॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhagavad Geeta Chapter 13
श्रीमद्भगवद गीता त्रयोदश अध्याय
अध्याय तेरह: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग
योग द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभेद को जानना
भगवद्गीता में कुल अठारह अध्याय हैं। इनका तीन खण्डों में विभाजन किया जा सकता है। प्रथम खण्ड के छः अध्यायों में कर्मयोग का वर्णन किया गया है। दूसरे खण्ड में भक्ति की महिमा और भक्ति को पोषित करने का की विधि वर्णन हुआ है। इसमें भगवान के ऐश्वर्यों का भी वर्णन किया गया है। तीसरे खण्ड के छः अध्यायों में तत्त्वज्ञान पर चर्चा की गयी है। यह तीसरे खण्ड का प्रथम अध्याय है। यह दो शब्दों क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (शरीर का ज्ञाता) से परिचित कराता है। हम शरीर को क्षेत्र के रूप में और शरीर में निवास करने वाली आत्मा को शरीर के ज्ञाता के रूप में स्वीकार कर सकते हैं। किंतु क्षेत्र का अर्थ वास्तव में अधिक व्यापक हैं। इसमें मन, बुद्धि, अहंकार और माया (प्राकृत) शक्ति के अन्य सभी घटक भी सम्मिलित हैं, जिनसे हमारा व्यक्तित्त्व निर्मित होता है। अतः देह के अंतर्गत आत्मा को छोड़कर हमारे व्यक्तित्व के सभी पहलू सम्मिलित हैं। जिस प्रकार किसान खेत में बीज बो कर खेती करता है। इसी प्रकार से हम अपने शरीर को शुभ-अशुभ विचारों और कर्मों से पोषित करते हैं और अपना भाग्य बनाते हैं।
महात्मा बुद्ध ने कहा है-"हम जैसा सोचते हैं वही हमारे सामने परिणाम के रूप में आ जाता है" इसलिए हम जैसे सोचते हैं वैसे बन जाते हैं। महान अमेरिकी विचारक राल्फ वाल्डो एमर्सन ने कहा है-"विचार ही सभी कर्मों का जनक है।" इसलिए हमें शुभ विचारों और कर्मों से अपने शरीर को पोषित करने की विधि सीखनी चाहिए। इसके लिए शरीर और शरीर के ज्ञाता के बीच के भेद को जानना आवश्यक है।
इस अध्याय में श्रीकृष्ण इस भेद का विस्तृत विश्लेषण करते हैं। वे माया के उन तत्त्वों की गणना करते हैं जिनसे शरीर की रचना होती है। वे शरीर में होने वाले भावनाओं, मत, दृष्टिकोण आदि का वर्णन करते हैं। वे उन गुणों और विशेषताओं का भी उल्लेख करते हैं जो मन को शुद्ध और उसे ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करते हैं। इस ज्ञान से आत्मा की अनुभूति करने में सहायता मिलती है। तत्पश्चात् इस अध्याय में भगवान के स्वरूप का अद्भुत वर्णन किया गया है। भगवान विरोधी गुणों के अधिष्ठाता हैं, अर्थात् वे एक ही समय में विरोधाभासी गुणों को प्रकट करते हैं। इस प्रकार से वे सृष्टि में सर्वत्र व्यापक भी हैं और सभी के हृदयों में भी निवास करते हैं। इसलिए वे सभी जीवों की परम आत्मा हैं। आत्मा, परमात्मा और माया शक्ति का वर्णन करने के पश्चात् श्रीकृष्ण आगे यह व्याख्या करते हैं कि जीवों द्वारा किए जाने वाले कर्मों के लिए इनमें से कौन उत्तरदायी है? और संसार में कारण और कार्य का करता कौन है? वे जिन्हें इसे भेद का बोध हो जाता है और जो भली भांति कर्म के कारण को जान लेते हैं, वही वास्तव में देखते हैं और केवल वही दिव्य ज्ञान में स्थित हो जाते हैं। वे सभी जीवों में परमात्मा को देखते हैं और इसलिए वे किसी को अपने से हीन नहीं समझते। वे एक ही माया शक्ति में स्थित विविध प्रकार के प्राणियों को देख सकते हैं और जब वे सभी अस्तित्त्वों में एक ही सत्ता को देखते हैं तब उन्हें ब्रह्म की अनुभूति होती है।
अर्जुन उवाच |
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च |
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव || 1||
अर्जुन ने कहा-हे केशव! मैं यह जानने का इच्छुक हूँ कि प्रकृति क्या है और पुरुष क्या है तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ क्या है? मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि वास्तविक ज्ञान क्या है और इस ज्ञान का लक्ष्य कौन है?
श्रीभगवानुवाच |
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते |
एतद्यो वेत्ति तं प्राहु: क्षेत्रज्ञ इति तद्विद: || 2||
परम पुरुषोतम भगवान ने कहाः हे अर्जुन! इस शरीर को क्षेत्र (कर्म क्षेत्र) के रूप में परिभाषित किया गया है और जो इस शरीर को जान जाता है उसे क्षेत्रज्ञ (शरीर का ज्ञाता) कहा जाता है।
श्रीकृष्ण शरीर और आत्मा के बीच के भेद के विषय पर चर्चा आरम्भ करते हैं। आत्मा दिव्य है। यह न तो खा, देख, सूंघ, सुन और स्वाद ले सकती है और न ही स्पर्श कर सकती है। यह इन सब क्रियाकलापों को शरीर, मन और बुद्धि के माध्यम से करती है जिन्हें कर्म क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया गया है। आधुनिक विज्ञान में हमें 'उर्जा शक्ति का क्षेत्र' जैसे प्रयोग मिलते हैं। किसी चुम्बक के चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र होता है जो बिजली उत्पन्न करता है। आवेशित बिजली के चारों ओर बल क्षेत्र होता है। इसी प्रकार शरीर मनुष्य के कर्मों का आयतन है। इसलिए इसे क्षेत्र (कर्म क्षेत्र) कहा जाता है। आत्मा शरीर, मन और बुद्धि से भिन्न है किन्तु यह अपनी दिव्य प्रकृति को भुला बैठी है और अपनी पहचान इन भौतिक अस्तित्त्वों के रूप में करती है। किन्तु फिर भी इसे शरीर का ज्ञान होता है इसलिए इसे क्षेत्रज्ञ अर्थात् शरीर के क्षेत्र को जानने वाला कहा जाता है। यह शब्दावली आत्मज्ञानी ऋषियों द्वारा दी गयी है जो आत्मज्ञान में स्थित थे और जिन्होंने शरीर से पृथक् अपनी पहचान को जान लिया था।
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत |
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम || 3||
हे भरतवंशी! मैं समस्त शरीरों के कर्म क्षेत्रों का भी ज्ञाता हूँ। कर्म क्षेत्र के रूप में शरीर को तथा, आत्मा और भगवान को इस शरीर के ज्ञाता के रूप में जान लेना मेरे मतानुसार वास्तविक ज्ञान है।
आत्मा केवल अपने शरीर के कर्म क्षेत्र को जानती है। यहाँ तक कि आत्मा को अपने क्षेत्र की भी अपूर्ण जानकारी ही होती है। भगवान सभी आत्माओं के शरीरों के ज्ञाता हैं, क्योंकि वे परमात्मा के रूप में सभी जीवों के हृदय में वास करते हैं। सभी के शरीरों से संबंधित भगवान का ज्ञान पूर्ण होता है। इन विभेदों की व्याख्या करते हुए श्रीकृष्ण हमें प्राकृत शरीर, आत्मा और परमात्मा तीन अस्तित्त्वों की एक दूसरे से तुलना करते हुए इनकी स्थिति को स्पष्ट करते हैं। इस श्लोक के दूसरे भाग में वह ज्ञान की परिभाषा देते हैं, "आत्मा, परमात्मा और शरीर तथा इनके बीच के अन्तर को समझना वास्तविक ज्ञान है।" ऐसी स्थिति में पी.एच.डी. और डी.लिट. के डिग्रीधारी स्वयं को चाहे विद्वान मानते हों किन्तु यदि वे शरीर, आत्मा और परमात्मा के भेद को नहीं समझ पाते तो श्रीकृष्ण की परिभाषा के अनुसार वे वास्तव में ज्ञानी नहीं हैं।
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् |
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु || 4||
सुनो अब मैं तुम्हें समझाऊंगा कि कर्म क्षेत्र और इसकी प्रकृति क्या है, इसमें कैसे परिवर्तन होते है और यह कहाँ से उत्पन्न हुआ है, कर्म क्षेत्र का ज्ञाता कौन है और उसकी शक्तियाँ क्या हैं?
