॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhagavad Gita Chapter 14
श्रीमद्भगवत गीता चतुर्दश अध्याय
अध्याय चौदह: गुण त्रय विभाग योग
त्रिगुणों के ज्ञान का योग
पिछले अध्याय में आत्मा और शरीर के बीच के अन्तर को विस्तार से समझाया गया था। इस अध्याय में माया शक्ति का वर्णन किया गया है जो शरीर और उसके तत्त्वों का स्रोत है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि माया सत्त्व, रजस, और तमस तीन गुणों से निर्मित है। शरीर, मन और बुद्धि जो प्राकृत शक्ति से बने हैं उनमें भी तीनों गुण विद्यमान होते हैं और हम में इन गुणों का अनुपात हमारे व्यक्तित्व का निर्धारण करता है। सत्त्व गुण शांत स्वभाव, सद्गुण और शुद्धता को इंगित करता है तथा रजो गुण कामनाओं और को बढ़ाता है एवं तमो गुण भ्रम, आलस्य, और निद्रा का कारण है। जब तक आत्मा मुक्त नहीं होती तब तक उसे माया शक्ति की प्रबल शक्तियों से निपटना पड़ता है। मुक्ति इन तीन गुणों से परे है।
आगे श्रीकृष्ण इन बंधनों को काटने का एक सरल उपाय बताते हैं। परम शक्तिशाली भगवान इन तीनों गुणों से परे अर्थात् गुणातीत हैं। यदि हम मन को उनमें अनुरक्त करते हैं तब हमारा मन भी दिव्यता की ओर बढ़ता है। इस बिन्दु पर अर्जुन तीन गुणों से परे होने की अवस्था प्राप्त व्यक्तियों के गुण-विशेषताओं के संबंध में पूछता है तब श्रीकृष्ण सहानुभूतिपूर्वक ऐसी प्रबुद्ध आत्माओं के लक्षणों का निरूपण करते हैं। वे बताते हैं कि महापुरुष सदैव संतुलित रहते हैं और वे संसार में तीन गुणों के कार्यान्वयन को देखकर व्यक्तियों, पदार्थों तथा परिस्थितियों में प्रकट होने वाले उनके प्रभाव से विचलित नहीं होते। वे सभी पदार्थों को भगवान की शक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं जो अंततः उनके नियंत्रण में होती है। इसलिए सांसारिक परिस्थितियाँ न तो उन्हें हर्षित और न ही उन्हें दुखी कर सकती हैं। इस प्रकार बिना विचलित हुए वे अपनी आत्मा में स्थित रहते हैं। श्रीकृष्ण भक्ति की महिमा और हमें तीन गुणों से परे ले जाने की इसकी क्षमता का स्मरण कराते हुए इस अध्याय का समापन करते हैं।
श्रीभगवानुवाच |
परं भूय: प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् |
यज्ज्ञात्वा मुनय: सर्वे परां सिद्धिमितो गता: || 1||
परमेश्वर ने कहाः अब मैं पुनः तुम्हें श्रेष्ठ ज्ञान के विषय में बताऊँगा जो सभी ज्ञानों में सर्वश्रेष्ठ है और सभी ज्ञानों का परम ज्ञान है, जिसे जानकर सभी महान संतों ने परम सिद्धि प्राप्त की है।
पिछले अध्याय में श्रीकृष्ण ने यह कहा था कि सभी प्राणी आत्मा और शरीर का संयोजन हैं। उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि प्रकृति ही पुरुष (आत्मा) के लिए कर्म क्षेत्र उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी है। वे आगे कहते हैं कि यह सब कुछ उस भगवान के निर्देशन में होता है जो सभी जीवों के शरीर में वास करते हैं। इस अध्याय में वे माया के तीन गुणों के संबंध में विस्तार से प्रकाश डालेंगे। इस ज्ञान को पाकर और इसे अपनी चेतना में आत्मसात् कर हम परम सिद्धि की प्राप्ति की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागता: |
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च || 2||
वे जो इस ज्ञान की शरण लेते हैं, वे मुझे प्राप्त होंगे और वे सृष्टि के समय न तो पुनः जन्म लेंगे और न ही प्रलय के समय उनका विनाश होगा।
श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि वे जो ज्ञान प्रदान करेंगे और जो उस ज्ञान को अपने भीतर समाहित कर लेंगे उन्हें पुनः मां के गर्भ रूपी कारावास का दुःख सहन नहीं करना पड़ेगा। वे आत्यन्तिक प्रलय के समय भगवान के उदर में प्रसुप्त अवस्था में भी नहीं रहें न ही अगले सृष्टि चक्र में वे पुनः जन्म लेंगे। वास्तव में माया शक्ति के तीनों गुण बंधन का कारण हैं और इनका ज्ञान बंधनों से मुक्ति पाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
श्रीकृष्ण जो भी शिक्षा प्रदान करते हैं वे बार-बार उसके परिणामों की उद्घोषणा करते हैं ताकि उनके विद्यार्थी उसमें तन्मय हो जाएँ। 'न व्यथन्ति' शब्द का अर्थ 'वे दुःख का अनुभव नहीं करेंगे' है। 'साधर्म्यमागताः' शब्द का तात्पर्य यह है कि वे स्वयं भगवान जैसी 'दिव्य प्रकृति प्राप्त कर लेते है।' जब आत्मा माया शक्ति के बंधन से मुक्त हो जाती है तब वह भगवान की दिव्य शक्ति 'योगमाया' के प्रभुत्व में आ जाती है। यह दिव्य शक्ति उसे भगवान के दिव्य ज्ञान, प्रेम और आनन्द से युक्त कर देती है जिसके फलस्वरूप जीवात्मा भगवान के समान बन जाती है और भगवान जैसे गुण प्राप्त कर लेती है।
मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् |
सम्भव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत || 3||
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या: |
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता || 4||
हे भरत पुत्र! प्रकृति, गर्भ स्वरूपा है। मैं इसी प्रकृति में जीवात्मा को गर्भस्थ करता हूँ जिससे समस्त जीवों का जन्म होता है। हे कुन्ती पुत्र! सभी योनियाँ जो जन्म लेती है, माया उनकी गर्भ है और मैं उनका बीज प्रदाता जनक हूँ।
जैसा कि 7वें और 8वें अध्याय में वर्णन किया गया है कि भौतिक सृष्टि में सर्जन, स्थिति और प्रलय का चक्र चलता रहता है। प्रलय के दौरान जो जीवात्माएँ भगवान से विमुख होती हैं वे महाविष्णु के उदर में प्रसुप्त अवस्था में समा जाती हैं। प्रकृति भी अव्यक्त अवस्था में भगवान के महोदर में चली जाती है। जब भगवान सृष्टि करने की इच्छा करते हैं तब वे प्रकृति पर दृष्टि डालते हैं। परिणामस्वरूप यह व्यक्त होने लगती है और फिर क्रमिक रूप से महान, अहंकार, पंचतन्मात्राओं और पंच महाभूतों की उत्पत्ति होती है। दूसरे सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की सहायता से प्राकृतिक शक्ति विविध जीवों को उत्पन्न करती है और भगवान आत्माओं को उन उपयुक्त शरीरों में रखता है जो उनके पूर्व कर्मों द्वारा निर्धारित होता है। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि प्रकृति गर्भ के समान है और आत्माएँ शुक्राणुओं के समान हैं। वे आत्माओं को प्रकृति के गर्भ में भेजते हैं। ऋषि वेदव्यास श्रीमद्भागवतम् में इसी प्रकार का वर्णन करते हैं-
दैवात्क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ पर:पुमान्।
आधत्त वीर्यं सासूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम्।।
(श्रीमद्भागवतम्-3.26.19)
"भगवान आत्माओं को प्रकृति के गर्भ में स्थापित करता है। तब जीवात्मा के कर्मों से उत्प्रेरित होकर माया शक्ति उनके लिए उपयुक्त शरीर तैयार करती है। वह सभी आत्माओं को संसार में नहीं भेजती बल्कि केवल भगवान से विमुख आत्माओं को भौतिक जगत में भेजती है।"
सत्त्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा: |
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् || 5||
हे महाबाहु अर्जुन! माया शक्ति सत्त्व, रजस और तमस तीन गुणों से निर्मित है। ये गुण अविनाशी आत्मा को नश्वर शरीर के बंधन में डालते हैं।
यह समझाने के पश्चात् कि सभी जीव पुरुष और प्रकृति द्वारा जन्म लेते हैं। अब श्रीकृष्ण अगले 14 श्लोकों में यह समझाएंगे कि प्रकृति किस प्रकार से आत्मा को बंधन में डालती है। यद्यपि यह दिव्य है तथापि शरीर के साथ इसकी पहचान इसे माया शक्ति के बंधन में डाल देती है। प्राकृत शक्ति सत्त्व, रजस और तमस तीनों गुणों से युक्त होती है। इसलिए शरीर, मन और बुद्धि जो प्रकृति द्वारा निर्मित होते हैं उनमें भी तीन गुण समाविष्ट होते हैं।
इस संबंध में त्रिरंग (RGB) प्रिटिंग के उदाहरण पर विचार किया जा सकता है। अगर मशीन द्वारा कागज पर कोई रंग अधिक डाल दिया जाता है तब चित्र में वह रंग अधिक गाढ़ा दिखता है। उसी प्रकार से प्रकृति भी तीन रंगों वाली है। व्यक्ति के आंतरिक विचारों, बाह्य परिस्थितियों, पूर्व संस्कारों और अन्य तत्त्वों के आधार पर कोई एक गुण उस व्यक्ति पर हावी हो जात है। तब वह गुण उस व्यक्ति के व्यक्तित्व पर अपनी छाया छोड़ता है। श्रीकृष्ण अब जीवों पर तीनों गुणों के प्रभाव का वर्णन करेंगे।
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् |
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ || 6||
इनमें से सत्त्वगुण शुद्ध होने के कारण प्रकाश प्रदान करने वाला और पुण्य कर्मों से युक्त है। हे निष्पाप अर्जुन! यह आत्मा में सुख और ज्ञान के भावों के प्रति आसक्ति उत्पन्न कर उसे बंधन में डालता है।
'प्रकाशकम' शब्द का अर्थ 'प्रकाशित करना' है। 'अनामयम्' शब्द का अर्थ 'स्वास्थ्य और अच्छाइयों से युक्त होना है।' विस्तृत रूप से इसका अर्थ है-'शांत स्वभाव' अर्थात् पीड़ा के कारणों, असहजता या दुःखों से रहित होना है। सत्त्वगुण शांत और प्रकाशवान है। सत्त्वगुण किसी के व्यक्तित्व में सद्गुण उत्पन्न करते हैं और बुद्धि को ज्ञान से आलोकित करते हैं। यह मनुष्य को स्थिर, संतुष्ट, दानी, दयालु, सहायक, और शांत बनाते हैं। यह उत्तम स्वास्थ्य बनाए रखते हैं और हमें रोग मुक्त करते हैं। सत्त्वगुण शांति और प्रसन्नता के कारण उत्पन्न होते हैं और इनमें आसक्ति होने से ये आत्मा को माया के बंधन में डालते हैं।
