॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhagavad Geeta Chapter 18
श्रीमद्भगवत गीता अष्टदश अध्याय
अध्याय अठारह: मोक्ष संन्यास योग
संन्यास में पूर्णता और शरणागति का योग
भगवद्गीता का अंतिम अध्याय सबसे बड़ा है और इसमें कई विषयों को सम्मिलित किया गया है। अर्जुन संन्यास और त्याग के संबंध में प्रश्न पूछता है। दोनों शब्द एक ही मूल के हैं जिसका अर्थ 'परित्याग करना' है। संन्यासी वह है जो गृहस्थ जीवन में प्रवेश नहीं करता और समाज को त्याग कर निरंतर साधना का अभ्यास करता है। त्यागी वह है जो कर्म में तो संलग्न रहता है लेकिन कर्म-फल का भोग करने की इच्छा का त्याग करता है। (यही गीता का मुख्य अभिप्राय है) श्रीकृष्ण इस दूसरे प्रकार के त्याग की संतुति करते हैं। वे कहते हैं कि यज्ञ, दान, तपस्या और कर्त्तव्य पालन संबंधी कार्यों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए क्योंकि ये ज्ञानी को शुद्ध करते हैं। इनका संपादन केवल कर्त्तव्य पालन की दृष्टि से करना चाहिए। इन कार्यों को कर्म फल की आसक्ति के बिना संपन्न किया जाता है।
तत्पश्चात् श्रीकृष्ण उन तीन हेतुओं का गहन विश्लेषण करते हैं जो कर्म, कर्म के तीन संघटक तत्त्व और कर्म फल की प्राप्ति के पाँच कारकों को प्रेरित करते हैं। वे प्रत्येक की तीन गुणों के अंतर्गत विवेचना करते हैं। वे कहते हैं कि जो अल्पज्ञानी है वे स्वयं को अपने कार्यों का कारण मानते हैं, लेकिन विशुद्ध बुद्धि युक्त जीवात्मायें स्वयं को अपने कार्यों का कर्ता और भोक्ता नहीं मानती हैं। अपने कर्मों के फलों से सदैव विरक्त रहने के कारण वे उनके बंधन में नहीं पड़ते। आगे इस अध्याय में यह बताया गया है कि हमारे उद्देश्यों और कर्मों में भिन्नता क्यों पाई जाती है? पुनः इसमें प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता की श्रेणियों का वर्णन किया गया है। फिर यह अध्याय बुद्धि, दृढ संकल्प और सुख के संबंध में भी समान विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसके बाद यह अध्याय उन लोगों का वर्णन करता है जिन्होंने आध्यात्मिक जीवन में पूर्णता की
अवस्था प्राप्त कर ली है और ब्रह्म में लीन हो गए हैं। इस अध्याय में यह भी कहा गया है कि ऐसे ब्रह्मज्ञानी भी भक्ति द्वारा ही अपनी पूर्णता को प्राप्त करते हैं। इसलिए भगवान के दिव्य व्यक्तित्त्व को केवल भक्ति द्वारा जाना जा सकता है।
इसके बाद श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि भगवान सभी जीवों के हृदय में स्थित हैं और उनके कर्मों के अनुसार वे उन्हें गति प्रदान करते हैं। यदि हम उनका स्मरण करते हुए अपने सभी कर्म उन्हें समर्पित करते हैं, तथा उनका आश्रय लेकर उन्हें अपना लक्ष्य बनाते हैं तब उनकी कृपा से हम सभी प्रकार की कठिनाइयों को पार कर लेंगे। लेकिन यदि हम अभिमान से प्रेरित होकर अपनी इच्छानुसार कर्म करते है तब हम सफलता प्राप्त नहीं कर पाएंगे।
अंत में श्रीकृष्ण यह प्रकट करते हैं कि सभी धर्मों का त्याग कर केवल भगवान की भक्ति द्वारा उनके समक्ष शरणागत होना ही गुह्यतम ज्ञान है। जो आडम्बर-हीन और भक्त नहीं हैं, यह ज्ञान उन्हें नहीं प्रदान करना चाहिए क्योंकि वे इसकी अनुचित व्याख्या करेंगे और इसका दुरूपयोग कर आवश्यक कर्मों का त्याग करेंगे। यदि हम यह गुह्य ज्ञान पात्र जीवात्मा को प्रदान करते है तब भगवान अति प्रसन्न होते हैं।
इसके बाद अर्जुन भगवान से कहता है कि उसका मोह नष्ट हो गया है और वह उनकी आज्ञाओं का पालन करने के लिए तत्पर है। अंत में संजय जो धृतराष्ट्र को श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हो रहे संवादों को सुना रहा था, व्यक्त करता है कि वह इन संवादों को सुनकर अत्यंत विस्मित है। जैसे ही वह भगवान के शब्दों और उनके विश्व रूप का स्मरण करता है, वैसे ही उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।भगवद्गीता का समापन करते हुए वह कहता है कि विजय सदैव वहीं होती है जहाँ भगवान और उसके भक्त होते हैं और इस प्रकार से सत्य, प्रभुता और समृद्धि भी वहीं होती है क्योंकि परम सत्य का प्रकाश सदैव असत्य के अंधकार को परास्त कर देता है।
अर्जुन उवाच |
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् |
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन || 1||
अर्जुन ने कहा-हे महाबाहु। मैं संन्यास और त्याग के संबंध में जानना चाहता हूँ। हे केशिनिषूदन, हे हृषीकेश! मैं दोनों के बीच का भेद जानने का भी इच्छुक हूँ।
अर्जुन, श्रीकृष्ण को 'केशिनिषूदन' कहकर संबोधित करता है जिसका अर्थ केशी नामक असुर का संहार करने वाला है। भगवान श्रीकृष्ण ने केशी नामक असुर का वध किया था जिसने एक पागल घोड़े का रूप धारण करके ब्रिजभूमि में आतंक मचा रखा था। संशय भी एक बे-लगाम घोड़े के समान है जो मन-मस्तिष्क में निरंतर दौड़ लगाता रहता है तथा भक्ति की फुलवारी को नष्ट कर देता है। अर्जुन इंगित करता है कि "जैसे आपने केशी नामक राक्षस का वध किया था उसी प्रकार मेरे मन-मस्तिष्क में उठने वाले संशय का भी दमन कीजिए।" अर्जुन का प्रश्न अत्यंत मार्मिक है। वह संन्यास की प्रकृति के बारे में जानना चाहता है जिसका अर्थ 'कर्मों का त्याग' करना है। वह त्याग की प्रकृति जिसका अर्थ 'कर्म-फलों को भोगने की इच्छाओं का त्याग करने से है' के संबंध में भी जानना चाहता है। आगे वह 'पृथक्' शब्द का प्रयोग करता है जिसका अर्थ भिन्नता है। अतः वह इन दोनों शब्दों के बीच के अंतर को भी जानना चाहता है।
अर्जुन श्रीकृष्ण को "हृषीकेश" कह कर संबोधित कर रहा है जिसका अर्थ "इन्द्रियों का स्वामी" है। अर्जुन का लक्ष्य महाविजय करना है, जिसे मन और इन्द्रियों को वश में करके ही संपूर्ण किया जा सकता है। यह वही विजय अभियान है जिससे पूर्ण शांति की अवस्था प्राप्त की जा सकती है। पुरुषोतम भगवान श्रीकृष्ण स्वयं इसके प्रमाण हैं।
इस संबंध में पिछले अध्यायों में भी वर्णन किया जा चुका है। श्लोक 5.13 तथा 9.28 में श्रीकृष्ण संन्यास के संबंध में और श्लोक 4.20 तथा 12.11 में त्याग के बारे में वर्णन कर चुके थे।लेकिन यहाँ पर वे इसे अन्य दृष्टिकोण से निरूपित कर रहे हैं। उदाहरणार्थ एक उद्यान के विभिन्न हिस्से हमारे मन में विभिन्न प्रकार के भाव उत्पन्न करते हैं जबकि पूरा उद्यान सम्मिलित रूप से एक अलग प्रकार का दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। भगवद्गीता भी कुछ इसी प्रकार से है। प्रत्येक अध्याय को एक योग रूप में निर्दिष्ट किया गया है तथा अठारहवें अध्याय को पूरी भगवद्गीता का सार कहा जा सकता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण संक्षिप्त रूप में मूलभूत सिद्धांतों तथा सत्य का वर्णन कर रहे हैं जिन्हें पिछले 17 अध्यायों में भी प्रस्तुत किया गया था। अब वे सबका सकल निष्कर्ष स्थापित करते हैं। संन्यास तथा विरक्ति के विषयों पर चर्चा करने के उपरांत भगवान श्रीकृष्ण प्रकृति के तीनों गुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं और यह बतलाते हैं कि किस प्रकार से ये जीवात्माओं के कार्यों को प्रभावित करते हैं। वे पुनः कहते हैं कि केवल सत्त्वगुण को पोषित करना ही उपयुक्त है। तत्पश्चात् वे यह निष्कर्ष देते हैं कि भगवान के प्रति अनन्य भक्ति ही हमारा परम कर्त्तव्य है और इसे प्राप्त करना ही मानव जीवन का लक्ष्य है।
श्रीभगवानुवाच |
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदु: |
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणा: || 2||
भगवान ने कहाः काम्य कर्मों के परित्याग को विद्वान लोग 'संन्यास' कहते हैं और सभी कर्मों के फलों के त्याग को बुद्धिमान लोग त्याग कहते है।
'कवयः' का अर्थ विद्वान लोग हैं। भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति कर्मों के त्याग को संन्यास कहते हैं। जो कर्मों का त्याग सांसारिक भोगों से विरक्त रहने के लिए करते हैं और संन्यासी जीवन में प्रवेश करते है, उन्हें कर्म संन्यासी कहा जाता है। वे कुछ नित्य कर्म करते रहते है, जैसे कि शरीर की देख भाल के लिए किए जाने वाले दैनिक कार्य। लेकिन वे धन सम्पदा, संतति, पद प्रतिष्ठा, सत्ता, इत्यादि से संबंधित कर्म त्याग देते हैं। ऐसे कार्य जीवात्मा को कर्मो के जाल में फंसा देते है और बार-बार पुनर्जन्म की ओर ले जाते हैं।
'विचक्षणाः' बुद्धिमान लोग होते हैं। श्रीकृष्ण यहाँ यह बताते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति त्याग पर बल देते हैं जिसका अर्थ आंतरिक संन्यास है। इसका तात्पर्य वैदिक शास्त्रों में उल्लिखित कर्त्तव्यों का त्याग करना नहीं है। बल्कि इसके विपरीत इनसे प्राप्त होने वाले फलों की इच्छा का त्याग करने से है। अतः फल की आसक्ति का त्याग करने की मनोवृति को त्याग कहा जाता है जबकि कर्मों का त्याग करना संन्यास कहलाती है। संन्यास और त्याग दोनों आत्मज्ञान के उचित विकल्प प्रतीत होते हैं। इन दोनों प्रकार के कर्मों में से श्रीकृष्ण किस कार्य की संस्तुति करते हैं? आने वाले श्लोकों में वे और अधिक स्पष्टता से इसकी व्याख्या करेंगे।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण: |
यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यमिति चापरे || 3||
कुछ मनीषी यह कहते हैं कि समस्त प्रकार के कर्मों को दोषपूर्ण मानते हुए उन्हें त्याग देना चाहिए। किन्तु अन्य विद्वान यह आग्रह करते हैं कि यज्ञ, दान, तथा तपस्या जैसे कर्मों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए।
सांख्य दर्शन के अनुयायी लौकिक जीवन को यथाशीघ्र और यथासंभव त्याग देने के पक्ष में हैं। उनका मत है कि समस्त कार्यों का परित्याग कर देना चाहिए क्योंकि ये सब इच्छाओं से प्रेरित होते हैं, जो आगे हमें जन्म और मृत्यु के चक्र में फंसाते हैं। वे यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि समस्त कार्य स्वाभाविक रूप से कुछ दोष युक्त होते हैं जैसे कि अप्रत्यक्ष हिंसा। उदाहरण के लिए यदि कोई अग्नि जलाता है तब सदैव यह संभावना बनी रहती है कि कीट इसमें जल सकते हैं। अतः ऐसे लोग केवल शरीर की देखभाल को छोड़कर सभी कर्मों से विरत रहने को उचित मानते हैं। वे यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि वेदों में भी दो परस्पर विरोधी निर्देश देखने को मिलते हैं।
यदि उनमें से कोई विशेष विधि हो तब सामान्य निर्देश को त्याग देना चाहिए। उदाहरण के लिए, वेद हमें यह निर्देश देते हैं-"मा हिस्स्यात् सर्वा भूतानि" अर्थात किसी भी जीवित प्राणी की हत्या न करो। यह एक सामान्य निर्देश है। वही वेद यह भी निर्देश देते हैं कि अग्नि यज्ञ सम्पन्न करो। यह एक विशेष निर्देश हैं। जिसमें संभावना बनी रहती है कि अग्नियज्ञ संपन्न करते समय कुछ कीट-आदि भूल से उसमें मर सकते हैं। परन्तु मीमांसक (मीमांसा दर्शन के अनुयायी) मानते हैं कि यज्ञ सम्पन्न करने के विशेष निर्देश यथावत् रहने चाहिए और इसका पालन अवश्य होना चाहिए भले ही इससे हिंसा न करने के समान्य निर्देश का विरोध होता हो। इसलिए मीमांसक कहते हैं कि हमें यज्ञ, दान तथा तपस्या का कभी त्याग नहीं करना चाहिए।
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम |
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविध: सम्प्रकीर्तित: || 4||
हे भरतश्रेष्ठ! अब त्याग के विषय में मेरा अंतिम वचन सुनो। हे मनुष्यों में सिंह! त्याग की तीन प्रकार की श्रेणियों का वर्णन किया गया है।
संन्यास का महत्त्व है क्योंकि यह उच्च अवस्था का आधार है। केवल निकृष्ट इच्छाओं का त्याग करके ही हम उच्च इच्छाओं को पोषित कर सकते हैं। इसी प्रकार निम्न प्रकार के कर्मो को त्याग कर ही हम स्वयं को उच्च कर्त्तव्यों हेतु समर्पित कर सकते हैं तथा ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ सकते हैं। पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा था कि त्याग की परिभाषा के संबंध में लोगों के भिन्न-भिन्न मत हैं। पिछले श्लोक में दो विरोधी विचारों का वर्णन करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब अपना मत प्रकट करते हैं जोकि निष्कर्षस्वरूप है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि अब वे त्याग को तीन श्रेणियों में (श्लोक 7 से 9 में वर्णित) विभक्त करते हुए विषय की व्याख्या करेंगे। उन्होंने अर्जुन को व्याघ्र कह कर संबोधित किया है जिसका अर्थ है 'मनुष्यों मे सिंह' क्योंकि संन्यास ग्रहण करना निडर मनुष्यों की पहचान है। संत कबीर कहते हैं
तीर तलवार से जो लडै सो शूरवीर नहीं होय।
माया तज भक्ति करै, शूर कहावे सोय।
"तीर तलवारों के साथ लड़ने से कोई निडर नही बनता। केवल वही मनुष्य बहादुर है जो माया को त्याग कर भक्ति में तल्लीन रहता है।"
यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् |
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् || 5||
यज्ञ, दान, तथा तपस्या का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए। इन्हें निश्चित रूप से सम्पन्न करना चाहिए। यज्ञ, दान तथा तपस्या महात्माओं को भी शुद्ध करते हैं।
यहाँ पर श्रीकृष्ण निष्कर्ष सुनाते हुए कहते हैं कि हमें उन कार्यो का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए जो हमें उन्नत करते हैं और मानव जाति के लिए लाभप्रद होते हैं। ऐसे कार्य अगर समुचित चेतना में संपन्न किए जाये तब ये हमें कर्म बंधन में नहीं डालते, अपितु हमें आध्यात्मिक उन्नति में सहायता करते हैं। यह समझने के लिए हम एक (कैटरपिलर) का उदाहरण लेते हैं। अपनी काया-पलट करने के लिए वह एक कोश (ककुन) बुनता है और वह स्वयं को इसमें बंद कर लेता है। बाद में जब वह तितली बन जाता है तब वह कोश को भेदकर आकाश में उड़ जाता है। इस संसार में हमारी स्थिति भी ऐसी है। उस कैटरपिलर के समान हम वर्तमान में इस संसार में आसक्त हैं और सदगुणों से वंचित है। अपने उत्थान हेतु हमें इस प्रकार के कार्यों को सम्पन्न करना चाहिए जो हमारे भीतर आंतरिक परिवर्तन कर सकें। यज्ञ, दान और तप कर्म भी ऐसे ही कार्य हैं। कभी-कभी ये कर्म बंधन में डालने वाले भी प्रतीत होते हैं, लेकिन ये कैटरपिलर के कोश के समान हैं। ये हमारी अशुद्धता को नष्ट कर हमें भीतर से पवित्र बनाते हैं तथा इस भौतिक संसार के चक्र को तोड़ने में सहायता करते हैं। अतः श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह उपदेश देते हैं कि इस प्रकार के कार्यों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए। अपितु उचित मनोवृत्ति के साथ हमें इनका निष्पादन करना चाहिए।
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च |
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् || 6||
ये सब कार्य आसक्ति और फल की कामना से रहित होकर संपन्न करने चाहिए। हे अर्जुन! यह मेरा स्पष्ट और अंतिम निर्णय है।
यज्ञ, दान तथा तपस्या को परमपिता भगवान की भक्ति के रूप में संपन्न करना चाहिए। यदि ऐसी चेतना उत्पन्न नहीं होती तब इन कार्यों को अपना कर्त्तव्य मानकर बिना किसी कामना के सम्पन्न करना चाहिए। एक माँ अपने सुखों को त्याग कर अपनी सन्तति की देखभाल करती है। वह बच्चे को अपने स्तन से दूध पिलाती है तथा बच्चे का पालन पोषण करती है। उसे अपने बच्चे का पालन पोषण करने से कुछ हानि नहीं होती बल्कि ऐसा करके वह अपने मातृत्व को पूर्ण करती है। उसी प्रकार से गाय दिनभर घास चरती रहती है, जिससे उसके थनों में दूध आता है। और इस दूध को वह अपने बछड़े को पिला देती है। गाय इस प्रकार अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करके हीन नहीं हो जाती बल्कि लोग उसे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। चूँकि ये सभी कार्य नि:स्वार्थ भावना से किए जाते है इसलिए इन्हें पवित्र माना जाता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि ज्ञानवान लोगों को इसी प्रकार की निःस्वार्थ भावना से कल्याणकारी कार्य करने चाहिए। अब वे आगे के तीन श्लोकों में त्याग की तीन श्रेणियों का वर्णन करेंगे।
नियतस्य तु सन्न्यास: कर्मणो नोपपद्यते |
मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तित: || 7||
नियत कर्मों को कभी त्यागना नहीं चाहिए। मोहवशात् नियत कार्यों के त्याग को तमोगुणी कहा जाता है।
निषिद्ध कर्मों का त्याग उचित है और कर्मफलों की इच्छा का त्याग भी उचित है। किंतु नियत कर्त्तव्यों का त्याग कभी उचित नहीं कहा जा सकता। निर्दिष्ट कर्त्तव्यों के पालन से मन को शुद्ध करने में सहायता मिलती है और यह हमें तमोगुण से रजोगुण में ले जाते हैं। इनका परित्याग करना मूर्खतापूर्ण कृत्य है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि नियत कर्तव्यों का परित्याग करने वाले मनुष्य को तमोगुणी कहा जाता है।
संसार में हम सबके कुछ अनिवार्य कर्त्तव्य हैं। इनका पालन करने से मनुष्यों को कई गुण विकसित करने में सहायता मिलती है, जैसे कि उत्तरदायित्व का निर्वहन करना, मन और इन्द्रियों पर संयम रखना, कष्ट सहन करना और परिश्रम करना इत्यादि। अज्ञानता के कारण किया गया परित्याग आत्मा को पतन की ओर ले जाता है। ये नियत कर्त्तव्य व्यक्ति की चेतना के स्तर के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। एक साधारण मनुष्य के लिए धन अर्जित करना, परिवार का पालन पोषण करना, स्नान करना, भोजन ग्रहण करना इत्यादि नियत कर्त्तव्य होते हैं। जब कोई मनुष्य थोड़ा उन्नत हो जाता है तब, ये कर्त्तव्य परिवर्तित हो जाते हैं। उन्नत आत्मा के लिए यज्ञ, दान और तप ही कर्त्तव्य हैं।
दु:खमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्यजेत् |
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् || 8||
नियत कर्त्तव्यों को कष्टप्रद समझकर किया गया त्याग रजोगुणी कहलाता है। ऐसा त्याग कभी लाभदायक या फलप्रद नहीं होता।
जीवन में उन्नति करने का अर्थ उत्तरदायित्वों का बढ़ना है, उनका त्याग करना नहीं है। अनुभवहीन लोग प्रायः इस सत्य को समझ नहीं पाते। दुःखो से छुटकारा पाने की इच्छा और पलायनवादी प्रवृत्ति साधकों को उत्तरदायित्वों का त्याग करने को प्रेरित करती है। जीवन निर्वाह कभी कष्ट रहित नहीं होता। उन्नत साधक वे नहीं होते, जो कुछ न करने के कारण शांत रहते हैं। बल्कि इसके विपरीत यदि उन्हें कोई बड़ा कार्यभार सौंपा जाता है तब वे उसको बिना विचलित हुए संपन्न करते हैं। श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह घोषित करते हैं कि अपने नियत कर्त्तव्यों को क्लेशप्रद समझकर त्याग देना रजोगुणी त्याग कहा जाता है।
प्रारम्भ से ही भगवद्गीता में कर्म करने का उपदेश दिया गया है। अर्जुन अपने कर्त्तव्य को अप्रिय और कष्टदायक समझता है जिसके परिणामस्वरूप वह युद्ध से पलायन करना चाहता है। श्रीकृष्ण इसे अज्ञानता और दुर्बलता कहते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन के भीतर आंतरिक परिवर्तन लाने हेतु उसे प्रोत्साहित करते हैं जिससे कि वह अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें। वे अर्जुन को प्रेरित करते हैं ताकि वह अपने ज्ञान चक्षुओं को विकसित कर सके। भगवद्गीता को सुन कर उसने अपने क्षत्रिय धर्म को नहीं बदला बल्कि उसने अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करने के लिए अपनी चेतना को विकसित किया। इससे पूर्व उसका ध्येय अपनी सुख-सुविधा और यश के लिए हस्तिनापुर का राज्य प्राप्त करना था। बाद में उसने भगवान की भक्ति रूपी परम कर्तव्य का पालन किया।
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन |
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्त्विको मत: || 9||
जब कोई व्यक्ति कर्मों का निष्पादन कर्त्तव्य समझ कर और फल की आसक्ति से रहित होकर करता है तब उसका त्याग सत्त्वगुणी कहलाता है।
