॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhagavad Geeta Chapter 15
श्रीमद्भगवत गीता पंचदश अध्याय
अध्याय-पन्द्रह: पुरुषोत्तम योग
सर्वोच्च दिव्य स्वरूप योग
पिछले अध्याय में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया था कि माया के तीन गुणों से रहित होकर ही जीव अपने दिव्य लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इन गुणों से परे जाने का सबसे उत्तम उपाय भगवान की अनन्य भक्ति में तल्लीन होना है। ऐसी भक्ति में तल्लीन होने के लिए हमें मन को संसार से विरक्त कर उसे केवल भगवान में अनुरक्त करना होगा। इसलिए संसार की प्रकृति को समझना अति आवश्यक है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन की संसार के प्रति विरक्ति विकसित करने में उसकी सहायतार्थ उसे भौतिक संसार की प्रकृति को प्रतीकात्मक शैली में समझाते हैं। वे भौतिक संसार की तुलना उल्टे 'अश्वत्थ' के वृक्ष से करते हैं। देहधारी आत्मा इस वृक्ष की उत्पत्ति के स्रोत आदि को समझे बिना एक जन्म से दूसरे जन्म में इस वृक्ष की शाखाओं में घूमती रहती है। इस वृक्ष की जड़ें ऊपर की ओर होती हैं क्योंकि इसका स्रोत भगवान है। वेदों में वर्णित सकाम कर्मफल इसके पत्तों के समान हैं। इस वृक्ष को माया के तीनों गुणों द्वारा सींचा जाता है। ये गुण विषयों को जन्म देते हैं जोकि वृक्ष की ऊपर लगी कोंपलों के समान हैं। कोंपलों से जड़ें फूट कर प्रसारित होती हैं जिससे वृक्ष और अधिक विकसित होता है। इस अध्याय में इस प्रतीकात्मकता को विस्तृत रूप से वर्णित किया गया है जिससे कि यह ज्ञात हो सके कि कैसे देहधारी आत्मा इस संसार रूपी वृक्ष की अज्ञानता के कारण निरंतर बंधनो में फंसी रहकर कष्ट सहन कर रही है। इसलिए श्रीकृष्ण समझाते हैं कि विरक्ति रूपी कुल्हाड़ी से इस वृक्ष को काट डालना चाहिए। फिर हमें वृक्ष के आधार की खोज करनी चाहिए जोकि स्वयं परमेश्वर हैं। परम स्रोत भगवान को खोजकर हमें इस अध्याय में वर्णित पद्धति के अनुसार उनकी शरणागति ग्रहण करनी चाहिए तभी हम भगवान के दिव्य लोक को पा सकेंगे जहाँ से हम पुनः इस लौकिक संसार में नहीं लौटेंगे। श्रीकृष्ण आगे वर्णन करते हैं कि उनका अभिन्न अंश होने के कारण जीवात्माएँ दिव्य हैं। किन्तु माया के बंधन के कारण वे मन सहित छः इन्द्रियों के साथ संघर्ष करती रहती हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि आत्मा दिव्य है किन्तु फिर भी वह विषयों के भोग का आनंद लेती है। श्रीकृष्ण यह भी बताते हैं कि मृत्यु होने पर आत्मा अपने वर्तमान जन्म के मन और सूक्ष्म इन्द्रियों सहित नये शरीर में प्रवेश करती है। अज्ञानी न तो शरीर में आत्मा की उपस्थिति का अनुभव करते हैं और न ही मृत्यु होने पर उन्हें आत्मा के देह को त्यागने का आभास होता है। किन्तु योगी ज्ञान चक्षुओं और मन की शुद्धता के साथ इसका अनुभव करते हैं। इसी प्रकार भगवान भी अपनी सृष्टि में व्याप्त हैं लेकिन ज्ञान चक्षुओं से ही उनकी उपस्थिति का अनुभव किया जा सकता है। यहाँ श्रीकृष्ण प्रकट करते हैं कि संसार में भगवान के अस्तित्व को और उनकी अनन्त महिमा को जो सर्वत्र प्रकाशित है, कैसे जान सकते हैं। इस अध्याय का समापन क्षर, अक्षर, पुरुषोत्तम शब्दों की व्याख्या के साथ होता है। क्षर भौतिक जगत की नश्वर वस्तुएँ हैं। अक्षर भगवान के लोक में निवास करने वाली मुक्त आत्माएँ हैं। पुरुषोत्तम का अर्थ परमात्मा है जो संसार का नियामक और निर्वाहक है। वह विनाशी और अविनाशी पदार्थों से परे है। हमें अपना सर्वस्व उस पर न्योछावर करते हुए उसकी आराधना करनी चाहिए।
श्रीभगवानुवाच |
ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् |
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् || 1||
पुरुषोतम भगवान ने कहाः संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष की जड़ें ऊपर की ओर तथा इसकी शाखाएँ नीचे की ओर होती हैं। इसके पत्ते वैदिक मंत्र हैं और जो इस वृक्ष के रहस्य को जान लेता है उसे वेदों का ज्ञाता कहते हैं।
अश्वत्थ शब्द का अर्थ है- जो अगले दिन तक यथावत् नहीं रहता। इस शब्द का अर्थ निरन्तर परिवर्तित होना भी है। संसार भी अश्वत्थ वृक्ष के समान है क्योंकि यह नित्य परिवर्तनशील है। संस्कृत शब्दकोश में संसार को निम्न प्रकार से परिभाषित किया गया है- "संसृतिति संसारः" अर्थात जो निरंतर परिवर्तनशील है वह संसार है। "गच्छतीति जगत्" अर्थात् जो निरंतर गतिमान है वह जगत है। संसार में केवल परिवर्तन ही नहीं होता बल्कि एक दिन इसका विनाश भी होता है और यह भगवान में विलीन हो जाता है। इसलिए इसका प्रत्येक पदार्थ अस्थायी या अश्वत्थ है।
अश्वत्थ का एक अन्य अर्थ पीपल का वृक्ष भी है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि जीवात्मा के लिए भौतिक जगत एक विशाल अश्वत्थ वृक्ष है। प्रायः वृक्षों की जड़ें नीचे की ओर तथा शाखाएँ ऊपर की ओर होती हैं किन्तु इस वृक्ष की जड़ ऊपर की ओर अर्थात् भगवान से उत्पन्न होती है और सी पर आश्रित है। इसके तने और शाखाएँ नीचे की ओर बढ़ते हैं जिसमें माया के सभी लोकों में व्याप्त सभी प्राणी सम्मिलित हैं। इसके पत्ते वैदिक मंत्र (छन्दांसि) हैं जिनका उच्चारण धार्मिक कर्मकाण्डों के अवसर पर किया जाता है। ये इस वृक्ष को आसव (भोजन) प्रदान करते हैं। इन वैदिक मंत्रों में वर्णित यज्ञों को संपन्न कर जीवात्मा स्वर्ग में जाती है और जब उसके पुण्य कर्म क्षीण हो जाते हैं तब वह वापस पृथ्वी पर लौट आती है। इस प्रकार से इस वृक्ष के पत्ते उसे जन्म और मृत्यु के चक्र में निरन्तर घुमाते रहते। संसार के रूप में इस वृक्ष को 'अव्ययम्' अर्थात् अविनाशी कहा जाता है क्योंकि इसका प्रवाह निरन्तर बना रहता है और जीवात्मा इसके आदि और अन्त का अनुभव नहीं कर पाती। जिस प्रकार से समुद्र का जल बाष्प होकर बादल बन जाता है फिर पृथ्वी पर बरसता है तत्पश्चात् पुनः समुद्र में मिल जाता है। उसी प्रकार जन्म और मृत्यु का चक्र शाश्वत होता है। वेदों में भी इस वृक्ष का उल्लेख किया गया है-
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः
(कठोपनिषद्-2.3.1)
"अश्वत्थ वृक्ष जिसकी जड़ें ऊपर की ओर और शाखाएँ नीचे की ओर की है, शाश्वत है।"
ऊर्ध्वमूलम् अर्वाक्शाखम् वृक्षम् यो सम्प्रति ।
न स जातु जन: श्रद्धयात्मृत्युत्युर्मा मर्यादिति
(तैत्तिरीयारणायक-1.11.5)
"वे लोग जो यह जानते हैं कि इस वृक्ष की जड़ें ऊपर की ओर तथा शाखाएँ नीचे की ओर हैं, वे मानते हैं कि मृत्यु उनका विनाश नहीं कर सकती है।" वेद इस वृक्ष का वर्णन इस उद्देश्य से करते हैं कि हमें इस वृक्ष को काटने का प्रयास करना चाहिए। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो इस 'संसार' वृक्ष को काट डालने के रहस्य समझता है वह वेदों का ज्ञाता (वेदवित्) है।
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवाला: |
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके || 2||
इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर तथा नीचे की ओर फैली हुई हैं जी त्रिगुणों द्वारा पोषित होती हैं। इन्द्रियों के विषय कोंपलों के समान हैं। जो वृक्ष की जड़ें नीचे की ओर भी फली होती हैं जो मानव को कर्म से बाँधती हैं।
