिरूप है जब आपको उस काले पत्थर की विशेषता का ज्ञान हो जाता है तब आपके लिए उस काले पत्थर का महत्त्व बढ़ जाता है। यदि फिर आपका मित्र आपको यह कहता है कि क्या आप जानते हैं कि पांच सौ वर्ष पूर्व महान संत स्वामी रामानन्द इस पत्थर का प्रयोग उपासना के लिए करते थे? जैसे ही आपको यह विशेष जानकारी प्राप्त होती है तब आपका उस काले पत्थर के प्रति श्रद्धा भाव और अधिक बढ़ जाता है। प्रत्येक समय पत्थर के संबंध में प्राप्त हो रही जानकारी से आपके भीतर उस काले पत्थर के प्रति श्रद्धा में निरन्तर वृद्धि होती रहती है। इसी प्रकार से भगवान का वास्तविक ज्ञान उनके प्रति हमारी श्रद्धा भक्ति बढ़ाता है। इस प्रकार भगवान की अनन्त ब्रह्माण्डों में व्याप्त अद्भुत शक्तियों का वर्णन करने के पश्चात श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे भक्त और पुण्य आत्माएँ जो इस ज्ञान में स्थित हो जाती हैं, वे आत्माएँ वास्तव में अविचल भक्ति के माध्यम से भगवान में एकनिष्ठ हो जाते हैं।'
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्त: सर्वं प्रवर्तते |
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता: || 8||
मैं समस्त सृष्टि का उद्गम हूँ। सभी वस्तुएँ मुझसे ही उत्पन्न होती हैं। जो बुद्धिमान यह जान लेता है वह दृढ़ विश्वास और प्रेमा भक्ति के साथ मेरी उपासना करता है।
श्रीकृष्ण इस श्लोक का आरम्भ 'अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः' कह कर करते हैं जिसका तात्पर्य है-"मैं ही अन्तिम सत्य और सब कारणों का कारण हूँ।" उन्होंने इसे भगवद् गीता के श्लोक संख्या 7.7, 7.12, 10.5 और 15.15 में कई बार दोहराया है। अन्य ग्रंथों में भी इसे प्रमाणित किया गया है। ऋग्वेद में वर्णन है-
ऋग्वेद में वर्णन हैयं कामये तं तं उग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तं ऋषिं तं सुमेधाम्।
(ऋग्वेद-10.125.5)
"मैं जिन मनुष्यों से प्रेम करता हूँ, उन्हें शक्तिशाली बना देता हूँ। मैं उन्हें स्त्री या पुरुष बनाता हूँ। मैं उन्हें ज्ञानी संत बनाता हूँ। मैं जीवात्मा को ब्रह्मा का पद पाने के लिए समर्थ बनाता हूँ। जो बुद्धिमान लोग इस सत्य को समझ लेते हैं वे मुझमें दृढ़ विश्वास रखते हैं और री उपासना करते हैं।" इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण भौतिक और आध्यात्मिक दोनों लोकों के परमेश्वर हैं किन्तु भगवान का मुख्य कार्य सृष्टि की शासन व्यवस्था का संचालन करना नहीं है। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं-
स्वयं भगवानेर कर्म नहे भारहरण।
(चैतन्य चरितामृत आदि लीला-4.8)
"श्रीकृष्ण संसार के सृजन, पालन और संहार के कार्य के लिए प्रत्यक्ष रूप से स्वयं को सम्मिलित नहीं करते।" भगवान श्रीकृष्ण का मुख्य कार्य अपने दिव्य धाम 'गोलोक' में मुक्त आत्माओं के साथ प्रेममयी लीलाओं में लीन होना है। सृष्टि के प्रयोजनार्थ वे स्वयं का विस्तार कारणोदकशायी विष्णु के रूप में करते हैं, जिन्हें महाविष्णु कहा जाता है फिर महाविष्णु भगवान के रूप में भौतिक जगत पर शासन करते हैं। महाविष्णु को प्रथम पुरुष अर्थात भौतिक क्षेत्र में भगवान के सर्वप्रथम विस्तार के रूप में जाना जाता है। वे कारण नामक सागर के दिव्य जल में निवास करते हैं और अपने दिव्य शरीर के रोमों से अनन्त भौतिक ब्रह्माण्डों को प्रकट करते हैं। तत्पश्चात् वे प्रत्येक ब्रह्माण्ड के तल पर रहने वाले गर्भोदकशायी विष्णु के रूप में अपना विस्तार करते हैं जिन्हें द्वितीय पुरुष अर्थात् भौतिक जगत में भगवान का द्वितीय विस्तार कहा जाता है।
गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का जन्म हुआ। उनके मार्गदर्शन में ब्रह्माण्ड के विभिन्न स्थूल और सूक्ष्म तत्त्वों एवं पदार्थों का निर्माण, प्राकृतिक नियमों का निर्माण, आकाश गंगाओं और ग्रहों की सूक्ष्म और स्थूल प्रणालियों का निर्माण और उनमें निवास करने वाले जीवों आदि को उत्पन्न करने की प्रक्रिया का सृजन किया जाता है। प्रायः ब्रह्मा का उल्लेख ब्रह्माण्ड के सृजनकर्ता के रूप में किया जाता है। वास्तव में वे सृष्टि के दूसरे क्रम के सृजनकर्ता हैं। गर्भोदकशायी विष्णु आगे फिर क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में अपना विस्तार करते हैं और प्रत्येक ब्रह्माण्ड के ऊपर क्षीरसागर नामक स्थान पर रहते हैं। क्षीरोदकशायी विष्णु को तृतीय पुरूष अर्थात् भौतिक जगत में भगवान का तीसरा विस्तार कहा गया है। प्रत्येक ब्रह्माण्ड के शीर्ष पर रहने के साथ-साथ वह परमात्मा के रूप में ब्रह्माण्ड के सभी जीवों के हृदय में भी वास करते हैं और उनके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं और उपयुक्त समय पर उन्हें उनके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। इसलिए उन्हें सभी ब्रह्माण्डों का पालक और संचालक कहा जाता है।
यहाँ उल्लिखित भगवान विष्णु के रूप भगवान श्रीकृष्ण से किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं हैं। इसलिए श्रीकृष्ण इस श्लोक में कहते हैं कि समस्त आध्यात्मिक और भौतिक सृष्टि उनसे ही प्रकट होती है। श्रीकृष्ण को अवतारी भी कहा जाता है क्योंकि वे सभी अवतारों के स्रोत हैं।
श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है
एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।
(श्रीमद्भागवतम्-1.3.28)
"भगवान के सभी रूप उनका विस्तार हैं या श्रीकृष्ण के विस्तारों के विस्तार हैं जो कि भगवान का मूल स्वरूप है और इसलिए सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्मा, परम परमेश्वर श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं।"
यस्यैकनिश्वासितकालमथावलंब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः।।
विष्णुर्महान् सैहयस्य कलाविशेषो।
गोविन्दमादि पुरुषं तमहं भजामि ।।
(ब्रह्मसंहिता-5.48)
"अनन्त ब्रह्माण्डों में से प्रत्येक ब्रह्माण्ड के शंकर, ब्रह्मा और विष्णु, महाविष्णु के श्वास भीतर लेने पर उनके शरीर के रोमों से प्रकट होते हैं और श्वास बाहर छोड़ने पर पुनः उनमें विलीन हो जाते हैं। मैं, उन श्रीकृष्ण की वन्दना करता हूँ जिनके महाविष्णु विस्तार हैं।" अब श्रीकृष्ण यह व्याख्या करेंगे कि भक्त जन उनकी आराधना कैसे करते हैं।
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम् |
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च || 9||
मेरे भक्त अपने मन को मुझमें स्थिर कर अपना जीवन मुझे समर्पित करते हुए सदैव संतुष्ट रहते हैं। वे एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करते हुए मेरे विषय में वार्तालाप करते हुए और मेरी महिमा का गान करते हुए अत्यंत आनन्द और संतोष की अनुभूति करते हैं।
मन की प्रवृत्ति अपनी पसंद की वस्तु में लीन होने की होती है। भगवान के भक्त उनके स्मरण में तल्लीन रहते हैं क्योंकि वे परमेश्वर में अगाध श्रद्धा विकसित करते हैं। ईश्वर की भक्ति उनके जीवन का आधार बन जाती है, जिससे उन्हें जीवन को जीने का अर्थ, उद्देश्य और शक्ति प्राप्त होती है। वे भक्त अपने सबसे प्रिय भगवान के स्मरण को उसी प्रकार से आवश्यक मानते हैं, जिस प्रकार मछली को श्वास लेने और जीवित रहने के लिए जल की आवश्यकता होती है।
मानवीय हृदय को क्या अतिप्रिय है, इसे उनके मन और शरीर के समर्पण तथा संपत्ति के उपयोग से ज्ञात किया जा सकता है। बाइबल में वर्णन है, "जहाँ तुम अपनी धन-संपत्ति का व्यय करोगे, तुम्हारा मन भी उसी ओर आकर्षित होगा" (मैथ्यू 6.21)।
हम लोगों की चैक बुक और क्रेडिट कार्ड की विवरणी को देखकर यह जान सकते हैं कि उनका अंत:करण किस ओर आकर्षित है। यदि वे विलासिता पूर्ण छुट्टियाँ व्यतीत करते हैं तब ऐसी मौज मस्ती उन्हें अधिक प्रिय लगती है। यदि वे एड्सग्रस्त अफ्रीकी बच्चों के उपचार के लिए धन दान करते हैं तब उनका ध्यान इन कल्याणकारी कार्यों में लीन रहता है। अपने बच्चों के लिए अभिभावकों का प्रेम इस वास्तविकता को दर्शाता है कि वे अपने बच्चों के कल्याण के लिए अपना समय और धन त्याग करने में किस प्रकार तैयार रहते हैं। उसी प्रकार से भक्तों का प्रेम भगवान के प्रति उनके समर्पण में प्रकट होता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'मत्-गत-प्राणा:' जिसका तात्पर्य है-'मेरे भक्त अपना जीवन मुझे समर्पित करते हैं।' ऐसे समर्पण से संतोष प्राप्त होता है क्योंकि भक्त अपने कर्मों के फलों को भगवान की इच्छा पर छोड़ देते हैं और वे अपने जीवन में आयी सभी प्रकार की परिस्थितियों को भगवान की ओर से उत्पन्न हुई मानते हैं। इसलिए वे अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों को प्रसन्नतापूर्वक भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार करते हैं और दोनों को समदृष्टि से देखते हैं। हालांकि भक्तों के भगवान के प्रति प्रेम को उपर्युक्त लक्षणों के रूप में दर्शाया गया है परन्तु यह उनके शब्दों द्वारा भी प्रकट होता है। वे भगवान की महिमा, नाम, रूप, गुण, लीला, धामों और संतों के गुणगान में मधुर रस प्राप्त करते हैं। इस प्रकार वे कीर्तन और भगवान की महिमा का श्रवण कर उनका प्रेम रस पाते हैं और उसे उसी प्रकार से अन्य भक्तों में बांटते हैं। इस प्रकार से भगवान के दिव्य ज्ञान का बोध अन्य लोगों को करवाने में अपना योगदान देते हैं। भगवान की महिमा का गान भक्तों को अत्यंत संतोष और आनन्द प्रदान करता है। इस प्रकार वे स्मरण, श्रवण, और गुणगान के माध्यम से भगवान की आराधना करते हैं। यह त्रिधा भक्ति है जिसमें श्रवण, कीर्तन और स्मरण सम्मिलित है। पिछले अध्याय के 14वें श्लोक में पहले ही इसका वर्णन किया जा चुका है। 'उनके भक्त उनकी आराधना कैसे करते हैं?' इसका वर्णन करने के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण अब उनकी भक्ति पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे।
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् |
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते || 10||
जिनका मन सदैव मेरी प्रेममयी भक्ति में एकीकृत रहता है, मैं उन्हें दिव्य ज्ञान प्रदान करता हूँ, जिससे वे मुझे पा सकते हैं।
हमारी बुद्धि की उड़ान भगवान के दिव्य ज्ञान को नहीं पा सकती। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हमारा तंत्र कितना शक्तिशाली है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारी बुद्धि माया शक्ति से निर्मित है। इसलिए हमारे विचार, ज्ञान और विवेक भौतिक जगत तक ही सीमित है भगवान और उनका दिव्य संसार हमारी लौकिक बुद्धि की परिधि से पूर्णरूप से परे है। वेदों में इसे प्रभावशाली ढंग से घोषित किया गया है
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्।।
(केनोपनिषद्-2.3)
"वे जो यह सोचते हैं कि वे भगवान को अपनी बुद्धि से समझ सकते हैं उन्हें भगवान का ज्ञान नहीं हो सकता। वे जो यह सोचते हैं कि वह उनकी समझ से परे है, केवल वही वास्तव में भगवान को जान पाते हैं।" बृहदारण्यकोपनिषद् में वर्णन है
स एष नेति नेत्यात्मागृह्योः।
(बृहदारण्यकोपनिषद-3.9.26)
"कोई भगवान को अपनी बुद्धि के अनुसार अपने स्वयं के प्रयत्नों द्वारा कभी नहीं समझ सकता।" रामचरितमानस में भी ऐसा वर्णन किया गया है
राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी।
मत हमार अस सुनहु सयानी ।।
"भगवान राम हमारी बुद्धि, मन और वाणी की परिधि से परे हैं।" अब भगवान को जानने के विषय के संबंध में ये कथन स्पष्ट रूप से घोषित करते हैं कि भगवान को जानना संभव नही है, तब फिर कोई भगवान को कैसे जान सकता है? श्रीकृष्ण यहाँ यह प्रकट करते हैं कि भगवान का ज्ञान कैसे प्राप्त किया जा सकता है। वे कहते हैं कि भगवान अपनी कृपा से जीवात्मा को अपना ज्ञान करवाते हैं और भाग्यशाली आत्माएँ उनकी कृपा से उन्हें जानने में समर्थ हो सकती हैं। यजुर्वेद में वर्णन है-
तस्य नो रास्व तस्य नो धेहि।
"भगवान के चरण कमलों से प्रवाहित अमृत जल में स्नान किए बिना कोई भी उन्हें कैसे जान सकता है।" इस प्रकार भगवान का सच्चा ज्ञान बौद्धिक व्यायाम के फलस्वरूप प्राप्त नहीं होता अपितु यह भगवान की दिव्य कृपा के परिणामस्वरूप मिलता है। श्रीकृष्ण ने यह भी उल्लेख किया है कि वे उनकी कृपा प्राप्त करने के पात्र मनुष्य का चयन मनचाहे ढंग से नही करते अपितु जो अपने मन को उनकी भक्ति में एकनिष्ठ रखता है, श्रीकृष्ण ऐसे भक्त पर कृपा बरसाते हैं। आगे वे उनकी दिव्य कृपा के परिणामस्वरूप होने वाली प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करेंगे।
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम: |
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता || 11||
उन पर करुणा करने के कारण मैं उनके हृदयों में वास करता हूँ और ज्ञान के दीपक द्वारा अज्ञान रूपी अन्हकार को नष्ट करता हूँ।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण पुनः कृपा की अवधारणा को विस्तार से बताते हैं। पहले भी उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे उन पर अपनी कृपा करते हैं जो प्रेम-भाव से अपना मन उनमें तल्लीन करते हैं और उन्हें अपनी योजनाओं, विचारों और कार्यों का परम लक्ष्य मानते हैं। अब वे यह प्रकट कर रहे हैं कि जब कोई उनकी कृपा प्राप्त करता है तब क्या होता है? वे कहते हैं कि वे उनके अन्त:करण के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से नष्ट कर देते हैं।
अज्ञान अंधकार का प्रतीक है किन्तु ज्ञान का दीपक क्या है जिसकी भगवान चर्चा करते हैं? वास्तव में हमारी इन्द्रिय, बुद्धि और मन सभी मायिक हैं अर्थात् प्राकृतिक पदार्थों से निर्मित हैं जबकि भगवान दिव्य हैं। इसलिए हम उन्हें देख सुन और जान नहीं सकते परन्तु जब भगवान अपनी कृपा बरसाते हैं तब वे जीवात्मा को अपनी योगमाया शक्ति प्रदान करते हैं जिसे शुद्ध सत्त्वगुण कहा जाता है तथा यह माया के सत्त्व गुण से भिन्न होता है। जब हम शुद्ध सत्त्व शक्ति प्राप्त करते हैं तब हमारी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि दिव्य हो जाती है। इस प्रकार भगवान केवल अपनी कृपा द्वारा अपनी दिव्य इन्द्रिय, दिव्य मन और दिव्य बुद्धि जीवात्मा को प्रदान करते हैं। इन दिव्य उपकरणों से युक्त होकर जीवात्मा भगवान को देखने, सुनने, जानने और उनमें एकनिष्ठ होने में समर्थ हो जाती है। इसलिए वेदान्त दर्शन (3.4.38) में वर्णन है-"विशेषानुग्रहश्च" अर्थात् "केवल भगवान की कृपा से ही कोई दिव्य ज्ञान प्राप्त कर सकता है।" इस प्रकार श्रीकृष्ण प्रकाश के जिस ज्योति पुंज का उल्लेख करते हैं, वह उनकी दिव्य शक्ति है। भगवान की दिव्य शक्ति के प्रकाश से माया शक्ति का अंधकार मिट जाता है।
अर्जुन उवाच |
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् |
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् || 12||
आहुस्त्वामृषय: सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा |
असितो देवलो व्यास: स्वयं चैव ब्रवीषि मे || 13||
अर्जुन ने कहा-“आप परम पुरुषोत्तम, परमधाम, परम शुद्ध, अविनाशी, आदि पुरुष, अजन्मा तथा महानतम हैं। नारद, असित, देवल और व्यास जैसे महान ऋषि सभी इस सत्य की पुष्टि करते हैं और अब आप स्वयं भी मुझे यही सब बता रहे हैं।"
वैदिक ग्रंथों के टीकाकार कभी-कभी अज्ञान के कारण श्रीकृष्ण और श्रीराम आदि को परम सत्ता नहीं मानते। वे दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि परम सत्य निराकार और निर्गुण है. वह रूप धारण कर अवतार लेकर साकार रूप में प्रकट होता है और इसलिए श्रीकृष्ण और श्रीराम का अवतार भगवान से निम्न कोटि का है। किन्तु अर्जुन इस मत का खंडन करते हुए कहता है कि श्रीकृष्ण अपने साकार रूप में सभी कारणों के परम कारण हैं।
पिछले चार श्लोकों को सुनकर अर्जुन श्रीकृष्ण की सर्वोच्च सत्ता को पूर्ण रूप से स्वीकार करता है और दृढ़ विश्वास के साथ अपने भीतर भी इसकी प्रतीति करता है। जब कोई श्रेष्ठ व्यक्ति ज्ञान को प्रमाणित करता है तब उसकी विश्वसनीयता स्थापित हो जाती है। महान संत अध्यात्मिक ज्ञान के भण्डार होते हैं इसलिए अर्जुन ने नारद, असित, देवल और व्यास जैसे महान संतो के नाम का उल्लेख किया है जिनके द्वारा श्रीकृष्ण के परम दिव्य स्वरूप की और सभी कारणों का परम कारण होने की पुष्टि की गयी है। महाभारत के भीष्म पर्व में कई संतों ने भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की है। संत नारद मुनि कहते हैं-"श्रीकृष्ण समस्त संसारों के सृजनकर्ता हैं और सबके भीतर के विचारों को जानते हैं। वे ब्रह्माण्ड पर शासन करने वाले समस्त स्वर्ग के देवताओं के भगवान हैं।" (श्लोक 68.2)। ऋषि मार्कण्डेय ने वर्णन किया है-"भगवान श्रीकृष्ण सभी धार्मिक यज्ञों का लक्ष्य और तपस्याओं का सार तत्त्व हैं। वे सभी का वर्तमान, भूतकाल, और भविष्य हैं" (श्लोक 68.3)। भृगु ऋषि कहते है-“वे सभी ईश्वरों के परमेश्वर और भगवान विष्णु का प्रथम मूल रूप हैं" (श्लोक 68.4)। वेदव्यास ने उल्लेख किया है-“हे भगवान श्रीकृष्ण! आप सभी वसुओं के भगवान हैं। आप ने ही इन्द्र और अन्य स्वर्ग के देवताओं को शक्तियों से सम्पन्न किया है" (श्लोक 68.5)। अंङ्गिरा ऋषि कहते हैं, "भगवान श्रीकृष्ण सभी जीवों के सृजक हैं। सभी तीनों लोक उनके उदर में रहते हैं। वे सभी देवों का परमस्वरूप हैं" (श्लोक 68.6)। इसके अतिरिक्त महाभारत में असित और देवल ऋषि यह वर्णन करते हैं, “श्रीकृष्ण तीन लोकों की रचना करने वाले ब्रह्मा के जन्मदाता हैं" (महाभारत का वन पर्व 12.50)। इन सिद्ध महापुरुषों का उल्लेख करते हुए अर्जुन यह कहता है कि भगवान स्वयं अब यह घोषित करते हुए कहते है कि वे संपूर्ण सृष्टि के परम कारण हैं। इस प्रकार वे अपने कथनों की पुनः पुष्टि कर रहे हैं।
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव |
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवा: || 14||
हे कृष्ण! मैं आपके द्वारा कहे गए सभी कथनों को पूर्णतया सत्य के रूप में स्वीकार करता हूँ। हे परम प्रभु! न तो देवता और न ही असुर आपके वास्तविक स्वरूप को समझ सकते हैं।
भगवान के दिव्य ऐश्वर्य और अनन्त महिमा को ध्यानपूर्वक सुनते हुए अर्जुन की और अधिक सुनने की प्यास बढ़ती गयी। अब वह श्रीकृष्ण से पुनः उनकी महिमा का वर्णन करने की इच्छा व्यक्त करता है। वह भगवान को आश्वस्त करना चाहता है कि वह उनकी अनुपम महिमा को पूरी तरह से जान गया है। 'यत्' शब्द के प्रयोग से अर्जुन का तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्ण ने सातवें अध्याय से नौवें अध्याय तक जो भी कहा उसे वह सत्य मानता है। वह दृढ़ता से कहता है कि श्रीकृष्ण ने जो सब कहा वह सत्य है न कि लाक्षणिक वर्णन। वह श्रीकृष्ण को 'भगवान' या 'परम प्रभु' कह कर संबोधित करता है। भगवान शब्द की परिभाषा को देवीभागवतपुराण में सुन्दर ढंग से व्यक्त किया गया है
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णाम् भगवान्नीह ।।
"भगवान छः अनन्त ऐश्वर्यों के स्वामी है-शक्ति, ज्ञान, सौंदर्य, कीर्ति, ऐश्वर्य और वैराग्य"। जिन्हें जानने एवं समझने के लिए दानव और मानव सभी की बुद्धि बहुत ही सीमित है। ये आत्माएं कभी भी भगवान की दिव्य लीलाओं और उनके पूर्ण व्यक्तित्व को नहीं समझ सकते।
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम |
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते || 15||
हे परम पुरुषोत्तम। आप सभी जीवों के उदगम और स्वामी हैं, देवों के देव और ब्रह्माण्ड नायक हैं। वास्तव में आप अकेले ही अपनी अचिंतनीय शक्ति से स्वयं को जानने वाले हो।
Commentary
श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप के महत्त्व को प्रकट करते हुए अर्जुन उन्हें इस प्रकार से संबोधित करता है-
भूत-भावन:- सभी जीवों का स्रष्टा, ब्रह्माण्ड का पिता।
भूतेशः-सभी जीवों का विधाता और परम नियन्ता।
जगत्पते- सृष्टि का स्वामी और विधाता।
देव-देवः स्वर्ग के समस्त देवताओं के पूज्य। श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी इसी सत्य को व्यक्त किया गया है।
यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-3.9)
"भगवान का कभी पार नहीं पाया जा सकता, वह सबसे परे है।" गत श्लोक में यह व्यक्त किया गया था कि भगवान को किसी के द्वारा जाना नहीं जा सकता। यह स्पष्ट रूप से तर्कसंगत है क्योंकि हम सभी जीवात्माओं की बुद्धि सीमित है इसलिए वे हमारी बुद्धि की पहुँच से परे हैं। इससे भगवान का महत्त्व कम नहीं होता अपितु बढ़ता है। पश्चिमी दार्शनिक एफ. ए. जकोबी का यह कथन है, "जिसे हम जान सके वह भगवान नहीं हो सकता।" किन्तु इस श्लोक में अर्जुन कहता है कि केवल एक ही पुरुष भगवान को जानता है जोकि स्वयं भगवान ही हैं। इस प्रकार अकेले श्रीकृष्ण ही स्वयं को जानते हैं और यदि वे जीवात्मा पर कृपा करके उसे अपनी शक्तियाँ प्रदान करने का निर्णय कर ले तब वह भाग्यशाली जीवात्मा उन्हें उन्हीं की भांति जान सकती है।
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतय: |
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि || 16||
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् |
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया || 17||
प्रभु कृपया विस्तारपूर्वक मुझे अपने दिव्य ऐश्वर्यों से अवगत कराएँ जिनके द्वारा आप समस्त संसार में व्याप्त होकर उनमें रहते हो। हे योग के परम स्वामी! मैं आपको अच्छे से कैसे जान सकता हूँ और कैसे आपका मधुर चिन्तन कर सकता हूँ। हे परम पुरुषोत्तम भगवान! ध्यानावस्था के दौरान मैं किन-किन रूपों में आपका स्मरण कर सकता हूँ।
इस श्लोक में योग का उल्लेख योगमाया अर्थात् भगवान की दिव्य शक्ति के रूप में किया गया है और योगी का तात्पर्य योगमाया के स्वामी से है। यहाँ अर्जुन जान चुका है कि श्रीकृष्ण ही भगवान हैं। उत्सुकतावश अब वह यह जानना चाहता है कि सृष्टि में व्याप्त श्रीकृष्ण की विभूतियाँ अर्थात् उनका अलौकिक और भव्य ऐश्वर्य जिनका पहले कभी भी और कहीं वर्णन नहीं किया गया है, उन सभी विभूतियों को श्रीकृष्ण कैसे अन्य प्रकार से प्रकट करते हैं? अर्जुन समस्त सृष्टि के परम नियन्ता श्रीकृष्ण की महानता और सर्वोपरि प्रतिष्ठा के संबंध में सुनना चाहता है। वह कहता है, "मैं आपकी दिव्य महिमा को जानने की जिज्ञासा कर रहा हूँ ताकि मैं दृढ़तापूर्वक आपकी भक्ति करने में समर्थ हो सकूँ। लेकिन आपकी कृपा के बिना आपके स्वरूप को समझना असंभव है। इसलिए कृपया अपनी महिमा प्रकट करो जिससे मैं आपको समझ सकूँ।"
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन |
भूय: कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् || 18|
हे जनार्दन! कृपया मुझे पुनः अपनी दिव्य महिमा, वैभवों और अभिव्यक्तियों के संबंध में विस्तृत रूप से बताएँ, मैं आपकी अमृत वाणी को सुनकर कभी तृप्त नहीं हो सकता।
अर्जुन "आपकी वाणी अमृत के समान है" यह कहने के स्थान पर "आपकी अमृत वाणी सुनकर" जैसे शब्दों का प्रयोग करता है। वह यह नहीं कहता "आपकी वाणी उसके समान है।" या "आपकी वाणी उसके जैसी है।" यह साहित्यिक अलंकार है जिसे अतिशयोक्ति कहते हैं जिसमें किसी गुण, स्थिति या वस्तु का बढ़ा चढ़ाकर वर्णन किया जाता है। वह श्रीकृष्ण को जनार्दन कहकर भी संबोधित करता है जिसका तात्पर्य ऐसे उदारवादी महापुरुष से है जिनसे दुःखी लोग दुःख दूर करने की कामना करते हैं।
भगवान की दिव्य और सुन्दर महिमा का विस्तारपूवर्क वर्णन उन लोगों के लिए अमृत के समान है जो उनसे प्रेम करते हैं और भक्ति में लीन रहना पसंद करते हैं। अर्जुन, श्रीकृष्ण द्व रा उच्चारित अमृत से भरे शब्दों को अपने कानों से श्रवण करते हुए अमृत सुधा का पान कर रहा है एवं सुखद अनुभव कर रहा है और अब वह उन्हें 'भूयः कथय' जिसका अर्थ 'एक बार और' कहिये कहकर प्रसन्न करता है। आपकी महिमा का श्रवण करने की मेरी प्यास अभी बुझी नहीं है। दिव्य अमृत का यही स्वभाव है। इससे हमारी तृप्ति तब होती है जब इसकी प्यास निरन्तर बढ़ती जाती है। नैमिषारण्य के ऋषियों ने सुत गोस्वामी से श्रीमद्भागवतम् की कथा सुनते हुए ऐसे ही कथन व्यक्त किए थे।
वयं तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमे।
यच्छृण्वतां रसज्ञानां स्वादु स्वादु पदे पदे।।
(श्रीमद्भागवतम्-1.1.19)
"वे जो भगवान श्रीकृष्ण के शरणागत हैं, भगवान की दिव्य लीलाओं का श्रवण करने से कभी तृप्त नहीं होते। इन लीलाओं का अमृतरस ऐसा है कि इनका जितना अधिक आस्वादन किया जाता है ये उतना अधिक आनन्द प्रदान करती हैं।"
श्रीभगवानुवाच |
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतय: |
प्राधान्यत: कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ||19||
भगवान ने कहा! अब मैं तुम्हें अपनी दिव्य महिमा का संक्षिप्त रूप से वर्णन करूँगा। हे श्रेष्ठ कुरुवंशी! इस वर्णन का कहीं भी कोई अंत नहीं है।
अमरकोष (अति प्रतिष्ठित प्राचीन संस्कृत शब्द कोष) में विभूति की परिभाषा 'विभतिर्भूतिरैश्वर्यम् ऐश्वर्यम्' (शक्ति और समृद्धि) के रूप में उल्लिखित है। भगवान की शक्तियाँ और ऐश्वर्य अनन्त हैं। वास्तव में भगवान से संबंधित सभी वस्तुएँ अनन्त हैं। उनके अनन्त रूप, अनन्त नाम, अनन्त लोक, अनन्त अवतार, अनन्त लीलाएँ, अनन्त भक्त और सब कुछ अनन्त हैं। इसलिए वेद उन्हें अनन्त नाम से संबोधित करते हैं।
अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता
(श्वेताश्वरोपनिषद्-1.9)
"भगवान अनन्त हैं और ब्रह्माण्ड में अनन्त रूप लेकर प्रकट होते हैं। यद्यपि वे ब्रह्माण्ड के शासक हैं तथापि अकर्ता हैं।"
रामचरितमानस में भी वर्णन किया गया है
हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता।
"भगवान और उसकी लीलाएँ अनन्त हैं। वे अवतार लेकर जो लीलाएँ करते हैं, वे भी अनन्त हैं।" महर्षि वेदव्यास इससे भी परे जाते हुए वर्णन करते हैं
यो वा अनन्तस्य गुणाननन्ताननुक्रमिष्यन् स तु बालबुद्धिः।
रजांसि भूमेर्गणयेत् कथञ्चित् कालेन नैवाखिलशक्तिधाम्नः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.4.2)
"वे जो भगवान के गुणों की गणना करने की बात करते हैं वे मंदबुद्धि हैं। हम धरती पर बिखरे रेत के कणों को गिनने में सफलता पा सकते हैं लेकिन हम भगवान के अनन्त गुणों की गणना नहीं कर सकते" इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे यहाँ केवल अपनी विभूतियों के लघु अंश का वर्णन करेंगे।
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित: |
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च || 20||
विभूति योग मैं सभी जीवित प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मैं ही समस्त जीवों का आदि, मध्य तथा अन्त हूँ।
श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि वे आत्मा से दूर नहीं हैं बल्कि वास्तव में वे आत्मा के निकटस्थ हैं। परमात्मा सभी जीवों के हृदय में स्थित है। वेदों में वर्णन है-“य आत्मनि तिष्ठति" अर्थात् "भगवान हम सभी जीवों की आत्मा में स्थित हैं।" वे भीतर बैठकर आत्मा को चेतना शक्ति और अमरता प्रदान करते हैं। यदि वे अपनी शक्तियों को कम कर दें, तब हम आत्माएँ जड़वत् और नष्ट हो जाएगी। इसलिए हम जीवात्माएँ अपनी स्वयं की शक्ति से अविनाशी और चेतन नहीं होती अपितु परम चेतन और अविनाशी भगवान की कृपा से चेतन रहती हैं इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सभी जीवों के हृदय में रहते हैं। हमारी आत्मा भगवान का शरीर है जो सब आत्माओं की आत्मा अर्थात् परमात्मा हैं। श्रीमद्भागवतम् में भी ऐसा वर्णन किया गया है
हरिर्हि साक्षाद्भगवान् शरीरिणा
मात्मा झषाणामिव तोयमीप्सितम्।
(श्रीमद्भागवतम्-5.18.13)
"भगवान सभी जीवों की आत्मा की आत्मा है।" भागवत में पुनः कहा गया है कि जब शुकदेव ने यह वर्णन किया कि किस प्रकार से गोपियाँ अपने बच्चों को घर पर छोड़कर बाल श्रीकृष्ण को निहारने के लिए जाती थी, तब परीक्षित ने प्रश्न किया कि ऐसा कैसे संभव था। ब्रह्मन्
परोद्भवे कृष्णे इयान् प्रेमा कथं भवेत् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.14.49)
"हे ब्राह्मण देव, सभी माताओं की अपने बच्चों में आसक्ति होती है तब गोपियों की श्रीकृष्ण के साथ ऐसी गहन आसक्ति कैसे हो गयी जितनी वे अपने स्वयं के बच्चों में भी अनुभव नहीं करती थीं।" शुकदेव ने उत्तर देते हुए कहा-
कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्
(श्रीमद्भागवतम्-10.14.55)
"कृपया यह समझो कि श्रीकृष्ण इस ब्रह्माण्ड के सभी जीवों की परम आत्मा हैं। वे मानव मात्र के कल्याण के लिए अपनी अतरंग शक्ति 'योगमाया' द्वारा मनुष्य के रूप में धरती पर प्रकट होते हैं।" श्रीकृष्ण पुनः कहते हैं कि वे सभी प्राणियों के आदि, मध्य और अन्त हैं। वे सब भगवान से उत्पन्न होते हैं इसलिए भगवान उनके आदि हैं। सृष्टि के सभी जीवित प्राणियों का निर्वाह उनकी शक्ति से होता है इसलिए वे सबके मध्य हैं और जो मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं वे उनके दिव्य लोक में उनके साथ सदा के लिए रहने आ जाते हैं। इसलिए भगवान सभी जीवों के अन्त भी हैं।
वेदों में प्रदत्त भगवान की विभिन्न परिभाषाओं में से एक इस प्रकार है-
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति ।
यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।
(तैत्तरीयोपनिषद-3.1.1)
"भगवान वह है जिससे सभी जीवों की उत्पत्ति हुई है। भगवान वह है जिसमें सभी जीव स्थित हैं। भगवान वह है जिसमें सभी जीव लीन हो जाएंगे।"
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् |
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी || 21||
मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु हूँ, प्रकाशवान पदार्थों में सूर्य, मरूतों में मुझे मरीचि और नक्षत्रों में चन्द्रमा समझो
पुराणों में ऐसी जानकारी मिलती है कि कश्यप ऋषि की अदिति और दिति नाम से दो पत्नियाँ थी। उनकी पहली पत्नी अदिति से उनकी बारह दिव्य सन्तानें धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरूण, अंश, भाग, विवस्वान, पूषा, सविता, त्वष्टा और वामन उत्पन्न हुईं। इनमें से वामन परमात्मा विष्णु के अवतार थे। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे आदित्यों में भगवान विष्णु हैं। विष्णु ने वामन के रूप में अपने वैभव को प्रकट किया। ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं में सूर्य सबसे अधिक दीप्तिमान होता है।
रामचरितमानस में वर्णन है-
राकापति शोरस उनहिं तारागन समुदाइ।
सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ।।
"रात्रिकाल में आकाश के सभी तारों और चन्द्रमा सहित सभी दीपक मिलकर भी अंधकार को मिटाने के लिए पर्याप्त नहीं होते। लेकिन जिस क्षण सूर्योदय होता है उसी क्षण रात्रि समाप्त हो जाती है।" यह सूर्य की शक्ति है जिसे कृष्ण अपनी विभूति के रूप में प्रकट करते हैं।
वे आगे रात्रि के आकाश का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं-"एक चन्द्रमा हजारों तारों से श्रेष्ठ है।" श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे रात्रि के आकाश में सभी नक्षत्रों और तारों के बीच चन्द्रमा हैं क्योंकि चन्द्रमा उनके वैभव को सर्वोत्तम ढंग से प्रकट करता है।
पुराणों में आगे यह वर्णन मिलता है कि कश्यप ऋषि की दूसरी पत्नी दिति से सन्तान के रूप में दैत्यों ने जन्म लिया। फिर दैत्यों के जन्म के पश्चात् दिति में इन्द्र से भी अधिक शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न करने की इच्छा उत्पन्न हुई इसलिए उसने अपने शिशु को एक वर्ष तक अपने गर्भ में रखा। तब इन्द्र ने वज्र का प्रयोग कर उसके गर्भ में पल रहे बालक के कई टुकड़े कर दिए और वे कई मारूत में बदल गये। वे सब 59 मारूत अर्थात् ब्रह्मांड में प्रवाहित होने वाली वायु बन गये। इनमें से सबसे मुख्य-अवाह, प्रवाह, निवाह, पूर्वाह, उद्वाह, संवाह, परिवाह हैं। सबसे प्रमुख वायु को 'परिवाह' के नाम से जाना जाता है और इसे 'मरीचि' भी कहा जाता है। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनका वैभव ‘मरीचि' नामक वायु में प्रकट होता है।
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासव: |
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना || 22||
मैं वेदों में सामवेद, देवताओं में स्वर्ग का राजा इन्द्र हूँ। इन्द्रियों के बीच में मन और जीवित प्राणियों के बीच चेतना हूँ।
चार वेदों के नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं। इनमें से सामवेद में भगवान के वैभवों का वर्णन किया गया है, जैसे कि ये स्वर्ग के देवताओं में प्रकट होते हैं जो ब्रह्माण्ड का संचालन करते हैं। सामवेद संगीतमय है और इसे भगवान की प्रशंसा में गाया जाता है। यह उनका मन हर लेता है जो इसे समझते हैं और यह इसे श्रवण करने वालों में भक्ति भाव उत्पन्न करता है। स्वर्ग के देवता इन्द्र का दूसरा नाम वासव है। उसका यश, शक्ति और पदवी जीवात्माओं में अद्वितीय है। कई जन्मों के पुण्य कर्मों के फलस्वरूप किसी विरले पुण्यात्मा को इन्द्र के पद पर नियुक्त किया जाता है इसलिए इन्द्र भगवान की दीप्तिमान महिमा को दर्शाता है। पाँचों इन्द्रियाँ तभी सुचारू रूप से काम करती हैं जब मन सचेत रहता है। यदि मन भटक जाता है तब इन्द्रियाँ सुचारू रूप से कार्य नहीं कर सकती।
उदाहरणार्थ हम अपने कानों से लोगों के वार्तालाप को सुनते हैं किन्तु यदि उनके बोलते समय हमारा मन भटक जाता है तब उनके शब्द हमारे कानों को सुनाई नहीं देते। इसलिए मन इन्द्रियों का राजा है। श्रीकृष्ण इसकी चर्चा अपनी शक्ति को दर्शाने के लिए करते हैं और बाद में भगवद्गीता के अध्याय 15.6 में उन्होंने मन का उल्लेख छठी और महत्वपूर्ण इन्द्रिय के रूप में किया है। चेतना जीवात्मा का वह गुण है जिसके द्वारा जड़ और चेतन पदार्थों में अन्तर का बोध होता है। जीवित मनुष्यों के शरीर में चेतना की उपस्थिति और मृत व्यक्ति में चेतना के अभाव से ही जीवित और मृत व्यक्ति के अन्तर का पता चलता है। भगवान की दिव्य शक्ति द्वारा चेतना आत्मा में व्याप्त रहती है।
चेतनश्चे तनानाम्।
(कठोपनिषद्-2.2.13)
"भगवान सभी चेतन पदार्थों में परम चेतन है।"
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् |
वसूनां पावकश्चास्मि मेरु: शिखरिणामहम् || 23||
रुद्रों में मुझे शंकर जानो, यक्षों में मैं कुबेर हूँ, वसुओं में मैं अग्नि हूँ और पर्वतों में मेरु हूँ।
भगवान शिव के ग्यारह स्वरूप रुद्र कहलाते हैं-हर, बहुरूप, त्रयंबक, अपराजित, वृषकपि, शंकर कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, सर्व और कपाली। पुराणों में विभिन्न स्थानों में इनको विभिन्न नाम दिए गए हैं। इनमें से शंकर ब्रह्माण्ड में भगवान शिव का मूल रूप हैं।
यक्षों और राक्षसों की रूचि संपत्ति अर्जित करने में होती है। यक्षों का नायक कुबेर विपुल धन-संपदा से सम्पन्न और देवताओं का कोषाध्यक्ष है। इस प्रकार वह यक्षों में सर्वव्यापी भगवान की विभूति प्रदर्शित करता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, अंतरिक्ष, सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र आठ प्रकार के वसु कहलाते हैं। ये सभी ब्रह्माण्ड की स्थूल संरचना का निर्माण करते हैं। इनमें से अग्नि गर्मी उत्पन्न करती है और अन्य तत्त्वों को ऊर्जा प्रदान करती है। इसलिए श्रीकृष्ण ने इसका उल्लेख अपनी विशेष अभिव्यक्ति के रूप में किया है। स्वर्गलोक में मेरु पर्वत अपनी प्राकृतिक सम्पदा के लिए प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि स्वर्ग की कई इकाइयाँ इसकी धुरी के चारों ओर चक्कर लगाती रहती हैं। इसलिए श्रीकृष्ण इसके वैभव की चर्चा करते हैं। जिस प्रकार समृद्धि से धनवान व्यक्ति की पहचान होती है उसी प्रकार उपर्युक्त सभी वैभव भगवान की विभूतियों अर्थात् अनन्त शक्तियों को प्रकट करते हैं।
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् |
सेनानीनामहं स्कन्द: सरसामस्मि सागर: || 24||
हे अर्जुन! पुरोहितों में मुझे बृहस्पति जानो और सेना नायकों में मैं कार्तिकेय हूँ और सभी जलाशयों में समुद्र हूँ।
पुरोहित मंदिरों और घरों में धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा और अनुष्ठानों आदि का पालन करवाते हैं। बृहस्पति स्वर्ग के मुख्य पुरोहित हैं इसलिए वे सभी पुरोहितों में श्रेष्ठ हैं। किन्तु श्रीमद्भागवतम् के श्लोक 11.16.22 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे पुरोहितों में विशिष्ट हैं। उन्होंने दो स्थानों पर पृथक्-पृथक् उल्लेख क्यों किया है? इसका तात्पर्य यह है कि हमें पदार्थ के महत्त्व के स्थान पर पदार्थ में प्रकट हो रहे भगवान के वैभव की ओर ध्यान देना चाहिए। सभी वस्तुओं के जिस वैभव का भगवान श्रीकृष्ण यहाँ वर्णन कर रहे हैं, उन्हें भी इसी प्रकार से समझना चाहिए। ऐसा नहीं है कि पदार्थ के महत्त्व पर बल दिया जा रहा है अपितु उसमें प्रकट होने वाले भगवान का वैभव अधिक महत्त्वपूर्ण है। कार्तिकेय भगवान शिव के पुत्र हैं जिसे स्कन्द नाम से भी जाना जाता है। वह स्वर्ग के देवताओं के महासेनानायक है। इसलिए समस्त सेनापतियों में श्रेष्ठ कार्तिकेय में भगवान का वैभव प्रदर्शित होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि सभी जलाशयों में वे उग्र और शक्तिशाली समुद्र हैं।
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् |
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालय: || 25||
मैं महर्षियों में भृगु हूँ, ध्वनियों में दिव्य ओम् हूँ। मुझे यज्ञों में जपने वाला पवित्र नाम समझो। अचल पदार्थों में मैं हिमालय हूँ।
यद्यपि सभी प्रकार के फल और फूल एक ही धरती पर उगते हैं किन्तु प्रदर्शन के लिए उनमें से उत्तम का चयन किया जाता है। इसी प्रकार से ब्रह्माण्ड में सभी व्यक्त और अव्यक्त पदार्थ भगवान का वैभव है, फिर भी भगवान की विभूतियों का वर्णन करने हेतु इनमें से सर्वश्रेष्ठ का चयन किया जाता है। देवलोक में स्थित ऋषियों में प्रमुख भृगु ऋषि हैं। वे ज्ञान, वैभव और भक्ति से सम्पन्न हैं। विष्णु भगवान की छाती पर भृगु के पदचिह्न है जिसका उल्लेख पुराणों में किया गया है। इसमें वर्णन है कि भृगु ने त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और शिव के धैर्य का परीक्षण किया था। अतः भृगु ऋषि के माध्यम से श्रीकृष्ण की विलक्षण महिमा प्रकट होती है।
भगवान के निराकार रूप की आराधना 'ओम्' स्पंदन का ध्यान करके की जाती है जोकि भगवान की एक अन्य विभूति है। श्रीकृष्ण ने श्लोक 7.18 और 8.13 में यह व्याख्या की है कि प्रणव शब्द 'ओम्' पवित्र ध्वनि है। यह अनाहत नाद है और यही स्पंदन ध्वनि सृष्टि में व्याप्त है। प्रायः मांगलिक कार्यों के आरम्भ में इसका उच्चारण किया जाता है। यह कहा जाता है कि एक अक्षर 'ओम्' से गायत्री मंत्र प्रकट हुआ और गायत्री मंत्र से वेद प्रकट हुए।
हिमालय उत्तर भारत में एक पर्वत श्रृंखला है। प्राचीन काल से ही ये पर्वत श्रृंखलाएँ करोडों भक्तों में आध्यात्मिक कौतुहल, विस्मय और आश्चर्य उत्पन्न करती रही हैं। इन पर्वत श्रृंखलाओं की जलवायु, पर्यावरण और निर्जनता तपस्या एवं आत्मिक उन्नति के अत्यंत अनुकूल है। इसलिए कई महान ऋषि हिमालय में अपने सूक्ष्म शरीर में रहते हुए स्वयं के आत्म उत्थान और मानव मात्र के कल्याणार्थ घोर तपस्या का अभ्यास करते हैं। इसलिए विश्व की बहुसंख्यक पर्वत श्रृंखलाओं में हिमालय भगवान के गौरव को अनुपम ढंग से प्रदर्शित करता है।
यज्ञ परमात्मा के प्रति हमारे समर्पण से संबंधित कर्म है। भगवान के पावन नाम को जपना सबसे सरल यज्ञ है। इसे जप यज्ञ या श्रद्धापूर्वक भक्तिभाव से भगवान के दिव्य नामों का बार-बार जप करना कहा जाता है। वैदिक यज्ञों के लिए कई प्रकार के नियम निर्धारित किए गये हैं। इन सबका सावधानी से पालन करना आवश्यक होता है जबकि जप यज्ञ या कीर्तन में कोई नियम नहीं होता। यह यज्ञ किसी भी स्थान और किसी भी समय किया जा सकता है और अन्य प्रकार के यज्ञों की तुलना में यह अधिक आत्म शुद्धि करता है। कलियुग में भगवान के नाम स्मरण पर ही अधिक बल दिया गया है।
कलिजुग केवल नाम आधारा।
सुमिरि सुमिरि नर उतरहैं पारा ।।
(रामचरित्मानस)
"कलियुग में भगवान के नाम का स्मरण और जप माया रूपी संसार के समुद्र को पार करने का सशक्त साधन है।"
अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारद: |
गन्धर्वाणां चित्ररथ: सिद्धानां कपिलो मुनि: || 26||
वृक्षों में मैं बरगद का वृक्ष हूँ और देव ऋषियों में मैं नारद हूँ, गंधों में मैं चित्ररथ हूँ, सिद्ध पुरुषों में मैं कपिल मुनि हूँ।
बरगद के वृक्ष के नीचे बैठने वालों को शीतलता का आभास होता है। यह वृक्ष घना होता है और विस्तृत क्षेत्र में ठण्डी छाया प्रदान करता है। यह अपनी जड़ों को नीचे पहुँचा कर फैलाता है। महात्मा बुद्ध को बरगद के वृक्ष के नीचे ध्यान लगाते हुए ज्ञान प्राप्त हुआ था। महर्षि नारद कई महान ऋषियों एवं संतों जैसे ऋषि वेदव्यास, वाल्मीकि, ध्रुव और प्रह्लाद के गुरु हैं। वे निरन्तर भगवान की महिमा का गान व बखान करते रहते हैं और तीनों लोकों में दिव्य कार्यों की पूर्ति करते हैं। वह समस्याएँ उत्पन्न करने के लिए प्रसिद्ध हैं और कभी-कभी कुछ गन्धर्व उन्हें उपद्रवी समझने लगते हैं जबकि उनकी यह इच्छा होती है कि महान लोगों के बीच विवाद उत्पन्न कर अंततः आत्मनिरीक्षण द्वारा उनके अत:करण को शुद्ध किया जाए। गन्धर्व लोक में ऐसे लोग निवास करते हैं जो मधुर वाणी में गाते हैं और इनमें चित्ररथ सर्वश्रेष्ठ गायक हैं। सिद्ध पुरुष वे योगी होते हैं जो आध्यात्मिक रूप से परिपूर्ण होते हैं। इन सिद्धों में कपिल मुनि ने सांख्य दर्शन प्रकट किया और भक्तियोग की महिमा की भी शिक्षा दी जिसका वर्णन श्रीमद्भागवतम् के तीसरे स्कन्ध में मिलता है। वे भगवान के अवतार थे और इसलिए श्रीकृष्ण ने अपनी महिमा को प्रकट करने के लिए विशेष रूप से इनका उल्लेख किया है।
उच्चै:श्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् |
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् || 27||
अश्वों में मुझे उच्चैश्रवा समझो जो समुद्र मंथन के समय प्रकट हुआ था। हाथियों में मुझे ऐरावत समझो और मनुष्यों में मैं राजा हूँ।
श्रीकृष्ण निरन्तर अर्जुन को अपना गौरव प्रकट करने प्रत्येक श्रेणी के अति प्रतिष्ठित व्यक्तियों और भव्य पदार्थों का नाम ले रहे हैं। उच्चैश्रवा अलौकिक पंखों वाला स्वर्ग लोक के राजा इन्द्र का घोड़ा है। सफेद रंग का यह घोड़ा ब्रह्माण्ड में सबसे तीव्र गति से दौड़ने वाला है। यह देवताओं और दैत्यों द्वारा समुद्रमंथन के दौरान प्रकट हुआ था। इन्द्र ऐरावत नाम के सफेद हाथी पर सवारी करता है। इसे 'अर्धमातंग' या 'बादलों का हाथी' भी कहा जाता है।
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् |
प्रजनश्चास्मि कन्दर्प: सर्पाणामस्मि वासुकि: || 28||
शस्त्रों में मैं वज्र हूँ और गायों में कामधेनु हूँ। सन्तति के समस्त कारणों में मैं प्रेम का देवता कामदेव और सर्पो में वासुकि हूँ।
पुराणों में महान ऋषि दधीचि के बलिदान से संबंधित कथा का वर्णन मिलता है जोकि इतिहास में अनूठी है। स्वर्ग के राजा इन्द्र से एक बार वृत्रासुर नामक राक्षस ने स्वर्ग का राज्य छीन लिया। वृत्रासुर को प्राप्त वरदान के अनुसार उस समय उपलब्ध किसी भी शस्त्र से उसका वध नहीं किया जा सकता था। देवलोक नरेश इन्द्र हताश होकर भगवान शिव की शरण में गये और शिव देवलोक नरेश को भगवान विष्णु के पास ले गये। विष्णु भगवान ने बताया कि महर्षि दधीचि की अस्थियों से बने वज्र नामक शस्त्र से ही वृत्रासुर को मारा जा सकता है। इन्द्र ने तब महर्षि दधीचि से प्रार्थना की कि वे अपने प्राणों का बलिदान दें ताकि उनकी अस्थियों का प्रयोग वज्र बनाने के लिए किया जा सके। दधिची ने प्रार्थना स्वीकार तो कर ली लेकिन उससे पहले उन्होंने सभी पवित्र नदियों की तीर्थ यात्रा पर जाने की इच्छा व्यक्त की। इन्द्र तब सभी पवित्र नदियों का जल एक साथ ले आया ताकि महर्षि दधीचि बिना समय व्यर्थ किए अपनी अभिलाषा पूर्ण कर सकें। इसके पश्चात् महर्षि दधीचि ने यौगिक प्रक्रिया से अपने प्राण त्याग दिए। फिर दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र नामक अस्त्र का निर्माण किया गया और उस हथियार का प्रयोग कर वृत्रासुर को पराजित करके इन्द्र ने अपना स्वर्ग का राज्य सिंहासन पुनः प्राप्त किया। इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने जानबूझकर अपनी महिमा करने के लिए वज्र के नाम का उल्लेख किया है और इसे विष्णु भगवान के हाथों में सदैव धारण किए जाने वाली गदा और चक्र की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि जब सम्भोग क्रिया सन्तान की उत्पत्ति के उद्देश्य से की जाती है तब उसे अपवित्र नहीं कहा जा सकता। कामदेव विपरीत लिंगों में आकर्षण उत्पन्न करने के दायित्व का निवर्हन करता है ताकि प्रजनन प्रक्रिया द्वारा सहज रूप से मानव जाति का अस्तित्व बना रहे। इस आकर्षण का मूल भगवान हैं और इसका प्रयोग कामुक आनन्द के लिए न करके केवल योग्य संतान की उत्पत्ति के लिए करना चाहिए। सातवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने इसी प्रकार की घोषणा की थी कि वे ऐसे आकर्षण हैं जो सदाचरण और शास्त्रीय आज्ञाओं के विरुद्ध नहीं हैं।
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् |
पितृणामर्यमा चास्मि यम: संयमतामहम् || 29||
विभूति योग अनेक फणों वाले सों में मैं अनन्त हूँ, जलचरों में वरुण हूँ, पितरों में अर्यमा हूँ और नियामकों में मैं मृत्यु का देवता यमराज हूँ।
अनन्त एक दिव्य सर्प है जिस पर विष्णु भगवान विश्राम करते हैं। उसके दस हजार फण हैं। ऐसा कहा गया है कि वह सृष्टि के प्रारम्भ से अपने प्रत्येक फण से निरन्तर भगवान की महिमा का गान कर रहा है किन्तु उसका वर्णन अभी तक पूरा नहीं हुआ है। वरुण समुद्र के देवता हैं। अर्यमा अदिति के तीसरे पुत्र हैं। दिवंगत पितरों के प्रमुख के रूप में उनकी पूजा की जाती है। यमराज मृत्यु का देवता है। वह मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा के नश्वर शरीर को ले जाता है। वह भगवान की ओर से न्याय करते हैं और मनुष्य के इस जीवन के कर्मों के अनुसार उसे अगले जन्म में दण्ड या फल प्रदान करता है। वह अपने कर्त्तव्य पालन में किसी प्रकार की कोताही नहीं करते चाहे वे जीवात्मा के लिए सुखद या पीड़ादायक ही क्यों न हो। वह निष्पक्ष परम न्यायकर्ता के रूप में भगवान की महिमा को प्रदर्शित करते है।
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां काल: कलयतामहम् |
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् || 30||
दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूँ और दमनकर्ताओं में मैं काल हूँ। पशुओं में मुझे सिंह मानो और पक्षियों में मुझे गरूड़ जानो।
प्रह्लाद ने शक्तिशाली दैत्यराज हिरण्यकश्यप के पुत्र के रूप में जन्म लिया था किन्तु वह बाल्यावस्था से ही भगवान विष्णु का परम भक्त हो गया। इस प्रकार प्रह्लाद के व्यक्तित्त्व में भगवान की महिमा सर्वोत्कृष्ट ढंग से प्रदर्शित होती है। काल अत्यंत बलवान है जो कि ब्रह्माण्ड के बड़े से बड़े शक्तिशाली मनुष्यों को धूल में मिला देता है। उसी तरह अहंकारी हिरण्यकश्यप का भी अंत भगवान विष्णु ने किया। खूखार सिंह जंगल का राजा है और पशुओं में भगवान की शक्ति वास्तव में सिंह में ही प्रदर्शित होती है। गरुड़ भगवान विष्णु का दिव्य वाहन है और पक्षियों में सबसे बड़ा है।
पवन: पवतामस्मि राम: शस्त्रभृतामहम् |
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी || 31||
पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ और शस्त्र चलाने वालों में मैं भगवान श्रीराम हूँ, जलीय जीवों में मगरमच्छ और बहती नदियों में गंगा हूँ।
प्रकृति में वायु अति प्रभावी ढंग से शुद्धिकरण का कार्य करती है। यह अशुद्ध जल को वाष्प में परिवर्तित करती है और पृथ्वी से दुर्गंध को दूर करती है। यह ऑक्सीजन के साथ अग्नि प्रज्जवलित करती है। इस प्रकार से यह प्रकृति को शुद्ध करती है। भगवान श्रीराम पृथ्वी पर सबसे पराक्रमी योद्धा थे और उनका धनुष घातक शस्त्र था। फिर भी उन्होंने अपनी प्रबल शक्तियों का कभी दुरुपयोग नहीं किया। हर समय उन्होंने शुभ कार्य के लिए हथियार उठाएँ। इस प्रकार से वे श्रेष्ठ शस्त्रधारी थे।
राम भगवान के अवतार थे। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने उनके साथ अपनी पहचान को दर्शाया है। पवित्र नदी गंगा भगवान के दिव्य चरणों से प्रवाहित होती है। वह स्वर्ग से नीचे पृथ्वी पर आती है। कई महान ऋषि मुनियों ने इसके किनारे पर तपस्या की है। यह तथ्य पहले भी उजागर हो चुका था कि यदि गंगा जल को किसी बर्तन में भरकर वर्षों तक भी रखा जाए तब भी सामान्य जल की भाँति उसमें सड़न उत्पन्न नहीं होती। लेकिन आधुनिक युग में इस तथ्य की प्रबलता थोड़ी घट गयी है क्योंकि लाखों गैलन गंदगी गंगा में डाली जा रही है।
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन |
अध्यात्मविद्या विद्यानां वाद: प्रवदतामहम् || 32||
हे अर्जुन! मुझे समस्त सृष्टियों का आदि, मध्य और अंत जानो। सभी विद्याओं में मैं अध्यात्म विद्या हूँ और सभी तर्कों का मैं तार्किक निष्कर्ष हूँ।
इससे पहले 20वें श्लोक में श्रीकृष्ण ने व्याख्या की थी कि वे सभी प्राणियों के आदि, मध्य और अंत हैं। अब वे यही बात सभी सृष्टियों के लिए कह रहे हैं। सभी प्रकार की सृष्टियाँ जैसे अंतरिक्ष, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को सर्ग कहा जाता है। मैं इनका 'सृजक' अर्थात् आदि, 'पालक' अर्थात् मध्य और 'संहारक' अर्थात् अंत हूँ। इसलिए सृष्टि का सृजन, पालन और संहार मेरी विभूतियों द्वारा किया जाता है। विद्या वह है जिसके द्वारा मनुष्य को किसी विषय से संबंधित ज्ञान प्राप्त होता है। धार्मिक ग्रंथों में 18 प्रकार की विद्याओं का वर्णन किया गया है जिनमें से प्रमुख चौदह का वर्णन निम्न प्रकार से किया गया है:
अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्याय विस्तरः।
पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्योताश्चर्तुदश ।।
विभूति योग आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चैव ते त्रयः।
अर्थशास्त्रं चतुर्थं तु विद्या ह्यष्टादशैव ताः।।
(विष्णु पुराण-3.6.27.28)
"शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्ति, ज्योतिष और छंद, ये छः प्रकार की विद्याओं को वेदों का अंग कहा जाता है। ऋक्, यजु, साम, अथर्व ये वैदिक ज्ञान की चार शाखाएँ हैं। मीमांसा, न्याय, धर्म शास्त्र और पुराणों सहित प्रमुख चौदह विद्याएँ हैं।" इन विद्याओं का अभ्यास बुद्धि, दिव्य ज्ञान और धर्म के मार्ग के प्रति जागरूकता को बढ़ाता है। इसके अतिरिक्त आध्यत्मिक ज्ञान मनुष्य को माया के बंधनों से मुक्त कर उसे अमरत्व प्रदान करता है। इस प्रकार से यह पहले उल्लिखित विद्याओं में सर्वोत्कृष्ट है। श्रीमद्भागवतम् में भी इसका उल्लेख किया गया है
सा विद्या तन्मतिर्यया
(श्रीमद्भागवतम्-4.29.49)
"सर्वोत्तम ज्ञान वह है जिसके द्वारा मनुष्य में भगवान के चरण कमलों में अनुराग उत्पन्न हो।" विवाद और तर्क के क्षेत्र में 'जल्प' का अर्थ प्रतिद्वन्दी के कथनों में दोष ढूँढ कर अपने मत को स्थापित करने से है। 'वितण्डा' से तात्पर्य कपटपूर्ण और असार तर्कों द्वारा स्पष्ट रूप से जानबूझकर सत्य को अस्वीकार करने से है। वेद, वाद-विवाद का तार्किक निष्कर्ष हैं। तर्क विचारों के संप्रेषण और सत्य की स्थापना का आधार है। इसलिए तर्क के सार्वभौमिक बोध के कारण मानव समाज में ज्ञान को सरलता से सीखा, सिखाया और विकसित किया जा सकता है। तर्क का सार्वभौमिक सिद्धान्त भगवान की विभूतियों का प्रकटीकरण है।
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्व: सामासिकस्य च |
अहमेवाक्षय: कालो धाताहं विश्वतोमुख: || 33||
मैं सभी अक्षरों में प्रथम अक्षर 'आकार' हूँ और व्याकरण के समासों का द्वन्द्व समास हूँ। मैं शाश्वत काल हूँ और में ब्रह्मा हूँ।
संस्कृत वर्णमाला के सभी वर्ण 'अ' अक्षर के साथ मिलकर बने होते हैं। उदाहरणार्थ क् + अ = क। इसलिए 'अ' अक्षर संस्कृत वर्णमाला का महत्त्वपूर्ण अक्षर है। 'अ' वर्णमाला का प्रथम स्वर भी है क्योंकि स्वर व्यंजन से पहले लिखा जाता है और 'अ' सबसे पहला स्वर है। यद्यपि संस्कृत ऐसी प्राचीन भाषा है जो अति परिष्कृत और सशक्त है। संस्कृत भाषा की सामान्य प्रक्रिया में एकल शब्दों को मिलाकर समास शब्द बनाए जाते हैं। जब दो या अधिक शब्द अपने सम्बन्धी शब्दों या विभक्तियों को छोड़कर एक साथ मिल जाते हैं तब उनके इस मेल को समास कहते हैं। समास द्वारा मिले हुए शब्दों को सामासिक शब्द अथवा समस्तपद कहा जाता है। प्रमुख रूप से छः प्रकार के समास हैं-1. द्वंद्व, 2. बहुब्रीहि, 3. कर्मधारय, 4. तत्पुरुष, 5. द्विगु, 6. अव्यवीभाव। इनमें से द्वन्द्व सर्वोत्तम है क्योंकि इनमें दोनों शब्दों की प्रमुखता होती है जबकि अन्य समासों में किसी एक शब्द की तुलना में दूसरे शब्द की अधिक प्रमुखता होती है या दोनों शब्दों का संयोग तीसरे शब्द का अर्थ स्पष्ट करता है। 'राधा-कृष्ण' यह दो शब्द द्वन्द समास का उदाहरण है।
श्रीकृष्ण इसलिए इसे अपनी विभूति के रूप में प्रकट कर रहे हैं। सृष्टि की रचना अद्भुत कार्य है और इसका अवलोकन विस्मयकारी है जबकि अति प्रबुद्ध अविष्कारों से उन्नत मानवजाति इसकी तुलना में निष्प्रभ है। इसलिए श्रीकृष्ण प्रथम जन्में ब्रह्मा का नाम लेते हैं जिन्होंने समूची सृष्टि की रचना की और वे यह कहते हैं कि सृष्टाओं में ब्रह्मा की रचनात्मक क्षमता भगवान की महिमा को सर्वोत्तम ढंग से प्रदर्शित करती है।
मृत्यु: सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् |
कीर्ति: श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृति: क्षमा || 34||
मैं सर्वभक्षी मृत्यु हूँ और भविष्य में होने वालों अस्तित्वों को उत्पन्न करने वाला मूल मैं ही हूँ। स्त्रियों के गुणों में मैं कीर्ति, समृद्धि, मधुर वाणी, स्मृति, बुद्धि, साहस और क्षमा हूँ।
अंग्रेजी में एक कहावत है 'मृत्यु के समान अटल'। जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी निश्चित है और इस प्रकार से 'डेड एन्ड' अर्थात् सभी के जीवन का अटल सत्य मृत्यु है ऐसा वर्णित है। भगवान में केवल सृजन की ही शक्ति नहीं है अपितु उनमें सृष्टि का संहार करने की भी शक्ति है। वे मृत्यु के रूप में उन सबका भक्षण करते हैं जो जन्म और मृत्यु के चक्र में घूमते रहते हैं और पुनः जन्म लेते रहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे भविष्य में उत्पन्न होने वाले सभी प्राणियों के मूल हैं। स्त्रियों के व्यक्तित्त्व में कुछ गुण अलंकारों के रूप में देखे जाते हैं जबकि पुरुषों में कुछ अन्य गुणों को विशेषतः प्रशंसनीय रूप में देखा जाता है। आदर्श रूप से बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व वह है जो दोनों प्रकार के गुणों से सम्पन्न हो। यहाँ श्रीकृष्ण ने कीर्ति, समृद्धि, मृदुवाणी, स्मृति, बुद्धि, साहस और क्षमा आदि गुणों का उल्लेख किया है जो स्त्रियों को गौरवशाली बनाते हैं। इनमें प्रथम तीन बाह्य रूप से और अगले चार आंतरिक रूप में प्रकट होते हैं। इसके अतिरिक्त मानव जाति के प्रजनक प्रजापति दक्ष की चौबीस कन्याएँ थी जिनमें से पाँच कीर्ति, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा श्रेष्ठ स्त्रियाँ थी। 'श्री' ऋषि भृगु की पुत्री थी तथा 'वाक्' ब्रह्मा की कन्या थी। अपने विशिष्ट नामों के अनुसार ये सात स्त्रियाँ इस श्लोक में वर्णित सात गुणों की अधिष्ठात्री देवियाँ हैं। यहाँ श्रीकृष्ण ने इन गुणों को अपनी विभूतियों के रूप में प्रकट किया है।
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् |
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकर: || 35||
सामवेद के स्तोत्रों में मुझे बृहत्साम और छन्दों में मुझे गायत्री समझो। मैं बारह मासों में मार्ग शीर्ष और ऋतुओं में पुष्प खिलाने वाली वसन्त ऋतु हूँ।
इससे पहले श्रीकष्ण ने कहा था कि वेदों में वे सामवेद हैं जो सुन्दर भक्तिमय गीतों से परिपूर्ण है। अब वे कहते हैं कि सामवेद में वे बृहत्साम हूँ जिसका स्वर अत्यंत मधुर है और ये विशेष रूप से मध्यरात्रि में गाए जाते हैं। अन्य भाषाओं के समान संस्कृत भाषा में काव्य रचना के लिए विशिष्ट पद्यों और छंदो की व्यवस्थाएँ हैं। वेदों में कई छंद हैं। इनमें गायत्री अति आकर्षक और मधुर है। जिस छंद में प्रसिद्ध गायत्री मंत्र सम्मिलित है वह गायत्री छंद ही है। यह गहन सार्थक प्रार्थना भी है।
ओउम् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
(ऋग्वेद-3.62.10)
"हम तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाले और हमारे लिए पूजनीय भगवान का ध्यान करते हैं। वह सभी पापों का और अज्ञानता का विनाश करता है। वह हमारी बुद्धि को उचित दिशा की ओर प्रेरित करे।" गायत्री मंत्र युवा पुरुषों के लिए पवित्र उपनयन संस्कार का भी अंग है और दैनिक धार्मिक अनुष्ठानों में गाया जाता है। इसके अतिरिक्त देवी गायत्री, रुद्र गायत्री, ब्रह्म गायत्री, परमहंस गायत्री और कुछ अन्य गायत्री मंत्र भी वेदों में मिलते हैं। मार्गशीर्ष हिन्दू पंचाङ्ग (कैलेंडर) का ग्यारहवाँ मास है। यह नवम्बर और दिसम्बर माह में पड़ता है।
भारत में तापमान की दृष्टि से यह मास उत्तम माना जाता है क्योंकि यह न तो अधिक गर्म न ही अधिक ठंडा होता है। वर्ष में इस समय में खेतों से फसल काटी जाती है। इन कारणों से इस मास को प्रायः सभी पसंद करते हैं। वसंत ऋतु को ऋतु राज या ऋतुओं के राजा के रूप में जाना जाता है। इस समय प्रकृति जीवन में उल्लास की बौछारें छिटका कर सबको प्रफुल्लित करती है। कई उत्सव भी इस ऋतु में मनाये जाते हैं। वसंत ऋतु वातावरण में व्याप्त होने वाले हर्षोल्लास का प्रतीक है। इस प्रकार ऋतुओं में वसंत भगवान के वैभव को प्रकट करती है।
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् |
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् || 36||
समस्त छलियों में मैं जुआ हूँ और तेजस्वियों में तेज हूँ। विजेताओं में विजय हूँ। संकल्पकर्ताओं का संकल्प और धर्मात्माओं का धर्म हूँ।
श्रीकृष्ण केवल गुणों का नहीं बल्कि अवगुणों का भी अपनी महिमा के रूप में उल्लेख करते हैं। जुआ एक बुराई है जो परिवार, व्यवसाय और जीवन का विनाश करता है। युधिष्ठिर की जुआ खेलने की दुर्बलता के कारण महाभारत का युद्ध हुआ। यदि जुआ भी भगवान की महिमा है और इसमें कोई बुराई नहीं है तब फिर इसकी मनाही क्यों है। इसका उत्तर यह है कि भगवान जीवात्मा को अपनी शक्ति प्रदान करते हैं और इसके साथ वह उसे चयन करने की स्वतंत्रता भी देते हैं। यदि हम उनको भूलना चाहते हैं तब वे हमें उन्हें भूल जाने की शक्ति देते हैं। यह विद्युत् शक्ति के समान है जिसका प्रयोग हम घर को गर्म या ठंडा करने के लिए करते हैं।
उपभोक्ता अपनी इच्छानुसार इसका प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र होता है। किन्तु पावर हाऊस जो बिजली की आपूर्ति करता है, वह इसके सदुपयोग या दुरूपयोग के लिए उत्तरदायी नहीं होता। समान रूप से जुआरी में भगवान द्वारा प्रदत्त बुद्धि और शक्ति होती है। लेकिन यदि वह भगवान द्वारा प्रदत्त उपहार का दुरूपयोग करना चाहता है तब भगवान उसके पापमय कर्म के लिए उत्तरदायी नहीं होते। सभी मनुष्य विजयी होना चाहते हैं। इसमें प्रभु की महिमा प्रकट होती है। श्रीकृष्ण ने दृढ़ संकल्प की गुणवत्ता पर भी अत्यंत बल दिया है। इसका पहले भी श्लोक संख्या 2.41, 2.44, और 9.30 में उल्लेख किया गया है। धर्मात्मा के गुण भी भगवान की शक्ति का ही प्रकटीकरण हैं। सभी सद्गुण, उपलब्धियाँ, महिमा, विजय, और दृढ़ संकल्प भगवान से उत्पन्न होते हैं। इसलिए इन्हें अपना समझने के स्थान पर हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि ये सब भगवान से ही हमारे पास आते हैं।
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जय: |
मुनीनामप्यहं व्यास: कवीनामुशना कवि: || 37||
विभूति योग वृष्णिवंशियों में मैं कृष्ण और पाण्डवों में अर्जुन हूँ, ऋषियों में मैं वेदव्यास और महान विचारकों में शुक्राचार्य हूँ।
भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर वृष्णि वंश में वसुदेव के पुत्र के रूप में जन्म लिया। वे वास्तव में वृष्णि वंश के सबसे गौरवशाली व्यक्तित्व हैं। पाँच पांडव युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल सहदेव, जो पाण्डु के पुत्र थे, इनमें अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे और श्रीकृष्ण के परम मित्र थे। भगवान उन्हें अपना परम मित्र मानते थे। ऋषियों में वेदव्यास का विशिष्ट स्थान है। उन्हें 'बादरायण' और 'कृष्ण द्वैपायन' नामों से भी जाना जाता है। उन्होंने वैदिक ज्ञान को अनेक प्रकार से प्रस्तुत किया और मानव मात्र के कल्याणार्थ कई धार्मिक ग्रंथों की रचना की। वास्तव में वेदव्यास श्रीकृष्ण के अवतार थे और श्रीमद्भागवतम् में अवतारों की सूची में उनके नाम का उल्लेख है। शुक्राचार्य विद्वान थे और उन्हें नीति शास्त्र के ज्ञाता के रूप में जाना जाता है। उन्होंने असुरों को अपने शिष्य बनाना स्वीकार किया और उनकी उन्नति के लिए उनका मार्गदर्शन दिया। अपनी विद्वत्ता के बल पर उन्हें भगवान की विभूति के रूप में जाना जाता है।
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् |
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् || 38||
मैं अराजकता को रोकने वाले साधनों के बीच न्यायोचित दण्ड और विजय की आकांक्षा रखने वालों में उनकी उपयुक्त नीति हूँ। रहस्यों में मौन और बुद्धिमानों में उनका विवेक हूँ।
मानव जाति की ऐसी प्रवृत्ति है कि लोगों के भीतर सदाचरण विकसित करने के लिए केवल उपदेश देना ही पर्याप्त नहीं होता। न्यायोचित ढंग से जब समय पर दण्ड दिया जाता है तब यह लोगों के पापमय आचरण में सुधार लाने और उन्हें सदाचरण पर चलने का प्रशिक्षण देने का महत्त्वपूर्ण उपकरण सिद्ध होता है। आधुनिक प्रबंधन सिद्धान्तों में अत्यंत कुशलता से वर्णन किया गया है कि दुराचार के लिए एक मिनट का दण्ड और सदाचार के लिए एक मिनट के उपयुक्त प्रोत्साहन से मनुष्यों के दुर्व्यवहार को रोका जा सकता है। विजय की अभिलाषा सार्वभौमिक है लेकिन जो उच्च चरित्रवान हैं वे नीति और सिद्धान्तों को त्याग कर अधर्म के मार्ग का अनुसरण कर विजय प्राप्त नहीं करना चाहते। ऐसी विजय जो धर्म के मार्ग का अनुसरण कर प्राप्त की जाती है वह भगवान की शक्ति का गौरव है। रहस्य वह है जिसे किसी विशिष्ट उद्देश्य से सामान्य जन से गुप्त रखा जाता है। कहा जाता है-"रहस्य एक व्यक्ति की जानकारी में ही रहस्य है। दो व्यक्ति की जानकारी में वह रहस्य गोपनीय नहीं रहता और तीन लोगों के बीच जानकारी होने का अर्थ है कि वह समूचे संसार में समाचार बन कर फैल चुका है।" इस प्रकार से सर्वोत्कृष्ट रहस्य वह है जो मौन में छिपा रहता है।
सच्चा ज्ञान मनुष्य में आध्यात्मिक ज्ञान की परिपक्वता और आत्मबोध या भगवद्ज्ञान द्वारा आता है। इसमें संपन्न मनुष्य सभी घटनाओं, मनुष्यों, और पदार्थों को भगवान के साथ संबंधित देखता है। ऐसा ज्ञान मनुष्य को परिशुद्ध, पूर्ण, तृप्त और उन्नत बनाता है। यह जीवन को दिशा देता है तथा अन्याय और परिवर्तन का सामना करने की शक्ति और मृत्यु तक क्रियाशील रहने की दृढ़ता प्रदान करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ऐसा ज्ञान हैं जो बुद्धिमानों में प्रकट होता है।
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन |
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् || 39||
मैं सभी प्राणियों का जनक बीज हूँ। कोई भी चर या अचर मेरे बिना नहीं रह सकता।
श्रीकृष्ण समस्त सृष्टि के निमित्त कारण और उपादान कारण दोनों हैं। निमित्त कारण से तात्पर्य यह है कि वे स्रष्टा हैं जो संसार को प्रकट करने के कार्य का निष्पादन करते हैं। उपादान कारण का अभिप्राय यह है कि वे वह तत्त्व हैं जिससे सृष्टि का सृजन होता है। श्लोक 7.10 और 9.18 में श्रीकृष्ण ने स्वयं को अनादि बीज घोषित किया था। यहाँ वे पुनः कहते हैं कि वे 'जनक बीज' हैं। वह इस पर पूर्णतः बल देते हैं कि वे सभी घटित घटनाओं का कारण हैं। उनकी शक्ति के बिना किसी का कोई अस्तित्त्व नहीं है। सभी जीव चार प्रकार से जन्म लेते हैं
1. अंडज-अण्डे से जन्म लेने वाले जैसे पक्षी, सर्प और छिपकली आदि।
2. जरायुज-गर्भ से जन्म लेने वाले जैसे मनुष्य, गाय, कुत्ता और बिल्ली आदि।
3. स्वेदज-पसीने से जन्म लेने वाले जैसे घु, खटमल आदि।
4. उद्भिज पृथ्वी से उगने वाले जैसे पेड़, लताएँ, घास और अनाज का पेड़ आदि। इसके अतिरिक्त अन्य योनियाँ भी हैं, जैसे भूत, प्रेतात्माएँ इत्यादि। श्रीकृष्ण इन सबका मूल कारण हैं।
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप |
एष तूद्देशत: प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया || 40||
हे शत्रु विजेता! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अन्त नहीं है। मैंने जो तुमसे कहा यह मेरी अनन्त महिमा का संकेत मात्र है।
श्रीकृष्ण अब अपने ऐश्वर्यों से संबंधित विषय का समापन कर रहे हैं। श्लोक संख्या 20 से 39 तक उन्होंने अपने बयासी ऐश्वर्यों का वर्णन किया। अब वे कहते हैं कि उन्होंने इस विषय का एक भाग ही उदाहरणार्थ प्रस्तुत किया है। अब यह प्रश्न सामने आता है कि यदि सब कुछ भगवान का ही ऐश्वर्य है तब इनका उल्लेख करने की क्या आवश्यकता है? इसका उत्तर यह है कि अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा था कि वह उनके दिव्य स्वरूप को कैसे समझे इसलिए अर्जुन के प्रश्न के प्रत्युत्तर में श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों का वर्णन किया। मन विशिष्ट गुणों की ओर आकर्षित होता है इसलिए भगवान ने अपनी शक्तियों की विलक्षणताओं को प्रकट किया है। जब कभी हम कहीं पर विशद वैभवशाली अभिव्यक्तियों को देखते हैं, यदि हम उन्हें भगवान की महिमा के रूप में देखते हैं तब हमारा मन स्वाभाविक रूप से भगवान के सम्मुख हो जाता है चूँकि। जबकि सृष्टि निर्माण की वृहत् योजना में भगवान की महिमा सभी छोटी और बड़ी वस्तुओं में व्याप्त है इसलिए हम यह समझ सकते हैं कि सारा संसार हमारी श्रद्धा भक्ति बढ़ाने के लिए असंख्य आदर्श और अवसर उपलब्ध करवाता है। भारत में एक पेंट कम्पनी अपने विज्ञापन में इसे इस प्रकार से व्यक्त करती है-'जब भी आप रंगों को देखोगे तब हमारे बारे में सोचोगे।' इस प्रकरण में श्रीकृष्ण का कथन भी समान है-"जहाँ भी आप महिमा की अभिव्यक्तियों को देखें तब मेरे बारे में सोंचें।"
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा |
तत्देवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् || 41||
तुम जिसे सौंदर्य, ऐश्वर्य या तेज के रूप में देखते हो उसे मेरे से ही उत्पन्न किन्तु मेरे तेज का स्फुलिंग मानो।
स्पीकर द्वारा प्रवाहित हो रही विद्युत्ध्वनि उत्पन्न करती है किन्तु जो इसके पीछे के सिद्धान्त को नहीं जानता। वह सोंचता है कि ध्वनि स्पीकर से आती है। समान रूप से जब हम किसी असाधारण प्रतिभा को देखते है वो हमारी कल्पना शक्ति को उन्मादिन कर देती है और हमें आनन्द में निमग्न कर देती है तब हमें उसे और कुछ न मानकर भगवान की महिमा का स्फुलिंग मानना चाहिए। वे सौंदर्य, महिमा, शक्ति, ज्ञान और ऐश्वर्य के अनन्त सरोवर हैं। वे विद्युत् गृह (पावर हाउस) हैं जहाँ से सभी जीव और पदार्थ ऊर्जा प्राप्त करते हैं। इसलिए हमें भगवान जो सभी प्रकार के वैभवों का स्रोत हैं उन्हें अपनी पूजा का लक्ष्य मानना चाहिए।
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन |
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् || 42||
हे अर्जुन! इस प्रकार के विस्तृत ज्ञान की क्या आवश्यकता है। केवल इतना समझ लो कि मैं अपने एक अंश मात्र से ही सकल सृष्टि में व्याप्त होकर उसे धारण करता हूँ।
श्रीकृष्ण का उपर्युक्त कथन यह इंगित करता है कि उन्होंने प्रश्न का उत्तर पहले ही दे दिया है। अब वह कुछ उल्लेखनीय तथ्य बताना चाहते हैं। अपना अद्भुत रूप प्रकट करने के पश्चात् वे कहते हैं कि अपनी महिमा के संबंध में उन्होंने जो कुछ वर्णन किया उन सबसे उनकी अनन्त महिमा के महत्त्व को आँका नहीं जा सकता क्योंकि अनन्त ब्रह्माण्डों की समस्त सृष्टि उनके एक अंश में स्थित है। वे यहाँ पर अपने अंश का उल्लेख क्यों कर रहे हैं?
इसका कारण है कि असंख्य ब्रह्माण्डों की सारी भौतिक सृष्टियाँ भगवान का केवल एक चौथाई अंश हैं। शेष तीन चौथाई आध्यात्मिक अभिव्यक्तियाँ हैं।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।
(पुरुष सूक्तम् मंत्र-3)
"भौतिक शक्ति से निर्मित अस्थायी संसार पुरुषोत्तम भगवान का केवल एक अंश है। अन्य तीन अंश उनके नित्य लोक हैं जो जन्म और मृत्यु से परे हैं।"
यह अत्यंत रोचक विषय है कि श्रीकृष्ण इस संसार में अर्जुन के सम्मुख खड़े हैं फिर भी वे यह कहते हैं कि समस्त संसार उनके स्वरूप का एक अंश है। यह गणेश और भगवान शिव की कथा के समान है। एक बार नारद मुनि ने भगवान शिव को एक विशेष फल दिया। भगवान शिव के दो पुत्र कार्तिकेय और गणेश उनसे उस फल की माँग करने लगे। भगवान शिव ने सोचा कि यदि वह किसी एक पुत्र को फल देते हैं तब दूसरा पुत्र सोचेगा कि उनके पिता पक्षपाती हैं। इसलिए भगवान शिव ने दोनों पुत्रों के लिए प्रतियोगिता की घोषणा की कि जो भी पूरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा पहले करके लौटेगा, फल उसे मिलेगा।
यह सुनकर कार्तिकेय ने तत्काल ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करना आरम्भ कर दी। वह बलिष्ठ और शक्तिशाली थे और उन्होंने इसका लाभ उठाना चाहा। उसकी अपेक्षा गणेश मोटे शरीर वाले थे और वे अपने भाई के साथ प्रतिस्पर्धा करने में स्वयं को असहाय मानते थे। इसलिए उन्होंने बुद्धि का सदुपयोग करने का निश्चय किया। भगवान शिव और पार्वती वहीं खड़े थे। गणेश ने उनकी तीन बार परिक्रमा की और घोषणा की-“पिताजी मैंने आपकी आज्ञा का पालन कर लिया कृपया मुझे फल प्रदान करें।" भगवान शिव ने कहा-"तुमने ब्रह्माण्ड की परिक्रमा कैसे कर ली तुम तो अब तक हमारे ही पास खड़े थे।" गणेश ने कहा-"पिताजी आप भगवान हैं। समस्त ब्रह्माण्ड आपके भीतर विद्यमान हैं।" भगवान शिव को इससे सहमत होना पड़ा कि उनका पुत्र गणेश बुद्धिमान है और वास्तव में उसने प्रतियोगिता में विजय प्राप्त की है।
जिस प्रकार भगवान शिव एक स्थान पर खड़े थे फिर भी सारा संसार उनमें समाविष्ट था, समान रूप से श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि असंख्य भौतिक ब्रह्माण्डों की सृष्टि उनके स्वरूप के एक अंश के रूप में उनमें स्थित है।
।। श्रीमद्भगवत गीता का दशम अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
Bhagavad Geeta Chapter 9
kathaShrijirasik
अध्याय नौ: राज विद्या योग
राज विद्या द्वारा योग
सातवें और आठवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने भक्ति को भगवत्प्राप्ति का सरल साधन और योग की सर्वोच्च स्थिति बताया था। नौवें अध्याय में उन्होंने अपनी महिमा का व्याख्यान किया है जिससे, श्रद्धा और भक्ति उत्पन्न होती है। वे यह बोध कराते हैं कि यद्यपि वे अर्जुन के सम्मुख साकार रूप में खड़े हैं किन्तु उन्हें सामान्य मनुष्य समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। वे स्पष्ट कहते हैं कि वे समस्त प्राकृतिक शक्तियों के अध्यक्ष हैं और सृष्टि के आरम्भ में अनगिनत जीवों को उत्पन्न करते हैं और प्रलय के समय वापस उन्हें अपने में विलीन कर लेते हैं तथा सृष्टि के अगले चक्र में उन्हें पुनः प्रकट करते हैं। जिस प्रकार से शक्तिशाली वायु सभी स्थानों पर प्रवाहित होती है और सदैव आकाश में स्थित रहती है। उसी प्रकार से सभी जीव भगवान में निवास करते हैं फिर भी वे अपनी योगमाया शक्ति द्वारा तटस्थ बने रहकर इन सभी गतिविधियों से विरक्त रहते हैं।
केवल भगवान ही आराधना का एक मात्र लक्ष्य हैं। इसे स्पष्ट करते हुए भगवान श्रीकृष्ण देवी-देवताओं की पूजा के मिथ्या भ्रम का समाधान करते हैं। भगवान सभी प्राणियों के लक्ष्य, सहायक, शरणदाता और सच्चे मित्र हैं। जिन मनुष्यों की रुचि वैदिक कर्मकाण्डों का पालन करने में होती है वे स्वर्गलोक प्राप्त करते हैं, किन्तु जब उनके पुण्य कर्म क्षीण हो जाते हैं तब उन्हें लौटकर पुनः पृथ्वीलोक में आना पड़ता है लेकिन जो परम प्रभु की भक्ति में तल्लीन रहते है वे उनके परम धाम में जाते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण उनके प्रति की जाने वाली विशुद्ध भक्ति को सर्वोत्तम बताते हुए उसकी प्रशंसा करते हैं। ऐसी भक्ति में लीन होकर जो कुछ हमारे पास है वह सब भगवान को समर्पित करते हुए हमें भगवान की इच्छा के साथ पूर्ण रूप से एकनिष्ठ होकर जीवनयापन करना चाहिए। ऐसी शुद्ध भक्ति पाकर हम कर्म के बंधनों से मुक्त रहेंगे और भगवान का प्रेम प्राप्त करने के लक्ष्य को पा सकेंगे।
आगे श्रीकृष्ण दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि वे न तो किसी का पक्ष लेते हैं और न ही किसी की उपेक्षा करते हैं। वह सभी प्राणियों के प्रति निष्पक्ष रहते हैं। यहाँ तक कि अधम पापी भी यदि उनकी शरण में आते हैं तब भी वे प्रसन्नता से उनको अपनाते हैं और उन्हें शीघ्र सद्गुणी बनाकर पवित्र कर देते हैं। वे वचन देते हैं कि उनके भक्त का कभी पतन नहीं हो सकता। अपने भक्तों के हृदय में आसीन होकर वे उनके आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं और जो पहले से उनके स्वामित्व में होता है उसकी रक्षा करते हैं। इसलिए हमें सदैव उनका ही चिन्तन और आराधना करनी चाहिए तथा मन और शरीर को पूर्णतया उनके प्रति समर्पित कर उन्हें अपना परम लक्ष्य बनाना चाहिए।
श्रीभगवानुवाच |
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे |
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् || 1||
परम प्रभु ने कहाः हे अर्जुन! क्योंकि तुम मुझसे ईर्ष्या नहीं करते इसलिए मैं तुम्हें विज्ञान सहित परम गुह्म ज्ञान बताऊँगा जिसे जानकर तुम भौतिक जगत के कष्टों से मुक्त हो जाओगे।
प्रारम्भ में ही श्रीकृष्ण उनके उपदेशों को सुनने की पात्रता के संबंध में बताते हैं। 'अनसूयवे' शब्द का तात्पर्य 'इर्ष्या न करने' से है। श्रीकृष्ण इसे इसलिए स्पष्ट करना चाहते हैं क्योंकि भगवान यहाँ अपनी अतिशय महिमा का वर्णन कर रहे हैं। 'अनसूयवे' शब्द का एक अन्य अर्थ 'जो घृणा नहीं करता है' भी है।
वे श्रोता जो श्रीकृष्ण का इसलिए उपहास उड़ाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि श्रीकृष्ण डींग मार रहे हैं, उन्हें श्रीकृष्ण के उपदेशों का श्रवण करने से कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा। निःसंदेह भगवान के संबंध में ऐसा सोचकर-'देखो इस अहंकारी मनुष्य को यह अपनी प्रशंसा स्वयं कर रहा है', वे स्वयं को हानि पहुँचाते हैं।
ऐसी मनोवृति अज्ञान और घमंड के कारण उत्पन्न होती है और इससे मनुष्य की श्रद्धा भक्ति समाप्त हो जाती है। ईर्ष्यालु लोग इस सत्य को ग्रहण नहीं कर पाते कि भगवान को अपने लिए कुछ प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होती और वे जीवात्मा के कल्याण के लिए ही सब कुछ करते हैं। वे जीवात्मा में अपनी भक्ति बढ़ाने के प्रयोजनार्थ अपनी प्रशंसा करते हैं न कि सांसारिक अहंभाव के दोष के कारण जैसा कि हम करते हैं। जब नाज़रेथ के यीशू मसीह ने कहा-"मैं ही मार्ग और मैं ही लक्ष्य हूँ" तब वे उनके उपदेश सुन रही जीवात्माओं को करुणा भाव से प्रेरित होकर ऐसा कह रहे थे न कि अहं भाव से। एक सच्चे गुरु के रूप में वे अपने शिष्यों को समझा रहे थे कि भगवान का धाम गुरु के माध्यम से मिलता है। किन्तु ईर्ष्यालु मनोवृत्ति के लोग इन उपदेशों के पीछे छिपी करुणा को नहीं समझ सकते और उन पर आत्म-दंभी होने का दोषारोपण करते हैं। क्योंकि अर्जुन उदारचित्त है और ईर्ष्या के दोष से मुक्त है इसलिए वह गुह्यत्तम ज्ञान को जानने का पात्र है जिसे भगवान श्रीकृष्ण इस अध्याय में प्रकट कर रहे हैं।
दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने आत्मा के ज्ञान की व्याख्या शरीर से भिन्न एक विशिष्ट इकाई के रूप में की थी। सातवें और आठवें अध्याय में उन्होंने अपनी परम शक्तियों की व्याख्या की है जोकि गुह्यतम ज्ञान है और अब इस नौवें और इसके बाद के अध्यायों में श्रीकृष्ण अपनी विशुद्ध भक्ति का ज्ञान प्रकट करेंगे जो कि गुह्यतम या अत्यन्त गोपनीय ज्ञान है।
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् |
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् || 2||
राज विद्या का यह ज्ञान सभी रहस्यों से सर्वाधिक गहन है। जो इसका श्रवण करते हैं उन्हें यह शुद्ध कर देता है और यह प्रत्यक्ष अनुभूति कराने वाला है। धर्म की मर्यादा के पालनार्थ इसका सरलता से अभ्यास किया जा सकता है और यह नित्य प्रभावी है
राजाः का अर्थ 'शासक' है। श्रीकृष्ण 'राजा' शब्द का प्रयोग ज्ञान की उस सर्वोच्च अवस्था के महत्व को व्यक्त करने के लिए करते हैं।
विद्या का अर्थ 'विज्ञान' है। श्रीकृष्ण अपने उपदेशों को पंथ, धर्म, हठधर्मिता, सिद्धान्त या विश्वास के रूप में उद्धृत नहीं करते। वे घोषणा करते हैं कि वे अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ विज्ञान का वर्णन करने जा रहे हैं।
गुह्यः का अर्थ 'रहस्य' है। यह ज्ञान भी परम रहस्यमयी है क्योंकि प्रेम केवल वहीं संभव होता है जहाँ स्वतंत्रता हो। भगवान जान बूझकर स्वयं को प्रत्यक्ष अनुभूति से गुप्त रखते हैं। इस प्रकार से वे जीवात्मा को उनसे प्रेम करने या न करने का विकल्प प्रदान करते हैं। एक यंत्र प्रेम नहीं कर सकता क्योंकि वह विकल्प रहित होता है। भगवान चाहते हैं कि हम उनसे प्रेम करें और इसलिए वह हमारी इच्छा के अनुसार उनका चयन करने या न करने का हमें विकल्प देते हैं। हम जो भी विकल्प चुनते हैं वे उसके परिणामों के संबंध में केवल सचेत करते हैं और हमारे मार्ग के चयन का निर्णय हम पर छोड़ देते हैं।
पवित्रम का अर्थ शुद्ध है। भक्ति का ज्ञान परम शुद्ध है क्योंकि यह स्वार्थों से दूषित नहीं होता। यह जीवात्मा को दिव्य प्रेम की वेदी पर भगवान के लिए समर्पित होने को प्रेरित करता है। भक्ति अपने भक्तों के पाप बीजों और अविद्या का विनाश कर उन्हें पवित्र करती है। पाप जीवात्मा के अनन्त जन्मों के बुरे कर्मों का संचय हैं। भक्ति इन्हें घास के गट्ठर के समान भस्म कर देती है। बीज से तात्पर्य अन्तःकरण की अशुद्धता से है जो पापजन्य कर्मों के बीज होते हैं। जब तक ऐसे बीज विद्यमान रहते हैं तब तक पिछले जन्मों के पापों को नष्ट करने के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे और पाप करने की प्रवृत्ति अन्त:करण में रहेगी। परिणामत: मनुष्य पुनः पाप करेगा।
भक्ति अन्तःकरण को शुद्ध करती है और पाप के बीजों को नष्ट कर देती है। किन्तु फिर भी बीजों का विनाश होना ही पर्याप्त नहीं है। तब अन्त:करण के अशुद्ध होने का क्या कारण है? इसका कारण अविद्या है जिसके कारण हम स्वयं की पहचान शरीर के रूप में करते हैं। इस गलत पहचान के कारण हम शरीर को आत्मा मान लेते हैं और इसलिए हमारे भीतर शारीरिक सुखों की कामनाएं उदित होती हैं और हम सोचते हैं कि इनसे हमारी आत्मा को सुख मिलेगा। ऐसी सांसारिक कामनाओं की पूर्ति हमें काम, क्रोध, लोभ और अन्त:करण को दूषित करने वाली अन्य बुराइयों की ओर धकेल देती हैं। जब तक अज्ञानता बनी रहती है तब तक हृदय शुद्ध किये जाने पर भी पुनः अशुद्ध हो जाता है। भक्ति के फलस्वरूप अन्ततः भगवान और आत्मा के ज्ञान का बोध होता है जिसके परिणामस्वरूप अज्ञानता नष्ट हो जाती है। भक्तिरसामृतसिंधु में भक्ति का वर्णन इस प्रकार किया गया है-
क्लेशस्-तु पापं तद्बीजम् अविद्या चेति ते त्रिधा।
(भक्तिरसामृतसिंधु-1.1.18)
" भक्ति पाप, बीज और अविद्या तीन प्रकार के विषों का विनाश करती है। जब इन तीनों का पूर्ण विनाश हो जाता है तब अन्त:करण वास्तव में स्थायी रूप से शुद्ध हो जाता है।"
प्रत्यक्षः का अर्थ 'प्रत्यक्ष अनुभूति' होना है। भक्ति योग का अभ्यास श्रद्धा के साथ शुरू होता है और इसके परिणामस्वरूप भगवान की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। यह शोध की अन्य प्रणालियों की भाँति नहीं है जहाँ हम अवधारणाओं के साथ आरम्भ करते हैं और निश्चित परिणाम प्राप्त करते हैं।
धर्म्यम का अर्थ 'पुण्य कर्म करना' है। सांसारिक सुख की कामनाओं से रहित भक्ति पुण्य कर्म है। यह निरन्तर पुण्य कर्मों से पोषित होती है जैसे कि गुरु की सेवा द्वारा।
कर्तुम् सुसुखम् का तात्पर्य 'अति सहजता से पालन करने' से है। भगवान हमसे किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं करते। यदि हम प्रेम करना सीख लें तब वे सहजता से मिल जाते हैं।
यदि यह सर्वोत्तम ज्ञान है जिसका सहजता से अभ्यास किया जा सकता है तब फिर लोग इसका पालन क्यों नहीं करते? श्रीकृष्ण इसकी व्याख्या अगले श्लोक में करेंगे।
अश्रद्दधाना: पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप |
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि || 3||
हे शत्रु विजेता! वे लोग जो इस धर्म में श्रद्धा नहीं रखते वे मुझे प्राप्त नहीं कर सकते। वे जन्म-मृत्यु के मार्ग पर चलते हुए बार-बार इस संसार में लौटकर आते रहते हैं।
पिछले दो श्लोकों में श्रीकृष्ण ने ज्ञान और इसकी पात्रता के आठ गुणों का वर्णन किया है। यहाँ इसका उल्लेख धर्म या भगवान के प्रति प्रेममयी भक्ति के मार्ग के रूप में किया गया है। ज्ञान चाहे कितना भी अद्भुत और मार्ग कितना ही परिणाममूलक क्यों न हो? अगर कोई उसका अनुसरण करने से मना कर देता है तब यह उसके लिए अनुपयोगी होता है। जैसाकि पिछले श्लोक में स्पष्ट किया गया है कि भगवान की प्रत्यक्ष अनुभूति विलम्ब से होती है। इस प्रकिया के आरम्भ में अगाध श्रद्धा अपेक्षित होती है। भक्ति रसामृत सिंधु (1.4.15) में उल्लेख है-“आदौ श्रद्धा ततः साधुसंगोऽथ भजनक्रिया" अर्थात् "भगवान की अनुभूति करने का पहला सोपान श्रद्धा है। तब मनुष्य सत्संग में भाग लेता है। यह एकांत साधना के अभ्यास की ओर ले जाता है।"
प्रायः लोग कहते है कि वे केवल उसमें विश्वास करना चाहते हैं जिसकी प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। और चूँकि भगवान की तत्काल प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं होती इसलिए वे उसमें विश्वास नहीं करते। किन्तु वे वास्तव में संसार में अनेक ऐसी चीजों पर बिना प्रत्यक्ष अनुभूति के विश्वास करते हैं। एक न्यायाधीश अतीत में कई वर्ष पूर्व घटित घटना से संबंधित प्रकरण पर अपना निर्णय देता है। यदि न्यायाधीश प्रत्यक्ष अनुभव के सिद्धान्त के अनुपालन में विश्वास करेगा तब पूरी न्याय व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाएगी। राज्याध्यक्ष अपने देश का शासन पूरे क्षेत्र से प्राप्त होने वाली सूचनाओं के आधार पर करता है। उसके लिए अपने अधिकार क्षेत्र के सभी गांवों और नगरों का निरीक्षण करना संभव नहीं हो पाता और यदि वह यह कारण प्रस्तुत कर इन सूचनाओं पर विश्वास न करे कि तब फिर वह पूरे देश पर शासन करने के योग्य नहीं हो सकता। यहाँ तक कि सांसारिक कार्यों के लिए भी प्रत्येक कदम पर श्रद्धा आवश्यक है। बाइबिल में इसका सुन्दर ढंग से वर्णन किया गया है-"हम दृष्टि से नहीं, विश्वास के बल पर चलते हैं।" (2 कोरिन्थिअन्स-5.7)
भगवान की अनुभूति से संबंधित एक रोचक कथा इस प्रकार से है। एक बार एक राजा ने एक साधु के सम्मुख यह कहा-“मैं भगवान में विश्वास नहीं करता क्योंकि मैं उसे देख नहीं सकता।" साधु ने राजा से अपने दरबार में एक गाय को लाने को कहा। राजा ने उसकी आज्ञा का पालन करते हुए अपने सेवकों को गाय लाने का आदेश दिया। तब साधु ने गाय का दूध दुहने का अनुरोध किया। राजा ने पुनः अपने सेवकों को साधु की आज्ञा का पालन करने का आदेश दिया। फिर साधु ने पूछाः हे राजन्! अभी गाय से दुहे गये ताजा दूध में क्या मक्खन व्याप्त है? राजा ने उत्तर दिया कि उसे पूर्ण विश्वास है कि इसमें मक्खन है। तब साधु ने राजा से पूछा-'तुमने दूध में मक्खन को देखा नहीं तब फिर तुम्हें यह विश्वास क्यों है कि इसमें मक्खन है।' राजा ने उत्तर दिया-'हम इसे अभी प्रत्यक्ष देख नहीं सकते, किन्तु इसको देखने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया है। यदि हम दूध को दही में परिवर्तित करें और फिर दही को मथें तो उसमें मक्खन को देख सकते हैं।' तब साधु ने कहा-'जैसे दूध में मक्खन है उसी प्रकार भगवान भी सर्वत्र है। यदि हम उसकी शीघ्र अनुभूति नहीं कर सकते उससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि भगवान नहीं है। उसकी अनुभूति करने की भी एक प्रक्रिया है। यदि हम उस प्रक्रिया पर विश्वास करके उसका पालन करते हैं तब हम प्रत्यक्ष उसकी अनुभूति कर पाएँगे और भगवत्प्राप्ति कर लेंगे।" भगवान में विश्वास एक स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं है जिसका हम सरलतया पालन कर सकें। हमें अपनी स्वतंत्र इच्छा का प्रयोग करते हुए सक्रिय होकर भगवान पर विश्वास करने का निर्णय लेना होगा। कौरवों की सभा में जब दुःशासन ने द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का प्रयास किया तब भगवान ने उसकी साड़ी की लम्बाई को बढ़ाकर उसे लज्जित और अपमानित होने से बचाया। वहाँ सभी कौरव उपस्थित थे और उन्होंने इस चमत्कार को देखा लेकिन उन्होंने श्रीकृष्ण के सर्वशक्तिमान होने पर विश्वास करना स्वीकार नहीं किया और इस कारण उनकी चेतना जागृत नहीं हुई। परम प्रभु इस श्लोक में कहते हैं कि जो आध्यात्मिक पथ में विश्वास रखना पसंद नहीं करते, वे दिव्य ज्ञान से वंचित रहते हैं और निरन्तर जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमते रहते हैं।
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना |
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित: || 4||
यह समूचा ब्रह्माण्ड अव्यक्त रूप में मेरे द्वारा व्याप्त है। सभी जीवित प्राणी मुझमें निवास करते हैं लेकिन मैं उनमें निवास नहीं करता।
वैदिक दर्शन इस अवधारणा को स्वीकार नहीं करता कि भगवान सृष्टि का सृजन करने के पश्चात् सातवें आसमान से झाँक कर यह जाँच करे कि उसके संसार का संचालन भली भाँति हो रहा है अथवा नहीं। वे इस मूल तत्त्व को बार-बार प्रतिपादित करते हैं कि भगवान इस संसार में सर्वत्र व्याप्त रहते हैं।
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी
(श्वेताश्वरोपनिषद्-6.11)
"एक ही परमेश्वर है। वह प्रत्येक के हृदय में निवास करता है और वह संसार में सर्वत्र व्याप्त है।"
ईशावास्यमिदंसर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
(ईशोपनिषद्-1)
"भगवान संसार में सर्वत्र व्याप्त है।"
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्।
(पुरुष सूक्तम)
"भगवान उन सब में व्याप्त है जिनका अस्तित्व है और जिनका आगे अस्तित्व होगा।"
भगवान के सर्वव्यापक होने की अवधारणा को व्यक्तिपरक समझा जाता है। दार्शनिक दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि संसार भगवान का रूपांतरण है। उदाहरणार्थ दूध शुद्ध पदार्थ है। जब यह अम्ल के संपर्क में आता है तब परिवर्तित होकर दही बन जाता है। इस प्रकार जब दूध परिवर्तित हो जाता है तब दही दूध का परिणाम, प्रभाव या उत्पाद बन जाता है। इसी प्रकार परिणामवाद के समर्थक कहते हैं कि भगवान संसार के रूप में परिवर्तित हो गया है।
अन्य दार्शनिक यह दावा करते हैं कि संसार ब्रह्म का विवर्त अर्थात् भ्रम है। उदहारणार्थ अँधेरे में भूल से रस्सी में सांप का भ्रम हो जाता है। इसी प्रकार से चाँदनी में चमकते हुए मोती में चांदी का भ्रम हो जाता है। समान रूप से वे कहते हैं कि केवल एक भगवान ही है और कुछ नहीं है। हम जिसे संसार के रूप में देख रहे हैं वह वास्तव में ब्रह्म है। किन्तु श्लोक 7.4 और 7.5 के अनुसार संसार न तो परिणाम और न ही विवर्त है। यह भगवान की शक्ति जिसे माया शक्ति कहते है, से निर्मित हुआ है। जीवात्माएँ भी भगवान की शक्ति हैं लेकिन ये परा शक्ति हैं जिन्हें जीव शक्ति भी कहा गया है। इसलिए माया और समस्त आत्माएँ दोनों भगवान की शक्तियाँ हैं और उनके परम व्यक्तित्व के भीतर हैं। किन्तु श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि वे सभी प्राणियों में निवास नहीं करते अर्थात् असीम सीमित में समाविष्ट नहीं हो सकता क्योंकि वे इन दोनों शक्तियों के कुल योग से परे हैं। जिस प्रकार समुद्र से कई लहरें निकलती हैं और ये लहरें समुद्र का अंश होती हैं लेकिन समुद्र इन सब लहरों के कुल योग से अधिक विशाल होता है। समान रूप से जीवात्माओं और माया का अस्तित्व भगवान के स्वरूप के भीतर समाविष्ट है किन्तु भगवान फिर भी उनसे परे है।
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् |
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन: || 5||
मेरी दिव्य शक्तियों के रहस्य को देखो। यद्यपि मैं सभी जीवित प्राणियों का रचयिता और पालक हूँ तथापि मेरे द्वारा उत्पन्न प्राणी मुझमें स्थित नहीं रहते और मैं उनसे या माया शक्ति से प्रभावित नहीं होता।
पिछले श्लोक में कथित रूप से उल्लिखित दो शक्तियों का अभिप्राय 'माया शक्ति और 'जीव' शक्ति से है किन्तु इनसे परे भगवान की तीसरी शक्ति भी है जिसे 'योगमाया' शक्ति कहते हैं। इस 'योगमाया' शक्ति को इस श्लोक में दिव्य शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। 'योगमाया' भगवान की सबसे प्रबल शक्ति है। इसे 'कर्तुम्-अकर्तुम्-समर्थः' कहते हैं अर्थात् "जो असंभव को संभव बना सकती है" और यह योगमाया शक्ति भगवान के विराट व्यक्तित्व की विशेषताओं और गुणों को प्रकट करने तथा विस्मयकारी कार्यों का निर्वहन करती है।
उदाहरणार्थ भगवान हमारे हृदय में निवास करते हैं किन्तु फिर भी हमें इसका बोध नहीं होता, क्योंकि भगवान की योगमाया शक्ति हमें उनसे विलग रखती है। समान रूप से भगवान भी स्वयं को मायाशक्ति के प्रभाव से विलग रखते हैं। वेदों में भगवान की इस प्रकार से प्रशंसा की गयी है
विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया।
(श्रीमद्भागवतम्-2.5.13)
"माया शक्ति भी भगवान के समक्ष खड़े रहने में लज्जा का अनुभव करती है। क्या यह एक आश्चर्य नहीं है कि यद्यपि भगवान माया में व्याप्त हैं किन्तु फिर भी वे उससे अछूते हैं? यह योगमाया की एक अन्य रहस्यमयी शक्ति है।"
यदि संसार भगवान को प्रभावित कर सकता फिर जब प्रलय हो जाता है तब उसकी प्रकृति और विराट व्यक्तित्व में भी विकृति होनी चाहिए। किन्तु संसार में होने वाले सभी परिवर्तनों के पश्चात् भी भगवान अपने दिव्य स्वरूप में प्रतिष्ठित रहते हैं। तदनुसार वेदों में भगवान को दशांगुली के नाम से भी पुकारा जाता है। वे संसार में हैं किन्तु फिर भी उससे दस अंगुल परे और अछूते हैं।
यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान् |
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय || 6||
यह जान लो कि जिस प्रकार प्रबल वायु प्रत्येक स्थान पर प्रवाहित होती है और आकाश में जाकर स्थित हो जाती है, वैसे ही सभी जीव सदैव मुझमें स्थित रहते हैं।
श्रीकृष्ण ने चौथे श्लोक से छठे श्लोक तक 'मत्स्थानि' शब्द का तीन बार प्रयोग किया है। इसका अर्थ यह है कि सभी प्राणी उनमें स्थित रहते हैं और वे भगवान से विलग नहीं हो सकते, भले ही वे विभिन्न शरीरों में निवास करते हैं और संसार के विषयों का भोग करते हैं। यह समझना कठिन है कि संसार भगवान में कैसे स्थित रह सकता है। ग्रीक लोक कथाओं में एटलस को ग्लोब उठाए दिखाया गया है। एटलस ने टाइटन्स के साथ ओलम्पस पर्वत के देवताओं के विरुद्ध युद्ध लड़ा था। पराजित होने पर उसे अपमानित किया गया था और उसे सदा के लिए अपनी पीठ पर एक बड़े स्तंभ के साथ स्वर्ग और पृथ्वी का भार सहन करना पड़ा जो उसके कंधों पर पृथ्वी और स्वर्ग को अलग करता हुआ दिखाई देता है। किन्तु यहाँ इसका अभिप्राय ऐसा नहीं है कि जब वे यह कहते हैं कि उन्होंने सभी प्राणियों को धारण किया हुआ है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आकाश में है और आकाश भगवान द्वारा निर्मित है। इसलिए सभी जीवों को भगवान में स्थित बताया जाता है।
परम प्रभु श्रीकृष्ण अब अर्जुन को इस अवधारणा का बोध करवाने के लिए एक उपमान देते हैं। वायु का आकाश से पृथक् स्वंतत्र अस्तित्व नहीं है। यह निरंतर प्रचण्ड वेग के साथ प्रवाहित होती है फिर भी आकाश में स्थित रहती है। इसी प्रकार से जीवात्माओं का भगवान से पृथक् अस्तित्व नहीं है। वे अनित्य शरीर द्वारा काल, स्थान और चेतनाओं में कभी तीव्रता से और कभी धीरे-धीरे अपनी जीवन यात्रा पूरी करती हैं, परन्तु फिर भी वे सदैव भगवान के भीतर स्थित रहती हैं। एक अन्य परिप्रेक्ष्य में ब्रह्माण्ड में व्याप्त सभी तत्त्व भगवान की इच्छा के अधीन हैं। यह सब उनकी इच्छा के अनुरूप उत्पन्न, पोषित और विनष्ट होते हैं। अतः इस प्रकार से भी कहा जा सकता है कि सब कुछ भगवान में स्थित है।
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् |
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् || 7||
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन: |
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् || 8||
हे कुन्ती पुत्र! कल्प के अन्त में सभी प्राणी मेरी प्राकृत शक्ति में विलीन हो जाते हैं और अगली सृष्टि के प्रारंभ में, मैं उन्हें पुनः प्रकट कर देता हूँ। प्राकृत शक्ति का अध्यक्ष होने के कारण मैं बारम्बार असंख्य योनियों के जीवों को उनकी प्रकृति के अनुसार पुनः-पुनः उत्पन्न करता हूँ।
पिछले दो श्लोकों में श्रीकृष्ण ने यह व्याख्या की है कि सभी जीव उनमें स्थित रहते हैं। उनके इस कथन से यह प्रश्न उत्पन्न होता है-"जब महाप्रलय होती है तब समस्त संसार का संहार हो जाता है तब सभी प्राणी कहाँ जाते हैं?" इसका उत्तर इस श्लोक में दिया गया है।
पिछले अध्याय के सोलहवें से उन्नीसवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया था कि सृजन, स्थिति तथा प्रलय के चक्र का पुनरावर्तन होता रहता है। यहाँ 'कल्पक्षये' शब्द का अर्थ 'ब्रह्मा के जीवन काल का अन्त है।' ब्रह्मा के जीवन के 100 वर्ष, पूर्ण होने के पश्चात् सभी ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्तियाँ अव्यक्त अवस्था में चली जाती हैं। पंच महाभूत पंच तन्मात्राओं में विलीन हो जाते हैं और पंच तन्मात्राएँ अहंकार में, अहंकार महान में और महान माया शक्ति के आदि रूप प्रकृति में विलीन हो जाती है और प्रकृति परम पिता महाविष्णु के दिव्य शरीर में विलीन होकर उनमें स्थित हो जाती है।
उस समय सभी जीवात्माएँ अव्यक्त अवस्था में भगवान के दिव्य शरीर में स्थित हो जाती हैं। उनका स्थूल और सूक्ष्म शरीर जड़ माया में विलीन हो जाता है। किन्तु उनका कारण शरीर बना रहता है। श्लोक 2.28 में उल्लिखित टिप्पणी में तीन प्रकार के शरीरों का विस्तार से वर्णन किया गया है। प्रलय के पश्चात् जब भगवान पुनः संसार की रचना करते हैं तब माया (भौतिक शक्ति) प्रकृति-महान-अहंकार-पंचतन्मात्राओं-पंचमहाभूतों को विपरीत क्रम में प्रकट करती है तब जो जीवात्माएँ केवल कारण शरीर के साथ सुप्त अवस्था में पड़ी थी उन्हें पुनः संसार में भेजा जाता है। अपने कारण शरीर के अनुसार वे पुनः सूक्ष्म और स्थूल शरीर प्राप्त करती हैं और ब्रह्माण्ड में जीवों की विभिन्न योनियाँ उत्पन्न होती हैं। इनकी प्रकृति विभिन्न ग्रहों में भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। कुछ ग्रहों में शरीर में अग्नि तत्त्व का प्रभुत्व होता है। जिस प्रकार से पृथ्वी ग्रह पर शरीर में पृथ्वी और जल का प्रभुत्व होता है। इस प्रकार शरीरों में ये विविधता उनकी सूक्ष्मता के अनुसार होती हैं इसलिए श्रीकृष्ण इन्हें असंख्य जीवन रूप कहते हैं।
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय |
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु || 9||
हे धनंजय! इन कर्मों में से कोई भी कर्म मुझे बाँध नहीं सकता। मैं तटस्थ नियामक के रूप में रहता हूँ और इन कर्मों से विरक्त रहता हूँ।
चेतना जीवन का आधार है। मायाशक्ति वास्तव में जड़ होती है फिर यह संसार के सृजन जैसा अद्भुत कार्य कैसे कर सकती है जिसे देखकर कोई भी आश्चर्य चकित हो जाता है। रामचरितमानस में इसका सुन्दर वर्णन मिलता है
जासु सत्यता तें जड़ माया।
भास सत्य इव मोह सहाया।।
"माया शक्ति अपने आप में जड़ है लेकिन यह भगवान की आज्ञा प्राप्त कर इस प्रकार से अपना कार्य करना आरम्भ करती है, जैसे कि यह चेतन हो।" यह रसोई घर में पड़े चिमटे के जोड़े के समान है। वे भी अपने आप में निर्जीव होते हैं। लेकिन रसोइए के हाथ में आकर ये सजीव के समान होकर बहुत गर्म पतीलों को उठाने जैसे कई अद्भुत कार्य करते हैं। उसी प्रकार से माया शक्ति के पास स्वयं कुछ करने का बल नहीं होता। जब भगवान सृष्टि के सृजन की इच्छा करते हैं तब वे केवल माया शक्ति पर दृष्टि डालते हैं और इसे प्रकट करते हैं। इस संबंध में मुख्य रूप से यह ध्यान रखें कि यद्यपि सृष्टि की प्रकिया भगवान की इच्छा और निर्देश से कार्यान्वित होती है किन्तु फिर भी वे माया शक्ति के कार्यों से अप्रभावित रहते हैं। वे सदैव अपनी ह्लादिनी शक्ति (आनन्दमयी शक्ति) के कारण अपने सच्चिदानन्द स्वरूप में स्थित रहते हैं। इसलिए वेद उन्हें 'आत्माराम' कहते हैं जिसका तात्पर्य है वह जो बिना किसी बाहरी सुख के स्वयं में आनन्दमय रहता है।'
अब भगवान श्रीकृष्ण आगे यह स्पष्ट करेंगे कि वे अकर्ता और नियामक किस प्रकार से हैं।
मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम् |
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते || 10||
हे कुन्ती पुत्र! यह प्राकृत शक्ति मेरी आज्ञा से चर और अचर प्राणियों को उत्पन्न करती है। इसी कारण भौतिक जगत में परिवर्तन होते रहते हैं।
Commentary
जैसे कि पिछले श्लोक में यह व्याख्या की गयी है कि भगवान विभिन्न जीवों के सृजन के कार्य में प्रत्यक्ष रूप से संबद्ध नहीं रहते। उनके द्वारा नियुक्त उनकी विभिन्न शक्तियाँ और पुण्य आत्माएँ इस कार्य को सम्पन्न करती हैं। उदाहरणार्थ किसी देश का शासनाध्यक्ष व्यक्तिगत रूप से सरकार के सभी कार्य नहीं करता। उसके अधीन विभिन्न विभागों में नियुक्त अधिकारी विभिन्न कार्य सम्पन्न करते हैं। किन्तु फिर भी सरकार की सफलताओं और असफलताओं के लिए वही उत्तरदायी होता है क्योंकि वह अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले अधिकारियों को कार्यों का निष्पादन करवाने की स्वीकृति प्रदान करता है। समान रूप से प्रथम जन्मे ब्रह्मा और माया शक्ति सृष्टि का सृजन करने और विभिन्न जीवन रूपों को प्रकट करने के कार्यों को कार्यान्वित करते हैं क्योंकि वे भगवान की स्वीकृति से कार्य करते हैं इसलिए भगवान को स्रष्टा के रूप में भी संबोधित किया जाता है।
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् |
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् || 11||
जब मैं मनुष्य रूप में अवतार लेता हूँ तब मूर्ख लोग मुझे समस्त प्राणियों के परमात्मा के रूप में पहचानने में समर्थ नहीं होते।
महान आचार्य भी कभी-कभी अपने विद्यार्थियों को आत्म संतुष्टि की अवस्था से बाहर निकालने के लिए कड़े शब्दों का प्रयोग करता है ताकि वे गहन चिन्तन की अवस्था को प्राप्त कर सकें। यहाँ श्रीकृष्ण ने 'मूढ़' शब्द जिसका तात्पर्य 'मंदबुद्धि' से है, का प्रयोग उन लोगों का वर्णन करने के लिए किया है जो उनके साकार रूप की दिव्यता को स्वीकार नहीं करते।
वे जो यह कहते हैं कि भगवान निराकार है और साकार रूप में प्रकट नहीं हो सकता। वे भगवान के सर्वशक्तिमान और शक्तिशाली होने की परिभाषा का खण्डन करते हैं। भगवान ने विविध रूपों, आकारों और बहुरंगी संसार का सृजन किया है। यदि भगवान संसार में जीवों की अनगिनत योनियों को उत्पन्न करने का अद्भुत कार्य कर सकते हैं तब फिर क्या वह स्वयं साकार रूप धारण नहीं कर सकते? क्या भगवान यह कहते हैं-'मेरे पास स्वयं को साकार रूप में प्रकट करने की कोई शक्ति नहीं है और इसलिए मैं निराकार ज्योति के रूप में हूँ।' ऐसा कहना कि भगवान साकार रूप धारण नहीं कर सकता, भगवान को अपूर्ण रूप में स्वीकार करना होगा। हम अणु जीवात्माएँ साकार रूप धारण करती हैं। यदि कोई मानता है कि भगवान साकार रूप धारण नहीं कर सकते तब इसका निष्कर्ष यह होगा कि वे मनुष्यों से भी कम शक्तिमान हैं। भगवान पूर्ण और सिद्ध हैं। इसके लिए उनके व्यक्तित्व में दो गुणों साकार और निराकार रूप का होना आवश्यक है। वैदिक ग्रंथों में उल्लेख है-
अपश्यं गोपां अनिपद्यमानमा
(ऋग्वेद-1.22.164 सूक्त 31)
"मैंने अविनाशी भगवान जिसका जन्म ग्वालों के परिवार में हुआ, को बालक रूप में देखा।"
द्विभूजं मौन मुद्राध्यम् वन-मालिनमीश्वरम्।
(गोपालतापिन्युपनिषद्-1.13)
"मैने भगवान को वन के फूलों की माला पहने और अपने हाथों से बाँसुरी बजाते हुए मनोहर मौन मुद्रा में देखा।"
गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम्।।
(श्रीमदभागवतम्-7.15.75)
"गूढ ज्ञान यह है कि भगवान मानव रूप को स्वीकार करते हैं।"
यत्रावतीर्णो भगवान् परमात्मा नराकृतिः।
(श्रीमदभागवतम्-9.23.20)
"उस समय परमात्मा सभी वैभवों के स्वामी मनुष्य के रूप में अवतार लेते हैं।"
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द-विग्रहः।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्।।
(ब्रह्मसंहिता-5.1)
इस श्लोक में ब्रह्मा भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहते हैं-"मैं उस भगवान की आराधना करता हूँ जो सत्-चित्-आनन्द है। उनका कोई आदि और अन्त नहीं है और वे सभी कारणों के कारण हैं।" भगवान के साकार रूप के संबंध में हमें यह ध्यान रखना होगा कि वह दिव्य स्वरूप हैं जिसका अर्थ है कि वे लौकिक प्राणियों में पाए जाने वाले सभी प्रकार के दोषों से रहित हैं। भगवान का स्वरूप सत्-चित्-आनन्द है।
अस्यापि देव-वपुषो मदनुग्रहस्य
स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि।
(श्रीमद्भागवतम्-10.14.2)
इस श्लोक में ब्रह्मा श्रीकृष्ण से इस प्रकार से प्रार्थना करते हैं-"हे भगवान आपका शरीर पंचमहाभूतों से नहीं बना है। यह दिव्य है और आप स्वेच्छा से साकार रूप में अवतार लेकर मुझ जैसी जीवात्माओं पर कृपा करते हो।"
भगवद्गीता के चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा है-"यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ और सभी जीवित प्राणियों का स्वामी हूँ तथापि मैं अपनी योगमाया की शक्ति जो मेरा मूल दिव्य स्वरूप है, द्वारा इस संसार में प्रकट होता हूँ।" इसका अर्थ यह है कि भगवान का न केवल साकार रूप है बल्कि वे इस संसार में अवतरित भी होते हैं। चूँकि हम जीवात्माएँ चिरकाल से संसार में जन्म ले रही हैं अतः यह भी संभव है कि जब भगवान अपने पिछले अवतारों में पृथ्वी पर आए उस समय हम भी रहे होंगे। यह भी संभावना है कि हमने उन अवतारों को देखा था। किन्तु भगवान का रूप दिव्य था और हमारी आँखें मायिक थीं इसलिए हमने जब उनको अपनी आँखों से देखा तब हम उनके स्वरूप की दिव्यता को पहचान नहीं पाए।
भगवान के दिव्य रूप की प्रकृति ऐसी है कि प्रत्येक व्यक्ति केवल एक सीमा तक ही उनकी दिव्यता का बोध करता है। जो लोग सत्त्वगुण में प्रवृत होते हैं वे उन्हें देख कर सोचते हैं-" श्रीकृष्ण विशिष्ट मानव हैं, लेकिन निश्चित रूप से भगवान नहीं हैं।" जब वे रजोगुण के प्रभाव में होते हैं तब भगवान को देखकर कहते हैं-"उनमें कुछ विशेष नहीं हैं। वे हमारे जैसे ही हैं।" तमोगुण के प्रभुत्व में रहने वाले लोग उन्हें देखकर कहते है-“वे अहंकारी, चरित्रहीन और हमसे भी बुरे हैं।" केवल भगवत्प्राप्त संत ही उन्हें भगवान के रूप में पहचान सकते हैं क्योंकि उन्हें उनकी कृपा से दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है।" इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब वे अवतार लेते हैं उस समय माया के बंधनों में जकड़ी जीवात्माएँ उन्हें पहचान नहीं पातीं।
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतस: |
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिता: || 12||
माया शक्ति से मोहित होने के कारण ऐसे लोग आसुरी और नास्तिक विचारों को ग्रहण करते हैं। इस अवस्था में उनके आत्मकल्याण की आशा निरर्थक हो जाती है और उनके कर्मफल व्यर्थ हो जाते हैं और उनका ज्ञान निष्फल हो जाता है।
भगवान के साकार रूप के सम्बन्ध में कई पक्ष संसार में प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मत है कि भगवान संसार में अवतार लेकर नहीं आते। इसलिए वे कहते हैं कि श्रीकृष्ण भगवान नहीं थे। वे मात्र योगी थे। अन्य लोग कहते हैं कि श्रीकृष्ण माया विशिष्ट ब्रह्म हैं अर्थात् जो मायाशक्ति के साथ सम्पर्क होने के कारण भगवान की निम्न श्रेणी है। जबकि अन्य लोग कहते हैं कि वे चरित्रहीन थे जो अविवाहिता गोपियों के आगे-पीछे घूमते रहते थे।
इस श्लोक के अनुसार ये सभी सिद्धान्त अनुचित हैं और वे जिनकी बुद्धि इन सिद्धान्तों का समर्थन करती हैं, वे माया शक्ति से प्रभावित हैं। श्रीकृष्ण ने ऐसे लोगों के लिए कहा है कि जो ऐसी बात को स्वीकार करते हैं, वे आसुरी प्रवृत्ति वाले होते हैं क्योंकि वे परमात्मा के साकार रूप के प्रति अपने हृदय में दिव्य भावों को प्रश्रय नहीं देते। इसलिए वे उनकी भक्ति में लीन नहीं हो सकते। इसके अतिरिक्त चूँकि भगवान के निराकार रूप की आराधना करना अत्यन्त कठिन होता है इसलिए वे दोनों में से किसी एक की भी आराधना नहीं कर पाते जिसके परिणामस्वरूप वे आत्मिक उत्थान के मार्ग पर चलने से वंचित रहते हैं। मायाशक्ति से मोहित होने के कारण उनकी आत्मिक कल्याण की आशा व्यर्थ हो जाती है।
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिता: |
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् || 13||
हे पार्थ! किन्तु वे महान आत्माएँ जो मेरी दिव्य शक्ति का आश्रय लेती हैं, वे मुझे समस्त सृष्टि के उद्गम के रूप में जान लेती हैं। वे अपने मन को केवल मुझमें स्थिर कर मेरी अनन्य भक्ति करती हैं।
श्रीकृष्ण के उपदेशों की यह अद्भुत शैली है कि वह विरोधाभासी दिखने वाले विषय को भी सरलता से समझाते हैं। मोहित मनुष्यों की दशा का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण महान् पुण्य आत्माओं की चर्चा करते हैं। भौतिक जीवन दीर्घकालीन स्वप्न है जिसका अनुभव वे आत्माएँ कर रही हैं जो माया के प्रभुत्व में सोयी रहती हैं। इसके विपरीत महान आत्माएँ वे हैं जो अपनी अज्ञानता से जाग चुकी हैं और जो बुरे स्वप्न की भांति लौकिक चेतना की उपेक्षा करती हैं। माया के बंधनों से मुक्त होकर अब वे दिव्य योगमाया शक्ति की शरण में आ जाती हैं। ऐसी प्रबुद्ध आत्माएँ जागृत होकर भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंध को जान लेती हैं। जैसे भगवान के साकार और निराकार दो रूप हैं, उसी प्रकार से योगमाया के दो रूप होते हैं। यह निराकार शक्ति है लेकिन राधा, सीता, दुर्गा, लक्ष्मी और काली आदि में यह साकार रूप में प्रकट होती है, ये सब दिव्य शक्तियाँ भगवान की अलौकिक शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं और ये सब एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं, जैसे कि कृष्ण, राम, शिव, नारायण इत्यादि एक भगवान के भिन्न-भिन्न रूप नहीं हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण में वर्णन हैं और ये सब एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार जैसे कि कृष्ण, राम, शिव, नारायण इत्यादि भगवान से अभिन्न हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण में वर्णन है
यथा त्वं राधिका देवी गोलोके गोकुले तथा।
वैकुण्ठे च महालक्ष्मी भवति च सरस्वती।
कपिलस्य प्रिया कान्ता भारते भारती सती।
द्वारवत्यां महालक्ष्मी भवती रुक्मिणी सती।
त्वं सीता मिथिलायां च त्वच्छाया द्रौपदी सती।
रावणेन हृता त्वं च त्वं च रामस्य कामिनी ।।
"हे राधा! तुम गोलोक, और गोकुल, जहाँ वे 5,000 वर्ष पूर्व प्रकट हुए थे, की दिव्य देवी हो। तुम द्वारका में रुक्मिणी के रूप में निवास करती हो। तुम मिथिला में सीता के रूप में प्रकट हुईं। पांडवों की पत्नी द्रोपदी तुम्हारी छाया की अभिव्यक्ति थी। तुम वही हो जिसका सीता के रूप में रावण ने हरण किया था और तुम भगवान राम की पत्नी हो।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने उल्लेख किया है कि सभी महान आत्माएँ दिव्य शक्ति की शरण लेती हैं। इसका कारण यह है कि दिव्य कृपा ज्ञान, प्रेम आदि सब भगवान की अलौकिक शक्तियाँ हैं और ये सब दिव्य योगमाया शक्ति (जो 'श्री राधा' हैं) के अधीन हैं। इस प्रकार योगमाया की कृपा से कोई प्रेम, ज्ञान और भगवान की अनुकंपा प्राप्त करता है। ऐसी पुण्य आत्माएँ जो भगवान की दिव्य कृपा प्राप्त कर लेती हैं, वे दिव्य प्रेम से युक्त होकर भगवान की अविरल भक्ति में तल्लीन रहती हैं।
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रता: |
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते || 14||
मेरी दिव्य महिमा का सदैव कीर्तन करते हुए दृढ़ निश्चय के साथ विनय पूर्वक मेरे समक्ष नतमस्तक होकर वे निरन्तर प्रेमा भक्ति के साथ मेरी आराधना करते हैं।
यह कहने के पश्चात् कि पुण्य आत्माएँ उनकी भक्ति में लीन रहती हैं, श्रीकृष्ण अब यह व्याख्या कर रहे हैं कि वे किस प्रकार से उनकी भक्ति करती हैं। वे कहते हैं कि भक्त अपनी भक्ति का अभ्यास करने और उसे बढ़ाने के लिए भगवान की महिमा का कीर्तन करने में संलग्न रहते हैं। भगवान की महिमा के गुणगान को कीर्तन कहते हैं जिसे निम्न प्रकार से परिभाषित किया गया है।
नाम-लीला-गुणादीना उच्चै: भाषा तु कीर्तनम्।
(भक्तिरसामृतसिंधु-1.2.145)
"भगवान के नाम, रूप, गुण, लीला, धाम और संतों की महिमा का गुणगान करना कीर्तन कहलाता है।"
कीर्तन भगवान की भक्ति का अत्यन्त सशक्त माध्यम है। इसमें तीन प्रकार की भक्ति श्रवण, कीर्तन, और स्मरण समाविष्ट है। भगवान में मन को अनुरक्त करने का लक्ष्य तभी प्राप्त हो सकता है जब इसका अभ्यास श्रवण और गायन के साथ किया जाए। जैसा कि छठे अध्याय में कहा गया है कि मन वायु के समान चंचल होता है और स्वाभाविक रूप से एक विचार से दूसरे विचार में घूमता रहता है। श्रवण और गायन ज्ञानेन्द्रियों को दिव्य आध्यात्मिक क्षेत्र में अनुरक्त कर देते हैं जिससे चंचल मन को बार-बार वापस लाकर भगवान की भक्ति में लीन करने में सहायता मिलती है।
कीर्तन के अन्य कई लाभ भी हैं। प्रायः जब लोग जप द्वारा या एकांत में ध्यान लगाकर भक्ति का अभ्यास करते हैं तब उन्हें नींद में ऊँघते हुए देखा जा सकता है। किन्तु कीर्तन भक्ति में तल्लीन होने की ऐसी प्रक्रिया है जो नींद को भगा देता है। कीर्तन गायन के स्वर शोरगुल वातावरण को भी शान्त करते हैं। कीर्तन का अभ्यास सामूहिक रूप में किया जा सकता है। इसमें अधिक संख्या में लोग भाग ले सकते हैं। इसके अतिरिक्त मन विविधता की ओर स्वत: आकर्षित होता है जो भगवान के नाम, गुणों, लीलाओं, धामों आदि के कीर्तनों के माध्यम से प्राप्त हो जाती है। मधुर और उच्च स्वर में कीर्तन करने से भगवान के नाम की दिव्य तरंगें पूरे वातावरण को पवित्र और सुखद बनाती हैं। इन सभी कारणों से भारतीय इतिहास में कीर्तन भक्ति का प्रसिद्ध माध्यम रहा है। भक्ति मार्ग के अनुयायी संत सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, कबीर, तुकाराम, एकनाथ, नरसी मेहता, जयदेव, त्यागराज आदि महान कवि थे। इन्होंने भक्ति रस से पूर्ण सुंदर काव्य और भजनों की रचना की जिनके द्वारा वे भगवान की महिमा के गायन, श्रवण और स्मरण में निमग्न रहे। वैदिक ग्रंथ भी विशेष रूप से कलियुग में भक्ति के सुगम मार्ग के रूप में कीर्तन पद्धति की सराहना करते हैं।
कृते यद् ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-12.3.52)
"सतयुग में भक्ति का उत्तम साधन भगवान का ध्यान करना था। त्रेता युग में यह साधन भगवान के सुख के लिए यज्ञों का अनुष्ठान करना था और द्वापर युग में मूर्ति पूजा की पद्धति प्रचलित थी। वर्तमान कलियुग में केवल कीर्तन का महत्व है।"
अविकारी वा विकारी वा सर्व-दोषैक-भाजनः।
परमेश परं याति राम-नामानुकीर्तनात् ।।
(अध्यात्म रामायण)
"चाहे तुम कामनाओं से युक्त हो या उनसे रहित हो, विकार रहित या विकार युक्त हो यदि तुम भगवान राम के नाम के कीर्तन में लीन रहते हो तब तुम परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हो।"
सर्व-धर्म-बहिर्भूतः सर्व-पापरतस्थथा।
मुच्यते नात्र सन्देहो विष्र्णोनमानुकीर्तनात् ।।
(वैशम्पायन संहिता)
"यहाँ तक कि कोई घोर पापी है या धर्म से च्युत है तब भी वह भगवान विष्णु के नाम का जप कर बच सकता है इसमें कोई संदेह नहीं है।"
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा।
गावत नर पावहिं भव थाहा।।
(रामचरितमानस)