श्रीकृष्ण अब श्रेष्ठ त्याग का वर्णन करते हैं जिसमें हम फल की कामना किए बिना निरंतर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते रहते है। इसे वे सर्वोत्कृष्ट त्याग के रूप में चित्रित करते हैं जो सत्त्वगुण में स्थित होकर किया जाता है। आध्यात्मिक उत्थान के लिए त्याग अनिवार्य है। लेकिन समस्या यह है कि त्याग के बारे में लोगों की धारणा सही नहीं है और वे इसे केवल बाह्य कर्मों का त्याग करना ही मानते हैं। ऐसा त्याग पाखण्ड की ओर ले जाता है जिसमें कोई व्यक्ति बाह्य रूप से तो त्याग का चोला ओढ़ता है लेकिन आंतरिक रूप से विषयों का चिंतन करता रहता है। भारत में कई साधु लोग इसी श्रेणी में आते हैं जिन्होंने संसार का त्याग भवत्प्राप्ति के लिए किया। किन्तु उनका मन तब तक विषयों से पूर्णतः विरक्त नहीं हुआ था और इसलिए उन्हें वैराग्य का फल प्राप्त नहीं हुआ। फलस्वरूप उन्हें यह ज्ञात हुआ कि उनके कर्म उन्हें उच्च आध्यात्मिक जीवन की ओर अग्रसर नहीं कर पाये। यह दोष उनके निर्णय में था। उन्होंने पहले त्याग किया और बाद में आंतरिक विरक्ति का प्रयास किया। इस श्लोक के उपदेश के अनुसार हमें विपरीत विधि का पालन करना है अर्थात् पहले आंतरिक विरक्ति विकसित करनी चाहिए और फिर बाह्य त्याग करना चाहिए।
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते |
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय: || 10||
वे जो न तो अप्रिय कर्म को टालते हैं और न ही कर्म को प्रिय जानकर उसमें लिप्त होते हैं ऐसे मनुष्य वास्तव में त्यागी होते हैं। वे सात्त्विक गुणों से संपन्न होते है और कर्म की प्रकृति के संबंध में उनमें कोई संशय नहीं होता।
सात्त्विक अवस्था में स्थित लोग प्रतिकूल परिस्थितियों में दुःखी नहीं होते और न ही अनुकूल परिस्थितियों के प्रति आसक्त होते हैं। वे सभी परिस्थितियों में अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं और न तो वे सुखद परिस्थिति में प्रसन्नता व्यक्त करते हैं और न ही कष्टमय जीवन में खिन्नता प्रकट करते हैं। वे उस सूखे पत्ते के समान नहीं होते जो हवा के झोकों से इधर-उधर उड़ते रहते हैं बल्कि वे समुद्र में स्थित उन सरकंडों के समान होते हैं जो प्रत्येक लहर को समान रूप से सहन करते हैं। अपने समभाव को बनाए रखते हुए क्रोध, लालच, ईर्ष्या और मोह के वश में न होकर वे परिस्थिति रूपी लहरों को अपने आस-पास उठते और गिरते हुए देखते रहते हैं। बाल गंगाधर तिलक भगवद्गीता के ज्ञाता और प्रसिद्ध कर्मयोगी थे। महात्मा गांधी से पूर्व वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के मुखिया थे। जब उनसे पूछा गया कि भारत के स्वतंत्र होने पर वह कौन-सा पद ग्रहण करना चाहेंगे-प्रधानमंत्री या विदेशमंत्री का? उन्होंने उत्तर दिया कि "मेरी इच्छा विभिन्न तर्क पद्धतियों पर पुस्तक लिखने की है। मैं इसे पूरा करूँगा।" एक बार पुलिस ने उन्हें शांति भंग करने के आरोप में बंदी बना लिया। तब उन्होंने अपने मित्र को कहा कि वह यह ज्ञात करें कि उन्हें किस धारा के अंतर्गत बन्दी बनाया गया और कारागार में आकर उन्हें इस संबंध में सूचित करें। जब उनका मित्र लौट कर आया तब वे कारागार के कक्ष में गहन निद्रा में थे। एक अन्य अवसर पर जब वे अपने कार्यालय में थे तब उनके लिपिक ने उन्हें सूचित किया कि उनका बड़ा पुत्र गंभीर रूप से बीमार है। भावनाओं में बहने के बजाय उन्होंने लिपिक से डॉक्टर को बुलाने को कहा। आधे घंटे के पश्चात् उनके मित्र ने वहाँ आकर उन्हें वही सूचना दी। तब उन्होंने कहा कि "मैंने उसे देखने के लिए डॉक्टर को बुलाने के लिए कह दिया है। इसके अतिरिक्त मैं और क्या कर सकता हूँ?" इन घटनाओं से विदित होता है कि वे अप्रिय परिस्थितियों में भी धैर्यवान बने रहे। वे अपने कार्यों को कुशलतापूर्वक संपन्न करने में इसलिए सफल रहे क्योंकि वे आंतरिक रूप से शांत चित्त थे। यदि वे निराश हो जाते तब वे कारागार में कैसे चैन से सो पाते अथवा अपने काम में कैसे ध्यान दे पाते।
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषत: |
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते || 11||
देहधारी जीवों के लिए पूर्ण रूप से कर्मों का परित्याग करना असंभव है लेकिन जो कर्मफलों का परित्याग करते हैं, वे वास्तव में त्यागी कहलाते हैं।
यहाँ पर यह तर्क भी प्रस्तुत किया जा सकता है कि कर्मफलों का त्याग करने से श्रेष्ठ यह है कि सभी कार्यों का त्याग कर दिया जाये क्योंकि इससे ध्यान में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होगी। श्रीकृष्ण इसे अस्वीकृत करते हुए कहते हैं कि देहधारी जीवात्माओं के लिए अकर्मण्य रहना असंभव है। सभी को शरीर की देखभाल के लिए मूलभूत कार्यों जैसे खाने, सोने, स्नान इत्यादि का निष्पादन करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त खड़ा होना, बैठना, सोचना, चलना, वार्तालाप करना इत्यादि को टाला नहीं जा सकता। यदि हम बाह्य कर्मों के परित्याग को त्याग समझते हैं तब वास्तव में कोई भी त्यागी नहीं हो सकता। तथापि श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि यदि कोई कर्मफलों के प्रति आसक्ति का त्याग करता है तभी उसे पूर्ण त्यागी माना जा सकता है।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मण: फलम् |
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित् || 12||
जो विषयों के प्रति आसक्त होते हैं उन्हें मृत्यु के पश्चात् भी सुखद, दुःखद और मिश्रित तीन प्रकार के कर्मफल प्राप्त होते हैं लेकिन जो अपने कर्मफलों का त्याग करते हैं, उन्हें न तो इस लोक में और न ही मरणोपरांत ऐसे कर्मफल भोगने पड़ते हैं।
मृत्यु के उपरांत आत्मा तीन प्रकार के फल प्राप्त करती है-(1) इष्टम्-अर्थात् स्वर्गलोक के सुखद अनुभव। (2) अनिष्टम्-अर्थात् नरक लोक के दुःखों का अनुभव। (3) मिश्रम्- अर्थात् पृथ्वी लोक पर मानव के रूप में मिश्रित अनुभव। वे जो पुण्य कार्य करते हैं उन्हें स्वर्ग का लोक प्राप्त होता है तथा जो पापमय कार्य करते हैं उन्हें नरक लोकों में भेजा जाता है। जो दोनों प्रकार के मिश्रित कार्य करते हैं उन्हें मानव के रूप में पृथ्वी लोक पर वापस भेज दिया जाता है। यह सब तभी होता है जब कर्मों का निष्पादन कर्मफल की कामना से किया जाता है। जब कर्म फल की इच्छाओं का परित्याग कर दिया जाता है और कार्यों का संपादन केवल भगवान के प्रति कर्त्तव्य पालन की दृष्टि से किया जाता है तब कर्मों के ऐसे प्रतिफल प्राप्त नहीं होते। इस संसार में भी इसी प्रकार का नियम मान्य है। यदि एक व्यक्ति दूसरे को मारता है तो इसे हत्या माना जाता है तथा जिसके लिए मृत्युदंड भी दिया जा सकता है। हालांकि यदि सरकार किसी कुख्यात हत्यारे अथवा चोर को जीवित या मृत प्रस्तुत करने की घोषणा करती है तब कानून की दृष्टि में ऐसे व्यक्ति की हत्या को अपराध नहीं माना जाता बल्कि ऐसे व्यक्ति को मारने वाले को सरकार द्वारा पुरस्कृत किया जाता है तथा हत्या करने वाले को सम्मानित भी किया जाता है। समान रूप से जब हम स्वार्थ का परित्याग कर अपने कर्मों का संपादन करते हैं तब हमें कर्मों के फलों को भोगना नहीं पड़ता।
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे |
साङ् ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् || 13||
हे अर्जुन! अब मुझसे सांख्य दर्शन के सिद्धांतानुसार कर्मों को संपूर्ण करने में पाँच हेतुओं को समझो। वे यह बोध कराते हैं कि कर्मों के फलों को कैसे नियंत्रित किया जाए।
यह जान लेने पर कि फल की आसक्ति के बिना भी कर्म किया जा सकता है, एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि 'कर्म कैसे बनता है?" श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वे अब इसी प्रश्न का उत्तर देने जा रहे हैं क्योंकि यह ज्ञान कर्म फलों से विरक्ति प्रदान करने में सहायता करेगा। साथ ही वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि कर्म के इन पाँच अंगो का वर्णन सांख्य दर्शन में भी किया जा चुका है। सांख्य दर्शन कपिल मुनि द्वारा प्रतिपादित है। कपिल मुनि भगवान के अवतार थे तथा पृथ्वी पर कर्दम मुनि और देवहूति के पुत्र के रूप में अवतरित हुए थे। उन्होंने जिस सांख्य दर्शन को प्रतिपादित किया वह विश्लेषणात्मक तर्क शक्ति पर आधारित है। यह शरीर में तथा संसार में पाए जाने वाले तत्त्वों के विश्लेषण द्वारा आत्मज्ञान कराता है। यह कर्म के विश्लेषण द्वारा उसके कारण और परिणाम का भी बोध कराता है।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् |
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् || 14||
शरीर, कर्ता, विभिन्न इन्द्रियाँ, अनेक प्रकार की चेष्टाएँ और विधि अर्थात् भगवान-ये पाँच कर्म के कारक तत्त्व हैं।
इस श्लोक में 'अधिष्ठानम्' का अर्थ 'निवास स्थान' है तथा इसका तात्पर्य शरीर से है क्योंकि कर्म केवल तभी किए जा सकते हैं जब आत्मा शरीर में स्थित हो। कर्ता का अर्थ है-कार्य को करने वाला और यह आत्मा का बोध कराता है। आत्मा स्वयं कर्मों का सम्पादन नहीं करती बल्कि यह प्राण शक्ति सहित मन, शरीर तथा बुद्धि के तंत्र को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। अहम् के प्रभाव के कारण यह अपनी पहचान अपने कर्मों के साथ करती है। इसलिए शरीर द्वारा सम्पन्न किये गये कार्यों के लिए आत्मा उत्तरदायी होती है और इसे कर्ता और ज्ञाता दोनों कहा जाता है। प्रश्नोपनिषद् में कहा गया है-"एष हि द्रिष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते (4.9)" अर्थात् यह आत्मा ही है जो देखती है, स्पर्श करती है, सुनती है, अनुभव करती है, स्वाद लेती है, सोचती और समझती है। इसलिए आत्मा को ज्ञाता और कर्मों का कर्त्ता दोनों माना गया है। ब्रह्मसूत्र में भी कहा गया है-"ज्ञोऽत एव (2.3.18)" अर्थात् यह सत्य है कि आत्मा ज्ञाता है। ब्रह्मसूत्र में पुनः वर्णन किया गया है, “कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् (2.3.33)" अर्थात् आत्मा कर्मों की कर्ता है और शास्त्रों द्वारा इसकी पुष्टि भी की गई है।" उपर्युक्त उद्धरणों से यह स्पष्ट होता है कि आत्मा भी कर्मों की संपति में एक कारक है। कर्मों का निष्पादन करने के लिए इन्द्रियों का प्रयोग किया जाता है। इन्द्रियों के बिना आत्मा स्वाद, स्पर्श, देखने, सुनने, सूंघने और ध्वनि इत्यादि से संबंधित क्रियाओं का अनुभव नहीं कर सकती। इसके अतिरिक्त हाथ, पाँव, मुँह, लिंग और गुदा-ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। इनकी सहायता से ही आत्मा विभिन्न प्रकार के कार्य संपूर्ण करती है। इस प्रकार इन्द्रियाँ भी कार्यों को पूर्ण करने के कारकों में सम्मिलित हैं। कर्म के सभी उपादानों के होने पर भी यदि कोई चेष्टा नहीं करता तब कोई भी कर्म नहीं किया जा सकता। वास्तव में प्रयास करना अति महत्त्वपूर्ण है जिसका चाणक्य पंडित ने अपने नीति सूत्र में उल्लेख किया है, "उत्साहवतां शत्रवोपि वशीभवन्ति" अर्थात् पर्याप्त प्रयास द्वारा दुर्भाग्य भी सौभाग्य में परिवर्तित हो जाता है। "निरुत्वाछाय दैवं पतिता" अर्थात् "बिना उचित् प्रयास के सौभाग्य भी दुर्भाग्य में परिवर्तित हो जाता है। अतः चेष्टा भी कर्म का एक अन्य घटक है। परमात्मा शरीर में साक्षी के रूप में निवास करता है। मनुष्य के पूर्व कर्मों के आधार पर वह विभिन्न प्रकार के लोगो को कर्मों का संपादन करने के लिए भिन्न-भिन्न योग्यताएँ प्रदान करता है जिससे कि वे कर्म कर सकें। इसे कोई भगवान का विध न भी कह सकता है। उदाहरण के लिए कुछ लोग ऐसी कुशलता से संपन्न होते हैं जिससे वे अपार धन सम्पदा अर्जित कर सकते हैं। जटिल परिस्थितियों में भी वे अपनी विलक्षण प्रतिभा के बल पर लोगों को चकित कर देते हैं। मुश्किलों का सामना करते हुए भी वे भाग्यशाली रहते हैं। ऐसी विलक्षण बुद्धि उन्हें भगवान द्वारा प्रदान की जाती है। इसी प्रकार से खेल, संगीत, कला, साहित्य इत्यादि क्षेत्रों से संबद्ध अन्य लोग भी भगवान द्वारा प्रदत्त विशिष्ट प्रतिभा से संपन्न होते हैं। यह भगवान ही हैं जो लोगों को उनके पूर्व कर्मों के अनुसार विशेष योग्यताएँ प्रदान करते हैं। अतः उन्हें भी कर्मों के लिए उत्तरदायी कारकों में एक कारक के रूप में कहा गया है।
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नर: |
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतव: || 15||
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु य: |
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान स पश्यति दुर्मति: || 16||
शरीर, मन या वाणी से जो भी कार्य संपन्न किया जाता है भले ही वह उचित हो या अनुचित, उसके ये पाँच सहायक कारक हैं। वे जो इसे नहीं समझते और केवल आत्मा को ही कर्ता मानते हैं, वे वस्तुओं को उनके वास्तविक रूप में नहीं देख सकते।
कर्म तीन प्रकार के हैं-कायिक (वे कार्य जो शरीर द्वारा संपन्न किए जाते हैं), वाचिक (वे कर्म जो वाणी द्वारा संपादित होते हैं) तथा मानसिक (वे कार्य जो मन से किये जाते हैं।) इनमें से प्रत्येक श्रेणी के पुण्य या पापमय कार्य के लिए पिछले श्लोक में वर्णित पाँच कारक उत्तरदायी होते हैं। अहम् के कारण हम स्वयं को अपने कार्यों का कर्ता मानने लगते हैं। उदाहरणार्थ “मैंने यह उपलब्धि प्राप्त की।", "मैंने यह कार्य संपूर्ण किया।", "मैं यह करूंगा।" कर्तापन के भ्रम के कारण हम इस प्रकार कहते हैं। इस ज्ञान को प्रकट करने का श्रीकृष्ण का उद्देश्य आत्मा के अहम् को नष्ट करना है। इसलिए वे कहते हैं कि जो केवल आत्मा को कर्म के कारक के रूप में देखते हैं वे वस्तुओं को उनके वास्तविक रूप में नहीं देखते। यदि भगवान द्वारा आत्मा को शरीर नहीं दिया जाता तब यह कुछ नहीं कर सकती थी। यदि भगवान शरीर को ऊर्जा प्रदान नहीं करते तब यह भी कुछ नहीं कर सकता था। केनोपनिषद् में वर्णन किया गया है
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते।
"ब्रह्म का वर्णन वाणी द्वारा नहीं किया जा सकता बल्कि उसकी प्रेरणा से वाणी वर्णन करने की शक्ति प्राप्त करती है।"
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्
(केनोपनिषद्-1.5)
"ब्रह्म को मन और बुद्धि से नहीं जाना जा सकता, उनकी शक्ति द्वारा मन और बुद्धि कार्य करते हैं"
यच्चक्षुषा न पश्यति येन चढूंषि पश्यति
(केनोपनिषद्-1.6)
"ब्रह्म को नेत्रों द्वारा देखा नहीं जा सकता, उसकी प्रेरणा से आंखें देखती हैं।"
यच्छ्रोत्रेण न श्रुणोति येन श्रोत्रमिदम् श्रुतम्
(केनोपनिषद्-1.7)
"ब्रह्म को कानों द्वारा सुना नहीं जा सकता, उसकी शक्ति के कारण कान सुनते हैं।"
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते
(केनोपनिषद्-1.8)
"ब्रह्म प्राण शक्ति से क्रियाशील नहीं होता, उसकी प्रेरणा से प्राण शक्ति कार्य करती हैं।"
इसका अर्थ यह नहीं है कि कर्मो के निष्पादन में आत्मा की कोई भूमिका नहीं होती है। यह आत्मा किसी कार चालक के समान है जो गाड़ी के स्टीयरिंग व्हील को नियंत्रित करते हुए यह निर्णय करता है कि कार को किस दिशा में कितनी गति से चलाना है। समान रूप से आत्मा भी शरीर, मन और बुद्धि के कर्मों को नियंत्रित करती है। लेकिन वह स्वयं किसी कार्य को संपन्न नहीं करती। यदि हम स्वयं को अपने समस्त कर्मों को संपन्न करने का एकमात्र कारण मानते हैं तब हम स्वयं को अपने समस्त कर्मों का भोक्ता बनाना चाहेंगे। लेकिन जब हम स्वयं को कर्तापन के भाव से मुक्त कर लेते हैं तब हम अपने प्रयासों का श्रेय भगवान को देते हैं और उनके द्वारा प्रदान किए गए सुख साधनों को हम उनकी कृपा के रूप में स्वीकार करते हैं। तब हमें यह अनुभव होता है कि हम अपने कर्मों के भोक्ता नहीं हैं और सभी कर्म भगवान के सुख के लिए हैं। अगले श्लोक में किए गए वर्णन के अनुसार यह ज्ञान हमें यज्ञ, दान और तपस्या जैसे सभी कर्मों को श्रद्धा और भक्ति भाव से संपन्न कर इन्हें भगवान को समर्पित करने में सहायता करता है।
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते |
हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते || 17||
जो कर्तापन के अहंकार से मुक्त होते हैं और जिनकी बुद्धि मोहग्रस्त नहीं है, वे जीवों को मारते हुए भी न तो जीवों को मारते हैं और न कर्मों के बंधन में पड़ते हैं।
पिछले श्लोक में मोहित बुद्धि का वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण अब विशुद्ध बुद्धि का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि विशुद्ध बुद्धि से युक्त मनुष्य कर्ता होने के मिथ्या अभिमान से मुक्त रहते हैं। वे अपने कर्मों का फल भी नहीं भोगना चाहते इसलिए वे जो कर्म करते हैं उसमें आसक्त नहीं होते।
पहले भी श्लोक 5.10 में उन्होंने कहा था कि जो कर्म-फलों से विरक्त रहते हैं वे कभी पाप से ग्रस्त नहीं होते। भौतिक दृष्टि से वे कार्य में संलग्न प्रतीत होते हैं लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से वे आसक्ति से मुक्त होते हैं और इसलिए वे कर्म फलों के बंधनो में नहीं पड़ते।
मुगलकाल में रहीम खानखाना प्रसिद्ध संत कवि थे। जन्म से मुसलमान होने पर भी वे भगवान कृष्ण के परम भक्त थे। जब भी वे भिक्षा देते तब वे अपनी आंखे झुका लेते थे। उनकी इस आदत के संबंध में एक रोचक घटना है। यह कहा जाता है कि संत तुलसी दास ने रहीम द्वारा इस प्रकार से दान देने के बारे में सुन रखा था और उन्होंने उनसे पूछाः
ऐसी देनी देन ज्यों, कित सीखे हो सैन
ज्यों-ज्यों कर ऊंच्यो करो, त्यों-त्यों नीचे नैन
"श्रीमान्, तुमने इस प्रकार से भिक्षा देने की कला कहाँ से सीखी? तुम्हारे हाथ उतने ही ऊपर की ओर होते हैं जितनी नीचे तुम्हारी दृष्टि।" रहीम ने इसका अति विनम्रता से उत्तर दिया
देनहार कोई और है, भेजत है दिन-रैन
लोग भरम हम पर करें, याते नीचे नैन
"देने वाला कोई और है जो दिन रात देता है किन्तु संसार इसका श्रेय मुझे देता है इसलिए मैं अपनी आँखों को नीचे झुका लेता हूँ।" यह बोध होना कि हम अपनी उपलब्धियों के लिए उत्तरदायी नहीं हैं, हमें कर्तापन के भाव से मुक्त करता है।
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना |
करणं कर्म कर्तेति त्रिविध: कर्मसंग्रह: || 18||
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता-ये कर्म को प्रेरित करने वाले तीन कारक हैं। करण,कर्म और कर्ता-ये कर्म के तीन घटक हैं।
कर्मयोग के अंतर्गत श्रीकृष्ण ने इसके अंगों का वर्णन किया था। उन्होंने कर्मों के फलों की व्याख्या की थी और उनसे मुक्त होने की प्रक्रिया का वर्णन किया था। अब वे कर्मों को प्रेरित करने वाले तीन कारकों की चर्चा करते हैं। ये ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता हैं। संयुक्त रूप से इन्हें 'ज्ञानत्रिपुटी' अर्थात् ज्ञान की त्रिमूर्ति कहा जाता है।
'ज्ञान' कर्म का प्रेरक है। यह ज्ञाता को 'ज्ञेय' की जानकारी देता है। यह त्रिवेणी संयुक्त रूप से कर्म को प्रेरित करती है। उदाहरणार्थ नियोक्ता द्वारा दिए जाने वाले धन का ज्ञान कर्मचारी को उत्साह से काम करने के लिए प्रेरित करता है। विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में स्वर्ण की खोज ने श्रमिकों में सोने की खानों में प्रवास करने की उद्विग्नता उत्पन्न की। ओलंपिक में पदक प्राप्त करने के महत्त्व का ज्ञान खिलाड़ियों को वर्षों तक अभ्यास करने के लिए प्रेरित करता है। ज्ञान और कार्य की गुणवत्ता का सीधा संबंध होता है।
उदाहरणार्थ किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से प्राप्त की गई डिग्री का जीविका प्राप्त करने में अत्यंत महत्त्व होता है। प्रतिष्ठित निगम और कम्पनियाँ जानती हैं कि उच्च शिक्षा प्राप्त लोग अधिक कुशलता से कार्य कर सकते हैं। इसलिए कई संस्थान अपने कर्मचारियों की कार्यकुशलता को विकसित करने के लिए निवेश करते हैं। यथा सेमिनारों, संगोष्ठियों और कार्यशालाओं में अपने कर्मचारियों को भेजकर उनके कार्य की गुणवत्ता, कार्य क्षमता और कार्यकुशलता को और अधिक बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।
इसकी दूसरी श्रेणी को 'कर्मत्रिपुटी' का नाम दिया गया है जिसमें कर्ता, (कार्य करने वाला) करण (कर्म के उपादान) और स्वयं कर्म सम्मिलित है। संयुक्त रूप से कर्म की यह त्रिपुटी कर्म तत्त्व का निर्माण करती है। कर्ता 'कर्म के उपादानों' का प्रयोग कर्म को सम्पन्न करने के लिए करता है। यह विश्लेषण करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब कर्म को तीन गुणों से संबंद्ध बताते हैं जिससे यह समझाया जा सके कि हम लोग क्यों एक दूसरे से भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं।