श्रीकृष्ण प्राकृतिक सृष्टि की तुलना अश्वत्थ वृक्ष के साथ कर रहे हैं। इस वृक्ष का मुख्य तना मानव शरीर है जो कर्मयोनि है। इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे दोनों ओर बढ़ती है। यदि जीवात्मा पाप कर्म करती है तब वह या तो पशु योनि या फिर निम्न योनियों में पुनर्जन्म लेती है। ये नीचे की शाखाएँ हैं। यदि जीवात्मा पुण्य कर्म करती है तब यह स्वर्ग लोक में गंधर्व, देवता आदि के रूप में जन्म लेती है। ये ऊपर की शाखाएँ हैं। वृक्ष को जल से सींचा जाता है लेकिन संसार रूपी इस वृक्ष की सिंचाई माया के तीनों गुणों से होती है। ये तीन गुण इन्द्रिय विषयों को जन्म देते हैं जो वृक्ष पर लगी कोंपलों (विषयप्रवालाः) के समान हैं। कोंपलों का कार्य अंकुरित होना है जिससे वृक्ष और अधिक विकसित होता है। अश्वत्थ वृक्ष पर कोंपलें अंकुरित होकर सांसारिक कामनाओं को बढ़ाती हैं जो वृक्ष की वायवीय जड़ों के समान हैं। बरगद के वृक्षों की विशेषता यह है कि ये अपनी शाखाओं से वायवीय जड़ों को नीचे भूमि पर ले जाते हैं। अतः इसकी वायवीय जड़ें दूसरा तना बन जाती हैं जिससे बरगद का वृक्ष विशाल आकार में फैलता है।
कोलकाता के बॉटनिकल गार्डन में सबसे बड़े आकार के बरगद के वृक्ष को 'दि ग्रेट बॅनियन' के नाम से जाना जाता है। यह वृक्ष चार एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है। वृक्ष के शिखर की 1100 गज की परिधि है और लगभग इसकी 3300 वायवीय जड़ें नीचे भूमि की ओर हैं। भौतिक जगत के विषय वृक्ष की कोंपलों के समान हैं। वे अंकुरित होती हैं और मनुष्यों में इन्द्रिय सुख की कामनाओं को भड़काती हैं। इन कामनाओं की तुलना वृक्ष की वायवीय जड़ों से की जाती है। ये वृक्ष को विकसित करने के लिए उसे आसव (भोजन) प्रदान करती हैं। भौतिक सुखों की कामनाओं से प्रेरित होकर मनुष्य कर्म करने में संलग्न रहता है। किन्तु इन्द्रियाँ कभी पूर्ण रूप से तृप्त नहीं होतीं। इसके विपरीत जैसे-जैसे हम कामनाओं की पूर्ति करते हैं वैसे-वैसे उनमें वृद्धि होती है। इस प्रकार से कामनाओं की पूर्ति हेतु संपन्न किए गए कर्म इन्हें और अधिक बढ़ाते हैं। परिणामस्वरूप इस वृक्ष का आकार बढ़ता जाता है और यह असीमित रूप से विकसित होता रहता है। इस प्रकार ये जड़ें आत्मा को और अधिक भौतिक चेतना में उलझाती हैं।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा |
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा || 3||
तत: पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूय: |
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यत: प्रवृत्ति: प्रसृता पुराणी || 4||
इस संसार में इस वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का बोध नहीं हो सकता और न ही इसके आदि, अंत और अस्तित्व को जाना जा सकता है। अतः इस गहन जड़ों वाले अश्वत्थ वृक्ष को विरक्ति रूपी शस्त्र से काट देना चाहिए। तभी कोई इसके आधार को जान सकता है। वह आधार परम प्रभु हैं जिनसे ब्रह्माण्ड का अनादिकाल से प्रवाह हुआ है और उनकी शरण ग्रहण करने पर फिर कोई इस संसार में लौट कर नहीं आता।
देहधारी जीवात्माएँ 'संसार' में डूबी रहती हैं अर्थात् निरंतर जन्म और मृत्यु के चक्र में घूमती रहती हैं और इस अश्वत्थ वृक्ष की प्रकृति को समझने में असमर्थ रहती हैं। वे इस वृक्ष की कोंपलों को अति आकर्षक समझती हैं अर्थात् वे इन्द्रिय विषयों का भोग करने के लिए लालायित रहती हैं और इनके भोग की कामना को विकसित करती हैं। इन कामनाओं की पूर्ति के लिए वे कठोर परिश्रम करती हैं किंतु उनके प्रयास इस वृक्ष को और अधिक विकसित करते हैं। जब कामनाओं की तृप्ति की जाती है तब वे लोभ के रूप में दोगुनी गति से पुनः उदित होती हैं। जब इनकी पूर्ति में बाधा आती है तब वे क्रोध का कारण बनती हैं, जिससे बुद्धि भ्रमित हो जाती है तथा अज्ञानता गहन हो जाती है।
श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि अश्वत्थ वृक्ष के रहस्य को केवल कुछ लोग ही समझ पाते हैं। सामान्य लौह कहते हैं-“मैं राम प्रसाद का सुपुत्र हरि प्रसाद इत्यादि हूँ और अमुक देश के नगर में निवास करता हूँ। मैं अधिक से अधिक सुख प्राप्त करना चाहता हूँ। इसलिए मैं अपनी शारीरिक चेतना के अनुसार काम करता हूँ किन्तु मुझे धोखे में रखा गया और मैं अब व्यथित हो गया हूँ।" वृक्ष की उत्पत्ति और प्रकृति को समझे बिना मनुष्य व्यर्थ के कार्यों और प्रयासों में संलग्न रहते हैं। भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य पाप कर्म करता है और निम्न योनियों में जन्म लेता है। कभी-कभी भौतिक सुखों के भोग की प्रवृत्ति वृक्ष के पत्तों की ओर आकर्षित करती है जोकि वेदों में वर्णित धार्मिक अनुष्ठान हैं। इन धार्मिक कार्मकाण्डों में संलग्न होकर मनुष्य केवल कुछ समय के लिए स्वर्ग लोक जाता है और अपने पुण्य कर्म समाप्त होने पर वह पुनः पृथ्वी लोक पर लौट आता है। इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं-
कृष्ण भूलि सेइ जीव अनादि-बहिर्मुख
अतएव मायातारे देय संसार-दुःख।।
कभु स्वर्गे उठाय, कभु नरके डुबाय
दण्ड्य जाने राजा येन नदीते चुभाय
(चैतन्य चरितामृत, मध्य लीला-20.117-118)
"आत्मा अनन्त काल से भगवान को भुलाए हुए है, इसलिए माया उसे संसार के दुःख भोगने के लिए विवश कर देती है। कभी-कभी यह आत्मा को स्वर्ग लोक देती है और कभी इसे नीचे नरक के लोकों में गिरा देती है। यह प्राचीन काल में राजाओं द्वारा दी जाने वाली यातनाओं के समान है। यातना के रूप में प्राचीन काल में राजा किसी व्यक्ति के सिर को पानी में तब तक डुबाने का ओदश देते थे जब तक कि उसका दम न घुट जाए और फिर उसे कुछ अंतराल के लिए मुक्त कर देते थे। जीवात्मा की स्थिति भी इसी के समान है। इसे स्वर्ग में केवल अस्थायी रूप से राहत मिलती है और फिर पुनः इसे पृथ्वी पर गिरा दिया जाता है।" इस प्रकार से अनन्त जन्म व्यतीत हो जाते हैं। भौतिक सुखों को प्राप्त करने के सभी प्रयासों का परिणाम केवल वृक्ष की जड़ों को और अधिक विकसित करना ही है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस वृक्ष को काटने वाला शस्त्र विरक्ति है। 'असङ्ग' शब्द का अर्थ विरक्ति है और यह जीवात्मा के कष्टों का उपाय है। माया के तीन गुणों से भड़की इच्छाओं का विनाश विरक्ति रूपी शस्त्र से किया जा सकता है। यह शस्त्र इस आत्म ज्ञान से निर्मित होना चाहिए-"मैं शाश्वत जीव हूँ न कि भौतिक शरीर। मैं जिस शाश्वत दिव्य आनन्द को प्राप्त करना चाहता हूँ उन्हें इन भौतिक पदार्थों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। जिन इच्छाओं को मैंने यह सोचकर प्रश्रय दिया कि मैं शरीर हूँ, उन्होंने केवल मुझे जन्म और मृत्यु के चक्र में ही स्थिर रखा है। इस में कोई राहत नहीं है।" जब कोई विरक्ति पश्चात् विकसित करता है तब वृक्ष का विकास अवरूद्ध हो जाता है और यह सूख जाता है। इसके पश्चात हमें इस वृक्ष के आधार को खोजना चाहिए जोकि जड़ों से ऊपर है। यह आधार परमेश्वर है।
जैसा कि श्रीकृष्ण ने पहले कहा था-"मैं ही भौतिक और आध्यात्मिक सृष्टि का स्रोत हूँ और सभी कुछ मुझसे उत्पन्न होता है। जो बुद्धिमान लोग इसे जानते हैं वे पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ मेरी आराधना करते हैं।" (श्लोक 10.8) इस प्रकार वृक्ष के मूल स्रोत को जानने के लिए हमें इस श्लोक में वर्णित पद्धति के अनुसार समर्पण करना होगा-"मैं सब कुछ उन पर छोड़ता हूँ जिनसे यह ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ है।" इस प्रकार से जिस वृक्ष को समझना अत्यंत कठिन था उसे अब इस विधि से समझा जा सकता है।
श्रीकृष्ण ने पहले कहा था-"मेरी दिव्य शक्ति माया को पार करना अत्यंत कठिन है लेकिन जो मेरे शरणागत हो जाते हैं वे इसे सरलता से पार कर लेते हैं।" (श्लोक 7.14) इसलिए परम प्रभु की शरण ग्रहण करने पर यह अश्वत्थ वृक्ष नष्ट हो जाएगा। फिर हम पुनः जन्म लेकर संसार में नहीं आएंगे और मृत्यु के पश्चात् भगवान के दिव्य लोक में जाएंगे। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण यह प्रकट करेंगे कि शरणागति क्यों आवश्यक है?