"कलियुग में मुक्ति का उपाय यह है कि भगवान के नाम की महिमा का गान कर कोई भी संसार रूपी समुद्र को पार सकता है।" किन्तु यह स्मरण रहे कि कीर्तन पद्धति में श्रवण और गायन भक्ति में सहायक मात्र है। वस्तुत: भगवान का स्मरण ही भक्ति का सार है। अगर हम इसकी उपेक्षा करते हैं तब कीर्तन से मन शुद्ध नहीं होगा। श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि कीर्तन करते समय निरन्तर मन से भगवान का चिन्तन भी करना चाहिए। हमें दृढ़तापूर्वक मन के शुद्धिकरण हेतु इसका अभ्यास करना चाहिए।
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते |
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् || 15||
अन्य लोग जो ज्ञान के संवर्धन हेतु यज्ञ करने में लगे रहते हैं, वे विविध प्रकार से मेरी ही आराधना में लीन रहते हैं। कुछ लोग मुझे अभिन्न रूप में देखते हैं जोकि उनसे भिन्न नहीं हैं जबकि अन्य मुझे अपने से भिन्न रूप में देखते हैं। कुछ लोग मेरे ब्रह्माण्डीय रूप की अनन्त अभिव्यक्तियों के रूप में मेरी पूजा करते हैं।
साधक परम सत्य को पाने के लिए विभिन्न आध्यात्मिक मार्गों का अनुसरण करते हैं। जो भक्त हैं, श्रीकृष्ण पहले ही उनका वर्णन कर चुके हैं। वे भगवान के अभिन्न अंग और सेवक के रूप में श्रद्धा भक्ति से युक्त होकर स्वयं को भगवान के चरण कमलों पर समर्पित करते हैं। वे अब साधकों द्वारा अनुसरण किए जाने वाले कुछ अन्य मार्गों का वर्णन कर रहे हैं।
वे मनुष्य जो ज्ञान योग के मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे स्वयं को भगवान से भिन्न नहीं मानते। वे जैसे 'सोऽहम्' अर्थात् मैं वही हूँ 'शिवोऽहम्' अर्थात् मैं शिव हूँ जैसे सूत्रों का गहनता से चिन्तन करते हैं। उनका चरम लक्ष्य परम सत्ता के रूप में अभिन्न ब्रह्म की अनुभूति करना होता है जो शाश्वत ज्ञान और आनन्द के गुण से सम्पन्न है लेकिन वह रूप, गुण और लीला से रहित है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे ज्ञानी योगी भी उनकी आराधना करते हैं लेकिन उनके सर्वत्र व्यापक निराकार रूप की। इसके विपरीत अष्टांग योगी स्वयं को भगवान से पृथक् देखते हैं और तदनुसार उनकी आराधना करते हैं। जबकि कुछ ब्रह्माण्ड की ही भगवान के रूप में पूजा करते हैं। वैदिक दर्शन में इसे 'विश्वरूप उपासना' अर्थात् भगवान के ब्रह्माण्डीय रूप की आराधना कहा गया है। पाश्चात्य दर्शन में इसे 'पेंथीजम' और ग्रीक दर्शन में 'पेन' (सब) और 'थियोस' (भगवान) कहा गया है। इस दर्शन का प्रसिद्ध समर्थक (स्पिनोज़ा) है। चूँकि संसार भगवान का अंग है अतः इसके प्रति दिव्य भावना रखना अनुचित नहीं है लेकिन यह अपूर्ण है। ऐसे भक्तों को भगवान के अन्य रूपों जैसे कि 'ब्रह्म' (भगवान की सर्वव्यापक अभिन्न अभिव्यक्ति), 'परमात्मा' (सब के हृदय में स्थित), और 'भगवान' (साकार रूप) का ज्ञान नहीं होता।
इन सब पद्धतियों द्वारा एक ही भगवान की उपासना कैसे की जा सकती है? श्रीकृष्ण इसका उत्तर अगले दो श्लोकों में दे रहे हैं।
अहं क्रतुरहं यज्ञ: स्वधाहमहमौषधम् |
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् || 16||
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामह: |
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च || 17||
मैं ही वैदिक कर्मकाण्ड हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही पितरों को दिया जाने वाला तर्पण हूँ, मैं ही औषधीय जड़ी-बूटी और वैदिक मंत्र हूँ, मैं ही घी, अग्नि और यज्ञ का कर्म हूँ। मैं ही इस ब्रह्माण्ड का पिता, माता, आश्रय और पितामह हूँ। मैं ही शुद्धिकर्ता, ज्ञान का लक्ष्य और पवित्र मंत्र ओम् हूँ, मैं ही ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद हूँ।
इन श्लोकों में श्रीकृष्ण अपने दिव्य व्यक्तित्व के विभिन्न स्वरूपों की झाँकी दिखा रहे हैं। क्रतुः शब्द का अर्थ 'यज्ञ संबंधी कर्मकाण्ड' है, यथा 'अग्निहोत्र' जैसे यज्ञों का उल्लेख वेदों में किया गया है। इन्हें यज्ञ भी कहा जाता है जैसे कि-विश्वदेवा जिसका उल्लेख स्मृति ग्रथों में किया गया है। 'औषधम्' शब्द औषधीय जड़ी-बूटियों की क्षमता को व्यक्त करता है।
सृष्टि भगवान से प्रकट होती है और इसलिए उन्हें उसका पिता कहा गया है। सृष्टि के पूर्व वह अप्रकट प्राकृतिक शक्ति को अपने गर्भ में धारण करता है इसलिए उसको माता भी कहते हैं, वह सृष्टि का रक्षण और पोषण करता है, इसलिए उसे 'धाता' अर्थात् आश्रयदाता कहते हैं। वह स्रष्टा ब्रह्मा का भी पिता है इसलिए उसे पितामह कहते हैं।
वेद भगवान से प्रकट हुए हैं। रामचरितमानस में वर्णन है -
जाकी सहज स्वास श्रुतिचारी।
"भगवान ने अपनी श्वास से वेदों को प्रकट किया।" वे भगवान की ज्ञान शक्ति हैं और इसलिए वे उनके अनन्त विराट व्यक्तित्व का स्वरूप हैं।" यह कहते हुए कि वे ही वेद हैं, श्रीकृष्ण इस सत्य को प्रभावशाली ढंग से प्रकट करते हैं।
गतिर्भर्ता प्रभु: साक्षी निवास: शरणं सुहृत् |
प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम् || 18||
मैं सभी प्राणियों का परम लक्ष्य हूँ और मैं ही सबका निर्वाहक, स्वामी, धाम, आश्रयऔर मित्र हूँ। मैं ही सृष्टि का आदि, अन्त और मध्य (विश्रामस्थल) और मैं ही अविनाशी बीज हूँ।
आत्मा भगवान का अणु अंश है और उसका उनसे सभी प्रकार का संबंध है। किन्तु शारीरिक चेतना के कारण हम अपने शरीर के सगे-संबंधियों जैसे पिता, माता, प्रियजन, बच्चों और मित्र को अपना बंधु-बांधव मानते हैं। हम उनमें मोहित हो जाते हैं और बार-बार मन में उनके साथ अपने संबंधों का चिन्तन कर सांसारिक मोहपाश में बंध जाते हैं। किन्तु संसार के इन सगे-संबंधियों में से कोई भी हमें पूर्ण और सच्चा प्रेम नहीं दे सकता जिसे पाने के लिए हमारी आत्मा तरसती रहती है। इसके दो कारण हैं। पहला यह कि सब नातेदार अस्थायी होते हैं और जब वे या हम शरीर त्यागते हैं तब सबका एक-दूसरे से बिछुड़ना अपरिहार्य हो जाता है। दूसरे जितने समय तक वे जीवित रहते हैं उनका प्रेम स्वार्थ पर आधारित होता है और इसलिए यह प्रेम स्वार्थ की संतुष्टि के अनुपात में घटता बढ़ता रहता है अर्थात् जितना स्वार्थ उतना प्रेम और स्वार्थ सिद्ध होते ही प्रेम समाप्त हो जाता है। दिन भर में सांसारिक प्रेम की गहनता क्षण प्रतिक्षण परिवर्तित होती रहती है। 'मेरी पत्नी बहुत शालीन है, मेरी पत्नी शालीन नहीं है। वह भली है, वह भद्दी है।' इस प्रकार से सांसारिक रंगमंच पर प्रेम इस सीमा तक घटता-बढ़ता रहता है। दूसरी ओर भगवान हमारे ऐसे संबंधी है जो इस जीवन में और मृत्यु के पश्चात् भी हमारे साथ रहते हैं। प्रत्येक जन्म में हम जिस भी योनि में गये, भगवान हमारे साथ रहे और हमारे हृदय में बैठे रहे। इस प्रकार से वे हमारे नित्य संबंधी हैं। इसके अतिरिक्त उनका हमसे कोई स्वार्थ नहीं होता क्योंकि वे पूर्ण और सिद्ध हैं। वे हमसे निःस्वार्थ प्रेम करते हैं क्योंकि उनकी इच्छा हमारा आंतरिक कल्याण करना है। इसलिए भगवान ही हमारे एकमात्र सच्चे संबंधी हैं जो नित्य और निःस्वार्थी दोनों हैं।
इस दृष्टिकोण को बेहतर समझने के लिए समुद्र और उसमें उठने वाली लहरों से इसके सादृश्य पर विचार करें। समुद्र की दो लहरें कुछ समय के लिए एक साथ आपस में खेलती हुईं यह आभास करते हुए बहती हैं कि दोनों के बीच घनिष्ठ मित्रता है। किन्तु कुछ दूरी तक साथ चलते रहने के बाद एक लहर समुद्र में विलीन हो जाती है और कुछ समय पश्चात् दूसरी भी विलीन हो जाती है। क्या उनमें आपस में कोई संबंध था? नहीं, उन दोनों का जन्म समुद्र से हुआ था और उनका संबंध केवल समुद्र के साथ था। समान रूप से भगवान समुद्र हैं और हम लहरों के समान हैं जो भगवान से प्रकट होती हैं। अतः सत्य यह है कि जीवात्माओं में परस्पर कोई संबंध न होकर केवल भगवान से उनका संबंध होता है जिससे वे प्रकट होती हैं।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण हमें शारीरिक चेतना और सगे-संबंधियों की आसक्ति से ऊपर ले जाते हैं। आत्मा के स्तर पर केवल भगवान हमारे सच्चे संबंधी हैं। वे हमारे पिता, माता, बहन, भाई, प्रिय और सखा हैं। इसी प्रसंग को सभी वैदिक ग्रंथों में बार-बार दोहराया गया है।
दिव्यो देव एको नारायणो माता पिता भ्राता सुहृत् गतिः।
निवासः शरणं सुहृत् गतिर्नारायण इति ।।
(सुबालश्रुति मंत्र-6)
"भगवान नारायण ही एकमात्र हमारे माता, पिता, प्रिय और आत्मा का गंतव्य हैं।"
मोरे सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबन्धु उर अन्तरजामी।।
(रामचरितमानस)
"हे भगवान राम केवल आप ही हमारे स्वामी हैं, आप ही निराश्रितों के उद्धारक, सबके हृदय को जानने वाले हो।" भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंध को जानकर हमें केवल उन्हीं में अपने मन को तल्लीन करने का प्रयास करना चाहिए। तभी हमारा मन शुद्ध होगा और उसी स्थिति में हम पूर्ण शरणागति की शर्त पूरी करने में सक्षम हो पाएँगे जोकि भगवान को पाने के लिए अनिवार्य है। हमें इस सत्य को धारण कर मन की सभी आसक्तियों को त्याग कर इसे भगवान में अनुरक्त कर देना चाहिए। इसलिए रामचरितमानस में वर्णन किया गया है
सब के ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँधा बरि डोरी।
"अपने मन से सांसारिक आसक्तियों के सूत को काट दो और इनकी रस्सी बनाकर इसे भगवान के चरण कमलों पर बाँध दो।" अपने मन को भगवान के साथ जोड़ने के सहायतार्थ यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि आत्मा का संबंध केवल एक भगवान के साथ ही है।
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णम्युत्सृजामि च |
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन || 19||
हे अर्जुन! मैं ही सूर्य को गर्मी प्रदान करता हूँ तथा वर्षा को रोकता और लाता हूँ। मैं ही अनश्वर तत्त्व और साक्षात् मृत्यु हूँ। मैं ही आत्मा और मैं ही पदार्थ हूँ।
पुराणों में यह वर्णन मिलता है कि जब भगवान ने ब्रह्माण्ड की रचना की तब उन्होंने सबसे पहले ब्रह्मा को प्रकट किया और फिर उन्हें आगे सृष्टि की रचना करने का दायित्व सौंपा। ब्रह्मा जब ब्रह्माण्ड के प्राकृतिक पदार्थों और विभिन्न योनियों के सृजन के कार्य को संपन्न करने में किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये तब भगवान ने उनके भीतर ज्ञान प्रकट किया जिसे चतुरश्लोकी भागवत कहते हैं। इसके आधार पर ब्रह्मा ने संसार की रचना के कार्य को आगे बढ़ाया। इसका पहला श्लोक इसे अति प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है -
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम्।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्।।
(श्रीमद्भागवतम्-2.9.32)
श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा से कहा, "मैं ही सब कुछ हूँ सृष्टि से पूर्व केवल मैं ही अस्तित्व में था। अब जब सृष्टि प्रकट हो चुकी है, इस प्रकट संसार का स्वरूप जो भी है वह सब मैं हूँ। प्रलय के पश्चात् भी केवल मैं ही रहूँगा। सृष्टि में मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं।" उपर्युक्त सत्य का तात्पर्य यह है कि संसार के जिस पदार्थ के द्वारा हम भगवान की आराधना करते हैं वह भी भगवान है। जब लोग गंगा की पूजा करते हैं तो वे अपने शरीर के निचले अंग को उसमें डुबाते हैं। फिर वे अपनी हथेलियों से जल उठाकर गंगा में डाल देते हैं। इस प्रकार से वे गंगाजल का ही प्रयोग उसकी पूजा के लिए करते हैं। उसी प्रकार से जब भगवान सभी में व्याप्त हैं तब उनकी पूजा करने के लिए प्रयोग किए जाने वाले पदार्थ भी उनसे भिन्न नहीं हो सकते। जैसे कि श्लोक 16 और 17 में श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि वे ही वेद, यज्ञ, अग्नि और पहला अक्षर 'ओम्', और यज्ञ कर्म हैं। हमारी भक्ति का भाव और विधि जो भी हो, कुछ भी भगवान से अलग नहीं है जो हम उन्हें अर्पित करें। इसके पश्चात भी प्रेम भाव से किया गया अर्पण भगवान को प्रसन्न करता है न कि पदार्थ का अर्पण।
त्रैविद्या मां सोमपा: पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते |
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् || 20||
वे जिनकी रुचि वेदों में वर्णित सकाम कर्मकाण्डों में होती है, वे यज्ञों के कर्मकाण्ड द्वारा मेरी आराधना करते हैं। वे यज्ञों के अवशेष सोमरस का सेवन कर पापों से शुद्ध होकर स्वर्ग जाने की इच्छा करते हैं। अपने पुण्य कर्मों के प्रभाव से वे स्वर्ग के राजा इन्द्र के लोक में जाते हैं और स्वर्ग के देवताओं का ऐश्वर्य पाते हैं।
इस अध्याय के श्लोक 11 और 12 में श्रीकृष्ण ने उन आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों की मानसिकता का वर्णन किया जो नास्तिक और आसुरी विचारों को स्वीकार करते हैं और इसके फलस्वरूप परिणाम भी भुगतते हैं। उसके पश्चात् उन्होंने महान आत्माओं की प्रकृति का वर्णन किया जो भगवान की प्रेममयी भक्ति में मग्न रहती हैं। अब इस और अगले श्लोक में उनका उल्लेख किया गया है जो न तो भक्त हैं और न ही नास्तिक हैं। वे वैदिक कर्मकाण्डों का अनुपालन करते हैं। कर्मकाण्ड की प्रक्रिया को 'त्रिविद्या' कहा जाता है। वे लोग जो 'त्रिविद्या' प्रक्रिया द्वारा प्रसन्न होकर यज्ञों या अन्य कर्मकाण्डों द्वारा इन्द्र जैसे देवताओं की पूजा करते हैं वे अप्रत्यक्ष रूप से सर्वात्मा भगवान की पूजा करते हैं क्योंकि उन्हें यह अनुभव नहीं होता कि देवताओं द्वारा प्रदान किए जाने वाले उपहारों की स्वीकृति तो भगवान ही प्रदान करते हैं। धार्मिक कर्मकाण्डों को शुभ कार्य माना जा सकता है लेकिन इनकी गणना भक्ति के रूप में नहीं की जाती। धार्मिक कर्मकाण्डों का अनुपालन करते हुए वे जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो पाते। वे ब्रह्माण्ड के उच्च लोकों जैसे कि स्वर्ग के राजा इन्द्र के लोक में जाते हैं, जहाँ वे स्वर्ग के देवताओं का अत्युत्तम सुख पाते हैं जो पृथ्वी पर मिलने वाले इन्द्रिय सुखों की तुलना में हजारों गुणा अधिक होता है। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण स्वर्ग के सुखों के दोषों की विवेचना करेंगे।
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति |
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते || 21||
जब वे स्वर्ग के सुखों को भोग लेते हैं और उनके पुण्य कर्मों के फल क्षीण हो जाते हैं तब फिर वे पृथ्वीलोक पर लौट आते हैं। इस प्रकार वे जो अपने इच्छित पदार्थ प्राप्त करने हेतु वैदिक कर्मकाण्डों का पालन करते हैं, बार-बार इस संसार में आवागमन करते रहते हैं।
श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह स्पष्ट करते हैं कि स्वर्ग लोक के दैवीय सुख अस्थायी हैं। जिन लोगों को स्वर्ग भेजा जाता है वे स्वर्ग के सुखों और ऐश्वर्य का भरपूर भोग करते हैं। बाद में जब उनके पुण्य कर्म समाप्त हो जाते हैं तब उन्हें पृथ्वी लोक पर वापस भेज दिया जाता है। स्वर्गलोक को प्राप्त करने से आत्मा की आनंद की खोज पूरी नहीं होती। हम भी अपने अनन्त पूर्व जन्मों में वहाँ पर कई बार जा चुके हैं तथापि आत्मा की अनन्त सुख पाने की भूख अभी तक शांत नहीं हुई है। सभी वैदिक ग्रंथों में इसका समर्थन किया गया है।
तावत् प्रमोदते स्वर्गे यावत् पुण्यं समाप्यते।
क्षीणपुण्यः पतत्यगिनिच्छन् कालचालितः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.10.26)
"स्वर्ग के निवासी तब तक स्वर्ग के सुखों का भोग करते हैं जब तक उनके पुण्य कर्म समाप्त नहीं हो जाते। कुछ अंतराल के बाद उन्हें अनिच्छा से बलपूर्वक निम्न लोकों में भेज दिया जाता है।"
स्वर्गहु स्वल्प अन्त दुखदाई।
(रामचरितमानस)
"स्वर्ग की प्राप्ति अस्थायी है और वहाँ भी दु:ख पीछा नहीं छोड़ते।"
जिस प्रकार खेल के मैदान में फुटबॉल को चारों ओर खिलाड़ी ठोकर मारते रहते हैं। उसी प्रकार से माया भी जीवात्मा को भगवान को भूल जाने का दण्ड देने के लिए इधर-उधर ठोकर मारती रहती है। आत्मा कभी निम्न लोकों में जाती है और कभी-कभी उच्च लोकों में जाती है। निम्न और उच्च लोकों की असंख्य योनियों जिन्हें यह प्राप्त करती है उनमें से केवल मनुष्य योनि में ही भगवत्प्राप्ति का अवसर मिलता है इसलिए देवता लोग भी मनुष्य जन्म प्राप्त करने हेतु प्रार्थना करते हैं, ताकि वे पिछली भूल को सुधारने और भगवत्प्राप्ति का प्रयास कर सकें।
दुर्लभं मानुषं जन्म प्रार्थ्यते त्रिदशैरपि।
(नारद पुराण)
"मानव जन्म अत्यंत दुर्लभ है। यहाँ तक कि स्वर्ग के देवता भी इसे पाने के लिए प्रार्थना करते हैं।" इसलिए श्रीराम ने अयोध्यावासियों को यह संदेश दिया
बड़े भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।।
(रामचरितमानस)
"हे अयोध्यावासियों! यह आपका परम सौभाग्य है कि आपको मानव जन्म प्राप्त हुआ है जोकि अत्यंत दुर्लभ है और स्वर्ग के देवता भी इसकी इच्छा करते हैं।" जब देवतागण मनुष्य जन्म चाहते हैं तब फिर मनुष्य स्वर्गलोक में क्यों जाना चाहते हैं? इसकी अपेक्षा हमें भगवान की भक्ति में लीन होकर भगवत्प्राप्ति का लक्ष्य रखना चाहिए।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते |
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् || 22||
किन्तु जो लोग सदैव मेरे बारे में सोचते हैं और मेरी अनन्य भक्ति में लीन रहते हैं एवं जिनका मन सदैव मुझमें तल्लीन रहता है, उनकी जो आवश्यकताएँ होती हैं, उन्हें मैं पूरा करता हूँ और जो कुछ उनके स्वामित्व में होता है, उसकी रक्षा करता हूँ।
एक माँ पूर्ण रूप से उस पर आश्रित नवजात शिशु के प्रति अपने दायित्वों का त्याग करने के बारे में सोच नहीं सकती। शिशु की परम और शाश्वत माँ भगवान ही हैं। भगवान केवल उन पर पूर्ण शरणागत जीवात्माओं को माँ जैसी सुरक्षा प्रदान करते हैं। यहाँ 'वहाम्यहम्' शब्द का प्रयोग किया गया हैं जिसका अर्थ यह है 'मैं अपने भक्तों की रक्षा का दायित्व स्वयं लेता हूँ' यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कोई विवाहित व्यक्ति अपनी पत्नी और बच्चों की देखभाल का दायित्व अपने उपर लेता है। भगवान दो वचन देते हैं-पहला 'योग' है जिसके माध्यम से वे अपने भक्तों को आध्यात्मिक समपत्ति प्रदान करते हैं। दूसरा 'क्षेम' है जिसके द्वारा वे भक्तों की उस अध्यात्मिक संपत्ति की रक्षा करते हैं जो उनके पास पहले से है। किन्तु भगवान ने इसके लिए अनन्य शरणागति की शर्त रखी है। इसे पुनः माँ और पुत्र के उदाहरण से समझा जा सकता है। नवजात शिशु अपनी माँ पर पूर्णतया आश्रित होता है जो अपने शिशु की पूरी तरह से देखभाल करती है। बच्चे को जब किसी वस्तु की आवश्यकता होती है तब वह रोने लगता है और फिर माँ उसे दूध पिलाती है, उसे स्वच्छ करती है और स्नान आदि कराती है। लेकिन जब वह शिशु 5 वर्ष का हो जाता है तब वह उपर्युक्त सभी कार्य स्वयं करने लग जाता है और कुछ सीमा तक माँ का दायित्व कम हो जाता है। जब बालक युवा हो जाता है और अपने उत्तरदायित्व को अनुभव करने लगता है, तब माँ अपने कुछ और उत्तरदायित्वों का त्याग कर देती है। अब यदि पिता घर में आकर अपने पुत्र के संबंध में कुछ पूछता है कि 'हमारा पुत्र कहाँ है तब माँ उत्तर देती है, 'वह विद्यालय से घर वापस नहीं आया। संभवतः वह अपने मित्र के साथ मूवी देखने गया होगा।' अब माँ की यह मनोवृति उसके प्रति स्वाभाविक हो जाती है किन्तु जब यही बालक 5 वर्ष का था और यदि उसे विद्यालय से लौटने में 10 मिनट की भी देरी हो जाती थी, तब माता और पिता दोनों ही चिन्तित हो जाते थे-क्या हुआ होगा? वह छोटा बालक है और यह आशंका करने लगते कि उसके साथ कोई दुर्घटना तो नहीं घटी। जरा विद्यालय में फोन कर पता लगाएँ।' इस प्रकार बालक जितना अधिक अपने उत्तरदायित्वों को समझने लगता है माँ उतना ही अपने दायित्वों का निर्वहन करना छोड़ देती है। भगवान का नियम भी कुछ ऐसा है। जब हम स्वयं को कर्त्ता मानकर अपनी स्वेच्छा से कार्य करते हैं और अपनी क्षमता पर भरोसा कर लेते हैं तब भगवान अपनी कृपा नहीं बरसाते। वे केवल हमारे कर्मों का लेखा-जोखा रखकर उसी के अनुरूप हमें फल देते हैं। जब हम भगवान के प्रति आंशिक रूप से शरणागत होते हैं और आंशिक रूप से संसार का आश्रय लेते हैं तब भगवान भी हम पर आंशिक कृपा करते हैं और जब हम स्वयं को पूर्ण शरणागत कर देते हैं। "मामेकं शरणं व्रज" तब भगवान हम पर कृपा करते हैं और जो हमारे पास है उसकी रक्षा करने और जो कमी है उसे पूरा करने का दायित्व अपने ऊपर ले लेते हैं।
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता: |
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् || 23||
हे कुन्ती पुत्र! जो श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, वे मेरी ही पूजा करते हैं। लेकिन वे यह सब अनुचित ढंग से करते हैं।
जो भगवान की पूजा करते हैं, उनकी मनोस्थिति का वर्णन करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब उन लोगों की स्थिति को स्पष्ट कर रहे हैं जो सांसारिक सुख प्राप्त करने के लिए देवताओं की पूजा करते हैं। वे श्रद्धायुक्त भी होते हैं और वे स्वर्ग के देवताओं से अपनी प्रार्थना का फल भी प्राप्त करते हैं, किन्तु ऐसे लोगों का ज्ञान अपूर्ण होता है। वे यह अनुभव नहीं कर पाते कि स्वर्ग के देवतागण अपनी शक्तियाँ भगवान से प्राप्त करते हैं। इस प्रकार वे अप्रत्यक्ष रूप से परमात्मा के दिव्य स्वरूप की भी पूजा करते हैं। यदि कोई सरकारी अधिकारी किसी नागरिक की शिकायत का निवारण करता है तब उसे उस पर कृपा करने का श्रेय नहीं दिया जा सकता। वह केवल अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत सरकार द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करता है। इसी प्रकार की शक्तियाँ देवताओं को भगवान से प्राप्त होती हैं। इस प्रकार से जो सर्वोच्च ज्ञान से युक्त हैं वे अप्रत्यक्ष मार्ग का अनुसरण नहीं करते। वे भगवान को समस्त शक्तियों का स्त्रोत मानकर पूजा करते हैं। सर्वात्मा भगवान को अर्पित की गयी ऐसी पूजा स्वतः समस्त सृष्टि को संतुष्ट करती है।
यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः।
प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां तथैव सर्वाहणमच्युतेज्या।।
(श्रीमद्भागवतम्-4.31.14)
"जब किसी वृक्ष की जड़ को पानी दिया जाता है तब उसके तनों, शाखाओं, टहनियों, पत्तियों और फूलों का भी पोषण होता है। जब हम अपने मुख से अन्न का सेवन करते हैं तब यह हमारी प्राण शक्ति और इन्द्रियों को स्वतः पोषित करता है। इसी प्रकार से जब सर्वात्मा भगवान की पूजा की जाती है तब देवता सहित उनके सभी स्वाशों की भी पूजा हो जाती है।" यदि हम वृक्ष की जड़ों की उपेक्षा कर उनकी पत्तियों पर पानी डालते हैं तब वृक्ष सूख जाता है। इस प्रकार देवताओं को अर्पित पूजा निश्चित रूप से भगवान तक पहुँच तो जाती है लेकिन ऐसे भक्तों को आध्यात्मिक लाभ नहीं मिलता। इसका विस्तृत विवरण अगले श्लोक में है।
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च |
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते || 24||
मैं ही समस्त यज्ञों का एक मात्र भोक्ता और स्वामी हूँ लेकिन जो मेरी दिव्य प्रकृति को पहचान नहीं पाते, वे पुनर्जन्म लेते हैं।
श्रीकृष्ण अब देवताओं की पूजा करने के दोषों को समझा रहे हैं। परम प्रभु द्वारा प्रदत्त शक्तियों से देवतागण अपने भक्तों को सांसारिक पदार्थ प्रदान करने में सक्षम होते हैं लेकिन वे अपने भक्तों को जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त नहीं करवा सकते। वे अपने भक्तों को वही दे सकते हैं जो उनके पास होता है। जब स्वर्ग के देवतागण ही 'संसार' अर्थात जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त नहीं होते, तब ऐसी स्थिति में वे अपने भक्तों को इससे कैसे मुक्ति दिला सकते हैं दूसरी ओर जिनका ज्ञान परिपूर्ण होता है वे अपनी समस्त आराधना को श्रद्धापूर्वक भगवान के चरण कमलों पर समर्पित करते हैं और जब उनकी भक्ति परिपक्व अवस्था में पहुँच जाती है तब वे नश्वर संसार से परे भगवान के दिव्य लोक को प्राप्त करते हैं।
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄ न्यान्ति पितृव्रता: |
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।
जो देवताओं की पजा करते हैं वे देवताओं के बीच जन्म लेते हैं। जो पितरों की पूजा करते हैं वे पितरों की योनियों में जन्म लेते है। भूत-प्रेतों की पूजा करने वाले उन्हीं के बीच जन्म लेते है और केवल मेरे भक्त मेरे धाम में प्रवेश करते हैं।
भक्त जिस सत्ता की आराधना करते हैं वे उसके स्तर तक उठ जाते हैं। जैसे किसी पाइप से जल उसी जलाश्य तक पहुँचता है जिससे उसे जोड़ा जाता है। इस श्लोक में विभिन्न सत्ता की आराधना से प्राप्त होने वाले गन्तव्यों की जानकारी द्वारा श्रीकृष्ण हमें इनकी जटिलताओं को समझा रहे हैं। इस जानकारी द्वारा वे हमें यह निर्णय लेने में सहायता प्रदान करते हैं कि आध्यात्मिक उन्नति पर पहुँचने के लिए हमें केवल भगवान की आराधना करनी चाहिए। वर्षा के देवता 'इन्द्र', 'सूर्य', धन के देवता 'कुबेर' और अग्नि देवता आदि की आराधना करने वाले स्वर्गलोक को जाते हैं। उसके बाद जब उनके पुण्य कर्म क्षीण हो जाते हैं तब उन्हें स्वर्ग से लौटा दिया जाता है। पितर हमारे पूर्वज हैं। उनके प्रति कृतज्ञता के विचारों को प्रश्रय देना उत्तम है लेकिन अनावश्यक रूप से उनके कल्याण की चिन्ता हानिकारक होती है। जो पितरों की पूजा करते हैं, वे मृत्यु के पश्चात् अपने पित्तरों के लोक में जाते हैं।
कुछ लोग अज्ञानतावश भूत-प्रेतों की पूजा करते हैं। पाश्चात्य जगत में लोग 'इंद्रजाल' और 'सम्मोहन', अफ्रीका में 'काला जादू' करने वाले और भारत में 'वाम मार्गी तांत्रिक' भूत प्रेतों का आह्वान करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं जो लोग ऐसे कर्मों में लिप्त रहते हैं वे अगला जन्म भूत पिशाचों की योनियों में लेते हैं। परम भक्त वे हैं जो अपना मन भगवान के दिव्य स्वरूप में अनुरक्त कर देते हैं। व्रत का अर्थ संकल्प लेना और वचनबद्ध होना है। ऐसी भाग्यशाली आत्माएँ जो दृढ़संकल्प से भगवान की आराधना करती हैं और जो दृढ़तापूर्वक उनकी भक्ति में लीन रहती हैं वे अगले जन्म में उनके लोक में जाती हैं।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति |
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन: || 26||
यदि कोई मुझे श्रद्धा भक्ति के साथ पत्र, पुष्प, फल या जल ही अर्पित करता है तब मैं प्रसन्नतापूर्वक अपने भक्त द्वारा प्रेमपूर्वक और शुद्ध मानसिक चेतना के साथ अर्पित उस वस्तु को स्वीकार करता हूँ।
परम प्रभु की आराधना के लाभों को प्रतिष्ठित करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब यह समझाते हैं कि किस प्रकार से इसका अनुपालन करना अत्यंत सरल है। देवताओं और पितरों की पूजा में उन्हें संतुष्ट करने हेतु कई विधियाँ निश्चित की गयी हैं जिनका अनिवार्य रूप से अनुपालन करना पड़ता है। लेकिन भगवान उनके भक्तों द्वारा प्रेमपूर्वक शुद्ध हृदय से अर्पित किए गए किसी भी पदार्थ को स्वीकार करते हैं। यदि आपके पास भगवान को अर्पित करने के लिए केवल फल है तब उसे ही अर्पित करने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। यदि फल उपलब्ध नहीं है तो उन्हें पुष्प अर्पित कर सकते हैं। यदि फूलों का मौसम नहीं है तब भगवान को प्रेमपूर्वक उपहार के रूप में पत्ता अर्पित करना ही पर्याप्त होता है। यदि पत्ते मिलने में कठिनाई हो तो जल जो कहीं भी उपलब्ध हो सकता है, अर्पित किया जा सकता है। किन्तु यह अर्पण श्रद्धा भक्ति युक्त होना चाहिए। इस श्लोक में 'भक्त्या' शब्द का प्रयोग पहली एवं दूसरी पंक्ति में किया गया है। भक्त की यह भक्ति ही भगवान को प्रसन्न करती है न कि अर्पित किए गये उपहार का मूल्य। इस अद्भुत कथन द्वारा श्रीकृष्ण भगवान के दिव्य स्वभाव को प्रकट कर रहे हैं। वे अर्पित की गयी भेंट के मूल्य को महत्व नहीं देते। इसके विपरीत वे हमारे भेंट का मूल्य सभी पदार्थों से अधिक आँकते है। इसलिए हरिभक्ति विलास में यह वर्णन किया गया है
तुलसी-दल-मात्रेण जलस्य चुलुकेन च।।
विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सलः।।
(हरिभक्ति विलास-11.261)
"यदि तुम भगवान को निश्छल प्रेम के साथ केवल तुलसी का एक पत्ता और इतना जल जिसे तुम अपनी हथेली पर रख सको, भेंट करते हो तब वे इसके बदले में वे स्वयं को तुम्हें सौंप देंगे क्योंकि वे प्रेम के बंधन में बँध जाते हैं।" यह कितना आश्चर्यजनक है कि अनन्त ब्रह्माण्डों के स्वामी जिनके गुण और विशेषताएँ अत्यंत अद्भुत और वर्णन से परे हैं और जिनके संकल्प मात्र से असंख्य ब्रह्माण्ड उत्पन्न होते हैं, और पुनः नष्ट हो जाते हैं। वे अपने भक्तों द्वारा सच्चे प्रेम के साथ अर्पित की गयी भेंटों को सहर्ष स्वीकार करते हैं। यहाँ प्रयुक्त 'प्रयतात्मनः' शब्द यह सूचित करता है-'मैं उन्ही की भेंट स्वीकार करता हूँ, जिनका हृदय शुद्ध है।" श्रीमद्भागवत में भी ऐसा ही वर्णन किया गया है। अपने महल में अपने प्रिय मित्र सुदामा के सूखे चावल खाते हुए श्रीकृष्ण ने इस प्रकार से कहा
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन ।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.81.4)
"यदि कोई मुझे श्रद्धा भक्ति के साथ पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, तो मैं शुद्ध चेतना युक्त मेरे भक्त द्वारा प्रेम पूर्वक अर्पित किए उस पदार्थ को सहर्ष स्वीकार करता हूँ।"
भगवान जब पृथ्वी पर अवतार लेते हैं तब वे अपनी दिव्य लीलाओं में इन गुणों को प्रदर्शित करते हैं। महाभारत के युद्ध से पूर्व जब श्रीकृष्ण कौरवों और पाण्डवों में समझौता होने की संभावना का पता लगाने हस्तिनापुर गये तब दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को भोजन खिलाने के लिए 56 भोग तैयार करवाए। श्रीकृष्ण उसके आतिथ्य को ठुकराकर और वहाँ भोजन करने के स्थान पर विदुरानी की कुटिया में गये जो उनकी सेवा का अवसर पाने की अभिलाषा कर रही थी। विदुरानी श्रीकृष्ण को अपने घर में देखकर आनन्द से ओत-प्रोत हो गयी। उसने उन्हें केले अर्पित किये, किन्तु उसकी बुद्धि प्रेमभाव से ऐसी स्तंभित हो गयी कि उसे इसका बोध नहीं रहा कि वह केले के फल को नीचे और केले के छिलके श्रीकृष्ण के मुँह में डाल रही थी। फिर भी उसकी भक्ति भावना को देखकर श्रीकृष्ण ने आनन्दपूर्वक केले के छिलकों को ऐसे खाया जैसे कि वे संसार का अति स्वादिष्ट भोजन हो।
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् |
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् || 27||
हे कुन्ती पुत्र! तुम जो भी करते हो, जो भी खाते हो, पवित्र यज्ञाग्नि में जो आहुति डालते हो, जो भी दान देते हो, जो भी तपस्या करते हो, यह सब मुझे अर्पित करते हुए करो।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा कि सभी पदार्थ उन्हें अर्पित करने चाहिए। अब वे कहते हैं कि समस्त कर्म भी उन्हें अर्पित करने चाहिए। कोई भी व्यक्ति अपने जिन सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करता है, जो भी शाकाहारी भोजन ग्रहण करता है, जो भी पदार्थ सेवन करता है, जो भी वैदिक कर्मकाण्ड करता है, जो भी व्रत या तपस्या करता है, उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि वह मानसिक रूप से भी सभी कार्यों को मुझे समर्पित करते हुए करे।
प्राय: लोग भक्ति को अपने दैनिक जीवन से अलग रखते हैं और वे ऐसा समझते हैं कि यह केवल मंदिर के भीतर किया जाने वाला कार्य है। किन्तु भक्ति को केवल मंदिर के प्रांगण तक सीमित न रखकर अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में इसमें तल्लीन होना आवश्यक है। नारद मुनि ने भक्ति की इस प्रकार से व्याख्या की है
नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारता तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति ।।
(नारद भक्तिदर्शन, सूत्र-19)
"भक्ति का तात्पर्य अपने समस्त कर्मों को भगवान को अर्पित करना है और उनका एक क्षण भी विस्मरण होने पर परम व्याकुल होना है।" जब कर्म मानसिक रूप से भगवान को सौंप दिए जाते हैं तब उसे अर्पण कहते हैं। इस मनोवृत्ति से सभी लौकिक कर्म भगवान की दिव्य सेवा में परिवर्तित हो जाते हैं।
स्वामी विवेकानन्द ने भी कर्म के प्रति इस प्रवृत्ति को व्यक्त किया है-"कोई कार्य लौकिक नहीं है। सब कुछ भक्ति और सेवा है।" संत कबीर अपने दोहे में कहते हैं
जहँ जहँ चलुं करूँ परिक्रमा, जो जो करूँ सो सेवा।
जब सोवू करूँ दंडवत, जानें देव न दूजा।।
"मैं जहाँ भी चलता हूँ, मैं यही अनुभव करता हूँ कि मैं भगवान के मंदिर की परिक्रमा कर रहा हूँ। मैं जो भी कर्म करता हूँ उसे मैं भगवान की सेवा के रूप में देखता हूँ। जब मैं सोता हूँ तब मैं इस भाव का ध्यान करता हूँ कि मैं भगवान की आज्ञा का पालन कर रहा हूँ। इस प्रकार मैं भगवान में एकनिष्ठ हो जाता हूँ।" निम्नांकित श्लोक का अभिप्राय समझे बिना मंदिरों में अधिकतर लोग इसका उच्चारण करते हैं।
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्याऽऽत्मना वानुसृतस्वभावात् ।
करोति यद् यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.2.36)
"कोई भी शरीर से, वाणी से, इन्द्रियों से, बुद्धि से, अहंकार से, अनेक जन्मों अथवा एक जन्म की प्रवृत्तियों से स्वभाववशः जो भी करता है वह सब परम प्रभु नारायण को समर्पित करना चाहिए।" किन्तु यह अर्पण कार्य के अंत में केवल मंत्रों के उच्चारण द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। जैसे कि 'श्रीकृष्ण समर्पण मस्तु' आदि मंत्रों का उच्चारण वैदिक अनुष्ठानों में किया जाता है। इस अर्पण को इस चेतना के साथ क्रियान्वित करना चाहिए कि हम जो भी कार्य करते हैं वे सब भगवान के सुख के लिए हैं। यह कहकर कि सभी कार्य भगवान को अर्पित करने चाहिए, अब श्रीकृष्ण इसके लाभों की व्याख्या करेंगे।
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै: |
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि || 28||
इस प्रकार सभी कार्य मुझे समर्पित करते हुए तुम शुभ और अशुभ फलों के बंधन से मुक्त रहोगे। इस वैराग्य द्वारा मन को मुझ में अनुरक्त कर तुम मुक्त होकर मेरे पास आ पाओगे।
सभी कार्य दोषों से युक्त होते हैं, जैसे अग्नि धुएँ से ढकी होती है। जब हम धरती पर चलते है तब हम अनजाने में लाखों अणु जीवों को मारते हैं। अभी भी हम पर्यावरण को दूषित करने और दूसरों को दु:खी करने में लगे रहते हैं। यहाँ तक कि यदि हम एक कटोरी दही का सेवन करते हैं तब भी हम उसमें व्याप्त जीवों को मारने का पाप अर्जित करते हैं। कुछ धर्मों के संत मुँह पर पट्टी बाँध कर अहिंसा को कम करने का प्रयत्न करते हैं किन्तु इसे पूर्ण रूप से समाप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि हमारी श्वासों से भी इन जीवों का विनाश होता है।
कर्म के नियम के अनुसार हमें अपने कर्म का फल भोगना ही पड़ता है। पुण्य कर्म भी बंधन का कारण हैं क्योंकि वे जीवात्मा को अपने कर्मों का फल भोगने के लिए स्वर्ग जाने के लिए विवश करते हैं। इस प्रकार शुभ और अशुभ कर्मों का परिणाम निरन्तर जन्म और मृत्यु के चक्र में घूमना है। फिर भी श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में सभी कर्मों के फलों को नष्ट करने का सरल उपाय बताया है। उन्होंने 'संन्यास योग' शब्द प्रयोग किया है जिसका अर्थ स्वार्थ को त्यागना है। वे कहते हैं कि जब हम अपने कर्मों को भगवान के सुख के लिए समर्पित करते हैं तब हम शुभ और अशुभ परिणामों के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं जो अपने भीतर ऐसी चेतना विकसित कर लेते हैं उन्हें 'योग युक्तात्मा' कहा जाता है। ऐसे योगी जीवन मुक्त हो जाते हैं और नश्वर शरीर को छोड़ने पर उन्हें दिव्य शरीर और भगवान के दिव्य धाम में नित्य सेवा प्राप्त होती है।
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय: |
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् || 29||
मैं समभाव से सभी जीवों के साथ व्यवहार करता हूँ न तो मैं किसी के साथ द्वेष करता हूँ और न ही पक्षपात करता हूँ लेकिन जो भक्त मेरी प्रेममयी भक्ति करते हैं, मैं उनके हृदय में और वे मेरे हृदय में निवास करते हैं।
हम यह मानते हैं कि यदि कोई भगवान है तो वह अवश्य न्यायी होगा क्योंकि कोई भी अन्यायी भगवान नहीं बन सकता। संसार में अन्याय से पीड़ित लोग यह कहते हैं-'करोड़पति महोदय आप के पास धन की शक्ति है। तुम चाहे जो भी कर लो, भगवान ही हमारे विवाद का निर्णय करेगा। वह सब देख रहा है, तुम्हें अवश्य दण्ड देगा। तुम उसके प्रकोप से बच नहीं सकते।' इस प्रकार के कथन यह नहीं दर्शाते कि ऐसा कहने वाला व्यक्ति कोई संत होगा क्योंकि साधारण मनुष्य भी यह विश्वास करते हैं कि भगवान पूर्ण न्यायी है। किन्तु पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण के वचन यह संदेह उत्पन्न करते हैं कि भगवान अपने भक्त का पक्ष लेते हैं। जब सब कुछ कर्म के नियम के अधीन होता है तब फिर भगवान अपने भक्तों को इससे मुक्त क्यों करते हैं? क्या यह पक्षपात का लक्षण नहीं है?
श्रीकृष्ण ने इस विषय को स्पष्ट करना आवश्यक समझते हुए इस श्लोक का आरम्भ 'समोऽहं' शब्द से किया है जिसका अर्थ 'नहीं' है। 'नहीं, नहीं, मैं सबके लिए समान हूँ किन्तु मेरा एक ऐसा नियम है जिसके अन्तर्गत मैं अपनी कृपा बरसाता हूँ।" इस नियम की व्याख्या चौथे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में की गयी है। “हे कुन्ती पुत्र! लोग जिस भाव से मेरे शरणागत होते है, मैं तदानुसार उन्हें प्रतिफल देता हूँ।" वर्षा का जल धरती पर समान रूप से गिरता है। यदि उसकी बूंद किसी खेत पर पड़ती है तब वे अन्न में परिवर्तित हो जाती है। यदि उसकी बूंदें रेगिस्तान की झाड़ी पर पड़ती है तब वह कांटेदार झाड़ी में परिवर्तित हो जाती है। और जब ये बूंदें गंदे नाले में गिरती है तब गंदे पानी में परिवर्तित हो जाती हैं। इस प्रकार वर्षा के जल की ओर से कोई पक्षपात नहीं किया जाता क्योंकि वह भूमि पर अपनी कृपा समान रूप से बरसाती हैं। वर्षा की बूंदों को विभिन्न प्रकार के परिणामों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। ये परिवर्तन प्राप्त करने वाले की प्रकृति के अनुरूप होते हैं। समान रूप से यहाँ भगवान कहते हैं कि मैं सभी प्राणियों के साथ समान व्यवहार करता हूँ किन्तु फिर भी जो उनसे प्रेम नहीं करते वे उनकी कृपा से वंचित रहते हैं क्योंकि उनके अन्तःकरण अशुद्ध होते हैं। श्रीकृष्ण अब भक्ति की शक्ति को बतायेंगे।
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् |
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स: || 30|
यदि कोई महापापी भी अनन्य भक्ति के साथ मेरी उपासना में लीन रहता है तब उसे साधु मानना चाहिए क्योंकि वह अपने संकल्प में दृढ़ रहता है
परम प्रभु के प्रति की जाने वाली भक्ति में इतनी शक्ति होती है कि वह महापापी का भी हृदय परिवर्तित कर देती है। धार्मिक ग्रंथों में इसका उत्तम उदाहरण अजामिल और वाल्मीकि हैं जिनकी कथाएँ प्रायः सभी जगह गायी जाती हैं। वाल्मीकि के पापों की गठरी इतनी भारी थी कि वह दो अक्षर के नाम 'राम' का उच्चारण नहीं कर सका। उसके पाप उसे दिव्य नाम लेने से रोक रहे थे। इसलिए उसके गुरु ने उसे भक्ति में तल्लीन होने का उपाय सुझाते हुए उसे उल्टा नाम 'मरा' जपने को कहा। इसके पीछे यह धारणा थी कि बार बार 'मरा-मरा-मरा-मरा' का उच्चारण करने से 'राम-राम-राम-राम' की ध्वनि स्वतः उत्पन्न होगी। परिणामस्वरूप वाल्मीकि नाम की एक पापात्मा अनन्य भक्ति के परिणामस्वरूप महान संत के रूप में परिवर्तित हो गयी।
उलटा नाम जपत जग जाना।
बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।।
(रामचरितमानस)
"समूचा संसार इस तथ्य का साक्षी है कि भगवान के नाम को उलटे क्रम में उच्चारण करने वाले वाल्मीकि सिद्ध संत कहलाये।" इसलिए पापियों को अनन्त काल तक नरकवास नहीं दिया जाता। भक्ति की शक्ति के संबंध में श्रीकृष्ण उद्घोषणा करते हैं कि यदि महापापी लोग भी भगवान की अनन्य भक्ति करना प्रारम्भ करते हैं तब फिर वे कभी पापी नहीं कहलाते। वे शुद्ध संकल्प धारण कर लेते हैं और इस प्रकार वे धर्मात्मा बन जाते हैं।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति |
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति || 31||
वे शीघ्र धार्मात्मा बन जाते हैं और चिरस्थायी शांति पाते हैं। हे कुन्ती पुत्र! निडर हो कर यह घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी पतन नहीं होता।
केवल उचित संकल्प कर लेने मात्र से भक्त कैसे पूज्य माने जा सकते हैं? श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि यदि वे निरन्तर भगवान की अनन्य भक्ति में अटूट श्रद्धा रखते हैं तब उनका हृदय शुद्ध हो जाएगा और वे सहजता से संतों के गुण विकसित कर लेंगे। दिव्य गुण भगवान से प्रकट होते हैं। वे पूर्णतया न्यायी, सच्चे, करुणामय, प्रिय, दयावान इत्यादि हैं। चूँकि हम जीवात्माएँ उनके अणु अंश हैं इसलिए स्वाभाविक रूप से हम भी इन्हीं गुणों की ओर आकर्षित होते हैं, लेकिन सद्गुणी बनने की प्रक्रिया जटिल ही है। बचपन से हम यह सुनते रहते हैं कि हमें सदा सत्य बोलना चाहिए, दूसरों की सेवा करनी चाहिए और काम क्रोध इत्यादि से मुक्त रहना चाहिए किन्तु फिर भी हम इन शिक्षाओं को व्यावहारिक रूप से अपनाने में असमर्थ रहते हैं। इसका स्पष्ट कारण हमारे मन का अशुद्ध होना है। मन के शुद्धिकरण के बिना दोषों का उन्मूलन पूर्ण रूप से नहीं हो सकता। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने इस दिव्य गुण को विकसित करने के विषय में कहा है -
सत्य अहिंसा आदि मन! बिन हरिभजन न पाय।
जल ते घृत निकले नहीं, कोटिन करिय उपाय।।
(भक्ति शतक-35)
"चाहे कितना भी प्रयत्न क्यों न करें, जल से घी नहीं निकल सकता। उसी प्रकार से सत्य, अहिंसा और अन्य सद्गुण भक्ति में तल्लीन हुए बिना नहीं पाये जा सकते।" ये गुण तभी प्रकट होते हैं जब मन शुद्ध हो जाता है और मन की शुद्धि परम शुद्ध सच्चिदानंद भगवान में अनुरक्त हुए बिना नहीं हो सकती। आगे भगवान अर्जुन को निर्भीक होकर यह घोषणा करने को कहते हैं कि उनके भक्त का कभी पतन नहीं होता। वह यह नहीं कहते कि 'ज्ञानी का पतन नहीं होता और न ही वह यह कहते हैं कि कर्मी (कर्मकाण्ड का पालन करने वाला) का पतन नहीं होता, वे केवल अपने भक्तों को वचन देते हैं कि उनका कभी विनाश नहीं होता।' इस प्रकार वे पुनः वही कहते हैं जो उन्होंने इस अध्याय के बाइसवें श्लोक में कहा है कि वे उनकी अनन्य भक्ति में लीन भक्तों की रक्षा का दायित्व अपने ऊपर लेते हैं। यह भी एक रहस्य सा है कि श्रीकृष्ण यह घोषणा स्वयं करने के स्थान पर अर्जुन को यह घोषणा करने के लिए क्यों कहते हैं? इसका कारण यह है कि विशेष परिस्थितियों में भगवान को कई बार अपना वचन भंग करना पड़ता है किन्तु वह यह नहीं चाहते कि उनका भक्त कभी विवश होकर अपना वचन भंग करे।
उदाहरणार्थ श्रीकृष्ण ने यह संकल्प लिया था कि वे महाभारत के युद्ध के दौरान शस्त्र नहीं उठाएँगे किन्तु जब भीष्म पितामह जिन्हें उनका परम भक्त माना जाता है, ने यह संकल्प लिया कि वह अगले दिन सूर्य अस्त होने तक अर्जुन का वध करेंगे या फिर श्रीकृष्ण को उसकी रक्षा हेतु शस्त्र उठाने के लिए विवश कर देंगे। श्रीकृष्ण ने भीष्म की प्रतिज्ञा की रक्षा हेतु अपने वचन को भंग कर दिया। इसलिए अपने कथन की पुनः पुष्टि के लिए श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं-"अर्जुन तुम यह घोषणा करो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता और मैं तुम्हें आश्वासन देता हूँ कि तुम्हारे वचन का पालन होगा।"
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय: |
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् || 32||
वे सब जो मेरी शरण ग्रहण करते हैं भले ही वे जिस कुल, लिंग, जाति के हों और भले ही समाज से तिरस्कृत ही क्यों न हों, वे परम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।
कुछ जीवात्माओं को ऐसे परिवारों में जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त होता है जहाँ उन्हें बचपन से उच्च आदर्श और सदाचारी जीवनयापन की शिक्षा दी जाती है। यह सौभाग्य पूर्व जन्मों के शुभ कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त होता है। किन्तु कुछ जीवात्माओं को दुर्भाग्य से अपराधियों, जुआरियों और नास्तिकों के परिवारों में जन्म मिलता है। यह दुर्भाग्य भी पूर्व जन्म में किए गए पाप कर्मों के कारण प्राप्त होता है।
यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि किसी भी जाति, लिंग, कुल में जन्म लेने के पश्चात् भी जो उनकी पूर्ण शरणागति प्राप्त करता है वह अपने लक्ष्य को पा लेगा। भक्ति मार्ग की ऐसी महानता है कि सभी लोग इसका पालन करने के योग्य होते हैं जबकि अन्य मार्गों का अनुसरण करने की योग्यता प्राप्त करने हेतु कठोर मापदण्ड निश्चित किए गये हैं। जगद्गुरु शंकराचार्य ने ज्ञान के मार्ग का अनुसरण की पात्रता का वर्णन इस प्रकार से किया है
विवेकिनो विरक्तस्य शमादिगुण-शालिनः।
मुमुक्षोरेव हि ब्रह्मजिज्ञासायोग्यता मताः।।
"केवल वे लोग जो विवेक, विरक्ति, शमादि गुण तथा मुमुक्षा से सम्पन्न होते हैं, उन्हीं लोगों को ज्ञान मार्ग का अनुसरण करने का अधिकारी माना जाता है।" वैदिक कर्मकाण्डों में इसकी पात्रता के लिए छः मापदण्डों का उल्लेख किया गया है। वैदिक कर्मकाण्डों के अनुपालन के लिए निम्नांकित छः मापदण्डों का पालन करना आवश्यक हैः
देशे काले उपायेन द्रव्यं श्रद्धा-समन्वितम्।
पात्रे प्रदीयते यत्तत् सकलं धर्म-लक्ष्णम्।।
"उपयुक्त स्थान, उपयुक्त समय, उपयुक्त प्रक्रिया और मंत्रों का शुद्ध उच्चारण, शुद्ध सामग्री का प्रयोग, यज्ञ करने वाले ब्राह्मण की योग्यता और उसकी दक्षता में पक्का विश्वास होना।" इसी प्रकार से अष्टांग योग के मार्ग के लिए भी कड़े नियम निर्धारित किए गए हैं।
शचौ देशे प्रतिष्ठाप्य
(श्रीमद्भागवतम्-3.28.8)
"हठ योग के अभ्यास हेतु शुद्ध स्थान पर उपयुक्त आसन में स्थिर बैठना आवश्यक है।" इसकी अपेक्षा भक्ति योग एक ऐसा योग है जिसका पालन किसी समय, स्थान, परिस्थितियों और किसी भी सामग्री के साथ किया जा सकता है।
न देश-नियमस्तस्मिन् न काल-नियमस्तथा।।
(पद्मपुराण)
इस श्लोक में वर्णन है कि भगवान भक्ति करने वाले स्थान के संबंध में कोई चिंता नहीं करते। वे केवल हृदय का प्रेम भाव देखते हैं। सभी जीव भगवान की संतान हैं। भगवान अपनी दोनों भुजाओं को फैलाए सभी को स्वीकार करना चाहते हैं यदि हम विशुद्ध प्रेम के साथ उनकी ओर अग्रसर होते हैं।
किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा |
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् || 33||
फिर पुण्य कर्म करने वाले राजर्षियों और धर्मात्मा ज्ञानियों के संबंध में कहना ही क्या है। इसलिए इस अनित्य और आनन्द रहित संसार में आकर मेरी भक्ति में लीन रहो।
यदि अति नृशंस पापी को भी भक्ति मार्ग में सफलता के लिए आश्वस्त किया जाता है तब फिर अधिक पात्रता प्राप्त जीवात्माओं को इस पर संदेह क्यों ही करना चाहिए? राजा और ज्ञानियों को तो अनन्य भक्ति में तल्लीनता द्वारा लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रति और अधिक आश्वस्त होना चाहिए। श्रीकृष्ण अर्जुन को संकेत करते हैं-"तुम जैसे राजर्षि को इस ज्ञान में स्थित होना चाहिए कि संसार अस्थायी और कष्टदायी है। दृढ़ता से मेरी भक्ति में लीन रहो और नित्य असीम आनन्द में मगन रहो अन्यथा राजपरिवार और ऋषि कुलों की उत्तम शिक्षा, सुख सुविधाएँ और अनुकूल परिवेश व्यर्थ हो जाएँगे, यदि तुम इनका उपयोग परम लक्ष्य प्राप्त करने के प्रयोजनार्थ नहीं करते।"
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण: || 34||
सदैव मेरा चिन्तन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो। अपने मन और शरीर को मुझे समर्पित करने से तुम निश्चित रूप से मुझको प्राप्त करोगे।
इस पूरे अध्याय में भक्ति मार्ग का अनुसरण करने पर बल देते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन से उनका भक्त बनने के सुझाव अनुनय-विनय के साथ इसका समापन करते हैं। वे अर्जुन को कहते हैं कि भगवान की भक्ति करते हुए, मन को उनके दिव्य रूप ध्यान में तल्लीन कर और पूर्ण दीनता के भाव से उनके प्रति सच्ची श्रद्धा व्यक्त करते हुए अपनी चेतना को भगवान में एकीकृत करना ही वास्तविक 'योग' है। ‘नमस्कुरु' विनम्रता का ऐसा भाव होता है जो वास्तव में अहंभाव को निष्प्रभावी करता है। यह भाव भक्ति में लीन होने के दौरान उदय होता हैं। इस प्रकार हृदय को भक्ति में निमग्न कर अहंकार रहित होकर मनुष्य को अपने सभी विचारों और कर्मों को भगवान के प्रति समर्पित कर देना चाहिए। श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि भक्ति योग के द्वारा उनके साथ ऐसे पूर्ण समागम के परिणामस्वरूप निश्चित रूप से भगवत्प्राप्ति होती है। इस संबंध में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।
।। श्रीमद्भगवत गीता नवम अध्याय सम्पूर्ण।।
Bhagavad Geeta Chapter 8
kathaShrijirasik
अध्याय आठ: अक्षर ब्रह्म योग
अविनाशी भगवान का योग
यह अध्याय संक्षेप में कुछ महत्वपूर्ण अवधारणाओं का वर्णन करता है जिनका उपनिषदों में विस्तार से उल्लेख किया गया है। इसमें यह वर्णन भी किया गया है कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा के गन्तव्य का निर्धारण किस प्रकार से होता है।
देह का त्याग करते समय यदि हम भगवान का स्मरण करते हैं तब हम निश्चित रूप से उन्हें पा लेंगे। इसलिए अपने दैनिक कार्यों को सम्पन्न करने के साथ-साथ हमें सदैव उनकी विशेषताओं, गुणों और दिव्य लीलाओं का चिन्तन करना चाहिए। जब हम अनन्य भक्ति से अपने मन को भगवान में पूर्णतया तल्लीन कर लेते हैं तब हम भौतिक आयामों से परे आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं। तत्पश्चात् इस अध्याय में भौतिक क्षेत्र में स्थित कुछ लोकों की चर्चा की गयी है। इसमें बताया गया है कि सृष्टि में ये लोक और इन पर निवास करने वाले असंख्य प्राणी कैसे इनमें प्रकट होते हैं और प्रलय के समय पुनः अव्यक्त हो जाते हैं। किन्तु इस व्यक्त और अव्यक्त सृष्टि से परे भगवान का दिव्य लोक है। वे जो प्रकाश के मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे अंततः दिव्यलोक में पहुँचते हैं और फिर कभी नश्वर संसार में लौट कर नहीं आते जबकि अंधकार के मार्ग का अनुसरण करने वाले लोग जन्म, रोग, बुढ़ापे और मृत्यु के चक्रों में घूमते रहते हैं
अर्जुन उवाच |
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम |
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते || 1||
अधियज्ञ: कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन |
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभि: || 2||
अर्जुन ने कहाः हे भगवान! 'ब्रह्म' क्या है? 'अध्यात्म' क्या है और कर्म क्या है? 'अधिभूत' को क्या कहते हैं और 'अधिदैव' किसे कहते हैं? हे मधुसूदन। अधियज्ञ कौन है और यह अधियज्ञ शरीर में कैसे रहता है? हे कृष्ण! दृढ़ मन से आपकी भक्ति में लीन रहने वाले मृत्यु के समय आपको कैसे जान पाते हैं?
सातवें अध्याय का उपसंहार करते समय भगवान ने ब्रह्म, अधिभूत, अध्यात्म, अधिदैव, अधियज्ञ जैसे शब्दों का उल्लेख किया था। अर्जुन इन शब्दों के संबंध में और अधिक जानने के लिए उत्सुक है इसलिए उसने इन दो श्लोकों में सात प्रश्न पूछे हैं। इनमें से छः प्रश्न श्रीकृष्ण द्वारा उल्लिखित शब्दों से संबंधित है। सातवाँ प्रश्न मृत्यु के संबंध में है। श्रीकृष्ण ने स्वयं इस विषय को श्लोक 7.30 में उठाया था। अर्जुन अब यह जानना चाहता है कि मृत्यु के क्षण कोई भगवान का स्मरण कैसे कर सकता है।
श्रीभगवानुवाच |
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते |
भूतभावोद्भवकरो विसर्ग: कर्मसञ्ज्ञित: || 3||
परम कृपालु भगवान ने कहाः परम अविनाशी सत्ता को ब्रह्म कहा जाता है। मनुष्य की अपनी आत्मा को अध्यात्म कहा जाता है। प्राणियों के दैहिक कर्मों और उनकी विकास प्रक्रिया को कर्म या सकाम कर्म कहा जाता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि परम सत्ता को ब्रह्म कहा जाता है। वेदों में भगवान के कई नामों का उल्लेख किया गया है। उनमें से एक नाम ब्रह्म है जो स्थान, समय, घटनाक्रमों और उसके परिणामों तथा कर्म और कर्मफल के बंधनों से परे है। ये सब तो भौतिक संसार के लक्षण हैं जबकि ब्रह्म लौकिक सृष्टि से परे है। वह ब्रह्माण्ड के परिवर्तनों से भी प्रभावित नहीं होता और अविनाशी है। इसलिए इसे अक्षर कहा गया है। बृहदारण्यकोपनिषद् 3.8.8 में ब्रह्म को इसी प्रकार से व्यक्त किया है। विद्वज्जन ब्रह्म को 'अक्षर' कहते हैं। इसे 'परम' नाम भी दिया गया है क्योंकि वह ऐसे गुणों का स्वामी है जो माया और जीवात्मा से परे हैं। आत्मा के विज्ञान को अध्यात्म कहा गया है। किन्तु यहाँ इस शब्द का प्रयोग जीवात्मा के लिए किया गया है जिसमें आत्मा, शरीर, मन और बुद्धि सम्मिलित हैं। कर्म शरीर द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले कार्य हैं जो जीवात्मा को जीवन की विचित्र परिस्थिति में फँसा देते हैं। ये कर्म जीवात्मा को जीवन-मरण के चक्र में डाल देते हैं।
अधिभूतं क्षरो भाव: पुरुषश्चाधिदैवतम् |
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर || 4||
हे देहधारियों में श्रेष्ठ! भौतिक अभिव्यक्ति जो निरन्तर परिवर्तित होती रहती है उसे अधिभूत कहते हैं। भगवान का विश्व रूप जो इस सृष्टि में देवताओं पर भी शासन करता है उसे अधिदैव कहते हैं। सभी प्राणियों के हृदय में स्थित, मैं परमात्मा अधियज्ञ या सभी यज्ञों का स्वामी कहलाता हूँ।
पाँच तत्त्वों-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को मिलाकर बहुरूपदर्शक ब्रह्माण्ड अधिभूत कहलाता है। विराट पुरुष जो भगवान का समस्त भौतिक सृष्टि में व्याप्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय स्वरूप है वह अधिदैव कहलाता हैं, क्योंकि सभी देवताओं पर उसका आधिपत्य है एवं जो ब्रह्माण्ड के विभिन्न कार्यों-विभागों के प्रशासक भी हैं। परम पुरुषोत्तम पुरुष जो सभी जीवों के हृदय में परमात्मा के रूप में निवास करते हैं उन्हें अधियज्ञ कहा जाता है। सभी यज्ञ उनकी संतुष्टि के लिए सम्पन्न किए जाते हैं। इस प्रकार से वे सभी यज्ञों की दिव्यता और प्रतिष्ठा हैं और केवल वही सभी कर्मों का फल प्रदान करते हैं।
इस श्लोक और पिछले श्लोक में अर्जुन के छः प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। आगे कुछ श्लोकों में मृत्यु के क्षण से संबंधित प्रश्नों का उत्तर दिया गया है।
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् |
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय: || 5||
वे जो शरीर त्यागते समय मेरा स्मरण करते हैं, वे मेरे पास आएँगे। इस संबंध में निश्चित रूप से कोई संदेह नहीं है।
अगले श्लोक में श्रीकृष्ण इस सिद्धान्त की व्याख्या करेंगे कि मृत्यु के समय मनुष्य की चेतनावस्था और तन्मयता का भाव उसके अगले जन्म का निर्धारण करता है। इसलिए यदि कोई मृत्यु के समय मन को भगवान के दिव्य नाम, रूप, गुण, लीलाओं और भगवान के लोकों में तल्लीन रखता है तब वह भगवत्प्राप्ति के अपने मनवांछित लक्ष्य को पा लेगा। श्रीकृष्ण ने 'मत्-भावम्' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ 'भगवान जैसी प्रकृति' होने से है। इस प्रकार मृत्यु के समय यदि किसी की चेतना भगवान में लीन होती है तब वह उन्हें पा लेता है और भगवान जैसा बन जाता है।
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् |
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित: || 6||
हे कुन्ती पुत्र! मृत्यु के समय शरीर छोड़ते हुए मनुष्य जिसका स्मरण करता है वह उसी गति को प्राप्त होता है क्योंकि वह सदैव ऐसे चिन्तन में लीन रहता है।
हम एक तोते को 'शुभ प्रभात' बोलने के लिए शिक्षित करने में तो सफल हो सकते हैं किन्तु यदि उसका गला जोर से दबा देते हैं तब वह भूल जाएगा कि उसने कृत्रिम रूप से क्या सीखा है और फिर अपनी स्वाभाविक भाषा में 'कैंऽऽ' बोलेगा। समान रूप से मृत्यु के समय हमारा मन स्वाभाविक रूप से विचारों की शृंखलाओं द्वारा प्रवाहित होता है जो दीर्घकालीन प्रवृत्ति के द्वारा रचित होते हैं। हमारी यात्रा की योजना का निर्णय उस समय नहीं लिया जाता जब यात्रा अगले ही दिन हो बल्कि इसके लिए पहले से सुविचारित योजना और उसके क्रियान्वयन की आवश्यकता होती है।
मृत्यु के क्षण किसी पर जो विचार प्रमुख रूप से हावी होते हैं उसी के अनुसार अगला जन्म निर्धारित होता है। यही सब श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में व्यक्त किया है। कोई व्यक्ति अपनी प्रवृत्तियों और संगत के प्रभाव के अनुसार अपने जीवनकाल में निरन्तर जिसका चिन्तन करता है और जिस पर अपना ध्यान एकाग्र करता है उसी के अनुसार स्वभाविक रूप से उसके अंतिम विचारों का निर्धारण होता है। पुराणों में भरत महाराज की कथा का वर्णन मिलता है। वह एक राजा थे किन्तु उन्होंने राज्य त्याग दिया और तपस्वी के भेष में वन में जाकर भगवत्प्राप्ति के लिए साध ना करने लगे।
एक दिन उन्होंने एक गर्भवती हिरणी को सिंह की गर्जना सुनने पर नदी में छलाँग लगाते हुए देखा। भय के कारण गर्भवती हिरणी ने बच्चे को जल में ही जन्म दिया और वह डूबने लगा। भरत को हिरणी के उस बच्चे पर दया आई और उन्होंने उसे डूबने से बचा लिया। वह उसे अपनी कुटिया में ले आए और उसका पालन-पोषण करने लगे। वह अति अनुराग के साथ उसकी चंचल क्रीड़ाओं का अवलोकन करते हुए प्रसन्न होते और उसके साथ लाड़-प्यार करते। वह उसके लिए घास इकट्ठी करके लाते और प्रेम से उसे खिलाते। उसे गर्म रखने के लिए अपने से चिपटाए रखते। धीरे-धीरे उनका मन भगवान से विमुख होकर हिरणी के उस बच्चे में आसक्त हो गया। यह आसक्ति इतनी गहन हो गयी कि वे पूरे दिन हिरण के बच्चे के स्मरण में खोये रहते और यह चिंता करने लगे कि उनकी मृत्यु के पश्चात् उसका क्या होगा।
परिणामस्वरूप अगले जन्म में भरत महाराज को हिरण का जन्म मिला। किन्तु उन्होंने पूर्व जन्म में आध्यात्मिक साधना कर रखी थी और उन्हें अपने पिछले जन्म की भूल का ज्ञान था। इसलिए हिरण होते हुए भी वह वन में संत पुरुषों के आश्रम के आस-पास ही रहते थे। अन्ततः जब उन्होंने हिरण के शरीर का त्याग किया तो उन्हें पुनः मनुष्य जन्म मिला। फिर वह महान संत जड़ भरत बने और अपनी साधना पूर्ण कर इन्होंने भगवत्प्राप्ति की।
इस श्लोक को पढ़कर किसी को यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि केवल मृत्यु के समय भगवान का ध्यान कर हम उन्हें पा सकते हैं। स्कन्ध पुराण में उल्लेख है कि मृत्यु के क्षणों में भगवान का स्मरण करना अत्यंत कठिन है।
मृत्यु एक पीड़ादायक अनुभव है इसलिए उस समय मन स्वाभाविक रूप से किसी की आंतरिक प्रकृति के अनुसार पूर्व निर्मित विचारों की ओर आकर्षित हो जाता है। मन में भगवान का चिन्तन करने के लिए किसी की आंतरिक प्रकृति का भगवान के साथ एकीकृत होना आवश्यक होता
चेतना आंतरिक प्रकृति है जो किसी के मन और बुद्धि के साथ टिकी रहती है। यदि हम किसी का निरन्तर चिन्तन करते हैं तब वह हमारी आंतरिक प्रकृति के अंश के रूप में प्रकट होता है। अन्तकाल में भगवच्चेतना विकसित करने के लिए जीवन के प्रत्येक क्षण में भगवान का स्मरण और चिन्तन करना आवश्यक है। इन सबका वर्णन श्रीकृष्ण अगले श्लोक में करेंगे।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च |
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् || 7||
इसलिए सदा मेरा स्मरण करो और युद्ध लड़ने के अपने कर्त्तव्य का भी पालन करो, अपना मन और बुद्धि मुझे समर्पित करो तब तुम निचित रूप से मुझे पा लोगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।
इस श्लोक की प्रथम पंक्ति भगवद्गीता के उपदेशों का सार है। इसमें हमारे जीवन को दिव्य बनाने की शक्ति निहित है। यह कर्मयोग की परिभाषा को भी स्पष्ट करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं- "अपने मन को मुझमें अनुरक्त रखो और शरीर से अपने सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते रहो।" यह उपदेश सभी व्यवसाय के लोगों, डॉक्टर, इंजीनियर, अधिवक्ताओं, गृहिणियों पर लागू होता है। विशेष रूप से अर्जुन के संदर्भ में जो एक योद्धा है और युद्ध लड़ना जिसका धर्म है। इसलिए उसे मन भगवान में अनुरक्त कर अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करने का उपदेश दिया गया है। कुछ लोग इस तर्क के आधार पर अपने लौकिक कर्त्तव्यों की उपेक्षा करते हैं कि उन्होंने आध्यात्मिक जीवन धारण कर लिया है। कुछ आध्यात्मिकता के अभ्यास से छुटकारा पाने हेतु सांसारिक कार्य-कलापों में व्यस्त रहने का बहाना करते हैं। लोग यह मानते हैं कि अध्यात्मवाद और भौतिकवाद परस्पर विरोधी हैं। लेकिन भगवान मनुष्य को शुद्धिकरण का उपदेश देते हैं।
जब हम कर्मयोग का अभ्यास करते हैं तब सांसारिक कार्य कोई बाधा उत्पन्न नहीं कर सकते क्योंकि उनमें शरीर ही व्यस्त होता है लेकिन मन भगवान में अनुरक्त होता है। तब ये कार्य किसी को कर्म के नियम में नहीं बाँध सकते। केवल उन्हीं कार्यों के परिणाम होते हैं जिन्हें आसक्ति के साथ किया जाता है। ऐसी आसक्ति न होने पर सांसारिक नियम भी किसी को दोषी नहीं ठहरा सकते। उदाहरणार्थ एक व्यक्ति ने किसी अन्य व्यक्ति को मार डाला और उसे न्यायालय में ले जाया गया। न्यायाधीश ने पूछा-'क्या आपने उस व्यक्ति को मारा?' उस व्यक्ति ने उत्तर दिया-'हाँ मान्यवर! इस मामले में किसी प्रकार के साक्ष्य की आवश्यकता नहीं है। मैं स्वीकार करता हूँ कि मैने उस व्यक्ति को मारा।' न्यायाधीश ने कहा 'तुम्हें दण्ड मिलना चाहिए।' 'नहीं मान्यवर! आप मुझे दण्डित नहीं कर सकते' न्यायाधीश ने पूछा क्यों? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया-'मेरा उसे मारने का कोई प्रयोजन नहीं था। मैं सड़क पर उचित दिशा में निर्धारित गति सीमा में कार चला रहा था और मेरी दृष्टि सामने की ओर ही थी। मेरी कार के ब्रेक, स्टेयरिंग आदि सब कुछ ठीक थे। वह व्यक्ति अचानक सामने आकर मेरी कार से टकरा गया तब उस स्थिति में मैं क्या कर सकता था।' यदि आरोपी व्यक्ति का वकील यह सिद्ध कर दे कि उस दुर्घटना में हत्या का कोई इरादा नहीं था तब न्यायाधीश उस व्यक्ति को बिना कोई साधारण दण्ड दिए आरोप मुक्त कर देगा।
उपर्युक्त उदाहरण के अनुसार भौतिक जगत में भी हमें उन कार्यों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता जिन्हें हम बिना आसक्ति के सम्पन्न करते हैं। कर्म नियम के लिए भी समान सिद्धान्त लागू होता है। इसलिए महाभारत के युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण के उपदेशों का अनुसरण करते हुए अर्जुन ने युद्ध क्षेत्र में अपने कर्त्तव्य का निर्वहन किया। युद्ध समाप्त होने पर श्रीकृष्ण ने कहा कि अर्जुन ने कोई पाप कर्म नहीं किया। वह कर्म बंधन में तब उलझ गया होता जब वह आसक्ति सहित सांसारिक सुखों और यश प्राप्ति के लिए युद्ध कर रहा होता। चूँकि उसका मन श्रीकृष्ण में अनुरक्त था और इसलिए वह जो कर रहा था वह शून्य को गुना करने के समान था। इसका तात्पर्य संसार में आसक्ति रहित अपने कर्तव्य का पालन करना है। अगर हम 10 लाख को शून्य से गुणा करते हैं तब उसका उत्तर शून्य ही होगा।
इस श्लोक में कर्मयोग की अति स्पष्ट व्याख्या की गयी है जिसके अनुसार मन को निरन्तर भगवान के चिन्तन में तल्लीन रखना चाहिए। जिस क्षण मन भगवान को विस्मृत कर देता है उस समय माया की सेना के बड़े-बड़े सेना नायक काम, क्रोध, ईष्या, द्वेष, आदि उस पर आक्रमण कर देते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि मन सदैव भगवान में अनुरक्त रहे। प्रायः लोग कर्मयोगी होने का दावा करते हैं क्योंकि वे कहते हैं कि वे कर्म और योग दोनों का पालन करते हैं। पूरे दिन में अधिकांश समय वे कार्य करते हैं और कुछ क्षणों के लिए योग (भगवान की साधना) करते हैं। किन्तु यह श्रीकृष्ण द्वारा दी गयी कर्मयोग की परिभाषा नहीं है। वे कहते हैं-(1) कार्य करते समय भी मन को भगवान के चिन्तन में लगाया जाना चाहिए। (2) भगवान का स्मरण रुक-रुक कर नहीं होना चाहिए बल्कि निरन्तर किया जाना चाहिए। संत कबीर ने अपने प्रसिद्ध दोहे में इसे इस प्रकार से व्यक्त किया है-
सुमिरन की सुधि यों करो, ज्यौं गागर पनिहार।
बोलत डोलत सुरति में, कहे कबीर विचार ।।
भगवान का स्मरण उसी प्रकार से करो, जैसे कि गाँव की महिलाएँ सिर पर रखे मटके का करती हैं। वे परस्पर वार्तालाप करते हुए अपने मार्ग पर आगे बढ़ती जाती हैं लेकिन उनका मन सिर पर उठाए हुए मटके पर केन्द्रित रहता है। श्रीकृष्ण कर्म योग के पालन के लाभों का वर्णन अगले श्लोक में करेंगे।
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना |
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् || 8||
हे पार्थ! अभ्यास के द्वारा जब तुम अविचलित भाव से मन को मुझ पुरुषोत्तम भगवान के स्मरण में लीन करोगे तब तुम निश्चित रूप से मुझे पा लोगे।
मन को सदैव भगवान की साधना में तल्लीन रखने का उपदेश गीता में अनेक बार दोहराया गया है। यहाँ इस संबंध में कुछ श्लोक निम्नांकित हैं-
1. अनन्यचेताः सततं 8.14
2. मय्येव मन आधत्स्व 12.8
3. तेषां सततयुक्तानां 10.10
अभ्यास शब्द से तात्पर्य मन को भगवान की साधना में अभ्यस्त करने से है। ऐसा अभ्यास केवल निर्धारित समय पर नहीं किया जाना चाहिए अपितु निरन्तर दैनिक जीवन के कार्य कलापों के साथ करना चाहिए। यदि मन भगवान में अनुरक्त हो जाता है तब सांसारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए भी मन शुद्ध हो जाता है। यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि हम अपने मन में जो सोचते हैं उसी से हमारे भविष्य का निर्माण होता है न कि शरीर से सम्पन्न की गयी गतिविधियों द्वारा। यह मन ही है जिसे भक्ति में तल्लीन होना है और मन को ही भगवान के प्रति शरणागत होना है। जब चेतना का पूर्ण रूप से भगवान में समावेश हो जाता है तभी कोई दिव्य कृपा प्राप्त करेगा। भगवान की कृपा प्राप्त कर ही कोई माया के बंधनों से मुक्त हो पाएगा। असीम दिव्य आनंद, दिव्य ज्ञान और दिव्य प्रेम प्राप्त करेगा। ऐसी पुण्य आत्मा इसी शरीर में भगवद्प्राप्ति कर लेगी और शरीर त्यागने पर भगवान के लोक में प्रवेश करेगी।
कविं पुराणमनुशासितार
मणोरणीयांसमनुस्मरेद्य: |
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप
मादित्यवर्णं तमस: परस्तात् || 9||
प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव |
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् || 10||
भगवान सर्वज्ञ, आदि पुरुष, नियन्ता, सूक्ष्म से सूक्ष्मतम, सबका पालक, अज्ञानता के सभी अंधकारों से परे और सूर्य से अधिक तेजवान हैं और अचिंतनीय दिव्य स्वरूप के स्वामी हैं। मृत्यु के समय जो मनुष्य योग के अभ्यास द्वारा स्थिर मन के साथ अपने प्राणों को भौहों के मध्य स्थित कर लेता है और दृढ़तापूर्वक पूर्ण भक्ति से दिव्य भगवान का स्मरण करता है वह निश्चित रूप से उन्हें पा लेता है।
भगवान का ध्यान विभिन्न प्रकार से किया जा सकता है। कोई भगवान के नाम, रूप, गुण लीला धाम और भगवान के संतों का ध्यान कर सकता है। इस प्रकार से ये विभिन्न स्वरूप परम दैवत्य स्वरूप भगवान से किसी भी दृष्टि से अलग नहीं हैं। जब हमारा मन इनमें से किसी पर भी अनुरक्त हो जाता है तब हम भगवान के दिव्य क्षेत्र में प्रवेश करते हैं और हमारा मन शुद्ध हो जाता है। इसलिए इन सब में से किसी को भी ध्यान का लक्ष्य बनाया जा सकता है। इस श्लोक में भगवान के आठ गुणों का वर्णन किया गया है जिन पर मन को एकाग्र किया जा सकता है।
कवि का अर्थ कवि या संत हैं और इसका व्यापक अर्थ सर्वज्ञ है। जैसा कि श्लोक सं 7.26 में व्यक्त किया गया है कि भगवान भूत, वर्तमान और भविष्य को जानते हैं।
पुराण का अर्थ है - अनादि अर्थात् जिसका कोई आरम्भ नहीं है और जो सबसे पहले है। भगवान सभी प्रकार की भौतिकता और आध्यात्मिकता के मूल हैं। ऐसा कुछ नहीं है जिससे उनका जन्म हुआ हो। कुछ भी उनके पहले का नहीं है।
अनुशासितारम् का अर्थ 'शासक' है। भगवान ही सृष्टि के नियमों के नियामक हैं। वे ब्रह्माण्ड का संचालन करते हैं। इस प्रकार से सब कुछ उनके शासन के आधीन है। स्वयं प्रत्यक्ष रूप से और अपने द्वारा नियुक्त देवताओं के माध्यम से वे अप्रत्यक्ष रूप से ब्रह्माण्ड का संचालन करते हैं।
अणोरणीयान् का अर्थ सूक्ष्म से सूक्ष्मतम हैं। आत्मा पदार्थ से सूक्ष्म है किन्तु भगवान उस आत्मा में वास करते हैं और इसलिए वे सूक्ष्मतम हैं।
सर्वस्य धाता का अर्थ सबका पालनकर्ता है, जैसे समुद्र लहरों का धाता है।
अचिन्त्य रूप का अर्थ कल्पनातीत रूप का होना है क्योंकि हमारा मन केवल लौकिक रूपों को समझ सकता है। भगवान हमारे मायिक मन की परिधि से परे हैं किन्तु यदि वे अपनी कृपा प्रदान कर दें तब वे अपनी योगमाया की शक्ति से हमारे मन को दिव्य बना सकते हैं। अत: केवल उनकी कृपा से उन्हें समझा जा सकता है।
आदित्य वर्णम् का अर्थ सूर्य के समान तेजस्वी होने से है।
तमसः परस्तात् से तात्पर्य अंधकार से परे होना है। जिस प्रकार से सूर्य को कभी बादलों से आच्छादित नहीं किया जा सकता किन्तु फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि बादलों से ढकने के कारण सूर्य हमारी दृष्टि से ओझल हो गया है। समान रूप से यद्यपि भगवान संसार में माया शक्ति से युक्त रहते हैं तथापि भगवान को माया शक्ति से आच्छादित नहीं किया जा सकता।
भक्ति में मन को भगवान के दिव्य रूपों, गुणों और लीलाओं आदि में केन्द्रित करना होता है। जब भक्ति केवल मन से की जाती है तब इसे शुद्ध भक्ति कहते हैं। जब भक्ति अष्टांग योग के साथ की जाती है तब इसे योग मिश्रित भक्ति कहते हैं। श्लोक 10 से 13 तक श्रीकृष्ण योग मिश्रित भक्ति का वर्णन करेंगे। भगवद्गीता का ऐसा वैलक्षण्य है कि इसमें विविध प्रकार की साधनाओं को सम्मिलित किया गया है। इस प्रकार से यह विभिन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों और व्यक्तित्वों का परिचय देते हुए उन्हें अपने में अन्तर्निहित करती है। जब पश्चिमी विद्वान बिना गुरु की सहायता के हिन्दू धार्मिक ग्रंथ को पढ़ने का प्रयास करते हैं तब वे प्रायः विभिन्न धर्म शास्त्रों में वर्णित विभिन्न प्रकार के मार्गों, उपदेशों और दार्शनिक विचारधाराओं के कारण विचलित हो जाते हैं। किन्तु वास्तव में यह विविधता एक प्रकार का वरदान है क्योंकि अनन्त जन्मों के संस्कारों के कारण हम सब की प्रकृति भिन्न-भिन्न होती हैं। जब चार लोग अपने लिए कपड़ा खरीदने जाते हैं तब वे अपनी-अपनी पसंद के अनुसार विभिन्न प्रकार के रंगों, ढंगों और फैशन के कपड़ों का चयन करते हैं। यदि किसी दुकान पर केवल एक ही रंग और फैशन के कपड़े हों तब यह मानव प्रकृति की विविधताओं का अपमान होगा। समान रूप से अध्यात्म मार्ग में भी लोग अपने पूर्व जन्मों की विभिन्न साधना पद्धतियों के अनुसार साधना करते हैं। वैदिक ग्रंथों में इन विविधताओं को समाविष्ट किया गया है और साथ ही साथ भगवान की भक्ति करने पर बल दिया गया है जो इन सभी को एक साथ बाँधे रखती है।
अष्टांग योग में मेरूदण्ड में स्थित सुषुम्ना नाड़ी द्वारा प्राण शक्ति को ऊपर तक बढ़ाया जाता है। इसे भौहों के मध्य लाया जाता है जो तीसरे नेत्र का क्षेत्र अर्थात् आंतरिक दृष्टि का क्षेत्र है। तब बाद में मन को भक्ति के साथ परमात्मा पर केन्द्रित किया जाता है।
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागा: |
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये || 11||
वेदों के ज्ञाता उसका वर्णन अविनाशी के रूप में करते हैं। महान तपस्वी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं और उसमें स्थित होने के लिए सांसारिक सुखों का त्याग करते हैं। मैं तुम्हें इस मुक्ति के मार्ग के संबंध में संक्षेप में बताऊंगा।
वेदों में भगवान के अनेक नामों का उल्लेख किया गया है। जिनमें से कुछ नाम सत्, अव्याकृत प्राण, इन्द्र, देव, ब्राह्मण, भगवान, पुरुष इत्यादि हैं। विभिन्न स्थानों पर भगवान के निराकार रूप के लिए उसे अक्षर नाम से भी पुकारा जाता है। अक्षर शब्द का अर्थ अविनाशी है-
बृहदारण्यकोपनिषद् में वर्णन है
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्यचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः।
(बृहदारण्यकोपनिषद्-3.8.9)
"अविनाशी भगवान के नियंत्रण में सूर्य और चन्द्रमा अपनी कक्षा में घूमते रहते हैं।" इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने भगवान का निराकार रूप प्राप्त करने के लिए योग मिश्रित भक्ति का वर्णन किया है। संग्रहेण शब्द का अर्थ 'संक्षेप' है। वे इस पथ का वर्णन विस्तार से करने की अपेक्षा संक्षेप में करते हैं क्योंकि यह मार्ग सबके लिए उपयुक्त नहीं है।
इस पथ का पालन करने के लिए मनुष्य को कठोर तपस्या करनी पड़ती है। सांसारिक कामनाओं का त्याग करना पड़ता है, कठिन आत्म संयमित जीवन निर्वाह करना पड़ता है तथा ब्रह्मचर्य के व्रत का पालन करना पड़ता है। इसके द्वारा मनुष्य की शारीरिक ऊर्जा संरक्षित हो जाती है और फिर वह साधना के माध्यम से आध्यात्मिक शक्ति में परिवर्तित हो जाती है। ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले साधक की स्मरण शक्ति बढ़ती है और उसकी बुद्धि आध्यात्मिक विषयों को समझने में समर्थ हो जाती है। इसका विस्तृत वर्णन पहले ही श्लोक 6.14 में किया गया है।
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च |
मूर्ध्न्याधायात्मन: प्राणमास्थितो योगधारणाम् || 12||
शरीर के समस्त द्वारों को बंद कर मन को हृदय स्थल पर स्थिर करते हुए और प्राण वायु को सिर पर केन्द्रित करते हुए मनुष्य को दृढ़ यौगिक चिन्तन में स्थित हो जाना चाहिए।
इन्द्रियों के माध्यम से मन संसार में प्रवेश करता है। हम सबसे पहले देखते सुनते, स्पर्श करते हैं और स्वाद लेते हैं तथा पदार्थों की गंध ग्रहण करते हैं। तब मन इन पदार्थों में प्रविष्ट हो जाता है। बार-बार चिन्तन से आसक्ति उत्पन्न होती है जिससे पुनः मन में विचारों की पुनरावृति उत्पन्न होती रहती है। इसलिए संसार को मन के बाहर रोके रखने के लिए इन्द्रियों पर संयम रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह व्यक्ति जो इस बिन्दु की उपेक्षा करता है उसे निरन्तर अनियंत्रित इन्द्रियों द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले संसारिक विचारों की धारा से जूझना पड़ता है। इसलिए श्रीकृष्ण यह उपदेश देते हैं कि अपने शरीर के द्वारों की रक्षा करो। 'सर्वद्वाराणि संयम्य' का अर्थ–'उन छिद्रों को नियंत्रित करना है जो शरीर में प्रवेश करते हैं।' इसका तात्पर्य इन्द्रियों की सामान्य बहिर्गामी प्रवृत्तियों को प्रतिबंधित करना है। 'हृदि निरुध्य' शब्द का अर्थ 'मन को हृदय में स्थित करना है।' इसका तात्पर्य मन के विचारों को 'अक्षरम्', अविनाशी परमात्मा की ओर आकर्षित करने का निर्देश देने से है। योगधारणाम् का अर्थ 'अपनी चेतना को भगवान के साथ जोड़ना है' जिसका तात्पर्य पूर्ण मनोयोग के साथ भगवान का ध्यान करने से है।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् |
य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् || 13||
जो देह त्यागते समय मेरा स्मरण करता है और पवित्र अक्षर ओम् का उच्चारण करता है वह परम गति को प्राप्त करता है।
पवित्र अक्षर ओम् को प्रणव भी कहा जाता है जो भगवान के निर्विशेष, निर्गुण निराकार अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए इसे भगवान के समान अविनाशी माना जाता है। चूँकि श्रीकृष्ण अष्टांग योग साधना के संदर्भ में साधना की क्रिया का वर्णन कर रहे हैं वे कहते हैं कि तपस्या और ब्रह्मचर्य व्रत का अभ्यास करते हुए साधक को अपना मन केन्द्रित करने के लिए पवित्र शब्द ओम् का उच्चारण करना चाहिए। वैदिक साहित्य में भी ओम शब्द को 'अनाहत नाद' कहा गया है। यह वह ध्वनि है जो समूची सृष्टि में व्याप्त रहती है और इसे योगी ही सुन सकते हैं।
बाइबिल में कहा गया है, "आरम्भ में शब्द था और शब्द भगवान के साथ था और शब्द भगवान था।" (जॉन-1.1) वैदिक ग्रंथों में वर्णन है कि भगवान ने सर्वप्रथम शब्द उत्पन्न किया और शब्द से आकाश और फिर इसके पश्चात् सृष्टि की प्रक्रिया आरम्भ की। मूल शब्द 'ओम्' था। इसलिए वैदिक दर्शन में इसे अत्यधिक महत्व दिया गया है। इसे महावाक्य या वेदों की महान स्पंदन ध्वनि कहा गया है। इसे बीज मंत्र भी कहा जाता है क्योंकि प्रायः इसका उच्चारण वैदिक मंत्रों जैसे ह्रीं, क्लीं इत्यादि वेदों मंत्रों के प्रारम्भ में किया जाता है। 'ओम्' शब्द तीन अक्षरों अ-उ-म् से निर्मित है। ओम् का शुद्ध उच्चारण हमें अपनी नाभि और खुले गले और मुख से 'अ' की ध्वनि उत्पन्न कर आरम्भ करना चाहिए। 'उ' ध्वनि मुँह के मध्य से उच्चारित होती है, और अंतिम अनुक्रम में मुँह को बंद कर 'म्' का उच्चारण किया जाता है।
ओम् के उच्चारण अ-उ-म् के तीनों वर्गों के अनेक अर्थ और व्याख्याएँ हैं। भक्तों के लिए ओम् भगवान के निराकार स्वरूप का नाम है।
प्रणव शब्द अष्टांग योग साधना का लक्ष्य है। भक्ति योग के मार्ग के भक्त भगवान के नामों जैसे-राम, कृष्ण, आदि का उच्चारण कर साधना करना पसंद करते हैं क्योंकि भगवान का अनन्त आनंद इन विशिष्ट नामों में व्याप्त होता है। इनका भेद गर्भ में पल रहे बच्चे और गोद में लिए हुए बालक जैसा होता है। गोद में उठाए हुए बच्चे का सुखद अनुभव गर्भ में पल रहे बच्चे की अपेक्षा अधिक होता है। हमारी साधना की अंतिम परीक्षा मृत्यु के समय पर होती है। वे लोग जो अपनी चेतना को भगवान पर स्थिर करने के योग्य हो जाते हैं, वे मृत्यु के समय घोर पीड़ा सहने पर भी इस परीक्षा में उत्तीर्ण होते हैं। ऐसे लोग शरीर त्याग कर परम धाम को प्राप्त करते हैं। यह सब अत्यंत कठिन है और इसके लिए जीवनपर्यन्त अभ्यास करना आवश्यक होता है। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण ऐसी प्रवीणता प्राप्त करने के लिए सरल उपाय की व्याख्या करेंगे।
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश: |
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन: || 14||
हे पार्थ! जो योगी अनन्य भक्ति भाव से सदैव मेरा चिन्तन करते हैं, उनके लिए मैं सरलता से सुलभ रहता हूँ क्योंकि वे निरन्तर मेरी भक्ति में तल्लीन रहते हैं।
पूरी भगवद्गीता में श्रीकृष्ण बारम्बार भक्ति की महत्ता पर बल देते हैं। पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने भगवान के निराकार स्वरूप और निर्गुण साधना को प्रतिपादित किया है। जो केवल नीरस ही नहीं अपितु अत्यंत कठिन भी है। इसलिए अब वे सरल विकल्प को अभिव्यक्त कर रहे हैं जो भगवान के दिव्य साकार रूप जैसे कृष्ण, राम, शिव, विष्णु इत्यादि हैं। इनमें भगवान का नाम, रूप, गुण, लीला, धाम और उनके परम दिव्य स्वरूप युक्त संत सम्मिलित हैं। पूरी गीता में केवल यही एक श्लोक है जिसमें श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्हें पाना सरल है किन्तु इसकी शर्तों के संबंध में 'अनन्यचेताः' अर्थात् 'कोई अन्य नहीं' शब्द कहा गया है जिसका अर्थ है कि मन अनन्यता से केवल उनमें तल्लीन रहना चाहिए। अनन्य शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। व्युत्पत्ति विज्ञान में इसका अर्थ 'न अन्य, या कोई अन्य नहीं है। अर्थात् मन भगवान के अलावा किसी और में आसक्त नहीं होना चाहिए। इस अनन्यता की शर्त को भगवद् गीता में बार-बार दोहराया गया है। अनन्याश्चिन्तयन्तो मां (9.22), तमेव शरणं गच्छ (18.62), मामेकं शरणं व्रज। (18.66)
अन्य वैदिक ग्रंथों में भी अनन्य भक्ति के महत्त्व पर बल दिया गया है।
"मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम्।"
(श्रीमदभागवतम्-11.12.15)
"तुम सब प्राणियों के आत्मस्वरूप मुझे एक परमात्मा की ही शरण ग्रहण करो।"
एक भरोसो एक बल एक आस विस्वास।
(रामाचरितमानस)
"मेरा केवल एक सहायक, एक सामर्थ्य, एक विश्वास और शरण श्री राम है"
अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता ।।
(नारद भक्ति दर्शन सूत्र-10)
"भगवान को छोड़कर दूसरे आश्रयों के त्याग का नाम अनन्यता है।"
अनन्य भक्ति से तात्पर्य यह है कि केवल भगवान के नाम, रूप, गुण, लीला, धाम और भगवान के संतों के प्रति ही मन की आसक्ति होनी चाहिए। इसका तर्क अत्यंत सरल है। साधना का उद्देश्य मन को शुद्ध करना है और यह केवल मन को पूर्ण शुद्धात्मा भगवान में अनुरक्त करने पर ही संभव है। किन्तु यदि हम भगवान का चिन्तन कर मन को शुद्ध करते हैं और फिर सांसारिकता में डूब कर उसे पुनः मलिन कर देते हैं, तब चाहे हम कितनी अवधि तक ही क्यों न प्रयास करें, हम कभी इसे शुद्ध नहीं कर सकते।
इस प्रकार की भूल प्रायः कई लोग करते हैं। वे भगवान से प्रेम करते हैं और संसार के लोगों और पदार्थों में भी आसक्त रहते हैं। साधना भक्ति द्वारा वे जो कुछ भी आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करते हैं वह सब सांसारिक आसक्ति के कारण दूषित हो जाता है। यदि हम साबुन से कपड़ों को साफ करते हैं किन्तु साथ ही साथ उन पर गंदगी डालते हैं तब हमारा प्रयास व्यर्थ हो जाएगा। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि केवल भक्ति नहीं अपितु उनके प्रति अनन्य भक्ति से ही वे सरलता से प्राप्त होते हैं।
मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयमशाश्वतम् |
नाप्नुवन्ति महात्मान: संसिद्धिं परमां गता: || 15||
मुझे प्राप्त कर महान आत्माएँ फिर कभी इस संसार में पुनः जन्म नहीं लेतीं जो अनित्यऔर दु:खों से भरा है। वे पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर चुकी होती हैं।
भगवत्प्राप्ति का परिणाम क्या होता है। वे सिद्ध पुरुष जो भगवत्पारायण हो जाते हैं, वे जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं और भगवान के परमधाम में प्रवेश करते हैं। इसलिए वे दु:खों से परिपूर्ण मायाबद्ध संसार में पुनः जन्म नहीं लेते। हम जन्म की कष्टदायी प्रक्रिया को सहन करते हैं और असहाय होकर चिल्लाते हैं। शिशु के रूप में जब हमें किसी ऐसी वस्तु की आवश्यकता होती है जिसे हम बोलकर व्यक्त नहीं कर सकते तो उसे पाने के लिए हम रोते हैं। युवावस्था में दैहिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए हमें संघर्ष करना पड़ता है जिससे हमें मानसिक कष्ट झेलने पड़ते हैं। वैवाहिक जीवन में हमें अपनी जीवन संगिनी के स्वभाव से जूझना पड़ता है। जब हम वृद्धावस्था में आते हैं तब हमें शारीरिक दुर्बलता को सहन करना पड़ता है। जीवन भर हमें मानसिक और शारीरिक कष्टों का सामना करना पड़ता है, दूसरों के व्यवहार और प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझना पड़ता है। अन्त में हमें मृत्यु की पीड़ा सहनी पड़ती है। यह सब दु:ख निरर्थक नहीं है अपितु इनका उद्देश्य भगवान की सृष्टि संचालन की व्यापक अभिकल्पना पर ध्यान से विचार करना है। ये हमें अनुभव कराते हैं कि भौतिक जगत हमारा स्थायी निवास नहीं है अपितु हम जीवात्माओं के लिए सुधार गृह है जो भगवान की ओर पीठ किए हुए हैं अर्थात् भगवान से विमुख हैं। यदि हम इस संसार के दु:खों को सहन नहीं करते तब फिर हमारे भीतर भगवान को पाने की इच्छा कभी विकसित नहीं हो सकती।
उदाहरणार्थ यदि हम आग में अपना हाथ डालते हैं तब इसके दो परिणाम होंगे-हमारी त्वचा जलने लगती है और हमारी स्नायु कोशिका मस्तिष्क में पीड़ा की अनुभूति उत्पन्न करती है। त्वचा का जलना अप्रिय घटना है किन्तु यह पीड़ा की अनुभूति अच्छी होती है। यदि हम पीड़ा का अनुभव नहीं करते तब फिर हम आग से हाथ बाहर नहीं निकालते और फिर हमें अत्यंत क्षति सहन करनी पड़ती। पीड़ा यह संकेत करती है कि कुछ गड़बड़ है जिसे सुधारना आवश्यक है। समान रूप से भौतिक जगत में जिन कष्टों को हम झेलते हैं, वे भगवान की ओर से प्राप्त होने वाले संकेत हैं जो यह बोध कराते हैं कि हमारी चेतना दूषित है और हमें अपनी लौकिक चेतना को उन्नत कर उसे भगवान के साथ एकीकृत करना चाहिए। अंततः अपने उत्तम प्रयासों के माध्यम से हम अपनी पसंद के पदार्थों को प्राप्त करने में समर्थ हो सकते हैं। वे लोग जो अपनी चेतना को भगवान से विमुख रखते हैं वे निरन्तर जन्म और मृत्यु के चक्कर में घूमते रहते हैं और जो भगवान की अनन्य भक्ति करते हैं वे उनका परमधाम प्राप्त करते हैं।
आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन |
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते || 16||
हे अर्जुन! इस भौतिक सृष्टि के सभी लोकों में ब्रह्मा के उच्च लोक तक जाकर भी तुम्हें पुनर्जन्म प्राप्त होगा। हे कुन्ती पुत्र! परन्तु मेरा धाम प्राप्त करने पर फिर आगे पुनर्जन्म नहीं होता।
वैदिक ग्रंथों में पृथ्वी लोक से नीचे सात लोकों-तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल,और पाताल के अस्तित्व का वर्णन किया गया है। इन सबको नरक या नरक लोक कहा जाता है। पृथ्वी लोक से आरम्भ होकर इसके उपर सात लोक-भूः, भूव:, स्व:, मह:, जनः, तपः, और सत्य: लोक अस्तित्व में हैं। इन सबको 'स्वर्ग' या 'देवलोक' भी कहा जाता है। अन्य धार्मिक परंपराओं में भी सात स्वर्गों का वर्णन मिलता है। यहूदी धर्म के तलमुड ग्रंथ में अराबोथ नाम के उच्च लोक सहित सात स्वर्गों का उल्लेख किया गया है (सॉल्म-68.4)। इस्लाम में भी सात स्वर्ग लोकों का उल्लेख किया गया है जिसमें 'सातवाँ आसमान' की गणना सबसे उच्च लोक के रूप में की गई है। सृष्टि में भिन्न-भिन्न ग्रह जिनका अस्तिव है, उन्हें विभिन्न लोक कहा गया है। हमारे भौतिक ब्रह्माण्ड में 14 लोक हैं। इसमें सबसे उच्चतम ब्रह्मा का लोक है जिसे ब्रह्मलोक कहा जाता है। इन सभी लोकों में माया का प्रभुत्व रहता है। इन लोकों के निवासी जन्म-मृत्यु के चक्र के अधीन होते हैं। श्रीकृष्ण ने पिछले श्लोक में इन्हें 'दुःखालयम् और अशाश्वतम्' अस्थायी एवं दुखों से भरा कहा है। यहाँ तक कि स्वर्ग के राजा की भी एक दिन मृत्यु होती है। पुराणों में वर्णन है कि एक बार इन्द्र ने देवलोक के अभियन्ता विश्वकर्मा को भव्य महल का निर्माण करने का कार्य सौंपा। इस महल के निर्माण का कार्य पूर्ण नहीं हो रहा था इसलिए थक-हार कर विश्वकर्मा ने भगवान से सहायता करने की प्रार्थना की। भगवान ने वहाँ प्रकट होकर इन्द्र से पूछा कि इस भव्य महल के निर्माण में कितने विश्वकर्मा लगाए गए हैं। इन्द्र ने चकित होकर इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा-"मेरे विचार से केवल एक ही विश्वकर्मा है।" भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा-"इस ब्रह्माण्ड सहित ऐसे 14 लोक हैं और सृष्टि में अनन्त ब्रह्माण्ड हैं और सभी में एक इन्द्र और एक विश्वकर्मा हैं।"
तत्पश्चात् इन्द्र ने उसकी ओर बढ़ती हुई चीटियों की पंक्ति देखी। वह आश्चर्यचकित होकर कहने लगा कि इतनी बड़ी संख्या में चीटियाँ कहाँ से आई। भगवान ने कहा-मैंने उन सब आत्माओं को बुलाया है जो पूर्वजन्म में इन्द्र थी और ये सब अब चींटियों के शरीर में हैं। इन्द्र उनकी विशाल संख्या देखकर चकित हो गया। कुछ समय पश्चात् वहाँ पर लोमश ऋषि प्रकट हुए। उन्होंने अपने सिर पर चटाई रखी हुई थी और उनके वक्ष स्थल पर बालों का एक चक्र था। उस चक्र से कुछ बाल गिरे हुए थे जिससे चक्र में कहीं-कहीं रिक्त स्थान दिखाई दे रहा था। इन्द्र ने ऋषि का स्वागत किया और उनसे विनम्रतापूर्वक पूछा-" श्रीमान् आपने सिर पर पूस की चटाई क्यों रखी हुई है और आपके वक्ष पर बालों का चक्र होने का क्या अभिप्राय है?" लोमश ऋषि ने उत्तर देते हुए कहा-"मुझे चिरायु होने का वरदान प्राप्त है। इस ब्रह्माण्ड में एक इन्द्र का कार्यकाल पूरा होने पर एक बाल टूटकर गिर जाता है। जिससे इस चक्र में रिक्त स्थान दिखाई देते हैं। मेरे शिष्य मेरे रहने के लिए घर का निर्माण करना चाहते थे परन्तु मैने विचार किया कि जीवन अस्थायी है तब फिर यहाँ घर क्यों बनाया जाए? मैं फूस की चटाई अपने पास रखता हूँ जो मुझे वर्षा व धूप से बचाती है। रात्रि के समय मैं इसे पृथ्वी पर बिछाकर सो जाता हूँ।" इन्द्र यह सोचकर अचंभित हुआ, “इस ऋषि का जीवनकाल कई इन्द्रों की आयु है और फिर भी यह कह रहा है कि जीवन अस्थायी है। तब फिर मैं ऐसे भव्य महल का निर्माण क्यों कर रहा हूँ?" उसका घमंड चूर-चूर हो गया और उसने विश्वकर्मा को महल बनाने के कार्य से मुक्त कर दिया।
इन कथाओं को पढ़ते हुए हमें भगवद्गीता के ब्रह्माण्डीय विज्ञान की अद्भुत अंत:दृष्टि युक्त चमत्कार की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। निकोलस कॉपरनिकस पहले पश्चिम वैज्ञानिक थे जिन्होंने एक उपयुक्त सिद्धांत स्थापित करते हुए कहा कि वास्तव में सूर्य ब्रह्माण्ड का केन्द्र है। उससे पहले पश्चिम जगत यह विश्वास करता था कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केन्द्र थी। तत्पश्चात् खगोल विज्ञान में हुई प्रगति से ज्ञात हुआ कि सूर्य भी ब्रह्माण्ड का केन्द्र नहीं है बल्कि यह तो आकाशगंगा के चारों ओर भ्रमण करता है। विज्ञान में आगे हुई प्रगति से वैज्ञानिक यह जानने में समर्थ हुए कि हमारी आकाश गंगा के समान कई अन्य आकाशगंगायें है और इनमें से प्रत्येक में हमारे लोक के सूर्य के समान असंख्य तारे होते हैं। इसके विपरीत पाँच हजार वर्ष पूर्व वैदिक दर्शन में वर्णन किया गया है कि पृथ्वी भूर्लोक है, जो स्वर्लोक के चारों ओर घूर्णन करती है। इनके बीच के क्षेत्र को भुव: लोक कहा गया है। किन्तु स्वर्लोक भी स्थिर नहीं है यह जनलोक के गुरुत्व में स्थित है और इनके बीच के क्षेत्र को महर लोक कहा जाता है किन्तु जनलोक भी स्थिर नहीं है। यह ब्रह्मलोक (सत्यलोक) के चारों ओर घूर्णन कर रहा है और इनके बीच के क्षेत्र को तपलोक कहा जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि सात उच्चलोक और समान रूप से सात निम्नलोक हैं। इस प्रकार पाँच सहस्त्र वर्ष पूर्व प्रकट किया गया यह ज्ञान अत्यन्त अद्भुत है।
श्रीकृष्ण इस श्लोक में कहते हैं कि ब्रह्माण्ड के सभी 14 लोकों में माया का आधिपत्य है। इसलिए यहाँ के निवासी जन्म-मृत्यु के चक्र में फँसे रहते हैं। किन्तु जो भगवत्प्राप्ति कर लेते हैं, वे माया के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और मृत्यु होने पर भौतिक शरीर को त्याग कर वे भगवान का परमधाम प्राप्त करते हैं। उन्हें दिव्य शरीर प्राप्त होता है जिससे वे नित्य भगवान की दिव्य लीलाओं में भाग लेते हैं। इस प्रकार से वे इस मायाबद्ध भौतिक संसार में पुनः जन्म नहीं लेते। कुछ संत माया से मुक्ति पाने के पश्चात् भी लौटकर संसार में आते हैं किन्तु वे अन्य लोगों को उसी प्रकार से माया के बंधनों से मुक्त करवाने हेतु संसार में अवतरित होते हैं। ये सब महान अवतारी होते हैं जो मानवता के कल्याण में लगे रहते हैं।
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदु: |
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जना: || 17||
चार युग (महायुग) के हज़ार चक्र को ब्रह्म का (कल्प) एक दिन माना जाता है और इतनी ही अवधि की उसकी एक रात्रि होती है। इसे वही बुद्धिमान समझ सकते हैं जो दिन और रात्रि की वास्तविकता को जानते है
वैदिक ब्रह्माण्डीय ज्ञान पद्धति में समय की गणना करने की विधि अत्यन्त गहन, स्थिर और प्रामाणिक है। उदाहरणार्थः कुछ कीट रात्रि में जन्म लेते हैं और एक ही रात्रि में बड़े होते हैं, प्रजनन करते हैं, अण्डे देते हैं और बूढ़े हो जाते हैं। प्रातः काल हम इन सबको मार्ग में लगे बिजली के खम्बों के नीचे मरा हुआ पाते हैं। यदि इन कीटों को यह कहा जाए कि उनका पूर्ण जीवन काल केवल मनुष्य की एक रात्रि के बराबर है तब वे इस पर संदेह करेंगे।
समान रूप से वेदों में वर्णन किया गया है कि स्वर्ग के देवताओं जैसे इन्द्र और वरुण का एक दिन और रात्रि पृथ्वीलोक के एक वर्ष के समतुल्य है। स्वर्ग के देवताओं का एक वर्ष पृथ्वी लोक के 360 वर्षों के बराबर होता है। स्वर्ग के देवताओं के 12,000 वर्षों के बराबर का एक महायुग (चार युगों का चक्र) पृथ्वी लोक के 4 लाख 32 हजार वर्ष के समतुल्य है। ऐसे 1000 महायुग का समूह ब्रह्मा का एक दिन होता है। इसे 'कल्प' कहा जाता है और यह समय की सर्वोच्च ईकाई है। ब्रह्मा की रात्रि भी इसके बराबर है। इन गणनाओं के अनुसार ब्रह्मा की आयु 100 वर्ष की होती है। पृथ्वीलोक की गणना के अनुसार यह 311,400,000,000,000 वर्ष है।
इस प्रकार से वैदिक गणना के अनुसार युगों की गणना निम्न प्रकार से है
कलियुग - 432,000 वर्ष
द्वापरयुग - 8,64,000 वर्ष
त्रेतायुग - 1,296,000 वर्ष
सतयुग - 1,728,000 वर्ष
इन सबको मिलाकर एक महायुग - 4,320,000 वर्ष
एक हजार महायुग का ब्रह्मा का एक दिन है जिसे एक कल्प कहते हैं और इसी अवधि के समान ब्रह्मा की एक रात्रि है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो इसे समझ पाते हैं, वे दिन और रात्रि के सत्य को जान जाते हैं।
ब्रह्माण्ड की पूरी अवधि ब्रह्मा की आयु के 100 वर्षों के बराबर है। ब्रह्मा भी एक आत्मा हैं जिन्होंने यह पदवी प्राप्त की है और वह भगवान के लिए अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहा है। इस प्रकार से ब्रह्मा भी जीवन और मृत्यु के चक्र के अधीन है। किन्तु अत्यंत उन्नत चेतना से युक्त होने के कारण उसे यह आश्वासन प्राप्त है कि उसका जीवन समाप्त होने पर वह जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाएगा और भगवान के धाम में प्रवेश करेगा। कभी-कभी जब कोई भी आत्मा सर्जन के समय ब्रह्मा के दायित्वों का पालन करने की पात्र नहीं पायी जाती, तब ऐसी स्थिति में भगवान स्वयं ब्रह्मा बन जाते हैं।
अव्यक्ताद्व्यक्तय: सर्वा: प्रभवन्त्यहरागमे |
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके || 18||
ब्रह्मा के दिन के आरंभ में सभी जीव अव्यक्त अवस्था से व्यक्त होते हैं और रात्रि होने पर पुनः सभी जीव अव्यक्त अवस्था में लीन हो जाते हैं।
ब्रह्माण्ड में विभिन्न लोकों के सृजन, स्थिति और प्रलय के चक्रों की पुनरावृति होती रहती है। ब्रह्मा के दिन की समाप्ति पर जो 4,3,20,000,000 वर्षों के बराबर है, महर् लोक तक की ग्रह प्रणालियाँ विनष्ट हो जाती हैं। इसे नैमित्तिक प्रलय अर्थात् आंशिक प्रलय कहा जाता है। श्रीमद्भागवतम् में शुकदेव जी परीक्षित को अवगत कराते हैं कि जिस प्रकार से बालक दिन में खिलौने से संरचनाएँ बनाता है और उन्हें सोने से पहले नष्ट कर देता है। उसी प्रकार से ब्रह्मा दिन में अपनी जागृत अवस्था में ग्रह प्रणालियों की रचना करते हैं और रात्रि में सोने से पूर्व उन्हें नष्ट कर देते हैं।
ब्रह्मा के जीवन के 100 वर्षों के अन्त में संपूर्ण ब्रह्माण्ड का संहार हो जाता है। उस समय समस्त भौतिक सृष्टि का अंत हो जाता है। पंच महाभूतों का पंच तन्मात्राओं में विलय और पंच तन्मात्राओं का अहंकार और अहंकार का विलय महान् में तथा महान् का विलय प्रकृति में हो जाता है। प्रकृति भौतिक शक्ति माया का सूक्ष्म रूप है। तब माया अपनी मौलिक अवस्था में महा विष्णु परमात्मा के शरीर में जाकर स्थित हो जाती है। इसे प्रकृति प्रलय या महाप्रलय कहते हैं। जब महा विष्णु पुनः सृष्टि करने की इच्छा करते हैं तब वे प्रकृति के रूप में मायाशक्ति पर दृष्टि डालते हैं और वह केवल उनके दृष्टि डालने से विकसित होती है। प्रकृति से महान् और महान् से अहंकार उत्पन्न होता है। अहंकार से पंचतन्मात्राएँ और पंचतन्मात्राओं से पंचमहाभूतों की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार से अनन्त ब्रह्माण्डों की सृष्टि होती हैं। आज के युग के वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार आकाशगंगा में 100 करोड़ तारे हैं। एक आकाशगंगा के समान ब्रह्माण्ड में 1 करोड़ तारा समूह हैं। वेदों के अनुसार हमारे ब्रह्माण्ड के समान विभिन्न आकार के अनन्त ब्रह्माण्ड अस्तित्व में हैं। हर समय जब महाविष्णु श्वास लेते हैं तब उनके शरीर के छिद्रों से असंख्य ब्रह्माण्ड प्रकट होते हैं और जब वे श्वास बाहर छोड़ते हैं तब सभी ब्रह्माण्डों का संहार हो जाता है। इस प्रकार से ब्रह्मा के 100 वर्षों का जीवन महाविष्णु की एक श्वास के बराबर है। प्रत्येक ब्रह्माण्ड का एक ब्रह्मा, विष्णु और शंकर होता है। इस प्रकार असंख्य ब्रह्माण्डों में असंख्य ब्रह्मा, विष्णु और शंकर हैं। सभी ब्रह्माण्डों के समस्त विष्णु, महाविष्णु का विस्तार हैं।
भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते |
रात्र्यागमेऽवश: पार्थ प्रभवत्यहरागमे || 19||
ब्रह्मा के दिन के आरंभ में असंख्य जीव पुनः जन्म लेते हैं और ब्रह्माण्डीय रात्रि होने पर विलीन हो जाते हैं।
वेदों में चार प्रकार के प्रलय का उल्लेख किया गया है-
नित्य प्रलय: हमारी चेतना का प्रतिदिन का प्रलय तब होता है जब हम गहन निद्रा में होते हैं।
नैमित्तिक प्रलयः यह प्रलय महर्लोक तक के सभी लोकों में ब्रह्मा का दिन समाप्त होने पर आती है। उस समय इन लोकों में रहने वाली आत्माएँ अव्यक्त हो जाती हैं। वे प्रसुप्त अवस्था में महा विष्णु के उदर में समा जाती हैं। जब ब्रह्मा इन लोकों की सृष्टि करते हैं तब वे अपने पूर्व कर्मों के अनुसार जन्म लेती हैं।
महाप्रलयः ब्रह्मा के जीवनकाल की समाप्ति पर सभी ब्रह्माण्डों में होने वाले संहार को महाप्रलय कहा जाता है। उस समय ब्रह्माण्ड की सभी जीवात्माएँ महाविष्णु के उदर में प्रसुप्त अवस्था में चली जाती हैं। उनके स्थूल और सूक्ष्म शरीर का विनाश हो जाता है और उनका कारण शरीर शेष रहता है। जब सृष्टि के अगले चक्र का सृजन होता है तब उनके कारण शरीर में संचित उनके कर्मों और संस्कारों के अनुसार उन्हें पुनः जन्म मिलता है।
आत्यन्तिक प्रलयः जब आत्मा अंततः भगवान को प्राप्त कर लेती है तब वह सदा के लिए जीवन और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाती है। आत्यन्तिक प्रलय माया के बंधनों का विनाश है जो आत्मा को नित्य बाँधे रखती थी।
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन: |
य: स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति || 20||
व्यक्त और अव्यक्त सृष्टि से परे एक अव्यक्त सृष्टि है। जब सब कुछ विनष्ट हो जाता है तो भी उसकी सत्ता का विनाश नहीं होता।
लौकिक संसार और उनके अस्थायित्व पर अपना वक्तव्य समाप्त करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अन्य आध्यात्मिक आयाम की चर्चा करते हैं। यह माया शक्ति की परिधि से परे है और भगवान की योगमाया शक्ति द्वारा उत्पन्न होता है। जब समस्त ब्रह्माण्डों का विनाश हो जाता है तब भी इसका विनाश नहीं होता। श्रीकृष्ण 10वें अध्याय के 42वें श्लोक में उल्लेख करते हैं कि यह आध्यात्मिक आयाम समस्त सृष्टि का तीन चौथाई है जब कि भौतिक संसार एक चौथाई है।
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम् |
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम || 21||
यह अव्यक्त स्वरुप ही परम गन्तव्य है और यहाँ पहुंच कर फिर कोई इस नश्वर संसार में लौट कर नहीं आता। यह मेरा परम धाम है।
आध्यात्मिक क्षेत्र के दिव्य आकाश को 'परव्योम' कहते हैं। इसमें भगवान के विविध प्रकार के शाश्वत लोक सम्मिलित हैं, जैसे-गोलोक, (भगवान श्रीकृष्ण का लोक) साकेत लोक, (भगवान राम का लोक) वैकुण्ठ लोक, (नारायण भगवान का लोक), शिव लोक, (सदाशिव का लोक), देवी लोक, (माँ दुर्गा का लोक)। इन लोकों में भगवान नित्य अपने दिव्य रूपों में अपने अनन्त संतो के साथ निवास करते हैं। ये सब भगवान के रूप एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं। ये एक ही भगवान के विभिन्न रूप हैं।
मनुष्य भगवान के जिस रूप की आराधना करता है, भगवत्प्राप्ति होने के पश्चात् वह उसी प्रकार के भगवान के उसी रूप वाले लोक में जाता है। दिव्य शरीर प्राप्त करने के पश्चात् जीवात्मा अनन्त काल के लिए भगवान के दिव्य कार्यों और दिव्यलीलाओं में भाग लेती है।
पुरुष: स पर: पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया |
यस्यान्त:स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् || 22||
परमेश्वर का दिव्य व्यक्तित्व सभी सत्ताओं से परे है। यद्यपि वह सर्वव्यापक है और सभी प्राणी उसके भीतर रहते है तथापि उसे केवल भक्ति द्वारा ही जाना जा सकता है।
परमात्मा जो अपने दिव्य लोक में निवास करते हैं, वे हमारे हृदय में भी निवास करते हैं और वे भौतिक जगत के प्रत्येक परमाणु में भी व्याप्त हैं। भगवान सभी स्थानों पर समान रूप से विद्यमान रहते हैं। हम यह नहीं कह सकते कि सर्वव्यापक भगवान कहीं 25 प्रतिशत विद्यमान हैं तथा वे अपने साकार रूप में शत-प्रतिशत व्याप्त रहते हैं। वे सर्वत्र साकार रूप में शत-प्रतिशत व्याप्त रहते हैं किन्तु हम भगवान की सर्वव्यापकता का लाभ प्राप्त नहीं करते, क्योंकि हमें उनकी अनुभूति नहीं होती।
शाण्डिल्य ऋषि ने कहा हैगवां सप्रिः शरीरस्थं न करोत्यङ्ग-पोषणम्।
(शाण्डिल्य भक्ति दर्शन)
"दूध गाय के शरीर में व्याप्त होता है किन्तु यह दुर्बल गाय को स्वस्थ रखने में सहायक नहीं होता।" जब गाय दुहने से प्राप्त होने वाले दूध को जमाकर उसे दही में परिवर्तित किया जाता है और उस दही में जब काली मिर्च मिलाकर उसे खिलायी जाती है तब उससे गाय का उपचार हो जाता है। उसी प्रकार से भगवान की सर्वव्यापकता की अनुभूति इतनी पक्की नहीं होती कि वह हमारी भक्ति को बढ़ा सके। सर्वप्रथम हमारे लिए उनके दिव्य रूप की आराधना करना और अन्तःकरण को शुद्ध करना आवश्यक होता है। तब हम भगवान की कृपा पाते हैं और उस कृपा से वे अपनी दिव्य योगमाया शक्ति के साथ हमारी बुद्धि, मन और अन्त:करण में व्याप्त हो जाते हैं। तब हमारी इन्द्रियाँ दिव्य होकर भगवान की दिव्यता की अनुभूति करने में समर्थ हो जाती हैं। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्हें केवल भक्ति द्वारा ही जाना जा सकता है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण बारम्बार भक्ति करने की अनिवार्यता पर बल देते हैं।
श्लोक 6.47 में उन्होंने कहा था कि वे उनकी भक्ति में तल्लीन रहने वाले भक्त को सब में श्रेष्ठ मानते हैं। इसलिए उन्होंने विशेष रूप से 'अनन्य' शब्द को अत्यन्त महत्त्व दिया है जिसका अर्थ 'किसी अन्य मार्ग द्वारा भगवान को नहीं जाना जा सकता' है।
चैतन्य महाप्रभु ने इसका अति सुन्दर वर्णन किया है
"भक्ति मुख निरीक्षत कर्म-योग-ज्ञान"
(चौतन्य चरितामृत मध्य लीला-22.17)
"यद्यपि कर्म, ज्ञान और अष्टांग योग भगवत्प्राप्ति के मार्ग हैं किन्तु इन मार्गों में सफलता के लिए भक्ति की सहायता की आवश्यकता पड़ती है।"
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने भी इसका विशद वर्णन किया है-
कर्म, योग, अरु ज्ञान सब, साधन यदपि बखान।
पै बिनु भक्ति सबै जनु, मृतक देह बिनु प्रान ।।
(भक्ति शतक-8)
"यद्यपि कर्म, ज्ञान और अष्टांग योग भगवद्प्राप्ति के साधन हैं किन्तु भक्ति के सम्मिश्रण बिना ये सब निष्प्राण मृत देह के समान हैं।" विभिन्न धर्मग्रंथों में भी ऐसा वर्णन किया गया है।
भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयाऽऽत्मा प्रियः सताम्।
(श्रीमद्भागवतम्-11.14.21)
"मैं केवल उन भक्तों को प्राप्य हूँ जो श्रद्धा और प्रेम युक्त होकर मेरी भक्ति करते हैं।"
मिलेहिं न रघुपति बिनु अनुरागा, किए जोग तप ज्ञान विरागा
(रामचरितमानस)
"यदि कोई अष्टांग योग का अभ्यास करे, तपस्या करे, ज्ञान अर्जित करे और चाहे विरक्ति भाव विकसित करे फिर भी भक्ति के बिना कोई भी कभी भगवान को नहीं प्राप्त कर सकता।"
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिन: |
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ || 23||
अग्निर्ज्योतिरह: शुक्ल: षण्मासा उत्तरायणम् |
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जना: || 24||
धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण: षण्मासा दक्षिणायनम् |
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते || 25||
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगत: शाश्वते मते |
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुन: || 26||
हे भरत श्रेष्ठ! अब मैं तुम्हें इस संसार से प्रयाण के विभिन्न मार्गों के संबंध में बताऊँगा। इनमें से एक मार्ग मुक्ति की ओर ले जाने वाला है और दूसरा पुनर्जन्म की ओर ले जाता है। वे जो परब्रह्म को जानते हैं और जो उन छः मासों में जब सूर्य उत्तर दिशा में रहता है, चन्द्रमा के शुक्ल पक्ष की रात्रि और दिन के शुभ लक्षण में देह का त्याग करते हैं, वे परम गति को प्राप्त करते हैं। वैदिक कर्मकाण्डों का पालन करने वाले जो साधक, कृष्णपक्ष की रात्रि में, अथवा सूर्य के दक्षिणायन रहते, छ: माह के भीतर मृत्यु को प्राप्त होते हैं, वे स्वर्गलोक को प्राप्त करते हैं। स्वर्ग के सुख भोगने के पश्चात् वे पुनः धरती पर लौटकर आते हैं। प्रकाश और अंधकार के ये दोनों पक्ष संसार में सदा विद्यमान रहते हैं। प्रकाश का मार्ग मुक्ति की ओर तथा अंधकार का मार्ग पुनर्जन्म की ओर ले जाता है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण के कथन श्लोक 8.2 में पूछे गए प्रश्न–'हम मृत्यु के समय आप में कैसे एकीकृत हो सकते हैं?' से सम्बन्धित हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार में दो मार्ग हैं-एक प्रकाश का मार्ग और दूसरा अंधकार का मार्ग। यहाँ हम प्रकाश और अंधकार से संबंधित आध्यात्मिक दृष्टिकोण अभिव्यक्त करने के लिए एक अद्भुत रूपक का प्रयोग कर सकते हैं। उत्तरायण के छः माह को, चन्द्रमा, के शुक्ल पक्ष को प्रकाश के रूप में चित्रित किया गया है। प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है जबकि अंधकार अज्ञानता का प्रतीक है। दक्षिण संक्राति के छः माह तथा चंद्रमा का कृष्ण पक्ष ये सब अंधकार के समानार्थक हैं। वे जिनकी चेतना भगवान में स्थित होती है और जो विषयासक्त कार्यों से विरक्त रहते हैं, वे प्रकाश अर्थात् विवेक और ज्ञान के पथ का अनुसरण करते हुए दिवंगत होते हैं। चूँकि वे भगवच्चेतना में स्थित हो जाते हैं इसलिए वे परमात्मा का धाम प्राप्त करते हैं और संसार के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। किन्तु जिनकी चेतना संसार में संलग्न होती है, वे अंधकार (अज्ञानता) के मार्ग का अनुसरण करते हुए दिवंगत होते है। दैहिक चेतना में उलझने और भगवान से विमुख होने की भूल के कारण वे निरन्तर जीवन और मृत्यु के चक्र में घूमते रहते हैं। यदि उन्होंने वैदिक कर्मकाण्डों का पालन किया होता है तब वे उन्नत होकर अस्थायी रूप से स्वर्ग लोक को जाते हैं और बाद में पुनः पृथ्वी लोक पर लौट कर आते हैं। अब यह उनके कर्मों के अनुसार उन पर निर्भर करता है कि क्या वे प्रकाश के मार्ग या अंधकार के मार्ग की ओर अग्रसर होंगे।
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन |
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन || 27||
हे पार्थ! जो योगी इन दोनों मार्गों का रहस्य जानते हैं, वे कभी मोहित नहीं होते इसलिए वे सदैव योग में स्थित रहते हैं।
जो साधक मन को भगवान में एकनिष्ठ करने का प्रयास करते रहते हैं, वे योगी कहलाते हैं। वे स्वयं को भगवान का अंश और विलासी जीवन को निरर्थक जानकर क्षणिक इन्द्रिय सुख की अपेक्षा भगवान के प्रति अपने प्रेम को बढ़ाने पर महत्त्व देते हैं। इस प्रकार से वे प्रकाश के मार्ग (शुक्ल पक्ष) का अनुसरण करते हैं। ऐसे लोग जो माया से मोहित होकर अस्थायी संसार को स्थायी और अपने शरीर को आत्मा समझकर तथा संसार के कष्टों को सुखों का साधन समझते हैं, वे अंधकार मार्ग (कृष्णपक्ष) का अनुसरण करते हैं। दोनों मार्गों के परिणाम पूर्णतया एक-दूसरे के विपरीत होते हैं। एक आंतरिक परमानंद की ओर ले जाता है तो दूसरा निरन्तर भौतिक संसार के कष्टों की ओर। श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रेरित करते हैं कि वे इन दोनों मार्गों के भेद को समझे और योगी बन कर प्रकाश के मार्ग का अनुसरण करे। उन्होंने यहाँ इस उक्ति-"सर्वेषु-कालेषु" को जोड़ा है जिसका अर्थ सदा के लिए है। हममें से कई लोग कुछ समय के लिए प्रकाश के मार्ग का अनुसरण करते हैं किन्तु फिर पीछे हटते हुए अंधकार के मार्ग का अनुसरण करने लगते हैं। अगर कोई व्यक्ति उत्तर की ओर जाना चाहता हैं किन्तु पूरा प्रयास करने के पश्चात् भी यदि वह प्रत्येक एक मील उत्तर दिशा की ओर चलकर वापस चार मील दक्षिण दिशा की ओर चलता है तब वह व्यक्ति अपनी यात्रा के अंत में दक्षिण दिशा के अंतिम बिन्दु पर पहुँचेगा। इसी प्रकार पूरे दिन में कुछ समय प्रकाश के मार्ग का अनुगमन करने से हमारी आध्यात्मिक उन्नति सुनिश्चित नहीं हो सकती। इसलिए हमें निरन्तर ठीक दिशा की ओर बढ़ना होगा और विपरीत दिशा की ओर बढ़ना बंद करना होगा तभी हम अध्यात्म के क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं-"सदा योगी बने रहो।"
वेदेषु यज्ञेषु तप:सु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् |
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् || 28||
जो योगी इस रहस्य को जान लेते हैं वे वेदाध्ययन, तपस्या, यज्ञों के अनुष्ठान और दान से प्राप्त होने वाले फलों से परे और अधिक लाभ प्राप्त करते हैं। ऐसे योगियों को भगवान का परमधाम प्राप्त होता है।
हम वैदिक अनुष्ठान, तपस्या, ज्ञान संवर्धन, विभिन्न प्रकार की तपस्या करते हैं और दान देते हैं। किन्तु जब तक हम भगवान की भक्ति में तल्लीन नहीं होते तब तक हम प्रकाश के मार्ग की ओर अग्रसर नहीं हो सकते। इन सभी लौकिक कर्मों का परिणाम भौतिक फल हैं। जबकि भगवान की भक्ति के परिणाम-स्वरूप हमें सांसारिक बंधनों से मुक्ति प्राप्त होती है। इसलिए रामचरितमानस में वर्णन किया गया है
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
भेषज पुनि कोटिन्ह नाहिं रोग जाहिं हरिजान ।।
"चाहे तुम सदाचारी, धर्मपरायण, तपस्वी, यज्ञ करने वाले हो और अष्टांग योग, मंत्र उच्चारण तथा दान आदि पुण्य कर्मों में लीन रहते हो किन्तु भक्ति के बिना यह भवरोग समाप्त नहीं हो सकता।"
जो योगी प्रकाश के मार्ग का अनुगमन करते हैं वे मन को संसार से विरक्त कर उसे भगवान में अनुरक्त कर लेते हैं और अपना पूर्ण कल्याण करते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ऐसा फल पाते हैं जो अन्य सभी पद्धतियों से प्राप्त होने वाले फलों से परे होता है।
।। श्रीमद्भगवत गीता अष्टम अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
Bhagavad Geeta Chapter 7
kathaShrijirasik
अध्याय सात: ज्ञान विज्ञान योग
दिव्य ज्ञान की अनुभूति द्वारा प्राप्त योग
यह अध्याय भगवान की शक्तियों के भौतिक और आध्यात्मिक आयामों के वर्णन के साथ आरम्भ होता है। श्रीकृष्ण व्यक्त करते हैं कि ये सब उन्हीं से प्रकट होते हैं और धागे में गुंथे मोतियों की भाँति उनमें स्थित रहते हैं। वे समूची सृष्टि के स्रोत हैं और ये सब उन्हीं में पुनः विलीन हो जाते हैं। उनकी प्राकृत शक्तिमाया पर विजय प्राप्त करना अत्यंत दुष्कर है लेकिन वे जो भगवान के शरणागत हो जाते हैं, वे उनकी कृपा प्राप्त करते हैं और इस माया पर सरलता से विजय पा लेते हैं। आगे श्रीकृष्ण उनके शरणागत न होने वाले चार प्रकार के लोगों और उनकी भक्ति में तल्लीन रहने वाले चार प्रकार के लोगों का वर्णन करते हैं। वे अपने भक्तों में उन्हें अत्यंत प्रिय मानते हैं जो अपने मन और बुद्धि को उनमें लीन कर ज्ञान में स्थित होकर उनकी आराधना करते हैं। कुछ लोग जिनकी बुद्धि सांसारिक कामनाओं द्वारा हर ली जाती हैं वे स्वर्ग के देवताओं की शरण में जाते हैं किन्तु ये स्वर्ग के देवता केवल अस्थायी भौतिक सुख प्रदान कर सकते हैं और इन क्षणभंगुर सुखों को भी वे भगवान द्वारा प्राप्त होने पर ही प्रदान कर सकते हैं। इस प्रकार से भक्ति का अंतिम लक्ष्य स्वयं भगवान हैं। श्रीकृष्ण पुष्टि करते हैं कि वे परम सत्य और अंतिम गंतव्य हैं और सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान भी हैं। चूँकि उनका वास्तविक स्वरूप उनकी दिव्य योगमाया शक्ति के आवरण द्वारा आच्छादित रहता है इसलिए उनके अविनाशी दिव्य स्वरूप को सब नहीं जान सकते। यदि हम उनकी शरण ग्रहण करते हैं तब वे हमें अपना दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं और उनको जानकर हम भी आत्मज्ञान और कर्मचक्र का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं।
श्रीभगवानुवाच |
मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रय: |
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु || 1||
परम प्रभु ने कहा-हे अर्जुन! अब यह सुनो कि भक्तियोग के अभ्यास द्वारा और मेरी शरण ग्रहण कर मन को केवल मुझमें अनुरक्त कर और संदेह मुक्त होकर तुम मुझे पूर्णतया किस प्रकार जान सकते हो।
छठे अध्याय के समापन पर श्रीकृष्ण ने घोषणा की थी कि वे जो मन को केवल उनमें स्थिर कर श्रद्धा भक्ति से उनकी सेवा करते हैं वे सब योगियों में श्रेष्ठ हैं। इस कथन द्वारा मन में कुछ स्वाभाविक प्रश्न उठते हैं कि परमात्मा को जानने का मार्ग क्या है? कोई भगवान का ध्यान कैसे करे? भक्त भगवान की आराधना कैसे करें?