श्रीकृष्ण अब स्वयं कई प्रश्न करते हैं और अर्जुन को ध्यानपूर्वक उनका उत्तर सुनने के लिए कहते हैं।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधै: पृथक् |
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितै: || 5 ||
ऋषियों ने अनेक रूप से क्षेत्र का और क्षेत्रज्ञ का वर्णन किया है। इसका उल्लेख विभिन्न वैदिक स्तोत्रों और विशेष रूप से ब्रह्मसूत्र में ठोस तर्क और अनेक साक्ष्यों द्वारा प्रकट किया गया है।
ज्ञान बुद्धि को तभी संतुष्ट करता है जब उसकी अभिव्यक्ति स्पष्ट, सटीक और ठोस तर्कों द्वारा की जाती है। पुनः इसे आत्मप्रमाण के रूप से स्वीकार करने हेतु इसकी पुष्टि आप्त्वकता द्वारा करना आवश्यक है। आध्यात्मिक ज्ञान की प्रामाणिकता के लिए वेदों का प्रमाण दिया जाता है।
वेद यह केवल कुछ पुस्तकों का नाम नहीं है। वेद भगवान का शाश्वत ज्ञान है। जब भगवान संसार की रचना करते हैं तब वे जीवात्माओं के कल्याण के लिए वेदों को प्रकट करते हैं।
बृहदारण्यकोपनिषद् (4.5.11) में वर्णन है “निःश्वसितमस्य वेदाः" अर्थात् वेद भगवान के श्वास से प्रकट हुए हैं।" सर्वप्रथम भगवान ने इनका ज्ञान ब्रह्मा जी के हृदय में प्रकट किया। वहाँ से वे 'श्रुति' परम्परा द्वारा पृथ्वी पर आए इसलिए इनको दूसरा नाम 'श्रुति' है अर्थात् 'श्रवण द्वारा प्राप्त ज्ञान।' कलियुग के आरम्भ में महर्षि वेदव्यास जो स्वयं भगवान का अवतार थे, उन्होंने वेदों को ग्रंथ का रूप दिया और इन्हें चार भागों-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में विभाजित किया। इसलिए उनका नाम है वेदव्यास कहलाया अर्थात् 'वह जिन्होंने वेदों का विभाजन किया।' यह ध्यातव्य कि वेदव्यास जी वेदों के संपादक नहीं है वेदों का विभाजन मात्र करने वाले हैं। इसलिए वेदों को कहा जाता है जिसका अर्थ है कि 'किसी व्यक्ति द्वारा रचित न होना।'
भूतम् भव्यं भविष्यच्च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति
(मनुस्मृति-12.97)
"कोई भी आध्यात्मिक सिद्धान्त वेदों द्वारा अवश्य प्रमाणित होना चाहिए। वेदों के ज्ञान के विस्तार के लिए कई ऋषियों ने ग्रंथ लिखे और वे सभी वैदिक ग्रंथों के समूह में सम्मिलित हो गये क्योंकि वे वेदों के अनुगत थे। कुछ महत्त्वपूर्ण वैदिक ग्रंथों का विवरण निम्नांकित है।
इतिहासः ये ऐतिहासिक ग्रंथ हैं। इनकी संख्या दो है-एक रामायण और एक महाभारत। इनमें भगवान के दो महान अवतारों का वर्णन है। रामायण की रचना ऋषि वाल्मीकि ने की थी और इसमें भगवान राम की लीलाओं का वर्णन किया गया है। यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि वाल्मीकि ने इसकी रचना भगवान श्रीराम की लीलाओं के प्रदर्शन से पूर्व की थी। महर्षि वाल्मीकि दिव्य दृष्टि से सम्पन्न थे जिसके कारण वे संसार में भगवान राम द्वारा अवतार लेने से पूर्व राम के अवतार काल में होने वाली लीलाओं को पहले से देख सके। उन्होंने रामायण में लगभग 24000 श्लोक लिखे। इन श्लोकों में विभिन्न संबंधों जैसे कि पुत्र, भाई, पत्नी, राजा और दंपति के लिए आदर्श आचरण की शिक्षा भी निहित है। रामायण भारत की कई क्षेत्रीय भाषाओं में भी लिखी गयी जिससे जनमानस में इसकी लोकप्रियता बढ़ती गयी। इनमें से सबसे अधिक लोकप्रिय रामायण परम रामभक्त गोस्वामी तुलसीदास द्वारा अवधी में रचित रामचरितमानस है।
ऋषि वेदव्यास ने महाभारत की रचना की। इसमें एक लाख श्लोक हैं और इसे विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य माना गया है। श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का वर्णन महाभारत का मूल विषय हैं। इसमें भरपूर ज्ञान भी निहित है। महाभारत में सभी आश्रमों से संबंधित कर्त्तव्यों का ज्ञान, पथ प्रदर्शन और भगवान की भक्ति का विस्तृत वर्णन किया गया है। भागवद्गीता महाभारत का एक भाग है। यह अति लोकप्रिय ग्रंथ है क्योंकि इसमें आध्यात्मिक ज्ञान का सार निहित है जिसका विशद वर्णन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने किया है। इसका विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है। भगवद्गीता पर अनेक भाष्य लिखे गये हैं।
पुराणः महर्षि वेदव्यास ने अठारह पुराण लिखे। इन सब में कुल चार लाख श्लोक हैं। इनमें भगवान के विभिन्न अवतारों और उनके भक्तों का वर्णन है। पुराणों में भरपूर तत्त्वज्ञान है। ये ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, स्थिति और उसके संहार तथा पुनः सृष्टि, मानव जाति के इतिहास, स्वर्ग के देवताओं और संतों की वंशावली का वर्णन करते हैं। इनमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण भागवतपुराण या श्रीमद्भागवतम् है। यह वेदव्यास द्वारा रचित अंतिम ग्रंथ है जिसमें उन्होंने यह उल्लेख किया है कि वे इस ग्रंथ में भगवान के निष्काम प्रेम रूपी परम धर्म को प्रकट कर रहे हैं। तात्त्विक दृष्टि से जहाँ भगवद्गीता समाप्त होती है वहीं श्रीमद्भागवतम् शुरू होती है।
षड् दर्शनः छः ऋषियों ने हिन्दू दर्शन के विशेष पहलुओं पर प्रकाश डालने वाले छः ग्रंथों की रचना की। इन्हें षट्दर्शन के नाम से जाना जाता है।
1. मीमांसाः जैमिनि महर्षि द्वारा रचित इस ग्रंथ में कर्मानुष्ठानों और धर्मानुष्ठानों का वर्णन किया गया है।
2. वेदान्त दर्शनः वेदव्यास द्वारा इस दर्शन में परम सत्य के स्वरूप का वर्णन किया गया
3. न्याय दर्शनः महर्षि गौतम द्वारा इस दर्शन में जीवन और परम सत्य को जानने की
पद्धति का निरूपण किया गया है।
4. वैशेषिक दर्शनः महर्षि कणाद द्वारा सत्रबद्ध यह दर्शन ब्रह्माण्ड का तथा इसके विभिन्न तत्त्वों का विश्लेषण करता है।
5. योग दर्शनः महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित इस दर्शन में योगासनों से आरम्भ करते हुए अष्टांग योग के अनुपालन द्वारा कैवल्य-प्राप्ति का वर्णन किया गया है।
6. सांख्य दर्शनः महर्षि कपिल ने प्रकृति, जो माया शक्ति का आदि रूप है, द्वारा ब्रह्माण्ड के विकास और माया के मूल तत्त्वों का वर्णन किया गया है।
उपर्युक्त ग्रंथों के अतिरिक्त हिन्दू संस्कृति में अन्य सैकड़ों ग्रंथ हैं। यहाँ इन सबका वर्णन करना संभव नहीं है। संक्षेप में यह कह सकते हैं कि वैदिक ग्रंथ दिव्य ज्ञान की अथाह निधि है, जिसमें मानव जाति का कल्याण निहित है। इन सब में ब्रह्म सूत्र (वेदान्त दर्शन) को आत्मा, शरीर और परमात्मा के ज्ञान के विषय पर परम प्रमाण माना गया है। 'वेद' का अर्थ वैदिक ज्ञान है और अन्त का अर्थ 'सार' है। परिणामस्वरूप वेदान्त से तात्पर्य 'वैदिक ज्ञान का सार से है। यद्यपि वेदान्त दर्शन महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित है, किन्तु फिर भी कई विद्वानों ने इसे दार्शनिक शास्त्रार्थ हेतु प्रमाण के रूप में स्वीकार किया और इस पर भाष्य लिखे ताकि आत्मा और परमात्मा के संबंध में अपना भिन्न दार्शनिक दृष्टिकोण स्थापित किया जा सके। जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा वेदान्त दर्शन पर लिखा गया भाष्य शारीरक भाष्य के नाम से जाना जाता है जो अद्वैत दर्शन परम्परा की नींव है। उनके अनुयायियों में कई जैसे वाचस्पति मिश्र और पद्मपाद ने इस पर विस्तार से अपनी टिक्कायें लिखी हैं। जगद्गुरु निम्बार्काचार्य ने 'वेदांत पारिजात सौरभ' लिखा जिसमें द्वैत-अद्वैतवाद की विचारधारा की व्याख्या की गयी है। जगद्गुरु रामानुजाचार्य के भाष्य को "श्री भाष्य' कहा जाता है जो विशिष्ट-अद्वैतवाद का आधार व्यक्त करता है। जगद्गुरु मध्वाचार्य द्वारा लिखा गया भाष्य 'ब्रह्मसूत्र भाष्यम्' कहलाता है जो द्वैतवाद के सिद्धान्त की नींव है। महाप्रभु वल्लभाचार्य ने अणु भाष्य लिखा जिसमें शुद्ध द्वैतवाद दर्शन को स्थापित किया गया। इसके अतिरिक्त अन्य प्रसिद्ध भाष्यकार भट्ट भास्कर, यादव प्रकाश, केशव, नीलकंठ, विज्ञान भिक्षु और बलदेव विद्याभूषण हैं।
चैतन्य महाप्रभु स्वयं वेदों के विद्वान थे, परन्तु उन्होंने वेदांत दर्शन पर कोई भाष्य नहीं लिखा। उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि महर्षि वेदव्यास ने स्वयं घोषित किया है कि उनका अंतिम ग्रंथ श्रीमद्भागवत ही इसका पूर्ण भाष्य है।
अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां सर्वोपनिषदामपि
"श्रीमद्भागवतम् में वेदान्त दर्शन और सभी उपनिषदों का सार और अर्थ प्रकट हुआ है।" इसलिए वेदव्यास के प्रति श्रद्धाभाव और सम्मान के कारण चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं को वेदान्त पर अलग से भाष्य लिखने के योग्य नहीं समझा।
महाभूतान्यङ्कारो बुद्धिरव्यक्त मेव च |
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचरा: || 6||
कर्म का क्षेत्र पाँच महातत्त्वों-अहंकार, बुद्धि और अव्यक्त, ग्यारह इन्द्रियों (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियों और मन) और इन्द्रियों के पाँच विषयों से निर्मित है।
कर्म के क्षेत्र का निर्माण करने वाले चौबीस तत्त्व-पंचमहाभूत (पाँच महातत्त्व-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश), पाँच-तन्मात्राएँ (पांच विषय-रस, स्पर्श, गंध, रूप और शब्द) पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाक्, हस्त, पांव, लिंग, गुदा), पाँच ज्ञानन्द्रियाँ (कान, नेत्र, जिह्वा, त्वचा और नासिका) मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति सम्मिलित हैं। यहाँ श्रीकृष्ण ने 'दशैकम्' शब्द जिसका अर्थ 'दस और एक' है का प्रयोग ग्यारह इन्द्रियों की संख्या दर्शाने के लिए किया है। इनमें वे मन को भी पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों के साथ सम्मिलित करते हैं। इससे पहले 10वें अध्याय के 22वें श्लोक में उन्होंने उल्लेख किया था कि वे इन्द्रियों में 'मन' हैं। आश्चर्य हो सकता है कि पाँच विषयों को कर्म क्षेत्र में क्यों सम्मिलित किया गया है जबकि ये शरीर के बाहर रहते हैं। इसका कारण यह है कि मन इन्द्रिय के विषयों के चिन्तन में व्यस्त रहता है और ये पाँच विषय सूक्ष्म रूप से मन में रहते हैं। इसलिए जब हम नींद में स्वप्न देखते हैं, तो स्वप्नावस्था में हम देखते, सुनते और अनुभव करते हैं तथा सूंघते हैं, जबकि हमारा स्थूल शरीर बिस्तर पर होता है। इससे ज्ञात होता है कि इन्द्रियों के स्थूल अंग भी सूक्ष्म रूप से मन में व्याप्त रहते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण यहाँ इन्हें भी सम्मिलित करते हैं क्योंकि वे आत्मा के पूर्ण कर्मक्षेत्र का वर्णन कर रहे हैं। कुछ ग्रंथ शरीर का विश्लेषण करते समय इन्द्रियों के पाँच विषयों को सम्मिलित नहीं करते। इनके स्थान पर इनमें पाँच प्राण (जीवन शक्ति) को सम्मिलित किया गया है। यह केवल श्रेणीकरण से संबंधित अन्तर है न कि दार्शनिक।