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा: |
द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदु:खसंज्ञै
र्गच्छन्त्यमूढा: पदमव्ययं तत् || 5||
वे जो अभिमान और मोह से मुक्त रहते हैं एवं जिन्होंने आसक्ति पर विजय पा ली है, जो निरन्तर अपनी आत्मा और भगवान में लीन रहते हैं, जो इन्द्रिय भोग की कामना से मुक्त रहते हैं और सुख-दुःख के द्वन्द्वों से परे हैं, ऐसे मुक्त जीव मेरा नित्य ध मि प्राप्त करते हैं।
श्रीकृष्ण अब बताते हैं कि इस वृक्ष के आधार, भगवान की शरणागति कैसे ग्रहण करें। वे कहते हैं कि मनुष्य को सर्वप्रथम अज्ञानता से उत्पन्न अभिमान का त्याग करना चाहिए। देहधारी जीव भ्रम के कारण यह सोचता हैं कि "मैं सब का स्वामी हूँ जो कुछ भी मेरे स्वामित्व में है, भविष्य में मेरे पास उसमें और अधिक होगा। यह सब कुछ मेरे सुख के लिए है।" जब तक हम अज्ञानता से उत्पन्न घमण्ड के नशे में चूर रहते हैं तब तक हम स्वयं को भौतिक सुखों का भोक्ता समझते हैं। ऐसी अवस्था में हम भगवान का अनादर करते हैं और भगवान की इच्छा में समर्पित हाने की इच्छा नहीं करते। ज्ञान के द्वारा हमें स्वयं को भोक्ता मानने की भावना का त्याग करना चाहिए। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि भौतिक सुखों और पदार्थों का संबंध भगवान से है और ये सब उनकी सेवा के लिए हैं। आत्मा भगवान की दासी है इसलिए विषयों को भोगने की भावना को सेवा की मनोभावना में परिवर्तित कर देना चाहिए। इसके लिए हमें सांसारिक आसक्तियों का त्याग करना चाहिए जो हमारे मन को संसार में आसक्त और भगवान से विमुख करती हैं। हमें निष्काम सेवा भावना से मन को भगवान में अनुरक्त करना चाहिए और स्वयं को भगवान का शाश्वत दास समझना चाहिए। पद्मपुराण में वर्णन है-
दासभूतमिदं तस्य जगत् स्थावर जंगमम्।
श्रीमन्नारायणस्वामी जगतान्प्रभुरीश्वरः।।
"भगवान नारायण इस संसार के नियामक और स्वामी हैं। सभी चर और अचर तथा सृष्टि के सभी तत्त्व उनके सेवक हैं।" इसलिए हम जितनी भगवान की सेवा की इच्छा उत्पन्न करते हैं, उतना ही भोक्ता होने का हमारा भ्रम दूर होगा और हृदय शुद्ध होगा। कृपालु जी महाराज हृदय की शुद्धता के लिए इसे सबसे शक्तिशाली साधन मानने पर बल देते हैं-
सौ बातन की बात इक, धरु मुरलीधर ध्यान।
बढ़वहु सेवा-वासना, यह सौ ज्ञानन ज्ञान।।
(भक्ति शतक-74)
"शुद्धिकरण के लिए सैकड़ों उपायों में से सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि मन को मुरली मनोहर श्रीकृष्ण में तल्लीन किया जाए और उनकी सेवा करने की इच्छा बढ़ायी जाय। यह ज्ञान हजारों है।"
एक बार जब हम अपने हृदय को शुद्ध कर लेते हैं और भगवान की सेवा में स्थित हो जाते हैं तब क्या होता है? श्रीकृष्ण उपर्युक्त श्लोक में वर्णन करते हैं कि ऐसी सिद्ध आत्माएँ अनन्त काल के लिए भगवद्धाम में चली जाती है। जब भगवान प्राप्त हो जाती है तब मायिक क्षेत्र का आगे कोई महत्व नहीं रहता। फिर आत्मा अन्य महापुरुषों के साथ भगवान के दिव्यलोक में निवास करने के योग्य हो जाती है जैसे कारागार किसी नगर के एक छोटे से भू-भाग पर स्थित होता है वैसे ही समस्त भौतिक क्षेत्र भगवान की सारी सृष्टि का एक चौथाई भाग है, जबकि आध्यात्मिक क्षेत्र तीन चौथाई है। वेद में वर्णन है-
पादोऽस्य विश्वा भूतानि, त्रिपादस्य अमृतं दिवि
(पुरुष सुक्तम मंत्र-3)
संसार माया से निर्मित है, लेकिन यह सृष्टि का एक चौथाई भाग है। अन्य तीन भाग जन्म और मृत्यु से परे भगवान के नित्य लोक हैं। श्रीकृष्ण अगले श्लोक में भगवान के नित्य धाम की व्याख्या करते हैं।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावक: |
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम || 6||
न तो सूर्य, न ही चन्द्रमा और न ही अग्नि मेरे सर्वोच्च लोक को प्रकाशित कर सकते हैं। वहाँ जाकर फिर कोई पुनः इस भौतिक संसार में लौट कर नहीं आता।
यहाँ श्रीकृष्ण दिव्य क्षेत्र के स्वरूप की संक्षिप्त जानकारी देते हैं। इस आध्यात्मिक क्षेत्र को प्रकाशित करने के लिए सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि यह स्वतः प्रकाशित है। भौतिक क्षेत्र माया से निर्मित है। जबकि दिव्य क्षेत्र का निर्माण योगमाया द्वारा होता है। यह माया के द्वंद्वों और दोषों से परे और सभी प्रकार से पूर्ण है। यह सत्-चित-आनन्द अर्थात् नित्य, सर्वज्ञ और आनन्दस्वरूप है। दिव्य क्षेत्र में एक आध्यात्मिक आकाश है जिसे परव्योम कहते हैं जिसमें भगवान के ऐश्वर्य और वैभवों से सम्पन्न असंख्य लोक हैं। भगवान के अनन्त रूप जैसे-कृष्ण, राम, नारायण आदि के इस आध्यात्मिक आकाश में अपने-अपने लोक हैं। वहाँ वे नित्य अपने भक्तों के साथ निवास करते हैं और दिव्य लीलाएँ करते हैं। ब्रह्मा श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहते हैं-
गोलोक-नाम्नि निज-धाम्नि तले च तस्य
देवी महेश-हरि-धामसु तेषु तेषु।
ते ते प्रभाव-निचया विहिताश्च येन
गोविन्दम् आदि-पुरुषम् तमहं भजामि ।।
(ब्रह्मसंहिता श्लोक-43)
"इस आध्यात्मिक आकाश में गोलोक भगवान श्रीकृष्ण का निजी लोक है। आध्यात्मिक आकाश में नारायण, शिव, दुर्गा आदि के लोक भी सम्मिलित हैं। मैं परम पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करता हूँ जिनके वैभवों की महिमा से यह संभव है।" श्रीकृष्ण के दिव्य धाम गोलोक के संबंध में ब्रह्मा पुनः वर्णन करते हुए कहते हैं
आनन्द-चिन्मय-रस-प्रतिभाविताभिस्
ताभिर्य एव निज-रूपतया कलाभिः।
गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो
गोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि।।
(ब्रह्मसंहिता श्लोक-37)
"मैं परम प्रभु गोविन्द की आराधना करता हूँ जो गोलोक में राधा, जो उनके ही अपने रूप का विस्तार है, के साथ निवास करते हैं। उनकी नित्य सहचारिणी सखियाँ हैं जो सदैव आनंद से परिपूर्ण रहती हैं और चौंसठ कलाओं से संपन्न हैं।" वे भक्त जो भगवान को पा लेते हैं वे उनके सर्वोच्च लोक में जाते हैं और उनकी लीलाओं में भाग लेते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो जीवात्मा वहाँ प्रवेश करती है वह 'संसार' अर्थात् जीवन-मृत्यु के संसार को पार कर लेती है।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: |
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति || 7||
इस जीवलोक की आत्माएँ मेरा शाश्वत अणु अंश हैं। लेकिन माया के बंधन के कारण वे मन सहित छः इन्द्रियों के साथ संघर्षरत करती हैं।
श्रीकृष्ण ने पहले यह समझाया था कि जो उनके लोक में जाते हैं वे पुनः संसार में लौटकर नहीं आते। अब वे उन जीवात्माओं का वर्णन करते हैं जो माया में रहती हैं। सर्वप्रथम वे कहते हैं कि वे जीवात्माएँ उनका अणु अंश हैं। भगवान का अंश दो प्रकार के होते हैं-
1. स्वांशः ये भगवान के अवतार हैं, जैसे राम, नृसिंह, वराह आदि। ये श्रीकृष्ण से भिन्न नहीं हैं इसलिए इन्हें स्वांश कहा जाता है। इसका तात्पर्य अभिन्न अंश है।
2. विभिन्नांशः ये प्रत्यक्ष रूप से भगवान के अंश नहीं हैं बल्कि