आइए इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझे। एक यात्री जंगल से जा रहा था तब तीन डाकुओं ने उस पर हमला किया। पहले डाकू ने कहा कि इसकी हत्या करके इसका सारा धन छीन लेते हैं। दूसरे ने कहा कि इसकी हत्या न करके इसे केवल बांधकर इसकी सारी सम्पत्ति लूट लेते हैं। दूसरे डाकू के परामर्श के अनुसार उन्होंने उसे रस्सियों से बांधकर उसकी सारी सम्पत्ति लूट ली। जब सभी डाकू कुछ दूर आगे निकल गये तब तीसरा डाकू लौटकर उसी स्थान पर आया जहाँ उन्होंने यात्री को बांधा था। उसने यात्री की रस्सियाँ खोल दी और उसे जंगल के किनारे पर ले गया और कहा–'मैं स्वयं यहाँ से बाहर नहीं जा सकता लेकिन यदि तुम इस मार्ग पर आगे चलोगे तब तुम इस जंगल से बाहर निकल जाओगे।'
पहला डाकू तमोगुणी था जो अज्ञानता का स्वरूप है जो वास्तव में स्वयं का पतन कर उस व्यक्ति की हत्या करना चाहता था। दूसरा डाकू रजोगुणी है जो कि वासना का स्वरूप है। जो जीवों में आसक्ति बढ़ाती है और आत्मा को सांसारिक कामनाओं से बांधती है। तथा तीसरा डाकू सत्त्वगुणी था जो अच्छाई का गुण है और जो मनुष्य में बुराइयों को कम करता है तथा आत्मा को सदाचार के मार्ग पर ले जाता है। किंतु सत्त्वगुण माया के क्षेत्र के भीतर है। इसमें हमारी आसक्ति नहीं होनी चाहिए अपितु हमें इसका प्रयोग दिव्यता की ओर कदम बढ़ाने के लिए करना चाहिए। इन तीनों से परे शुद्ध सत्त्व है जो सत्त्वगुण की चरम अवस्था है। यह भगवान की योगमय शक्ति का गुण है जो माया से परे है। जब आत्मा भगवत्प्राप्ति कर लेती है तब भगवान अपनी कृपा से आत्मा को शुद्ध सत्त्व प्रदान करते हैं तथा इन्द्रिय, मन और बुद्धि को दिव्य बनाते हैं।
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् |
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् || 7||
हे अर्जुन! रजोगुण की प्रकृति रागात्मिका है। यह सांसारिक इच्छाओं और आसक्ति से उत्पन्न होता है और आत्मा को कर्म के प्रतिफलों से बांधता है।
श्रीकृष्ण अब रजोगुण को समझाते हुए वर्णन करते हैं कि यह किस प्रकार आत्मा को जगत् से बांधता है। पतंजलि योग दर्शन शारीरिक कार्यकलापों में रजो गुण की मुख्य अभिव्यक्ति स्वीकार में करता है। यहाँ श्रीकृष्ण आसक्ति और कामना के रूप में इस का वर्णन करते हैं। रजोगुण इन्द्रिय सुखों के लिए वासना को दीप्त करता है। यह शारीरिक और मानसिक सुखों के लिए कामनाओं को बढ़ाता है। यह सांसारिक पदार्थों में आसक्ति बढ़ाता है। रजोगुण से प्रभावित होकर मनुष्य पद, प्रतिष्ठा, भविष्य, परिवार और गृहस्थ के कार्यों में व्यस्त हो जाता है। वह इन्हें सुख के स्रोत के रूप में देखता है और इनकी प्राप्ति के लिए अथक परिश्रम करने के लिए प्रेरित होता है। इस प्रकार से रजोगुण कामनाओं को बढ़ाता है। ये कामनाएँ आगे और अधिक भड़कती हैं। ये दोनों एक-दूसरे का पोषण करते हैं और आत्मा को सांसारिक जाल में फंसा देते हैं। इस जाल को काटने का मार्ग भक्तियोग अर्थात् अपने कर्म-फल भगवान को अर्पित करना है। यह संसार से विरक्ति उत्पन्न करता है और रजोगुण के प्रभाव को शांत करता है।
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् |
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत || 8||
हे अर्जुन! तमोगुण अज्ञानता के कारण उत्पन्न होता है और यह देहधारियों जीवात्माओं के लिए मोह का कारण है। यह सभी जीवों को प्रमाद, आलस्य और निद्रा द्वारा भ्रमित करता है।
तमोगुण सत्त्वगुण के विपरीत है। इससे प्रभावित व्यक्ति को निद्रा, आलस्य, नशा, हिंसा और जुआ खेलने जैसे कृत्यों से सुख मिलता है। वे उचित और अनुचित में अन्तर करने का विवेक खो देते हैं? वे अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए अनैतिक व्यवहार का आश्रय लेने में भी संकोच नहीं करते। अपने कर्त्तव्यों का पालन करना उनके लिए बोझ बन जाता है और वे उनकी उपेक्षा करते हैं। इसके अतिरिक्त आलस्य और निद्रा के प्रति उनका झुकाव और अधिक बढ़ जाता है। इस प्रकार से तमोगुण आत्मा को अज्ञानता के गहन अंधकार की ओर ले जाता है जिससे यह अपनी आध्यात्मिक पहचान, जीवन के लक्ष्य, तथा आत्म उत्थान के अवसर को भूल जाती है।
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रज: कर्मणि भारत |
ज्ञानमावृत्य तु तम: प्रमादे सञ्जयत्युत || 9||
सत्त्वगुण सांसारिक सुखों में बांधता है, रजोगुण आत्मा को सकाम कर्मों की ओर प्रवृत्त करता है और तमोगुण ज्ञान को आच्छादित कर आत्मा को भ्रम में रखता है।