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदत: |
प्रोच्यते गुणसङ् ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि || 19||
सांख्य दर्शन में ज्ञान, कर्म और कर्ता की तीन श्रेणियों का उल्लेख किया गया है और तदनुसार प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार इनका भेद निरूपित किया गया है। इन्हें सुनो।
श्रीकृष्ण एक बार पुनः प्रकृति के तीन गुणों का वर्णन करते हैं। 14वें अध्याय में उन्होंने इन तीन गुणों का परिचय दिया था और बताया था कि किस प्रकार से ये आत्मा को जन्म और मृत्यु के संसार में बांधे रखते हैं। फिर 17वें अध्याय में उन्होंने यह बताया था कि किस प्रकार से ये तीनों गुण लोगों की श्रद्धा और उनके भोजन को प्रभावित करते हैं। उन्होंने यज्ञ, दान और तपस्या की तीन श्रेणियों की भी व्याख्या की थी। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण तीन गुणों के अनुसार तीन प्रकार के ज्ञान, कर्म और कर्ता की विवेचना करेंगे।
भारतीय दर्शन शास्त्र की छः विचार पद्धतियों में से एक सांख्य दर्शन जिसे पुरुष प्रकृतिवाद भी कहा जाता है, को प्रकृति के विश्लेषण में प्रमाण में स्वीकार किया जाता है। इसमें आत्मा को पुरुष कहा जाता है। इसमें पुरुष बहुत्ववाद का सिद्धांत है। प्रकृति एक भौतिक शक्ति है जिसमें सभी भौतिक वस्तुएँ सम्मिलित हैं।
सांख्य दर्शन में वर्णित है कि पुरुष द्वारा प्रकृति का भोग करने की इच्छा ही सभी दुःखों का मूल कारण है। जब यह भोग प्रवृत्ति शांत हो जाती है तब पुरुष माया शक्ति के बन्धनों से मुक्त हो जाता है और शाश्वत आनंद पाता है। सांख्य दर्शन भगवान के अस्तित्त्व को स्वीकार नहीं करती। अतः यह परम सत्य को जानने के लिए पर्याप्त नहीं है तथापि प्रकृति (भौतिक शक्ति) के विषय में श्रीकृष्ण इसे प्रामाणिक ग्रंथ के रूप में देखते हैं।
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते |
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानम् विद्धि सात्त्विकम् || 20||
जिस ज्ञान द्वारा व्यक्ति सभी जीवों में एक अविभाजित अविनाशी सत्ता को देखता है उसे सात्त्विक ज्ञान कहते हैं।
सृष्टि भौतिक पदार्थों और विभिन्न प्रकार के जीवों का संगम है। किन्तु इस विविधता का आधार परम भगवान ही हैं। जो मनुष्य इस ज्ञान दृष्टि से संपन्न हैं वे सृष्टि के निर्माण के पीछे उसी प्रकार एकीकृत शक्ति को देखते हैं जिस प्रकार से एक विद्युत् अभियंता विभिन्न प्रकार के विद्युत् उपकरणों में एक समान विद्युत् को प्रवाहित होते देखता है और एक सुनार एक ही सोने को विभिन्न प्रकार के आभूषणों में देखता है। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन किया गया है
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्
(श्रीमद्भागवतम्-1.2.11)
"परम सत्य को जानने वाले कहते हैं कि सृष्टि में केवल एक ही सत्ता है।" चैतन्य महाप्रभु ने चार मापदण्डों के आधार पर श्रीकृष्ण को भगवान कहते हुए उन्हें 'अद्वय ज्ञान तत्त्व' (जिसके समान दूसरा कोई नहीं) कह कर संबोधित किया है।
1. सजातीय भेद शून्यः श्रीकृष्ण अपने ही विभिन्न रूपों जैसे राम, शिव, विष्णु इत्यादि में एक समान ही हैं अर्थात् ये एक ही भगवान की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। सभी आत्माओं में भी एक श्रीकृष्ण हैं। आत्मा उनका अंश है, जिस प्रकार आग की लपटें आग के लघु अंश हैं।
2. विजातीय भेद शून्यः माया भगवान से पृथक् है। वह जड़ है जबकि भगवान चेतन हैं। तथापि माया भगवान की शक्ति है और शक्ति अपने शक्तिमान से ठीक उसी प्रकार अभिन्न होती है जिस प्रकार से अग्नि की शक्ति, गर्मी और प्रकाश उससे भिन्न नहीं हैं।
3. स्वगत भेद शून्यः इसका तात्पर्य भगवान के शरीर के विभिन्न अंगों का उनसे पृथक् न होने से है। उनके शरीर का कोई भी अंग अन्य अंगों का कार्य भी कर सकता है। ब्रह्मसंहिता में वर्णन है
अङानि यस्य सकलेन्द्रियवृत्ति मन्ति
पश्यन्ति पान्ति कलयन्ति चिरम् जगन्ति । (ब्रह्मसंहिता-5.32)
"भगवान अपने प्रत्येक अंग से देख, सूंघ, खा और सोच भी सकते हैं।" इस प्रकार से भगवान के शरीर के सभी अंग उनसे पृथक् नहीं है।
4. स्वयं सिद्धः (किसी अन्य सत्ता की सहायता की आवश्यकता न होना) माया और आत्मा दोनों अपने अस्तित्त्व के लिए भगवान पर निर्भर हैं। अगर वे इन्हें शक्ति प्रदान न करते तब इन दोनों का अस्तित्त्व समाप्त हो गया होता। अन्य शब्दों में भगवान परम स्वतंत्र हैं और उन्हें अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए किसी अन्य सत्ता की आवश्यकता नहीं पड़ती।
परम पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण उपर्युक्त चारों विशेषताओं से परिपूर्ण हैं और इस प्रकार वे 'अद्वय ज्ञान तत्त्व' हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वे सृष्टि में व्याप्त सभी वस्तुओं में विद्यमान हैं। इस ज्ञान में स्थिर होकर जब हम संपूर्ण सृष्टि को भगवान के साथ एकीकृत रूप में देखते हैं तब ऐसा ज्ञान सात्त्विक कहलाता है और इस ज्ञान पर आधारित प्रेम पक्षपातपूर्ण या राष्ट्रीय न होकर सार्वभौमिक होता है।
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् |
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् || 21||
जिस ज्ञान द्वारा कोई मनुष्य भिन्न-भिन्न शरीरों में अनेक जीवित प्राणियों को पृथक्-पृथक् और असंबद्ध रूप में देखता है उसे राजसी माना जाता है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण अब राजसी ज्ञान के संबंध में बता रहे हैं। राजसी ज्ञान से परिपूर्ण जीव संसार को भगवान के साथ संबद्ध हुए नहीं देख पाता अपितु वह प्राणियों को उनके जातिगत भेदभाव के साथ वर्ग, पंथ, धर्म, राष्ट्रीयता आदि के आधार पर अनेक के रूप में देखता है। इस प्रकार का ज्ञान मानव समाज को कई अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित करता है। जब ज्ञानों का एकीकरण हो जाता है तब यह सत्त्वगुणी कहलाता है और जब ज्ञान विभाजित हो जाता है तब इसे रजोगुणी कहा जाता है।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् |
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् || 22||
वह ज्ञान जिसमें मनुष्य ऐसी धारणा रखता है मानो वह संपूर्ण के सदृश हो और जो ज्ञान न तो किसी कारण या सत्य पर आधारित है उसे तामसिक ज्ञान कहते हैं।
जब बुद्धि तमोगुण के प्रभाव से कुंठित हो जाती है तब यह निकृष्ट अवधारणा में इस प्रकार से निष्ठ हो जाती है जैसे कि वही पूर्ण सत्य है। ऐसी विचारधारा के कारण लोग प्रायः कटट्रवादी बन जाते हैं और जो वे समझते हैं उसे ही सत्य मानने लगते हैं। उनका ज्ञान न तो तर्कसंगत और न ही शास्त्रों या सत्य पर आधारित होता है। किन्तु फिर भी वे अपने विचारों को दूसरों पर थोपना चाहते हैं। मानव सभ्यता के इतिहास में ऐसे अनेक उन्मादियों को देखा गया है जो स्वयं को भगवान का संदेशवाहक, अनुयायी और उनके विधान का रक्षक बनने का ढोंग करते रहे हैं। वे दूसरों को धर्म परिवर्तन के लिए फुसलाते हैं और अपने समान मति वाले अनुयायी ढूंढ लेते हैं। इस प्रकार से वे 'एक अंधा दूसरे अंधे को मार्ग दिखाने' वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं। तथापि भगवान और धर्म की सेवा के नाम पर वे समाज में विघटन उत्पन्न करते हैं और भाईचारे की भावना में बाधा उत्पन्न करते हैं।
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषत: कृतम् |
अफलप्रेप्सुना कर्म यतत्सात्त्विकमुच्यते || 23||
जो कर्म शास्त्रों के अनुसार है, राग और द्वेष की भावना से रहित और फल की कामना के बिना संपन्न किया जाता है, वह सत्त्वगुण प्रकृति का होता है।
तीन प्रकार के ज्ञान की विवेचना करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब तीन प्रकार के कर्मों का वर्णन करते हैं। इतिहास में कई सामाजिक वैज्ञानिकों और दार्शनिकों ने उचित कर्म के संबंध में अपना-अपना मत प्रकट किया है। उनमें से कुछ के महत्त्वपूर्ण मत और दर्शन का निम्न प्रकार से उल्लेख किया जा रहा है
1. ग्रीस के एपिक्युरियन (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) के अनुसार "खाना, पीना और आनंद भोगना ही उचित कर्म था।"
2. इंग्लैंड के हौब्स (1588-1679) तथा फ्रांस के हैल्वेटिस (1715-1771) का दर्शन और अधिक परिष्कृत था। उन्होंने कहा कि यदि सब स्वार्थी बन जाते हैं और दूसरों का ध्यान नहीं रखते तब संसार में अराजकता फैल जाएगी। इसलिए उन्होंने कहा कि अपने ज्ञान की तुष्टि के साथ-साथ हमें अन्य लोगों का भी ध्यान रखना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि पति अस्वस्थ है तो पत्नी को उसकी देखभाल करनी चाहिए और यदि पत्नी अस्वस्थ है तो पति को उसका ध्यान रखना चाहिए। लेकिन उन मामलों में जहाँ दूसरों की सहायता करने से हमारे निजी हितों का ह्रास होता है तब उनके अनुसार ऐसी स्थिति में अपने निजी हितों को प्राथमिकता प्रदान करनी चाहिए।
3. जोसफ बटलर (1692-1752) का दर्शन इनसे श्रेष्ठ था। उन्होंने कहा कि अपने हितों की सिद्धि करके दूसरों की सेवा का विचार अनुचित था। परोपकार करना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। सिंहनी स्वयं भूखी रहकर भी अपने शावकों को दूध पिलाती है। इसलिए दूसरों की सेवा को प्राथमिकता देनी चाहिए। तथापि बटलर की यह अवधारणा भौतिक दु:खों की निवृत्ति तक ही सीमित थी। यदि कोई व्यक्ति भूखा हो तो उसे भोजन खिलाया जा सकता है किन्तु इससे समस्या का पूर्ण निवारण नहीं होता क्योंकि वह व्यक्ति छः घंटे बाद पुनः भूख से व्याकुल हो जाएगा।
4. बटलर के पश्चात् जेरेमी बेन्थम (1748-1832) तथा जॉन स्टुअर्ट मिल (1806-1873) का आगमन हुआ। उन्होंने एक अन्य सिद्धांत की अनुशंसा करते हुए कहा कि वही कार्य किया जाए जो बहुसंख्यक लोगों के हित में हो। उन्होंने उचित अनुचित आचरण का निर्धारण करने के लिए बहुमत को स्वीकार करने का सुझाव दिया। लेकिन यदि बहुमत गलत हो तब यह दर्शन असफल सिद्ध हो जाएगा। क्योंकि एक हजार अज्ञानी मिलकर भी एक विद्वान के विचारों की गुणवत्ता की समानता नहीं कर सकते।
कुछ दार्शनिकों ने यह कहा की कि अपने अंतःकरण की आवाज को सुनो। उन्होंने सुझाव दिया कि उचित आचरण निर्धारित करने का यह उत्तम मार्ग है। किन्तु समस्या यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का अंत:करण विभिन्न प्रकार का होता है। एक ही परिवार के दो बच्चों के अलग-अलग नैतिक मूल्य और उनका अंत:करण भिन्न-भिन्न होगा। साथ ही किसी भी व्यक्ति का अंत:करण परिवर्तित होता रहता है। यदि एक हत्यारे से पूछा जाए कि लोगों की हत्या करके क्या उसे बुरा लगता है? वह उत्तर देता है, "आरंभ में मुझे बुरा लगता था किन्तु बाद में ऐसा करना मुझे मच्छरों को मारने के समान मोक्ष-संन्यास योग नगण्य लगने लगा। ऐसा करने से मुझे कोई पश्चात्ताप नहीं होता।" उचित कार्य के संबंध में महाभारत बताती है
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
श्रुतिः स्मृति सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।।
(महाभारत-5.15.17)
"यदि तुम किसी के बुरे व्यवहार की आशा नहीं करते तब तुम्हें दूसरों के साथ भी वैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। सदैव यह सुनिश्चित करो कि तुम्हारा आचरण शास्त्रों के अनुसार है।" दूसरों के साथ भी वैसा व्यवहार करो जैसे आचरण की तुम उनसे अपेक्षा करते हो। बाइबिल में भी वर्णन है-"दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा कि वे तुम्हारे साथ करते हैं।" (लुका 6.31) यहाँ श्रीकृष्ण भी यही कहते हैं कि शास्त्रों के अनुसार किए गये कार्य सात्त्विक है। वे कहते हैं कि ऐसा कार्य राग और द्वेष की भावना और कर्मफल की इच्छा से रहित होकर करना चाहिए।
यत्तुकामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुन: |
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् || 24||
जो कार्य स्वार्थ की सिद्धि से प्रेरित होकर, अभिमान और तनाव ग्रस्त होकर किए जाते हैं वे रजोगुणी प्रकृति के होते हैं।
रजोगुण की प्रवृत्ति इन्द्रिय सुखों का अधिक से अधिक भोग करने की तीव्र उत्कंठा उत्पन्न करती है। इसलिए रजोगुण के प्रभाव में किया गया कार्य अनेक प्रकार की अभिलाषाओं से प्रेरित होता है। इसमें कठिन परिश्रम अनिवार्य है और यह शारीरिक और मानसिक थकान देता है। रजोगुणी कार्यों का उदाहरण कॉर्पोरेट जगत है। कर्मचारी लगातार तनाव की शिकायत करते हैं। ऐसा इस लिए होता है क्योंकि उनके कार्य सत्ता, प्रतिष्ठा और धन प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रेरित होते हैं। नेताओं, अभिभावकों और व्यवसायिक लोगों के कार्य भी रजोगुण के प्रभाव में किए जाते हैं।
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् |
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते || 25||
जो कार्य मोहवश और अपनी क्षमता का आंकलन, परिणाम, हानि और दूसरों की क्षति पर विचार किए बिना आरम्भ किए जाते हैं, वे तमोगुणी कहलाते हैं।
जिनकी बुद्धि अज्ञानता से आच्छादित होती है, वे उचित और अनुचित के संबंध में असावधान रहते हैं। वे केवल स्वयं में और अपने निजी स्वार्थों में रुचि रखते हैं। वे धन और संसाधनों का दुरुपयोग करने में तथा दूसरों को कष्ट देने में संकोच नहीं करते। श्रीकृष्ण ने इसके लिए 'क्षयम्' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ 'क्षीण' है। तामसिक कार्य किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य और शक्ति के क्षीण होने का कारण बनते हैं। यह प्रयास, समय और संसाधनों का दुरुपयोग है। जुआ, चोरी, भ्रष्टाचार, मदिरापान इत्यादि इसके उदाहरण हैं।
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित: |
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते || 26||
वह जो अहंकार और मोह से रहित होता है, उत्साह और दृढ़ निश्चय से युक्त होता है, ऐसे कर्ता को सत्त्वगुणी कहा जाता है।
श्रीकृष्ण ने पहले ही कहा था कि कर्म के तीन संघटक हैं-ज्ञान, कर्म और कर्ता। इनमें से ज्ञान और कर्म की श्रेणियों का वर्णन करने के पश्चात् अब वे कर्ताओं की तीन श्रेणियों का वर्णन करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि सत्त्वगुण में स्थित लोग अकर्मण्य नहीं होते बल्कि वे उत्साह और दृढ़ निश्चय के साथ कार्य करते हैं। उनके द्वारा संपन्न किए गए कार्य उपयुक्त चेतना से युक्त होते हैं।
सात्त्विक कर्ता 'मुक्तसङ्ग' होते हैं अर्थात् वे संसारिक पदार्थों से आसक्त नहीं होते और न ही वे यह विश्वास करते हैं कि संसारिक पदार्थ आत्मा को तृप्त कर सकते हैं। इसलिए वे महान उद्देश्यों के लिए कार्य करते हैं। चूंकि उनकी मनोभावना शुद्ध होती है, अतः वे अपने प्रयत्नों में उत्साह और धृति (दृढ़ निश्चय) से युक्त होते हैं। अपनी इस मनोवृति के कारण कार्य करते हुए उनकी ऊर्जा का कम से कम क्षय होता है। इस प्रकार से वे अपने महान उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अथक परिश्रम करने में समर्थ होते हैं। यद्यपि वे महान कार्य करते हैं तथापि वे 'अनहंवादी' अर्थात् अहंकार से मुक्त रहते हैं और अपनी सफलताओं का श्रेय भगवान को देते हैं।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचि: |
हर्षशोकान्वित: कर्ता राजस: परिकीर्तित: || 27||
जब कोई कर्ता कर्म-फल की लालसा, लोभ, हिंसक प्रवृत्ति, अशुद्धता, हर्ष एवं शोक से प्रेरित होकर कार्य करता है, उसे रजोगुणी कहा जाता है।
यहाँ राजसिक कर्ता का वर्णन किया गया है। सात्त्विक कर्त्ता आध्यात्मिक विकास की इच्छा से प्रेरित होते हैं किन्तु राजसिक कर्ता भौतिक लाभों के लिए गहन अभिलाषा रखते हैं। वे यह अनुभव नहीं करते कि संसार में सब कुछ अस्थायी है और एक दिन ये सब पीछे छूट जाएगा। राग के कारण वे शुद्ध मनोभावना से संपन्न नहीं होते। उन्हें यह विश्वास होता है कि वे जो सुख चाहते हैं, वे सुख उन्हें संसार के पदार्थों में मिल सकते हैं। इसलिए जो उन्हें प्राप्त होता है उससे वे संतुष्ट नहीं होते। वे 'लुब्ध:' होते हैं अर्थात् उनमें और अधिक पाने की लालसा बनी रहती है। जब वे यह देखते हैं कि अन्य लोग उनसे अधिक सफलता प्राप्त कर रहे है, तब वे 'हिंसात्मक' हो जाते हैं अर्थात् ईष्यापूर्वक दूसरों को कष्ट पहुंचाने में संकोच नहीं करते एवं अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु वे कभी-कभी नैतिकता का त्याग करते हैं और इसलिए वे 'अशुचि' अर्थात् अपवित्र हो जाते हैं। जब उनकी इच्छाओं की पूर्ति होती है तब वे हर्षित हो जाते हैं। जब वे निरुत्साहित हो जाते हैं तब दुःखी हो जाते हैं और इस प्रकार से उनका जीवन 'हर्षशोकान्वित' अर्थात् हर्ष और शोक से मिश्रित हो जाता है।
अयुक्त: प्राकृत: स्तब्ध: शठो नैष्कृतिकोऽलस: |
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते || 28||
जो कर्ता अनुशासनहीन, अशिष्ट, हठी, कपटी, आलसी तथा निराश होता है और टाल मटोल करता है, वह तमोगुणी कहलाता है।
श्रीकृष्ण अब तामसिक कर्ता का निरूपण करते हैं। तामसिक प्रवृत्ति के मनुष्यों का मन नकारात्मक विचार से कलुषित रहता है और इस प्रकार वे 'अयुक्तः' अर्थात् अनुशासनहीन हो जाते हैं। शास्त्रों में उचित और अनुचित आचरण के लिए निर्देश दिए गए हैं। परन्तु अज्ञानता के द्वारा प्रेरित कर्त्ता 'स्तब्धः' होते हैं क्योंकि वे तर्क बुद्धि को अवरुद्ध कर देते हैं। इसलिए वे प्रायः शठ: अर्थात् धुर्त और 'नैष्कृतिको' (नीच) होते हैं। वे प्राकृतः (अशिष्ट) होते हैं क्योंकि वे अपनी पशु प्रवृत्ति को नियंत्रित नहीं करते। यद्यपि उन्हें कर्तव्यों का निर्वहन करना होता है किन्तु वे प्रयास को श्रम साध्य और कष्टदायक समझते हैं। इसलिए वे 'अलसः' अर्थात् आलसी और 'दीर्घ-सूत्री' अर्थात् टालमटोल करने वाले होते हैं। उनके विचार किसी अन्य की तुलना में उन्हें अधिक प्रभावित करते हैं जो उन्हें दुःखी और हताश करते हैं। श्रीमद्भागवतम् में भी इस प्रकार से वर्णन किया गया है
सात्त्विकः कारकोऽसंङ्गी रागान्धो राजसः स्मृतः।
तामसः स्मृतिविभ्रष्टो निर्गुणो मदपाश्रयः
(श्रीमदभागवतम्-11.25.26)
"जो कर्ता अनासक्त होते हैं वे सात्त्विक प्रकृति के होते हैं। वे जो केवल कर्म और कर्म फलों के प्रति आसक्त होते हैं वे राजसिक कहलाते हैं और जो विवेक रहित होते हैं वे तामसिक कहलाते हैं। लेकिन जो कर्ता मेरे शरणागत होता है वह इन तीनों गुणों से परे हो जाता है।"
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु |
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय || 29||
हे अर्जुन! अब मैं प्रकृति के तीनों गुणों के अनुसार तुम्हें विभिन्न प्रकार की बुद्धि तथा वृति के विषय में विस्तार से बता रहा हूँ। तुम उसे सुनो।
श्रीकृष्ण ने पिछले नौ श्लोकों में कर्म के संघटकों का वर्णन किया और यह बताया कि तीन घटकों में प्रत्येक की तीन श्रेणियाँ हैं। अब वे कार्य की गुणवत्ता और मात्रा को प्रभावित करने वाले दो कारकों का वर्णन करते हैं जो न केवल कर्म को प्रेरित करते हैं बल्कि उसे नियंत्रित भी करते हैं। ये कारक हैं-बुद्धि और धृति। बुद्धि विवेक शक्ति है जो उचित और अनुचित में भेद करती है। धृति मार्ग में आनेवाली कठिनाइयों और बाधाओं के पश्चात् भी कार्य को संपूर्ण करने के लिए अडिग रहने का दृढ़ संकल्प है। प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार इन दोनों की तीन श्रेणियाँ हैं। श्रीकृष्ण अब इन दोनों गुणों और इनके तीन प्रकार के वर्गीकरण की चर्चा करते हैं।
प्रवृत्तिंच निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये |
बन्धं मोक्षं च या वेत्तिबुद्धि: सा पार्थ सात्त्विकी || 30||
हे पृथापुत्र! जिसके द्वारा यह जाना जाता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित है, क्या कर्त्तव्य है और क्या अकरणीय है, किससे भयभीत होना चाहिए और किससे भयभीत नहीं होना चाहिए, और क्या बंधन में डालने वाला है और क्या मुक्ति देने वाला है वह बुद्धि सात्त्विकी है।