इस ज्ञान को आवरणों के रूप में भी समझाया गया है। शरीर के क्षेत्र में पाँच कोष (आवरण) हैं, जो इसे आच्छादित करते हैं।
1. अन्नमय कोषः यह स्थूल आवरण है। यह पाँच महाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) से बना है।
2. प्राणमय कोषः यह प्राणों का आवरण है। यह पाँच प्रकार की जीवन दायिनी शक्तियों (प्राण, आपान व्यान, समान, उदान) से निर्मित है।
3. मनोमय कोषः यह मानसिक आवरण है। यह मन और पाँच कर्मेन्द्रियों (वाक्, हस्त, पाँव, लिंग और गुदा) से बना है।
4. विज्ञानमय कोषः यह बुद्धि का आवरण है। यह कोष बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियों (कान, आँख, जिह्वा, त्वचा और नासिका) से बना है।
5. आनन्दमय कोषः यह आनंद का आवरण है जो कि अहंकार से बना है यह हमारी पहचान शरीर, मन और बुद्धि तंत्र के साथ कराता है।
इच्छा द्वेष: सुखं दु:खं सङ्घातश्चेतना धृति: |
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् || 7||
इच्छा और द्वेष, सुख और दुःख, शरीर, चेतना और इच्छा शक्ति ये सब कार्य क्षेत्र तथा उसके विकार में सम्मिलित हैं। श्रीकृष्ण अब इस क्षेत्र के गुणों और उसके विकारों को स्पष्ट करते हैं।
शरीरः कर्मक्षेत्र में शरीर सम्मिलित है। लेकिन इसमें इसके अतिरिक्त और भी बहुत कुछ सम्मिलित है। शरीर में जन्म से मृत्यु तक छः प्रकार के विकार होते हैं-अस्ति (गर्भावस्था में जीवन) जायते (जन्म), वर्धते (विकास), विपरिणमाते (प्रजनन), अपक्षीयते (क्षीण होना), विनश्यति (मृत्यु) अर्थात् यह गर्भावस्था में रहता है, जन्म लेता है, विकसित होता है, उत्पन्न करता है, क्षीण होता है और अन्त में मृत्यु को प्राप्त होता है। शरीर भगवान या संसार में सुख की खोज करने वाली आत्मा की सहायता करता है।
चेतनाः यह जीवन दायिनी शक्ति है और आत्मा में स्थित रहती है। यह जब तक शरीर में रहती है उसे जीवन शक्ति प्रदान करती है। जिस प्रकार यदि हम अग्नि में लोहे की छड़ डालते हैं, तब छड़ अग्नि से ऊष्मा प्राप्त कर लाल हो जाती है। उसी प्रकार से आत्मा शरीर को चेतना प्रदान कर उसे सजीव बनाती है। इसलिए कृष्ण चेतना को भी क्षेत्र में सम्मिलित करते हैं।
इच्छाशक्ति:-यह दृढ़ संकल्प है जो शरीर के सभी घटक तत्त्वों को सक्रिय करती है और उन्हें उपयुक्त दिशा की ओर केन्द्रित करती है। यह इच्छाशक्ति आत्मा को लक्ष्य प्राप्त करने में समर्थ बनाती है। इच्छा बुद्धि का गुण है जो आत्मा द्वारा प्रेरित होती है। सत्त्व, रजस् और तमोगुण के प्रभाव से इच्छा के स्वरूप का वर्णन 18वें अध्याय के 33वें से 35वें श्लोक में किया गया है।
कामनाः यह मन और बुद्धि की एक क्रिया है जो किसी वस्तु किसी स्थिति और किसी व्यक्ति आदि की प्राप्ति के लिए लालसा उत्पन्न करती है। सामान्यतः हम कामना को महत्त्व नहीं देते लेकिन कल्पना करें कि यदि कामनाएँ न होती तब जीवन की प्रवृत्ति किस प्रकार से भिन्न होती? इसलिए कर्म क्षेत्र का निर्माण करने वाले परमात्मा ने कामना को इसके अंश के रूप में इसमें सम्मिलित किया और इसलिए इसका विशेष उल्लेख करना स्वाभाविक है। बुद्धि किसी पदार्थ की महत्ता का विश्लेषण करती है और मन इसके प्रति अभिलाषाओं को प्रश्रय देता है जब किसी को आत्मज्ञान हो जाता है तब सभी लौकिक कामनाएँ शांत हो जाती हैं और फिर शुद्ध मन केवल भगवत्प्राप्ति की कामना करने लगता है। लौकिक कामनाएँ बंधन का कारण होती हैं और आध्यात्मिक कामनायें मुक्ति की ओर ले जाती हैं।
द्वेषः यह मन और बुद्धि की एक अवस्था है जो ऐसे पदार्थ, व्यक्ति और परिस्थितियों के प्रति विरक्ति उत्पन्न करती है जो उसे अप्रिय लगते हैं और उनसे बचने का प्रयास करती है।
सुखः यह सुख और आनन्द का भाव है जिसकी अनुभूति प्रिय और अनुकूल परिस्थितियों तथा कामनाओं की पूर्ति होने पर होती है। मन सुख की प्राप्ति करता है और आत्मा भी इस सुख का अनुभव करती है क्योंकि यह समय की पहचान मन के साथ युक्त मानती है। किंतु लौकिक सुख आत्मा की क्षुधा को कभी शान्त नहीं कर सकते और वह तब तक असंतुष्ट रहती है जब तक वह भगवान के दिव्य आनंद की प्राप्ति नहीं करती।
दुःख: यह मानसिक पीड़ा है। मन अप्रिय और प्रतिकूल परिस्थितियों में इसका अनुभव करता है।
अब श्रीकृष्ण ऐसे गुण और विशेषताओं का वर्णन करते हैं जो किसी को ज्ञान प्राप्त करने के योग्य बनाते हैं। इस प्रकार वे सर्वश्रेष्ठ मानव शरीर को प्राप्त करते हैं।
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् |
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रह: || 8||
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च |
जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम् || 9||
असक्तिरनभिष्वङ्ग: पुत्रदारगृहादिषु |
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु || 10||
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी |
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि || 11||
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम् |
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा || 12||
नम्रता, आडंबरों से मुक्ति, अहिंसा, क्षमा, सादगी, गुरु की सेवा, मन और शरीर की शुद्धता, दृढ़ता और आत्मसंयम, विषयों के प्रति उदासीनता, अहंकार रहित होना, जन्म, रोग, बुढ़ापा और मृत्यु के दोषों पर ध्यान देना, अनासक्ति, स्त्री, पुरुष, बच्चों और घर सम्पत्ति आदि वस्तुओं के प्रति ममता रहित होना। जीवन में वांछित और अवांछित घटनाओं के प्रति समभाव, मेरे प्रति अनन्य और अविरल भक्ति, एकान्त स्थानों पर रहने की इच्छा, लौकिक जनों के प्रति विमुखता, आध्यात्मिक ज्ञान में स्थिरता और परम सत्य की खोज, इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और जो भी इसके प्रतिकूल हैं उसे मैं अज्ञान कहता हूँ।
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान प्राप्त करना केवल बौद्धिक प्रक्रिया नहीं है। पुस्तकीय ज्ञान किसी के चरित्र में परिवर्तन नहीं लाता किंतु आध्यात्मिक ज्ञान, के लिए हृदय की शुद्धता आवश्यक है। (यहाँ हृदय का उल्लेख शारीरिक अवयव के रूप में नहीं) मन और बुद्धि का कई बार हृदय के रूप में उल्लेख किया जाता है।
उपर्युक्त पाँच श्लोक गुण, प्रवृत्तियों, व्यवहार और मनोवृत्तियों का वर्णन करते हैं जो हमारे जीवन को शुद्ध करते हैं और उसे ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करते हैं।
नम्रताः जब हमें अपने क्षेत्र अर्थात् शरीर के गुणों जैसे सौंदर्य, बुद्धि, प्रतिभा, सामर्थ्य आदि पर अहंकार हो जाता है, तब हम यह भूल जाते हैं कि ये सब गुण हमें भगवान ने ही कृपापूर्वक प्रदान किए हैं। अहंकार के परिणामस्वरूप हमारी चेतना हमें भगवान से विमुख कर देती है। यह आत्मज्ञान के मार्ग में एक बड़ी बाधा है क्योंकि अहंकार मन और बुद्धि को प्रभावित करके पूरे क्षेत्र को दूषित कर देता है।
आडम्बर से मुक्तिः आडम्बर कृत्रिम व्यक्तित्व को विकसित करते हैं। मनुष्य के भीतर दोष होते हैं लेकिन वह बाहर से मुखौटा लगाए रखता है। बाह्य रूप से सदाचार का प्रदर्शन खोखला होता है।
अहिंसाः ज्ञान की प्राप्ति हेतु सभी प्राणियों के प्रति आदर भाव रखना आवश्यक है। इसके लिए अहिंसा का पालन करना भी आवश्यक है। इसलिए धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है-“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् " अर्थात् यदि तुम किसी विशेष तरह के व्यवहार को स्वयं के लिए पसंद नहीं करते तो उनके साथ भी वैसा व्यवहार न करो।"
क्षमाः इसका तात्पर्य दुर्भावना मुक्त होना हैउन लोगों के प्रति भी जो हमारा अहित करते हैं और हमें कष्ट पहुँचाते हैं। वास्तव में दुर्भावना को मन में प्रश्रय देना हमारे लिए अधिक हानिकारक होता है। क्षमाशीलता के कारण विवेकी मनुष्य का मन शुद्ध हो जाता है।
सरलताः इसका तात्पर्य विचारों, वाणी और कर्मों की सरलता से है। विचारों की सरलता में छल, शत्रुता और कुटिलता से रहित होना सम्मिलित है। इसी प्रकार वाणी की सरलता में उपहास, निंदा, वृथा वार्तालाप, अतिशयोक्ति वर्णन न करने जैसी वृत्तियों से दूर रहना, कर्मों में सरलता में, सादा जीवन व्यतीत करना और सद्व्यवहार आदि सम्मिलित हैं।
गुरु की सेवाः गुरु से हमें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है। गुरु से दिव्यज्ञान प्राप्त करने के लिए शिष्य को गुरु के प्रति भक्ति, समर्पण और श्रद्धा युक्त होना चाहिए। गुरु की सेवा द्वारा शिष्य नम्रता और अनन्यता विकसित करता है जिससे प्रसन्न होकर गुरु उसे दिव्य ज्ञान प्रदान करता है। इसलिए श्रीकृष्ण ने चौथे अध्याय के 34वें श्लोक में यह कहा है कि "आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर श्रद्धा भक्ति के साथ उनकी सेवा करते हुए उनसे परम सत्य के बारे में जानों। ऐसा सिद्ध संत दिव्य ज्ञान प्रदान करेगा क्योंकि उसने परम सत्य का अनुभव किया है।"
शरीर और मन की शुद्धताः आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार की शुद्धता अति आवश्यक है। शाण्डिल्य उपनिषद् में वर्णन है-"शौचम् नाम द्विविधम्-बाह्यमांतर चेति (1.1)।" अर्थात् शुद्धता आंतरिक और बाह्य दो प्रकार की होती है।" बाह्य शुद्धता स्वास्थ्य की देखभाल, मन को व्यवस्थित करने में सहायता करती है लेकिन मानसिक शुद्धता का महत्त्व और अधिक होता है। इसे मन को पूर्णरूप से भगवान में केन्द्रित करके प्राप्त किया जा सकता है। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने इसका विशद वर्णन किया है-
मायाधीन मलिन मन, है अनादि कालीन।
हरि विरहानल धोय जल, करु निर्मल बनि दीन।।
(भक्ति शतक-79)
"हमारा मायिक मन अनंत जन्मों से अशुद्ध है। इसे अति दीन बनकर भगवान के विरह की अग्नि में तपाकर निर्मल करो"।
दृढ़ताः भगवत्प्राप्ति ऐसा लक्ष्य नहीं है जिसे एक दिन में प्राप्त कर लिया जाए। दृढ़ता का अर्थ यह है कि जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता तब तक हम अपने मार्ग पर निरंतर स्थिर बने रहें। शास्त्रों में वर्णन है-"चरैवेति चरैवेति, चरन् वै मधु विन्दति" अर्थात् आगे बढ़ते चलो, आगे बढ़ते चलो क्योंकि जो पराजय स्वीकार नहीं करते वे अंत में अनंत लाभ पाते हैं।"