ये उनकी (जीव शक्ति) हैं। इस श्रेणी में सभी आत्माएँ सम्मिलित हैं। श्रीकृष्ण ने 7वें अध्याय के 5वें श्लोक में कहा था-“हे महाबाहों अर्जुन! माया से परे मेरी एक अन्य परा शक्ति है। वह जीवात्मा है जो इस संसार में जीवन का आधार है।"
आगे विभिन्नांश आत्माओं की तीन श्रेणियों का वर्णन इस प्रकार है
1. नित्य सिद्धः ये वो आत्माएँ हैं जो सदैव से मुक्त अवस्था में हैं और अनन्त काल से भगवान के लोक में वास कर रही हैं और उनकी लीलाओं में भाग लेती हैं।
2. साधन सिद्धः ये हमारी जैसी आत्माएँ हैं जो पहले संसार में रहती थीं लेकिन उन्होंने कठोर साधना एवं भक्ति द्वारा भगवान को प्राप्त किया। अब वे अनन्त काल के लिए भगवान के दिव्य लोक में वास करती हैं और भगवान की दिव्य लीलाओं में भाग लेती हैं।
3. नित्य बद्धः ये आत्माएँ अनन्त काल से माया में निवास कर रही हैं। ये पाँच इन्द्रियों और मन के विषयों में लिप्त रहती हैं।
कटोपनिषद् में वर्णन है-
पशञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभू:
(कठोपनिषद्-2.1.2)
"स्रष्टा ब्रह्मा ने हमारी इन्द्रियों को ऐसा बनाया है कि वे बाह्य संसार में आकर्षित रहती हैं।" नित्य बद्ध आत्माओं के लिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे मन और इन्द्रियों की तृप्ति के लिए संघर्ष कर रही हैं और कष्ट पा रही हैं। वे अब अगले श्लोक में यह व्याख्या करेंगे कि मृत्यु होने के पश्चात् जब आत्मा दूसरे शरीर में प्रवेश करती है तब मन और इन्द्रियों की क्या अवस्था होती है।
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वर: |
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् || 8||
जिस प्रकार से वायु सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है, उसी प्रकार से आत्मा जब पुराने शरीर का त्याग करती है और नये शरीर में प्रवेश करती है उस समय वह अपने साथ मन और इन्द्रियों को भी ले जाती है।
यहाँ आत्मा के देहांतरण की प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। इसके लिए वायु का उदाहरण दिया गया है जो फूलों की सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है। मृत्यु होने पर आत्मा स्थूल शरीर को छोड़ देती है लेकिन यह अपने साथ सूक्ष्म और कारण शरीर, जिसमें मन और इन्द्रियाँ भी सम्मिलित हैं, को अपने साथ ले जाती है। दूसरे अध्याय के 28वें श्लोक में तीन प्रकार के शरीरों का वर्णन किया गया था।
आत्मा को प्रत्येक जीवन में नया शरीर मिलता है और मन भी उसके साथ अनंत जन्मों से निरन्तर यात्रा करता रहता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जो लोग जन्म से अन्धे होते हैं वे भी स्वप्न किस प्रकार देख पाते हैं। स्वप्न प्रायः हमारे विचारों के विरूपण का परिणाम है वो जागृत अवस्था में असंबद्ध रहते हैं किंतु निद्रावस्था के दौरान संबद्ध हो जाते है। उदाहरण के लिए यदि कोई उड़ते हुए पक्षी को देख कर कहता है कि “यदि मैं पक्षी होता तब कितना अच्छा होता।" तब स्वप्न में वह मानव शरीर में स्वयं को उड़ता हुआ पाता है। ऐसा जागृत अवस्था के विरूपित विचारों का स्वप्नावस्था से संबद्ध होने के कारण हुआ। इसके अतिरिक्त जन्मांध व्यक्ति जिसने कभी कोई रूप या आकार नहीं देखा वह भी इन्हें स्वप्न में देख सका क्योंकि जागृत अवस्था की धारणाएँ अनन्त जन्मों से अवचेतन मन में संचित होती हैं। यह निरूपण करने के पश्चात् कि आत्मा शरीर का त्याग करते समय मन और इन्द्रियों को भी अपने साथ ले जाती है, अब आगे वे यह व्याख्या करेंगे कि वह इनका साथ क्या उपयोग करती है।
श्रोत्रं चक्षु: स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च |
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते || 9||
कान, आंख, त्वचा, जिह्वा और नासिका के समूह मन को अधिष्ठित कर देहधारी आत्मा इन्द्रिय विषयों का भोग करती है।
आत्मा दिव्य होने के कारण प्रत्यक्ष रूप से स्वाद, स्पर्श, देख, सूंघ या सुन नहीं सकती तब फिर यह इन भोगों को कैसे ग्रहण कर सकती है? इसका उत्तर है-इन्द्रियाँ और मन इसमें उसकी सहायता करते हैं। इन्द्रियाँ और मन वास्तव में जड़ हैं लेकिन ये आत्मा की चेतना से चेतनावत् हो जाते हैं। इसलिए वे पदार्थों, परिस्थितियों, विचारों और व्यक्तियों के संपर्क से सुख-दुःख की अनुभूति करते हैं। अहंकार के कारण आत्मा अपनी पहचान मन और इन्द्रियों के रूप में करती है और परोक्ष रूप से उसके आनन्द की अनुभूति करती है।
आत्मा दिव्य है किन्तु वह जिन सुखों की अनुभूति करती है वे भौतिक हैं। इन्द्रियाँ और मन आत्मा को चाहे कितना भी सुख प्रदान करें किन्तु फिर भी वह अतृप्त रहती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसने अभी तक अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया और इसकी आनन्द प्राप्त करने की खोज जारी रहती है। अमरीकी दार्शनिक रॉल्फ वॉल्डो एमर्सन ने इसका अति सुंदरता से वर्णन किया है-"हम मानते हैं कि मानव जीवन दुःखखमय है लेकिन हमें कैसे ज्ञात हुआ कि यह दुःखमय है? इस असहजता और इस असंतोष का कारण क्या है? इस अभाव और अज्ञानता की अनुभूति के द्वारा आत्मा अपना विलक्षण रूप प्रकट करती है?" अन्य विख्यात दार्शनिक मेस्टर एक्खर्ट लिखते हैं, “आत्मा में कुछ तो ऐसा है जो सभी से परे दिव्य और सरल है। यह केवल परम सार के द्वारा संतुष्ट हो सकती है।"
जिस असीम नित्य और दिव्य आनन्द को आत्मा प्राप्त करना चाहती है वह उसे केवल भगवान से प्राप्त हो सकता है। जब किसी को यह अनुभव हो जाता है, तब वही इन्द्रियाँ जो मन के बंधन का कारण थीं वे भगवान की ओर अग्रसर हो जाता हैं और इनका उपयोग भक्ति के साधन के रूप में किया जाता है। इसका अद्भुत उदाहरण संत तुलसीदास हैं जिन्होंने हिन्दी में रामचरितमानस की रचना की है। अपनी युवावस्था में उनकी अपनी पत्नी में अत्यंत आसक्ति थी। एक बार वह कुछ दिनों के लिए अपने मायके रहने चली गयी। जब तुलसीदास में उनसे मिलने की उत्कंठा उत्पन्न हुई तब वह अपने ससुराल की ओर चल दिए। लेकिन मार्ग में पड़ने वाली नदी का बहाव अत्यंत तीव्र था और कोई नाविक भी उन्हें नदी पार कराने के लिए तैयार नहीं हुआ क्योंकि उस समय मूसलाधार वर्षा हो रही थी। एक मृत शव नदी में तैर रहा था। अपनी पत्नी से मिलने की तीव्र इच्छा में तुलसीदास ने उसे लकड़ी का टुकड़ा समझा। उन्होंने लाश से लिपट कर नदी पार की। अपनी पत्नी से मिलने की इच्छा उन पर इतनी हावी हो गयी थी कि घर के बाहर की दीवार पर लटके हुए सर्प को तुलसीदास ने ध्यानपूर्वक नहीं देखा और सोचा कि वह रस्सी होगी। इसलिए वह मुख्य द्वार को खटखटा कर समय व्यर्थ करने के स्थान पर साँप को पकड़ कर दीवार पर चढ़ गए। जब उन्होंने खिड़की से कमरे में प्रवेश किया तब उनकी पत्नी ने उनसे पूछा कि उन्होंने नदी कैसे पार की और कैसे दीवार से ऊपर चढ़ कर आए। तब तुलसीदास ने बाहर उन वस्तुओं की ओर संकेत किया जिन्हें उन्होंने भूलवश लकड़ी का लट्ठा और रस्सी समझा था। उनकी पत्नी मृत शव और साँप को देखकर आश्चर्यचकित रह गयी। उसने कहा-"आपकी रक्त और मांस से बने शरीर में इतनी आसक्ति है। यदि आपने भगवान को पाने की ऐसी उत्कंठा प्रकट की होती तब तुम्हें इस संसार में जन्म न लेना पड़ता।" पत्नी के शब्दों से तुलसीदास को इतना आघात पहुंचा कि उन्हें अपनी मूर्खता का आभास हो गया और उनमें संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न हुआ। वह घर गृहस्थी को त्याग कर भक्ति में तल्लीन होने के लिए निकल पड़े। उन्होंने स्वयं को भगवान की भक्ति में निमग्न कर दिया। उन्होंने अपनी उन इच्छाओं को जिन्होंने अतीत में उन्हें कष्ट दिया था, उन्हें भगवान की भक्ति में तल्लीन कर दिया।