हम निरन्तर निर्णय करने हेतु अपनी स्वतंत्र इच्छा का प्रयोग करते हैं और हमारे समेकित विकल्प यह निर्धारित करते हैं कि हम क्या बनेंगे। रॉबर्ट फ्रॉस्ट ने अपनी कविता 'रोड नॉट टेकन' में इसका सजीव ढंग से वर्णन किया है
मैं आहें भर कर कहूँगा,
आज से युगों-युगों तक कहीं,
वन में दो अलग-अलग मार्ग और मैं था,
मैंने उस मार्ग को चुना,
जिस पर कम लोग यात्रा करते थे
और इसी से यह परिणाम हुआ।
उपर्युक्त विकल्प का चयन करने के लिए विवेक शक्ति का होना आवश्यक है। अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश विवेक शक्ति से युक्त करने के लिए दिया गया था। आरम्भ में अर्जुन अपने कर्त्तव्य पालन के संबंध में उलझन में था। अपने स्वजनों के प्रति अत्यधिक मोह के कारण वह उचित और अनुचित का निर्णय कर पाने में किंकर्तव्यविमूढ था। अपनी दुर्बलता और भय के कारण वह भगवान के शरणागत होता है और उनसे प्रार्थना करता है कि वे उसे उचित कर्त्तव्य का ज्ञान प्रदान करें। भगवान के दिव्य ज्ञान द्वारा अर्जुन को उस समय विवेक शक्ति विकसित करने में सहायता प्राप्त हुई। तब उन्होंने उसे अपना अंतिम निर्णय सुनाया-"मैंने तुम्हें वह ज्ञान बताया है जो सभी रहस्यों में गुह्यतम है। इसका गहनता से मंथन करो और फिर अपनी इच्छा अनुसार तुम्हें जो उचित लगे वही करो।" (श्लोक 18.63)
सत्त्वगुण बुद्धि को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करता है इसलिए उचित और अनुचित कर्म और विचारों में भेद करना सरल हो जाता है। सात्त्विक बुद्धि वह है जो हमें यह बोध और किस प्रकार के कार्यो का त्याग करना चाहिए। यह हमारी कमियों के कारण का बोध कराती है और उन्हें दूर करने का उपाय भी बताती है।
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च |
अयथावत्प्रजानाति बुद्धि: सा पार्थ राजसी || 31||
हे पार्थ! जो धर्म और अधर्म तथा उचित और अनुचित आचरण के बीच भेद करने में भ्रमित रहती है। ऐसी बुद्धि राजसिक कहलाती है।
आसक्ति के कारण राजसिक बुद्धि मिश्रित हो जाती है। कई बार यह स्पष्ट देखती है लेकिन निजी स्वार्थ आड़े आने पर यह दूषित और भ्रमित हो जाती है। उदाहरणार्थ कुछ लोग अपने व्यवसाय में अति प्रवीण होते हैं किन्तु पारिवारिक संबंधों में उनका आचरण बचकाना होता है। वे अपनी जीविका के मोर्चे पर तो सफल होते हैं घरेलू मोर्चे पर असफल रहते हैं क्योंकि उनका मोह उन्हें उचित निर्णय लेने और सदाचरण का पालन करने से रोकता है। राग और द्वेष, पसंद और नापसंद से ग्रसित राजसी बुद्धि उचित निर्णय लेने में असमर्थ होती है। यह महत्त्वपूर्ण और तुच्छ, स्थायी और अस्थायी तथा मूल्यवान और निरर्थक के बीच उलझी रहती है।
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता |
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी || 32||
जो बुद्धि अंधकार से आच्छादित रहती है, अधर्म में धर्म, असत्य में सत्य की कल्पना करती है, वह तामसिक प्रकृति की होती है।
तामसिक बुद्धि उत्कृष्ट ज्ञान से रहित होती है, इसलिए यह अधर्म को धर्म समझती है। उदाहरणार्थ एक शराबी शराब से मिलने वाले नशे में आसक्त हो जाता है। इसलिए उसकी मलिन बुद्धि अंधकार के कुहरे से ढक जाती है और वह अपनी दुर्गति को अनुभव नहीं कर पाता और शराब की अगली बोतल का क्रय करने के लिए अपनी संपत्ति को बेचने में चिंता नहीं करता। तामसिक बुद्धि के कारण उसकी निर्णय लेने और तर्क वितर्क करने की क्षमता नष्ट हो जाती है।
धृत्या यया धारयते मन:प्राणेन्द्रियक्रिया: |
योगेनाव्यभिचारिण्या धृति: सा पार्थ सात्त्विकी || 33||
जो धृति योग से विकसित होती है और जो मन, प्राण शक्ति और इन्द्रियों को स्थिर रखती है उसे सात्त्विक धृति (संकल्प) कहते हैं।
धृति अर्थात् संकल्प, मन और बुद्धि की आंतरिक शक्ति है जिसके कारण हम बाधाओं के बाबजूद अपने मार्ग पर अडिग रहते हैं। धृति हमारी दृष्टि को लक्ष्य की ओर केन्द्रित करती है और हमारी यात्रा में आने वाली दुर्गम बाधाओं को पार करने के लिए शरीर, मन और बुद्धि की प्रच्छन्न शक्तियों को एकत्रित करती है। श्रीकृष्ण अब तीन प्रकार के संकल्प की व्याख्या करते हैं। योग के अभ्यास द्वारा मन अनुशासित हो जाता है तथा शरीर और इन्द्रियों को वश में करने की क्षमता विकसित करता है। दृढ़ संकल्प तब विकसित होता है जब कोई इन्द्रियों का दमन और प्राण को अनुशासित करना तथा मन पर नियंत्रण रखना सीख लेता है। मन को नियंत्रित करना सात्त्विक धृति है।
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन |
प्रसङ्गेन फलाकाङ् क्षी धृति: सा पार्थ राजसी || 34||
वह धृति जिसके द्वारा मनुष्य आसक्ति और कर्म फल की इच्छा से कर्तव्य पालन करता है, सुख और धन प्राप्ति में लिप्त रहता है, वह राजसी धृति कहलाती है।
दृढ़ता केवल योगियों में ही नहीं पायी जाती। सांसारिक लोग भी अपने कार्यों को दृढ़ता से करते हैं। किंतु उन जीवात्माओं का दृढ़-संकल्प सांसरिक उन्नति से प्रसन्न होने की इच्छा से प्रेरित होता है। उनका ध्यान इन्द्रियों के सुखों को पाने और धन अर्जन की ओर केंद्रित होता है क्योंकि धन इन सब प्रकार के भौतिक सुखों को प्राप्त करने का एकमात्र साधन है। इसलिए ऐसे लोग अपने पूर्ण जीवन धन में आसक्त रहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि फल भोगने की इच्छाओं से प्रेरित धृति राजसी प्रकृति की होती है।
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च |
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृति: सा पार्थ तामसी || 35||
दुर्बद्धिपूर्ण संकल्प जिसमें निंदा, भय, दुःख, मोह, निराशा और कपट का त्याग नहीं किया जाता उसे तमोगुणी घृति कहा जाता है।
अज्ञानी और अहंकारी लोगों में भी दृढ़ता पायी जाती है। लेकिन यह एक प्रकार का हठ है जो भय, निराशा और अहंकार के कारण उत्पन्न होती है। उदाहरणार्थ कुछ लोग भय से ग्रस्त होते हैं और वे इसके इतनी दृढ़तापूर्वक जकड़े रहते हैं, जैसे कि यह उनके व्यक्तित्त्व का अविभाज्य अंग है। कुछ लोग अपने जीवन को इसलिए नारकीय बना देते हैं क्योंकि वे अपनी अतीत की निराशाओं के साथ संसक्त रहते हैं। वे जानते हैं कि इससे उनके जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा किन्तु फिर भी वे उन्हें भुलाना नहीं चाहते। कुछ लोग ऐसे लोगों से झगड़ा करने में लगे रहते हैं जो उनके अहम् को ठेस पहुँचाते हैं और उनके विचारों के विरूद्ध चलते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन विषयों पर आधारित धृति अर्थात् संकल्प तमोगुणी होता है।
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ |
अभ्यासाद्रमते यत्र दु:खान्तं च निगच्छति || 36||
हे अर्जुन! अब तुम मुझसे तीन प्रकार के सुखों के संबंध में सुनो जिनसे देहधारी आत्मा आनन्द प्राप्त करती है और सभी दुःखों के नाश तक भी पहुँच सकती है।
पिछले श्लोकों में श्रीकृष्ण ने कर्म के घटकों की चर्चा की थी। इसके पश्चात् उन्होंने उन कारकों का वर्णन किया जो कर्म को प्रेरित और नियंत्रित करते हैं। अब वे कर्म के लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। सांसारिक आत्माओं के कर्मो का परम लक्ष्य सुख की खोज है। सभी सुखी रहना चाहते हैं और अपने कार्यों से पूर्णता, शांति और संतोष की खोज करते हैं। परन्तु प्रत्येक व्यक्ति के कर्म में उनके संघटक कारकों का अंतर होता है, इसी कारण उनके द्वारा सम्पन्न कार्यों से प्राप्त होने वाले सुखों की श्रेणी में भी अंतर होता है। श्रीकृष्ण अब सुख की तीन श्रेणियों का वर्णन करते हैं।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् |
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् || 37||
जो आरम्भ में विष के समान लगता है लेकिन अंत में जो अमृत के समान हो जाता है उसे सात्त्विक सुख कहते हैं। यह शुद्ध बुद्धि से उत्पन्न होता है जो आत्म ज्ञान में स्थित होती है।
आंवला स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। इसमें दस संतरों से भी अधिक विटामिन-सी होता है। लेकिन बच्चे इसे नापसंद करते हैं क्योंकि इसका स्वाद कड़वा होता है। उत्तर भारत में माता-पिता बच्चों को इसका सेवन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और एक ऐसी कहावत भी है-“आंवले का खाया और बड़ों का कहा, बाद में पता चलता है।" अर्थात् “आंवले का सेवन और बड़ों का परामर्श" इन दोनों का लाभ भविष्य में ज्ञात होता है। वास्तव में आंवला खाने के कुछ क्षणों के पश्चात् उसका कड़वापन समाप्त हो जाता है और मिठास का अनुभव होता है। प्राकृतिक रूप से विटामिन-सी का सेवन करने से निःसंदेह दीर्घकालीन लाभ प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि सात्त्विक सुख भी ऐसा ही होता है जो आरम्भ में कड़वा लगता है और अंत में सुख के रूप में इसका स्वाद अमृत बन जाता है। वेदों में सात्त्विक सुखों का 'श्रेय' के रूप में उल्लेख किया गया है जोकि वर्तमान में दुःखद और अंततः लाभकारी होता है। इसके विपरीत 'प्रेय' है जो आरम्भ में सुखद लेकिन अंततः हानिकारक होता है। 'श्रेय' और 'प्रेय' के संबंध में कठोपनिषद् में वर्णन है
अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषम् सिनीतः।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते
(कठोपनिषद्-1.2.1-2)
"दो प्रकार के मार्ग होते हैं-एक लाभप्रद और दूसरा सुखद। ये दोनों मनुष्य को अलग दिशाओं की ओर ले जाते हैं। सुखद मार्ग प्रारम्भ में आनन्द प्रदान करता है लेकिन इसका अंत पीड़ादायक होता है। अज्ञानी लोग सुख और विनाश के पाश में बंधते हैं लेकिन बुद्धिमान इस धोखे में नहीं आते और लाभप्रद मार्ग का चयन करते हैं और अंततः सुख प्राप्त करते हैं।
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् |
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् || 38||
इन्द्रियों द्वारा उसके विषयों के संपर्क से उत्पन्न सुख को रजोगुणी कहा जाता है। ऐसा सुख आरम्भ में अमृत के सदृश लगता है और अंततः विष जैसा हो जाता है।
राजसिक सुख इन्द्रियों और उसके विषयों के संपर्क से उत्पन्न होता है। लेकिन ऐसा आनंद अल्प काल तक रहता है और परिणामस्वरूप अपने पीछे लोभ, चिंता आदि दोष छोड़ जाता है और माया के आवरण का और अधिक गाढ़ा कर देता है। संसारिक क्षेत्र में भी सफलता के लिए राजसिक सुखों का त्याग करना अनिवार्य है। क्षणभंगुर सुख से दूर रहने की चेतावनी के रूप में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू अपने पुस्तकालय में रखी हुई पुस्तक में लिखित 'स्टॉपिंग बाई वुड्स ऑन ए स्नोइंग इवनिंग' कविता की पंक्तियों का अक्सर अपयोग करते थे।
वन सुन्दर, अंधकारमय और घने हैं,
परन्तु मुझे कई वचनों को पूरा करना है,
और विश्राम करने से पूर्व मुझे कई लक्ष्यों को प्राप्त करना है,
और विश्राम करने से पूर्व मुझे कई लक्ष्यों को प्राप्त करना है,
नित्य और दिव्य आनन्द का मार्ग भोग नहीं है बल्कि त्याग, तपस्या और अनुशासन है।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मन: |
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् || 39||
जो सुख आदि से अंत तक आत्मा को आच्छादित करता है और जो निद्रा, आलस्य और असावधानी से उत्पन्न होता है वह तामसिक सुख कहलाता है।
तामसिक सुख निम्न कोटि का और प्रारंभ से अंत तक मूर्खता से परिपूर्ण होते हैं। यह आत्मा को अज्ञानता के अंधकार में धकेलता है। चूँकि इनसे सुख की थोड़ी सी अनुभूति होती है अतः लोग इसमें आसक्त हो जाते हैं। इसी कारण से धूम्रपान करने वाले यह जानते हुए कि यह उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, उन्हें धूम्रपान की लत को छोड़ना कठिन लगता है। वे इस व्यसन से प्राप्त होने वाले सुख को त्यागने में असमर्थ रहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे सुख जो निद्रा, आलस्य और असावधानी से उत्पन्न होते हैं वे तामसिक प्रकृति के होते हैं।
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुन: |
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै: || 40||
पृथ्वी और स्वर्ग के उच्च लोकों में रहने वाला कोई भी जीव प्रकृति के इन तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त नहीं होता।
श्वेताश्वतरोपनिषद् में माया शक्ति का विस्तृत वर्णन करते हुए माया शक्ति को त्रिरंगी कहा गया है
अजामेकां लोहिताशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः।
अजो टेको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः
(श्वेताश्वतरोपनिषद् -405)
"माया शक्ति के तीन रंग हैं-श्वेत, लाल और काला अर्थात् यह सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण सहित त्रिगुणी है। यह असंख्य जीवों के लिए माँ के गर्भ के समान है। यह भगवान जो पूर्ण सर्वज्ञ हैं, द्वारा अस्तित्त्व में लायी जाती है और उनका संयोग प्राप्त करती है। भगवान इस भौतिक शक्ति माया से कोई संबंध नहीं रखता। वह स्वतंत्र रूप से अपनी दिव्य लीलाओं में आनन्द लेता है किन्तु जीव माया का भोग करते हैं और बंधनों में पड़ जाते हैं।" माया का प्रभुत्व नरक के निम्न लोकों से स्वर्ग के ब्रह्मलोक तक होता है। चूँकि प्रकृति के तीन गुण-सत्त्व, रजस् और तमस् मायाशक्ति के अंतर्निहित हैं अतः ये सभी भौतिक लोकों में पाये जाते हैं। इसलिए इन लोकों के प्राणी चाहे वे पृथ्वी लोक के मनुष्य हों या स्वर्गलोक के देवता ही क्यों न हों, सभी तीन गुणों के अधीन रहते हैं। अंतर केवल इन गुणों के तुलनात्मक अनुपात में है। नरक लोकों के निवासियों में तमोगुण की प्रबलता होती है, पृथ्वीलोक पर निवास करने वाले में रजोगुण की प्रधानता होती है और स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओं में सत्त्वगुण की प्रबलता होती है। अब इन तीन तत्त्वों का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करेंगे कि मानव जाति में क्यों भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रकृति देखने को मिलती है।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप |
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै: || 41||
हे शत्रुहंता! ब्राह्मणों, श्रत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के कर्तव्यों को इनके स्वरूप के अनुसार तथा प्रकृति के तीन गुणों के अनुरूप विभाजित किया गया है, (न कि इनके जन्म के अनुसार।)
किसी ने ठीक ही कहा है कि उपयुक्त व्यवसाय की खोज एक उपयुक्त जीवन साथी की खोज करने के समान है। लेकिन हम स्वयं अपने लिए उपयुक्त व्यवसाय की कैसे खोज करें? यहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार लोगों का स्वभाव भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है जिससे उनके व्यक्तित्त्व का निर्माण होता है और इसलिए विभिन्न प्रकार के दायित्व उनके लिए सुविधाजनक होते हैं। 'स्वभाव-प्रभवैगुणौ' (मानव स्वभाव और गुण पर आधारित कर्म) के अनुसार वर्णाश्रम धर्म पद्धति समाज की वैज्ञानिक व्यवस्था थी। इस पद्धति के अनुसार समाज में चार आश्रम थे जिन्हें जीवन की चार अवस्थाएँ भी कहा जाता है और चार वर्ण अर्थात् चार व्यावसायिक श्रेणियाँ थी। जीवन की चार अवस्थाएँ इस प्रकार से थीं-(1) ब्रह्मचर्य आश्रम-(विद्यार्थी जीवन) जो जन्म से 25 वर्ष तक की आयु होता था। (2) गृहस्थ आश्रम-यह वैवाहिक जीवन था। यह 25 वर्ष की आयु से 50 वर्ष की आयु तक था। (3) वानप्रस्थ आश्रम- यह 50 वर्ष से 75 वर्ष तक की आयु तक था। इस अवस्था में मनुष्य अपने परिवार के साथ रहता था लेकिन वैराग्य का अभ्यास भी करता था। (4) संन्यास आश्रम-यह 75 वर्ष से आगे की अवस्था थी जिसमें मनुष्य अपनी घर गृहस्थी के दायित्वों का त्याग करता था और पवित्र स्थानों में निवास करते हुए मन को भगवान में तल्लीन करता था।
चार वर्णों में ब्राह्मण (पुरोहित वर्ग), अत्रिय वर्ग (योद्धा और शासक वर्ग), वैश्य (व्यापार और कृषि वर्ग वाले), शूद्र (कर्मचारी वर्ग) आते थे। वर्णों में कोई बड़ा या छोटा नहीं माना जाता था। भगवान ही समाज का केन्द्र थे और सभी अपने-अपने स्वाभाविक गुणों के अनुसार काम करते थे और भगवत्प्राप्ति के लिए प्रगति करते हुए अपने जीवन को सफल बनाते थे। इस प्रकार वर्णाश्रम पद्धति में विविधता में एकता थी। विविधता प्रकृति में अंतनिर्हित है और इसे कोई समाप्त नहीं कर सकता। हमारे शरीर में विभिन्न अंग है और ये सब भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य करते हैं। सभी अंगों से एक समान कार्य करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। इन सबको अलग-अलग समझना अज्ञानता नहीं है बल्कि तथ्यात्मक ज्ञान है। समान रूप से मानव जाति के बीच भी विविधता की उपेक्षा नहीं की जा सकती। समाजवादी देशों में समानता सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है लेकिन वहाँ भी राजनीतिक दलों के नेता हैं जो विचारधारा तैयार करते हैं। वहाँ भी सेना है जो बंदूकों का प्रयोग करती और देश की सुरक्षा करती है। वहाँ किसान भी हैं जो खेती-बाड़ी करते हैं। इन देशों में औद्योगिक श्रमिक भी हैं जो यांत्रिक कार्य करते हैं। समाजवादी देशों में समानता के प्रयासों के बाबजूद भी व्यवसाय के चार वर्ग विद्यमान हैं। वर्णाश्रम पद्धति ने मानवों में विविधता को मान्यता दी और लोगों के स्वभाव के अनुकूल वैज्ञानिक ढंग से उनके कर्त्तव्य और व्यवसाय निर्धारित किए।
यद्यपि समय व्यतीत होने के साथ-साथ वर्णाश्रम पद्धति विकृत हो गयी और वर्गों का निर्धारण स्वभाव की अपेक्षा जन्म के आधार पर होने लगा। ब्राह्मणों के बच्चों ने स्वयं को ब्राह्मण कहना आरम्भ कर दिया भले ही वे अपेक्षित गुणों से संपन्न हों या न हों। उच्च तथा निम्न जाति की अवधारणा भी विकसित हुई और उच्च जातियों के लोग निम्न जातियों को हेय दृष्टि से देखने लगे। जब यह पद्धति कठोर और जन्म आधारित हो गयी तब यह विरूपित हो गयी। यह एक समाजिक दोष था जो समय के साथ उभरा और यह वर्णाश्रम पद्धति का मूल उद्देश्य नहीं था।
अगले कुछ श्लोकों में इस पद्धति के मूल वर्गीकरण के अनुसार श्रीकृष्ण लोगों के स्वभावों को उनके कर्म के स्वाभाविक गुणों के साथ चित्रित करेंगे।
शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च |
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् || 42||
शान्ति, संयम, तपस्या, शुद्धता, धैर्य, सत्यनिष्ठा, ज्ञान, विवेक तथा परलोक में विश्वास-ये सब ब्राह्मणों के स्वाभाविक गुण हैं।
सात्त्विक गुणों की प्रधानता से संपन्न लोग ब्राह्मण कहलाते थे। उनके मुख्य कार्य तपस्या करना, मन की शुद्धि का अभ्यास करना, भक्ति करना और दूसरों को अपने आदर्शों से प्रेरित करना था। इसलिए उनमें सहिष्णुता, विनम्रता और आध्यात्मिक मनोवृति होती थी। उनसे स्वयं अपने लिए और अन्य वर्गों के लिए यज्ञों का निष्पादन करने की अपेक्षा की जाती थी। उनकी प्रकृति उन्हें ज्ञान की ओर प्रवृत्त करती थी। इसलिए शिक्षा प्रदान करना और ज्ञान को पोषित करना तथा इसे सब के साथ बांटना भी उनकी वृत्ति के अनुकुल था। यद्यपि वे स्वयं राज्य के प्रशासनिक कार्यों में भाग नहीं लेते थे लेकिन वे अधिकारियों को मार्गदर्शन प्रदान करते थे। चूंकि वे शास्त्रों के ज्ञान से संपन्न थे इसलिए सामाजिक और राजनीतिक विषयों के संबंध में उनके विचारों का अत्यधिक महत्त्व था।
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् |
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् || 43||
शूरवीरता, शक्ति, धैर्य, रण कौशल, युद्ध से पलायन न करने का संकल्प, दान देने में उदारता नेतृत्व क्षमता-ये सब क्षत्रियों के स्वाभाविक गुण हैं।
क्षत्रिय उन्हें कहते थे जिनमें रजोगुण प्रधान तथा सत्त्वगुण गौण होता था। इन गुणों ने उन्हें शासक, नायक, निडर, नेतृत्ववान और दानवीर बनाया। उनके गुण सैन्य और नेतृत्व संबंधी कार्यों के अनुकूल थे और उन्होंने शासक वर्ग तैयार किया और देश पर शासन किया। फिर भी ब्राह्मणों को अधिक ज्ञानी और पवित्र मानते थे इसलिए उन्होंने सदैव ब्राह्मणों का मान-सम्मान किया और वैचारिक, आध्यात्मिक और नीतिगत विषयों में उनसे परामर्श प्राप्त किया।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् |
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् || 44||