आत्मसंयमः यह हमें ऐसे लौकिक सुखों के पीछे भागने से रोकता है जो मन और बुद्धि को दूषित करते हैं। आत्मसंयम व्यक्ति को दुर्व्यवसनों में लिप्त होने से रोकता है।
विषयों के प्रति उदासीनता:- यह आत्म संयम से आगे की अवस्था है। इसमें हमें स्वयं को बलपूर्वक रोकना पड़ता है। उदासीनता से तात्पर्य इन्द्रिय भोग से प्राप्त होने वाले आनंद से रहित होना है जो भगवत्प्राप्ति के मार्ग की अड़चन है।
अहंभाव से मुक्तिः अहंभाव 'मैं', 'मुझे' और 'मेरा' का बोध है। इसका वर्णन अविद्या के रूप में किया जाता है क्योंकि यह शारीरिक स्तर पर होता है और स्वयं की पहचान शरीर के साथ करने से उत्पन्न होता है। इसे 'अहम् चेतना' भी कहा जाता है। सभी सभी संत यह घोषणा करते हैं कि भगवान को अपने हृदय में लाने के लिए हमें अहंभाव से मुक्त होना चाहिए-
जब मैं था तब हरि नाहीं, अब हरि हैं, मैं नाहीं।
प्रेम गली अति सांकरी, यामें द्वे न समाहीं (संत कबीर)।।
"जब मैं अर्थात् अहम् था तब मेरे भीतर भगवान नहीं थे। अब भगवान हैं और 'मैं' अर्थात् अहं नहीं है। दिव्य प्रेम का मार्ग बहुत संकरा है जिसमें 'मैं' और 'भगवान' दोनों नहीं रह सकते।"
ज्ञान योग और अष्टांग-योग के मार्ग में अहम् से मुक्ति प्राप्त करने के लिए अनेक साधनाएँ हैं लेकिन भक्ति योग के मार्ग में इससे मुक्त होना अत्यंत सरल है। हम अहं (अहंचेतना) के सामने 'दास' जोड़ देते हैं और इसे दासोहम् (मैं भगवान का सेवक हूँ) बना देते हैं। अब मैं अर्थात् अहं हानिकारक नहीं रहता और अहं चेतना भगवत् चेतना में परिवर्तित हो जाती है।
जन्म, रोग, बुढ़ापा और मृत्यु के दोषों को पहचानना: यदि बुद्धि यह निर्णय न कर सके कि सांसारिक संपत्ति या आध्यात्मिक संपदा में से क्या अधिक महत्त्वपूर्ण है, तब दृढ़ इच्छा को विकसित करना कठिन हो जाता है। किंतु जब बुद्धि संसार की नीरसता जान लेती है, तब यह अपने संकल्प के प्रति दृढ़ हो जाती है। इस दृढ़ता को पाने के लिए हमें उन कष्टों का निरन्तर चिंतन करना चाहिए जो जीवन के अविभाज्य अंग हैं। यह वही सिद्धान्त है जिसे महात्मा बुद्ध ने आध्यात्मिक मार्ग पर स्थापित किया है। उन्होने एक रोगी व्यक्ति को देखा और सोचा कि संसार में रोग है, “मैं भी एक दिन रोग ग्रस्त हो जाऊंगा"। तत्पश्चात् उन्होंने एक बूढ़े व्यक्ति को देखा और कहा, “यहाँ बुढ़ापा भी है तब मैं भी एक दिन बूढ़ा हो जाऊंगा" तत्पश्चात उन्होंने एक मृत व्यक्ति को देखा और अनुभव किया कि “यह भी जीवन का सत्य है। इसका तात्पर्य है कि मुझे भी एक दिन मरना होगा।" बुद्ध की बुद्धि इतनी अद्भुत थी कि जीवन के इन सत्यों के एक ही बार दर्शन से उन्होंने संसार त्याग करने का निश्चय कर लिया। चूँकि हमारे पास ऐसी बुद्धि नहीं है इसलिए हमें बार-बार इन सत्यों का चिन्तन करना चाहिए ताकि संसार की नीरसता के सत्य को अपने हृदय में स्थिर कर सकें।
अनासक्तिः इसका तात्पर्य संसार से विरक्ति विकसित करने से है। हमारे पास एक ही मन है और यदि हम इसे आध्यात्मिक लक्ष्य में लीन रखना चाहते हैं तब हमें इसे संसार के पदार्थों और व्यक्तियों से विमुख करना पड़ता है। साधक सांसारिक आसक्ति को भगवत्प्रीति में परिवर्तित कर देता है।
पति-पत्नी, बच्चों और घरआदि के प्रति मोह रहित होनाः ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ मन शीघ्रता से आसक्त हो जाता है। स्वाभाविक रूप से हर व्यक्ति परिवार और घर को 'मेरा' के रूप में पहचानता है। इसलिए ये मन में शीघ्र ही घर कर जाते हैं और मन को बंधन में डाल देते हैं। आसक्ति के कारण हम अपने परिवार से अच्छे व्यवहार की अपेक्षा करते हैं और जब हमारी इच्छा पूरी नहीं हो पाती तब हमें मानसिक पीड़ा होती है। हमें परिवार में एक दूसरे के साथ बिछुड़ना पड़ता है और आपस में संबंध विच्छेद भी होते रहते हैं। यदि परिवार के कुछ लोग किसी अन्य स्थान पर चले जाते हैं तब वे अस्थायी रूप से बिछड़ जाते हैं और यदि किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है तब यह वियोग स्थायी होता है। ये सारे अनुभव और ऐसी आशंकाएँ मन पर भारी बोझ डालती हैं और मन को खींच कर भगवान से दूर ले जाती हैं। इसलिए हमें असीम आनन्द प्राप्त करने हेतु पति या पत्नी, बच्चों तथा घर संपदा के विषय में नहीं उलझना चाहिए। हमें आसक्ति रहित होकर उनके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए उसी प्रकार जैसे कि एक नर्स अस्पताल में निष्काम भाव से अपना कार्य करती है या अध्यापक विद्यार्थियों के प्रति अपने धर्म का पालन करता है।
वांछित एवं अवांछित घटनाओं में समभाव रहनाः प्रिय और अप्रिय घटनाएँ उसी प्रकार घटती हैं, जैसे कि दिन और रात। ऐसा ही जीवन है। इन द्वैतों से ऊपर उठने के लिए हमें संसार के प्रति विरक्ति उत्पन्न कर आध्यात्मिकता को बढ़ाना सीखना चाहिए। हमें जीवन के परिवर्तनों में स्थिर रहने की क्षमता विकसित करनी चाहिए और सफलता में अत्यधिक प्रफुल्लित नहीं होना चाहिए।
मेरे प्रति अविरल और अनन्य भक्ति का भावः विरक्ति से तात्पर्य केवल यह है कि मन संसार की ओर नहीं जा रहा है। लेकिन जीवन का महत्त्व इससे कहींअधिक है। वास्तव में जीवन का अर्थ अभीष्ट कार्यों में व्यस्त रहना है। जीवन का लक्ष्य मन की भगवान के कमल चरणों पर अर्पित करना है। इसलिए श्रीकृष्ण ने यहाँ इस पर प्रकाश डाला है।
एकांत वास में रूचिः- सांसारिक लोगों की भांति भक्तों को अकेलापन दूर करने के लिए किसी के साथ की आवश्यकता नहीं होती। वे एकान्तवास पसंद करते हैं ताकि उनका मन भगवान में लीन हो सके। इसलिए वे स्वाभाविक रूप से एकान्त स्थानों का चयन करते हैं, जहाँ वे अधिक गहनता से स्वयं को श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान के चिन्तन में लीन कर सकें।
समाज से विमुखताः भौतिकवादी मनुष्य सांसारिक लोगों और सांसारिक कार्यकलापों में आनंद ढूँढता है। लेकिन जो दिव्य चेतना विकसित करता है, वह इन गतिविधियों से स्वाभाविक दूरी बनाए रखता है और इसलिए लौकिक समाज से विमुख रहता है। यदि भगवान की सेवार्थ संसार में सम्मिलित होना अनिवार्य होता है तब भक्त इसे सहर्ष स्वीकार करता है, और मानसिक रूप से इससे अप्रभावित रहता है।
आध्यात्मिक ज्ञान में निष्ठाः सैद्धान्तिक रूप से कुछ भी जानना पर्याप्त नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति यहजानता है कि क्रोध करना बुरा है, किन्तु फिर भी वह इसे अपने भीतर बार-बार प्रवेश करने का मार्ग प्रदान करता है। हमें अपने जीवन में आध्यात्मिक ज्ञान को क्रियान्वित करना सीखना चाहिए। केवल एक बार श्रवण करने से ऐसा तुरन्त नहीं होता। श्रवण करने के पश्चात हमें बार-बार इनका चिन्तन करना चाहिए। परम सत्य पर बार-बार विचार करने से वह आध्यात्मिक ज्ञान पुष्ट होता है जिसकी श्रीकृष्ण यहाँ चर्चा कर रहें हैं।
परम सत्य की खोजः पशु भी खाने, सोने, मैथुन क्रिया और आत्म रक्षा की गतिविधियों में संलग्न रहते हैं। भगवान ने विशेषकर मनुष्य को ज्ञान शक्ति से संपन्न किया है। हमें शारीरिक सुखों में लिप्त रहने की अपेक्षा इन प्रश्नों पर विचार करने के योग्य बनना होगा—'मैं कौन हूँ? मैं इस संसार में क्यों आया हूँ? इस संसार की रचना कैसे हुई भगवान से मेरा क्या संबंध है? मैं अपने जीवन के लक्ष्य को कैसे पूर्ण करुंगा।' सत्य की ऐसी तात्त्विक खोज हमारे विचारों को परिशुद्ध करके हमें पाशविक स्तर से ऊपर उठाती है और अध्यात्म के विज्ञान का श्रवण और अध्ययन करने के लिए प्रेरित करती है। उपर्युक्त वर्णित सभी प्रकार के गुण, प्रवृत्तियाँ, व्यवहार और मनोदृष्टि ज्ञान की ओर ले जाते हैं। इसके विपरीत घमंड, पाखण्ड, हिंसा, प्रतिशोध, छल-कपट, गुरु का अनादर, शरीर और मन की अस्वच्छता, अस्थिरता, आत्म विश्वास की कमी, इन्द्रिय विषयों की लालसा, पति, पत्नी, बच्चों और गृहस्थ जीवन में आसक्ति हमें बंधन की ओर धकेलती है। ऐसी मनोवृत्ति आत्म ज्ञान से हमें दूर कर देती है। इसलिए श्रीकृष्ण इसे अज्ञानता और अंधकार कहते हैं।
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते |
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते || 13||
अब मैं तुम्हें वह बताऊंगा जो जानने योग्य है और जिसे जान लेने के पश्चात् जीव अमरत्व प्राप्त कर लेता है। यह जेय तत्त्व अनादि ब्रह्म है जो सत् और असत् से परे है।
दिन और रात एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और एक का दूसरे के बिना कोई अस्तित्त्व नहीं होता। इसलिए जहाँ कोई रात्रि नहीं है वहाँ दिन भी नहीं हो सकता। इस कारण वहाँ केवल शाश्वत प्रकाश होगा। समान रूप से ब्रह्म के प्रकरण में 'सत्' शब्द पर्याप्त नहीं है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ब्रह्म सत् और असत् संबंधी शब्दों से परे है। ब्रह्म अपने निराकार और निर्गुण स्वरूप में ही ज्ञानियों की आराधना का केंद्र होता है। उनका साकार स्वरूप भक्तों की आराधना का आधार होता है। शरीर के भीतर निवास करने वाले स्वरूप को परमात्मा कहा जाता है। ब्रह्म की ये तीनों अभिव्यक्तियाँ एक ही हैं। 14वें अध्याय के 27वें श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है-
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च
"मैं ही निराकार ब्रह्म का आधार हूँ।" इस प्रकार से निराकार ब्रह्म और भगवान का साकार रूप दोनों एक ही परमात्मा के दो स्वरूप हैं। दोनों सर्वत्र व्याप्त हैं और इसलिए इन दोनों को सर्वव्यापक कहा जा सकता है। इनका वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण भगवान में प्रकट होने वाले विरोधाभासी गुणों की व्याख्या करते हैं।
सर्वत: पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् |
सर्वत: श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति || 14||
भगवान के हाथ, पाँव, नेत्र, सिर, तथा मुख सर्वत्र हैं। उनके कान भी सभी ओर हैं क्योंकि वे ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु में व्याप्त हैं।