यद्यपि अर्जुन द्वारा ये प्रश्न नहीं किए गए किन्तु अपनी अनुकंपा से भगवान इनका पूर्वानुमान कर उत्तर देना प्रारम्भ करते हैं। उन्होंने 'श्रृणु' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ सुनना है और इसके साथ 'मदाश्रयः' शब्द का भी प्रयोग किया है जिसका अर्थ 'अपने मन को मुझमें केन्द्रित करना' है।
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषत: |
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते || 2||
अब मैं तुम्हारे समक्ष उस ज्ञान और विज्ञान को पूर्णतः प्रकट करूँगा जिसको जान लेने पर इस संसार में तुम्हारे जानने के लिए और कुछ शेष नहीं रहेगा।
इन्द्रियों, मन और बुद्धि से अर्जित जानकारी को ज्ञान कहते हैं। आध्यात्मिक अभ्यास के परिणामस्वरूप अपने अन्तःकरण में प्राप्त ज्ञान को 'विज्ञान' कहा जाता है। विज्ञान बौद्धिक ज्ञान नहीं है क्योंकि इसकी प्रतीति प्रत्यक्ष अनुभव से होती है। उदाहरणार्थ यदि हम बंद बोतल में रखी शहद की मिठास की प्रशंसा सुनते हैं, किन्तु सुनी-सुनाई बात से केवल सैद्धान्तिक ज्ञान प्राप्त होता है। किन्तु जब हम बोतल के ढक्कन को खोलकर शहद का स्वाद चखते हैं तब हम उसकी मिठास का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। उसी तरह गुरु और शास्त्रों से प्राप्त सैद्धान्तिक जानकारी 'ज्ञान' है और जब हम उस ज्ञान के अनुसार साधना का अभ्यास करते हुए अपने मन को शुद्ध करते हैं तब हमारे भीतर अनुभूति के रूप में प्रकाशित ज्ञान 'विज्ञान' कहलाता है। जब वेदव्यास ने श्रीमद्भागवतम् लिखने का निर्णय लिया तब उसमें प्रकृति, भगवान की महिमा और भक्ति के विषय का वर्णन करने के लिए वे ज्ञान को आधार मानने में संतुष्ट नहीं थे।
भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले।
अपश्यत्पुरुषं पूर्वं मायां च तदपाश्रयाम्।।
(श्रीमद्भागवतम्-1.7.4)
"भक्तियोग द्वारा वेदव्यास जी ने लौकिक भावनाओं से रहित होकर अपने मन को पूर्णतया एकाग्र और निर्मल करके भगवान और उनकी बाह्यशक्ति माया के पूर्ण दर्शन प्राप्त किये। तब ऐसी अनुभूति से युक्त होकर उन्होंने भागवत की रचना की। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे अर्जुन के भीतर भगवान संबंधी सैद्धान्तिक ज्ञान प्रकाशित करेंगे और उसे भगवान का वास्तविक ज्ञान प्रदान करने में भी उसकी सहायता करेंगे। इस ज्ञान का बोध हो जाने पर फिर उसके लिए कुछ जानना शेष नहीं रहेगा।
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये |
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत: || 3||
हजारों में से कोई एक मनुष्य आध्यात्मिक सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और सिद्धि प्राप्त करने वालों में से कोई एक विरला ही वास्तव में मुझे जान पाता है।
इस श्लोक में 'सिद्धि' शब्द का प्रयोग किया गया है। इस शब्द के कई अर्थ हैं। संस्कृत शब्दकोश से लिए गए सिद्धि शब्द के कुछ अर्थ इस प्रकार से हैं-अलौकिक शक्तियों की प्राप्ति, उपलब्धि, सफलता, निष्पादन, पूर्ति, समस्याओं का समाधान, कार्य को सम्पूर्ण करना, उपचार करना, लक्ष्य साधना, परिपक्वता, परम सुख, मोक्ष, असाधारण दक्षता और पूर्णता। श्रीकृष्ण अध्यात्मवाद के लिए पूर्णता शब्द का प्रयोग करते हुए कहते हैं-“हे अर्जुन! असंख्य आत्माओं में से कुछ को ही मानव शरीर प्राप्त होता है। मनुष्य जन्म पाने वालों में केवल कुछ लोग ही पूर्णता के लिए प्रयास करते हैं और हजारों सिद्धावस्था प्राप्त आत्माओं में से मेरी सर्वोच्च स्थिति और दिव्य महिमा से परिचित होने वाली आत्माएँ विरली ही होती हैं।"
फिर ऐसी आत्माएँ जो आध्यात्मिक अभ्यास द्वारा पूर्णता को प्राप्त कर लेती हैं वे भगवान को क्यों नहीं जान सकतीं? इसका कारण यह है कि भक्ति और प्रेममय समर्पण के बिना भगवान को जान पाना या उनकी अनुभूति करना सम्भव नहीं है। आध्यात्मिक पथ के साधक कर्म, ज्ञान, हठयोग आदि के अभ्यास के साथ भक्ति को सम्मिलित किए बिना भगवान को नहीं जान सकते। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने इस सत्य को कई बार दोहराया है।
"यद्यपि वे सर्वव्यापक हैं और सभी प्राणी उनमें स्थित हैं तथापि उन्हें केवल भक्ति द्वारा ही जाना जा सकता है।" (8.22)
"हे अर्जुन! मैं तुम्हारे समक्ष खड़ा हुआ अपने जिस स्वरूप में हूँ, उसे भक्ति के अलावा अन्य किसी साधन से नहीं देखा जा सकता। इस प्रकार से तुम मेरे दिव्य स्वरूप को देख सकते हो और मुझे जानने के रहस्यों को जान सकते हो।" (11.54)
"केवल प्रेममयी भक्ति से ही कोई यह जान पाता है कि मैं वास्तव में क्या हूँ। फिर तब वह भक्ति के माध्यम से मेरे दिव्य स्वरूप को जानकर मेरे दिव्य लोक में प्रवेश करता है।" (18.55)
इस प्रकार से जो आध्यात्मिक साधक अपनी साधना में भक्ति को सम्मिलित नहीं करते और भगवान के संबंध में सैद्धान्तिक ज्ञान तक ही सीमित रहते हैं उन्हें परम सत्य का अनुभवात्मक ज्ञान नहीं हो पाता।
यह कहने के पश्चात् कि कई मनुष्यों में कोई एक ही उन्हें वास्तव में जान पाता है, श्रीकृष्ण अब अपनी भौतिक और आध्यात्मिक शक्तियों के आयामों का उल्लेख करना आरम्भ कर रहे हैं। वे सर्वप्रथम अपनी अपरा प्रकृति, भौतिक शक्ति का क्षेत्र जोकि निकृष्ट शक्ति होते हुए भी भगवान की शक्ति है, का उल्लेख करते हैं।
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च |
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा || 4||
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार ये सब मेरी प्राकृत शक्ति के आठ तत्त्व हैं।
माया शक्ति द्वारा रचित संसार विचित्र, जटिल और अगाध है। इसे वर्गीकृत करके हम अपनी परिमित बुद्धि से इसे कुछ-कुछ समझ सकते हैं। हालाँकि इनमें से प्रत्येक श्रेणी की आगे असंख्य उप श्रेणियाँ हैं। आधुनिक विज्ञान में पदार्थ को तत्त्वों के संयोजन के रूप में देखा जाता है। वर्तमान में 118 तत्त्वों की खोज की गयी है और इन्हें आवधिक सारणी में सम्मिलित किया गया है। सामान्य रूप से भगवद्गीता और वैदिक दर्शन में मूलभूत रूप से अलग-अलग प्रकार का वर्गीकरण किया गया है। पदार्थ को प्रकृति या भगवान की शक्ति के रूप में देखा जाता है और इस श्लोक में इस शक्ति के आठ खंडों का उल्लेख किया गया है। पिछली शताब्दी में आधुनिक विज्ञान की प्रगति को देखते हुए यह कितनी आश्चर्यजनक और व्यावहारिक जानकारी है।
वर्ष 1905 में अपने अनुस मिरबिल पत्रों में अल्बर्ट आइंस्टीन ने पहले पदार्थ ऊर्जा समतुल्यता के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया था। उन्होंने कहा कि पदार्थ में शक्ति में परिवर्तित होने की क्षमता होती है और इसे संख्यात्मक रूप से समीकरण E = mc द्वारा निर्धारित किया जा सकता है। यह ज्ञान न्यूटन की पिछली अवधारणा कि 'ब्रह्माण्ड की रचना ठोस पदार्थों को मिलाकर की गयी है', को मूलभूत रूप से परिवर्तित करता है। इसके पश्चात् वर्ष 1920 में नील्स बोर और अन्य वैज्ञानिकों ने क्वांटम सिद्धान्त स्थापित किया जिसके अनुसार पदार्थ की प्रकृति दोहरी होती है। क्वांटम सिद्धान्त, पदार्थ द्वारा ऊर्जा के उत्सर्जन, अवशोषण और कणों की गति के साथ संबंधित है। तब से वैज्ञानिक एकीकृत क्षेत्र सिद्धान्त की खोज कर रहे हैं जिसमें सभी बलों और पदार्थों को ब्रह्माण्ड के एक क्षेत्र के रूप में समझा जा सकेगा।
इसी एकीकृत क्षेत्र सिद्धान्त को श्रीकृष्ण ने आधुनिक वैज्ञानिक युग से 5000 वर्ष पूर्व अर्जुन को एकदम सटीक रूप से समझाया था। वे कहते हैं-"अर्जुन! ब्रह्माण्ड में व्याप्त सभी पदार्थों का अस्तित्व मेरी माया अर्थात् प्राकृत शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं।" यह मेरी प्राकृत शक्ति है जो संसार में असंख्य आकारों, रूपों और अस्तित्वों में प्रकट होती है। तैत्तिरीयोपनिषद् में इसका विस्तार से इस प्रकार वर्णन किया गया है:
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः।
आकाशाद्वायुः। वायोरग्रिः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या औषधयः।
औषधीभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुषः। स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः।
(तैत्तिरीयोपनिषद्-2.1.2)
"भौतिक ऊर्जा का आदि रूप प्रकृति है। जब भगवान संसार के सृजन की इच्छा करते हैं तब वे प्रकृति पर दृष्टि डालते हैं जिससे उसमें विकार उत्पन्न होता है और फिर वह महान के रूप में प्रकट होती है", फिर महान में विकार उत्पन्न होने से अगला तत्त्व अहंकार प्रकट होता है जोकि विज्ञान के जानने योग्य किसी भी ईकाई की तुलना में सूक्ष्म है। अहंकार से पंचतन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है। ये पाँच तन्मात्राएँ-स्वाद, स्पर्श, गंध, रूप और शब्द हैं। इन से पाँच स्थूल तत्त्व-आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी प्रकट होते हैं।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण न केवल इन पाँच स्थूल तत्त्वों को अपितु वे मन, बुद्धि और अहंकार को भी अपनी शक्ति के विशिष्ट तत्त्वों के रूप में सम्मिलित करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये सब उनकी प्राकृत शक्ति माया का ही अंश हैं। इससे परे आत्मा (जीव शक्ति) या भगवान की परा शक्ति है जिसकी व्याख्या वे अगले श्लोक में करते हैं।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् |
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् || 5||
ये मेरी अपरा शक्तियाँ हैं किन्तु हे महाबाहु अर्जुन! इनसे अतिरिक्त मेरी परा शक्ति है। यह जीव शक्ति है जिसमें देहधारी आत्माएँ (जीवन रूप) सम्मिलित हैं जो इस संसार में जीवन का आधार हैं।
श्रीकृष्ण अब पूर्णतया भौतिक ज्ञान के क्षेत्र से परे विषय की चर्चा कर रहे हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि पिछले श्लोक में उन्होंने अपनी जिन आठ प्रकार की अपरा शक्तियों का उल्लेख किया है केवल वही अभिव्यक्तियाँ ही सब कुछ नहीं हैं। वे कहते हैं कि मेरी परम आध्यात्मिक शक्ति भी है जो जड़ पदार्थ से पूर्णतः परे है। यह शक्ति 'जीव शक्ति' है जिसमें आत्माएँ अर्थात् विभिन्न जीवन रूप सम्मिलित हैं। भगवान और जीव (जीवात्मा) के संबंध में महान भारतीय दार्शनिकों ने विभिन्न परिप्रेक्ष्यों का निरूपण किया है। अद्वैत मत के तत्त्व ज्ञानी कहते हैं, “जीवो ब्रह्मैव नापरः" अर्थात् “आत्मा स्वयं भगवान है किन्तु इस मत पर कई अनुत्तरित प्रश्न उत्पन्न होते हैं।
1. भगवान सर्व शक्तिशाली है और माया उनकी दासी है। यदि आत्मा भगवान है तब माया उस पर कैसे हावी हो जाती है? क्या माया भगवान से शक्तिशाली है?
2. हम जानते हैं कि आत्मा अज्ञान के कारण भटकती रहती है, इसलिए इसे समझाने के लिए भगवद्गीता जैसे धार्मिक ग्रंथों और संतों के उपदेशों की आवश्यकता पड़ती है। अज्ञानता के कारण पराधीन आत्मा को भगवान के समान कैसे माना जा सकता है जो कि सर्वज्ञ हैं।
3. भगवान सर्वव्यापक हैं। इसे वेदों में बार-बार दोहराया गया है। यदि आत्मा ही भगवान है तब आत्मा को भी एक ही समय में सब स्थानों पर व्याप्त रहना चाहिए तब फिर मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग और नरक जाने का प्रश्न ही कहाँ रहेगा?
4. जीवात्माओं की संख्या अनन्त है और उनका स्वतंत्र अस्तित्व होता है जबकि भगवान एक ही हैं। अगर सभी जीवात्माएँ भगवान होतीं तो भगवान भी अनेक होते।
इस प्रकार हम देखते हैं कि अद्वैतवादी दार्शनिकों का यह दावा कि आत्मा स्वयं भगवान है, तर्क संगत नहीं है।
दूसरी ओर द्वैतवादी दार्शनिक कहते हैं कि आत्मा भगवान से भिन्न है। यह उपर्युक्त कुछ प्रश्नों का उत्तर अवश्य है किन्तु यह इस श्लोक में श्रीकृष्ण द्वारा किए गए वर्णन की तुलना में अपूर्ण ज्ञान है। वे कहते हैं कि आत्मा भगवान की शक्ति का अणु अंश है। इसलिए केवल एक भगवान परम शक्तिमान हैं और दृश्य जगत में जो भी आध्यात्मिक और भौतिक तत्त्व हैं, दोनों उनकी विविध प्रकार की परा और अपरा शक्तियों से निर्मित हैं।
एक देशस्थितस्याग्निर्ज्योत्स्ना विस्तारिणी यथा।
परस्य ब्रह्मणः शक्तिस्तथैदम् अखिलं जगत्।।
(विष्णुपुराण 1.22.53)
"जिस प्रकार सूर्य एक स्थान पर रहता है किन्तु उसका प्रकाश सम्पूर्ण सौरमण्डल में व्याप्त रहकर उसे प्रकाशित करता है उसी प्रकार से भगवान अपनी अनन्त शक्तियों द्वारा संसार में व्याप्त रहते हैं।" चैतन्य महाप्रभु ने कहा है:
जीवतत्त्व-शक्ति, कृष्णतत्त्व-शक्तिमान।
गीताविष्णुपुराणादि ताहाते प्रमाण ।।
(चैतन्य चरित्रामृत, आदि लीला-7.117)
"आत्मा भगवान की शक्ति है जबकि भगवान परम शक्तिमान है।" एक बार जब हम इस अवधारणा को स्वीकार कर लेते हैं कि आत्मा भगवान की शक्ति है तब सारी सृष्टि के अद्वैतों को सरलता से समझा जा सकता है। कोई भी शक्ति एक साथ अपने शक्तिमान से अभिन्न और भिन्न भी हो सकती है। उदाहरणार्थ अग्नि का ताप और प्रकाश विभिन्न तत्त्व समझे जा सकते हैं, किन्तु इन सबको एक साथ एक भी समझा जा सकता है। इस प्रकार से हम शक्ति (आत्मा) और शक्तिमान (परमात्मा) के दृष्टिकोण से आत्मा और परमात्मा को एक समान मान सकते हैं किन्तु हम आत्मा और भगवान में भेद को भी मान सकते हैं, क्योंकि शक्ति और शक्तिमान का पृथक अस्तित्त्व भी होता है। इस प्रकार से भगवान और आत्मा में भेदाभेद है।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने श्रीकृष्ण के इस श्लोक और पिछले श्लोक के कथन का संपुटीकरण करते हुए इसकी अत्यंत सटीक व्याख्या की है
"जिवु', 'माया', दुइ शक्ति हैं, शक्तिमान भगवान ।
शक्तिहिँ भेद अभेद भी, शक्तिमान ते जान ।।
(भक्ति शतक श्लोक-42)
"आत्मा और माया भगवान की दो शक्तियाँ है। इसलिए दोनों का भगवान के साथ भेद और अभेद भी है।"
शक्ति और शक्तिमान के बीच एकता के दृष्टिकोण से समूचा संसार भगवान से अभिन्न नहीं है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि सारा संसार भगवान का यथार्थ रूप है।
सर्वं खल्विदं ब्रह्म
(छान्दोग्योपनिषद्-3.14.1)
"सभी ब्रह्म है।"
ईशावास्यमिदं सर्वम्।
(ईशोपनिषद्-1)
"संसार में व्यक्त प्रत्येक वस्तु भगवान है।" ।
पुरुष एवेदं सर्वं
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-3.15)
"सभी अस्तित्वों में परम पुरुषोत्तम भगवान ही सब कुछ हैं।"
ये सभी वैदिक मंत्र कह रहे हैं कि संसार में भगवान के अतिरिक्त कुछ नहीं है। शक्ति और शक्तिमान में विविधता के परिप्रेक्ष्य को इस प्रकार से समझ सकते हैं कि इस एकता में भी अनेकता हैं। आत्मा भिन्न है, पदार्थ भिन्न है, भगवान भिन्न हैं। पदार्थ जड़ है जबकि आत्मा चेतन है और भगवान आत्मा और पदार्थ दोनों के परम चेतन स्रोत और आधार हैं। कई वैदिक मंत्रों में सृष्टि में तीन प्रकार की सत्ता का उल्लेख किया गया है।
क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः
क्षरात्मानावीशते देव एकः।
तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावाद्
भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-1.10)
"सृष्टि में तीन सत्ता अस्तित्व में हैं-(1) पदार्थ जो नाशवान है (2) जीवात्मा जो अविनाशी है। (3) भगवान जो पदार्थ और जीवात्माओं का नियंता है। भगवान का चिन्तन करके और उसके समान बनकर जीवात्मा सांसारिक मोह माया से मुक्त हो सकती है।"
हम देखते हैं कि वेद कैसे दोनों प्रकार के द्वैतवादी और अद्वैतवादी मतों को प्रतिपादित करते हैं। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज परमात्मा और आत्मा के बीच अचिन्त्य अभेद और भेद के मत का समर्थन करते हैं।
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय |
अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा || 6||
यह जान लो कि सभी प्राणी मेरी इन दो शक्तियों द्वारा उत्पन्न होते हैं। मैं सम्पूर्ण सृष्टि का मूल कारण हूँ और ये पुनः मुझमें विलीन हो जाती हैं।
भौतिक जगत के सभी प्राणी आत्मा और पदार्थ के संयोग से अस्तित्त्व में आते हैं। पदार्थ अपने आप में जड़ है, आत्मा को शरीर रूपी वाहन की आवश्यकता पड़ती है। इन दोनों शक्तियों के संयोजन से जीव उत्पन्न होते हैं।
भगवान इन दोनों शक्तियों का मूल कारण हैं। समूची सृष्टि उन्हीं से उत्पन्न होती है। जब ब्रह्मा के जीवन के एक सौ वर्ष के अन्त में सृष्टि अपना चक्र पूरा कर लेती है तब भगवान सृष्टि का संहार कर देते हैं। पाँच स्थूल तत्त्व पाँच सूक्ष्म तत्त्वों में विलीन हो जाते हैं और पाँच सूक्ष्म तत्त्व अहंकार में, अहंकार महान में, और महान प्रकृति में विलीन हो जाता है और प्रकृति महाविष्णु के शरीर में स्थित हो जाती है। जो जीवात्माएँ सृष्टि के चक्र में बंधनमुक्त नहीं हो पाती वे भी अव्यक्त रूप में भगवान के उदर में समा जाती हैं और सृष्टि के अगले चक्र की प्रतीक्षा करती हैं।
एक बार पुनः भगवान जब सृष्टि-सर्जन की इच्छा करते हैं तब श्लोक संख्या 7.4 में किए गए उल्लेख के अनुसार सृष्टि चक्र आरंभ हो जाता है और संसार प्रकट हो जाता है इसलिए भगवान सभी पदार्थों के स्रोत, पालक और अंतिम आश्रय हैं।
मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय |
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव || 7||
हे अर्जुन! मुझसे श्रेष्ठ कोई नहीं है। सब कुछ मुझ पर उसी प्रकार से आश्रित है, जिस प्रकार से धागे में गुंथे मोती।
यह कहने के पश्चात् कि वे सबके मूल और सभी अस्तित्त्वों के आधार हैं परम प्रभु श्रीकृष्ण अब अपनी सर्वोच्चता और सब पर अपने आधिपत्य की चर्चा करते हैं। वे ब्रह्माण्ड के स्रष्टा, निर्वाहक और संहारक हैं। वे सृष्टि में व्याप्त सभी तत्त्वों के आधार हैं। इस श्लोक में धागे में गुंथे मोतियों की उपमा का प्रयोग किया गया है। उसी प्रकार से जीवात्माएँ यद्यपि अपनी इच्छा के अनुसार कर्म करने में स्वतंत्र होती हैं लेकिन इसकी शक्ति उन्हें केवल भगवान द्वारा प्राप्त होती है जो उन सबका पालन-पोषण करते हैं और जिनमें सभी स्थित रहते हैं। इसलिए श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णन किया गया
न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते ।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.8)
"न तो कुछ भी भगवान के बराबर है और न ही कुछ उनसे श्रेष्ठ है।"
भगवद्गीता का यह श्लोक कई लोगों के मन से उस संदेह का निवारण करता है जो श्रीकृष्ण को परम सत्य के रूप में नहीं स्वीकार करते और यह कल्पना करते हैं कि कोई अन्य निराकार सत्ता है जो न केवल सबका बल्कि श्रीकृष्ण का भी परम स्रोत है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे जिस साकार पुरुषोत्तम रूप में अर्जुन के समक्ष खड़े हैं वही श्रीकृष्ण अंतिम परम सत्य हैं।
इसलिए प्रथम जन्मे ब्रह्मा श्रीकृष्ण से इस प्रकार की प्रार्थना करते हैं।
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्।।
(ब्रह्मसंहिता-5.1)
" श्रीकृष्ण ही परम प्रभु हैं। वह नित्य, अविनाशी और परम आनन्द स्वरुप हैं। उनका कोई आदि और अंत नहीं है। वे सभी का उद्गम हैं और सभी कारणों के कारण हैं।"
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययो: |
प्रणव: सर्ववेदेषु शब्द: खे पौरुषं नृषु || 8||
हे कुन्ती पुत्र! मैं ही जल का स्वाद हूँ, सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश हूँ, मैं वैदिक मंत्रों में पवित्र अक्षर ओम हूँ, मैं ही आकाश में ध्वनि और मनुष्यों में सामर्थ्य हूँ।
यह कहने के पश्चात् कि वे ही जो सब का मूल और आधार हैं, अब श्रीकृष्ण सत्य का निरूपण इन चार श्लोकों में कर रहे हैं। जब हम फलों का सेवन करते हैं तब हमें उनकी मिठास से उनमें शक्कर होने का आभास होता है। उसी प्रकार से श्रीकृष्ण अपनी शक्तियों के सभी विकृत रूपों में व्याप्त रहते हैं। इसलिए वह कहते हैं-"मैं जल में स्वाद हूँ" जोकि उसका सार भूत गुण है। क्या कोई भी जल के स्वाद को उसमें से अलग कर सकता है? भौतिक शक्तियों के अन्य सभी रूपों-गैस, अग्नि, ठोस पदार्थों को अपना स्वाद बनाए रखने के लिए तरल की आवश्यकता पड़ती है। यदि हम किसी ठोस पदार्थ को अपनी सूखी जिह्वा पर रखते हैं तब हम उसका स्वाद ग्रहण नहीं कर सकते किन्तु जब ठोस पदार्थ मुँह की लार से घुल जाता है तब फिर उसका रस स्वाद कलिकाओं द्वारा जिह्वा पर ग्रहण किया जा सकता है।
उसी प्रकार से आकाश ध्वनि के संवाहक के रूप में कार्य करता है। ध्वनि भी स्वयं को विभिन्न भाषाओं में रूपांतरित करती रहती है और श्रीकृष्ण यह व्यक्त करते हैं कि वे इस सबका आधार हैं क्योंकि आकाश में शब्द उनकी शक्ति है। इससे आगे वे कहते हैं कि वे पवित्र मंत्र 'ओम्' हैं जो वैदिक मंत्रों का मूलतत्त्व है। वे मनुष्य में प्रकट होने वाली सभी क्षमताओं के मूल कारण हैं।
पुण्यो गन्ध: पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ |
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु || 9||
मैं पृथ्वी की शुद्ध सुगंध और अग्नि में प्रकाश हूँ। मैं सभी प्राणियों में जीवन शक्ति हूँ और तपस्वियों का तप हूँ।
श्रीकृष्ण अपना वक्तव्य जारी रखते हुए आगे वर्णन करते हैं कि वे किस प्रकार से सभी वस्तुओं का आधारभूत तत्त्व हैं। आत्मशुद्धि के लिए शारीरिक सुखों को अस्वीकार करना और स्वेच्छा से आत्म संयमी होना तपस्वियों की विशेषता होती है। भगवान कहते हैं कि वे तपस्वियों में उनका सामर्थ्य हैं। पृथ्वी पर वे सुगंध हैं जोकि उसका मूल गुण है और अग्नि में वे प्रकाश हैं।
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् |
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् || 10||
हे अर्जुन! यह समझो कि मैं सभी प्राणियों का आदि बीज हूँ। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ?
कारण को ही अपने फल के बीज के रूप में जाना जाता है इसलिए समुद्र को बादलों का बीज माना जा सकता है और बादल वर्षा के जनक होते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिससे सभी प्राणियों की उत्पत्ति हुई, वे उसका आदि बीज हैं क्योंकि सभी वस्तुएँ जो दिखाई देती हैं, भगवान की शक्ति का रूप हैं। मनुष्यों में दिखने वाले सारे सद्गुण भगवान की शक्तियाँ ही हैं जो उनमें प्रकट होती हैं। बुद्धिमान पुरुष अपने विचार और मतों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करते हैं। भगवान कहते हैं कि वे ऐसी सूक्ष्म शक्ति हैं जो उनके विचारों को प्रभावशाली और विश्लेषणात्मक बनाती हैं।
जब कुछ मनुष्य ऐसी असाधारण प्रतिभा प्रदर्शित करते हैं जिससे संसार सकारात्मक दिशा की ओर अग्रसर होता है तब उस समय यह भगवान की शक्ति ही होती है जो उनके द्वारा क्रियान्वित होती है। विलियम शेक्सपियर ने साहित्य के क्षेत्र में ऐसी विलक्षण प्रतिभा प्रदर्शित की जिसकी आधुनिक साहित्य से तुलना नहीं की जा सकती। संभवतः भगवान ने उसकी बुद्धि को इतना कुशाग्र बनाया कि उसका साहित्य लेखन का कार्य अंग्रेजी भाषा को समृद्ध कर सके।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि ब्रिटिश साम्राज्य का उद्देश्य संसार को एक भाषा के साथ जोड़ना था। बिल गेट्स ने मार्केटिंग के क्षेत्र में ऐसी अभूतपूर्व सफलता पायी है कि माइक्रोसॉफ्ट की विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम की विश्व बाजार में 90 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। यदि ऐसा न होता तब पूरे विश्व में कंप्यूटर के लिए कई ऑपरेटिंग सिस्टम प्रचलित होते जिससे संसार में अत्यधिक उथल-पुथल होती, जैसे कि वीडियो संपादन क्षेत्र की कई प्रणालियाँ-एन.टी. एस.सी. पॉल, सेकम आदि हैं। संभवतः भगवान की यह इच्छा हुई कि विश्व में केवल एक मुख्य ऑपरेटिंग सिस्टम होना चाहिए जिससे सुचारू संपर्क सुनिश्चित किया जा सके। इसलिए भगवान ने इस प्रयोजन के लिए एक ही व्यक्ति की बुद्धि को अति तीक्ष्ण बनाया। संत निश्चित रूप से अपने कार्य और ज्ञान को भगवान की कृपा के रूप में स्वीकार करते हैं।
संत तुलसीदास ने वर्णन किया है
न मैं किया न करि सकू, साहिब करता मोर।
करत करावत आप हैं, तुलसी तुलसी शोर ।।
"न तो मैंने रामायण की रचना की और न ही मैं इसकी रचना करने के योग्य था। भगवान राम मेरे कर्ता हैं। उन्होंने मेरे कार्यों को निर्देशित किया और मुझे माध्यम बनाकर मुझसे काम कराया लेकिन संसार सोचता है कि तुलसीदास सब कुछ कर रहा है। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सभी प्रतिभाशालियों की प्रतिभा और सभी बुद्धिमानों की बुद्धि हैं।
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् |
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ || 11||
हे भरत श्रेष्ठ! मैं बलवान पुरुषों का काम और आसक्ति रहित बल हूँ। मैं सभी प्राणियों में धर्मानुगत काम हूँ।
आसक्ति-अप्राप्त सुख के लिए तीव्र उत्कंठा है। आसक्ति एक विकृत मनोभावना है जो इच्छित पदार्थों का उपभोग करने के उपरांत भी उनकी प्यास को बढ़ाती है। श्रीकृष्ण 'कामराग - विवर्जितम्' शब्द का प्रयोग करते हैं जिसका अर्थ "कामना और आसक्ति रहित होना" है। ऐसा कहकर वे अपनी शक्ति के स्वरुप को स्पष्ट करते हैं। वे परम उदात्त शक्ति हैं जो लोगों को बिना भटकाव या विराम के अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए सामर्थ्य प्रदान करती है।
मैथुन क्रिया जब शास्त्रीय सिद्धान्तों से विहीन हो जाती है और इन्द्रियों के आनन्द को पाने के प्रयोजन से क्रियान्वित की जाती है तब उसे पशु प्रवृत्ति माना जाता है। किन्तु गृहस्थ जीवन के अंग के रूप में जब यह धर्म से अविरुद्ध रूप में और सन्तानोत्पति के उद्देश्य से की जाती है तब इसे शास्त्रीय ग्रंथों के अनुकूल माना जाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ऐसे पवित्र, संयत और सदिच्छा से युक्त वैवाहिक संबंध में कामस्वरूप हूँ।
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये |
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि || 12||
तीन प्रकार के प्राकृतिक गुण-सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण मेरी शक्ति से ही प्रकट होते हैं। ये सब मुझमें हैं लेकिन मैं इनसे परे हूँ।
पिछले चार श्लोकों में अपनी महिमा का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण इस श्लोक में उनकी समीक्षा करते हैं। वे प्रभावशाली शैली में अभिव्यक्त करते हैं-"अर्जुन मैं यह व्याख्या कर चुका हूँ कि मैं किस प्रकार से सभी पदार्थों का सार हूँ
लेकिन इस बिन्दु पर विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। सभी शुभ-अशुभ, और सृष्टि में व्याप्त सभी जड़-चेतन जीवों और पदार्थों का अस्तित्त्व केवल मेरी शक्ति द्वारा ही संभव है।"
यद्यपि सभी वस्तुएँ भगवान से प्रकट होती हैं, तथापि वे इनसे स्वतंत्र और परे हैं। अल्फ्रेड टेनीसन ने अपनी प्रसिद्ध कविता 'इन मैमोरियम' में इसे इस प्रकार से व्यक्त किया है
1. हमारी लघु ग्रह प्रणालियों का समय निश्चित है।
2. इनका आदि और अन्त है।
3. ये केवल आपका विखंडित प्रकाश है।
4. और हे भगवान! आपकी अनुपम महिमा अनन्त और इनसे परे है।
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत् |
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम् || 13||
माया के तीन गुणों द्वारा मोहित इस संसार के लोग मेरे नित्य और अविनाशी स्वरूप को जान पाने में असमर्थ होते हैं।
पिछले श्लोकों को सुनकर संभवत: अर्जुन यह सोचता होगा “हे भगवान यदि तुम्हारी ऐसी दिव्य विभूतियाँ हैं तब तुम्हें अरबों मनुष्य परम नियन्ता और सृष्टि का मूल कारण क्यों नहीं मानते? इसका उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार के लोग माया के तामसिक, राजसिक और सत्त्वगुणों से मोहित होते हैं। माया के ये तीन गुण मनुष्य की चेतना को आच्छादित कर देते हैं और जिसके परिणामस्वरूप वे शारीरिक सुखों के क्षणभंगुर आकर्षणों से मोहित हो जाते हैं।"
माया शब्द "मा" धातु से बना है। मा का अर्थ 'नहीं' और या का अर्थ 'जो' है इस प्रकार से माया का अर्थ-"वह ऐसा नहीं है जैसा दिखायी दे रहा है।" भगवान की शक्ति होने के कारण माया भी भगवान की सेवा में लगी रहती है। माया उन जीवात्माओं से भगवान के दिव्य स्वरूप को आच्छादित करने का काम करती है जिन्होंने अभी तक भगवत्प्राप्ति नहीं की होती। यह माया इसलिए उन जीवात्माओं को मोहित कर देती है क्योंकि वे भगवान से विमुख होती हैं अर्थात् भगवान की ओर पीठ किए होती हैं। प्रकृति के तीन गुणों के वशीभूत होने के कारण माया मनुष्य को विभिन्न संकटों में डालकर कष्ट देती है। इस प्रकार से वह जीवात्माओं को यह अनुभव करवाने का प्रयास करती है कि वे भगवान के सम्मुख हुए बिना कभी सुख नहीं पा सकती।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया |
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते || 14||
प्रकति के तीन गुणों से युक्त मेरी दैवीय शक्ति माया से पार पाना अत्यंत कठिन है किन्तु जो मेरे शरणागत हो जाते हैं, वे इसे सरलता से पार कर जाते हैं।
कुछ लोग यह स्वीकार करते हैं कि माया मिथ्या है और इसका कोई अस्तित्त्व नहीं है। वे कहते हैं कि हमें माया की अनुभूति केवल अज्ञानता के कारण होती है किन्तु जब हम ज्ञान से युक्त हो जाते हैं तब माया का अस्तित्त्व समाप्त हो जाएगा। वे दावा करते हैं कि इससे हमारा भ्रम दूर हो जाएगा और हम आत्मा को परम सत्य मानने लगेंगे। किन्तु भगवद्गीता का यह श्लोक ऐसे सिद्धान्त का खण्डन करता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि माया भ्रम नहीं है, यह भगवान की शक्ति है। श्वेताश्वतरोपनिषद् में इस प्रकार से वर्णन किया गया है-
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-4.10)
"माया भगवान की शक्ति है जबकि भगवान शक्तिमान हैं।"
रामचरितमानस में उल्लेख किया गया है
सो दासी रघुबीर कि समुझें मिथ्या सोपि।
"कुछ लोगों का विचार है कि माया मिथ्या अर्थात् अस्तित्वहीन है परन्तु माया वास्तव में एक शक्ति है जो भगवान की सेवा में लगी रहती है।"
यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि माया पर विजय पाना अत्यंत कठिन है क्योंकि यह उनकी शक्ति है। यदि कोई माया पर विजय पा लेता है तब उसका अर्थ यह होगा कि उसने स्वयं भगवान को जीत लिया है। इसलिए न तो कोई भगवान को पराजित कर सकता है और न ही माया को। मन माया से निर्मित है इसलिए कोई भी योगी, ज्ञानी, तपस्वी या कर्मी केवल अपने प्रयास से मन पर सफलतापूर्वक नियंत्रण प्राप्त नहीं कर सकता।
उस समय अर्जुन यह प्रश्न कर सकता था-"फिर मैं माया पर कैसे विजय पा सकूँगा" इसका उत्तर श्रीकृष्ण ने इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में दिया है। वे कहते हैं-"अर्जुन, यदि तुम मेरे शरणागत हो जाते हो तब मैं अपनी कृपा से तुम्हें संसार रूपी महासागर से पार करा दूंगा। मैं माया को संकेत कर दूंगा कि यह आत्मा मेरी हो गयी है अतः इसे मुक्त करो।" भगवान का आदेश पाने पर माया शक्ति मनुष्य को अपने बंधन से मुक्त कर देती है। माया कहती है-"मेरा कार्य केवल इतना ही था कि जीवात्मा को तब तक कष्ट दिया जाए जब तक वह भगवान के चरणों का आश्रय नहीं लेती। अब चूँकि इस जीवात्मा ने भगवान की शरण ले ली है इसलिए मेरा कार्य संपूर्ण हो गया है।"
हम अपने जीवन के उदाहरण से भी इसे समझ सकते हैं। आप अपने मित्र से भेंट करने के लिए उसके घर के बाहर के द्वार पर पहुँच जाते हैं। उसके घर के बाहर लगे सूचना पट्ट पर 'कुत्ते से सावधान रहें' लिखा हुआ है। उसका पालतु कुत्ता जर्मन शेफर्ड उसके लॉन में खड़ा है। वह कुत्ता आप पर भौंकने लगता है। फिर आप बाड़े के आस-पास जाकर पिछले द्वार से उसके घर में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं। किन्तु वही कुत्ता वहाँ भी आ जाता है और क्रोध से गुर्राने लगता है जैसे कि यह कह रहा हो-"देखता हूँ कि तुम कैसे घर में प्रवेश करने का साहस कर सकते हो।" जब आपके पास कोई अन्य विकल्प नहीं होता तब आप अपने मित्र को पुकारते हैं और फिर वह अपने घर से बाहर निकल कर देखता है कि उसका कुत्ता आपको तंग कर रहा है। तब वह कहता है-'टॉमी नहीं! टॉमी आओ और यहाँ बैठो।' कुत्ता तुरन्त शांत हो जाता है और अपने स्वामी की ओर आकर बैठ जाता है। अब आप भयमुक्त होकर प्रवेश द्वार खोलकर घर में प्रवेश करते हैं। समान रूप से प्राकृत शक्ति माया जो हमें सताती है वह भगवान की दासी है। अपने प्रयासों से हम उस पर विजय नहीं पा सकते। उससे पार पाने का एक मात्र उपाय भगवान की शरणागति है।
इसे इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने महत्त्वपूर्ण ढंग से संप्रेषित किया है। यदि हम माया पर विजय पाना चाहते हैं तब हमें केवल भगवान के शरणागत होना चाहिए। तब फिर लोग भगवान के शरणागत क्यों नहीं होते? इसकी व्याख्या श्रीकृष्ण अगले श्लोक में करेंगे।
न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा: |
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता: || 15||
चार प्रकार के लोग मेरी शरण ग्रहण नहीं करते-वे जो ज्ञान से वंचित हैं, वे जो अपनी निकृष्ट प्रवृत्ति के कारण मुझे जानने में समर्थ होकर भी आलस्य के कारण मुझे जानने का प्रयास नहीं करते, जिनकी बुद्धि भ्रमित है और जो आसुरी प्रवृत्ति के हैं।
श्रीकृष्ण ने उन चार प्रकार के मनुष्यों की श्रेणियाँ बताई हैं जो उनकी शरण ग्रहण नहीं करते।
(1) अज्ञानी मनुष्यः ये लोग आध्यात्मिक ज्ञान से वंचित होते हैं। वे शाश्वत आत्मा के रूप में अपनी पहचान करने और जीवन के लक्ष्य भगवत्प्राप्ति के संबंध में अनभिज्ञ रहते हैं। ज्ञान की कमी उन्हें भगवान के शरणागत होने से रोकती है।
(2) वे जो आलस्य के कारण निकृष्ट प्रवृत्ति का अनुसरण करते हैं: वे मनुष्य जिनके पास मौलिक आध्यात्मिक ज्ञान होता है और उन्हें यह बोध भी होता है कि उन्हें क्या करना है, किन्तु फिर भी ऐसे मनुष्य अपनी निकृष्ट प्रवृत्ति के कारण भगवान की शरण ग्रहण करने का प्रयास नहीं करते। धार्मिक सिद्धान्तों के अनुसार किसी मनुष्य द्वारा आध्यात्म मार्ग पर अग्रसर न होने में आलस्य को सबसे बड़ा दोषी माना गया है।
संस्कृत भाषा में इस प्रकार से कहा गया है-
आलस्य ही मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ।।
"आलस्य एक बड़ा शत्रु है और यह हमारे शरीर में रहता है। कर्म मनुष्य का अच्छा मित्र है जो कभी पतन की ओर नहीं ले जाता।"
(3) वे जो भ्रमित बुद्धि वाले होते हैं: संसार में ऐसे कई मनुष्य हैं जिन्हें अपनी बुद्धि पर घमंड होता है। यद्यपि वे संतो और धार्मिक ग्रंथो के उपदेशों को सुनते हैं किन्तु श्रद्धा के साथ उन्हें स्वीकार करने की इच्छा नहीं रखते। सभी आध्यात्मिक सत्य तुरन्त सुस्पष्ट नहीं होते। सर्वप्रथम हमें इस सिद्धान्त में विश्वास रखना होगा और फिर इसके लिए अभ्यास आरम्भ करना चाहिए। तब फिर अनुभव द्वारा हम उनके उपदेशों को समझ सकेंगे। ऐसे लोग कोई भी विषय जो उनके लिए वर्तमान में सुस्पष्ट नहीं है, उस पर विश्वास करने से मना कर देते हैं और वे भगवान जो इन्द्रियों की समझ से परे हैं, की शरण ग्रहण करना अस्वीकार कर देते हैं। श्रीकृष्ण ऐसे लोगों को तीसरी श्रेणी में रखते हैं।
(4) वे जो आसुरी प्रवृत्ति के अधिभूत हैं: ये ऐसे मनुष्य है जो स्वीकार करते हैं कि भगवान है किन्तु संसार में भगवान के प्रयोजन को विफल करने के लिए वे प्रतिकूल, बुरे और अनुचित कार्य करते हैं तथा अपनी आसुरी प्रवृत्ति के कारण वे भगवान के दिव्य व्यक्तित्त्व से घृणा करते हैं। वे किसी को भगवान की महिमा का गान करते हुए या भगवान की भक्ति में लीन होते हुए देखना सहन नहीं कर सकते। स्पष्ट है कि ऐसे लोग भगवान की शरण ग्रहण नहीं करते।
चतुर्विधा: भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन |
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ || 16||
हे भरतश्रेष्ठ! चार प्रकार के पवित्र लोग मेरी भक्ति में लीन रहते हैं: आर्त अर्थात् पीड़ित, ज्ञान की जिज्ञासा रखने वाले जिज्ञासु, संसार के स्वामित्व की अभिलाषा रखने वाले अर्थार्थी और जो परमज्ञान में स्थित ज्ञानी है
उन मनुष्यों की जो भगवान की शरणागति नहीं करना चाहते, की व्याख्या करने के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण अब भगवान की शरण ग्रहण करने वाले मनुष्यों की श्रेणियों को व्यक्त करते हैं-
1. आर्तः कुछ मनुष्यों के लिए जब सांसारिक दु:खों का पात्र अत्यधिक भर जाता है तब वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सांसारिक पदार्थों के पीछे भागना व्यर्थ है और भगवान की शरण ग्रहण करना ही उत्तम है। इसप्रकार जब वे देखते हैं कि सांसारिक आश्रय उनकी रक्षा करने में असमर्थ हैं तब वे भगवान की ओर मुड़ते हैं।
इस प्रकार के समर्पण का एक सटीक उदाहरण द्रौपदी का श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण है। जब कौरवों की सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र किया जा रहा था तब सर्वप्रथम उसने अपनी रक्षा हेतु अपने पतियों के नाम लिए। जब वे चुप रहे तब उसने सभा में उपस्थित सम्मानित वयोवृद्ध द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म पितामह और विदुर पर भरोसा करते हुए उनसे अपनी रक्षा हेतु सहायता माँगी। किन्तु जब वे भी मौन रहकर उसकी रक्षा न कर सके, तब फिर द्रौपदी ने साड़ी को अपने दाँतो के बीच फँसा दिया। उस समय तक भी श्रीकृष्ण द्रौपदी की रक्षा के लिए नहीं आए। अंत में जब दुःशासन ने एक झटके के साथ उसकी साड़ी को खींचा तो साड़ी दाँतो की पकड़ से छूट गयी। ऐसी दशा में जब उसे अपनी रक्षा हेतु न तो अपने पतियों पर, न किसी अन्य पर तथा न ही अपनी शक्ति पर विश्वास रहा तब उसने अपनी रक्षा के लिए श्रीकृष्ण के पूर्ण शरणागत होने का निश्चय किया तब भगवान ने उसकी पूरी रक्षा की। वे वहाँ प्रकट होकर उसकी साड़ी का विस्तार करते रहे। दुःशासन साड़ी खींचता गया किन्तु इसका कुछ प्रभाव नहीं पड़ा और वह द्रौपदी को निर्वस्त्र करने में विफल रहा।
2. ज्ञान प्राप्त करने वाले जिज्ञासुः भगवान को जानने की अपनी इच्छा के परिणामस्वरूप कुछ जिज्ञासु मनुष्य भगवान की शरण में जाते हैं। उन्होंने आध्यात्मिक जगत में परम आनन्द की खोज करने वाले महापुरुषों के संबंध में सुना होता है और यह सब उन्हें भगवान के बारे में जानने के लिए उत्साहित करता है। इसलिए वे अपनी जिज्ञासा को संतुष्ट करने के लिए भगवान की ओर अग्रसर होते हैं।
3. सांसारिक संपत्ति की अभिलाषा रखने वाले अथार्थीः अन्य प्रकार के मनुष्य जिन्हें यह स्पष्ट है कि उन्हें क्या चाहिए और वे यह समझते है कि केवल भगवान ही उन्हें मनोवांछित पदार्थ प्रदान कर सकते हैं, वे कामनाओं की पूर्ति हेतु भगवान की शरण में जाते हैं। ध्रुव ने अपने पिता राजा उत्तानपाद से अधिक शक्तिशाली होने की कामना के साथ भगवान की भक्ति आरम्भ की थी किन्तु जब उसकी भक्ति परिपक्व हो गयी और भगवान ने उसे दर्शन दिए तब उसने अनुभव किया कि उसने जो कामना की थी वह परमात्मा के दिव्य प्रेम रुपी अमूल्य रत्न की तुलना में काँच के टूटे हुए टुकड़े के समान थी तब फिर उसने भगवान से निष्काम, नि:स्वार्थ भक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की।
4. ज्ञान में स्थित ज्ञानी मनुष्यः अन्ततः कुछ जीवात्माओं को यह बोध हो जाता है कि वे भगवान के अणु अंश हैं और उनका परम धर्म भगवान से प्रेम और उनकी सेवा करना ही है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये चौथी श्रेणी वाले ही वे मनुष्य हैं जो भगवान की भक्ति में तल्लीन रहते हैं।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते |
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय: || 17||
इनमें से मैं उन्हें श्रेष्ठ मानता हूँ जो ज्ञान युक्त होकर मेरी आराधना करते हैं और दृढ़तापूर्वक अनन्य भाव से मेरे प्रति समर्पित होते हैं। मैं उन्हें बहुत प्रिय हूँ और वे भी मुझे अत्यंत प्रिय हैं।
वे जो भगवान का दु:ख में, सांसारिक सुख समृद्धि की प्राप्ति के लिए या जिज्ञासा के कारण स्मरण करते हैं, वे अब तक निष्काम भक्ति से युक्त नहीं होते। लेकिन धीरे-धीरे समर्पण भक्ति की प्रक्रिया से उनका हृदय शुद्ध हो जाता है और वे भगवान के साथ अपने नित्य संबंध का ज्ञान प्राप्त करते हैं। तत्पश्चात् भगवान के प्रति उनकी भक्ति अनन्य, एकचित्त और अविरल होती है। चूँकि उन्हें ऐसा ज्ञान प्राप्त हो जाता है कि संसार उनका नहीं है और यह आनन्द का स्रोत नहीं है अत: वे न तो अनुकूल परिस्थितियों की तृष्णा और न ही प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए शोक व्यक्त करते हैं। इस प्रकार से वे निष्काम भक्ति में स्थित हो जाते हैं। पूर्ण आत्मसमर्पण की भावना से वे अपने परम प्रियतम श्रीकृष्ण के लिए प्रेम की अग्नि में स्वयं को आहुति के रूप में अर्पित करते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे भक्त जो ऐसे सत्य ज्ञान में स्थित हो जाते हैं, मुझे अत्यंत प्रिय हैं।
उदारा: सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् |
आस्थित: स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् || 18||
वास्तव में वे सब जो मेरे प्रति शरणागत हैं, निःसंदेह महान हैं। लेकिन जो ज्ञानी हैं और स्थिर मन वाले हैं और जिन्होंने अपनी बुद्धि मुझमें विलय कर दी है और जो केवल मुझे ही परम लक्ष्य के रूप में देखते हैं, उन्हें मैं अपने समान ही मानता हूँ
श्लोक 7.17 में ज्ञानी भक्त को श्रेष्ठ बताने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब स्पष्ट करते हैं कि अन्य तीन प्रकार के भक्त भी पुण्यात्मा हैं। जो मनुष्य किसी भी कारण से भक्ति में लीन रहते हैं, वे भी सौभाग्यशाली हैं। फिर भी वे भक्त जो ज्ञान में स्थित होते हैं, वे भौतिक सुखों को प्राप्त करने के प्रयोजन से भगवान की भक्ति नहीं करते। जिसके परिणामस्वरूप भगवान ऐसे भक्तों के निष्काम और निश्छल प्रेम में बँध जाते हैं। पराभक्ति या दिव्य प्रेम सांसारिक प्रेम से अत्यंत भिन्न होता है। यह परम प्रियतम के सुख की भावना से ओत-प्रोत होता है जबकि सांसरिक प्रेम आत्म सुख की इच्छा से प्रेरित होता है। दिव्य प्रेम देने और अपने प्रियतम की सेवा के लिए प्रेयसी के त्याग की भावना से युक्त होता है किन्तु संसारिक प्रेम में लेने की भावना प्रधान होती है। सांसारिक प्रेम में लेने की प्रवृत्ति ही चित्रित होती है जिसमें प्रियतम से कुछ प्राप्त करना ही चरम लक्ष्य होता है। चैतन्य महाप्रभु ने इस प्रकार से वर्णन किया है
कामेर तात्पर्य निज-सम्भोग केवल ।
कृष्ण-सुख-तात्पर्य-मात्र प्रेम त' प्रबल ।।
अतएव काम-प्रेमे बहुत अन्तर ।
काम अन्ध-तम प्रेम निर्मल भास्कर ।।
(चैतन्य चरितामृत आदि लीला-4.166-167)
"काम-वासना आत्म सुख के लिए होती है, किन्तु दिव्य प्रेम में मन श्रीकृष्ण के सुख में ओत-प्रोत रहता है। इन दोनों में असाधारण भिन्नता पायी जाती है। काम वासना अज्ञान के अंधकार के समान है जबकि दिव्यप्रेम शुद्ध और प्रकाशमय सूर्य के समान होता है।" ।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने इसे अत्यंत सुन्दरता से व्यक्त किया है
ब्रह्मलोक पर्यंत सुख, अरु मुक्तिहुँ सुख त्याग।
तबै धरहु पग प्रेम पथ, नहिं लगि जैहैं दाग।।
(भक्ति शतक-45)
"यदि तुम भक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर होना चाहते हो तब सांसारिक सुखों और मुक्ति की कामनाओं का त्याग कर दो। अन्यथा दिव्यप्रेम का शुद्ध जल स्वार्थ रुपी मल से दूषित हो जाएगा।" नारद मुनि ने विशुद्ध भक्ति का निरूपण इस प्रकार से किया है
तत्सुख्सुखित्वम् ।।
(नारद भक्ति दर्शन, सूत्र-24)
"सच्चा प्यार प्रियतम के सुख के लिए होता है।" सांसारिकता द्वारा अभिप्रेरित भक्त ऐसी भक्ति में लीन नहीं हो सकते लेकिन जिस भक्त को इसका ज्ञान होता है वह निजी स्वार्थ के स्तर से ऊपर उठ जाता है। जब कोई इस प्रकार से भगवान से प्रेम करना सीख जाता है तब भगवान उस भक्त के दास बन जाते हैं। भगवान का सबसे बड़ा गुण भक्तवत्सलता है। पुराणों में ऐसा उल्लेख किया गया है
गीत्वा च मम नामानि विचरेन्मम सन्निधौ।
इति ब्रवीमि ते सत्यं क्रीतोहं तस्य चार्जुन ।।
(आदि पुराण-1.2.231)
श्रीकृष्ण कहते हैं "मैं अपने उन भक्तों का दास बन जाता हूँ जो मेरे नामों की महिमा का गान करते हैं और अपने ध्यान में मेरा ही चिन्तन करते हैं। हे अर्जुन! यह सत्य है-भगवान अपने निष्काम परमभक्तों के ऋणी हो जाते हैं।" गीता के इस श्लोक में तो भगवान यहाँ तक कह देते हैं कि वे ऐसे भक्तों को अपने समान देखते हैं।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते |
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ: || 19||
अनेक जन्मों की आध्यात्मिक साधना के पश्चात् जिसे ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वह मुझे सबका उद्गम जानकर मेरी शरण ग्रहण करता है। ऐसी महान आत्मा वास्तव में अत्यन्त दुर्लभ होती है।
यह श्लोक सामान्य धारणा को स्पष्ट करता है। प्रायः ऐसे लोग जो को ज्ञान से निम्न मानकर उसका उपहास करने में प्रवृत्त रहते हैं। वे ज्ञान प्राप्ति के अपने दंभ को प्रसारित करते रहते हैं और भक्ति में तल्लीन लोगों को निम्न दृष्टि से देखते हैं। किन्तु इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने एकदम विपरीत कहा है। वे कहते हैं कि अनेक जन्मों तक ज्ञान का अनुशीलन करने के पश्चात् जब ज्ञानी का ज्ञान परिपक्व अवस्था को प्राप्त करता है तब वह अंततः भगवान के शरणागत होता है।
वास्तव में सच्चा ज्ञान भक्ति की ओर ले जाता है। एक बार एक व्यक्ति समुद्र के किनारे भ्रमण कर रहा था और उसे वहाँ रेत में अंगूठी मिल गयी। उसने अंगूठी उठा ली लेकिन उसे अंगूठी का मूल्य ज्ञात नहीं था। उसने सोचा कि यह नकली आभूषण होगा और सामान्य रूप से आजकल उसका मूल्य मात्र 100 रुपये होना चाहिए। अगले दिन वह सुनार के पास गया और उससे कहा-'क्या तुम मुझे इस अंगूठी का दाम बता सकते हो? सुनार ने अंगूठी को परखा और कहा-'यह 22 केरेट का सोना है। इसका दाम एक लाख रुपये होना चाहिए।' यह सुनकर उस व्यक्ति का उस अंगूठी में अनुराग बढ़ गया। अब जब वह उस अंगूठी को देखता तब उसे इतनी प्रसन्नता होती जितनी उसे एक लाख रुपये का उपहार प्राप्त होने पर होती।
कुछ दिन व्यतीत होने के पश्चात् उसका चाचा उसे मिला जो एक सुनार था और दूसरे नगर से आया था। उसने अपने चाचा से पूछा-'क्या आप इस अंगूठी और इसमें जड़े रत्न के मूल्य का आंकलन कर सकते हो।' उसके चाचा ने अंगूठी को देखा और चिल्ला कर कहने लगा—'यह तुम्हें कहाँ से मिली? यह शुद्ध हीरा है और इसका दाम एक करोड़ रुपये होगा।' यह सुनकर वह आनन्द से झूम उठा और कहने लगा-'चाचा जी कृपया मेरे साथ उपहास न करें।' चाचा ने कहा-'नहीं मेरे बच्चे! मैं तुमसे कोई उपहास नहीं कर रहा। यदि तुम्हें विश्वास नहीं है तो तुम मुझे यह अंगूठी 75 लाख रुपये में बेच सकते हो' अब अंगूठी के वास्तविक मूल्य के संबंध में उसकी जानकारी पुष्ट हो गयी। तत्क्षण उसकी अंगूठी में आसक्ति बढ़ गयी। उसे लगा कि उसने कोई लॉटरी जीत लिया है और उसके आनन्द की कोई सीमा नहीं थी।
यह देखें कि कैसे उस व्यक्ति का उस अंगूठी के प्रति अनुराग उसके ज्ञान के अनुपात के अनुसार बढ़ता गया। जब उसे ज्ञात हुआ कि अंगूठी का दाम 100 रुपये है तब उसका अनुराग उसके प्रति कुछ सीमा तक बढ़ा। जब उसे यह जानकारी मिली कि उस अंगूठी का दाम एक लाख रुपये है तब उसी अनुपात में अंगूठी के प्रति उसका अनुराग और अधिक बढ़ गया। फिर जब उसे यह ज्ञात हुआ कि अंगूठी का वास्तविक मूल्य एक करोड़ रुपये है फिर उसके प्रति उसकी आसक्ति और बढ़ गई। उपर्युक्त उदाहरण ज्ञान और प्रेम के प्रत्यक्ष पारस्परिक संबंध को चित्रित करता है। रामचरितमानस में भी वर्णन किया गया है
जानें बिन होइ न परतीती।
बिनु परतीती होइ नहिं प्रीती ।।
"बिना ज्ञान के श्रद्धा उत्पन्न नहीं हो सकती और बिना श्रद्धा के प्रेम नहीं बढ़ सकता।" इसलिए सच्चा ज्ञान स्वाभाविक रूप से प्रेम का सूचक प्राप्त होता है। यदि हम यह दावा करते हैं कि हम ब्रह्म के ज्ञान से सम्पन्न हैं लेकिन यदि हम उसके प्रति प्रेम की अनुभूति नहीं करते तब हमारा ज्ञान केवल सैद्धान्तिक ही होता है।
यहाँ श्रीकृष्ण यह व्यक्त करते हैं कि अनेक जन्मों तक ज्ञान का अनुशीलन करने के पश्चात् जब ज्ञानी मनुष्य का ज्ञान परिपक्व होकर सत्य ज्ञान में परिवर्तित हो जाता है तब वह परम प्रभु को सभी का उद्गम जानकर उनके शरणागत होता है। इस श्लोक में यह चित्रित किया गया है कि महान आत्माएँ विरली ही होती हैं। भगवान ऐसे वचन ज्ञानी, कर्मी, हठ योगी इत्यादि के लिए नहीं कहते अपितु वे यह सब केवल अपने भक्त के लिए कहते हैं और यह घोषणा भी करते हैं कि ऐसी महान आत्माएँ अत्यंत दुर्लभ होती हैं, जो यह समझती हैं कि “भगवान ही सबकुछ हैं और उनके शरणागत होती हैं।" ।
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञाना: प्रपद्यन्तेऽन्यदेवता: |
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियता: स्वया || 20||
वे मनुष्य जिनकी बुद्धि भौतिक कामनाओं द्वारा हर ली गयी है, वे देवताओं की शरण में जाते हैं। अपनी-अपनी प्रवृत्ति के अनुसार वे देवताओं की पूजा करते हैं और इन देवताओं को संतुष्ट करने के लिए वे धार्मिक कर्मकाण्डों में संलग्न रहते हैं।
जब भगवान श्रीकृष्ण सभी अस्तित्वों के आधार हैं तब कोई भी देवता अपने आप में स्वतंत्र नहीं हो सकता। जैसे किसी देश का राष्ट्रपति देश की शासन व्यवस्था का संचालन कई अधिकारियों की सहायता से करता है उसी प्रकार से देवता भी भगवान के शासन के अधिकारी हैं। हमारे जैसी जीवात्माएँ जोकि आध्यात्मिक रूप से समुन्नत हैं, वे अपने पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों के परिणामस्वरूप भौतिक जगत की शासन व्यवस्था में उच्च पद प्राप्त कर लेती हैं। वे किसी को माया के बंधनों से मुक्ति नहीं दिला सकतीं क्योंकि वे अपने आप में स्वतंत्र नहीं हैं। वे केवल अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर की भौतिक वस्तुएँ प्रदान कर सकती हैं। लौकिक कामनाओं की पूर्ति हेतु लोग देवताओं की पूजा करते हैं और उनकी पूजा के लिए निश्चित धार्मिक विधियों का पालन करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे लोग जिनका ज्ञान भौतिक इच्छाओं से आच्छादित हो जाता है वही देवताओं की पूजा करते हैं।
यो यो यां यां तनुं भक्त: श्रद्धयार्चितुमिच्छति |
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् || 21||
भक्त श्रद्धा के साथ स्वर्ग के देवता की जिस रूप की पूजा करना चाहता है, मैं ऐसे भक्त की श्रद्धा को उसी रूप में स्थिर करता हूँ।
परमात्मा की पूजा में आस्था होना अत्यंत लाभकारी है और यह सच्चे ज्ञान से प्राप्त होता है। यदि संसार में अपने आस-पास देखें तो हम यह पाते हैं कि स्वर्ग के देवताओं के भक्त भी इसी प्रकार की दृढ़ता और अदम्य श्रद्धा विश्वास के साथ उनकी भक्ति में लीन रहते हैं। आश्चर्य है कि कैसे ये लोग ऐसी निम्न स्तर की आराधना करते हुए उच्च स्तर की श्रद्धा भक्ति विकसित कर लेते हैं। श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में इसका उत्तर प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं कि वे ही देवताओं के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करते हैं। जब वे लोगों को अपनी लौकिक कामनाओं की पूर्ति हेतु देवताओं की पूजा करते हुए देखते हैं तब वे उनके विश्वास को दृढ़ कर उनकी श्रद्धा बढ़ाने में सहायता करते हैं। स्वर्ग के देवताओं में अपने भक्तों में श्रद्धा उत्पन्न करने की सामर्थ्य नहीं होती। यह भीतर निवास करने वाला परमात्मा ही उनमें श्रद्धा उत्पन्न करते हैं। जैसा कि भगवान श्रीकृष्ण ने श्लोक 15.15 में कहा है-"मैं सभी प्राणियों के हृदय में बैठा हूँ। स्मृति, ज्ञान और बुद्धि मुझसे ही प्राप्त होती है।"
अब कोई पूछ सकता है कि परमात्मा देवताओं के प्रति श्रद्धा क्यों उत्पन्न करते हैं जबकि ऐसी श्रद्धा अनुपयुक्त रूप से की जाती है। यह उसी प्रकार से है जैसे माता-पिता अपने छोटे बच्चों को बनावटी गुड़िया के साथ खेलने की अनुमति देते हैं, मानो वह जीवंत बच्चा हो। अभिभावक यह जानते हैं कि उनके बच्चे में गुड़िया के प्रति अनुराग अज्ञानता के कारण है पर फिर भी वे इसलिए अपने बच्चे को गुड़िया से प्रेम करने और उसके साथ खेलने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, क्योंकि वे यह जानते हैं कि इससे उसमें अनुराग, प्रेम और देखभाल करने जैसे गुणों को विकसित करने में सहायता मिलेगी और जब वह बच्चा बड़ा होगा तब यह सब उसके लिए लाभदायक होगा। उसी तरह जब जीवात्माएँ सांसारिक सुखों की कामना से देवताओं की आराधना करती हैं तब भगवान उनके विश्वास को इस आशा के साथ दृढ़ करते हैं कि ये सब अनुभव आत्मा के उत्थान में सहायता करेंगे। फिर एक दिन आत्मा भगवान की शरण में आकर उन्हें ही सबका परमार्थ करने वाला समझने लगेगी।
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते |
लभते च तत: कामान्मयैव विहितान्हि तान् || 22||
श्रद्धायुक्त होकर ऐसे भक्त किसी देवता विशेष की पूजा करते हैं और अपनी वांछित वस्तुएँ प्राप्त करते हैं किन्तु वास्तव में ये सारे लाभ मेरे द्वारा ही प्रदान किए जाते हैं।
लभते का अर्थ 'प्राप्त करना' है। देवताओं के भक्त देवता विशेष की पूजा कर अपनी इच्छा के पदार्थ प्राप्त करते हैं किन्तु वास्तव में यह पदार्थ देवता नहीं देते अपितु भगवान ही सब कुछ प्रदान करते हैं। इस श्लोक का अर्थ स्पष्ट है कि देवताओं के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है कि वे भौतिक वस्तुओं को प्रदान कर सकें। भगवान से स्वीकृति प्राप्त होने पर ही वे अपने भक्तों को सांसारिक पदार्थ प्रदान कर सकते हैं। वे अपने भक्तों को सांसारिक पदार्थ तभी प्रदान कर सकते हैं जब भगवान इन्हें प्रदान करने की स्वीकृति प्रदान कर देते हैं। किन्तु अल्प ज्ञानी लोग यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यह सब सुख-सुविधाएँ उन देवताओं से ही प्राप्त होती हैं जिनकी वह पूजा करते हैं।
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् |
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि || 23||
किन्तु ऐसे अल्पज्ञानी लोगों को प्राप्त होने वाले फल भी नश्वर होते हैं। जो लोग देवताओं की पूजा करते हैं, वे देव लोकों को जाते हैं जबकि मेरे भक्त मेरे लोक को प्राप्त करते हैं।
प्राथमिक विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करना अनिवार्य है। लेकिन बड़े होने पर छात्रों को प्राथमिक विद्यालय छोड़ना पड़ता है। यदि कोई छात्र प्राथमिक विद्यालय में आवश्यकता से अधिक रहना चाहता है तब अध्यापक उसे प्रोत्साहित नहीं करेगा और छात्र को जीवन में आगे बढ़ने की शिक्षा देगा। इसी प्रकार से नव दीक्षित साधक देवताओं की पूजा करना चाहते हैं।
श्लोक 7.21 में किए गए वर्णन के अनुसार श्रीकृष्ण उनके विश्वास को दृढ़ करते हैं किन्तु भगवद्गीता आध्यात्मिक छात्रों के लिए कोई प्राथमिक विद्यालय नहीं है और इसलिए वे अर्जुन को आध्यात्मिक सिद्धान्त समझने के लिए कहते हैं-"किसी की पूजा करने से उसी का फल प्राप्त होता है। वे जो देवताओं की पूजा करते हैं वे मृत्यु पश्चात् देवताओं के लोक में जाते हैं और जो मेरी आराधना करते हैं, वे मेरे धाम में प्रवेश करते हैं।" जब देवतागण नश्वर है तब उनकी पूजा से प्राप्त होने वाले फल भी नश्वर होते हैं। किन्तु भगवान अविनाशी हैं इसलिए उनकी पूजा से प्राप्त फल स्थायी अर्थात् अनश्वर होते हैं। भगवान के भक्त उनकी नित्य सेवा और सदा के लिए उनके धाम को प्राप्त करते हैं।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धय: |
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् || 24||
बुद्धिहीन मनुष्य सोचते हैं कि मैं परमेश्वर पहले निराकार था और अब मैंने यह साकार रूप धारण किया है, वे मेरे इस अविनाशी और सर्वोत्तम दिव्य स्वरूप की प्रकृति को नहीं जान पाते।
कुछ लोग दृढ़तापूर्वक यह दावा करते हैं कि भगवान निराकार है जबकि अन्य लोग निश्चयपूर्वक कहते हैं कि भगवान केवल साकार रूप में है। किन्तु ये दोनों दृष्टिकोण सीमित और अपूर्ण हैं। भगवान पूर्ण है इसलिए वे निराकार और साकार दोनों रूप में विद्यमान रहते हैं। इसकी चर्चा श्लोक 4.5 और 4.6 की टिप्पणी में की गयी है। भगवान के दोनों रूपों को स्वीकार करने वाले लोगों के मध्य कभी-कभी यह विवाद उत्पन्न होता है कि भगवान के इन दोनों रूपों में से कौन सा रूप वास्तविक है। क्या निराकार रूप साकार व्यक्तित्त्व के रूप में प्रकट होता है या इसके विपरीत? श्रीकृष्ण यहाँ इस विवाद का समाधान यह कहकर करते हैं कि उनका यह दिव्य रूप अनादिकालीन है और यह निराकार ब्रह्म से प्रकट नहीं हुआ है। भगवान आध्यात्मिक क्षेत्र में अपने दिव्य स्वरूप में नित्य विद्यमान रहते हैं। निराकार ब्रह्म एक ज्योति है जो उसके अलौकिक शरीर से प्रकट होती है। पद्मपुराण में वर्णन है
यन्नखेन्दुरुचिर्ब्रह्म ध्येयं ब्रह्मदिभि: सुरै: ।
गुणत्रयमतीतं तं वन्दे वृन्दावनेश्वरम् ।।
(पद्मपुराण, पाताल खण्ड-77.60)
"भगवान के पैर के नखों से प्रकट होने वाली ज्योति की ज्ञानी ब्रह्म के रूप में पूजा करते हैं।" वास्तव में भगवान के साकार और निराकार रूपों के बीच कोई अन्तर नहीं है। ऐसा नहीं है कि एक बड़ा और दूसरा छोटा है। निराकार ब्रह्म स्वरूप में भगवान की सभी शक्तियाँ विद्यमान रहती हैं किन्तु वे अप्रकट रहती हैं। उनके साकार रूप में उनके नाम, रूप, लीला, गुण, धाम और संत सब उनकी दिव्य शक्ति से प्रकट होते हैं। तब फिर लोग भगवान को साधारण मानव क्यों मानते हैं? इस प्रश्न के उत्तर की व्याख्या अगले श्लोक में की गयी है।
नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत: |
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् || 25||
मैं सभी के लिए प्रकाशित नहीं हूँ क्योंकि सब मेरी अंतरंग शक्ति 'योगमाया' द्वारा आच्छादित रहते हैं। इसलिए मूर्ख और अज्ञानी लोग यह नहीं जानते कि मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ।
श्लोक 7.4 और 7.5 में अपनी दो शक्तियों का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण अपनी तीसरी अतरंग शक्ति 'योगमाया' का उल्लेख करते हैं। यह भगवान की परम शक्ति है। विष्णु पुराण में इस प्रकार से वर्णन किया गया है
विष्णु शक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथाऽपरा।
अविद्या कर्म सञ्ज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ।।
"परमात्मा श्री विष्णु की तीन प्रमुख शक्तियाँ हैं-योगमाया, जीव और माया।" जगद्गुरु श्री कृपालु जी ने भी इसका विशद वर्णन किया है
शक्तिमान की शक्तियाँ, अगनित यदपि बखान।
तिन महँ 'माया', 'जीव', अरु, 'परा' त्रिशक्ति प्रधान ।।
(भक्ति शतक श्लोक-3)
"शक्तिमान परमात्मा श्रीकृष्ण की अनन्त शक्तियाँ हैं। इनमें योगमाया, जीव और माया प्रमुख हैं"
दिव्य अंतरंग शक्ति 'योगमाया' भगवान की सर्वोच्च शक्ति है जिसके द्वारा वे अपनी दिव्य लीलाएँ, अपना दिव्य प्रेम, अपना दिव्य आनन्द और दिव्य लोक प्रकट करते हैं।
भगवान संसार में अवतार लेते हैं और पृथ्वी लोक पर अपनी लीलाओं को प्रकट करते हैं। इसी योगमाया की शक्ति द्वारा वे स्वयं को आच्छादित रखते हैं। यद्यपि भगवान हमारे हृदय में विराजमान हैं किन्तु हमें उनकी उपस्थिति का कोई बोध नहीं होता। जब तक योगमाया उनकी दिव्यता को हमसे गुप्त रखती है तब तक हम उनके दिव्य दर्शन करने में समर्थ नहीं हो सकते। इसलिए यदि हम वर्तमान में भगवान को साकार रूप में भी देखते हैं तब भी हम उन्हें भगवान के रूप में पहचानने में समर्थ नहीं हो सकते। जब भगवान की योगमाया शक्ति हम पर कृपा करती है केवल तभी हम भगवान के दिव्य रूप को देख सकते हैं और उन्हें भगवान के रूप में पहचानने लगते हैं।
चिदानंदमय देह तुम्हारी।
बिगत विकार जान अधिकारी।।
(रामचरितमानस)
"हे भगवान, आपका स्वरूप दिव्य है। केवल वे जिनका हृदय शुद्ध है, आपकी कृपा से आपको जान सकते हैं।"
योगमाया शक्ति निराकार और साकार दोनों रूपों में प्रकट होती है जैसे कि राधा, सीता, काली, लक्ष्मी, पार्वती आदि। ये सब योगमाया शक्ति के दिव्य रूप हैं और वैदिक संस्कृति में इन सबको ब्रह्माण्ड की माँ के रूप में चित्रित किया गया है। ये अपनी उदारता, करुणा, क्षमा, और अकारण प्रेम जैसे गुणों से प्रकाशित हैं। हमारे लिए यह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि ये जीवात्मा पर अपनी दिव्य कृपा बरसाते हुए उन्हें अलौकिक ज्ञान प्रदान करती हैं जिसके द्वारा वह भगवान को जान सके। इसलिए वृंदावन के भक्त 'राधे राधे श्याम मिला दे' गाते रहते है अर्थात 'हे राधे! अपनी अनुकम्पा प्रदान कर कृष्ण से मिलने में मेरी सहायता करो।' इस प्रकार योगमाया दोनों कार्य करती है। वह भगवान को उन जीवात्माओं से आच्छादित रखती है जिनमें भगवान को जानने की पात्रता नहीं होती और शरणागत जीवात्माओं पर कृपा करती है ताकि वे भगवान को जान सके। वे लोग जिन्होंने भगवान की ओर अपनी पीठ कर रखी है अर्थात् जो भगवान से विमुख रहते हैं, वे माया से आच्छादित हो जाते हैं और योगमाया की कृपा से वंचित रहते हैं। जो भगवान की ओर अपना मुख कर लेते हैं वे योगमाया की शरण में आते हैं और माया के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन |
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन || 26||
हे अर्जुन! मैं भूत, वर्तमान और भविष्य को जानता हूँ। मैं सभी प्राणियों को जानता हूँ। लेकिन मुझे कोई नहीं जानता।
भगवान सर्वज्ञ हैं। यहाँ वे स्वयं को त्रिकालदर्शी घोषित करते हैं। उन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य की जानकारी है जबकि हम तो यही भूल जाते हैं कि कुछ घंटे पूर्व हमने क्या सोचा था? भगवान ब्रह्माण्ड की प्रत्येक जीवात्मा के सभी जन्मों का, उनके जीवन के प्रत्येक क्षण के विचारों, शब्दों और कर्मों का स्मरण रखते हैं। यही हमारे संचित कर्म बनते हैं। भगवान इन सब कर्मों का लेखा जोखा रखते हैं, ताकि वे कर्म के अनुसार न्याय प्रदान कर सकें। इसी कारण से वे कहते हैं कि वे भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता हैं। मुंडकोपनिषद् में वर्णन है
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः।
(मुंडकोपनिषद्-1.1.9)
"भगवान सब कुछ जानने वाले और सर्वज्ञ हैं"
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में कहते हैं कि यद्यपि वह सब कुछ जानते हैं किन्तु उन्हें कोई नहीं जानता। भगवान का तेज, वैभव, महिमा, शक्तियाँ, गुण और आयाम अनन्त हैं। हमारी बुद्धि सीमित है, इसलिए ऐसा कोई उपाय नहीं जिससे यह सर्वशक्तिमान भगवान को समझ सके। सभी वैदिक ग्रंथ कहते हैं
नैषा तर्केण मतिरापनेया
(कठोपनिषद्-1.2.9)
"भगवान हमारे तर्क की परिधि से परे हैं।"
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।
(तैत्तिरीयोपनिषद्-2.9.1)
"हमारा मन और वाणी भगवान तक नहीं पहुँच सकती।" ।
राम अतयं बुद्धि मन बानी।
मत हमार अस सुनहि सयानी।।
(रामचरितमानस)
"भगवान का निरूपण तर्कों द्वारा नहीं कीया जा सकता और मन, वाणी और बुद्धि द्वारा उन्हें पाया नहीं जा सकता।"
केवल वही व्यक्ति भगवान को समझ सकता है जो स्वयं भगवान है। यदि वह किसी जीवात्मा पर अपनी कृपा करके, उसे अपनी बुद्धि दे देता है तब ऐसी भाग्यशाली आत्मा भगवान की शक्ति से सम्पन्न होकर भगवान को जान सकती है। भगवान को जानने के लिए भगवान की कृपा का महत्व सर्वोपरि है। इस बिन्दु पर 10वें अध्याय के 11वें श्लोक तथा 18वें अध्याय के 58वें श्लोक में विस्तार से चर्चा की गयी है।
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत |
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप || 27||
हे भरतवंशी! इच्छा तथा द्वेष के द्वन्द्व मोह से उत्पन्न होते हैं। हे शत्रु विजेता! भौतिक जगत में समस्त जीव जन्म से ही इनसे मोहग्रस्त होते हैं।
संसार द्वन्द्वों से भरपूर है, जैसे कि दिन-रात, सर्दी और गर्मी, सुख और दु:ख तथा आनन्द और पीड़ा। सबसे बडा द्वन्द्व जन्म और मृत्यु का है। जिस क्षण जीव जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित हो जाती है। मृत्यु के पश्चात् जीव पुनः अगला जन्म लेता है। जन्म और मृत्यु के दो छोरों के बीच जीवन की रंगभूमि है। ये द्विविधिताएँ सभी के अनुभवों का अभिन्न अंग हैं।
लौकिक चेतना में हम किसी को चाहते हैं और कुछ लोगों से घृणा करते हैं। यह अनुराग और विद्वेष द्वैतता का स्वाभाविक गुण नहीं है अपितु यह हमारी अज्ञानता से उत्पन्न होता है। हमारी विकृत बुद्धि यह समझती है कि लौकिक सुख ही हमारे निजी हितों की पूर्ति कर सकते हैं। हम यह समझते हैं कि पीड़ा हमारे लिए अत्यंत कष्टदायक है। हम यह अनुभव नहीं कर पाते कि भौतिक रूप से सुखदायक परिस्थितियाँ हमारी आत्मा पर पड़े सांसारिक मोह के आवरण को अधिक कठोर बना देती हैं जबकि विपरीत परिस्थितियाँ हमारे मोह को मिटाने और आत्मा को उन्नत करने में समर्थ होती हैं।
हमारे मोह का मूल कारण अज्ञानता है। मनुष्य का राग और द्वेष के द्वन्द्वों से ऊपर उठना, पसंद-नापसंद और इन दोनों को भगवान की सृष्टि के अविभाज्य रूप में अंगीकार करना ही आध्यात्मिक ज्ञान में स्थित होने का लक्षण है।
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् |
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रता: || 28||
लेकिन पुण्य कर्मों में संलग्न रहने से जिन व्यक्तियों के पाप नष्ट हो जाते हैं, वे मोह के द्वन्द्वों से मुक्त हो जाते हैं। ऐसे लोग दृढ़ संकल्प के साथ मेरी पूजा करते हैं।
श्रीकृष्ण ने दूसरे अध्याय के 69वें श्लोक में कहा था कि अज्ञानी जिसे रात्रि कहते हैं, बुद्धिमान उसे दिन कहते हैं। भगवत्प्राप्ति की अभिलाषा करने वाले जागृत हो जाते हैं और आध्यात्मिक विकास के अवसर के रूप में दु:ख एवं पीड़ा का स्वागत करते हैं। वे ऐसे सुखों से सावधान रहते हैं जो आत्मा को अज्ञान से आच्छादित करते हैं। इस प्रकार वे न तो सुख के लिए लालायित होते हैं और न ही दु:ख के लिए शोक करते हैं। ऐसी जीवात्माएँ जो अपने मन को इच्छाओं और घृणा के द्वन्द्वों से मुक्त कर देती हैं, वे अविचलित होकर दृढ़ संकल्प के साथ मेरी पूजा करती हैं।
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये |
ते ब्रह्म तद्विदु: कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् || 29||
जो मेरी शरण ग्रहण कर बुढ़ापे और मृत्यु से छुटकारा पाने की चेष्टा करते हैं, वे ब्रह्म, अपनी आत्मा और समस्त कर्म के क्षेत्र को जान जाते हैं।
जैसा कि श्लोक 7.26 में कहा गया है कि भगवान को बुद्धि की सामर्थ्य से जाना नहीं जा सकता किन्तु जो उनके शरणागत हो जाते हैं वही उनकी कृपा प्राप्त करते हैं। भगवान जब किसी पर अपनी कृपा करते हैं तब वे लोग सरलता से उसे जानने में सक्षम हो जाते हैं।
कठोपनिषद् में वर्णन है
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।
(कठोपनिषद्-1.2.23)
"भगवान को न तो आध्यात्मिक उपदेशों, बुद्धि और न ही विभिन्न प्रकार की शिक्षाओं को सुनकर जाना जा सकता है। भगवान जब किसी पर अपनी कृपा करते हैं तब केवल वही भाग्यशाली आत्मा उन्हें जान पाती है" जब कोई भगवान का ज्ञान प्राप्त कर लेता है तब वह भगवान के संबंध में सब कुछ जान लेता है। वेदों में भी उल्लेख किया गया है-“एकस्मिन् विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति" अर्थात “यदि तुम भगवान को जान जाते हो तब तुम सब कुछ जान जाओगे।"
कुछ अध्यात्मवाद के साधक आत्मज्ञान को ही चरम लक्ष्य मानते हैं। जिस प्रकार जल की बूंद महासागर का लघु अंश होती है, ठीक इसी प्रकार से आत्म ज्ञान ब्रह्म ज्ञान का छोटा सा अंश है। वे जिन्हें बूंद का ज्ञान होता है, उनके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वे महासागर की गहराई चौड़ाई और शक्ति को जान सकें। उसी प्रकार जो आत्मा को समझ लेते हैं, उनके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वे भगवान को भी जानते हों। किन्तु वे जिन्हें भगवान का ज्ञान हो जाता है उन्हें स्वतः उन सब का ज्ञान हो जाता है जो भगवान से संबंधित हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे जो उनकी शरण में आ जाते हैं उन्हें भगवान की कृपा से आत्मा और कर्म के क्षेत्र का ज्ञान हो जाता है।
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदु: |
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतस: || 30||
वे जो मुझे 'अधिभूत' (प्रकृति के तत्त्वों के नियामक) और 'अधिदेव' (देवतागण के नियामक) तथा 'अधियज्ञ' (यज्ञों के नियामक) के रूप में जानते हैं, ऐसी प्रबुद्ध आत्माएँ सदैव यहाँ तक कि अपनी मृत्यु के समय भी मेरी चेतना में लीन रहती हैं।
अगले अध्याय में श्रीकृष्ण उन प्रबुद्ध आत्माओं के संबंध में बताएँगे जो देह त्यागते समय उनका स्मरण करती हैं और उनका लोक प्राप्त करती हैं। किन्तु मृत्यु के समय भगवान का स्मरण अत्यंत कठिन होता है। इसका कारण यह है कि मृत्यु अत्यंत पीड़ादायक है। यह किसी को एक साथ दो हजार बिच्छुओं के काटने के समय होने वाली पीड़ा के समान है। मृत्यु के समय मन और बुद्धि कार्य करना बंद कर देते हैं और व्यक्ति चेतना शून्य हो जाता है तब ऐसी स्थिति में कोई भगवान का स्मरण कैसे कर सकता है?