कृषि, गोपालन और दुग्ध उत्पादन तथा व्यापार, वैश्य लोगों के स्वाभाविक कार्य हैं। शूद्रों के श्रम और सेवा स्वाभाविक कर्म हैं।
वैश्यों में रजोगुण की प्रधानता तथा तमोगुण गौण होता है। इसलिए उनकी रुचि व्यापार और कृषि के माध्यम से अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण करने और धनोपार्जन में थी। वे देश की अर्थव्यवस्था को संभालते थे और अन्य वर्गों के लिए रोजगार उत्पन्न करते थे। उनसे समाज के वंचित लोगों के लिए धन सम्पदा दान करने की अपेक्षा की जाती थी। शूद्रों में तमोगुण की प्रधानता होती है। उनकी रुचि विद्वत्ता प्राप्त करने और प्रशासनिक कार्यों या व्यावसायिक उद्यमों में नहीं होती थी। उनके लिए उन्नति का मार्ग समाज की सेवा करना था। कलाकार, तकनीशियन, श्रमिक, दर्जी, कारीगर नाई इत्यादि इस वर्ग में सम्मिलित हैं।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर: |
स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु || 45||
अपने स्वाभाविक कर्तव्यों का पालन करने से मनुष्य पूर्णता प्राप्त कर सकता है। अब मुझसे यह सुनो कि निर्धारित कर्तव्यों का पालन करते हुए मनुष्य कैसे पूर्णता प्राप्त करता है।
स्व-धर्म हमारे गुणों और हमारे जीवन की अवस्थाओं पर आधारित होते हैं। इन्हें सम्पन्न करना यह सिद्ध करता है कि हम अपने शरीर और मन की योग्यताओं का उपयोग रचनात्मक ढंग से करते हैं। यह आध्यात्मिक विकास की ओर ले जाता है और समाज एवं आत्मा के लिए लाभदायक होता है। चूंकि हमारे कर्त्तव्य हमारे स्वभाव के अनुरूप होते हैं इसलिए इनका निर्वहन करने में हम स्वयं को सहज अनुभव करते हैं। फिर जब हमारी क्षमता बढ़ती है तब स्व-धर्म भी परिवर्तित हो जाता है और हम अगली कक्षा में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार से हम अपने उत्तरदायित्व का निष्ठापूर्वक निर्वहन कर उन्नति की ओर अग्रसर होते हैं।
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् |
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव: || 46|।
अपनी स्वाभाविक वृत्ति का निर्वहन करते हुए उस स्रष्टा भगवान की उपासना करो जिससे सभी जीव अस्तित्त्व में आते हैं और जिसके द्वारा सारा ब्रह्माण्ड प्रकट होता है। इस प्रकार से अपने कर्मों को सम्पन्न करते हुए मनुष्य सरलता से सिद्धि प्राप्त कर सकता है।
भगवान की सृष्टि में सभी जीवात्माओं का समान महत्त्व है। सृष्टि संचालन की उनकी दिव्य योजना सभी जीवों के विकास के लिए है। हम उनकी योजना रूपी विशाल चक्र में छोटे चक्रदंत के रूप में जुड़ते हैं और वे हमें क्षमता के अनुकूल ही अपेक्षा रखते हैं। इसलिए यदि हम अपने स्वभाव और अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने स्व-धर्म का पालन करते हैं तभी हम अपने शुद्धिकरण के लिए उनकी दिव्य योजना में अपनी भूमिका का निर्वहन कर सकेंगे। जब हम भक्तिपूर्ण चेतना से युक्त होकर अपना कार्य सम्पन्न करते हैं तब हमारा कार्य पूजा का रूप बन जाता है।
एक कथा जिसे मार्कण्डेय ऋषि ने महाभारत के वन पर्व में युधिष्ठिर को सुनाई थी, यह दर्शाती है कि कोई भी कर्त्तव्य अशुद्ध नहीं होता किस चेतना के द्वारा हम इसे संपन्न करते हैं, वही इसके महत्त्व को निर्धारित करती है। इस कथा में यह वर्णन किया गया है कि एक युवा संन्यासी वन में गया और वहाँ उसने दीर्घकाल तक घोर तपस्या की। कुछ वर्षों बाद एक दिन वृक्ष के ऊपर से एक कौवे का मल तपस्वी पर गिरा। उसने कौवे पर क्रोध से दृष्टि डाली और फिर कौवा पृथ्वी पर गिर कर मर गया। संन्यासी ने समझा कि उसकी तपस्या के फलस्वरूप उसमें उनके शक्तियाँ प्रकट हुई हैं। वह घमंड में चूर हो गया। कुछ समय बाद वह किसी के घर भिक्षा मांगने गया। उस घर की गृहिणी द्वार पर आई और उसने संन्यासी से कुछ समय तक प्रतीक्षा करने का अनुरोध किया क्योंकि वह अपने बीमार पति की देखभाल में लगी हुई थी। इससे संन्यासी क्रोधित हो गया और उसने उस स्त्री पर क्रोध भरी दृष्टि डाली और सोंचने लगा-"तुम जैसी नीच स्त्री ने मुझसे प्रतीक्षा करवाने का दुःसाहस कैसे किया, तुम्हें मेरी शक्तियों का ज्ञान नहीं?" भिक्षु के मन का अभिप्राय जानकर स्त्री ने उसे उत्तर दिया-"मुझे क्रोध से मत देखो, मैं कोई कौवा नहीं जो तुम्हारे दृष्टि डालने से जल जाऊंगी।" संन्यासी ने चौंककर पूछा कि वह इस घटना के संबंध में कैसे जानती है? गृहिणी ने कहा कि उसने कभी कोई तपस्या नहीं की, लेकिन उसने अपने दायित्वों का निर्वहन समर्पण भाव से किया है। इसी के बल पर वह प्रबुद्ध हुई और उसके विचारों को जानने में सक्षम हुई। उसने उस संन्यासी को धर्मात्मा व्याध से भेंट करने को कहा, जो मिथिला नगर में रहता था और यह भी कहा कि धर्म के विषय में वह उसके प्रश्न का उत्तर देगा। संन्यासी ने नीच माने जाने वाले व्याध से भेंट करने की अपनी झिझक समाप्त की और वह मिथिला पहुँचा। व्याध ने उसे समझाया कि हमारा स्वधर्म हम सबके पूर्व कर्मों और क्षमताओं पर आधारित है। यदि हम अपने स्वाभाविक कर्त्तव्य का निर्वहन करने के लिए अपनी इच्छाओं और निजी स्वार्थों का त्याग करते हैं और मार्ग में आने वाले क्षणिक सुखों और दुःखों से ऊपर उठते हैं तब हम स्वयं को शुद्ध कर सकेंगे और अध्यात्म की अगली कक्षा में प्रवेश करेंगे। अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करने व उनसे विमुख न होने से आत्मा उत्तरोत्तर अपनी स्थूल चेतना से दिव्य चेतना में उन्नति करती है। व्याध द्वारा दिए व्याख्यान को महाभारत में व्याध गीता के रूप में जाना जाता है।
यह उपदेश स्वाभाविक रूप से अर्जुन के लिए था क्योंकि वह युद्ध करने के अपने धर्म को निंदनीय समझ कर युद्ध से विमुख होना चाहता था। इस श्लोक में श्रीकृष्ण उसे उपदेश देते हैं कि समुचित चेतना में अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए वह परमेश्वर की उपासना करगा और सरलता से पूर्णता प्राप्त कर लेगा।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् || 47||
अपने धर्म का पालन त्रुटिपूर्ण ढंग से करना अन्य के कार्यों को उपयुक्त ढंग से करने की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है। अपने स्वाभाविक कर्तव्यों का पालन करने से मनुष्य पाप अर्जित नहीं करता।
जब हम अपने स्वधर्म (निश्चित व्यावसायिक कर्त्तव्य) का पालन करते हैं तब उससे दो प्रकार से लाभ होता है। पहला यह हमारी मनोवृत्ति के अनुरूप होता है। यह हमारे व्यक्तित्त्व के लिए उसी प्रकार से अनुकूल होता है जैसे किसी पक्षी का आकाश में उड़ना और मछली का जल में तैरना। पुनश्च यह मन के लिए सहज होता है जिसके परिणामस्वरूप हमारी चेतना सहजता से भक्ति में तल्लीन हो सकती है।
यदि हम अपने कर्त्तव्यों को दोषपूर्ण समझ कर उनका त्याग कर देते हैं और अपने स्वभाव के प्रतिकूल अन्य लोगों का कार्य सम्पन्न करने लगते हैं, तब हम अपने स्वाभाविक प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। अर्जुन की स्थिति एकदम ऐसी ही थी। उसका क्षत्रियोचित स्वभाव उसे सैन्य और प्रशासनिक कार्यों में प्रवृत्त करता था। परिस्थितियाँ उसे ऐसी स्थिति में ले गयी जहाँ उसके लिए धर्म की मर्यादा हेतु युद्ध में भाग लेना अनिवार्य था। यदि वह अपने कर्त्तव्य पालन से विमुख हो जाता और युद्ध क्षेत्र से भाग कर वन में तपस्या करने लगता, तब ऐसा करने पर उसे आध्यात्मिक दृष्टि से भी कोई लाभ प्राप्त नहीं होता क्योंकि वन में भी वह अपने स्वाभाविक गुणों का त्याग नहीं कर पाता। यह भी संभावना थी कि वह वन में जाकर आदिवासियों को एकत्रित कर लेता और उनका राजा बन जाता। इसकी अपेक्षा उसके लिए यह उचित होगा कि वह अपने स्वाभाविक कर्त्तव्यों का पालन करता रहे और अपने कर्मफल भगवान को समर्पित कर उनकी उपासना करे। जब कोई आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त करता है तब स्व-धर्म स्वतः परिवर्तित हो जाता है फिर यह शारीरिक स्तर पर टिका नहीं रहता बल्कि आत्मा का धर्म बन जाता है। इस अवस्था में अपने स्वाभाविक कर्तव्यों का त्याग करना और पूर्ण रूपेण भक्ति में तल्लीन होना किसी के लिए औचित्यपूर्ण हो सकता है क्योंकि अब यह उस व्यक्ति का स्व-धर्म बन जाता है। ऐसी पात्रता से युक्त लोगों के लिए श्रीकृष्ण भगवद्गीता के अंत में इस प्रकार से अपना अंतिम निष्कर्ष देते हैं-"सभी प्रकार के धर्मों का त्याग करो और केवल मेरी शरण ग्रहण करो" (18.66)। फिर भी जब तक हम उस अवस्था तक नहीं पहुंचते तब तक इस श्लोक में प्रदत्त उपदेश का पालन करना होगा। श्रीमद्भागवत पुराण में भी ऐसा वर्णन किया गया है
तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।
मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ।।
(श्रीमदभागवदम्-11.20.9)
"हमें तब तक अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए जब तक भगवान की लीलाओं के श्रवण-कीर्तन और स्मरण द्वारा हमारे मन में भगवान की भक्ति के प्रति रुचि विकसित न हो जाए।"
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् |
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता: || 48||
किसी को भी अपने स्वभाविक कर्त्तव्यों का परित्याग नहीं करना चाहिए चाहे उनमें दोष भी क्यों न हो। हे कुन्ती पुत्र! वास्तव में सभी प्रकार के कर्म कुछ न कुछ बुराई से आवृत रहते हैं जैसे आग धुंए से ढकी रहती है।
कभी-कभी लोग कर्त्तव्य पालन से इसलिए पीछे हटते हैं क्योंकि वे इनमें दोष देखते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि कोई भी कार्य दोष रहित नहीं है जैसे धुआँ स्वाभाविक रूप से अग्नि के ऊपर रहता है। उदाहरणार्थ हम लाखों जीवाणुओं की हत्या किए बिना श्वास नहीं ले सकते। जब हम कृषि के लिए खेत जोतते हैं तब हम असंख्य सूक्ष्म जीवों को नष्ट करते हैं। जब हम व्यापार में प्रतिस्पर्धा करते हुए सफलता प्राप्त करते हैं तब हम अन्य लोगों को धन सम्पदा से वंचित करते हैं। जब हम भोजन करते हैं तब हम दूसरों को भोजन से वंचित करते हैं। चूँकि स्व-ध म क्रियाशीलता पर बल देता है इसलिए यह दोषों से रहित नहीं हो सकता। लेकिन स्व-धर्म के लाभ उसके दोषो से कहीं अधिक हैं। इसके लाभ का उदाहरण मार्क अलिबयन जो हार्वड बिजनेस स्कूल के प्राध्यापक थे ने 'मेकिंग ए लाइफ, मेकिंग ए लिविंग' नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपने एक अध्ययन में वर्ष 1960 से 1980 तक की अवधि के दौरान एक विद्यालय के पन्द्रह सौ स्नातकों के भविष्य को परखा। स्नातकों के दो समूह बनाये गये। 'क' श्रेणी में उन स्नातकों को रखा गया जो पहले धन सम्पदा अर्जित करना चाहते थे ताकि वे बाद में उन कार्यों को बाद में संपन्न कर सकें जो उनकी इच्छा के अनुरूप थे। इस श्रेणी में 83 प्रतिशत स्नातक सम्मिलित हुए। 'ख' श्रेणी का चयन उन स्नातकों ने किया जिन्होंने सर्वप्रथम अपनी रुचि और हित के कार्यों की ओर ध्यान दिया और उसी के अनुरूप प्रयास किए क्योंकि वे पूर्ण रूप से आश्वस्त थे कि इससे धन संपदा अपने आप प्राप्त होगी। 'ख' श्रेणी में सत्रह प्रतिशत स्नातक सम्मिलित हुए थे। बीस वर्षों के पश्चात् एक सौ बीस लोग करोड़पति बनें जिनमें से केवल एक 'क' श्रेणी के स्नातकों में था, जो पहले धनोपार्जन करना चाहते थे और एक सौ स्नातक 'ख' श्रेणी के थे जिन्होंने सर्वप्रथम अपनी रुचि के अनुसार कार्य संपन्न किए थे। अत्यधिक संख्या में धनवान बने लोगों ने अपने कार्यों के प्रति कृतज्ञता और निष्ठा प्रकट की। जिन्हें सम्पन्न करने में वे तल्लीन रहे। मार्क अलिबयन ने निष्कर्ष निकाला कि अधिकतर लोग यह समझते हैं कि काम और मनोरंजन के बीच में अंतर है। लेकिन यदि वे अपनी पसंद का कार्य करते हैं तब कार्य मनोरंजन बन जाता है और फिर उन्हें अपने जीवन में कभी अपने काम को टालना नहीं पड़ता। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को ऐसे काम को करने और उसका त्याग न करने का उपदेश देते हैं जो उसके स्वभाव के अनुकूल हो, भले ही वह दोषपूर्ण ही क्यों न हो। लेकिन कार्य को समुचित चेतना के साथ सम्पन्न किया जाना चाहिए जिसका वर्णन अगले श्लोक में किया जाएगा।
असक्तबुद्धि: सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृह: |
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति || 49||
वे जिनकी बुद्धि सदैव अनासक्त रहती है, जिन्होंने अपने मन को वश में कर लिया है जो वैराग्य के अभ्यास द्वारा कामनाओं से मुक्त हो जाते हैं, वे कर्म से मुक्ति प्राप्त करते हैं।
इस अंतिम अध्याय में श्रीकृष्ण ने पूर्व्वर्णित कई सिद्धान्तों को दोहराया है। इस अध्याय के आरम्भ में उन्होंने अर्जुन को समझाया था कि जीवन के उत्तरदायित्व से विमुख होना न तो संन्यास है और न ही त्याग है। अब वे अकर्मण्यता की अवस्था या नैष्कर्म्यसिद्धि का वर्णन करते हैं। इस अवस्था को संसार के बीच में रहते हुए भी स्वयं को घटनाओं और परिणामों से विरक्त रख कर अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए प्राप्त किया जा सकता है। यह उसी प्रकार से है जैसे एक पुल के नीचे से बहने वाला पानी एक ओर से प्रवेश करता है और दूसरी ओर निकल जाता है। पुल न तो जल को प्राप्त करता है और न ही इसका वितरक होता है। उसी प्रकार से कर्मयोगी अपने कर्तव्य का निर्वहन करतें हैं लेकिन अपने मन को घटनाओं के प्रवाह से अप्रभावित रखते हैं। वे अपने कर्तव्य का भली भांति निर्वहन करने के लिए उत्कृष्ट प्रयास करते हुए उन्हें भगवान की आराधना के रूप में देखते हैं लेकिन वे अंतिम निर्णय भगवान पर छोड़ देते हैं और इस प्रकार से जो भी घटित होता है, उससे संतुष्ट और अविचलित रहते हैं।
यहाँ इस विषय को एक सरल कथा द्वारा स्पष्ट किया जाता है। एक व्यक्ति की दो पुत्रियाँ थी। एक का विवाह किसान के साथ हुआ था और दूसरी का विवाह ईंट के भट्टे के मालिक से हुआ था। एक दिन पिता ने अपनी पहली पुत्री से पर बातचीत की और यह पूछा कि वह कैसी है? उसने उत्तर दिया-"पिताजी हम आर्थिक कठिनाइयों में जीवन निर्वाह कर रहे हैं। कृपया भगवान से प्रार्थना करें कि आने वाले महीनों में अच्छी वर्षा हो।" इसके बाद उस व्यक्ति ने अपनी दूसरी पुत्री को फोन किया तब उसकी पुत्री ने बताया-"हम आर्थिक तंगी में है कृपया भगवान से यह प्रार्थना करें कि इस वर्ष वर्षा न हो ताकि सूर्य की तेज धूप निकलने से ईटों का अधिक उत्पादन हो सके।" पिता ने दोनों पुत्रियों की एक दूसरे से विपरीत प्रार्थनाओं को सुना और सोंचा-"केवल भगवान ही जानता है कि क्या अच्छा है। इसलिए उसे जो अच्छा लगे वही करे।" भगवान की ऐसी इच्छाओं को स्वीकार करने से संसार में निरन्तर घट रही घटनाओं की धारा में मग्न होने के बाबजूद भी हमारे भीतर कर्म-फलों के प्रति विरक्ति उत्पन्न होगी।
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे |
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा || 50||
हे अर्जुन! अब मैं तुम्हें यह समझाऊंगा कि जो सिद्धि प्राप्त कर चुका है वह भी दृढ़ता से दिव्य ज्ञान में स्थित होकर कैसे ब्रह्म को भी पा सकता है।मुझसे संक्षेप में सुनो।
सैद्धांतिक ज्ञान को समझना एक विषय है लेकिन उसे व्यवहार में लाना अलग विषय है। यह कहा जाता है कि अच्छे विचार कौड़ियों के भाव मिलते हैं लेकिन यदि हम इन्हें व्यवहार में नहीं लाते तब यह व्यर्थ ही है। सैद्धांतिक ज्ञान से युक्त पंडितों को शास्त्रों का ज्ञान कंठस्थ हो सकता है किन्तु फिर भी वे उसकी वास्तविक अनुभूति से वंचित रहते हैं। दूसरी ओर एक कर्मयोगी को प्रतिदिन शास्त्रों के सत्य का आभास करने का अवसर प्राप्त होता है। इस प्रकार से कर्मयोग के निरन्तर पालन के परिणामस्वरूप आध्यात्मिक ज्ञान की अनुभूति होती है और जब कोई कार्य करते हुए नैष्कर्म्यसिद्धि या अकर्मण्यता प्राप्त करता है तब उसे दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। इस ज्ञान में स्थित होकर कर्मयोगी भगवत्प्राप्ति करते हैं। ऐसा कैसे होता है? श्रीकृष्ण इसकी व्याख्या अगले कुछ श्लोकों में करेंगे।
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च |
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च || 51||
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस: |
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रित: || 52||
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् |
विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते || 53||
कोई भी मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है जब वह विशुद्ध बुद्धि और दृढ़ता से इन्द्रियों को संयत रखता है, शब्द और अन्य विषयों का परित्याग करता है, राग और द्वेष को दूर रखता है। ऐसा व्यक्ति जो एकांत वास करता है, अल्प भोजन करता है, शरीर, मन और वाणी पर नियंत्रण रखता है, सदैव ध्यान में लीन रहता है, वैराग्य का अभ्यास करता है, अहंकार, अहिंसा, अभिमान, कामनाओं, स्वामित्व की भावना और स्वार्थ से मुक्त रहता है और जो शांति में स्थित है वह ब्रह्म के साथ एक होने का अधिकारी है।
श्रीकृष्ण यह समझा रहे हैं कि समुचित चेतना में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने से हम सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। अब वे भगवत्प्राप्ति के लिए आवश्यक तत्त्वों का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि भगवत्प्राप्ति की अवस्था में हमारी बुद्धि शुद्ध होकर दिव्य ज्ञान में स्थित हो जाती है। पसंद और नापसंद में लिप्त न होने से मन वश में हो जाता है। इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं और वाणी तथा शरीर के आवेग नियंत्रित हो जाते हैं। शरीर की क्रियाएँ जैसे भोजन ग्रहण करना और निद्रा आदि संतुलित हो जाती हैं। मन को निरंतर भगवत्विषयों में तल्लीन करने वाला योगी अत्यंत शांत होता है और कामनाओं के बंधनों, क्रोध और लोभ से मुक्त रहता है। ऐसा योगी परम ब्रह्म को प्राप्त करता है।
ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ् क्षति |
सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् || 54||
परम ब्रह्म में स्थित मनुष्य शांति प्राप्त करता है, वह न तो शोक करता है और न ही कोई कामना करता है। वह सभी के प्रति समभाव रखता है, ऐसा परम योगी मेरी भक्ति को प्राप्त करता है।
यहाँ श्रीकृष्ण भगवत्प्राप्ति की अवस्था के विवरण का समापन करते हैं। ब्रह्मभूतः शब्द का अर्थ ब्रह्म की अनुभूति की अवस्था है। उसमें स्थित होकर मनुष्य प्रसन्नात्मा हो जाता है अर्थात् कष्टदायक अनुभवों से अप्रभावित रहता है। 'न शोचति' का अर्थ यह है कि न तो किसी प्रकार का शोक करना है और न ही किसी प्रकार की अपूर्णता का अनुभव करना है। 'न काङ्क्षति' का अर्थ किसी व्यक्ति द्वारा अपने सुखों को पाने के लिए भौतिक पदार्थों की लालसा न करना है। ऐसा योगी सभी को समान दृष्टि से देखता है और सभी में ब्रह्म का अनुभव करता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य परम ज्ञान की अवस्था में स्थित हो जाता है। हालांकि श्रीकृष्ण इस श्लोक को एक अनोखा मोड़ में समाप्त करते हैं। वे कहते हैं कि ज्ञान की इस अवस्था को प्राप्त करने के पश्चात् मनुष्य 'परा भक्ति' अर्थात् भगवान का दिव्य प्रेम प्राप्त करता है। ज्ञानी प्रायः कहते हैं कि भक्ति केवल भगवद् अनुभूति के मध्यवर्ती उपाय के रूप में की जानी चाहिए। उनके अनुसार भक्ति केवल अंतःकरण की शुद्धि करती है और अंत में केवल ज्ञान रह जाता है। इसलिए वे यह तर्क देते हैं कि जो दृढ़ बुद्धि से युक्त होते हैं वे भक्ति की उपेक्षा करते हैं और केवल ज्ञान को पोषित करते हैं लेकिन यह श्लोक ऐसे विचार का निषेध करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मज्ञान की अनुभूति होने के बाद परा भक्ति विकसित होती है। वेदव्यास ने श्रीमद्भागवतम् में इसी प्रकार की व्याख्या की है।
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकी भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः।।
(श्रीमद्भागवतम् -1.7.10)