प्रायः लोग तर्क देते हैं कि भगवान के हाथ, पैर, आंखें और कान नहीं होते लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं कि भगवान में यह सब कुछ है और वो भी असंख्य मात्रा में। हम भगवान की प्रभुता को अपने सीमित ज्ञान में बाँध नहीं सकते। वह ‘कर्तुम्, अकुर्तम् अन्यथा कर्तुम् समर्थ है' अर्थात् वे संभव को असंभव कर सकते हैं और असंभव को संभव में परिवर्तित कर सकते है। ऐसे शक्तिशाली भगवान के लिए यह कहना कि उनके हाथ, पाँव नहीं होते उन्हें निरीह बताने जैसा है। भगवान के अंग और इन्द्रियाँ दिव्य हैं जबकि हमारी इन्द्रियाँ तथा अंग मायिक अर्थात् भौतिक हैं। भौतिकता और दिव्यता के बीच अन्तर यह है कि हमारी इन्द्रियाँ एक ही शरीर में सीमित हैं जबकि भगवान के असंख्य हाथ, पाँव, नेत्र और कान होते हैं। हमारी इन्द्रियाँ एक स्थान पर स्थित रहती हैं और भगवान की सर्वत्र व्याप्त हैं। इसलिए संसार में जो हो रहा है, भगवान उसे देख सकते हैं और जो कभी भी कहा गया हो उसे वे सुन सकते हैं। यह इसलिए संभव होता है क्योंकि वे सृष्टि में सर्वत्र व्यापक हैं।
छान्दोग्योपनिषद् में भी वर्णन है कि “सर्वम् खल्विदम् ब्रह्म" (3.14.1) अर्थात् सर्वत्र ब्रह्म है इसलिए वह ब्रह्माण्ड में कहीं भी अर्पित किए जाने वाले भोग को स्वीकार करता है और अपने भक्तों द्वारा किसी भी स्थान पर की जाने वाली प्रार्थना को सुनता है तथा तीनों लोकों में घटित होने वाली घटनाओं का साक्षी है। यदि उसके असंख्य भक्त एक ही समय पर उसकी आराधना करते हैं तो उसे उन सबकी प्रार्थना को स्वीकार करने में भी कोई कठिनाई नहीं होती
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् |
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च || 15||
यद्यपि वे समस्त इन्द्रिय विषयों के गोचर हैं फिर भी इन्द्रिय रहित रहते हैं। वे सभी के प्रति अनासक्त होकर भी सभी जीवों के पालनकर्ता हैं। यद्यपि वे निर्गुण है फिर भी प्रकृति के तीनों गुणों के भोक्ता हैं।
यह कहने के पश्चात् कि भगवान की इन्द्रियाँ सर्वत्र हैं अब श्रीकृष्ण इसके सर्वथा विपरीत कहते हैं कि वे इन्द्रियों से रहित हैं। यदि हम इसे लौकिक तर्क द्वारा समझने का प्रयास करते हैं तब हम इसमें विरोधाभास पाएंगे। हमें यह जानना होगा कि भगवान अनंत इन्द्रियों से युक्त और इन्द्रियों से रहित दोनों एक साथ कैसे हो सकते हैं? किन्तु दिव्य भगवान के लिए लौकिक तर्क लागू नहीं होता। भगवान एक ही समय में दो विरोधाभासी गुणों के अधिष्ठाता हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण में वर्णन है-
विरुद्ध-धर्मो रूपोसावैश्वर्यात् पुरुषोत्तमः
"परमात्मा असंख्य विरोधाभासी गुणों के अधिष्ठान हैं।" इस श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान के अनंत विरोधाभासों में से कुछ का उल्लेख करते हैं। वे भौतिक इन्द्रियों से रहित हैं इसलिए यह कहना उचित है कि उनकी इन्द्रियाँ नहीं हैं। 'सर्वेन्द्रियविवर्जितम्' का अर्थ है कि वे भौतिक इन्द्रियों से रहित हैं लेकिन वे दिव्य इन्द्रियों के स्वामी हैं। वे सर्वत्र व्याप्त हैं। परिणामस्वरूप यह कहना भी उचित है कि भगवान की इन्द्रियाँ सर्वत्र हैं। 'सर्वेन्द्रियगुणाभासम्' का अर्थ है कि वे इन्द्रियों से कर्म करते हैं और इन्द्रियों के विषयों को भी ग्रहण करते हैं। इन दोनों गुणों से युक्त भगवान के स्वरूप का श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णन किया गया है।
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-3.19)
भगवान के भौतिक हाथ, पाँव, नेत्र और कान नहीं होते फिर भी वे ग्रहण करते हैं, चलते हैं, देखते हैं और सुनते हैं। आगे श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सृष्टि के रक्षक हैं पर फिर भी उससे विरक्त रहते हैं। विष्णु रूप में भगवान सारी सृष्टि का पालन पोषण करते हैं। वे सबके हृदयों में बैठकर उनके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं और उनका फल देते हैं। भगवान विष्णु के आधिपत्य में ब्रह्मा प्रकृति के नियमों का निर्माण करते हैं ताकि सृष्टि का संचालन सुचारु रूप से हो सके। विष्णु के आधिपत्य में स्वर्ग के देवता वायु, पृथ्वी, जल, वर्षा आदि की व्यवस्था करते हैं जो कि हमारे जीवन के लिए अनिवार्य है। इसलिए भगवान सबके रक्षक हैं। चूँकि वे अपने आप में पूर्ण हैं इसलिए सबसे विरक्त रहते हैं। वेदों में उन्हें आत्माराम कहकर संबोधित किया गया है जिसका अर्थ यह है कि 'वह जो अपनी आत्मा में रमण करने वाला है और जिसे कोई भी बाहर की वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ती।' माया अर्थात् प्राकृत शक्ति भगवान की दासी है और उनके सुख के लिए उनकी सेवा करती है। इसलिए वे प्रकृति के तीनों गुणों के भोक्ता हैं। साथ ही वह निर्गुण अर्थात् तीनों गुणों से परे हैं क्योंकि गुण मायिक है जबकि भगवान दिव्य हैं।
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च |
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् || 16||
भगवान सभी के भीतर एवं बाहर स्थित हैं चाहे वे चर हों या अचर। वे सूक्ष्म हैं इसलिए वे हमारी समझ से परे हैं। वे अत्यंत दूर हैं लेकिन वे सबके निकट भी हैं।
श्रीकृष्ण ने यहाँ जैसा वर्णन किया है उसी प्रकार से एक वैदिक मंत्र में भी भगवान के विशिष्ट रूप का वर्णन इस प्रकार से किया गया है-
तदेजति तन्नैजति तद्रे तद्वन्तिके तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः।
(ईशोपनिषद मंत्र-5)
"परम ब्रह्म दौड़ नहीं सकता फिर भी दौड़ता है। वह दूर है लेकिन वह निकट भी है। वह सभी के भीतर स्थित है लेकिन वह सबके बाहर भी स्थित है।" इस अध्याय के तीसरे श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह कहा था कि भगवान को जानना ही वास्तविक ज्ञान है। किन्तु यहाँ वे कहते हैं कि परमात्मा समझ से परे है। यहाँ पुनः विरोधाभास प्रतीत होता है लेकिन उनके कथन का अर्थ यह है कि भगवान को इन्द्रियों, मन और बुद्धि द्वारा नहीं जाना जा सकता। परन्तु यदि भगवान किसी पर अपनी कृपा करते हैं तब वह भाग्यशाली आत्मा उसे जान सकती है।
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् |
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च || 17||
यद्यपि भगवान सभी जीवों के बीच विभाजित प्रतीत होता है किन्तु वह अविभाज्य है। परमात्मा सबका पालनकर्ता, संहारक और सभी जीवों का जनक है।
भगवान के स्वरूप में उनकी विभिन्न शक्तियाँ सम्मिलित हैं। सभी व्यक्त और अव्यक्त पदार्थ केवल उनकी शक्ति का विस्तार हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि वे उन सब में है जो अस्तित्त्व में है। तदनुसार श्रीमद्भागवतम् में ऐसा वर्णन है-
द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च।
वासुदेवात्परो ब्रह्मन्न चान्योऽर्थोऽस्ति तत्त्वतः।।
(श्रीमद्भागवतम्-2.5.14)
सृष्टि के विभिन्न रूप-काल, कर्म, जीवों की प्रकृति और सृष्टि के सभी भौतिक पदार्थ सब स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं। सृष्टि में कुछ भी ऐसा नहीं जो उनसे विलग हो।
भगवान सृष्टि के पदार्थों के बीच विभाजित प्रतीत होते हैं लेकिन फिर भी वे अविभाजित रहते हैं। उदाहरणार्थ आकास अपने में निहित पदार्थों में विभाजित प्रतीत होता है। किन्तु वास्तव में आकास की एक ही सत्ता है जो कि सृष्टि के आरम्भ में प्रकट हुआ। पुनः जल में सूर्य का प्रतिबिंब विभक्त दिखाई देता है और जबकि सूर्य अविभाजित रहता है। जैसे समुद्र से लहरें निकलती हैं और फिर उसी में विलीन हो जाती हैं। इस प्रकार से भगवान संसार की रचना करते हैं, उसका पालन करते हैं और बाद में उसको अपने में लीन कर लेते हैं। इसलिए वे समान रूप से सबके सृजक, पालन कर्ता और संहारक के रूप में दिखाई देते हैं।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमस: परमुच्यते |
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् || 18||
वे समस्त प्रकाशमयी पदार्थों के प्रकाश स्रोत हैं, वे सभी प्रकार की अज्ञानता के अंधकार से परे हैं। वे ज्ञान हैं, वे ज्ञान का विषय हैं और ज्ञान का लक्ष्य हैं। वे सभी जीवों के हृदय में निवास करते हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण विभिन्न प्रकार से भगवान की प्रभुता को स्थापित करते हैं। संसार में विभिन्न प्रकाशमान वस्तुएँ हैं जैसे सूर्य, चन्द्रमा, आभूषण इत्यादि। यदि इन्हें स्वतंत्र छोड़ दिया जाए तब ये स्वयं अपनी शक्ति से प्रकाशित नहीं हो सकते। जब भगवान इन्हें शक्ति प्रदान करते हैं केवल तभी ये किसी को प्रकाशित कर सकते हैं। वेदों में कहा गया है
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति
(कठोपनिषद्-2.2.15)
"भगवान ही सभी वस्तुओं को प्रकाशित करते हैं। उसी के प्रकाश से सभी प्रकाशमान वस्तुएँ प्रकाश फैलाती हैं।"
सूर्यस्तपति तेजसेन्द्रः
(वेद)
"उसी के तेज से सूर्य और चन्द्रमा चमकते हैं।" दूसरे शब्दों में सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश भगवान से मांगा गया है। इनका प्रकाश किसी भी दिन लुप्त हो सकता है लेकिन भगवान का अपना दिव्य प्रकाश लुप्त नहीं हो सकता। भगवान के तीन अनूठे नाम है-वेद-कृत, वेद-वित्, वेद-वैद्य है 'वे वेद-कृत् हैं' इसका तात्पर्य है-'वे जो वेद प्रकट करते हैं', 'वे वेद-वित् हैं' जिसका अर्थ है-वह जो वेदों के ज्ञाता हैं। 'वे वेद-वेद्य हैं।' इसका अर्थ है-वे जो वेदों द्वारा जाने जा सकते हैं। इस प्रकार से श्रीकृष्ण भगवान का निरूपण ज्ञेय (जानने योग्य विषय) ज्ञानगम्य (ज्ञान का लक्ष्य) और ज्ञान (सत्य ज्ञान) के रूप में किया गया है।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति
(कठोपनिषद्-2.2.15)
"भगवान ही सभी वस्तुओं को प्रकाशित करते हैं। उसी के प्रकाश से सभी प्रकाशमान वस्तुएँ प्रकाश फैलाती हैं।"
सूर्यस्तपति तेजसेन्द्रः
(वेद)
"उसी के तेज से सूर्य और चन्द्रमा चमकते हैं।" दूसरे शब्दों में सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश भगवान से मांगा गया है। इनका प्रकाश किसी भी दिन लुप्त हो सकता है लेकिन भगवान का अपना दिव्य प्रकाश लुप्त नहीं हो सकता। भगवान के तीन अनूठे नाम है-वेद-कृत, वेद-वित्, वेद-वैद्य है 'वे वेद-कृत् हैं' इसका तात्पर्य है-'वे जो वेद प्रकट करते हैं', 'वे वेद-वित् हैं' जिसका अर्थ है-वह जो वेदों के ज्ञाता हैं। 'वे वेद-वेद्य हैं।' इसका अर्थ है-वे जो वेदों द्वारा जाने जा सकते हैं। इस प्रकार से श्रीकृष्ण भगवान का निरूपण ज्ञेय (जानने योग्य विषय) ज्ञानगम्य (ज्ञान का लक्ष्य) और ज्ञान (सत्य ज्ञान) के रूप में किया गया है।
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासत: |
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते || 19||
इस प्रकार मैंने तुम्हें कर्म क्षेत्र की प्रकृति, ज्ञान का अर्थ और ज्ञान के लक्ष्य का ज्ञान कराया है। इसे वास्तव में केवल मेरे भक्त ही पूर्णतः समझ सकते हैं और इसे जानकर वे मेरी दिव्य स्वरूप को प्राप्त होते हैं।