सत्त्वगुण की प्रबलता से भौतिक जीवन के कष्ट कम हो जाते हैं और सांसारिक इच्छाएँ शांत हो जाती हैं। यह संतुष्टि की भावना को बढ़ाता है। यह शुभ तो है किन्तु इसका नकारात्मक पहलू भी हो सकता है। उदाहरणार्थ वे जो संसार में कष्ट पाते हैं औरअपने मन में उठने वाली कामनाओं से विक्षुब्ध रहते हैं, वे अपनी समस्याओं के समाधान के लिए प्रेरित होते हैं। और यह प्रेरणा उन्हें आध्यात्मिक मार्ग की ओर ले जाती है। किन्तु सत्त्वगुण से सम्पन्न लोग सरलता से आत्म संतुष्ट तो हो जाते हैं, लेकिन वे आगे उन्नति कर सिद्ध अवस्था को प्राप्त करने में रुचि नहीं लेते।
सत्त्वगुण बुद्धि को ज्ञान से भी प्रकाशित करता है। यदि यह आध्यात्मिक ज्ञान से युक्त नहीं होता तब ऐसे ज्ञान के फलस्वरूप अभिमान उत्पन्न होता है और यह अभिमान भगवान की भक्ति के मार्ग में बाधक बन जाता है। यह प्रायः वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों आदि में दिखाई देता है। उनमें सामान्य रूप से सत्त्वगुण की प्रधानता होती है क्योंकि वे अपना समय और ऊर्जा ज्ञान को पोषित करने में लगाते हैं। फिर भी वे जो ज्ञान अर्जित करते हैं वह प्रायः उन्हें घमण्डी बना देता है और वे यह अनुभव करने लगते हैं कि ज्ञानप्राप्ति से परे कोई सत्य नहीं है। इस प्रकार से इन्हें धार्मिक ग्रंथों और महापुरुषों के प्रति श्रद्धा विकसित करना कठिन प्रतीत होता है। रजोगुण की प्रधानता जीवात्मा को अथक परिश्रम करने के लिए प्रेरित करती है। संसार के प्रति उनकी आसक्ति, अधिक सुख प्राप्त करने की इच्छा, प्रतिष्ठा, सम्पत्ति और शारीरिक सुख उन्हें संसार में कठोर परिश्रम करने के लिए प्रेरित करते हैं।
रजोगुण पुरुष और स्त्री में परस्पर आकर्षण बढ़ाता है और काम वासना को उत्पन्न करता है। कामवासना की तुष्टि हेतु पुरुष और स्त्री वैवाहिक संबंध बनाते है और गृहस्थी के कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं। घर की देखभाल और रख-रखाव के लिए धन की आवश्यकता होती है इसलिए वे आर्थिक स्थिरता के लिए कड़ा परिश्रम करते हैं। इस प्रकार से वे अनेक कार्यों में संलग्न रहते हैं लेकिन प्रत्येक क्रिया उन्हें माया में बांधती हैं।
तमोगुण मनुष्य की बुद्धि को आच्छादित कर लेता है और सुख की कामना अब विकृत रूप से प्रकट होती है। उदाहरणार्थ, हम सभी जानते हैं कि धूम्रपान करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सिगरेट के पैकेट पर चेतावनी लिखी होती है। धूम्रपान करने वाले उसे पढ़ते हैं किन्तु फिर भी धूम्रपान करना नहीं छोड़ते। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनकी बुद्धि अपनी विवेक शक्ति खो देती है और धूम्रपान का आनन्द लेने के लिए वे स्वयं को हानि पहुँचाने में संकोच नहीं करते। किसी ने उपहास करते हुए कहा है-'सिगरेट के एक छोर पर आग से सुलगी हुई पाइप है तथा उसके दूसरे छोर पर मूर्खता है।' यही तमोगुण का प्रभाव है जो आत्मा को अज्ञानता के अंधकार में ले जाता है।
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत |
रज: सत्त्वं तमश्चैव तम: सत्त्वं रजस्तथा || 10||
कभी-कभी सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण को अभिभूत करता है और कभी-कभी रजोगुण सत्त्व गुण और तमोगुण पर हावी हो जाता है और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि तमोगुण सत्त्व गुण और रजोगुण पर हावी हो जाता है।
श्रीकृष्ण अब यह बताते हैं कि किसी व्यक्ति का स्वभाव किस प्रकार से तीनों गुणों में घूमता रहता है। माया में ये तीनों गुण विद्यमान हैं और हमारा मन इसी शक्ति से निर्मित है इसलिए हमारे मन में तीनों गुण भी उसी प्रकार से विद्यमान होते हैं। इनकी तुलना एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करने वाले तीन पहलवानों से की जा सकती है। इनमें से प्रत्येक एक-दूसरे को परास्त करते रहते हैं और इसलिए कभी-कभी एक शीर्ष पर और कभी दूसरा और कभी तीसरा शीर्ष पर होता है। इस प्रकार से तीनों गुण मनुष्य के स्वभाव पर प्रभाव डालते हैं।बाह्य परिवेश, चिन्तन और पिछले जन्मों के संस्कारों के प्रभाव के कारण एक गुण हावी होना प्रारम्भ कर देता है। इन गुणों में से किसी गुण का प्रभाव कितने समय तक रहता है इसके लिए कोई नियम नहीं है। कोई एक गुण मन और बुद्धि पर एक क्षण के लिए या एक घंटे की अवधि या दीर्घ काल तक हावी रह सकता है। यदि किसी पर सत्त्व गुण हावी होता है, तब वह मनुष्य शांतिप्रिय, संतोषी, उदार, दयालु, सहायक, सुस्थिर और सुखी हो जाता है। जब रजोगुण की प्रधानता होती है तब कोई मनुष्य कामुक, उत्तेजित और महत्त्वाकांक्षी हो जाता है। दूसरों की उन्नति से ईर्ष्या करता है और इन्द्रिय सुखों के लिए उत्साहित करता है। जब तमोगुण प्रधान हो जाता है तब मनुष्य पर निद्रा, आलस्य, घृणा, क्रोध, असंतोष, हिंसा और संदेह हावी हो जाते हैं।