इस प्रकार भक्ति के कारण वे महान कवि संत तुलसीदास कहलाए। बाद में उन्होंने रामचरित मानस की रचना की जिसमें उन्होंने इस प्रकार से वर्णन किया-
कामिहि नारि पियारि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरन्तर प्रिय लागहू मोहि राम।।
(रामचरितमानस)
"जिस प्रकार से कामी पुरुष को सुंदर स्त्री प्रिय लगती है और लोभी को धन प्यारा लगता है उसी प्रकार से मेरा मन और इन्द्रियाँ भगवान राम की इच्छा करती रहें।
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् |
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: || 10||
अज्ञानी जन आत्मा का उस समय अनुभव नहीं कर पाते जब यह इन्द्रिय विषयों का भोग करती है और न ही उन्हें इसके शरीर से प्रस्थान करने का बोध होता है लेकिन वे जिनके नेत्र ज्ञान से युक्त होते हैं वे इसे देख सकते हैं।
यद्यपि आत्मा हमारे हृदय में रहती है और मन एवं इन्द्रियों की भावनाओं को ग्रहण करती है किन्तु इसे प्रत्येक मनुष्य जान नहीं पाता। इसका कारण यह है कि आत्मा भौतिक पदार्थ नहीं है और इसे भौतिक इन्द्रियों से देखा और स्पर्श नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिक अपने उपकरणों द्वारा प्रयोगशाला में इसका पता नहीं लगा सकते, इसलिए वे भूलवश निष्कर्ष निकालते हैं कि शरीर ही आत्मा है। यह एक मकैनिक द्वारा यह ज्ञात करने के प्रयास के समान है कि कार कैसे चलती है। वह पिछले पहियों की गति की ओर देखता है फिर त्वरक, अग्निशमन स्विच और स्टीरिंग व्हील का निरीक्षण करता है। वह इन सबको कार की गति के कारणों के रूप में चिह्नित करता है पर यह अनुभव नहीं कर पाता कि कार चलाने का काम कार चालक करता है। समान रूप से आत्मा के ज्ञान के बिना वैज्ञानिक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि शरीर के सभी अंग सम्मिलित रूप से शरीर की चेतना के स्रोत हैं।
किन्तु जो अध्यात्मिक मार्ग पर चलते हैं वे ज्ञान के चक्षुओं से यह देखते हैं कि आत्मा शरीर के अंगों को सक्रिय करती है। जब यह शरीर से प्रस्थान करती है तब शरीर के विभिन्न अंग जैसे हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े इत्यादि यहीं रह जाते हैं और शरीर में चेतना का कोई अस्तित्व नहीं रहता। चेतना आत्मा का लक्षण है। जब तक आत्मा शरीर में उपस्थित रहती है तब तक चेतना शरीर में रहकर उसे जीवित रखती है और आत्मा द्वारा शरीर त्याग करने पर वह भी शरीर को छोड़ देती है। ज्ञान रूपी चक्षु से संपन्न ज्ञानी मनुष्य ही इसे देख सकते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि अज्ञानी मनुष्य आत्मा की दिव्यता से अनभिज्ञ रहते हैं और भौतिक शरीर को आत्मा समझते हैं।
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् |
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतस: || 11||
भगवत्प्राप्ति के लिए प्रयासरत योगी यह जान लेते हैं कि आत्मा शरीर में प्रतिष्ठित है किन्तु जिनका मन शुद्ध नहीं है वे प्रयत्न करने के बावजूद भी इसे जान नहीं सकते।
ज्ञान अर्जन का प्रयास करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह भी आवश्यक है कि हमारे प्रयास उचित दिशा की ओर निर्देशित भी हो। मनुष्य यह सोंचने की भूल करते हैं कि वे भगवान को उन्हीं साधनों द्वारा जान सकते हैं जिनके द्वारा उन्होंने संसार को जाना है। अपनी इन्द्रियों के अनुभव और अपनी बुद्धि के आधार पर वे सभी प्रकार के ज्ञान को उचित और अनुचित घोषित करने का निर्णय करते हैं। यदि उनकी इन्द्रियाँ किसी पदार्थ का अनुभव नहीं कर पाती और उनकी बुद्धि उसे समझ नहीं पाती तब फिर वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उस पदार्थ का कोई अस्तित्व नहीं हो सकता। इस सिद्धान्त को स्पष्ट करते हुए, एलेक्सिस कार्रल ने अपनी पुस्तक, 'मैन द अननोन' में लिखा है-"हमारे मन में ऐसी वस्तुओं को अस्वीकार करने की प्रवृत्ति होती है जो वैज्ञानिक या दार्शनिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं होती। आखिरकार सभी वैज्ञानिक भी मानव मात्र हैं। वे अपने परिवेश और पूर्वाग्रहों से युक्त होते हैं। वे यह विश्वास करते हैं कि जिन तथ्यों को वर्तमान सिद्धांतों द्वारा समझाया नहीं जा सकता उनका कोई अस्तित्व नहीं होता। आधुनिक युग के वैज्ञानिक सिद्धियों और अन्य आध्यात्मिक सिद्धान्तों को अंधविश्वास के रूप में देखते हैं। अप्रामाणिक प्रतीत होने वाले तथ्य दबा दिए जाते हैं।"
न्याय दर्शन में इस प्रकार के विचार को कूप-मंडूक-न्याय कहते हैं। कुएँ में रहने वाला एक मेढ़क अपने रहने के स्थान से भली-भांति परिचित था। एक दिन राणा केन्क्रिवोर (समुद्र में रहने वाली एक मेढ़क ) उस कुएँ में कूद कर आ गया। फिर दोनों मेढ़क आपस में वार्तालाप करने लगे। कुएँ के मेढ़क ने समुद्र में रहने वाले मेढ़क से पूछा-"वह समुद्र कितना बड़ा है जहाँ से तुम आये हो"? उसने उत्तर दिया "वह बहुत विशाल है।" "क्या इस कुएँ से पाँच गुणा अधिक आकार का है?" "नहीं इससे भी अधिक" "क्या इससे दस गुणा विशाल?" "नहीं यह तो कुछ नहीं है"? "क्या सौ गुणा अधिक"? "नहीं, इससे भी कहीं अधिक विशाल।" कुएँ के मेढ़क ने कहा, "तुम झूठ बोल रहे हो, कोई वस्तु मेरे कुएँ से सौ गुणा अधिक विशाल कैसे हो सकती है?" कुएँ में रहने वाले मेंढक की बुद्धि जीवन भर कुएँ में रहने के कारण संकुचित हो चुकी थी। इसलिए वह विशाल महासागर की कल्पना नहीं कर सका। समान रूप से सीमित बुद्धि के कारण सांसारिक लोग अलौकिक आत्मा के अस्तित्व की संभावना को स्वीकार नहीं करते। लेकिन जो आध्यात्मिक मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे यह अनुभव करते हैं कि उनकी भौतिक बुद्धि की परिधि से परे भी कोई ज्ञान हो सकता है। वे विनम्रता और विश्वास के साथ आध्यात्मिक मार्ग पर चलना आरंभ करते हैं और इसे ही अपना उद्देश्य समझने लगते हैं। जब उनका मन शुद्ध हो जाता है तब स्वाभाविक रूप से उन्हें आत्मा की उपस्थिति का बोध होने लगता है। फिर अनुभव द्वारा उन्हें शास्त्रों की सत्यता की अनुभूति होती है।
जिस प्रकार से इन्द्रियाँ आत्मा का बोध नहीं कर सकती उसी प्रकार से भगवान भी उनकी परिधि में नहीं हैं। इसलिए आत्मा और भगवान को ज्ञान रूपी चक्षुओं से जाना जा सकता है। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान के अस्तित्व का बोध कराने की विधि स्पष्ट करेंगे।
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् |
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् || 12||
यह जान लो कि मैं सूर्य के तेज के समान हूँ जो पूरे ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है। सूर्य का तेज और अग्नि की दीप्ति मुझसे ही उत्पन्न होती है।