श्रीकृष्ण अपने कथनों का समापन इस विषय को समझने के परिणामों का उल्लेख करते हुए करते हैं। अतः एक बार पुनः वह भक्ति की श्रेष्ठता बताते हैं और कहते हैं कि केवल मेरे भक्त ही वास्तव में इस ज्ञान को समझ सकते हैं। वे जो भक्ति रहित होकर कर्म, ज्ञान, अष्टांग योग आदि का पालन करते हैं वे भगवद्गीता के अर्थ को नहीं समझ सकते। भक्ति भगवान की ओर ले जाने वाले सभी मार्गों का आवश्यक अंग हैं। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने इसका सुन्दर निरूपण इस प्रकार से किया है-
जो हरि सेवा हेतु हो, सोई कर्म बखान।
जो हरि भगति बढ़ावे, सोई समुझिय ज्ञान।।
(भक्ति शतक-66)
"भगवान की भक्ति के लिए किया गया प्रत्येक कार्य ही वास्तविक कर्म है और जो भगवान के लिए प्रेम बढ़ाता है वही सच्चा ज्ञान है।" भक्ति केवल भगवान को जानने में ही हमारी सहायता नहीं करती बल्कि यह भक्त को भगवान जैसा बना देती है। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि भक्त मेरी प्रकृति को जान लेते हैं। वैदिक ग्रंथों में भी बार-बार इस पर बल दिया गया है। वेदों में वर्णन है-
भक्तिरेवैनम् नयति भक्तिरेवैनम् पश्यति भक्तिरेवैनम्
दर्शयति भक्तिवशः पुरुषः भक्तिरेव भयसि (माथर श्रुति)
"केवल और केवल शुद्ध भक्ति ही भगवान की ओर ले जा सकती है। केवल भक्ति द्वारा ही हम भगवान को देख सकते हैं। भक्ति ही हमें भगवान के सम्मुख ले जा सकती है। भगवान क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग भक्ति के अधीन हैं इसलिए केवल भक्ति करो। आगे मुण्डकोपनिषद् में इस प्रकार से वर्णन किया गया है
उपासते पुरुषम् ये ह्याकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः (3.2.1)
"वे जो परमपुरुषोत्तम भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं और सभी लौकिक कामनाओं का त्याग कर देते हैं वे जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।" श्वेताश्वतरोपनिषद् में पुनः वर्णन किया गया है
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्था प्रकाशन्ते महात्मनः।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.23)
"वे जो धैर्यपूर्वक भगवान की भक्ति करते हैं और समान रूप से गुरु की भी भक्ति करते हैं। ऐसे संत पुरूषो के हृदय में भगवान की कृपा से वैदिक ग्रंथों का ज्ञान स्वतः प्रकट हो जाता है।" अन्य वैदिक ग्रंथ भी इसे दृढ़तापूर्वक दोहराते हैं-
न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.14.20)
श्रीकृष्ण कहते हैं, "उद्धव! मुझे अष्टांग योग, सांख्य दर्शन के अध्ययन, धार्मिक ग्रंथों के ज्ञान को पोषित करने, तपस्या और विरक्ति द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। केवल एक भक्ति द्वारा ही मुझे कोई जीत सकता है।" भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने श्लोक 8.22, 11.54 इत्यादि में इसे दोहराया है। 18वें अध्याय के 55वें श्लोक में वे कहते हैं-"केवल प्रेममयी भक्ति से ही कोई यह जान सकता है कि मैं वास्तव में क्या हूँ? भक्ति द्वारा मेरे स्वरूप को जानने के पश्चात् ही कोई मेरे दिव्य क्षेत्र में प्रवेश पा सकता है।" रामचरितमानस में भी वर्णन किया गया है-
रामहि केवल प्रेम पियारा, जान लेऊ जो जाननिहारा
"पप्रभु श्रीराम केवल प्रेम द्वारा प्राप्त होते हैं। इस सत्य को वही जानते हैं जो इसे वास्तव में जानना चाहते हैं।" इस सिद्धान्त को अन्य सम्प्रदायों में भी इसी प्रकार से महत्व दिया गया है। यहूदी टोराह में लिखा है-“तुम भगवान से प्रेम करो, पूर्ण रूप से अपने हृदय, अपनी आत्मा और अपनी पूर्ण सामर्थ्य से।" नाज़ारेथ के जीसस ने क्रिश्चियन 'न्यू टेस्टामेन्ट' में इस आज्ञा को सबसे महत्वपूर्ण आज्ञा के रूप में पालन करने के लिए दोहराया है (मार्क 12.30)। गुरुग्रंथ साहिब में वर्णन किया गया है-
हरि सम जग महान वस्तु नहीं, प्रेम पंथ सों पंथ।
सद्गुरु सम सज्जन नहीं, गीता सम नहीं ग्रंथ।।
"भगवान के समान कोई व्यक्तित्त्व नहीं है। भक्ति के मार्ग के समान कोई अन्य मार्ग नहीं है, कोई भी मनुष्य गुरु के बराबर नहीं है और किसी भी ग्रंथ की तुलना गीता से नहीं की जा सकती।"
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि |
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् || 20||
प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) दोनों अनादि हैं। शरीर में होने वाले सभी परिवर्तन और प्रकृति के तीनों गुणों की उत्पत्ति माया शक्ति से होती है।
भौतिक शक्ति को माया या प्रकृति कहा जाता है। भगवान की शक्ति होने के कारण यह तब से अस्तित्त्व में है जब से भगवान हैं। दूसरे शब्दों में आत्मा भी शाश्वत है और यहाँ इसे पुरुष कहा गया है जबकि भगवान को परम पुरुष कहा गया है। आत्मा भी भगवान की शक्ति का विस्तार है
शक्तित्वेन अंशात्वं त्यञ्जयति
(परमात्मा संदर्भ-39)
"आत्मा भगवान की जीव शक्ति का अंश है"। माया शक्ति जड़ शक्ति है और जीव शक्ति चेतन शक्ति है। यह दिव्य और अपरिवर्तनीय है। यह विभिन्न जन्मों में और जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में अपरिवर्तित रहती है। एक जन्म में शरीर जिन परिवर्तनों को जीता है वे है- अस्ति अर्थात् गर्भावस्था जायते (जन्म), वर्धते (विकास), विपरिणमते (प्रजनन), अपक्षीयते (क्षीणता) और विनश्यति (मृत्यु) है। शरीर में ये परिवर्तन माया शक्ति जिसे प्रकृति या माया कहा जाता है, द्वारा लाए जाते हैं। इससे प्रकृति के तीन गुण सत्व, रजस, और तमस और इनके अनंत प्रकार के मिश्रणों की उत्पत्ति होती है।
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते |
पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते || 21||
सृष्टि के विषय में माया शक्ति ही कारण और परिणाम के लिए उत्तरदायी है और सुख-दुःख की अनुभूति हेतु जीवात्मा को उत्तरदायी बताया जाता है।
माया शक्ति ब्रह्मा के निर्देशानुसार असंख्य तत्त्वों और प्राणियों की सृष्टि करती है। वेद में वर्णन है कि संसार में 84 लाख योनियाँ पायी जाती हैं। इन सबके रूपों का परिवर्तन द्वारा होता है इसलिए यह प्राकृत शक्ति संसार के सभी कारणों और परिणामों के लिए उत्तरदायी है। आत्मा अपने पूर्व कर्मों के अनुसार शरीर अर्थात् कर्म क्षेत्र प्राप्त करती है और यह अपनी पहचान शरीर, मन और बुद्धि के रूप में करती है इसलिए यह शरीर के सुखों की कामना करती है। जब इन्द्रियाँ अपने विषयों के संपर्क में आती है तब मन सुखद अनुभूति का बोध करता है क्योंकि आत्मा अपनी पहचान मन के रूप में करती है इसलिए वह परोक्ष रूप से इस सुखद अनुभूति का आनंद लेती है। इस प्रकार से आत्मा को मन, इन्द्रियों और बुद्धि द्वारा सुख और दुःख दोनों की अनुभूति का बोध होता है। इसकी तुलना स्वप्नावस्था से की गयी है।
एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई।
जदपि असत्य देत दुःख अहई।।
(रामचरितमानस)
जौं सपनें सिर काटइ कोई।
बिनु जागें न दूरि दुख होई।।
(रामचरितमानस)
संसार भगवान द्वारा पोषित है। यह असत्य का भ्रम उत्पन्न करता है और आत्मा को दुःख देता है। जैसे किसी का स्वप्न में सिर कट गया हो इससे उसे तब तक कष्ट होता रहता है जब तक कि स्वप्न देखने वाला वह व्यक्ति नींद से जाग नहीं जाता और स्वप्न समाप्त नहीं हो जाता। इस स्वप्नावस्था में शरीर के साथ अपनी पहचान करने वाली आत्मा को अपने पूर्व और वर्तमान के कर्मों के अनुसार सुख और दुःख की अनुभूति होती है। परिणामस्वरूप इसे दोनों प्रकार के अनुभवों के लिए उत्तरदायी माना जाता है।
पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङक्ते प्रकृतिजान्गुणान् |
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु || 22||
पुरुष अर्थात् जीव प्रकृति में स्थित हो जाता है, प्रकृति के तीनों गुणों के भोग की इच्छा करता है, उनमें आसक्त हो जाने के कारण उत्तम और अधम योनियों में जन्म लेता है।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह व्यक्त किया था कि पुरुष (आत्मा) सुख और दुःख का अनुभव करने के लिए उत्तरदायी है। अब वे बताते हैं कि ऐसा कैसे होता है? स्वयं को शरीर मान लेने से आत्मा ऐसी गतिविधियों की ओर क्रियाशील हो जाती है जो शारीरिक सुखों के भोग की ओर ले जाती है। चूंकि शरीर माया से निर्मित है इसलिए यह माया शक्ति, जो कि तीन गुणों सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से बनी है, का भोग करना चाहता है। अहंकार के कारण आत्मा स्वयं को कर्त्ता और शरीर के भोक्ता के रूप में पहचानने लगती है। शरीर, मन और बुद्धि सभी कार्य करते हैं लेकिन आत्मा उन सबके लिए उत्तरदायी ठहरायी जाती है। जैसे यदि किसी बस की दुर्घटना हो जाती है तब बस के पहियों और स्टेयरिंग को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। बस की किसी प्रकार की क्षति के लिए बस का चालक उत्तरदायी होता है। समान रूप से इन्द्रियाँ मन, बुद्धि आत्मा द्वारा क्रियाशील होते हैं तथा ये उसके प्रभुत्व में कार्य करते हैं। इस प्रकार से आत्मा शरीर द्वारा किए गए सभी कार्यकलापों के लिए कर्मफल का संचय करती है। अनन्त जन्मों के कर्मों का संचित भण्डार ही इसके बार-बार उत्तम और निम्न योनियों में जन्म का कारण बता है।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वर: |
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुष: पर: || 23||
इस शरीर में परमेश्वर भी रहता है। उसे साक्षी, अनुमति प्रदान करने वाला, सहायक, परम भोक्ता, परम नियन्ता और परमात्मा कहा जाता है।
अब तक श्रीकृष्ण द्वारा शरीर के भीतर जीवात्मा की स्थिति का वर्णन किया गया है। अब इस श्लोक में वे परमात्मा की स्थिति का वर्णन करते हैं, जो शरीर के भीतर भी निवास करता है। उन्होंने श्लोक संख्या 13.2 में भी इसी प्रकार से परमात्मा शब्द का उल्लेख किया था जब उन्होंने बताया था कि जीवात्मा केवल अपने शरीर की ज्ञाता है जबकि परमात्मा अनन्त शरीरों के ज्ञाता हैं। सभी प्राणियों में स्थित परमात्मा भगवान विष्णु के साकार रूप में भी प्रकट होते हैं। विष्णु के परमात्मा संसार के पोषण के लिए उत्तरदायी हैं। भगवान विष्णु क्षीर सागर में साकार रूप में रहते हैं। वह अपना विस्तार कर सभी प्राणियों के हृदय में परमात्मा के रूप में वास करते हैं। सभी के हृदय में बैठकर वे सबके कर्मों को देखते हैं और उनके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं तथा उचित समय पर उनका फल प्रदान करते हैं। वे प्रत्येक जन्म में जीवात्मा को चाहे जो भी शरीर मिले, सदैव उसके साथ रहते हैं। वे सर्प, सुअर या कीड़े मकोडों के शरीर में रहने में कोई संकोच नहीं करते। मुंडकोपनिषद् में वर्णन है-