यह केवल उनके लिए संभव है जो शरीर के सुख और दु:ख से परे हैं। ऐसे लोग बहुत सजगता से देह का त्याग करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो उन्हें अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के नियामक के रूप में जानते हैं, वे अपनी मृत्यु के समय भी उनकी चेतना से परिपूर्ण रहते हैं, क्योंकि सच्चा ज्ञान पूर्ण समर्पण की ओर ले जाता है तब मन भगवान में पूर्ण रूप से अनुरक्त हो जाता है। यह शारीरिक राग और द्वेष के प्रति विरक्त हो जाता है और ऐसी आत्मा फिर कभी शारीरिक चेतना की अनुभूति नहीं करती।
अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ शब्दों की व्याख्या अगले अध्याय में होगी।
।। श्रीमद्भागवत गीता सप्तम अध्याय सम्पूर्ण।।
Bhagavad Geeta Chapter 6
kathaShrijirasik
अध्याय छह: ध्यानयोग
ध्यान का योग
श्रीकृष्ण कर्मयोग और कर्म संन्यास के तुलनात्मक विवेचन को छठे अध्याय में भी जारी रखते हैं और कर्मयोग की संस्तुति करते हैं।जब हम समर्पण की भावना से कार्य करते हैं तब इससे हमारा मन शुद्ध हो जाता है और हमारी आध्यात्मिक अनुभूति गहनहो जाती है।मन के शांत हो जाने पर साधना उत्थान का मुख्य साधन बन जाती है।ध्यान द्वारा योगी मन को वश में करने काप्रयास करते हैं क्योंकि अनियंत्रित मन हमारा शत्रु है और नियंत्रित मन हमारा प्रिय मित्र है।श्रीकृष्ण अर्जुन को सावधान करतेहैं कि कठोर तप में लीन रहने से कोई सफलता प्राप्त नहीं कर सकता इसलिए मनुष्य को अपने खान-पान, कार्य-कलापों, आमोद-प्रमोद और निद्रा को संतुलित रखना चाहिए। फिर वे मन को भगवान में एकीकृत करने के लिए साधना विधि का वर्णनकरते हैं।जिस प्रकार से वायु रहित स्थान पर रखे दीपक की ज्वाला अचल होती है। ठीक उसी प्रकार साधक को भी मनसाधना में स्थिर रखना चाहिए।वास्तव में मन को वश में करना कठिन है लेकिन अभ्यास और वैराग्य द्वारा इसे नियंत्रित कियाजा सकता है।इसलिए मन यदि कहीं भटकने लगे तो हमें वहाँ से इसे वापस लाकर निरन्तर भगवान में लगाना चाहिए। जब मनशुद्ध हो जाता है तब यह दिव्य बन जाता है।आनन्द की इस अवस्था को समाधि कहते हैं।
इसके पश्चात् अर्जुन उस साधक की गति के संबंध में प्रश्न करता है जो इस मार्ग का अनुसरण करना आरम्भ तो करता हैलेकिन अस्थिर मन के कारण लक्ष्य तक पहुँचने में असमर्थ रहता है। श्रीकृष्ण उसे आश्वस्त करते हैं कि जो भगवत्प्राप्ति केलिए प्रयास करता है, उसका कभी पतन नहीं हो सकता।भगवान हमारे पूर्व जन्मों में संचित आध्यात्मिक गुणों का लेखा-जोखारखते हैं और अगले जन्मों में उस ज्ञान को पुनः जागृत करते हैं ताकि हमने अपनी यात्रा को जहाँ छोड़ा था उसे वहीं से पुनः आगेजारी रख सकें।पूर्व जन्मों से अर्जित कर्मों के बल पर योगी अपने वर्तमान जीवन में भगवान तक पहुँचने में समर्थ हो सकता है।इस अध्याय का समापन इस उद्घोषणा के साथ होता है कि योगी भगवान के साथ एकीकृत होने का प्रयास करता है इसलिएवह तपस्वी, ज्ञानी और कर्मी से श्रेष्ठ होता है। सभी योगियों में से जो भक्ति में तल्लीन रहता है वह सर्वश्रेष्ठ होता है
श्रीभगवानुवाच |
अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य: |
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय: || 1||
प्रभु ने कहा! वे मनुष्य जो कर्मफल की कामना से रहित होकर अपने नियत कर्मों का पालन करते हैं वे वास्तव में संन्यासी और योगी होते हैं, न कि वे जो अग्निहोत्र यज्ञ संपन्न नहीं करते या शारीरिक कर्म नहीं करते।
वेदों में वर्णित धार्मिक अनुष्ठानों में अग्नि प्रज्ज्वलित कर यज्ञों को संपन्न करना प्रमुख है, जैसे अग्निहोत्र यज्ञ। संसार कापरित्याग करने वालों लिए और 'संन्यास' आश्रम में प्रवेश करने वालों के लिए ऐसे नियम हैं कि वे धार्मिक विधियों काअनुपालन नहीं करेंगे और किसी भी रूप में अग्नि का प्रयोग नहीं करेंगे तथा वे केवल भिक्षा माँग कर जीवन निर्वाह करेंगे।किन्तु इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह अभिव्यक्त किया है कि केवल अग्नि का त्याग करने से कोई संन्यासी नहीं बन सकता।
सच्चा योगी और सच्चा संन्यासी कौन है? इस विषय पर अत्यधिक भ्रम है। प्रायः लोग कहते हैं-"यह स्वामी जी फलाहारी हैंइसलिए अवश्य सिद्ध योगी होंगे।" "यह दुग्धाहारी बाबाजी हैं जो केवल दूध पर निर्भर रहते हैं, अतः ये अवश्य ही महायोगी कीअवस्था को प्राप्त होंगे।" "यह पवनाहारी गुरुजी है, जो कुछ ग्रहण नहीं करते इसलिए निश्चित रूप से इन्हें भगवत्प्राप्ति होचुकी होगी।" "यह साधु नागा बाबा हैं जो कोई वस्त्र धारण नहीं करते इसलिए यह पूर्ण संन्यासी हैं।" भगवान श्रीकृष्ण कहतेहैं कि संन्यास के ऐसे बाहरी लक्षणों को दर्शाने से कोई न तो संन्यासी बन सकता है और न ही योगी। वे ज्ञानी जन जो अपनेकर्मफलों का त्याग कर उन्हें भगवान को समर्पित कर देते हैं वही सच्चे संन्यासी या योगी होते हैं।
आजकल पश्चिम जगत में 'योगा' एक रोमांचक शब्द बन गया है। संसार के सभी देशों में कुकुरमुत्ते की तरह योग संस्थानस्थापित हो रहे हैं।आँकड़े यह दर्शाते हैं कि अमेरिका के दस प्रतिशत व्यक्ति योग का अभ्यास करते हैं किन्तु संस्कृत धर्म ग्रंथोंमें 'योगा' शब्द का वर्णन नहीं किया गया है। अपितु वास्तविक शब्द 'योग' है और इसका अर्थ 'जुड़ना' है, जो मनुष्य की चेतनाको दिव्य चेतना के साथ एकीकृत करने का बोध कराता है। अन्य शब्दों में योगी वही है जिसका मन भगवान में पूर्णतयातल्लीन है। यह भी माना जाता है कि ऐसे योगी का मन स्वाभाविक रूप से संसार से विरक्त रहता है इसलिए वास्तविक योगीसच्चा संन्यासी भी होता है।
इस प्रकार जो मनुष्य भगवान की श्रद्धापूर्वक सेवा की भावना से कर्मयोग का अनुसरण करते हुए फल की इच्छा से रहितहोकर कर्म करते हैं चाहे वे गृहस्थी ही क्यों न हों, ऐसे मनुष्य ही वास्तव में सच्चे योगी और वास्तविक संन्यासी होते हैं।
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव |
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन || 2||
जिसे संन्यास के रूप में जाना जाता है वह योग से भिन्न नहीं है। कोई भी सांसारिक कामनाओं का त्याग किए बिना संन्यासी नहीं बन सकता।
संन्यासी वही है जो मन और इन्द्रियों के सुखों का परित्याग करता है | किन्तु केवल संन्यास लेना ही लक्ष्य नहीं है और न ही यह परम लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त है। वैराग्य का अर्थ स्वयं को गलत दिशा की ओर अग्रसर होने से रोकना है। हम संसार में सुखों को खोजते हैं और जब हम यह जान जाते हैं कि भौतिक पदार्थों से कोई सुख नहीं मिल सकता तब हम संसार की ओर भागना बंद कर देते हैं। किन्तु केवल रुकने से हम गन्तव्य तक नहीं पहुँच सकते। आत्मा का गन्तव्य भगवत्प्राप्ति है। भगवान की ओर सम्मुख होने के लिए उसमें मन को तल्लीन करना है जोकि योग का मार्ग है। जिन्हें अपने जीवन के परम लक्ष्य का अपूर्ण ज्ञान होता है वे संन्यास को आध्यात्मिकता के परम लक्ष्य के रूप में देखते हैं। किन्तु जो वास्तव में जीवन के परम लक्ष्य को जानते हैं वे श्रद्धापूर्वक भगवत्प्राप्ति को अपना परम लक्ष्य मानते हैं।
श्लोक 5.4 का अभिप्राय यह स्पष्ट करना था कि वैराग्य दो प्रकार का होता है-पहला-'फल्गु वैराग्य' और दूसरा 'युक्त वैराग्य' होता है। फल्गु वैराग्य में सांसारिक पदार्थों को माया के रूप में देखा जाता है और इसलिए संन्यासियों द्वारा उनका परित्याग कर दिया जाता है क्योंकि वे आत्मिक उन्नति के लिए दृढ़ संकल्पित होते हैं। युक्त वैराग्य वह है जिसमें सभी पदार्थों में भगवान का रूप दिखाई देता है और इसलिए उनका प्रयोग भगवान की सेवा के निमित्त किया जाता है। फल्गु वैराग्य में कोई योगी यह कह सकता है- 'धन का त्याग करो', 'इसे छुओ भी मत', 'यह माया का रूप है' और 'आध्यात्मिकता के पथ की ओर अग्रसर होने में बाधा डालता है।' दूसरे प्रकार के वैराग्य में कोई यह कह सकता है-'धन भगवान की माया शक्ति का रूप है। इसलिए इसे व्यर्थ मत करो या फेंको मत, जो भी तुम्हारे स्वामित्व में है उसे भगवान के सेवार्थ अर्पित कर दो।'
फल्गु वैराग्य अस्थायी है और यह सरलता से सांसारिक आसक्ति में खींच सकता है। इसका फल्गु नाम बिहार राज्य के गया नगर में बहने वाली नदी के नाम पर पड़ा है। फल्गु नदी सतह से नीचे बहती है। ऊपर से ऐसा लगता है कि नदी में पानी नहीं है किन्तु अगर हम कुछ गहराई तक इसे खोदते हैं तब हमें नीचे पानी की धारा मिल जाती है। सामान्यतः कई लोग संसार को त्याग कर मठों में रहने लगते हैं। किन्तु कुछ समय में उनका वैराग्य समाप्त हो जाता है और मन पुनः संसार की ओर आसक्त हो जाता है। उनकी संसार के प्रति अनासक्ति फल्गु वैराग्य जैसी ही थी। संसार को बोझ और कष्टदायी समझ कर उन्होंने संसार से सन्यास लेने की इच्छा की और मठों में आश्रय लिया। जब उन्हें यह प्रतीत हुआ कि आध्यात्मिक जीवन भी कठिन और दुष्कर है तब उनकी आध्यात्मिकता से भी उसी प्रकार से विरक्ति हो गयी। दूसरी ओर अन्य लोग भगवान के साथ मधुर संबंध स्थापित करने के लिए और उनकी सेवा की इच्छा से प्रेरित होकर संसार का त्याग कर मठों में जीवन व्यतीत करते हैं। उनका वैराग्य 'युक्त वैराग्य' है। वे प्रायः कठिनाइयों का सामना करने पर भी अपनी आध्यात्मिक यात्रा जारी रखते हैं।
इस श्लोक की प्रथम पंक्ति में श्रीकृष्ण ने यह अभिव्यक्त किया है कि सच्चा संन्यासी ही योगी होता है अर्थात् वह जो अपने मन को भगवान की प्रेममयी सेवा में लगा देता है। दूसरी पंक्ति में श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि लौकिक कामनाओं का त्याग किए बिना कोई भी योगी नहीं बन सकता। यदि मन में सांसारिक कामनाएँ रहती हैं तब स्वाभाविक रूप से मन सांसारिक आकर्षणों की ओर भागेगा। क्योंकि यह मन ही है, जिसे भगवान के साथ युक्त होना है और यह तभी सम्भव है जब मन सभी प्रकार की सांसारिक कामनाओं से मुक्त हो। इसलिए किसी को योगी बनने के लिए भीतर से संन्यासी बनना पड़ेगा और संन्यासी केवल वही हो सकता है जो योगी भी हो।
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते |
योगारूढस्य तस्यैव शम: कारणमुच्यते || 3||
जो योग मार्ग से भगवत्प्राप्ति की अभिलाषा करते हैं उनके लिए बिना आसक्ति के कर्म करना साधन है और वे योगी जिन्हें पहले से योग में उच्चता प्राप्त है, उनके लिए ध्यानावस्था में परमशांति को साधन कहा जाता है।
तीसरे अध्याय के तीसरे श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह उल्लेख किया था कि आत्म कल्याण के दो मार्ग हैं-पहला 'ज्ञान का मार्ग' और दूसरा 'कर्म का मार्ग।' इनमें से श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म के मार्ग का अनुसरण करने का उपदेश दिया। पाँचवें अध्याय के दूसरे श्लोक में उन्होंने पुनः उसे उत्तम मार्ग बताया। क्या इसका अभिप्राय यह है कि हमें जीवन पर्यन्त कर्म करना चाहिए? इस प्रश्न का पूर्वानुमान कर श्रीकृष्ण इसकी सीमा निर्धारित करते हैं। जब हम कर्मयोग का अनुपालन करते हैं तब यह मन को शुद्धिकरण और आध्यात्मिक ज्ञान की परिपक्वता की ओर ले जाता है। किन्तु एक बार जब हमारा मन शुद्ध हो जाता है और हम योग में स्थित हो जाते हैं तब हम कर्मयोग का त्याग कर संन्यास ले सकते हैं। फिर लौकिक गतिविधियों का कोई प्रयोजन नहीं रहता और ध्यान हमारी साधन बन जाती है। इसलिए हमें उसी मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो हमारी योग्यता के अनुरूप हो। श्रीकृष्ण इस श्लोक में योग्यता का वर्णन करते हैं। इसलिए वे कहते हैं कि जो योग प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं उनके लिए कर्मयोग उपयुक्त है और जो योग में उन्नत हैं उनके लिए कर्म संन्यास अधिक उपयुक्त है। योग शब्द लक्ष्य और साधन दोनों के लिए प्रयुक्त है। जब हम इसे लक्ष्य के रूप में स्वीकार करते हैं तब हम योग शब्द का प्रयोग 'भगवान के साथ एकीकृत होने' के अर्थ के रूप में कर सकते हैं और जब हम इसे प्रक्रिया के रूप में देखते हैं तब योग का अभिप्राय 'भगवान के साथ जुड़ने का मार्ग' हो जाता है।
इस दूसरे संदर्भ में योग उस सीढ़ी के समान है जिस पर चढ़कर हम भगवान तक पहुंचते हैं। सीढ़ी के नीचे के पायों पर लौकिक विषयों में तल्लीन आत्मा सांसारिकता में जकड़ी रहती है। योग रूपी सीढ़ी आत्मा को इस स्तर से ऊपरी स्तर तक ले जाती है जहाँ चेतना दिव्यता में तल्लीन होती है। सीढ़ी के विभिन्न पायों के अलग-अलग नाम हैं लेकिन सबके लिए योग एक सामान्य शब्द है। 'योग-आरुरुक्षो' वे साधक हैं जो भगवान में एकाकार होने की अभिलाषा करते हैं और इस योग रुपी सीढ़ी पर चढ़ना आरम्भ करते हैं। 'योग-आरुढस्य' वे साधक हैं जो इस सीढ़ी के सबसे ऊपर के पाये तक पहुँच चुके होते हैं। इसलिए हम योग विज्ञान में कैसे उन्नत हो सकें, इसकी विवेचना श्रीकृष्ण अगले श्लोक में करेंगे।
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते |
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते || 4||
जब कोई मनुष्य न तो भौतिक विषयों में और न ही कर्मों के अनुपालन में आसक्त होता है, वैसा मनुष्य कर्म फलों की सभी इच्छाओं का त्याग करने के कारण योग मार्ग में आरूढ़ कहलाता है।
जब मन भगवान में अनुरक्त हो जाता है तब यह स्वतः संसार से विरक्त हो जाता है। अतः किसी के मन की दशा का मूल्यांकन यह निरीक्षण करके किया जा सकता है कि क्या उसका मन सभी प्रकार की लौकिक कामनाओं के चिन्तन से मुक्त हो गया है? वही व्यक्ति संसार से विरक्त समझा जाता है जो न तो भौतिक सुखों की लालसा करता है और न ही उन्हें पाने के लिए कर्म करता है। ऐसा व्यक्ति इन्द्रिय सुखों को उत्पन्न करने वाले अवसरों की खोज करना बंद कर देता है और अंततः विषय भोग से सुख पाने के सभी विचारों का शमन कर देता है तथा सभी पुराने सुखों की स्मृतियों को मिटा देता है। तब मन निजी स्वार्थों की तुष्टि हेतु किसी बहकावे में कभी नहीं फँसता। जब हम मन पर इस तरह शासन करने की अवस्था पा लेते हैं तभी हम योग में उन्नत माने जाते हैं।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् |
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: || 5||
मन की शक्ति द्वारा आत्म उत्थान करो और स्वयं का पतन न होने दो। मन ही जीवात्मा का मित्र और शत्रु दोनों हो सकता है
हम अपने आत्म उत्थान और पतन के लिए स्वयं उत्तरदायी होते हैं। हमारे लिए भगवत्प्राप्ति के मार्ग में कोई भी बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता। संत और गुरु हमें मार्ग दिखाते हैं, किन्तु हम अपनी इच्छा के मार्ग पर चलना चाहते हैं। हिन्दी में कहावत है- 'एक पेड़ पर दो पक्षी बैठे, एक गुरु एक चेला, अपनी करनी गुरु उतरे, अपनी करनी चेला।' इसका अर्थ यह है कि एक पेड़ पर दो पक्षी बैठे हैं-एक गुरु और चेला। गुरु का पतन उसके स्वयं के कर्मों से होगा और चेला भी अपने कर्मों से नीचे की ओर गिरेगा।
इस जन्म से पूर्व हमारे अनन्त जन्म हो चुके हैं और भगवत्प्राप्त संत भी सदा धरती पर रहे हैं। यदि किसी भी समय संसार ऐसे संतों से विहीन होता तब उस समय जीवात्माओं को भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती थी। अतः फिर लोग मानव जीवन के परम लक्ष्य भगवत्प्राप्ति को कैसे पा सकते थे? इसलिए भगवान यह सुनिश्चित करते हैं कि महापुरुष सदा प्रत्येक युग में विद्यमान रहकर निष्ठावान भक्तों का मार्गदर्शन करें और मानवता के प्रेरक बनें। इस प्रकार हम अनन्त पूर्व जन्मों में कई बार इस प्रकार के संतों से मिले हैं किन्तु फिर भी हमें कभी भगवत्प्राप्ति नहीं हुई। इसका तात्पर्य यह है कि उचित मार्गदर्शन का अभाव कभी नहीं था लेकिन या तो इन संतों के उपदेशों को स्वीकार करने में हमारी मूर्खता या इनका अनुपालन न करना ही मुख्य समस्या रही होगी। इसलिए हमें पहले अपनी वर्तमान आध्यात्मिक अवस्था या इसकी कमी को स्वीकार करना चाहिए। यदि हमें अपनी वर्तमान अवस्था का बोध हो जाता है केवल तभी हमारे भीतर आत्म विश्वास जागृत होता है और हम अपने प्रयत्नों से भी स्वयं का उत्थान कर सकते हैं।
जब हम आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग में प्रतिकूलताओं का सामना करते हैं तब हम यह शिकायत करते हैं कि अन्य लोग हमारे कष्ट का कारण हैं और वे हमारे शत्रु हैं। जबकि हमारा सबसे बड़ा शत्रु हमारा अपना मन है। विध्वंस का कारण यही मन है। मन हमारी परम लक्ष्य की अभिलाषा को निष्फल कर देता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि एक ओर जीवात्मा के परम हितैषी के रूप में मन में हमें परम लाभ प्रदान करने की क्षमता होती है तथा दूसरी ओर उसमें हमें अधिकतम हानि पहुँचाने की क्षमता भी होती है। नियंत्रित मन अद्भुत कार्य पूर्ण कर सकता है जबकि अनियंत्रित मन अति अधम विचारों के द्वारा हमारी चेतना को विकृत कर सकता है। मन का मित्र के रूप में प्रयोग करने के लिए इसकी प्रवृति को समझना आवश्यक है। हमारा मन चार तत्त्वों द्वारा संचालित होता है-
मनः जब इसमें विचार उत्पन्न होते हैं तब हम इसको मन कहते हैं।
बुद्धिः जब यह विश्लेषण और निर्णय करता है तब हम इसे बुद्धि कहते हैं।
चित्तः जब यह किसी विषय या व्यक्ति के प्रति आसक्त हो जाता है तब हम इसे चित्त कहते हैं।
अहंकारः जब हमें धन, प्रतिष्ठा, सुन्दरता और ज्ञान जैसी चीजों पर अहंकार हो जाता है तब हम इसे अहंकार कहते हैं।
यह चारों पृथक तत्त्व नहीं है। यह केवल मन की चार उपाधियाँ हैं। इसलिए हम इन्हें 'मन या मन-बुद्धि' या 'मन-बुद्धि-अहंकार' या 'मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार' कह सकते हैं। इन सबका अभिप्राय एक ही है।
फ्रॉयडियन मनोविज्ञान में अहंकार शब्द का प्रयोग भिन्न अर्थ में किया गया है। सिगमंड फ्रॉयड (1856-1939)। इन्होने मन कैसे कार्य करता है, इसका पहला मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त प्रस्तुत किया। उसके अनुसार अहंकार हमारा 'वास्तविक स्वरुप' है जो हमारी कामनाओं (इड) और बचपन में सीखे गए संस्कारों को जोड़ता है।
विभिन्न ग्रंथ मन का निरूपण करने के लिए इन चारों अवयवों में से किसी एक का विश्लेषण करते हैं। यह सभी पद उसी तंत्र की ओर संकेत करते हैं जिसे अन्तःकरण या मन कहा जाता है। उदाहरणार्थ-
1. पंचदशी इन सभी चारों का एक साथ मन के रूप में उल्लेख करता है और यह व्यक्त करता है कि यह भौतिक बंधनों का कारण हैं।
2. भगवद्गीता में श्रीकृष्ण बार-बार मन और बुद्धि की चर्चा करते हैं और इन्हें भगवान को समर्पित करने पर बल देते हैं।
3. योग दर्शन प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों का विश्लेषण करते समय तीन तत्त्वों मन, बुद्धि और अहंकार की चर्चा करता है।
4. शंकराचार्य ने आत्मा को स्पष्ट करते समय मन को चार प्रकार से वर्गीकृत किया है-मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार।
इसलिए जब श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमें मन का प्रयोग स्वयं के उत्थान के लिए करना चाहिए तब उनका कहने का तात्पर्य यह होता है कि हमें अपने उन्नत मन या बुद्धि का प्रयोग कर अपने अवनत मन को ऊपर उठाना चाहिए। दूसरे शब्दों में हमें बुद्धि का प्रयोग मन को नियंत्रित करने के लिए करना चाहिए। ऐसा कैसे संभव है? इसकी विस्तृत व्याख्या श्लोक 2.41 और 2.44 और पुनः श्लोक 3.33 में की गयी है।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित: |
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् || 6||
जिन्होंने मन पर विजय पा ली है, मन उनका मित्र है। किन्तु जो ऐसा करने में असफल होते हैं मन उनके शत्रु के समान कार्य करता है।
हम जिन लोगों को अपना शत्रु समझते हैं, उनसे संघर्ष करने में ही हम अपनी विचार शक्ति और ऊर्जा को नष्ट कर देते हैं। वैदिक ग्रंथों में कहा गया है कि काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, मोह इत्यादि शत्रु हमारे भीतर रहते हैं। यह भीतरी शत्रु बाहरी शत्रुओं से अधिक घातक होते हैं। बाहरी दुराचारी लोग हमें कुछ समय के लिए ही चोट पहुंचा सकते हैं। परन्तु हमारे मन के भीतर बैठे ये दानव हमें निरन्तर दुःख पहुंचाते हैं । हम सब ऐसे लोगों को जानते हैं जिन्हें किसी वस्तु का अभाव नहीं होता किन्तु फिर भी वे दयनीय स्थिति में रहते हैं क्योंकि उनका अपना मन हताशा, घृणा, तनाव, चिन्ता और कुण्ठा द्वारा उन्हें निरन्तर संताप देता रहता है।
वैदिक दर्शन में विचारों की गंभीरता पर विशेष बल दिया गया है। विषाणु और जीवाणु ही केवल रोग का कारण नहीं होते अपितु वे नकारात्मक विचार भी होते हैं जिन्हें हम अपने मन में प्रश्रय देते हैं। यदि कोई भूलवश तुम पर पत्थर फेंकता है तब उससे तुम्हें कुछ समय तक ही दर्द होगा और अगले दिन तुम संभवतः उसे भूल जाओगे। किन्तु यदि कोई तुम्हें कुछ आपत्तिजनक शब्द कहे तो वे निरन्तर तुम्हारे मन में चुभते रहते हैं। यह विचारों की असीम शक्ति है। बौद्ध धर्म के ग्रंथ धम्मपद में (1.3) महात्मा बुद्ध ने इस सत्य को दो प्रकार से स्पष्ट किया है-
1) 'मेरा अपमान हुआ', 'मुझे चोट पहुंचाई गई', 'मुझे पीटा गया', 'मुझे लूट लिया गया'-जो इस प्रकार के विचारों को अपने मन में प्रश्रय देते हैं उनके कष्ट दूर नहीं होते।'
2) 'मेरा अपमान हुआ', 'मुझे चोट पहुंचाई गई', 'मुझे पीटा गया', 'मुझे लूट लिया'-जो इस प्रकार के विचारों को अपने मन में प्रश्रय नहीं देते उनमें क्रोध नहीं होता' अर्थात्
जब हम अपने मन में किसी के प्रति विद्वेष रखते हैं तो हमारे ये नकारात्मक विचार हमें उस व्यक्ति से भी अधिक हानि पहुँचाते हैं। यह भी कहा गया है-"कटुता स्वयं विष का सेवन कर किसी अन्य व्यक्ति के मरने की आशा करने के समान है।" समस्या यह है कि अधिकतर लोगों को यह आभास नहीं होता कि उनका अनियंत्रित मन ही उनके अधि कतर कष्टों का कारण है। इसलिए जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज यह उपदेश देते हैं
मन को मानो शत्रु उसकी, सुनहु जनि कछु प्यारे।
(साधन भक्ति तत्त्व)
"प्रिय आध्यात्मिक साधक अपने अनियंत्रित मन को शत्रु के रूप में देखो। उसके प्रभुत्व में मत आओ।" परन्तु इसी मन में हमारा प्रिय मित्र बनने की क्षमता होती है जब हम आध्यात्मिक अभ्यास द्वारा अपने मन को बुद्धि के नियंत्रण में ले आते हैं। जिस पदार्थ की शक्ति अधिक होती है, उसका दुरुपयोग उतना ही अधिक घातक होता है और उसके सदुपयोग से उसकी व्यापकता भी बृहत् हो जाती है क्योंकि मन एक ऐसा यन्त्र है जो दो धार वाली तलवार की तरह काम करता है। इस प्रकार जो आसुरी व्यक्ति हैं वे मलिन मन के कारण ऐसा करते हैं और जो उन्नत अवस्था प्राप्त कर लेते हैं वे भी अपने मन के शुद्धिकरण के कारण ऐसा करते हैं। तदनुसार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट ने इसे अत्यंत सुन्दरता से व्यक्त किया है-"मनुष्य भाग्य के अधीन नहीं हैं लेकिन वे केवल अपने मन के दास बने रहते हैं" आगे के तीन श्लोकों में श्रीकृष्ण योग में आरुढ़ पुरुष के लक्षणों का विवेचन करेंगे।
जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहित: |
शीतोष्णसुखदु:खेषु तथा मानापमानयो: || 7||
वे योगी जिन्होंने मन पर विजय पा ली है वे शीत-ताप, सुख-दु:ख और मान-अपमान के द्वंद्वों से ऊपर उठ जाते हैं। ऐसे योगी शान्त रहते हैं और भगवान की भक्ति के प्रति उनकी श्रद्धा अटल होती है।
श्रीकृष्ण ने दूसरे अध्याय के चौदहवें श्लोक में स्पष्ट किया था कि इन्द्रियों और उसके विषयों के संपर्क से मन शीत और ताप तथा सुख-दु:ख का अनुभव करता है। जब तक मन वश में नहीं होता तब तक मनुष्य इन्द्रिय सुखों के लिए उनके पीछे भागता रहता है और दुःख का अनुभव होने पर पीछे हट जाता है। जो योगी मन पर विजय पा लेता है वह इन क्षणभंगुर सुखों को आत्मा से भिन्न शारीरिक इन्द्रियों की क्रियाशीलता के रूप में देखता है। ऐसे सिद्ध योगी ताप और शीत तथा सुख और दु:ख आदि के दैत से परे रहते हैं। मन दो क्षेत्रों में भ्रमण करता है-एक माया का क्षेत्र और दूसरा भगवान का क्षेत्र। यदि मन संसार के विषयों से ऊपर उठ जाता है तब वह सुगमता से भगवान में तल्लीन हो सकता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण कहते हैं कि सिद्ध योगी का मन समाधि में स्थिर अर्थात् भगवान की गहन साधना में लीन हो जाता है।
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रिय: |
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चन: || 8||
वे योगी जो ज्ञान और विवेक से युक्त होते हैं और जो इन्द्रियों पर विजय पा लेते हैं, वे सभी परिस्थितियों में अविचलित रहते हैं। वे धूल, पत्थर और सोने को एक समान देखते हैं।
गुरु के वचनों को सुनकर और शास्त्रों के अध्ययन द्वारा प्राप्त की गयी सैद्धान्तिक जानकारी को ज्ञान कहते है। विज्ञान उस ज्ञान की अनुभूति है जो आंतरिक जागरण और विवेक के रूप में हमारे भीतर निहित है। उन्नत योगी की बुद्धि ज्ञान और विज्ञान से प्रकाशित रहती है। विवेक सम्पन्न योगी सभी सांसारिक विषयों को माया शक्ति के विकृत रूप में देखता है। सिद्ध योगी सभी पदार्थों का संबंध भगवान के साथ देखते हैं क्योंकि माया का संबंध भगवान से होता है और सभी वस्तुएँ उनकी सेवा के निमित्त होती हैं।
कूटस्थ शब्द का प्रयोग उनके लिए किया गया है जो मन को विषयों की अनुभूतियों से दूर रखते हैं। वे न तो सुखद परिस्थितियों की इच्छा करते हैं और न ही दु:खद परिस्थितियों की उपेक्षा करते हैं। विजितेन्द्रिय शब्द का अर्थ मनुष्य द्वारा इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना है। युक्त शब्द का अर्थ यह है कि जो सदा के लिए परम भगवान में एकनिष्ठ हो जाता है। ऐसा मनुष्य भगवान के दिव्य आनन्द का आस्वादन करता है और इसलिए 'तृप्तात्मा' बन जाता है अर्थात् अनुभूत ज्ञान के बल पर पूर्ण रूप से संतुष्ट हो जाता है।
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु |
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते || 9||
योगी शुभ चिन्तकों, मित्रों, शत्रुओं पुण्यात्माओं और पापियों को निष्पक्ष होकर समान भाव से देखते हैं। इस प्रकार जो योगी मित्र, सहयोगी, शत्रु को समदृष्टि से देखते हैं और शत्रुओं एवं सगे संबंधियों के प्रति तटस्थ रहते हैं तथा पुण्यात्माओं और पापियों के बीच भी निष्पक्ष रहते हैं, वे मनुष्यों के मध्य विशिष्ट माने जाते हैं।
यह मनुष्य की प्रकृति है कि वह मित्रों और शत्रुओं के साथ अलग-अलग व्यवहार करता है किन्तु सिद्ध योगी की प्रकृति भिन्न होती है। भगवद्ज्ञान से सम्पन्न योगी समस्त सृष्टि को भगवान के साथ एक रूप में देखते हैं। इस प्रकार से वे सभी प्राणियों को समदृष्टि से देखने में समर्थ होते हैं। दृष्टि की इस समानता की भी अनेक अवस्थाएँ होती हैं
1. "सभी जीव दिव्य आत्माएँ है और इसलिए वे भगवान का अंश हैं। इसलिए उन्हें एक समान समझना चाहिए। “आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डित:।" अर्थात् "सच्चा पंडित वही है जो सभी प्राणियों को आत्मा के रूप में देखता है और इसलिए सबको अपने समान देखता है।"
2. उत्तम दृष्टि यह है कि भगवान प्रत्येक प्राणी के भीतर विराजमान हैं और इसलिए समस्त प्राणी आदर के योग्य हैं।
3. उच्चावस्था प्राप्त योगी 'प्रत्येक में भगवान का रूप' देखने वाली दृष्टि विकसित करता है। वैदिक ग्रंथों में भी बार-बार वर्णित है कि समस्त संसार भगवान का ही रूप है-ईशावास्यमिदम् सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। (ईशोपनिषद-1) अर्थात् "जड़ एवं चेतन पदार्थों के साथ ही समस्त ब्रह्माण्ड भी भगवान की अभिव्यक्ति है जोकि उनके भीतर व्याप्त है।" पुरुष एवेदं सर्वं (पुरुष सूक्तम्) अर्थात "भगवान इस संसार में सर्वत्र व्याप्त हैं और सब कुछ उनकी ही शक्ति है।" इसलिए उच्चावस्था प्राप्त योगी सभी में भगवान की अभिव्यक्ति देखता है। ऐसी दृष्टि से सम्पन्न हनुमान जी कहते हैं-सिया राममय सब जग जानी। (रामचरितमानस) “मैं सभी में सीता राम का रूप देखता हूँ।"
सम दृष्टि की इन श्रेणियों पर श्लोक 6.31 में विस्तृत टिप्पणी की गयी है। उपर्युक्त तीनों श्रेणियों का उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह योगी जो सभी प्राणियों में समदृष्टि बनाए रख सकता है वह पिछले श्लोक में वर्णित योगी की तुलना में अधिक उन्नत योगी है। योग की अवस्था का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण अगले श्लोक का आरम्भ यह व्यक्त करते हुए करेंगे कि किस पद्धति द्वारा इस अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है।
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थित: |
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रह: || 10||
योग की अवस्था प्राप्त करने के इच्छुक साधकों को चाहिए कि वे एकान्त स्थान में रहें और मन एवं शरीर को नियंत्रित कर निरन्तर भगवान के चिन्तन में लीन रहें तथा समस्त कामनाओं और सुखों का संग्रह करने से मुक्त रहें
योग की अवस्था प्राप्त मनुष्य की विशेषताओं का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण आत्म प्रयास के संबंध में चर्चा कर रहे हैं। किसी भी क्षेत्र में निपुणता के लिए दैनिक अभ्यास करना आवश्यक होता है। तैराकी में ओलिंपिक चैम्पियन वह नहीं हो सकता जो सप्ताह में केवल शनिवार सायंकाल में किसी स्थानीय पड़ोस के स्विमिंग पूल पर अभ्यास करता हो अपितु वही बन सकता है जो प्रतिदिन कई घंटे अभ्यास कर तैराकी में निपुण हो जाता है। अतः आध्यात्मिकता में प्रवीणता पाने के लिए भी इसी प्रकार से अभ्यास करना आवश्यक है। श्रीकृष्ण प्रतिदिन साधना के अभ्यास की अनुशंसा करते हुए आध्यात्मिकता में प्रवीणता प्राप्त करने की पूरी प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। प्रथम चरण के लिए वे एकान्त स्थान की अनिवार्यता का उल्लेख करते हैं। प्रायः दिनभर हम सांसारिक वातावरण से घिरे रहते हैं। शारीरिक गतिविधियाँ, लोगों से संपर्क और वार्तालाप आदि सब मन को और अधिक सांसारिक बना देते हैं। मन को भगवान की ओर सम्मुख करने के लिए हमें प्रतिदिन एकान्त में साधना करने के लिए कुछ समय समर्पित करना चाहिए।
दूध और पानी के उदाहरण से इस बिन्दु को स्पष्ट करने में सहायता मिल सकती है। यदि दूध को पानी में डाल देते हैं तब यह अपनी पहचान नहीं रख सकता क्योंकि पानी स्वभावत: इसमें मिश्रित हो जाता है। किन्तु जब दूध को पानी से अलग रखते हैं और दही जमा लेते हैं और फिर उससे मक्खन निकाल लेते हैं तब मक्खन पानी में घुल नहीं पाता । मक्खन अब पानी को चुनौती देते हुए कह सकता है-'मैं तुम्हारे शीर्ष पर बैलूंगा और तैरता रहूँगा और तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते क्योंकि मैं मक्खन बन गया हूँ।' हमारा मन दूध के समान है और संसार के साथ संपर्क होने से हमारा मन इससे प्रभावित होकर सांसारिक हो जाता है। किन्तु एकांत वातावरण, इन्द्रियों का विषयों के साथ कम से कम संपर्क रखने का अवसर प्रदान करता है और मन को ऊपर उठाकर उसे भगवान में लगाने में सहायक होता है। एक बार जब मन भगवान में पूर्णतः अनुरक्त हो जाता है तब कोई भी संसार को चुनौती देते हुए कह सकता है-"मैं माया के सभी गुणों के बीच रहते हुए उनसे अछूता रहूँगा।"
एकान्तवास के उपदेश को श्रीकृष्ण ने श्लोक 18.52 में दोहराया है-"विविक्तसेवी लध्वाशी" अर्थात् "एकान्त स्थान में रहो, अपने आहार को संतुलित करो।" अपने व्यावसायिक और सामाजिक कार्यों से छेड़छाड़ किए बिना इस उपदेश का व्यावहारिक रूप से अनुपालन करने का सुन्दर और सरल उपाय यही है। अपने दैनिक कार्यक्रम में हमें कुछ समय साधना या आध्यात्मिक अभ्यास के लिए निश्चित करना चाहिए। हमें स्वयं को एकांत कमरे में जहाँ सांसारिक विघ्न न हों वहाँ संसार से अलग-थलग होकर अपने मन को शुद्ध करके और मन को दृढ़ता से भगवान में केन्द्रित करने के लिए साधना करनी चाहिए। यदि हम इस विधि से दो घंटे अभ्यास करते हैं तब हम सांसारिक गतिविधियों में व्यस्त रहते हुए भी दिन भर इसका लाभ पा सकते हैं। इस विधि द्वारा हम उच्च चेतनावस्था बनाए रखने के योग्य हो सकेंगे जिसका हमने संसार से अलग होकर दैनिक साधना के दौरान संग्रह किया था।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मन: |
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् || 11||
योगाभ्यास के लिए स्वच्छ स्थान पर भूमि पर कुशा बिछाकर उसे मृगछाला से ढककर उसके ऊपर वस्त्र बिछाना चाहिए। आसन बहुत ऊँचा या नीचा नहीं होना चाहिए।
श्रीकृष्ण इस श्लोक में साधना के बाहरी क्रियाओं का वर्णन कर रहे हैं। 'शुचौ देशे' से तात्पर्य पवित्र या स्वच्छ स्थान है। प्रारम्भिक चरणों में बाहरी वातावरण मन को प्रभावित करता है लेकिन बाद के चरणों में कोई भी गंदे और अस्वच्छ स्थानों पर आंतरिक शुद्धता को प्राप्त करने के योग्य हो सकता है। स्वच्छ वातावरण मन को स्वच्छ रखने में अत्यधिक सहायता करता है। कुश (घास) की चटाई आजकल के योग मैट के समान ही तापमान रोधक होती है। मृगछाला विषैले कीटों जैसे सर्प और बिच्छुओं को साधना में लीन साधक के पास जाने से रोकती है। यदि आसन अधिक ऊँचा है तब वहाँ से गिरने का जोखिम बना रहता है और यदि आसन बहुत नीचा है तब भूमि पर रेंगने वाले कीटों से साधना में बाधा उत्पन्न होती है। इस श्लोक में आसन पर बैठने के दिशा-निर्देश कुछ सीमा तक आधुनिक समय से भिन्न हैं। प्राचीन और आधुनिक दोनों कालों के निर्देशों का लक्ष्य भगवान के चिन्तन में लीन होना है जबकि आंतरिक अभ्यास के निर्देश समान हैं।
तत्रैकाग्रं मन: कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रिय: |
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये || 12||
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर: |
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् || 13||
योगी को उस आसन पर दृढ़तापूर्वक बैठ कर मन को शुद्ध करने के लिए सभी प्रकार के विचारों तथा क्रियाओं को रोक कर मन को एक बिन्दु पर स्थिर करते हुए साधना करनी चाहिए। उसे शरीर, गर्दन और सिर को सीधा रखते हुए और आँखों को हिलाए बिना नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि स्थिर करनी चाहिए।
साधना के लिए आसन पर बैठने का वर्णन करने के पश्चात् श्रीकृष्ण आगे मन की एकाग्रता के लिए शरीर की उत्तम मुद्रा का वर्णन कर रहे हैं। साधना करते समय प्रायः लोगों में आलस्य तथा झपकी लेने की प्रवृत्ति पायी जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि हमारे मायाबद्ध मन को आरम्भ में भगवान के चिन्तन में वैसा आनन्द प्राप्त नहीं होता जैसा वह विषयों का भोग करने में पाता है। इससे मन को भगवान पर केन्द्रित करते समय उसके शिथिल होने की संभावना बनी रहती है। हम लोगों को भोजन ग्रहण करते हुए बीच में ऊँघते हुए नहीं पाते लेकिन लोगों को साधना करते हुए या भगवान के नाम का जप करते हुए उन्हें सोते हुए देख सकते हैं। इससे बचने के लिए श्रीकृष्ण सीधा बैठने का उपदेश देते हैं। ब्रह्मसूत्र में भी साधना की मुद्रा के संबंध में तीन सूत्रों का वर्णन किया गया है-
आसीनः संभवात् ।।4.1.7।। 'उपयुक्त आसन पर बैठकर साधना करों।'
अचलत्वं चापेक्ष्य-।।4.1.19।। 'सुनिश्चित करो कि आप सीधे और स्थिर बैठे हैं।'
ध्यानाच्च-।।4.1.8।। 'ऐसी मुद्रा में बैठो जिसमें मन साधना में केन्द्रित रहें।'
हठयोग प्रदीपका में साधना के लिए कई प्रकार के आसनों का वर्णन किया गया है, जैसे-पद्मासन, अर्धपद्मासन, ध्यानवीरासन, सिद्धासन और सुखासन। हम साधना की अवधि के दौरान किसी भी ऐसे आसन जिसमें हम सुविधापूर्वक स्थिरता से बैठ सकते हैं, का चयन कर सकते हैं।
महर्षि पतंजलि कहते हैं
"स्थिरसुखमासनम्।।"
(पतंजलि योग सूत्र-2.46)
"साधना का अभ्यास करने के लिए सुविधानुसार मुद्रा में स्थिर बैठो।" कुछ लोग घुटनों में दर्द के कारण फर्श पर बैठने में असमर्थ होते हैं। उन्हें हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। वे सीधा और स्थिर बैठने के लिए कुर्सी पर बैठकर साधना कर सकते हैं। इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह अभिव्यक्त किया है कि आँखें नासिका के अग्र भाग पर केन्द्रित होनी चाहिए और हिलने से बचना चाहिए। विकल्प के लिए आँखों को बंद भी रखा जा सकता है। ये दोनों ही विधियाँ सांसारिक आकर्षणों को रोकने में सहायक होगी। बाहरी आसन और मुद्रा का उपयुक्त होना आवश्यक है किन्तु साधना वास्तव में हमारे भीतर की यात्रा है। साधना के माध्यम से हम अपने स्वरुप में गहनता से उतर सकते हैं और मन के अनन्त जन्मों की मैल को स्वच्छ कर सकते हैं। मन को एकाग्र करना सीखकर हम इसकी अप्रतिम क्षमता पर अंकुश लगा सकते हैं। साध ना के अभ्यास से हमें अपने व्यक्तित्व को उन्नत करने में सहायता मिलती है, हमारी आंतरिक चेतना जागृत होती है और हमारा आत्म ज्ञान बढ़ता है।
साधना के आध्यात्मिक लाभों का वर्णन श्लोक 6.15 की व्याख्या में किया जाएगा। साधना के कुछ अन्य लाभ इस प्रकार है
1. यह अनियंत्रित मन पर अंकुश लगाती है और कठिन लक्ष्यों पाने के लिए विचार शक्ति को नियमित है।
2. प्रतिकूल परिस्थतियों में मानसिक संतुलन बनाये रखने में सहायता करती है।
3. जीवन में सफलता पाने के लिए अनिवार्य दृढ़ संकल्प को विकसित करने में सहायता करती है। यह मनुष्य को बुरे संस्कारों और प्रवृत्तियों का उन्मूलन करने और सद्गुणों को उत्पन्न करने के योग्य बनाती है।
एक उत्तम प्रकार की साधना वह है जिसमें मन भगवान पर केन्द्रित किया जाता है। इसे अगले दो श्लोकों में स्पष्ट किया गया है।
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थित: |
मन: संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्पर: || 14||
इस प्रकार शांत, भयरहित और अविचलित मन से ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा में निष्ठ होकर उस प्रबुद्ध योगी को मन से मेरा चिन्तन करना और केवल मुझे ही अपना परम लक्ष्य बनाना चाहिए।
श्रीकृष्ण साधना में सफलता के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करने पर बल देते हैं। प्रजनन हेतु में पशुओं में भी काम वासना की प्रवृति पायी जाती है और पशु केवल इसी उद्देश्य से इसमें लिप्त रहते हैं। अधिकतर पशु जातियों में निश्चित ऋतु में मैथुन क्रिया होती है। पशु इच्छानुसार मैथुन क्रिया में युक्त नहीं रहते जबकि पशुओं से अधिक बुद्धिमान मनुष्य के अपनी इच्छानुसार इसमें लिप्त रहने की स्वतंत्रता होने के कारण प्रजजन की विधि अनैतिक आनन्द पाने के साधन में परिवर्तित हो जाती है। वैदिक ग्रंथों में ब्रह्मचर्य का पालन करने पर बल दिया गया है। महर्षि पतंजलि ने कहा है-"ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः” (योगसूत्र-2.38) अर्थात् "ब्रह्मचर्य का पालन अति शक्तिवर्धक होता है।"
आयुर्वेद में भी असाधारण स्वास्थ्य लाभों के कारण ब्रह्मचर्य की प्रशंसा की गयी है। धन्वन्तरि के एक शिष्य ने उनसे एक प्रश्न पूछा-“हे महर्षि! कृपया मुझे स्वस्थ रहने का रहस्य बताएँ?" उन्होंने ने उत्तर दिया-"वीर्य ही वास्तव में आत्मस्वरूप है। स्वास्थ्य का रहस्य इसी शक्ति के संरक्षण में निहित है। वह जो इस महत्वपूर्ण और अनमोल शक्ति को व्यर्थ करता है उसका शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास नहीं हो सकता।" आयुर्वेद के अनुसार रक्त की चालीस बूंदों से वीर्य की एक बूंद बनती है। वे जो अपने वीर्य को नष्ट करते हैं वे अस्थिर रहते हैं और प्राणों को उत्तेजित करते हैं। इससे उनकी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा को क्षति पहुँचती है तथा स्मरणशक्ति, मन और बुद्धि दुर्बल हो जाती है। ब्रह्मचर्य के पालन से शारीरिक ऊर्जा, बुद्धि की तीक्ष्णता, दृढ़ इच्छा शक्ति, स्मरण शक्ति और आध्यात्मिक बोध की उत्कंठा में वृद्धि होती है। इससे आँखों में चमक और कपोलों पर लालिमा आती है। ब्रह्मचर्य की परिभाषा केवल शारीरिक काम वासना मात्र से दूर रहने तक सीमित नहीं है। अग्नि पुराण में मैथुन से संबंधित आठ प्रकार की गतिविधियों को नियंत्रित करने का वर्णन किया गया है
1. इसके बारे में सोचना, 2. इसके बारे में चर्चा करना, 3. इस विषय पर उपहास करना, 4. इसको देखना, 5. इसकी रुचि उत्पन्न करना, 6. किसी को ऐसा करने के लिए आकर्षित करना, 7. किसी को इसमें रुचि लेने के लिए उत्तेजित करना, 8. इसमें लिप्त रहना। इस प्रकार ब्रह्मचर्य के लिए केवल शारीरिक संभोग से दूर रहना ही आवश्यक नहीं है अपितु हस्तमैथुन, समलैंगिक गतिविधियों आदि यौनाचार से भी दूर रहना चाहिए।
आगे श्रीकृष्ण यह वर्णन करेंगे कि साधना का लक्ष्य केवल भगवान का ध्यान करना है। इस बिन्दु पर पुनः अगले श्लोक में प्रकाश डाला जाएगा।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानस: |
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति || 15||
इस प्रकार मन को संयमित रखने वाला योगी मन को निरन्तर मुझमें तल्लीन कर निर्वाण प्राप्त करता है और मुझ में स्थित होकर परम शांति पाता है।
संसार में ध्यान की कई पद्धतियाँ विद्यमान हैं। जैन पद्धति, बौद्ध पद्धति, तांत्रिक पद्धति, ताओवादी पद्धति और वैदिक पद्धति इत्यादि प्रचलन में हैं। इनमें से प्रत्येक की कई उप शाखाएँ हैं। हिन्दू धर्म के अनुयायियों के बीच भी अनेक पद्धतियों का पालन किया जा रहा है। हमें अपने व्यक्तिगत अभ्यास के लिए किस पद्धति को अपनाना चाहिए? श्रीकृष्ण इस प्रश्न का सरलता से समाधान करते हैं। वे कहते हैं कि साधना का लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ भगवान ही होना चाहिए।
साधना का लक्ष्य केवल एकाग्रता और ध्यान को बढ़ाना ही नहीं है अपितु मन को शुद्ध करना भी है। श्वास, चक्र, शून्य और ज्योति आदि का ध्यान एकाग्रता को विकसित करता है। फिर भी मन की शुद्धता तभी संभव है जब हम इसे शुद्ध तत्त्व पर स्थिर करें जो कि स्वयं भगवान हैं। इसलिए 14वें अध्याय के 26वे श्लोक में वर्णन किया गया है कि भगवान प्रकृति के तीनों गुणों से परे हैं। जब कोई मनुष्य अपने मन को भगवान में स्थिर करता है तब वह भी प्रकृति के तीनों गुणों से ऊपर उठकर गुणातीत हो जाता है। इसलिए प्राणों पर ध्यान करने की क्रिया को लोकातीत कहा जाता है किन्तु वास्तविक इन्द्रियातीत साधना केवल भगवान में ध्यान स्थिर करना है।
मन को भगवान में कैसे स्थिर करें? इसके लिए हम भगवान की दिव्य विशेषताओं, नाम, गुणों, रूपों, लीलाओं, धामों और संतों को अपने ध्यान का लक्ष्य बना सकते हैं। ये सब भगवान से अभिन्न हैं तथा उनकी सभी दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण हैं। इसलिए साधक इनमें से किसी एक का भी ध्यान कर सकता है। भारत में प्रचलित विभिन्न ‘भक्ति' परम्पराओं में भगवान के नाम को चिन्तन का आध पर बनाया जाता है। इसलिए रामचरितमानस में कहा गया है
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बड़दायक बड़दानि।
"आत्मा के लाभ के प्रयोजन से भगवान का नाम स्वयं भगवान से बड़ा है।" भगवान का स्मरण करने के लिए भगवान का नाम लेना एक सरल उपाय है क्योंकि इसे कहीं भी तथा सर्वत्र चलते, बोलते, बैठते और खाते हुए सहजता से लिया जा सकता है।
किन्तु अधिकतर साधकों को मन को वश में करने के लिए केवल नाम लेना पर्याप्त नहीं लगता। अनन्त जन्मों के संस्कारों के कारण मन स्वभावतः रूप की ओर आकर्षित होता है। भगवान के रूप को आधार बनाकर की गयी साधना स्वाभाविक और सरल होती है। इसे रूपध्यान साधना कहा जाता है।
एक बार जब मन भगवान पर केन्द्रित हो जाता है तब फिर हम आगे चलकर भगवान के गुणों उनके पार्षदों, उनके सौंदर्य, उनके दिव्य ज्ञान, प्रेम, उनकी करुणा और उनकी कृपा आदि गुणों का चिन्तन कर मन को और अधिक उत्साहित कर सकते हैं। इस प्रकार से कोई भी मनुष्य मन को भगवान की सेवा भक्ति में लगाकर साधना में उन्नति कर सकता है। हम भगवान को खाद्य पदार्थों का भोग लगाने, उनकी सेवा करने, उनका गुणगान करने, उन्हें स्नान कराने और उनके लिए भोजन पकाने इत्यादि की कल्पना कर सकते हैं। इसे मन से भगवान की सेवा करना अर्थात् 'मानसी सेवा' कहते हैं। इस प्रकार से हम भगवान के नाम, रूप, गुण लीलाओं का ध्यान करते हुए उनका चिन्तन कर सकते हैं।
इस श्लोक के अन्त में श्रीकृष्ण साधना के लाभों का वर्णन कर रहे हैं जो हैं - माया के बंधनों से मुक्त होना और परम आनन्द की प्राप्ति करना।
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नत: |
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन || 16||
हे अर्जुन! जो लोग बहुत अधिक भोजन ग्रहण करते हैं या अल्प भोजन ग्रहण करते हैं, बहुत अधिक या कम नींद लेते हैं, वे योग में सफल नहीं हो सकते।
साधना के ध्येय का वर्णन करने के पश्चात् श्रीकृष्ण कुछ नियमों का पालन करने के लिए कहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे मनुष्य जो शरीर की देखभाल के नियमों को भंग करते हैं, योग में सफलता नहीं प्राप्त कर सकते। प्रायः इस पथ का अनुसरण करने वाले साधक अपने अधूरे ज्ञान के कारण कहते हैं-"तुम आत्मा हो न कि शरीर" इसलिए वे केवल आध्यात्मिक साधना में लिप्त हो जाते हैं और शरीर की देखभाल करना छोड़ देते हैं किन्तु उनकी ऐसी धारणा उन्हें बहुत आगे तक नहीं ले जा सकती। यह सत्य है कि हम शरीर नहीं हैं फिर भी हम जब तक जीवित रहते हैं, शरीर हमारा वाहक होता है और हमें कृतज्ञतापूर्वक इसकी देखभाल करनी चाहिए। आयुर्वेदिक ग्रंथ चरक संहिता में वर्णन है-"शरीरमाधं खलु धर्म - साधनम्" अर्थात् "हमारा शरीर हमें धार्मिक गतिविधियों में तल्लीन रखने का साधन है।" यदि शरीर अस्वस्थ हो जाता है, तब अध्यात्मिक कार्यों में भी बाधा उत्पन्न होती है। रामचरितमानस में भी उल्लेख है, "तन बिनु भजन बेद नहिं बरना।" अर्थात् वेद शरीर की उपेक्षा करने की अनुशंसा नहीं करते। वास्तव में वे हमें शरीर की देखभाल करने का उपदेश देते हैं। ईशोपनिषद् में इस प्रकार से वर्णन किया गया है।
अन्धंतमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः।।
(ईशोपनिषद्-9)
"जो केवल भौतिक विज्ञान को पोषित करते हैं, वे नरक में जाते हैं किन्तु जो केवल आध्यात्मिक ज्ञान को पोषित करते हैं, वे और अधिक गहन नरक में जाते हैं।" शरीर की देखभाल के लिए भौतिक विज्ञान आवश्यक है जबकि आध्यात्मिक ज्ञान हमारे भीतर की दिव्यता के आविर्भाव के लिए अनिवार्य है। जीवन के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए हमारे जीवन में दोनों का संतुलन होना चाहिए इसलिए योगासन, प्राणायाम, और उपयुक्त आहार विहार आदि वैदिक ज्ञान का अनिवार्य अंग हैं। चारों वेदों में प्रत्येक वेद का एक उपवेद है। जैसे अथर्व वेद का सहायक वेद आयुर्वेद है जो औषधीय चिकित्सा और उत्तम स्वास्थ्य का प्राचीन विज्ञान है। यह दर्शाता है कि वेद शारीरिक स्वास्थ्य की देख-रेख करने पर बल देते हैं। तदनुसार श्रीकृष्ण कहते हैं कि अधिक भोजन करना या बिल्कुल अन्न ग्रहण न करना, अति सक्रियता और पूर्ण अकर्मण्यता आदि सब योग के लिए बाधक हैं। आध्यात्मिक साधकों को ताजा भोजन, पौष्टिक खाद्य पदार्थ, दैनिक व्यायाम और प्रत्येक रात्रि को भरपूर निद्रा लेकर अपने शरीर की भली-भाँति देखभाल करनी चाहिए।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु |
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा || 17||
लेकिन जो आहार और आमोद-प्रमोद को संयमित रखते हैं, कर्म को संतुलित रखते हैं और निद्रा पर नियंत्रण रखते हैं, वे योग का अभ्यास कर अपने दु:खों को कम कर सकते हैं।
योग भगवान के साथ आत्मा का मिलन है। इसके विपरीत भोग का आशय इन्द्रिय सुख में लिप्त होना है। भोग में संलिप्तता शरीर के स्वाभाविक नियमों के विपरीत है और इसके परिणामस्वरूप रोग पनपते हैं। पिछले श्लोक में किए गए वर्णन के अनुसार यदि शरीर रोगग्रस्त हो जाता है तब योग के अभ्यास में बाधा उत्पन्न होती है। इसलिए इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है कि शारीरिक गतिविधियों को संयमित कर योग के अभ्यास द्वारा हम शारीरिक और मानसिक दु:खों से मुक्त हो सकते हैं।
श्रीकृष्ण के पच्चीस सौ वर्षों के पश्चात् गौतम बुद्ध ने भी यही उपदेश दिया। उन्होंने कठोर तप और कामुक भोग के बीच मध्यम मार्ग का पालन करने की अनुशंसा की। इस संबंध में एक रोचक कथा इस प्रकार से है-
ऐसा कहा जाता है कि ज्ञान प्राप्त करने से पूर्व गौतम बुद्ध एक बार अन्न और जल का त्याग कर ध्यान में लीन हो गये। इस प्रकार कुछ दिनों की साधना के अभ्यास के पश्चात् वे दुर्बल हो गये और उन्हें चक्कर आने लगे तब उन्हें आभास हुआ कि मन को साधना में स्थिर रखना असंभव है। उसी समय कुछ ग्रामीण महिलाएँ वहाँ से निकल रही थीं। उन्होंने जल से भरा मटका अपने सिर पर रखा हुआ था जिन्हें वे समीप की नदी से भरकर ला रही थीं और गीत गा रही थीं। उस गीत के स्वर इस प्रकार के थे-"तानपुरे के तारों को कस कर रखो किन्तु इतना भी न कसो कि वे टूट जाए।" उनके शब्द गौतम बुद्ध के कानों में पड़े तब वे अचम्भित होकर बोले, 'ये अनपढ़ ग्रामीण महिलाएँ ऐसे ज्ञान के शब्द गा रही हैं। उनका संदेश हम मनुष्यों के लिए है कि हमें भी अपने शरीर रूपी तानपुरे को कस कर रखना चाहिए किन्तु इतना भी न कसें कि शरीर ही नष्ट हो जाए।'
बैंजामिन फ्रैंकलिन (1706-1790) संयुक्त राज्य अमेरिका के संस्थापकों में से एक, ने अपने चरित्र का विकास करने के लिए बीस वर्ष की आयु में डायरी लिखना आरम्भ किया था जिसमें उन्होंने तेरह कार्यों का उल्लेख किया जिनमें वे उन्नति करना चाहते थे। उनकी पहली प्रतिज्ञा थी खान-पान संतुलित करो ताकि सुस्ती न आए और अधिक मदिरा पान न करो।
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते |
नि:स्पृह: सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा || 18||
पूर्ण रूप से अनुशासित होकर जो अपने मन को लालसाओं से हटाना सीख लेते हैं और इसे अपनी आत्मा के लाभ में लगा देते हैं, ऐसे मनुष्यों को योग में स्थित कहा जा सकता है और वे सभी प्रकार की इन्द्रिय लालसाओं से मुक्त होते हैं।
मनुष्य कब योग का अभ्यास पूर्ण कर लेता है? इसका उत्तर यह है कि जब नियंत्रित मन केवल एक परमात्मा में स्थिर और केन्द्रित हो जाता है। तब यह स्वतः सांसारिक भोगों के लिए इन्द्रिय सुख की सभी लालसाओं और कामनाओं से दूर हो जाता है। उस समय मन की ऐसी अवस्था प्राप्त करने वाले मनुष्य को 'युक्त' अर्थात 'पूर्ण योग में स्थित' माना जा सकता है। इस अध्याय के अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं-"सभी योगियों में जिस योगी का मन सदैव मुझमें तल्लीन हो जाता है और जो पूर्ण श्रद्धायुक्त होकर मेरी भक्ति में लीन रहता है, मैं उसे सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ।" (श्लोक 6.47)
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता |
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मन: || 19||
जिस प्रकार वायुरहित स्थान में दीपक की ज्योति झिलमिलाहट नहीं करती उसी प्रकार से संयमित मन वाला योगी आत्म चिन्तन में स्थिर रहता है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण दीपक की ज्योति की उपमा देते हैं। वायु वाले स्थान पर जिसकी ज्योति स्वाभाविक रूप से झिलमिलाहट करती है और जिसे स्थिर रखना असंभव होता है। जबकि वायु रहित स्थान में यह चित्र की भाँति स्थिर रहती है। इसी प्रकार से मन भी स्वाभाविक रूप से चंचल होता है और इसे वश में करना कठिन होता है। किन्तु जब किसी योगी का मन भगवान में लीन होकर उसमें एकीकृत हो जाता है तब वह कामनाओं की आँधी से बचने का आश्रय पा लेता है। ऐसा योगी भक्ति की शक्ति द्वारा मन को स्थिर एवं नियंत्रित करता है।
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया |
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति || 20||
जब मन भौतिक क्रियाओं से दूर हट कर योग के अभ्यास द्वारा स्थिर हो जाता है तब योगी शुद्ध मन से आत्म-तत्त्व को देख सकता है और आंतरिक आनन्द में मग्न हो सकता है।
साधना की प्रक्रिया को प्रस्तुत करने तथा इसमें सिद्धि की अवस्था का वर्णन करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब इसके परिणामों से अवगत करा रहे हैं। जब मन शुद्ध हो जाता है, तब कोई भी मनुष्य आत्मा की शरीर से भिन्नता को जानने के योग्य हो सकता है। यदि किसी गिलास में मिट्टी से युक्त जल भरा है तब हम इसके आर-पार नहीं देख सकते। किन्तु यदि हम इस जल में फिटकरी डाल देते हैं तो मिट्टी नीचे बैठ जाती है और जल स्वच्छ हो जाता है। समान रूप से मन जब अशुद्ध होता है तब आत्मा के संबंध में इसकी अवधारणा धुंधली होती है और शास्त्रों द्वारा प्राप्त आत्मा का ज्ञान केवल सैद्धान्तिक स्तर का ही होता है। किन्तु मन जब शुद्ध हो जाता है तब प्रत्यक्ष अनुभूति से आत्म तत्त्व का बोध होता है।
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् |
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वत: || 21||
योग में चरम आनन्द की अवस्था को समाधि कहते हैं और इसमें स्थित मनुष्य परम सत्य के पथ से विचलित नहीं होता।
सुख की लालसा करना आत्मा का स्वभाव है। इसका कारण यह है कि हम आनन्द के महासागर भगवान के अणु अंश हैं। वैदिक ग्रंथों में दिए अनेक उदाहरणों द्वारा इसे सिद्ध किया गया है जिनकी व्याख्या पाँचवें अध्याय के 21वें श्लोक में की गयी है। यहाँ अनन्त सुखों के महासागर भगवान के स्वरूप को अभिव्यक्त करने के लिए कुछ और उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं
रसो वै सः। रसँ ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति।
(तैत्तिरीयोपनिषद्-2.7)
"भगवान स्वयं आनन्द है। जीवात्मा उसे पाकर आनन्दमयी हो जाती है।"
"आनन्दमयोऽभ्यासात्"
(ब्रह्मसूत्र-1.1.12)
"भगवान परमानंद स्वरूप है"
सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः।
(श्रीमद्भागवतम्-10.13.54)
"भगवान का दिव्य स्वरूप सत्-चित्-आनन्द से निर्मित है।"
आनंद सिंधु मध्य तव वासा। बिनु जाने कत मरसि पियासा॥
(रामचरितमानस)
"आनन्द के महासागर भगवान, जो तुम्हारे भीतर बैठे हैं, उन्हें जाने बिना आनन्द प्राप्ति की तुम्हारी इच्छा की तृप्ति कैसे हो सकती है।" हम युगों से पूर्ण आनन्द प्राप्त करना चाह रहे हैं और इसी आनन्द की खोज में हम सब कुछ करते हैं। हालाँकि विषयों से मन और इन्द्रियों को वास्तविक सुख की छायात्मक अनुभूति होती है। इस प्रकार इन्द्रिय सुख भगवान का असीम सुख पाने के लिए दीर्घ काल से तड़प रही आत्मा को संतुष्ट करने में असफल होती है। जब मन भगवान में एकनिष्ठ हो जाता है तब आत्मा अनिर्वचनीय और परम आनन्द प्राप्त करती है, जोकि इन्द्रियों की परिधि से परे होता है। वैदिक ग्रंथों में योग की इस अवस्था को समाधि कहा जाता हैं। महर्षि पतंजलि ने भी इस प्रकार से कहा है
समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ।।
(पंतजलि योग दर्शन-2.45)
"समाधि में सफलता के लिए परमात्मा की शरणागति प्राप्त करो।" समाधि की अवस्था में पूर्ण तृप्ति और संतोष की अनुभूति होती है और आत्मा की कोई इच्छा शेष नहीं रह जाती। इस प्रकार से वह एक क्षण के लिए भी डिगे बिना दृढ़ता से परमसत्य में स्थित हो जाती है।
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत: |
यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते || 22||
ऐसी अवस्था प्राप्त कर कोई और कुछ श्रेष्ठ पाने की इच्छा नहीं करता। ऐसी सिद्धि प्राप्त कर कोई मनुष्य बड़ी से बड़ी आपदाओं में विचलित नहीं होता।
भौतिक जीवन में किसी भीउपलब्धि से कोई भी प्राणी पूर्णतः संतुष्ट नहीं हो पाता। निर्धन व्यक्ति धनवान बनने के लिए कड़ा परिश्रम करता है और जब वह लखपति हो जाता है तब स्वयं को संतुष्ट मानने लगता है। किन्तु जब वह करोड़पति को देखता है तब पुनः दु:खी हो जाता है। करोड़पति भी अपने से अधिक धनवान को देखकर असंतोष प्रकट करता है। चाहे हम कितने भी सुखी हों जब हम उच्चावस्था वाले सुखों की ओर देखते हैं तब हमें अपने सुख बौने दिखाई देने लगते हैं और हमारे भीतर अतृप्ति की भावना जागृत हो जाती है। लेकिन योग की अवस्था में प्राप्त होने वाला सुख भगवान का असीम सुख है क्योंकि इससे श्रेष्ठ कुछ नहीं है। इस सुख की अनुभूति से आत्मा को स्वाभाविक रूप से यह बोध हो जाता है कि उसने अपने चरम लक्ष्य को पा लिया है। भगवान का दिव्य आनन्द भी शाश्वत है और एक बार जो योगी इसे पा लेता है फिर उससे यह दिव्य आनंद छिन नहीं सकता। ऐसी भगवत्प्राप्त आत्माएँ भौतिक शरीर में रहते हुए भी दिव्य चेतना की अवस्था में स्थित रहती हैं।
कभी-कभी बाहर से देखने पर प्रतीत होता कि ऐसे सिद्ध संत अस्वस्थता, विरोधी लोगों और कष्टदायी परिवेश के रूप में संकटों का सामना कर रहे हैं किन्तु आंतरिक दृष्टि से वे दिव्य चेतना में लीन रहते हैं और निरन्तर भगवान के दिव्य सुख का आस्वादन करते रहते हैं। इस प्रकार बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ भी ऐसे संतों को विचलित नहीं कर सकतीं। भगवान के साथ संबंध स्थापित कर ऐसे संत शारीरिक चेतना से ऊपर उठ जाते हैं और इसलिए वे शारीरिक कष्टों से होने वाली क्षति से प्रभावित नहीं होते। तदनुसार हमने पुराणों में यह सुना है कि प्रह्लाद को कैसे सोँ के गड्ढे में डाला गया, हथियारों से यातना दी गयी, अग्नि में बिठाया गया, पहाड़ से गिराया गया आदि। किन्तु कोई भी विपत्ति प्रह्लाद को भगवान की भक्ति से विलग नहीं कर पायी।
तं विद्याद् दु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् |
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा || 23||
दु:ख के संयोग से वियोग की अवस्था को योग के रूप में जाना जाता है। इस योग का दृढ़तापूर्वक निराशा से मुक्त होकर पालन करना चाहिए।
भौतिक जगत में माया का आधिपत्य होता है और श्रीकृष्ण ने इसे आठवें अध्याय के 15वें श्लोक में अस्थायी और दु:खों से भरा हुआ कह कर परिभाषित किया है। इस प्रकार माया की तुलना अंधकार से की जाती है। यह हमें अज्ञान के अंधकार में रखकर संसार में दु:ख उठाने के लिए विवश करती है। हालाँकि माया का अंधकार स्वाभाविक रूप से तब मिट जाता है जब भगवान का दिव्य प्रकाश हमारे हृदय में आलोकित होता हैं। चैतन्य महाप्रभु ने इसे अति सुन्दरता से व्यक्त किया है
कृष्ण सूर्यसम, माया हय अन्धकार।
यहाँ कृष्ण, ताहाँ नाहि मायार अधिकार।।
(चैतन्य चरितामृत, मध्य लीला-22.31)
"भगवान प्रकाश के समान है और माया अंधकार के समान है। जिस प्रकार से अंधकार प्रकाश के सामने खड़ी नहीं हो सकती उसी प्रकार से माया कभी भगवान पर हावी नहीं हो सकती।" भगवान का स्वरूप दिव्य आनन्दमय है और जबकि माया का परिणाम दु:ख है। इस प्रकार जब कोई भगवान का दिव्य सुख प्राप्त कर लेता है तब माया शक्ति के दु:ख उस पर हावी नहीं हो सकते।
इस प्रकार योग में सिद्धि की अवस्था का तात्पर्य–(1) भगवान की कृपा प्राप्त करना है, (2) दुखों से छुटकारा पाना है। श्रीकृष्ण क्रमशः दोनों पर प्रकाश डालते हैं। पिछले श्लोक में योग के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाले भगवान के दिव्य परमानंद पर प्रकाश डाला गया था और इस श्लोक में दु:खों से मुक्ति पर विशेष बल दिया गया है। इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में श्रीकृष्ण ने यह व्यक्त किया है कि दृढ़तापूर्वक अभ्यास द्वारा ही योग में सिद्धता की अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है। हमें किस विधि से ध्यान लगाना चाहिए, श्रीकृष्ण अब आगे इसे स्पष्ट करेंगे।
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषत: |
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्तत: || 24||
शनै: शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया |
आत्मसंस्थं मन: कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् || 25||
संसार संबंधित सभी इच्छाओं का पूर्ण रूप से त्याग कर हमें मन द्वारा इन्द्रियों पर सभी ओर से अंकुश लगाना चाहिए, फिर धीरे-धीरे निश्चयात्मक बुद्धि के साथ मन केवल भगवान में स्थिर हो जाएगा और भगवान के अतिरिक्त कुछ नहीं सोचेगा।
ध्यान के लिए मन को संसार से हटाने और भगवान में स्थिर करने का अभ्यास करना आवश्यक है। यहाँ श्रीकृष्ण मन को संसार से हटाने की प्रक्रिया का वर्णन कर रहे हैं। जब मन संसार में आसक्त हो जाता है तब मन में सांसारिक वस्तुओं, लोगों, घटनाओं के विचार उमड़ते रहते हैं। प्रायः ये विचार आरम्भ में स्फुरणा (भावनाओं और विचारों की झलक) के रूप में होते हैं। जब हम स्फुरणा को कार्यान्वित करने पर बल देते हैं तब यह संकल्प (विचारों का कार्यरूप) बन जाता है। इस प्रकार से विचार संकल्प की ओर ले जाते हैं और विकल्प (विविधता या अनिश्चित विचार) इस पर निर्भर करता है कि आसक्ति सकारात्मक है या नकारात्मक। संकल्प के बीज इच्छाओं के पौधों का रूप लेकर विकसित होते हैं। यह होना चाहिए था' 'यह नहीं होना चाहिए था' जैसे संकल्प और विकल्प दोनों मन पर तत्काल प्रभाव डालते हैं। इस प्रकार से दोनों भगवान में मन एकाग्र करने में प्रत्यक्ष रूप से बाधा उत्पन्न करते हैं। उनकी स्वाभाविक रूप से वृद्धि की प्रवृति होती है और इच्छा जोकि आज चिनकारी के रूप में है वही कल दावानल बन सकती है। इसलिए जो ध्यान में सफलता पाना चाहते हैं उन्हें सांसारिक पदार्थों के आकर्षणों का त्याग करना चाहिए। संसार से मन हटाने की प्रक्रिया के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण अब दूसरे भाग को व्यक्त कर रहे हैं। मन भगवान पर कैसे स्थिर करें? इस संबंध में वे कहते हैं कि ऐसा स्वतः नहीं होगा लेकिन दृढ़ता से प्रयास करने पर धीरे-धीरे सफलता मिलेगी।
संकल्प की दृढ़ता को शास्त्रों में धृति कहा जाता है। यह संकल्प बुद्धि के दृढ़ निश्चय से आता है। कई लोग शास्त्रों में प्रदत्त आत्मा के स्वरुप और संसार की असारता के संबंध में सैद्धान्तिक ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं किन्तु उनका दैनिक जीवन उनके इस ज्ञान से प्रभावित नहीं होता। उन्हें प्रायः पाप, कामुकता और नशे में संलिप्त देखा जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनकी बुद्धि ऐसे ज्ञान को स्वीकार नहीं करती। संसार की नश्वरता का बोध होने और भगवान के साथ शाश्वत संबंध स्थापित करने के बुद्धि के निश्चय से विवेक शक्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार बुद्धि का प्रयोग करते हुए हमें धीरे-धीरे इन्द्रिय सुख में संलिप्तता का त्याग करना होगा। इसे 'प्रत्याहार' कहा जाता है अर्थात् मन और इन्द्रियों को नियंत्रित कर उन्हें विषयों की ओर आकर्षित होने से रोकना है। प्रत्याहार में शीघ्र सफलता नहीं मिलेगी। इसे धीरे-धीरे बार-बार अभ्यास कर प्राप्त किया जा सकता है। इस अभ्यास में क्या सम्मिलित है? इसकी व्याख्या श्रीकृष्ण अगले श्लोक में करेंगे-
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् |
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् || 26||
जब और जहाँ भी मन बेचैन और अस्थिर होकर भटकने लगे तब उसे वापस लाकर भगवान की ओर केन्द्रित करना चाहिए।
साधना में सफलता एक ही दिन में प्राप्त नहीं की जा सकती। यह मार्ग दीर्घकालीन और कठिन है। जब हम मन को भगवान पर केन्द्रित करने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ ध्यान में बैठते हैं तब प्रायः यह सांसारिक संकल्पों और विकल्पों के बीच भटकता रहता है। इसलिए ध्यान प्रक्रिया में सम्मिलित तीन चरणों को समझना आवश्यक है।
1. बुद्धि की विवेक शक्ति द्वारा हम यह निर्णय लेते हैं कि संसार हमारा लक्ष्य नहीं है इसलिए हमें बलपूर्वक मन को संसार से हटा लेना चाहिए। इसके लिए प्रयास करना आवश्यक है।
2. हमें पुनः विवेक शक्ति से युक्त होकर यह समझना चाहिए कि केवल भगवान ही हमारे हैं और भगवत्प्राप्ति हमारा लक्ष्य है। इस प्रकार से हम मन को भगवान में केन्द्रित कर सकते हैं। यह सब प्रयास से ही संभव हो सकता है।
3. जब मन भगवान से विमुख होकर वापस संसार में भटकने लगता है, तब इसके लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता, यह स्वतः हो जाता है।
जब यह तीसरा चरण स्वतः होने लगता है तब साधक निराश होकर सोचते हैं-'हमने भगवान पर ध्यान लगाने के लिए कड़ा परिश्रम किया किन्तु मन वापस संसार में चला गया।' किन्तु श्रीकृष्ण हमें निराश न होने का उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि मन चंचल है और हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि मन को नियंत्रित करने के हमारे प्रयासों के पश्चात् भी क्या यह अपनी आसक्ति के विषयों की ओर भटकता है अथवा नहीं, किन्तु जब यह भटकने लगे तब हमें एक बार पुनः चरण-1 और चरण-2 में दिए गए निर्देशों को दोहराते हुए मन को संसार से हटा कर भगवान में केन्द्रित करना चाहिए। तब हमें एक बार पुनः अनुभव होता है कि तीसरा चरण स्वतः क्रियाशील हो रहा है। ऐसे में हमें पराजित होकर पीछे नहीं हटना चाहिए बल्कि पुनः प्रथम और दूसरे चरण के निर्देशों का पालन करना चाहिए। हमें बार-बार इसका अभ्यास करना होगा। तब धीरे-धीरे मन की भगवान में भक्ति बढ़नी आरम्भ होगी और साथ-साथ संसार से इसकी विरक्ति भी बढ़ेगी। ऐसा होने से मन सुगमता से हमारे वश में हो जाता है जिससे साधना में ध्यान लगाना सुगम और सहज हो जाता है।
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् |
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् || 27||
जिस योगी का मन शांत हो जाता है और जिसकी वासनाएँ वश में हो जाती हैं एवं जो निष्पाप है तथा जो प्रत्येक वस्तु का संबंध भगवान के साथ जोड़कर देखता है, उसे अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है।
सिद्ध योगी अपने मन को भौतिक विषयों से हटाने और उसे भगवान में केन्द्रित करने में निपुण हो जाता है और उसके सभी भाव उसके वश में हो जाते हैं तथा उसका मन पूर्ण रूप से शांत हो जाता है। प्रारंभिक प्रयास तो मन को भगवान की ओर केन्द्रित करने के लिए आवश्यक थे किन्तु अब मन स्वतः भगवान की ओर आकर्षित होता है। ऐसी अवस्था में प्रबुद्ध साधक सब कुछ भगवान से संबंधित मानते हैं।
नारद मुनि ने कहा है
तत् प्राप्य तदेवालोकयती तदेव श्रृणोति ।
तदेव भाषयति तदेव चिन्तयति ।।
(नारद भक्तिदर्शन, सूत्र-55)
"जिस साधक का मन भगवान के प्रेम में डूबकर एक हो जाता है उसकी चेतना सदा भगवान की भक्ति में लीन रहती है। ऐसा साधक भगवान को ही देखता है, भगवान के संबंध में ही सुनता है, भगवान की ही चर्चा करता है और उसके बारे में ही सोचता है।" जब मन इस प्रकार से भगवान की भक्ति में लीन हो जाता है तब आत्मा अपने भीतर विराजमान भगवान के असीम आनन्द की अनुभूति करती है। साधक सदैव यह प्रश्न करते हैं कि वे कैसे जानें कि वे आत्मोन्नति कर रहे हैं। इसका उत्तर इसी श्लोक में दिया गया है। जब हम अपने भीतर के अलौकिक आनन्द को बढ़ता देखते हैं तब हम इस लक्षण को स्वीकार कर सकते हैं कि हमारा मन वश में हो रहा है और हमारी चेतना आध्यात्मिक रूप से ऊपर उठ रही है। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब हम शान्तरजसम् (कामवासना रहित) और अकल्मषम् (पापों से मुक्त) हो जाते हैं तब हम ब्रह्मभूतम्, अर्थात् भगवत्चेतना से युक्त हो जाते हैं। उस अवस्था में हम सुखम्-उत्तमम् अर्थात् परम आनन्द की अनुभूति करते हैं।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मष: |
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते || 28||
इस प्रकार योगी स्वयं को भगवान से एकीकृत कर भौतिक कल्मषों से मुक्त हो जाता है और निरन्तर परमेश्वर में तल्लीन होकर उसकी दिव्य प्रेममयी भक्ति में परम सुख प्राप्त करता है।
सुख को हम चार श्रेणियों में वर्गीकृत कर सकते हैं-
सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तु राजसम्।
तामसं मोहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.25.29)
तामसिक सुखः यह सुख नशा, मदिरा, धूम्रपान, सिगरेट, मांसाहार के सेवन, अहिंसा और अधिक निद्रा करने से मिलता है। राजसिक सुखः यह सुख पाँच इन्द्रियों और मन की तृप्ति से प्राप्त होता है।
सात्त्विक सुखः इस सुख की अनुभूति गुणों, जैस-अनुराग, परोपकार, ज्ञान को विकसित करने तथा मन को शान्त रखने से होती है। इसमें ज्ञानियों के आत्मज्ञान की अनुभूति जिसे वे मन को आत्मा पर केन्द्रित करके प्राप्त करते हैं, भी सम्मिलित है।
निर्गुण सुखः यह भगवान का दिव्य सुख है जो असीम और अनन्त है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जो योगी भौतिक कल्मषों से मुक्त हो जाते हैं और भगवान के साथ एकनिष्ठ हो जाते हैं वे इस उच्चावस्था को पाकर परमानंद प्राप्त करते हैं। उन्होंने पाँचवें अध्याय के 21वें श्लोक में इसे असीम सुख और छठे अध्याय के 21वें श्लोक में परम सुख कहा है।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि |
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन: || 29||
सच्चा योगी अपनी चेतना को भगवान के साथ एकीकृत कर समान दृष्टि से सभी जीवों में भगवान और भगवान को सभी जीवों में देखता है।
भारत में दीपावली के उत्सव के दौरान दुकानों में कई प्रकार की चीनी से बनी मिठाइयाँ, हाथी गेंद और टोपी आदि का आकार बनाकर बेची जाती हैं। बच्चे अपने अभिभावकों से कार, हाथी आदि की आकृतियों में बनी हुई चीनी की मिठाइयाँ लेने की हठ करते हैं। अभिभावक उनकी नासमझी पर यह समझकर हँसते हैं कि ये सब खिलौने एक ही चीनी की सामग्री से बने हैं और सबकी मिठास एक समान है। इसी प्रकार सभी पदार्थों में भगवान अपनी विभिन्न शक्तियों के साथ स्वयं रहते हैं।
एक देशस्थितस्याग्निज्यो॔त्स्ना विस्तारिणी यथा।
परस्य ब्रह्मणः शक्तिस्तथैदमखिलं जगत्।।
(नारद पंचरात्र)
"जिस प्रकार सूर्य एक स्थान पर स्थित रहकर अपना प्रकाश सब जगह फैला देता है उसी प्रकार से भगवान अपनी विभिन्न शक्तियों द्वारा सर्वत्र व्याप्त रहते हैं और इनका पोषण करते हैं।" इस प्रकार पूर्ण सिद्ध योगी सभी वस्तुओं को भगवान से जुड़ा मानता है।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति || 30||
वे जो मुझे सर्वत्र और प्रत्येक वस्तु में देखते हैं, मैं उनके लिए कभी अदृश्य नहीं होता और वे मेरे लिए अदृश्य नहीं होते।
भगवान को भूलने से तात्पर्य मन का भगवान से विमुख होकर भटकना है और उसमें मन के लगने का अर्थ मन को भगवान में एकत्व कर उसके सम्मुख होना है। मन को भगवान के साथ जोड़ने का सरल उपाय सीखने के लिए सभी पदार्थों को भगवान से संबंधित देखना चाहिए। उदाहरणार्थ यदि कोई हमें आहत करता है तब मन अपनी प्रवृत्ति के अनुसार भावुक होकर हमें आहत करने वाले के प्रति रोष और घृणा व्यक्त करता है। यदि हम मन को ऐसा करने की अनुमति देते हैं तब हमारा मन आध्यात्मिक क्षेत्र से दूर भाग जाता है और मन का भगवान से योग समाप्त हो जाती है। इसके स्थान पर यदि हम उस व्यक्ति के भीतर भगवान की अनुभूति करते हैं तब कोई ऐसा सोचेगा-"भगवान इस व्यक्ति के माध्यम से मेरी परीक्षा ले रहे हैं क्योंकि वे मेरे भीतर सहिष्णुता के गुण को बढ़ाना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने इस व्यक्ति को मेरे साथ दुर्व्यवहार करने की प्रेरणा दी होगी लेकिन मैं अपने मन को इस घटना द्वारा मुझे विक्षुब्ध करने की स्वीकृति नहीं दूंगा।" इस प्रकार से सोचकर हम अपने मन को नकारात्मक मनोभावों का शिकार बनने से रोकने में समर्थ हो सकते हैं। इसी प्रकार से मन जब मित्र या सगे संबंधी में आसक्त हो जाता है, तब वह भगवान से विमुख हो जाता है। ऐसे में यदि हम मन को समझायें कि वह उस व्यक्ति में भगवान को देखे तब प्रत्येक समय जब मन उस व्यक्ति या महिला में भटकने लगे तब हम यह सोचने लगेंगे –'भगवान श्रीकृष्ण उस व्यक्ति या महिला के भीतर उपस्थित हैं। इसलिए मैं इन पर आकर्षित हो रहा हूँ।' इस विधि से मन स्थिर होकर निरन्तर परमेश्वर की भक्ति में लीन रहेगा।
कई बार मन अतीत की घटनाओं पर शोक व्यक्त करता है। इससे पुनः मन दिव्य आध्यात्मिक क्षेत्र से विलग हो जाता है। क्योंकि शोक मन को अतीत में उलझा देता है और इससे वर्तमान में भगवान और गुरु का चिन्तन समाप्त हो जाता है। यदि हम उन घटनाओं का संबंध भगवान के साथ जोड़कर देखते हैं तब यह विचार होगा -" भगवान ने जान-बूझकर ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न की थी ताकि मैं संसार के कष्टों का अनुभव कर सकू जिससे मैं सांसारिक आकर्षणों से विरक्त होने के योग्य बन पाऊँ। भगवान मेरे कल्याण के संबंध में अत्यंत चिन्तित हैं इसलिए उन्होंने मुझ पर दया करके ऐसी उपयुक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न की हैं जो कि मेरे आध्यात्मिक उत्थान के लिए अत्यंत लाभदायक हैं।" ऐसा सोचकर हम भगवान की भक्ति पाने के योग्य बन सकते हैं।
लोकहानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्म लोकवेदत्वात् ।।
(नारद भक्तिदर्शन सूत्र-61)
"जब हम संसार में कठिनाइयों का सामना करे, तब हमें शोक या इन पर चिन्ता नहीं करनी चाहिए। इन घटनाओं को भगवान की कृपा के रूप में देखना चाहिए।" यदि हमारा निजी स्वार्थ किसी भी प्रकार से भगवान के अलावा मन में किसी अन्य को प्रश्रय देता है तब इसको समझाने का सरल उपाय सर्वत्र सभी पदार्थों और समस्त जीवों में भगवान को देखना है। यही अभ्यास धीरे-धीरे पूर्णता की ओर ले जाता है और फिर जैसा कि इस श्लोक में उल्लेख किया गया है कि हम कभी भगवान के लिए अदृश्य नहीं होंगे और भगवान हमारे लिए अदृश्य नहीं होंगे।
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित: |
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते || 31||
जो योगी मुझमें एकनिष्ठ हो जाता है और परमात्मा के रूप में सभी प्राणियों में मुझे देखकर श्रद्धापूर्वक मेरी भक्ति करता है, वह सभी प्रकार के कर्म करता हुआ भी केवल मुझमें स्थित हो जाता है।
भगवान सर्वव्यापक हैं। वे परमात्मा के रूप में सभी के हृदय में निवास करते हैं। अठारहवें अध्याय के 61वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने वर्णन किया है-"मैं सभी प्राणियों के हृदय में निवास करता हूँ।" इस प्रकार से सभी प्राणियों के शरीर में दो ही तत्त्व हैं-आत्मा और परमात्मा ।
1. भौतिक चेतना से युक्त लोग सभी को शरीर के रूप में देखते हैं और जाति, नस्ल, लिंग, आयु और सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर एक-दूसरे से भेदभाव बनाए रखते हैं।
2. उच्च चेतना में युक्त मनुष्य सभी को आत्मा के रूप में देखते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण ने पाँचवे अध्याय के 18वें श्लोक में कहा है कि विद्वान लोग दिव्य ज्ञान की दृष्टि से ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और कुत्ते का मांस भक्षण करने वाले चाण्डाल को समान दृष्टि से देखते
3. दिव्य चेतना से युक्त सिद्ध योगी भगवान को परमात्मा के रूप में सब में स्थित देखते हैं। वे संसार का अनुभव भी करते हैं किन्तु उसमें उलझते नहीं। वे उस हंस के समान होते हैं जो दूध और जल के मिश्रण में से केवल दूध का सेवन करता है व जल को छोड़ देता है।
4. सिद्धावस्था प्राप्त योगियों को परमहंस कहा जाता है। वे सर्वत्र भगवान को देखते हैं और संसार का अनुभव नहीं करते। श्रीमद्भागवत् में किए गए वर्णन के अनुसार महर्षि वेदव्यास के सुपुत्र शुकदेव जो परमहंस थे
यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव ।
पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदुस्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ।।
(श्रीमद्भागवत् 1.2.2)
"जब शुकदेव बचपन में ही घर से संन्यास लेकर निकल पड़े उस समय वह ऐसी परम सिद्धावस्था में थे कि उन्हें संसार का बोध नहीं था। उन्होंने सरोवर में नग्न होकर स्नान कर रही सुन्दर स्त्रियों की ओर ध्यान नहीं दिया जबकि वह वहाँ से निकल कर गये थे। उन्होंने केवल भगवान की ही अनुभूति की, भगवान के बारे में ही सुना और भगवान का ही चिन्तन किया।" इस श्लोक में श्रीकृष्ण पूर्ण सिद्ध योगी की चर्चा कर रहे हैं जो तीसरे और चौथे चरण से ऊपर के स्तर की अनुभूति है।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन |
सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मत: || 32||
मैं उन पूर्ण सिद्ध योगियों का सम्मान करता हूँ जो सभी जीवों में समानता के दर्शन करते हैं और दूसरों के सुखों और दु:खों के प्रति ऐसी भावना व्यक्त करते हैं, जैसे कि वे उनके अपने हों।
शरीर के सभी अंग हमारे हैं और यदि किसी भी अंग में विकार आ जाता है तब हम समान रूप से उसकी चिन्ता करते हैं। हम निर्विवाद रूप से स्वीकार करते हैं कि यदि हमारे किसी अंग को कोई कष्ट होता है तो उससे हमें भी कष्ट होगा। उसी तरह जो सब प्राणियों में भगवान को देखते हैं उन्हें सबके सुख और दु:ख अपने समान लगते हैं। इसलिए ऐसे योगी सभी जीवात्माओं के शुभ चिन्तक होते हैं और सभी के आंतरिक लाभ के लिए प्रयास करते हैं। यही पूर्ण योगी का समदर्शन है।
अर्जुन उवाच |
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्त: साम्येन मधुसूदन |
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ||
अर्जुन ने कहा-हे मधुसूदन! आपने जिस योगपद्धति का वर्णन किया वह मेरे लिए अव्यावहारिक और अप्राप्य है क्योंकि मन चंचल है।
अर्जुन इस श्लोक के प्रारम्भ में 'योऽयं' शब्द का उच्चारण करता है। इसका अर्थ 'यह योग की पद्धति है' जिसका इस अध्याय के 10वें श्लोक से आगे वर्णित श्लोकों में उल्लेख किया गया है। श्रीकृष्ण अब योग में सिद्धता के लिए आवश्यक रूप से अनुपालन किए जाने वाले बिन्दुओं को बताते हुए अपनी व्याख्या को समाप्त करते हैं
1. इन्द्रियों का दमन करना।
2. सभी कामनाओं का त्याग करना।
3. मन को केवल भगवान पर केन्द्रित करना।
4. स्थिर मन से भगवान का चिन्तन करना।
5. सबको समान दृष्टि से देखना।
अर्जुन यह कहकर कि जो भी उसने सुना वह अव्यवहारिक है, नि:संकोच अपना संदेह प्रकट करता है। मन को नियंत्रित किए बिना इनमें से किसी का भी पालन नहीं किया जा सकता। यदि मन अस्थिर है तब योग की ये सभी अवस्थाएँ अप्राप्य हो जाती हैं।
चञ्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् |
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् || 34||
हे कृष्ण! क्योंकि मन अति चंचल, अशांत, हठी और बलवान है। मुझे वायु की अपेक्षा मन को वश में करना अत्यंत कठिन लगता है।
अर्जुन द्वारा व्यक्त की गयी मन की दशा हम सबके दुराग्रही मन की दशा की ओर इंगित करती है। यह बेचैन रहता है क्योंकि यह एक विषय से दूसरे विषय की ओर अलग-अलग दिशाओं में भटकता रहता है। यह अशांत रहता है क्योंकि यह किसी की चेतना में घृणा, क्रोध, काम, लोभ, ईर्ष्या, चिन्ता, आसक्ति के रूप में उथल-पुथल उत्पन्न करता है। यह शक्तिशाली है क्योंकि यह अपनी प्रबल धाराओं के बल से बुद्धि पर हावी हो जाता है और विवेक शक्ति को नष्ट कर देता है। मन हठी भी है क्योंकि जब मन में हानिकारक विचार आ जाते हैं तब फिर यह उन्हें मन से बाहर नहीं निकालता और निरन्तर बार-बार उनका तब तक चिन्तन करता है जब तक कि वे बुद्धि को भ्रमित न कर दें। इस प्रकार यहाँ मन के हानिकारक लक्षणों की गणना की गयी है। अर्जुन भी स्वीकार करता है कि वायु की अपेक्षा मन को नियंत्रित करना अत्यंत कठिन है। यह एक उत्तम दृष्टान्त है कि कोई भी व्यक्ति आकाश में व्याप्त वायु शक्ति को नियंत्रित करने की सोच भी नहीं सकता।
इस श्लोक में अर्जुन ने श्रीकृष्ण को भगवान कह कर सम्बोधित किया है। कृष्ण शब्द का अर्थ, "कर्षति योगिनां परमहंसानां चेतांसि इति कृष्णः" अर्थात् "कृष्ण वह है जो मन को बलपूर्वक आकर्षित कर लेता है चाहे कोई दृढ़ मन वाला योगी और परमहंस ही क्यों न हो।" इस प्रकार से अर्जुन यह इंगित कर रहा है कि श्रीकृष्ण को उसके अस्थिर, अशांत, बलशाली और हठी मन को भी अपने आकर्षण में बाँध लेना चाहिए।
श्रीभगवानुवाच |
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् |
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते || 35||
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा-हे महाबाहु कुन्तीपुत्र! जो तुमने कहा वह सत्य है, मन को नियंत्रित करना वास्तव में कठिन है। किन्तु अभ्यास और विरक्ति द्वारा इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
Commentary
अर्जुन को संबोधित कर श्रीकृष्ण में कहते हैं-“हे बलिष्ठ भुजाओं वाले अर्जुन, तुमने युद्ध में महाबलशाली योद्धाओं को पराजित किया है तो क्या तुम मन को वश में नहीं कर सकते?" किन्तु श्रीकृष्ण इस समस्या को यह कहकर अस्वीकार नहीं करते-“हे अर्जुन तुम ऐसी व्यर्थ की चर्चा क्यों कर रहे हो? मन को सुगमता से नियंत्रित किया जा सकता है।" इसके विपरीत वे अर्जुन के इस कथन के साथ कि मन पर नियंत्रण प्राप्त करना कठिन है, अपनी सहमति प्रकट करते हैं। यद्यपि संसार में बहुत-सी वस्तुओं को प्राप्त करना कठिन होता है तथापि हम निडर होकर आगे बढ़ते हैं। नाविकों को ज्ञात होता है कि समुद्र में नाव चलाना जोखिम भरा कार्य है और भयानक तूफान आने की आशंका बनी रहती है। फिर भी वे इन जोखिमों को तट पर खड़े रहने का बहाना नहीं बनाते। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि मन को वैराग्य और अभ्यास द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।
वैराग्य से तात्पर्य संसार से विरक्त होना है। हम देखते हैं कि मन भौतिक विषयों एवं पदार्थों की ओर आकर्षित होता है। इस दिशा की ओर बढ़ने से वह अतीत का चिन्तन करने का आदी हो जाता है। आसक्ति का उन्मूलन मन को अनावश्यक भटकने से रोकता है।
अभ्यास एक ठोस प्रयास है जिसका लक्ष्य पुरानी प्रवृत्तियों को परिवर्तित करना या नवीन विचार उत्पन्न करना है। साधक के लिए अभ्यास शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानवीय प्रयास के सब क्षेत्रों में अभ्यास निपुणता और उत्कृष्टता के द्वार को खोलने की कुंजी है। इसे टाइपिंग कार्य के उदाहरण से समझा जा सकता है। पहली बार जब लोग टाइपिंग करना आरम्भ करते हैं तब वे एक मिनट में एक शब्द टाइप कर पाते हैं। किन्तु एक वर्ष टाइपिंग का अभ्यास करने के पश्चात् उनकी उंगलियाँ टाइपराइटर पर 80 शब्द प्रति मिनट की गति से दौड़ती हैं। यह दक्षता पूर्ण अभ्यास के कारण से आती है। इसी प्रकार हठी और अशांत मन को परम प्रभु के चरण कमल पर स्थिर करने का प्रयास करना चाहिए। मन को संसार से हटाना वैराग्य है और मन को भगवान में स्थित करना अभ्यास है। ऋषि पतंजलि ने भी यही उपदेश दिया है
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:।।
(पतंजली योगदर्शन-1.12)
'मन की चंचलता को निरन्तर अभ्यास और विरक्ति द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।'
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मति: |
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायत: || 36||
जिनका मन निरंकुश है उनके लिए योग करना कठिन है। लेकिन जिन्होंने मन को नियंत्रित करना सीख लिया है और जो समुचित ढंग से निष्ठापूर्वक प्रयास करते हैं, वे योग में पूर्णता प्राप्त कर सकते हैं। यह मेरा मत है।
परम पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण मन को नियंत्रित करने और योग में सफलता पाने के बीच की कड़ी को स्पष्ट करते हैं। वह कहते हैं कि जिन्होंने अभ्यास और वैराग्य द्वारा मन पर अंकुश लगाना नहीं सीखा, उन्हें योग का अभ्यास करना कठिन लगता है। लेकिन जो समुचित उपायों को अपनाते हुए निरन्तर प्रयास द्वारा मन को अपने वश में कर लेते हैं, वे योग में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। इसकी प्रक्रिया का वर्णन श्लोक 6.10 से 6.32 तक में पहले ही किया जा चुका है जिसमें इन्द्रियों का दमन करना, सभी कामनाओं का त्याग करना, मन को केवल भगवान पर केन्द्रित करना, अविचलित मन से भगवान का चिन्तन करना और सभी को समान दृष्टि से देखना आदि सम्मिलित है। इस कथन द्वारा अर्जुन के मन में उस साधक के संबंध में शंका उत्पन्न होती है जो अपने मन को नियंत्रित करने में असमर्थ है। इसलिए वह अब इस संबंध में श्रीकृष्ण से प्रश्न करता है।
अर्जुन उवाच |
अयति: श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानस: |
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति || 37||
अर्जुन ने कहाः हे कृष्ण! योग में असफल उस योगी की गति क्या होती है जो श्रद्धा के साथ इस पथ पर चलना प्रारम्भ तो करता है किन्तु जो अस्थिर मन के कारण भरपूर प्रयत्न नहीं करता और इस जीवन में योग के लक्ष्य तक पहुँचने में असमर्थ रहता है।
भगवत्प्राप्ति की यात्रा श्रद्धा के साथ आरम्भ होती है। कई साधक अपने पूर्व जन्म के संस्कारों से या संतों की संगति या संसार में हानि के कारण धार्मिक ग्रंथों में अपनी श्रद्धा विकसित करती हैं। इस यात्रा में अपेक्षित श्रद्धा के उत्पन्न करने के कई कारण हो सकते हैं। किन्तु यदि ऐसे साधक आवश्यक प्रयास नहीं करते और 'अयतिः' अर्थात आलसी बन जाते हैं तब उनका मन बेचैन रहता है। ऐसे साधक अपने जीवन में इस यात्रा को पूर्ण करने में असमर्थ रहते हैं। अर्जुन ऐसे साधकों का भाग्य जानना चाहता है।
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति |
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मण: पथि || 38||
हे महाबाहु कृष्ण! क्या योग से पथ भ्रष्ट ऐसा व्यक्ति भौतिक एवं आध्यात्मिक सफलताओं से वंचित नहीं होता और छिन्न-भिन्न बादलों की भाँति नष्ट नहीं हो जाता जिसके परिणामस्वरूप वह किसी भी लोक में स्थान नहीं पाता?
जीवात्मा में सफलता प्राप्त करने की इच्छा स्वाभाविक होती है। यह भगवान (जो पूर्ण सिद्ध हैं) का अंश होने के कारण उत्पन्न होती है। भौतिक और अध्यात्म दोनों क्षेत्रों में सफलता प्राप्त की जा सकती है। वे जो संसार को सुखों का साधन मानते हैं, वे भौतिक उन्नति के लिए प्रयास करते हैं और जो वास्तविक निधि के रूप में आध्यात्मिक संपदा को प्राप्त करने को अपना सौभाग्य समझते हैं, वे इसके लिए भौतिक उन्नति को अस्वीकार कर देते हैं। किन्तु यदि ऐसे साधक अपने प्रयास में असफल होते हैं तब वे न तो आध्यात्मिक और न ही सांसारिक संपदा को प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा सोचकर अर्जुन पूछता है कि क्या ऐसे साधकों की स्थिति छिन्न-भिन्न बादल की भाँति होती है? जो बादल समूह से टूटकर अलग हो जाता है एवं जो न तो पर्याप्त छाया देता है और न ही भारी होकर वर्षा करता है, वह केवल वायु में उड़ जाता है और अस्तित्व हीन होकर आकाश में विनष्ट हो जाता है।
अर्जुन पूछता है कि क्या असफल योगी ऐसे दुर्भाग्य का सामना करता है और क्या उसे किसी भी लोक में स्थान नहीं मिलता।
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषत: |
त्वदन्य: संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते || 39||
हे कृष्ण! कृपया मेरे इस सन्देह का निवारण करें क्योंकि आपके अतिरिक्त कोई अन्य नहीं है जो ऐसा कर सके।
अज्ञान के कारण ही संदेह उत्पन्न होते हैं और इन सन्देहों का निवारण करने के लिए शास्त्रों का सैद्धान्तिक ज्ञान ही पर्याप्त नहीं होता। क्योंकि शास्त्रों में कई विरोधाभासी विचार सम्मिलित होते हैं जिनका समाधान केवल अनुभव द्वारा ही हो सकता है। महापुरुष ऐसे अनुभवात्मक ज्ञान से संपन्न होते हैं जो सीमित मात्रा का होता है। वे सर्वज्ञ नहीं होते। वे संदेह निवारण करने की शक्ति से सम्पन्न होते हैं किन्तु उनकी भगवान से तुलना नहीं हो सकती जो पूर्ण एवं सर्वज्ञ हैं। केवल भगवान ही 'सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है' इसलिए वे उसी प्रकार से अज्ञानता को दूर करने में समर्थ हैं जिस प्रकार सूर्य अंधकार को मिटाने में पूर्णतः समर्थ होता है।
श्रीभगवानुवाच |
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते |
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति || 40||
परमेश्वर श्रीकृष्ण ने कहाः हे पृथा पुत्र! आध्यात्मिक पथ का अनुसरण करने वाले योगी का न तो इस लोक में और न ही परलोक में विनाश होता है। मेरे प्रिय मित्र! भगवत्प्राप्ति के मार्ग पर चलने वाले का पतन नहीं हो सकता।
'तात' एक स्नेहपूर्ण शब्द है जिसका साहित्यिक अर्थ 'पुत्र' है। अर्जुन को 'तात' शब्द से संबोधित कर श्रीकृष्ण उसके प्रति अपना स्नेह प्रदर्शित करते हैं। पुत्र को स्नेहपूर्वक 'तात' कहकर संबोधित किया जाता है। गुरु शिष्य के लिए पिता समान है और इसलिए गुरु भी कई बार शिष्य को स्नेहपूर्वक 'तात' कहकर पुकारते हैं। यहाँ अर्जुन के प्रति अपना स्नेह और कृपा व्यक्त करते हुए श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि भगवान उनकी सहायता करते हैं जो उनके मार्ग का अनुगमन करते हैं। वे भगवान के प्रिय होते हैं क्योंकि वे अति पुण्यशाली और पवित्र कार्यों में लीन रहते हैं। इस मार्ग पर चलने वाले को कभी कष्ट नहीं होता। यह श्लोक इस बात की पुष्टि करता है कि भगवान अपने भक्त की इस लोक में और परलोक में रक्षा करते हैं। यह उद्घोषणा सभी साधकों के लिए आश्वासन है।
श्रीकृष्ण अब यह स्पष्ट करेंगे कि भगवान योगभ्रष्ट जीव के प्रयासों को कैसे सुरक्षित करके रखते हैं।
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वती: समा: |
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते || 41||
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् |
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् || 42||
योगभ्रष्ट जीव मृत्यु के पश्चात् पुण्य आत्माओं के लोक में जाते हैं। अनेक वर्षों तक वहाँ निवास करने के पश्चात् वे पृथ्वी पर कुलीन या धनवानों के कुल में पुनः जन्म लेते हैं अथवा जब वे दीर्घकाल तक योग के अभ्यास से विरक्त हो चुके होते हैं तब उनका जन्म दिव्य ज्ञान से सम्पन्न परिवारों में होता है। संसार में ऐसा जन्म अत्यंत दुर्लभ है।
जो लौकिक पुण्यकर्मो में संलग्न रहते हैं उन्हें स्वर्गलोक में स्थान मिलता है। वे फल की इच्छा से वेदों में प्रदत्त कर्मकाण्डों का पालन करते हैं। किन्तु योगभ्रष्ट को स्वर्गलोक क्यों भेजा जाता है? इसका कारण भोग है। भोग की कामना के कारण ही व्यक्ति योग मार्ग से भ्रष्ट हो जाता है। इसलिए भगवान एक पिता की भाँति योग मार्ग से भ्रष्ट योगी को अगले जन्म में सुख भोगने और यह अनुभूति करने का अवसर प्रदान करते हैं कि लौकिक सुख व्यर्थ हैं जो अनन्त आनन्द प्राप्त करने के लिए तरसती आत्मा को तृप्त नहीं कर सकता। इसलिए असफल योगी को कभी-कभी दीर्घकाल के लिए स्वर्ग के उच्च लोकों में भेजा जाता है और फिर वे पुनः पृथ्वी पर जन्म लेते हैं।
ऐसी जीवात्माओं को तब ऐसे कुलों में जन्म मिलता है जहाँ उन्हें अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आगे जारी रखने का अवसर मिल सके। 'शुचि' का अर्थ पवित्र और सदाचार का पालन करने वालों से हैं और 'श्री' का अर्थ वे जो धनवान हैं। असफल योगी या तो किसी पुण्य कर्म करने वाले परिवार में जहाँ बचपन से बालक में आध्यात्मिकता का पोषण किया जाता है या किसी धनवान परिवार में जन्म लेता है जहाँ सभी प्रकार की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का ध्यान रखा जाता है और जहाँ किसी प्रकार का संघर्ष नहीं करना पड़ता। ऐसा पारिवारिक परिवेश उन जीवात्माओं को जिनकी आध्यात्मवाद में रुचि होती है, उन्हें आध्यात्मिक गतिविधियों में संलग्न रहने का अवसर प्रदान करता है।
हमारे जीवन पर परिस्थितियों, और हमारे परिवार का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। हमारे माता पिता से हमें वंशानुगत गुण आदि प्राप्त होते हैं। यह वंशानुगत की आनुवांशिक प्रक्रिया है। हालांकि सामाजिक आनुवांशिकता का भी महत्त्व होता है। हम अपने सामाजिक परिवेशों के कारण कई प्रकार के रीति रिवाजों का पालन आँखे मूंद कर करते हैं। हम भारतीय, अमेरीकी और ब्रिटिश होने का चयन नहीं कर सकते। हम अपने जन्म स्थान के आधार पर अपनी राष्ट्रीयता की पहचान करते हैं और यहाँ तक कि हम अन्य राष्ट्रीयता वाले लोगों से शत्रुता रखते हैं। इस प्रकार से हम सामाजिक आनुवांशिकता के आधार पर ही अपने पूर्वजों के धर्म का भी पालन करते हैं।
हमारे जन्मस्थान और जन्म कुल का हमारे जीवन के दिशा और प्रगति पर अत्यंत प्रभाव पड़ता हैं। यदि प्रत्येक जन्म में स्थान और जन्मकुलों का स्वेच्छानुसार निर्णय लिया जाता, तब संसार में कभी कोई न्याय नहीं हो सकता था। चूंकि भगवान हमारे अनन्त जन्मों के विचारों और कर्मों का लेखा-जोखा अपने पास रखते हैं। अतः कर्म के नियमों के अनुसार योगभ्रष्ट को पिछले जन्म में अर्जित आध्यात्मिक संपत्ति का फल मिलता है। तदनुसार ऐसे योगी, जो आध्यात्मिक क्षेत्र में अत्यधिक दूरी तय करने के पश्चात् उदासीन हो जाते हैं, उन्हें उच्च लोकों में नहीं भेजा जाता। उन्हें आध्यात्मिक रूप से उन्नत कुलों में जन्म दिया जाता है, ताकि वे सुगमतापूर्वक अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आगे बढ़ा सकें। इस प्रकार ऐसा जन्म अति सौभाग्यशाली होता है, क्योंकि माता-पिता बच्चों को आरम्भ से ही भगवत्शिक्षा प्रदान करते हैं।
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् |
यतते च ततो भूय: संसिद्धौ कुरुनन्दन || 43||
हे कुरुवंशी! ऐसा जन्म पाकर वे पिछले जन्म के ज्ञान को पुनः प्राप्त करते हैं और योग में पूर्णता के लिए और अधिक परिश्रम करते हैं।
भगवान प्रत्येक प्राणी के हृदय में रहते हैं और पूर्ण न्यायकर्ता हैं। हमने पिछले जीवन में विरक्ति, ज्ञान, भक्ति, श्रद्धा, सहनशीलता, दृढ संकल्प आदि जो भी आध्यात्मिक संपत्ति प्राप्त की थी इन सबका भगवान को ज्ञान होता है। इसलिए भगवान उचित समय पर हमारे अतीत के प्रयत्नों का फल प्रदान करते हैं और हमारी पिछली उपलब्धियों के अनुसार हमारे भीतर आध्यात्मिकता के गुणों को बढ़ाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भौतिकवादी विचारों को मानने वाले कुछ लोग अचानक कैसे आध्यात्मिक हो जाते हैं। जब उनके आध्यात्मिक संस्कार जागृत होते हैं तब उन्हें अपनी पूर्व जन्म की साधना का लाभ मिलता है।
एक यात्री रात्रि के समय मार्ग पर स्थित एक होटल में विश्राम करने के लिए जाता है। लेकिन जब वह प्रात:काल में जागता है तब पहले से तय की गई दूरी पर पुनः वापिस नहीं चलता। वह शेष दूरी को समाप्त करने के लिए आगे बढ़ता जाता है। समान रूप से भगवान की कृपा से ऐसा योगी पूर्वजन्मों में संचित की गयी आध्यात्मिक संपत्ति के बल पर नींद से जागे मनुष्य की भाँति अपनी यात्रा को वहीं से पुनः आरम्भ करने के योग्य हो जाता है जहाँ से उसने इसे छोड़ा था। इसी कारण ऐसे योगी का कभी पतन नहीं होता।
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि स: |
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते || 44||
वास्तव में वे अपने पूर्व जन्मों के संस्कारों के बल पर स्वतः भगवान की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसे जिज्ञासु साधक स्वाभाविक रूप से कर्मकाण्डों से ऊपर उठ जाते हैं।
एक बार जब आध्यात्मिक भावनाएँ उदित होती हैं तब उन्हें समाप्त नहीं किया जा सकता। जीवात्मा वर्तमान और पूर्व जीवन के भक्तिमय संस्कारों के साथ आध्यात्मिकता की ओर प्रेरित होती है। ऐसे मनुष्य भगवान की ओर आकर्षित होते हैं और इस आकर्षण को 'भगवान का आमंत्रण' भी कहा जाता है। पूर्व जन्मों के संस्कारों पर आधारित 'भगवान का यह आमंत्रण' जीवन का सबसे सशक्त निमंत्रण है। जिन्हें इसकी अनुभूति होती है वे समस्त संसार को त्याग देते हैं और अपने मित्रों और सगे-संबंधियों को भी इसी मार्ग पर चलने का परामर्श देते हैं। ऐसा इतिहास में भी देखा गया है कि महान राजाओं, कुलीन पुरुषों, धनाढ्य व्यवसायियों ने तपस्वी, योगी, ऋषी, मनीषी और स्वामी बनने के लिए अपने लौकिक पद प्रतिष्ठा और सुख सुविधाओं का परित्याग किया था। इसके अतिरिक्त उनकी श्रद्धा केवल भगवान को प्राप्त करने के लिए थी, अतः वे स्वाभाविक रूप से भौतिक उन्नति हेतु वेदों में वर्णित कर्म काण्डों से ऊपर उठ गये थे।
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिष: |
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् || 45||
पिछले कई जन्मों में संचित पुण्यकर्मों के द्वारा जब ये योगी आध्यात्मिक मार्ग में उन्नति करने हेतु प्रयत्न में लीन रहते हैं तब वे सांसारिक कामनाओं से मुक्त हो जाते हैं और इसी जीवन में भगवत्प्राप्ति कर लेते हैं।
पिछले जन्म के संचित अभ्यास आध्यात्मिक उन्नति में सहायक वायु बन जाते हैं। इसी अनुकूल वायु में योगी अपने वर्तमान जीवन में प्रयत्नों के द्वारा अपनी नाव को खड़ा करते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण ने 'प्रयत्नाद्यतमानस्तु' शब्द का प्रयोग किया है, जिसका अर्थ 'पहले से अधिक अथक प्रयास' है। 'तु ' शब्द यह इंगित करता है कि उनके वर्तमान प्रयास पूर्वजन्मों से अधिक गहन होते हैं। इस प्रकार से वे अतीत की साधना का लाभ उठाने में समर्थ हो जाते हैं और वर्तमान साधना उन्हें लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायक होती हैं। देखने वालों को ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने इस वर्तमान जीवन में ही संपूर्ण दूरी तय कर ली है। लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं-"जन्मसंसिद्धस्ततो" अर्थात् कई जन्मों के संचित कर्मों के परिणामस्वरूप योग में पूर्णता प्राप्त होती है।
तपस्विभ्योऽधिकोयोगी
ज्ञानिभ्योऽपिमतोऽधिक:|
कर्मिभ्यश्चाधिकोयोगी
तस्माद्योगीभवार्जुन|| 46||
एक योगी तपस्वी से, ज्ञानी से और सकाम कर्मी से भी श्रेष्ठ होता है। अतः हे अर्जुन! तुम सभी प्रकार से योगी बनो।
तपस्वी वह है जो स्वेच्छा से वैराग्य स्वीकार करता है, नितान्त सादा जीवन व्यतीत करता है और मोक्ष प्राप्त करने के साधन के रूप में इन्द्रियों के सुखों और भौतिक संपत्ति के संग्रह से दूर रहता है। ज्ञानी पुरुष वह है जो ज्ञान के संवर्धन में रत रहता है। कर्मी मनुष्य भौतिक समृद्धि और स्वर्ग प्राप्ति की कामना से वेदों में वर्णित कर्मकाण्डों का पालन करता रहता है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि इनमें से सर्वश्रेष्ठ योगी होता है। इसका कारण अत्यंत सरल है-कर्मी, ज्ञानी और तपस्वी का लक्ष्य लौकिक सिद्धि प्राप्त करना होता है क्योंकि वे अभी तक शारीरिक चेतन पर स्थित रहते हैं जबकि योगी सांसारिक सिद्धियाँ प्राप्त करने की अपेक्षा भगवान को पाने के लिए प्रयत्न करता है। योगी की सिद्धि आध्यात्मिक स्तर पर होती है और इसी कारण से वह इन सबमें से श्रेष्ठ होता है।
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना |
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मत: || 47||
सभी योगियों में से जिनका मन सदैव मुझ में तल्लीन रहता है और जो अगाध श्रद्धा से मेरी भक्ति में लीन रहते हैं उन्हें मैं सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ।
योगियों में कर्मयोगी, भक्ति योगी, अष्टांग योगी आदि सम्मिलित हैं। इस श्लोक में केवल यह चर्चा की गयी है कि योग की कौन सी पद्धति सर्वोत्तम है। श्रीकृष्ण भक्ति योगी को अष्टांग योगी और हठ योगी से भी श्रेष्ठ घोषित करते हैं क्योंकि भक्ति भगवान की दिव्य शक्ति है। यह एक ऐसी शक्ति है जो भगवान को भी भक्त का दास बना देती है। इसलिए श्रीमद्भागवतम् में इस प्रकार से वर्णन किया है।
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः।।
(श्रीमद्भागवतम-9.4.63)
"यद्यपि मैं परम स्वतंत्र हूँ, फिर भी मैं अपने भक्त का दास बन जाता हूँ। वे मेरे हृदय को वश में कर लेते हैं। मेरे भक्त का क्या ही वर्णन किया जा सकता है? यहाँ तक कि मेरे भक्त के भक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय हैं।" भक्त योगी दिव्य प्रेम की शक्ति से सम्पन्न होता है और इसलिए वह भगवान का अत्यंत प्रिय है और वे उसे सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।
इस श्लोक में भगवान ने 'भजते' शब्द का प्रयोग किया है। यह 'भज्' धातु से बना है, जिसका अर्थ 'सेवा करना' है। यह भक्ति के लिए 'पूजा' शब्द की अपेक्षा अत्यधिक सार्थक शब्द है जिसका अर्थ 'श्रद्धा रखना' है। यहाँ श्रीकृष्ण उनकी चर्चा कर रहे हैं जो न केवल उनमें श्रद्धा रखते हैं बल्कि अपनी प्रेममयी भक्ति से उनकी सेवा भी करते हैं। इस प्रकार से वे भगवान के सेवक के रूप आत्मा की स्वाभाविक स्थिति में प्रतिष्ठित हो जाते हैं जबकि अन्य श्रेणी के योगी आने स्वरुप के ज्ञान में अभी तक अपूर्ण रहते हैं। वे स्वयं को भगवान के साथ एकीकृत तो कर लेते हैं किन्तु फिर भी वे इस ज्ञान में स्थित नहीं होते कि वे उनके नित्य दास हैं। श्रीमद्भागवतम् में पुनः वर्णन किया गया है
मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः।
सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने।।
(श्रीमद्भागवतम्-6.14.5)
"कई लाखों सिद्ध और मुक्त संतो के मध्य कोई विरला मनुष्य ही परमेश्वर नारायण का भक्त होता है।"
इस श्लोक को इस प्रकार से भी समझा जा सकता है कि भक्ति योग ही भगवान की अंतरंग और पूर्ण अनुभूति करा सकता है। इसकी व्याख्या अठारहवें अध्याय के 55वें श्लोक में की गयी है जहाँ श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि केवल भक्ति योग द्वारा ही भगवान के विराट एवं सच्चिदानन्द स्वरूप को समझा जा सकता है।
।। श्रीमद्भागवत गीता षष्ठम अध्याय सम्पूर्ण ।।
Bhagavad Geeta Chapter 5
kathaShrijirasik
अध्याय पाँच: कर्म संन्यास योग
वैराग्य का योग
इस अध्याय में कर्म संन्यास के मार्ग की तुलना कर्मयोग के मार्ग के साथ की गयी है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि दोनों मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं और हम इनमें से किसी एक का चयन कर सकते हैं। लेकिन कर्म का त्याग तब तक पूर्णरूप से नहीं किया जा सकता। जब तक मन पूर्णतः शुद्ध न हो जाए और मन की शुद्धि भक्ति के साथ कर्म करने से प्राप्त होती है। इसलिए कर्मयोग बहुसंख्यक लोगों के लिए उपयुक्त विकल्प है। कर्मयोगी अपने सांसारिक दायित्वों का निर्वहन शुद्ध बुद्धि के साथ करते हुए अपने कर्म फलों की आसक्ति का त्याग कर उन्हें भगवान को अर्पित करते हैं। इस प्रकार से वे पाप से उसी प्रकार से अप्रभावित रहते हैं जिस प्रकार से कमल का पत्ता जल में तैरता है किन्तु जल उसे स्पर्श नहीं कर पाता। ज्ञान के आलोक में वे शरीर को नवद्वारों के एक नगर के रूप में देखते हैं जिसमें आत्मा निवास करती है। इसलिए वे न तो स्वयं को कर्म का कर्ता और न ही कर्म का भोक्ता मानते हैं। वे ब्राह्मण, गाय, हाथी, और कुत्ते का मांस भक्षण करने वाले चांडाल को एक समान दृष्टि से देखते हैं। ऐसे सच्चे संत भगवान के दिव्य गुणों को अपने भीतर विकसित करते हैं और परम सत्य में स्थित हो जाते हैं किन्तु सांसारिक लोग यह नहीं जानते कि इन्द्रिय और विषयों के संपर्क से मिलने वाले सुख वास्तव में कष्टों के कारण हैं। अतः वे अज्ञानता के कारण इनसे मिलने वाले सुखों को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। लेकिन कर्मयोगी इनसे प्रसन्न नहीं होते बल्कि इसकी अपेक्षा वे अपने भीतर भगवदीय आनन्द की अनुभूति करना पसंद करते हैं।
आगे यह अध्याय संन्यास के मार्ग का वर्णन करता है। कर्म संन्यासी अपने मन, इन्द्रियों और बुद्धि को नियंत्रित करने के लिए तपस्या करते हैं। इस प्रकार से वे भौतिक सुख के विचारों को त्याग कर इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त हो जाते हैं। फिर, वे भगवान की भक्ति के द्वारा अपनी तपस्या को सम्पूर्ण करते हैं और अनंत शांति प्राप्त करते हैं।
अर्जुन उवाच |
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि |
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् || 1||
अर्जुन ने कहा-हे कृष्ण! पहले आपने कर्म संन्यास की सराहना की और फिर आपने मुझे भक्ति युक्त कर्मयोग का पालन करने का उपदेश भी दिया। कृपापूर्वक अब मुझे निश्चित रूप से बताएँ कि इन दोनों में से कौन सा मार्ग अधिक लाभदायक है।
यह अर्जुन के सोलह प्रश्नों में से पाँचवाँ प्रश्न है। श्रीकृष्ण कर्म के परित्याग और भक्तिपूर्वक कर्म-दोनों की सराहना करते हैं। अर्जुन इन विरोधाभासी उपदेशों को सुनकर विचलित हो जाता है और वह यह जानना चाहता है कि इन दोनों में से कौन सा मार्ग उसके लिए अधिक लाभदायक है। इस प्रश्न के प्रसंग की समीक्षा की जानी आवश्यक है।
प्रथम अध्याय में अर्जुन के विषाद का वर्णन किया गया था जिसके परिणामस्वरूप श्रीकृष्ण ने उसे आध्यात्मिक ज्ञान देना आरम्भ किया। दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा के विज्ञान का बोध कराया और यह समझाया कि आत्मा अविनाशी है इसलिए युद्ध में कोई नहीं मरेगा। अतः शोक करना मूर्खता है। तत्पश्चात् वे अर्जुन को स्मरण कराते हैं कि एक योद्धा के रूप में उसका कर्त्तव्य धर्म के पक्ष में युद्ध करना है। चूंकि कर्म मनुष्य को कर्मों के प्रतिफल से बांधते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण उसे अपने कर्म-फल भगवान को अर्पित करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं ताकि उसका कर्म कर्मयोग बन जाए या वह 'कर्म द्वारा भगवान के साथ एकीकृत' हो सके।
तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया कि मनुष्य के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करना अनिवार्य है क्योंकि ये मन को शुद्ध करने में सहायता प्रदान करते हैं। किन्तु उन्होंने यह भी कहा कि जिस मनुष्य ने पहले ही अंत:करण को शुद्ध कर लिया है उसके लिए किसी प्रकार के सामाजिक दायित्वों का पालन आवश्यक नहीं होता (भगवद्गीता-3:13)।
चौथे अध्याय में भगवान ने विभिन्न प्रकार के यज्ञों, वे कार्य जिन्हें भगवान के सुख के लिए सम्पन्न किया जाता है, की व्याख्या की थी। उन्होंने यह निष्कर्ष दिया कि ज्ञान युक्त होकर सम्पन्न किए गए यज्ञ कर्मकाण्डों से श्रेष्ठ होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सभी यज्ञों का सार भगवान से संबंध स्थापित करना है। अन्त में भगवद्गीता-4.41 में उन्होंने कर्म संन्यास के सिद्धान्त का वर्णन किया, जिसमें वैदिक कर्मकाण्डों और सामाजिक दायित्वों को त्याग कर मनुष्य शरीर, मन और आत्मा से भगवान की सेवा में तल्लीन हो जाता है।
इन सभी उपदेशों ने अर्जुन को भ्रमित कर दिया। उसने सोंचा कि कर्म का त्याग और कर्मयोग अर्थात् (श्रद्धाभक्ति पूर्ण कार्य) विरोधाभासी प्रवृत्ति के हैं और इन दोनों का एक साथ पालन करना संभव नहीं है। इसलिए वह श्रीकृष्ण के समक्ष संदेह व्यक्त करता है।
श्रीभगवानुवाच |
संन्यास: कर्मयोगश्च नि:श्रेयसकरावुभौ |
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते || 2||
भगवान ने कहा-कर्म संन्यास और कर्मयोग दोनों मार्ग परम लक्ष्य की ओर ले जाते हैं लेकिन कर्मयोग कर्म संन्यास से श्रेष्ठ है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने कर्म संन्यास और कर्मयोग की तुलना की है। यह अति गंभीर श्लोक है। इसलिए इसे ध्यानपूर्वक समझना चाहिए। कर्मयोगी वह है जो अपने आध्यात्मिक और सामाजिक दोनों कर्त्तव्यों का पालन करता है। सामाजिक दायित्वों का निर्वहन शरीर द्वारा किया जाता है जबकि मन भगवान में अनुरक्त रहता है। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने कहा है-
सोंचु मन यह कर्म मम सब लखत हरि गुरु प्यारे।
(साधन भक्ति तत्त्व)
अर्थात् प्यारे! 'तुम्हारे सभी कर्मों को भगवान और गुरु देखते हैं।' यही कर्मयोग की साधना है जिसके द्वारा हम धीरे-धीरे स्वयं को शारीरिक चेतना से ऊपर उठाकर आत्मिक चेतना में स्थित हो जाते हैं। कर्म संन्यास उन के उत्थान के लिए है जो पहले से ही दैहिक स्तर से परे हो चुके हैं। पूर्णतया भगवान में अनुरक्त होने के कारण कर्म संन्यासी अपने सामाजिक दायित्वों का परित्याग कर देते हैं और पूर्ण रूप से आध्यात्मिक कर्तव्यों का पालन करने में तल्लीन रहते हैं। जब श्रीराम वनवास जाते समय लक्ष्मण को अपने सांसारिक कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए कहते हैं तब उस समय लक्ष्मण ने कर्म संन्यास की अतिसुन्दर मनोभावना को इस प्रकार से व्यक्त किया-
मोरे सबइ एक तुम स्वामी।
दीनबन्धु उर अन्तरयामी।।
(रामचरितमानस)
लक्ष्मण ने राम से कहा, "तुम मेरे स्वामी, पिता, माता, बंधु, भाई, मित्र सब कुछ हो। मैं अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ केवल आपके प्रति ही अपने कर्तव्यों का पालन करूँगा। इसलिए कृपया मुझे मेरे दैहिक कर्त्तव्यों के पालन के संबंध में कुछ न कहो।"
वे जो कर्म संन्यास का अभ्यास करते हैं वे अपने दैहिक कर्तव्यों का निर्वहन करना आवश्यक नहीं समझते। ऐसे कर्म संन्यासी अपना पूरा समय और अपनी ऊर्जा को आध्यात्मिक कार्य-कलापों में समर्पित करते हैं जबकि कर्मयोगी को अपना समय सांसारिक और आध्यात्मिक कर्तव्यों का पालन करने में विभाजित करना पड़ता है। इसलिए कर्म संन्यासी तीव्र गति से भगवान के सम्मुख होता है जबकि कर्मयोगी सामाजिक दायित्वों से भारग्रस्त रहते हैं फिर भी इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने कर्म संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग की प्रशंसा की है और वे अर्जुन को इसी श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण करने की सलाह देते हैं। कर्म संन्यासी यदि अपने कर्मों का त्याग करने के पश्चात् यदि अपना मन भगवान में पूरी तरह से तल्लीन नहीं कर पाते, तब उनकी महती हानि तय है।
भारत में हजारों की संख्या में ऐसे साधु हैं जिन्हें विरक्ति का भ्रम हुआ और इसलिए उन्होंने संसार का त्याग कर दिया किन्तु उनका मन भगवान में अनुरक्त नहीं हो पाया। परिणामस्वरूप वे आध्यात्मिक मार्ग से प्राप्त होने वाले परम आनन्द की अनुभूति नहीं कर सके। यद्यपि वे साधकों जैसा भगवा चोला पहनते हैं किन्तु वास्तव में वे अफीम आदि का सेवन करने जैसे सभी प्रकार के पापमयी दुष्कर्मों में लिप्त हो जाते हैं। अज्ञानी केवल अपनी तंद्रा को संसार से विरक्ति के रूप में देखने की भूल करते हैं।
दसरी ओर कर्मयोगी लौकिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के कर्त्तव्यों का निर्वहन करते हैं। इसलिए यदि उनका मन आध्यात्मिकता से भी गया है तब भी उनके पास कम से कम अपना लौकिक कार्य करने का विकल्प होता है। इसलिए कर्मयोग का मार्ग जन साधारण के लिए सरल मार्ग है जबकि कर्म संन्यास का अनुसरण योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही किया जा सकता है।
ज्ञेय: स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ् क्षति |
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते || 3||
वे कर्मयोगी जो न तो कोई कामना करते हैं और न ही किसी से घृणा करते हैं उन्हें नित्य संन्यासी माना जाना चाहिए। हे महाबाहु अर्जुन! सभी प्रकार के द्वन्द्वों से मुक्त होने के कारण वे माया के बंधनों से सरलता से मुक्ति पा लेते हैं।
कर्मयोगी विरक्ति का अभ्यास करते हुए अपने सांसारिक दायित्वों का निरन्तर निर्वहन करते रहते हैं। इसलिए वे सकारात्मक और नकारात्मक दोनों परिस्थितियों को भगवान की कृपा के रूप में समभाव से स्वीकार करते हैं। भगवान ने इस सृष्टि की संरचना अति विलक्षणता से की है जिसमें हमें अपने आध्यात्मिक उत्थान के लिए सुख और दुःख दोनों का अनुभव करना आवश्यक है। यदि हम नियमित रूप से जीवन निर्वाह करते हुए अपने मार्ग में आने वाली सभी चुनौतियों को सहन कर प्रसन्नतापूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करते रहते हैं तब संसार हमें उत्तरोत्तर आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।
इस दृष्टिकोण को समझने के लिए एक रोचक कथा इस प्रकार से है-एक बार लकड़ी का एक टुकड़ा बढ़ई के पास जाकर कहने लगा-"क्या आप मुझे सुंदर बना सकते हो?" बढ़ई ने कहा-मैं ऐसा करने के लिए तैयार हूँ, क्या तुम भी इसके लिए तैयार हो?" लकड़ी के टुकड़े ने उत्तर दिया "हाँ, मैं भी तैयार हूँ।" बढई अपने औजार निकालकर लकड़ी को थोड़ा छीलने लगा। लकड़ी ने भयभीत होकर कहा-आप क्या कर रहे हो? “कृपया रुको! यह बहुत पीड़ादायक है।" बढ़ई ने कहा-अगर तुम सुन्दर बनना चाहते हो, तब तुम्हें पीड़ा सहन करनी पड़ेगी। लकड़ी के टुकड़े ने कहा "ठीक है। अपना काम करते रहो, किन्तु सहजता से और ध्यानपूर्वक।" कुछ देर बाद लकड़ी ने कहा “आज के लिए बस इतना ही पर्याप्त है, मैं आज और पीड़ा सहन नहीं कर सकती कृपया शेष कार्य कल करना।" बढ़ई अपने काम के प्रति अडिग था और कुछ ही दिनों में लकड़ी एक सुन्दर मूर्ति बन गई और उसे मन्दिर की वेदी में स्थापित कर दिया गया। उसी तरह हमारा हृदय अनन्त जन्मों से सांसारिक पदार्थों में आसक्त रहने के कारण अशुद्ध होता है। यदि हम आंतरिक रूप से पवित्र होना चाहते हैं तब हमें अवश्य ही पीड़ा सहन करनी पड़ेगी और माया के संसार को हमें शुद्ध करने की छूट देनी होगी। इसलिए कर्मयोगी श्रद्धा भक्ति के साथ कर्म करते हैं तथा सुखद और दुःखद परिणामों से विचलित न होकर समता की भावना में लीन रहते हैं और मन को भगवान में अनुरक्त करने का अभ्यास करते रहते हैं।
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता: |
एकमप्यास्थित: सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् || 4||
केवल अज्ञानी ही 'सांख्य' या 'कर्म संन्यास' को कर्मयोग से भिन्न कहते हैं जो वास्तव में ज्ञानी हैं, वे यह कहते हैं कि इन दोनों में से किसी भी मार्ग का अनुसरण करने से वे दोनों का फल प्राप्त कर सकते हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण ने सांख्य शब्द का प्रयोग कर्म संन्यास या ज्ञान पूर्वक कर्म का परित्याग करने के रूप में किया है। वैराग्य के दो प्रकार है-(1) फल्गु वैराग्य। (2) युक्त वैराग्य। फल्गु वैराग्य वह है जिसमें लोग संसार को बोझ के रूप में देखते हैं और अपने उत्तरदायित्वों से छुटकारा पाने की इच्छा से इसका त्याग करते हैं। ऐसा वैराग्य पलायनवादी मनोवृत्ति का परियाचक है और यह स्थायी नहीं होता। ऐसे मनुष्यों का वैराग्य चुनौतियों से भागने की इच्छा से प्रेरित होता है। ऐसे मनुष्यों को जब आध्यात्मिक मार्ग में आने वाली विपत्तियों का सामना करना पड़ता है तब वे अध्यात्मिक मार्ग को त्यागकर लौकिक जीवन में लौटने की इच्छा करते हैं। युक्त वैराग्य में लोग समस्त जगत को भगवान की शक्ति के रूप में देखते हैं। जो कुछ भी उनके स्वामित्व में होता है उसे वे अपना नहीं समझते और अपने लिए उसका उपयोग भी नहीं करना चाहते। इसके स्थान पर भगवान ने उन्हें जो कुछ दिया है उसी के द्वारा वे भगवान की सेवा करना चाहते हैं। युक्त वैराग्य स्थायी होता है और इसका अनुसरण करने वाले कभी विपत्तियों से भयभीत नहीं होते।
कर्मयोगी बाह्य रूप से अपने दैनिक कार्यों को करते हुए युक्त वैराग्य को विकसित करते हैं। वे भगवान को भोक्ता और स्वयं को भगवान का सेवक मानते हैं तथा इसलिए वे समस्त कार्य कलापों को भगवान के सुख के लिए करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार से उनकी आंतरिक अवस्था उन कर्म संन्यासियों के समान हो जाती है जो पूर्ण रूप से दिव्य चेतना में लीन रहते हैं। बाह्य दृष्टि से वे सांसारिक व्यक्ति प्रतीत होते हैं किन्तु आन्तरिक रूप से वे किसी संन्यासी से कम नहीं होते।
पुराणों और इतिहास में कई महान राजाओं के उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने यद्यपि बाह्य दृष्टि से अपनी पूरी कुशलता से शासकीय कर्तव्यों का निर्वहन किया और राजसी ठाट बाट में जीवन व्यतीत किया किन्तु मानसिक दृष्टि से वे लोग पूर्णतया भगवत्च्चेतना में तल्लीन रहे। प्रह्लाद, धुव्र, अम्बरीष, पृथु, विभीषण और युधिष्ठिर आदि सब राजा ऐसे कर्मयोगियों के उदाहरण हैं। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है:
गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति।
विष्णोर्मायामिदं पश्यन् स वै भागवतोत्तमः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.2.48)
"वह जो इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण तो करता है किन्तु न तो उनके लिए ललचाता है और न ही उनसे दूर भागता है, वह इस दिव्य चेतना में स्थित होता है कि संसार में सब कुछ भगवान की शक्ति है और इनका उपयोग उन्हीं की सेवा के लिए करना चाहिए, ऐसा व्यक्ति परम भक्त होता है।" इस प्रकार सच्चे ज्ञानियों की दृष्टि में कर्मयोग और कर्म संन्यास में कोई भेद नहीं होता क्योंकि दोनों में से किसी एक का अनुसरण करने से दोनों का फल प्राप्त होता है।
यत्साङ्ख्यै: प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते |
एकं साङ्ख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति || 5||
परमेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म संन्यास के माध्यम से जो प्राप्त होता है उसे भक्ति युक्त कर्मयोग से भी प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार जो कर्म संन्यास और कर्मयोग को एक समान देखते हैं वही वास्तव में सभी वस्तुओं को यथावत् रूप में देखते हैं।
आध्यात्मिकता के अभ्यास में मनोवृत्ति ही प्रमुख होती है। यदि कोई वृंदावन जैसे तीर्थ स्थान पर रह रहा है किन्तु उसका मन कोलकाता में रसगुल्ला खाने का चिन्तन करता है तब भगवत्क्षेत्र में यही माना जाएगा कि वह कोलकाता में ही है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति कोलकाता की भीड़-भाड़ में रहता है किन्तु अपने मन को वृंदावन की दिव्य भूमि में तल्लीन रखता है तब वह वहाँ होने का लाभ पा सकता है। सभी वैदिक ग्रंथों में उल्लेख है कि हमारे मनोभावों के अनुसार ही हमारी चेतना का स्तर निर्धारित होता है।
मन एव मनुष्याणां कारणंबन्ध मोक्षयोः।
(पंचदशी)
"मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है।" जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज ने इसी सिद्धान्त को इस प्रकार से व्यक्त किया है-
बंधन और मोक्ष का, कारण मनहिं बखान।
याते कौनिउ भक्ति करु, करु मन ते हरिध्यान ।।
(भक्ति शतक-19)
"बंधन और मोक्ष मन की दशा पर निर्भर करते हैं। तुम चाहे जिस भी भक्ति के साधन का चयन करो परन्तु मन को भगवान के स्मरण में लीन रखो।" वे लोग जो ऐसा आध्यात्मिक दृष्टिकोण नहीं रखते, वे कर्म संन्यास और कर्मयोग में अन्तर देखते हैं और कर्म संन्यासी को उसके बाह्य परित्याग के कारण श्रेष्ठ घोषित करते हैं। किन्तु ज्ञानीजन यह देखते हैं कि कर्म संन्यासी और कर्मयोगी दोनों ही अपने मन को भगवान की भक्ति में तल्लीन कर लेते हैं इसलिए वे दोनों उनकी दृष्टि में एक समान होते हैं।
संन्यासस्तु महाबाहो दु:खमाप्तुमयोगत: |
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति || 6||
भक्तियुक्त होकर कर्म किए बिना पूर्णतः कर्मों का परित्याग करना कठिन है। हे महाबलशाली अर्जुन! किन्तु जो संत कर्मयोग में संलग्न रहते हैं, वे शीघ्र ही ब्रह्म को पा लेते हैं।
हिमालय की गुफाओं में रहने वाला योगी यह समझता है कि उसने वैराग्य प्राप्त कर लिया है किन्तु उसके वैराग्य का वास्तविक परीक्षण उसके नगर में लौटने पर होता है। उदाहरणार्थ एक साधु जिसने 12 वर्षों तक गढ़वाल के पहाड़ों में तपस्या की थी, वह हरिद्वार में पवित्र कुम्भ मेला देखने आया। कुम्भ मेले की भीड़-भाड़ में किसी व्यक्ति ने भूल से अचानक अपने जूते साधु के नंगे पैरों पर रख दिए। साधु ने क्रोधित होकर चिल्ला कर कहा-"क्या तुम अंधे हो" क्या तुम्हें दिखाई नहीं देता है कि तुम क्या कर रहे हो?" बाद में वह क्रोध को अपने ऊपर हावी होते देखकर पश्चात्ताप करते हुए लज्जित होकर सोचता है-"एक दिन नगर में रहने से उसकी 12 वर्षों तक पर्वतों पर की गई तपस्या व्यर्थ हो गयी।" संसार वह क्षेत्र है जहाँ वैराग्य का परीक्षण होता है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस संसार में रहते हुए मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए धीरे-धीरे क्रोध, लोभ और कामनाओं पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। यदि इसके स्थान पर कोई पहले ही अपने कर्मों का त्याग कर देता है तो मन को शुद्ध करना अत्यंत कठिन हो जाता है और शुद्ध मन के बिना वास्तविक विरक्ति होना स्वप्न के समान है। अर्जुन एक योद्धा था और यदि वह भ्राणवश अपने कर्तव्यों का निर्वहन न कर संन्यास के लिए वन में चला जाता तब भी उसे अपनी प्रवृत्ति के अनुसार वहाँ कार्य करने के लिए विवश होना पड़ता। वह वहाँ आदिवासी लोगों को एकत्रित कर स्वयं को उनका राजा घोषित कर सकता था। लेकिन इसके विपरीत अब भगवान की सेवार्थ अपनी स्वाभाविक प्रतिभा का उपयोग करना अर्जुन के लिए अधिक लाभदायक होगा। इसलिए भगवान ने उसे उपदेश दिया-"युद्ध लड़ना जारी रखो, लेकिन अपने मनोभाव को बदलो। पहले तुम अपने राज्य को बचाने की प्रत्याशा से इस युद्ध भूमि पर आए थे। अब इसके स्थान पर निःस्वार्थ भाव से केवल अपनी सेवाएँ भगवान को समर्पित करो। इस प्रकार से तुम सहजता से अपने मन को शुद्ध कर पाओगे और मन में सच्चे वैराग्य की अनुभूति करोगे।" कच्चे फल जिन्हें वृक्ष धारण और पोषित करता है, वे उसके साथ दृढ़तापूर्वक चिपटे रहते हैं किन्तु वही फल जब पक जाते हैं तब वे वृक्ष के साथ सम्बन्ध तोड़ देते हैं। समान रूप से भौतिक जगत में कर्मयोगी जो अनुभव प्राप्त करता है उससे उसका ज्ञान परिपक्व होता है। जिस प्रकार गहन निद्रा तभी संभव है जब कोई कठोर परिश्रम करता है उसी प्रकार से गहन साधना भी उन्हें प्राप्त होती है जो कर्मयोग द्वारा अपने मन को शुद्ध कर लेते हैं।
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रिय: |
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते || 7||
जो कर्मयोगी विशुद्ध बुद्धि युक्त हैं, अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में रखते हैं और सभी जीवों में आत्मरूप परमात्मा को देखते हैं, वे सभी प्रकार के कर्म करते हुए कभी कर्मबंधन में नहीं पड़ते।
वैदिक ग्रंथों में आत्मा शब्द का कई अर्थों में प्रयोग किया गया है, जैसे कि भगवान के लिए, आत्मा के लिए, मन के लिए और बुद्धि के लिए। इस श्लोक में इन सभी प्रतीकों के लिए आत्मा शब्द का प्रयोग हुआ है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म योगी योग युक्त होता है अर्थात् अपनी चेतना को भगवान के साथ युक्त करता है। आगे वे कहते हैं कि ऐसी पुण्य आत्माएँ तीन प्रकार की होती है-(1) विशुद्धात्माः विशुद्ध बुद्धि युक्त (2) विजितात्माः जिसने मन पर विजय प्राप्त कर ली है और (3) जितेन्द्रियः जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया है। ऐसे कर्मयोगी विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर सभी जीवों में भगवान को बैठा देखते हैं और बिना आसक्ति के सबके साथ सम्मानजनक व्यवहार करते हैं। चूंकि उनके कार्य स्वयं को सुखी रखने की कामना से प्रेरित नहीं होते अतः उनका ज्ञान उत्तरोत्तर स्पष्ट होता रहता है और उनकी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जो पहले तो भौतिक सुख के लिए लालायित होती थी, वे सब अब नियंत्रण में आ जाती हैं। अब ये सब साधन भगवान की सेवा में तत्पर रहते हैं। सेवा और समर्पण भाव से उन्हें अपने भीतर आंतरिक ज्ञान की अनुभूति होती है। इस प्रकार कर्मयोग स्वभाविक रूप से उत्तरोत्तर ज्ञानोदय की इन अवस्थाओं में पहुँचा देता है और इसलिए यह कर्म संन्यास से भिन्न नहीं होता।
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् |
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् || 8||
प्रलपन्विसृजन्गृह्ण्न्नुन्मिषन्निमिषन्नपि |
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् || 9||
कर्मयोग में दृढ़ निश्चय रखने वाले सदैव देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूंघते, चलते-फिरते, सोते हुए, श्वास लेते हुए, बोलते हुए, त्यागते हुए, ग्रहण करते हुए और आंखें खोलते या बंद करते हुए सदैव यह सोचते हैं- 'मैं कर्ता नहीं हूँ' और दिव्य ज्ञान के आलोक में वे केवल यह देखते हैं कि भौतिक इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में क्रियाशील रहती हैं आत्मा नहीं।
जब हम किसी महत्त्वपूर्ण कार्य को कुशलतापूर्वक सम्पन्न कर लेते हैं तब हमें यह अभिमान हो जाता है कि हमने कोई महान कार्य किया है। स्वयं को किसी कार्य का कर्ता मानने का अभिमान हमें लौकिक चेतना से ऊपर उठने में बाधा उत्पन्न करता है किन्तु भगवच्चेतना में लीन योगी इस बाधा को सरलता से पार कर लेते हैं। बुद्धि के शुद्धिकरण द्वारा वे स्वयं को शरीर से भिन्न देखते हैं और वे शरीर द्वारा किए गए कर्मों का श्रेय स्वयं को नहीं देते। यह शरीर भगवान की माया शक्ति से निर्मित है इसलिए वे अपने सभी कार्यों का श्रेय भगवान को देते हैं क्योंकि ये भगवान की शक्ति से सम्पन्न होते हैं। वे स्वयं को भगवान की इच्छा पर समर्पित कर देते हैं। वे अपने मन और बुद्धि को भगवान की दिव्य इच्छा के अनुसार नियोजित करते हैं। अतः वे यही मानते हैं कि भगवान ही सब कार्यों के कर्ता हैं।
कर्ता बहिरकर्तान्तरलोके विहर राघव।
(योग वाशिष्ठ)
"हे राम, बाह्य दृष्टि से परिश्रम करते रहो लेकिन आंतरिक दृष्टि से स्वयं को अकर्ता के रूप में देखो और भगवान को अपने सभी कार्यों का कर्त्ता मानो।" इस दिव्य चेतना में लीन योगी स्वयं को केवल भगवान के हाथों का खिलौना मानते हैं। श्रीकृष्ण अगले श्लोक में इस दिव्य चेतना में किए जाने वाले कार्यों के परिणाम की व्याख्या करते हैं।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति य: |
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा || 10||
वे जो अपने कर्मफल भगवान को समर्पित कर सभी प्रकार से आसक्ति रहित होकर कर्म करते हैं, वे पापकर्म से उसी प्रकार से अछूते रहते हैं जिस प्रकार से कमल के पत्ते को जल स्पर्श नहीं कर पाता।
हिन्दू और बौद्ध दोनों धर्मों के धार्मिक ग्रंथ कमल के पुष्प की उपमाओं से भरे पड़े हैं। भगवान के दिव्य स्वरूप के विभिन्न अंगों का निरूपण करते समय कमल के पुष्प का नाम आदरपूर्वक लिया जाता है। इसलिए चरण कमल का अर्थ 'कमल के समान चरण', 'कमलेक्षण' का अर्थ कमल के समान नेत्र, 'कर कमल' का अर्थ 'कमल के समान हाथ' इत्यादि। कमल के पुष्प का एक अन्य नाम 'पंकज' है जिसका अर्थ 'कीचड़ में जन्म लेना' है।कमल का फूल सरोवर के तल पर जमे कीचड़ में जन्म लेता है, फिर भी यह अपनी सुन्दरता को बनाए रखते हुए जल से ऊपर आकर सूर्य की ओर खिलता है। इसलिए संस्कृत साहित्य में गंदगी में उत्पन्न होने वाली उस वस्तु के लिए कमल के फूल का उदाहरण दिया जाता है जो विकसित होकर अपने सौन्दर्य और पवित्रता को बनाए रखता है।
इसके अतिरिक्त कमल के बड़े पत्ते जो सरोवरकी सतह पर तैरते रहते हैं, उनका भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में थाली के रूप में प्रयोग किया जाता है क्योंकि इन पर डाला गया तरल पदार्थ सोखता नहीं, बल्कि बह जाता है। कमल के पत्ते की विशेषता यह है कि यद्यपि कमल का पुष्प अपने जन्म, विकास और जीवन निर्वाह के लिए जल निर्भर होता है किन्तु वह स्वयं को जल से भीगने नहीं देता। कमल के पत्रों पर डाला गया जल उसकी सतह पर उगने वाले छोटे रोयों के कारण एक किनारे की ओर से बह जाता है।
इस प्रकार कमल पर्ण की सुन्दर उपमा देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसे यह जल की सतह पर तैरता रहता है किंतु स्वयं को जल से भीगने नहीं देता उसी प्रकार से कर्मयोगी सभी प्रकार के कर्म करते हुए भी पाप से अछूते रहते हैं क्योंकि वे दिव्य चेतना में लीन होकर अपने कर्म करते हैं।
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि |
योगिन: कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये || 11||
योगीजन आसक्ति को त्याग कर अपने शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि द्वारा केवल अपने शुद्धिकरण के उद्देश्य से कर्म करते हैं।
योग जन यह समझते हैं कि सुख की खोज में लौकिक कामनाओं के पीछे भागना मृग-तृष्णा के समान है। इसी सत्य को जानकर वे अपनी निजी कामनाओं का त्याग करते हैं और अपने सभी कर्म भगवान के सुख के लिए करते हैं “भोक्तारं यज्ञ तपसाम्" अर्थात् जो अकेला सभी कर्मों का परम भोक्ता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण ‘समर्पण' को नवीन शैली में व्यक्त कर रहे हैं। वे कहते हैं कि सिद्ध योगी अन्तःकरण की शुद्धि हेतु कर्म करते हैं। तब फिर कर्म भगवान को कैसे समर्पित हो जाते हैं? वास्तव में भगवान हमसे कुछ अपेक्षा नहीं करते। वे परम सत्य हैं और अपने आप में पूर्ण हैं। हम अणु आत्माएँ सर्व शक्तिमान भगवान को ऐसा क्या दे सकती हैं जो भगवान के पास न हो? इसलिए भगवान को कुछ अर्पित करने के लिए यह कहने की परम्परा है-“हे भगवान! मैं तुम्हारी वस्तु तुम्हें लौटा रहा हूँ।" इसी समान मत को व्यक्त करते हुए संत यमुनाचार्य कहते हैं-
मम नाथ यद् अस्ति योऽस्म्यहं सकलं तद्धी तवैव माधव ।
नियतस्वम् इति प्रबुद्धधैरथावा किं नु समर्पयामि ते।।
(श्रीस्त्रोत रत्न-50)
"हे लक्ष्मी के स्वामी विष्णु भगवान, जब मैं अज्ञानी था तब मैं समझता था कि मैं आपको बहुत सा पदार्थ दे सकता हूँ किन्तु अब जब मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया तब मैं यह मानता हूँ कि मेरे स्वामित्व में जो भी है वह सब पहले से ही आप का है। इसलिए मैं आपको क्या अर्पित कर सकता हूँ।" फिर भी एक कर्म जो भगवान के हाथ में न होकर हमारे हाथ में होता है वह हमारे स्वयं के अन्त:करण (मन और बुद्धि) को शुद्ध करना है। जब हम अपने अन्तःकरण को शुद्ध कर लेते है और उसे भगवान की भक्ति में तल्लीन कर लेते हैं तब भगवान अत्यधिक प्रसन्न होते हैं। इसे जानकर योगी जन अपने निहित स्वार्थों को त्यागकर भगवान के सुख के लिए अपने अन्तःकरण की शुद्धि करते हैं। इस प्रकार से योगी जन यह जानते हैं कि वे भगवान को जो सबसे सर्वोत्तम वस्तु अर्पित कर सकते हैं वह है अन्त:करण की शुद्धि और वे उसके लिए कर्म करते हैं। रामायण में इस सिद्धान्त का रोचक वर्णन मिलता है। भगवान राम ने जब सुग्रीव को युद्ध से पूर्व भयभीत होते हुए देखा तो उन्होंने उसे इस प्रकार से सांत्वना दी-
पिशाचान् दानवान् यक्षान् पृथिव्यां चैव राक्षसान् ।
अङ्गुगेण तान्हन्यामिच्छन् हरी गणेश्वरः।।
(वाल्मीकि रामायण)
भगवान राम ने कहा, “यदि मैं, केवल अपने बांये हाथ की अंगुली को थोड़ा सा ही टेढ़ा कर लूँ तो रावण और कुंभकर्ण की बात ही क्या संसार के समस्त राक्षस धराशायी हो जाएंगे।" सुग्रीव उत्तर देते हुए कहता है, “यदि ऐसा है, फिर रावण का वध करने के लिए आपको इतनी बड़ी सेना एकत्रित करने की आवश्यकता क्या थी।" भगवान ने उत्तर देते हुए कहा, "यह सब तुम्हारी शुद्धि के लिए, तुम्हें सेवा करने का अवसर प्रदान करने हेतु है। इसलिए यह मत समझो कि मुझे इन राक्षसों का दमन करने के लिए तुम्हारी सहायता की आवश्यकता है।" हमारे द्वारा की गई अर्जित मन की शुद्धि ही हमारी स्थायी सम्पत्ति है और यही हमारे साथ अगले जन्म में जाती है शेष सब कुछ इसी संसार में छूट जाता है। इसलिए निष्कर्ष यह है कि हमारे जीवन की सफलता और असफलता हमारे द्वारा अन्त:करण की शुद्धि के लिए किए गए प्रयासों द्वारा निर्धारित होती है। इसी कारण सिद्ध योगी प्रतिकूल परिस्थितियों का स्वागत करते हैं क्योंकि वे इन्हें अन्त:करण की शुद्धि के अवसर के रूप में देखते हैं। संत कबीर ने कहा है:
निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छबाय।
नित साबुन पानी बिना निर्मल करे सुभाय ।।
"यदि तुम अपने मन को शीघ्र निर्मल करना चाहते हो तो किसी निन्दक की संगति में रहो जब तुम उसके निंदनीय शब्दों को सहन करोगे तब तुम्हारा मन बिना जल और साबुन के निर्मल हो जाएगा।" इस प्रकार जब कर्म करने का मुख्य उद्देश्य हृदय को शुद्ध करना होता है तब मनुष्य प्रतिकूल परिस्थितियों को भगवान द्वारा प्रदत्त और आत्म उत्थान का अवसर समझकर इनका स्वागत करता है तथा सफलता और असफलता दोनों परिस्थितियों में समभाव रहता है। यदि हम भगवान के सुख के लिए कार्य करते हैं तब हमारा हृदय शुद्ध हो जाता है और जब हृदय शुद्ध हो जाता है तब स्वाभाविक रूप से हम अपने समस्त कर्मफलों को भगवान को समर्पित करने लगते हैं।
युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् |
अयुक्त: कामकारेण फले सक्तो निबध्यते || 12||
कर्मयोगी अपने समस्त कमर्फलों को भगवान को अर्पित कर परम शांति प्राप्त कर लेते हैं, जबकि वे जो कामनायुक्त होकर निजी स्वार्थों से प्रेरित होकर कर्म करते हैं, वे बंधनों में पड़ जाते हैं क्योंकि वे कमर्फलों में आसक्त होकर कर्म करते हैं।
यह कैसे मान लिया जाए कि एक जैसा कर्म करने से कुछ लोग तो माया के बंधन में पड़ जाते हैं और कुछ माया के बंधनों से मुक्त रहते हैं? श्रीकृष्ण इसका उत्तर इस श्लोक में देते हैं। वे मनुष्य जो भौतिक पदार्थो के प्रति अनासक्त हैं वे कभी कर्म बंधनों में नहीं बंधते किन्तु जो निजी लाभ और कामना युक्त होकर भौतिक सुखों का भोग करना चाहते हैं वे कर्मफलों के बंधनों में पड़ जाते हैं। युक्त शब्द का अर्थ 'भगवच्चेतना से जुड़ना' है। इसका अर्थ 'हृदय के शुद्धिकरण के अतिरिक्त किसी फल की इच्छा न करना' भी होता है। युक्त पुरुष वे हैं जो अपने कर्मफलों का त्याग करते हैं और इसके स्थान पर आत्मशुद्धि के उद्देश्य से कार्य करते हैं। इसलिए वे शीघ्र ही दिव्य चेतना को प्राप्त कर लेते हैं।
दूसरी ओर अयुक्तः का अर्थ 'भगवच्चेतना से युक्त न होना' है। इसे इस प्रकार से भी अभिव्यक्त कर सकते हैं कि-'लौकिक या सांसारिक सुखों की कामना आत्मा के लिए हानिकारक है।' ऐसे लोग अपने कर्मों का फल की तिब्र आकांक्षा करते हैं। इस भाव से सम्पन्न किए गए कर्म इन 'अयुक्त' पुरुषों को 'संसार' या जन्म-मरण के चक्र में डाल देते हैं।
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी |
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् || 13||
जो देहधारी जीव आत्मनियंत्रित एवं निरासक्त होते हैं, नौ द्वार वाले भौतिक शरीर में भी वे सुखपूर्वक रहते हैं क्योंकि वे स्वयं को कर्त्ता या किसी कार्य का कारण मानने के विचार से मुक्त होते हैं।
श्रीकृष्ण अब शरीर की तुलना नौ द्वारों वाले नगर से कर रहे हैं। आत्मा नगर के राजा के समान है जिसका शासन अहंकार, बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और प्राणशक्ति द्वारा निमित्त मंत्रालय द्वारा किया जाता है। इनका शरीर पर शासन तब तक चलता है जब तक कि मृत्यु द्वारा इनका नश्वर शरीर छिन नहीं जाता। किन्तु इनका शरीर पर शासन रहते हुए भी सिद्ध योगी स्वयं को न तो शरीर और न ही शरीर के स्वामी के रूप में देखते हैं अपितु वे शरीर और इसमें होने वाली सभी क्रियाओं को भगवान से संबंधित मानते हैं। मन से सभी कर्मों का परित्याग कर वे अपने शरीर में सुखपूर्वक रहते हैं। इसे (साक्षी भाव) या ‘अपने चारों ओर घटित हो रही सभी क्रियाओं का अनासक्त दृष्टा' होने की मनोवृत्ति भी कहा जा सकता है। इस श्लोक की उपमा श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी दी गयी है-
नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः।
वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-3:18)
"यह शरीर नव द्वारों-दो कान, एक मुख, दो नासिका छिद्र, दो नेत्र, गुदा और लिंग से निर्मित है। भौतिक चेतना से युक्त होकर शरीर में रहने वाली आत्मा स्वयं की पहचान नव द्वारों के नगर के साथ करती है। इस शरीर में परमात्मा भी निवास करते हैं जो संसार के सभी प्राणियों के नियन्ता हैं। जब आत्मा-परमात्मा के साथ अपना संबंध जोड़ती है तब वह शरीर में रहते हुए भी उससे अछूती रहती है।"
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह बोध कराया कि देहधारी जीवात्मा न तो कर्त्ता है और न ही किसी कार्य का कारण। अब यह प्रश्न सामने आता है कि क्या भगवान ही संसार में सभी कर्मों के वास्तविक कारण हैं? इसका उत्तर अगले प्रश्न में दिया गया है।
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु: |
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते || 14||
न तो कर्त्तापन का बोध और न ही कर्मों का सृजन भगवान द्वारा होता है तथा न ही वे कर्मों के फल का सृजन करते हैं। यह सब प्रकृति के गुणों से सृजित होते हैं।
इस श्लोक में 'प्रभु' शब्द का प्रयोग भगवान के लिए किया गया है, जो यह इंगित करता है कि वे सारे संसार के स्वामी हैं। वे सर्वशक्तिमान हैं और समस्त ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करते हैं। यद्यपि वे ब्रह्माण्ड की गतिविधियों का संचालन करते हैं तथापि वे अकर्ता रहते हैं। वे हमारे कर्मों के न तो संचालक हैं और न ही अच्छे-बुरे में प्रेरक अर्थात् हम अच्छे या बुरे जो भी कार्य करेंगे उसका निर्णय भगवान द्वारा नहीं होता। यदि भगवान हमारे कर्मों के संचालक होते तब उन्हें शुभ और अशुभ कर्मों के निर्देश के लिए शास्त्र रचना करने की आवश्यकता न पड़ती। तब तो सभी शास्त्रों का अंत इन तीन छोटे वाक्यों में हो गया होता हे आत्मा! "मैं तुम्हारे सभी कार्यों का संचालक हूँ, इसलिए तुम्हें यह समझने की आवश्यकता नहीं है कि शुभ और अशुभ कर्म क्या है। मैं तुमसे अपनी इच्छानुसार कर्म कराऊँगा।"
उसी प्रकार भगवान हमारे कर्त्तापन होने के बोध के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। यदि भगवान हमारे द्वारा किए गए कार्यों का कर्तव्य करने लगते तब फिर हम उन्हें अपने द्वारा किए गए पाप कर्मों का दोषी ठहराने लगते। वास्तव में आत्मा स्वयं ही अज्ञान के कारण ऐसा अभिमान कर लेती है। यदि आत्मा इस अज्ञान को भी दूर करने का निश्चय कर ले तब भगवान अपनी कृपा से इस अज्ञान को दूर करने में उसकी सहायता करते हैं। अतः कर्त्तापन के बोध को त्यागने का उत्तरदायित्व जीवात्मा का होता है। शरीर प्रकृति के तीन गुणों से निर्मित है और सभी कर्म इन्हीं गुणों के अंतर्गत आते हैं। किन्तु अज्ञानता के कारण आत्मा स्वयं को शरीर मानकर कर्मों के कर्त्तापन के भ्रम में उलझ जाती है जो कि वास्तव में प्रकृति के तीन गुणों द्वारा सम्पन्न होते हैं।
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभु: |
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तव: || 15||
सर्वव्यापी परमात्मा किसी के पापमय कर्मों या पुण्य कर्मों में स्वयं को लिप्त नहीं करते। किन्तु जीवात्माएँ मोहग्रस्त रहती हैं क्योंकि उनका आत्मिक ज्ञान अज्ञान से आच्छादित रहता है।
भगवान किसी के पुण्य या पापकर्मों के लिए उत्तरदायी नहीं होते। इस संबंध में भगवान का कार्य केवल तीन प्रकार का है-(1) वे जीवात्मा को कर्म करने की शक्ति प्रदान करते हैं, (2) जैसे ही हम उनसे शक्ति प्राप्त कर कर्म करने लगते हैं तब वे हमारे कर्मों का लेखा जोखा रखते हैं, (3) वे हमें हमारे कर्मों का फल देते हैं। जीवात्मा स्वेच्छानुसार अच्छे या बुरे कर्म करने के लिए स्वतंत्र होती है। भगवान क्रिकेट मैच के निर्णायक (अम्पायर) की भांति कार्य करते हैं। वे केवल परिणाम घोषित करते हैं-'चार रन' 'छः रन' या खिलाड़ी (आउट) खेल से बाहर। निर्णायक के निर्णय के विरुद्ध कुछ नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके निर्णय खिलाड़ी के खेल कौशल के अनुसार लिए जाते हैं। अब कोई यह कह सकता है कि भगवान जीवात्मा को इच्छानुसार कर्म करने की स्वतंत्रता क्यों देते हैं। इसका कारण यह है कि आत्मा परमात्मा का अणु अंश है और वह कुछ मात्रा में भगवान के गुणों से सम्पन्न होती है और भगवान 'अभिज्ञ-स्वराट्' परम स्वतंत्र हैं। इसलिए जीवात्मा अपनी इच्छानुरूप इन्द्रिय, मन और बुद्धि का प्रयोग करने में अल्प रूप से स्वतंत्र होती है। इसके अतिरिक्त स्वतंत्र इच्छा के बिना प्रेम नहीं हो सकता। मशीन प्रेम नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास चयन करने की स्वतंत्रता नहीं होती। केवल प्राणियों में ही प्रेम करने के विकल्प को चुनने की योग्यता होती है क्योंकि भगवान ने हमारी रचना उनसे प्रेम करने के लिए की है इसलिए उन्होंने हमें स्वतंत्र इच्छा प्रदान की है। अतः हमें अपनी इच्छानुसार किए गए कार्यो के शुभ और अशुभ परिणामों के लिए भगवान को दोषी नहीं ठहराना चाहिए।
कुछ जीवात्माएँ जो यह नहीं जानती हैं कि वे अपने कर्मों का चयन करने के लिए स्वयं स्वतंत्र हैं वे अपनी सभी भूलों के लिए भगवान को उत्तरदायी ठहराती हैं। अन्य जीवात्माएँ यह अनुभव करती हैं कि वे कर्म करने की स्वतंत्र इच्छा से युक्त हैं लेकिन फिर भी वे शरीर होने की धारणा के कारण कर्त्तापन के अभिमान को प्रश्रय देती हैं। यह पुनः अज्ञानता का सूचक है।
श्रीकृष्ण अगले श्लोक में यह व्याख्या करेंगे कि इस अज्ञानता को कैसे मिटाया जा सकता है।
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मन: |
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् || 16||
किन्तु जिनकी आत्मा का अज्ञान दिव्यज्ञान से विनष्ट हो जाता है उस ज्ञान से परमतत्त्व का प्रकाश उसी प्रकार से प्रकाशित हो जाता है जैसे दिन में सूर्य के प्रकाश से सभी वस्तुएँ प्रकाशित हो जाती हैं।
रात्रि के अंधकार को मिटाने की सूर्य की शक्ति अतुल्य है। रामचरितमानस में वर्णन है-
राकापति षोडस उनहिं तारागन समुदाइ।
सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ।।
"पूर्ण चंद्रमा और सभी तारों के प्रकाश से भी रात्रि का अंत नहीं होता किन्तु जिस क्षण सूर्य उदित होता है तब, रात्रि शीघ्र ही प्रस्थान की तैयारी करती है।" सूर्य के प्रकाश के सामने अंधकार ठहर नहीं सकता। इसी प्रकार भगवद्ज्ञान के प्रकाश के प्रभाव से अज्ञान रूपी अंधकार दूर हो जाता है। अंधकार ही भ्रम की उत्पत्ति का कारण होता है।
सिनेमा हॉल के अंधकार में स्क्रीन पर पड़ने वाला प्रकाश भ्रम को वास्तविकता में परिवर्तित कर देता है और लोग उसे देखने में लीन हो जाते हैं। फिर जब सिनेमा हॉल की लाइट जलती है तब लोगों का भ्रम दूर हो जाता है। जब यह भ्रम टूट जाता है, तब उन्हें आभास होता है कि वे तो चलचित्र (मूवी) देख रहे थे। ठीक इसी प्रकार अज्ञान के अंधकार के कारण हम स्वयं को शरीर मान लेते हैं और स्वयं को सभी कार्यों का कर्ता और भोक्ता मान लेते हैं। जब भगवद्ज्ञान का प्रकाश चमकने लगता है तब भ्रम उल्टे पांव भाग जाता है और आत्मा जागृत होकर शरीर रूपी नगर के नवद्वारों में रहते हुए भी अपनी वास्तविकता को पहचान लेती है। आत्मा इससे पहले अंधकार में पड़ी थी क्योंकि भगवान की माया शक्ति, अविद्या ने उसे अंधकार से आच्छादित कर रखा था। जब भगवान की दिव्य अध्यात्मिक शक्ति, ज्ञान के आलोक से उसे प्रकाशित कर देती है तब उसका भ्रम दूर हो जाता है।
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा: |
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा: || 17||
वे जिनकी बुद्धि भगवान में स्थिर हो जाती है और जो भगवान में सच्ची श्रद्धा रखकर उन्हें परम लक्ष्य मानकर उनमें पूर्णतया तल्लीन हो जाते हैं, वे मनुष्य शीघ्र ऐसी अवस्था में पहुँच जाते हैं जहाँ से फिर कभी वापस नहीं आना होता और उनके सभी पाप ज्ञान के प्रकाश से मिट जाते हैं।
अज्ञानता के कारण जीव 'संसार' या 'जीवन और मरण के सतत चक्र' के कष्ट में पड़ता है किंतु ज्ञान में माया के बंधन से मुक्त करने की शक्ति होती है। ऐसा ज्ञान भगवद्भक्ति से युक्त होता है। इस श्लोक में पूर्ण भगवद्च्चेतना का अर्थ प्रकट करने के लिए निम्नांकित सुस्पष्ट शब्दों का प्रयोग किया गया है।
तबुद्धयः का अर्थ बुद्धि को भगवान की ओर ले जाना है।
तदात्मानः का अर्थ अन्तःकरण (मन और बुद्धि) की पूर्णतया भगवान में तल्लीन करना है।
तन्निष्ठाः से तात्पर्य बुद्धि का भगवान में दृढ़ निश्चय होना है तत्परायणाः का अर्थ भगवान को परम लक्ष्य और आश्रय बनाने का प्रयास करना है।
इस प्रकार से वास्तविक ज्ञान वह है जो भगवान के प्रेम की ओर ले जाए। ऐसे प्रेम में तल्लीन भक्त उन्हें सर्वत्र और सबमें देखते हैं।
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि |
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन: || 18||
सच्चे ज्ञानी महापुरुष एक ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल को अपने दिव्य ज्ञान के चक्षुओं द्वारा समदृष्टि से देखते हैं।
जब हम ज्ञान के परिप्रेक्ष्य में वस्तुओं को देखते हैं तब इसका तात्पर्य 'प्रज्ञाचक्षु' अर्थात् 'ज्ञान चक्षु के साथ' देखने से है। श्रीकृष्ण ने समान अर्थ वाले शब्द 'विद्या सम्पन्ने' का प्रयोग किया है और साथ ही उन्होंने 'विनयसम्पन्ने' शब्द जोड़ा है जिसका अर्थ विनम्रता है। दिव्य ज्ञान का लक्षण यह है कि यह दीनता से युक्त होता है जबकि थोथा पुस्तकीय ज्ञान विद्वता के अभिमान से युक्त होता है।
श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह प्रकट करते हैं कि दिव्य ज्ञान किस प्रकार से व्यक्ति को भिन्न दृष्टि प्रदान करता है। इस ज्ञान से युक्त भक्त सभी प्राणियों को आत्मा के रूप में देखते हैं जो दिव्य है और भगवान का अंश है। श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए उदाहरण विविधता से युक्त हैं। वैदिक ब्राह्मण जो धार्मिक अनुष्ठान करते हैं वे सम्मानित कहलाते हैं जबकि कुत्ते के मांस का सेवन करने वाले चाण्डाल को प्रायः निम्न जाति से संबंधित होने के कारण घृणित समझा जाता है। गाय मनुष्यों के उपयोग के लिए दूध देने में समर्थ होती है किन्तु कुत्ता नहीं। हाथी का प्रयोग उत्सवों की शोभायात्रा के लिए किया जाता है जबकि गाय और कुत्ते का नहीं। शारीरिक दृष्टिकोण से प्राणियों इन में अनेक प्रकार की विषमताएँ पायी जाती हैं जबकि आध्यात्मिक ज्ञान से युक्त प्रबुद्ध लोग इन सबको शाश्वत आत्मा मानते हैं और इसलिए इन सबको एक दृष्टि से देखते हैं। वेद इस मत का समर्थन नहीं करते कि ब्राह्मण उच्च जाति है और शूद्र (श्रमिक वर्ग) निम्न जाति है। दिव्य ज्ञान के दृष्टिकोण से यद्यपि ब्राह्मण धार्मिक कर्मकाण्ड करते हैं, क्षत्रिय समाज शासन संचालन का कार्य करते हैं और वैश्य व्यावसायिक गतिविधियों तथा शूद्र श्रम के कार्य में जुटे रहते हैं तथापि सभी अविनाशी आत्माएँ हैं क्योंकि सभी भगवान का अंश हैं और इसलिए सभी समान हैं।
इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन: |
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिता: || 19||
वे जिनका मन समदृष्टि में स्थित हो जाता है, वे इसी जीवन में जन्म और मरण के चक्र से मुक्ति पा लेते हैं। वे भगवान के समान गुणों से संपन्न हो जाते हैं और परमसत्य में स्थित हो जाते हैं।
श्रीकृष्ण ने यहाँ 'सम' शब्द का प्रयोग किया है जिसका तात्पर्य पिछले श्लोक में किए गए वर्णन के अनुसार किसी मनुष्य द्वारा सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखना है। इसके अतिरिक्त समदृष्टि का अर्थ पसंद और नापसंद, सुख और दुःख तथा हर्ष और शोक से ऊपर उठकर देखने से भी है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो समदृष्टि रखते हैं वे 'संसार' अर्थात् जन्म और मृत्यु के अनवरत चक्र से परे हो जाते हैं।
जब तक हम स्वयं को शरीर समझते हैं तब तक हम समदर्शी होने की योग्यता नहीं पा सकते क्योंकि हम शरीर के सुख और दुःख के लिए निरन्तर कामनाओं और विमुखता की अनुभूति करेंगे। संत महापुरुष शारीरिक चेतना से उपर उठकर सांसारिक मोह को त्यागकर अपना मन भगवान में तत्लीन कर लेते हैं। रामचरितमानस में वर्णन है-
सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि।
जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।।
"जिस प्रकार अज्ञानी मनुष्य अपने को शरीर मानकर उसकी सेवा करता है, वैसे ही लक्ष्मण ने भगवान राम और सीता की सेवा की।" जब किसी का मन दिव्यचेतना में स्थित हो जाता है तब वह भौतिक सुखों की आसक्ति और दुःखों की अनुभूति से परे हो जाता है और फिर वह समदृष्टा की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। यह समदृष्टि भौतिक कामनाओं का त्याग करने से प्राप्त होती है और मनुष्य को भगवान के समान आचरण वाला बना देती है। महाभारत में यह वर्णन है-“यो न कामयते किञ्चत् ब्रह्म भूयाय कल्पते" अर्थात् "जो मनुष्य अपनी कामनाओं का त्याग कर देता है वह भगवान के समान हो जाता है।" ।
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् |
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थित: || 20||
परमात्मा में स्थित होकर, दिव्य ज्ञान में दृढ़ विश्वास धारण कर और मोह रहित होकर वे सुखद पदार्थ पाकर न तो हर्षित होते हैं और न ही अप्रिय स्थिति में दुःखी होते हैं।
इस श्लोक का यह अंश 'न तो सुख में प्रसन्न होना और न ही दुःख में शोक करना' बौद्ध धर्म की साधना पद्धति विपस्सना का सर्वोत्तम ध्येय है। अंततोगत्वा समदृष्टि की ओर अग्रसर करने वाली इस शुद्धता अभ्यास की अवस्था प्राप्त करने के लिए कठोर प्रशिक्षण करना आवश्यक है। किन्तु जब हम भगवान को अपनी सभी इच्छाएँ समर्पित कर देते हैं तब यही समान अवस्था स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाती है। श्लोक 5.17 के अनुसार यदि हम अपनी इच्छाओं को भगवान की इच्छा से जोड देते हैं तब सुख और दुःख दोनों को उसकी कृपा मानकर सहर्ष स्वीकार किया जा सकता है। इस सिद्धांत से संबंधित एक सुन्दर कथा इस प्रकार है-एक बार एक जंगली घोड़ा किसी किसान के खेत में आ गया। लोगों ने उस किसान को उसके भाग्य के लिए बधाई दी। किसान ने कहा- “सौभाग्य और दुर्भाग्य के बारे में कौन जानता है। यह सब भगवान की इच्छा है।" कुछ समय पश्चात् वह घोड़ा वापिस जंगल में चला गया। उसके पड़ोसी इसे दुर्भाग्य बताते हुए उसे सांत्वना देने लगे। बुद्धिमान किसान ने उत्तर देते हुए कहा-“दुःख और सुख केवल भगवान की इच्छा के अनुसार मिलता है।"कुछ दिन व्यतीत होने पर वह घोड़ा 20 अन्य जंगली घोड़ों के साथ वापस आ गया। लोगों ने किसान को फिर उसके सौभाग्य के लिए बधाई दी। किसान ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा-“सौभाग्य और दुर्भाग्य क्या है? यह सब भगवान की इच्छा पर निर्भर है।" कुछ दिनों बाद घोड़े पर सवारी करते हुए किसान के पुत्र की टांग टूट गयी। लोगों ने इस पर अपना शोक व्यक्त किया लेकिन किसान ने फिर भी यह उत्तर दिया-"दुःख और सुख केवल भगवान की इच्छा है।" इसके पश्चात् एक दिन राजा के सैनिक शीघ्र होने वाले युद्ध के लिए नवयुवकों को सेना में भर्ती करने के लिए गांव में आते हैं। किसान के पड़ोस में रहने वाले सभी युवकों को सेना में भर्ती कर लिया जाता है किन्तु किसान के पुत्र को उसकी टूटी टांग के कारण छोड़ दिया जाता है।
दिव्यज्ञान से हमें यह बोध होता है कि हमारा निजी हित केवल भगवान के सुख में निहित है। इसलिए हम अपनी सभी कामनाएँ भगवान को समर्पित कर देते हैं। जब हमारी निजी कामनाएँ भगवान की इच्छा में जुड़ जाती हैं तब किसी मनुष्य में भगवान की कृपा से दुःख और सुख दोनों को एक समान स्वीकार करने की दृष्टि विकसित होती है। समता में स्थित मनुष्य के यही लक्षण हैं।
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् |
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते || 21||
जो बाह्य इन्द्रिय सुखों में आसक्त नहीं होते वे परम आनन्द की अनुभूति करते हैं। भगवान के साथ एकनिष्ठ होने के कारण वे असीम सुख भोगते हैं।
वैदिक धर्म ग्रंथ बार-बार वर्णन करते हैं कि भगवान अनन्त आनन्द के महासागर हैं।
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ।
(तैत्तिरीयोपनिषद्-3.6)
"भगवान को आनन्द मानो"
केवलानुभवानन्दस्वरुपः परमेश्वरः।
(श्रीमद्भागवतम्-7.6.23)
"भगवान का स्वरूप वास्तविक आनंद ही है।"
आनन्द मात्र कर पाद मुखोदरादि।
(पद्म पुराण)
"भगवान के हाथ, पैर, मुख और उदर आदि आनन्द स्वरूप हैं।"
जो आनन्द सिंधु सुखरासी।
(रामचरितमानस)
भगवान आनन्द और सुख के महासागर हैं।
शास्त्रों से लिए गए ये सब मंत्र और श्लोक इस पर बल देते हैं कि दिव्य आनन्द भगवान की प्रकृति है। वे योगी जो अपनी इन्द्रियों, मन और बुद्धि को भगवान में तल्लीन कर देते हैं वे अपने भीतर स्थित असीम आनन्द की अनुभूति करते हैं।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते |
आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध: || 22||
इन्द्रिय विषयों के सम्पर्क से उत्पन्न होने वाले सुख यद्यपि सांसारिक लोगों को आनन्द प्रदान करने वाले प्रतीत होते हैं किन्तु वे वास्तव में दुःखों के कारण हैं। हे कुन्तीपुत्र! ऐसे सुखों का आदि और अंत है इसलिए ज्ञानी पुरुष इनमें आनन्द नहीं लेते।
इन्द्रियों का विषयों से संपर्क होने पर सुख की अनुभूति होती है। मन जो छठी इन्द्रिय है वह सम्मान, प्रशंसा, और सफलता आदि में सुख का अनुभव करता है। शरीर और मन के इन सभी सुखों के भोग को लौकिक सुख के रूप में जाना जाता है। ऐसे सांसारिक सुख निम्नांकित कारणों से आत्मा को संतुष्ट नहीं कर सकते।
सांसारिक सुख सीमित है इसलिए इनमें स्वाभाविक रूप से अल्पता की प्रतीति बनी रहती है। कोई व्यक्ति लखपति होने में प्रसन्न रहता है लेकिन वही लखपति जब करोड़पति को देखता है तब वह असंतुष्ट हो जाता है और सोचता है-"यदि उसके पास एक करोड़ रूपये होते तब वह और भी सुखी होता।" इसके विपरीत भगवान का सुख असीम है और उससे पूर्ण संतुष्टि प्राप्त होती है।
सांसारिक सुख अस्थायी होते हैं क्योंकि एक बार जब यह समाप्त हो जाते हैं तब पुनः दुःख की अनुभूति करवाते हैं। उदाहरणार्थ मदिरा पान करने वाला व्यक्ति मदिरा का सेवन कर आनन्द प्राप्त करता है किन्तु प्रातःकाल में नशे की खुमारी उतर कर सिरदर्द के रूप में फूटती है। किन्तु भगवान का सुख शाश्वत है और एक बार प्राप्त होने पर सदा के लिए रहता है।
सांसारिक सुख जड़ है और इसी कारण उनका निरन्तर ह्रास होता रहता है। जब कोई किसी फिल्म अकादमी द्वारा पुरस्कृत मूवी को देखते हैं तब वे अत्यंत आनन्द प्राप्त करते हैं किन्तु जब वे अपने मित्र के साथ उस मूवी को पुनः देखते हैं तब उन्हें उससे मिलने वाले आनन्द की मात्रा कम हो जाती है और फिर यदि कोई दूसरा मित्र उनसे उस मूवी को पुनः एक बार देखने का आग्रह करता है तब वे खिन्नतापूर्वक उत्तर देते हैं कि 'उन्हें मूवी देखने के स्थान पर कोई दंड दे दिया जाये किन्तु मूवी को पुनः देखने के लिए मत कहो' भौतिक पदार्थों से प्राप्त होने वाले सुखों का जैसे-जैसे उपभोग किया जाता है वैसे-वैसे उनमें निरन्तर ह्रास होता रहता है।
अर्थशास्त्र में इसे 'प्रतिफल ह्रास नियम' के रूप में परिभाषित किया गया है। जैसे-जैसे हम किसी वस्तु का निरन्तर उपयोग करते हैं वैसे वैसे उससे मिलने वाला सुख घटता रहता है। किन्तु भगवान का सुख पूर्ण संतुष्टि प्रदान करता है। यह सत्-चित्-आनन्द अर्थात् शाश्वत, चिरनूतन और दिव्य है। इस प्रकार यदि कोई भगवान का दिव्य नाम पूरा दिन जपता रहता है तब इससे उसे आध्यात्मिक संतुष्टि और सदा के लिए आनन्द की प्राप्ति होती है।
कोई भी स्वस्थ व्यक्ति स्वादिष्ट मिष्ठान का सेवन करने की इच्छा का त्याग कर मिट्टी खाने में आनन्द प्राप्त नहीं कर सकता है। समान रूप से जब कोई परम आनन्द की अनुभूति करना आरम्भ कर देता है तब मन भौतिक वस्तुओं से प्राप्त होने वाले आनंद को भुला देता है। वे जो उचित और अनुचित के विवेक से युक्त हो जाते हैं वे उपर्युक्त लौकिक सुखों की तीनों कमियों को समझ जाते हैं और अपनी इन्द्रियों को उस ओर आकर्षित होने से रोकते हैं।
श्रीकृष्ण अगले श्लोक में इस पर प्रकाश डालेंगे-
शक्नोतीहैव य: सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् |
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त: स सुखी नर: || 23||
वे मनुष्य ही योगी हैं जो शरीर को त्यागने से पूर्व काम और क्रोध के वेग को रोकने में समर्थ होते हैं, केवल वही संसार मे सुखी रहते हैं।
मानव शरीर में ही आत्मा को भगवत्प्राप्ति करने का सुनहरा अवसर प्राप्त होता है। इस शरीर में हम विवेक शक्ति से युक्त होते हैं जबकि पशु अपनी प्रवृत्ति के अनुसार जीवन निर्वाह करते हैं।
श्रीकृष्ण बलपूर्वक कहते हैं कि कामनाओं और क्रोध पर लगाम लगाने के लिए हमें अपनी विवेक शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। 'काम' शब्द का एक अर्थ काम वासना है लेकिन इस श्लोक में काम शब्द का प्रयोग शरीर और मन की तृप्ति के लिए उपायुक्त सभी प्रकार के भौतिक सुखों के लिए किया गया है। जब मन इच्छित पदार्थों को प्राप्त नहीं कर पाता तब वह अपनी व्यथा क्रोध के रूप में प्रकट करता है। काम और क्रोध नदी की तेज धारा की भांति शक्तिशाली होते हैं। पशु भी इन कामनाओं के अधीन होते हैं किन्तु वे मनुष्य की भांति विवेक के गुण से सम्पन्न न होने के कारण इन्हें रोक नहीं सकते। मानव जाति ज्ञान शक्ति से सम्पन्न है। 'सोदुम् ' शब्द का अर्थ 'सहन करना' है। इस श्लोक में हमें कामनाओं और क्रोध के वेग को सहन करने की शिक्षा दी गयी है। कुछ समय तक कोई लज्जावश अपने मनोवेग को रोक सकता है। जैसे कि कोई व्यक्ति हवाई अड्डे पर बैठा हुआ है। कोई सुन्दर महिला उसके बगल में आकर बैठ जाती है। उसके मन में उसके ऊपर अपनी बाजू रख कर आनन्द पाने की इच्छा उठती है किन्तु उसकी बुद्धि उसे ऐसा करने से रोकती है, "यह अनुचित व्यवहार है और महिला मुझे थप्पड़ भी मार सकती है।" अपमान से बचने के लिए वह स्वयं को रोकता है। किन्तु यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को लज्जा, भय और संदेह के कारण नहीं अपितु विवेक द्वारा मन के वेग को रोकने के लिए कह रहे हैं। मन पर अंकुश लगाने के लिए बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए। जैसे ही मन में भौतिक सुखों को प्राप्त करने का विचार उत्पन्न हो, उसी समय हमें बुद्धि को यह समझाना चाहिए कि ये सब दुःख के साधन हैं। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है-
नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते विड्भुजा ये।
तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्धयेद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-5:5:1)
"इस मनुष्य योनि में इन्द्रिय सुख प्राप्त करने के लिए कठोर परिश्रम करना व्यर्थ है क्योंकि ऐसे सुख तो शूकर जैसे जीव जंतुओं को भी प्राप्त हैं, जो विष्ठा का सेवन करते हैं। इसकी अपेक्षा हमें तप करना चाहिए, जिससे हमारा अंत:करण पवित्र हो और हम भगवान के असीम आनन्द में मग्न हो सकें।" विवेक शक्ति के प्रयोग का अवसर केवल मानव शरीर को प्राप्त है। वह इसका प्रयोग कर इसी जीवन में कामनाओं और क्रोध पर अंकुश रखने के योग्य हो जाता है। वह इसी जीवन में योगी बन जाता है। ऐसा सिद्ध पुरुष परम सुख का आस्वादन कर सदा उसी में लीन रहता है।
योऽन्त:सुखोऽन्तरारामस्तथान्तज्र्योतिरेव य: ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ।। 24।।
जो अन्तर्मुखी होकर असीम आत्मिक सुख का अनुभव करते हैं वे और आत्मिक प्रकाश से प्रकाशित रहते हैं, ऐसे योगी भगवान में एकीकृत हो जाते हैं और संसार से मुक्त हो जाते हैं।
'आंतरिक प्रकाश' वह दिव्य ज्ञान है जो भगवान की कृपा द्वारा हमारे भीतर तब प्रकट होता है जब हम भगवान के शरणागत हो जाते हैं।
योगदर्शन में वर्णन है-
ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥
(योगदर्शन-1.48)
"समाधि की अवस्था में मनुष्य की बुद्धि परम सत्य की अनुभूति में डूब जाती है।"
अर्जुन को यह उपदेश देने के पश्चात् कि कामना और क्रोध के आवेग को सहन करना आवश्यक है, अब श्रीकृष्ण इसका अभ्यास करने का उपाय प्रकट करते हैं। 'योऽन्तः सुख' शब्द का अर्थ 'आंतरिक रूप से प्रसन्न होना' है। एक प्रकार की प्रसन्नता हमें बाहरी पदार्थों से प्राप्त होती है और दूसरे प्रकार की प्रसन्नता हमें तब प्राप्त होती है जब हम अपने मन को भगवान में लीन कर लेते हैं। लेकिन जब भगवान का आनन्द हृदय में उमड़ता है तब उसकी तुलना में बाह्य लौकिक सुख तुच्छ दिखाई पड़ने लगते हैं और फिर उनको त्यागना सुगम हो जाता है। संत यमुनाचार्य ने कहा है-
यदावधि मम चेतः कृष्णपदारविन्दे
नव नव रस धामनुद्यत रन्तुम् आसीत् ।
तदावधि बत नारीसंगमे स्मर्यमाने
भवति मुखविकारः सुष्ठु निष्ठीवनं च ।।
"जब से मैं भगवान श्रीकृष्ण के चरणों का ध्यान करने लगा हूँ तब से मैं नित्य असीम आनन्द अनुभव करने लगा हूँ। यदि अचानक मेरे मन में काम सुख का विचार आ जाए तब उस विचार पर मैं थूकता हूँ और मेरे ओष्ठ अरुचि से सिमट जाते हैं।"
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा: |
छिन्नद्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता: || 25||
वे मनुष्य जिनके पाप समाप्त हो जाते हैं और जिनके संशय मिट जाते हैं और जिनका मन संयमित होता है, वे सभी प्राणियों के कल्याणार्थ कार्य करते हैं। वे भगवान को पा लेते हैं और सांसारिक बंधनों से भी मुक्त हो जाते हैं।
गत श्लोक में श्रीकृष्ण ने उन साधुओं की अवस्था को व्यक्त किया है जो अपने भीतर भगवान के सुख का अनुभव करते हैं। इस श्लोक में वे उन संत महात्माओं की अवस्था का वर्णन कर रहे हैं, जो सभी प्राणियों के कल्याण के कार्य में रत रहते हैं। रामचरितमानस में वर्णन है
पर उपकार बचन मन काया।
संत सहज सुभाउ खगराया।।
"करुणा संतो की स्वाभाविक प्रकृति है। इससे प्रेरित होकर वे अपनी वाणी, मन और शरीर का प्रयोग दूसरों के कल्याण के लिए करते हैं।"
परोपकार प्रशंसनीय कार्य है किन्तु केवल शरीर के कल्याण संबंधी कार्यों का परिणाम अस्थायी होता है। एक भूखे व्यक्ति को जब भोजन परोसा जाता है तब उसकी भूख शांत हो जाती है किन्तु चार घंटे के पश्चात् उसे फिर भूख लगती है। आत्मिक कल्याण के द्वारा सभी प्रकार के लौकिक कष्टों के मूल में पहुंचकर भगवच्चेतना को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाता है। इसलिए परम कल्याण का कार्य मनुष्य की चेतना को भगवच्चेतना के साथ जोड़ने में सहायता करना है। इस परोपकार कार्य में महापुरुष शुद्ध मन से तल्लीन रहते हैं। इससे और अधिक भगवान की कृपा प्राप्त होती है जो उन्हें इस मार्ग की ओर अग्रसर होने के लिए और अधिक प्रेरित करती है। अन्त में जब वे मन को पूर्णतः शुद्ध कर भगवान के पूर्ण शरणागत हो जाते हैं तब वे दिव्य आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश कर सदा के लिए परमात्मा का दिव्य लोक प्राप्त कर लेते हैं।
इसलिए इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने कर्मयोग के मार्ग की प्रशंसा की है। अब वे शेष श्लोकों में कर्म संन्यास की व्याख्या करते हुए यह बता रहे हैं कि कर्म संन्यासी भी उसी अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् |
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् || 26||
ऐसे संन्यासी भी जो सतत प्रयास से क्रोध और काम वासनाओं पर विजय पा लेते हैं एवं जो अपने मन को वश में कर आत्मलीन हो जाते हैं, वे भी माया के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 5.2 में की गयी व्याख्या के अनुसार कर्मयोग अधिकतर लोगों के लिए सरल मार्ग है और इसलिए श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को भी इसका अनुसरण करने की अनुशंसा की गयी है। किन्तु फिर भी कुछ लोग जो वास्तव में संसार से विरक्त हो जाते हैं, उनके लिए कर्म संन्यास भी उपयुक्त है। इसका एक लाभ यह है कि इसमें समय और ऊर्जा का सांसारिक कर्त्तव्यों के प्रति गमन नहीं होता और व्यक्ति आध्यात्मिक अभ्यास के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध हो सकता है।
इतिहास में अनेक कर्मसंन्यासियों का उल्लेख मिलता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे सच्चे संन्यासी आध्यात्मिक क्षेत्र में तीव्रता से प्रगति करते हैं और अनंत शांति प्राप्त करते हैं। कामनाओं और क्रोध का दमन कर तथा मन को वश में करके वे इस लोक और परलोक दोनों में परम शांति प्राप्त करते हैं। हम प्रायः इस मिथ्या धारणा को प्रश्रय देते हैं कि बाह्य परिस्थितियाँ ही हमारे जीवन में अशांति के लिए दोषी हैं और हम यह प्रतीक्षा करते हैं कि परिस्थितियाँ कब अनुकूल होंगी। किन्तु शांति बाह्य परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती क्योंकि यह मन, बुद्धि और इन्द्रियों की शुद्धि का विषय है।
संन्यासी अपने मन और विचारों को भीतर की ओर मोड़ लेते हैं और उसी शांति के महासागर में गोता लगाते हैं। ऐसा करने से वे बाह्य परिस्थितियों से उदासीन हो जाते हैं। ऐसे व्यवस्थित अंतःकरण के साथ वे सर्वत्र उसी शांति का अनुभव करते हैं और इस संसार में से भी मुक्त हो जाते हैं।
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवो: |
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ || 27||
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण: |
विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव स: || 28||
समस्त बाह्य सुख के विषयों का विचार न कर अपनी दृष्टि को भौहों के बीच में स्थित कर, नासिका में विचरने वाली भीतरी और बाहरी श्वासों के प्रवाह को सम करते हुए इन्द्रिय, मन और बुद्धि को संयमित करके जो ज्ञानी कामनाओं और भय को त्याग देता है, वह सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
प्रायः वैरागी लोगों की रुचि अष्टांगयोग या हठयोग में भी होती है। उनकी विरक्ति उन्हें भक्ति के मार्ग से उदासीन रखती है जिसमें भगवान के नाम, रूपों, लीलाओं और धाम का स्मरण करना आवश्यक होता है। श्रीकृष्ण यहाँ तपस्वियों द्वारा अपनाए गए मार्ग का वर्णन करते हैं-
वे कहते हैं कि ऐसे तपस्वी अपनी दृष्टि और श्वास को नियंत्रित कर विषयों का चिंतन बंद कर देते हैं। वे अपनी दृष्टि को भौहों के मध्य में केन्द्रित करते हैं। यदि नेत्रों को पूरी तरह से बंद कर दिया जाए तो निद्रा आने की संभावना रहती है और यदि आंखों को खुला रखा जाये तब वे अपने आस-पास की वस्तुओं से व्याकुल हो सकते हैं। इन दोनों दोषों से बचने के लिए योगी लोग अपनी अधखुली आंखों से दृष्टि को भौहों के मध्य या नासिका के अग्र भाग पर केन्द्रित करते हैं। वे 'प्राण' अर्थात् बाहर छोड़ी जाने वाली श्वास को 'आपान' अर्थात् अन्दर भरी जाने वाली श्वास के साथ तब तक समरूप करते हैं जब तक कि दोनों यौगिक समाधि में विलीन न हो जायें। यह यौगिक क्रिया इन्द्रिय, मन और बुद्धि पर नियंत्रण पाने के योग्य बनाती है। ऐसे योगी लोगों का एक मात्र लक्ष्य माया के बंधनों से मुक्त पाना होता है। ऐसे योगियों को आत्मज्ञान तो प्राप्त हो जाता है किन्तु उन्हें ब्रह्म ज्ञान प्राप्त नहीं होता। किंतु तपस्या का मार्ग भी भगवान की भक्ति के द्वारा ही पूर्ण होता है। इसे अगले श्लोक में व्यक्त किया गया है।
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् |
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति || 29||
जो भक्त मुझे समस्त यज्ञों और तपस्याओं का भोक्ता, समस्त लोकों का स्वामी और सभी प्राणियों का सच्चा हितैषी समझते हैं, वे परम शांति प्राप्त करते हैं।
पिछले दो श्लोकों में जिस साधना पद्धति का उल्लेख किया गया है वह आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्त कराती है। किन्तु ब्रह्मज्ञान के लिए भगवान की कृपा आवश्यक है जो भक्ति के द्वारा ही प्राप्त होती है। 'सर्वलोकमहेश्वरम्' शब्द का अर्थ 'समस्त संसार के परम स्वामी भगवान' तथा 'सुहृदं सर्वभूतानां' शब्द का अर्थ सभी प्राणियों का हितैषी और उपकारी होता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण बल देते हुए कहते हैं कि तपस्या के मार्ग का समापन भी भगवान की शरणागति में ही होता है। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने इसकी सुन्दर व्याख्या इस प्रकार से की है-
हरि का वियोगी जीव गोविन्द राधे।
साँचो योग सोई जो हरि से मिला दे।।
(राधा गोविन्द गीत)
"आत्मा सदा से भगवान से विमुख है। सच्चा योग वही है जो आत्मा को भगवान से जोड़ दे। अतः कोई योग पद्धति भक्ति मार्ग का अनुसरण किए बिना पूर्ण नहीं हो सकती।"
भगवान श्रीकृष्ण ने आध्यात्मिक अभ्यास के लिए सभी मार्गों को सम्मिलित किया है किन्तु हर बार वे इन्हें उपयुक्त बताते हुए कहते हैं कि इन सभी मार्गों में भक्ति का होना भी आवश्यक होता है। उदाहरणार्थ उन्होंने इस का वर्णन श्लोक 6.46-.47, 8.22, 11.53-54, 18.54-55 आदि में किया है। यहाँ भी श्रीकृष्ण ने इस विषय का अवसान भक्ति की अनिवार्यता को प्रकट करते हुए किया है।
।।श्रीमद्भगवत गीता का पंचम अध्याय सम्पूर्ण।।
Bhagavad Geeta Chapter 4
kathaShrijirasik
अध्याय चार: ज्ञान कर्म संन्यास योग
ज्ञान का योग और कर्म करने का विज्ञान
चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को दिए जा रहे दिव्य ज्ञान के उद्गम को प्रकट करते हुए उसके विश्वास को पुष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि यह वही शाश्वत ज्ञान है जिसका उपदेश उन्होंने आरम्भ में सर्वप्रथम सूर्यदेव को दिया था और फिर परम्परागत पद्धति से यह ज्ञान निरन्तर राजर्षियों तक पहँचा। अब वे अर्जुन, जो उनका प्रिय मित्र और परमभक्त है, के सम्मुख इस दिव्य ज्ञान को प्रकट कर रहे हैं। तब अर्जुन प्रश्न करता है कि वे श्रीकृष्ण जो वर्तमान में उसके सम्मुख खड़े हैं वे इस ज्ञान का उपदेश युगों पूर्व सूर्यदेव को कैसे दे सके? इसके प्रत्युत्तर में श्रीकृष्ण अपने अवतारों का रहस्य प्रकट करते हैं। वे बताते हैं कि भगवान अजन्मा और सनातन हैं फिर भी वे अपनी योगमाया शक्ति द्वारा धर्म की स्थापना के लिए पृथ्वी पर प्रकट होते हैं लेकिन उनके जन्म और कर्म दिव्य होते हैं और वे भौतिक विकारों से दूषित नहीं हो सकते। जो इस रहस्य को जानते हैं वे अगाध श्रद्धा के साथ उनकी भक्ति में तल्लीन रहते हैं और उन्हें प्राप्त कर फिर इस संसार में पुनः जन्म नहीं लेते।
इसके पश्चात् इस अध्याय में कर्म की प्रकृति का व्याख्यान किया गया है और कर्म, अकर्म तथा विकर्म से संबंधित तीन सिद्धातों पर चर्चा की गयी है। इनसे विदित होता है कि कर्मयोगी अनेक प्रकार के सांसारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए अकर्मा की अवस्था प्राप्त कर लेते हैं और इसलिए वे कर्मचक्र में नहीं फंसते।
इसी ज्ञान के कारण प्राचीन काल में ऋषि मुनि सफलता और असफलता, सुख-दुःख से प्रभावित हुए बिना केवल भगवान के सुख के लिए कर्म करते थे। यज्ञ कई प्रकार के होते हैं और इनमें से कई यज्ञों का उल्लेख यहाँ किया गया है। जब यज्ञ पूर्ण समर्पण की भावना से सम्पन्न किए जाते हैं तब इनके अवशेष अमृत के समान बन जाते हैं। ऐसे अमृत का पान करने से साधक के भीतर की अशुद्धता समाप्त हो जाती है। इसलिए यज्ञों का अनुष्ठान पूर्ण निष्ठा और ज्ञान के साथ करना चाहिए। ज्ञान रूपी नौका की सहायता से महापापी भी संसार रूपी कष्टों के सागर को सरलता से पार कर लेता है। ऐसा दिव्य ज्ञान वास्तविक आध्यात्मिक गुरु से प्राप्त करना चाहिए जो परम सत्य को जान चुका हो। श्रीकृष्ण गुरु के रूप में अर्जुन से कहते हैं कि ज्ञान की खड्ग से अपने हृदय में उत्पन्न हुए सन्देहों को काट दो, उठो और युद्ध लड़ने के अपने कर्त्तव्य का पालन करो।
श्रीभगवानुवाच |
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् |
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् || 1||
परम भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-मैने इस शाश्वत ज्ञानयोग का उपदेश सूर्यदेव, विवस्वान् को दिया और विवस्वान् ने मनु और फिर इसके बाद मनु ने इसका उपदेश इक्ष्वाकु को दिया।
किसी मनुष्य को केवल ज्ञान प्रदान करना ही पर्याप्त नहीं होता। ज्ञान प्राप्त करने वालों के लिए उसकी महत्ता समझना और उसकी प्रामाणिकता पर विश्वास करना आवश्यक होता है। तभी वे अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से इसका क्रियान्वयन करने का प्रयास करेंगे। इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिए जा रहे आध्यात्मिक ज्ञान की विश्वसनीयता और महत्व को प्रतिपादित किया है। श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि उसे युद्ध करने की प्रेरणा प्रदान करने हेतु दिया जा रहा ज्ञान कोई नवीन ज्ञान नहीं है। यह वही शाश्वत ज्ञान योग है जिसका उपदेश उन्होंने सबसे पहले विवस्वान् या सूर्यदेव को दिया था और फिर सूर्य देवता ने इस ज्ञान का उपदेश सृष्टि के प्रथम मानव मनु को और फिर बाद में मनु ने इसे सूर्य वंशज के पहले राजा इक्ष्वाकु को दिया। इसे अधोगामी ज्ञान पद्धति कहा जाता है। इस पद्धति में ज्ञानी व्यक्ति इस ज्ञान को अन्य व्यक्ति को प्रदान करता है।
इसके विपरीत उध्वगामी ज्ञान पद्धति है जिसमें कोई व्यक्ति अपने प्रयासों द्वारा ज्ञान को बढ़ाता है। यह स्व-अर्जित प्रक्रिया श्रम साध्य, अपूर्ण और अधिक समय लेने वाली होती है। उदाहरणार्थ हम भौतिक शास्त्र सीखना चाहते हैं। हम या तो स्व-अर्जित पद्धति से इसे सीखने का प्रयास करते हैं जिसके लिए हमें अपनी पूरी बुद्धि लगते हैं और फिर बाद में किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं या फिर अधोगामी पद्धति का आश्रय लेते हैं और इस विषय में निपुण अध्यापक से संपर्क करते हैं। स्व अर्जित पद्धति अत्यधिक समय लेती है और हम अपने जीवन काल में पूर्ण ज्ञान भी नहीं प्राप्त कर पाते। हम अपने निष्कर्षों की सटीकता के प्रति आश्वस्त भी नहीं हो सकते। किंतु अन्य पद्धति द्वारा हम शीघ्र ही भौतिक शास्त्र के गूढ़ रहस्यों को जान सकते हैं। यदि हमारे अध्यापक को भौतिक विज्ञान का पूर्ण ज्ञान है तब हम उससे इस विज्ञान को सुगमता से ग्रहण कर सकते हैं। ज्ञान की यह पद्धति सरल और दोष रहित है।
प्रत्येक वर्ष हजारों ऐसी पुस्तकें बाजार में आती हैं जिनके लेखक जीवन की सामान्य समस्याओं का हल भी उसमें प्रस्तुत करते हैं। ये पुस्तकें एक सीमा तक सहायक होती हैं क्योंकि ये ज्ञान प्राप्त करने की स्व अर्जित पद्धति पर आधारित होती हैं इसलिए ये अपूर्ण होती हैं। कुछ वर्षों पश्चात् नए सिद्धान्त स्थापित होते हैं जो वर्तमान सिद्धान्त को खंडित कर देते हैं। यह स्व अर्जित पद्धति परम सत्य का बोध कराने में अनुपयुक्त होती है। दिव्य ज्ञान को प्रकट करने के लिए निजी प्रयत्नों की आवश्यकता नहीं होती। यह भगवान की शक्ति है। यह तब से अस्तित्त्व में हैं जब से भगवान हैं। जैसे गर्मी और प्रकाश उतने ही पुराने हैं जितनी कि अग्नि जिससे ये प्रकट होते हैं। भगवान और जीवात्मा दोनों सनातन हैं और इसलिए भगवान और आत्मा को एकीकृत करने वाला योग विज्ञान भी शाश्वत है। अतः इसके लिए नये सिद्धान्त की कल्पना और रचना करने की कोई आवश्यकता नहीं होती। इसकी साक्षात् उदाहरण स्वयं भगवद्गीता है जो अपनी ज्ञान की विलक्षणता के द्वारा लोगों को विस्मित करती है और जो आज से 50वीं शताब्दी पहले सुनायी जाने के बावजूद वर्तमान में भी हमारे दैनिक जीवन के लिए प्रासंगिक है। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि योग का जो ज्ञान वे अर्जुन को दे रहे हैं वह शाश्वत और प्राचीन काल से गुरु-शिष्य परम्परा द्वारा एक-दूसरे तक पहुँचता रहा है।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदु: |
स कालेनेह महता योगो नष्ट: परन्तप || 2||
हे शत्रुओं के दमन कर्ता! इस प्रकार राजर्षियों ने गुरु परम्परा पद्धति द्वारा ज्ञान योग की विद्या प्राप्त की किन्तु अनन्त युगों के साथ यह विज्ञान संसार से लुप्त हो गया।
दिव्य ज्ञान प्राप्त करने की परम्परागत पद्धति के अंतर्गत शिष्य, भगवत्प्राप्ति गुरु परम्परा द्वारा अपने गुरु से पाते थे जो गुरु को भी परम्परागत पद्धति से प्राप्त होती थी। इसी परम्परा के अंतर्गत निमी और जनक जैसे राजर्षियों ने ज्ञानयोग की विद्या प्राप्त की। इस परम्परा का आरम्भ स्वयं भगवान ने किया जो इस संसार के प्रथम गुरु हैं। पद्धति से प्राप्त होती थी। इसी परम्परा के अंतर्गत निमि और जनक जैसे राजर्षियों ने ज्ञानयोग की विद्या प्राप्त की। इस परम्परा का आरम्भ स्वयं भगवान ने किया जो इस संसार के प्रथम गुरु हैं।
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवयेमुह्यन्ति यत्सूरयः। (श्रीमद्भागवतम्-1.1.1)
भगवान ने सर्वप्रथम आदिजन्मा ब्रह्माजी के हृदय में बैठकर उन्हें इसका ज्ञान दिया और ब्रह्माजी से यह परम्परा निरन्तर चलती रही। श्रीकृष्ण ने पिछले श्लोक में कहा कि उन्होंने यह ज्ञान सूर्य देवता विवस्वान् को दिया जिससे यह परम्परा आगे बढ़ती रही। किन्तु लौकिक जगत की प्रकृति इस प्रकार की है कि कालक्रम के साथ यह ज्ञान विलुप्त हो गया। अब लौकिक मनोवृत्ति वाले और निष्ठाहीन शिष्य इस ज्ञान की व्याख्या अपने निहित उद्धेश्यों के अनुसार करते हैं। केवल कुछ पीढ़ियों में ही इसकी पवित्रता दूषित हो गयी। जब ऐसा होता है तब भगवान अपनी अकारण कृपा द्वारा इस परम्परागत ज्ञान पद्धति को मानव समाज के कल्याण के लिए पुनः स्थापित करते हैं। वह ऐसा लोक कल्याण का कार्य संसार में स्वयं प्रकट होकर करते हैं या अपने भगवद् अनुभूत श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ संतों द्वारा करवाते हैं जो पृथ्वी पर भगवान के कार्य के वाहक के रूप में प्रकट होते हैं।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज जो भारतीय इतिहास में पाँचवें मूल जगद्गुरु थे। वे ऐसे भगवतप्राप्त संत थे जिन्होंने आधुनिक समय में प्राचीन वैदिक ज्ञान की महत्ता को पुनः स्थापित किया। जब वे केवल 34 वर्ष के थे तब काशी विद्वत् परिषद के 500 विद्वानों की सर्वोच्च सभा ने उन्हें 'जगद्गुरु' अर्थात 'विश्व के आध्यात्मिक गुरु' की उपाधि से सम्मानित किया। इस प्रकार से वे भारतीय इतिहास में 'जगद्गुरु' की उपाधि प्राप्त करने वाले पाँचवें संत बने। इससे पूर्व इतिहास में केवल 4 ही मूल गुरु हुए-1. आदि जगद्गुरु श्री शंकराचार्य, 2. जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, 3. जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य और 4. जगद्गुरु श्री माध्वाचार्य। प्राचीन वैदिक ग्रंथों पर उनके पूर्ण ज्ञान से काशी विद्वत् परिषद के सभी विद्वान इतने अभिभूत हुए कि उन्होंने इन्हें बहुत सी उपाधियों से विभूषित किया। भगवद्गीता का यह भाष्य और इसके श्लोकों का ज्ञान श्री कृपालु जी महाराज द्वारा मुझे दिए गए दिव्यज्ञान पर आधारित है।
स एवायं मया तेऽद्य योग: प्रोक्त: पुरातन: |
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् || 3||
उसी प्राचीन गूढ़ योगज्ञान को आज मैं तुम्हारे सम्मुख प्रकट कर रहा हूँ क्योंकि तुम मेरे मित्र एवं मेरे भक्त हो इसलिए तुम इस दिव्य ज्ञान को समझ सकते हो।
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि उसे दिया जा रहा यह पुरातन गूढ़ विज्ञान असाधारण रहस्य है। संसार में रहस्य रखने के दो मुख्य कारण हैं-या तो स्वार्थवश सत्य को अपने तक ही सीमित रखना या फिर ज्ञान के दुरूपयोग को बचाने के लिए। किन्तु ज्ञानयोग की विद्या का रहस्य इन दोनों कारणों से गुप्त नहीं रखा जाता अपितु इसे गुप्त इसलिए रखते हैं क्योंकि इसको समझने की योग्यता का होना अति आवश्यक है। इस श्लोक में इसकी योग्यता को भक्ति के रूप में व्यक्त किया गया है। भगवद्गीता के गहन संदेश को समझने के लिए केवल विद्वत्ता या संस्कृत भाषा में पारंगत होना आवश्यक नहीं है। इसे समझने के लिए भक्ति आवश्यक है जो भगवान के प्रति जीवात्मा के सूक्ष्म द्वेष का विनाश कर देती है और हमें भगवान के अणु अंश और दास के रूप में अपनी स्थिति को स्वीकार करने के योग्य बनाती है।
अर्जुन इस ज्ञान को पाने योग्य विद्यार्थी था क्योंकि वह भगवान का परम भक्त था। भगवान की भक्ति का अभ्यास यथाक्रम निम्नांकित पाँच उच्च भावों में से किसी एक भाव से किया जा सकता है।
1. शांत भाव-भगवान को अपना स्वामी मानना।
2. दास्य भाव-स्वामी के रूप में भगवान की दासता स्वीकार करने की भावना।
3. सख्य भाव-भगवान को अपना मित्र समझना।
4. वात्सल्य भाव-भगवान को अपना पुत्र मानना।
5. माधुर्य भाव-भगवान को अपना प्रियतम समझ कर उनकी उपासना करना।
अर्जुन ने भगवान को अपना मित्र मानकर उनकी आराधना की और इसलिए श्रीकृष्ण उसे अपना परम मित्र और भक्त कहते हैं। हृदय में श्रद्धा भक्ति के बिना कोई भी भगवद्गीता के दिव्य ज्ञान को ग्रहण नहीं कर सकता। यह श्लोक भगवान के प्रति श्रद्धा भक्ति न रखने वाले विद्वानों, ज्ञानियों, योगियों, तपस्वियों आदि द्वारा भगवद्गीता पर लिखी गयी टीका-टिप्पणियों को अमान्य सिद्ध करता है। इस श्लोक के अनुसार क्योंकि वे भक्त नहीं होते इसलिए वे अर्जुन के सम्मुख जो दिव्य ज्ञान प्रकट किया गया था, उसके अभिप्राय को वास्तव में समझ नहीं सकते। अतः भगवद्गीता पर उनका भाष्य अनुचित और अधूरा होता है।
अर्जुन उवाच |
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वत: |
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति || 4||
अर्जुन ने कहा! आपका जन्म विवस्वान् के बहुत बाद हुआ तब मैं फिर यह कैसे मान लूं कि प्रारम्भ में आपने उन्हें इस ज्ञान का उपदेश दिया था।
अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के कथनों में घटनाओं की असंगति से विचलित हो जाता है। सूर्य देवता का अस्तित्त्व सृष्टि के प्रारम्भ से ही है जबकि श्रीकृष्ण ने अभी इस संसार में जन्म लिया है। यदि श्रीकृष्ण वसुदेव और देवकी के पुत्र हैं तब उनका यह कहना कि उन्होंने इस ज्ञान को विवस्वान् सूर्य देव को दिया था, अर्जुन को असंगत प्रतीत होता है इसलिए वह इसकी सत्यता को जानना चाहता है। अर्जुन का प्रश्न भगवान की अवतार के रहस्य की व्याख्या करने का अनुरोध है और श्रीकृष्ण अगले श्लोक में इसका उत्तर देते हैं।
श्रीभगवानुवाच |
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन |
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप || 5||
तुम्हारे और मेरे अनन्त जन्म हो चुके हैं किन्तु हे परन्तप! तुम उन्हें भूल चुके हो जबकि मुझे उन सबका स्मरण है।
श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे अर्जुन के समक्ष एक मनुष्य के रूप में खड़े हैं केवल इस कारण से उनकी तुलना मानव मात्र से करना भोलापन है। कोई राष्ट्राध्यक्ष यदि कारागार को देखने का निर्णय लेता है और यदि हम उसे कारागार में खड़ा पाते हैं तब हमें यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि वह भी एक बन्दी है। हम जानते हैं वह केवल कारागार का निरीक्षण करने के प्रयोजन से वहाँ आया है। इसी प्रकार से भगवान भी कई बार अवतार लेकर संसार में प्रकट होते हैं किन्तु वह अपने दिव्य गुणों और शक्तियों को कभी नहीं त्यागते।
इस श्लोक पर अपनी टीका प्रस्तुत करते हुए शंकराचार्य कहते हैं- “या वासुदेवेअनीश्वरासर्वज्ञाशंका मूर्खाणां तां परिहरन् श्रीभगवान् उवाच।" (शारीरिक भाष्य श्लोक 4.5) अर्थात् "श्रीकृष्ण के मुख से उच्चारित इस श्लोक द्वारा उन मूर्ख लोगों की भर्त्सना की गयी है जो उन्हें भगवान मानने में संदेह करते हैं।" ये अविश्वासी लोग यह तर्क देते हैं कि श्रीकृष्ण ने भी उन सबके समान ही जन्म लिया था और उनके समान ही भोजन एवं जल आदि ग्रहण करते थे इसलिए वे भगवान नहीं हो सकते। यहाँ इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण जीवात्मा और भगवान के बीच के भेद को समझाते हुए कहते हैं कि यद्यपि वे इस संसार में अनन्त बार अवतार लेते हैं तथापि वे सदैव सर्वज्ञ रहते हैं।
जीवात्मा और परमात्मा में कई प्रकार की समानता होती है, जैसे दोनों सत्-चित्-आनन्द (नित्य, चेतन और आनन्द) हैं फिर भी दोनों में अनेकों भेद हैं। भगवान सर्वव्यापक हैं किन्तु आत्मा केवल शरीर में व्याप्त रहती है। भगवान सर्वशक्तिमान हैं जबकि आत्मा में भगवान की कृपा के बिना स्वयं को माया से मुक्त करवाने की शक्ति भी नहीं होती। भगवान सृष्टि के नियमों के निर्माता हैं जबकि आत्मा इन नियमों के अधीन है भगवान समस्त सृष्टि के नियन्ता हैं जबकि आत्मा उनके नियंत्रण में रहती है, भगवान सर्वज्ञ हैं और जीवात्मा को किसी एक विषय का भी पूर्ण ज्ञान नहीं होता।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस श्लोक में 'परन्तप' कह कर संबोधित किया है जिसका अर्थ 'शत्रुओं का दमनकर्ता' है। वे कहते हैं, "अर्जुन तुम पराक्रमी योद्धा हो, तुमने कई शक्तिशाली शत्रुओं का वध किया है। अब तुम इस संदेह को जो तुम्हारे मस्तिष्क में प्रविष्ट हो गया है, उससे अपनी पराजय स्वीकार न करो। ज्ञान की जो खड्ग मैं तुम्हे दे रहा हूँ, इससे अपने अज्ञान का नाश करो और ज्ञान में स्थित हो जाओ।"
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् |
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया || 6||
यद्यपि मैं अजन्मा और समस्त जीवों का स्वामी और अविनाशी हूँ तथापि मैं इस संसार में अपनी दिव्य शक्ति योगमाया द्वारा प्रकट होता हूँ।
कुछ लोग इस मत का विरोध करते हैं कि भगवान मनुष्य का रूप धारण करते हैं। वे भगवान के निराकार रूप के साथ अधिक सहज रहते हैं जो सर्वत्र व्याप्त, अमूर्त और सूक्ष्म है। भगवान निश्चित रूप से अमूर्त और निराकार है किन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि भगवान एक साथ अपने निराकार और साकार रूप में नहीं रह सकते। यदि कोई कल्पना करता है कि भगवान का साकार रूप नहीं है तब इसका यह अर्थ होगा कि वह व्यक्ति भगवान को सर्व शक्तिशाली नहीं मानता इसलिए यह कहना कि 'भगवान निराकार है' यह एक अधूरा कथन है। अन्य शब्दों में यह कहना कि 'भगवान साकार रूप में प्रकट होते हैं' यह भी एक अधूरा सत्य है। सर्वशक्तिमान भगवान के साकार और निराकार दो रूप हैं। इसलिए बृहदारण्यकोपनिषद् में वर्णन है-
द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च। (बृहदारण्यकोपनिषद्-2.3.1)
भगवान दो रूपों में प्रकट होते हैं-निराकार 'ब्रह्म' के रूप में और साकार 'भगवान' के रूप में। ये दोनों भगवान के व्यक्तित्त्व के आयाम हैं। वास्तव में जीवात्मा में भी ये दोनों आयाम होते हैं। यह निराकार है और इसलिए जब यह मृत्यु के समय शरीर को त्याग देती है तब यह दिखाई नहीं देती। फिर भी यह दूसरा शरीर धारण करती है और केवल एक बार ही नहीं बल्कि अनन्त बार क्योंकि वह एक जन्म से दूसरे जन्म में शरीर बदलती रहती है। जब अणु आत्मा शरीर धारण करने के योग्य हो सकती है तब फिर सर्वशक्तिशाली भगवान साकार रूप धारण क्यों नहीं कर सकते? या भगवान क्या यह कहते हैं-"मेरे पास साकार रूप में प्रकट होने की शक्ति नहीं है और इसलिए मैं केवल एक निराकार ज्योति हूँ।" सर्वज्ञता और पूर्णता के दिव्य गुणों से परिपूर्ण होने के लिए भगवान का साकार और निराकार दोनों रूपों में होना आवश्यक है। भगवान और जीवात्मा में यह भेद इसलिए है कि हमारा शरीर प्राकृत अर्थात् माया शक्ति से निर्मित है। भगवान का साकार रूप उनकी दिव्य शक्ति योगमाया द्वारा निर्मित होता है इसलिए यह दिव्य है और भौतिक विकारों से परे है। पद्मपुराण में इसका विशद वर्णन इस प्रकार से है-
यस्तु निर्गुण इत्युक्तः शास्त्रेषु जगदीश्वरः।
प्राकृतैर्हेय संयुक्तैर्गुणैर्लीनत्वमुच्यते ।।
"जबकि वैदिक ग्रंथों में वर्णन किया गया है कि भगवान का कोई रूप नहीं होता इससे उनका यह ताप्तर्य है कि भगवान का रूप प्राकृतिक विकार से ग्रस्त नहीं होताअपितु इसके विपरीत वह दिव्य रूप होता है"।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् || 7||
जब जब धरती पर धर्म की ध्वनि और अधर्म में वृद्धि होती है तब उस समय मैं पृथ्वी पर अवतार लेता हूँ।
वस्तुतः धर्म एक नियत कर्म है जो हमारे आध्यात्मिक उत्थान और उन्नति में सहायक होता है और धर्म के प्रतिकूल आचरण को अधर्म कहा जाता है। जब धरती पर अधर्म प्रबल हो जाता है तब संसार के सृष्टि कर्ता और नियामक भगवान प्रकट होकर अधर्म का विनाश कर धर्म की स्थापना करते हैं। इस प्रकार से भगवान के प्रकट होने को अवतार कहा जाता है। संस्कृत भाषा के शब्द 'अवतार' शब्द को अंग्रेजी भाषा के शब्दकोश में भी सम्मिलित किया गया है और इसका प्रयोग प्रायः स्क्रीन पर अपना चित्र दर्शाने के लिए किया जाता है। इस पुस्तक में हम भगवान के दिव्य प्राकट्य के अर्थ के लिए इस शब्द का प्रयोग करेंगे। श्रीमद्भागवतम् में 24 अवतारों का उल्लेख मिलता है किन्तु वैदिक धर्मग्रंथों में अनन्त अवतारों का वर्णन किया गया है।
जन्मकर्माभिधानानि सन्ति मेऽङ्ग सहस्रशः।
न शक्यन्तेऽनुसंख्यातुमनन्तत्त्वान्मयापि हि।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.51.36)
"कोई भी ईश्वर के अनन्त अवतारों की गणना नहीं कर सकता। इन अवतारों का वर्गीकरण निम्न चार प्रकार से किया गया है"
1. आवेशावतार-जब भगवान अपनी दिव्य शक्तियाँ किसी पुण्य जीवात्मा में प्रकट कर उसके माध्यम से अपनी लीलाएँ करते हैं। नारद मुनि इस का उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त महात्मा बुद्ध का अवतार भी इसका उदाहरण है।
2. प्रभवावतार-ये भगवान के साकार रूप के अवतार हैं जिसमें वे अपनी कुछ दिव्य शक्तियों
का प्रदर्शन करते हैं। प्रभवावतार भी दो प्रकार के होते हैं।
(क) जब भगवान थोड़े समय के लिए प्रकट होकर अपना कार्य सम्पन्न कर चले जाते हैं। हंसावतार इसका उदाहरण है जहाँ भगवान ने प्रकट होकर चार कुमारों के प्रश्नों के उत्तर दिये और फिर अन्तर्ध्यान हो गये।
(ख) जब भगवान अवतार लेकर कई वर्षों तक पृथ्वी पर रहते हैं। वेदव्यास जिन्होंने 18 पुराणों और महाभारत की रचना की एवं वेदों को चार भागों में विभक्त किया था, वे इस प्रकार के अवतार का उदाहरण है।
3. वैभवातार-जब भगवान विराट रूप में प्रकट होकर अपनी दिव्य शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं। जैसे मत्स्यवतार, कूर्मावतार और वराहावतार ये सभी वैभावतार के उदाहरण हैं।
4. परावस्थावतार-जब भगवान अपनी दिव्य शक्तियों सहित स्वयं अवतार लेकर पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। श्रीकृष्ण, श्रीराम और नृसिंहावतार सभी परावस्थावतार हैं।
इस वर्गीकरण का तात्पर्य यह दर्शाना नहीं है कि कोई अवतार अन्य अवतारों से श्रेष्ठ है। वेदव्यासजी जो स्वयं भगवान का अवतार थे, ने स्पष्ट वर्णन किया है-" सर्वे पूर्णाः शाश्वताश्च देहास्तस्यपरमात्मनः" (पद्मपुराण) अर्थात् "सभी अवतार भगवान की दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण थे।" इसलिए हमें किसी अवतार की तुलना में किसी अन्य अवतार को बड़ा या छोटा नहीं समझना चाहिए। भगवान अवतारों के दौरान सम्पन्न किए जाने वाले कार्यों के आधार पर अपेक्षित शक्तियों के साथ प्रकट होते हैं। शेष शक्तियाँ अवतार में अप्रकट रहती हैं इसलिए उपर्युक्त वर्गीकरण किया गया है।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे || 8||
भक्तों का उद्धार, दुष्टों का विनाश और धर्म की मर्यादा को पुनः स्थापित करने के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ।
पिछले श्लोक में यह कहने के पश्चात् कि भगवान संसार में अवतार लेते हैं अब श्रीकृष्ण भगवान के अवतार लेने के तीन कारणों की व्याख्या कर रहे हैं-(1) दुष्टों के विनाश के लिए, (2) भक्तों के उद्धार के लिए, (3) धर्म की स्थापना के लिए। किंतु यदि हम इन तीनों बिन्दुओं का गहन अध्ययन करते हैं तब भी तीनों कारणों में से कोई भी अधिक विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता।
1) भक्तों के उद्धार के लिए: भगवान अपने भक्तों के हृदय में वास करते हैं और उनके भीतर रहकर सदैव उनकी रक्षा करते हैं। इस प्रयोजन हेतु भगवान को अवतार लेने की आवश्यकता नहीं होती।
2) दुष्टों के विनाश हेतुः भगवान सर्वशक्तिमान हैं और केवल अपने संकल्प से उन्हें मार सकते हैं। इसलिए ऐसा करने के लिए उन्हें अवतार लेने की क्या आवश्यकता है?
3) धर्म की स्थापना के लिए: वेदों में नित्य धर्म का वर्णन किया गया है। भगवान संतों के माध्यम से इसकी पुनः स्थापना कर सकते हैं। अतः इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए अवतार लेना आवश्यक नहीं है।
ऐसे में फिर उपर्युक्त श्लोक में वर्णित कारणों के अभिप्राय को हम कैसे समझ सकते हैं? श्रीकृष्ण के कथनों का आशय ग्रहण करने के लिए हमें गहनता से विचार करना होगा।
इसे भगवान की भक्ति में तल्लीन होना ही आत्मा का सबसे बड़ा धर्म है इसलिए भगवान अवतार लेकर इसे शक्ति प्रदान करते हैं। जब भगवान पृथ्वी पर अवतरित होते हैं तब वह अपने दिव्य रूप, नाम, गुण, लीला, धाम और संतों के साथ प्रकट होते हैं जिससे आत्मा को भगवान की भक्ति में लीन होने का सरल आधार प्राप्त होता है। चूँकि मन को अपना ध्यान स्थिर रखने के लिए किसी रूप का आश्रय लेने की आवश्यकता पड़ती है इसलिए भगवान के निराकार रूपों की उपासना कठिन होती है। अन्य शब्दों में साकार भगवान की भक्ति को समझना, करना और उसमें तल्लीन होना रुचिकर होता है।
इस प्रकार 5000 वर्ष पूर्व हुए श्रीकृष्ण के अवतार से अब तक करोड़ों आत्माओं ने उनकी लीलाओं की भक्ति का आधार बनाते हुए सहजता के साथ अपने मन को शुद्ध किया। इसी प्रकार से रामायण ने सदियों से जीवात्मा को भक्ति का सुखद आधार प्रदान किया है। जब भारत में दूरदर्शन पर सर्वप्रथम रामायण श्रृंखला का प्रसारण प्रत्येक रविवार को प्रात:काल में आरम्भ हुआ था तब उस टी. वी. प्रसारण को देखने के लिए पूरे देश के सभी गली मुहल्ले खाली हो जाते थे। भगवान राम की लीलाओं ने लोगों को ऐसा मंत्रमुग्ध किया कि वे भगवान की लीलाओं को देखने के लिए अपने टी. वी की स्क्रीन से चिपके रहते थे। इससे यह ज्ञात होता है कि इतिहास में भगवान राम के अवतार ने अनन्त जीवात्माओं को भक्ति का आधार प्रदान किया। रामचरितमानस में इस प्रकार से वर्णन किया गया है-
राम एक तापस तिय तारी।
नाम कोटि खल कुमति सुधारी।।
"अपने अवतार काल में राम ने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को स्पर्श कर पत्थर के शरीर से मुक्ति प्रदान की थी।" इस प्रकार तब से 'राम' के नाम की महिमा का गान करते हुए अनेक पतित आत्माएँ पवित्र हो गयीं। इस श्लोक का गूढ ज्ञान इस प्रकार से है-
धर्म की स्थापनाः भगवान अवतार लेकर जीवात्माओं को अपना नाम, रूप, लीला, गुण, धाम और संतों का संग प्रदान कर धर्म की स्थापना करते हैं, जिससे सभी जीव भक्ति में लीन होकर अपने अन्तःकरण को पवित्र करते हैं।
दुष्टों का संहार करनाः भगवान की दिव्य लीलाओं को सुकर बनाने के लिए कुछ जीवन मुक्त संत भी उनके साथ अवतार लेकर आते हैं और वे खलनायक का अभिनय करते हैं। उदाहरणार्थ रावण और कुंभकरण जय और विजय थे जो भगवान के दिव्य धाम से अवतार लेकर प्रकट हुए थे। उन्होंने राक्षस का अभिनय किया और भगवान राम से शत्रुता कर उनसे युद्ध किया। वे किसी के द्वारा भी मारे नहीं जा सकते थे क्योंकि वे दिव्य पुरुष थे। इसलिए भगवान ने अपनी लीला के प्रदर्शन हेतु ऐसे राक्षसों का वध किया और उन्हें मारने के पश्चात् भगवान श्रीराम ने उन्हे अपने उसी दिव्य धाम में पहुँचा दिया जहाँ से वे पहले आए थे।
भक्तों के उद्धार के लिए: अनेक जीवात्माएँ भगवान का साक्षात्कार करने की पात्रता प्राप्त करने के लिए अपनी साधना भक्ति में अत्यंत उन्नत हो चुकी थीं। जब श्रीकृष्ण संसार में अवतरित हुए तब इन सिद्ध आत्माओं को भगवान की लीलाओं में भाग लेने का प्रथम बार सुअवसर प्राप्त हुआ। उदाहरणार्थ कुछ गोपियाँ (वृंदावन की ग्वालिनें जहाँ श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाएँ प्रकट की), जीवन मुक्त आत्माएँ थी जो श्रीकृष्ण की लीलाओं के प्रदर्शन में सहायतार्थ उनके दिव्य धाम से अवतार लेकर प्रकट हुई थीं। अन्य गोपियाँ मायाबद्ध जीवात्माएँ थीं जिन्हें भगवान से मिलने और उनकी सेवा करने का प्रथम बार अवसर प्राप्त हुआ और उन्होंने भी उनकी मधुर लीलाओं में भाग लिया। इस प्रकार जब श्रीकृष्ण संसार में अवतरित हुए तब इन जीवात्माओं को भगवान की लीलाओं में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने और अपनी भक्ति पूर्ण करने का सुअवसर मिला। यही इस श्लोक का गूढ़ अर्थ है। फिर भी यदि कोई इस श्लोक पर अधिक साहित्यिक या शाब्दिक दृष्टि से विचार करना चाहता है तब यह अनुचित नहीं होगा।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत: |
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन || 9||
हे अर्जुन! जो मेरे जन्म एवं कर्मों की दिव्य प्रकृति को जानते हैं वे शरीर छोड़ने पर संसार में पुनः जन्म नहीं लेते अपितु मेरे नित्य धाम को प्राप्त करते हैं।
गत श्लोक के संदर्भ में इस श्लोक को समझना चाहिए। श्रद्धापूर्वक भगवान के स्मरण में तल्लीन रहने से मन पवित्र होता है। यह भक्ति या तो निराकार भगवान या उनके साकार रूप के प्रति हो सकती है। भगवान के निराकार रूप की भक्ति अमूर्त होती है। इस प्रकार की साधना भक्ति के दौरान लोगों को अपना ध्यान केन्द्रित करने या संपर्क स्थापित करने के लिए कोई आधार दिखाई नहीं देता। साकार भगवान की भक्ति सरल है, ऐसी भक्ति के लिए भगवान के प्रति दिव्य मनोभावों का होना आवश्यक होता है। श्रीकृष्ण की भक्ति में तल्लीन होने के लिए लोगों को उनके नाम, रूप, गुण, लीलाओं, धाम और संतों में दिव्य मनोभाव विकसित करना चाहिए।
उदाहरणार्थ लोग भगवान की पत्थर की मूर्ति की पूजा करके अपने अन्त:करण को पवित्र करते हैं क्योंकि उन्हें यह पूर्ण विश्वास है कि इन मूर्तियों में भगवान का वास है। यही भावनाएँ भक्त के अन्तःकरण को शुद्ध करती हैं। महाराज मनु इस प्रकार से व्यक्त करते हैं:
न काष्ठे विद्यते देवो न शिलायां न मृत्सु च।
भावे हि विद्यते देवस्तस्मात्भावं समाचरेत् ।।
"भगवान न तो लकड़ी में और न ही पत्थर में अपितु भक्तों के हृदय में निवास करते हैं। इसलिए पूर्ण भावना के साथ मूर्ति की पूजा करो।" उसी प्रकार यदि हम भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन होना चाहते हैं तब हमें उनकी लीलाओं के प्रति अपने मन में दिव्य मनोभावों को प्रश्रय देना होगा। वे टीकाकार जो महाभारत या भगवद्गीता की लाक्षणिक विवेचना करते हैं, वे लोगों में श्रीकृष्ण की भक्ति को समाप्त कर घोर अन्याय करते हैं। इस श्लोक में श्रीकृष्ण हमारी भक्ति को प्रगाढ़ करने के लिए उनकी लीलाओं के प्रति दिव्य मनोभावना रखने की आवश्यकता पर बल देते हैं। ऐसी दिव्य मनोभावना विकसित करने के लिए हमें भगवान और हमारे अपने कर्मों के बीच के भेद को समझना होगा। हम मायाबद्ध जीव हैं और हमें अभी तक परमानंद प्राप्त नहीं हुआ और आत्मा की कामनाओं की अभी तक तृप्ति नहीं हुई है इसलिए हमारे कर्म निजी स्वार्थों और निजी आवश्यकताओं की पूर्ति की इच्छा से प्रेरित होते हैं जबकि भगवान के कर्म किसी निजी कारण से प्रेरित नहीं होते क्योंकि वे अनन्त सुखों से नित्य तृप्त रहते हैं। भगवान को कर्मों द्वारा आनन्द प्राप्त करने की अपेक्षा नहीं होती। इसलिए भगवान जो भी करते हैं वे मायाबद्ध जीवात्माओं के कल्याणार्थ करते हैं। इन दिव्य कर्मों को भगवान की लीलाएँ कहा जाता है जबकि हमारे कर्मों को कार्य कहा जाता है। समान रूप से भगवान का जन्म भी दिव्य होता है और हमारी तरह किसी माता के गर्भ में नहीं होता इसलिए परमानन्द से परिपूर्ण भगवान को किसी माता के गर्भ में उल्टा लटकने की आवश्यकता नहीं होती। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है-
तमद्भूतं बालकमम्बुजेक्षणं चतुर्भुजं शङ्खगदायुदायुधम्।
(श्रीमद्भागवतम्-10.3.9)
"जब श्रीकृष्ण अवतार लेने से पूर्व वसुदेव और देवकी के सम्मुख प्रकट हुए तब वह चतुर्भुज विष्णु के रूप में थे।" भगवान का वह विराट रूप निश्चित रूप से देवकी के गर्भ में नहीं ठहर सकता था फिर भी देवकी को यह आभास दिलाने के लिए कि वे उसके गर्भ में है उन्होंने अपनी योगमाया शक्ति द्वारा देवकी के गर्भ को सुगमता से फैला दिया। अंततः वे बाहर से प्रकट हुए जिससे ज्ञात होता कि वे कभी भी गर्भ में नहीं थे।
आविरासीद् यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.3.8)
"जैसे आकाश में रात्रि के समय चन्द्रमा पूर्ण आभा के साथ प्रकट होता है उसी प्रकार से भगवान श्रीकृष्ण देवकी और वसुदेव के समक्ष प्रकट हुए।" यह भगवान के जन्म की विशेषता है। यदि हम भगवान की लीलाओं और जन्म की दिव्यता में विश्वास रखते हैं तब हम भगवान के साकार रूप की भक्ति में सरलता से तल्लीन हो सकते हैं और अपने परम लक्ष्य को पा सकते हैं।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता: |
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता: || 10||
आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त होकर पूर्ण रूप से मुझमें तल्लीन होकर मेरी शरण ग्रहण कर पहले भी अनेक लोग मेरे ज्ञान से पवित्र हो चुके हैं और इस प्रकार से उन्होंने मेरा दिव्य प्रेम प्राप्त किया है।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया था कि वे लोग जो उनके जन्म और उनकी लीलाओं की दिव्य प्रकृति को वास्तव में जानते हैं वे उन्हें पा लेते हैं। वे अब इसकी पुष्टि करते हैं कि सभी कालों में असंख्य मनुष्यों ने इस साधन से भगवत्प्राप्ति की है। उन्होंने श्रद्धा भक्ति द्वारा अपने अन्तःकरण को शुद्ध कर इस परम लक्ष्य को प्राप्त किया है। श्री अरविंद ने इसे अति सुन्दरता से व्यक्त किया है, "तुम्हें अपने हृदय रूपी मन्दिर को शुद्ध रखना चाहिए यदि तुम इसमें किसी दिव्या मूर्ति को रखना चाहते हो।" बाइबिल में वर्णन है-"शुद्ध हृदय वाले भाग्यशाली हैं क्योंकि वे ही वह भगवान को देख सकते हैं।" (मैथ्यू 5.8)
अब मन को कैसे शुद्ध किया जाए? आसक्ति, भय और क्रोध को त्यागने से और मन को भगवान में अनुरक्त करने से अन्त:करण कैसे शुद्ध होता है? वास्तव में आसक्ति ही भय और क्रोध का कारण है। जिन सांसारिक वस्तुओं में हमारी आसक्ति है वे हमसे छिन जाएंगी, इसकी आशंका से भय उत्पन्न होता है और विषयों की प्राप्ति में बाधा आने से क्रोध उत्पन्न होता है। इसलिए आसक्ति ही मन के अशुद्ध होने का मुख्य कारण है। यह माया का संसार तीन प्राकृतिक गुणों से निर्मित है-सत्व, रजस और तमस। संसार के सभी विषय और सभी मनुष्य इन तीन गुणों के आधिपत्य में हैं। जब हम स्वयं को किसी सांसारिक पदार्थ, विषय या व्यक्ति में अनुरक्त कर देते हैं तब हमारा मन भी इन तीन गुणों से प्रभावित होता है। इसके विपरीत जब हम अपने मन को भगवान (जो तीनों गुणों से परे हैं,) में अनुरक्त करते हैं तब ऐसी समर्पण भक्ति से मन शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार से मन को काम-वासना, क्रोध, लोभ, शत्रुता और मोह के विकारों से शुद्ध करने का श्रेष्ठ उपाय इसे संसार से विरक्त करना और भगवान में अनुरक्त करना है। इसलिए रामायण में वर्णन किया गया है-
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
अभ्यंतर मल कबहुँन जाई ।।
" भगवान की भक्ति बिना, मन का मैल नहीं धुल सकता" ज्ञान योग के महान् प्रवर्तक शंकराचार्य ने कहा है
शुद्धयति हि नान्तरात्मा कृष्णपदाम्भोज-भक्तिमृते।
(प्रबोध सुधाकर)
"भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों की भक्ति में लीन हुए बिना मन शुद्ध नहीं होगा" पिछले श्लोक को पढ़ने से यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि भगवान कृष्ण पक्षपात करते हुए अपनी कृपा उस पर बरसाते हैं जो अपने मन को उनमें लीन करते हैं न कि सांसारिक मनोवृत्ति वाले जीवात्माओं पर। परम पिता अगले श्लोक में इसे स्पष्ट करते हैं।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् |
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: || 11||
जिस भाव से लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं उसी भाव के अनुरूप मैं उन्हें फल देता हूँ। हे पृथा पुत्र! सभी लोग जाने या अनजाने में मेरे मार्ग का ही अनुसरण करते हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण यह व्यक्त करते हैं कि भगवान सभी के साथ उनके समर्पण के स्तर के अनुसार व्यवहार करते हैं। जो लोग भगवान के अस्तित्त्व को स्वीकार नहीं करते उनके प्रति वे कर्म के अनुसार उनसे व्यवहार करते हैं।वे उनके हृदय में बैठते हैं, उनके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं और तदनुसार फल देते हैं किन्तु ऐसे नास्तिक लोग भी भगवान की दासता से बच नहीं सकते। भगवान की शक्ति माया उन्हें धन-संपत्ति, विलासिता, सगे संबंधी, प्रतिष्ठा आदि के मोह जाल में फंसा कर भगवान की दासता करने के लिए बाध्य करती है। माया उन्हें क्रोध, काम-वासना और लोभ के नियंत्रण में ले आती है। दूसरी ओर जो लोग अपने मन से सांसारिक आकर्षणों को हटाकर भगवान को अपना लक्ष्य और आश्रय मानकर उनके सम्मुख होते हैं, उनके लिए भगवान अपने बालक का पालन पोषण करने वाली एक माँ के समान उनकी देखभाल करते हैं।
श्रीकृष्ण ने 'भजामि' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ 'सेवा करना' है। वे शरणागत जीवात्माओं के अनन्त पापों का नाश कर देते हैं, माया के बंधनों से मुक्त कर देते हैं, उन्हें भौतिक संसार के अंधकार को मिटा देते हैं और दिव्य कृपा, दिव्य ज्ञान एवं दिव्य प्रेम प्रदान करते हैं। जब भक्त निष्काम भाव से उन्हें प्रेम करते हैं तब वे अपनी स्वेच्छा से उनके प्रेम के कारण दास बन जाते हैं। श्रीराम ने हनुमान से इस प्रकार से कहा-
एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यास्मि ते कपे।
शेषस्येहोपकाराणां भवाम ऋणिनो वयं ।।
(वाल्मिकी रामायण)
"हे हनुमान! तुमने मेरी जो सेवा की है उसके ऋण से उऋण होने के लिए मैं तुम्हें अपना जीवन समर्पित कर दूंगा। तथा तुम्हारी भक्ति के लिए मैं सदैव तुम्हारा ऋणी रहूँगा।" इस प्रकार भगवान सभी के साथ उनके समर्पण के आधार पर व्यवहार करते हैं। यदि भगवान अपने भक्तों पर दया करते हैं तब फिर कुछ लोग स्वर्ग के देवताओं की पूजा क्यों करते हैं? श्रीकृष्ण इसकी व्याख्या अगले श्लोक में करते हैं।
काङ् क्षन्त: कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवता: |
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा || 12||
इस संसार में जो लोग सकाम कर्मों में सफलता चाहते हैं वे लोग स्वर्ग के देवताओं की पूजा करते हैं क्योंकि सकाम कर्मों का फल शीघ्र प्राप्त होता है।
जो लोग सांसारिक पदार्थों को प्राप्त करना चाहते हैं वे स्वर्ग के देवताओं की पूजा करते हैं और उनसे वरदान प्राप्त करते हैं। देवताओं द्वारा प्रदान किए जाने वाले वरदान भौतिक और अस्थायी होते हैं। क्योंकि देवता भी इन्हें केवल भगवान की शक्ति प्राप्त होने पर प्रदान कर सकते हैं। इस संबंध में एक ज्ञानप्रद सुन्दर कथा इस प्रकार से है-
संत फरीद एक बार बादशाह अकबर के दरबार में गए। वह जनता के दरबार में बैठकर बादशाह अकबर की प्रतीक्षा करने लगे जबकि अकबर दूसरे कमरे में प्रार्थना कर रहा था। संत फरीद ने उस कमरे में झांक कर देखना चाहा कि वहाँ क्या हो रहा है। वे यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि अकबर भगवान से अधिक शक्तिशाली सेना, धन से भरी तिजोरियाँ और युद्ध में विजय पाने की प्रार्थना कर रहा था। बादशाह को कुछ बोले बिना बाबा फरीद राज दरबार में लौट आए। अकबर अपनी प्रार्थना पूरी करने के पश्चात् जनता के दरबार में आया और उन्होंने संत फरीद के दर्शन किए। अकबर ने संत फरीद से पूछा कि क्या उन्हें किसी चीज की आवश्यकता है। संत फरीद ने उत्तर दिया, "मैं सम्राट से अपने आश्रम के लिए आवश्यक वस्तुएँ मांगने आया था किन्तु मैंने यह पाया कि बादशाह स्वयं भगवान से भीख मांग रहा है, तब फिर मैंने सोंचा कि उससे कुछ मांगने की अपेक्षा प्रत्यक्ष रूप से भगवान से ही क्यों न मांगूँ?" स्वर्ग के देवता केवल वही वरदान दे सकते हैं जो उन्हें भगवान की शक्तियों द्वारा प्राप्त होते हैं। संकीर्ण बुद्धि वाले लोग देवताओं की शरण में जाते हैं किन्तु ज्ञानी पुरुष यह समझते हैं कि इन से उनका मनोरथ सिद्ध नहीं हो सकता इसलिए वे अपनी अभिलाषाओं की पूर्ति हेतु भगवान की शरण ग्रहण करते हैं। विभिन्न प्रकार के लोगों की भिन्न-भिन्न अभिलाषाएँ होती हैं। श्रीकृष्ण अब आगे चार वर्णों के गुणों और कार्यों का उल्लेख करेंगे।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश: |
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् || 13||
मनुष्यों के गुणों और कर्मों के अनुसार मेरे द्वारा चार वर्णों की रचना की गयी है। यद्यपि मैं इस व्यवस्था का स्रष्टा हूँ किन्तु तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी मानो।
वेदों में लोगों के वर्ण के अनुसार उन्हें चार श्रेणियों में विभक्त किया गया है। यह वर्गीकरण उनके जन्म के अनुसार न होकर उनकी प्रकृति के अनुरूप किया गया है। वर्गों में यह विविध ता प्रत्येक समाज में होती है।
साम्यवादी राष्ट्रों में जहाँ समानता का सिद्धान्त प्रमुख है वहाँ भी मानव समाज में विभिन्नताओं को नकारा नहीं जा सकता। वहाँ कुछ ऐसे दार्शनिक हैं जो साम्यवादी दल के प्रमुख योजनाकार हैं। कुछ लोग सैनिक के रूप में अपने देश की रक्षा करते हैं। वहाँ किसान भी हैं जो खेती-बाड़ी करते हैं और वहाँ कारखानों में कार्य करने वाले कर्मचारी भी हैं।
वैदिक दर्शन में इन वर्णों का और अधिक वैज्ञानिक ढंग से वर्णन किया गया है। इनमें यह वर्णन मिलता है कि प्रकृति की शक्ति द्वारा तीन गुण निर्मित होते हैं-सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। ब्राह्मणों में सत्वगुण की प्रधानता होती है। वे विद्या और पूजा की ओर प्रवृत्त होते हैं। क्षत्रिय वे हैं जिनमें रजोगुण की प्रमुखता और कुछ मात्रा में सत्वगुण मिश्रित होता है। उनकी रुचि प्रशासन और प्रबंधन कार्यों में होती है। वैश्यों में रजोगुण और तमोगुण मिश्रित होते हैं। तदनुसार वे व्यावसायिक और कृषि संबंधी कार्य करते हैं। समाज में शूद्र लोग भी होते हैं। उनमें तमोगुण की प्रबलता होती हैं, इन्हें श्रमिक वर्ग कहा जाता है। इस वर्गीकरण का संबंध न तो जन्म से था और न ही यह अपरिवर्तनीय था।
श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में स्पष्ट किया है कि इस वर्णाश्रम व्यवस्था का वर्गीकरण लोगों के गुणों और कर्मों के अनुसार था। यद्यपि भगवान संसार के स्रष्टा हैं किन्तु फिर भी वे अकर्ता हैं। जैसे कि वर्षा का जल वनों में समान रूप से गिरता है किन्तु कुछ बीजों से बरगद के वृक्ष उगते हैं, कुछ बीजों से सुन्दर पुष्प खिलते हैं और कहीं पर कांटेदार झाड़ियाँ निकल आती हैं।
वर्षा बिना पक्षपात के जल प्रदान करती है अतः इस भिन्नता के लिए उत्तरदायी नहीं होती। इसी प्रकार से भगवान जीवात्माओं को कर्म करने के लिए शक्ति प्रदान करते हैं और जीव अपनी इच्छानुसार इसका प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं और भगवान उनके कर्मों के लिए उत्तरदायी नहीं होते।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा |
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते || 14||
न तो कर्म मुझे दूषित करते हैं और न ही मैं कर्म के फल की कामना करता हूँ जो मेरे इस स्वरूप को जानता है वह कभी कर्मफलों के बंधन में नहीं पड़ता।
भगवान पूर्ण विशुद्ध तत्त्व हैं और वे जो भी कर्म करते हैं वे शुद्ध और पवित्र हो जाते हैं। रामचरितमानस में वर्णन है
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं।
रबि पावक सुरसरि की नाईं।।
"सूर्य, अग्नि और गंगा जैसे विशुद्ध तत्त्व अशुद्ध सत्ता के संपर्क से भी विकारों से दूषित नहीं होते। सूर्य की रोशनी कीचड़ पर पड़ने से दूषित नहीं होती। सूर्य अपनी शुद्धता बनाए रखता है और साथ ही गंदे कीचड़ को भी शुद्ध कर देता है। उसी तरह यदि हम कोई अशुद्ध पदार्थ अग्नि में डालते हैं तो अग्नि की शुद्धता तो बनी रहती है तथा उसमें जो वस्तु डालते हैं वह भी अग्नि का रूप लेकर शुद्ध हो जाती है। इस प्रकार से अनेक बरसाती गटरों का गंदा पानी पवित्र गंगा में मिल जाता है किन्तु वह गंगा को गंदा नहीं कर सकता अपितु पवित्र गंगा इन गटरों के गंदे पानी को शुद्ध कर उसे भी पवित्र कर देती है। इसी प्रकार से भगवान अपने कर्मों का सम्पादन करने से दूषित नहीं होते।" जब फल भोगने की इच्छा से कर्म किए जाते हैं तब वे मनुष्य को कर्म की प्रतिक्रियाओं में बांधते हैं। भगवान के कर्म स्वार्थ से प्रेरित नहीं होते। उनके प्रत्येक कार्य जीव-मात्र पर करुणा करने के लिए होते हैं। इसलिए यद्यपि वे संसार पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शासन करते हैं और इस प्रक्रिया में सभी प्रकार के कार्यों में संलग्न रहते हैं लेकिन वे कर्मों की प्रतिक्रिया से दूषित नहीं होते। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे कर्मफल के चक्र से परे हैं। यहाँ तक कि भगवत् चेतना में लीन महापुरुष भी माया के प्रभाव से परे हो जाते हैं क्योंकि उनके सभी कार्य भगवान के प्रति प्रेम की भावना से युक्त होते हैं। ऐसे शुद्ध अन्तःकरण वाले संत कर्मों के बंधन में नहीं पड़ते। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है-
यत्पादपङ्कजपरागनिषेवतृप्ता योगप्रभावविधुताखिलकर्मबन्धाः।
स्वैरं चरन्ति मुनयोऽपि न नह्यमानास्तस्येच्छयाऽऽत्तवपुषः कुत एव बन्धः।
(श्रीमद्भागवतम्-10.33.35)
" भगवान के उन भक्तों को लौकिक कर्म कभी दूषित नहीं कर सकते जो भगवान के चरण कमलों की धूल पाकर संतुष्ट हो जाते हैं। लौकिक कर्म उन ज्ञानी संतों को दूषित नहीं करते जो योग शक्ति द्वारा कर्म के चक्र से मुक्ति पा लेते हैं। तब फिर ऐसे में यह प्रश्न ही कहाँ रह जाता है कि वे भगवान जो अपनी इच्छानुसार अपने अलौकिक स्वरूप में रहते हैं, कर्म के पाश में बंध सकते हैं?"
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभि: |
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वै: पूर्वतरं कृतम् || 15||
इस सत्य को जानकर प्राचीन काल में मुमुक्षुओं ने भी कर्म किए इसलिए तुम्हे भी उन मनीषियों के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
भगवान को पाने के अभिलाषी संत यद्यपि भौतिक सुखों की कामना से प्रेरित होकर कर्म नहीं करते फिर वे इस संसार में रहकर कर्म ही क्यों करते हैं? इसका कारण यह है कि वे भगवान की सेवा करना चाहते हैं और इसी प्रेरणा से वे भगवान के सुख के लिए ही कर्म करते हैं। पिछले श्लोक में प्रदत्त ज्ञान उन्हें आश्वस्त करता है कि वे उन कार्यों द्वारा कभी बंधन में नहीं बंध सकते जिन्हें श्रद्धा भक्ति की भावना से सम्पन्न किया जाता है। वे भगवत्च्चेतना से रहित सांसारिक बंधनों से दुःख प्राप्त कर रही जीवात्माओं के दुःखों को देखकर करुणा से भर जाते हैं और उनके आध्यात्मिक उत्थान के कार्य करने के लिए प्रेरित होते हैं। महात्मा बुद्ध ने एक बार कहा था, "ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् तुम्हारे पास दो विकल्प होते हैं या तो तुम कुछ मत करो या ज्ञान प्राप्ति हेतु अन्य लोगों की सहायता करो।" इस प्रकार से संत लोग जिनका कर्म करने में अपना कोई निहित स्वार्थ नहीं होता वे भी भगवान के सुख के लिए कर्म करते हैं। श्रद्धायुक्त भक्ति भाव से कर्म करने पर भगवान की दिव्य कृपा भी प्राप्त होती है। श्रीकृष्ण अर्जुन को यही उपदेश दे रहे हैं। अर्जुन को यह उपदेश देने के पश्चात् कि कर्म करने से कोई बंधन में नहीं पड़ता, अब भगवान श्रीकृष्ण कर्म के तत्त्वज्ञान की व्याख्या प्रारम्भ करते हैं।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता: |
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् || 16||
कर्म क्या है और अकर्म क्या है? इसका निर्धारण करने में बद्धिमान लोग भी विचलित हो जाते हैं अब मैं तुम्हें कर्म के रहस्य से अवगत कराऊँगा जिसे जानकर तुम सारे लौकिक बंधनों से मुक्त हो सकोगे।
कर्म के सिद्धान्तों को मानसिक संकल्पना द्वारा निर्धारित नहीं किया जा सकता। बुद्धिमान लोग भी धर्म ग्रंथों और ऋषि मुनियों द्वारा वर्णित विरोधाभासी तर्कों में उलझ कर विचलित हो जाते हैं। उदाहरणार्थ वेदों में अहिंसा की संस्तुति की गयी है। तदनुसार महाभारत के युद्ध में अर्जुन भी इसका पालन करना चाहता है और हिंसा से दूर रहना चाहता है किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं कि यहाँ इस युद्ध में उसे अपने धर्म का पालन करने के लिए हिंसा करनी पड़ेगी। यदि परिस्थितियों के साथ कर्त्तव्य परिवर्तित हो जाते हैं तब किसी विशेष परिस्थिति में व्यक्ति के लिए अपने कर्तव्य को निश्चित करना कठिन हो जाता है। इस संबंध में मृत्यु के देवता यमराज के कथन निम्न प्रकार से है
धर्मं तु साक्षाद्भगवत्प्रणीतं न
वै विदर्ऋषयो नापि देवाः ।
(श्रीमद्भागवतम्-6.3.19)
"उचित और अनुचित कर्म क्या है? महान् ऋषियों और स्वर्ग के देवता के लिए भी यह निर्धारण करना कठिन है। धर्म के संस्थापक स्वयं भगवान हैं और वे ही वास्तव में इसे जानते हैं।" भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि अब वे कर्मयोग और अकर्म के गूढ़ ज्ञान को प्रकट करेंगे जिसके द्वारा वह लौकिक बंधनों से मुक्त हो जाएगा।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण: |
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: || 17||
तुम्हें सभी तीन कर्मों-कर्म, विकर्म और अकर्म की प्रकृति को समझना चाहिए। इनके सत्य को समझना कठिन है।इनका ज्ञान गहन है।
श्रीकृष्ण ने कर्म को तीन श्रेणियों में विभक्त किया है। कर्म, वर्जित कर्म (विकर्म) और अकर्म।
कर्मः कर्म वे पवित्र कार्य हैं जिनकी धर्म ग्रंथों में इन्द्रियों को नियंत्रित करने और मन को शुद्ध करने हेतु संस्तुति की गयी है।
वर्जित कर्मः विकर्म अपवित्र कार्य हैं जिनका धर्म ग्रंथों में निषेध किया गया है क्योंकि ये हानिकारक होते हैं और इनके परिणामस्वरूप आत्मा का पतन होता है।
अकर्मः अकर्म ऐसे कर्म हैं जो फल की आसक्ति के बिना और भगवान के सुख के लिए किए जाते हैं। ना तो कर्मफल बनता है और न ही ये आत्मा को बंधन में डालते हैं।
कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य: |
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत् || 18||
वे मनुष्य जो अकर्म में कर्म और कर्म में अकर्म को देखते हैं, वे सभी मनुष्यों में बुद्धिमान होते हैं। सभी प्रकार के कर्मों में प्रवृत्त रहकर भी वे योगी कहलाते हैं और अपने सभी कर्मों में पारंगत होते हैं।
अकर्म में कर्मः एक प्रकार का अकर्म वह है जिसमें व्यक्ति अपने सामाजिक कर्त्तव्यों को बोझ समझते हुए एक आलसी की भांति उनका त्याग कर देता है। ऐसे लोग शारीरिक रूप से कर्म का त्याग तो करते हैं किन्तु उनका मन निरन्तर इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है। इस प्रकार के लोग अकर्मण्य तो प्रतीत होते हैं लेकिन उनकी कृत्रिम अकर्मण्यता वास्तव में पापमय कार्य है। जब अर्जुन अपने कर्तव्य पालन से संकोच करता है तब श्रीकृष्ण उसे बोध कराते हैं कि ऐसा करने से उसे पाप लगेगा और वह अपनी इस अकर्मण्यता के कारण मृत्यु के पश्चात् निम्नतर लोकों में जाएगा।
कर्म में अकर्मः कुछ दूसरे प्रकार के अकर्म भी होते हैं जो योगियों द्वारा सम्पन्न किए जाते हैं। वे बिना फल की आसक्ति के अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते हैं और अपने कर्मों के फलों को भगवान की सेवा में समर्पित करते हैं। यद्यपि वे सभी प्रकार के कर्म करते हैं किन्तु उनके कर्मफल नहीं भोगते क्योंकि उनका निजी सुख प्राप्त करने का मनोरथ नहीं होता। भारतीय इतिहास में ध्रुव, प्रह्लाद, युधिष्ठिर पृथु और अम्बरीष कई ऐसे महान राजा हुए हैं जिन्होंने अपनी पूर्ण योग्यता से अपने राजसी कर्त्तव्यों का निर्वहन किया और फिर भी उनका मन किसी प्रकार की लौकिक कामनाओं में लिप्त नहीं रहा। इसलिए उनके कार्यों को अकर्म कहा गया। अकर्म का एक अन्य नाम कर्मयोग भी है जिसकी विस्तृत चर्चा पिछले दो अध्यायों में की गयी है।
यस्य सर्वे समारम्भा: कामसङ्कल्पवर्जिता: |
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा: || 19||
जिन मनुष्यों के समस्त कर्म सांसारिक सुखों की कामना से रहित हैं तथा जिन्होंने अपने कर्म फलों को दिव्य ज्ञान की अग्नि में भस्म कर दिया है उन्हें आत्मज्ञानी संत बुद्धिमान कहते हैं।
आत्मा आनन्द के महासागर भगवान का अणु अंश है। माया से आच्छादित होने के कारण आत्मा स्वयं को शरीर समझ लेती है। इस अज्ञानता के कारण वह सांसारिक पदार्थों से सुख पाने के लिए कर्म करती है। चूँकि ये कर्म मानसिक सुखों और इन्द्रिय तृप्ति की कामना से प्रेरित होते हैं इसलिए ये आत्मा को कर्म फलों में लिप्त करते हैं। इसके विपरीत जब आत्मा दिव्य ज्ञान से प्रकाशित हो जाती है और यह अनुभव करती है कि वह भगवान की भक्ति से ही वास्तविक सुख प्राप्त कर सकती है न कि इन्द्रिय विषय भोगों से, तब वह भगवान के सुख के लिए सभी कर्म करने का प्रयास करती है। भगवद्गीता के नौवें अध्याय के 27वें श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है, "हे कुन्ती पुत्र! तुम जो कुछ करते हो, जो भी खाते हो, जो भी यज्ञ में अर्पित करते हो, जो भी दान के रूप में देते हो, जो तपस्या करते हो, वह सब मुझे अर्पित करते हुए करो" क्योंकि ऐसी प्रबुद्ध आत्मा लौकिक सुख पाने के लिए किए जाने वाले कर्मों को त्याग देती है और अपने सभी कर्म भगवान को अर्पित करती है। इस प्रकार से सम्पन्न किए गए कार्यों का कोई प्रतिफल नहीं होता। ऐसे कर्म दिव्य ज्ञान की अग्नि में भस्म हो जाते हैं।
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रय: |
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति स: || 20||
अपने कर्मों के फलों की आसक्ति को त्याग कर ऐसे ज्ञानीजन सदा संतुष्ट रहते हैं और बाह्य विषयों पर निर्भर नहीं होते। कर्मों में संलग्न रहने पर भी वे वास्तव में कोई कर्म नहीं करते।
बाह्य दृष्टि से कर्मों का वर्गीकरण नहीं किया जा सकता। कर्म और अकर्म क्या है, यह निर्धारित करना मन का कार्य है। ज्ञानी मनुष्यों का मन भगवान में तल्लीन रहता है। भगवान के साथ भक्ति भावना से युक्त होकर वे केवल भगवान को ही अपने आश्रयदाता के रूप में देखते हैं और संसार के आश्रयों पर निर्भर नहीं रहते। इस प्रकार की मन:स्थिति के कारण उनके प्रत्येक कर्म को अकर्म कहा जाता है। इस सत्य को समझने के लिए पुराण में एक सुन्दर कथा का वर्णन किया गया है। वृदावन की गोपियों ने एक बार उपवास रखा। उस उपवास को पूर्ण करने के लिए किसी ऋषि को भोजन खिलाना आवश्यक था। श्रीकृष्ण ने उन्हें महान ऋषि दुर्वासा को भोजन खिलाने का सुझाव दिया जो यमुना नदी के दूसरी ओर रहते थे, गोपियों ने स्वादिष्ट भोजन बनाया और दुर्वासा ऋषि को खिलाने के लिए निकल पड़ी किन्तु उस दिन नदी का बहाव बहुत तेज था और कोई भी नाविक उन्हें नदी पार कराने के लिए तैयार नहीं हुआ।
गोपियों ने जब श्रीकृष्ण से इसका समाधान पूछा तब उन्होंने उत्तर दिया-"तुम नदी से कहो कि यदि श्रीकृष्ण अखण्ड ब्रह्मचारी है तब वह उन्हें रास्ता दे।" गोपिया हँसने लगी क्योंकि वह जानती थीं कि श्रीकृष्ण प्रायः उन पर मोहित रहते हैं और इसलिए उनके अखण्ड ब्रह्मचारी होने का कोई प्रश्न नहीं था। लेकिन जब उन्होंने यमुना नदी से इस प्रकार की प्रार्थना की तब नदी ने पुष्पों का सेतु प्रकट कर उन्हें नदी पार जाने का मार्ग दे दिया। गोपियाँ आश्चर्यचकित रह गयीं। वे नदी पार कर दुर्वासा ऋषि के आश्रम पहुँची। उन्होंने दुर्वासा ऋषि से प्रार्थना की कि वह उनके स्वादिष्ट भोजन को ग्रहण करें। एक महान तपस्वी होने के कारण उन्होंने भोजन का कुछ अंश ही ग्रहण किया जिससे गोपियाँ निराश हो गयीं। दुर्वासा ने गोपियों की इच्छा को स्वीकार किया और उन्होंने अपनी योग शक्ति का प्रयोग कर गोपियों का सारा भोजन खा लिया। उन्हें सारा भोजन ग्रहण करते देख गोपियाँ अचम्भित हो गयीं किन्तु उन्हें इस बात की प्रसन्नता थी कि दुर्वासा ने उनके भोजन को ग्रहण करने की कृपा कर उनका मान बढ़ाया।
गोपियों ने अब ऋषि दुर्वासा से वापस नदी पार कराने के लिए सहायता करने को कहा। ऋषि दुर्वासा ने कहा कि "यमुना नदी से कहो कि यदि दुर्वासा ने आज तक केवल दूब के अतिरिक्त कुछ भी ग्रहण न किया हो तब वह उन्हें रास्ता दे" गोपियाँ पुनः हँसने लगी क्योंकि उन्होंने दुर्वासा को अपार भोजन खाते हुए देखा था किन्तु उन्हें तब अत्यंत आश्चर्य हुआ जब उन्होंने यमुना नदी से ऐसी प्रार्थना की और नदी ने पुनः उन्हें रास्ता दे दिया।
गोपियों ने श्रीकृष्ण से इस घटना का रहस्य पूछा तो उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान और संत बाह्य रूप से लौकिक कर्मों में व्यस्त दिखाई देते हैं किन्तु आन्तरिक दृष्टि से वे सदैव इन्द्रियातीत अवस्था में होते हैं इसलिए सभी प्रकार के कर्म करते हुए भी वे सदा अकर्त्ता माने जाते हैं। यद्यपि श्रीकृष्ण बाह्य रूप से गोपियों से प्रेम भाव से मिलते-जुलते थे किन्तु आन्तरिक रूप से अखण्ड ब्रह्मचारी थे। इसी प्रकार दुर्वासा ने गोपियों द्वारा अर्पित किया गया स्वादिष्ट भोजन खाया किन्तु आन्तरिक दृष्टि से उन्होंने मन से दूब का स्वाद ही चखा था। ये दोनों कर्म में अकर्म के सटीक उदाहरण हैं।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रह: |
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् || 21||
ऐसे ज्ञानीजन फल की आकांक्षाओं और ममत्व की भावना से मुक्त होकर अपने मन और बुद्धि को संयमित रखते हैं और शरीर से कर्म करते हुए भी कोई पाप अर्जित नहीं करते।
संसार में दुर्घटनावश घटित हिंसा को दण्डनीय अपराध नहीं माना जाता। यदि कोई अपने क्षेत्र में निर्धारित गति पर और ध्यानपूर्वक सामने देखते हुए कार चला रहा है और अचानक कोई व्यक्ति सामने से आकर कार से टकराकर मर जाता है तब न्यायिक कानून में इसे तब तक दोषपूर्ण अपराध नहीं माना जाएगा जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि कार चालक की उसे मारने की इच्छा थी। इसलिए मुख्यतः मानसिक इच्छा को ही महत्वपूर्ण समझा जाता है न कि कर्म के परिणाम को। समान रूप से तत्त्वदर्शी जो दिव्य चेतना से युक्त होकर कर्म करते हैं वे सभी प्रकार से पापों से मुक्त होते हैं क्योंकि उनका मन आसक्ति और स्वामित्व की भावना से रहित होता है और उनका प्रत्येक कार्य दिव्य भावना के साथ भगवान की प्रसन्नता के निमित्त होता है।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर: |
सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते || 22||
वे जो अपने आप स्वतः प्राप्त हो जाए उसमें संतुष्ट रहते हैं, ईर्ष्या और द्वैत भाव से मुक्त रहते हैं, वे सफलता और असफलता दोनों में संतुलित रहते हैं, जो सभी प्रकार के कार्य करते हुए कर्म के बंधन में नहीं पड़ते।
सिक्के के दो पहलुओं के समान भगवान द्वारा रचित सृष्टि में भी द्वैतता देखने को मिलती है। जैसे कि दिन और रात, मीठा और कड़वा, गर्मी और सर्दी, वर्षा और अकाल आदि। इसी प्रकार से गुलाब की झाड़ियों में सुन्दर फूल और कटीले कांटे भी पाए जाते हैं। जीवन में भी द्वैतता आती रहती है, जैसे-दुःख-सुख, जय और पराजय, यश-अपयश। भगवान राम ने भी अपनी दिव्य लीलाओं का प्रदर्शन करते हुए अयोध्या के राज्याभिषेक से एक दिन पूर्व वनवास प्रस्थान करने की आज्ञा को स्वीकार किया था। इस संसार में रहते हुए कोई भी द्वैतता को निष्प्रभावी कर सदा सकारात्मक अनुभव करने की आशा नहीं कर सकता। तब फिर हम अपने जीवन में आने वाले द्वन्दों का सफलतापूर्वक सामना करने में कैसे समर्थ हो सकते हैं? सभी परिस्थितियों में इन द्वैतताओं से ऊपर उठकर प्रत्येक अवस्था में स्थिर रहना सीखकर ही हम इन द्वैतताओं का समाधान कर सकते हैं। ऐसा तभी संभव हो सकता है, जब हम अपने कर्मों के फलों के प्रति विरक्ति की भावना को विकसित करते हैं और फल की लालसा किए बिना जीवन में केवल अपने कर्तव्यों के निर्वहन की ओर ध्यान देते हैं। जब हम भगवान के सुख के लिए कार्यों का निष्पादन करते हैं तब हम अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिणामों को भगवान की इच्छा के रूप में देखते हैं और हर्ष सहित दोनों को स्वीकार करते हैं।
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतस: |
यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते || 23||
वे सांसारिक मोह से मुक्त हो जाते हैं और उनकी बुद्धि दिव्य ज्ञान में स्थित हो जाती है क्योंकि वे अपने सभी कर्म यज्ञ के रूप में भगवान के लिए सम्पन्न करते हैं और इसलिए वे कर्मफलों से मुक्त रहते हैं।"
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने पिछले पाँच श्लोकों का सार प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारे सभी कर्म इस बोध के कारण भगवान को समर्पित होते हैं कि आत्मा परमात्मा की नित्य दास है। चैतन्य महाप्रभु ने भी कहा है:
जीवेर स्वरूप हय कृष्णेर नित्य दास।
(चैतन्य चरितामृत मध्यलीला 20.108)
"आत्मा स्वभाविक रूप से भगवान का दास है। वे जो इस ज्ञान को विकसित कर अपने सभी कर्म भगवान को समर्पित करते हैं वे अपने कर्मों की पापमयी प्रवृत्ति से मुक्त हो जाते हैं।" ऐसी पुण्य आत्माएँ कैसी दृष्टि विकसित करती हैं? श्रीकृष्ण इसकी व्याख्या अगले श्लोक में करेंगे।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् |
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना || 24||
जो मनुष्य पूर्णतया भगवत्च्चेतना में तल्लीन रहते हैं उनका हवन ब्रह्म है, हवन सामग्री ब्रह्म है और वह पात्र जिससे आहुति डाली जाती है वह ब्रह्म है, अर्पण कार्य ब्रह्म है और यज्ञ की अग्नि भी ब्रह्म है। ऐसे मनुष्य जो प्रत्येक वस्तु को भगवान के रूप में देखते हैं वे सहजता से उसे पा लेते हैं।
वास्तव में संसार के पदार्थ भगवान की माया शक्ति से निर्मित हैं। शक्ति और शक्तिमान दोनों एक भी है और उनमें भेद भी होता है। उदाहरणार्थ प्रकाश अग्नि की शक्ति है। इसे अग्नि से पृथक् माना जाता है क्योंकि यह उससे बाहर होता है किन्तु इसे अग्नि के एक अंश के रूप में भी समझा जाना चाहिए। क्योंकि जब सूर्य की किरणें खिड़की से हमारे कमरे में आती हैं तब लोग कहते हैं कि 'सूर्योदय हो गया।' यहाँ पर लोग सूर्य की किरणों को सूर्य के साथ जोड़ कर देखते हैं। शक्ति और शक्तिमान का एक-दूसरे से भेद होता है किन्तु फिर भी शक्ति उसका अंश होती है। आत्मा भगवान की शक्ति है। इस आध्यात्मिक शक्ति को जीव शक्ति कहा गया है। श्रीकृष्ण ने इसकी व्याख्या सातवें अध्याय के चौथे और पाँचवे श्लोक में की है। चैतन्य महाप्रभु ने कहा है:
जीवतत्त्व-शक्ति, कृष्णतत्त्व-शक्तिमान् ।
गीता-विष्णुपुराणादि ताहाते प्रमाण।।
(चैतन्य चरितामृत, आदि लीला-7.117)
"भगवान श्रीकृष्ण शक्तिमान हैं और आत्मा उनकी शक्ति है। इसका वर्णन भगवद्गीता और विष्णु पुराण में किया गया है।" इस प्रकार आत्मा और भगवान एक भी है और इनमें भेद भी है किंतु जिन मनुष्यों का मन भगवत्च्चेतना में लीन रहता है वे समस्त संसार को भगवान के साथ एकाकार हुए देखते हैं न कि उससे पृथक् रूप में। श्रीमद्भागवतम् में निम्न प्रकार से वर्णन किया गया है:
सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.2.45)
"जो मनुष्य सर्वत्र और सब मनुष्यों में भगवान को देखता है वह परम आध्यात्मवादी है" ऐसे उन्नत आध्यात्मवादी जिनका मन पूर्णतया भगवत् चेतना में तल्लीन होता है, वे यज्ञ के अनुष्ठान, यज्ञ के उद्देश्य, यज्ञ की सामग्री, यज्ञ की अग्नि और यज्ञ के कर्मकाण्ड सबको भगवान से अभिन्न समझते हैं। किस भावना से यज्ञ सम्पन्न किए जाने चाहिए? इसकी व्याख्या करने के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण अब लोगों द्वारा इस संसार में शुद्धिकरण के लिए संपन्न किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के यज्ञों का उल्लेख करेंगे।
दैवमेवापरे यज्ञं योगिन: पर्युपासते |
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति || 25||