"वे ज्ञानी पुरूष जो 'आत्माराम' हैं अर्थात् जो अपनी आत्मा में रमण करते हैं, आत्म ज्ञान में स्थित होते हैं और माया के बंधनों से मुक्त होते हैं। वे भी भगवान की भक्ति प्राप्त करने की इच्छा रखती हैं। भगवान वे मुक्त आत्माओं को भी आकर्षित करते हैं।" अनेक ज्ञानियों के उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया था और निराकार ब्रह्म के ध्यान में स्थित हो गए थे किन्तु जब उन्होंने भगवान के दिव्य गुणों की झलक देखी तब वे स्वाभाविक रूप से भक्ति की ओर आकर्षित हुए। प्रत्येक युग के ऐसे ज्ञानियों के उदाहरण इस प्रकार से हैं-
ब्रह्मा के चार पुत्र-सनत्कुुमार कुमार, सनातन कुमार, सनक कुमार और सनंदन कुमार सतयुग के महान ज्ञानी थे। वे जन्म से ही आत्मज्ञानी थे और सदैव निराकार ब्रह्मानंद में निमग्न रहते थे। जब चारों कुमार एक बार भगवान विष्णु के बैकुण्ठ लोक में गए, तब भगवान के चरणारविंद से मिली हुई तुलसी की पत्तियों की सुगंध से सुवासित वायु ने उनके नाक में प्रवेश किया, जिससे उनका हृदय रोमांचित हुआ और तत्क्षण उनकी निर्गुण ब्रह्म में लीन समाधि टूट गयी और वे भगवान विष्णु के दिव्य प्रेम में निमज्जित हो गये। उन्होंने भगवान से वरदान देने की प्रार्थना करते हुए कहा-
कामं भवः स्ववृजिनैर्निरयेषु नः स्ता
च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत।
(श्रीमदभागवत-3.15.49)
"हे भगवान, यदि हमारे मन को आपके चरण कमलों से निर्गत दिव्य प्रेमानंद का रसपान करने का अवसर प्राप्त होता रहे तब आप चाहे हमें नरकादि योनियों में भी क्यों न भेज दें। इसकी भी हमें कोई चिंता नहीं है।" जरा विचार करें कि निराकार ब्रह्म की अनुभूति होने के पश्चात् भी इन महान ज्ञानियों ने भगवान के साकार रूप का आनंद प्राप्त करने के लिए नरक में निवास करने की इच्छा व्यक्त की थी। अब त्रेता युग पर दृष्टि डाली जाए। इस युग के सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी राजा जनक थे। वह के पिता थे जो भगवान राम की प्रिया थीं। राजा जनक विदेह के नाम से भी जाने जाते हैं क्योंकि वह दैहिक चेतना से एकदम परे थे। उनका मन सदैव निराकार और निर्गुण ब्रह्म में तल्लीन रहता था। एक दिन विश्वामित्र ऋषि भगवान राम और लक्ष्मण के साथ उनके महल में गए। उस समय क्या घटित हुआ इसका रामचरितमानस में अति सुंदरता से वर्णन किया गया है
इनहिँ बिलोकत अति अनुरागा, बरबस ब्रह्मसुखहिँ मन त्यागा।
(रामाचरितमानस)
भगवान राम को देख कर राजा जनक की निराकार ब्रह्मानंद से विरक्ति हो गई और उनके भीतर परमेश्वर के साकार रूप के लिए गहन प्रीति उत्पन्न हो गयी।" इस प्रकार से त्रेता युग के महान ज्ञानी राजा जनक ने भी भक्ति के मार्ग को स्वीकार किया।
द्वापर युग के महाज्ञानी शुकदेव वेदव्यास ऋषि के पुत्र थे। पुराणों में वर्णन है कि वे इतने सिद्ध थे कि बारह वर्षों तक यह सोच कर अपनी माँ के गर्भ में रहे कि बाहर आने पर माया शक्ति उन पर हावी हो जाएगी।
अंत में नारद मुनि ने आकर उनकी माँ के कान में उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि ऐसा कुछ नहीं होगा और उन्हें अब गर्भ से बाहर निकलना चाहिए। अंततः वह अपनी योग शक्ति द्वारा गर्भ से बाहर आए और उन्होंने बारह वर्ष की आयु के समान अपने शरीर का विस्तार कर लिया और गृहस्थी को त्याग कर वन में रहने लगे। यहाँ वह शीघ्र ही निर्विकल्पक समाधि की अवस्था में पहुंच गए। कुछ वर्षों के पश्चात् जब वेदव्यास के कुछ शिष्य वन में लकड़ियाँ काट रहे थे तब उन्होंने शुकदेव को समाधि की अवस्था में देखा। उन्होंने वापस जाकर ऋषि वेदव्यास को सारा वृतांत सुनाया तब उन्होंने शुकदेव के कान में यह श्लोक सुनाने को कहा जिसमें श्रीकृष्ण के साकार रूप के सौंदर्य का वर्णन है-
बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं
बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।
रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै
वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.21.5)
"श्रीकृष्ण के सिर पर मोरपंखी मुकुट सुशोभित है और उनका भेष एक श्रेष्ठ नर्तक के समान दिख रहा है। उनके कान पीले-पीले पुष्पों से सुशोभित हो रहे हैं। उन्होंने गले में सुगंधित पुष्पों से बनी वैजयंती माला पहन रखी है। बांसुरी के छिद्रों में वे अपने अधरों से अमृत भर रहे हैं। उनके पीछे-पीछे ग्वाल बाल उनकी कीर्ति का गान कर रहे हैं और उनके पद चिह्नों से वृन्दावन अति रमणीय स्थान बन गया है।" शुकदेव ने जब भगवान के अनुपम सौंदर्य को सुना तब यह विचार किया कि ऐसे सौंदर्यशाली भगवान उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए वह पुनः समाधि में लीन हो गए। शिष्यों ने लौटकर ऋषि वेदव्यास को इसकी जानकारी दी तब वेदव्यास ने उन्हें एक अन्य श्लोक शुकदेव के कानों में पुनः सुनाने को कहा-
पूतना लोकबालघ्नी राक्षसी रुधिराशना।
जिघांसयापि हरये स्तनं दत्त्वाऽऽप सद्गतिम्।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.6.35)
"श्रीकृष्ण इतने दयालु हैं कि उन्होंने अपने स्तन से विष पिलाने वाली पूतना का उद्धार करके उसे अपने लोक में भेज दिया।" उपर्युक्त श्लोक जब शुकदेव के कानों में प्रविष्ट हुआ उस समय वे निराकार ब्रह्म के ध्यान में लीन थे। अचानक उनका चित्त भगवान कृष्ण की महिमा के गुणगान में लीन हो गया। वे भगवान के साकार रूप के दिव्य आनंद में इतने मगन हो गए कि वे समाधि से उठकर अपने पिता वेदव्यास के पास आए। वहाँ उन्होंने उनसे श्रीमद्भागवतम् का श्रवण किया जो भक्ति से परिपूर्ण है। बाद में गंगा के तट पर उन्होंने इसे अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित को सुनाया। इस प्रकार से द्वापरयुग के महाज्ञानी शुकदेव भी भक्ति के पथ की ओर अग्रसर हुए।
जगद्गुरु शंकराचार्य को कलियुग का महान ज्ञानी माना जाता है। अद्वैतवाद का व्यापक रूप से प्रचार करके उन्होंने अद्वितीय ख्याति प्राप्त की। इसमें उन्होंने कहा कि केवल एक ही सत्ता है और वह निर्गुण, निर्विशेष और निराकार ब्रह्म है। हालांकि इस तथ्य से इससे अनभिज्ञ हैं कि 20 वर्ष से 32 वर्ष की आयु तक उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण, भगवान राम, दुर्गा माता आदि की स्तुति सैकड़ों श्लोक लिखे। इसके अतिरिक्त उन्होंने भारत के चारों कोनों में स्थित चारों धामों का दर्शन किया और सभी में भगवान के साकार रूप की पूजा की। प्रबोध सुधाकर में उन्होंने इस प्रकार से उल्लेख किया-
काम्योपासनायार्थयन्त्यनुदिनं किञ्चितफलं स्वेप्सितं
केचित् स्वर्गमथापवर्गमपरे योगादियज्ञादिभिः।
अस्माकं यदुनन्दनाङ्घ्रियुगलध्यानावधा - नार्थिनाम्
किं लोकेन दमेन किं नृपतिना स्वर्गापवगैर्श्च किम्।।
(श्लोक 250)
"वे जो स्वर्गलोक की प्राप्ति हेतु पुण्य कर्म करते हैं, वे ऐसा कर सकते हैं। वे जो ज्ञानमार्ग या अष्टांग योग के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करना चाहें, वे भी अपने मार्ग का करें। किंतु, मैं इन दोनों मार्गो की इच्छा नहीं करता। मैं केवल श्रीकृष्ण के चरण कमलों के अमृत में स्वयं को डुबोना चाहता हूँ। मैं संसारिक और स्वर्ग के सुखों की कामना नहीं करता हूँ और न ही मेरी मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा है। मैं एक रसिक हूँ जो भगवान के दिव्य प्रेम से आनंदित होता है।" वास्तव में शंकराचार्य भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। उन्होंने अपने भाष्यों में जो उपदेश दिए वह तत्कालीन युग की आवश्यकता थी। जब वे पृथ्वी पर प्रकट हुए तब पूरे भारत वर्ष में बौद्ध धर्म प्रचलित था। ऐसे दौर में बौद्धों का वेदों में विश्वास पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए उन्होंने अपने भाष्य में भक्ति का उल्लेख नहीं किया। लेकिन बाद में उन्होंने अनेक स्तुतियों में भगवान के साकार रूप का सुन्दर वर्णन किया और अपनी आंतरिक भक्ति को प्रकट किया। इस प्रकार से शंकराचार्य कलियुग में एक ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने ज्ञान की सर्वोत्तम अवस्था प्राप्त की थी और बाद में उन्होंने भक्ति भी की।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत: |
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् || 55||
मेरी प्रेममयी भक्ति द्वारा ही कोई मुझे वास्तविक रूप में जान पाता है। तब सत्य के रूप में मुझे जानकर मेरा भक्त मेरे पूर्ण चेतन स्वरूप को प्राप्त करता है।
श्रीकृष्ण ने पिछले श्लोक में कहा था कि दिव्य ज्ञान में स्थित होकर ही कोई भक्ति को कर सकता है। अब वे कहते हैं कि केवल भक्ति द्वारा ही कोई भगवान के वास्तविक स्वरूप को जान सकता है। ज्ञानी को पहले निर्गुण, निर्विशेष और निराकार रूप में भगवान की अनुभूति हो चुकी होती है लेकिन ज्ञानी को भगवान के साकार रूप की अनुभूति नहीं होती। इसका कारण यह है कि भगवान के साकार रूप को कर्म, ज्ञान और अष्टांग योग द्वारा जाना नहीं जा सकता। यह प्रेम ही है जो इनकी अनुभूति का द्वार खोलता है। श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं कि भगवान के रूप, गुण, लीलाओं, धामों और संतो के रहस्य को केवल शुद्ध भक्ति द्वारा ही समझा जा सकता है। केवल भक्त ही भगवान को जान पाते हैं क्योंकि वे प्रेम चक्षुओं से युक्त होते हैं। पद्मपुराण में इसी के संबंध में एक सुन्दर उदाहरण दिया गया है। जाबालि नाम के एक ऋषि ने अत्यंत तेजस्विनी और शांत कन्या को वन में ध्यान में मग्न देखा। ऋषि ने उससे अपनी पहचान प्रकट करने और तपस्या का प्रयोजन बताने का अनुरोध किया। उस कन्या ने इसका इस प्रकार से उत्तर दिया-
ब्रह्मविद्याह्मतुला योगींद्रैर्या च मृग्यते ।
साहं हरिपदाम्भोजकाम्यया सुचिरं तपः।।
चराम्यस्मिन् वने घोरे ध्यायन्ती पुरुषोत्तमम्।
ब्रह्मानन्देन पूर्णाहं तेनानन्देन तृप्तधीः।।
तथापि शून्यमात्मानं मन्ये कृष्णरतिं विना ।
(पद्मपुराण)
"मैं ब्रह्म विद्या हूँ। महान योगी और तपस्वी मुझे जानने के लिए कठोर तपस्या करते हैं लेकिन मैं स्वयं साकार भगवान के चरण कमलों में प्रेम विकसित करने के लिए घोर तपस्या कर रही हूँ। मैं परिपूर्ण हूँ और ब्रह्म के आनन्द से तृप्त हूँ। फिर भी भगवान कृष्ण के अनुराग के बिना मैं स्वयं को शून्य समझती हूँ।" इसलिए भगवान के साकार रूप के आनन्द में निमज्जित होने के लिए केवल ज्ञान ही पर्याप्त नहीं होता। भक्ति द्वारा ही कोई इस रहस्य को जान सकता है तथा भगवान को प्राप्त कर सकता है।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय: |
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् || 56||
मेरे भक्त सभी प्रकार के कार्यों को करते हुए भी मेरी पूर्ण शरण ग्रहण करते हैं। तथा वे मेरी कृपा से मेरा नित्य एवं अविनाशी धाम प्राप्त करते हैं।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह व्याख्या की थी कि भक्ति द्वारा भक्त उन्हें प्राप्त करते हैं। वे सभी में भगवान के संबंध को स्वीकार करते हैं। वे भौतिक संपत्तियों को भगवान की संपत्ति के रूप में देखते हैं। वे सभी जीवों को भगवान के अभिन्न अंग के रूप में देखते हैं और स्वयं को भगवान का तुच्छ सेवक समझते हैं। इस दिव्य चेतना में वे कर्मों का त्याग नहीं करते बल्कि वे कर्ता और कर्म का भोक्ता होने के अहम् का त्याग करते हैं। वे सभी कार्यों को परमेश्वर की सेवा के रूप में देखते हैं और उनके सम्पादन के लिए भगवान का आश्रय लेते हैं। तथा अपने शरीर का त्याग करके वे भगवान के दिव्य लोक में जाते हैं। जिस प्रकार भौतिक क्षेत्र माया शक्ति से निर्मित होता है, उसी प्रकार से आध्यात्मिक क्षेत्र योगमाया शक्ति से बना है। इसलिए यह सभी प्रकार के मायिक दोषों से मुक्त होता है। यह सत्, चित् और आनंद होता है अर्थात् नित्य या अविनाशी, सर्वज्ञ और आनन्द से परिपूर्ण होता है। अपने दिव्य धाम के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने 15वें अध्याय के छठे श्लोक में कहा था, "न तो सूर्य, न चन्द्रमा और न ही अग्नि मेरे दिव्य लोक को प्रकाशित कर सकती है। एक बार वहाँ जाने के पश्चात् कोई पुनः संसार में लौट कर नहीं आता।"
आध्यात्मिक क्षेत्र में भगवान के विभिन्न स्वरूपों के अपने निजी लोक हैं जहाँ वे अपने भक्तों के साथ नित्य मधुर लीलाएँ करते हैं। वे जो उनकी नि:स्वार्थ सेवा करते हैं, वे अपने आराध्य भगवान के स्वरूप वाले लोक में जाते हैं। इस प्रकार से भगवान श्रीकृष्ण के भक्त गोलोक को जाते हैं। विष्णु भगवान के भक्त वैकुण्ठ लोक, भगवान श्रीराम के भक्त साकेत लोक, भगवान शिव की आराधना करने वाले शिव लोक और माता दुर्गा के भक्त देवी लोक में जाते हैं। वे भक्त जो भगवान को प्राप्त कर उनके दिव्य लोकों में प्रवेश करते हैं वे उनकी ऐसी दिव्य लीलाओं में भाग लेते हैं।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पर: |
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: सततं भव || 57||
अपने सभी कर्म मुझे समर्पित करो और मुझे ही अपना लक्ष्य मानो। बुद्धियोग का आश्रय लेकर अपनी चेतना को सदैव मुझमें लीन रखो।
योग का अर्थ 'जुड़ना' है और बुद्धियोग का अर्थ 'बुद्धि को भगवान के साथ एकीकृत करना' है। बुद्धि का यह एकीकरण तब होता है जब यह दृढ़ विश्वास हो जाए कि जो भी कुछ अस्तित्त्व में है वह सब कुछ भगवान से उत्पन्न हुआ है और उसी से संबद्ध है, तथा उसी की संतुष्टि के लिए है। आइए अब हम अपनी संरचना में बुद्धि की स्थिति को समझें। हमारे शरीर में एक अंत:करण है जिसे आम बोलचाल की भाषा में हृदय भी कहा जाता है। इसके चार स्वरूप हैं। जब इसमें विचार उत्पन्न होते हैं तब हम इसे मन कहते हैं। जब यह विश्लेषण करता है और निर्णय लेता है तब इसे बुद्धि कहा जाता है। जब यह किसी विषय या व्यक्ति में आसक्त हो जाता है तब हम इसे चित्त कहते हैं और जब यह अपनी पहचान शरीर के गुणों के साथ करता है और अभिमानी हो जाता है तब इसे अहंकार कहते हैं।
इस आंतरिक तंत्र में बुद्धि का स्थान प्रमुख होता है। यह निर्णय लेती है जबकि मन इसके निर्णयों के अनुसार कामनाएँ उत्पन्न करता है और चित्त अनुराग के विषयों में आसक्त हो जाता है। उदाहरणार्थ यदि बुद्धि यह निर्णय करती है कि सुरक्षा ही अति महत्वपूर्ण है तब मन सदैव जीवन की सुरक्षा की चिन्ता करता है। प्रतिदिन हम अपनी बुद्धि से मन को नियंत्रित करते हैं। इसलिए हमारा क्रोध अधोगामी होता है। अधिकारी निर्देशक पर चिल्लाता है लेकिन इसकी प्रतिक्रिया में निर्देशक उस पर नहीं चिल्लाता क्योंकि बुद्धि को यह बोध होता है कि इससे उसकी जीविका छिन जाएगी और वह अपना क्रोध प्रबंधक पर निकालता है। प्रबंधक निर्देशक के साथ झगड़ा नहीं करता। उसे फोरमैन पर चिल्लाने से राहत मिलती है। फोरमैन अपना सारा क्रोध श्रमिक को डांट कर निकालता है। श्रमिक अपनी कुंठा पत्नी पर उतारता है। पत्नी बच्चों पर चिल्लाती है। अतः प्रत्येक स्थिति में हम देखते हैं कि कहाँ क्रोध करना हानिकारक होता है और कहाँ नहीं। उपर्युक्त उदाहरण यह दर्शाते हैं कि हमारी बुद्धि में मन को नियंत्रित करने की क्षमता होती है। इसलिए हमें अपनी बुद्धि को उपयुक्त ज्ञान के साथ पोषित करना चाहिए और इसका प्रयोग इस प्रकार से करना चाहिए कि यह मन को उचित दिशा की ओर जाने के लिए मार्गदर्शन प्रदान कर सके। इस प्रकार से श्रीकृष्ण का बुद्धियोग से अभिप्राय दृढ़ निश्चय को इस प्रकार से विकसित करने से है कि सभी पदार्थ भगवान के सुख के लिए हैं। निश्चयात्मक बुद्धियुक्त ऐसे मनुष्य का चित्त सरलता से भगवान में अनुरक्त हो जाता है।
मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि |
अथ चेत्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि || 58||
यदि तुम सदैव मेरा स्मरण करते हो तब मेरी कृपा से तुम सभी कठिनाइयों और बाधाओं को पार कर लोगे। यदि तुम अभिमान के कारण मेरे उपदेश को नहीं सुनोगे तब तुम्हारा विनाश हो जाएगा।
पिछले श्लोक में अर्जुन को क्या करना चाहिए इसका उपदेश देने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब उनके उपदेशों का अनुसरण करने और अनुसरण न करने के परिणामों का वर्णन करते हैं। जीवात्मा को यह नहीं सोंचना चाहिए कि वह भगवान से से स्वतंत्र है। यदि हम मन को भगवान में स्थिर करके भगवान की पूर्ण शरणागति ग्रहण करते हैं तब उनकी कृपा से सभी प्रकार की कठिनाइयों और बाधाओं का समाधान हो जाएगा। यदि हम अभिमान के कारण भगवान के उपदेशों की अवहेलना करते हैं और यह सोचते हैं कि हम भगवान और शास्त्रों के ज्ञान की अपेक्षा अधिक जानते हैं तब हम मानव जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल हो जाएंगे क्योंकि न तो कोई भगवान से श्रेष्ठ है और न ही कोई उपदेश भगवान के उपदेश की तुलना में श्रेष्ठ है।
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे |
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति || 59||
यदि तुम अहंकार से प्रेरित होकर यह सोचते हो कि “मैं युद्ध नहीं लड़ूँगा' तो तुम्हारा निर्णय निरर्थक हो जाएगा। तुम्हारा स्वाभाविक क्षत्रिय धर्म तुम्हें युद्ध लड़ने के लिए विवश करेगा।
यहाँ श्रीकृष्ण चेतावनी भरे वचन बोलते हैं। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने के लिए पूर्णरूप से स्वतंत्र हैं। आत्मा एक स्वतंत्र भूमिका का निर्वहन नहीं कर सकती। यह भगवान की सृष्टि पर आश्रित है। यह प्रकृति के तीन गुणों के प्रभाव में रहती है। गुणों के संयोजन से हमारा स्वभाव बनता है और इसके प्रभाव के अनुसार हम कार्य करने के लिए बाध्य होते हैं। इसलिए हम यह कहने के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं है कि "मैं वैसा करूंगा जैसी मेरी इच्छा होगी।" हमें भगवान और शास्त्रों के उपदेशों तथा अपनी प्रकृति के अनुसार श्रेष्ठ का चयन करना चाहिए। इस संदर्भ में एक छोटा सा कथानक इस प्रकार से है। तीस वर्षों की सेवा अवधि पूरी करने के पश्चात् एक सेवानिवृत्त सैनिक लौट कर अपने घर आया।
एक दिन वह कॉफी की दुकान पर खड़ा होकर काफी का सेवन कर रहा था। तब उसके मित्र को एक उपहास सूझा। वह पीछे से चिल्लाया 'सावधान'। आदेश पर प्रतिक्रिया दर्शाना सैनिक के स्वभाव का अंग बन चुका था। उसने अनायास अपने हाथों से कप नीचे फेंक दिया और अपने दोनों हाथों को अपने बगल में करके वह सावधान मुद्रा में खड़ा हो गया। श्रीकृष्ण अर्जुन को चेतावनी देते हैं कि स्वभाव से वह एक योद्धा है और यदि वह अहम् के कारण उनके उपदेश को सुनने और उसका अनुपालन करने का निर्णय नहीं करता तब भी उसका क्षत्रिय धर्म उसे युद्ध लड़ने के लिए विवश करेगा।
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्ध: स्वेन कर्मणा |
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् || 60||
हे अर्जुन! मोहवश जिस कर्म को तुम नहीं करना चाहते उसे तुम अपनी प्रवृत्ति से बाध्य होकर करोगे।
अपने चेतावनी भरे शब्दों में श्रीकृष्ण पुनः पिछली बात पर प्रकाश डालते हैं। वे कहते हैं-"अपने पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण तुम क्षत्रिय हो।" महानायक, शूरवीरता और देशभक्ति जैसे तुम्हारे जन्मजात गुण तुम्हें युद्ध लड़ने के लिए बाध्य करेंगे। इसलिए योद्धा के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए तुम्हें पूर्व जन्म और इस जन्म में प्रशिक्षित किया गया है। क्या यह संभव है कि तुम अपनी आंखों के सामने दूसरों पर अन्याय होता देखकर अकर्मण्य हो जाओगे? तुम्हारा धर्म और तुम्हारी प्रकृति ऐसी है कि तुम जहाँ भी बुराई को देखोगे उसका प्रबलता से विरोध करोगे, इसलिए तुम्हारे लिए यही लाभकारी है कि तुम अपने स्वभाव से बाध्य होकर कार्य करने के स्थान पर मेरे उपदेशों के अनुसार कर्म करो।
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति |
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया || 61||
हे अर्जुन! परमात्मा सभी जीवों के हृदय में निवास करता है। उनके कर्मों के अनुसार वह माया द्वारा निर्मित यंत्र पर सवार आत्माओं को निर्देशित करता है।
आत्मा की परतंत्रता पर बल देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं-"अर्जुन! भले ही तुम मेरी आज्ञा का पालन करो या न करो, तुम्हारी स्थिति सदैव मेरे अधीन रहेगी। जिस शरीर में तुम रहते हो वह यंत्र मेरी माया शक्ति से निर्मित है। तुम्हारे पूर्व जन्मों को पात्रता के अनुसार तुम्हें मैंने शरीर प्रदान किया है। मैं इसमें स्थित रहता हूँ और तुम्हारे विचारों, शब्दों, और कर्मों का लेखा-जोखा रखता हूँ। इस प्रकार से वर्तमान में जो कर्म तुम करते हो उसका आंकलन करते हुए मैं तुम्हारे भविष्य का निर्णय करता हूँ। यह मत सोंचा कि तुम मुझसे किसी भी प्रकार से स्वतंत्र हो। इसलिए अर्जुन तुम्हारे हित में यही है कि तुम मेरी शरण ग्रहण करो।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत |
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् || 62||
हे भारत! पूर्ण अनन्य निष्काम से केवल उसकी शरण ग्रहण करो। उसकी कृपा से तुम पूर्ण शांति और उसके नित्यधाम को प्राप्त करोगे।
भगवान पर निर्भरता के कारण आत्मा को अपनी वर्तमान दुर्दशा से बाहर निकलने और चरम लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उनकी कृपा पर आश्रित होना चाहिए। इसके लिए स्वयं का प्रयास कभी पर्याप्त नहीं हो सकता। यदि भगवान अपनी कृपा प्रदान करते हैं तब वे जीवात्मा को अपना दिव्य ज्ञान प्रदान कर उसे माया शक्ति के बंधन से मुक्त कर देते हैं। श्रीकृष्ण बल देते हुए कहते हैं कि उनकी कृपा से ही कोई शाश्वत परमानंद और अविनाशी लोक प्राप्त करता है। अतः यह कृपा प्राप्त करने के लिए जीवात्मा को भगवान के शरणागत होना आवश्यक है। संसार में भी कोई पिता अपने पुत्र को अपनी सभी संपत्तियाँ तब तक हस्तांतरित नहीं करता जब तक वह इनका समुचित रूप से सदुपयोग करने के योग्य नहीं हो जाता। समान रूप से भगवान की कृपा शर्तरहित नहीं है। इसके लिए कुछ नियम है जिसके आधार पर वे कृपा करते हैं। यदि भगवान अपनी कृपा प्रदान करते समय इन नियमों का पालन नहीं करते तब लोगों का उन पर से विश्वास टूट जाएगा।
इसे एक उदाहरण द्वारा समझें-एक पिता के दो पुत्र थे। फसल उगाने के मौसम में वह अपने दोनों पुत्रों को खेत में कड़ा परिश्रम करने का आदेश देता है। एक पुत्र दिन भर सूर्य की तेज धूप में पसीना बहाकर परिश्रम करता है। जब रात्रि को वह घर पहुँचता है तब पिता कहता है-"मेरे पुत्र तुमने बहुत अच्छा काम किया। तुम आज्ञाकारी, अति परिश्रमी और निष्ठावान हो। यह तुम्हारा पुरस्कार है। यह 500 रुपये लो और इसको जैसे चाहो वैसे व्यय करो।" दूसरे पुत्र ने कुछ नहीं किया और पूरा दिन बिस्तर पर पड़ा रहा, मदिरा पान तथा धूम्रपान करता रहा और अपने पिता के लिए अपशब्द बोलता रहा। मान लो कि यदि रात को उसका पिता उससे कहता है-"चिंता मत करो। तुम भी मेरे पुत्र हो। यह 500 रुपये लो और आनंद मनाओ।" इसका परिणाम यह होगा कि पहले पुत्र की कड़ा परिश्रम करने की प्रेरणा समाप्त हो जाएगी। वह कहेगा-"यदि मेरे पिता का पुरस्कार देने का यही मापदण्ड है तब मैं भी परिश्रम क्यों करू? मैं भी कुछ नहीं करूँगा क्योंकि फिर भी मुझे 500 रुपये प्राप्त होंगे।" समान रूप से यदि भगवान हमारी पात्रता पर विचार किए बिना अपनी कृपा प्रदान करते हैं तब जो लोग पहले ही संत बन चुके हैं वे शिकायत करेंगे-"यह कैसी बात है? हमने कई जन्मों तक स्वयं को शुद्ध करने का प्रयास किया और तब हम भगवान की कृपा प्राप्त करने के पात्र बन पाए लेकिन इस व्यक्ति ने बिना पात्रता प्राप्त किए कृपा प्राप्त कर ली। फिर क्या हमारे प्रयास निरर्थक थे?" भगवान कहते हैं-"मैं इस प्रकार के अन्यायपूर्ण ढंग से व्यवहार नहीं करता, मेरी कुछ शाश्वत शर्ते हैं जिसके आधार पर मैं अपनी कृपा प्रदान करता हूँ। मैंने इसकी घोषणा सभी ग्रंथो में की है।" श्वेताश्वतरोपनिषद् में निम्न प्रकार से वर्णन किया है-
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.18)
"हमें उस परमेश्वर की शरण ग्रहण करनी चाहिए जिसने ब्रह्मा आदि को जन्म दिया है। उनकी कृपा के कारण आत्मा और बुद्धि प्रकाशित होती है।" श्रीमद्भागवतम् में भी इस प्रकार से वर्णन किया गया है-
मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम्।
याहि सर्वात्मभावेन मया स्या ह्यकुतोभयः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.12.15)
"हे उद्धव! सभी प्रकार की लौकिक, सामाजिक और धार्मिक परंपराओं का त्याग करो और सभी आत्माओं की परम आत्मा की शरण ग्रहण करो। केवल तभी तुम इस संसार रूपी महा सागर को पार कर सकोगे और सर्वथा निडर हो जाओगे।" भगवद्गीता के 7वें अध्याय के 14वें श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह भी कहा था-"मेरी दिव्य शक्ति माया प्रकृति के तीन गुणों से निर्मित हैं और इसको पार करना अत्यंत कठिन है लेकिन वे जो मेरे शरणागत हो जाते हैं वे इसे सरलता से पार कर लेते हैं।"
रामायण में भी ऐसा वर्णन किया गया है
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।
"जिस क्षण जीवात्मा भगवान के शरणागत हो जाती है उसी क्षण उसके अनन्त जन्मों के संचित कर्म उसकी कृपा द्वारा नष्ट हो जाते हैं।" भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए उनके शरणागत होने की अनिवार्यता के सिद्धांत को दोहराया गया है। शरणागति का विस्तृत अर्थ क्या है? इसे हरि भक्ति विलास, भक्ति रसामृत सिंधु, वायु पुराण और अहिर्बुध्न्य संहिता में निम्न प्रकार से समझाया गया है-
आनुकूल्यस्य सङ्कल्प प्रतिकूल्यस्य वर्जनम्
रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्वे वरणं तथा।
आत्मनिक्षेपकार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः।।
(हरि भक्तिविलास 11.676)
उपर्युक्त श्लोक में भगवान की शरणागति के छः स्वरूपों का वर्णन किया गया है-
1. केवल भगवान की इच्छा में इच्छा रखनाः स्वाभाविक रूप से हम भगवान के दास हैं और दास का यह धर्म है कि वह अपने स्वामी की इच्छा को पूर्ण करें। इसलिए भगवान के शरणागत भक्त के रूप में हमें भगवान की दिव्य इच्छा के अनुरूप ही अपनी इच्छा रखनी चाहिए। एक सूखा पत्ता वायु पर पूर्ण रूप से निर्भर हो जाता है। यदि वायु चाहे तो उसे ऊपर उठा दे, नीचे गिरा दे या उसे आगे या पीछे ले जाए या फिर उसे पृथ्वी पर फेंक दे। लेकिन सूखा पत्ता इसकी कोई शिकायत नहीं करता। समान रूप से हमें भी भगवान के सुख में सुखी रहना सीखना चाहिए।
2. भगवान की इच्छा के विरुद्ध इच्छा न करनाः इस जीवन में हमें अपने पूर्व और वर्तमान जन्म के फल प्राप्त होते हैं। किंतु कर्मों के फल अपने आप नहीं प्राप्त होते। भगवान हमारे कर्मों का लेखा जोखा रखते हैं और उचित समय पर उनके फल प्रदान करते हैं। चूंकि भगवान स्वयं फल वितरित करते हैं इसलिए हमें धैर्यपूर्वक उन्हें स्वीकार करना चाहिए। प्रायः जब लोग धन, यश, सुख और संसार के भोग विलास प्राप्त करते है तब वे भगवान के प्रति आभार प्रकट करते हैं। किन्तु यदि वे कष्ट पाते हैं तब इसका दोष भगवान को देते हैं-" भगवान ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?" दूसरी प्रकार की शरणागति के स्वरूप का तात्पर्य भगवान हमें जो भी प्रदान करें उस पर असंतोष प्रकट न करने से है।
3. यह दृढ़ विश्वास होना कि भगवान सदैव हमारी रक्षा करते हैं: भगवान हमारे शाश्वत पिता हैं। वे सृष्टि के सभी जीवों की देखभाल करते हैं। पृथ्वी लोक पर खरबों चींटियाँ हैं और सभी को नियमित रूप से भोजन की आवश्यकता पड़ती है। क्या हमने कभी उनमें से कुछ हजार चींटियों को अपने बगीचे में भूख से मरते हुए देखा? भगवान सुनिश्चित करते हैं कि इन सबको भोजन मिलता रहे। दूसरी ओर हाथी प्रतिदिन ढेरों भोजन करते हैं। भगवान इनके लिए भी भोजन की व्यवस्था करते हैं। सांसारिक पिता अपने बच्चों की चिंता और उनका पालन-पोषण करता है। तब हम यह संदेह क्यों करें कि हमारा शाश्वत पिता हमारी देख भाल करेगा या नहीं? भगवान के संरक्षण में दृढ़तापूर्वक विश्वास करना शरणागति का तीसरा स्वरूप है।
4. भगवान के प्रति कृतज्ञता की भावना रखनाः भगवान द्वारा हमें अनेक उपहार प्राप्त होते हैं। पृथ्वी जिस पर हम चलते हैं। सूर्य का प्रकाश जिससे हम देखते हैं तथा वायु जिससे हम श्वास लेते हैं और जल जिसका हम सेवन करते हैं। यह सब हमें भगवान द्वारा प्रदान किया जाता है। वास्तव में भगवान के कारण ही हमारा अस्तित्त्व है। वे हमें जीवन और हमारी आत्मा को चेतना प्रदान करते हैं। हम भगवान को इसके एवज में कोई कर नहीं देते लेकिन हमें भगवान जो भी कुछ प्रदान करते हैं उन सब के लिए हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिए।
इसके विपरीत भावना बनाना अकृतज्ञता है। उदाहरणार्थ पिता अपने पुत्र के लिए बहुत कुछ करता है। इसके लिए पुत्र को अपने पिता के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए लेकिन अगर बच्चा यह प्रतिक्रिया व्यक्त करता है, "मुझे अपने पिता का आभारी क्यों होना चाहिए? इनके पिता ने इनका पालन पोषण किया और यह मेरा कर रहे है।" यह सांसारिक पिता के प्रति अकृतज्ञता है। अपने शाश्वत पिता भगवान द्वारा प्रदत्त अमूल्य उपहारों के लिए उनके प्रति कृतज्ञ होना शरणागति का चौथा स्वरूप हैं।
5. सभी वस्तुओं को भगवान से संबंधित माननाः भगवान ने समस्त संसार की सृष्टि की है। संसार हमारे जन्म से पूर्व से अस्तित्त्व में है और मृत्यु के पश्चात् भी अस्तित्त्व में रहेगा। इसलिए केवल भगवान ही सभी वस्तुओं के वास्तविक स्वामी हैं। जब हम यह सोचते हैं कि कोई वस्तु हमारी है तब हम भगवान के प्रभुत्व को विस्मृत कर देते हैं। इस विषय को इस प्रकार से समझा जा सकता है। जब आप अपने घर में नहीं होते तब कोई आपके घर में प्रवेश करता है। वह आपके कपड़े पहनता है, आपके रैफ्रिजरेटर से खाने पीने की चीजें उठा कर उनका सेवन करता है और आपके बिस्तर पर सो जाता है। जब आप लौट कर घर आते हैं तब उससे क्रोध से पूछते हैं-“तुम मेरे घर में क्या कर रहे हो?" वह कहता है-"मैंने तुम्हारे घर की किसी वस्तु को क्षतिग्रस्त नहीं किया है। मैंने सभी वस्तुओं का भली भांति उपयोग किया है। तुम मुझ पर क्रोधित क्यों हो रहे हो?" तब आप उत्तर देंगे, "भले ही तुमने किसी वस्तु को क्षतिग्रस्त नहीं किया है लेकिन ये सब मेरी है। तुमने मेरी अनुमति के बिना इनका उपयोग किया, तुम चोर हो।" समान रूप से संसार के सभी पदार्थ भगवान के हैं। इस बात को ध्यान में रखो। इस प्रकार से स्वामित्व की भावना को त्यागना शरणागति का पांचवा स्वरूप है।
6. समर्पण की भावना का भी समर्पण करनाः यदि हम अपने द्वारा किए गए शुभ कार्यों पर अभिमान करते हैं तब यह अभिमान हमारे हृदय को अपवित्र करता है और हमने जो भी अच्छा कार्य किया है उसे भी विनष्ट कर देता है। इसी कारण विनम्रता बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है। "यदि मैं कुछ उअच्छा कर पाया तो यह केवल भगवान द्वारा मेरी बुद्धि को उचित दिशा में प्रेरित करने के कारण संभव हुआ। यदि ऐसा न होता तब मैं इसे न कर पाता।" विनम्रता की ऐसी भावना रखना शरणागति का छठा स्वरूप है। यदि हम शरणागति के इन छः बिन्दुओं का पूर्ण रूप से अनुसरण करते हैं तब हम भगवान की शर्तों को पूरा कर पाएंगे और वे हम पर अपनी कृपा बरसायेंगे।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया |
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु || 63||
इस प्रकार से मैंने तुम्हे यह ज्ञान समझाया जो सभी गुह्यों से गुह्यतर है। इस पर गहनता के साथ विचार करो और फिर तुम जैसा चाहो वैसा करो।
गुह्य ज्ञान वह है जो बहुसंख्यक लोगों को ज्ञान नहीं होता। भौतिक विज्ञान के अधिकतर सिद्धांत कुछ शताब्दी पूर्व तक गूढ़ रहस्य थे और कुछ अभी तक भी रहस्य बने हुए हैं। आध्यात्मिक ज्ञान अत्यंत गहन है और प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा इसे समझा नहीं जा सकता। इसे गुरु और शास्त्रों के माध्यम से सीखा जा सकता है, इसलिए इसे रहस्य कहा जाता है। दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने आत्मा के ज्ञान को प्रकट किया था जो गुह्य अर्थात् रहस्यमयी ज्ञान है। 7वें और 8वें अध्याय में उन्होंने अपनी शक्तियों के ज्ञान की व्याख्या की जो गुह्यतर हैं अर्थात् अति रहस्यमयी हैं। नौवें और उसके बाद के अध्यायों में उन्होंने अपनी भक्ति का ज्ञान प्रकट किया जोकि गुह्यतम है अर्थात् सर्वाधिक गूढ़ है। इसी अध्याय के 55वें श्लोक में उन्होंने बताया कि केवल भक्ति द्वारा ही उन्हें उनके साकार रूप में पाया जा सकता है। श्रीकृष्ण अब भगवद्गीता का समापन कर रहे हैं। अर्जुन को अति गुह्यतम ज्ञान देने के बाद अब वे अठारहवें अध्याय के अंतिम श्लोकों में अपना दिव्य उपदेश देते हुए निर्णय का चुनाव अर्जुन पर छोड़ देते है। वे कहते हैं मैंने तुम्हें गहन और गुह्य ज्ञान समझाया है। अब निर्णय तुम्हारे हाथ में है। भगवान राम ने भी अयोध्या वासियों के सम्मुख यही वचन बोले थे।
एक बार रघुनाथ बोलाए।
गुरु द्विज पुरबासी सब आए।।
(रामचरितमानस)
"एक बार भगवान राम ने सब अयोध्यावासियों को बुलाया। गुरु वसिष्ठ सहित सभी उन्हें सुनने के लिए आए।" अपने उपदेश में भगवान श्रीराम ने उन्हें मानव जीवन के लक्ष्य को समझाया और उसे पूरा करने का मार्ग बताया। अंत में उन्होंने निष्कर्ष देते हुए कहा-
नहि अनीति नहि कछु प्रभुताई।
सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई।।
(रामचरितमानस)
"मैंने तुम्हें जो उपदेश दिया वह न तो अनीतिपूर्ण है और न ही बाध्यकर है। इसे ध्यान से सुनो, इस पर चिंतन करो और आगे जो तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो।"
इस प्रकार भगवान ने जीवात्मा को उपलब्ध विकल्पों में से चयन करने की स्वतंत्र इच्छा प्रदान की है। यह अधिकार नियमरहित नहीं है। कोई भी यह निर्णय नहीं कर सकता कि “मैं संसार का अति बुद्धिमान मनुष्य बनूंगा।" पूर्व और वर्तमान जन्मों के अनुसार हमारे विकल्प भी सीमित होते हैं। फिर भी कुछ सीमा तक हम स्वतंत्र इच्छा से युक्त होते हैं क्योंकि हम भगवान के हाथों के कोई यंत्र नहीं है। कई बार लोग प्रश्न करते हैं कि यदि भगवान हमें स्वतंत्र इच्छा प्रदान नहीं करते तब हम कोई भी बुरा कार्य न करते। लेकिन तब हम कोई अच्छा कार्य भी नहीं कर सकते थे। अच्छे कार्य के अवसर के साथ सदैव बुरा करने का जोखिम बना रहता है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह समझना है कि भगवान चाहते हैं हम उनसे अपार प्रेम करें और प्रेम केवल वहीं संभव हो सकता है जहाँ विकल्प हो। मशीन प्रेम नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास चयन करने की स्वतंत्रता नहीं होती। सर्वव्यापी भगवान ने हमें स्वतंत्र इच्छा दी और हमारे लिए कई विकल्पों की व्यवस्था की ताकि हम भगवान का चयन करें और अंततः अपना प्रेम उन पर न्यौछावर करें। सर्वशक्तिमान भगवान जीवात्मा को ईश्वर से प्रेम करने और उसी ईश्वर के शरणागत होने के लिए कदापि बाध्य नहीं करते बल्कि इसका निर्णय सांसरिक जीवात्मा को स्वयं लेना पड़ता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन का ध्यान उसकी इस स्वतंत्र इच्छा की ओर आकर्षित करने का प्रयास करते हैं और उसे चुनने के लिए कहते हैं।
सर्वगुह्यतमं भूय: शृणु मे परमं वच: |
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् || 64||
पुनः मेरा परम उपदेश सुनो जो सबसे श्रेष्ठ गुह्य ज्ञान है। मैं इसे तुम्हारे लाभ के लिए प्रकट कर रहा हूँ क्योंकि तुम मेरे प्रिय मित्र हो।
शिक्षक को गूढ विषय की जानकारी हो सकती है किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि वह इसे शिष्यों को भी बताएँ। इसे संझा करने से पूर्व वह कई चीजों पर विचार करता है जैसे क्या विद्यार्थी इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए तत्पर हैं, क्या वे इसे समझ पाएंगे और इससे उन्हें क्या लाभ होगा? भगवद्गीता के आरंभ में अर्जुन अपने सम्मुख खड़ी समस्याओं के कारण उलझन में था और उसने श्रीकृष्ण को मार्गदर्शन प्रदान करने का आग्रह किया। श्रीकृष्ण ने अठारह अध्यायों में थोड़ा-थोड़ा करके उसके ज्ञान को उन्नत किया। यह ज्ञात होने के पश्चात् कि अर्जुन उनके उपदेशों को भली भांति समझ चुका है, अब श्रीकृष्ण आश्वस्त होते हैं कि वह अंतिम और अति गहन ज्ञान को अच्छी तरह से ग्रहण करने के योग्य हो गया होगा। आगे वे कहते हैं- " इष्टोऽसि मे दृढमिति" इसका अर्थ यह है कि मैं तुम्हें इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि तुम मेरे परम प्रिय मित्र हो। इसलिए मुझे तुम्हारी अत्यधिक चिंता है और मैं वास्तव में तुम्हारा हित चाहता हूँ।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे || 65||
सदा मेरा चिंतन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी अराधना करो, मुझे प्रणाम करो, ऐसा करके तुम निश्चित रूप से मेरे पास आओगे। मैं तुम्हें ऐसा वचन देता हूँ क्योंकि तुम मेरे अतिशय प्रिय मित्र हो।
नौंवे अध्याय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को वचन दिया था कि वे उसे अति गुह्य ज्ञान प्रदान करेंगे और फिर उसके पश्चात् भक्ति की महिमा का वर्णन करेंगे। यहाँ वे पुनः नौवें अध्याय के 34 वें श्लोक की प्रथम पंक्ति को दोहराते हैं और अर्जुन को उनकी भक्ति में लीन होने के लिए कहते हैं। श्रीकृष्ण के लिए गहन प्रेम विकसित कर मन को सदैव उनकी भक्ति में तल्लीन रखने से अर्जुन सुनिश्चित रूप से अपने परम लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा। भगवान की भक्ति में पूर्णतया तल्लीन होने का सबसे उपर्युक्त उदाहरण राजा अम्बरीष का है। श्रीमद्भागवतम् में इसे इस प्रकार से वर्णित किया गया है
स वै मनः कृष्णपदारविन्दयोर्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने ।
करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु श्रुतिं चकाराच्युतसत्कथोदये ।।
मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने दृशौ तभृत्यगात्रस्पर्शेऽङ्गसंङ्गमम् ।
घ्राणं च तत्पादसरोजसौरभे श्रीमत्तुलस्या रसनां तदर्पिते ।।
पादौ हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे शिरो हृशीकेशपदाभिवन्दने।
कामं च दास्ये न तु कामकाम्यया यथोत्तमश्लोकजनाश्रया रतिः।।
(श्रीमद्भागवतम्-9.4.18-20)
"अम्बरीष ने भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों में अपने मन को तल्लीन रखा। उसने अपनी सुन्दर वाणी को भगवान की अप्रतिम महिमा का गुणगान करने में, अपने दोनों हाथों को भगवान के मंदिर को स्वच्छ करने में और अपने कानों को भगवान की दिव्य लीलाओं को ध्यानपूर्वक सुनने में लगाया। उसने अपनी आंखों को भगवान की मूर्ति देखने, अपने अंगों से भक्तों के शरीर को स्पर्श करने, अपनी नासिका को भगवान के चरण कमलों में अर्पित तुलसी की सुगंध लेने में, अपनी जिह्वा को भगवान को अर्पित प्रसाद का स्वाद चखने, अपने पावों को भगवान के तीर्थ स्थानों की यात्रा करने में और अपने शीश को भगवान के चरणों में झुकाने में लगाया। उन्होंने सभी प्रकार की सामग्रियों जैसे फूल, माला और चंदन की लकड़ियाँ भगवान की सेवा में अर्पित की। उन्होंने यह सब किसी निजी स्वार्थ के लिए नहीं किया। बल्कि शुद्धिकरण द्वारा केवल भगवान की निःस्वार्थ सेवा प्राप्त करने के लिए किया। सच्चे हृदय से भगवान की भक्ति में लीन होने का उपदेश सभी शास्त्रों का सार है और सभी प्रकार के ज्ञान से श्रेष्ठ है। तथापि श्रीकृष्ण द्वारा प्रकट यह ज्ञान अति गुह्य नहीं था क्योंकि वे पहले भी इसका उल्लेख कर चुके हैं। अब वे अगले श्लोक में इस परम रहस्य को प्रकट करेंगे।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: || 66|
सभी प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और केवल मेरी शरण ग्रहण कर दो। मैं तुम्हें समस्त पाप कर्मों से मुक्त कर दूंगा, डरो मत।
अब तक श्रीकृष्ण अर्जुन को एक साथ दो काम करने के लिए कहते आये हैं- वह अपने मन को भक्ति में तल्लीन करे और शरीर से अपने सांसारिक कर्तव्यों का निर्वहन करे। इस प्रकार से वे अर्जुन से यह चाहते थे कि वह अपने क्षत्रिय धर्म का त्याग न करे लेकिन साथ-साथ भक्ति भी करता रहे। यह कर्मयोग का सिद्धांत है। अपने इस उपदेश के विपरीत अब श्रीकृष्ण कहते हैं कि अपने सांसारिक धर्मों का पालन करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है। अर्जुन सभी सांसारिक कर्त्तव्यों का त्याग कर सकता है और केवल भगवान की शरणागति ग्रहण कर सकता है। यह कर्म संन्यास का सिद्धान्त है। यहाँ कोई यह प्रश्न कर सकता है कि यदि हम अपने समस्त सांसारिक धर्मों का त्याग करते है तब फिर क्या हमें पाप नहीं लगेगा?