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।।
समाने वृक्षे पुरूषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः
(मुंडकोपनिषद्-3.1.1-2)
"शरीर रूपी वृक्ष के घोंसले में दो पक्षी रहते हैं। वे आत्मा और परमात्मा हैं। जीवात्मा परमात्मा की ओर पीठ किए हुए है और वृक्ष के फलों को भोगने में मग्न हैं। जब मीठे फल आते हैं तो यह सुख का अनुभव करती है और जब फल कड़वे आते हैं तो तब दुःखी हो जाती है। परमात्मा जीवात्मा का मित्र अवश्य है लेकिन वह हस्तक्षेप नहीं करता वह केवल बैठकर देखता रहता है। यदि जीवात्मा परमात्मा सम्मुख हो जाती है तब उसके सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं।" जीवात्मा भगवान के सम्मुख होने या विमुख रहने के लिए स्वतंत्र है। इस स्वतंत्रता के अनुचित प्रयोग से जीवात्मा बंधन में फंस जाती है जबकि इसका सदुपयोग सीखकर यह भगवान की नित्य सेवा प्राप्त कर सकती है और असीम आनन्द पा सकती है।
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणै: सह |
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते || 24||
वे जो परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति के सत्य और तीनों गुणों की प्रकृति को समझ लेते हैं वे पुनः जन्म नहीं लेते। उनकी वर्तमान स्थिति चाहे जैसी भी हो, वे मुक्त हो जाते हैं।
अज्ञानता आत्मा को अधोगति की ओर ले जाती है। अपनी दिव्य पहचान को भूल कर यह भौतिक चेतना में डूब जाती है। इसलिए अपनी वर्तमान स्थिति से अपना पुनरूत्थान करने के लिए इसका जागना आवश्यक है। श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी ऐसा वर्णन किया गया है कि सृष्टि में तीन तत्त्व हैं
संयुक्तमेतत् क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः।
अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावात् ज्ञात्वा देवम् मुच्यते सर्वपाशैः।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-1.8)
सृष्टि में तीन तत्त्व विद्यमान हैं। सदैव परिवर्तनशील मायिक जगत्, अपरिवर्तनशील आत्मा और दोनों का स्वामी परमात्मा। इन तत्त्वों की अज्ञानता जीवात्मा के बंधन का कारण है जबकि इनका ज्ञान माया की बेड़ियों को काट कर उससे अलग करने में सहायता करता है। श्रीकृष्ण जिस ज्ञान के संबंध में चर्चा कर रहे हैं, वह कोई कोरा पुस्तकीय ज्ञान नहीं है बल्कि सिद्ध ज्ञान है। इस ज्ञान का बोध तभी होता है जब हम पहले ही इन तीन तत्त्वों का सैद्धान्तिक ज्ञान अपने गुरु और धर्म ग्रंथों से प्राप्त कर लें और तत्पश्चात् साधना में संलग्न हों। श्रीकृष्ण अब अगले श्लोक में तीन साधना विधियों का वर्णन करेंगे।
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना |
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे || 25||
कुछ लोग ध्यान द्वारा अपने हृदय में बैठे परमात्मा को देखते हैं और कुछ लोग ज्ञान के संवर्धन द्वारा जबकि कुछ अन्य लोग कर्म योग द्वारा देखने का प्रयत्न करते हैं।
विविधता भगवान की सृष्टि की विशेषता है। वृक्ष के दो पत्ते भी एक समान नहीं होते। उसी प्रकार से किन्हीं दो मनुष्यों के अंगुलियों के निशान भी एक जैसे नहीं होते। समान रूप से सभी जीवात्माएँ भी अद्वितीय हैं और उनके विशिष्ट लक्षण हैं जिन्हे उन्होंने अपनी जन्म मृत्यु की अनूठी यात्राओं में प्राप्त किया है। इसी प्रकार से आध्यात्मिक क्षेत्र में भी सभी लोग एक प्रकार के साधाना की ओर आकर्षित नहीं होते। श्रीमद्भगवद्गीता और अन्य धार्मिक ग्रंथों की सुन्दरता यह है कि ये मनुष्यों को मानव जाति में निहित विविध ताओं का बोध कराते हैं और इन्हें अपने उपदेशों में समायोजित करते हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण बताते हैं कि कुछ साधक अपने मन से जूझते हैं और इसे अपने वश में लाने का प्रयत्न करते रहते हैं। वे अपने हृदय में स्थित भगवान का ध्यान करने की ओर आकर्षित होते हैं। जब उनका मन उनके भीतर स्थित भगवान में स्थिर हो जाता है तब वे अपने अनंत आध्यात्मिक आनंद से सराबोर हो जाते हैं। अन्य लोगों को अपनी बुद्धि का प्रयोग करने में संतोष प्राप्त होता है। आत्मा, शरीर मन, बुद्धि और अहंकार में भेद का विचार उन्हें अत्यंत प्रभावित करता है। वे श्रवण, मनन और निध्यासन की प्रक्रिया द्वारा और अधिक विश्वास से आत्मा, परमात्मा और माया के संबंध में ज्ञान वृद्धि करते हैं। जबकि कुछ लोग जब किसी कार्य में लीन होते हैं तो वे भगवान द्वारा उन्हें प्रदत्त गुणों और योग्यताओं को उसकी सेवा में करने का प्रयास करते हैं। अपनी श्वास के अंतिम क्षण का भी उपयोग भगवान की सेवा में अर्पित करने से अधिक उन्हें कुछ भी संतुष्ट नहीं कर सकता। इस प्रकार से सभी साधक पनी शक्तियों का उपयोग भगवान की अनुभूति के लिए करते हैं। ज्ञान, कर्म आदि की सफलता तभी होती है जब वह भगवान की भक्ति से युक्त और उनके सुख के लिए हो।
श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है:
सा विद्या तन्मतिर्यया
(4.29.49)
"सच्चा ज्ञान वह है जो भगवान के लिए प्रेम उत्पन्न करे। कर्म की सार्थकता तभी होती है जब यह भगवान के सुख के लिए किया जाता है।"
अन्ये त्वेवमजानन्त: श्रुत्वान्येभ्य उपासते |
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणा: || 26||
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो आध्यात्मिक मार्ग से अनभिज्ञ होते हैं लेकिन वे संत पुरुषों से श्रवण कर भगवान की आराधना करने लगते हैं। वे भी धीरे-धीरे जन्म और मृत्यु के सागर को पार कर लेते हैं।
संतों से भक्ति विषय का श्रवण करने वाले पुरुष भी धीरे-धीरे जन्म और मृत्यु के समुद्र को पार कर सकते हैं। कुछ लोग साधना पद्धति से अनभिज्ञ होते हैं लेकिन वे दूसरों के द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान का श्रवण करते हैं और फिर आध्यात्मिक मार्ग की ओर आकर्षित होते हैं। वास्तव में, अधिकतर वही लोग आध्यात्मिक मार्ग की ओर अग्रसर हुए जिन्हें आध्यात्मिक ज्ञान की औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं थी। लेकिन किसी मध्यम से उन्हें जब इस संबंध में कुछ पढ़ने और श्रवण करने का अवसर मिला तब उनमें भगवान की भक्ति के प्रति रुचि उत्पन्न हुई और उन्होंने अपनी आध्यात्मिक यात्रा प्रारम्भ की।
वैदिक परम्परा में संतों की वाणी के श्रवण को आध्यात्मिक कल्याण के उपाय के रूप में विशेष महत्त्व दिया गया है। श्रीमद्भागवत् में परीक्षित ने शुकदेव से प्रश्न किया कि हम अपने हृदय को कैसे शुद्ध कर सकते हैं? जैसे कि काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या द्वेष आदि। शुकदेव उत्तर देते हैं-
श्रृण्वतां स्वकथां कृष्ण:पुण्यश्रवणकीर्तनः।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-1.2.17)
"परीक्षित! संतों से केवल भगवान के दिव्य नामों, रूपों, लीलाओं, गुणों, धामों और उनके संतों का श्रवण करो। इससे तुम्हारे हृदय में विद्यमान अनंत जन्मों की मैल स्वतः नष्ट हो जाएगी।" जब हम किसी सही स्रोत से श्रवण करते हैं तब हम प्रामाणिक ज्ञान प्राप्त करते हैं और जिस संत से हम यह श्रवण करते हैं उसके प्रति भी हमारे भीतर अटूट श्रद्धा उत्पन्न होने लगती है। संतों का श्रवण करना श्रद्धा उत्पन्न करने का सरल मार्ग है। आध्यात्मिक साधना हेतु संतों से मिलने की उत्सुकता भी हमें निर्मल करती है। भक्ति के लिए उत्साह ऐसा बल प्रदान करती है जो साधकों की लौकिक चेतना को समाप्त करने और साधना के मार्गकी बाधाओं को दूर करने में सहायता करती है। श्रद्धा और उत्साह ऐसी आधारशिलाएँ हैं जिन पर भक्ति रूपी भवन टिका रहता है।
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्वं स्थावरजङ्गमम् |
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ || 27||
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ! चर और अचर जिनका अस्तित्व तुम्हें दिखाई दे रहा है वह कर्म क्षेत्र और क्षेत्र के ज्ञाता का संयोग मात्र है।
श्रीकृष्ण ने यहाँ 'यावत् किञ्चित्' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ है 'जो भी कुछ अस्तित्त्व में हैं' चाहे वह विशाल ही या अति सूक्ष्म हो। सबका जन्म 'क्षेत्रज्ञ' अर्थात् शरीर के ज्ञाता और क्षेत्र अर्थात् कर्म क्षेत्र के संयोग से होता है। अब्राहमिक परम्परा मानव शरीर में आत्मा के अस्तित्त्व को स्वीकार करती है किन्तु अन्य प्राणियों में आत्मा के अस्तित्त्व को स्वीकार नहीं करती। यह विचारधारा अन्य जीवों के प्रति हिंसा को बढ़ावा देती है। किन्तु वैदिक दर्शन में यह कहा गया है कि जहाँ भी चेतना है वहाँ आत्मा रहती है। इसके बिना कुछ भी चेतन नहीं रह सकता। 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में सर जी. सी. बोस ने एक खोज द्वारा यह सिद्ध किया था कि पेड़-पौधे भी भावनाओं का अनुभव करते हैं और वे भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। इनके अनुसंधान ने सिद्ध किया कि मधुर संगीत पौधों के विकास में वृद्धि कर सकता है। जब एक शिकारी वृक्ष पर बैठी चिड़िया को मारता है तब वृक्ष में होने वाला कम्पन्न यह दर्शाता है कि वृक्ष चिड़िया के लिए दुःखी होता है। जब किसी उद्यान का माली उद्यान में प्रवेश करता है तब पेड़ पौधे हर्षित होने लगते हैं। पेड़ के कम्पनों में होने वाले परिवर्तनों से ज्ञात होता है कि यह चैतन्य है और यह भावनाओं का अनुभव करता है। ये सब टिप्पणियाँ यहाँ श्रीकृष्ण के इस कथन की पुष्टि करती हैं कि सभी प्राणियों में चेतना होती है तथा वे सभी आत्मा और शरीर का संयोगरूप हैं।
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् |
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति || 28||
जो परमात्मा को सभी जीवों में आत्मा के साथ देखता है और जो इस नश्वर शरीर में दोनों को अविनाशी समझता है, केवल वही वास्तव में देखता है।।