यह मानवीय स्वभाव है कि हमें जो महत्त्वपूर्ण प्रतीत होता है उसके प्रति हम आकर्षित होते हैं। शरीर, पति पत्नी, बच्चों और संपत्ति को महत्त्वपूर्ण मानते हुए हम उनके प्रति आकृष्ट होते हैं।
श्रीकृष्ण बताते हैं कि सृष्टि में जो कुछ भी सारभूत दिखाई देता है वह सब उनकी शक्ति है। वे कहते हैं कि सूर्य की दीप्ति उनके अधीन है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सूर्य प्रतिक्षण भारी मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन करता है। वह अरबों वर्षों से ऐसा कर रहा है फिर भी उसकी इस ऊर्जा न तो कम हुई है और न ही उसकी ऊर्जा उत्सर्जन प्रक्रिया में कोई दोष आया है। यह सोंचना कि सूर्य किसी महा विस्फोट के कारण में अस्तित्व में आया होगा, अनुभवहीनता है। सूर्य भगवान की एक विभूति है।
समान रूप से चन्द्रमा रात्रि में आकाश को प्रकाशित करता है। यद्यपि हम वैज्ञानिक दृष्टि से यह निष्कर्ष तो निकाल सकते हैं कि चन्द्रमा का प्रकाश केवल सूर्य के प्रकाश के प्रतिबिम्ब पर आश्रित है, लेकिन यह अद्भुत व्यवस्था भगवान की विभूति से ही संपन्न होती है और चन्द्रमा भगवान की विभूतियों में से एक है। इस संदर्भ में केनोपनिषद में एक कथा वर्णित है। इसमें देवताओं और दैत्यों के बीच दीर्घकाल तक हुए युद्ध का वर्णन किया गया है, जिसमें अंत में देवताओं ने विजय प्राप्त की थी। अपनी विजय से देवताओं में अभिमान आ गया और वे सोचने लगे कि उन्होंने अपनी शक्ति से असुरों पर विजय प्राप्त की है। उनके अभिमान को नष्ट करने के लिए भगवान आकाश में यक्ष के रूप में प्रकट हुए। वे अत्यंत दीप्तिमान था। स्वर्ग के राजा इन्द्र ने सबसे पहले उन्हें देखा और वह यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि मात्र एक यक्ष का तेज उससे अधिक है। उसने अग्नि देवता को उस यक्ष के बारे में पता लगाने के लिए भेजा। अग्नि ने यक्ष के पास आकर कहा-“मैं अग्निदेव हूँ और मुझमें समस्त ब्रह्माण्ड को क्षणभर में जलाकर भस्म कर देने की शक्ति है। कृपया आप बतायें कि आप कौन है?" यक्ष के रूप में भगवान ने उसके सामने घास का तिनका रखा और कहा-"कृपया इसे जलाएँ" उसे देखकर अग्निदेव हँसने लगा, "क्या यह एक छोटा-सा तिनका मेरी शक्ति का परीक्षण करेगा?" और फिर जैसे ही उस तिनके को जलाने के लिए उसने प्रयत्न किया तब भगवान ने उसके भीतर की शक्ति के स्रोत को समाप्त कर दिया। बेचारा अग्निदेव ही जब सर्दी से कांपने लगा तब उस तिनके को जलाने का प्रश्न ही कहाँ रहा? अपनी विफलता से लज्जित होकर वह इन्द्र के पास लौट आया।
तब इन्द्र ने वायु देवता को यक्ष की वास्तविकता ज्ञात करने के लिए भेजा। वायु देवता ने वहाँ जाकर घोषणा की-"मैं वायु का देवता हूँ और क्षण भर में संपूर्ण संसार को उलट-पलट सकता हूँ। अब कृपया अवगत कराएँ कि आप कौन हों?" "यक्ष बने भगवान ने उसके सामने घास का तिनका रखा और आग्रह किया-"कृपया इसे हिला कर दिखाएँ।" वायुदेव तीव्र गति से आगे बढ़े किंतु उसी दौरान भगवान ने उसकी शक्ति के स्रोत को बंद कर दिया। बेचारे वायुदेव को उस समय एक कदम भी आगे बढ़ना कठिन लगने लगा तब तिनके जैसी किसी वस्तु को हिलाना कैसे संभव होता? अंत में जब इन्द्र वहाँ आया तब भगवान अर्तध्यान हो गये और उनके स्थान पर वहाँ भगवान की योगमाया शक्ति उमा प्रकट हुईं। जब इन्द्र ने उमा से उस यक्ष के संबंध में पूछा तब उसने उत्तर दिया कि वे आपके परम पिता भगवान थे, जिनसे आप सब स्वर्ग के देवता अपनी शक्तियाँ प्राप्त करते हैं। वो तुम्हारा घमंड नष्ट करने आये थे।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा |
पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक: || 13||
पृथ्वी पर व्याप्त होकर मैं सभी जीवों को अपनी शक्ति द्वारा पोषित करता हूँ। चन्द्रमा के रूप में मैं सभी पेड़-पौधों और वनस्पतियों को जीवन रस प्रदान करता हूँ।
Ok
'गाम्' शब्द का अर्थ पृथ्वी और 'ओजसा' शब्द का अर्थ शक्ति है। भगवान की शक्ति से यह पृथ्वी विभिन्न प्रकार के चर-अचर जीवन रूपों के निवास के लिए और उन्हें जीवित रखने में समर्थ होती है। उदाहरणार्थ बचपन से हम सोंचा करते थे कि समुद्र का जल खारा क्यों होता है? यदि समुद्र का जल खारा नहीं होता तब इससे प्रचुर मात्रा में रोग फैलते और जलीय जीव इसमें जीवित नहीं रह पाते। अतः इसके साथ संबद्ध सिद्धांत जो भी हो लेकिन समुद्र का पानी भगवान की इच्छा के कारण खारा है। नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक जॉर्ज बाल्ड ने अपनी पुस्तक 'ए यूनिवर्स दैट ब्रीडस लाईफ' में लिखा है, "यदि हमारे ब्रह्माण्ड के भौतिक गुणों में से कोई एक गुण भी जैसा वो है उससे कुछ भिन्न होता तब वर्तमान में दृश्यमान जीवन यहाँ सम्भव नहीं होता।"
श्रीकृष्ण के कथन से स्पष्ट है कि यह भगवान की ही शक्ति है जो पृथ्वी लोक में जीवों के लिए उपयुक्त पदार्थों की व्यवस्था करती है। इसके अतिरिक्त चन्द्रमा की चांदनी जिसमें अमृत की गुणवत्ता है, सभी पेड़-पौधों जैसे जड़ी-बूटियाँ, सब्जियाँ, फल और अनाज को पोषित करती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ही चांदनी को पोषण करने की विशेषता प्रदान करते हैं।
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित: |
प्राणापानसमायुक्त: पचाम्यन्नं चतुर्विधम् || 14||
: मैं सभी जीवों के उदर में जठराग्नि के रूप में रहता हूँ, श्वास और प्रश्वास के संयोजन से चार प्रकार के भोजन को मिलाता और पचाता हूँ।
वैज्ञानिक पाचन का श्रेय पित्ताशय, अग्न्याशय, यकृत इत्यादि को देते हैं। इस श्लोक के अनुसार यह भी एक हीन सोच है। इन सभी रसों के पीछे भगवान की ही शक्ति है जो पाचन क्रिया को सुचारु बनाने का काम करती है। 'वैश्वानर' शब्द का अर्थ 'जठराग्नि' है जो भगवान की शक्ति से प्रज्जवलित होती है। बृहदारण्यकोपनिषद् में भी वर्णन किया गया है-
अयमग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते
(बृहदारण्यकोपनिषद्-5.9.1)
"भगवान आमाशय के भीतर की अग्नि है जो जीवों के भोजन को पचाती है।"
इस श्लोक में निम्नांकित चार प्रकार के भोजन का उल्लेख किया गया है-(1) भोज्यः इन में दाँतों से चबाये जाने वाले भोजन जैसे चपाती, फल इत्यादि हैं, (2) पेयः यह निगले जाते हैं। जैसे–दूध, जल, जूस इत्यादि, (3) चोष्य: ये खाद्य पदार्थ चूसे जाते हैं। जैसे-गन्ना, नींबू, इत्यादि, (4) लेह्यः यह खाद्य पदार्थ चाट कर खाये जाते हैं, जैसे शहद, चूर्ण इत्यादि।
12वें से 14वें श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह वर्णन किया है कि भगवान जीवन के सभी पहलुओं को संभव बनाते हैं। वे पृथ्वी को जीवों के रहने योग्य बनाते हैं। वे वनस्पतियों के पोषण हेतु चन्द्रमा को शक्ति प्रदान करते हैं और वे चार प्रकार के भोजनों को पचाने हेतु जठराग्नि बन जाते हैं। अब वे अगले श्लोक में यह निरूपण करते हुए कि केवल वे ही सभी प्रकार के ज्ञान का लक्ष्य हैं, इस विषय का समापन करते हैं।
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च |
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् || 15||