कुछ योगी सांसारिक पदार्थों की आहुति देते हुए यज्ञ द्वारा देवताओं की पूजा करते हैं। अन्य लोग जो वास्तव में आराधना करते हैं वे परम सत्य ब्रह्मरूपी अग्नि में आत्माहुति देते हैं।
यज्ञ दिव्य चेतना से युक्त होकर भगवान को अर्पण की भावना से सम्पन्न करना चाहिए। किन्तु लोगों की मति में विविधता पायी जाती है। इसलिए वे सभा भिन्न-भिन्न प्रकार की चेतना के साथ यज्ञ करते हैं। अल्प ज्ञानी और भौतिक पदार्थों की लालसा करने वाले लोग स्वर्ग के देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करते हैं। अन्य प्रकार के मनुष्य यज्ञ के प्रयोजन को गहनता से समझते हुए यज्ञ में परमात्मा को आत्मतत्त्व की आहुति देते हैं। इसे आत्मसमर्पण या आत्माहुति या अपनी आत्मा भगवान को समर्पित कर देना कहा गया है। योगी श्रीकृष्ण प्रेम ने इसे अत्यंत सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है-"इस क्षण भंगुर संसार में जब कोई योगी दिव्य प्रेम की ज्वाला में आत्महुति डालता है तब वहाँ एक विस्फोट होता है जो कि भगवान की कृपा है क्योंकि सच्ची आत्माहुति कभी व्यर्थ नहीं जाती" लेकिन यज्ञ में किसी के लिए आत्म आहुति देने की प्रक्रिया क्या है? ऐसा केवल भगवान की पूर्ण शरणागति प्राप्त कर लेने पर ही होता है। ऐसी शरणागति के छः रूप होते हैं जिनकी व्याख्या अठारहवें अध्याय के 66वें श्लोक में की गयी है। यहाँ श्रीकृष्ण लोगों द्वारा किये जाने वाले विभिन्न प्रकार के यज्ञों की व्याख्या कर रहे हैं।
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति |
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति || 26||
कुछ योगीजन श्रवणादि क्रियाओं और अन्य इन्द्रियों को संयमरूपी यज्ञ की अग्नि में स्वाहा कर देते हैं और जबकि कुछ अन्य शब्दादि क्रियाओं और इन्द्रियों के अन्य विषयों को इन्द्रियों के अग्निरूपी यज्ञ में भेंट चढ़ा देते हैं।
अग्नि में जो भी पदार्थ डाला जाए वह उसका रूप परिवर्तित कर उसे अपना रूप दे देती है। बाह्य वैदिक यज्ञ के अनुष्ठानों में यज्ञ कुण्ड में डाली गयी आहूतियाँ भौतिक रूप में भस्म हो जाती हैं। आध्यात्मिकता के आंतरिक अभ्यास में अग्नि एक प्रतीकात्मक चिह्न है। आत्म संयम की अग्नि इन्द्रियों की कामनाओं को भस्म कर देती है।इस श्लोक में श्रीकृष्ण आत्मिक उत्थान की दो विरोधी पद्धतियों के बीच के अन्तर को स्पष्ट कर रहे हैं। इन दोनों में एक मार्ग इन्द्रियों का दमन करने से संबंधित है जिसका अभ्यास हठ योग में किया जाता है। इस प्रकार के यज्ञ में केवल शरीर के रख-रखाव को छोड़कर इन्द्रियों की समस्त क्रियाओं को स्थगित कर दिया जाता है और आत्मबल से मन को इन्द्रियों से पूर्णतया हटाकर अंतर्मुखी बनाया जाता है।
इसके विपरीत भक्ति योग का अभ्यास है। इस में इन्द्रियाँ सृष्टि में व्याप्त प्रत्येक अणु में उसके स्रष्टा भगवान की महिमा का अवलोकन करती हैं। इन्द्रियाँ लौकिक सुखों का साधन नहीं बनती अपितु इसके विपरीत वे परिष्कृत होकर सभी में भगवान की अनुभूति करती हैं। सातवें अध्याय के आठवें श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं, "रसो अहमत्सु कौन्तेय" अर्थात् 'हे अर्जुन!' मुझे जल के साररूप स्वाद के रूप में जानो। तदानुसार भक्ति मार्ग का अनुसरण करने वाले योगी अपनी समस्त इन्द्रियों द्वारा जो भी देखते, सुनते, आस्वादन करते तथा सूंघते हैं उन सब में वे भगवान को देखने का अभ्यास करते हैं। भक्ति का मार्ग हठयोग के मार्ग से सरल है और इसका अनुसरण करना आनन्ददायक है तथा इस मार्ग में पतन होने का जोखिम भी कम है। यदि कोई साइकिल चला रहा है और जब वह उसे ब्रेक लगाकर रोकता है तब वह अपना संतुलन खो देता है। यदि साइकिल चलाने वाला केवल हैंडल को दायें बायें घुमाता है तब आगे की दिशा में जा रही साइकिल सुगमता से रुक जाती है और साइकिल सवार संतुलन भी नहीं खोता।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे |
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते || 27||
दिव्य ज्ञान से प्रेरित होकर कुछ योगी संयमित मन की अग्नि में अपनी समस्त इन्द्रियों की क्रियाओं और प्राण शक्ति को भस्म कर देते हैं।
कुछ योगी ज्ञानयोग के मार्ग का अनुसरण करते हैं और ज्ञान की सहायता से अपनी इन्द्रियों को संसार से विरक्त कर लेते हैं। जबकि हठयोगी दृढ़ इच्छाशक्ति से इन्द्रियों को नियंत्रित करते हैं। ज्ञानमार्गी संसार के मिथ्यात्व के गहन चिन्तन में रत रहते हैं और स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार से पृथक् मानते हैं। वे इन्द्रियों को संसार से हटाकर मन को आत्म चिन्तन में लीन कर देते हैं। यह अवधारणा धारण कर कि 'आत्मा परम सत्य परमेश्वर के समान है' उनका लक्ष्य व्यावहारिक दृष्टि से इस प्रकार के आत्मज्ञान में स्थिर होने का होता है। सहायतार्थ वे इन मत्तों का उच्चारण करते हैं 'तत्त्वमसि' अर्थात् 'मैं वही हूँ' (छान्दोग्योपनिषद-6.8.7) और 'अहम् ब्रह्मास्मि' अर्थात् 'मैं परम सत्ता हूँ' (वृहदारण्यकोपनिषद-1.4.10)।
ज्ञानयोग के मार्ग का अनुसरण करना अत्यंत कठिन है जिसके लिए दृढ़ निश्चय और बुद्धि कौशल आवश्यक होता है।श्रीमद्भागवतम्-11.20.7 में वर्णन है-'निर्विण्णानां ज्ञानयोगो' ज्ञानयोग के अभ्यास में सफलता केवल उन मनुष्यों के लिए संभव है जो वैराग्य की उन्नत अवस्था प्राप्त कर चुके होते हैं
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे |
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतय: संशितव्रता: || 28||
कुछ लोग यज्ञ के रूप में अपनी सम्पत्ति को अर्पित करते हैं। कुछ अन्य लोग यज्ञ के रूप में कठोर तपस्या करते हैं और कुछ योग यज्ञ के रूप में अष्टांग योग का अभ्यास करते हैं और जबकि अन्य लोग यज्ञ के रूप में वैदिक ग्रंथों का अध्ययन और ज्ञान पोषित करते हैं जबकि कुछ कठोर प्रतिज्ञाएँ करते हैं।
सभी मनुष्य अपनी-अपनी प्रकृति, प्रेरणा, कर्मों, व्यवसाय, अभिलाषाओं और संस्कारों अर्थात् पूर्व जन्म की प्रवृत्ति के अनुसार एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बोध कराना चाहते हैं कि यज्ञ करने के सैकड़ों रूप हो सकते हैं किन्तु जब सभी प्रकार के यज्ञ भगवान को समर्पित करने के प्रयोजन से किए जाते हैं तब वे मन के शुद्धिकरण और आत्मा के उत्थान का साधन बन जाते हैं। इस श्लोक में उन्होंने तीन प्रकार के यज्ञों के अनुष्ठान का उल्लेख किया है-
द्रव्य यज्ञः इस संसार में कुछ लोगों की धन सम्पदा अर्जित करने में रुचि होती है और वे परमार्थ के प्रयोजन से दान पुण्य करते हैं। ऐसे लोग जटिल व्यवसाय और उद्यमों में संलग्न रहते हैं लेकिन उनका आंतरिक उद्देश्य अपने द्वारा अर्जित धन को भगवान की सेवा में अर्पित करना होता है। इस प्रकार से उनकी अभिलाषा भगवान की सेवा के लिए धन अर्जित करने की होती है। जॉन वेस्ली एक ब्रिटिश उपदेशक और मेथोडिस्ट चर्च के संस्थापक थे। उन्होंने अनुयायियों को यह उपदेश दिया-"जितना धन अर्जित कर सकते हो, करो, जितना बचा सकते हो, बचाओ और जितना दान दे सकते हो, दो।"
योग यज्ञः भारतीय दर्शन में योग दर्शन छः दर्शन शास्त्रों में से एक है। जैमिनि ऋषि ने 'मीमांसा दर्शन', वेदव्यास ने, 'वेदान्त दर्शन', गौतम ऋषि ने 'न्याय दर्शन' कणाद ऋषि ने वैशेषिक दर्शन और कपिल मुनि ने 'सांख्य दर्शन' का प्रवर्तन किया। पतंजलि ऋषि ने योग सूत्र की रचना की। योग दर्शन में पतंजलि ने आध्यात्मिक उन्नति के लिए योग के आठ अंगों का वर्णन किया जिसे अष्टांग योग कहा जाता है। यह पद्धति शारीरिक क्रियाओं से प्रारम्भ होकर मन पर विजय पाने के पर समाप्त होती है। कुछ लोग इस मार्ग को आकर्षक मानते हुए यज्ञ के रूप में इसका अभ्यास करते हैं। पतंजलि योग दर्शन में स्पष्ट वर्णित है-
समाधिासिद्धिरीश्वर प्रणिधानात्।। (पतंजलि योग दर्शन-2.45)
"योग में पूर्णता प्राप्त करने के लिए तुम्हें भगवान के शरणागत होना होगा" इसलिए जब मनुष्यों में भगवान से प्रेम करना सीखने के लिए अष्टांग योग में रुचि उत्पन्न होती है तब वे अपनी यौगिक क्रियाओं को यज्ञ रूपा भक्ति की अग्नि में आहुति देते हैं। इस यौगिक पद्धति का सुन्दर उदाहरण 'जगद्गुरु कृपालु योग' में मिलता है जिसमें अष्टांग योग की शारीरिक मुद्राओं का अभ्यास भगवान के यज्ञ के रूप में उनके दिव्य नामों के उच्चारण के साथ किया जाता है। इस प्रकार के अभ्यास के परिणामस्वरूप योगाभ्यास करने वाले की शारीरिक, मानसिक और आत्म शुद्धि होती है।
ज्ञान यज्ञः कुछ लोगों की रुचि ज्ञान का संवर्धन करने में होती है। ऐसी प्रवृत्ति वाले लोग अपना ज्ञान बढ़ाने और भगवान का दिव्य प्रेम पाने के लिए पूर्ण तन्मयता से धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते हैं। “सा विद्या तन्मतिर्यया" (श्रीमद्भागवतम्-4.29.49) अर्थात् “वास्तविक ज्ञान वह है जो भगवान में हमारी भक्ति को बढ़ाता है।" इस प्रकार से अध्ययनशील साधक जब ज्ञान यज्ञ में संलग्न रहते हैं तब फिर बाद में वे भक्ति रस में सराबोर होकर भगवान के प्रेमपूर्ण मिलन की ओर अग्रसर होते हैं।
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे |
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा: || 29||
अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुह्वति |
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषा: || 30||
कुछ अन्य लोग भी हैं जो बाहर छोड़े जाने वाली श्वास को अन्दर भरी जाने वाली श्वास में जबकि अन्य लोग अन्दर भरी जाने वाली श्वास को बाहरी श्वास में रोककर यज्ञ के रूप में अर्पित करते हैं। कुछ प्राणायाम की कठिन क्रियाओं द्वारा भीतरी और बाहरी श्वासों को रोककर प्राणवायु को नियंत्रित कर उसमें पूरी तरह से तल्लीन हो जाते हैं। कुछ योगी जन अल्प भोजन कर श्वासों को यज्ञ के रूप में प्राण शक्ति में अर्पित कर देते हैं। सब प्रकार के यज्ञों को संपन्न करने के परिणामस्वरूप साधक स्वयं को शुद्ध करते हैं।
कुछ लोग प्राणायाम के अभ्यास की ओर आकर्षित होते हैं जिसका सरल शब्दों में अर्थ 'प्राणों पर नियंत्रण है' इसमें निम्न क्रियाएँ सम्मिलित है-
पूरकः यह फेफड़ों में श्वास भरने की प्रक्रिया है।
रेचकः श्वास बाहर छोड़ते हुए फेफड़ों को खाली करने की प्रक्रिया।
अन्तर कुम्भकः फेफड़ों में श्वास भरने के पश्चात् उसे भीतर रोकना। इसमें बाहर छोड़ी जाने वाली श्वास को भीतर की श्वास में निरोधावस्था के दौरान पूर्णतया रोक दिया जाता है।
बाह्य कुम्भकः श्वास बाहर छोड़ते हुए फेफड़ों को खाली करना। इसमें अन्दर भरी जाने वाली श्वास को बाहर छोड़ी जाने वाली श्वास में स्थगित अवधि के दौरान पूर्णतया रोक दिया जाता है।
दोनों कुम्भक क्रियाएँ जटिल हैं और इनका अभ्यास योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में करना चाहिए अन्यथा शरीर को क्षति पहुंच सकती है। प्राणायाम का अभ्यास करने वाले योगी श्वासों को नियंत्रित करने की प्रक्रिया का प्रयोग इन्द्रियों पर अंकुश लगाने और मन को स्थिर करने के लिए करते हैं। फिर वे अपने संयमित मन को यज्ञ की आहुति के रूप में भगवान को अर्पित कर देते हैं।
प्राण वास्तव में श्वास नहीं है। यह सूक्ष्म जीवनदायिनी शक्ति है जो कि विभिन्न चेतन व अचेतन पदार्थों में व्याप्त होती है। वैदिक ग्रंथों में पाँच प्रकार के प्राणों का वर्णन किया गया है-प्राण, पान, व्यान, समान और उदान जो विभिन्न प्रकार से भौतिक शरीर के कार्यों के संचालन में सहायता करते हैं। इनमें से समान शरीर की पाचन क्रिया के कार्य को निभाता है। कुछ लोगों में उपवास रखने की प्रवृत्ति भी होती है। कुछ लोग यह जानकर कि आहार का सबके चरित्र और स्वभाव पर प्रभाव पड़ता है अल्प मात्रा में भोजन करने लगते हैं। ऐसे उपवास भारत में प्राचीनकाल से किए जा रहे हैं और यहाँ इन्हें यज्ञ के रूप में स्वीकार किया गया है। जब कम मात्रा में आहार का सेवन किया जाता है तब इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं और 'समान' जो पाचन शक्ति के लिए उत्तरदायी होता है, स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है। इस प्रकार से यह कुछ लोगों द्वारा किये जाने वाले यज्ञों के स्वरूप हैं। लोग मन की शुद्धि के लिए विभिन्न प्रकार के ऐसे कठोर तप करते हैं। यह इन्द्रियों और मन के तुष्टिकरण की अभिलाषा है जो अन्त:करण को अशुद्ध करती है। इन सभी कठोर तपस्याओं का उद्देश्य इन्द्रियों और मन की सांसारिक पदार्थों से सुख पाने की स्वभाविक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना होता है। जब ये तपस्याएँ भगवान के समर्पण के रूप में की जाती है तब इसके परिणामस्वरूप अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। पहले किए गए उल्लेखानुसार अन्त:करण शब्द का प्रयोग प्रायः मन और बुद्धि के लिए किया जाता है।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् |
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्य: कुरुसत्तम || 31||
इन यज्ञों का रहस्य जानने वाले और इनका अनुष्ठान करने वाले, इन यज्ञों के अमृततुल्य अवशिष्टांश का आस्वादन कर परम सत्य की ओर बढ़ते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ! जो लोग यज्ञ नहीं करते, वे न तो इस संसार में और न ही अगले जन्म में सुखी रह सकते हैं।
जैसा पहले उल्लेख किया गया है, यज्ञों का अनुष्ठान भगवान को प्रसन्न करने के लिए किया जाना चाहिए और इनसे प्राप्त होने वाले अवशेषों को उनका प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए। उदाहरणार्थ भगवान के भक्तगण भगवान को भोग लगाने के पश्चात् भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन पकाने के पश्चात् उसे भगवान की प्रतिमा के सामने रखकर भगवान को इसे स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं। अपने मन में यह भावना धारण कर कि भगवान उनकी थाली से भोजन ग्रहण कर रहे हैं फिर वे उस थाली के अवशेषों को प्रसाद या भगवान की कृपा के रूप में सेवन करते हैं। इस प्रसाद रूपी अमृत का आस्वादन करने से ज्ञान की प्राप्ति, मन की शुद्धि और आत्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
इसी तरह कुछ भक्त भगवान को वस्त्र अर्पित करने के पश्चात् उन्हें उनका प्रसाद मानकर उसे पहनते हैं। वे अपने घर में भगवान की मूर्ति स्थापित करते हैं और इस मनोभावना के साथ घर में निवास करते हैं कि उनका घर भगवान का मन्दिर है। जब सभी पदार्थ और कार्य भगवान को अर्पित किए जाते हैं तब उनके अवशेष या प्रसाद जीवात्मा के लिए अमृत रूपी वरदान बन जाते हैं।
परम भक्त उद्धव ने श्रीकृष्ण से कहा था
त्वयोपभुक्तस्रग्गन्धवासोऽलङ्कारचर्चिताः।
उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेमहि ।
(श्रीमद्भागवतम्-11.6.46)
"मैं केवल वही खाऊँगा, सूचूंगा, पहनँगा, वहीं रहँगा और वही करूँगा जो पहले आपको अर्पित किया गया हो। इस प्रकार अवशेषों को आपका प्रसाद मानकर उनका सेवन कर मैं माया पर सुगमता से विजय प्राप्त कर लूंगा।" वे लोग जो यज्ञ नहीं करते, वे कर्मों के प्रतिफल से बंध जाते हैं और निरन्तर माया द्वारा प्रताड़ित होते रहते हैं।
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे |
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे || 32||
विभिन्न प्रकार के इन सभी यज्ञों का वर्णन वेदों में किया गया है और इन्हें विभिन्न कर्मों की उत्पत्ति का रूप मानो, यह ज्ञान तुम्हें माया के बंधन से मुक्त करेगा।
वेदों की एक सुन्दर विशेषता यह है कि वे मनुष्यों की विभिन्न प्रकार की प्रवृत्तियों से परिचित हैं और उसी के अनुसार उनके पालन की व्यवस्था करते हैं। इसलिए विभिन्न प्रकार की रुचि रखने वाले साधकों के लिए वेदों में विभिन्न प्रकार के यज्ञों और उनका अनुष्ठान करने की विधियों का वर्णन किया गया है। इनमें निहित सामान्य सिद्धान्त यह है कि यज्ञ का अनुपालन भक्ति के साथ भगवान को अर्पण के रूप में किया जाना चाहिए। इस ज्ञान द्वारा किसी को वेदों में वर्णित विविध उपदेशों के कारण किंकर्तव्यमूढ़ नहीं होना चाहिए। अपनी प्रकृति के अनुकूल किसी एक विशेष यज्ञ का अनुपालन करने से मनुष्य लौकिक बंधनों से मुक्त हो सकता है।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञ: परन्तप |
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते || 33||
हे शत्रुओं के दमन कर्ता! ज्ञान युक्त होकर किया गया यज्ञ किसी प्रकार के भौतिक या द्रव्य यज्ञ से श्रेष्ठ है। हे पार्थ! अंततः सभी यज्ञों की परिणति दिव्य ज्ञान में होती है।
श्रीकृष्ण अब पहले वर्णित यज्ञों को हमारे समक्ष पुनः रख रहे हैं। वे अर्जुन को बताते हैं कि शारीरिक क्रियाओं द्वारा भगवान की भक्ति करना उत्तम है किन्तु सर्वोत्तम नहीं है। कर्मकाण्ड, उपवास, मंत्र उच्चारण, तीर्थ का दर्शन आदि सभी उत्तम कार्य हैं किन्तु अगर इनका संयोग ज्ञान के साथ नहीं किया जाता तब ये केवल शारीरिक गतिविधियों तक ही सीमित रह जाते हैं। फिर भी ये शारीरिक गतिविधियाँ कुछ न करने से तो अच्छी होती हैं, किन्तु मन को शुद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं होती। कई लोगों का यह विश्वास है कि शारीरिक रूप से सम्पन्न किए गए धार्मिक अनुष्ठान ही उन्हें माया के बंधनों से मुक्त करवाने के लिए पर्याप्त हैं इसलिए वे माला फेर कर भगवान के नाम का जाप करते हैं, एकांत में बैठकर धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हैं, तीर्थ स्थानों की यात्रा करते हैं और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। किन्तु संत कबीर ने अति वाक्पटुता से इस विचार का निम्न प्रकार से खण्डन किया है-
माला फेरत युग फिरा, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि के, मन का मनका फेर ।।
"हे आध्यात्मिक साधक तुम कई युगों से माला के मनके फेर रहे हो किन्तु तुम्हारे मन से छल कपट गया नहीं इसलिए इन माला के मनके फेरना छोड़कर मन के मनके को फेरो।" जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं-
बंधन और मोक्ष का, कारण मनहिं बखान।
याते कौनिउ भक्ति करु, करु मन ते हरिध्यान ।।
(भक्ति शतक-19)
"मन ही मोक्ष और बंधन का कारण है। तुम जिस भी रूप से भक्ति करो, किन्तु मन को भगवान के स्मरण में लगाओ।" भक्ति भावना ज्ञान के संवर्धन से पोषित होती है। उदाहरणार्थ आज आपके जन्मदिन के उपलक्ष्य में भोज का आयोजन किया गया है। लोग आपको शुभकामनाओं सहित उपहार आदि भेंट कर रहे हैं। कोई आकर आपको फटा-पुराना बैग देता है। आप इसे हेय दृष्टि से देखते हुए अन्य उपहारों के साथ उसकी तुलना करने लगते हैं, तभी वह व्यक्ति आपसे बैग के अन्दर देखने का आग्रह करता है। उसे खोलने पर आप उसमें 100 रुपये के 100 नोट पाते हैं और आप तुरन्त उस बैग को अपनी छाती से चिपटाकर कहते हैं-"मुझे यही सबसे उत्तम उपहार प्राप्त हुआ है।" पदार्थ का ज्ञान होने पर वस्तु से प्रेम हो जाता है। उसी तरह भगवान के विषय में जानना उनके साथ हमारे भक्ति की भावनाओं को पुष्ट करता है। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि ज्ञान के साथ किया गया यज्ञ द्रव्य यज्ञ से अधिक श्रेष्ठ है। अब वे ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया का उल्लेख करेंगे।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया |
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन: || 34||
आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर सत्य को जानो। विनम्र होकर उनसे ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा प्रकट करते हुए ज्ञान प्राप्त करो और उनकी सेवा करो। ऐसा सिद्ध सन्त तुम्हें दिव्य ज्ञान प्रदान कर सकता है क्योंकि वह परम सत्य की अनुभूति कर चुका होता है।
यह जानकर कि ज्ञान युक्त होकर यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि हम आध्यात्मिक ज्ञान कैसे प्राप्त करें। श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में इसका उत्तर दिया है। वे कहते हैं-(1) प्रामाणिक गुरु की शरण में जाओ, (2) विनम्रतापूर्वक उनसे ज्ञान प्राप्त करो, (3) उनकी सेवा करो। हम केवल अपने चिन्तन से परम सत्य को नहीं समझ सकते। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है-
अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम् ।
स्वतो न सम्भवादन्यस्तत्त्वज्ञो ज्ञानदो भवेत् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.22.10)
"जीवात्मा की बुद्धि अनन्तकाल से अज्ञानता से आच्छादित है। अज्ञान से ढकी होने के कारण बुद्धि केवल अपने प्रयासों से स्वयं अज्ञानता पर विजय नहीं प्राप्त कर सकती। परम सत्य को जानने के लिए सभी को श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ संत से ज्ञान प्राप्त करना पड़ता है जो परम सत्य को जानता है।" वैदिक ग्रंथों में बार-बार आध्यात्मिक पथ पर चलने के लिए गुरु के महत्व का वर्णन किया गया है।
आचार्यवान् पुरुषो वेदः। (छान्दोग्योपनिषद्-6.14.2)
"केवल गुरु के माध्यम से ही तुम वेदों का ज्ञान प्राप्त कर सकते हो" पंचदशी में वर्णन हैं
तत्पादाम्बुरु हद्वन्द्व सेवा-निर्मल-चेतसाम्।
सुखबोधाय तत्त्वस्य विवेकोऽयं विधीयते ।। (पंचदशी-1.2)
"शुद्ध हृदय से गुरु की सेवा करो और अपने संदेहों का निवारण करो। तब तुम्हें वह परम आनन्द प्रदान करते हुए शास्त्रों का ज्ञान देगा।" जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने भी कहा है: “यावत् गुरुर्न कर्तव्यो तावन्मुक्तिर्न लभ्यते" अर्थात् “जब तक तुम गुरु की शरणागति प्राप्त नहीं करोगे तब तक तुम माया शक्ति से मुक्त नहीं हो सकते।"
भगवान की एक कृपा यह है कि वे जीवात्मा का सच्चे संत से मेल कराते हैं। लेकिन एक गुरु द्वारा शिष्य को आध्यात्मिक ज्ञान देने की प्रक्रिया लौकिक ज्ञान प्रदान करने से अत्यंत भिन्न होती है। लौकिक शिक्षा पाने के लिए गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा रखना आवश्यक नहीं होता। ऐसे ज्ञान की प्राप्ति शिक्षकों को शिक्षा शुल्क देकर ली जा सकती है। जबकि अध्यात्मिक शिक्षा इरन पद्धति द्वारा शिष्य को प्रदान नहीं की जा सकती और न ही इसे मूल्य चुका कर लिया जा सकता है। यह ज्ञान गुरु की कृपा से शिष्य के अंतःकरण में तब प्रकट होता है जब शिष्य में दीनता का भाव विकसित होता है और जब गुरु शिष्य के सेवा भाव से प्रसन्न होता है। इसी कारण से प्रह्लाद महाराज ने कहा-
नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाघ्रिं स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः।
महीयसां पादरजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानांन वृणीत यावत् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-7.5.32)
"जब तक हम भगवान के प्रेमी संतों के चरणों की धूल में स्नान नहीं कर लेते तब तक हमें लोकातीत विषयों का ज्ञान नहीं हो सकता" इसलिए इस श्लोक में श्रीकृष्ण श्रद्धा युक्त होकर गुरु की शरण में जाने और उनसे परम सत्य जानने की जिज्ञासा प्रकट कर दीन भाव से उनकी सेवा करने और उन्हें प्रसन्न करने की अनिवार्यता का उल्लेख कर रहे हैं।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव |
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि || 35||
इस मार्ग का अनुसरण कर और गुरु से ज्ञान को प्राप्त करने पर, हे अर्जुन! तुम कभी मोह में नहीं पड़ोगे क्योंकि इस ज्ञान के प्रकाश में तुम यह देख सकोगे कि सभी जीव परमात्मा के अंश हैं और वे सब मुझमें स्थित हैं।
जिस प्रकार अंधकार सूर्य को छिपा नहीं सकता ठीक उसी प्रकार से वे जीवात्माएँ जो एक बार ज्ञानोदय की अवस्था प्राप्त कर लेती हैं उन पर मोह फिर कभी हावी नहीं हो सकता। “तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः" अर्थात् “वे जो भगवत्प्राप्ति कर चुके हैं, सदैव भगवच्चेतना में लीन रहते हैं।" माया के कारण हम संसार को भगवान से भिन्न देखते हैं और यह देखते हुए कि क्या अन्य लोग हमें सुख देते हैं या हमें क्षति पहुंचाते हैं, इसी आधार पर हम अन्य लोगों के साथ मित्रता या शत्रुता रखते हैं। भगवत्प्राप्ति के बाद प्राप्त होने वाला दिव्यज्ञान संसार के प्रति हमारे विचार को परिवर्तित कर देता है। इस अवस्था को प्राप्त संत संसार को भगवान की शक्ति के रूप में देखते हैं और उन्हें जो प्राप्त होता है उसका उपयोग वे भगवान की सेवा के लिए करते हैं। वे समस्त जीवों को भगवान के अंश के रूप में देखते हैं और सबके प्रति दिव्य मनोभावना रखते हैं। इसलिए राम भक्त हनुमान कहते हैं-
सिया राममय सब जग जानी।
करउँ प्रणाम जोरि जुग पानी।।
(रामचरितमानस)
"मैं सब प्राणियों में भगवान राम और सीता का रूप देखता हूँ और इसलिए मैं दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम करते हुए सबका आदर करता हूँ।
अपि चेदसि पापेभ्य: सर्वेभ्य: पापकृत्तम: |
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि || 36||
जिन्हें समस्त पापियों में महापापी समझा जाता है, वे भी दिव्यज्ञान की नौका में बैठकर संसार रूपी सागर को पार करने में समर्थ हो सकते हैं।
मायाबद्ध संसार गहरे समुद्र की भांति है जिसमें मनुष्य जन्म, रोग, बुढ़ापा और मृत्युरूपी लहरों द्वारा इधर-उधर हचकोले खाता रहता है। माया शक्ति के कारण सभी को तीन प्रकार के दुख सहने पड़ते हैं-
1. आध्यात्मिक दुःख मनुष्य के अपने शारीरिक और मानसिक कष्ट, 2. आधिभौतिक दुःख अन्य लोगों द्वारा दिए जाने वाले दुःख और कष्ट, 3. आधिदैविक दुःख प्राकृतिक आपदाओं के कारण उत्पन्न दुःख। माया के बंधनों में आत्मा को कभी विश्राम नहीं मिलता और ऐसी दुःखद अवस्था में रहते हुए हमारे अनन्त जन्म व्यतीत हो चुके हैं। खेल के मैदान में ठोकर खाकर लुढ़कती हुई फुटबॉल की भांति आत्मा अपने पाप और पुण्य कर्मों के अनुसार कभी स्वर्ग लोक में जाती है और फिर नरक के निम्न लोकों में भेजी जाती है और पुनः पृथ्वी पर लौट आती है। दिव्य ज्ञान मायारूपी सागर को पार करने के लिए नौका प्रदान करता है। अज्ञानी लोग कर्म करते हैं और कर्म बंधन में फंस जाते हैं। जब इन्हीं कर्मों का सम्पादन भगवान के प्रति यज्ञ के रूप में किया जाता है तब यह ज्ञानियों को बंधन मुक्त कर देता है। इस प्रकार का ज्ञान सांसारिक बंधन को काटने का साधन बन जाता है। कठोपनिषद् में वर्णन है-
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः।
सोऽध्वनः परमाप्नेती ति तद्विष्णोः परमं पदम्।।
(कठोपनिषद्-1.3.9)
"दिव्य ज्ञान के द्वारा अपनी बुद्धि को प्रकाशित करो और फिर प्रकाशित बुद्धि द्वारा अनियंत्रित मन को वश में करके संसार रूपी महासागर को पार करो और भगवान के धाम में प्रवेश करो।"
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन |
ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा || 37||
जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि लकड़ी को स्वाहा कर देती है उसी प्रकार से हे अर्जुन! ज्ञान रूपी अग्नि भौतिक कर्मों से प्राप्त होने वाले समस्त फलों को भस्म कर देती है।
अग्नि की छोटी-सी चिंगारी भी भयंकर आग का रूप धारण कर वस्तुओं के बड़े ढेर को जला देती है। 1666 ई. में लंदन में लगी भीषण आग एक बेकरी से आई छोटी-सी चिंगारी से भड़की थी और उसकी चपेट में आकर 13,200 मकान, 87 चर्च और कई कार्यालय जलकर राख हो गये थे। हम सब अनंत जन्मों के संचित कर्मों की गठरी को अपने साथ उठाए रहते हैं। यदि हम कर्मों के फलों को भोगकर इन्हें समाप्त करने का प्रयास करते हैं तब इसमें कई जन्मों का समय लगेगा और इस दौरान हमारे और कर्मों के संचित होने की प्रक्रिया चलती रहेगी लेकिन श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि ज्ञान में वह शक्ति होती है कि वह इस जन्म में ही हमारे संचित कर्मों की गठरी को भस्म कर सकता है क्योंकि आत्मबोध और भगवान के साथ इसके संबंध का ज्ञान हमें भगवान की शरणागति की ओर ले जाता है। जब हम भगवान की शरणागति प्राप्त करते हैं तब वे हमारे अनंतकाल के संचित कर्मों को भस्म कर देते हैं और हमें लौकिक बंधनों से मुक्त कर देते हैं।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते |
तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति || 38||
इस संसार में दिव्यज्ञान के समान कुछ भी शुद्ध नहीं है। जो मनुष्य योग के अभ्यास द्वारा मन को शुद्ध कर लेता है वह हृदय में इस ज्ञान को प्राप्त करता है।
ज्ञान में मन को शुद्ध करने, मनुष्य को ऊपर उठाने, मुक्त करने और भगवान के साथ एकीकृत की शक्ति होती है इसलिए यह उदात्त और शुद्ध होता है किन्तु ज्ञान को दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है-सैद्धान्तिक ज्ञान और व्यवहारिक ज्ञान।
एक प्रकार का ज्ञान वह है जिसे हम धार्मिक ग्रंथों को पढ़कर और गुरु से श्रवण कर प्राप्त करते हैं। इस प्रकार का सैद्धान्तिक ज्ञान अपूर्ण होता है। यह उसी प्रकार का ज्ञान है जैसे किसी ने व्यंजन बनाने की पुस्तक का स्मरण कर लिया हो किन्तु स्वयं कभी रसोई में प्रवेश न किया हो। इस प्रकार के सैद्धान्तिक ज्ञान से भूखे की क्षुधा को शांत नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार जब कोई मनुष्य आत्मा, भगवान, माया, कर्म, ज्ञान और भक्ति से संबंधित विषयों पर गुरु से सैद्धान्तिक ज्ञान अर्जित करता है, वो केवल इस ज्ञान से किसी को भगवत्प्राप्ति नहीं होती।
जब कोई मनुष्य साधना का अभ्यास करता है तब इसके परिणामस्वरूप अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, और फिर मनुष्य आत्मा की प्रकृति और भगवान के साथ इसके संबंध की अनुभूति करता है।
ऋषि पतंजलि ने इस प्रकार से कहा है-
श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ।।
(योग दर्शन-1.49)
"भक्ति योग के अभ्यास द्वारा आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना धार्मिक ग्रंथों के सैद्धान्तिक ज्ञान से श्रेष्ठ है।" ऐसे अनुभूत ज्ञान की श्रीकृष्ण ने प्रशंसा की है।
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: |
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || 39||
वे जिनकी श्रद्धा अगाध है और जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है, वे दिव्य ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। इस दिव्य ज्ञान के द्वारा वे शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त कर लेते हैं।
श्रीकृष्ण अब श्रद्धा के स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। सभी आध्यात्मिक सत्यों का शीघ्र अनुभव नहीं किया जा सकता। इनमें से कुछ को इस मार्ग में अत्यधिक रूप से उन्नत होने पर अनुभव किया जा सकता है। यदि हम केवल उसे स्वीकार करते हैं जिसे हम वर्तमान में परख और समझ सकते हैं तब हम उच्चतम आध्यात्मिक रहस्यों से वंचित हो जाएंगे। जिसे हम वर्तमान में समझ नहीं पा रहे हैं उसे समझने और स्वीकार करने में श्रद्धा हमारी सहायता करती है। जगद्गुरु शंकराचार्य ने श्रद्धा की परिभाषा इस प्रकार से की है-
गुरु वेदान्त वाक्येषु दृढो विश्वासः श्रद्धा।
"श्रद्धा का अर्थ गुरु और शास्त्रों के शब्दों में दृढ़ विश्वास होना है।" यदि ऐसी श्रद्धा किसी ढोंगी व्यक्ति पर रखी जाती है तब इसके विध्वंसात्मक परिणाम होते हैं। जब यह वास्तविक गुरु में होती है तब इससे आत्मकल्याण का मार्ग खुलता है। किन्तु इसके लिए अंध विश्वास वांछनीय नहीं है। हरि-गुरु के प्रति श्रद्धा रखने से पूर्व हमें अपनी बुद्धि का प्रयोग कर यह पुष्टि करनी चाहिए कि हमारे गुरु ने परम सत्य का अनुभव किया है या नहीं और क्या वह वैदिक ग्रंथों का ज्ञान रखते हैं? एक बार जब इसकी पुष्टि हो जाये तब हमें ऐसे गुरु के प्रति शरणागत हो जाना चाहिए और उसके मार्गदर्शन में भगवान की भक्ति करना चाहिए। श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णित है-
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.23)
"वैदिक ज्ञान का प्रकाश उन्हीं मनुष्यों के हृदय में प्रकट होता है जिनकी भगवान और गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा होती है।"
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति |
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन: || 40||
किन्त जिन अज्ञानी लोगों में न तो श्रद्धा और न ही ज्ञान है और जो संदेहास्पद प्रकृति के होते हैं उनका पतन होता है। संशययुक्त जीवात्मा के लिए न तो इस लोक में और न ही परलोक में सुख है।
भक्ति रसामृत सिंधु में साधकों को उनकी श्रद्धा और ज्ञान की योग्यता के आधार पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।
शास्त्र-युक्तौ च निपुण:सर्वथा दृढनिश्चयः।
प्रौढश्रद्धोऽधिकारी यःस भक्तावुत्तमो मतः।।
यः शास्त्रादिष्वपुणः श्रद्धावान् स तु मध्यमः।।
यो भवेत् कोमलश्रद्धः स कनिष्ठो निगद्यते।।
(भक्ति रसामृत सिंधु-1.2.17.19)
"उच्चतम श्रेणी का साधक वह होता है जिसे शास्त्रयुक्ति में निपुणता और जो पूर्ण श्रद्धायुक्त होता है। मध्यम श्रेणी का साधक वह है जिसे धार्मिक ग्रंथों का ज्ञान नहीं होता किन्तु वह भगवान और गुरु के प्रति श्रद्धायुक्त होता है। निम्न श्रेणी का साधक न तो धार्मिक ग्रंथों के ज्ञान से सम्पन्न होता है और न ही उसमें श्रद्धा भावना होती है।" इस तीसरी श्रेणी के साधक के लिए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे साधक को न तो इस जन्म में और न ही अगले जन्मों में शांति प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त सांसारिक कार्यों में भी विश्वास परम आवश्यक है।
उदाहरणार्थ अगर कोई महिला रेस्टोरेन्ट में जाती है और खाने का आर्डर देती है तो उसे यह विश्वास होता है कि रेस्टोरेंट के कर्मचारी उसके भोजन में विष नहीं मिलाएंगे। फिर भी वह यदि संदेहयुक्त होकर सभी खाद्य पदार्थों की जांच करवाने लगे, तो क्या वह भोजन का आनन्द ले सकती है? इसी प्रकार जब कोई व्यक्ति नाई की दुकान में कुर्सी पर बैठता है और जब नाई तेज धार वाले उस्तरे को उसके गले पर रखता है तब ऐसे में यदि वह व्यक्ति यह संदेह करने लगे कि कहीं यह नाई मेरी हत्या तो नहीं करना चाहता तब ऐसी स्थिति में वह नाई की दुकान में सहजतापूर्वक बैठकर नाई को शेव नहीं करने देगा। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि संदेही व्यक्ति को न तो इस संसार में और न ही परलोक में सुख मिल सकता है।
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् |
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय || 41||
हे अर्जुन! जिन्होंने योग की अग्नि में कर्मों को विनष्ट कर दिया है और ज्ञान द्वारा जिनके समस्त संशय दूर हो चुके हैं। कर्म उन लोगों को बंधन में नहीं डाल सकते। वे वास्तव में आत्मज्ञान में स्थित हो जाते हैं।
'कर्म' का अर्थ विधि-विधान और सामाजिक दायित्वों का पालन करने संबंधी क्रियाएँ हैं। 'संन्यास' का अर्थ 'परित्याग' है, जबकि 'योग' का अर्थ 'भगवान में एकीकृत' होना है। यहाँ श्रीकृष्ण ने 'योगसंन्यस्तकर्माणं ' शब्द का प्रयोग उन मनुष्यों के लिए किया है जो सभी वैदिक कर्मों का परित्याग कर देते हैं और अपने शरीर, मन और आत्मा को भगवान की भक्ति में लीन कर देते हैं। ऐसे महापुरुष अपना प्रत्येक कार्य भगवान की सेवा के लिए करते हैं।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि समर्पण की भावना से किए गए उनके कार्य उन्हें माया के बंधन में नहीं बाँधते। केवल वे लोग कर्म के बंधनों में फंसते हैं जो अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति हेतु कार्य करते हैं। जब भगवान के सुख के लिए कार्य किया जाता है तो ऐसे सभी कर्म प्रतिफलों से रहित हो जाते हैं। वे शून्य में अन्य संख्या को गुणा करने के समान होते हैं। यदि हम शून्य को 10 से गुणा करते हैं तो इसका परिणाम शून्य ही होगा। शून्य को 1000 से गुणा करने का परिणाम भी शून्य होता है और शून्य को 100000 से गुणा करने पर भी परिणाम वही शून्य ही रहता है। समान रूप से महापुरुषों द्वारा संसार में किए गए कार्य उन्हें बंधन में नहीं डालते, क्योंकि उन कर्मों को भगवान को अर्पित कर दिया जाता है अर्थात् इनका सम्पादन भगवान के सुख के लिए किया जाता है। इस प्रकार से सभी प्रकार के लौकिक कर्म करते हुए संत महात्मा कर्मफलों के बंधनों से मुक्त रहते हैं।
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मन: |
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत || 42||
अतः तुम्हारे हृदय में अज्ञानतावश जो संदेह उत्पन्न हुए हैं उन्हें ज्ञानरूपी शस्त्र से काट दो। हे भरतवंशी अर्जुन! स्वयं को योग में निष्ठ करो। उठो खड़े हो जाओ और युद्ध करो।
यहाँ हृदय शब्द का अर्थ वक्षस्थल में स्थित शारीरिक अवयव से नहीं है जो शरीर में रक्त को संचारित करता है। वेदों में उल्लेख है कि हमारे सिर में एक भौतिक मस्तिष्क होता है किन्तु हमारा सूक्ष्म मन हृदय के क्षेत्र में रहता है। इसी कारण से ही प्रेम और घृणा की अनुभूति होने पर हमें हृदय में आनन्द और पीड़ा का अनुभव होता है। इस प्रकार से हृदय करुणा, प्रेम सहानुभूति आदि सभी शुभ भावों का स्रोत है। इसलिए जब श्रीकृष्ण यह उल्लेख करते हैं कि हृदय में जो संदेह उत्पन्न हुए हैं तब इसका तात्पर्य मन में संदेह उत्पन्न होने से है क्योंकि मन ही वह सूक्ष्म यंत्र है जो हृदय स्थल पर स्थित रहता है। अर्जुन के आध्यात्मिक गुरु होने की भूमिका का निर्वहन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण अपने शिष्य अर्जुन को अवगत कराते हैं कि कर्मयोग के अभ्यास द्वारा कैसे अन्तर्दृष्टि प्राप्त की जा सकती है। वे अर्जुन को उपदेश देते हैं कि वह अपनी बुद्धि और श्रद्धा दोनों का प्रयोग अपने मन के संदेह को हटाने के लिए करे। तत्पश्चात् वे उसे कर्म करने का आह्वान करते हैं और उसे उठ खड़े होने तथा कर्मयोग की भावना से युक्त होकर युद्ध करने के लिए कहते हैं। एक ही साथ कर्म का त्याग करने और कर्म करने के दो विरोधाभासी उपदेश अर्जुन के मन को विचलित करते हैं जिसे वह अगले अध्याय के प्रारम्भ में प्रकट करता है।
।।श्रीमद्भागवत गीता चतुर्थ अध्याय सम्पूर्ण।।
Bhagavad Geeta Chapter 3
kathaShrijirasik
श्रीमद्भगवत गीता अध्याय तीन: कर्मयोग
कर्म का विज्ञान
इस अध्याय में श्रीकृष्ण यह समझाते हैं कि सभी जीव अपनी स्वाभाविक प्रकृति के गुणों के कारण कार्य करने के लिए बाध्य होते हैं और कोई भी प्राणी एक क्षण के लिए भी अकर्मा नहीं रह सकता। वे जो गेरुए वस्त्र धारण कर बाह्य रूप से वैराग्य प्रदर्शित करते हैं लेकिन आंतरिक रूप से भोगों के प्रति आसक्ति रखते हैं, वे ढोंगी हैं। जो कर्मयोग का अनुपालन करते हुए बाह्य रूप से निरन्तर कर्म करते रहते हैं लेकिन उनमें आसक्त नहीं होते, वे उनसे श्रेष्ठ हैं। इसके बाद श्रीकृष्ण इस पर बल देते हैं कि सभी जीवित प्राणियों को भगवान की सृष्टि की व्यवस्था के अभिन्न अंग के रूप में अपने दायित्वों का निर्वाहन करना पड़ता है। जब हम भगवान के प्रति सेवा भावना रखते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं तब ऐसे कर्म यज्ञ बन जाते हैं। यज्ञों का अनुष्ठान वास्तव में स्वर्ग के देवताओं को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है और वे हमें सांसारिक सुख और समृद्धि प्रदान करते हैं। ऐसे यज्ञों के कारण वर्षा होती है और वर्षा से अन्न उत्पन्न होता है जो जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक है। वे जो इस सृष्टि चक्र में अपने उत्तरदायित्व को स्वीकार नहीं करते, वे पापी हैं। वे केवल इन्द्रिय सुख प्राप्त करने के लिए जीवित रहते हैं और उनका जीवन व्यर्थ हो जाता है।
फिर आगे श्रीकृष्ण कहते हैं कि भगवत्प्राप्त महापुरुष जो आत्मज्ञान में स्थित रहते हैं, वे शारीरिक उत्तरदायित्वों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं होते क्योंकि वे आत्मा के स्तर पर अपने उच्च दायित्वों का निर्वहन कर रहे होते हैं। हालांकि वे अपने सामाजिक दायित्वों का त्याग करते हैं तो सामान्य मनुष्यों के मन में असमंजस की भावना उत्पन्न होती है जो उनके पदचिह्नों पर चलना चाहते हैं। इसलिए ज्ञानी पुरुषों को संसार के लाभार्थ उच्च आदर्श प्रस्तुत करने के लिए बिना किसी प्रयोजन और व्यक्तिगत लाभ के भी निरन्तर कर्म करना पड़ता है। यह योजना अज्ञानी को अपरिपक्व अवस्था में अपने नियत दायित्वों का त्याग करने से रोकेगी। अतीत में महान राजर्षियों जैसे कि राजा जनक और अन्य राजाओं का भी यही उद्देश्य था जिन्होंने अपने सांसारिक दायित्वों का निर्वहन किया था।
तत्पश्चात् अर्जुन पूछता है कि लोग अनिच्छा से पापपूर्ण कर्मों में प्रवृत्त क्यों होते हैं? क्या उन्हें बलपूर्वक पाप कर्मों में लगाया जाता है। परम प्रभु श्रीकृष्ण बताते हैं कि संसार का सबसे बड़ा शत्रु केवल काम-वासना है। जिस प्रकार से अग्नि धुंए से ढकी रहती है, दर्पण धूल से ढका रहता है उसी प्रकार से कामना मनुष्य के ज्ञान पर आवरण डाल देती है और उसकी बुद्धि का विनाश कर देती है। फिर श्रीकृष्ण अर्जुन से आह्वान करते हैं कि वह इस कामना रूपी शत्रु का संहार कर दें जो पाप का मूर्तरूप है और अपनी इन्द्रिय, मन और बुद्धि को वश में करे।
अर्जुन उवाच |
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन |
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव || 1||
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे |
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् || 2||
अर्जुन ने कहा! हे जनार्दन, यदि आप ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं तब फिर आप मुझे इस भीषण युद्ध में भाग लेने के लिए क्यों कहते हैं? आपके अस्पष्ट उपदेशों से मेरी बुद्धि भ्रमित हो गयी है। कृपया मुझे निश्चित रूप से कोई एक ऐसा मार्ग बताएँ जो मेरे लिए सर्वाधिक लाभदायक हो।
पहले अध्याय में उस परिवेश का परिचय दिया गया था जिसमें अर्जुन के भीतर दुःख और अवसाद उत्पन्न हुआ और जिसके कारण श्रीकृष्ण को दिव्य आध्यात्मिक उपदेश देना पड़ा। दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अविनाशी आत्मा के दिव्यज्ञान का वर्णन किया। उन्होंने तब अर्जुन को एक क्षत्रिय योद्धा के धर्म के पालन का स्मरण करवाया और कहा कि इसका पालन करने के फलस्वरूप उसकी कीर्ति बढ़ेगी और स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी। अर्जुन को एक क्षत्रिय के रूप में अपने वर्ण से संबंधित धर्म का पालन करने की प्रेरणा देने के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण ने फिर कर्मयोग के विज्ञान का सर्वोत्तम सिद्धान्त प्रकट किया और अर्जुन को कर्मफलों से विरक्त रहने का उपदेश दिया और यह कहा कि ऐसा करने से बंधन उत्पन्न करने वाले कर्म बंधनमुक्त कर्मों में परिवर्तित हो जायेंगे। उन्होंने बिना फल की इच्छा से कर्म करने के विज्ञान का नाम 'बुद्धियोग' रखा। इससे उनका अभिप्राय निश्चयात्मक बुद्धि द्वारा मन को नियंत्रित करते हुए उसे सांसारिक लालसाओं से विरक्त रखने और आध्यात्मिक ज्ञान के संवर्धन द्वारा बुद्धि को स्थिर रखने से था। उन्होंने कर्म का त्याग करने का परामर्श नहीं दिया अपितु इसके विपरीत उन्होंने कर्म के फल की आसक्ति का त्याग करने का उपदेश दिया। अर्जुन श्रीकृष्ण के अभिप्राय को यह सोंचकर गलत समझता है कि यदि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है तब फिर वह इस युद्ध में भाग लेने जैसे कर्त्तव्य का पालन क्यों करें? इसलिए वह कहता है-"विरोधाभासी कथनों से आप मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रहे हैं। मैं जानता हूँ कि आप करुणामय हैं और आपकी इच्छा मुझे निष्फल करने की नहीं है, अतः कृपया मेरे संदेह का निवारण करें।"
श्रीभगवानुवाच |
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ |
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् || 3||
श्री भगवान ने कहा, हे निष्पाप अर्जुन! मैं पहले ही भगवत्प्राप्ति के दो मार्गों का वर्णन कर चुका हूँ। ज्ञानयोग उन मनुष्यों के लिए है जिनकी रुचि चिन्तन में होती है और कर्मयोग उनके लिए है जिनकी रुचि कर्म करने में होती है।
श्लोक-2.39 में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा आध्यात्मिक परिपूर्णता की ओर ले जाने वाले दो मार्गों का वर्णन किया गया। जिनमें से प्रथम मार्ग विश्लेषणात्मक अध्ययन द्वारा आत्मा के स्वरूप और शरीर से उसके भेद को जानने का ज्ञान प्राप्त करना है।
श्रीकृष्ण ने इसे सांख्य योग कहा है, दार्शनिक मनोवृत्ति वाले लोगों की रुचि बौद्धिक चिन्तन द्वारा आत्मा को जानने के लिए ज्ञानमार्ग की ओर होती है। दूसरे प्रकार के लोग अपने समस्त कर्म भगवान को समर्पित करने की भावना से 'कर्मयोग' करते हैं। पिछले श्लोक में किए गए वर्णन के अनुसार श्रीकृष्ण इसे बुद्धि-योग भी कहते हैं। ऐसी पद्धति द्वारा कार्य करने से अन्त:करण की शुद्धि होती है और शुद्ध अन्तःकरण में स्वाभाविक रूप से ज्ञान प्रकट होता है। अतः यह मार्ग परम लक्ष्य की प्राप्ति की ओर प्रवृत्त करता है।
आध्यात्मिक मार्ग में रुचि रखने वालों में ऐसे लोग भी सम्मिलित होते हैं जो चिन्तन एवं मनन में रुचि रखते हैं और कुछ ऐसे लोग भी सम्मिलित होते हैं जो कर्म करने में रुचि रखते हैं। इस प्रकार से इन दोनों मार्गों का अस्तित्व तब तक बना रहता है जब तक आत्मा की भगवत्प्राप्ति की अभिलाषा विद्यमान रहती है। श्रीकृष्ण इन दोनों पद्धतियों का अनुसरण करने वालों का उल्लेख करते हैं क्योंकि उनका संदेश सभी प्रकार की मनोवृत्ति और रुचि रखने वाले लोगों के कल्याण के लिए है।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते |
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति || 4||
न तो कोई केवल कर्म से विमुख रहकर कमर्फल से मुक्ति पा सकता है और न केवल शारीरिक संन्यास लेकर ज्ञान में सिद्धावस्था प्राप्त कर सकता है।
इस श्लोक की प्रथम पंक्ति कर्मयोगी, स्वयं दूसरी पंक्ति सांख्य योगी, ज्ञान योग के अनुयायियों के सम्बन्ध में है।
प्रथम पंक्ति में श्रीकृष्ण कहते हैं कि कार्य के प्रति केवल उदासीन रहने से कर्मफलों से मुक्ति की अवस्था प्राप्त नहीं होती। मन निरन्तर फलप्राप्ति का चिन्तन करता रहता है और क्योंकि मानसिक कार्य भी कर्म का ही रूप है इसलिए यह भी शारीरिक कार्य के समान मनुष्य को कर्म के बंधनो में बांधता है। सच्चे कर्मयोगी को कर्मफलों की आसक्ति से रहित होकर जीवन निर्वाह करना अवश्य सीखना चाहिए। इसके लिए बौद्धिक ज्ञान को उन्नत करना आवश्यक होता है। इसलिए कर्मयोग में सफलता पाने के लिए तत्त्वज्ञान भी अनिवार्य है।
दूसरी पंक्ति में श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि सांख्य योगी केवल संसार से संन्यास लेकर और संन्यासी बनकर आत्मज्ञान की अवस्था प्राप्त नहीं कर सकता। कोई भी मनुष्य भोगों का परित्याग कर सकता है। किन्तु जब तक मन अशुद्ध रहता है तब तक वास्तविक ज्ञान का उदय नहीं होता। मन की प्रवृत्ति पिछले विचारों की पुनरावृत्ति करना है। ऐसी पुनरावृत्ति मन के भीतर एक कड़ी का रूप ले लेती है और साथ में नए विचार भी निर्बाध रूप से समान दिशा में उमड़ते रहते हैं। अपनी पुरानी प्रवृत्तियों के कारण लौकिक चिन्तन से मन चिन्ता, तनाव, भय, घृणा, शत्रुता आदि सांसारिक विषयजन्य दोषों से युक्त रहता है। इस प्रकार केवल भौतिक रूप में संसार से संन्यास लेने से अशुद्ध अन्तःकरण में वास्तविक ज्ञान प्रकट नहीं होगा। यह उपयुक्त कर्म से युक्त होना चाहिए जो मन और बुद्धि को शुद्ध करता है। इस प्रकार से सांख्य योग में भी सफलता के लिए कर्म करना अनिवार्य है। यह कहा जाता है कि तत्त्वज्ञान के बिना भक्ति भावना मात्र होती है और बिना भक्ति के तत्त्वज्ञान बुद्धि की कल्पना मात्र है। कर्मयोग और सांख्य योग दोनों के लिए कर्म और ज्ञान अनिवार्य हैं। यह केवल इनका आनुपातिक अंतर है जो इन दो मार्गों के बीच भेद उत्पन्न करता है।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् |
कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: || 5||
कोई भी मनुष्य एक क्षण के लिए अकर्मा नहीं रह सकता। वास्तव में सभी प्राणी प्रकृति द्वारा उत्पन्न तीन गुणों के अनुसार कर्म करने के लिए विवश होते हैं।
कुछ लोग सोंचते हैं कि कर्म का संबंध केवल व्यवसायिक कार्यों का निष्पादन करने से है न कि दिनचर्या संबंधी कार्य जैसे कि-खाना, पीना, निद्रा, जागना, और विचार करना। इसलिए प्रायः ऐसे लोग जब अपना व्यवसाय छोड़ देते हैं तब वह यह समझते हैं कि वे कर्म नहीं कर रहे हैं। लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं कि शरीर, मन और वाणी द्वारा निष्पादित की जाने वाली सभी गतिविधियाँ कर्म ही हैं। इसलिए वे अर्जुन को बताते हैं कि एक क्षण के लिए भी पूर्णरूप से निष्क्रिय रहना असंभव है। यदि हम केवल कहीं बैठे हैं तो यह भी एक क्रिया है और जब हम लेटते हैं तो यह भी एक क्रिया है। यदि हम निद्रा में होते हैं तब भी मन स्वप्न देखने में व्यस्त हो जाता है। यहाँ तक कि जब हम गहन निद्रा में चले जाते हैं, तब भी हमारे हृदय और शरीर के अन्य अंग कार्य करते रहते हैं। इस प्रकार से श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि किसी भी मनुष्य के लिए पूर्णतया अकर्मा रहना असंभव है। क्योंकि शरीर, मन और बुद्धि अपनी प्रकृति द्वारा निर्मित तीन गुणों-सत्व, रज, तम के अधीन होकर संसार में कार्य करने के लिए विवश होती है। श्रीमद्भागवतम् में भी इसी प्रकार का श्लोक है।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म गुणैः स्वाभाविकैबलात् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-6.1.53)
"कोई भी मनुष्य एक क्षण के लिए अकर्मा नहीं रह सकता। सभी जीव अपने प्राकृतिक गुणों द्वारा कर्म करने के लिए बाध्य होते हैं।"
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् |
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते || 6||
जो अपनी कर्मेन्द्रियों को तो नियंत्रित करते हैं लेकिन मन से उनके विषयों का चिन्तन करते हैं, वे निःसन्देह स्वयं को धोखा देते हैं और पाखण्डी कहलाते हैं।
संन्यासी जीवन के प्रति आकर्षित होकर लोग प्रायः अपने कर्मों का परित्याग कर देते हैं और बाद में उन्हें ज्ञात होता है कि उनका वैराग्य सांसारिक विषयभोगों के प्रति विरक्ति से युक्त नहीं है। इससे मिथ्याचरिता की ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहाँ लोग स्वयं बाह्य दृष्टि से आध्यात्मवादी होने का ढोंग करते हैं जबकि आंतरिक रूप से निकृष्ट मनोभावों के साथ अधम उद्देश्यों के लिए जीवन निर्वाह करते हैं। इसलिए संसार में कर्मयोगी के रूप में रहना पाखण्डपूर्ण संन्यासी जीवन व्यतीत करने से श्रेष्ठ है। अपरिपक्व अवस्था में संन्यास लेकर अपने जीवन की समस्याओं से दूर भागना आत्मा के उद्धार की यात्रा में नहीं बाधक है। संत कबीर ने कहा है:
मन न रंगाए हो, रंगाए योगी कपड़ा।
जतवा बढ़ाए योगी धुनिया रमौले,
दढ़िया बढ़ाए योगी बनि गयेले बकरा ।।
"हे तपस्वी योगी! तुमने अपने वस्त्रों को भगवा (गहरे पीले रंग में) रंग से रंगवा लिया है किन्तु तुमने अपने मन को वैराग्य के रंग से रंगने पर ध्यान नहीं दिया। स्वयं को संन्यासी दर्शाने के लिए तुमने प्रतीक के रूप में अपने केश बढ़ा लिए हैं और अपने शरीर पर राख मल ली है किन्तु भीतर से समर्पण भाव के बिना बाहरी रूप से मुख पर दाढ़ी बढ़ाकर अपना रूप बकरे जैसा बना लिया है।" इस प्रकार श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह व्यक्त करते हैं कि जो लोग बाह्य दृष्टि से इन्द्रियों के विषय भोगों का त्याग करते हैं किन्तु मन से निरन्तर उनका चिन्तन करते हैं, वे मिथ्याचारी हैं और स्वयं को धोखा देते हैं।
इस तत्त्व को समझाने के लिए पुराणों में तावृत और सुवृत दो भाइयों की कथा का वर्णन इस प्रकार से है-एक दिन दोनों भाई अपने घर से श्रीमद्भागवतम् का प्रवचन सुनने मंदिर जा रहे थे। बीच मार्ग में मूसलाधार वर्षा होने लगी। अतः वे आश्रय लेने के लिए समीप के भवन में चले गये। उन्होंने पाया कि वे वेश्यालय में आ गये हैं जहाँ पर गणिकाएँअपने ग्राहकों का मनोरंजन करने के लिए नृत्य कर रही थीं। बड़ा भाई तावृत वहाँ से बाहर निकल कर वर्षा में भींगता हुआ मन्दिर की ओर जाने लगा। छोटे भाई सुवृत ने वर्षा में भींगने से बचने के लिए कुछ समय और वहाँ बैठने में कोई बुराई नहीं समझी। तावृत मन्दिर पहुंचा और वहाँ बैठकर प्रवचन सुनने लगा किन्तु वह मन से पश्चात्ताप करने लगा-“यह कैसा नीरस करने वाला प्रवचन है। मैंने बड़ी भूल की, मुझे वेश्यालय में रुकना चाहिए था। मेरा भाई अवश्य ही वहाँ के उत्सव में आनन्दित हो रहा होगा।" दूसरी ओर सुवृत यह सोचने लगता है-“मैं इस पाप के स्थान पर क्यों रुक गया? मेरा भाई पुण्यात्मा है और वह अवश्य भागवत के ज्ञान से अपने मन और बुद्धि को निमज्जित कर रहा होगा। मुझे भी साहस जुटा कर वर्षा से भयभीत हुए बिना मंदिर पहुँचना चाहिए था। आखिरकार मैं कोई नमक का बना हुआ नहीं हूँ जो थोड़ी वर्षा में घुल जाता।" जब वर्षा समाप्त हुई तो दोनों भाई अपने-अपने स्थानों से बाहर निकले और एक-दूसरे की दिशा की ओर बढ़े। जिस क्षण में वह एक-दूसरे से मिले तब अचानक उन पर बिजली गिरी और उसी स्थान पर उनकी मृत्यु हो गयी। तब यमदूत वहाँ आकर तावृत को नरक ले जाने लगे तब तावृत ने आपत्ति करते हुए कहा-"तुमसे भूल हुई है। मैं तावृत हूँ। वह मेरा भाई था जो कुछ समय पहले वेश्यालय में बैठा था। अतः तुम्हें उसे नरक में ले जाना चाहिए।" यमदूतों ने उत्तर दिया-"हमने कोई भूल नहीं की। तुम्हारा भाई वहाँ वर्षा से बचने के लिए बैठा था किन्तु उसका मन भागवत के प्रवचन में तल्लीन था। दूसरी ओर प्रवचन सुनते समय तुम्हारे मन में वेश्यालय में ठहरने की लालसा उत्पन्न हो रही थी।" तावृत ने बिलकुल वैसा ही किया जैसा कि श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में व्याख्या की है। उसने बाह्य दृष्टि से तो विषय भोगों के प्रति विरक्ति प्रकट की किन्तु मन से विषय भोगों का चिन्तन किया था। यह अनुचित वैराग्य है।
अब अगले श्लोक में श्रीकृष्ण वास्तविक वैराग्य का वर्णन करेंगे।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन |
कर्मेन्द्रियै: कर्मयोगमसक्त: स विशिष्यते || 7||
हे अर्जुन! लेकिन वे कर्मयोगी जो मन से अपनी ज्ञानेन्द्रियों को नियंत्रित करते हैं और कर्मेन्द्रियों से बिना किसी आसक्ति के कर्म में संलग्न रहते हैं, वे वास्तव में श्रेष्ठ हैं।
इस श्लोक में कर्मयोग शब्द का प्रयोग किया गया है। यह दो अवधारणाओं का योग है। कर्म अर्थात् व्यावसायिक कार्य और योग अर्थात भगवान में एकत्व। इस प्रकार कर्मयोगी वह है जो मन को भगवान में अनुरक्त कर सांसारिक दायित्वों का निर्वहन करता है। ऐसा कर्मयोगी सभी प्रकार के कर्म करते हुए भी कर्म के बंधन से मुक्त रहता है। इस प्रकार के कर्म किसी मनुष्य को कर्म के फलों से नहीं बाँधते किन्तु उन कर्मों के फलों में आसक्ति रखने पर वह कर्म के बंधन में बंध जाता है।
कर्मयोगी की कर्म के फलों में कोई आसक्ति नहीं होती। दूसरी ओर एक पाखंडी संन्यासी जो कर्म से तो विरक्त रहता है परन्तु आसक्ति का त्याग नहीं करता, वह कर्म के बंधन में बंध जाता है। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि गृहस्थ जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति जो कर्मयोग में रत रहते हैं, वे मन से निरन्तर विषय-भोगों का चिन्तन करने वाले मिथ्याचारी संन्यासी से अधिक श्रेष्ठ हैं। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने इन दोनों विचारों की तुलना अति विशद प्रकार से की है:
मन हरि में तन जगत में, कर्मयोग तेही जान।
तन हरि में मन जगत में, यह महान अज्ञान ।।
(भक्ति शतक-84)
"जब कोई संसार में शरीर से काम करता है किन्तु मन भगवान में अनुरक्त रखता है तो उसे कर्मयोग समझना चाहिए। जब कोई शरीर को आध्यात्मिकता या भक्ति में लीन करता है किन्तु मन को संसार में आसक्त रखता है तब उसे पाखंडी मानो।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: |
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मण: || 8||
इसलिए तुम्हें निर्धारित वैदिक कर्म करने चाहिए क्योंकि निष्क्रिय रहने से कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म का त्याग करने से तुम्हारे शरीर का भरण पोषण भी संभव नहीं होगा।
जब तक मन और बुद्धि भगवान में तल्लीन होने की अवस्था तक न पहुँचे तब तक कर्त्तव्य का पालन करने की दृष्टि से किया गया शारीरिक कार्य अन्त:करण को शुद्ध करने में सहायक होता है। इसलिए वेदों में मनुष्यों के लिए अपने मन और इन्द्रियों पर संयम रखने के लिए कुछ कर्तव्य निश्चित किए गए हैं। आलस्य को आध्यात्मिक मार्ग में अवरोध बताया गया है।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ।।
"आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और यह घातक शत्रु, उसके शरीर में ही निवास करता है।" कर्म मनुष्य का विश्वस्त मित्र है और उसे निश्चित रूप से अधोपतन से बचाता है। मुख्य शारीरिक कार्य जैसे भोजन ग्रहण करना, स्नान करना तथा शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए कर्म करना अनिवार्य होता है। इन अनिवार्य कर्मों को नित्यकर्म कहा जाता है। शरीर को सुचारु रूप से क्रियाशील रखने वाले इन कार्यों की उपेक्षा करना उचित नहीं है अपितु ये आलसी होने का संकेत है जो मन और शरीर दोनों को क्षीण और दुर्बल करता है। दूसरी ओर शरीर की देखभाल और पोषण करना आध्यात्मिकता के मार्ग में सहायक है। इस प्रकार अकर्मण्यता न तो भौतिक और न ही आध्यात्मिक उपलब्धि की साधिका है। अपनी आत्मा के उत्थान के लिए हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। वे हमारे मन और बुद्धि को उन्नत और पवित्र करने में सहायता करते हैं।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन: |
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर || 9||
परमात्मा के लिए यज्ञ-स्वरूप में कर्मों का निष्पादन करना चाहिए अन्यथा कर्म बंधन का कारण बनेंगे। इसलिए हे कुन्तीपुत्र! भगवान के सुख के लिए और फल की आसक्ति के बिना अपने नियत कर्म करो।
डाकू हत्या करने के प्रयोजन से चाकू का प्रयोग करता है जबकि एक सर्जन उसी चाकू का प्रयोग एक उपकरण के रूप में लोगों का जीवन बचाने के लिए करता है। यह चाकू स्वयं न तो किसी की हत्या करता है और न ही किसी के जीवन की रक्षा करता है। इसका इसके प्रयोग करने के प्रयोजन से ज्ञात होता है। जैसा कि शेक्सपीयर ने कहा है-"कोई भी कर्म बुरा या अच्छा नहीं होता किन्तु हमारी सोंच इन्हें ऐसा बनाती है।" इसी प्रकार से कर्म अपने आप में शुभ या अशुभ नहीं होता। मनुष्य की मनोदशा के अनुसार यह बंधन या उत्थान का कारण हो सकता है।
इन्द्रिय सुख और अपने अहम् की तुष्टि के लिए किया गया कार्य भौतिक संसार में बंधन का कारण होता है और भगवान के सुख के लिए यज्ञ के रूप में किया गया कर्म माया के बंधनों से मुक्त करता है तथा भगवान की दिव्य कृपा प्राप्त कराता है। क्योंकि कर्म करना हमारी प्रकृति है अतः हम इन दो प्रकार के कार्यों में से किसी एक को करने के लिए बाध्य होते हैं। हम एक क्षण के लिए भी अकर्मा नहीं रह सकते क्योंकि हमारा मन खाली नहीं रह सकता। अगर कोई भी कार्य हम भगवान को अर्पण किए बिना करते हैं तब हम अपने मन और इन्द्रियों की तुष्टि के लिए कार्य करने के लिए विवश होंगे। जब हम किसी कार्य को समर्पण की भावना से सम्पन्न करते हैं तब हम यह पाते हैं कि यह सारा संसार और उसमें व्याप्त सभी वस्तुएँ भगवान से संबंधित हैं और उनका उपयोग भगवान की सेवा के लिए ही है। भगवान राम के पूर्वज राजा रघु द्वारा इसका उच्च आदर्श स्थापित किया गया। रघु ने विश्वजित् यज्ञ का अनुष्ठान किया जिसमें अपने स्वामित्व की सभी वस्तुएँ और धन संपदा की परोपकार के लिए दान में देना आवश्यक होता है।
स विश्वजितम् आजह्वे यज्ञं सर्वस्व दक्षिणम्।
आदानं हि विसर्गाय सतां वारिमुचाम् इव।।
(रघुवंश-4.86)
"रघु ने इसी भावना से यज्ञ किया। जिस प्रकार बादल पृथ्वी से अपने सुख के लिए जल एकत्रित नहीं करते अपितु वर्षा के रूप में उसे पृथ्वी को लौटा देते हैं। इसी प्रकार राजा द्वारा जनता से कर के रूप में इकट्ठा की गयी धन सम्पदा उसके सुख के लिए नहीं होती अपितु प्रजा तथा भगवान के सुख के लिए होती है। इसलिए उन्होंने अपनी धन सम्पदा को भगवान के सुख के लिए अपने नागरिकों की सेवा में अर्पित करने का निर्णय लिया।" यज्ञ के पश्चात् रघु ने अपनी सारी सम्पत्ति अपनी प्रजा को दान में दे दी और फिर वह भिखारी के भेष में मिट्टी का पात्र उठाकर भिक्षा के लिए निकल पड़े। जब वह एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे, तब उन्होंने कुछ लोगों द्वारा किए जा रहे इस वार्तालाप को सुना-"हमारा राजा अत्यंत परोपकारी है। राजा ने अपना सर्वस्व दान कर दिया।" रघु को अपनी प्रशंसा सुनकर दुःख हुआ और वह बोले-"तुम क्या चर्चा कर रहे हो?" उन्होंने उत्तर दिया-"हम अपने राजा का गुणगान कर रहे हैं। हमारे राजा जैसा दानी इस संसार में कोई दूसरा नहीं है।" रघु ने कहा-"पुनः ऐसा न कहना। रघु ने कुछ भी दान नहीं किया।" तब उन्होंने कहा, "तुम किस प्रकार के मनुष्य हो जो हमारे राजा की बुराई कर रहे हो? सभी जानते हैं कि रघु ने जो भी अर्जित किया वह सब दान में दे दिया।" रघु ने उत्तर दिया-"जाओ और अपने राजा से पूछो कि जब वह संसार में आया था तब उसके पास क्या था? क्या उसने खाली हाथ जन्म नहीं लिया? आख़िर उसका क्या था जिसका उसने त्याग कर दिया?" यही कर्मयोग है जिससे हमें यह ज्ञात होता है कि समस्त संसार भगवान का है और यहाँ का सब कुछ भगवान को संतुष्ट करने के निमित्त है, तभी हम अपने कर्तव्यों का निर्वहन अपने मन और इन्द्रियों की तुष्टि के लिए न करके केवल भगवान के सुख के लिए करते हैं।
भगवान विष्णु ने प्रचेताओं को इस प्रकार से उपदेश दिया।
गृहेष्वाविशतां चापि पुंसां कुशलकर्मणाम् ।
मद्वार्तायातयामानां न बन्धाय गृहा मता।।
(श्रीमद्भागवतम्-4.30.19)
"सच्चे कर्मयोगी अपनी गृहस्थी के कार्यों को पूरा करते हुए अपने सभी कार्यों को मेरे यज्ञ के रूप में करते हैं और मुझे ही सभी कर्मों का भोक्ता मानते हैं। उन्हें जब भी खाली समय मिलता है, तब उस समय वे मेरी महिमा का श्रवण एवं गान करते हैं। ऐसे मनुष्य संसार में रहते हुए कभी भी अपने कर्मों के बंधन में नहीं फंसते।"
सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति: |
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् || 10||
सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा ने मानव जाति को उनके नियत कर्तव्यों सहित जन्म दिया और कहा “इन यज्ञों का विधिपूर्वक अनुष्ठान करने पर तुम्हें सुख समृद्धि प्राप्त होगी और इनसे तुम्हें सभी वांछित वस्तुएँ प्राप्त होंगी।”
प्रकृति के सभी उपादान भगवान की सृष्टि के अभिन्न अंग हैं। भगवान की सृष्टि के समस्त उपादान जो भी सृष्टि से प्राप्त करते हैं उन्हें वे पुनः भगवान की सृष्टि को लौटा देते हैं। सूर्य, पृथ्वी के अस्तित्व को बनाए रखने और जीवन निर्वाह के लिए ताप और प्रकाश की व्यवस्था करता है। भूमि अपनी मिट्टी से हमारे पालन-पोषण के लिए खाद्य पदार्थ उत्पन्न करती है और उत्तम जीवन शैली के लिए अपने गर्भ में आवश्यक खनिज पदार्थों को समाए रखती है। वायु हमारे शरीर में प्राण शक्ति को संचालित करता है और ध्वनि को प्रसारित करता है। हम मानव भी भगवान की सृष्टि रचना के अभिन्न अंग हैं। वायु द्वारा हम सांस लेते हैं, धरती पर हम चलते हैं, जल का हम सेवन करते हैं और सूर्य का प्रकाश हमारे जीवन को प्रकाशित करता है। ये सभी हमारे लिए भगवान की सृष्टि के अद्भुत उपहार हैं। जिस प्रकार हम अपने जीवन को बनाए रखने के लिए इन तत्त्वों का उपयोग करते हैं उसी प्रकार से हमें अपने नियत कर्त्तव्यों का पालन करते हुए प्रकृति की शक्तियों का उपयोग भगवान की सेवा के लिए करना चाहिए। भगवान हम मनुष्यों से ऐसे ही यज्ञ की अपेक्षा करते हैं।
अपने हाथ का उदाहरण ही लें जो कि हमारे शरीर का अभिन्न अंग है। यह अपने पोषण हेतु शरीर से रक्त, ऑक्सीजन, विटामिन आदि प्राप्त करता है और इसके बदले में यह शरीर के लिए आवश्यक कार्य सम्पादित करता है। यदि हाथ यह सोंचने लगे कि शरीर की सेवा करना एक बोझ है और यह निर्णय कर ले कि शरीर ही उसकी सेवा करे तब हाथ एक क्षण के लिए भी चेतन नहीं रह सकता। यदि वह शरीर के लिए यज्ञ के रूप में कर्म करता है तब हाथ का निजी स्वार्थ भी पूरा हो जाता है। उसी तरह जीवात्माएँ भगवान का अणु अंश हैं अतः भगवान की अनन्त सृष्टि में हम सब को भी अपनी भूमिका का निर्वहन करना चाहिए। जब हम अपने समस्त कार्यों को भगवान की सेवा में अर्पित करते हैं तब इससे हमारे निजी हित की भी सिद्धि होती है।
प्रायः हवन कुंड में अग्नि प्रज्जवलित कर हवन करने को यज्ञ कर्म कहा जाता है। परन्तु भगवद्गीता में वर्णित 'यज्ञ' में शास्त्रों में लिखित सभी नियत कर्म भी सम्मिलित हैं जिन्हें हम भगवान को अर्पित करने के भाव से सम्पन्न करते हैं।
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व: |
परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ || 11||
तुम्हारे द्वारा सम्पन्न किए गए यज्ञों से देवता प्रसन्न होंगे तथा मनुष्यों और देवताओं के इस संबंध के परिणामस्वरूप सभी को सुख समृद्धि प्राप्त होगी।
स्वर्ग के देवता आधिकारिक रूप से ब्रह्मांड का संचालन करते हैं। परमपिता परमात्मा संसार की शासन व्यवस्था के नियंत्रण और संचालन संबंधी अपने कार्य उनके माध्यम से सम्पन्न करते हैं। ये देवता स्वर्ग या देवलोक में निवास करते हैं। देवतागण भगवान नहीं हैं अपितु वे भी हमारे जैसी आत्माएँ हैं। उन्हें संसार के संचालन से संबंधित दायित्वों का निर्वाहन करने हेतु पद सौंपे गये हैं। अपने देश की शासन व्यवस्था पर ध्यान दें जहाँ राज्यमंत्री, वित्त मंत्री, रक्षा सचिव, अटॉर्नी जनरल और अन्य पद हैं। इन पदों पर जिन लोगों का चयन होता है, वे निश्चित समयावधि तक अपने पद पर बने रहते हैं। समयावधि समाप्त होने पर या सत्ता का हस्तान्तरण होने पर सभी पदों पर नियुक्त लोगों को हटा दिया जाता है। समान रूप से संसार के प्रशासन संबंधी कार्यों का संचालन करने के लिए भी कुछ पद जैसे अग्निदेव (अग्नि का देवता), वायु देव (वायु का देवता), वरुणदेव (समुद्र का देवता), इन्द्रदेव (स्वर्ग के देवताओं का राजा) आदि पदों का सृजन किया गया है। पूर्वजन्म के संस्कारों, गुणों और पाप-पुण्यमय कर्मों के आधार पर जीवात्मा को इन पदों पर नियुक्त किया जाता है। ये पद दीर्घकाल के लिए निश्चित होते हैं और इन पदों पर आसीन लोग ब्रह्मांड के शासन का संचालन करते हैं। ये सब देवता हैं।
वेदों में स्वर्ग के देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के कर्मकाण्डों एवं धार्मिक विधि-विधानों का उल्लेख किया गया है और इनके बदले में देवता लौकिक सुख समृद्धि प्रदान करते हैं। जब हम अपने यज्ञ कर्म भगवान की संतुष्टि के लिए करते हैं तब स्वर्ग के देवता भी स्वतः संतुष्ट हो जाते हैं। जिस प्रकार जब हम किसी वृक्ष की जड़ को पानी देते है तब वह स्वतः उसके पुष्पों, फलों, पत्तियों शाखाओं और लताओं तक पहुँच जाता है। स्कन्द पुराण में वर्णन है:
अर्चिते देव देवेशे शङ्ख चक्र गदाधरे।
अर्चिताः सर्वे देवाः स्युर्यतः सर्व गतो हरिः।।
"विष्णु भगवान की उपासना करने से सभी देवताओं की स्वतः उपासना हो जाती है क्योंकि वे अपनी शक्तियाँ उनसे ही प्राप्त करते हैं।" इसलिए यज्ञ कर्म के निष्पादन से देवतागण प्रसन्न होते हैं और वे भौतिक प्रकृति के उपादानों का नियमन करते हुए मानव समाज के लिए सुख समृद्धि की व्यवस्था करते हैं।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविता: |
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव स: || 12||
तुम्हारे द्वारा सम्पन्न यज्ञों से प्रसन्न होकर देवता जीवन निर्वाह के लिए वांछित वस्तुएँ प्रदान करेंगे किन्तु जो प्राप्त वस्तुओं को उनको अर्पित किए बिना भोगते हैं, वे वास्तव में चोर हैं।
ब्रह्मांड के प्रशासक के रूप में देवता हमें वर्षा, वायु, अन्न, खनिज और उपजाऊ भूमि आदि प्रदान करते हैं। देवताओं द्वारा प्रदत्त इन सभी उपहारों के लिए हमें उनका आभारी होना चाहिए। देवता अपने कर्तव्य का पालन करते हैं और यह अपेक्षा करते हैं कि हम मनुष्य भी निष्ठापूर्वक अपने दायित्वों का निर्वहन करें। क्योंकि ये सभी स्वर्ग के देवता परम शक्तिमान भगवान के सेवक हैं और जब वे किसी को भगवान के लिए यज्ञ कर्म करते हुए देखते हैं तब वे प्रसन्न होते हैं और प्रतिफल के रूप में ऐसी जीवात्माओं के लिए भौतिक सुख-सुविधाओं की व्यवस्था करते हैं। इसलिए यह कहा जाता है कि जब हम दृढ़संकल्प के साथ भगवान की सेवा करते हैं तब ब्रह्माण्ड की सभी शक्तियाँ हमारी सहायता करना आरम्भ कर देती हैं।
कुछ लोग प्रकृति द्वारा प्रदत्त उपहारों को भगवान की सेवा के निमित्त नहीं समझते अपितु उन्हें अपने सुख का साधन मानते हैं। ऐसी मनोवृत्ति को श्रीकृष्ण ने चोरी की मानसिकता कहा है। प्रायः लोग यह प्रश्न करते हैं-"मैं सदाचार का जीवन व्यतीत करता हूँ, मैं किसी का अहित नहीं करता और न ही मैं कोई चोरी करता हूँ किन्तु मैं न तो भगवान की उपासना में विश्वास करता हूँ और न ही भगवान के अस्तित्व में। तब मैं क्या कुछ अनुचित कर रहा हूँ?" इस प्रश्न का उत्तर उपर्युक्त श्लोक में मिलता है। सामान्य मनुष्यों की दृष्टि से ऐसे व्यक्ति कुछ अनुचित नहीं करते किन्तु वे परमात्मा की दृष्टि में चोर माने जाते हैं। जैसे कि यदि हम किसी के घर जाते हैं और गृह स्वामी से परिचित न होते हुए भी उसके सोफे पर बैठ जाते हैं, रेफ्रिजरेटर से खाने-पीने के पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और उसके विश्राम कक्ष का प्रयोग करते हैं। फिर हम यह दावा करते हैं कि हम कुछ अनुचित नहीं कर रहे हैं। किन्तु कानून की दृष्टि में हमें चोर माना जाएगा क्योंकि उस घर से हमारा कोई संबंध नहीं है। इसी प्रकार यह संसार जिसमें हम रहते हैं, वह भगवान द्वारा बनाया गया है और उसकी प्रत्येक वस्तु भगवान की ही है। यदि हम सृष्टि के इन सुख साधनों पर भगवान के आधिपत्य को स्वीकार किए बिना अपने सुख के लिए इनका उपभोग करते हैं तब दैवीय दृष्टिकोण से हम निश्चित रूप से चोरी करते हैं।
भारतीय इतिहास के सुप्रसिद्ध राजा चन्द्रगुप्त ने अपने गुरु आचार्य चाणक्य से पूछा-"एक राजा का अपनी प्रजा के प्रति क्या कर्त्तव्य है?" आचार्य चाणक्य ने उत्तर दिया-"राजा प्रजा के सेवक के अलावा कुछ नहीं है। भगवान ने उसे राज्य के नागरिकों की सेवा करने का दायित्व सौंपा है ताकि वे भगवद्धाम की अपनी यात्रा में उन्नति कर सकें।" चाहे कोई राजा, व्यवसायी, किसान या श्रमिक हो, सभी व्यक्ति भगवान के संसार के अभिन्न अंग हैं और उनसे परमात्मा की सेवा के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है।
यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै: |
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् || 13||
आध्यात्मिक मनोवत्ति वाले जो लोग यज्ञ में अर्पित करने के पश्चात् भोजन ग्रहण करते हैं, वे सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं किन्तु जो अपनी इन्द्रिय तृप्ति के लिए भोजन बनाते हैं, वे वास्तव में पाप अर्जित करते हैं।
वैदिक परम्परा में भोजन इस भावना से बनाया जाता था कि यह भोजन भगवान के लिए है। फिर भोज्य पदार्थों को किसी पात्र में रखकर मौखिक रूप से या मन से भगवान से इसका भोग लगाने की प्रार्थना की जाती थी। भोग लगाने के पश्चात् पात्र में रखे भोजन को भगवान का प्रसाद (भगवान की कृपा) समझा जाता है। अन्य धर्म परम्पराओं में भी समान रीति का पालन किया जाता था। ईसाई धर्म में परम प्रसाद ग्रहण करने की रीति है जिसमें मदिरा और रोटी को पवित्र करने के पश्चात् ही उसका सेवन किया जाता है। श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में यह कहा है कि सर्वप्रथम भगवान के भोग के लिए अर्पित किए गए भोजन को जब प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है तब वह मनुष्यों को पाप मुक्त करता है और जो भगवान को भोग लगाए बिना भोजन ग्रहण करते हैं, वे पाप अर्जित करते हैं। अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या हम मांसाहारी भोज्य पदार्थों का भगवान को भोग लगाने के पश्चात् उसे भगवान के प्रसाद के रूप में स्वीकार कर सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि वेदों में मनुष्य के लिए शाकाहारी भोजन का सेवन विहित है जिसमें अन्न, दालें, फलियाँ, शाक-सब्जियाँ, फल, दुग्ध आदि सम्मिलित हैं। वैदिक सभ्यता के अतिरिक्त संसार की सभी सभ्यताओं के इतिहास में पुण्य आत्माओं ने मांसाहारी भोजन के सेवन को अस्वीकार किया और यह कहा कि ऐसा भोजन हमारे पेट को कब्रिस्तान बनाता है। यद्यपि इनमें से कुछ ने मांसाहारी भोजन ग्रहण करने वाले परिवारों में जन्म लिया था तथापि वे शाकाहारी जीवन शैली की ओर आकर्षित हुए। क्योंकि वे आध्यात्मिक पथ पर उन्नत थे। शाकाहार का समर्थन करने वाले विचारकों और महानुभावों के कुछ उद्धरण निम्न प्रकार से है:
"मानवता को आतंक से बचाने के लिए शिष्यों को मांसाहार का सेवन करने से मना करो, बुद्धिमानों का भोजन वह है जिसे साधु लोग ग्रहण करते हैं वह मांस से बना नहीं होता।" महात्मा बुद्ध-
"यदि तुम यह कहते हो कि प्राकृतिक रूप से तुम्हारी रचना ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन करने के लिए हुई है तब फिर तुम उसकी स्वयं हत्या करो जिसे तुम खाना चाहते हो। यह सब केवल स्वयं अपने हाथों से करो, बिना किसी छुरे, लाठी और कुल्हाड़ी की सहायता के बिना।" (रोमन प्लुतार्क का निबन्ध “ऑन ईटिंग फ्लैश")
"जब तक मनुष्य पशुओं का संहार करते हैं, वे एक दूसरे की हत्या करते रहेंगे। वास्तव में जो रक्त और पीड़ा के बीज बोता है, वह प्रेम और आनन्द कैसे प्राप्त कर सकता है।" (पाइथागोरस)
"मनुष्य पशुओं का राजा है क्योंकि वर्बरता में यह उनसे आगे है। हमें दूसरों की मृत्यु पर निर्भर रहना पड़ता है। हमारा शरीर कब्रगाह है। मैने अल्प आयु से ही मांस का सेवन त्याग दिया।" (लियोनार्दो दा विन्ची)
"अहिंसा उच्च संस्कारों की ओर ले जाती है जो कि सभी प्रकार के उत्थान का लक्ष्य है। जब तक हम सभी जीवों को कष्ट देना छोड़ नहीं देते तब तक हम सब असभ्य हैं।" (थॉमस एडिसन)
"मांस खाना स्पष्ट रूप से अनैतिकता है क्योंकि इसमें निहित क्रिया-हत्या- नैतिक मूल्यों के सर्वथा विपरीत है।" (लियो टॉलस्टॉय)
"वास्तव में यह प्रश्न किया जा सकता है कि क्या मांस का सेवन जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक है, शिष्टता किसी भी प्रकार से यह अपेक्षा नहीं करती कि मनुष्य को मांस खाना चाहिए।" (एडम स्मिथ)
"मैं अपनी आयु को देखता हूँ। लेकिन कुछ लोग तो अपनी वास्तविक आयु से बड़े लगते हैं, ऐसे लोगों से तुम क्या अपेक्षा कर सकते हो, जो लाशों का उपभोग करते है।" (जॉर्ज बर्नाड शॉ)
"एक मृत गाय या बकरे को सड़े-गले मांस की तरह देखा जाता है। लेकिन कसाई की दुकान में सड़ी-गली उन्हीं लाशों को सजाकर आहार के रूप में बेचा जाता है।" (जे. एच. केलॉग)
"मेरा यह विचार है कि शाकाहारी रीति से जीवन निर्वाह करने का प्रभाव मनुष्य के स्वभाव पर पड़ता है और यह समूची मानव जाति के उत्थान के लिए लाभकारी होगा।" (अलबर्ट आइंस्टाइन)
"मैं यह अनुभव करता हूँ कि आध्यात्मिक उन्नति किसी एक पड़ाव पर यह अपेक्षा करती है कि हमें अपनी तृप्ति के लिए अपने से छोटे जीवों की हत्या करना बंद कर देना चाहिए।" (महात्मा गांधी)
इस श्लोक में श्रीकृष्ण इससे भी परे जाते हुए कहते हैं कि शाकाहारी जीवन निर्वाह करते हुए भी यदि हम अपनी इंद्रियों की तृप्ति के लिए भोजन ग्रहण करते हैं तब भी हम कर्मफलों के बंधन में पड़ जाते हैं। इस श्लोक में प्रयुक्त शब्द आत्म-कारणात् का अर्थ 'अपना निजी सुख' है। किन्तु यदि हम भगवान को अर्पित करने के पश्चात् यज्ञ के अवशेषों का प्रसाद के रूप में सेवन करते हैं तब हमारी भावना परिवर्तित हो जाती है और हम अपने शरीर को भगवान की धरोहर के रूप में देखते हैं जिसकी देखभाल भगवान की सेवा के लिए की जाती है। हमें भगवान की कृपा से प्राप्त विहित भोजन को इस भावना के साथ ग्रहण करना चाहिए कि यह हमारे शरीर को स्वस्थ बनाए रखेगा। इस भावना से यह पूरी प्रक्रिया भगवान को अर्पित हो जाती है। भरत मुनि ने इस प्रकार से वर्णन किया है:
वसुसतो क्रतु दक्षौ काल कामौ धृतिः कुरुः।
पुरुरवा मद्रवासश्च विश्वदेवाः प्रकीर्तिताः।।
"भोजन पकाते हुए, मूसल, अग्नि, पीसने वाले यंत्रों, जल के बर्तनों और झाड़ का प्रयोग करते हुए भूलवश हिंसा हो जाती है इसलिए जो शरीर की तृप्ति के लिए भोजन बनाते हैं, पाप में फंस जाते हैं किन्तु यज्ञ पाप फलों को निष्प्रभावी करते हैं।"
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव: |
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ: कर्मसमुद्भव: || 14||
सभी लोग अन्न पर निर्भर हैं और अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ का अनुष्ठान करने से होती है और यज्ञ निर्धारित कर्मों का पालन करने से सम्पन्न होता है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण सृष्टि के चक्र का वर्णन कर रहे हैं। वर्षा अन्न उत्पन्न करती है। अन्न का सेवन करने से शरीर में रक्त संचारित होता है और रक्त से वीर्य बनता है। इसी वीर्य से मनुष्य का शरीर बनता है और मनुष्य यज्ञ कर्म करता है तथा इससे स्वर्ग के देवता संतुष्ट होते हैं जो फिर पृथ्वी पर वर्षा करते हैं। इस प्रकार सृष्टि का चक्र निरन्तर चलता रहता है।
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् |
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् || 15||
वेदों में सभी जीवों के लिए कर्म निश्चित किए गए हैं और वेद परब्रह्म भगवान से प्रकट हुए हैं। परिणामस्वरूप सर्वव्यापक भगवान सभी यज्ञ कर्मों में नित्य व्याप्त रहते हैं।
वेद भगवान की श्वास से प्रकट हुए हैं। अरेऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदो तथैवाङिःरसः (बृहदारण्यकोपनिषद् 4.5.11) अर्थात “चारों वेद-ऋग्वेद, यर्जुवेद, सामवेद, अथर्ववेद परम पुरुषोत्तम भगवान की श्वास से प्रकट हुए हैं"। इन शाश्वत वेदों में भगवान ने स्वयं कर्तव्य निर्धारित किए हैं। इन कर्त्तव्यों को इस प्रकार से व्यवस्थित किया गया है कि जिनके निष्पादन से भौतिकता में संलिप्त मनुष्य धीरे-धीरे अपनी कामनाओं पर नियंत्रण करना सीखकर तमोगुण से रजोगुण और रजोगुण से सत्त्वगुण तक ऊपर उठ सके। ये कर्त्तव्य यज्ञ के रूप में भगवान को अर्पित करने के लिए कहे गए हैं। इस प्रकार भगवान को यज्ञ के रूप में अर्पित किए गए ये कर्त्तव्य वास्तव में भगवान के गुणों के समान भगवत्स्वरूप हो जाते हैं और उनसे किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं होते। तंत्र सार में यज्ञों को स्वयं परमात्मा का स्वरूप कहा गया है:
यज्ञो यज्ञ पुमांश्चैव यज्ञशो यज्ञ यज्ञभावनः।
यज्ञभुक् चेति पञ्चात्मा यज्ञेष्विज्यो हरिः स्वयम्।।
श्रीमद्भागवतम् (11.19.39) में श्रीकृष्ण उद्धव को उपदेश देते हुए कहते हैं: 'यज्ञोऽहं भगवत्तमः' अर्थात् मैं वसुदेव का पुत्र यज्ञ हूँ। वेदों में भी कहा गया है: 'यज्ञो वै विष्णुः' अर्थात् वास्तव में भगवान विष्णु ही स्वयं यज्ञ हैं। इसी सिद्धान्त को इस श्लोक में दोहराते हुए श्रीकृष्ण व्यक्त करते हैं कि भगवान यज्ञ कर्मों में साक्षात् रूप से प्रकट हैं।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह य: |
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति || 16||
हे पार्थ! जो मनुष्य वेदों द्वारा स्थापित यज्ञ कर्म के इस चक्र का पालन नहीं करते, वे पाप अर्जित करते हैं, वे केवल अपनी इन्द्रियों की तृप्ति के लिए जीवित रहते हैं, वास्तव में उनका जीवन व्यर्थ ही है।
चक्र या चरण से तात्पर्य घटनाओं की क्रमबद्धता से है। श्लोक संख्या 3.14 में अन्न से वर्षा तक के चक्र का वर्णन किया गया है। इस संसार के कर्म चक्र में सभी जीव अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं और इसका निर्विघ्न गति में अपना योगदान देते हैं। चूँकि हम भी सृष्टि के काल चक्र से बंधे हैं अतः हमें भी सृष्टि की श्रृखला में अपने निश्चित कर्तव्यों का पालन अवश्य करना चाहिए।
सृष्टि की इस श्रृखला में हम मनुष्य ही मात्र ऐसे प्राणी हैं जिन्हें अपनी इच्छा के अनुसार कर्मों का चयन करने की स्वतंत्रता प्राप्त है। इसलिए या तो हम सृष्टि के चक्र के सामंजस्य में योगदान दे सकते हैं या इस ब्रह्माण्डीय संरचना में विसंगति उत्पन्न कर सकते हैं। जब मानव समाज के बहुसंख्यक लोग इस व्यवस्था में जीवनयापन करने के लिए अपने दायित्वों का निर्वहन स्वीकार करते हैं तब उन्हें विपुल भौतिक समृद्धि प्राप्त होती है और उनका आध्यात्मिक विकास होता है। ऐसा काल मानव जाति के सामाजिक और सभ्य इतिहास में स्वर्ण युग कहलाता है। इसके विपरीत जब मानव जाति के अधिकांश लोग भगवान की सृष्टि के नियमों का उल्लंघन करने लगते हैं और ब्रह्मांड का अभिन्न अंग होते हुए भी अपने दायित्वों का निर्वाह करना अस्वीकार कर देते हैं तब भगवान की माया शक्ति उन्हें दण्ड देती है और तब उनकी शान्ति और समृद्धि नष्ट हो जाती है।
काल चक्र की रचना भगवान द्वारा अनुशासन और प्रशिक्षण हेतु तथा चेतना के विभिन्न स्तरों पर सभी मनुष्यों को ऊपर उठाने के लिए की गई है। श्रीकृष्ण अर्जुन को स्पष्ट करते हैं कि वे जो अपने लिए निर्देशित यज्ञ कर्म नहीं करते, वे अपनी इन्द्रियों के दास बन जाते हैं और पापमयी जीवन व्यतीत करते हैं इसलिए वे व्यर्थ में जीवित रहते हैं। किन्तु जो व्यक्ति दैवीय नियमों का पालन करते हैं, उनका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है और वे सभी प्रकार के मानसिक विकारों से मुक्त रहते हैं।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव: |
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते || 17||
लेकिन जो मनुष्य आत्मानंद में स्थित रहते हैं तथा जो प्रबुद्ध और अपने में ही तुष्ट होते हैं, उनके लिए कोई नियत कर्त्तव्य नहीं होता।
केवल वे मनुष्य जो बहिर्मुख विषय भोगों की कामनाओं का त्याग कर देते हैं वही आनन्दमय और आत्मलीन रह सकते हैं। सांसारिक कामनाएँ ही हमारे बंधन का मूल कारण हैं, 'यह होना चाहिए, और यह नहीं होना चाहिए।' श्रीकृष्ण आगे इस अध्याय के 37वें श्लोक में अभिव्यक्त करते हैं कि कामनाएँ ही सभी प्रकार के पापों का कारण हैं इसलिए इनका त्याग करना चाहिए। जैसा कि पहले ही (दूसरे अध्याय के 64वें में श्लोक में) किए गए उल्लेख के अनुसार सदैव यह ध्यान रखें कि जब भी श्रीकृष्ण कामनाओं का त्याग करने का उपदेश देते हैं तब उनका अभिप्राय सांसारिक कामनाओं का त्याग करने से है न कि आध्यात्मिक उन्नति करने की अभिलाषा या भगवत्प्राप्ति की इच्छा का त्याग करने से है।
फिर भी सर्वप्रथम यह विचारणीय है कि सांसारिक कामनाएँ क्यों उत्पन्न होती हैं? जब हम स्वयं को शरीर मानते हैं, तब हमें प्रतीत होता है कि शरीर और मन की कामनाएँ ही आत्मा की इच्छाएँ हैं और ये विचार हमें माया के क्षेत्र में धकेल देते हैं। संत तुलसीदास ने व्यक्त किया है:
जिब जिब ते हरि ते बिलगानो तब ते देह गेह निज मान्यो।
माया बस स्वरूप बिसरायो तेहि भ्रम ते दारुण दुःख पायो।।
"जब जीवात्मा भगवान से विमुख हो जाती है तब माया शक्ति उस पर भ्रम का आवरण डाल देती है। इसी भ्रम के कारण हम स्वयं की पहचान शरीर के रूप में करना आरम्भ कर देते हैं और स्वयं को भूल जाने के कारण हमें अत्यन्त कष्ट सहन करने पड़ते हैं।"
" लेकिन ज्ञानी पुरुष यह अनुभव करते हैं कि आत्मा का कोई भौतिक स्वरूप नहीं है और यह दिव्य है इसलिए यह अविनाशी है। संसार के नश्वर पदार्थ अविनाशी आत्मा की आनंद की क्षुधा को शान्त नहीं कर सकते और इसलिए सांसारिक विषय भोगों के लिए भागना मूर्खता है। इस प्रकार आत्मज्ञान की ज्योति से आलोकित आत्माएँ अपनी चेतना को भगवान के साथ एकीकृत कर देती हैं और अपने भीतर भगवान के असीम आनन्द की अनुभूति करती हैं।
सांसारिकता में लिप्त आत्माओं के लिए निर्धारित कर्म सिद्धावस्था प्राप्त आत्माओं पर लागू नहीं होते क्योंकि उन्होंने ऐसे सभी कर्मों का लक्ष्य पहले ही प्राप्त कर लिया होता है। उदाहरणार्थ जब तक कोई स्नातक का विद्यार्थी रहता है तब उसके लिए विश्वविद्यालय के नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है और जब वह ग्रेजुएट होकर डिग्री प्राप्त कर लेता है तब फिर उसके लिए विश्वविद्यालय के नियम अनावश्यक हो जाते हैं। महापुरुषों के लिए यह कहा गया है: 'ब्रह्मवित् श्रुति मुधिर्न' अर्थात् 'वे जो भगवान के साथ अपना एकत्व स्थापित कर लेते हैं, वे वेदों पर पाँव रखकर चलते हैं' अर्थात् उनके लिए वेदों के नियमों का पालन करना कभी आवश्यक नहीं होता।
वेदों का लक्ष्य जीवात्मा को भगवान के साथ जोड़ने के लिए उनकी सहायता करना है। एक बार जब आत्मा को भगवत्प्राप्ति हो जाती है तब फिर आत्मा को उसके गंतव्य तक पहुँचाने में सहायता करने वाले वेदों के नियम उस पर लागू नहीं होते। ऐसी आत्मा उनके अधिकार क्षेत्र से परे हो जाती है। उदाहरणार्थ पंडित विवाह समारोह में पुरुष और महिला को वैवाहिक गठबंधन में बांध देता है। एक बार जब समारोह समाप्त हो जाता है तब वह कहता है-“अब तुम पति और पत्नी हो, मैं जा रहा हूँ।" उसका काम समाप्त हो जाता है। यदि पत्नी बाद में यह कहती है-"पंडित जी, आपने विवाह समारोह के दौरान जो प्रतिज्ञाएँ करवायी थीं उनका मेरे पति द्वारा पालन नहीं किया जा रहा है।" तब पंडित यह उत्तर देगा-"यह मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर है, मेरा काम तुम दोनों का वैवाहिक गठबंधन करवाना था और यह कार्य हो चुका है।" समान रूप से वेद आत्मा को परमात्मा के साथ मिलाने में सहायता करते हैं। इस प्रकार भगवत्प्राप्ति हो जाने पर वेदों का काम समाप्त हो जाता है। फिर ऐसी पुण्यात्माओं के लिए वैदिक कर्तव्यों का पालन करने की कोई बाध्यता नहीं होती।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन |
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रय: || 18||
ऐसी मुक्त आत्माओं को अपने कर्तव्य का पालन करने या उनसे विमुख होने से कुछ पाना या खोना नहीं होता और न ही उन्हें अपनी निजी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहने की आवश्यकता होती है।
ये आत्मलीन संत आत्मा की अलौकिक अवस्था में स्थित रहते हैं। उनके सभी कर्म लोकातीत और भगवान की सेवा के लिए होते हैं। अतः सांसारिक मनुष्यों के लिए वर्णाश्रम धर्म के आधार पर निर्धारित कर्तव्यों का पालन करना उनके लिए अनिवार्य नहीं होता।
यहाँ कर्म और भक्ति में भेद जानना आवश्यक है। इससे पूर्व श्रीकृष्ण कर्म अर्थात् नियत सांसारिक कर्तव्यों के संबंध में व्याख्या कर रहे थे और यह कह रहे थे कि उन्हें भगवान को समर्पित करना चाहिए। यह मन की शुद्धि और उसे सांसारिक विकारों से ऊपर उठने में सहायता करता है किन्तु आत्मलीन जीवात्मा पहले ही भगवान में विलीन होकर मन को शुद्ध कर चुकी होती है।
ऐसे ज्ञानातीत संत प्रत्यक्ष रूप से भक्ति या पवित्र आध्यात्मिक क्रियाओं, जैसे कि-ध्यान, पूजा, कीर्तन और गुरु की सेवा आदि में तल्लीन रहते हैं। यदि ऐसे आत्मलीन संत सांसारिक कर्मों से विरक्त रहते हैं तो उसे पाप नहीं माना जाता। यदि वे चाहें तो अपने सांसारिक कर्मों का पालन करना आगे जारी रख सकते हैं किन्तु उनका पालन करना उनके लिए अनिवार्य नहीं होता।
इतिहास में दो प्रकार के संत हुए है:
1. प्रह्लाद, ध्रुव, अम्बरीष, पृथु और विभीषण जिन्होंने इस अवस्था को प्राप्त करने के पश्चात् भी अपने सांसारिक कर्तव्यों का निरन्तर पालन किया। ये सब कर्मयोगी थे। बाह्य रूप से वे अपने शारीरिक कर्तव्यों का पालन करते रहे और आंतरिक दृष्टि से उनका मन भगवान में अनुरक्त रहा।
2. शंकराचार्य, माध्वाचार्य, रामानुजाचार्य, चैतन्य महाप्रभु जैसे संत सांसारिक कर्मों से विमुख रहे और इन्होंने वैरागी जीवन स्वीकार किया। ये सब कर्म संन्यासी थे जो शरीर और मन सहित आंतरिक और बाह्य दोनों दृष्टि से भगवान की भक्ति में तल्लीन रहे। इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि भगवत्प्राप्त संत के लिए दोनों विकल्प होते हैं। अब अगले श्लोक में श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करेंगे कि वह अर्जुन के लिए इनमें से कौन-से विकल्प का चयन करने का सुझाव देंगे।
तस्मादसक्त: सततं कार्यं कर्म समाचर |
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुष: || 19||
अतः आसक्ति का त्याग कर अपने कार्य को फल की आसक्ति के बिना करने से ही किसी को परमात्मा की प्राप्ति होती है।
श्लोक 3.8-3.16 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिन मनुष्यों ने अभी तक सिद्धावस्था प्राप्त नहीं की है उन्हें अपने नियत कर्मों का पालन करना चाहिए। श्लोक 3.17-3.18 में उन्होंने व्यक्त किया है कि ज्ञानातीत संतों के लिए नियत कर्मों का पालन करना आवश्यक नहीं होता। अतः अर्जुन के लिए कौन-सा मार्ग अति उपयुक्त है? श्रीकृष्ण उसके लिए कर्मयोगी बनने की संस्तुति करते हैं न कि कर्म संन्यासी बनने की। अब वे श्लोक 3.20-3.26 में इसके कारणों की व्याख्या करेंगे।
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय: |
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि || 20||
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: |
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते || 21||
राजा जनक और अन्य महापुरुषों ने अपने नियत कर्मों का पालन करते हुए सिद्धि प्राप्त की थी इसलिए तुम्हें भी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए समाज के कल्याण के लिए अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। महापुरुष जो भी कर्म करते हैं, सामान्य जन उनका पालन करते हैं, वे जो भी आदर्श स्थापित करते हैं, सारा संसार उनका अनुसरण करता है।
राजा जनक ने अपने शासकीय कर्त्तव्यों का निर्वहन करते हुए कर्मयोग द्वारा सिद्ध अवस्था प्राप्त कर ली थी। ज्ञानातीत अवस्था प्राप्त करने के पश्चात् भी संसार में सामान्य लोगों के समक्ष आदर्श प्रस्तुत करने के उद्धेश्य से वे अपने नियत सांसारिक कर्त्तव्यों का पालन करते रहे ताकि लोग उनका अनुकरण कर सकें। कई अन्य महान संतों ने भी ऐसा ही किया। इन महापुरुषों द्वारा स्थापित उच्च आदर्शों को देखकर मानवजाति को प्रेरणा मिली।
मानव जाति उन्हीं आदर्शों से प्रेरित होती है जिन्हें वो महापुरुषों के जीवन में देखती है। ऐसे नेता अपने आदर्शों से समाज को प्रेरणा प्रदान करते हैं और सामान्य जन के लिए चमकते हुए प्रकाश स्तम्भ बन जाते हैं ताकि वे उनका अनुसरण कर सकें। समाज के नेताओं का यह नैतिक दायित्व होता है कि वे अपने वचनों, कार्यों और चरित्र द्वारा जनता को प्रेरित करने के लिए उच्च आदर्श स्थापित करें। जब श्रेष्ठ नेता आगे बढ़कर नेतृत्व करते हैं तब स्वाभाविक रूप से शेष समाज नैतिकता, नि:स्वार्थता और आध्यात्मिक शक्ति में ऊपर उठ जाता है। लेकिन जब किसी समय समाज आदर्शवादी नेतृत्व से शून्य होता है तब समाज के लोगों के पास अनुसरण करने के लिए कोई मानदण्ड नहीं होते और इसलिए वे आत्म केन्द्रित होकर, अपना पतन करा लेते हैं। इसलिए महापुरुषों को समाज के लिए उपयुक्त मानदण्ड स्थापित करने चाहिए, भले ही वे स्वयं लोकातीत अवस्था को प्राप्त कर चुके हों और उनके लिए नियत वैदिक कर्मों का पालन करना अनिवार्य न हो। क्योंकि ऐसा करके वे दूसरों को निर्धारित वैदिक कर्तव्यों का पालन करने के लिए प्रेरित करते हैं।
यदि समाज के जननायक कर्म संन्यासी बन जाते हैं और कर्मों का त्याग कर देते हैं तब अधिक लोग पथ से भ्रष्ट हो जायेंगे। जननायक यदि परमगति को पा चुके और पूर्णतया अध्यात्म में तल्लीन गये हों फिर भी समाज के अन्य लोग अपने कर्तव्यों से विमुख होने के लिए उनके आदर्शों का अनुकरण करेंगे। ऐसे पलायनवादी महान कर्म सन्यासियों जैसे शंकराचार्य, माध्वाचार्य, निर्म्बाकाचार्य और चैतन्य महाप्रभु का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उनके पदचिह्नों पर चलने की बात करते हुए ये पाखण्डी भी अपने सांसारिक दायित्वों का परित्याग कर देते हैं और संन्यास धारण कर लेते हैं। यद्यपि उन्होंने उस समय तक इसके लिए इन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षित मन की शुद्धता प्राप्त नहीं की होती। भारत में हमें ऐसे हजारों साधु मिलते हैं जो महान् सन्यासियों का अनुकरण करते हैं और ज्ञान और भक्ति के बिना गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं। यद्यपि वे बाह्य रूप से वैरागी बन जाते हैं किन्तु उनका स्वभाव उन्हें सुख की प्राप्ति के लिए विवश करता है और भगवान के दिव्य आनन्द से विहीन होकर वे मादक द्रव्यों के सेवन रूपी अधम सुखों के चंगुल में फंस जाते हैं। इस प्रकार से वे गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रहे लोगों के स्तर से भी नीचे गिर जाते हैं, जैसा कि निम्न दोहे में वर्णन किया गया है
ब्रह्म ज्ञान जान्यो नहीं, कर्म दिये छिटकाय।
तुलसी ऐसी आत्मा सहज नरक मँह जाय ।।
संत तुलसीदास कहते हैं "वे जो दिव्य ज्ञान की प्राप्ति के बिना सांसारिक कर्त्तव्यों का त्याग करते हैं, वे शीघ्र नरक का मार्ग तैयार करते हैं।" इसके विपरीत यदि महानायक कर्मयोगी होता है तब कम से कम उसके अनुयायी निरन्तर अपने कर्मों को कर्त्तव्यपरायणता के साथ निष्ठापूर्वक सम्पन्न कर अपने दायित्वों का निर्वहन तो करेंगे। इससे उन्हें अपने मन और इन्द्रियों पर संयम रखने में सहायता मिलेगी और शनैः-शनैः वे मायातीत अवस्था तक ऊपर उठ जाएंगे। इसलिए समाज के अनुसरणार्थ आदर्श प्रदर्शित करने के लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग का पालन करने का परामर्श देते हैं। अब उक्त बिंदु को समझाने के लिए वे अगले श्लोक में अपना उदाहरण दे रहे हैं।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन |
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि || 22||
हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरे लिए कोई कर्म निश्चित नहीं है, न ही मुझे किसी पदार्थ का अभाव है और न ही मुझमें कुछ पाने की अपेक्षा है फिर भी मैं कर्म करता हूँ।
हम सब इसलिए कार्य करते हैं क्योंकि हमारी कुछ मूलभूत आवश्यकताएँ होती हैं। हम सब आनंदसिंधु भगवान के अणु अंश हैं इसलिए हम भी आनन्द चाहते हैं। फिर भी हमें अभी तक पूर्ण आनन्द प्राप्त नहीं हुआ है। हम स्वयं को असंतुष्ट और अपूर्ण ही समझते हैं। हम जो कुछ भी करते हैं, केवल आनन्द की प्राप्ति के लिए ही करते हैं लेकिन आनन्द भगवान की एक शक्ति है और केवल वे ही असीम आनन्द के स्वामी हैं। भगवान ही पूर्ण और स्वयंसिद्ध हैं और उन्हें किसी बाहरी पदार्थ की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती इसलिए उन्हें आत्माराम, आत्मरति और आत्मक्रिड भी कहा जाता है।
यदि ऐसा परम पुरुष कोई कार्य करता है तब उसका केवल एकमात्र यह कारण होता है कि वे अपने लिए कुछ न कर लोगों के कल्याण के लिए ही कार्य करेगा। इस प्रकार से श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि साकार रूप में भी ब्रह्माण्ड में मेरे लिए किस भी प्रकार के नियत कर्म नहीं हैं लेकिन फिर भी मैं लोगों के कल्याण के लिए कर्म करता हूँ। अब वे स्पष्ट करते हैं कि जब वे कर्म करते हैं उससे भी किस प्रकार से मानव मात्र का कल्याण होता है।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रित: |
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: || 23||
यदि मैं सावधानीपूर्वक नियत कर्म नहीं करता तो हे पार्थ! सभी लोगों ने निश्चित रूप से सभी प्रकार से मेरे मार्ग का ही अनुसरण किया होता।
पृथ्वी पर अपनी दिव्य लीलाओं को प्रदर्शित करते हुए श्रीकृष्ण एक राजा और महानायक की भूमिका निभा रहे थे।
श्रीकृष्ण ने भौतिक संसार में धर्म परायण वृष्णि वंश के राजा वसुदेव के पुत्र के रूप में जन्म लिया था। यदि भगवान कृष्ण अपने निर्धारित वैदिक कर्मों का निर्वहन नहीं करते तब सामान्य जन भी उनके पदचिह्नों का अनुसरण यह सोंचकर करते कि उनका उल्लंघन करना ही उचित है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा करने से मानव जाति के विनाश का दोष उन पर लगता।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् |
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमा: प्रजा: || 24||
यदि मैं अपने निर्धारित कर्म को नहीं करता तब ये सभी लोक नष्ट हो जाते और मैं संसार में उत्पन्न होने वाली अराजकता के लिए उत्तरदायी होता और इस प्रकार से मानव जाति की शांति का विनाश करने वाला कहलाता।
जब श्रीकृष्ण धरती पर मनुष्य के रूप में प्रकट हुए तब उन्होंने एक क्षत्रिय के रूप में समाज में अपनी प्रतिष्ठा के अनुसार उपयुक्त सभी प्रकार के अपेक्षित शिष्टाचारों और कुलाचारों को अपनाया। यदि वे इसके विपरीत कर्म करते तब अन्य मनुष्य भी यह सोंचकर उनका अनुकरण करते कि उन्हें भी भगवान श्रीकृष्ण के आचरण के अनुरूप ही चलना चाहिए। यदि श्रीकृष्ण वैदिक कर्म का अनुपालन करने में असफल हो जाते तब मानव जाति भी उनके पदचिन्हों का अनुसरण कर कर्म के अनुशासन से पलायन कर अराजकता की स्थिति में आ जाती। यह एक गम्भीर अपराध होता और श्रीकृष्ण इसके दोषी कहलाते इसलिए वे अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि यदि वह अपने वर्ण धर्म का पालन नहीं करेंगे तब उसके कारण समाज में अराजकता उत्पन्न होगी।
अर्जुन अजेय तथा विश्व विख्यात योद्धा था तथा धर्मपरायण राजा युधिष्ठर का भाई था। यदि अर्जुन धर्म की रक्षा के लिए अपने कर्तव्य का पालन करने से मना कर देता तब अन्य पराक्रमी और श्रेष्ठ योद्धा भी उसका अनुकरण करते हुए धर्म की रक्षा के निमित्त अपने नियत कर्त्तव्य के पालन को त्याग देते। इससे संसार का संतुलन डगमगा जाता और निर्दोष तथा गुणी लोगों का विनाश हो जाता। इसलिए श्रीकृष्ण ने समूची मानव जाति के कल्याणार्थ अर्जुन को उसके लिए निश्चित वैदिक कर्तव्यों की उपेक्षा न करने के लिए मनाया।
सक्ता: कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत |
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् || 25||
हे भरतवंशी! जैसे अज्ञानी लोग फल की आसक्ति से कर्म करते हैं, उसी प्रकार बुद्धिमान मनुष्यों को लोगों को उचित मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करने हेतु अनासक्त रहकर कर्म करना चाहिए।
श्लोक 3.20 में पहले श्रीकृष्ण ने 'लोकसंग्रहमेवापि, सम्पश्यन्कुर्तमर्हसि' शब्दों का प्रयोग किया था जिसका अर्थ 'जन कल्याण की भावना से युक्त होना' है। इस श्लोक में 'लोकसंग्रह चिकीर्षुः' शब्द का अर्थ 'विश्व के कल्याण की इच्छा' है। इस प्रकार श्रीकृष्ण पुनः इस पर बल देते हैं कि बुद्धिमान मनुष्य को सदैव मानवता के कल्याणार्थ कार्य करना चाहिए।
इस श्लोक में 'सक्ताः अविद्वांस:' शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए किया गया जो अभी तक शरीर की चेतना में स्थित हैं और सांसारिक सुखों में आसक्त रहते हैं, साथ ही शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित वैदिक रीतियों में पूर्ण विश्वास रखते हैं। उन्हें अज्ञानी कहा जाता है क्योंकि यद्यपि उन्हें धार्मिक ग्रथों का सैद्धांतिक ज्ञान होता है लेकिन वे भगवत्प्राप्ति के परम लक्ष्य को पाना नहीं चाहते। ऐसे अज्ञानी मनुष्य बिना किसी आलस्य के निःसंकोच होकर शास्त्रों के आदेशों के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। उन्हें यह दृढ़ विश्वास होता है कि वैदिक कर्तव्यों और कर्मकाण्डों का अनुपालन करने से उन्हें उनकी इच्छा के अनुरूप भौतिक सुख प्राप्त होंगे। इसलिए यदि ऐसे लोगों का भक्ति में विश्वास विकसित हुए बिना धार्मिक कर्मकाण्डों से विश्वास उठ जाता है तब वे कहीं के नहीं रहेंगे अर्थात् उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है:
तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्देत यावता।
मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ।।
(श्रीमद्भागवतम् 11.20.9)
"मनुष्य को अपने नियत कर्मों का सम्पादन तब तक करना चाहिए जब तक उनमें विषय भोगों के प्रति विरक्ति और भगवान के लिए अनुराग विकसित नहीं होता।" श्रीकृष्ण अर्जुन से आग्रह करते हैं कि जैसे अज्ञानी श्रद्धापूर्वक वैदिक कर्मकाण्डों का पालन करते हैं, उसी प्रकार से ज्ञानी पुरूष को भी भौतिक सुख समृद्धि की अपेक्षा शेष समाज के लिए आदर्श स्थापित करने के लिए निष्ठापूर्वक अपने नियत कर्मों का निष्पादन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जिन विशेष परिस्थितियों में अर्जुन स्वयं को पाता है, वह धर्मयुद्ध है। इसलिए अर्जुन को समाज के कल्याण के लिए अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करना चाहिए।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् |
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन् || 26||
ज्ञानवान मनुष्यों को चाहिए कि वे अज्ञानी लोगों को जिनकी आसक्ति सकाम कर्म करने में रहती है, उन्हें कर्म करने से रोक कर उनकी बुद्धि में संशय उत्पन्न न करें अपितु स्वयं ज्ञानयुक्त होकर अपने कार्य करते हुए उन अज्ञानी लोगों को भी अपने नियत कर्म करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
महापुरुषों का दायित्व अति महत्वपूर्ण होता है क्योंकि सामान्य जन उनका अनुसरण करते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि ज्ञानी पुरुष कोई ऐसा कार्य न करें या कुछ ऐसा न कहें कि जो अज्ञानी लोगों को अधोपतन की ओर ले जाए। यहाँ यह तर्क दिया जा सकता है कि यदि ज्ञानीजन अज्ञानियों के प्रति करुणा भाव रखते हैं तब उन्हें उनको भगवत्प्राप्ति का ज्ञान प्रदान करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण इस तर्क को 'न बुद्धिभेदं जनयेत्' कहकर निष्प्रभावी करते हैं जिसका तात्पर्य यह है कि अज्ञानी को दिव्य उपदेश सुनाकर उन्हें कर्मों का परित्याग करने की शिक्षा नहीं देनी चाहिए क्योंकि उनमें ऐसे उपदेशों को समझने की योग्यता नहीं होती। प्रायः लौकिक चेतना युक्त लोगों के पास केवल दो विकल्प होते हैं या तो वे लोग सुखद परिणाम की इच्छा से कड़ा परिश्रम करते हैं या फिर वे यह तर्क देते हुए कर्म करना छोड़ देते हैं कि सभी कार्य अत्यंत कठिन, कष्टदायक और बुराइयों से युक्त होते हैं। इन दोनों में फल की इच्छा से कर्म करना पलायनवादी व्यक्ति के दृष्टिकोण से श्रेष्ठ है। इसलिए वैदिक ज्ञान के विद्वानों को अज्ञानियों को सावधानीपूर्वक और ध्यान से अपने कर्मों का पालन करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। यदि अज्ञानी लोगों का मन विक्षुब्ध और अस्थिर हो जाता है तब उनका कर्म करने से विश्वास उठ जाएगा और नियत कर्मों का त्याग करने से उनका ज्ञान नहीं बढ़ेगा। इस प्रकार अज्ञानियों की दोनों ओर से हानि होगी। यदि अज्ञानी और ज्ञानीजन दोनों वैदिक कर्म करते हैं तब फिर दोनों के बीच क्या भेद रह जाएगा? इस प्रश्न को समझाने के लिए श्रीकृष्ण इसे अगले दो श्लोकों में स्पष्ट कर रहे हैं।
प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश: |
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते || 27||
जीवात्मा देह के मिथ्या ज्ञान के कारण स्वयं को अपने सभी कर्मों का कर्ता समझती है।यद्यपि विश्व के सभी कार्य प्रकृति के तीन गुणों के अन्तर्गत सम्पन्न होते हैं लेकिन अहंकारवश जीवात्मा स्वयं को अपने सभी कर्मों का कर्ता समझती है।
हम जानते हैं कि संसार हमारे द्वारा निर्देशित नहीं होता अपितु प्रकृति द्वारा कार्यान्वित होता है। हमारे शरीर की क्रियाएँ जिन्हें हम प्रायः दो श्रेणियों में विभक्त करते हैं-1. प्राकृतिक जैविक क्रियाएँ, जैसे-पाचन, रक्त संचालन, हृदय गति आदि का संचालन हमारे सोंच-विचार के बिना स्वाभाविक रूप से संपन्न होता है। बोलना, सुनना, चलना, सोना और काम करना आदि क्रियाओं का संचालन हमारे सोंचने और विचारने से होता है।
उपर्युक्त दोनों प्रकार के कार्य इस मानव तंत्र द्वारा संपन्न होते हैं। मानव तंत्र के सभी अंग प्रकृति या भौतिक शक्ति द्वारा निर्मित होते हैं जिसमें तीन गुण-सत्व, रजस, और तमस सम्मिलित हैं। जैसे लहर समुद्र से अलग नहीं होती अपितु उसमें समाकर उसका अंश बनी रहती है, उसी प्रकार से शरीर उसी प्रकृति का अंग है जिससे इसकी रचना होती है। इस प्रकार से प्रकृति अर्थात् माया शक्ति ही संसार में होने वाले सभी कार्यकलापों की जननी है। तब फिर आत्मा स्वयं को कर्मों का कर्ता क्यों समझती है। इसका कारण यह है कि मिथ्या अभिमान के बोध से आत्मा भ्रम के कारण स्वयं को शरीर समझ लेती है। इसलिए उसे कर्ता होने का भ्रम हो जाता है। देखिए, जिस प्रकार अगर रेलवे प्लेटफार्म पर दोनों ओर दो ट्रेन खड़ी है और एक रेलगाड़ी के यात्री दूसरी रेलगाड़ी पर अपनी दृष्टि रखे हुए हैं और फिर जब दूसरी रेलगाड़ी चलने लगती है तब पहली गाड़ी भी चलती हुई प्रतीत होने लगती है। इसी प्रकार से अचल आत्मा स्वयं को सचल प्रकृति के रूप में पहचानने लगती है। जिस क्षण आत्मा अभिमान को त्याग कर भगवान की इच्छा के आगे समर्पण कर देती है तब उसे स्वयं के अकर्ता होने का आभास होता है। अब कोई यह प्रश्न कर सकता है कि यदि आत्मा वास्तव में अकर्ता है तब फिर वह शरीर द्वारा किए गए कार्यों के कारण कर्मों के बंधन में क्यों फंसती है। इसका कारण यह है कि आत्मा स्वयं कोई कार्य नहीं करती लेकिन वह इन्द्रिय-मन-बुद्धि को कार्य करने का निर्देश देती है। उदाहरण गार्थ रथ का सारथी स्वयं रथ को नहीं चलाता अपितु घोड़ों को निर्देश देता है। अब यदि कोई दुर्घटना घटित होती है तब उसका दोष घोड़ों का न होकर अपितु उन्हें निर्देशित करने वाले सारथी का होता है। उसी प्रकार से आत्मा शरीर के कार्यों के लिए उत्तरदायी होती है क्योंकि इन्द्रिय, मन और बुद्धि आत्मा से प्रेरणा पा कर ही कार्य करते हैं।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयो: |
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते || 28||
हे महाबाहु अर्जुन! तत्त्वज्ञानी आत्मा को गुणों और कर्मों से भिन्न रूप में पहचानते हैं वे समझते हैं कि 'इन्द्रिय, मन, आदि के रूप में केवल गुण ही हैं जो इन्द्रिय विषयों, (गुणेषु) में संचालित होते हैं। इसलिए वे उनमें नहीं फंसते।
गत श्लोक में अहंकार विमूढात्मा शब्दों का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ है 'जो अहंकार से मोहित होकर स्वयं को शरीर मान लेते हैं और स्वयं को कर्ता समझने लगते हैं।' इस श्लोक में तत्त्ववित्तु या सत्यदर्शियों के संबंध में व्याख्या की गयी है। जिसका तात्पर्य यह है कि वे अहंकार को त्याग कर शारीरिक चेतना से मुक्त हो जाते हैं और इस शरीर से भिन्न अपने स्वरूप को जानने में समर्थ हो जाते हैं। इसलिए वे अपने लौकिक कर्मों के लिए स्वयं को कर्ता नहीं मानते और सभी क्रियाओं को तीन गुणों का परिणाम मानते हैं। ऐसे भगवतप्राप्त संत कहते हैं, " जो करै सो हरि करै, होत कबीर कबीर।" "सब कुछ भगवान करता है किन्तु लोग स्वयं को कर्ता मानने की भूल करते हैं।"
प्रकृतेर्गुणसम्मूढा: सज्जन्ते गुणकर्मसु |
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् || 29||
जो मनुष्य प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मोहित हो जाते हैं वे फल प्राप्ति की कामना के साथ अपने कर्म करते हैं लेकिन बुद्धिमान पुरुष जो इस परम सत्य को जानते हैं, उन्हें ऐसे अज्ञानी लोगों को विचलित नहीं करना चाहिए।
अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि आत्मा गुणों और उनकी क्रियाओं से पृथक् है तब फिर अज्ञानी मनुष्य विषय भोगों की ओर आसक्त क्यों होते हैं। श्रीकृष्ण इस श्लोक में इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि वे माया के तीन गुणों से मोहित होकर स्वयं को कर्ता मान लेते हैं। माया के तीन गुणों से मुग्ध होकर वे कामसुख और मानसिक आनन्द की प्रप्ति के लिए ही कार्य करते हैं। वे फल की इच्छा के बिना कर्तव्य पालन करने में असमर्थ होते हैं।
फिर भी ‘कृत्स्नवित्' ज्ञानवान मनुष्य को 'अकृत्स्नवित्' अज्ञानी मनुष्य के मन को विक्षुब्ध नहीं करना चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि ज्ञानी पुरूषों को अज्ञानी लोगों पर अपने विचारों को बलात् यह कहकर थोपना नहीं चाहिए 'तुम शरीर नहीं आत्मा हो और इसलिए कर्म करना निरर्थक है, अतः कर्म का त्याग करो' बल्कि इसके विपरीत उन्हें अज्ञानी लोगों को अपने नियत कर्म करने का उपदेश देना चाहिए जिससे उन्हें धीरे-धीरे आसक्ति से ऊपर उठने में सहायता मिल सके। इस प्रकार ज्ञानी और अज्ञानी मनुष्यों के बीच अन्तर स्पष्ट करने के पश्चात् श्रीकृष्ण कहते हैं कि अज्ञानी लोगों के मन को क्षुब्ध नहीं करना चाहिए।
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा |
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर: || 30||
अपने समस्त कर्मों को मुझको अर्पित करके और परमात्मा के रूप में निरन्तर मेरा ध्यान करते हुए कामना और स्वार्थ से रहित होकर अपने सन्तापों को त्याग कर युद्ध करो।
अपनी विलक्षण शैली में श्रीकृष्ण पहले विषय को प्रतिपादित करते हैं और तत्पश्चात् उसका सार प्रकट करते हैं। 'अध्यात्मचेतसा' शब्द का अर्थ 'भगवान को समर्पित करने की भावना के साथ' तथा 'संन्यस्य' शब्द का अर्थ 'जो भगवान को समर्पित न हो उन सबका परित्याग करना' है। 'निराशी' शब्द का तात्पर्य कर्मों के फलों में आसक्ति न रखने से है। स्वामित्व की भावना को त्यागने के लिए सभी कर्मों को भगवान के प्रति समर्पित करना और अपने निजी लाभ, लालसा और शोक का त्याग करना आवश्यक है। पिछले श्लोक में दिए गए उपदेशों का सार यह है कि हमें निष्ठापूर्वक यह चिन्तन करना चाहिए-"मेरी आत्मा परम शक्तिशाली भगवान का अणु अंश है। वे सभी पदार्थों के भोक्ता और स्वामी हैं। मेरे सभी कर्म उनके सुख के निमित्त हों और इसलिए मुझे अपने सभी कर्तव्यों का पालन उनके प्रति यज्ञ या समर्पण की भावना से करना चाहिए। उनके द्वारा प्रदत्त शक्ति से ही मैं अपने यज्ञ कर्म को सम्पन्न करता हूँ। इसलिए मुझे अपने कर्मों के शुभ परिणामों का श्रेय नहीं लेना चाहिए।"
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवा: |
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभि: || 31||
जो मनुष्य अगाध श्रद्धा के साथ मेरे इन उपदेशों का पालन करते हैं और दोष दृष्टि से परे रहते हैं, वे भी कर्म के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।
भगवान ने सिद्धान्त शब्द की व्याख्या 'मत' के रूप में की है। मत एक व्यक्तिगत विचार है जबकि सिद्धान्त सार्वभौमिक सत्य है। आचार्यों के मत विभिन्न हो सकते हैं किन्तु सिद्धान्त समान रहता है। दार्शनिक, आचार्य और शिक्षक अपने मत को सिद्धान्त का नाम देते हैं किन्तु गीता में श्रीकृष्ण ने अपने सिद्धान्तों को मत के रूप में अभिव्यक्त किया है। अपने आचरण द्वारा वे हमें सौहार्दपूर्ण और दीनता का व्यवहार करने का उपदेश दे रहे हैं।
कर्म करने का आह्वान करते हुए श्रीकृष्ण अब भगवद्गीता के उपदेशों के महत्त्व को श्रद्धापूर्वक स्वीकार करने और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का संदेश देते हैं। मानव के रूप में हमारा दायित्व है कि हम सत्य को जानें और तदनुसार अपने जीवन को सुधारे। ऐसा करने से हमारे मानसिक सन्ताप, काम, लोभ, ईर्ष्या, मोह आदि शान्त हो जाते हैं।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को स्पष्ट रूप से अपने सभी कर्म उन्हें समर्पित करने को कहा था। वे जानते हैं कि उनसे ईर्ष्या करने वाले लोगों के लिए उनके कथन उपहास और निंदा का कारण हो सकते हैं। इसलिए अब वे अपने दिव्य उपदेशों को समर्पित भाव से स्वीकार करने पर जोर देते हैं। उनके कथन के अनुसार जो मनुष्य इन उपदेशों का श्रद्धापूर्वक अनुसरण करते हैं, वे कर्म के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। लेकिन जो श्रद्धायुक्त नहीं हैं उनकी क्या दशा होगी? उनकी दुर्दशा को अगले श्लोक में व्यक्त किया गया है।
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् |
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतस: || 32||
किन्तु जो मेरे उपदेशों में दोष ढूंढते हैं, वे ज्ञान से वंचित और विवेकहीन होते हैं, इन सिद्धान्तों की उपेक्षा करने से वे अपने विनाश का कारण बनते हैं।
श्रीकृष्ण द्वारा प्रस्तुत उपदेश हमारे कल्याण के लिए अति उपयुक्त हैं। हमारी मायाबद्ध बुद्धि में अनगिनत दोष हैं जिसके कारण हम भगवान के उपदेशों की महत्ता को समझने या उसकी सराहना करने में सक्षम नहीं होते। यदि ऐसा हो जाये तो परमात्मा और जीवात्मा के बीच क्या भेद रह जाएगा है? इसलिए गीता के दिव्य उपदेशों को स्वीकार करने के लिए श्रद्धा अनिवार्य है। जब हमारी बुद्धि इन्हें समझने की अपेक्षा इन उपदेशों में दोष ढूंढने लगती है तब हमें यह सोंचकर अपनी बुद्धि का समर्पण कर देना चाहिए-" श्रीकृष्ण ने ऐसा कहा है। इसमें अवश्य ही सत्यता है जिसे मैं अभी समझ नहीं सकता। अभी मुझे यह स्वीकार करना चाहिए और आध्यात्मिक साधना करनी चाहिए। इन उपदेशों को मैं तब समझ पाऊँगा जब मैं साधना द्वारा आध्यात्मिक पथ पर उन्नति कर लूंगा।" इसी मनोवृति को श्रद्धा कहते हैं।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने श्रद्धा की परिभाषा इस प्रकार से की है-" गुरु-वेदान्त-वाक्येशु दृढो विश्वासः" अर्थात् 'श्रद्धा गुरु और शास्त्रों के वचनों में दृढ़ विश्वास' है। चैतन्य महाप्रभु ने भी इसी प्रकार की व्याख्या की है-“श्रद्धा शब्दे विश्वास कहे सुदृढ निश्चय" (चैतन्य चरितामृत मध्य लीला 2.62) अर्थात् “श्रद्धा का अर्थ गुरु और भगवान में अटूट विश्वास होना है', भले ही हम वर्तमान में उनके उपदेशों को समझने में असमर्थ हैं। ब्रिटिश कवि अल्फ्रेड टेनिसन ने कहा था- "जहाँ हम सिद्ध नहीं कर सकते वहाँ केवल श्रद्धा द्वारा ही विश्वास को अंगीकार किया जा सकता है।" इसलिए श्रद्धा का अर्थ यह है कि भगवद्गीता के समझे जाने वाले सरल अंशों को विनम्रतापूर्वक आत्मसात् करते हुए और इसके कठिन अंशों को भी इस आशा के साथ स्वीकार करना चाहिए कि ये भी भविष्य में समझ में आ जायेंगे।
मायिक बुद्धि का एक मुख्य दोष अहंकार है। अहंकार के कारण जिसे वर्तमान में बुद्धि समझ नहीं सकती प्रायः उसे दोष युक्त मानकर अस्वीकार कर देती है। यद्यपि सर्वज्ञ भगवान के रूप में भगवान श्रीकृष्ण ने जीवात्मा के कल्याण हेतु अपने दिव्य उपदेश प्रकट किए हैं किन्तु मनुष्य उसमें अभी तक दोष ढूंढते हैं, जैसे-" भगवान स्वयं को सभी कुछ समर्पित करने के लिए क्यों कहते हैं? क्या भगवान लोभी हैं? क्या वे अहंकारी हैं जो अर्जुन को अपनी उपासना करने को कहते हैं?"
श्रीकृष्ण कहते हैं-"ऐसे लोग विवेक शून्य हैं क्योंकि वे शुद्ध और अशुद्ध, धर्म और अधर्म सृष्टि के कर्ता और कृत्य, परम स्वामी और दास के बीच के अन्तर को समझने में असमर्थ होते हैं। ऐसे मनुष्य अपने विनाश का कारण बनते हैं" क्योंकि वे परम मुक्ति के मार्ग को अस्वीकार कर देते हैं और जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमते रहते हैं।
सदृशं चेष्टते स्वस्या: प्रकृतेर्ज्ञानवानपि |
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह: किं करिष्यति || 33||
बुद्धिमान लोग भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही कार्य करते हैं क्योंकि सभी जीव अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति से प्रेरित होते हैं। दमन से क्या प्राप्त हो सकता है?