श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि डरो मत, वे उसे सभी पापों से दोष मुक्त कर देंगे और उसे माया से भी मुक्ति प्रदान करेंगे।
श्रीकृष्ण के उपदेश को समझने के लिए हमें धर्म के अर्थ को जानना होगा। यह शब्द 'धृ' धातु से बना है। जिसका अर्थ है 'धारण करने योग्य' या 'उत्तरदायित्व, कर्त्तव्य, विचार और वे कार्य जो हमारे लिए उपयुक्त' है। वास्तव में दो प्रकार के धर्म हैं-शारीरिक धर्म और आध्यात्मिक धर्म। ये दोनों प्रकार के धर्म 'आत्मा' को समझने की दो विभिन्न धारणाओं पर आधारित हैं। जब हम शरीर के रूप में अपनी पहचान करते है, तब हमारी शारीरिक उपाधियों, दायित्वों, कर्तव्यों और नियमों के अनुसार हमारा धर्म निर्धारित होता है। इसलिए शारीरिक माता-पिता की सेवा करना, सामाजिक और राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों का निर्वहन आदि सब शारीरिक धर्म हैं। इसे अपर धर्म या शारीरिक धर्म भी कहते हैं। इस धर्म में ब्राह्मण, क्षत्रिय धर्म आदि भी सम्मिलित है लेकिन जब हम अपनी पहचान आत्मा के रूप में करते हैं तब हमारे वर्ण और आश्रम नहीं होते। आत्मा का पिता, माता, सखा, प्रियतम और आश्रय सब भगवान होता है। इसलिए हमारा एकमात्र धर्म प्रेममयी भक्ति से भगवान की सेवा करना है। इसे परधर्म या आध्यात्मिक धर्म भी कहा जाता है। यदि कोई शारीरिक धर्म का त्याग करता है तब इसे कर्त्तव्य से विमुख होने के कारण पाप माना जाता है। लेकिन जब कोई अपने शारीरिक
धर्म का त्याग करता है और आध्यात्मिक धर्म का आश्रय लेता है तब इसे पाप नहीं माना जाता है।
श्रीमद्भागवतम् में इस प्रकार का वर्णन किया गया है
देवर्षिभूताप्तनृणां पितृणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्।
सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्
(श्रीमद्भागवतम्-11.5.41)
इस श्लोक में यह समझाया गया है कि जो भगवान के शरणागत नहीं होते उन पर पाँच प्रकार के ऋण होते हैं। ये ऋण है-स्वर्ग के देवताओं के प्रति, ऋषियों के प्रति, पितरों के प्रति, अन्य मनुष्यों के प्रति और अन्य जीवों जैसे अतिथियों और कुटुम्बियों के प्रति। वर्णाश्रम पद्धति में इन सब ऋणों से स्वयं को मुक्त करने के लिए विविध प्रकार की प्रक्रियाएँ निश्चित की गयी हैं। लेकिन जब हम भगवान के शरणागत होते हैं तब हम इन सभी ऋणों से स्वतः मुक्त हो जाते हैं। जिस प्रकार से वृक्ष की जड़ को जल देने से जल स्वतः उसकी शाखाओं, तनों, पत्तियों, पुष्पों और फलों को प्राप्त हो जाता है। समान रूप से भगवान के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने से हम स्वतः सभी के प्रति अपने कर्त्तव्यों को पूरा कर लेते हैं। इसलिए यदि हम समुचित रूप से आध्यात्मिक धर्म में स्थित हो जाते हैं तब शारीरिक धर्म का त्याग करने से कोई पाप नहीं लगता। वास्तव में पूर्ण और सच्चे हृदय से आध्यात्मिक धर्म में लीन रहना ही परम लक्ष्य है।
श्रीमद्भागवतम् में निम्न प्रकार से वर्णन किया गया है
आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयाऽऽदिष्टानपि स्वकान्।
धर्मान् सन्त्यज्य यः सर्वान् मां भजेत स सत्तमः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.11.32)
"मैंने शास्त्रों में शारीरिक धर्म का पालन करने के संबंध में असंख्य उपदेश दिए हैं लेकिन जो इनमें दोष देखते हैं और केवल मेरी भक्तिपूर्ण सेवा में तल्लीन रहने के लिए अपने सभी निर्धारित कर्मों का त्याग कर देते हैं। मैं उन्हें मेरा सबसे उत्तम साधक मानता हूँ। रामायण में हमने भी पढ़ा है कि लक्ष्मण किस प्रकार अपने शारीरिक कर्तव्यों को त्याग कर भगवान राम के साथ वन में गए।
गुरु पितु मातु न जानहु काहू। कहहु सुभाऊ नाथ पतियाऊ।।
मोरे सबहिं एक तुम स्वामी। दीनबन्धु उर अन्तरयामी।।
"हे भगवान! कृपया मुझ पर विश्वास करें। मैं अपने गुरु, पिता, माता आदि को नहीं जानता। जहाँ तक मैं जानता हूँ, तुम पतितों के रक्षक और सभी के हृदयों की बात जानने वाले अन्तर्यामी हो तथा मेरे स्वामी और सब कुछ हो" प्रह्लाद ने भी इसी प्रकार से कहा
माता नास्ति पिता नास्ति नास्ति मे स्वजनो जनः
"मैं किसी माता, पिता और कुटुम्ब को नहीं जानता, भगवान ही मेरे सब कुछ हैं।" भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्रमशः उच्च उपदेश दिए। आरम्भ में उन्होंने अर्जुन को कर्म करने को कहा अर्थात् योद्धा के रूप में शारीरिक धर्म का पालन करने का उपदेश दिया। (श्लोक 2.31) लेकिन शारीरिक धर्म के पालन से भगवत्प्राप्ति नहीं होती। इससे स्वर्ग के उच्च लोक प्राप्त होते हैं और एक बार जब पुण्य कर्म क्षीण हो जाते हैं तब मनुष्य को लौट कर पुनः संसार में आना पड़ता है। इसलिए फिर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का पालन करने का उपदेश दिया। इसका तात्पर्य शरीर से संसारिक कर्तव्यों का निर्वहन और मन से आध्यात्मिक धर्म का पालन करना है। उन्होंने अर्जुन को से साथ युद्ध लड़ने और मन से भगवान का स्मरण करने को कहा (श्लोक 8.7)। भगवद्गीता में कर्मयोग का यह उपदेश मुख्य है। अब अंत में श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म संन्यास का उपदेश देते हैं जिसका तात्पर्य सभी सांसारिक कर्तव्यों का त्याग करना और आध्यात्मिक धर्म को अंगीकार करना है। अर्जुन को केवल योद्धा के रूप में अपने धर्म का पालन करना चाहिए बल्कि उसे ऐसा इसलिए करना चाहिए क्योंकि भगवान उससे यह करवाना चाहते हैं।
लेकिन श्री कृष्ण ने अर्जुन को यह उपदेश पहले क्यों नहीं दिया? उन्होंने पाँचवे अध्याय के दूसरे श्लोक में कर्मयोग को कर्म संन्यास से श्रेष्ठ बताने वाले अपने कथन के विपरीत अब कर्म संन्यास की स्पष्ट रूप से प्रशंसा क्यों की? भगवान श्रीकृष्ण अगले श्लोक में इसे भली भांति समझाएंगे।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन |
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति || 67||
यह उपदेश उन्हें कभी नहीं सुनाना चाहिए जो न तो संयमी है और न ही उन्हें जो भक्त नहीं हैं। इसे उन्हें भी नहीं सुनाना चाहिए जो आध्यात्मिक विषयों को सुनने के इच्छुक नहीं हैं और विशेष रूप से उन्हें भी नहीं सुनाना चाहिए जो मेरे प्रति द्वेष रखते हैं।
पिछले अध्याय में श्रीकृष्ण ने यह समझाया था कि यदि कोई भगवान की प्रेममयी भक्ति में स्थित हो जाता है तब सांसारिक कर्तव्यों का त्याग करने से उसे कोई पाप नहीं लगता। लेकिन इसमें एक समस्या है। यदि हम अभी तक भगवान की प्रेममयी भक्ति में स्थित नहीं हो पाए है और अपरिपक्व अवस्था में ही अपने संसारिक दायित्वों से विमुख हो जाते हैं तब हम न तो इस लोक के और न ही परलोक के रहेंगे। अतः कर्म संन्यास केवल उनके लिए है जो इसके पात्र हैं। हमारी पात्रता क्या है? इसका निर्धारण हमारा आध्यात्मिक गुरु ही कर सकता है जो हमारी क्षमताओं और इस मार्ग में आने वाली कठिनाइयों के संबंध में जानता है। यदि कोई विद्यार्थी स्नातक बनना चाहता है तब ऐसा नहीं होता कि वह सीधे स्नातक की डिग्री वितरित वाले समारोह में उपस्थित हो जाए। हमें इसके लिए प्रथम कक्षा से क्रमशः अध्ययन करना पड़ेगा। समान रूप से बहुसंख्यक लोग कर्मयोग के पात्र हैं किंतु यदि वे अपरिपक्व अवस्था में संन्यास लेते हैं तब यह मूर्खता होगी। उन्हें यह निर्देश देना उत्तम होगा कि वह पहले अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करें और साथ-साथ भक्ति का अभ्यास भी करते रहें। इसी कारण से श्रीकृष्ण इस श्लोक में कहते हैं कि यह गुह्य ज्ञान जो उसे प्रदान किया गया है वह सबके लिए नहीं है। अन्य लोगों को यह ज्ञान देने से पूर्व उनकी पात्रता को परखना चाहिए।
यह संदेश जागरूकता शब्द विशेष रूप से पिछले श्लोक के गुह्य उपदेशों पर लागू होता है किंतु सामान्य रूप से यह भगवद्गीता का व्यापक सन्देश है। यदि इसे भगवान श्रीकृष्ण से द्वेष रखने वाले व्यक्ति को सुनाया जाता है तब वह यह प्रतिक्रिया देगा-"श्रीकृष्ण अभिमानी हैं। वह अर्जुन को अपनी स्तुति करने के लिए कहते रहते हैं।" इस उपदेश का अनर्थ करने से श्रद्धाविहीन श्रोता को इस दिव्य संदेश से हानि होगी। पद्मपुराण में इस प्रकार से कहा गया है
अश्रद्दधाने विमुखेऽप्यशृण्वति यश् चोपदेशः शिवनामापराधः।
(पद्म पुराण)
" श्रद्धाविहीन श्रोता और भगवान से द्वेष रखने वाले को यह अलौकिक उपदेश देकर हम उन्हें अपराधी बनाने का कारण बनेंगे।" इसलिए श्रीकृष्ण उपर्युक्त श्लोक में श्रोताओं की अयोग्यताओं का वर्णन करते हैं।
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति |
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय: || 68||
वे जो इस अति गुह्य ज्ञान को मेरे भक्तो को देते हैं, वे अति प्रिय कार्य करते हैं। वे निःसंदेह मेरे धाम को आएंगे।
श्रीकृष्ण अब भगवद्गीता के संदेश को समुचित रूप से प्रचारित करने के फल का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि ऐसे प्रचारक सर्वप्रथम पराभक्ति प्राप्त करते हैं और तत्पश्चात् उन्हें पा लेते हैं।
भक्ति में तल्लीन होने का अवसर पाना भगवान की विशेष कृपा है। लेकिन अन्य लोगों को भक्ति करने में सहायता करने का अवसर प्राप्त होना उससे भी बड़ी कृपा है, जिससे भगवान की और भी विशेष कृपा प्राप्त होती है। जब हम अच्छे विचारों को दूसरों के साथ बांटते हैं तब हम भी इससे लाभान्वित होते हैं। जब हम अपने ज्ञान को दूसरों के साथ बांटते हैं तब भगवान की कृपा से हमारा ज्ञान भी बढ़ता है। प्रायः दूसरों को भोजन खिलाने से हम कभी भूखे नहीं रह सकते। संत कबीर ने भी ऐसा कहा है-
दान दिए धन न घटे, नदी घटे न नीर
अपने हाथ देख लो यों क्या कहे कबीर ?
"दान देने से धन की कमी नहीं होती और नदी से जल लेने से नदी सूख नहीं जाती। मैं यह सब निराधार नहीं कह रहा। इसे तुम स्वयं संसार में देख सकते हो।" इस प्रकार से जो भगवद्गीता के अध्यात्मिक ज्ञान को दूसरों के साथ बांटते हैं वे स्वयं सर्वोत्तम कृपा प्राप्त करते हैं।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम: |
भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि || 69||
कोई भी मनुष्य उनसे अधिक मेरी सेवा नहीं करता और इस पृथ्वी पर मुझे उनसे प्रिय न तो कोई है और न ही होगा।
सभी प्रकार के उपहारों में आध्यात्मिक ज्ञान का उपहार सर्वश्रेष्ठ है। राजा जनक ने अपने गुरु से पूछा था-"जो अलौकिक ज्ञान आपने मुझे प्रदान किया वह इतना अमूल्य है कि मैं आपका ऋणी हो गया हूँ। इसके एवज में मैं आपको क्या दे सकता हूँ?" गुरु अष्टवक्र ने उत्तर दिया-"कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जिसे देकर तुम इस ऋण से उऋण हो सकते हो क्योंकि मैंने तुम्हें जो ज्ञान दिया है वह दिव्य है और तुम्हारे अधिकार में जो कुछ भी है वह सब भौतिक है। संसारिक पदार्थों से दिव्य ज्ञान के मूल्य को कभी नहीं चुकाया जा सकता लेकिन तुम एक काम कर सकते हो। यदि तुम्हें ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा प्रकट करने वाला कोई पुरुष मिलता है तब तुम उसे अपना ज्ञान बाँटों।" यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि भगवद्गीता के ज्ञान को बांट कर कोई भी व्यक्ति भगवान की सर्वोत्तम सेवा कर सकता है। तथापि वे जो भगवद्गीता पर प्रवचन देते हैं उन्हें यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि वे कोई महान कार्य कर रहे हैं। एक शिक्षक की उचित मनोवृति यह होनी चाहिए कि वह स्वयं को भगवान के हाथों में एक कठपुतली के समान समझे और सबका श्रेय भगवान की कृपा को दे।
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयो: |
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति: || 70||
और मैं यह घोषणा करता हूँ कि जो हमारे पवित्र संवाद का अध्ययन करेंगे वे ज्ञान के समर्पण द्वारा (अपनी बुद्धि द्वारा) मेरी पूजा करेंगे, ऐसा मेरा मत है।
श्रीकृष्ण बार-बार अर्जुन से कहते हैं कि वह अपनी बुद्धि उन्हें समर्पित कर दे (श्लोक 8.7, 12.8)। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हम अपनी बुद्धि का प्रयोग करना बंद कर दें। बल्कि इसका अर्थ यह है कि हम अपनी उत्कृष्ट क्षमता के साथ अपनी बुद्धि का प्रयोग जो भगवान की इच्छा है, उसकी पूर्ति के लिए करें। इसे हम भगवद्गीता के संदेश से समझ सकते हैं। इसलिए वे जो इस पवित्र संवाद का अध्ययन करते हैं वे अपनी बुद्धि के द्वारा भगवान की पूजा करते हैं।
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नर: |
सोऽपि मुक्त: शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् || 71||
वे जो श्रद्धायुक्त तथा द्वेष रहित होकर इस ज्ञान को सुनते हैं वे भी पापों से मुक्त हो जाते हैं और मेरे पवित्र लोकों को पाते हैं जहाँ पुण्य आत्माएं निवास करती हैं।
सभी ऐसी बद्धि से संपन्न नहीं होते कि वे श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच के संवाद के गहन अर्थ को समझ सकें। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि ऐसे मनुष्य जो श्रद्धायुक्त होकर केवल इन्हें सुन भी लेते हैं उन्हें भी इसका लाभ प्राप्त होगा। जगद्गुरु शंकराचार्य के शिष्य सानंद की कथा से इस विषय को समझा जा सकता है। वह अनपढ़ था और अन्य शिष्यों के समान अपने गुरु के उपदेशों को समझ नहीं सकता था। लेकिन जब शंकराचार्य अपना प्रवचन देते थे तब वह ध्यानपूर्वक और श्रद्धायुक्त होकर उन्हें सुनता था। एक दिन वह नदी दिन के दूसरे तट पर अपने गुरु के वस्त्र धो रहा था। कक्षा का समय होने पर अन्य शिष्यों ने प्रार्थना की-"गुरुजी, कृपया कक्षा आरम्भ करें।" शंकराचार्य ने उत्तर दिया कि प्रतीक्षा करें क्योंकि सानंद यहाँ नहीं आया है।" शिष्यों ने कहा, "लेकिन गुरुजी, वह कुछ भी नहीं समझ पाता है।" शंकराचार्य ने कहा-"लेकिन फिर भी वह पूर्ण श्रद्धा के साथ मेरे प्रवचन सुनता है और इसलिए मैं उसे निराश नहीं कर सकता।"
तब श्रद्धा की शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए शंकराचार्य ने पुकारा-"सानंद, कृपया यहाँ आओ।" अपने गुरु के शब्दों के सुनकर उसने कोई हिचक नहीं की। वह पानी पर दौड़ने लगा। जनश्रुति है कि वह जहाँ कहीं पर अपने पांव रखता था वहाँ कमल के पुष्प उसकी सहायता के लिए तैरने लगते। वह नदी पार कर दूसरे तट पर आ गया और उसने अपने गुरु को प्रणाम किया। उस समय उसके मुख से संस्कृत में गुरु की महिमा की स्तुति निर्गत हुई। अन्य शिष्य उसको सुनकर अचंभित हुए। चूंकि उसके पैरों के नीचे कमल के पुष्प खिले रहते थे इसलिए उसका नाम 'पदम्पाद पड़ गया' जिसका अर्थ 'अपने पैरों के नीचे कमल के पुष्पों वाला पुरुष' है। सानंद शंकराचार्य के चार प्रमुख शिष्यों सुरेश्वराचार्य, हस्तामलक और तोटकाचार्य में से एक था। उपर्युक्त श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि वे जो उनके पवित्र संवाद को केवल पूर्ण श्रद्धा के साथ सुनते है, वे शनैः शनैः पवित्र हो जाते हैं।
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा |
कच्चिदज्ञानसम्मोह: प्रनष्टस्ते धनञ्जय || 72||
हे पार्थ! क्या तुमने एकाग्रचित्त होकर मुझे सुना? हे धनंजय! क्या तुम्हारा अज्ञान और मोह नष्ट हुआ?
श्रीकृष्ण ने अर्जुन के गुरु की भूमिका का निर्वहन किया। गुरु का कर्तव्य है कि वह यह परखे कि उसके शिष्य ने विषय को पूर्णरूप से ग्रहण किया है या नहीं? श्रीकृष्ण के प्रश्न करने का करने का अभिप्राय यह था कि यदि अर्जुन इस ज्ञान को समझ नहीं पाया तब ऐसी स्थिति में वे उसे पुनः विस्तारपूर्वक समझाने के लिए तैयार हैं।
अर्जुन उवाच |
नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत |
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव || 73||
अर्जुन ने कहाः हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है। अब मैं ज्ञान में स्थित हूँ। मैं संशय से मुक्त हूँ और मैं आपकी आज्ञाओं के अनुसार कर्म करूंगा।
प्रारम्भ में अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में था। संशययुक्त वह अपने कर्तव्य पालन के प्रति उलझन में था। शोकाकुल होकर वह अपने रथ पर एक ओर बैठ गया और उसने अपने शस्त्रों को नीचे रख दिया। वह यह स्वीकार कर लेता है कि वह अपने उन दुःखों का निदान नहीं ढूंढ पा रहा जो उसके शरीर और इन्द्रियों पर आक्रमण कर रहे थे। लेकिन अब वह स्वयं में पूर्णतया परिवर्तन देखता है और घोषित करता है कि वह ज्ञान में स्थित हो गया है और अब वह व्यथित नहीं है। उसने स्वयं को भगवान की इच्छा के अधीन कर दिया और कहा कि वह वही करेगा जैसा श्रीकृष्ण उसे आदेश देंगे। यह भगवद्गीता के संदेश का ही प्रभाव था। तथापि आगे उसने कहा "त्वत्प्रसादान्मयाच्युत" जिसका यह अर्थ है-“हे श्रीकृष्ण! यह केवल आपका उपदेश ही नहीं है बल्कि यह आपकी कृपा है जिससे मेरा अज्ञान दूर हुआ है।"
लौकिक ज्ञान में कृपा की आवश्यकता नहीं होती। हम शिक्षण संस्थानों को या शिक्षकों को शुल्क देकर ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान का इस प्रकार क्रय विक्रय नहीं किया जा सकता। यह कृपा द्वारा ही प्रदान किया जा सकता है और इसे विनम्रतापूर्वक श्रद्धा से प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार यदि हम भगवद्गीता पर अभिमान की भावना से चर्चा करते हैं कि “मैं अति बुद्धिमान हूँ। मैं इसके संदेश की कुल उपयोगिता का मूल्यांकन करूँगा।" तब हम इसे समझने में कभी समर्थ नहीं हो पाएंगे। हमारी बुद्धि इस ग्रंथ में दोष ढूंढकर उनपर अपना ध्यान केंद्रित करेगी और इसी तरह हम संपूर्ण ग्रंथ को त्रुटिपूर्ण मानते हुए अस्वीकार कर देंगे।
भगवद्गीता पर अनेक भाष्य लिखे गए और इसके दिव्य संदेश के असंख्य पाठक हैं। लेकिन इनमें से कितने लोग अर्जुन के समान प्रबुद्ध हुए? यदि हम वास्तव में यह ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं तब केवल इसे पढ़ना पर्याप्त नहीं बल्कि श्रद्धा से युक्त होकर प्रेमपूर्वक समर्पण द्वारा भगवान की कृपा प्राप्त करनी होगी। तब हम उनकी कृपा से भगवद्गीता का अभिप्राय समझ सकेंगे।
सञ्जय उवाच |
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मन: |
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् || 74||
संजय ने कहाः इस प्रकार से मैंने वासुदेव श्रीकृष्ण और उदारचित्त पृथापुत्र अर्जुन के बीच अद्भुत संवाद सुना। यह इतना रोमांचकारी संदेश है कि इससे मेरे शरीर के रोंगटे खड़े हो गए हैं।
इस प्रकार संजय भगवद्गीता के दिव्य उपदेश के अवसान की ओर आता है। वह अर्जुन को महात्मा कहकर संबोधित करता है क्योंकि उसने श्रीकृष्ण के उपदेशों और आज्ञाओं को ग्रहण किया। इसलिए वह श्रेष्ठ विद्वान बन गया। संजय अब अभिव्यक्त करता है कि उनके दिव्य संवादों को सुनकर वह इस प्रकार से अचंभित और स्तंभित हुआ जिससे उसके शरीर के रोंगटे खड़े हो गये जो भाव भक्ति का एक लक्षण है।
भक्तिरसामृतसिंधु में इस प्रकार से वर्णन किया गया है-
स्तम्भ स्वेदोऽथ रोमाञ्चः स्वरभेदोऽथ वेपथुः।
वैवर्ण्यमश्रुप्रलय इत्यष्टौ सात्त्विकाः स्मृताः।।
"भाव भक्ति के आठ लक्षण हैं-जड़वत् हो जाना, पसीना निकलना, रोंगटे खड़े होना, वाणी अवरुद्ध होना कांपना, मुख का रंग पीला पड़ना, आँसू बहाना और मूर्च्छित होना।" संजय भक्तिपूर्ण मनोभावनाओं की इतनी गहन अनुभूति कर रहा है कि दिव्य आनन्द से उसके शरीर के रोंगटे खड़े हो गये। अब कोई यह प्रश्न कर सकता है कि संजय के लिए युद्ध क्षेत्र में अत्यंत दूर हो रहे इस वार्तालाप को सुनना कैसे संभव हुआ? इसका वर्णन वह अगले श्लोक में करता है।
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् |
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयत: स्वयम् || 75||
वेदव्यास की कृपा से मैंने इस परम गुह्य योग को साक्षात् योगेश्वर श्रीकृष्ण से सुना।
श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास देव को ऋषि वेदव्यास के नाम से भी जाना जाता है। वे संजय के आध्यात्मिक गुरु थे। अपने गुरु की कृपा से संजय को दिव्य दृष्टि का वरदान प्राप्त हुआ था। इसलिए वह हस्तिनापुर के राजमहल में बैठकर कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर घटित घटनाओं को देख सके। यहाँ संजय स्वीकार करटी हैं कि यह उनके गुरु की कृपा थी जिसके कारण उन्हें स्वयं योग के स्वामी श्रीकृष्ण से योग के परम ज्ञान का श्रवण करने का अवसर प्राप्त हुआ।
ब्रह्मसूत्र, पुराणों, महाभारत आदि के रचयिता वेदव्यास भगवान के अवतार थे और वे स्वयं सभी प्रकार की दिव्य शक्तियों से संपन्न थे। इस प्रकार से उन्होंने न केवल श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुए वार्तालाप को सुना बल्कि संजय और धृतराष्ट्र के बीच हुई वार्ता को भी सुना। अतः उन्होंने भगवद्गीता का संकलन करते हुए दोनों के संवादों को भी सम्मिलित किया।
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् |
केशवार्जुनयो: पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहु: || 76||
हे राजन्! जब-जब मैं परमेश्वर श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुए इस चकित कर देने वाले अद्भुत संवाद का स्मरण करता हूँ तब-तब मैं पुनः पुनः हर्षित होता हूँ।
आध्यात्मिक अनुभूति ऐसा आनन्द प्रदान करती है जो सकल सांसारिक सुखों से कई गुणा अधिक संतोषप्रद होती है। संजय इस सुख से प्रमुदित हो रहा था और इसे वह धृतराष्ट्र के साथ भी सांझा करता है। इस अद्भुत संवाद को ध्यान में रखकर और उसका स्मरण करके उसे दिव्य आनन्द की अनुभूति हो रही है, जिससे इस ग्रंथ में निहित ज्ञान की प्रतिष्ठा और भगवान की लीला, जिसका संजय साक्षी था, की दिव्यता प्रकट होती है।
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरे: |
विस्मयो मे महानराजन्हृष्यामि च पुन: पुन: || 77||
भगवान श्रीकृष्ण के अति विस्मयकारी विश्व रूप का स्मरण कर मैं अति चकित और बार-बार हर्ष से रोमांचित हो रहा हूँ।
अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से उनके विराट रूप का दर्शन करने के लिए दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई थी उस रूप को विरले योगी ही देख सकते हैं। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि वे उसे अपना विराट रूप दिखा रहे हैं क्योंकि अर्जुन उनका भक्त और सखा था और इसलिए वह उनका अति प्रिय था। संजय भी भगवान के विराट रूप को देख सके क्योंकि सौभाग्यवश वह भगवान की लीला में सूत्रधार की भूमिका का निर्वहन कर रहे थे। जीवन में कई बार ऐसे अवसर आते हैं जब हमें अकारण कृपा प्राप्त होती है। यदि हम उचित ढंग से इसका प्रयोग करते हैं तब हम तीव्रता से अपनी साधना में उन्नति करते हैं। संजय ने जो देखा उसका वह बार-बार चिन्तन कर रहा है और भक्ति की धारा में बह रहा है।
यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: |
तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्रुवा नीतिर्मतिर्मम || 78||
जहाँ योग के स्वामी श्रीकृष्ण और श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन हैं वहाँ निश्चित रूप से अनन्त ऐश्वर्य, विजय, समृद्धि और नीति होती है, ऐसा मेरा मत है।
इस गहन कथन को संप्रेषित करते हुए भगवद्गीता का समापन होता है। धृतराष्ट्र युद्ध के परिणाम से भयभीत था। संजय उसे सूचित करता है कि शक्ति और दोनों पक्षों की सेना के सैनिकों की संख्या का आंकलन करना व्यर्थ है। इस युद्ध का एक ही निर्णय हो सकता है कि विजय सदैव उसी पक्ष की होगी जहाँ भगवान और उसके सच्चे भक्त हैं और इसलिए अच्छाई, प्रभुता, समृद्धि और प्रचुरता भी वहीं होगी।
भगवान स्वतंत्र हैं एवं संसार के स्वामी हैं और श्रद्धा तथा पूजा के परम लक्ष्य हैं। "न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते" (श्वेताश्वतरोपनिषद् 6.8) अर्थात् उनके बराबर कोई नहीं, कोई भी उनसे बड़ा नहीं। तात्पर्य यह है कि उनसे बड़ा तो दूर उनके समान ही कोई नहीं दिखता। अपनी अतुलनीय महिमा को प्रकट करने के लिए उन्हें एक माध्यम की आवश्यकता होती है। जो जीवात्मा उनके शरणागत होती है वह भगवान के महिमामण्डन के लिए माध्यम बनती है। इसलिए परमेश्वर और उनके सच्चे भक्त जहाँ उपस्थित रहते हैं वहाँ परम सत्य का प्रकाश सदैव असत्य के अंधकार को परास्त कर देता है।
।। श्रीमद्भागवत गीता अष्टदश अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
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