श्रीकृष्ण ने पहले 'यः पश्यति स पश्यति' का प्रयोग किया था जिसका अर्थ है कि केवल वही वास्तव में देखता है जो ऐसा देखता है। अब वे कहते हैं कि शरीर के भीतर केवल आत्मा के अस्तित्त्व को देखना ही पर्याप्त नहीं है। भगवान परमात्मा के रूप में सभी शरीर में निवास करते हैं। सभी जीवों के हृदय में परमात्मा स्थित हैं, इसका उल्लेख पहले भी इस अध्याय के 23वें श्लोक में किया गया है। इसके अतिरिक्त भगवद्गीता के 10वें अध्याय के 20वें और 18वें अध्याय के 61वें श्लोक में और उसी प्रकार से अन्य वैदिक ग्रंथों में भी इस का वर्णन किया गया है।
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.11)
"भगवान एक है, वह सभी के हृदयों में रहता है, वह सर्वव्यापी है। वह आत्माओं की परम आत्मा है।"
भवान् हि सर्वभूतानामात्मा साक्षी स्वदृग् विभो
(श्रीमद्भागवतम्-10.86.31)
"भगवान सभी के भीतर साक्षी और स्वामी के रूप में निवास करता है।"
राम ब्रह्म चिन्मय अबिनासी। सर्व रहित सब उर पुर बासी।।
(रामचरितमानस)
"भगवान श्रीराम अविनाशी और सबसे परे हैं। वह सभी जीवों के हृदय में निवास करते हैं।" परमात्मा सदैव जीवात्मा के साथ रहते हैं। श्रीकृष्ण अब यह व्यक्त करेंगे कि सभी जीवों में भगवान की उपस्थिति का अनुभव करने से साधक के जीवन में किस प्रकार परिवर्तन होता है।
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् |
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् || 29||
वे जो भगवान को सर्वत्र और सभी जीवों में समान रूप से स्थित देखते हैं वे अपने मन से स्वयं की हानि नहीं करते। इस प्रकार से वे अपने परम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।
मन की प्रकृति सुख की कामना करना है और माया की उपज होने के कारण सहज रूप से इसकी रूचि सांसारिक सुखों में होती है। अगर हम अपने मन की इच्छाओं की पूर्ति करते हैं तब हम गहन लौकिक चेतनाओं में फँस जाते हैं। इस अधोपतन को रोकने के लिए बुद्धि की सहायता से मन पर अंकुश लगाना पड़ता है। इसके लिए बुद्धि को सच्चे ज्ञान से युक्त करना आवश्यक है।
वे लोग जो भगवान को सभी जीवों में प्रकट परमात्मा के रूप में देखना सीख लेते हैं और इस सत्य ज्ञान से जीवन निर्वाह करते हैं, वे फिर कभी दूसरों से व्यक्तिगत लाभ और सुख की अपेक्षा नहीं करते। वे न तो दूसरे के अच्छे कार्यों के कारण उनके प्रति आसक्त होते हैं और न ही उनके द्वारा स्वयं को किसी भी प्रकार की क्षति पहुँचाने के कारण उनसे द्वेष करते हैं। अपितु इसके विपरीत वे सभी को भगवान के अंश के रूप में देखते हैं और अन्य लोगों का सम्मान और उनकी सेवा करने का मनोभाव बनाए रखते हैं। जब उन्हें अपने भीतर भगवान की उपस्थिति का बोध हो जाता है तब वे स्वाभाविक रूप से दुर्व्यवहार, धोखा-धड़ी, और दूसरों को अपमानित करने जैसे विकारों से दूर रहते हैं। उनके लिए राष्ट्रीयता, योनि, जाति, लिंगभेद, पद प्रतिष्ठा, रंग भेद, अमीर-गरीब आदि सबका अन्तर व्यर्थ हो जाता है। इस प्रकार से वे सभी जीवों में भगवान की उपस्थिति का बोध करते हुए अपने मन को शुद्ध करते हैं और अंततः परम लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं।
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वश: |
य: पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति || 30||
जो यह समझ लेते हैं कि शरीर के समस्त कार्य माया द्वारा सम्पन्न होते हैं तथा देहधारी आत्मा वास्तव में कुछ नहीं करती। केवल वही वास्तव में देखते हैं।
तंत्र भागवत में वर्णन है-“अहड्कारात् तु संसारो भवेत् जीवस्य न स्वतः" अर्थात् शरीर होने का अहंकार और कर्ता होने का अभिमान आत्मा को जीवन और मृत्यु के संसार में फंसा लेता है। अहंकार के कारण हम अपनी पहचान शरीर के रूप में करते हैं और हम शरीर के कार्यों को आत्मा पर आरोपित करते हैं तथा यह सोचते हैं कि 'मैं यह कर रहा हूँ। लेकिन महापुरुष को सदा ही यह बोध होता है कि खाने-पीने, वार्तालाप इत्यादि कार्य केवल शरीर द्वारा सम्पन्न किए जाते हैं। किन्तु फिर भी आत्मा शरीर द्वारा किए गए कार्यों के उत्तरदायित्व से विलग नहीं रह सकती। जिस प्रकार से कोई राष्ट्राध्यक्ष स्वयं न लड़ते हुए देश द्वारा लड़े जाने वाले युद्ध के निर्णय के लिए उत्तरदायी होता है। उसी प्रकार से आत्मा भी जीवित प्राणियों के कार्यों के लिए उत्तरदायी होती है भले ही वे कार्य शरीर, मन और बुद्धि द्वारा सम्पन्न किए गए हों। इसी कारण से साधक को इन दोनों पक्षों को मन में अवश्य ही रखना चाहिए। महर्षि वसिष्ठ ने राम को यह उपदेश दिया था, “कर्ता बहिरकर्ता अंतर्लोके विहर राघव (योग वासिष्ठ)" अर्थात् राम! कर्म करते समय बाह्य रूप से ऐसा परिश्रम करो जैसा कि इसका परिणाम तुम पर निर्भर हो लेकिन आंतरिक दृष्टि से स्वयं को अकर्ता समझो।
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति |
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा || 31||
जब वे सभी प्राणियों को एक ही परमात्मा में स्थित देखते हैं और उन सबको उसी से उत्पन्न समझते हैं तब वे ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करते हैं।
महासागर स्वयं को कई रूपों में प्रकट करता है, जैसे कि लहर, झाग, ज्वार, छोटी लहर, इत्यादि। जब कोई इन सबको प्रथम बार देखता है तब वह यह निष्कर्ष निकालता है कि इन सब में भिन्नता है लेकिन अगर किसी को महासागरीय विषयों का ज्ञान होता है तब वह इन सभी विविधताओं में निहित एकत्व को देखता है। समान रूप से ब्रह्माण्ड में कई योनियाँ हैं-अणु से लेकर (अमीबा) तक और अति शक्तिशाली स्वर्ग के देवता तक। ये सब एक ही परमात्मा से जन्मे हैं। आत्मा भगवान का अंश है और यह शरीर में वास करती है जो माया शक्ति से निर्मित है। योनियों में भिन्नता आत्मा के कारण से नहीं होती अपितु माया शक्ति द्वारा प्रकट विभिन्न शरीरों के कारण होती है। जन्म के समय सभी जीवों के शरीरों की रचना प्राकृत शक्ति द्वारा होती है और मृत्यु होने पर उनके शरीर उसी में विलीन हो जाते हैं। जब हम सभी प्राणियों को एक ही माया शक्ति से जन्मे हुए देखते हैं तब हमें इन विविधताओं के पीछे एकत्व की अनुभूति होती है। चूँकि प्रकृति भगवान की शक्ति है, यह ज्ञान हमें सभी अस्तित्त्वों में व्याप्त एक परमात्मा को देखने में समर्थ बनाता है। यह ब्रह्म की अनुभूति की ओर ले जाता है।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय: |
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते || 32||
परमात्मा अविनाशी है और इसका कोई आदि नहीं है और यह प्रकृति के गुणों से रहित है। हे कुन्ती पुत्र! यद्यपि यह शरीर में स्थित है किन्तु यह न तो कर्म करता है और न ही माया शक्ति से दूषित होता है।
भगवान सभी प्राणियों के शरीर में परमात्मा के रूप में निवास करते हैं। उनकी कभी शरीर के रूप में पहचान नहीं होती और न ही वे इसके अवस्थाओं से प्रभावित होते हैं। भौतिक शरीर में उनकी उपस्थिति उन्हें भौतिक नहीं बनाती और न ही वे कर्म के नियम तथा जन्म-मृत्यु के कालचक्र के अधीन होते हैं। जबकि दूसरी ओर आत्मा इन सबका अनुभव करती है।
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते |
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते || 33||
आकाश सबको अपने में धारण कर लेता है लेकिन सूक्ष्म होने के कारण जिसे यह धारण किए रहता है उसमें लिप्त नहीं होता। इसी प्रकार से यद्यपि आत्मा चेतना के रूप में पूरे शरीर में व्याप्त रहती है फिर भी आत्मा शरीर के धर्म से प्रभावित नहीं होती।
जीवात्मा अहंकार के कारण स्वयं की पहचान शरीर के रूप में करते हुए निद्रा, स्वाद, भ्रमण, थकावट और ताजगी आदि का अनुभव करती है। अब कोई यह पूछ सकता है कि शरीर में होने वाले परिवर्तन उसमें रहने वाली आत्मा को दूषित क्यों नहीं करते? श्रीकृष्ण इसे आकाश के उदाहरण के साथ स्पष्ट करते हैं। आकाश सब कुछ धारण करता है किंतु फिर भी उससे अप्रभावित रहता है क्योंकि यह धारण किए जाने वाले स्थूल पदार्थ से सूक्ष्म है। समान रूप से आत्मा सूक्ष्म है। भौतिक शरीर से जुड़ने के पश्चात् भी इसकी दिव्यता अक्षय रहती है।
यथा प्रकाशयत्येक: कृत्स्नं लोकमिमं रवि: |
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत || 34||
जिस प्रकार से एक सूर्य समस्त ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है उसी प्रकार से आत्मा पूरे शरीर को प्रकाशित करती है।
यद्यपि आत्मा जिस शरीर में रहती है उसे ऊर्जा प्रदान करती है फिर भी वह स्वयं अत्यंत सूक्ष्म है। "एषोऽणुरात्मा" (मुंडकोपनिषद्-3.1.9) “आत्मा का आकार अत्यंत अणु है।" श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णन ह
बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।
भागोजीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-5.9)
"यदि हम बाल के अग्र भाग के सौ टुकड़े करें और फिर इनमें से एक टुकड़े के पुनः सौ टुकड़े करें तब हम आत्मा के आकार को समझ सकते हैं। इनकी संख्या असंख्य है।" यह एक प्रकार से आत्मा की सूक्ष्मता को व्यक्त करने की विधि है। सूक्ष्म आत्मा उन शरीरों को कैसे गतिशील रखती है जो इतनी विशाल है। श्रीकृष्ण सूर्य की उपमा देकर इसे स्पष्ट करते हैं। यद्यपि सूर्य एक ही स्थान पर स्थिर रहता है किंतु वह सम्पूर्ण सौरमण्डल को अपने प्रकाश से प्रकाशित करता है। वेदांत दर्शन में भी ऐसा वर्णन किया गया ह
गुणाद्वा लोकवत्
(वेदांत दर्शन-2.3.25)
"हृदय में स्थित आत्मा समस्त क्षेत्र को चेतना प्रदान करती है।"
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा |
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् || 35||
जो लोग ज्ञान चक्षुओं से शरीर और शरीर के ज्ञाता के बीच के अन्तर और माया शक्ति के बन्धनों से मुक्त होने की विधि जान लेते हैं, वे परम लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं।
अब तक श्रीकृष्ण ने जो कुछ कहा उसका उपसंहार करते हुए वे क्षेत्र और क्षेत्र के ज्ञाता के विषय का समापन करते हैं। प्रकृति अर्थात् क्षेत्र (कर्म क्षेत्र) और आत्मा अर्थात् क्षेत्रज्ञ (क्षेत्र का ज्ञाता) के अंतर को जानना ही वास्तविक ज्ञान है। जो इस विवेक ज्ञान से सम्पन्न हो जाते हैं, वे स्वयं को भौतिक शरीर के रूप में नहीं देखते। वे अपनी पहचान भगवान के अणु अंश के रूप में करते हैं, इसलिए वे आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर चलते हैं और माया शक्ति के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
।। श्रीमद्भगवत गीता त्रयोदश अध्याय सम्पूर्ण हुआ ।।
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