इस श्लोक में श्रीकृष्ण पुनः इस बिन्दु की ओर लौटते हैं कि कर्म करना निष्क्रिय रहने से श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव से प्रेरित होकर लोग अपने व्यक्तिगत गुणों के अनुसार कार्य करने में प्रवृत्त होते हैं जबकि सैद्धान्तिक रूप से शिक्षित लोग भी अपने अनन्त पूर्वजन्मों के संस्कारों, इस जन्म के 'प्रारब्ध' तथा अपने मन और बुद्धि की गठरी को अपने साथ उठाए रहते हैं। उन्हें प्रतीत होता है कि इस प्रकृति और प्रवृत्ति के वेग को रोकना कठिन है। यदि वैदिक ग्रंथ उन्हें सभी प्रकार के कर्मों का त्याग करने का और केवल आध्यात्मिकता में तल्लीन होने का उपदेश देते तब इससे असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो गयी होती। ऐसी कृत्रिम विमुखता का प्रतिकूल प्रभाव होता। आध्यात्मिक उन्नति का उपयुक्त और सरल मार्ग प्रकृति और प्रवृत्ति की असीम शक्ति का प्रयोग करना और इनकी दिशा को भगवान की ओर परिवर्तित करना है। जिस स्थिति में हम हैं वहीं से हमें आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होना आरम्भ करना चाहिए और ऐसा करने के लिए हमें सर्वप्रथम अपनी वर्तमान मनोदशा को स्वीकार करना होगा और तत्पश्चात् इसे सुधारना होगा।
हम देखते हैं कि जानवर भी स्वभाव के अनुसार कार्य करते हैं। चीटियाँ एक सामाजिक प्राणी के रूप में अपने समुदाय की देखभाल के लिए भोजन एकत्रित करती हैं। ऐसा गुण मनुष्य में कठिनता से देखने को मिलता है। एक गाय का अपने बछड़े से स्वाभाविक लगाव होता है। एक क्षण के लिए भी जब वह उसकी आंखों से ओझल होता है तब गाय अत्यंत व्याकुल हो जाती है। कुत्ते की स्वामिभक्ति की तुलना भी सभ्य मनुष्यों से नहीं की जा सकती। उसी तरह मनुष्य भी अपनी प्रकृति से प्रेरित होते हैं। चूँकि अर्जुन योद्धा था इसलिए श्रीकृष्ण ने उससे कहा कि 'तुम्हारा क्षत्रिय स्वभाव तुमसे युद्ध की अपेक्षा करता है' (भगवद्गीता 18.59)। 'तुम अपने जन्मजात स्वभाव से जनित कर्म द्वारा बाध्य होकर इसे करोगे' (भगवद्गीता 18.60)। हमें अपने लक्ष्य को सांसारिक सुखों से हटाते हुए उसे भगवत्प्राप्ति की ओर परिवर्तित कर अपने स्वभाव का परिष्कार करना चाहिए और अपने नियत कर्तव्यों का पालन बिना आसक्ति और द्वेष भाव से ईश्वर सेवा की भावना के साथ करना चाहिए।
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ |
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ || 34||
इन्द्रियों का इन्द्रिय विषयों के साथ स्वाभाविक रूप से राग और द्वेष होता है किन्तु मनुष्य को इनके वशीभूत नहीं होना चाहिए क्योंकि ये आत्म कल्याण के मार्ग के अवरोधक और शत्रु हैं।
यद्यपि श्रीकृष्ण ने पहले यह कहा था कि मन और इन्द्रियाँ अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति द्वारा प्रेरित होती हैं, किन्तु अब वे इन्हें वश में करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाल रहे हैं। जब तक हमारा भौतिक शरीर हमारे साथ है तब तक उसकी देखभाल के लिए हमें विषयों का भोग करना पड़ता है। श्रीकृष्ण उपयोग को रोकने के लिए नहीं कहते किन्तु वे आसक्ति और द्वेष के उन्मूलन का अभ्यास करने का उपदेश देते हैं। पूर्वजन्म के संस्कारों का सभी मनुष्यों के जीवन पर निश्चित रूप से गहन प्रभाव पड़ता है लेकिन यदि हम गीता द्वारा सिखायी गयी विधि का अभ्यास करते हैं तब हम अपनी दशा को सुधारने में सफल हो सकते हैं।
इन्द्रियाँ अपने विषयों की ओर आकर्षित होती हैं और उनके सन्निकर्ष से सुख और दुःख की अनुभूति होती है। जिह्वा स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद चखना चाहती है और कड़वा स्वाद उसे पसंद नहीं आता। मन बार-बार सुख और दुःख से जुड़े विषयों का चिन्तन करता है। विषयों के सुख के अनुभव से आसक्ति और दुःख के अनुभव से द्वेष उत्पन्न होती है। श्रीकृष्ण अर्जुन को न तो आसक्ति और न ही द्वेष के वशीभूत होने को कहते हैं।
अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए हमें अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। हमें न तो अनुकूल परिस्थितियों के लिए लोभ करना चाहिए और न ही प्रतिकूल परिस्थितियों की उपेक्षा करनी चाहिए। जब हम मन और इन्द्रियों के रुचिकर और अरुचिकर दोनों विषयों की दासता से मुक्त हो जाते हैं तब हम अपनी अधम प्रकृति से ऊपर उठ जाते हैं और फिर हम अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करते समय सुख और दुःख दोनों में समभाव से रहते हैं। तब हम वास्तव में अपनी विशिष्ट प्रकृति से मुक्त होकर कार्य करते हैं।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: || 35||
अपने धर्म को दोष युक्त सम्पन्न करना किसी अन्य के धर्म को समुचित ढंग से सम्पन्न करने से कहीं अधिक श्रेष्ठ होता है। वास्तव में अपने कर्तव्य का पालन करते हुए मर जाना दूसरों के कर्तव्य का अनुसरण करने से श्रेयस्कर होता है। दूसरे के धर्म का पालन भययुक्त है।
इस श्लोक में धर्म शब्द चार बार प्रयुक्त हुआ है। धर्म का प्रयोग प्रायः हिन्दुत्व और बौद्ध के लिए किया जाता है किन्तु अंग्रेजी भाषा में इस शब्द का अनुवाद अत्यंत दुष्कर है। धर्म शब्द की रचना 'धृ' धातु से हुई है जिसका अर्थ धारण करने योग्य या उपयुक्त उत्तरदायित्व, कर्तव्य, विचार, और कर्म है। उदाहरणार्थ आत्मा का धर्म भगवान से प्रेम करना है। यह हमारे अस्तित्व का मुख्य सिद्धान्त है।
स्व उपसर्ग का अर्थ 'स्वयं' है। इस प्रकार स्वधर्म हमारा निजी धर्म है। स्व धर्म हमारे निजी जीवन की स्थिति, परिपक्वता और व्यवसाय पर लागू होता है और जैसे-जैसे हम आध्यात्मिक रूप से उन्नत होते हैं वैसे ही हमारी परिस्थितियों में परिवर्तन आने पर हमारा स्वधर्म भी परिवर्तित हो सकता है। श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके स्वधर्म का पालन करने के लिए कहते हुए उसे समझा रहे हैं कि वह अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करे और इसमें कोई शिथिलता प्रदर्शित न करे जिससे कोई दूसरा इसका अनुचित लाभ न उठा सके।
किसी अन्य का अभिनय करने की अपेक्षा अपनी वास्तविकता में आनन्दित होना अत्यंत श्रेयस्कर होता है। प्रकृति द्वारा निश्चित अपने कर्तव्यों का निर्वहन हम मन की स्थिरता के साथ सरलता से कर सकते हैं। दूसरों के कार्य हमें आकर्षित कर सकते हैं और यदि हम तदनुसार अपने कार्यों को परिवर्तित करने का विचार करते हैं तब ऐसा करना उचित नहीं होगा। यदि ये कार्य हमारी प्रकृति के प्रतिकूल हैं तब ये हमारी इन्द्रियों, मन और बुद्धि में असामंजस्य उत्पन्न करेंगे। ऐसा करना हमारी चेतना के लिए हानिकारक और आध्यात्मिक पथ पर हमारी उन्नति के मार्ग में बाधक होगा। श्रीकृष्ण इस बिन्दु पर बल देते हुए यह कहते हैं कि अपने धर्म का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए अपने प्राणों का बलिदान देना दूसरों के कार्यों में प्रवृत्त होकर अप्रिय स्थिति में फंसने से श्रेष्ठ है।
अर्जुन उवाच |
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष: |
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित: || 36||
अर्जुन ने कहा! हे वृष्णिवंशी, श्रीकृष्ण! इच्छा न होते हुए भी मनुष्य पापजन्य कर्मों की ओर क्यों प्रवृत्त होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि उसे बलपूर्वक पाप कर्मों में लगाया जाता है।
श्रीकृष्ण ने पिछले श्लोक में यह अभिव्यक्त किया था कि किसी भी मनुष्य को आसक्ति या द्वेष से युक्त नहीं होना चाहिए। अर्जुन इस प्रकार का उत्तम जीवनयापन करना चाहता है किन्तु उसे भगवान के उपदेश का अनुपालन करना कठिन लगता है। इसलिए वह श्रीकृष्ण से अति एक अत्यंत गंभीर प्रश्न पूछता है। वह कहता है, "कौन सी शक्ति हमें उच्च आदर्शों को प्राप्त करने से रोकती है। मनुष्य राग और द्वेष के वशीभूत कैसे हो जाता है?" हमारी अन्तरात्मा को पाप करते हुए पश्चात्ताप का बोध होता है। यह बोध इस तथ्य पर आधारित है कि भगवान गुणों के धाम हैं और उनके अणु अंश होने के कारण स्वाभाविक रूप से हमारा आकर्षण अच्छाइयों के प्रति होता है। अच्छाई ही जो आत्मा की प्रकृति है तथा यह अंतरात्मा की आवाज को उन्नत करती है। इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि चोरी, ठगी, निंदा, लूट-खसोट, हत्या, अत्याचार और भ्रष्टाचार जैसे कार्य पापजन्य कृत्य नहीं हैं। हमारी अन्तर्दृष्टि यह बोध कराती है कि ये सब कार्य पापजन्य हैं फिर भी हम ऐसे कार्य करते हैं जैसे कि कोई शक्ति हमें बलपूर्वक ऐसा करने के लिए विवश करती है। अर्जुन इसी प्रबल शक्ति के संबंध में जानना चाहता है।
श्रीभगवानुवाच |
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव: ||
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् || 37||
परमात्मा श्रीकृष्ण कहते हैं- काम वासना जो रजोगुण से उत्पन्न होती है और बाद में क्रोध का रूप धारण कर लेती है, इसे पाप के रूप में संसार का सर्वभक्षी शत्रु समझो।
वेदों में प्रयुक्त काम शब्द या वासना केवल यौन इच्छाएँ नहीं हैं बल्कि इसमें सभी प्रकार के भौतिक सुख भी सम्मिलित हैं। इस प्रकार वासना कई रूप दर्शाती है, जैसे धन की इच्छा, शारीरिक लालसाएँ, प्रतिष्ठा की अभिलाषा, सत्ता की भूख इत्यादि। वासना केवल भगवान के प्रति प्रेम का विकृत प्रतिबिंब है जो कि प्रत्येक जीवित प्राणी का अंतर्निहित स्वभाव है। जब आत्मा शरीर से संयुक्त होकर माया शक्ति के सम्पर्क में आती है तब तमोगुण के संयोग से इसका दिव्य प्रेम वासना में परिवर्तित हो जाता है। दिव्य प्रेम भगवान की सर्वोच्च शक्ति है। अतः भौतिक क्षेत्र में इसका विकृत स्वरूप जो कि काम वासना है, वह भी अति प्रबल शक्ति है। श्रीकृष्ण ने सांसारिक सुखों के भोग की लालसा को पाप के रूप में चिह्नित किया है क्योंकि यह प्रलोभन हमारे भीतर छिपा रहता है। रजोगुण आत्मा को यह विश्वास दिलाता है कि सांसारिक विषय भोगों से ही तृप्ति प्राप्त होगी। इसलिए किसी भी मनुष्य में इन्हें प्राप्त करने की कामना उत्पन्न होती है। जब कामना की पूर्ति होती है तब इससे लोभ उत्पन्न होता है और इसकी संतुष्टि न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। कामना, लोभ और क्रोध इन तीनों विकारों से ग्रस्त होकर मनुष्य पाप करता है। लोभ कामनाओं का प्राबल्य है जबकि क्रोध कुण्ठित इच्छा है। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने वासना या कामना को सभी बुराइयों की जड़ के रूप में चिह्नित किया है।
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च |
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् || 38||
जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है, दर्पण धूल से आवृत रहता है तथा भ्रूण गर्भाशय से अप्रकट रहता है, उसी प्रकार से कामनाओं के कारण मनुष्य के ज्ञान पर आवरण पड़ा रहता है।
उचित और अनुचित के ज्ञान को विवेक कहा जाता है। यह विवेक मनुष्य की बुद्धि में होता है। वैसे भी काम-वासना एक ऐसा दुर्जेय शत्रु है जो बुद्धि की विवेक शक्ति को आवृत्त कर देता है। श्रीकृष्ण ने इस सिद्धान्त पर प्रकाश डालने हेतु तीन उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। अग्नि जो प्रकाश का स्रोत है, धुएँ से ढकी रहती है। यह आंशिक अंधकार अर्थात् अविवेक छितराए बादलों जैसा होता है जिससे सात्विक इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं। दर्पण परावर्तन करता है और धूल से ढक जाता है। यह बुद्धि पर राजसिक कामनाओं के प्रभाव जैसी होती है। भ्रूण गर्भाशय से आवृत्त होता है। यह तामसिक कामनाओं का प्रतीक है जो मनुष्य की विवेक शक्ति को नष्ट कर देता है। उसी प्रकार हमारी कामनाओं के कारण हमारे द्वारा सुना और पढ़ा गया आध्यात्मिक ज्ञान आच्छादित हो जाता है।
इस विषय पर एक सुन्दर कथा इस प्रकार है-एक व्यक्ति जंगल के किनारे प्रतिदिन भ्रमण करता था। एक बार सायंकाल उसने जंगल के भीतर भ्रमण करने का निर्णय लिया। जंगल में कुछ ही मील चलने पर सूर्यास्त होने लगा। जैसे ही वह जंगल से बाहर जाने के लिए वापस मुड़ा तब वह यह देखकर भयभीत हुआ कि दूसरी ओर कई जंगली जानवर खड़े थे। वे खूखार जंगली जानवर उसका पीछा करने लगे और उनसे बचने के लिए वह जंगल में और भीतर की ओर दौड़ने लगा तब उसने अपने सम्मुख एक डायन को खड़ा पाया जो दोनों हाथों को पसारे उसे गले लगाना चाहती थी। उससे बचने के लिए वह दिशा बदलकर भागने लगा और फिर वह पेण्डुलम की भांति डायन और जंगली जानवरों के बीच भागता रहा। इसके बाद अंधेरा हो गया। अधिक दिखाई न देने के कारण वह एक गड्ढे की ओर चला गया जो अंगूर की लताओं से ढका हुआ था। उसमें वह सिर के बल गिरा लेकिन उसके पैर अंगूर की लताओं के बीच फंस गए। परिणामस्वरूप वह गड्ढे के उपर उल्टा झूलने लगा। कुछ समय पश्चात् उसकी चेतना लौटी और उसने देखा कि एक सर्प गड्ढे के नीचे बैठा है जो उसके नीचे गिरने पर उसे डंसने की प्रतीक्षा कर रहा था। कुछ ही क्षणों में वहाँ एक सफेद और एक काले रंग का चूहा दिखा। दोनों चूहें उन टहनियों को काटने लगे जिन पर अंगूर की बेलें लटकी हुई थीं। तभी कुछ ततैये वहाँ आकर उसके मुख पर काटने लगे। किंतु इस विकट परिस्थिति में वह व्यक्ति हँसने लगा। तब कई दार्शनिक वहाँ यह ज्ञात करने आए कि इस प्रतिकूल परिस्थिति में वह व्यक्ति क्यों हँस रहा था। उन्होंने ऊपर की ओर मधुमक्खी के छत्ते को देखा जिसमें से मधु की कुछ बूंदें टपक कर उसकी जीभ पर गिर रही थी। वह मधु को चाटते हुए सोंच रहा था कि यह कितना विलक्षण सुख है और वह जंगली जानवरों, डायन, सर्प, चूहे और ततैयों को भूल गया।
यह व्यक्ति हमें पागल प्रतीत हो सकता है। हालाँकि यह कथा कामनाओं के अधीन रहने वाले सभी मनुष्यों की दशा का वर्णन करती है। जिस जंगल में वह व्यक्ति भ्रमण कर रहा था वह इसी लौकिक संसार का चित्रण करता है जिसमें हम वास करते हैं तथा प्रत्येक क्षण जोखिम से भरा है। उस व्यक्ति का पीछा करने वाले जंगली पशु हमारे जीवन में आने वाले रोगों के द्योतक हैं जो लगातार हमें कष्ट प्रदान करते हैं। डायन वृद्धावस्था का प्रतीक है जो समय व्यतीत होने पर हमारा आलिंगन करने के लिए खड़ी हैं। गड्ढे के नीचे बैठा सर्प प्रतीक्षारत मृत्यु का प्रतीक है। सफेद और काले चूहे जो लताओं को काट रहे थे वे दिन और रात के सूचक है जो हमारे जीवन को धीरे-धीरे मृत्यु के समीप ले जा रहे है। उस व्यक्ति के मुख पर बैठे ततैये हमारी असीम कामनाओं के समान हैं जो हमारी पीड़ा और दुःख का कारण हैं। शहद काम-वासना के सुखों को चित्रित करती है जो हमारे विवेक और बुद्धि को धुंधला करते हैं। विषय भोग में हम इतना लिप्त हो जाते हैं कि हमें अपनी दुर्दशा का आभास नहीं हो पाता । श्रीकृष्ण ने यहाँ व्यक्त किया है कि इस प्रकार की कामनाएँ हमारी विवेक शक्ति पर आवरण डालती हैं।
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा |
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च || 39||
हे कुन्ती पुत्र! इस प्रकार ज्ञानी पुरुष का ज्ञान भी अतृप्त कामना रूपी शत्रु से आच्छादित रहता है जो कभी संतुष्ट नहीं होता और अग्नि के समान जलता रहता है।
यहाँ श्रीकृष्ण ने काम या वासना की कृति को सुस्पष्ट किया है। काम का अर्थ 'इच्छा', दुष्प्रेरण का अर्थ 'अतृप्ति' और अनलेन का अर्थ 'अग्नि के समान' है। कामनाएँ बुद्धिमान पुरूष के विवेक पर विजय पा लेती हैं और अपनी तुष्टि के लिए उन्हें लुभाती हैं । कामना रूपी अग्नि को शांत करने का जितना भी अधिक प्रयास किया जाए यह उतनी ही और अधिक भीषणता से भड़कती है। महात्मा बुद्ध के कथन हैं:
न कहापणवस्सेन, तित्ति कामेसु विज्जति
अप्पस्सादा कामा दुखा कामा, इति विज्ञाय पण्डितो।
(धम्मपद श्लोक-186)
"कामनाएँ अशमनीय अग्नि के समान भड़कती है जो कभी भी किसी को सुख प्रदान नहीं करतीं। ज्ञानी पुरुष इसे दुःख का मूल जानकर इसका परित्याग करते हैं।" किन्तु वे जो इस सत्य को नहीं जानते, वे अपनी वासनाओं की तुष्टि का निरर्थक प्रयास करते हुए अपने जीवन को व्यर्थ कर देते हैं।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते |
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् || 40||
इन्द्रिय, मन और बुद्धि को कामना का अधिष्ठान कहा जाता है जिनके द्वारा यह मनुष्य के ज्ञान को आच्छादित कर लेती है और देहधारियों को मोहित करती है।
काम वासना की शरण स्थली को प्रकट करते हुए भगवान श्रीकृष्ण अब इसे नियंत्रित करने की विधि के संबंध में सूचित करते हैं। शत्रु की घेराबंदी करने से पूर्व शत्रु की दुर्बलता का पता लगाना आवश्यक होता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण व्यक्त करते हैं कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि वह स्थान हैं जहाँ से काम वासना आत्मा पर आधिपत्य जमाने का प्रयास करती है। काम वासना के प्रभाव से इन्द्रियाँ विषय भोगों की कामना करती हैं और मन को सम्मोहित करती हैं। मन बुद्धि को भ्रमित करता है तथा बुद्धि अपनी विवेकी शक्तियाँ खो देती है। जब बुद्धि पर आवरण पड़ जाता है, तब मनुष्य मोहवश वासनाओं के दास बन जाते हैं और उनकी तुष्टि हेतु सब कुछ करने को तत्पर रहते हैं। इन्द्रियाँ मन और बुद्धि अपने आप में किसी प्रकार से बुरे नहीं होते। यह सब भगवत्प्राप्ति के प्रयोजन हेतु हमें भगवान द्वारा प्रदान किए गये हैं। किन्तु हम वासनाओं को इन पर कब्जा करने की अनुमति देते हैं। अब हमें इन्हीं इन्द्रियों, मन और बुद्धि का आत्म उत्थान के लिए प्रयोग करना चाहिए। ऐसा किस प्रकार से किया जाए, इसे श्रीकृष्ण अगले श्लोक में स्पष्ट करेंगे।
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ |
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् || 41||
इसलिए हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ! प्रारम्भ से ही इन इन्द्रियों को नियंत्रण में रखकर कामना रूपी शत्रु का वध कर डालो जो पाप का मूर्तरूप तथा ज्ञान और आत्मबोध का विनाशक है।
इस श्लोक में अब श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि उस काम वासना पर कैसे विजय प्राप्त की जा सकती है जो सभी बुराइयों की जड़ है तथा मानव चेतना के लिए घातक है। काम वासना को बुराइयों का भण्डार बताते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रारम्भ से ही विषय भोगों पर नियंत्रण रखने के लिए कहते हैं। इनकी उत्पत्ति ही हमारे कष्टों का मूल कारण है जबकि इनका दमन करना शांति का मार्ग है।
इसे समझने के लिए प्रस्तुत उदाहरण को समझें। रमेश और दिनेश दो सहपाठी कॉलेज के छात्रावास के एक कमरे में रहते थे। रात्रि 10 बजे रमेश सिगरेट पीने की इच्छा व्यक्त करता है। वह कहता है, “मेरी धूम्रपान करने की तीव्र इच्छा हो रही है। दिनेश कहता है कि बहुत अधिक रात हो गयी है इसलिए धूम्रपान करना भूल कर सो जाओ।" रमेश कहता है-"नहीं-नहीं मैं जब तक सिगरेट के कश नहीं ले लेता, तब तक मैं सो नहीं सकता।" दिनेश सो जाता है और रमेश सिगरेट की खोज में कमरे से बाहर निकल जाता है। छात्रावास के निकट की दुकान बंद हो चुकी थी। दो घंटे के पश्चात् जब अंत में उसे सिगरेट मिलती है तब वह छात्रावास में आकर धूम्रपान करता है।
प्रात:काल दिनेश उससे पूछता है-"रमेश तुम रात को कब सोये?" रमेश–'आधी रात के समय' दिनेश-"क्या, सच में, इसका अभिप्राय है कि तुम दो घंटे तक धूम्रपान करने के लिए तड़पते रहे और धूम्रपान करने के पश्चात् तुम उसी मनोदशा में लौट आये जो कल 10 बजे रात्रि काल में थी।" रमेश ने पूछा-"इससे तुम्हारा क्या मतलब है?" दिनेश ने उत्तर दिया-"देखो रात 10 बजे तुम्हारी धूम्रपान करने की कोई इच्छा नहीं थी और तुम शांत थे किन्तु रात्रिकाल में 10 बजे से 12 बजे अर्धरात्रि तक तुम सिगरेट पीने के लिए तड़पते रहे। अंततः जब तुम्हारी धूम्रपान करने की इच्छा समाप्त हुई तभी तुम सो सके। दूसरी ओर मैंने अपने मन में किसी प्रकार की इच्छा उत्पन्न नहीं की और मैं 10 बजे रात्रि को शांतिपूर्वक सो गया।" इसी प्रकार से हम भोगों की कामनाएँ उत्पन्न करते हैं और बाद में वे हमें दुःखी करती हैं। जब हमें मनचाही वस्तु मिल जाती है तब हमारे द्वारा ही उत्पन्न यह रोग निर्मूल हो जाता है और हम इसे सुख समझने लगते हैं। जब हम स्वयं को आत्मा मानते हैं तो हमारा प्रयोजन केवल आत्मा को सुख प्रदान करना होता है तब हमारे लिए ऐसी कामनाओं का परित्याग करना सुगम होता है। श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि इन इन्द्रियों पर संयम रखो ताकि इनमें व्याप्त वासना का संहार किया जा सके। ऐसी दक्षता पाने के लिए हमें भगवान द्वारा प्रदत्त दिव्य शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए जिनका वर्णन श्रीकृष्ण अगले श्लोक में कर रहे हैं।
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन: |
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स: || 42||
इन्द्रियाँ स्थूल शरीर से श्रेष्ठ हैं और इन्द्रियों से उत्तम मन, मन से श्रेष्ठ बुद्धि और आत्मा बुद्धि से भी परे है।
निम्न तत्त्व को उसके श्रेष्ठ तत्त्व से नियंत्रित किया जा सकता है। श्रीकृष्ण मनुष्य को भगवान द्वारा प्रदत्त अवयवों की श्रेष्ठता को व्यक्त कर रहे हैं। वे वर्णन करते हैं कि शरीर जड़ पदार्थों से निर्मित है श्रेष्ठ पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं जिनके द्वारा स्वाद, स्पर्श, रूप, गंध और शब्द की ग्रहण किया जाता है। इन्द्रियों से उत्तम मन और मन से श्रेष्ठ बुद्धि है जिसकी सहायता से हम विभिन्न पदार्थों में भेद करने के योग्य होते हैं किन्तु आत्मा बुद्धि से भी परे है। इस अध्याय के अंतिम श्लोक में किए गए वर्णन के अनुसार इन्द्रिय, मन, बुद्धि और आत्मा के श्रेष्ठता के इस ज्ञान का प्रयोग हमें काम वासना को जड़ से उखाड़ने के लिए करना चाहिए।
एवं बुद्धे: परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना |
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् || 43||
इस प्रकार हे महाबाहु! आत्मा को बुद्धि से श्रेष्ठ जानकर अपनी इन्द्रिय, मन और बुद्धि पर संयम रखो और आत्मज्ञान द्वारा कामरूपी दुर्जेय शत्रु का दमन करो।
निष्कर्ष के रूप में श्रीकृष्ण इस पर बल देकर कहते हैं कि हमें आत्मज्ञान द्वारा कामरूपी शत्रु का संहार करना चाहिए। क्योंकि आत्मा भगवान का अंश है और यह दिव्य शक्ति है इसलिए दिव्य पदार्थों से ही अलौकिक आनन्द प्राप्त हो सकता है जबकि संसार के सभी पदार्थ भौतिक हैं। ये भौतिक पदार्थ आत्मा की स्वाभाविक उत्कंठा को कभी पूरा नहीं कर सकते इसलिए इनको प्राप्त करने की कामना करना व्यर्थ ही है। इसलिए परिश्रम करते हुए हमें बुद्धि को तदनुसार कार्य करने का प्रशिक्षण देना चाहिए और फिर मन और इन्द्रियों को नियंत्रित रखने के लिए इसका प्रयोग करना चाहिए।
कठोपनिषद् में रथ के सादृश्य से इसे अति विशद ढंग से समझाया गया है:
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयां स्तेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः।।
(कठोपनिषद्-1.3.3-4)
यह उपनिषद् अवगत कराती है कि एक रथ है जिसे पांच घोड़े हाँक रहे हैं। उन घोड़ों के मुख में लगाम पड़ी है। यह लगाम रथ के सारथी के हाथ में है और रथ के पीछे आसन पर यात्री बैठा हुआ है। यात्री को चाहिए कि वह सारथी को उचित निर्देश दे जो लगाम को नियंत्रित कर घोड़ों को उचित दिशा की ओर जाने में मार्गदर्शन दे सके। यदि यात्री सो जाता है तब घोड़े निरंकुश हो जाते हैं।
इस सादृश्य में रथ मनुष्य का शरीर है, घोड़े पाँच इन्द्रियाँ हैं और घोड़ों के मुख में पड़ी लगाम मन है और सारथी बुद्धि है और रथ में बैठा यात्री शरीर में वास करने वाली आत्मा है। इन्द्रियाँ (घोड़े) अपनी पसंद के पदार्थों की कामना करती हैं। मन (लगाम) इन्द्रियों को मनमानी करने से नहीं रोक पाती। बुद्धि (सारथी) मन (लगाम) के समक्ष आत्मसमर्पण कर देती है। इस प्रकार मायाबद्ध आत्मा बुद्धि को उचित दिशा में चलने का निर्देश नहीं देती। इसलिए रथ को किस दिशा की ओर ले जाना है, इसका निर्धारण इन्द्रियाँ अपनी मनमानी के अनुसार करती हैं। आत्मा इन्द्रियों के सुखों का अनुभव परोक्ष रूप में करती है किन्तु ये इन्द्रियाँ उसे तृप्त नहीं कर पाती। इसी कारण से रथ के आसन पर बैठी आत्मा (यात्री) इस भौतिक संसार में अनन्त काल से चक्कर लगा रही है। यदि आत्मा अपनी दिव्यता के बोध से जागृत हो जाती है और अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वहन करने का निश्चय करती है तब वह बुद्धि को उचित दिशा की ओर ले जा सकती है। तब फिर बुद्धि अपने से निम्न मन और इन्द्रियों द्वारा शासित नहीं होगी और रथ आत्मिक उत्थान की दिशा में दौड़ने लगेगा। अतःआत्मा द्वारा इन्द्रियों, मन और बुद्धि को नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए।
।। श्रीमद्भगवत गीता तीसरा अध्याय सम्पूर्ण।।
Bhagvad Geeta Chapter 2
kathaShrijirasik
गीता अध्याय दो: सांख्य योग
विश्लेषणात्मक ज्ञान का योग
इस अध्याय में अर्जुन अपने सम्मुख उत्पन्न स्थिति का सामना करने में अपनी असमर्थता को पुनः प्रकट करता है और युद्ध करने के अपने कर्तव्य का पालन करने से मना कर देता है। तत्पश्चात् वह औपचारिक रूप से श्रीकृष्ण को अपना आध्यात्मिक गुरु बनाने और वर्तमान स्थिति का सामना करने के लिए उचित मार्गदर्शन प्रदान करने की प्रार्थना करता है। प्रभु उसे आत्मा, जो शरीर के नष्ट होने पर भी नहीं मरती, के अमरत्व की शिक्षा देकर दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं। आत्मा मृत्यु के बाद एक शरीर से दूसरे शरीर में उसी प्रकार प्रवेश करती है जिस प्रकार से मनुष्य पुराने वस्त्र त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण सामाजिक दायित्त्वों के विषय की ओर आगे बढ़ते हैं। वे अर्जुन को स्मरण कराते हैं कि धर्म के अनुसार योद्धा के रूप में युद्ध लड़ना उसका कर्त्तव्य है। वे स्पष्ट करते हैं कि किसी के द्वारा अपने नैतिक कर्तव्यों का पालन करना पुण्य का कार्य है जो स्वर्ग जाने का द्वार खोलता है किन्तु कर्त्तव्यों से विमुख होने से केवल तिरस्कार और अपयश प्राप्त होगा।
लौकिक स्तर पर अर्जुन को प्रेरित करने के पश्चात् श्रीकृष्ण गहनता के साथ कर्मयोग के ज्ञान पर प्रकाश डालते हैं। वे अर्जुन को फल की आसक्ति के बिना निष्काम कर्म करने की प्रेरणा देते हैं। फल की कामना से रहित कर्म करने के विज्ञान को वे 'बुद्धियोग' या 'बुद्धि का योग' नाम देते हैं। बुद्धि का प्रयोग मन को कर्मफल की लालसा करने से रोकने के लिए करना चाहिए। इस भावना के साथ सम्पन्न किए गए कर्म 'बांधने वाले' से 'मुक्त करने वाले' में परिवर्तित हो जाते हैं। अर्जुन स्थितप्रज्ञ मनुष्य के लक्षणों को जानना चाहता है। श्रीकृष्ण उसे बताते हैं कि किस प्रकार से स्थितप्रज्ञ होकर मनुष्य आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त हो जाता है और सभी परिस्थितियों में उसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हो जाती हैं और उसका मन सदा के लिए भगवान की भक्ति में तल्लीन हो जाता है। पश्चात् वे स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार से मानसिक संताप, काम-वासना और लोभ विकसित होते हैं और किस प्रकार से इनका उन्मूलन किया जा सकता है।
सञ्जय उवाच |
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् |
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदन: || 1||
संजय ने कहा-करुणा से अभिभूत, मन से शोकाकुल और अश्रुओं से भरे नेत्रों वाले अर्जुन को देख कर श्रीकृष्ण ने निम्नवर्णित शब्द कहे।
अर्जुन की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए संजय ने 'कृपया' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ करुणा या संवेदना है। यह संवेदना दो प्रकार की होती है। एक दिव्य संवेदना होती है जिसका अनुभव भगवान और संत को भौतिक जगत में भगवान से विमुखता के कारण कष्ट सह रही आत्माओं को देखकर। दूसरी संवेदना वह होती है जिसका अनुभव हम दूसरों के कष्टों को देखकर होता है।
भौतिक संवेदना होना अच्छी बात है किन्तु यह सर्वदा वंदनीय नहीं है। यह किसी वाहन को चला रहे भूख से व्याकुल चालक की ओर ध्यान न देकर वाहन की देख-रेख करने जैसा है। अर्जुन दूसरी प्रकार की संवेदना का अनुभव कर रहा है। वह युद्ध के लिए एकत्रित अपने शत्रुओं के प्रति लौकिक करुणा से अभिभूत है। गहन शोक से संतप्त अर्जुन की निराशा यह दर्शाती है कि स्वयं उसे इस संवेदना की अत्यंत आवश्यकता है। इसलिए अन्य लोगों पर करुणा करने का उसका विचार निरर्थक प्रतीत होता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण को मधुसूदन कह कर संबोधित किया गया है क्योंकि उन्होंने मधु नाम के राक्षस का संहार किया था और इसलिए उनका नाम 'मधुसूदन' या 'मधु राक्षस का दमन करने वाला' पड़ गया। यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन के मन में उत्पन्न संदेह रूपी राक्षस को मारना चाहते हैं जो उसे अपने युद्ध धर्म का पालन करने से रोक रहा है।
श्रीभगवानुवाच |
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् |
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन || 2||
परमात्मा श्रीकृष्ण ने कहाः मेरे प्रिय अर्जुन! इस संकट की घड़ी में तुम्हारे भीतर यह विमोह कैसे उत्पन्न हुआ? यह सम्माननीय लोगों के अनुकूल नहीं है। इससे उच्च लोकों की प्राप्ति नहीं होती अपितु अपयश प्राप्त होता है।
हमारे पवित्र ग्रन्थों में 'आर्य' शब्द का प्रयोग किसी प्रजाति या जाति समूह के लिए नहीं किया गया है। मनु स्मृति में आर्य शब्द की परिभाषा एक परिपक्व और सभ्य मानव के रूप में की गई है। आर्य '(भद्र पुरूष)' जैसा संबोधन सबके कल्याण की भावना की ओर संकेत करता है। वैदिक धर्म ग्रन्थों का उद्देश्य मानव को सभी प्रकार से श्रेष्ठ 'आर्य' बनने का उपदेश देना है। श्रीकृष्ण अर्जुन की वर्तमान मानसिक स्थिति को इन आदर्शों के प्रतिकूल पाते हैं और इसलिए उसकी व्याकुलता को ध्यान में रखते हुए वह उसे फटकारते हुए समझाते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में इस आदर्शवादी अवस्था में कैसे रहा जा सकता है। भगवद्गीता या 'भगवान की दिव्य वाणी' वास्तव में यहीं से आरम्भ होती है क्योंकि श्रीकृष्ण, जो अभी तक शांत थे, अब इस श्लोक से बोलना आरम्भ करते हैं। परमात्मा पहले अर्जुन के भीतर ज्ञान प्राप्त करने की क्षुधा उत्पन्न करते हैं।
ऐसा करने के लिए वह यह तर्क देते हैं कि उत्तम पुरुष के लिए इस प्रकार के भ्रम की स्थिति में रहना अपमानजनक और सर्वथा अनुचित है। इसके बाद वे अर्जुन को अवगत करवाते हैं कि मिथ्या-मोह के परिणामों से पीड़ा, अपयश तथा जीवन में असफलता मिलती है और आत्मा का पतन होता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सांत्वना देने के बजाय उसकी वर्तमान मनोदशा को देखते हुए उसे और अधिक व्याकुल करना चाह रहे हैं। जब हम व्याकुल होते हैं तब हमें दुःख की अनुभूति होती है क्योंकि यह आत्मा की वास्तविक स्थिति नहीं है। यह असंतोष की अनुभूति यदि उचित दिशा की अग्रसर होती है तब वह वास्तविक ज्ञान की खोज में प्रेरक सिद्ध होती है। संदेह का उचित निवारण मनुष्य को गूढ ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करता है। इसलिए भगवान कभी-कभी जानबूझकर मनुष्य को कठिनाई में डालते हैं ताकि वह अपनी उलझन को सुलझाने के लिए ज्ञान की खोज करने में विवश हो जाए और जब उसके संदेह का पूरी तरह से निवारण हो जाता है तब वह मनुष्य ज्ञान की उच्चावस्था को प्राप्त कर लेता है।
क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते |
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप || 3||
हे पार्थ! अपने भीतर इस प्रकार की नपुंसकता का भाव लाना तुम्हें शोभा नहीं देता। हे शत्रु विजेता! हृदय की तुच्छ दुर्बलता का त्याग करो और युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।
ज्ञान के मार्ग पर सफलतापूर्वक कदम रखने के लिए उच्च आत्मबल और नैतिकता का होना आवश्यक है। जिसके लिए किसी मनुष्य को आशावान, उमंगी और ऊर्जावान बनकर आलस्य, स्वछन्दता की प्रवृत्ति, अज्ञान और आसक्ति जैसे दोषों पर विजय प्राप्त करना आवश्यक होता है। श्रीकृष्ण एक योग्य गुरु हैं और इसलिए अर्जुन को फटकारते हुए वे अब उसे परिस्थितियों का सामना करने के लिए प्रोत्साहित कर उसके आत्मबल को बढ़ाते हैं।
अर्जुन को पृथा पुत्र (कुन्ती का दूसरा नाम) के नाम से संबोधित करते हुए श्रीकृष्ण उसे अपनी माता कुन्ती का स्मरण करने का आग्रह करते हैं। कुन्ती ने स्वर्ग के राजा इन्द्र की उपासना की थी और इन्द्र के आशीर्वाद से अर्जुन का जन्म हुआ था इसलिए वह इन्द्र के समान असाधारण बल और पराक्रम से सम्पन्न था। श्रीकृष्ण उसे इन सबका स्मरण करवाते हुए प्रोत्साहित कर रहे हैं कि वह ऐसी दुर्बलता को स्वीकार न करे जो उसके यशस्वी पूर्वजों के अनुरूप नहीं है। श्रीकृष्ण अर्जुन को पुनः परन्तप अर्थात 'शत्रुओं का विजेता' के संबोधन द्वारा उसे क्षत्रिय धर्म के कर्तव्यों का पालन करने की इच्छा का त्याग करने वाले अपने भीतर उत्पन्न हुए शत्रु का दमन करने की प्रेरणा देते हैं।श्रीकृष्ण कहते हैं कि अर्जुन जिस प्रकार का मनोभाव व्यक्त कर रहा है वह न तो उसका धर्म है और न ही वास्तविक संवेदना है, अपितु यह मोह है। दुर्बल मानसिकता ही इसकी जड़े हैं। यदि अर्जुन का आचरण वास्तव में ज्ञान और करुणा पर आधारित था तब उसे न तो किसी प्रकार की व्यथा और न ही शोक की अनुभूति होनी चाहिए।
अर्जुन उवाच |
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन |
इषुभि: प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन || 4||
अर्जुन ने कहा-हे मधुसूदन! हे शत्रुओं के दमनकर्ता! मैं युद्धभूमि में कैसे भीष्म और द्रोणाचार्य जैसे महापुरुषों पर बाण चला सकता हूँ जो मेरे लिए परम पूजनीय है।
श्रीकृष्ण के युद्ध करने के आह्वान की प्रतिक्रिया में अर्जुन अपनी व्यग्रता प्रदर्शित करते हुए कहता है कि भीष्म और द्रोण मेरे लिए आदरणीय और आराध्य हैं। भीष्म ब्रह्मचर्य की मूर्ति थे और अपने पिता को दिए गए वचन के पालन हेतु वे जीवन भर ब्रह्मचारी रहे। अर्जुन को शस्त्रविद्या प्रदान करने वाले गुरु द्रोणाचार्य युद्ध कला में निपुण थे और उन्हीं से विद्या प्राप्त कर अर्जुन धनुर्विद्या में पारंगत हुआ था। दूसरे पक्ष की ओर से कृपाचार्य भी एक अन्य महापुरुष थे जिनके प्रति अर्जुन सदैव श्रद्धाभाव रखता था। ऐसे उच्च आचरण वाले विद्वान लोगों के प्रति शत्रुता का व्यवहार करना संवेदनशील अर्जुन को अब घृणास्पद कार्य प्रतीत होने लगा था। उसके अनुसार जब इन श्रद्धेय महापुरुषों के साथ किसी प्रकार का तर्क करना भी अनुचित था तब फिर वह किस प्रकार उनके विरुद्ध हथियार उठा सकता था। अर्जुन ने कहाः हे कृष्ण! कृपया मेरी वीरता पर संदेह न करें। मैं युद्ध करने के लिए तैयार हूँ परन्तु नैतिक दायित्व निर्वहन के दृष्टिकोण से मेरा कर्त्तव्य अपने आचार्यगणों का आदर करना और धृतराष्ट्र के पुत्रों पर दया दर्शाना है।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके |
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् || 5||
ऐसे आदरणीय महापुरुष जो मेरे गुरुजन हैं, को मारकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने की अपेक्षा तो भीख मांगकर इस संसार में जीवन निर्वाह करना अधिक श्रेयस्कर है। यदि हम उन्हें मारते हैं तो उसके परिणामस्वरूप हम जिस सम्पत्ति और सुखों का भोग करेंगे वे रक्तरंजित होंगे।
यह कहना तर्क संगत होगा कि अर्जुन को सन्मानपूर्वक जीवन निर्वाह के लिए साम्राज्य प्राप्त करने हेतु युद्ध करना चाहिए किन्तु अर्जुन यहां इन तर्कों का खण्डन करता है। वह कहता है कि वह ऐसा जघन्य अपराध करने की अपेक्षा भीख मांगकर जीवन निर्वाह करना पसंद करेगा। आगे वह यह तर्क व्यक्त करता है कि यदि वह युद्ध लड़ने जैसे जघन्य अपराध में संलिप्त होकर अपने आदरणीय वयोवृद्धों और बंधु-बान्धवों का वध करता है तो उसकी आत्मा उसके इस कृत्य के फलस्वरूप प्राप्त होने वाली सुख-संपत्ति और सत्ता का सुख भोगने की अनुमति नहीं देगी।
शेक्सपीयर के 'मैकबेथ' नाटक में एक ऐसे उदाहरण का उल्लेख किया गया है कि अपराध बोध से ग्रस्त मनुष्य अच्छी निद्रा का सुख प्राप्त नहीं कर सकता। छल-कपट आदि बुरे कर्मों से प्राप्त की गई सम्पत्ति और सत्ता से सुख और चैन छिन जाता है। मैकबेथ स्काटलैण्ड का एक सम्मानित व्यक्ति था। एक बार यात्रा के दौरान स्कॉटलैण्ड का राजा रात को विश्राम करने के लिए उसके घर ठहरा था। मैकबेथ की पत्नी ने उसे राजा की हत्या कर उसका राज-सिंहासन पाने के लिए उकसाया। मैकबेथ ने उसके परामर्श को स्वीकार कर राजा की हत्या कर दी और उसके पश्चात् वह और उसकी पत्नी 'राजा और रानी' के रूप में स्काटलैण्ड के सिंहासन पर बैठ गये। एक वर्ष के पश्चात् मैकबेथ अपने महल में अपनी रातें जागकर व्यतीत करने लगा। लेखक लिखता है-“मैकबेथ ने षड़यन्त्र रचकर सोये हुए राजा को मारा था इसलिए मैकबेथ रात को कभी सो नहीं पाया।" रानी बारंबार अपने हाथों को साफ करते हुए दिखाई देती थी ताकि उसके रक्तरंजित हाथों पर लगे रक्त के धब्बे धुल जाएँ। इस श्लोक में अर्जुन यह संवेदना प्रकट कर रहा है कि यदि वह युद्ध कर इन श्रद्धावान् महानुभावों का वध कर देगा तब उसके हाथ भी रक्तरंजित होंगे और उसकी आत्मा उसे किसी भी प्रकार का राजसी ठाठ बाट और राजसत्ता का सुख भोगने की अनुमति नहीं देगी।
न चैतद्विद्म: कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयु: |
यानेव हत्वा न जिजीविषाम
स्तेऽवस्थिता: प्रमुखे धार्तराष्ट्रा: || 6||
हम यह भी नहीं जानते कि इस युद्ध का परिणाम हमारे लिए किस प्रकार से श्रेयस्कर होगा। उन पर विजय पाकर या उनसे पराजित होकर। यद्यपि उन्होंने धृतराष्ट्र का पक्ष लिया है और अब वे युद्धभूमि में हमारे सम्मुख खड़े हैं तथापि उनको मारकर हमारी जीवित रहने की कोई इच्छा नहीं होगी।
जब किसी महत्त्वपूर्ण कार्य पर विचार किया जाता है तब मनुष्य उसके कई प्रकार के परिणामों पर विचार करता है। अर्जुन भी इस विवाद में पड़ जाता है कि कौरवों को पराजित करना उचित है या उनके हाथों पराजित होना? अर्जुन को दोनों विकल्पों में पराजय दिखाई देती है क्योंकि युद्ध में कौरवों का वध करके यदि उसे विजय प्राप्त होती है तब भी उसकी आगे जीवित रहने की इच्छा नहीं होगी। यद्यपि भीष्म, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य आदि अधर्मी कौरवों का पक्ष लेकर वास्तव में अधर्म का कार्य कर रहे थे। इन लोगों के लिए प्रयुक्त 'अर्थ काम' शब्द जिसका अर्थ 'संपत्ति और पद प्रतिष्ठा का लोभ' होना है इन पर चरितार्थ होता है क्योंकि इन्होंने दुश्चरित्र दुर्योधन का पक्ष लिया था। इसलिए युद्ध में इनका वध करना ही न्याय था। वास्तव में युद्ध के पश्चात् भीष्म पितामह ने स्वयं यह स्वीकार किया था कि यदि कोई आचार्य अधर्म का कार्य करता है तब उसका त्याग करना उचित है।
यहाँ भीष्म पितामह के संबंध में उल्लेख करना विशेष रूप से आवश्यक है। श्रीमद्भागवत (श्लोक: 9.22.19) के अनुसार वह श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। उनका अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण संयम था और वे उदारता व शौर्य की मूर्ति थे। वह सदा सत्य बोलने वाले महापुरुष के रूप में भी जाने जाते थे क्योंकि उन्होंने जीवन में सदैव सत्य बोलने की प्रतिज्ञा ली थी। उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। यहाँ तक कि वे अपनी मृत्यु का समय भी अपनी इच्छा के अनुरूप निश्चित कर सकते थे। इन सभी विविध विशिष्टताओं के कारण श्रीमद्भागवतम् में उनकी गणना 'बारह महापुरुषों' या 'महाजनो' में की गई है।
स्वयम्भूर्नारदः शम्भुः कुमारः कपिलो मनुः। प्रह्लादो जनको भीष्मो बलियासकिर्वयम्।।
(श्रीमद्भागवतम्-6.3.20)
"धर्म के मर्म को जानने वाले विद्वानों के नाम इस प्रकार हैं-सबसे पहले जन्मे ब्रह्मा, नारद मुनि, भगवान शिव, चारो कुमार, भगवान कपिल, (देवहूति के पुत्र) स्वयम्भुव मनु, महाराज प्रह्लाद, महाराज जनक, भीष्म पितामह, महाराज बली, शुकदेव मुनि, और वेदव्यास"।
इस प्रकार भीष्म एक विशुद्ध आत्मा थे जो कभी भी धर्म के विरुद्ध कार्य नहीं करते थे। उनका समग्र जीवन सांसारिकता विषयों से परे था। यद्यपि वे कौरवों के पक्ष की ओर से युद्ध लड़ रहे थे फिर भी उन्होंने युधिष्ठिर को युद्ध आरंम्भ होने से पूर्व कहा था कि "मैं अधर्म का साथ देने के लिए बाध्य हूँ किन्तु मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम युद्ध में विजय प्राप्त करोगे"। भीष्म जानते थे कि धर्म का पालन करने वाले पाण्डव-जिनके पक्ष में भगवान श्रीकृष्ण थे, कभी पराजित नहीं हो सकते। अधर्म का पक्ष लेते हुए भी वे यह दर्शाना चाहते थे कि स्वर्ग और पृथ्वी की बड़ी से बड़ी शक्तियाँ भी मिलकर पाण्डवों पर विजय प्राप्त नहीं कर सकतीं। इसलिए उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं में सहयोग प्रदान करने के प्रयोजनार्थ अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
कौरवों के पक्ष में युद्ध करने के पश्चात् भीष्म की उनके प्रति पूर्ण समर्पण की भावना से श्रीकृष्ण भलीभांति परिचित थे। इसी कारण उन्होंने भीष्म के वचन का सम्मान रखने के लिए अपना वचन भंग किया था। भीष्म ने युद्ध के दौरान एक निश्चित दिन यह संकल्प लिया था कि वह अगले दिन सूर्य अस्त होने से पूर्व या तो पाण्डवों के महापराक्रमी योद्धा अर्जुन का वध करेंगे या श्रीकृष्ण को महाभारत के युद्ध में शस्त्र न उठाने के अपने वचन को भंग करने पर विवश कर देंगे। कवि संत सूरदास ने भीष्म के वचन का वर्णन इस प्रकार से किया है:
आजु जो हरिहिं न शस्त्र गहाऊँ तो लाजहुँ गंगा जननी को, शान्तनु सुत न कहाऊँ ।
(संत सूरदास)
"यदि मैं भगवान श्रीकृष्ण को युद्ध में शस्त्र उठाने के लिए विवश न कर दूं, तो मैं अपनी माता गंगा को लज्जित करूँ और राजा शान्तनु का पुत्र भी न कहलाऊँ।"
भीष्म ने अति पराक्रम से युद्ध लड़ते हुए अर्जुन के रथ को तोड़ दिया और अर्जुन भूमि पर गिर गया। ऐसी दशा में भगवान श्रीकृष्ण ने रथ का पहिया उठाया और भीष्म के सामने आकर उन्हें अर्जुन को मारने से रोका। भीष्म ने जब भगवान श्रीकृष्ण को रथ का पहिया अपने हाथों में उठाते हुए देखा तब वे जोर से हँसने लगे। वे समझ गए कि भक्तवत्सल भगवान (जो अपने भक्तों को आनन्द प्रदान करते हैं) ने अपने भक्त के वचन की लाज रखने के लिए स्वयं अपने वचन को भंग किया। वास्तव में भीष्म की श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धाभक्ति रसिक भाव की थी। वे प्रायः वृन्दावन में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का चिन्तन करते थे। जहाँ श्रीकृष्ण सायंकाल में वन में गायों को चराने के पश्चात् गाँव में लौटते थे तब उस समय गायों के खुरों से उड़ने वाली धूल से उनके सुन्दर मुख की कान्ति और अधिक बढ़ जाती थी। महाभारत के युद्ध के दौरान घोड़ों के खुरों से उठने वाली धूल से श्रीकृष्ण की अनुपम छवि की शोभा और अधिक बढ़ जाती थी और भीष्म पितामह वहाँ भगवान के दिव्य रूप का दर्शन कर अत्यन्त प्रसन्न होते थे। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में जब भीष्म पितामह बाणों की शैय्या पर सो रहे थे तब वह भगवान के दिव्य रूप का चिन्तन करते रहे और भगवान से निम्न प्रकार से प्रार्थना करते थे।
युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्कचलुलितश्रमवार्यलङ्कतास्ये।
मम निशितशरैर्विभिद्यमानत्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा।। (श्रीमद्भागवतम्-1.9.34)
"युद्धभूमि में श्रीकृष्ण के लहराते हुए घुघराले केश अश्वों के खुरों से उठने वाली धूल से ढक जाते थे और रथ को हाँकने से शारीरिक श्रम के कारण उनका मुख पसीने से गीला हो जाता था और ये सब आभूषणों की भांति मेरे भगवान के दिव्य सौन्दर्य में वृद्धि करते थे और मेरे तीखे बाणों से हुए घाव उनकी मनोहर छवि की शोभा को और अधिक बढ़ाते थे। अतः उन सुन्दर भगवान श्रीकृष्ण के प्रति मेरा मन, शरीर और आत्मा समर्पित हो जाये।"
भगवान श्रीकृष्ण भीष्म की प्रेम भक्ति का सम्मान करते हुए उनसे बाणों की मृत्यु शैय्या पर पड़े रहने के दौरान मिलने गये। अपने सम्मुख भगवान के दर्शन कर 'महाजन' भीष्म ने अपनी इच्छा से अपना शरीर त्याग दिया।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव:
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता: |
यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् || 7||
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया हूँ और गहन चिन्ता में डूब कर कायरता दिखा रहा हूँ। मैं आपका शिष्य हूँ और आपके शरणागत हूँ। कृपया मुझे निश्चय ही यह उपदेश दें कि मेरा हित किसमें है।
भगवद्गीता का यह क्षण अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जब प्रथम बार अर्जुन, जो श्रीकृष्ण के परम मित्र और चचेरे भाई थे, भगवान श्रीकृष्ण को अपना गुरु बनने की प्रार्थना करते हैं। अर्जुन श्रीकृष्ण के सम्मुख यह स्वीकार करते हैं कि उन पर 'कार्पण्यदोष' हावी हो गया है या उनका आचरण कायरों जैसा हो गया है और इसलिए वह श्रीकृष्ण को अपना गुरु बनने और उन्हें धर्म के पथ पर चलने का उपदेश देने के लिए निवेदन करते हैं। सभी वैदिक ग्रन्थ एक स्वर से घोषणा करते हैं कि आध्यात्मिक गुरु के द्वारा ही हमें अपने आत्मकल्याण के लिए दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्।।
(मुण्डकोपनिषद्-1.2.12)
"परम सत्य को जानने के लिए गुरु की खोज करनी होगी, जो वेदादि शास्त्रों का ज्ञाता हो और जो व्यावहारिक रूप से परब्रह्म में स्थित हो चुका हो।"
तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्।
शाब्दे पर च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्।।
(श्रीमद्भागवतम्-11:3:21)
"सत्य की खोज करने वालों को अध्यात्मिक गुरु के प्रति पूर्ण शरणागत होना चाहिए जो वैदिक ग्रन्थों के सार को भलीभांति समझता है और भौतिक संसार की उपेक्षा कर भगवान के पूर्ण शरणागत होता है" रामचरितमानस में वर्णन किया गया है:
गुरु बिनु भव निधि तरइ न कोई।
जौं बिरंचि संकर सम होई।
"यहाँ तक कि आध्यात्मिक ज्ञान में उन्नत साधक भी बिना गुरु की कृपा के इस मायारूपी संसार को पार नहीं कर सकते।" श्रीकृष्ण ने स्वयं गीता के श्लोक संख्या 4.34 में वर्णन किया है-"सत्य को जानने के लिए गुरु की शरण में जाओ, श्रद्धापूर्वक उनकी सेवा करो और उनसे तत्त्व ज्ञान प्राप्त करो। ऐसा सिद्ध संत महापुरुष आपको ज्ञान देगा क्योंकि वह यथार्थ को जानता है।" ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरु की शरण में जाने की अनिवार्यता सिद्ध करने के लिए श्रीकृष्ण भी गुरु की शरण में गए थे। अपनी युवावस्था में श्रीकृष्ण चौसठ कलाओं की विद्या प्राप्त करने के लिए सांदीपनि गुरु के आश्रम में रहे। श्रीकृष्ण के सहपाठी सुदामा ने इस विषय पर निम्न प्रकार से टिप्पणी की है।
यस्यच्छन्दोमयं ब्रह्म देह आवपनं विभो।
श्रेयसां तस्य गुरुषु वासोऽत्यन्तविडम्बनम्।।
(श्रीमद्भागवतम् 10:80:45)
"हे श्रीकृष्ण! वेद आपके शरीर के समान हैं, इनमें प्रकट ज्ञान आप ही हैं। इसलिए आपको गुरु बनाने की क्या आवश्यकता पड़ी, फिर भी यदि आप गुरु से शिक्षा प्राप्त करने का अभिनय कर रहे हो तो यह केवल आपकी दिव्य लीला है।" वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण जगत् के आदि गुरु हैं क्योंकि वे भौतिक संसार में सबसे पहले जन्मे ब्रह्माजी के भी गुरु हैं। उन्होंने हमारे कल्याण के लिए यह लीला रची और अपने इस दृष्टांत द्वारा हमें शिक्षित किया कि हमारी आत्मा पर माया हावी है और अज्ञान को दूर करने के लिए हमें गुरु की आवश्यकता है। इस श्लोक में अर्जुन एक शिष्य के रूप में श्रीकृष्ण के समक्ष आत्मसर्मपण कर उन्हें अपना गुरु स्वीकार करते हुए उसे उचित मार्ग दिखाने के लिए ज्ञान प्रदान करने की प्रार्थना करता है।
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् |
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् || 8||
मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं सूझता जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके। यदि मैं धन सम्पदा से भरपूर इस पृथ्वी पर निष्कंटक राज्य प्राप्त कर लेता हूँ या देवताओं जैसा प्रभुत्व प्राप्त कर लेता हूँ तब भी मैं इस शोक को दूर करने में समर्थ नहीं हो पाऊँगा।
जब हम किसी विपत्ति मे फंस जाते हैं तब हमारी बुद्धि उस विपत्ति के कारणों का विश्लेषण करने लगती है। जब आगे कोई उपाय नहीं सूझता और ओर रास्ते बंद हो जाते है तब विषाद उत्पन्न होता है। क्योंकि अर्जुन की यह समस्या उसकी बुद्धि की क्षमता से परे है और उसका लौकिक ज्ञान उसे दुःख के महासागर में से निकालने के लिए अपर्याप्त है।
श्रीकृष्ण को गुरु के रूप में स्वीकार कर अर्जुन अब अपनी दयनीय दशा प्रकट करने के लिए अपना हृदय उनके सम्मुख उड़ेल देता है। अर्जुन की इस दशा को उत्तम नहीं कहा जा सकता। कभी-कभी हमें भी अपनी जीवन यात्रा में ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। जब हम सुख की कामना करते हैं तब हमें दुःख मिलता है। हम ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं किन्तु हम अज्ञान के अंधकार को दूर करने में समर्थ नहीं हो पाते। हम सच्चा प्रेम पाने के लिए तरसते हैं किन्तु हमें बार-बार निराशा मिलती है।
हमारे कॉलेज की डिग्रियाँ, अर्जित ज्ञान और छात्रवृत्तियाँ हमारे जीवन की इन कठिनताओं का समाधान नहीं कर सकतीं। हमें जीवन की उलझनों का समाधान करने के लिए दिव्य ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता होती है। दिव्य ज्ञान हमें तभी मिलता है जब हम वास्तविक गुरु को खोज लेते हैं जो सदैव इन्द्रियातीत रहता है। अतः हमें विनम्रतापूर्वक उससे ज्ञान प्राप्त करने के लिए उद्यत रहना चाहिए। अर्जुन इसी मार्ग का अनुसरण करने का निर्णय करता है
सञ्जय उवाच |
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेश: परन्तप |
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह || 9||
संजय ने कहा-ऐसा कहने के पश्चात् 'गुडाकेश' तथा शत्रुओं का दमन करने वाला अर्जुन ने 'हृषीकेश' कृष्ण से कहा, हे गोविन्द! मैं युद्ध नहीं करूँगा और शांत हो गया।
दूरदर्शी संजय ने धृतराष्ट्र को सुनाए जा रहे वृतान्त में संबोधित किए गये व्यक्तियों के लिए विशेष नामों को प्रयोग किया है। यहाँ अर्जुन को गुडाकेश कह कर संबोधित किया गया है जिसका अर्थ है-'निद्रा पर विजय पाने वाला।'
निद्रा एक ऐसी शक्ति है जो सभी प्राणियों को कभी न कभी वशीभूत कर लेती है किन्तु अपनी दृढ़ शक्ति से अर्जुन ने स्वयं को इस प्रकार से संयमित किया था कि उसको तभी नींद आती थी जब उसकी सोने की इच्छा होती थी और वह भी केवल अर्जुन द्वारा निर्धारित अवधि तक। अर्जुन के लिए गुडाकेश शब्द का प्रयोग कर संजय गूढता से धृतराष्ट्र को संकेत करता है-'मनुष्यों के बीच ऐसा महानायक' जो निद्रा को वश में कर सकता है, वह अपने अवसाद पर भी विजय पा सकता है।
संजय ने श्रीकृष्ण के लिए हृषीकेश अर्थात् 'मन और इन्द्रियों के स्वामी' शब्द का प्रयोग किया है। इसका शाब्दिक संकेत यह है कि जो मन और इन्द्रियों के स्वामी हैं, वे निश्चित रूप से अर्जुन को इस किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति से बाहर ले आएंगे।
तमुवाच हृषीकेश: प्रहसन्निव भारत |
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वच: || 10||
हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! तत्पश्चात् दोनों पक्षों की सेनाओं के मध्य शोककुल अर्जुन से कृष्ण ने हँसते हुए ये वचन कहे।
अर्जुन के शोकायुक्त कथनों के प्रतिकूल श्रीकृष्ण की प्रसन्नता यह प्रदर्शित कर रही थी कि परिस्थितियों से वे निराश नहीं थे अपितु इसके विपरीत वे इन परिस्थितियों में पूर्णतया शांत थे। ज्ञानयुक्त होकर ही कोई सभी प्रकार की परिस्थितियों में ऐसी समवृत्ति प्रदर्शित कर सकता है। अपने अधूरे ज्ञान के कारण हम जिन परिस्थितियों का सामना करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं, उन्हें हम दोषी मानते हैं, दुःखी होते हुए उन पर खीझते हैं, उनसे दूर भागना चाहते हैं और उन्हें अपने दुर्भाग्य के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं। किन्तु प्रबुद्ध आत्माएँ हमें अवगत कराती हैं कि भगवान की यह सृष्टि सभी प्रकार से पूर्ण है तथा शुभ और अशुभ परिस्थितियाँ हमारे सम्मुख दिव्य प्रयोजन हेतु उत्पन्न होती हैं। ये सब हमारे आध्यात्मिक उत्थान की व्यवस्था करती हैं ताकि हम पूर्णता को प्राप्त करने की अपनी यात्रा में आगे बढ़ सके। जो लोग इस रहस्य को समझते हैं, वे कभी कठिन परिस्थितियों से विचलित नहीं होते बल्कि दृढ़ता और शांति से इनका सामना करते हैं।
छान्दोग्योपनिषद् में वर्णन है कि भूकंप, चक्रवात, बाढ़ और तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाएँ भी भगवान द्वारा सृष्टि की गति के लिए निर्मित योजना का ही मुख्य भाग हैं। यह भी कहा जाता है कि भगवान जानबूझ कर कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं ताकि लोगों को उनकी आध्यात्मिक उन्नति की यात्रा में शिथिल होने से रोका जाए।
जब मनुष्य आत्मसंतुष्ट हो जाता है तब प्राकृतिक आपदाएँ मनुष्य को अपनी पूरी शक्ति लगाकर इनका सामना करने में समर्थ बनाने के लिए उत्पन्न होती हैं जिससे उसकी आत्मिक उन्नति सुनिश्चित होती है। यह ध्यान देना आवश्यक है कि जिस उन्नति की हम बात कर रहे हैं उसका तात्पर्य भौतिक विलासिता को बढ़ाने से नहीं है अपितु यह आत्मा की दिव्यता का आन्तरिक प्राकट्य है।
श्रीभगवानुवाच |
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे |
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता: || 11||
भगवान ने कहा-तुम विद्धत्तापूर्ण वचन कहकर भी उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक के पात्र नहीं हैं। बुद्धिमान पुरुष न तो जीवित प्राणी के लिए शोक करते हैं और न ही मृत के लिए।
इस श्लोक के साथ श्रीकृष्ण अपने दिव्य उपदेश का उत्साहवर्धक प्रकटीकरण करते हैं। शोक में डूबे अर्जुन को प्रतीत होता है कि उसके शोक के कारण अत्यन्त ठोस हैं किन्तु उससे सहानुभूति रखने की अपेक्षा श्रीकृष्ण उसके तर्क का खण्डन करते हैं। वे कहते हैं कि अर्जुन यद्यपि तुम यह अनुभव करते हो कि तुम पांडित्यपूर्ण बातें कर रहे हो, किन्तु वास्तव में तुम अज्ञानता के कारण इस प्रकार की अनुचित वार्ता और व्यवहार कर रहे हो। इस शोक को तर्कसंगत ठहराने का कोई उचित कारण नहीं हो सकता। पंडित अर्थात जो बुद्धिमान हैं, वे न तो कभी किसी जीवित प्राणी के लिए और न ही मृत के लिए शोक करते हैं। इसलिए अपने संबंधियों को मारने में तुम्हें जो शोक प्रतीत हो रहा है, वह भ्रामक है और यह सिद्ध करता है कि तुम पंडित अर्थात विद्वान नहीं हो। शोक से परे किसी विद्वान पुरुष की खोज के लिए किसी को गीता की गहनता में जाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि स्वयं 'भीष्म पितामह' इसके उपयुक्त उदाहरण हैं। वह एक ऐसे मनीषी थे जो जीवन और मृत्यु के रहस्य को पूरी तरह से समझते थे और परिस्थितियों की द्वैतता से ऊपर उठे हुए थे। किसी भी स्थिति में शांत रहने वाले भीष्म पितामह ने दुराचारी लोगों का पक्ष लेना वैसे ही स्वीकार किया जैसे कि वह भगवान की ही सेवा हो। इस प्रकार उन्होंने यह प्रदर्शित किया कि जो भगवान के प्रति शरणागत हैं, वे परिण म की चिंता किए बिना प्रत्येक परिस्थितियों में केवल अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। ऐसे लोग कभी शोकग्रस्त नहीं होते क्योंकि वे सब परिस्थितियों को भगवान की कृपा मानते हैं।
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः |
न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम् || 12||
ऐसा कोई समय नहीं था कि जब मैं नहीं था या तुम नहीं थे और ये सभी राजा न रहे हों और ऐसा भी नहीं है कि भविष्य में हम सब नहीं रहेंगे।
श्रीकृष्ण अपने दिव्य उपदेश के प्रारम्भ में यह वर्णन कर रहे हैं कि जिस अस्तित्व को हम 'स्वयं' कहते हैं, वह आत्मा है न कि भौतिक शरीर और यह भगवान के समान नित्य है। श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णन मिलता है।
ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशनीशावजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता।
अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्तात्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत् ।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-1.9)
उपर्युक्त श्लोक में यह वर्णन किया गया है कि सृष्टि की रचना तीन तत्त्वों के मिश्रण से हुई है-परमात्मा, आत्मा और माया। ये सभी तीनों तत्त्व नित्य हैं। अगर हम विश्वास करते हैं कि आत्मा अमर है तब यह मानना तर्कसंगत होगा कि भौतिक शरीर की मृत्यु के पश्चात् भी जीवन है। श्रीकृष्ण इसकी व्याख्या अगले श्लोक में करेंगे।
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा |
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति || 13||
जैसे देहधारी आत्मा इस शरीर में बाल्यावस्था से तरुणावस्था और वृद्धावस्था की ओर निरन्तर अग्रसर होती है, वैसे ही मृत्यु के समय आत्मा दूसरे शरीर में चली जाती है। बुद्धिमान मनुष्य ऐसे परिवर्तन से मोहित नहीं होते
श्रीकृष्ण सटीक तर्क के साथ आत्मा के एक जन्म से दूसरे जन्म में देहान्तरण के सिद्धान्त को समझाते हैं। वे यह समझा रहे हैं कि किसी भी मनुष्य के जीवन में उसका शरीर बाल्यावस्था से युवावस्था, प्रौढ़ता और बाद में वृद्धावस्था में परिवर्तित होता रहता है। आधुनिक विज्ञान भी यह कहता है कि हमारी शरीर की कोशिकाएँ पुनरूज्जीवित होती रहती हैं। पुरानी कोशिकाएँ जब नष्ट हो जाती हैं तो नयी कोशिकाएँ उनका स्थान ले लेती हैं।
एक अनुमान के अनुसार सात वर्षों में हमारे शरीर की सभी कोशिकाएँ पूर्णतः परिवर्तित हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त कोशिकाओं के भीतर के अणु और अधिक शीघ्रता से परिवर्तित होते हैं। हमारे द्वारा ली जाने वाली प्रत्येक श्वास के साथ ऑक्सीजन के अणु हमारी कोशिकाओं में मिल जाते हैं और वे अणु जो अब तक हमारी कोशिकाओं में विद्यमान थे, वे कार्बन डाईआक्साइड के रूप में बाहर निकल जाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार एक वर्ष के दौरान हमारे शरीर के लगभग 98 प्रतिशत अणु परिवर्तित होते हैं और फिर भी शरीर के क्रमिक विकास के पश्चात् हम स्वयं को वही व्यक्ति समझते हैं। क्योंकि हम भौतिक शरीर नहीं हैं अपितु इसमें दिव्य आत्मा निवास करती है।
इस श्लोक में देहे का अर्थ 'शरीर' और देही का अर्थ 'शरीर का स्वामी' या आत्मा है। श्रीकृष्ण अर्जुन को यह अवगत कराते हैं कि शरीर में केवल एक ही जन्म पर्यन्त परिर्वतन होता है जबकि आत्मा कई शरीरों में प्रवेश करती रहती है। साथ ही मृत्यु के समय यह दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। वास्तव में जिसे हम लौकिक शब्दों में मृत्यु कहते हैं, वह केवल आत्मा का अपने पुराने शरीर से अलग होना है और जिसे हम 'जन्म' कहते हैं, वह आत्मा का कहीं पर भी किसी नये शरीर में प्रविष्ट होना है। यही पुनर्जन्म का सिद्धान्त है। आधुनिक युग के अधिकतर दर्शन भी पुनर्जन्म की धारणा को स्वीकार करते हैं।
श्रीकृष्ण पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि बुद्धिमान पुरूष कभी शोक नहीं करता। किन्तु वास्तविकता यह है कि हम सुख और दुःख दोनों का अनुभव करते हैं। इसके क्या कारण हैं? अगले श्लोक में भगवान इसी को स्पष्ट करते हैं।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा: |
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || 14||
हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रिय और उसके विषयों के संपर्क से उत्पन्न सुख तथा दुख का अनुभव क्षण भंगुर है। ये स्थायी न होकर सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने-जाने के समान हैं। हे भरतवंशी! मनुष्य को चाहिए कि वह विचलित हुए बिना उनको सहन करना सीखे।
मानव शरीर में पांच प्रकार की-देखने, सूंघने, स्वाद, स्पर्श और शब्द ग्रहणकी इन्द्रियाँ होती हैं और इनके विषयों के साथ संपर्क से हमें सुख और दुःख की अनुभूति होती है। इनमें से कोई भी अनुभूति चिरस्थायी नहीं होती। यह ऋतुओं के परिवर्तन के समान है। यद्यपि शीतल जल ग्रीष्मकाल में अच्छा लगता है जबकि शीतकाल में हमारी शीतल जल ग्रहण करने की इच्छा नहीं होती। इसी प्रकार इन्द्रियों द्वारा सुख और दुःख की अनुभूति क्षणिक होती है। यदि हम स्वयं इनको अपने ऊपर हावी होने देते हैं तब हम पेण्डुलम की भांति एक ओर से दूसरी ओर झूलते रहते हैं। एक विवेकी मनुष्य को सुख और दुःख दोनों परिस्थितियों में विचलित हुए बिना इनको सहन करने का अभ्यास करना चाहिए। बौद्ध धर्म में आत्मज्ञान की प्रारंम्भिक पद्धति 'विपासना पद्धति' इन्द्रिय बोध को सहन करने के सिद्धान्त पर आधारित है। इसके अभ्यास से इच्छाओं का दमन करने में सहायता मिलती है जिसका उल्लेख चार आर्य सत्यों के रूप मे किया गया है-दुःख के कारण, दुःख के कारण का निवारण और अंत की ओर ले जाने वाला मार्ग ये सभी दुःखों के कारण हैं। इसमे कोई आश्चर्य नहीं है कि बौद्ध दर्शन गहन वैदिक दर्शन का उपवर्ग है।
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ |
समदु:खसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते || 15||
हे पुरुषों में श्रेष्ठ अर्जुन! जो मनुष्य सुख तथा दुःख में विचलित नहीं होता और इन दोनों परिस्थितियों में स्थिर रहता है, वह वास्तव में मुक्ति का पात्र है।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह वर्णन किया था कि सुख और दुःख की अनुभूति चिरस्थायी नहीं होती। वे अर्जुन को विवेक बुद्धि द्वारा इन द्वंद्वो से उभरने की प्रेरणा दे रहे हैं। इसे समझने के लिए सर्वप्रथम हमें दो महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर जानना होगा। (1) हम सुख क्यों चाहते हैं? (2) भौतिक सुखों से हमें संतुष्टि प्राप्त क्यों नहीं होती?
प्रथम प्रश्न का उत्तर अत्यंत सरल है। भगवान अनंत सुखों के महासागर हैं और हम आत्माएँ उनका अणु अंश हैं जिसका मुख्य अर्थ यह है कि हम उस अनंत सुख सागर के अणु अंश हैं। स्वामी विवेकानन्द लोगों को 'हे सच्चिदानंद भगवान के पुत्रों' कहकर संबोधित करते थे। जैसे बालक अपनी माता की ओर आकर्षित होता है ठीक उसी प्रकार से सभी अंश स्वाभाविक रूप से अपने मूल अंशी की ओर आकर्षित होते हैं। इसी प्रकार से अनन्त सुख के महासागर भगवान का अणु अंश होने के कारण हम आत्माएँ भी उसी असीम आनंद के महासागर की ओर आकर्षित होती हैं। इसलिए हम अपना प्रत्येक कार्य संसार में सुख प्राप्त करने के लिए करते हैं। यह सुख कहाँ है और इसे किस रूप में पाया जा सकता है, इस संबंध में सबका मत भिन्न-भिन्न है लेकिन सभी जीव इसके अतिरिक्त और कुछ पाना नहीं चाहते। यही प्रथम प्रश्न का उत्तर है।
दूसरे प्रश्न का अर्थ समझें। परमात्मा का अणु अंश होने के कारण आत्मा स्वभावतः भगवान के समान दिव्य है इसलिए आत्मा भी दिव्य सुख चाहती है ऐसे आलौकिक सुख की तीन विशेषताएँ निम्नांकित है- 1. यह अनन्त मात्रा का होना चाहिए। 2. यह स्थायी होना चाहिए। 3. यह नित्य होना चाहिए। ऐसा सुख केवल भगवान में ही है जिसे सत्-चित्-आनन्द या अनन्त चेतन स्वरूप करुणा सागर के नाम से भी पुकारा जाता है। इन्द्रियों के विषय के संपर्क से हमें जो सुख प्राप्त होता है, वह इन सुखों के विपरीत है तथा यह अस्थायी, सीमित मात्रा का और जड़वत् होता है। इसलिए शरीर से प्राप्त होने वाला लौकिक सुख हमारी दिव्य आत्मा को कभी संतुष्ट नहीं कर सकता।
इस अन्तर को समझने के लिए हमें सांसारिक सुखों और दुःखों के बोध को समान रूप से सहन करने का अभ्यास करना चाहिए तभी हम इन द्वंद्वो से ऊपर उठेंगे और भौतिक शक्तियाँ हमें अधिक समय तक दुःखी नहीं कर पायेंगी।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: |
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि: || 16||
अनित्य शरीर का चिरस्थायित्व नहीं है और शाश्वत आत्मा का कभी अन्त नहीं होता है। तत्त्वदर्शियों द्वारा भी इन दोनों की प्रकृति के अध्ययन करने के पश्चात् निकाले गए निष्कर्ष के आधार पर इस की पुष्टि की गई है।
श्वेताश्वतरोपनिषद् के अनुसार संसार में तीन तत्त्वों का अस्तित्व है
भोता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ।।(श्वेताश्वतरोपनिषद्-1.12)
क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः।(श्वेताश्वतरोपनिषद्-1.10)
संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च व्यताव्यक्तं भरते विश्वमीशः।(श्वेताश्वतरोपनिषद्-1.08)
ये सभी वेद मंत्र बताते हैं कि भगवान, जीवात्मा और माया तीनों नित्य तत्त्व हैं।
1. भगवान नित्य हैं इसलिए वे सत् (शाश्वत तत्त्व) हैं। वेदों में भगवान को सत्-चित्-आनन्द (नित्य-सर्वज्ञ-आनंद का महासागर) कहा गया है। 2. आत्मा अनश्वर है और इसलिए सत् है। शरीर का एक दिन नाश होगा इसलिए इसे असत् (अस्थायी) कहा गया है आत्मा भी सत्-चित्-आनन्द है किन्तु अणु रूप में है। अतः आत्मा अणु सत्, अणु चित् और अणु आनन्दमय है। 3. माया तत्त्व जिससे संसार निर्मित है, नित्य या सत् है। फिर भी सभी भौतिक पदार्थ जिन्हें हम अपने आस-पास देखते हैं, का सीमित अस्तित्व है तथा इन सबका समय के साथ विनाश हो जाता है। इसलिए इन्हें असत् या अस्थायी की श्रेणी में रख सकते हैं। इस प्रकार संसार ही असत् है क्योंकि इसका अस्तित्व केवल माया तत्त्व के कारण है जो कि सत् है।
जब हम संसार को असत् कहते हैं तब इसे मिथ्या कहने की भूल नहीं करनी चाहिए। असत् का अर्थ मिथ्या अर्थात् अस्तित्वहीन नहीं है। कुछ तत्त्वदर्शी यह दावा करते हैं कि संसार मिथ्या है। वे दृढ़ता से कहते हैं कि यह केवल हमारी अज्ञानता है कि हम संसार का अनुभव करते हैं और एक बार जब हम ब्रह्म-ज्ञान में स्थित हो जाते हैं तब संसार के अस्तित्व का अनुभव समाप्त हो जाता है। यदि यह सत्य होता तब फिर इसके पश्चात् भागवत्प्राप्त संतो के लिए संसार नहीं रहना चाहिए क्योंकि उनकी अज्ञानता नष्ट हो चुकी होती और उनके लिए संसार का अस्तित्व समाप्त हो गया होता। ऐसी स्थिति में ब्रह्मज्ञान की अवस्था प्राप्त करने के पश्चात् ऐसे संत धार्मिक ग्रंथों की रचना कैसे करते और धार्मिक ग्रथों की रचना करने के लिए उन्हें कागज और कलम कहाँ से मिलती?
सत्य यह है कि ब्रह्मज्ञानी भी संसार की वस्तुओं का प्रयोग कर यह सिद्ध करते हैं कि संसार का अस्तित्व उनके लिए भी है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मज्ञानी को अपने शरीर के पोषण हेतु भोजन की आवश्यकता भी होती है।
वैदिक ग्रंथों में इस प्रकार से वर्णन किया गया है- 'पैशवादिभिश्चाविशेषत' अर्थात् 'ब्रह्मज्ञानी संतों को भी वैसे ही भूख लगती है जैसे कि पशुओं को।' यदि इनके लिए संसार का कोई अस्तित्व नहीं है तब उन्हें कैसे और क्यों भोजन ग्रहण करने की आवश्यकता पड़ती है? । इसके अतिरिक्त तैत्तिरीयोपनिषद् यह अवगत कराता है कि भगवान सर्वव्यापक है:
सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा
इदँ सर्वमसृजत यदिदं किं च। तत्सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत्।
तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत्। निरुतं चानिरुतं च। निलयनं
चानिलयनं च। विज्ञानं चाविज्ञानं च। सत्यं चानृतं चा सत्यमभवत्।
यदिदं किं च। तत्सत्यमित्याचक्षते। तदप्येष श्लोको भवति।
(तैत्तिरीयोपनिषद्-2.6.4)
यह वैदिक मंत्र यह बताता है कि भगवान केवल सृष्टि का सृजन नहीं करते बल्कि वह स्वयं प्रत्येक अणु में व्याप्त हो जाते हैं। इसलिए यदि भगवान इस संसार में सर्वव्यापक हैं तब फिर संसार का अस्तित्व क्यों नहीं हो सकता? इस प्रकार संसार को मिथ्या कहना और संसार में भगवान को सर्वव्यापक कहने के तथ्य का विरोधाभास है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह व्याख्या करते हैं कि संसार का अस्तित्व है किन्तु यह नश्वर है, इसलिए वे इसे 'असत्' या 'अस्थायी' कहते हैं। उन्होंने संसार को 'मिथ्या' या 'अस्तित्वहीन' नहीं कहा है।
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् |
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति || 17||
जो पूरे शरीर में व्याप्त है, उसे ही तुम अविनाशी समझो। उस अनश्वर आत्मा को नष्ट करने मे कोई भी समर्थ नहीं है।
आत्मा शरीर में व्याप्त है, यह कहकर श्रीकृष्ण शरीर और आत्मा के बीच के संबंध का निरूपण कर रहे हैं। इससे उनका तात्पर्य क्या है? आत्मा चेतन है अर्थात् चैतन्य स्वरूप है। शरीर जड़ पदार्थों से निर्मित और चेतना रहित होता है। जबकि आत्मा अपनी चेतन शक्ति को शरीर में संचारित करने के साथ पूरे शरीर में वास करती है। इस प्रकार आत्मा शरीर में व्याप्त रहकर पूरे शरीर को सचेतन बनाती है। कुछ लोग शरीर में आत्मा के निवास स्थान के संबंध में प्रश्न करते हैं। वेदों में वर्णन किया गया है कि आत्मा हृदय में वास करती है।
हृदि ह्येष आत्मा । (प्रश्नोपनिषद्-3.6)
स वा एष आत्मा हृदि। (छान्दोग्योपनिषद-8.3.3)
"हृदि शब्द दर्शाता है कि आत्मा हृदय के आस-पास स्थित होती है। जबकि चेतना जो कि आत्मा का लक्षण है, पूरे शरीर में प्रसारित रहती है।" ऐसा कैसे संभव है? महर्षि वेदव्यास ने इस दृष्टिकोण को निम्न प्रकार से समझाया है:
अविरोधश्चन्दनवत् ।। (ब्रह्मसूत्र-2.3.24)
"जिस प्रकार मस्तक पर चंदन का लेप करने से पूरा शरीर शीतल हो जाता है उसी प्रकार यद्यपि आत्मा हृदय के भीतर स्थित रहती है तदपि पूरे शरीर में अपनी चेतन शक्ति को प्रसारित करती रहती है।" कुछ लोग पुनः यह प्रश्न करते हैं कि यदि चेतना आत्मा का अभिलक्षण है तब वह पूरे शरीर में कैसे प्रसारित होती है। इस प्रश्न का उत्तर भी महर्षि वेदव्यास ने दिया है:
व्यतिरेको गन्धवत्। (ब्रह्मसूत्र-2.3.27)
"सुगंध, पुष्प का गुण है। जिस उद्यान में पुष्प खिलते हैं वह उद्यान भी फूलों की सुगंध से सुगंधित हो जाता है।" इसका अर्थ है कि जिस प्रकार पुष्प की सुगंध पूरे उद्यान को सुगंधित करने में सक्षम होती है उसी प्रकार से आत्मा चेतन है और यह जड़ शरीर में चेतना भरकर उसे सचेतन बना देती है।
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ता: शरीरिण: |
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत || 18||
केवल भौतिक शरीर ही नश्वर है और शरीर में व्याप्त आत्मा अविनाशी, अपरिमेय तथा शाश्वत है। अतः हे भरतवंशी! युद्ध करो।
वास्तव में शरीर मिट्टी से बना है। यह मिट्टी साग-सब्जियों, फलों, अनाज, दाल और घास में परिवर्तित होती है। गायें घास चरती हैं और दूध देती हैं। हम मनुष्य इन खाद्य पदार्थो का सेवन करते हैं और ये हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं। अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि शरीर मिट्टी से निर्मित है। इसके अतिरिक्त मृत्यु के समय जब आत्मा शरीर को छोड़ देती है तब शरीर की अंत्येष्टि तीन प्रकार से की जाती है-कृमि, विद् या भस्म। यदि शरीर को अग्नि में जलाया जाता है तब यह राख में परिवर्तित हो जाता है यदि दफनाया जाता है तो यह कीटाणुओं का भोजन बनता है और अंततः मिट्टी में मिल जाता है और यदि इसे जल मे प्रवाहित कर दिया जाता है तो यह समुद्री जीवों का ग्रास बनता है और उनके मलत्याग से अंततः समुद्र के तल की मिट्टी में मिल जाता है। इस प्रकार से मिट्टी संसार में अद्भुत प्रकार से आवर्तन करती है। यही मिट्टी खाद्य पदार्थों में परिवर्तित होती है और इन्हीं खाद्य पदार्थों से हमारा शरीर बनता है और अंततः मृत्यु के पश्चात् शरीर मिट्टी में परिवर्तित होकर उसी में मिल जाता है।
यह उक्ति भौतिक शरीर के संबंध में है। श्रीकृष्ण अर्जुन को अवगत कराते हैं कि इस भौतिक शरीर में नित्य अविनाशी सत्ता अर्थात् आत्मा वास करती है जो कि मिट्टी से निर्मित नहीं है। आत्मा दिव्य और सनातन है।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् |
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते || 19||
वह जो यह सोंचता है कि आत्मा को मारा जा सकता है या आत्मा मर सकती है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं। वास्तव में आत्मा न तो मरती है और न ही उसे मारा जा सकता है।
मृत्यु का भ्रम हमारे भीतर इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि हम स्वयं को शरीर मानते हैं। रामचरितमानस मे इसे निम्न प्रकार से व्यक्त किया गया है
जौं सपनें सिर काटै कोई।
बिनु जागें न दूरि दुःख होई।।
"यदि हम स्वप्न में यह देखते हैं कि हमारे सिर पर चोट लगी है तब हमें उस समय तक पीड़ा का अनुभव होता है जब तक हम स्वप्नावस्था से जाग नहीं जाते।" स्वप्न में घटित वह घटना एक भ्रम के समान होती है किन्तु हमें तब तक पीड़ा सहन करनी पड़ती है जब तक हम नींद से जाग नहीं जाते और हमारा भ्रम टूट नहीं जाता। इस प्रकार से यह भ्रम होना कि हम शरीर हैं, इसी कारण से हमें मृत्यु से भय लगता है। वे आत्मज्ञानी जिनका शरीर होने का भ्रम समाप्त हो जाता है, वे मृत्यु के भय से मुक्त हो जाते हैं। कोई यह भी कह सकता है कि यदि कोई किसी को मार नहीं सकता तब फिर किसी की हत्या करना दण्डनीय अपराध क्यों कहलाता है। इसका उत्तर यह है कि शरीर आत्मा का वाहन है और किसी भी मनुष्य के वाहन अर्थात् शरीर की हत्या करना हिंसा है जो क्षमा योग्य नहीं है। वेदों में स्पष्ट किया गया है कि 'मा हिंस्यात्सर्वभूतानि' अर्थात् 'किसी की हिंसा मत करो।' वास्तव में वेदों में पशुओं के प्रति हिंसा को भी अपराध माना गया है किन्तु कुछ परिस्थितियों में इस नियम का उल्लंघन करना पड़ता है जब हिंसा करना अनिवार्य हो जाता है।
उदाहरणार्थ जब कोई सर्प किसी को काटने लगता है या घातक हथियार से कोई किसी पर आक्रमण करता है या जब कोई अन्यायपूर्ण ढंग से किसी की जीविका को छीन रहा हो तब ऐसी दशा में आत्मरक्षा के लिए हिंसा को अपनाना वैध माना जाता है। वर्तमान स्थिति में अर्जुन के लिए हिंसा या अहिंसा दोनों में क्या और क्यों उचित है? भगवान श्रीकृष्ण उसे यह भगवद्गीता के आगे आने वाले संवादों के माध्यम से विस्तारपूर्वक समझाएंगे। उनकी व्याख्याओं द्वारा इस विषय पर दिव्य ज्ञान का प्रकाश होगा।
न जायते म्रियते वा कदाचि
नायं भूत्वा भविता वा न भूय: |
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे || 20||
आत्मा का न तो कभी जन्म होता है न ही मृत्यु होती है और न ही आत्मा किसी काल में जन्म लेकर पुनः उत्पन्न होता है। आत्मा अजन्मा, शाश्वत, अविनाशी और चिरनूतन है। शरीर का विनाश होने पर भी इसका विनाश नहीं होता।
इस श्लोक में आत्मा की शाश्वतता को सिद्ध किया गया है जो सनातन है तथा जन्म और मृत्यु से परे है। परिणामस्वरूप आत्मा के स्वरूप को छः श्रेणियों में विभक्त किया गया है-"अस्ति, जायते, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते और विनिश्यति" अर्थात गर्भावस्था में आना, जन्म, विकास, प्रजनन, हास और मृत्यु। ये सब शरीर के बदलते स्वरूप हैं न कि आत्मा के। जिसे हम मृत्यु कहते हैं, वह केवल शरीर का विनाश है किन्तु शाश्वत आत्मा शरीर के सभी परिवर्तनों से अछूती रहती है अर्थात शरीर में समय-समय पर होने वाले परिवर्तनों का आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वेदों में इस दृष्टिकोण को बार-बार दोहराया गया है। कठोपनिषद् का यह मंत्र भी गीता के उपर्युक्त श्लोक के समान उपदेश करता है।
न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।
(कठोपनिषद्-1.2.18)
"आत्मा का न तो जन्म होता है और न ही यह मरती है, न ही किसी से यह प्रकट होती है, न ही इससे कोई प्रकट होता है। यह अजन्मा अविनाशी और चिरनूतन है। शरीर का विनाश हो जाने पर भी यह अविनाशी है।" बृहदारण्यकोपनिषद् में भी वर्णन किया गया है
स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो (बृहदारण्यकोपनिषद्-4.4.25)
"आत्मा आनन्दमय, अजन्मा अविनाशी, वृद्धावस्था से मुक्त, अमर और भय मुक्त है"।
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् |
कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम् || 21||
हे पार्थ! वह जो यह जानता है कि आत्मा अविनाशी, शाश्वत, अजन्मा और अपरिवर्तनीय है, वह किसी को कैसे मार सकता है या किसी की मृत्यु का कारण हो सकता है?
आध्यात्मिक रूप से उन्नत आत्मा हमारे उस "अहम्" को दूर करती है जो हमें यह अनुभव कराता है कि हम अपने द्वारा किए जा रहे कार्यों के कर्त्ता हैं। ऐसी स्थिति में कोई यह देख सकता है कि हमारे भीतर विद्यमान आत्मा कोई कार्य नहीं करती। ऐसी उन्नत आत्माएँ यद्यपि सभी प्रकार के कार्य करती हैं लेकिन उनसे कभी भी दूषित नहीं होती। श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश दे रहे हैं कि उसे भी स्वयं को इस जागृत अवस्था तक उन्नत करना चाहिए और स्वयं को अकर्ता के रूप में देखना और अहंभाव को त्यागना चाहिए तथा अपने कर्तव्यों से जी चुराने की अपेक्षा उसका पालन करना चाहिए।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि |
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा
न्यन्यानि संयाति नवानि देही || 22||
जिस प्रकार से मनुष्य अपने फटे पुराने वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार मृत्यु होने पर आत्मा पुराने तथा जीर्ण शरीर को त्याग कर नया शरीर धारण करती है।
आत्मा की प्रकृति का निरूपण करते हुए भगवान श्रीकृष्ण पुनर्जन्म की अवधारणा को दोहराते हुए उसकी तुलना दैनिक क्रिया-कलापों से कर रहे हैं। जब वस्त्र फट जाते हैं या व्यर्थ हो जाते हैं तब हम उन्हें त्याग कर नये वस्त्र धारण करते हैं और ऐसा करते समय हम स्वयं नहीं बदलते। इसी प्रकार से जब आत्मा जीर्ण शरीर को छोड़ती है तब उसमें किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं होता। न्यायशास्त्र में प्रदत्त निम्नांकित तर्क द्वारा पुनर्जन्म की अवधारणा सिद्ध की गयी है।
जातस्य हर्षभयशोक सम्प्रतिपत्तेः।। (न्यायशास्त्र-3.1.18)
उपर्युक्त तर्क के अनुसार यदि हम छोटे शिशु की गतिविधियों पर ध्यानपूर्वक विचार करते हैं, तब हमें यह ज्ञात होता है कि वह बिना किसी स्पष्ट कारण के कभी प्रसन्न, कभी उदास और कभी भयभीत दिखाई देता है। न्यायशास्त्र के अनुसार छोटा शिशु अपने पूर्वजन्म का स्मरण करता रहता है और इसी कारण समय-समय पर उसकी मनोदशा में परिवर्तन देखने को मिलता है। हालांकि जैसे-जैसे उसकी आयु बढ़ती है तब उसके मन-मस्तिष्क में वर्तमान जीवन के संस्कार पूरी तरह अंकित हो जाते हैं तथा जिसके परिणामस्वरूप उसके पूर्वजन्म की स्मृतियाँ विलुप्त हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया भी अत्यंत पीड़ादायक होती है जो हमारी पूर्वजन्म की स्मृतियों के ठोस अंशों को मिटा देती है। पुनर्जन्म के पक्ष में न्यायशास्त्र का दूसरा तर्क जिसमें यह कहा गया है-“स्तन्याभिलाषात्" (3.1.21)। इसमें यह वर्णन किया गया है कि नवजात शिशु को भाषा का कोई ज्ञान नहीं होता। तब फिर कोई माँ अपने बालक के मुँह में अपना स्तन डाल कर उसे दूध पीना या स्तनपान करना कैसे सिखा सकती है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि नवजात शिशु ने अपने पूर्व जन्मों में यहाँ तक कि पशु की योनि में स्तन से अपनी असंख्य माताओं का दूध पिया होता है। इसलिए जब माँ अपने बच्चे के मुँह में स्तन का अग्रभाग डालती है, तब बच्चा स्वतः अपने पूर्व जन्म के अभ्यास के कारण अपनी माँ का स्तनपान करना आरंभ कर देता है। पुनर्जन्म की अवधारणा को स्वीकार किए बिना मानव मात्र में भेद करना अनिवर्चनीय और अतर्क्य है। उदाहरणार्थ मान लो यदि कोई व्यक्ति जन्म से अंधा है तब वह व्यक्ति यह कहे कि उसे ऐसा दण्ड क्यों मिला तब इसका तर्कसंगत उत्तर क्या होना चाहिए? यदि हम कहते हैं कि ये सब उसके पूर्वजन्मों के कर्मों का परिणाम है तब वह यह तर्क देगा कि उसने केवल वर्तमान जीवन को देखा है और इस प्रकार से जन्म लेते समय उसके कोई पूर्वकर्म ही नहीं है जो उसे इस जन्म में बुरा फल देते। यदि हम कहते हैं कि यह भगवान की इच्छा थी तब यह भी अविश्वसनीय लगता है क्योंकि अकारण करुण भगवान जो सब पर बिना भेदभाव के करुणा करते हैं वे कभी किसी को अनावश्यक रूप से अंधा नहीं बनाना चाहेंगे।
इसकी तर्कसंगत व्याख्या यही है कि वह मनुष्य अपने पूर्वजन्म के कर्मों के कारणवश अंधा है। इस प्रकार सामान्य मत और धर्मग्रंथों के प्रमाणों के आधार पर हमें पूर्वजन्म की अवधारणा को स्वीकार करना चाहिए
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: |
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत: || 23||
किसी भी शस्त्र द्वारा आत्मा के टुकड़े नहीं किए जा सकते, न ही अग्नि आत्मा को जला सकती है, न ही जल द्वारा उसे गीला किया जा सकता है और न ही वायु इसे सुखा सकती है।
चेतना, जो आत्मा का लक्षण है, उसे भौतिक अवयवों द्वारा समझा जा सकता है लेकिन आत्मा स्वयं भौतिक विषयों के संपर्क में नहीं रहती। ऐसा केवल इसलिए है कि आत्मा दिव्य है और इस कारण से आत्मा भौतिक विषयों के संसर्गों से परे है। वायु आत्मा को सुखा नहीं सकती और जल द्वारा इसे भिगोया या अग्नि द्वारा इसे जलाया नहीं जा सकता है, ऐसा कहकर श्रीकृष्ण ने आत्मा का विशद वर्णन किया है।
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च |
नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन: || 24||
आत्मा अखंडित और अज्वलनशील है, इसे न तो गीला किया जा सकता है और न ही सुखाया जा सकता है। यह आत्मा शाश्वत, सर्वव्यापी, अपरिर्वतनीय, अचल और अनादि है।
यहाँ आत्मा की अमरता के विषय की ओर पुनः ध्यान आकर्षित किया जा रहा है। शिक्षक के लिए विद्यार्थी को केवल ज्ञान प्रदान करना ही पर्याप्त नहीं होता। ज्ञान तभी उपयोगी होता है जब वह विद्यार्थी के हृदय में बैठ जाए। इसलिए एक निपुण शिक्षक प्रायः अपने पिछले वक्तव्यों को दोहराता रहता है। संस्कृत साहित्य में इसे पुनरुक्ति या पुनरावृत्ति कहते हैं। श्रीकृष्ण भगवान ने भगवद्गीता में प्रायः पुनरुक्ति का प्रयोग अपने महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक सिद्धान्तों को रेखांकित करने के लिए एक साधन के रूप मे किया है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उनके भक्त उनके उपदेशों को
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते |
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि || 25
इस आत्मा को अदृश्य, अचिंतनीय और अपरिवर्तनशील कहा गया है। यह जानकर हमें शरीर के लिए शोक प्रकट नहीं करना चाहिए।
हमारी आँखें भौतिक तत्वों से बनी हैं और केवल सांसारिक विषयों का ही अवलोकन कर सकती हैं। चूँकि आत्मा दिव्य है और भौतिक यंत्रों के क्षेत्र से परे है इसलिए यह हमारी आँखों के लिए अदृश्य है। वैज्ञानिकों ने कई बार आत्मा के अस्तित्व को जानने के लिए कई प्रयोग किए हैं। उन्होंने मरणासन्न व्यक्ति को शीशे के बक्से में रखा और उसे चारों ओर से बंद (सील) कर दिया ताकि वे जान सकें कि शरीर त्यागने पर आत्मा के प्रस्थान करने पर क्या बक्सा टूट जाएगा। किन्तु आत्मा बक्सा तोड़े ही बिना शरीर से बाहर निकल गयी। अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण आत्मा को अपनी गतिशीलता के लिए भौतिक शरीर या स्थान की आवश्यकता नहीं होती। कठोपनिषद् में वर्णन किया गया है कि भौतिक ऊर्जा से भी सूक्ष्म होने के कारण आत्मा हमारी बुद्धि की पहुंच से बाहर है।
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः।। (कठोपनिषद्-1.3.10)
"इन्द्रियों से परे इन्द्रियों के विषय हैं, इन्द्रियों के विषय से सूक्ष्म मन, मन से परे बुद्धि और बुद्धि से सूक्ष्म आत्मा है।" हमारी लौकिक बुद्धि केवल सांसारिक विषयों को समझ-बूझ सकती है लेकिन अपनी चिन्तन शक्ति से दिव्य आत्मा तक नहीं पहुंच सकती। अतः आत्मा को जानने के लिए आंतरिक ज्ञान आवश्यक है जो केवल शास्त्रों और गुरु द्वारा सुलभ है।
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् |
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि || 26||
यदि तुम यह सोंचते हो कि आत्मा निरन्तर जन्म लेती है और मरती है तब ऐसी स्थिति में भी, हे महाबाहु अर्जुन! तुम्हें इस प्रकार से शोक नहीं करना चाहिए।
श्रीकृष्ण द्वारा इस श्लोक में 'अथ' शब्द का (अर्थ 'यदि') का प्रयोग करना यह दर्शाता है कि अर्जुन आत्मा की प्रकृति के विषय पर किसी अन्य प्रचलित स्पष्टीकरण पर विश्वास करना चाहेगा। इस श्लोक को भारत में प्रचलित दार्शनिक विचारधाराओं और आत्मा की प्रकृति के संबंध में उनकी विभिन्न मान्यताओं के संदर्भो में समझना चाहिए। ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय चिन्तन को बारह दर्शनशास्त्रों में समाविष्ट किया गया है। इनमें से छः दर्शन जो वैदिक प्रमाणों को स्वीकार करते हैं उन्हें आस्तिक दर्शन कहा जाता है। ये मीमांसा, वेदान्त, न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग हैं। इनमें प्रत्येक की अन्य शाखाएँ भी है। उदाहरणार्थ वैदिक दर्शन को आगे फिर छः दर्शनों में विभक्त किया गया है-अद्वैतवाद, द्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, विशुद्धाद्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद और अचिन्त्य भेदाभेदवाद। आगे इनकी भी अन्य शाखाएँ पायी जाती है, जैसे अद्वैतवाद को दृष्टि-सृष्टिवाद, अवच्छेदवाद, बिम्ब-प्रतिबिम्बवाद, विवर्तवाद, अजातवाद आदि में विभक्त किया जाता है। यहाँ इन दर्शनशास्त्रों की विस्तृत जानकारी नहीं दी जाएगी। यह भी ध्यातव्य है कि ये सभी दर्शन शास्त्र वेदों के उद्धरणों को प्रमाण रूप में स्वीकार करते हैं। तदनुसार ये समस्त दर्शन शास्त्र आत्मा को शाश्वत और अपरिवर्तनशील मानते हैं। भारतीय चिन्तन के शेष छः दर्शन वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार नहीं करते। यह दर्शन चार्वाक और बौद्धों के चार दर्शन (योगाचारवाद, माध्यमिकवाद, वैभाषिकवाद और सौत्रांतिकवाद) और जैन धर्म हैं। इनमें से प्रत्येक की आत्मा की प्रकृति के संबंध में अलग-अलग धारणाएँ हैं। चार्वाक दर्शन के अनुसार शरीर ही है और चेतना केवल उसके अवयवों के समूह से उत्पन्न होती है।
जैन धर्मग्रंथो के अनुसार आत्मा का आकार शरीर के आकार के समान होता है और इसलिए यह एक जन्म से दूसरे जन्म में परिवर्तित होती रहती है। बौद्ध दर्शन की विचारधारा आत्मा के स्थायी अस्तित्व को स्वीकार नहीं करती और इसके स्थान पर उसकी यह मान्यता है कि एक जन्म से दूसरे जन्म में चेतना का प्रवाह चलता रहता है जो आत्मा और मानव जाति की नित्यता सुनिश्चित करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान श्रीकृष्ण के युग में भी आत्मा के पुनर्जन्म और आत्मा के अस्थायित्व के संबंध में बौद्ध दर्शन की विचारधारा विद्यमान थी। इसलिए श्रीकृष्ण यह व्याख्या कर रहे हैं कि यदि अर्जुन आत्मा के एक जन्म से दूसरे जन्म अर्थात् पुनर्जन्म के विचार को स्वीकार करता है तब भी उसके शोक करने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। कोई शोक क्यों न करें? इसे अब अगले श्लोक में स्पष्ट किया जाएगा।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च |
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि || 27||
जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है और मृत्यु के पश्चात् पुनर्जन्म भी अवश्यंभावी है। अतः तुम्हें अपरिहार्य के लिए शोक नहीं करना चाहिए।
जीवन में सबसे सुनिश्चित तथ्य यह है कि एक दिन हमारी मृत्यु अवश्य होगी। मनोवैज्ञानिक मृत्यु के भय को जीवन का सबसे बड़ा भय सत्य बताते हैं। पतंजलि के योगदर्शन में भी अभिनिवेश या किसी भी स्थिति में जीवित रहने की स्वाभाविक इच्छा को लौकिक बुद्धि के लक्षण के रूप में चित्रित किया गया है लेकिन जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु भी अनिवार्य है इसलिए जो अवश्यंभावी है, उसके लिए शोक क्यों किया जाए।
महाभारत काल में इससे संबंधित एक दृष्टांत है। अपने निर्वासन काल के दौरान एक दिन वन में घूमते हुए पाण्डवों को प्यास लगी और वे एक कुएँ के पास पहुंचे। तब युधिष्ठिर ने भीम को कुएँ से जल निकाल कर लाने को कहा। जब भीम कुएँ के समीप गए तब कुएँ में से एक यक्ष (शक्तिशाली प्रेतात्मा) की कुएँ की भीतर से आवाज आने लगी, "मैं तुम्हें तभी जल लेने दूंगा जब पहले तुम मेरे प्रश्नों का उत्तर दे दोगे।" भीम इसकी उपेक्षा करते हुए कुएँ से जल निकालने लगे, तब यक्ष ने उसे कुएँ मे खींच लिया। कुछ समय पश्चात् जब भीम लौट कर नहीं आये, तब युधिष्ठिर ने अर्जुन से भीम को खोजने और जल लाने को कहा! फिर जब अर्जुन कुएँ के पास पहुंचे, तब यक्ष ने उससे यह कहा कि “मैंने पहले ही तुम्हारे भाई को बंदी बना लिया है और जबतक तुम भी मेरे प्रश्नों का सही उत्तर नहीं दोगे तब तक जल लेने का प्रयास मत करना।"
अर्जुन ने भी उसे अनसुना किया और यक्ष ने उसे भी कुएँ में खींच लिया। नकुल और सहदेव ने भी उन्हीं का अनुकरण किया और उन्हें भी वैसा ही परिणाम भुगतना पड़ा। अंततः युधिष्ठिर स्वयं कुएँ पर आये तब यक्ष ने पुनः उनसे कहा-"यदि तुम इस कुएँ का जल ग्रहण करना चाहते हो तो तुम्हें मेरे प्रश्नों का ठीक उत्तर देना होगा अन्यथा मैं तुम्हें भी तुम्हारे भाइयों के समान कुएँ में डाल दूंगा।"युधिष्ठिर प्रश्नों का उत्तर देने के लिए सहमत हो गए। यक्ष वास्तव में स्वर्ग का देवता यमराज था जिसने भेष बदल रखा था। उसने युधिष्ठिर से साठ प्रश्न पूछे, जिनका उन्होंने एकदम उपयुक्त उत्तर दिया जिसमें से एक प्रश्न 'किम् आश्चर्यम्' अर्थात् 'आश्चर्य क्या है' था जिसका उत्तर युधिष्ठिर ने निम्न प्रकार से दियाः
अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्।
शेषाः स्थिरत्वम् इच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ।। (महाभारत)
"प्रतिक्षण लोग मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं और जो जीवित हैं, वे इस सत्य को देख रहे हैं परन्तु वे यह नहीं सोचते कि एक दिन उन्हें भी मरना है। इससे अधिक और क्या आश्चर्य हो सकता है। श्रीकृष्ण भी इस श्लोक में यह समझा रहे हैं कि एक दिन जीवन का अंत अपरिहार्य है इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को इस अनिवार्य मृत्यु के लिए शोक नहीं करना चाहिए।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत |
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना || 28||
हे भरतवंशी! समस्त जीव जन्म से पूर्व अव्यक्त रहते हैं, जन्म होने पर व्यक्त हो जाते हैं और मृत्यु होने पर पुनः अव्यक्त हो जाते हैं। अतः ऐसे में शोक व्यक्त करने की क्या आवश्यकता है।
इस अध्याय के श्लोक 2.20 में श्रीकृष्ण ने आत्मा के लिए शोक करने के कारण का और श्लोक 2.27 में शरीर के लिए शोकग्रस्त होने के कारण का निवारण किया है। अब इस श्लोक में उन्होंने आत्मा और शरीर दोनों को समाविष्ट किया है।
नारद मुनि ने भी श्रीमद्भागवतम् में युधिष्ठिर को समान रूप से यही उपदेश दिया है।
यन्मन्यसे ध्रुवं लोकमध्रुवं वा न चोभयम् ।
सर्वथा न हि शोच्यास्ते स्नेहादन्यत्र मोहजात्।।
(श्रीमद्भागवतम्-1.13.43)
"यदि तुम स्वयं को अविनाशी आत्मा या नश्वर शरीर मानते हो या फिर तुम स्वयं को आत्मा और शरीर का अकल्पनीय मिश्रण के रूप में स्वीकार करते हो तब भी तुम्हें किसी प्रकार का शोक नहीं करना चाहिए।" शोक ग्रस्त होने का मुख्य कारण केवल आसक्ति ही है जो मिथ्या मोह के कारण उत्पन्न होती है।
भौतिक क्षेत्र में प्रत्येक जीवात्मा तीन प्रकार के शरीरों से युक्त होती है-स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर।
स्थूल शरीरः प्रकृति के पाँच स्थूल तत्त्वों-भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश से निर्मित होता है।
सूक्ष्म शरीरः अठारह तत्त्वों, पाँच प्राण वायु, पाँच कर्मेन्द्रियों, पाँच ज्ञानेन्द्रियों, मन, बुद्धि और अहंकार से बनता है।
कारण शरीरः यह पूर्वजन्मों से गृहीत संस्कारों सहित अनन्त पूर्वजन्मों के अर्जित कर्मों के परिणामस्वरूप बनता है।
मृत्यु के समय आत्मा स्थूल शरीर को छोड़ देती है तथा आत्मा सूक्ष्म और कारण शरीर के साथ शरीर से अलग हो जाती है। भगवान पुनः सूक्ष्म और कारण शरीर के अनुसार आत्मा को दूसरा स्थूल शरीर प्रदान करते हैं और आत्मा को यथोचित माता के गर्भ में प्रविष्ट करवाते हैं। जब आत्मा स्थूल शरीर को त्याग देती है तब नया शरीर प्राप्त होने से पूर्व इसे संक्रांति काल से गुजरना पड़ता है। यह अवधि कुछ क्षण या आगे अगले कुछ वर्षों की हो सकती है इसलिए जन्म से पूर्व अव्यक्त सूक्ष्म और कारण शरीर के साथ आत्मा का अस्तित्व होता है। मृत्यु के पश्चात् भी यह अव्यक्त अवस्था में रहती है। यह केवल मध्य में प्रकट होती है। अतः मृत्यु के लिए शोकग्रस्त होने का कोई कारण नहीं है।
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य: |
आश्चर्यवच्चैनमन्य: शृ्णोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् || 29||
कुछ लोग आत्मा को एक आश्चर्य के रूप में देखते हैं, कुछ लोग इसे आश्चर्य बताते हैं और कुछ इसे आश्चर्य के रूप मे सुनते हैं जबकि अन्य लोग इसके विषय में सुनकर भी कुछ समझ नहीं पाते।
यह संपूर्ण संसार आश्चर्य है क्योंकि एक अणु से लेकर विशाल आकाश गंगाएँ भगवान की अद्भुत कृतियाँ हैं। एक छोटे-से पुष्प की संरचना, सुगंध और सुन्दरता भी अपने आप में एक आश्चर्य है। परम-पिता-परमात्मा स्वयं सबसे बड़ा आश्चर्य है।
यह कहा जाता है कि भगवान विष्णु दस हजार सिर वाले दिव्य सर्प अनन्त शेष पर निवास करते हैं और वह सृष्टि के आरम्भ से भगवान की महिमा का निरन्तर गुणगान कर रहा है और अभी तक उसे पूरा नहीं कर पाया है। चूंकि आत्मा भगवान का अंश है अतः यह संसार के किसी भी पदार्थ से अधिक आश्चर्यजनक है क्योंकि इसका भौतिक अस्तित्व अनुभवातीत एवं दुर्बोध है। जिस प्रकार भगवान दिव्य हैं उसी प्रकार आत्मा भी उनका अंश होने के कारण दिव्य है।
इसी कारण आत्मा को मात्र बुद्धि से समझना संभव नहीं है क्योंकि आत्मा के अस्तित्व और प्रकृति का ज्ञान अत्यंत कठिन है। कठोपनिषद् में वर्णन किया गया है।
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः श्रृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः। आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः।।
(कठोपनिषद्-1.2.7)
"एक आत्मज्ञानी गुरु को पाना अत्यंत दुर्लभ है। आत्म ज्ञान के विषय में ऐसे गुरु का उपदेश सुनने का अवसर भी बहुत कम मिलता है। यदि परम सौभाग्य से ऐसा अवसर मिलता भी है तब ऐसे शिष्य बहुत कम मिलते हैं जो आत्मा के विषय को समझ सकें।"
ऐसे में जब उनके अथक प्रयासों के पश्चात् भी बहुसंख्यक लोग आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने या इसको समझने के इच्छुक न हो तब सिद्ध पुरुषों को कभी निराश नहीं होना चाहिए।
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत |
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि || 30||
हे अर्जुन! शरीर में निवास करने वाली आत्मा अविनाशी है इसलिए तुम्हें किसी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।
अपने उपदेशों के अंतर्गत भगवान श्रीकृष्ण प्रायः कुछ श्लोकों में अपने दृष्टिकोण का वर्णन करते हैं और फिर वे एक श्लोक में अपने उन उपदेशों का सार प्रस्तुत करते है। इस श्लोक में आत्मा की अमरता और शरीर से उसकी भिन्नता से संबंधित उपदेशों के सार का निरूपण किया गया है।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते || 31||
इसके अलावा एक योद्धा के रूप में अपने कर्तव्य पर विचार करते हुए तुम्हें उसका त्याग नहीं करना चाहिए। वास्तव में योद्धा के लिए धर्म की रक्षा हेतु युद्ध करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं होता।
वेदों के अनुसार स्वधर्म मनुष्य का कर्त्तव्य है। स्वधर्म या मनुष्य के लिए निर्धारित कर्त्तव्य दो प्रकार के होते हैं-पर धर्म अर्थात् आध्यात्मिक कर्त्तव्य और अपर धर्म अर्थात् लौकिक कर्त्तव्य। जो स्वयं को आत्मा मानते हैं, उनके लिए श्रद्धापूर्वक भगवान से प्रेम और उनकी भक्ति करने का कर्त्तव्य निश्चित किया गया है। इसे पर धर्म कहते हैं।चूँकि भौतिक जगत के बहुसंख्यक लोग इस आध्यात्मिक विचार से प्रेरित नहीं होते इसलिए वेदों में उनके लिए भी कुछ कर्त्तव्य निश्चित किए गये हैं जो स्वयं को शरीर मानते हैं। इन कर्त्तव्यों को व्यक्ति के आश्रम अर्थात् जीवन के पड़ाव और वर्ण अर्थात व्यवसाय के अनुसार परिभाषित किया गया है। इन्हें अपर धर्म या लौकिक कर्तव्य कहा जाता है। भगवद्गीता और वैदिक ग्रंथो का अध्ययन करते हुए धार्मिक और लौकिक कर्तव्यों के अन्तर पर गहनता के साथ ध्यान देना आवश्यक है। अर्जुन वृत्ति से योद्धा था और इसलिए एक योद्धा के रूप में वर्णानुसार उसका कर्त्तव्य धर्म की मर्यादा के लिए युद्ध करना था। श्रीकृष्ण इसे स्वधर्म अथवा शारीरिक स्तर पर निर्धारित कर्तव्यों के रूप में सम्बोधित करते हैं।
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् |
सुखिन: क्षत्रिया: पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् || 32||
हे पार्थ! वे क्षत्रिय भाग्यशाली होते हैं जिन्हें बिना इच्छा किए धर्म की रक्षा हेतु युद्ध के ऐसे अवसर प्राप्त होते हैं जिसके कारण उनके लिए स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं।
संसार में समाज की रक्षा हेतु सदैव क्षत्रिय वर्ण का होना अनिवार्य होता है। क्षत्रिय वर्ण के धर्म के अनुसार योद्धा का यह धर्म होता है कि वह आवश्यकता पड़ने पर समाज की रक्षा हेतु निडरतापूर्वक अपने प्राणों का बलिदान करने से पीछे न हटे। वैदिककाल में समाज के अन्य लोगों को पशुहत्या की मनाही थी किन्तु क्षत्रियों को वन में जाकर युद्ध कौशल के अभ्यास हेतु पशुओं का वध करने की अनुमति दी जाती थी। क्षत्रिय धर्म का पालन करने वाले योद्धाओं से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे धर्म की रक्षा के अवसर का अति उत्साह से स्वागत करें क्योंकि अपने धर्म का पालन करने पर उन्हें इस जीवन और परलोक में भी यश मिलेगा। किसी मनुष्य के द्वारा अपनी वृत्ति के अनुसार कुशलतापूर्वक निर्वहन किया गया कर्त्तव्य आध्यात्मिक कर्म नहीं है और इसके परिणामस्वरूप भगवद्प्राप्ति नहीं होती। यह केवल निश्चित भौतिक प्रतिफल सहित एक पुण्य कर्म है। अपने दिव्य उपदेशों के पश्चात् अब श्रीकृष्ण अपने लौकिक उपदेशों की व्याख्या आरम्भ करते हुए कहते हैं कि यदि अर्जुन की दिव्य आंतरिक आध्यात्मिक उपदेशों में कोई रुचि नहीं है और वह शारीरिक स्तर पर टिका रहना चाहता है तब भी एक योद्धा के रूप में धर्म की रक्षा करना उसका सामाजिक दायित्व है।
जैसा कि हम यह सोच सकते हैं कि भगवद्गीता कर्म करने का उपदेश देती है न कि अकर्मण्य रहने का। जब लोग आध्यात्मिक प्रवचन सुनते हैं तब वे प्रायः प्रश्न करते हैं-"क्या आप मुझे अपने कर्म का त्याग करने के लिए कह रहे हैं?" यद्यपि भगवान श्रीकृष्ण प्रत्येक श्लोक में अर्जुन को कर्म का उपदेश दे रहे हैं किन्तु अर्जुन अपने कर्त्तव्य पालन से विमुख होना चाहता है फिर भी श्रीकृष्ण बार-बार उसे कर्त्तव्य पालन के लिए मनाना चाहते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन की चेतना मे आंतरिक परिवर्तन देखना चाहते हैं न कि बाह्य दृष्टि से कर्तव्यों का परित्याग करना। अब श्रीकृष्ण आगे अर्जुन को कर्त्तव्य से विमुख होने के परिणामों से अवगत कराते हैं।
अथ चेतत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि |
तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि || 33||
यदि फिर भी तुम इस धर्म युद्ध का सामना नहीं करना चाहते तब तुम्हें निश्चित रूप से अपने सामाजिक कर्तव्यों की उपेक्षा करने का पाप लगेगा और तुम अपनी प्रतिष्ठा खो दोगे।
यदि कोई सैनिक युद्ध स्थल पर युद्ध न करने का निश्चय करता है तब इसे कर्तव्यों की अवहेलना करना कहा जाएगा और इसलिए इसे पापमय कार्यों की श्रेणी में रखा जाता है। अतः श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि अर्जुन अपने युद्ध करने के कर्तव्यों को घृणास्पद और कष्टदायक मानते हुए उसकी अवहेलना करने का विचार करता है तो वह पाप अर्जित करेगा। पराशर स्मृति में निम्न प्रकार से कहा गया है:
क्षत्रियोः हि प्रजा रक्षन्शस्त्रपाणिः प्रदण्डवान्। निर्जित्यपरसैन्यादि क्षितिं धर्मेणपालयेत् ।।
(पराशर स्मृति-1.61)
"एक सैनिक का धर्म अपने देश के नागरिकों की आक्रमणों और उपद्रवों से रक्षा करना होता है। इस प्रकार की परिस्थितियों में कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए हिंसा का सहारा लेना पड़ता है इसलिए उसे शत्रु राजा के सैनिकों को पराजित कर न्यायोचित सिद्धान्तों के अनुरूप देश का शासन चलाने में सहायता करनी चाहिए"।
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् |
सम्भावितस्य चाकीर्ति र्मरणादतिरिच्यते || 34||
लोग तुम्हें कायर और भगोड़ा कहेंगे। एक सम्माननीय व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से बढ़कर है।
सम्मानित लोगों के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा अति महत्त्वपूर्ण होती है। विशिष्ट गुणों से सम्पन्न होने के कारण योद्धाओं के लिए मान और प्रतिष्ठा का विशेष महत्त्व होता है। अपमान उनके लिए मृत्यु से बढ़कर होता है। श्रीकृष्ण अर्जुन को इसी का स्मरण करवाते हैं ताकि वह यदि उच्च स्तर के ज्ञान से प्रेरित नहीं होता तब उसके लिए कम से कम निम्न कक्षा का ज्ञान तो लाभकारी हो। संसार के कई समुदायों में यह नियम लागू है कि जब कोई योद्धा युद्ध क्षेत्र में कायरता प्रदर्शित करते हुए युद्धस्थल से भाग जाता है तब उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। इसलिए यदि अर्जुन अपने कर्त्तव्य पालन से च्युत हो जाता है तब उसे इससे मिलने वाले अपमान की पीड़ा सहन करनी पड़ेगी।
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा: |
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् || 35||
जिन महान योद्धाओं ने तुम्हारे नाम और यश की सराहना की है, वे सब यह सोचेंगे कि तुम भय के कारण युद्धभूमि से भाग गये और उनकी दृष्टि में तुम अपना सम्मान गंवा दोगे।
अर्जुन एक पराक्रमी योद्धा के रूप में विख्यात था और कौरव पक्ष के महा बलशाली योद्धा जैसे भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण आदि के लिए शक्तिशाली प्रतिद्वन्दी था। उसने स्वर्ग के कई देवताओं के साथ युद्ध कर ख्याति प्राप्त की थी। उसने शिकारी का भेष धारण करके आये भगवान शिव के साथ युद्ध किया और भगवान शिव ने उसकी वीरता और युद्ध कौशल पर प्रसन्न होकर उसे पाशुपतास्त्र नामक दिव्य अस्त्र उपहार में दिया।
अर्जुन को धनुर्विद्या प्रदान करने वाले गुरु द्रोणाचार्य ने भी उसे आशीर्वाद के रूप में विशेष शस्त्र प्रदान किए थे। अब महाभारत का युद्ध प्रारम्भ होने से पहले यदि अर्जुन युद्ध भूमि से पलायन कर जाता तब ये महायोद्धा यह नहीं समझते कि अपने स्वजनों के अनुराग से प्रेरित होकर उसने युद्ध पलायन किया था बल्कि इसके विपरीत वे उसे कायर मानते हुए यह समझते कि उनके पराक्रम के भय से वह युद्ध से विमुख हो गया।
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिता: |
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दु:खतरं नु किम् || 36||
तुम्हारे शत्रु तुम्हारी निन्दा करेंगे और कटु शब्दों से तुम्हारा मानमर्दन करेंगे और तुम्हारी सामर्थ्य का उपहास उड़ायेंगें। तुम्हारे लिए इससे पीड़ादायक और क्या हो सकता है?
यदि अर्जुन युद्ध से पलायन करता है तब न केवल युद्ध के लिए एकत्रित वीर योद्धाओं की दृष्टि में अर्जुन का मान-सम्मान कम हो जाएगा अपितु उसे तुच्छ भी समझा जाएगा। श्रीकृष्ण ने 'निन्दन्त' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ निन्दा करना है तथा 'अवाच्यवादांश्च' शब्द का तात्पर्य कटु शब्दों का प्रयोग जैसे 'नपुंसक' आदि शब्द से है। अर्जुन का शत्रु दुर्योधन उसके बारे में बहुत से न कहे जाने वाले अपशब्द जैसे-'देखो युद्ध छोड़कर भागे इस लाचार अर्जुन को, श्रीकृष्ण अर्जुन को स्मरण करवाना चाहते हैं कि इस प्रकार के व्यंग्यपूर्ण कथन उसके लिए अत्यंत दुःखदायी होंगे।
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् |
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय: || 37||
हे कुन्ती पुत्र! यदि तुम युद्ध करते हो तो या तो तुम मारे जाओगे और स्वर्ग लोक प्राप्त करोगे या विजयी होने पर पृथ्वी के साम्राज्य का सुख भोगोगे। इसलिए हे कुन्ती पुत्र! उठो और दृढ़ संकल्प के साथ युद्ध करो।
श्लोक 2.31 से श्रीकृष्ण निरन्तर वर्णाश्रम धर्म के स्तर पर अपने दिव्य उपदेशों की व्याख्या कर रहे हैं। वे अर्जुन को अपने कर्त्तव्य का पालन करने के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली दो प्रकार की संभावनों को व्यक्त कर रहे हैं। यदि अर्जुन युद्ध में विजय प्राप्त करता है तब वह पृथ्वी का साम्राज्य प्राप्त करेगा और यदि अपने धर्म का पालन करने के लिए उसे अपने जीवन का बलिदान भी करना पड़ा तब वह स्वर्गलोक में जाएगा।
सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ |
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि || 38||
कर्तव्यों के पालन हेतु युद्ध करो, युद्ध से मिलने वाले सुख-दुःख, लाभ-हानि को समान समझो। यदि तुम इस प्रकार अपने दायित्त्वों का निर्वहन करोगे तब तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा।
लौकिक स्तर पर अर्जुन को प्रेरित करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब गहन कर्मयोग का ज्ञान प्रदान करने की ओर अग्रसर होते हैं। अर्जुन को यह भय था कि यदि वह युद्ध में अपने शत्रुओं का वध करता है तो उसे पाप लगेगा। श्रीकृष्ण उसके भय को दूर करते हैं। वे अर्जुन को उपदेश देते हैं कि वह फल की इच्छा किए बिना अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करे। इस प्रकार की मनोदशा के साथ कर्त्तव्य का पालन करने से उसे पाप लगने के भय से मुक्ति मिलेगी। जब हम स्वार्थ की भावना के साथ कार्य करते हैं तब हम कर्म का सृजन करते हैं जिसका हमें बाद में एक निश्चित परिणाम मिलता है। माठर स्मृति में वर्णित है:
पुण्येन पुण्य लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम्।
(माठर स्मृति)
"यदि तुम शुभ कर्म करते हो तब तुम स्वर्ग में जाओगे। यदि तुम अशुभ कर्म करोगे तब नरक में जाओगे और तुम शुभ और अशुभ दोनों कर्म करते हो तब तुम्हें पुनः मृत्यु लोक में वापस आना पड़ेगा।" इसलिए इन दोनों परिस्थितियों में हम अपने कर्मों के प्रतिफलों से बंधे हुए हैं। इसलिए शुभ लौकिक कर्म भी बंधन है और उनका फल भौतिक सुख है जिसके कारण हमारे कर्मों का संचयन बढ़ता है और हमारे इस भ्रम को और अधिक पुष्ट करता है कि इस संसार में सुख है। यदि हम स्वार्थ की कामना को त्याग देते हैं तब फिर हमारे कर्म परिणाम उत्पन्न नहीं करते।
उदाहरणार्थ हत्या करना एक पाप है और सभी देशों की न्यायिक व्यवस्थाओं में इसे दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है। किंतु यदि पुलिस का कोई सिपाही अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए डाकुओं के दल के सरदार को मार देता है तब उसे इसके लिए दंड नहीं मिलता है अपितु उसे उसकी वीरता के लिए पुरस्कार मिलता है। इसे दण्ड न मिलने का कारण यह है कि यह कार्य दुर्भावना और स्वार्थ की भावना से प्रेरित नहीं है और इसका निर्वहन देश के प्रति कर्त्तव्यों के पालन की दृष्टि से किया गया है। भगवान का विधान भी एकदम समान है। यदि कोई सभी प्रकार की कामनाओं का त्याग कर केवल कर्त्तव्य पालन के लिए कार्य करता है तब ऐसे कार्यों के परिणाम उत्पन्न नहीं होते हैं।
इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को परामर्श देते हैं कि वह युद्ध के परिणामों से विरक्त होकर केवल अपने कर्तव्यों के पालन की ओर ध्यान दे। जब वह समान भावना से युद्ध करेगा, विजय और पराजय तथा सुख-दुःख को एक समान समझेगा, तब अपने शत्रुओं का वध करने पर भी उसे पाप नहीं लगेगा।
इस विषय को बाद में भगवद्गीता के श्लोक 5.10 में भी दोहराया गया है। "जिस प्रकार कमल के पत्ते जल पर रहकर भी डाल को स्पर्श नहीं करते-उसी प्रकार से जो मनुष्य अपने सभी कर्मों को भगवान के प्रति अर्पित करता है और सभी प्रकार के मोह का त्याग कर देता है वह पाप से अछूता रहता।"
बिना आसक्ति के कर्म करने के परिणाम को समझाने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब अपने द्वारा व्यक्त किए गए दिव्य वचनों में निहित तर्क को प्रकट करने के लिए कर्मयोग की विस्तार से व्याख्या करेंगे।
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु |
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि || 39||
अब तक मैंने तुम्हें सांख्य योग या आत्मा की प्रकृति के संबंध में वैश्लेषिक ज्ञान से अवगत कराया है। अब मैं बुद्धियोग या ज्ञानयोग प्रकट कर रहा हूँ, हे पार्थ! उसे सुनो। जब तुम ऐसे ज्ञान के साथ कर्म करोगे तब कर्मों के बंधन से स्वयं को मुक्त कर पाओगे।
सांख्य शब्द 'सां' धातु से बना है। 'सां' का अर्थ 'पूर्ण' तथा 'ख्य' का अर्थ जानना है। सांख्य दर्शन छः भारतीय दर्शन शास्त्रों में से एक दर्शनशास्त्र है जिसमें ब्रह्माण्ड के तत्त्वों की विश्लेषणात्मक गणना की गयी है। इसमें 24 तत्त्वों की व्याख्या की गयी है: पंच महाभूत, (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) पाँच तन्मात्राएँ (इन्द्रियों के पाँच विषय रसना, स्पर्श, गंध, श्रव्य और रूप) पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ-मन, अहंकार (जिसका उत्पत्ति महान में विकार से उत्पन्न होती है), महान (जिसकी उत्पत्ति प्रकृति में विकार उत्पन्न होने से होती है) और प्रकृति (आदिकालीन भौतिक शक्ति का रूप) है। इसके अतिरिक्त पुरुष या आत्मा है जो प्रकृति का भोग करता है और उसके बंधन में बंध जाता है।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को केवल सांख्य योग के भिन्न प्रकार के स्वरूप का ज्ञान करवाया है जो कि अविनाशी आत्मा का विश्लेषणात्मक ज्ञान है। श्रीकृष्ण अब कहते हैं कि वे बिना फल की इच्छा के कर्मयोग का ज्ञान प्रकट कर रहे हैं। इसके लिए कर्म के फल के प्रति विरक्ति आवश्यक है। ऐसी विरक्ति विवेक के साथ बुद्धि का प्रयोग करने से आती है इसलिए श्रीकृष्ण ने अपनी इच्छा के अनुसार इसे बुद्धि-योग कहा है। आगे श्लोक 2.41 और 2.44 में श्रीकृष्ण यह व्याख्या करेंगे कि मन में विरक्ति का भाव उत्पन्न करने में बुद्धि किस प्रकार से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते |
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || 40||
इस स्थिति में कर्म करने से किसी प्रकार की हानि या प्रतिकूल परिणाम प्राप्त नहीं होते अपितु इस प्रकार से किया गया अल्प प्रयास भी बड़े से बड़े भय से हमारी रक्षा करता है।
हमारे सामने सबसे बड़ा भय यह है कि अगले जन्म में हमें संभवतः मानव देह प्राप्त होने के स्थान पर कहीं निम्न योनियों जैसे पशु, पक्षी आदि की योनियों में जन्म लेना और नरक लोकों में न जाना पड़े। हमें यह निश्चिन्तता नहीं हो सकती कि अगले जन्म में हमारे लिए मनुष्य योनि सुरक्षित रहेगी क्योंकि पुनर्जन्म का निर्धारण हमारे कर्मों और इस जीवन की हमारी चेतना के अनुसार होता है।
पृथ्वी पर 84 लाख योनियों का अस्तित्व है। मनुष्य से निम्न योनियों-पशु-पक्षी, मीन, कीट-कीटाणु, आदि में मनुष्यों के समान बुद्धि नहीं होती। यद्यपि वे मनुष्य की भांति खाने, सोने और अपनी रक्षा व संभोग आदि गतिविधियों में संलग्न रहते हैं। जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त करने के प्रयोजनार्थ मानवजाति को बुद्धि के गुण से सम्पन्न किया गया है ताकि वह इसका प्रयोग स्वयं के उत्थान के लिए कर सके। अगर मनुष्य अपनी बुद्धि का प्रयोग पशुओं की भांति केवल खाने, सोने, संभोग और अपनी रक्षा करने जैसे कार्यों में करता है तब यह मानव जीवन को व्यर्थ करने के समान है।
यदि कोई मनुष्य जीवन के क्षणिक सुख के लिए खाद्य पदार्थों का सेवन करने में ही जीवन व्यतीत कर देता है तब अगले जन्म में उस व्यक्ति के लिए सुअर का शरीर अति उपयुक्त होगा और उस मनुष्य को अगले जन्म में सुअर का शरीर मिलेगा। अगर कोई निद्रा को ही जीवन का लक्ष्य बनाता है तब भगवान उसकी रुचि के अनुरूप ध्रुवीय भालू के शरीर को उपयुक्त समझ कर अगले जन्म में उसे ध्रुवीय भालू की योनि में भेजेंगे। इसलिए हमारे सामने सबसे बड़ा भय यह है कि शायद अगले जन्म में हमें मानव शरीर नहीं मिलेगा। वेदों मे वर्णन किया गया है:
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः
(केनोपनिषद्-2.5)
"हे मनुष्यों! मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है। यदि तुम इसका उपयोग परम लक्ष्य को प्राप्त करने में नहीं करते तब तुम्हें घोर हानि का सामना करना पड़ेगा।" कठोपनिषद् में आगे यह वर्णन है कि
इह चेदशकद् बोद्धं प्राक् शरीरस्य विस्त्रसः। ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ।।
(कठोपनिषद्-2.3.4.)