मैं समस्त जीवों के हृदय में निवास करता हूँ और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति होती है। केवल मैं ही सभी वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ, मैं वेदांत का रचयिता और वेदों का अर्थ जानने वाला हूँ।
भगवान ने हमारे भीतर ज्ञान और स्मृति का अद्भुत तंत्र रचा है। हमारा मस्तिष्क (हार्डवेयर) और मन (सॉफ्टवेयर) के समान है। हम प्रायः इस तंत्र को उपेक्षित दृष्टि से देखते हैं। सर्जन मस्तिष्क का प्रत्यारोपण कर अपनी उपलब्धि पर गर्व करते हैं किंतु वे यह चिंतन नहीं करते कि मस्तिष्क रूपी इस अद्भुत तंत्र की संरचना कैसे हुई? आधुनिक युग में अभी भी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ प्रौद्योगिकी में सभी प्रकार की प्रगति के बावजूद भी कम्प्यूटर की मानव मस्तिष्क के साथ तुलना नहीं की जा सकती। उदाहरणार्थ सॉफ्टवेयर इंजीनियर अभी तक चेहरा पहचानने की तकनीक की खोज में जुटे हुए हैं किन्तु मानव मस्तिष्क लोगों को उनके चेहरों पर आए परिवर्तन के बावजूद भी सरलता से उनकी पहचान कर लेता है। हम प्रायः लोगों को यह कहते हुए पाते हैं, “ओ प्रिय मित्र, इतने सालों बाद के पश्चात तुमसे मिलकर प्रसन्नता हुई जब हम पिछली बार मिले थे उस समय और अब में तुममें बहुत परिवर्तन दिखाई दे रहा है।" यह दर्शाता है कि मानव मस्तिष्क परिवर्तित चेहरों की कई वर्षों बाद भी पहचान कर लेता है जबकि कम्प्यूटर अपरिवर्तित चेहरों की भी ठीक प्रकार से पहचान नहीं कर सकता। वर्तमान में इंजिनियर अभी भी स्कैनर सॉफ्टवेयर पर काम कर रहे हैं जो टाईप की गई सामग्री को बिना त्रुटि के समझ सकें। इसके विपरीत मनुष्य दूसरों की सांकेतिक हस्तलिपि भी सरलता से समझ सकता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्मृति और ज्ञान के अद्भुत गुण उन्हीं से प्राप्त होते हैं।
इसके अतिरिक्त वे मनुष्य को विस्मृति की शक्ति भी प्रदान करते हैं। जिस प्रकार आवांछित लेख नष्ट कर दिए जाते हैं, उसी प्रकार लोग व्यर्थ की स्मृति को भुला देते हैं क्योंकि ऐसा न करने से मस्तिष्क सूचनाओं के समुद्र अवरुद्ध से अवरूद्ध हो जाएगा। उद्धव श्रीकृष्ण से कहते हैं-
त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तेऽत्र शक्तितः
(श्रीमदभागवतम्-11.22.28)
"केवल आपसे जीवों में ज्ञान का उदय होता है और आपकी ही शक्ति से ज्ञान विलुप्त हो जाता है।" इस आंतरिक ज्ञान के अतिरिक्त उस ज्ञान का बाह्य स्रोत शास्त्र हैं और श्रीकृष्ण ने इन ग्रंथों में भी उसी प्रकार से अपनी महिमा प्रकट की है। उन्होंने ही सृष्टि के आरम्भ में वेदों को प्रकट किया। चूंकि भगवान दिव्य हैं और बुद्धि की परिधि से परे हैं इसलिए वेद भी दिव्य हैं। इसलिए केवल वे ही इनका वास्तविक अर्थ जानते हैं और यदि वे किसी पर कृपा करते हैं तब वह भाग्यशाली आत्मा भी वेदों को जान लेती है। वेदव्यास जो भगवान के अवतार थे, ने वेदान्त दर्शन लिखा। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे वेदान्त के रचयिता हैं। अंततः वह कहते हैं कि यद्यपि वेदों में बहुसंख्यक भौतिक और आध्यात्मिक उपदेश सम्मिलित हैं और वैदिक ज्ञान का उद्देश्य भगवान को जानना है। धार्मिक अनुष्ठानों का उल्लेख भी उनमें इसी प्रयोजनार्थ किया गया है। वे भौतिक संसार में आसक्त लोगों को लुभाते हैं और उन्हें भगवान की ओर ले जाने से पूर्व मध्यवर्ती उपायों की व्यवस्था करते हैं। कठोपनिषद् (1.2.15) में वर्णित है-" सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति" अर्थात् "सभी वैदिक मंत्र भगवान की ओर संकेत करते हैं।" हम सभी वैदिक मंत्रों का स्मरण करना, तथा उनका उपर्युक्त छंदों में उच्चारण सीख सकते हैं। सभी धार्मिक अनुष्ठानों को सम्पन्न करने में हम दक्ष और ध्यान में लीन होना सीख सकते हैं। यहाँ तक कि हम अपनी कुण्डलिनी शक्ति को भी जागृत कर सकते हैं। यदि फिर भी हम भगवान को नहीं जान पाते, इसका अर्थ है कि हम वेदों के वास्तविक अभिप्राय को नहीं समझे हैं। दूसरी ओर वे जो भगवान के प्रति प्रेम विकसित करते हैं, स्वतः सभी वेदों के अभिप्राय को समझ जाते हैं। इस संबंध में जगद्गुरु श्री कृपालुजी जी महाराज ने वर्णन किया है-
सर्व शास्त्र सार यह गोविंद राधे।
आठों याम मन हरि गुरु में लगा दे।।
(राधा गोविन्द गीत)
"सभी शास्त्रों का सार मन को दिन-रात भगवान की भक्ति में तल्लीन करना है।"
इस अध्याय के पहले श्लोक से 15वें श्लोक तक श्रीकृष्ण ने सृष्टि रूप वृक्ष की व्याख्या की है। अब इस विषय का समापन करते हुए वे अगले दो श्लोकों में इस ज्ञान को सही परिप्रेक्ष्य में रखकर क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम शब्दों की व्याख्या करेंगे।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च |
क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते || 16||
सृष्टि में दो प्रकार के जीव हैं-क्षर और अक्षर। भौतिक जगत के सभी जीव नश्वर हैं और मुक्त जीव अविनाशी हैं।
संसार में माया जीवात्मा को भौतिक देह के बंधन में डालती है। आत्मा स्वयं अविनाशी है और बारंबार शरीर की जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया का अनुभव करती रहती है। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि भौतिक संसार में देहधारी जीव भी क्षर हैं। इसमें अणु-जीवाणु से लेकर स्वर्ग के देवता भी सम्मिलित हैं।
इसके अतिरिक्त भगवान के लोक में वास कर रही आत्माएँ भी हैं। ये आत्माएँ अविनाशी शरीर से युक्त हैं जो जन्म और मृत्यु का अनुभव नहीं करती और उन्हें अक्षर (अविनाशी) की श्रेणी में रखा गया है।
उत्तम: पुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृत: |
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वर: || 17||
इनके अतिरिक्त एक परम सर्वोच्च रास्ता है जो अक्षय परमात्मा है। वह तीनों लोकों में नियंता के रूप में प्रविष्ट होता है और सभी जीवों का पालन पोषण करता है।
संसार और आत्मा का निरूपण करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण भगवान के संबंध में चर्चा करते हैं जो संसार तथा नश्वर और अविनाशी जीवों से परे हैं। शास्त्रों में उन्हें परमात्मा के नाम से पुकारा जाता है। 'परम' विशेषण स्पष्ट करता है कि परमात्मा आत्मा या जीवात्मा से भिन्न है। यह श्लोक उन अद्वैतवादी दार्शनिकों का खण्डन करता है, जो जीवात्मा को ही परम आत्मा मानते हैं। जीवात्मा अणु है और यह केवल अपनी देह में ही व्याप्त रहती है जबकि परमात्मा विभु हैं और सब प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं। वे उनके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं और उचित अवसर पर उसका फल प्रदान करते हैं। वे जीवात्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक रहते हैं चाहे वह कोई भी शरीर धारण करे। अगर जीवात्मा कुत्ते की योनि में जन्म लेती है तब भी परमात्मा उसके साथ रहते हैं और पूर्व कर्मों के अनुसार उसे फल देते हैं।