उदाहरणार्थ मान लीजिए कि "आप अपने पुस्तकालय में बैठकर अध्ययन कर रहे हैं। वहाँ किसी प्रकार का कोई सांसारिक विघ्न नहीं है और आपका मन सात्त्विक हो जाता है। अपना अध्ययन समाप्त करने के पश्चात् जब आप अपने विश्राम कक्ष में जाकर टेलीविजन का स्विच ऑन करते हैं। तब टेलीविजन पर दिखाये जा रहे सभी दृश्य आपके मन को राजसी बना देते हैं और सांसारिक सुखों के लिए आपकी लालसा को बढ़ाते हैं। जब आप अपनी पसंद का चैनल देख रहे होते हैं तब परिवार का कोई सदस्य आकर चैनल बदल देता है। यह विघ्न आपके मन में तमोगुण की उत्पत्ति का कारण बनता है और आप क्रोध से भर जाते हैं।
इस प्रकार से मन तीनों गुणों के बीच झूलता रहता है और उनकी विशेषताओं को ग्रहण करता हो।
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते |
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत || 11||
लोभ: प्रवृत्तिरारम्भ: कर्मणामशम: स्पृहा |
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ || 12||
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च |
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन || 13||
जब शरीर के सभी द्वार ज्ञान से आलोकित हो जाते हैं तब इसे सत्वगुण की अभिव्यक्ति मानो। जब रजोगुण प्रबल होता है तब हे अर्जुन! लोभ, सांसारिक सुखों के लिए परिश्रम, बचैनी और उत्कंठा के लक्षण विकसित होते हैं। हे अर्जुन! जड़ता, असावधानी और भ्रम यह तमोगुण के प्रमुख लक्षण हैं।
श्रीकृष्ण पुनः कहते हैं कि किस प्रकार से तीन गुण किसी जीव की सोच को प्रभावित करते हैं। सत्त्वगुण सद्गुणों के विकास और ज्ञान के आलोक की ओर ले जाता है। रजोगुण लोभ और सांसारिक उपलब्धियों के लिए कार्यों में व्यस्तता तथा मन को बैचेनी की ओर ले जाता है।
तमोगुण के कारण बुद्धि में भ्रम, आलस्य, मादक पदार्थों और हिंसा के प्रति रुचि उत्पन्न होती है। वास्तव में ये गुण भगवान और अध्यात्म मार्ग के प्रति हमारी मनोवृति को भी प्रभावित करते हैं। जब हमारे मन में सत्त्व गुण की प्रबलता होती है, तब हम यह सोचना आरम्भ करते हैं-"मुझे अपने गुरु की अत्यंत अनुकंपा प्राप्त हुई है इसलिए मुझे तीव्रता से अपनी साधना में प्रगति करनी चाहिए क्योंकि मानव जीवन अनमोल है और इसे लौकिक कार्यों में व्यर्थ नहीं करना चाहिए।" जब रजोगुण प्रबल होता है तब हम सोचते हैं-"मुझे अध्यात्म के मार्ग पर निश्चित रूप से प्रगति करनी चाहिए लेकिन इतनी भी क्या शीघ्रता है? वर्तमान में मुझे कई दायित्वों का निर्वहन करना है जो कि अधिक महत्वपूर्ण हैं।" जब तमोगुण का गुण हावी हो जाता है तब हम यह सोचने लगते हैं-"मुझे यह विश्वास नहीं है कि कोई भगवान है भी या नहीं क्योंकि उसे किसी ने कभी नहीं देखा है। इसलिए साधना में समय क्यों व्यर्थ किया जाए।" यहाँ यह बात विचारणीय है कि एक ही व्यक्ति के विचार भक्ति के संबंध में ऐसे उच्चत्तम और निम्नतम स्तर तक कैसे जाते रहते हैं।
तीन गुणों के कारण मन का अस्थिर होना स्वाभाविक है। हालाँकि हमें ऐसी परिस्थितियों में निराश नहीं होना चाहिए, अपितु इसके विपरीत हमें यह समझना चाहिए कि ऐसा क्यों होता है और इससे ऊपर उठने की चेष्टा करनी चाहिए। साधना का अभिप्राय यह है कि मन में इन तीनों गुणों के प्रवाह का सामना किया जाए और इसे भगवान और गुरु के प्रति श्रद्धा भक्ति को बनाए रखने के लिए बाध्य करना चाहिए। यदि हमारी चेतना पूरे दिन दिव्य चेतना में स्थित रहती है, तब फिर साधना करना आवश्यक नहीं होता। यद्यपि मन की स्वाभाविक भावनाएँ संसार की ओर प्रवृत होती हैं फिर भी हमें बुद्धि के सहयोग से इन्हें आध्यात्मिक क्षेत्र में लाने के लिए प्रयत्न करना होगा। आरम्भ में यह कठिन होगा किन्तु अभ्यास द्वारा ऐसा करना सरल हो जाता है। यह कार चलाने के समान है। आरम्भ में कार चलाना कठिन लगता है लेकिन अभ्यास द्वारा कार चलाना सहज हो जाता है।
श्रीकृष्ण अब इन तीनों गुणों द्वारा प्राप्त गन्तव्यों के संबंध में और इन्हें पार करने के लिए अर्थात् गुणातीत होने की आवश्यकता को व्यक्त करना आरम्भ करते हैं।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् |
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते || 14||
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते |
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते || 15||