"यदि तुम इस जीवन में भगवद्प्राप्ति का प्रयास नहीं करते तो तुम्हें कई जन्मों तक 84 लाख योनियों में चक्कर लगाना पड़ेगा।"
एक बार जब हम आध्यात्मिक मार्ग पर चलना आरम्भ कर देते हैं और यदि हम इस जीवन में अपनी आध्यात्मिक यात्रा को पूर्ण नहीं कर पाते तब भगवान हमारी इस ओर चलने की इच्छा को देखते हुए हमें पुनः मनुष्य का शरीर देते हैं ताकि हम अपनी आध्यात्मिक यात्रा को पुनः वहीं से प्रारम्भ कर सके जहाँ से हमने इसे छोड़ा था। इस प्रकार से हम बड़े जोखिम से बच जाते हैं।
श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि इस मार्ग का अनुसरण करने के प्रयास से किसी प्रकार की हानि नहीं होती क्योंकि वर्तमान जीवन में हम जो भौतिक पदार्थ और धन सम्पदा इकट्ठा करते हैं, उसे बाद में मृत्यु के समय हम इसी संसार मे छोड़ जाते हैं। लेकिन यदि हम भक्ति योग के मार्ग पर चलते हुए आध्यात्मिक उन्नति करते हैं तब उसे भगवान हमारे श्रेष्ठ कर्मों में जोड़ते हैं और उसका फल हमें अगले जन्म में देते हैं ताकि हम अपनी आध्यात्मिक यात्रा को पुनः वहीं से आरम्भ कर सकें जहाँ से हमने इसे छोड़ा था। इस प्रकार अर्जुन को इसके लाभों से अवगत करवाने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब उसे बिना आसक्ति के निष्काम भाव से कर्मयोग के मार्ग पर चलने का उपदेश देना आरम्भ करते हैं।
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन |
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् || 41||
हे कुरुवंशी! जो इस मार्ग का अनुसरण करते हैं, उनकी बुद्धि निश्चयात्मक होती है और उनका एक ही लक्ष्य होता है लेकिन जो मनुष्य संकल्पहीन होते हैं उनकी बुद्धि अनेक शाखाओं मे विभक्त रहती है।
आसक्ति मानसिक क्रिया है। इसका अभिप्राय यह है कि मन बार-बार अपनी आसक्ति के विषयों की ओर भागता है जो किसी व्यक्ति, इन्द्रिय विषय, प्रतिष्ठा, शारीरिक सुख त्यादि में हो सकती है। यदि किसी व्यक्ति या इन्द्रिय विषय का विचार हमारे मन में बार-बार उठता है तब निश्चय ही यह मन का उसमें आसक्त होने का संकेत है। यदि यह मन ही आसक्त हो जाता है तब भगवान इस आसक्ति के विषय के बीच बुद्धि को क्यों लाना चाहते हैं। क्या आसक्ति का उन्मूलन करने में बुद्धि की कोई भूमिका होती है? हमारे शरीर में सूक्ष्म अंत:करण होता है जिसे हम बोलचाल की भाषा में हृदय भी कहते हैं। यह मन, बुद्धि और अहंकार से निर्मित होता है। इस सूक्ष्म शरीर में बुद्धि मन से श्रेष्ठ है जो निर्णय लेती है जबकि मन में इच्छाएँ उत्पन्न होती है और यह बुद्धि द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसार मोह के विषयों में अनुरक्त हो जाता है।
उदाहरणार्थ यदि मनुष्य की बुद्धि यह निर्णय करती है कि धन सम्पत्ति ही सुख का साधन है तब मन में धन प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हो जाती है। यदि बुद्धि यह निश्चय करती है कि जीवन में प्रतिष्ठा ही सबसे महत्त्वपूर्ण है तब मन में प्रतिष्ठा और ख्याति पाने की अभिलाषा उत्पन्न होती है। दूसरे शब्दों में, मन में बुद्धि के बोध के अनुसार इच्छाएँ विकसित होती हैं।
पूरे दिन हम अपने मन को बुद्धि द्वारा नियंत्रित करते हैं। जब हम अपने घर में होते है तब हम अनौपचारिक मुद्रा में रहते हैं जिसमें मन भी सहजता का अनुभव करता है जबकि अपने कार्यालय में रहते हुए हम औपचारिक मुद्रा में रहना सही समझते हैं। ऐसा नहीं है कि मन कार्यालय की औपचारिकताओं में प्रसन्न रहता है, अपितु वह अवसर मिलते ही अपेक्षाकृत घर जैसी अनौपचारिकताओं को अंगीकार करना चाहता है। इस प्रकार हमारी बुद्धि निश्चय करती है कि कार्यालय में औपचारिक आचरण का पालन करना अनिवार्य है। इसलिए बुद्धि मन को नियंत्रित करती है और हम पूरे दिन अपने कार्यालय में औपचारिक मुद्रा में रहते हैं और हमें मन की प्रकृति के विपरीत औपचारिक शिष्टाचार का पालन करना पड़ता है। इसी प्रकार मन कार्यालय के कार्यों में सुख अनुभव नहीं करता। यदि उसे स्वतंत्र छोड़ दिया जाए तब वह कार्यालय में कार्य करने की अपेक्षा घर में बैठकर टेलीविजन देखना चाहेगा किन्तु बुद्धि उसे यह आदेश देती है कि जीवन निर्वाह हेतु कार्यालय में बैठकर कार्य करना अनिवार्य है। इसलिए बुद्धि पुनः मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाती है और लोग आठ घंटे या अधिक समय तक कार्य करते हैं।
उपर्युक्त उदाहरण से हमें यह ज्ञात होता है कि हमारी बुद्धि मन को नियंत्रित करने में सक्षम है। इसलिए हमें अपनी बुद्धि को उचित ज्ञान के साथ पोषित करना चाहिए और उसका प्रयोग मन को उचित दिशा की ओर ले जाने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करने में करना चाहिए।
बुद्धियोग मन को कर्म फलों से विरक्त रखने का विज्ञान है जो बुद्धि में यह दृढ़ निश्चय विकसित करता है कि सभी कार्य भगवान के सुख के निमित्त हैं। ऐसी स्थिर बुद्धि वाला मनुष्य एकाग्रता से अपने लक्ष्य पर ध्यान रखता है और निर्बाध गति से धनुष से छोड़े गए बाण के समान अपने मार्ग को पार कर लेता है। ऐसा साधक यह संकल्प लेता है-"यदि मेरे मार्ग में लाख बाधाएँ उत्पन्न हो जाएँ और यदि सारा संसार मेरी निंदा करे और यदि मुझे अपने जीवन का भी बलिदान क्यों न करना पड़े तब भी मैं अपनी साधना नहीं छोडूंगा।
" साधना की उच्च अवस्था में यह संकल्प इतना अधिक दृढ़ हो जाता है कि साधक को अपने मार्ग पर चलने से कोई डिगा नहीं सकता किन्तु वे लोग जिनकी बुद्धि अनेक शाखाओं में विभक्त है, अपने मन को विभिन्न दिशाओं की ओर भटकते हुए पाते हैं। वे मन की एकाग्रता को विकसित करने में समर्थ नहीं होते जो भगवान की ओर जाने वाले मार्ग के लिए आवश्यक होती है।
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चित: |
वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन: || 42||
कामात्मान: स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् |
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति || 43||
अल्पज्ञ मनुष्य वेदों के आलंकारिक शब्दों में अत्यधिक आसक्त रहते हैं। वे स्वर्गलोक का सुख भोगने हेतु दिखावटी कर्मकाण्ड करने की अनुशंसा करते हैं और वे यह मानते हैं कि वेदों में उच्च सिद्धान्तों का वर्णन नहीं किया गया है। वे वेदों के केवल उन्हीं खण्डों को महिमामण्डित करते हैं जो उनकी इन्द्रियों को तृप्त करे और वे उत्तम जन्म, ऐश्वर्य, इन्द्रिय तृप्ति और स्वर्गलोक की प्राप्ति के लिए आडम्बरयुक्त कर्मकाण्डों का पालन हैं।
वेदों को तीन भागों में विभक्त किया गया है। ये खण्ड हैं-कर्मकाण्ड (धार्मिक अनुष्ठान) ज्ञान काण्ड (ज्ञान खण्ड) उपासना काण्ड (भक्ति खण्ड)। कर्मकाण्ड में भौतिक सुखों को भोगने और स्वर्गलोक की प्राप्ति के उद्देश्य से धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। वे लोग जो इन्द्रिय तृप्ति की कामना रखते है; वेदों के इस भाग को महिमामण्डित करते हैं।
स्वर्गलोक में भौतिक ऐश्वर्य और इन्द्रिय तृप्ति के भरपूर साधन उपलब्ध होते हैं। किन्तु स्वर्गलोक की कामना आध्यात्मिक उत्थान के लिए सहायक नहीं होती। स्वर्गलोक में भी मायाबद्ध संसार की तरह राग और द्वेष पाया जाता है और स्वर्ग लोक में जाने के पश्चात् जब हमारे संचित पुण्यकर्म समाप्त हो जाते है तब हमें पुनः मृत्युलोक में वापस आना पड़ता है।
अल्पज्ञानी लोग स्वर्ग की कामना रखते हैं और सोंचते हैं कि वेदों का केवल यही उद्देश्य है। इस प्रकार वे भगवतप्राप्ति का प्रयास न करते हुए निरन्तर जन्म और मृत्यु के चक्र में घूमते रहते हैं। जबकि आध्यात्मिक चिन्तन में लीन साधक स्वर्ग की प्राप्ति को अपना लक्ष्य नहीं बनाते।
मुण्डकोपनिषद् में वर्णित है
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयंधीराः पण्डितं मन्यमानाः। जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः।।
(मुण्डकोपनिषद्-1.2.8)
"जो स्वर्ग जैसे उच्च लोकों का सुख पाने के प्रयोजन से वेदों में वर्णित आडम्बरपूर्ण कर्मकाण्डों में व्यस्त रहते है और स्वयं को धार्मिक ग्रंथों का विद्वान समझते हैं वास्तव में वे मूर्ख हैं। वे एक अंधे व्यक्ति द्वारा दूसरे अंधे को रास्ता दिखाने वाले के समान हैं।"
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् |
व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ न विधीयते || 44||
ऐसे मनुष्यों को सांसारिक सुखों में मन की गहन आसक्ति तथा बुद्धि सांसारिक वस्तुओं में मोहित रहती है इसलिए वे भगवतप्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए दृढ़-संकल्प लेने में असमर्थ होते हैं।
वे मनुष्य जिनका मन इन्द्रिय के सुखों के प्रति आसक्त रहता है, वे सांसारिक विषयों और ऐश्वर्यों का भोग करने के लिए चिन्तित रहते हैं। वे अपनी बुद्धि का प्रयोग अपनी आय बढ़ाने, अपनी लौकिक प्रतिष्ठा बढ़ाने और भौतिक सुखों का संवर्धन करने में करते हैं। इस प्रकार से भ्रमित होकर वे भगवतप्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए अपेक्षित दृढ़-संकल्प धारण करने में असमर्थ रहते हैं।
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् || 45||
वेदों में प्रकृति के तीन गुणों का वर्णन मिलता है। हे अर्जुन! प्रकृति के इन गुणों से ऊपर उठकर विशुद्ध आध्यात्मिक चेतना मे स्थित हो जाओ। परम सत्य में स्थित होकर सभी प्रकार के द्वैतों से स्वयं को मुक्त करते हुए भौतिक लाभ-हानि और सुरक्षा की चिन्ता किए बिना आत्मलीन हो जाओ।
मायाशक्ति अपने तीन प्रकार के प्राकृतिक गुणों द्वारा दिव्य आत्मा को देह में बांधती है। ये तीन-गुण, सत्व (शुभ कर्म) रजस (आसक्ति) और तमस (अज्ञानता) हैं। प्रत्येक मनुष्य में पिछले अनन्त जन्मों के संस्कारों और उनकी रुचि व प्रवृत्ति के अनुसार इन गुणों की भिन्नता होती हैं। वैदिक ग्रंथ इस असमानता को स्वीकार करते हैं और सभी प्रकार के मनुष्यों को उचित उपदेश देते हैं। यदि शास्त्रों में सांसारिक मोह-माया में लिप्त मनुष्यों के लिए उपदेश निहित न हो तब आगे चलकर वे और अधिक पथ भ्रष्ट हो जाएंगे। इसलिए वेदों में मनुष्यों को भौतिक सुख प्रदान करने के प्रयोजनार्थ कठोर कर्मकाण्डों का वर्णन किया गया है जो मनुष्य को अज्ञानता अर्थात तमोगुण से रजो गुण और रजो गुण से सत्व गुण तक ऊपर उठने में उनकी सहायता कर सके। इसलिए वेदों में भौतिक सुखों में आसक्ति रखने वालों के लिए धार्मिक अनुष्ठानों और आध्यात्मिक अभिलाषा रखने वाले मनुष्यों के लिए दिव्य ज्ञान दोनों प्रकार की विद्याएँ सम्मिलित हैं।
जब श्रीकृष्ण अर्जुन को वेदों की अवहेलना करने के लिए कहते हैं तब उनके इस कथन को आगे आने वाले श्लोकों के संदर्भ में समझना आवश्यक है जिनमें वे यह इंगित कर रहे हैं कि अर्जुन वेदों के उन खण्डों पर अपना ध्यान आकर्षित न करे जिनमें भौतिक सुखों के लिए धार्मिक विधि विधानों और अनुष्ठानों को प्रतिपादित किया गया है अपितु परम सत्य को जानने के लिए तथा स्वयं को आध्यात्मिकता के उच्च स्तर तक उठाने के लिए वैदिक ज्ञान से परिपूर्ण वेदों के आध्यात्मिक भागों पर अपना ध्यान केन्द्रित करे।
यावानर्थ उदपाने सर्वत: सम्प्लुतोदके |
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानत: || 46||
जैसे एक छोटे जलकूप का समस्त कार्य सभी प्रकार से विशाल जलाशय द्वारा तत्काल पूर्ण हो जाता है, उसी प्रकार परम सत्य को जानने वाले वेदों के सभी प्रयोजन को पूर्ण करते हैं।
वेदों में एक लाख मंत्रा हैं जिनमें विभिन्न धार्मिक विधि विधानों, प्रार्थनाओं, अनुष्ठानों, और दिव्य ज्ञान का वर्णन किया गया है। इन सबका एक ही उद्देश्य आत्मा को परमात्मा के साथ एकीकृत करने में सहायता करना है।
वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः।
वासुदेवपरा योगा वासुदेवपराः क्रियाः।।
सांख्य योग वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः।
वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गतिः।।
(श्रीमद्भागवतम्-1.2.28-29)
"सभी वैदिक मंत्रों, धार्मिक विधि-विधानों, आध्यात्मिक क्रियाओं, यज्ञ, ज्ञान और कर्तव्यों का निर्वहन करने का लक्ष्य भगवान के दिव्य चरणों में प्रीति उत्पन्न करने में सहायता करना है।" जिस प्रकार औषधि की टिकिया पर प्रायः शक्कर का लेप लगा होता है ताकि वह मधुर लगे, उसी प्रकार वेद भौतिक प्रवृत्ति वाले मनुष्यों को सांसारिक प्रलोभनों की ओर आकर्षित करते हैं। इनका उद्देश्य मनुष्य को धीरे-धीरे सांसारिक बंधनों से विरक्त कर उसे भगवान में अनुरक्त करने में सहायता करना है। इस प्रकार जब किसी मनुष्य का मन भगवान में लीन हो जाता है तब स्वतः ही सभी वैदिक मंत्रों का प्रयोजन सिद्ध हो जाता है। श्रीकृष्ण द्वारा उद्धव को दिया गया उपदेश
आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयाऽऽदिष्टानपि स्वकान्।
धर्मान् सन्त्यज्य यः सर्वान् मां भजेत स सत्तमः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.11.32)
"वेदों में मनुष्य के लिए सामाजिक और धार्मिक विधि विधानों से संबंधित विभिन्न कर्त्तव्य निर्धारित किए गए हैं लेकिन वे मनुष्य जो इनके अंतर्निहित अभिप्राय को समझ लेते हैं और उनके मध्यवर्ती उपदेशों का त्याग करते हैं तथा पूर्ण समर्पण भाव से मेरी भक्ति और सेवा में तल्लीन रहते हैं, उन्हें मैं अपना परम भक्त मानता हूँ।"
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || 47 ||
इसलिए हमें कर्ता होने के अभिमान का त्याग करना होगा और यह स्मरण रखना होगा कि भगवान ही केवल उन शक्तियों के एक मात्र स्रोत हैं जिनके द्वारा हम कर्म करते हैं। उपर्युक्त प्रकार के विचारों का सुन्दर वर्णन निम्न वर्णित प्रसिद्ध संस्कृत के श्लोक में मिलता है।
यत्कृतं यत्करिष्यामि तत्सर्वं न मयाकृतम्।
त्वया कृत तु फलभुक् त्वमेव मधुसूदन ।।
"जो भी मैंने प्राप्त कर लिया है और जो भी प्राप्त करना चाहता हूँ उनका कर्ता मैं नहीं हूँ। हे मधुसूदन! आप ही वास्तविक कर्ता हो और आप ही सभी फलों के स्वयं भोक्ता हो।"
अकर्मण्यता के प्रति आसक्त न होनाः यद्यपि कर्म करना सभी मनुष्यों का स्वभाव है किन्तु प्रायः ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं जब कार्य करना बोझिल और कठिन लगता है। ऐसी स्थिति में उससे बचने के स्थान पर हमें श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए कर्मयोग के दिव्य ज्ञान के अनुसार उस कार्य को सम्पन्न करना चाहिए। किन्तु यह सरासर अनुचित होगा यदि हम कार्य को दुष्कर और बोझिल मानकर अकर्मा बन जायें। निष्क्रियता के प्रति आसक्ति होने से कभी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता और भगवान श्रीकृष्ण इसकी स्पष्ट रूप से निंदा करते हैं।
योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय |
सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||48||
हे अर्जुन! सफलता और असफलता की आसक्ति को त्याग कर तुम दृढ़ता से अपने कर्तव्य का पालन करो। यही समभाव योग कहलाता है।
समता का भाव हमें सभी परिस्थितियों को शांतिपूर्वक स्वीकार करने के योग्य बनाता है। यह इतना प्रशंसनीय है कि भगवान ने इसे 'योग' अर्थात् भगवान के साथ एक होना कहा है। यह समबुद्धि पिछले श्लोक में वर्णित ज्ञान का अनुसरण करने से आती है। जब हम यह जान जाते हैं कि प्रयास करना हमारे हाथ में है किंतु परिणाम सुनिश्चित करना हमारे नियंत्रण मे नहीं है तब हम केवल अपने कर्तव्यों के पालन की ओर ध्यान देते हैं। फलों की प्राप्ति भगवान के सुख के लिए है और हमें उन्हें भगवान को अर्पित करना चाहिए। अब ऐसी स्थिति में यदि हम यश और अपयश, सफलता और असफलता, सुख और दुःख दोनों को समान रूप से भगवान की इच्छा मानते हुए ग्रहण करना सीख लेते हैं तब हमारे भीतर ऐसा समभाव विकसित होता है जिसकी व्याख्या भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा की गयी है।
यह श्लोक जीवन की उथल-पुथल का अति व्यावहारिक समाधान है। यदि हम समुद्र में नौका चलाते हैं तब यह स्वाभाविक है कि समुद्र की लहरें नौका को हिला सकती हैं। यदि हम हर समय यह सोंचकर व्याकुल होते है कि लहरें नाव से टकरायेंगी तब हमारे दुःखों का कोई अंत नहीं होगा और यदि हम समुद्र में लहरें न उठने की अपेक्षा करते तब समुद्र की प्राकृतिक विशेषताओं में विरोध उत्पन्न होता है। लहरों का समुद्र से अविछिन्न सम्बंध है। उसी प्रकार से जब हम जीवन रूपी समुद्र को पार करते हैं तब हमारे सम्मुख लहरों के समान अनेक बाधाएँ आती हैं जो हमारे नियंत्रण से परे होती हैं।
यदि हम संघर्ष करते हुए प्रतिकूल परिस्थितियों को जीतना भी चाहें तब भी हम दुःखों को टालने में असमर्थ होंगे। यदि हम अपने मार्ग में आने वाली सभी कठिनाइयों का सामना करना सीख लेते हैं और उन्हें भगवान की इच्छा पर छोड़ देते हैं तब इसे ही वास्तविक 'योग' कहा जाएगा।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय |
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणा: फलहेतव: || 49||
हे अर्जुन! दिव्य ज्ञान और विवेक की शरण ग्रहण करो, फलों की आसक्ति युक्त कर्मों से दूर रहो जो दिव्य ज्ञान में स्थित बुद्धि के द्वारा निष्पादित किए गए कार्यों से निष्कृष्ट हैं। जो अपने कर्मफलों का भोग करना चाहते हैं, वे कृपण हैं।
किसी भी कार्य के दो प्रकार के दृष्टिकोण होते हैं-(1) हमारी बाह्य गतिविधियाँ, (2) उनके प्रति हमारी आंतरिक मनोवृत्ति। इसे हम वृंदावन की पावन भूमि पर बनाए जा रहे मन्दिर का उदाहरण देते हुए स्पष्ट कर सकते हैं। मन्दिर का निर्माण करने वाले श्रमिक एक पवित्र कार्य को सम्पन्न करने में लगे हैं किन्तु उनकी मनोवृत्ति सांसारिक है। वे केवल अर्जित किए जाने वाले पारिश्रमिक में ही रुचि रखते हैं। यदि कोई दूसरा ठेकेदार उन्हें अधिक पारिश्रमिक देता हैं तब वे अपनी नौकरी बदलने में कोई संकोच नहीं करेंगे। वृंदावन मे कई तपस्वी लोग भी रहते हैं जो यह देखकर कि वृंदावन में भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है, वे इसे भगवान की सेवा मानकर कार सेवा (स्वैच्छिक सेवा) में जुट जाते हैं। श्रमिकों और साधुओं द्वारा निष्पादित किया जा रहा कार्य एक समान ही है किन्तु उनकी आंतरिक मनोवृत्ति अलग-अलग है। यहां श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि वह अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए अपनी आंतरिक प्रेरणा के साथ ऊपर उठे। श्रीकृष्ण घोषणा करते हैं कि जो लोग स्वयं को सुखी रखने के प्रयोजनार्थ कर्म करते हैं, वे दुःखी होते हैं। वे लोग जो बिना फल की आसक्ति के समर्पित होकर समाज के कल्याणार्थ अपने कर्त्तव्य का पालन करते हैं, श्रेष्ठ कहलाते हैं और वे लोग जो अपने कर्मों के फल भगवान को अर्पित कर देते हैं, वे वास्तव में ज्ञानी हैं। इस श्लोक में कृपण शब्द प्रयुक्त हुआ है। श्रीमद्भागवतम् में कृपण शब्द का वर्णन निम्न प्रकार से किया गया हैं:
न वेद कृपणः श्रेय आत्मनो गुणवस्तुदृक् ।
तस्य तानिच्छतो यच्छेद् यदि सोऽपि तथाविधः।।
(श्रीमद्भागवतम्-6.9.49)
"कृपण वे हैं जो यह सोचते हैं कि परम सत्य केवल भौतिक तत्त्वों द्वारा निर्मित इन्द्रिय विषय भोग के पदार्थों में ही है।" श्रीमद्भागवतम् में पुनः यह भी वर्णन किया गया है: “कृपणो योऽजितेन्द्रियः" (11.19.44) "कृपण वह है, जिसका इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं है।" जब कोई मनुष्य चेतना के उच्चतर स्तर की ओर अग्रसर होता है तब वह स्वभाविक रूप से कर्मों के फलों का सुख प्राप्त करने की इच्छा का त्याग कर देता है और समाज सेवा की भावना से कार्य करता है।
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते |
तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम् || 50||
जब कोई मनुष्य बिना आसक्ति के कर्मयोग का अभ्यास करता है तब वह इस जीवन में ही शुभ और अशुभ कर्मफलों से छुटकारा पा लेता है। इसलिए योग के लिए प्रयास करना चाहिए जो कुशलतापूर्वक कर्म करने की कला है।
'कर्मयोग' विज्ञान के संबंध में उपदेश सुनकर प्रायः लोग आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि यदि वे परिणाम के प्रति आसक्ति का त्याग कर देते हैं तब उनकी कार्यकुशलता कम हो जाएगी। भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि बिना निजी स्वार्थ के कार्य करने से हमारे कार्य की गुणवत्ता कम नहीं होती अपितु हम पहले से अधिक कुशलता प्राप्त कर लेते हैं।
एक निष्ठावान सर्जन का उदाहरण लें जो लोगों का ऑपरेशन करते समय चाकू से चीर-फाड़ (सर्जरी) का कार्य करता है और वह समभाव से अपना कर्त्तव्य निभाता है, चाहे रोगी जीवित बचे या मर जाए वह आहत नहीं होता। क्योंकि वह केवल निःस्वार्थ भाव से अपनी पूरी योग्यता के साथ अपना कार्य करता है और उसकी परिणाम के प्रति कोई आसक्ति नहीं है। इसलिए यदि रोगी ऑपरेशन करते समय मर जाता है तब सर्जन को हत्या करने का अपराध बोध नहीं होता। यदि उसी सर्जन के अपने इकलौते पुत्र का ऑपरेशन किया जाना हो तब ऐसी दशा में वह स्वयं उसका ऑपरेशन करने का साहस नहीं जुटा पाता क्योंकि अब उसमें परिणाम के प्रति आसक्ति का भाव आ जाता है और उसमें यह भय व्याप्त हो जाता है कि वह कुशलतापूर्वक ऑपरेशन करने के योग्य है या नहीं।
वह दूसरे सर्जन की सहायता लेना चाहता है। इससे ज्ञात होता है कि परिणाम के प्रति आसक्ति हमें अपेक्षाकृत अधिक कुशल नहीं बनाती अपितु इसके विपरीत आसक्ति हमारी कार्यकुशलता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।
इसके स्थान पर यदि हम बिना आसक्ति के कार्य करते हैं तब हम आकुलता, घबराहट, आशंका और अधीरता से रहित होकर अत्यधिक कुशलता से कार्य कर सकते हैं। इसी प्रकार से अर्जुन का निजी उदाहरण भी इस तथ्य को उजागर करता है कि फल की आसक्ति को त्यागने से कार्य की कुशलता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
भगवद्गीता का उपदेश सुनने से पूर्व अर्जुन विजयी होकर राजपाट पाने की इच्छा के साथ युद्ध करना चाहता था। श्रीकृष्ण से भगवद्गीता का उपदेश सुनने के पश्चात् उसने युद्ध लड़ा क्योंकि यह भगवान की सेवा थी और श्रीकृष्ण की भी इसमें प्रसन्नता थी। वह सदैव एक योद्धा रहा यद्यपि उसकी आंतरिक प्रेरणा परिवर्तित हो गई थी।
बिना मोह के किए गए कर्त्तव्य पालन ने उसे किसी भी प्रकार से कम सक्षम नहीं बनाया। वास्तव में उसने अति उत्साह और वीरता से युद्ध लड़ा क्योंकि युद्ध करने का उसका कार्य प्रत्यक्ष रूप से भगवान की सेवा थी।
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिण: |
जन्मबन्धविनिर्मुक्ता: पदं गच्छन्त्यनामयम् || 51||
समबुद्धि युक्त ऋषि मुनि कर्म के फलों की आसक्ति से स्वयं को मुक्त कर लेते हैं जो हमें जन्म-मृत्यु के चक्र में बांधती हैं। इस चेतना में कर्म करते हुए वे उस अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं जो सभी दुःखों से परे है।
श्रीकृष्ण निरन्तर फल के प्रति आसक्त हुए बिना कर्म करने के विषय को समझा रहे हैं और कहते हैं कि यह विरक्ति मनुष्य को सुख-दुःख की अनुभूति से परे की अवस्था में ले जाती है। हम प्रेम के लिए लालायित रहते हैं किन्तु हमें निराशा मिलती है, हम जीवित रहना चाहते हैं लेकिन हम यह भी जानते हैं कि हम प्रतिक्षण मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं।
श्रीमद्भागवतम् में वर्णन किया गया है:
सुखाय कर्माणि करोति लोको न तैः सुखं वान्यदुपारमं वा।
विन्देत भूयस्तत एव दुःखं यदत्र युक्तं भगवान् वदेनः।।
(श्रीमद्भागवतम्-3.5.2)
"सभी लोग सुख प्राप्त करने के लिए कर्मों में संलग्न रहते हैं किन्तु फिर भी उन्हें इससे संतोष नहीं मिलता अपितु फल के प्रति आसक्त होकर कर्म करने से उनके कष्ट और अधिक बढ़ जाते हैं।" परिणामस्वरूप व्यावहारिक रूप से सभी लोग इस संसार मे दुःखी हैं। कुछ शारीरिक और मानसिक कष्ट भोग रहे हैं। कुछ लोग अपने परिवार के सदस्यों या सगे-संबंधियों से उत्पीड़ित होते हैं और कुछ धन और जीवन यापन के लिए मूलभूत वस्तुओं के अभाव से दुःखी हैं। भौतिक सुखों में लिप्त सांसारिक मनोवृत्ति वाले लोग जानते हैं कि वे वास्तव मे दुःखी हैं किन्तु वे सोचते हैं कि जो अन्य लोग उनसे अधिक समृद्ध हैं, वे सुखी होंगे और इसलिए वे भी सांसारिक सुख सुविधाओं को बढ़ाने की दिशा की ओर निरन्तर भागने में लगे रहते हैं। यह अंधी दौड़ अनेक जन्मों तक चलती रहती है और फिर भी सुख की कोई किरण दिखाई नहीं देती। जब लोगों को यह अनुभव होता है कि सकाम कर्मों में संलग्न होने से कभी भी कोई मनुष्य सुख प्राप्त नहीं कर सकता, तब उन्हें समझ में आता है कि वे जिस दिशा की ओर भाग रहे हैं, वह निस्सार है और फिर वे आध्यात्मिक जगत की ओर मुड़ने के लिए सोचते हैं।
वे बुद्धिमान पुरुष जो आध्यात्मिक ज्ञान से दृढ़-निश्चयी हो जाते हैं वे यह जान जाते हैं कि भगवान सभी पदार्थों के भोक्ता हैं। परिणामस्वरूप वे अपने कर्मों के प्रति आसक्ति के भाव को त्याग कर सब कुछ भगवान को अर्पित करते हैं और सुख-दुःख आदि सभी को समान रूप से स्वीकार करते हैं। ऐसा करने से उनके कर्म अपने फलों से मुक्त हो जाते हैं जो मनुष्य को जन्म और मृत्यु के बंधन मे बांधते हैं।
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति |
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च || 52||
जब तुम्हारी बुद्धि मोह के दलदल को पार करेगी तब तुम सुने हुए और आगे सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक के भोगों के प्रति उदासीन हो जाओगे।
श्रीकृष्ण ने पहले के श्लोकों में स्पष्ट किया है कि जो लोग वेदों के उन अलंकारिक शब्दों से सांसारिक सुख और ऐश्वर्य के प्रति आकर्षित होते हैं, वे सांसारिक भोगों, ऐश्वर्य को प्राप्त करने और स्वर्ग प्राप्त करने के प्रयोजनार्थ धार्मिक कर्मकाण्डों का अनुष्ठान करते हैं (श्लोक 2.42 2.43) किन्तु जिनकी बुद्धि आध्यात्मिक ज्ञान से प्रकाशित है, वे यह जानते हैं कि सांसारिक सुख और इन्द्रिय तृप्ति दुःखों के अग्रदूत हैं, ऐसे ज्ञानी महापुरुष वेदों के कर्मकाण्डों में रुचि नहीं रखते। मुण्डकोपनिषद् में वर्णन किया गया हैं
परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन।
(मुण्डकोपनिषद्-1.2.12)
"सिद्ध ज्ञानी पुरुष यह समझने के पश्चात् कि सकाम कर्मों से प्राप्त होने वाले सुख इस जन्म में तथा स्वर्ग में अस्थायी और कष्टदायी होते हैं, वे वैदिक कर्मकाण्डों से दूर रहते हैं।"
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला |
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि || 53||
जब तुम्हारी बुद्धि का वेदों के अलंकारमयी भागों के प्रति आकर्षण समाप्त हो जाए और वह दिव्य चेतना में स्थिर हो जाए तब तुम पूर्ण योग की उच्च अवस्था का प्राप्त कर लोगे।
जब साधक आध्यात्मिक मार्ग में उन्नति करते हैं, तब ऐसे साधकों का भगवान से अटूट संबंध स्थापित हो जाता है। उस समय उन्हें यह ज्ञात होता है कि वे पहले वेदों के जिन कर्मकाण्डों का पालन कर रहे थे, वे सब बोझिल और समय व्यर्थ करने वाले हैं। फिर वे यह जानना चाहते हैं कि क्या उन्हें अपनी साधना के साथ-साथ धार्मिक अनुष्ठानों का निष्पादन भी जारी रखना चाहिए और यदि वे धार्मिक अनुष्ठानों को तिलांजली देकर केवल अपनी साधना भक्ति में समर्पित हो जाते हैं तब ऐसा करने पर वे कोई अपराध तो नहीं करेंगे? ऐसे लोग अपने संदेह का उत्तर इस श्लोक में पा सकते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वेदों के अलंकारमयी खण्डों के प्रति आकर्षित हुए बिना साधना भक्ति में स्थिर होना कोई अपराध नहीं है अपितु यह उच्चतम आध्यात्मिक चेतना की अवस्था है। 14वीं शताब्दी के महान संत माध वेन्द्र पुरी ने इस मनोभावना को दृढ़ता से व्यक्त किया है। वह वैदिक ब्राह्मण थे और धार्मिक विधियों का पालन करने में अत्यंत व्यस्त रहते थे लेकिन जब उन्होंने सन्यास ग्रहण किया तब वे पूर्णरूप से श्रीकृष्ण की भक्ति में तल्लीन हो गए। अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने अपनी भावना को इस प्रकार से व्यक्त कियाः
सन्ध्यावन्दनभद्रमस्तु भवते भोः स्नान तुभ्यं नमः।
भो देवाः पितरश्चतर्पणविधौ नाहं क्षमः क्षम्यताम् ।।
यत्र क्वापि निषद्य यादव कुलोत्तमस्य कंसद्विषः।
स्मारं स्मारमा हरामि तदलं मन्ये किमन्येन मे।।
"मैं सभी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठानों से क्षमा याचना करता हूँ क्योंकि मैं इनका पालन करने में समय व्यर्थ नहीं करना चाहता। इसलिए मेरी त्रिकाल प्रार्थनाओं और मेरे प्रिय संध्या वंदन (जनेउ धारण करने वाले मनुष्य के लिए दिन में तीन बार पालन किए जाने वाले धार्मिक विधि विध न) प्रातः कालीन स्नान, देवताओं के यज्ञ के भाग, पितरों को तर्पण इत्यादि कृपया मुझे क्षमा करें। अब मैं जहां भी बैठता हूँ तो मैं केवल कंस के शत्रु श्रीकृष्ण का स्मरण करता हूँ जो मुझे सांसारिक बंधनों से मुक्त करने के लिए पर्याप्त है।
श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में समाधौ-अचला शब्द का प्रयोग किया है जिसका तात्पर्य दिव्य चेतना में दृढ़तापूर्वक स्थित होने की अवस्था से है। समाधि शब्द की रचना सम् धातु (समत्व) और धि (बुद्धि) से हुई है जिसका तात्पर्य 'बुद्धि की पूर्ण साम्यावस्था' है। जो मनुष्य चेतना की उच्चावस्था में स्थिर हो जाता है उसे सांसारिक आकर्षण विचलित नहीं कर सकते तथा वह समाधि या पूर्ण योग की अवस्था को प्राप्त कर लेता है।
अर्जुन उवाच |
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव |
स्थितधी: किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् || 54||
अर्जुन ने कहाः हे केशव! दिव्य चेतना में लीन मनुष्य के क्या लक्षण हैं। वह सिद्ध पुरुष कैसे बोलता है? कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
स्थितप्रज्ञस्य (स्थिर बुद्धियुक्त मनुष्य) और समाधिस्थस्य (दिव्य चेतना में स्थित) की उपाधि महापुरुषों को दी जाती है। श्रीकृष्ण से पूर्ण योग की अवस्था या समाधि के विषय पर उपदेश सुनकर अर्जुन स्वाभाविक प्रश्न पूछता है। वह ऐसी अवस्था वाले सिद्धपुरुष के मन की प्रकृति के संबंध में जानना चाहता है। इसके अतिरिक्त वह यह भी जानना चाहता है कि दिव्य चेतना में स्थित मनुष्य की मानसिकता उसके स्वभाव में कैसे प्रकट होती है। इस श्लोक से आरम्भ करते हुए अर्जुन श्रीकृष्ण से सोलह प्रश्न पूछता है। जिसकी प्रतिक्रिया में श्रीकृष्ण कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, तप और ध्यान इत्यादि के संबंध में गूढ़ रहस्य प्रकट करते हैं।
अर्जुन द्वारा पूछे गए सोलह प्रश्न निम्नवर्णित हैं
1. "दिव्य चेतना में स्थित मनुष्य के क्या लक्षण हैं।" (श्लोक 2.54)
2. “यदि तुम ज्ञान को सकाम कर्मों से श्रेष्ठ मानते हो तब मुझे इस घोर युद्ध में क्यों धकेलना ___चाहते हो।" (श्लोक 3.1)
3. "मनुष्य न चाहकर भी पापकर्मों में क्यों प्रवृत्त हो जाता है? क्या उसे बलपूर्वक पापमयी कर्मों में लगाया जाता है।" (श्लोक 3.36)
4. "आपका जन्म सूर्य से बहुत काल पश्चात् हुआ था, तब फिर मैं यह कैसे समझूं कि आपने उसे इस ज्ञान का उपदेश दिया था।" (श्लोक 4.4)
5. "पहले आप कर्मों का परित्याग करने की अनुशंसा करते हैं और फिर पुनः आप निष्ठापूर्वक श्रद्धाभक्ति के साथ कर्म करने की प्रशंसा करते हैं। कृपया मुझे निश्चयपूर्वक समझाने की कृपा करें कि इन दोनों में से क्या लाभकारी है।" (श्लोक 5.1)
6. "हे कृष्ण। मन चंचल, अशांत, शक्तिशाली और हठी है। मुझे प्रतीत होता है कि वायु की अपेक्षा इसे नियंत्रित करना अत्यंत कठिन है।" (श्लोक 6.33)
7. "उस असफल योगी का भविष्य कैसा है जो प्रारम्भ में श्रद्धापूर्वक भक्तिमार्ग पर चलता है तथा बाद में जिसका मन भगवान से हटकर दुर्वासनाओं में लिप्त हो जाता है और अपने जीवन में भगवतप्राप्ति नहीं कर पाता।" (श्लोक 6.37)
8. "ब्रह्म क्या है और कर्म क्या है? अधिभूत क्या है और अधिदेव कौन है? अधियज्ञ क्या है और यह शरीर में कैसे रहता है? मन को भक्ति में स्थिर रखने वाले योगी मृत्यु के समय आपको कैसे पा लेते हैं।" (श्लोक 8.1-2)
9. "कृपया मुझे अपने दिव्य वैभवों के संबंध में विस्तारपूर्वक समझाएँ जिसके द्वारा आप समस्त संसार में व्याप्त हैं।" (श्लोक 10.16) ।
10. "हे परम पुरुषोत्तम! मेरी इच्छा है कि मैं आपका विश्वरूप देखूं!" (श्लोक 11.3)
11. "मैं जानना चाहता हूँ कि आप कौन हैं, आपकी प्रकृति और कार्य मुझे विस्मित करते हैं।" (श्लोक 11.31)
12. "जो आपकी साकार रूप में भक्ति करते हैं या जो अव्यक्त निर्गुण निर्विशेष ब्रह्म के रूप में आपकी पूजा करते हैं, इन दोनों में से किसको श्रेष्ठ माना जाए।" (श्लोक 12.1)
13. "मैं प्रकृति और पुरुष (भोक्ता) के बारे में जानना चाहता हूँ। कर्म क्षेत्र क्या है और कर्म क्षेत्र का ज्ञाता कौन है? ज्ञान क्या है और ज्ञान का विषय क्या है।" (श्लोक 13.1)
14. "उस पुरुष के क्या लक्षण हैं जो प्रकृति के तीन गुणों से परे हो चुका है। हे भगवान! उसका आचरण क्या है। वह गुणों के बंधन को कैसे पार कर जाता है।" (श्लोक 14.21)
15. "उन लोगों की स्थिति क्या है जो शास्त्रों के विधि-विधानों की अवहेलना करते हैं किन्तु अपनी इच्छा से श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं।" (श्लोक 17.1)
16. "मैं संन्यास का प्रयोजन जानना चाहता हूँ, यह त्याग या कर्म के फलों का परित्याग करने से कैसे भिन्न है।" (श्लोक 18.1)
श्रीभगवानुवाच |
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् |
आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते || 55||
परम प्रभु श्रीकृष्ण कहते हैं: हे पार्थ! जब कोई मनुष्य स्वार्थयुक्त कामनाओं और मन को दूषित करने वाली इन्द्रिय तृप्ति से संबंधित कामनाओं का परित्याग कर देता है और आत्मज्ञान को अनुभव कर संतुष्ट हो जाता है तब ऐसे मानव को स्थितप्रज्ञ कहा जा सकता है।
इस श्लोक से श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्नों का उत्तर देना आरम्भ करते हैं और अध्याय के अंत तक निरन्तर उत्तर देते रहते हैं। सभी अंश स्वाभाविक रूप से अपने अंशी की ओर आकर्षित होते हैं। पत्थर गुरुत्वाकर्षण की शक्ति के कारण पृथ्वी पर गिरता है। हमारी आत्मा भगवान का अंश है जो परमानन्द स्वरूप हैं। चूंकि आत्मा अनन्त सुखों के सागर भगवान का अंश है इसलिए वह स्वाभाविक रूप से आनन्द प्राप्त करना चाहती है। जब यह भगवान से आत्मानंद का रस लेने का प्रयास करती है तब इसे 'दिव्य प्रेम' कहते हैं। किन्तु जब अपनी आध्यात्मिक प्रकृति की अज्ञानता के कारण वह स्वंय को शरीर मान लेती है और संसार से प्राप्त होने वाले शरीर के सुखों का भोग करना चाहती है, तब उसे तृष्णा कहते हैं।
धार्मिक ग्रंथों में संसार को मृगतृष्णा कहा गया है जिसका अर्थ हिरण द्वारा देखा जाने वाला 'मृग जल' है। रेगिस्तान की गर्म रेत पर जब सूर्य की किरणों का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है वो उससे हिरण को जल का भ्रम हो जाता है। वह समझता है कि रेत के ऊपर जल है और अपनी प्यास बुझाने के लिए उस ओर दौड़ता है। किन्तु वह जितना अधिक जल की ओर भागता है, वह मृगजल वहाँ से विलुप्त होकर उसे और आगे दिखाई देता है। हिरण अपनी मंदबुद्धि के कारण यह नहीं जान पाता कि वह भ्रम के पीछे भाग रहा है। अभागा हिरण मृगजल का पीछा करते हुए भागता रहता है और रेगिस्तान की तपती रेत पर थककर मर जाता है। इसी प्रकार प्राकृत शक्ति माया भी सुख का भ्रम उत्पन्न करती है और हम अपनी इन्द्रियों की तृप्ति की आशा में झूठे सुखों के पीछे भागते रहते हैं। हम चाहे कितना भी प्रयत्न क्यों न करें सुख हमारे हाथ नहीं आता और हमसे दूर हो जाता है। गरुड़ पुराण में निम्न प्रकार से उल्लेख किया गया है:
चक्रधरोऽपि सुरत्वं सुरत्वलाभे सकलसुरपतित्वम्।
भवितुं सुरपतिरूवंगतित्वं तथापि न निवर्तते तृष्णा।।
(गरुड़ पुराण-2.12.14)
"एक राजा अखिल विश्व का सम्राट बनना चाहता है। सम्राट स्वर्ग का देवता बनना चाहता है और स्वर्ग का देवता स्वर्ग के राजा इन्द्र का पद पाना चाहता है तथा इन्द्र सृजनकर्ता ब्रह्मा का पद चाहता है" फिर भी भौतिक सुखों की भूख समाप्त नहीं होती। लेकिन जब कोई अपने मन को भौतिक लालसाओं और विषय भोगों से हटाना सीख लेता है तब ऐसा मनुष्य आत्मा के आंतरिक सुख की अनुभूति करता है और लोकातीत होकर सिद्धावस्था प्राप्त करता है। कठोपनिषद् में इस विषय पर और अधिक बढ़-चढ़कर यह वर्णन किया गया है-अपनी "कामनाओं का परित्याग करने वाला मनुष्य भगवान के समान हो जाता है"
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मोऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ।।
(कठोपनिषद्-2.3.14)
"जब कोई अपने मन से समस्त स्वार्थयुक्त कामनाओं का उन्मूलन करता है, तब सांसारिक बंधनों से जकड़ी जीवात्मा जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाती है और भगवान के समान सद्गुणी हो जाती है।" श्रीकृष्ण उपर्युक्त श्लोक में कहते हैं कि लोकातीत अवस्था में स्थित मनुष्य वह है जिसने अपनी कामनाओं और इन्द्रिय तृप्ति का त्याग कर दिया है और जो आत्म संतुष्ट रहता है।
दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह: |
वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते || 56||
जो मनुष्य किसी प्रकार के दुःखों में क्षुब्ध नहीं होता जो सुख की लालसा नहीं करता और जो आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त रहता है, वह स्थिर बुद्धि वाला मनीषी कहलाता है।
Commentary
इस श्लोक में श्रीकृष्ण स्थिर बुद्धि वाले मनीषी की निम्न प्रकार से व्याख्या करते हैं।
1. वीतरागः वे सुख की लालसा को त्याग देते हैं।
2. वीतभयः वे भयमुक्त होते हैं।
3. वीतक्रोधः वे क्रोध रहित होते हैं। 81
आध्यात्मिक चेतना में लीन मनुष्य अपने मन में नश्वर भौतिक ऐश्वर्यों, क्रोध, लालच और शत्रुता आदि को प्रवेश करने की अनुमति नहीं देते इसलिए उनका मन लोकातीत चिन्तन में स्थिर और दिव्य चेतना में स्थित हो जाता है। यदि कोई मनुष्य अपने मन को दुःखों की चिन्ता करने की अनुमति देता है तब भगवान का चिन्तन समाप्त हो जाता है और मन ज्ञानातीत अवस्था से पतन की ओर चला जाता है। दुःखदायी कार्यों की गति इसी प्रकार होती है। वर्तमान पीड़ा से अधिक अतीत की पीड़ा का चिन्तन और भविष्य की पीड़ा की आशंका मन को सन्ताप देती है। किन्तु जब मन इन दोनों का चिन्तन छोड़ देता है और केवल वर्तमान संवेदना को सहजता से टटोलता है तब पीड़ा आश्चर्यजनक ढंग से संकुचित होकर सहनीय और पहले से कम हो जाती है। यह सर्वविदित है कि बौद्ध भिक्षु आक्रमणकारियों के उत्पीड़न को सहन करने के लिए यही विधि अपनाते थे। इसी प्रकार यदि मन बाहरी सुखों की लालसा करता है और संसार के विषय भोगों की ओर भागता है तो दिव्य आध्यात्मिक चेतना से विमुख हो जाता है। इसलिए स्थिर बुद्धि वाला मनीषी वह है जो मन को सुखों के लिए ललचाने और दुःखों के लिए शोक प्रकट करने की अनुमति नहीं देता। इसके अतिरिक्त मनीषी मन को भय और क्रोध से पराजित होने की अनुमति नहीं देता। इस प्रकार मन ज्ञानातीत अवस्था में स्थित हो जाता है।
य: सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् |
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 57||
जो सभी परिस्थितियों में अनासक्त रहता है और न ही शुभ फल की प्राप्ति से हर्षित होता है और न ही विपत्ति से भयभीत होता है वही पूर्ण ज्ञानावस्था में स्थित मुनि है।
1. यदि तुम स्वप्न देख सकते हो और स्वप्नों को अपने पर हावी नहीं होने देते।
2. यदि तुम सोंच सकते हो और विचारों को अपना लक्ष्य नहीं बनाते।
3. यदि तुम सफलता या संकट का समता की भावना से सामना कर सकते हो और इनके साथ समान व्यवहार करते हो।
4. यदि तुम्हें न तो शत्रु और न ही तुम्हारे प्रिय मित्र आहत कर सकते हैं।
5. यदि सभी मनुष्य तुम्हारे लिए महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन कोई बहुत अधिक नहीं।
6. यदि तुम एक मिनट को 60 क्षणों की तुल्य दूरी से भर सकते हो तब इस सारी पृथ्वी की संपदा तुम्हारी है।
7. और इससे भी अधिक तुम सच्चे मानव बनोगे मेरे पुत्र।
इस कविता की लोकप्रियता दर्शाती है कि लोगों में ज्ञान की चरम अवस्था में पहुँचने की स्वाभाविक अभिलाषा होती है जिसका वर्णन श्रीकृष्ण, अर्जुन से करते हैं। यह जानकर कोई भी आश्चर्यचकित हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा के कवि ने उसी ज्ञानोदय की अवस्था को व्यक्त किया है जिसका भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पहले से वर्णन किया गया है। वास्तव में अनंत ज्ञान की उत्कंठा आत्मा की मूल प्रवृत्ति है। इसलिए सकल विश्व की सभी संस्कृतियों में सभी लोग जाने या अनजाने में इसकी अभिलाषा रखते हैं। श्रीकृष्ण ने इसे यहाँ अर्जुन के प्रश्न के उत्तर के रूप में प्रस्तुत किया है।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वश: |
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 58||
जो मनुष्य अपनी इन्द्रियों को उनके विषय भोगों से खींच लेने के लिए उसी प्रकार से योग्य होता है, जैसे एक कछुआ अपने अंगो को संकुचित करके उन्हें कवच के भीतर कर लेता है, वह दिव्य ज्ञान में स्थिर हो जाता है।
इन्द्रियों की तुष्टि हेतु उसके विषयों से संबंधित इच्छित पदार्थों की आपूर्ति करने का प्रयास ठीक वैसा ही है जैसे जलती आग में घी की आहुति डालकर उसे बुझाने का प्रयास करना। इससे अग्नि कुछ क्षण के लिए कम हो जाती है किन्तु फिर एकदम और अधिक भीषणता से भड़कती है। इस प्रकार भगवद्गीता में वर्णन किया गया है कि इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होती और जब उनकी तुष्टि की जाती है तब वे और अधिक प्रबल हो जाती हैं। श्रीमद्भागवतम् में भी वर्णन किया गया है-
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्मेव भूय एवाभिवर्धते ।।
(श्रीमद्भागवतम्-9.19.14)
"जैसे आग में घी की आहुति डालने से वह शांत नहीं होती अपितु इससे आग की लपटें और भीषणता से भड़कती है। उसी प्रकार इन्द्रियों की तृष्टि करने से वे शांत नहीं होतीं।" इन इच्छाओं की तुलना शरीर के खाज रोग से की जा सकती है। खाज कष्टदायक होती है और खुजलाहट करने की प्रबल इच्छा उत्पन्न करती है। खुजलाहट समस्या का समाधान नहीं है, कुछ क्षण इससे राहत मिलती है और फिर यह खुजलाहट अधिक वेग से बढ़ती है। यदि कोई इस खाज को कुछ समय तक सहन कर लेता है तब इसका दंश दुर्बल होकर धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। यह खाज से राहत पाने का रहस्य है। यही तर्क कामनाओं पर भी लागू होता है। मन और इन्द्रियाँ सुख के लिए असंख्य कामनाएँ उत्पन्न करती हैं लेकिन जब तक हम इनकी पूर्ति के प्रयत्न में लगे रहते हैं तब ये सब सुख मृग-तृष्णा की भांति भ्रम के समान होते हैं। किन्तु जब हम भगवान का अलौकिक सुख प्राप्त करने के लिए इन सब कामनाओं का त्याग कर देते हैं तब हमारा मन और इन्द्रियाँ शांत हो जाती हैं।
इसलिए प्रबुद्ध व्यक्ति मन और इन्द्रियों का स्वामी बन जाता है। यही स्पष्ट करने के लिए इस श्लोक में कछुए का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। कछुआ संकट के समय अपने अंगों और सिर को अपने खोल के भीतर कर लेता है। संकट समाप्त होने पर कछुआ अपने अंगों और सिर को खोल के बाहर निकालता है और अपने मार्ग पर आगे बढ़ने लगता है। प्रबुद्ध आत्मा भी इसी प्रकार से अपने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखती है और परिस्थितियों की आवश्यकता के अनुरूप उन्हें संकुचित और उनका विस्तार कर सकती है।
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन: |
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते || 59||
यद्यपि देहधारी जीव इन्द्रियों के विषयों से अपने को कितना दूर रखे लेकिन उन विषयों को भोगने की लालसा बनी रहती है फिर भी जो लोग भगवान को जान लेते हैं, उनकी लालसाएँ समाप्त हो जाती हैं।
जब कोई व्यक्ति उपवास रखते समय भोजन ग्रहण करना छोड़ देता है तब इन्द्रिय तृप्ति की इच्छा क्षीण हो जाती है। इसी प्रकार रोगी व्यक्ति में भी विषय भोगों की रुचि कम हो जाती है। ऐसी विरक्ति अस्थायी होती है क्योंकि मन में कामनाओं के बीज विद्यमान रहते हैं। जब उपवास समाप्त हो जाता है या रोग दूर हो जाता है, तब कामनाएँ पुनः जागृत हो जाती है। कामनाओं की जड़ क्या है?
भगवान के आनंद सुख को प्राप्त करना आत्मा की प्रकृति है जो कि भगवान का अणु अंश है। जब तक इसे यह आनंद नहीं मिलता तब तक आत्मा भी तृप्त नहीं होती और उसकी यह खोज निरन्तर जारी रहती है। साधक बलपूर्वक अपनी इन्द्रियों को विषय भोगों से दूर रख सकते हैं। किन्तु इस प्रकार का संयम अस्थायी होता है क्योंकि वे विषयों को भोगने की आंतरिक लालसा का शमन नहीं कर सकते। जब आत्मा भगवान की भक्ति में तल्लीन हो जाती है और परमानंद प्राप्त करती है तब उसे दिव्य प्रेमरस की अनुभूति होती है जिसे प्राप्त करने के लिए वह अनन्त जन्मों तक तरसती रही थी।
तैत्तिरीयोपनिषद् में वर्णन है :
रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्धवाऽऽनन्दी भवति।
(तैत्तिरीयोपनिषद्-2.7)
" भगवान सत्-चित्-आनन्द हैं। जब आत्मा भगवान को पा लेती है तब वह आनंदमयी हो जाती है और तब मुनष्य में स्वाभाविक रूप से निकृष्ट सांसारिक विषय भोगों के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो जाती है। भगवद्भक्ति से प्राप्त यह विरक्ति स्थायी और अविचल होती है।" इस प्रकार भगवद्गीता कामनाओं के दमन का कोरा उपदेश देने के स्थान पर उन्हें भगवान की ओर निर्देशित कर सुन्दर उदात्तीकरण के मार्ग पर अग्रसर होने का ज्ञान देती है। संत रामकृष्ण परमहंस इस सिद्धांत को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करते हुए कहते हैं, "भक्ति परम सत्ता के प्रति दिव्य प्रेम है जिसके प्राप्त होने पर निकृष्ट भाव स्वतः समाप्त हो जाते हैं।"
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चित: |
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मन: || 60||
हे कुन्ती पुत्र! इन्द्रियाँ इतनी प्रबल और अशान्त होती हैं कि वे विवेकशील और आत्म नियंत्रण का अभ्यास करने वाले मनुष्य के मन को भी वरवश में कर लेती है।
इन्द्रियाँ उस अनियंत्रित जंगली घोड़े के समान हैं जिसकी नयी-नयी साज कसी गयी हो। ये अत्यंत चंचल होती हैं इसलिए इन्हें अनुशासित करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। इसलिए जो आध्यात्मिक उत्थान की अभिलाषा रखते हैं, उन्हें इन कामुक इन्द्रियों की लगाम कसने पर बल देना चाहिए जो वासना और लालसा के रंग में रंगी होती हैं।साथ ही ये इतनी शक्तिशली होती हैं कि महान योगी को भी आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ने से रोक देती हैं। श्रीमद्भागवतम् में वर्णित एक कथा है जिसमें इस कथन का उपर्युक्त दृष्टांत है (स्कन्ध-9, अध्याय-6, श्लोक-38)। प्राचीनकाल में सौभरि नाम के परम तपस्वी थे जिनका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। इसमें प्रदत्त कुछ मंत्रों को सौभरि सूत्र कहा गया है। सौभरि संहिता नाम से भी एक ग्रंथ है। इस प्रकार सौभरि एक साधारण मुनि नहीं थे। सौभरि का अपने शरीर पर इतना नियंत्रण था कि वे यमुना नदी के बीच में जल में डुबकी लगाकर जल के नीचे तपस्या करते थे। एक दिन उन्होंने दो मछलियों को विषयभोग करते हुए देख लिया। इस दृश्य ने उनके मन और इन्द्रियों को हर लिया और उनमें संभोग करने की इच्छा जागृत हो गयी। उन्होंने तपस्या को बीच में छोड़ दिया और नदी से बाहर निकल आये और अपनी काम-वासना की तृप्ति के संबंध में सांचने लगे। उस समय अयोध्या में मान्धाता नामक बहु-यशस्वी और दयालु शासक था। उसकी पचास कन्याएँ थीं जो सब एक-दूसरे से बढ़कर सुन्दर थीं। सौभरि मुनि ने राजा के पास जाकर उनसे पचास राजकुमारियों में से एक कन्या उन्हें सौंपने को कहा। राजा को उस तपस्वी की विवेकशीलता पर आश्चर्य हुआ और वह समझ गया-"यह वृद्ध तपस्वी विवाह करना चाहता है। राजा, तपस्वी सौभरि की शक्ति से परिचित होने के कारण भयभीत थे कि यदि उन्होंने सौभरि मुनि के प्रस्ताव को ठुकरा दिया तो वे राजा को शाप दे देंगे। राजा के लिए इस प्रस्ताव को मानने का अर्थ यह होता कि उसकी एक कन्या का जीवन नष्ट हो जाता। वह दुविधा में पड़ गया। राजा ने कहा, "हे पुण्यात्मा! मुझे आपके आग्रह को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है। कृपया आसन ग्रहण करें, मैं अपनी पचास कन्याओं को आपके सम्मुख प्रस्तुत करता हूँ और जो भी कन्या आपका वरण करेगी, मैं उससे आपका विवाह कर दूंगा।" राजा को विश्वास था कि उसकी कोई भी कन्या उस बूढ़े तपस्वी का चयन नहीं करेगी और इस प्रकार से वह उस मुनि के शाप से बच जाएगा। सौभरि राजा के अभिप्राय को भली-भांति समझ गया। उन्होंने राजा से कहा कि वे कल आयेंगे। संध्या के समय उन्होंने अपनी योग शक्ति द्वारा स्वयं को एक सुंदर नवयुवक के रूप में परिवर्तित कर लिया। अगले दिन जब सौभरि मुनि महल में पहुंचे तब सभी पचास राजकुमारियों ने उन्हें पति के रूप में वरण कर लिया। राजा ने अपने दिए गये वचन से बंधे होने के कारण विवश होकर अपनी सभी कन्याओं का विवाह तपस्वी के साथ कर दिया। अब राजा को अपनी कन्याओं में परस्पर कलह होने की चिन्ता सताने लगी क्योंकि उन्हें एक ही पति के साथ जीवन व्यतीत करना था। सौभरि ने पुनः अपनी योग शक्ति का प्रयोग किया। राजा की आशंका को दूर करने के लिए उन्ध्येत मुनि पचास रूप धारण कर लिए और अपनी पत्नियों के लिए पचास महल बना दिए और उन सभी के साथ अलग-अलग रहने लगे। इस प्रकार सहस्रों वर्ष व्यतीत हो गए।
पुराणों में उल्लेख है कि सौभरि मुनि की उन सभी पत्नियों से अनेक सन्तानों ने जन्म लिया और उनकी आगे और संतानें हुई और यहाँ तक कि एक छोटा नगर बस गया। एक दिन सौभरि के चित्त में विचार आया और वे शोक से कहने लगे “अहो इमं पश्यत मे विनाशं (श्रीमद्भागवतम्9.6.50)" अर्थात हे मनुष्यों! तुम में से जो लौकिक पदार्थों से सुख प्राप्त करना चाहते हैं, वे सावधान हो जाएँ। मेरे अधोपतन की ओर देखें कि पहले मैं कहाँ था और अब मैं कहाँ पर हूँ। मैंने योग शक्ति द्वारा पचास शरीर धारण किए तथा सहस्त्रों वर्षों तक पचास स्त्रियों के साथ रहा फिर भी इन्द्रिय भोगों से तृप्ति नहीं हुई, अपितु और अधिक तुष्टि की लालसा बनी रही। अतः मेरे अधोपतन से शिक्षा लें और सावधान रहकर इस दिशा की ओर न भटकें।"
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर: |
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 61||
वे जो अपनी इन्द्रियों को वश में कर लेते हैं और अपने मन को मुझमें स्थिर कर देते हैं, वे दिव्य ज्ञान में स्थित होते हैं।
इस श्लोक में युक्त शब्द (जुड़ना) 'भक्ति में तल्लीनता' को इंगित करता है और मत्-पर का अर्थ 'भगवान श्रीकृष्ण के प्रति' है। यहां 'आसीत' शब्द का लाक्षणिक अर्थ 'स्थित' या 'स्थिर होना' है। यह कहकर कि इस दुराग्राही मन और इन्द्रियों को वश में करना आवश्यक है, श्रीकृष्ण अब इन्हें सुचारू रूप से नियंत्रित करने की विधि प्रकट करते हैं जो कि भगवान की भक्ति में तल्लीनता है। श्रीमद्भागवतम् में राजा अम्बरीष के दृष्टांत द्वारा इस विधि का सुन्दर निरूपण किया गया है
स वै मनः कृष्णपदारविन्दयोर्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने। करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु श्रुतिं चकाराच्युतसत्कथोदये ।
मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने दृशौ तभृत्यगात्रस्पर्शेऽङ्गस्ङ्गमम्। घ्राणं च तत्पादसरोजसौरभे श्रीमत्तुलस्या रसनां तदपिर्ते ।।
पादौ हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे शिरो हृषीकेशपदाभिवन्दने। कामं च दास्ये न तु कामकाम्यया यथोत्तमष्लोकजना श्रया-रति ।।
(श्रीमद्भागवतम्-9.4.18.20)
"अम्बरीष ने अपने मन को श्रीकृष्ण के चरण कमलों में, वाणी को उनके दिव्य नाम, रूप, गुण और लीला का गुणगान करने में, अपने कानों को भगवान की मंगलमयी कथा का श्रवण करने में और नेत्र भगवान की सुन्दर मुकुन्द मूर्ति के दर्शन में, अंगों को भगवान के भक्तों के चरणों का स्पर्श करने में, नासिका को उनके चरण कमलों पर रखी तुलसी की दिव्य गंध में और माला चन्दन आदि भोग सामग्री को भगवान की सेवा में समर्पित कर दिया था। उनके चरण भगवान के मन्दिरों की परिक्रमा करने में और शीश श्रीकृष्ण एवं उनके भक्तों का झुककर प्रणाम करने में लगाया।" इस प्रकार उन्होंने अपनी समस्त इन्द्रियों को परम प्रभु की सेवा में तल्लीन कर वश में किया।
ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते |
सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते ||
इन्द्रियों के विषयों का चिंतन करते हुए मनुष्य उनमें आसक्त हो जाता है और आसक्ति कामना की ओर ले जाती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।
क्रोध, लालच, वासना आदि को वैदिक ग्रंथों में मानस रोग कहा गया है। राम चरितमानस मे वर्णन है-"मानस रोग कछुक मैं गाए। हैं सब के लखि बिरलेन्ह पाए।" अर्थात् हम सब शरीर के रोगों से भलीभांति अवगत होते हैं, यहां तक कि केवल एक शारीरिक रोग में इतनी शक्ति होती है कि वह हमारे पूरे दिन को कष्टदायक बना देता है लेकिन हम यह नहीं जानते कि हम निरंतर बहुसंख्यक मानसिक रोगों से ग्रसित हैं। चूँकि हम वासना, लोभ आदि को मानसिक रोग के रूप में स्वीकार नहीं करते अतः उनका निदान करने का प्रयास नहीं करते। मनोविज्ञान मानव के मन मस्तिष्क को समझने की पद्धति है जिसके द्वारा इन रोगों का विश्लेषण करने के पश्चात् इनके उपचार का प्रयास किया जाता है।
यद्यपि पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत शोधकार्यों पर अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है किन्तु ये मन की वास्तविकता के संबंध में केवल अनुमान ही प्रतीत होते हैं। इस श्लोक और आगे के श्लोकों में श्रीकृष्ण ने मन के कार्य-कलापों का पूर्ण एवं सूक्ष्मेक्षिका से वर्णन किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जब हम कुछ पदार्थों से मिलने वाले सुख का बार-बार चिन्तन करते हैं तब मन उनमें आसक्त हो जाता है।
उदाहरणार्थ-एक कक्षा में बहुत लड़के और लड़कियाँ पढ़ते हैं। वे एक-दूसरे के साथ निष्कपट भाव से बातचीत करते हैं किन्तु एक लड़का एक लड़की पर मोहित होकर उसके बारे में सोंचना आरम्भ कर देता है। "यदि यह मेरी मित्र बन जाए, तो मैं बहुत प्रसन्नचित्त रहूँगा।" चूँकि वह अपने मन में उस लड़की का निरन्तर चिन्तन करता है इसलिए उसका मन उसमें आसक्त हो जाता है। वह अपने मित्र को बताता है कि वह उसके प्यार में मतवाला हो गया है और अध्ययन कार्य में उसका मन नहीं लगता क्योंकि उसका मन बार-बार उस लड़की की ओर ही आकर्षित होता है। उसका मित्र उसकी खिल्ली उड़ाते हुए कहता है कि वे सभी कक्षा में उस लड़की के साथ मिलते-जुलते हैं किन्तु उनमें से कोई भी उसके लिए पागल नहीं हुआ है तब फिर तुम क्यों उसके लिए अपनी रातों की नींद खराब कर रहे हो और अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहे हो? वास्तविकता यह है कि वह छात्र बार-बार यह चिन्तन करता है कि उस लड़की में सुख है और इसलिए उसका मन उस पर मोहित हो जाता है। इस प्रकार की आसक्ति या मोह अपने आप में एकदम निष्कपट प्रतीत होता है किन्तु समस्या यह है कि मोह से कामना उत्पन्न होती है। यदि किसी की मदिरापान में आसक्ति है, तब उसके मन में बार-बार मदिरापान करने की इच्छा उत्पन्न होगी। यदि किसी की धूम्रपान में आसक्ति है, तब उसका मन बार-बार धूम्रपान में सुख मानकर धूम्रपान करने के लिए तड़पेगा। इस प्रकार आसक्ति कामना की ओर ले जाती है। एक बार जब कामना उत्पन्न होती है तब दो अन्य समस्याओं का जन्म होता है जो हैं लोभ और क्रोध। कामनाओं को पूर्ण करने से लोभ उत्पन्न होता है। ज्यों प्रतिलाभ लोभ अधिकाई।। (रामचरितमानस) "यदि हम अपनी कामनाओं की तुष्टि करते हैं तब वे लोभ की ओर ले जाती है।" इसलिए कामनाओं को पूर्ण करने से इनका नाश नहीं होता।
यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः।
न दुह्यन्ति मन:प्रीतिं पुंसः कामहतस्य ते ।।
(श्रीमद्भागवतम्-9.19.13)
"यदि कोई मनुष्य सभी प्रकार के धन, संपदा, ऐश्वर्य और संसार के इंद्रिय भोग-विलास भी प्राप्त कर ले तो भी उसकी कामनाओं की समाप्ति नहीं होगी इसलिए इसे दुःखों का कारण मानते हुए बुद्धिमान पुरुष को कामनाओं का त्याग करना चाहिए।" इसका दूसरा पहलू यह है कि यदि कामनाओं की पूर्ति में कोई बाधा उत्पन्न होती है तब क्या होगा? इससे क्रोध की ज्वाला उत्पन्न होती है। ध्यान रखें कि क्रोध अपने आप उत्पन्न नहीं होता। यह इच्छाओं की पूर्ति में बाधा आने से उत्पन्न होता है और इच्छाएँ आसक्ति से उत्पन्न होती हैं और आसक्ति इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करने से उत्पन्न होती है। इस प्रकार से हम देखते हैं कि विषयों के सुख का थोड़ा सा भी चिन्तन हमें लोभ और क्रोध दो प्रकार के मनोविकारों की ओर धकेलता है। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण इसी कड़ी को जारी रखते हुए इसे अधिक सरल ढंग से व्यक्त करेंगे और क्रोध के दुष्परिणामों की व्याख्या करेंगे।
क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम: |
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति || 63||
क्रोध निर्णय लेने की क्षमता को क्षीण करता है जिसके कारण स्मृति भ्रम हो जाता है। जब स्मृति भ्रमित हो जाती है तब बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य का पतन हो जाता है।
जैसे प्रात:काल की धुंध सूर्य की किरणों को ढक लेती है ठीक उसी प्रकार क्रोध करने से निर्णय लेने की क्षमता क्षीण हो जाती है। क्रोध में लोग भूल करते हैं और बाद में पश्चात्ताप करते हैं। फिर हम सोंचते हैं, "वह मुझसे आयु में 20 वर्ष बड़ा है। मैंने उसे ऐसा क्यों बोला। मुझे क्या हुआ था।" क्रोध के कारण बुद्धि के निर्णय लेने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के कारण ऐसा होता है और इसलिए किसी बड़े को फटकारने की भूल आपने की। जब बुद्धि क्षीण हो जाती है तब इससे स्मृति भ्रमित हो जाती है। ऐसे में मनुष्य अच्छे और बुरे में भेद करना भूल जाता है। वह भावनाओं के आवेग में बहता रहता है और यहीं से उसका अधोपतन आरम्भ हो जाता है तथा स्मृति भ्रम होने के परिणामस्वरूप बुद्धि का विनाश हो जाता है।
बुद्धि आंतरिक गुण है। जब यह भ्रमित हो जाती है तब मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है। इस प्रकार यहाँ जिस अधोगामी मार्ग का वर्णन किया गया है वह इन्द्रियों के विषयों के चिन्तन के साथ आरम्भ होकर बुद्धि का नाश होने पर समाप्त होता है।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् |
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति || 64||
लेकिन जो मन को वश में रखता है वह इन्द्रियों के विषयों का भोग करने पर भी राग और द्वेष से मुक्त रहता है और भगवान की कृपा को प्राप्त करता है।
यह विनाश की प्रक्रिया विषय भोगों का चिन्तन करने से आरम्भ होती है। सुखों की लालसा करना आत्मा के लिए उसी प्रकार सहज है जिस प्रकार से भौतिक शरीर की प्यास समाप्त होने की इच्छा। यह विचार करना भी कठिन है-"मैं कभी सुखों का चिन्तन नहीं करूंगा", क्योंकि यह आत्मा के लिए असहज है। इसका सरल उपाय यह है कि सुख का चिन्तन उचित दिशा अर्थात् भगवान में हो। यदि हम बार-बार यह स्मरण करते हैं कि भगवान में ही सुख है तब भगवान में हमारी भक्ति विकसित होगी। यह दिव्य प्रेम भौतिक आसक्ति के समान मन को दूषित नहीं करेगा अपितु उसे शुद्ध कर देगा। भगवान शुद्ध तत्त्व हैं और जब हम अपने मन को उनमें लीन करते हैं तब मन भी शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण हमें मोह और कामनाओं का त्याग करने का उपदेश देते हैं। यहाँ वे केवल लौकिक मोह और कामनाओं के संबंध में चर्चा कर रहे हैं। आध्यात्मिक आसक्ति और कामनाओं का त्याग नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वास्तव में ये अति वंदनीय हैं। मन के शुद्धिकरण के लिए इनका संवर्धन आवश्यक है। हम कामनाओं का जितना दहन करेंगे, हमें उतना ही अधिक भगवत्प्रेम प्राप्त होगा और हमारा मन शुद्ध होगा। ज्ञानीजन इस तथ्य को समझ नहीं पाते तथा वे सभी प्रकार की आसक्तियों का त्याग करने की अनुशंसा करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे लोग जो अपने मन को निष्काम भाव से मुझ में स्थिर करते हैं, वे माया के तीन गुणों से ऊपर उठ जाते हैं और वे परब्रह्म की अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं (भगवद्गीता 14.26)।
भगवद्गीता के आगे के अध्यायों जैसे (8.7, 8.14, 9.22, 9.34, 10.10, 12.8, 11.54, 18. 55, 18.58, 18.65) आदि में वे बार-बार अर्जुन को अपना मन भगवान में स्थिर करने की प्रेरणा देते हैं। राग और द्वेष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। द्वेष और कुछ न होकर नकारात्मक आसक्ति है। जिस प्रकार से संसार के विषय भोगों का मन में बार-बार चिन्तन करने से आसक्ति उत्पन्न होती है उसी प्रकार से द्वेष के कारण घृणा भी मन में प्रविष्ट हो जाती है। इस प्रकार भौतिक पदार्थों में आसक्ति और द्वेष दोनों का मन पर समान रूप से प्रभाव पड़ता है। वे इसे दूषित करते हैं और माया के तीन गुणों में धकेल देते हैं। जब मन, राग और द्वेष दोनों से मुक्त हो जाता है और भगवान की भक्ति में तल्लीन हो जाता है तब वह मनुष्य भगवान की कृपा प्राप्त कर अनन्त आनंद प्राप्त करता है। इस दिव्य सुख को पाकर मन संसार के सुखों का भोग करने पर भी विषयों की ओर आकर्षित नहीं होता। इस प्रकार से स्थितप्रज्ञ मनीषी इन्द्रियों के विषयों स्वाद, स्पर्श, गंध, श्रवण, रूप का हमारे समान भोग करते हैं लेकिन फिर भी वे आसक्ति और द्वेष दोनों से मुक्त रहते हैं।
प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते |
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते || 65||
भगवान की दिव्य कृपा से शांति प्राप्त होती है जिससे सभी दुःखों का अन्त हो जाता है और ऐसे शांत मन वाले मनुष्य की बुद्धि दृढ़ता से भगवान में स्थिर हो जाती है।
शालीनता एक दिव्य शक्ति है जो मनुष्य के व्यक्तित्व में झलकती है। अपनी कृपा द्वारा भगवान जो सत्-चित्-आनन्द हैं, दिव्य ज्ञान व दिव्य प्रेम और दिव्य आनन्द प्रदान करते हैं। यह कृपा प्रेम, आनन्द और भगवद्ज्ञान में ध्रुव तारे के समान बुद्धि को स्थिर कर देती है। भगवत्कृपा से जब हमें दिव्य प्रेम रस का अनुभव होता है तब इन्द्रियों के सुखों को प्राप्त करने की इच्छा का शमन हो जाता है। एक बार जब सांसारिक विषय भोगों की लालसा समाप्त हो जाती है तब मनुष्य सभी दुःखों से परे हो जाता है और मन शांत हो जाता है। इस प्रकार की संतुष्टि द्वारा से बुद्धि दृढ़ता से यह निर्णय करती है कि समस्त सुखों का उद्गम स्थल और आत्मा का अंतिम लक्ष्य भगवान हैं। पहले तो बुद्धि शास्त्रों में वर्णित ज्ञान के आधार पर इसे स्वीकार करती थी किन्तु अब इसे इसकी अनुभूति भगवान की दिव्य कृपा से होती है। इससे बुद्धि का सन्देह नष्ट हो जाता है और यह दृढ़ता से भगवान में स्थित हो जाती है।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना |
न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम् || 66||
लेकिन असंयमी व्यक्ति का अपने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता, न ही उसकी बुद्धि दृढ़ होती है और न ही उसका मन भगवान के चिन्तन में स्थिर हो सकता है। अपने मन को भगवान में स्थिर किये, जिसके बिना शान्ति संभव नहीं और शांति के बिना कोई कैसे सुखी रह सकता है?
यह श्लोक पिछले श्लोक के निष्कर्ष की ही पुष्टि करता है। इससे पहले के श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि "भगवान को जानो और शांति प्राप्त करो" इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'भगवान के बिना शांति संभव नहीं।' जो व्यक्ति मन और इन्द्रियों को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं करता, वह न तो भगवान का चिन्तन कर सकता है और न ही उनकी दिव्य कृपा पा सकता है। दिव्य प्रेमरस का आस्वादन किए बिना सांसारिक ऐश्वर्यों और सुखों का त्याग करना संभव नहीं है और ऐसे लोग भौतिक सुखों के लिए उसी प्रकार से लालायित रहते हैं जिस प्रकार से एक मधुमक्खी के लिए मधुरस का त्याग करना असंभव होता है।
रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं भास्वानुद्वेष्यति हसिष्यति पङ्कजश्रीः।
एवं विचिन्तयति कोषगते द्विरेफे हा हन्त हन्त नलिनी गज उज्जहार ।।
(सूक्ति सुधाकर)
उपर्युक्त संस्कृत साहित्य का प्रसिद्ध श्लोक मधुमक्खी की कहानी से संबंधित है। एक मधुमक्खी कमल के फूल पर बैठी थी और उसका मधुरस पी रही थी। ज्यों ही सूर्यास्त होने लगा तब फूलों की पत्तियाँ संकुचित होने लगी लेकिन मधुमक्खी अपनी इन्द्रियों का सुख पाने के लिए इतनी आसक्त थी कि वह उड़ना नहीं चाहती थी। उसने सोंच-"अभी फूल के संकुचित होने में बहुत समय है इसलिए मैं और अधिक मधुरस पी सकती हूँ।" इसी प्रकार से हम भी वृद्धावस्था को देख रहे होते हैं जो कि मृत्यु का स्पष्ट संकेत है किन्तु फिर भी हम मधुमक्खी के समान सांसारिक सुखों में मग्न रहना चाहते हैं। थोड़े ही समय में अंधेरा होने पर फूल संकुचित हो गया और मधुमक्खी उसमें फंस गयी। "उसने सोंचा कोई बात नहीं है, रातभर फूल के भीतर रह लूंगी और कल प्रातः काल में जब पत्तियाँ पुनः खिलेंगी, तब मैं उड़ जाऊंगी।"
"काष्ठ भेदे निपुणोपि संग्रहीकुंठितो भवति पद्मविभेदे" अर्थात् मधुमक्खी में लकड़ी को खोखला करने की शक्ति होती है किन्तु विषय के प्रति आसक्ति होने के कारण वह कमल के फूल की कोमल पत्तियों के भीतर चिपकी रहती है। उसी समय एक हाथी आया और उसने कमल के फूल की टहनी को तोड़ कर निगल लिया। अब मधुमक्खी कमल के फूल के साथ हाथी के पेट में चली गयी। फिर भी वह सोंच रही थी-'मेरा प्रिय कमल का फूल कहीं जा रहा है और मैं भी सहर्ष उसके साथ जा रही हूँ।' इसके पश्चात् वह शीघ्र ही मर गयी। इस प्रकार से हम मनुष्य भी अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने में मग्न रहते हैं और संतों द्वारा भगवान की भक्ति करने के उपदेश पर ध्यान नहीं देते। अंततः काल हमें मृत्यु के रूप में ग्रस लेता है। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो अपनी इन्द्रियों पर संयम नहीं रखते और निरंतर उनकी तृप्ति करने में लगे रहते हैं, वे माया के तीन गुणों के बंधनों मे बंध जाते हैं। भौतिक इच्छाएँ खुजली वाली खाज जैसी हैं जिसमें हम जितना अधिक लिप्त होते हैं उतना ही अधिक हमारा विनाश होता है। इस प्रकार सांसारिक विषय भोगों में लिप्त रहने पर हम कैसे वास्तविक सुख पा सकते हैं?।
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते |
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि || 67||
जिस प्रकार प्रचंड वायु अपने तीव्र वेग से जल पर तैरती हुई नाव को दूर तक बहा कर ले जाती है उसी प्रकार से अनियंत्रित इन्द्रियों में से कोई एक जिसमें मन अधिक लिप्त रहता है, बुद्धि का विनाश कर देती है।
कठोपनिषद् में वर्णन है- "पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयंभूः(2.1.1)", "भगवान ने हमारी पांच इन्द्रियों को बाह्य अभिमुख बनाया है" इसलिए वे बाहरी जगत के विषयों की ओर आकर्षित होती हैं और यहाँ तक कि उनमें से कोई भी एक इन्द्रिय जिस पर मन अधिक केन्द्रित रहता है, हमारा विनाश करने की शक्ति रखती है।
कुरङ्ग-मातङ्ग-पतङ्ग-भृङग-मीनाहताः पञ्चभिरेव पञ्च।
एकः प्रमादी स कथं न हन्यते यः सेवते पञ्चभिरेव पञ्च ।।
(सूक्ति सुधाकर)
"हिरण मधुर वाणी की ओर आसक्त होते हैं। शिकारी सुरीला संगीत सुनाकर उन्हें मार देता है। मधुमक्खियों की सुगंध में आसक्ति होती है। वे फूलों का मकरन्द चूसती है और जब रात्रि में फूल संकुचित हो जाता है तब वे उसमे फंस जाती हैं। मछली खाने की इच्छा के कारण शिकारी द्वारा फैलाए गए जाल में फंस जाती है। कीट-पतंगे प्रकाश की ओर आकर्षित होते हैं। अग्नि के समीप जाने पर वे उसमें जल कर मर जाते हैं। स्पर्श हाथी की दुर्बलता है। शिकारी इसका लाभ उठा कर हाथी को फंसाने के लिए हथिनी को गड्ढे में डाल देता है। हथिनी को स्पर्श करने के लिए हाथी जब गड्ढे में गिर जाता है तब वह बाहर निकलने में असमर्थ होता है और शिकारी द्वारा मारा जाता है तब फिर उस मनुष्य का कैसा दुर्भाग्य होगा जो सभी पांचों इन्द्रियों के विषयों का भोग करता है?" इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को मन और बुद्धि का विनाश करने वाली इन्द्रियों के विषय भोगों की शक्ति से सचेत करते हैं।
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वश: |
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 68||
इसलिए हे महाबाहु। जो मनुष्य इन्द्रियों के विषय भोगों से विरक्त रहता है, वह दृढ़ता से प्रज्ञा से युक्त हो जाता है।
प्रबुद्ध आत्माएँ लोकातीत अर्थात् दिव्य ज्ञान द्वारा बुद्धि को वश में रखती हैं और फिर विशुद्ध बुद्धि के द्वारा वे मन को नियंत्रित करती हैं तथा मन का प्रयोग इन्द्रियों पर लगाम कसने के लिए करती हैं। लेकिन संसार में इसका विपरीत होता है।
इन्द्रियाँ मन को अपनी दिशा की ओर खींचती है और मन बुद्धि पर हावी हो जाता है और फिर बुद्धि वास्तविक कल्याण के मार्ग से भटक जाती है। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि बुद्धि आध्यात्मिक ज्ञान से दिव्य होगी तब इन्द्रियाँ वश में रहेंगी और जब इन्द्रियों पर संयम होगा तो फिर बुद्धि दिव्य चिन्तन के मार्ग से विचलित नहीं होगी।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी |
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने: || 69||
जिसे सब लोग दिन समझते हैं वह आत्मसंयमी के लिए अज्ञानता की रात्रि है तथा जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह आत्मविश्लेषी मुनियों के लिए दिन है।
श्रीकृष्ण ने यहाँ दिन और रात का प्रतीकात्मक रूप में प्रयोग किया है। लोग प्रायः इसका प्रयोग शब्दिक अर्थ के रूप में करते हैं। एक समय की बात है कि 'खड़े श्री बाबा' सदा एक टांग पर खड़े रहने वाले तपस्वी थे। उनके शिष्य उन्हें सिद्ध पुरुष मानते थे। वह पैंतीस वर्ष तक सोये नहीं। वह अपने कक्ष में लटकती हुई रस्सी पर अपनी भुजाओं को रखकर विश्राम करते थे। वह स्थिरता से लगातार खड़े रहने के लिए रस्सी का प्रयोग करते थे।
यह पूछे जाने पर कि इस प्रकार की कठोर तपस्या का क्या प्रयोजन है वह भगवद्गीता के इसी श्लोक को उद्धृत करते थे, "जिसे सभी जीव रात्रि समझते हैं वह आत्मसंयमी के लिए दिन है।" इसी का अभ्यास करते हुए उन्होंने रात को सोना छोड़ दिया। अब यह देखिए कि सांसारिक लोगों द्वारा इस महान त्याग का किस प्रकार से अनर्थ किया गया। निरंतर खड़े रहने से उनके पैरों और टांगों में सूजन आ गयी होगी और इसलिए वह शारीरिक रूप से खड़े रहने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते थे। आइए, अब श्रीकृष्ण के शब्दों का सटीक अर्थ समझने का प्रयास करें। वे जिनकी चेतना लौकिक है, वे सांसारिक सुखों को ही जीवन का मुख्य लक्ष्य मानते हैं। वह लौकिक सुखों के अवसर को जीवन की सफलता अर्थात् दिन और लौकिक तथा इन्द्रिय सुख से वंचित होने को अंधकार अर्थात् रात समझते हैं।
दूसरी ओर जो दिव्य ज्ञान से युक्त होकर बुद्धिमान हो जाते हैं, वे मनुष्य इन्द्रियों के विषय भोगों को आत्मा के लिए हानिकारक मानते हैं। इसलिए वे इसे 'रात्रि' के रूप में देखते हैं। वे आत्मा के उत्थान के लिए इन्द्रियों के विषय भोगों से विरक्त रहते हैं और इसलिए वे रात्रि को 'दिन' के रूप मे देखते हैं। इन शब्दों का सांकेतिक रूप में प्रयोग कर श्रीकृष्ण यह व्यक्त करते हैं कि जो एक सिद्ध महापुरुष के लिए रात्रि है उसे सांसारिक लोग दिन मानते हैं और इसी प्रकार से जिसे सिद्ध महापुरुष दिन समझते हैं, वह उनके लिए रात्रि है।
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत् |
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी || 70||
जिस प्रकार से समुद्र उसमें निरन्तर मिलने वाली नदियों के जल के प्रवाह से विक्षुब्ध नहीं होता उसी प्रकार से ज्ञानी अपने चारों ओर इन्द्रियों के विषयों के आवेग के पश्चात भी शांत रहता है, न कि वह मनुष्य जो कामनाओं को तुष्ट करने के प्रयास में लगा रहता है।
विशाल समुद्र में, निरन्तर नदियों के जल का प्रवाह होने के पश्चात् भी इतनी क्षमता होती है कि वह अपनी विक्षुब्ध न होने की स्थिति को बनाए रखता है। संसार की सभी नदियां निरन्तर समुद्र में मिल कर खाली भी हो जाएँ तब भी समुद्र न तो अतिप्लावित और न ही खाली हो सकता है। श्रीकृष्ण द्वारा प्रयुक्त आपूर्यमाण (सभी ओर से जलमग्न) शब्द यह व्यक्त करता है कि यदि नदियाँ वर्षा ऋतु में निरन्तर अपना सारा जल सागर में बहाती रहें तब भी समुद्र में बाढ़ नहीं आ सकती। इसी प्रकार से आत्मज्ञानी शरीर की आवश्यकता की पूर्ति हेतु इन्द्रियों के विषयों का भोग करते हुए या उनसे वंचित रहते हुए दोनों ही परिस्थितियों में शांत और स्थिर रहता है। केवल ऐसा संत ही वास्तविक शांति पा सकता है।
विहाय कामान्य: सर्वान्पुमांश्चरति नि:स्पृह: |
निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति || 71||
जिस मुनष्य ने अपनी सभी भौतिक इच्छाओं का परित्याग कर दिया हो और इन्द्रिय तृप्ति की लालसा, ममत्व के भाव और अंहकार से रहित हो गया हो, वह पूर्ण शांति को प्राप्त करता है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण मनुष्य की शांति के मार्ग में आने वाले बाधक तत्त्वों की व्याख्या कर रहे हैं और फिर अर्जुन को उनका परित्याग करने को कहते हैं।
सांसारिक इच्छाएँ: जिस क्षण हम अपनी इच्छाओं को मन में प्रश्रय देते हैं उसी क्षण हम लोभ और क्रोध के जाल में फंस जाते हैं। इसलिए आंतरिक शांति का मार्ग कामनाओं की पूर्ति करने के स्थान पर उनका नाश करने से प्राप्त होता है।
लोभः सर्वप्रथम, भौतिक उन्नति की लालसा से हमारा बहुमूल्य समय व्यर्थ होता है यह कभी न समाप्त होने वाली दौड़ है। विकसित देशों के लोग उत्तम रहन-सहन और खान पान से युक्त रहते हैं किन्तु फिर भी वे विक्षुब्ध रहते हैं क्योंकि उनकी लालसाएँ समाप्त नहीं हुई हैं। अतः जो संतोष रूपी धन पा लेता है उसे जीवन की अनमोल निधि मिल जाती है।
स्वामित्वः अज्ञानता के कारण मन में स्वामित्व की भावना उत्पन्न होती है। हम संसार में खाली हाथ आए थे और खाली हाथ जाएंगे तब ऐसे में हम सांसारिक पदार्थों को अपना कैसे मान सकते हैं।
एषा ब्राह्मी स्थिति: पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति |
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति || 72||
हे पार्थ! इस अवस्था में रहने वाली प्रबुद्ध आत्मा जब ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लेती है, वह फिर कभी भ्रमित नहीं होती। मृत्यु के समय यह सिद्ध पुरुष जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है और भगवान के परम धाम में प्रवेश करता है।
ब्रह्म का अर्थ भगवान तथा स्थिति का अर्थ भगवत्प्राप्ति की अवस्था है। जब आत्मा अन्त:करण को शुद्ध कर लेती है (कई बार मन और बुद्धि दोनों को संयुक्त रूप से अन्त:करण कह कर संबोधित किया जाता है) तब भगवान अपनी दिव्य कृपा प्रदान करते हैं, जैसा कि श्लोक संख्या 2.64 में वर्णित है। अपनी कृपा द्वारा वे आत्मा को दिव्य ज्ञान, दिव्य आनन्द और दिव्य प्रेम प्रदान करते हैं। भगवान ये सब दिव्य शक्तियाँ आत्मा को भगवत्प्राप्ति करने के समय प्रदान करते हैं।
उसी क्षण भगवान आत्मा को माया के बंधनों से मुक्त कर देते हैं। फिर संचित कर्म अर्थात् अनन्त जन्मों के संचित कर्म समाप्त हो जाते हैं तथा अविधा अर्थात् भौतिक संसार के अनन्त जन्मों की अज्ञानता दूर हो जाती है। त्रिगुण अर्थात् माया के तीन गुण समाप्त हो जाते हैं, त्रिदोष अर्थात् सांसारिक बंधनों के तीन दोषों का भी अंत हो जाता है। पंच क्लेश अर्थात् मायिक बुद्धि के पांच विकार नष्ट हो जाते हैं, पंच कोष अर्थात् माया शक्ति के पांच आवरण भी जल जाते हैं। इससे आगे के क्रम में आत्मा सदा के लिए माया के बंधनों से मुक्त हो जाती है। भगवत्प्राप्ति की अवस्था प्राप्त करने पर आत्मा को जीवनमुक्त कहा जाता है अर्थात् शरीर में वास करते हुए भी आत्मा मुक्त रहती है। फिर मृत्यु के समय जब मुक्त आत्मा भौतिक शरीर से अलग होती है, तब वह भगवान के परम धाम में प्रवेश करती है।
ऋग्वेद में वर्णित है। तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः।
(ऋग्वेद-1.22.20)
"एक बार जब आत्मा भगवान को पा लेती है, तब वह सदा के लिए उससे एक हो जाती है। इसके पश्चात् माया का अंधकार उस पर कभी हावी नहीं हो पाता"। माया से सर्वदा मुक्ति को निर्वाण, मोक्ष इत्यादि कहा जाता है। फलस्वरूप मुक्ति ही भगवत्प्राप्ति का वास्तविक परिणाम है।
।। श्रीमद्भागवत गीता अध्याय 2 सम्पूर्ण।।
Bhagvad Geeta Chapter 1
kathaShrijirasik
गीता प्रथम अध्याय
धृतराष्ट्र उवाच |
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः |
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ||1||
धृतराष्ट्र ने कहाः हे संजय! कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर युद्ध करने की इच्छा से एकत्रित होने के पश्चात्, मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
राजा धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन होने के अतिरिक्त आध्यात्मिक ज्ञान से भी वंचित था। अपने पुत्रों के प्रति अथाह मोह के कारण वह सत्यपथ से च्युत हो गया था और पाण्डवों के न्यायोचित राज्याधिकार को हड़पना चाहता था। अपने भतीजों पाण्डव पुत्रों के प्रति उसने जो अन्याय किया था, उसका उसे भलीभांति बोध था। इसी अपराध बोध के कारण वह युद्ध के परिणाम के संबंध में चिन्तित था। इसलिए धृतराष्ट्र संजय से कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि जहाँ युद्ध होने वाला था-की घटनाओं के संबंध में जानकारी ले रहा था।
इस श्लोक में धृतराष्ट्र ने संजय से यह प्रश्न पूछा कि उसके और पाण्डव पुत्रों ने युद्धभूमि में एकत्रित होने के पश्चात् क्या किया? अब यह एकदम स्पष्ट था कि वे युद्धभूमि में केवल युद्ध करने के उद्देश्य के लिए एकत्रित हुए थे। इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि वे युद्ध करेंगे। धृतराष्ट्र को ऐसा प्रश्न करने की आवश्यकता क्यों पड़ी कि उन्होंने युद्धभूमि में क्या किया?
धृतराष्ट्र द्वारा 'धर्म क्षेत्रे', धर्मभूमि शब्द का प्रयोग करने से उसकी आशंका का पता चलता है। कुरुक्षेत्र पवित्र भूमि थी। शतपथ ब्राह्मण में इसका वर्णन 'कुरुक्षेत्र देव यजनम्' के रूप में किया गया है अर्थात 'कुरुक्षेत्र स्वर्ग की देवताओं की तपोभूमि है।' इसलिए इस भूमि पर धर्म फलीभूत होता है। धृतराष्ट्र आशंकित था कि कुरुक्षेत्र की पावन धर्म भूमि के प्रभाव के परिणामस्वरूप उसके पुत्रों में कहीं उचित और अनुचित में भेद करने का ऐसा विवेक जागृत न हो जाए कि वे यह सोचने लगें कि अपने स्वजन पाण्डवों का संहार करना अनुचित और धर्म विरूद्ध होगा और कहीं ऐसा विचार कर वे शांति के लिए समझौता करने को तैयार न हो जाएं। इस प्रकार की संभावित आशंकाओं के कारण धृतराष्ट्र के मन में अत्यंत निराशा उत्पन्न हुई। वह सोचने लगा कि यदि उसके पुत्रों ने युद्ध विराम या संधि का प्रस्ताव स्वीकार किया तो पाण्डव निरन्तर उनकी उन्नति के मार्ग में बाधा उत्पन्न करेंगे। साथ ही साथ वह युद्ध के परिणामों के प्रति भी संदिग्ध था और अपने पुत्रों के उज्ज्वल भविष्य के प्रति सुनिश्चित होना चाहता था। इसलिए उसने संजय से कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में हो रही गतिविधियों के संबंध में पूछा। जहाँ दोनों पक्षों की सेनाएं एकत्रित हुई थीं।
सञ्जय उवाच ।
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ।। 2।।
संजय ने कहाः हे राजन्! पाण्डवों की सेना की व्यूहरचना का अवलोकन कर राजा दुर्योधन अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर इस प्रकार बोले।
धृतराष्ट्र इस बात की पुष्टि करना चाहता था कि क्या उसके पुत्र अब भी युद्ध करने के उत्तरदायित्व का निर्वहन करेंगे? संजय धृतराष्ट्र के इस प्रश्न के तात्पर्य को समझ गया और उसने ऐसा कहकर कि पाण्डवों की सेना व्यूह रचना कर युद्ध करने को तैयार है, यह पुष्टि की कि युद्ध अवश्य होगा। फिर उसके पश्चात् उसने वार्ता का विषय बदलते हुए यह बताया कि दुर्योधन क्या कर रहा था।
धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन निर्दयी और दुष्ट प्रवृत्ति का था। धृतराष्ट्र के जन्मांध होने के कारण व्यावहारिक रूप से हस्तिनापुर के शासन की बागडोर दुर्योधन के हाथों में थी। वह पाण्डवों के साथ अत्यधिक ईर्ष्या करता था और कठोरता से उनका दमन करना चाहता था ताकि वह हस्तिनापुर पर निर्विरोध शासन कर सके। उसने यह कल्पना की थी कि पाण्डव कभी भी इतनी विशाल सेना एकत्रित नही कर सकते जो उसकी सेना का सामना कर सके। किन्तु अपने आंकलन के विपरीत पाण्डवों की विशाल सेना को देखकर दुर्योधन व्याकुल और हतोत्साहित हो गया।
ऐसे में दुर्योधन का अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाना यह दर्शाता है कि वह युद्ध के परिणाम के संबंध में भयभीत था। वह द्रोणाचार्य के प्रति अपना आदर प्रकट करने का ढोंग करते हुए, उनके पास गया किन्तु वास्तव में वह अपनी चिन्ता को कम करना चाहता था। इसलिए उसने अगले श्लोक से लेकर आगे के नौ श्लोकों में इस प्रकार से कहा।
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ।। 3।।
दुर्योधन ने कहाः पूज्य आचार्य! पाण्डु पुत्रों की विशाल सेना का अवलोकन करें, जिसे आपके द्वारा प्रशिक्षित बुद्धिमान शिष्य द्रुपद के पुत्र ने कुशलतापूर्वक युद्ध करने के लिए सुव्यवस्थित किया है।
दुर्योधन एक कुशल कूटनीतिज्ञ के रूप में अपने सेनापति गुरु द्रोणाचार्य द्वारा अतीत में की गई भूल को इंगित करना चाहता था। द्रोणाचार्य का राजा द्रुपद के साथ किसी विषय पर राजनैतिक विवाद था। उस विवाद के कारण क्रोधित होकर द्रुपद ने प्रतिशोध की भावना से यज्ञ किया
और यह वरदान प्राप्त किया कि उसे ऐसे पुत्र की प्राप्ति होगी जो द्रोणाचार्य का वध करने में समर्थ होगा। इस वरदान के फलस्वरूप उसका धृष्टद्युम्न के नाम से पुत्र हुआ। यद्यपि द्रोणाचार्य धृष्टद्युम्न के जन्म का रहस्य जानते थे किन्तु जब द्रुपद ने अपने पुत्र धृष्टद्युम्न को सैन्य कौशल की विद्या प्रदान करने के लिए द्रोणाचार्य को सौंपा तब उदारचित द्रोणाचार्य ने धृष्टद्युम्न को सैन्य युद्ध की विद्या में निपुण बनाने में कोई संकोच और भेदभाव नही किया। अब धृष्टद्युम्न पाण्डवों के पक्ष से उनकी सेना के महानायक के रूप में उनकी सेना की व्यूह रचना कर रहा था। ऐसे में दुर्योधन अपने गुरु को यह अवगत कराना चाहता था कि अतीत में की गई उनकी भूल के कारण ही उसे वर्तमान में संकट का सामना करना पड़ रहा है और वह यह भी इंगित करना चाहता था कि उन्हें आगे पाण्डवों के साथ युद्ध करने में किसी प्रकार की उदारता नहीं दर्शानी चाहिए।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथ: || 4||
धृष्टकेतुश्चेकितान: काशिराजश्च वीर्यवान् |
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गव: || 5||
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् |
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथा: || 6||
यहाँ इस सेना में भीम और अर्जुन के समान बलशाली युद्ध करने वाले महारथी युयुधान, विराट और द्रुपद जैसे अनेक शूरवीर धनुर्धर हैं। यहाँ पर इनके साथ धृष्टकेतु, चेकितान काशी के पराक्रमी राजा काशिराज, पुरूजित, कुन्तीभोज और शैव्य सभी महान सेना नायक हैं। इनकी सेना में पराक्रमी युधामन्यु, शूरवीर, उत्तमौजा, सुभद्रा और द्रौपदी के पुत्र भी हैं जो सभी निश्चय ही महाशक्तिशाली योद्धा हैं।
संकट के भय से दुर्योधन को पाण्डवों की सेना वास्तविकता से अपेक्षाकृत अधिक विशाल प्रतीत होनी लगी। अपनी चिन्ता को व्यक्त करने के लिए दुर्योधन ने यह कहा कि पाण्डव पक्ष की ओर से महारथी (ऐसे योद्धा जो अकेले ही साधारण दस हजार योद्धाओं के साथ युद्ध करने की सामर्थ्य रखते हों) युद्ध करने के लिए उपस्थित हैं। दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना के ऐसे असाधारण महापराक्रमी योद्धाओं का उल्लेख भी किया जो अर्जुन और भीम के समान बलशाली महान सेना नायक थे जिन्हें युद्ध में पराजित करना कठिन होगा।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम |
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते || 7||
ब्राह्मण श्रेष्ठ! हमारे पक्ष की और के उन सेना नायकों के संबंध में भी सुनिए, जो सेना को संचालित करने में विशेष रूप से निपुण हैं। अब मैं आपके समक्ष उनका वर्णन करता हूँ।
यहाँ कौरव सेना के प्रधान सेनापति द्रोणाचार्य को दुर्योधन ने 'द्विजोत्तम' अर्थात् ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ कहकर संबोधित किया। उसने जान बूझकर अपने गुरु को इस प्रकार संबोधित किया। द्रोणाचार्य वृत्ति से योद्धा नही थे, वे मात्र सैन्य शिक्षा के आचार्य थे। एक कपटी नायक के रूप में दुर्योधन अपने मन में अपने गुरु की निष्ठा पर निर्लज्जतापूर्वक संदेह कर रहा था। दुर्योधन के शब्दों में छिपा अर्थ यह था कि यदि द्रोणाचार्य पराक्रम से युद्ध नहीं लड़ते तो उन्हें मात्र एक ब्राह्मण ही माना जाएगा जिसकी रुचि दुर्योधन के राज्य में केवल उत्तम जीविका अर्जित करने और सुख सुविधाएं भोगने की होगी।
ऐसा कहकर अब दुर्योधन अपना और अपने गुरु के मनोबल को बढ़ाना चाहता था और इसलिए वह अपनी सेना के महासेनानायकों की गणना करने लगा।
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जय: |
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च || 8||
इस सेना में सदा विजयी रहने वाले आप तथा भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण तथा सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा आदि महा पराक्रमी योद्धा हैं जो युद्ध में सदा विजेता रहे हैं।
अन्ये च बहव: शूरा मदर्थे त्यक्तजीविता: |
नानाशस्त्रप्रहरणा: सर्वे युद्धविशारदा: || 9||
यहाँ हमारे पक्ष में अन्य अनेक महायोद्धा ऐसे भी हैं जो मेरे लिए अपने जीवन का बलिदान करने के लिए तत्पर हैं। वे युद्ध कौशल में पूर्णतया निपुण और विविध प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित हैं।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् |
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् || 10||
हमारी शक्ति असीमित है और हम सब महान सेना नायक भीष्म पितामह के नेतृत्व में पूरी तरह से संरक्षित हैं जबकि पाण्डवों की सेना की शक्ति भीम द्वारा भलीभाँति रक्षित होने के पश्चात भी सीमित है।
दुर्योधन के आत्म प्रशंसा करने वाले ये शब्द मिथ्याभिमान करने वाले मनुष्यों की उक्ति जैसे थे। जब उन्हें अपना अन्त निकट दिखाई देता है तब स्थिति का आंकलन करने के पश्चात् आत्मप्रशंसा करने वाले व्यक्ति अभिमानपूर्वक मिथ्या गर्व करने लगते हैं। अपने भविष्य के प्रति अनर्थकारी व्यंग्योक्ति दुर्योधन के कथन में तब अभिव्यक्त हुई जब उसने कहा कि भीष्म पितामह द्वारा संरक्षित उनकी शक्ति असीमित थी।
भीष्म पितामह कौरव सेना के प्रधान सेनापति थे। उन्हें इच्छा मृत्यु और अपनी मृत्यु का समय निश्चित करने का वरदान प्राप्त था जिससे वह अजेय कहलाते थे। पाण्डव पक्ष की सेना भीम के संरक्षण में थी जो दुर्योधन का जन्मजात शत्रु था। इसलिए दुर्योधन ने भीष्म के साथ भीम की अल्प शक्ति की तुलना की। भीष्म कौरव और पाण्डवों के पितामह थे और वे वस्तुतः दोनों पक्षों का कल्याण चाहते थे। पाण्डवों के प्रति करुणा भाव भीष्म पितामह को तन्मयता से युद्ध करने से रोकता था। वे यह भी जानते थे कि इस धर्मयुद्ध में भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों की ओर से उपस्थित थे और संसार की कोई भी शक्ति अधर्म का पक्ष लेने वालों को विजय नहीं दिला सकती। इसलिए भीष्म पितामह ने अपने नैतिक उत्तरदायित्व का पालन करने और हस्तिनापुर एवं कौरवों के हित की रक्षा हेतु पाण्डवों के विरुद्ध युद्ध करने का निर्णय लिया। यह निर्णय भीष्म पितामह के व्यक्तित्व की गहनता को रेखांकित करता है।
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिता: |
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्त: सर्व एव हि || 11||
अतः मैं कौरव सेना के सभी योद्धागणों से आग्रह करता हूँ कि सब अपने मोर्चे पर अडिग रहते हुए भीष्म पितामह की पूरी सुरक्षा करें।
दुर्योधन यह समझ गया था कि भीष्म पितामह मानसिक रूप से पाण्डवों के विरुद्ध आक्रान्त होकर युद्ध लड़ने को इच्छुक नही हैं जिसके कारण वे सैनिकों को वीरता और उत्साह से युद्ध करने के लिए प्रेरित नही करेंगे। इसलिए उसने अपनी सेना के अन्य सेना नायकों से अपनी-अपनी स्थिति पर अडिग रहने के साथ-साथ चारों ओर से भीष्म पितामह की सुरक्षा का भी ध्यान रखने को कहा।
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्ध: पितामह: |
सिंहनादं विनद्योच्चै: शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् || 12||
तत्पश्चात् कुरूवंश के वयोवृद्ध परम यशस्वी महायोद्धा भीष्म पितामह ने सिंह-गर्जना जैसी ध्वनि करने वाले अपने शंख को उच्च स्वर से बजाया जिसे सुनकर दुर्योधन हर्षित हुआ।
भीष्म पितामह अपने पौत्र दुर्योधन के भीतर के भय को समझ गये थे और उसके प्रति अपने स्वाभाविक करुणाभाव के कारण उन्होंने दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए उच्च स्वर में शंखनाद किया। यद्यपि वे जानते थे कि दूसरे पक्ष पाण्डवों की सेना में स्वयं परम पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के उपस्थित होने पर दुर्योधन किसी भी स्थिति में युद्ध में विजय प्राप्त नहीं कर सकता। फिर भी भीष्म दुर्योधन को यह बताना चाहते थे कि वे युद्ध करने के अपने दायित्व का भली-भांति पालन करेंगे और इस संबंध में किसी भी प्रकार की शिथिलता नहीं दिखाएंगे। उस समय प्रचलित युद्ध के नियमों के अनुसार शंखनाद द्वारा युद्ध का उद्घाटन किया जाता था।
तत: शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखा: |
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् || 13||
इसके पश्चात् शंख, नगाड़े, बिगुल, तुरही तथा मृदंग अचानक एक साथ बजने लगे। उनका समवेत स्वर अत्यन्त भयंकर था।
युद्ध के लिए भीष्म पितामह के तीव्र उत्साह को देखते हुए कौरवों की सेना ने भी अति उत्सुकता से वाद्ययंत्र बजाकर भयंकर ध्वनि उत्पन्न की। पणव का अर्थ ढोल, आनक का अर्थ मृदंग और गो-मुख का अर्थ तुरही बजाना है। ये सभी वाद्ययंत्र थे और इनकी समवेत ध्वनि के कारण युद्धक्षेत्र में भयंकर कोलाहल उत्पन्न हुआ।
तत: श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ |
माधव: पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतु: || 14||
तत्पश्चात् पाण्डवों की सेना के बीच श्वेत अश्वों द्वारा खींचे जाने वाले भव्य रथ पर आसीन माधव और अर्जुन ने अपने-अपने दिव्य शंख बजाये।
कौरवों की सेना के शंख नाद की ध्वनि धीमी पड़ने के पश्चात् भव्य रथ पर आसीन भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने निर्भीकता से पूरी शक्ति के साथ शंख नाद करते हुए उसी प्रकार से पाण्डवों द्वारा वीरता से युद्ध लड़ने की उत्कंठा प्रकट की। संजय ने माधव शब्द का प्रयोग श्रीकृष्ण के लिए किया। 'मा' का अर्थ भाग्य के देवता से है और 'धव' का अर्थ पति से है। भगवान श्रीकृष्ण विष्णु के रूप में भाग्य की देवी लक्ष्मी के पति है। यह श्लोक दर्शाता है कि भाग्य की देवी की अनुकंपा पाण्डवों पर थी और वे शीघ्र युद्ध में विजय प्राप्त कर अपना छीना गया साम्राज्य प्राप्त कर लेंगे। पाण्डवों से तात्पर्य पाण्डु के पुत्रों से है। पाँच भाइयों में किसी भी भाई को पाण्डव कहकर संबोधित किया जा सकता है। यहाँ पर पाण्डव शब्द अर्जुन के लिए प्रयुक्त हुआ है। जिस भव्य रथ पर वह आसीन था वह उसे अग्नि देवता ने उपहार स्वरूप भेंट किया था।
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय: |
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदर: || 15||
हृषीकेश भगवान् कृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया, अर्जुन ने देवदत्त शंख तथा अतिभोजी एवं अति दुष्कर कार्य करने वाले भीम ने पौण्डू नामक भीषण शंख बजाया
इस श्लोक में श्रीकृष्ण के लिए "हृषीकेश" शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ मन और इन्द्रियों का स्वामी है। श्रीकृष्ण स्वयं अपनी और समस्त प्राणियों के मन और इन्द्रियों के परम स्वामी हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने धरती पर अपनी अद्भुत लीलाएं करते समय भी अपने मन और इन्द्रियों को पूर्ण नियंत्रण में रखा।।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: |
नकुल: सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ || 16||
काश्यश्च परमेष्वास: शिखण्डी च महारथ: |
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजित: || 17||
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वश: पृथिवीपते |
सौभद्रश्च महाबाहु: शङ्खान्दध्मु: पृथक् पृथक् || 18||
हे राजन्! राजा युधिष्ठिर ने अपना अनन्त विजय नाम का शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष एवं मणिपुष्पक नामक शंख बजाये। श्रेष्ठ धनुर्धर काशीराज, महा योद्धा शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट, अजेय सात्यकि, द्रुपद, द्रौपदी के पांच पुत्रों तथा सुभद्रा के महाबलशाली पुत्र वीर अभिमन्यु आदि सबने अपने-अपने अलग-अलग शंख बजाये।
युधिष्ठिर पाण्डवों के सबसे बड़े भाई थे। यहाँ उन्हें राजा कहकर संबोधित किया गया है। उन्होंने राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान कर 'राजा' कहलाने की उपाधि पायी थी। उनके आचरण में उदारता सदैव परिलक्षित होती थी फिर चाहे जब वह महलों में रहे या अपने निर्वासन काल के दौरान वनों में।
धृतराष्ट्र को संजय द्वारा 'पृथ्वी का राजा' कहा गया है। देश की रक्षा करना या उसे विनाशकारी युद्धों में उलझाए रखना यह सब राजा के हाथों में होता है। इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से संजय के इस संबोधन का तात्पर्य यह है-"सेनाएं युद्ध की ओर बढ़ रही हैं, हे राजा धृतराष्ट्र केवल आप ही उसे वापिस बुला सकते हैं। अतः आपका क्या निर्णय है?"
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् |
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् || 19||
हे धृतराष्ट्र! इन शंखों से उत्पन्न ध्वनि द्वारा आकाश और धरती के बीच हुई गर्जना ने आपके पुत्रों के हृदयों को विदीर्ण कर दिया।
आपके पुत्रों के हृदयों को विदीर्ण कर दिया। पाण्डव सेना द्वारा बजाए गए विविध प्रकार के शंखों से उत्पन्न भयंकर ध्वनि से कौरव सेना के सैनिकों के हृदय विदीर्ण हो गये जबकि कौरवों की सेना ने जब शंखनाद किया था तब पाण्डवों की सेना पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नही पड़ा क्योंकि पाण्डवों को भगवान श्रीकृष्ण का आश्रय प्राप्त था। इसलिए उन्हें अपनी सुरक्षा का पूरा भरोसा था। दूसरी ओर कौरवों को केवल अपनी स्वयं की शक्ति और सामर्थ्य पर भरोसा था और अपने अत्याचारों के अपराध बोध की कसक से उनके भीतर पराजित होने का भय व्याप्त हो गया था।
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वज: |
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डव: ||20||
उस समय हनुमान के चित्र से अंकित ध्वजा लगे रथ पर आसीन पाण्डु पुत्र अर्जुन अपना धनुष उठा कर बाण चलाने के लिए उद्यत दिखाई दिये। हे राजन! आपके पुत्रों को अपने विरुद्ध व्यूह रचना में खड़े देख कर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से यह वचन कहे।
इस श्लोक में अर्जुन को कपि-ध्वज कह कर संबोधित किया गया है क्योंकि उसके रथ पर महावीर हनुमान के चिन्ह की ध्वजा सुशोभित थी। इसकी कथा इस प्रकार है। अर्जुन को एक बार अपनी धनुर्विद्या पर घमण्ड हो गया था और उसने श्रीकृष्ण से कहा कि भगवान श्रीराम के समय वानरों ने भारत से लंका के बीच समुद्र में सेतु बनाने में व्यर्थ ही इतना परिश्रम क्यों किया? यदि वह वहाँ उपस्थित होता तो वह बाणों से सेतु का निर्माण कर देता। श्रीकृष्ण ने उसे इसका प्रदर्शन करने को कहा। अर्जुन ने अपने धनुष से चलाये गये बाणों की बौछार से एक सेतु का निर्माण कर दिया। श्रीकृष्ण ने वीर हनुमान को बुलाया और उन्हें उस सेतु का परीक्षण करने को कहा। जब वीर हनुमान ने उस सेतु पर चलना आरंभ किया तो वह टूटने लगा। तब अर्जुन ने अनुभव किया कि उसके बाणों द्वारा बनाया गया सेतु कभी भी भगवान श्रीराम की सेना के भार को सहने के लिए उपयुक्त नहीं होता और उसने अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। तब वीर हनुमान ने अर्जुन को शिक्षा दी कि कभी भी अपने बल और कौशल का घमंड नहीं करना चाहिए। उन्होंने अपनी इच्छा से अर्जुन को यह वरदान दिया कि महाभारत के युद्ध के दौरान वह उसके रथ पर आसीन रहेंगे। इसलिए अर्जुन के रथ पर हनुमान के चित्र से अंकित ध्वजा लगाई गई थी जिसके कारण उसका नाम 'कपि-ध्वज' पड़ गया।
अर्जुन उवाच |
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते |
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत || 21||
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् |
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे || 22||
अर्जुन ने कहा! हे अच्युत! मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करने की कृपा करें ताकि मैं यहाँ एकत्रित युद्ध करने की इच्छा रखने वाले योद्धाओं को देख सकूं।
Commentary
अर्जुन संपूर्ण सृष्टि के परम स्वामी भगवान श्रीकृष्ण का परम भक्त था। यद्यपि इस श्लोक में अर्जुन ने भगवान को अपनी इच्छानुसार अपेक्षित स्थान पर रथ ले जाने का निर्देश दिया है जोकि यह दर्शाता है कि भगवान अपने प्रिय भक्तों से अगाध प्रेम करते हैं। भक्त के प्रति अपने निश्छल प्रेम के कारण भगवान उनके ऋणी हो जाते हैं।
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः।।
(श्रीमद्भागवतम्-9.4.63)
यद्यपि मैं परम स्वतंत्र हूँ, किन्तु फिर भी मैं अपने भक्तों का सेवक बन जाता हूँ। वे मुझे अत्यंत प्रिय है और उनके प्रेम के कारण मैं उनका ऋणी हो जाता हूँ।" अर्जुन की श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण महाभारत के युद्ध में उसके रथ के सारथी बने जबकि अर्जुन रथी के रूप में उस रथ पर सुविधापूर्वक बैठे हुए श्रीकृष्ण को निर्देश देते रहे।
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागता: |
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षव: || 23||
मैं उन लोगों को देखने का इच्छुक हूँ जो यहाँ पर धृतराष्ट्र के दुश्चरित्र पुत्रों को प्रसन्न करने की इच्छा से युद्ध लड़ने के लिए एकत्रित हुए हैं।
धृतराष्ट्र के दुष्ट पुत्रों ने छल से पाण्डवों का राज्य हड़प लिया था इसलिए कौरवों के पक्ष में युद्ध करने आये योद्धागण भी स्वाभाविक रूप से दुष्ट प्रवृत्ति वाले थे। अर्जुन उन योद्धाओं को जिनके साथ उसे युद्ध करना था, को देखना चाहता था। आरम्भ में अर्जुन की वीरतापूर्वक युद्ध लड़ने की प्रबल इच्छा थी। इसलिए वह धृतराष्ट्र के पुत्रों को दुष्ट मनोवृत्ति से ग्रस्त कह कर यह इंगित करना चाहता था कि किस प्रकार से दुर्योधन ने कई बार पाण्डवों का विनाश करने का षड़यंन्त्र रचा। उस समय अर्जुन ने ऐसे मनोभाव व्यक्त किए-“हम विधिपूर्वक आधे साम्राज्य के अधिकारी थे, किन्तु वह उसे हड़पना चाहता था। वह दुष्ट मनोवृत्ति वाला है इसलिए उसकी सहायता के लिए एकत्रित राजा लोग भी दुश्चरित्र हैं। मैं उन योद्धाओं को देखना चाहता हूँ जो युद्ध करने के लिए व्यग्र हैं। वे अन्याय का पक्ष ले रहे हैं और इसलिए हमारे हाथों उनका विनाश निश्चित है।"
सञ्जय उवाच |
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत |
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् || 24||
संजय ने कहा-हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! निद्रा पर विजय पाने वाले अर्जुन द्वारा इस प्रकार के वचन बोले जाने पर भगवान श्रीकृष्ण ने उस भव्य रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले जाकर खड़ा कर दिया।
भीष्मद्रोणप्रमुखत: सर्वेषां च महीक्षिताम् |
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति || 25||
भीष्म, द्रोण तथा अन्य सभी राजाओं की उपस्थिति में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि हे पार्थ! यहाँ पर एकत्रित समस्त कुरुओं को देखो।
"कुरु" शब्द का प्रयोग कौरवों और पाण्डवों दोनों के लिए किया गया है क्योंकि दोनों कुरु वंशज थे। भगवान श्रीकृष्ण ने जान बूझकर इस शब्द का प्रयोग किया ताकि अर्जुन में बंधुत्व की भावना जागृत हो और उसे यह प्रतीत हो कि वे सब एक ही हैं। वे चाहते थे कि बंधुत्व की भावना से अर्जुन में मोह उत्पन्न होगा और जिससे वह विचलित हो जाएगा जिसके परिणामस्वरूप उन्हें आगे आने वाले कलियुग में मानव मात्र के कल्याण के लिए गीता के सिद्धान्त का दिव्य उपदेश देने का अवसर प्राप्त होगा। इसलिए उन्होंने 'धार्तराष्ट्रान्' धृतराष्ट्र के पुत्रों के स्थान पर 'कुरु' कुरुवंशज शब्द का प्रयोग किया। जिस प्रकार एक सर्जन फोड़े की पीड़ा से ग्रस्त रोगी को पहले उसकी पीड़ा कम करने के लिए औषधि देता है और उसके बाद उसके रूग्ण अंग की चीर-फाड़ करता है, उसी प्रकार से भगवान श्रीकृष्ण ने भी पहले अर्जुन के भीतर छिपे मोह को जागृत किया ताकि बाद में उसे नष्ट किया जा सके।
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थ: पितृ नथ पितामहान् |
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृ न्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा || 26||
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि |
अर्जुन ने वहाँ खड़ी दोनों पक्षों की सेनाओं के बीच अपने पिता तुल्य चाचाओं, पितामहों, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, चचेरे भाइयों, पुत्रों, भतीजों, मित्रों, ससुर, और शुभचिन्तकों को भी देखा।
अर्जुन युद्धभूमि में अपने सभी सम्बंधियों को देख सका। वह अपने पिता के समकालीन भूरिश्रवा जैसे व्यक्तियों, भीष्म तथा सोमदत्त जैसे पितामहों, द्रोणाचार्य तथा कृपाचार्य जैसे गुरुओं, शल्य तथा शकुनि जैसे मामाओं, दुर्योधन जैसे भाईयों, लक्ष्मण जैसे पुत्रों, अश्वत्थामा जैसे मित्रों एवं कृतवर्मा जैसे शुभचिन्तकों को देख सका। वह उन सेनाओं को भी देख सका जिनमें उसके मित्र थे।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेय: सर्वान्बन्धूनवस्थितान् || 27||
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् |
जब कुन्तीपुत्र अर्जुन ने अपने बंधु बान्धवों को वहाँ देखा तब उसका मन अत्यधिक करुणा से भर गया और फिर गहन शोक के साथ उसने निम्न वचन कहे।
अपने बंधु बान्धवों को युद्ध स्थल पर एकत्रित देखकर अर्जुन का ध्यान पहली बार भातृध्त्या वाले इस भयंकर युद्ध के परिणामों की ओर गया। वह महापराक्रमी योद्धा जो युद्ध लड़ने के लिए उद्यत था और पाण्डवों के प्रति किए गए अन्यायपूर्ण व्यवहार का प्रतिशोध लेने हेतु शत्रुओं को मृत्यु के द्वार पहुँचाने के लिए मानसिक रूप से तैयार था, उस अर्जुन का हृदय अचानक परिवर्तित हो गया। शत्रु पक्ष की ओर से एकत्रित अपने बंधु बान्धवों को देखकर अर्जुन का हृदय शोक में डूब गया, उसकी बुद्धि भ्रमित हो गयी और अपने कर्त्तव्य का पालन करने के लिए उसकी निडरता कायरता में परिवर्तित हो गई। उसके हृदय की दृढ़ता ने कोमलता का स्थान ले लिया। इसलिए संजय उसे कुन्ती ('उसकी माता') पुत्र कहकर उसके स्वभाव की सहृदयता और उदारता को व्यक्त करते हैं।
अर्जुन उवाच |
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् || 28||
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति |
अर्जुन ने कहा! हे कृष्ण! युद्ध करने की इच्छा से तथा एक दूसरे का वध करने के लिए यहाँ अपने वंशजों को देखकर मेरे शरीर के अंग कांप रहे हैं और मेरा मुंह सूख रहा है।
आसक्ति लौकिक या आध्यात्मिक हो सकती है। किसी संबंधी के लिए मोह-होना सांसारिक आसक्ति है जो दैहिक संकल्पना के कारण उत्पन्न होती है। स्वयं को शरीर समझने पर दैहिक संबंधियों में आसक्ति हो जाती है। अज्ञानता से उत्पन्न यह आसक्ति हमें घोर सांसारिक बना देती है। अन्ततोगत्वा इस आसक्ति का अंत भी दुखदायी होता है क्योंकि शरीर का अंत होने पर पारिवारिक संबंध भी समाप्त हो जाता है। दूसरी ओर परम पिता परमात्मा हमारी आत्मा के सच्चे पिता, माता, सखा, स्वामी और प्रियतम हैं। इसलिए आत्मा के स्तर पर भगवान में अनुरक्त होना आध्यात्मिक आसक्ति है जो हमारी चेतना का विकास है और हमारी बुद्धि को प्रकाशित करता है। भगवान के प्रति प्रेम एक महासागर की तरह है जिसकी व्यापकता में सब कुछ समा जाता है जबकि दैहिक संबंध अपूर्ण और स्वार्थयुक्त पूर्ण होते हैं। यहाँ अर्जुन सांसारिक मोह का अनुभव कर रहा था जिसने उसे शोक के महासागर में डुबो दिया और वह अपने कर्तव्य पालन के विचार से कांपने लगा।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते || 29||
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चै व परिदह्यते |
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन: || 30||
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव |
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे || 31||
मेरा सारा शरीर काँप रहा है, मेरे शरीर के रोएं खड़े हो रहे हैं, मेरा धनुष ‘गाण्डीव' मेरे हाथ से सरक रहा है और मेरी पूरी त्वचा में जलन हो रही है। मेरा मन उलझ रहा है और मुझे घबराहट हो रही है। अब मैं यहाँ और अधिक खड़ा रहने में समर्थ नहीं हूँ। केशी राक्षस का वध करने वाले हे केशव! मुझे केवल अमंगल के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। युद्ध में अपने वंश के बंधु बान्धवों का वध करने में मुझे कोई अच्छाई नही दिखाई देती है और उन्हें मारकर मैं कैसे सुख पा सकता हूँ?
जब अर्जुन ने युद्ध के परिणामों पर विचार किया तब वह चिन्तित और उदास हो गया। अर्जुन का वह धनुष जिसकी टंकार से शक्तिशाली शत्रु भयभीत हो जाते थे, उसके हाथ से सरकने लगा। यह सोचकर कि युद्ध करना एक पाप पूर्ण कार्य है, उसका सिर चकराने लगा। मन की इस अस्थिरता के कारण वह हीन भावना से ग्रसित होकर अमंगलीय लक्षणों को स्वीकार करने लगा और विनाशकारी विफलता व सन्निकट परिणामों का पूर्वानुमान करने लगा।
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च |
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा || 32||
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगा: सुखानि च |
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च || 33||
हे कृष्ण! मुझे विजय, राज्य और इससे प्राप्त होने वाला सुख नहीं चाहिए। ऐसे राज्य सुख या अपने जीवन से क्या लाभ प्राप्त हो सकता है क्योंकि जिन लोगों के लिए हम यह सब चाहते हैं, वे सब इस युद्धभूमि में हमारे समक्ष खड़े हैं।
अर्जुन के मन में यह सत्य जानकर उलझन उत्पन्न हुई कि हत्या करना अपने आप में एक पापपूर्ण कृत्य है और अपने ही स्वजनों को मारना तो और अधिक कुत्सित कार्य है। अर्जुन को यह प्रतीत हुआ कि यदि उसने राज्य प्राप्त करने के लिए इस प्रकार के निर्दयतापूर्ण कार्य किए तब उसे ऐसी विजय से अंततोगत्वा कोई सुख प्राप्त नही होगा और वह इस ख्याति को अपने उन मित्रों और सगे-संबंधियों में बांटने में असमर्थ रहेगा जिन्हे युद्ध में मारकर उसे विजय प्राप्त होगी। यहाँ अर्जुन अनुचित भावों को प्रदर्शित कर रहा है और उसे श्रेष्ठ मान रहा है। सांसारिक भोगों और भौतिक सुख-समृद्धि के प्रति विरक्ति प्रशंसनीय है किन्तु अर्जुन आध्यात्मिक भावों से युक्त नहीं है अपितु उसका मोह करुणा के रूप में उससे छल कर रहा है। शुद्ध मनोभाव, आंतरिक सामंजस्य और संतोष आत्मा को सुख प्रदान करते हैं। यदि अर्जुन की भावनाएँ अलौकिक की होती तब वह संवेदनाओं से ऊपर उठ चुका होता। लेकिन उसके मनोभाव सर्वथा प्रतिकूल हैं क्योंकि वह अपने मन और बुद्धि में असामंजस्य और अपने कर्तव्य पालन के प्रति असंतोष और अपने भीतर गहन दुःख का अनुभव कर रहा है।उस पर हावी संवेदनाओं का प्रभाव यह दर्शाता है कि उसकी करुणा उसके मोह से उत्पन्न हुई हैं।
आचार्या: पितर: पुत्रास्तथैव च पितामहा: |
मातुला: श्वशुरा: पौत्रा: श्याला: सम्बन्धिनस्तथा || 34||
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन |
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतो: किं नु महीकृते || 35||
हे मधुसूदन! हमारे आचार्यगण, पितृगण, पुत्र, पितामह, मामा, पौत्र, ससुर, भांजे, साले और अन्य संबंधी अपने प्राण और धन का दाव लगाकर यहाँ उपस्थित हैं। यद्यपि वे मुझपर आक्रमण भी करते हैं तथापि मैं इनका वध क्यों करूं? यदि फिर भी हम धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध करते हैं तब भले ही इससे हमें पृथ्वी के अतिरिक्त तीनों लोक भी प्राप्त क्यों न होते हों तब भी उन्हें मारने से हमें सुख कैसे प्राप्त होगा?
द्रोणाचार्य और कृपाचार्य अर्जुन के गुरुजन थे और भीष्म एवं सोमदत पितामह, सोमदत का पुत्र, भूरिश्रवा जैसे लोग पिता तुल्य थे। पुरुजित्, कुंतिभोज, शल्य, शकुनि मामा और धृतराष्ट्र के सौ पुत्र उनके चचेरे भाई थे। दुर्योधन का पुत्र, लक्ष्मण उसके पुत्र के समान था। अर्जुन युद्धस्थल पर उपस्थित अपने स्वजनों के साथ अपने संबंधों की व्याख्या कर रहा है। इस श्लोक में अर्जुन ने दो बार अपि शब्द-जिसका अर्थ 'यद्यपि' है, का प्रयोग किया है। प्रथम बार 'यद्यपि' के प्रयोग का अर्थ है-यदि वे मुझ पर आक्रमण करते हैं तब भी मेरी इच्छा उनका वध करने की नहीं होगी। दूसरी बार 'यद्यपि' के प्रयोग का अर्थ है-यदि हम धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध कर देते हैं, तब भले ही हमें इससे तीनों लोक प्राप्त क्यों न होते हों, फिर भी उनका वध करने से हमें कैसे सुख और शांति मिलेगी?
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: का प्रीति: स्याज्जनार्दन |
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिन: || 36 ||
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् |
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिन: स्याम माधव || 37||
हे समस्त जीवों के पालक! धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध करके हमें क्या सुख प्राप्त होगा? यद्यपि वे सब अत्याचारी हैं फिर भी यदि हम उनका वध करते हैं तब निश्चय ही उन्हें मारने का हमें पाप लगेगा। इसलिए अपने चचेरे भाइयों, धृतराष्ट्र के पुत्रों और मित्रों सहित अपने स्वजनों का वध करना हमारे लिए किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। हे माधव! इस प्रकार अपने वंशजों का वध कर हम सुख की आशा कैसे कर सकते हैं?
Commentary
पिछले श्लोक में अर्जुन दो बार 'यद्यपि' शब्द कहकर अपने स्वजनों का वध न करने के अपने मन्तव्य को न्यायोचित ठहराता है। इसके बाद अर्जुन पुनः कहता है कि 'यद्यपि मैं उन्हें मार भी देता हूँ तथापि ऐसी विजय प्राप्त करने से मुझे क्या सुख प्राप्त होगा?'
अधिकतर परिस्थितियों में युद्ध लड़ना और किसी का वध करना प्रायः अधर्म माना जाता है जिसके कारण बाद में पश्चात्ताप और अपराध का बोध होता है। वेदों के अनुसार अहिंसा परम धर्म है और अपवाद स्वरूप कुछ विषम परिस्थतियों को छोड़कर अहिंसा पापकर्म भी है: मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि, अर्थात 'किसी भी प्राणी को मत मारो' यहाँ अर्जुन अपने कुटुम्बियों को मारना नही चाहता क्योंकि वह इसे पापपूर्ण कार्य मानता है। वशिष्ठ स्मृति (श्लोक 3.19) में छह प्रकार के आतातायियों का उल्लेख किया गया है जिनके विरूद्ध हमें अपनी रक्षा करने का अधिकार है। (1) किसी के घर को आग से जलाने वाला, (2) किसी के भोजन में विष मिलाने वाला, (3) किसी की हत्या करने वाला, (4) किसी का धन लूटने वाला, (5) पराई स्त्री का अपहरण करने वाला और (6) दूसरे का राज्य या भूमि हड़पने वाला। इन सब अत्याचारियों से अपनी रक्षा करने और इनका वध करने का सबको अधिकार है। मनु स्मृति 'श्लोक 8.351' में वर्णित है कि यदि कोई ऐसे अत्याचारियों का वध करता है तो उसे पाप नही लगता।
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस: |
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् || 38||
कथं न ज्ञेयमस्माभि: पापादस्मान्निवर्तितुम् |
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन || 39||
यद्यपि लोभ से अभिभूत होने के कारण वे अपने स्वजनों के विनाश और अपने मित्रों के साथ विश्वासघात करने में कोई दोष नहीं देखते हैं। तथापि हे जनार्दन! जब हमें स्पष्टतः अपने बंधु बान्धवों का वध करने में अपराध दिखाई देता है तब हम ऐसे पापमय कर्म से क्यों न दूर रहें?
यद्यपि अर्जुन वृत्ति से क्षत्रिय योद्धा था फिर भी उसे अनावश्यक हिंसा से घृणा थी। महाभारत युद्ध के अन्त में एक घटना से उसके चरित्र का यह पक्ष उजागर होता है। जब सौ कौरवों का वध हो गया था तब गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने प्रतिशोध लेने के लिए रात्रि के समय पाण्डवों के शिविर में चुपके से प्रवेश किया और द्रौपदी के सोये हुए पांच पुत्रों की हत्या कर दी। अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़ कर उसे जानवरों की भांति बांधकर द्रौपदी के चरणों में डाल दिया। ऐसा करने पर अश्वत्थामा क्रन्दन करने लगा। फिर भी पुत्रों की मृत्यु से शोकाकुल कोमल हृदया और क्षमाशीलता के गुण से परिपूर्ण द्रौपदी ने कहा कि जो भी हो अश्वथामा उनका गुरु पुत्र है इसलिए उसे क्षमा कर देना चाहिए। दूसरी ओर भीम, अश्वत्थामा का तत्काल वध कर देना चाहता था। दुविधा में फंसे अर्जुन ने जब इसके समाधान के लिए भगवान श्रीकृष्ण की ओर देखा, तब उन्होंने ये वचन कहे-'यदि आदरणीय श्रेष्ठ ब्राह्मण अस्थायी रूप से धर्म पथ से च्युत हो जाता है तब भी वह क्षमा योग्य है किन्तु जो मनुष्य घातक हथियार से किसी की हत्या करता है तब उसे अवश्य दण्ड देना चाहिए।' अर्जुन-श्रीकृष्ण के अनेकार्थक संकेत को समझ गया। उसने अश्वत्थामा को मारने की बजाए उसके सिर के पीछे की चुटिया को काट दिया और उसके मस्तक से मणि निकाल ली और अपने शिविर से बाहर भगा दिया। अर्जुन स्वभावतः यथासंभव हिंसा से दूर रहना चाहता है। इस विशेष दुःखद परिस्थिति में भी वह कहता है कि वह जानता है कि अपने कुटुम्बियों और वृद्धजनों को मारना उचित कृत्य नहीं है। मनु स्मृति में वर्णित है
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः।
बालवृद्धातुरैवैद्यैर्जातिसम्बन्धिबान्धवैः।। (मनुस्मृति: 4.179)
"किसी को भी यज्ञ करने वाले ब्राह्मण से कलह नहीं करनी चाहिए। कुल पुरोहित, आचार्य, मामा, अतिथि, अपने पर आश्रित, बच्चों, वृद्धजनों, वैद्य और स्वजनों के साथ झगड़ा नहीं करना चाहिए।" इसलिए अर्जुन ने यह निष्कर्ष निकाला कि लोभ से अभिभूत होने के कारण कौरव शायद धर्म पथ से डिग गये हैं और अपना विवेक खो बैठे हैं फिर जब हमारा पापजन्य कोई मनोरथ ही नहीं है तब हम ऐसे घिनौने कृत्य में क्यों संलिप्त हो?
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मा: सनातना: |
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत || 40||
जब कुल का नाश हो जाता है तब इसकी कुल परम्पराएं भी नष्ट हो जाती हैं और कुल के शेष बचे लोग अधर्म में प्रवृत्त होने लगते हैं।
पुरातन परम्पराओं और प्रथाओं के अनुसार कुल के वयोवृद्ध लोग उच्च मूल्यों और आदर्शों को अगली पीढ़ी के कल्याण हेतु उन्हें हस्तांतरित करते हैं। ये महान परम्पराएं कुल के सदस्यों को मानवीय मूल्यों और धार्मिक मर्यादाओं का पालन करवाने में सहायता करती हैं। यदि कुल के वयोवृद्धों की समय से पूर्व मृत्यु हो जाती है तब भावी पीढ़ियां कुल के उनके मार्गदर्शन और शिक्षण से वंचित हो जाती हैं। अर्जुन के कहने का तात्पर्य यह है कि जब कुलों का विनाश हो जाता है तब उसकी महान परम्पराएं भी उसके साथ समाप्त हो जाती हैं और कुल के शेष सदस्यों में अधर्म और व्यभिचार की प्रवृत्ति बढ़ती है जिससे वे अपनी आध्यात्मिक उन्नति का अवसर खो देते हैं। इसलिए अर्जुन के अनुसार कुल के आदरणीय वयोवृद्ध सदस्यों को कभी भी नहीं मारना चाहिए।
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय: |
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्कर: || 41||
अधर्म की प्रबलता के कारण हे कृष्ण! कुल की स्त्रियां दूषित हो जाती हैं और स्त्रियों के दुराचारिणी होने से हे वृष्णिवंशी! अवांछित संतानें जन्म लेती हैं।
वैदिक सभ्यता में समाज में स्त्रियों को उच्च स्थान प्राप्त था और स्त्रियों में शुचिता एवं सदाचारिता के गुणों की आवश्यकता को अत्यन्त महत्त्व दिया जाता था। इसलिए मनु स्मृति में वर्णन किया गया है:
'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः'
अर्थात (3:56) "जहाँ स्त्रियाँ पतिव्रता, संयत और सदाचारी जीवन व्यतीत करती हैं वहाँ वे अपनी पवित्रता के लिए पूरे समाज द्वारा पूजी जाती हैं और वहाँ स्वर्ग के देवता भी हर्षित होते हैं।" जब स्त्रियाँ पतिता बन जाती हैं तब अनुत्तरदायी पुरुष इसका लाभ उठा कर पर स्त्री गमन के कुमार्ग में प्रवृत्त हो जाते हैं और जिसके परिणामस्वरूप अवांछित सन्तानें जन्म लेती हैं।
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च |
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: || 42||
अवांछित सन्तानों की वृद्धि के परिणामस्वरूप निश्चय ही पारिवारिक परम्परा का विनाश करने वालों का जीवन नारकीय बन जाता है। जल तथा पिण्डदान की क्रियाओं से वंचित हो जाने के कारण ऐसे पतित कुलों के पितरों का भी पतन हो जाता है।
दोषैरेतै: कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकै: |
उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता: || 43||
अपने दुष्कर्मों से कुल परम्परा का विनाश करने वाले दुराचारियों के कारण समाज में अवांछित सन्तानों की वृद्धि होती है और विविध प्रकार की सामुदायिक और कुटुंब तथा पारिवारिक कल्याण की गतिविधियों का भी विनाश हो जाता है।
सनातन-धर्म या वर्णाश्रम द्वारा निर्धारित चारों वर्गों के लिए सामुदायिक योजनाएं इसलिए नियोजित हैं कि मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सके। अतः समाज के निकृष्ट जनों द्वारा सनातन परम्परा के विखण्डन से उस समाज में अव्यवस्था फैलती है, फलस्वरूप लोग जीवन के उद्देश्य भगवत्प्राप्ति को भूल जाते हैं। ऐसे नायक अंधे कहलाते हैं और जो लोग इनका अनुगमन करते हैं वे निश्चय ही कुव्यवस्था की ओर अग्रसर होते हैं।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन |
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम || 44||
हे जनार्दन! मैंने गुरुजनों से सुना है कि जो लोग कुल परंपराओं का विनाश करते हैं, वे अनिश्चितकाल के लिए नरक में डाल दिए जाते हैं।
अर्जुन अपने तर्कों को अपने निजी अनुभव तथा आचार्यों से जो सुन रखा है उस के आधार पर प्रस्तुत करता है। वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने की यही विधि है जिस व्यक्ति ने पहले से ज्ञान प्राप्त कर रखा है उस व्यक्ति की सहायता के बिना कोई भी वास्तविक ज्ञान तक नहीं पहुँच सकता। वर्णाश्रम-धर्म की एक पद्धति के अनुसार मृत्यु के पूर्व मनुष्य को पापकर्मों के लिए प्रायश्चित करना होता है जो पापात्मा है उसे इस विधि का अवश्य उपयोग करना चाहिए।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् |
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता: || 45||
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणय: |
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् || 46||
ओह! कितने आश्चर्य की बात है कि हम इस महा पापजन्य कर्म करने के लिए उद्यत हैं। राजसुख भोगने की इच्छा के प्रयोजन से हम अपने संबंधियों का वध करना चाहते हैं। यदि धृतराष्ट्र के शस्त्र युक्त पुत्र मुझ निहत्थे को रणभूमि में प्रतिरोध किए बिना मार देते हैं वही यह मेरे लिए श्रेयस्कर होगा।
अर्जुन ने सन्निकट युद्ध के अनेक दुष्परिणामों का उल्लेख तो किया किन्तु वह यह नहीं देख पा रहा था कि यदि दुर्योधन जैसे दुष्ट लोगों को समाज में पनपने का अवसर प्राप्त हो जाएगा तो इसके परिणामस्वरूप पापचार और अधिक प्रबल हो जाएंगे। वह अपना आश्चर्य प्रकट करने के लिए 'अहो' शब्द का प्रयोग करता है। बत शब्द का अर्थ 'भयंकर परिणाम' है। अर्जुन कह रहा है-"यह कितना आश्चर्यजनक है कि हमने युद्ध करने का निर्णय लेकर पाप कार्य किया है जबकि हम इसके दुष्परिणामों को भली भाँति जानते हैं।"
जैसा कि प्रायः यह होता है कि लोग अपनी स्वयं की भूल को देखने में असमर्थ होते हैं और उसके लिए स्वयं की अपेक्षा परिस्थितियों और अन्य लोगों को उत्तरदायी ठहराते हैं। इसी प्रकार से अर्जुन ने यह अनुभव किया कि धृतराष्ट्र के पुत्र लोभ से प्रेरित थे किन्तु वह इस ओर ध्यान नहीं दे सका कि उसके संवेदना से भरे उद्गार निर्मल मनोभाव नहीं है अपितु स्वयं को देह मानने की अज्ञानता और सांसारिक आसक्ति पर आधारित हैं। अर्जुन के सभी तर्क-वितर्कों की उलझन यह थी कि वह अपनी शारीरिक आसक्ति, हृदय की दुर्बलता और कर्तव्य पालन की विमुखता के कारण उत्पन्न हुए अपने मोह को न्यायोचित ठहराने के लिए इनका प्रयोग कर रहा था। अब आगे आने वाले अध्यायों में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करेंगे कि अर्जुन के तर्क अनुचित क्यों थे।
सञ्जय उवाच |
एवमुक्त्वार्जुन: सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् |
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस: || 47||
संजय ने कहा-इस प्रकार यह कह कर अर्जुन ने अपने धनुष और बाणों को एक ओर रख दिया और शोकाकुल चित्त से अपने रथ के आसन पर बैठ गया, उसका मन व्यथा और दुःख से भर गया।
वार्तालाप करते समय मनुष्य प्रायः भावनाओं में बह जाता है और इस प्रकार से अर्जुन ने इस अध्याय के 28वें श्लोक में जिस विषाद को प्रकट किया था, वह अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया था। अर्जुन ने निराशाजनक आत्म समर्पण करते हुए अपने धार्मिक कर्त्तव्य का निर्वहन करने के लिए युद्ध करने के निर्णय को त्याग दिया जोकि आत्म ज्ञान और भक्ति की प्राप्ति हेतु भगवान के प्रति समर्पण करने की मनोभावना के सर्वथा विपरीत है।
यहाँ इस बिन्दु को स्पष्ट करना उचित होगा कि अर्जुन किसी नवदीक्षित की भांति अध्यात्मिक ज्ञान से वंचित नहीं था। वह स्वर्गलोक में भी रह चुका था और उसने अपने पिता स्वर्ग के सम्राट इन्द्र से शिक्षा प्राप्त की थी। वास्तव में वह पूर्व जन्म में 'नर' था और इसलिए वह अलौकिक ज्ञान से परिपूर्ण था। नर-नारायण एक ही वंश के थे। नर एक मुक्त आत्मा और नारायण परमात्मा थे। इस तथ्य का प्रमाण महाभारत के युद्ध के पूर्व की इस घटना से मिलता है, जब अर्जुन ने युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को अपने पक्ष के लिए चुना और यादवों की समस्त सेना का त्याग दुर्योधन के लिए किया। उसका दृढ़ विश्वास था कि यदि युद्ध क्षेत्र में भगवान उसके पक्ष की ओर होंगे तो वह कभी पराजित नहीं होगा। भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा थी कि वे भावी पीढ़ियों के कल्याणार्थ संसार को भगवद्गीता के दिव्य ज्ञान का उपदेश दें। इसलिए अब इस अनुकूल अवसर को देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने जान बूझकर अर्जुन के मन में व्याकुलता उत्पन्न की।
।।श्रीमद्भागवत गीता का प्रथम अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
Shri Krishna Janmashtami Katha
kathaShrijirasik
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कहते हैं, क्योंकि यह दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिवस माना जाता है। इसी तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। यह तिथि उसी शुभ घड़ी की याद दिलाती है और सारे देश में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है।
जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की जन्म संबंधी कथा भी सुनते-सुनाते हैं, जो इस प्रकार है-
'द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था।
एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था।
रास्ते में आकाशवाणी हुई- 'हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।' यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ।
तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- 'मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है?'
कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया।
वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था।
उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ 'माया' थी।
जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- 'अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं।
तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी।'
उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए।
अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है।
उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- 'अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।' यह है कृष्ण जन्म की कथा।