संसार में कुत्तों के भाग्य में भी विषमता देखने को मिलती है। कुछ आवारा कुत्ते भारत की गलियों में नारकीय जीवन व्यतीत करते हैं जबकि अन्य पालतू कुत्ते संयुक्त राज्य अमेरिका में विलासिता पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। यह विषमता पूर्व संचित कर्मों के परिणामस्वरूप पायी जाती है। परमात्मा ही हमें हमारे कर्मों का प्रतिफल प्रदान करते हैं और प्रत्येक जन्म में आत्मा जिस भी योनि में जाती है वे उसके साथ रहते हैं। परमात्मा जो सभी जीवों के हृदय में निवास करते हैं वे अपने चतुर्भुजधारी क्षीरोदकशायी विष्णु के साकार रूप में भी प्रकट रहते हैं। हिन्दी में एक सुप्रसिद्ध कहावत है-"मारने वाले के दो हाथ, बचाने वाले के चार हाथ।" अर्थात् किसी को मारने वाले के दो हाथ होते हैं लेकिन उसकी रक्षा करने वाले के चार हाथ होते हैं। यह चतुर्भुज धारी स्वरूप परमात्मा के संदर्भ में कहा जाता है।
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तम: |
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित: पुरुषोत्तम: || 18||
मैं नश्वर सांसारिक पदार्थों और यहाँ तक कि अविनाशी आत्मा से भी परे हूँ इसलिए मैं वेदों और स्मृतियों दोनों में ही दिव्य परम पुरूष के रूप में विख्यात हूँ।
पिछले कुछ श्लोकों में श्रीकृष्ण ने विस्तारपूर्वक यह प्रकट किया था कि प्रकृति के सभी भव्य पदार्थ उनकी ही महिमा की अभिव्यक्तियाँ हैं। वे केवल दृश्य जगत का सृजन मात्र नहीं करते। वे मायाशक्ति और दिव्य आत्माओं से परे है। यहाँ उन्होंने अपने स्वरूप को पुरुषोत्तम के रूप में अभिव्यक्त किया है। अब कोई यह संदेह कर सकता है कि श्रीकृष्ण और परम सत्ता क्या एक ही हैं? ऐसे किसी भ्रम की संभावना को हटाने के लिए श्रीकृष्ण इस श्लोक में स्वयं को उत्तम पुरुष एकवचन में प्रस्तुत करते हैं। आगे वे कहते हैं कि वेदों में भी इस प्रकार की उदघोषणा की गयी है-
कृष्ण एव परो देवस्तं ध्यायेत् तं रसयेत् तं यजेत तं भजेद्
(गोपालतापिन्युपनिषद्)
"भगवान श्रीकृष्ण परम प्रभु हैं, उनका ध्यान करो उनकी भक्ति में परम आनन्द पाओ और उनकी आराधना करो" आगे पुनः वर्णन किया गया है:
योऽसै परं ब्रह्म गोपालः
(गोपालतापिन्युपनिषद्)
"गोपाल परम पुरुष हैं।" अब कोई भगवान विष्णु, भगवान राम, भगवान शिव आदि की स्थिति के संबंध में पूछ सकता है? ये सब एक ही परम पुरुष के विभिन्न रूप हैं। ये सब भगवान की अभिव्यक्तियाँ हैं।
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् |
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत || 19||
वे जो संशय रहित होकर मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानते हैं, वास्तव में वे पूर्ण ज्ञान से युक्त हैं। हे अर्जुन! वे पूर्ण रूप से मेरी भक्ति में तल्लीन रहते हैं।
श्रीमद्भागवतम् में भगवान के तीन स्वारोपों का वर्णन किया गया है।
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ।।
(श्रीमद्भागवतम्-1.2.11)
"तत्त्ववेत्ता कहते हैं कि केवल एक ही परम सत्ता है जो विश्व में ब्रह्म, परमात्मा और भगवान तीन रूपों में प्रकट है। ये तीन अलग-अलग सत्ता नहीं हैं बल्कि एक ही परम सत्ता की तीन अभिव्यक्तियाँ हैं। उदाहरणार्थ जल, बर्फ और भाप तीन अलग-अलग तत्त्व दिखाई देते हैं किन्तु ये तीनों एक ही तत्त्व के तीन रूप हैं। समान रूप से ब्रह्म भगवान का सर्वत्र व्यापक निराकार रूप है। वे जो ज्ञानयोग के मार्ग का अनुसरण करते हैं वे भगवान के ब्रह्म रूप की उपासना करते हैं। परमात्मा परम सत्ता का वह रूप है जिसमें वे सभी जीवों के हृदयों में निवास करते हैं। अष्टांग योग द्वारा भगवान की अनुभूति परमात्मा के रूप में की जाती है। भगवान परमेश्वर का वह स्वरूप है जिसमें वे साकार रूप में प्रकट होकर अपनी मधुर लीलाएँ प्रदर्शित करते हैं। भक्ति के मार्ग में परम प्रभु की अनुभूति भगवान के रूप में की जाती है। इसकी व्याख्या पहले भी श्लोक संख्या 12.2 में की गई है। इस अध्याय के 12वें श्लोक से श्रीकृष्ण ने भगवान के इन तीनों स्वरूपों का वर्णन किया है। 12वें श्लोक से 14वें में सर्वत्र व्यापक ब्रह्म की प्रकृति और श्लोक 15 में परमात्मा का स्वरूप और 17वें तथा 18वें श्लोक में भगवान के स्वरूप का उल्लेख किया गया है। अब इनमें से कौन-सी अनुभूति सर्वश्रेष्ठ और पूर्ण है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे जो भक्ति के माध्यम से उन्हें पुरुषोत्तम भगवान के रूप में जानते हैं वास्तव में उन्हें ही उनका पूर्ण ज्ञान होता है। भगवान की अनुभूति सर्वश्रेष्ठ है। इसका विस्तृत विवरण जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज ने भक्ति शतक में किया है।
तीन रूप श्रीकृष्ण को, वेदव्यास बताय।
ब्रह्म और परमात्मा, अरू भगवान कहाय।।
(भक्ति शतक-21)
"वेदव्यास के अनुसार परम सत्ता की अभिव्यक्ति ब्रह्म, परमात्मा और भगवान के रूप में होती है।" वे आगे इन तीन अभिव्यक्तियों का वर्णन करते हैं।
सर्वशक्ति संपन्न हो, शक्ति विकास न होय।
सत चित आनंद रूप जो, ब्रह्म कहावे सोय।।
(भक्ति शतक-22)
"ब्रह्म के रूप में भगवान की असीम शक्तियाँ प्रकट नहीं होती हैं। वह केवल शाश्वत ज्ञान और आनन्द प्रकट करता है।"
सर्वशक्ति संयुक्त हो, नाम रूप गुण होय।
लीला परिकर रहित हो, परमात्मा है सोय।।
(भक्ति शतक-23)
"परमात्मा के रूप में भगवान अपना रूप, नाम और गुण प्रकट करते हैं किन्तु वे लीलाएँ नहीं करते और उनके परिकर नहीं होते।"
सर्वशक्ति प्राकट्य हो, लीला विविध प्रकार।
विहरत परिकर संग जो, तेहि भगवान पुकार ।।
(भक्ति शतक-24)
परम पिता के उस स्वरूप को जिसमें वे अपनी सभी शक्तियाँ प्रकट करते हैं और अपने भक्तों के साथ अनेक प्रकार की लीलाएँ करते हैं, को भगवान कहते हैं। कृपालु जी महाराज के उपर्युक्त श्लोकों में स्पष्ट किया गया है कि ब्रह्म और परमात्मा की अभिव्यक्ति में भगवान अपनी सभी शक्तियाँ प्रकट नहीं करते। परम सत्ता की पूर्ण अनुभूति के स्वरूप में ही संभव भगवान हैं जिसमें वे अपने सभी नामों, रूपों, गुणों, लीलाओं धामों और संतों को प्रकट करते हैं। 12वें अध्याय के दूसरे श्लोक में एक ट्रेन के उदाहरण द्वारा इसकी व्याख्या की गयी है। इस प्रकार जो उन्हें भगवान के रूप में जानते हैं, उन्हें वास्तव में परम पुरुषोतम भगवान का पूर्ण ज्ञान हो जाता है।
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ |
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत || 20||
हे निष्पाप अर्जुन! मैंने तुम्हें वैदिक ग्रंथों का अति गुह्य सिद्धान्त समझाया है। इसे समझकर मनुष्य प्रबुद्ध हो जाता है और अपने प्रयासो में परिपूर्ण हो जाता है।
इस अध्याय का अंतिम श्लोक 'इति' शब्द से प्रारंभ होता है जिसका अर्थ 'ये' है। श्रीकृष्ण उल्लेख करते हैं कि "मैंने तुम्हें इन बीस श्लोकों में सभी वेदों का सार समझाया है। संसार की प्रकृति की विवेचना से आरंभ करते हुए मैंने तुम्हें पदार्थ और आत्मा के बीच के अंतर का बोध कराया और अंततः परम पुरुष का भी ज्ञान कराया। अब मैं तुम्हें आश्वस्त करता हूँ कि जो भी इस ज्ञान को अंगीकार करता है वह प्रबुद्ध हो जाता है। ऐसी आत्मा समस्त कर्तव्यों के अंतिम लक्ष्य भगवान को प्राप्त कर लेती है।"
।। श्रीमद्भगवत गीता पंचदश अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
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