जिनमें सत्त्वगुण की प्रधानता होती है वे मृत्यु पश्चात् ऋषियों के ऐसे उच्च लोक में जाते हैं जो रजोगुण और तमोगुण से मुक्त होता है। रजोगुण की प्रबलता वाले सकाम कर्म करने वाले लोगों के बीच जन्म लेते हैं और तमोगुण में मरने वाले पशुओं में जन्म लेते है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जीवात्मा का भविष्य उसके व्यक्तित्व के गुणों पर आधारित होता है। भगवान के कर्म नियमों के अनुसार हम वही प्राप्त करते हैं जिसके हम पात्र होते हैं। जो सद्गुणों और ज्ञान को विकसित करते हैं तथा दूसरों के प्रति सेवा की भावना रखते है वे पुण्यवान, विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं इत्यादि के परिवारों में जन्म लेते हैं या वे स्वर्ग के उच्च लोकों में जाते हैं। जो अपने आपको लोभ, धन लोलुपता और सांसारिक महत्त्वकांक्षाओं के अधीन कर लेते हैं वे प्रायः व्यावसायिक परिवारों में जन्म लेते हैं। वे जिनकी रुचि मादक पदार्थों के सेवन, हिंसा, आलस्य और कर्त्तव्य का परित्याग करने में होती है, वे मदिरापान करने वाले और अनपढ़ लोगों के परिवार में जन्म लेते हैं अन्यथा उन्हें आध्यात्मिक विकासवाद की सीढ़ी से नीचे उतरने के लिए बाध्य होना पड़ता है और वह पशुओं की योनियों में जन्म लेते हैं।
कई लोग पूछते हैं कि एक बार मानव रूप में जन्म लेने पर क्या वापस निम्न योनियों में धकेले जाना संभव है? इस श्लोक से ज्ञात होता है कि आत्मा के लिए मानव योनी आरक्षित नहीं रहती। वे जो मानव जीवन का सदुपयोग नहीं करते वे पुनः पशुओं की निम्न योनियों में जन्म लेते रहते हैं। इस प्रकार से सभी विकल्प हर समय खुले रहते हैं। आत्मा अपने गुणों के आधार पर अपने आध्यात्मिक विकास के लिए ऊपर उठ सकती है, समान स्तर पर रह सकती है और यहाँ तक कि नीचे भी गिर सकती है।
कर्मण: सुकृतस्याहु: सात्त्विकं निर्मलं फलम् |
रजसस्तु फलं दु:खमज्ञानं तमस: फलम् || 16||
ऐसा कहा जाता है कि सत्त्वगुण में सम्पन्न किए गये कार्य शुभ फल प्रदान करते हैं, रजोगुण के प्रभाव में किए गये कर्मों का परिणाम पीड़ादायक होता है तथा तमोगुण से सम्पन्न किए गए कार्यों का परिणाम अंधकार है।
सत्त्वगुणों से प्रभावित लोग शुद्धता, सदाचार और नि:स्वार्थ भावना से परिपूर्ण होते हैं। इसलिए उनके कर्मों का सम्पादन शुद्ध मनोभावना और निःस्वार्थ भाव से युक्त होता है और इसके परिणाम उन्हें आत्मिक उत्थान और संतोष प्रदान करते हैं। वे जो रजोगुण से प्रभावित होते हैं वे अपनी इन्द्रियों और कामनाओं से उद्वेलित होते हैं। अपने कार्य के पीछे उनका उद्देश्य स्वयं और अपने संबंधियों की उन्नति तथा इन्द्रियों का तुष्टिकरण करना होता है। इस प्रकार से उनके कार्य उन्हें इन्द्रिय सुखों की ओर ले जाते हैं जो आगे चलकर उनकी इन्द्रिय तृप्ति की वासनाओं को और अधिक भड़काते हैं। वे जिनमें तमोगुण की प्रधानता होती है वे शास्त्रों और स्मृतियों का सम्मान नहीं करते। इस प्रकार वे तुच्छ सुखों के लिए पापमयी कार्य करते हैं जो आगे चलकर उन्हें दुःखसागर में डुबा देते हैं।
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च |
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च || 17||
सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ और तमोगुण से अज्ञानता, प्रमाद और मोह उत्पन्न होता है।
तीनों गुणों से प्राप्त होने वाले परिमाणों में भिन्नता का उल्लेख करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण इसके कारणों को व्यक्त करते हैं। सत्त्वगुण विवेक बुद्धि को बढ़ाता है तथा उचित और अनुचित के बीच भेद करने की क्षमता प्रदान करता है। यह इन्द्रियों को तुष्ट करने के लिए उत्पन्न काम-वासनाओं को शांत करता है तथा सुख और संतोष की भावना उत्पन्न करता है। इससे प्रभावित लोग बौद्धिक गतिविधियों और उत्तम विचारों की ओर प्रवृत्त होते हैं। सत्त्वगुण बुद्धिमत्ता को बढ़ावा देता है। रजोगुण इन्द्रियों को भड़काता है और मन को निरंकुश बनाकर उसे तृष्णाओं में घुमाता रहता है। जीव इसके फन्दे में फंस जाता है तथा अधिक धन और सुख प्राप्त करने के लिए अधिक परिश्रम करने लगता है। तमोगुण जीव को जड़ता और अविद्या से ढक देता है। अज्ञानता में डूबा व्यक्ति कुत्सित और अधम कार्य करने लगता है और उसके बुरे परिणाम भुगतता है।
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा: |
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसा: || 18||
सत्त्वगुण में स्थित जीव उच्च लोकों में जाते हैं, रजोगुणी पृथ्वी लोक पर और तमोगुणी नरक लोकों में जाते हैं
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जीवात्मा का पुनर्जन्म उन गुणों से संबद्ध होता है जिनकी प्रबलता उनके व्यक्तित्व में प्रदर्शित होती है। इसकी तुलना विद्यालय (स्कूल) की शिक्षा पूरी कर महाविद्यालय (कॉलेज) में प्रवेश करने वाले छात्र से की जा सकती है। हमारे देश में अनेक महाविद्यालय हैं। वे छात्र जो निर्धारित मापदण्डों पर खड़े उतरते हैं उन्हें प्रतिष्ठित महाविद्यालयों में प्रवेश मिलता है जबकि अपेक्षाकृत कम अंक पाने वाले छात्रों को अन्य कॉलेजों में प्रवेश मिलता है। इसी प्रकार से श्रीमद्भागवतम् में भी वर्णन किया गया है-
सत्त्वे प्रलीनाः स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलयाः।
तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणाः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.25.22)
वे जो सत्त्वगुणी हैं, उच्च लोकों में जाते हैं। रजोगुणी पृथ्वी लोक पर पुनः जन्म लेते हैं और जो तमोगुणी हैं वे निम्न लोकों में जाते हैं जबकि वे जो तीनों गुणों से परे हो जाते हैं, मुझे प्राप्त करते हैं।
नान्यं गुणेभ्य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति |
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति || 19||
जब बुद्धिमान व्यक्ति को यह ज्ञात हो जाता है कि सभी कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों के अलावा कोई अन्य कर्ता नहीं है और जो मुझे इन तीन गुणों से परे देखते हैं, वे मेरी दिव्य प्रकृति को प्राप्त करता है।
श्रीकृष्ण त्रिगुणों के बंधनों को काटने का सरल समाधान प्रस्तुत करते हैं। संसार के सभी जीव इन तीनों गुणों के चुंगल में फंसे रहते हैं और इसलिए ये गुण ही सभी कार्यों के वास्तविक कर्ता हैं। लेकिन सर्वशक्तिमान भगवान इनसे परे हैं। इसलिए उन्हें त्रिगुणातीत अर्थात् माया के तीन गुणों से परे कहा जाता है। इस प्रकार से भगवान की सभी विशेषताएँ उनके नाम, गुण, लीलाएँ और संत भी गुणातीत होते हैं। यदि हम अपने मन को इन तीन गुणों से युक्त किसी व्यक्ति या पदार्थ में आसक्त करते हैं, तब उसका परिणाम उनके गुणों के अनुसार हमारे मन और बुद्धि पर पड़ता है। लेकिन यदि हम अपने मन को दिव्य क्षेत्र में अनुरक्त करते हैं तब वह गुणातीत होकर दिव्य बन जाता है। वे जो इस सिद्धांत को समझते हैं वे सांसारिक पदार्थों और लोगों के साथ अपनी आसक्ति और संबंधों को शिथिल करना आरम्भ कर देते हैं और अपने संबंधों को भगवान और गुरु में दृढ़ करते हैं। इससे वे गुणातीत होने में समर्थ हो जाते हैं और भगवान की दिव्य प्रकृति को पाते हैं। इसे आगे श्लोक 14.26 में विस्तार से समझाया गया है।
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् |
जन्ममृत्युजरादु:खैर्विमुक्तोऽमृतमश्रुते || 20||
शरीर से संबद्ध माया के त्रिगुणों से मुक्त होकर जीव जन्म, मृत्यु, रोग, बुढ़ापे और दुःखों से मुक्त हो जाता है तथा अमरता प्राप्त कर लेता है।
यदि हम गंदे कुएँ के जल का सेवन करते हैं तब हमारा पेट खराब हो जाता है। समान रूप से यदि हम तीन गुणों द्वारा प्रभावित होते हैं, तब हम उनके परिणामों को भोगते हैं। 'रोग, बुढ़ापा, मृत्यु और संसार में बार-बार जन्म लेना' ये चारों सांसारिक जीवन के मुख्य दुःख हैं।
इन्हें देखकर सर्वप्रथम महात्मा बुद्ध ने अनुभव किया कि संसार दुःखों का घर है और तब वह दुःखों से मुक्त होने के मार्ग की खोज के लिए निकले। वेदों में मनुष्यों के लिए कई आचार संहिताएँ, सामाजिक दायित्व, कर्मकाण्ड, और नियम निर्धारित किए गए हैं। कर्तव्यों और आचार संहिता को एक साथ कर्म-धर्म या वर्णाश्रम धर्म या शारीरिक धर्म कहा जाता है। ये हमें तमोगुण और रजोगुण से ऊपर सत्त्वगुण तक उठाने में सहायता करते हैं किन्तु सत्त्वगुण तक पहुंचना ही पर्याप्त नहीं है क्योंकि यह भी बंधन का कारण है। सत्वगुण की तुलना सोने की जंजीरों से बंधे होने से की जा सकती है। हमारा लक्ष्य संसार रूपी कारागार से मुक्त होना है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब हम गुणातीत हो जाते हैं तब फिर माया जीव पर हावी नहीं हो सकती और उसे बंधन में नहीं डाल सकती। इस प्रकार से आत्मा जन्म मरण के चक्कर से मुक्ति पाकर अमरता को प्राप्त करती है। वास्तव में आत्मा सदैव अमर है। किन्तु भौतिक शरीर के साथ इसकी पहचान इसे जन्म और मृत्यु के भ्रम जाल में डालकर कष्ट देती है। यह भ्रम आत्मा की सनातन प्रकृति के विरुद्ध है। इसलिए सांसारिक मोह हमारे आंतरिक अस्तित्व के लिए कष्टप्रद है क्योंकि भीतर से हम सब अमरता प्राप्त करना चाहते हैं।
अर्जुन उवाच |
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो |
किमाचार: कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते || 21||
अर्जुन ने पूछा-हे भगवान! वे जो इन तीनों गुणों से परे हो जाते हैं उनके लक्षण क्या हैं? वे किस प्रकार से गुणों के बंधन को पार करते हैं?
अर्जुन ने श्रीकृष्ण से तीनों गुणों से परे होने के संबंध में सुना इसलिए अब वह इन गुणों के संबंध में तीन प्रश्न पूछता है। लिङ्ग शब्द का अर्थ 'लक्षण' है। अर्जुन का प्रथम प्रश्न यह है-"गुणातीत होने वालों के लक्षण क्या हैं?" उसका दूसरा प्रश्न यह है कि "ऐसे गुणातीत व्यक्तियों का 'आचरण' कैसा होता है?" अर्जुन द्वारा पूछा गया तीसरा प्रश्न यह है कि “जीव तीनों गुणों से परे किस प्रकार होता है?" श्रीकृष्ण अगले श्लोकों में इन प्रश्नों का उचित उत्तर देते हैं।
श्रीभगवानुवाच |
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव |
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति || 22||
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते |
गुणा वर्तन्त इत्येवं योऽवतिष्ठति नेङ्गते || 23||
भगवान ने कहा-हे अर्जुन! तीनों गुणों से रहित मनुष्य न तो प्रकाश, (सत्त्वगुण का उदय) न ही कर्म, (रजोगुण से उत्पन्न) और न ही मोह (तमोगुण से उत्पन्न) होने पर इनसे घृणा करते हैं और न ही इनके अभाव में इनकी लालसा करते हैं। वे गुणों की प्रकृति से उदासीन रहते हैं और उनसे विक्षुब्ध नहीं होते। यह जानकर कि केवल गुण ही क्रियाशील हैं, वे बिना विचलित हुए रहते हैं।
श्रीकृष्ण अब तीनों गुणों से परे हो चुके मनुष्यों के लक्षणों को स्पष्ट करते हैं। ऐसे मनुष्य यह देखते हैं कि संसार में गुण ही कार्य कर रहे हैं और व्यक्तियों, पदार्थों और आस-पास की परिस्थितियों में उनके प्रभाव प्रकट हो रहे हैं। अतः वे उनसे विक्षुब्ध नहीं होते। सिद्ध व्यक्ति जब तमोगुण के संपर्क में आते है तब वे उससे द्वेष नहीं करते और उसमें फंसते भी नहीं हैं। संसारी मानुष संसारिक विषयों की अत्यधिक चिंता करते हैं। वे अपना समय और ऊर्जा संसार के पदार्थों और संसार की घटनाओं के चिंतन में लगाते हैं। दूसरी ओर सिद्ध आत्माएँ मानव कल्याण के लिए भी प्रयास करती हैं। वे ऐसा इसलिए करती है क्योंकि उनका स्वभाव ही दूसरों की सहायता करना होता है। वे अनुभव करती हैं कि संसार का अंतिम संचालन भगवान के हाथों में है। अतः उन्हें केवल अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए और शेष सब भगवान पर छोड़ देना चाहिए। संसार में आकर हमारा प्रथम कर्त्तव्य यह है कि हम स्वयं को शुद्ध करें। फिर शुद्ध मन के साथ हम स्वाभाविक रूप से उत्तम और संसार के लिए हितकारी कार्य करेंगे। जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था-"वह परिवर्तन लाओ स्वयं में जिसे तुम संसार में देखना चाहते हो।"
श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति स्वयं को गुणों की क्रियाशीलता से परे मानते हैं। जब प्रकृति के गुण अपनी प्रवृत्ति के अनुसार संसार में कार्यों को सम्पन्न करते हैं तब वे न तो दुःखी और न ही हर्षित होते है। वास्तव में जब वे इन गुणों को अपने मन में भी देखते हैं तब भी वे विचलित नहीं होते। मन माया से निर्मित है और माया के तीनों गुण उसमें निहित होते हैं। इसलिए स्वाभाविक रूप से मन को इन गुणों और इनके विचारों के प्रभुत्व में रहना पड़ता है।
समस्या यह है कि हम मन को स्वयं से अलग नहीं समझते और इसलिए जब मन क्षुब्ध करने वाले विचार बनाता है तब हम अनुभव करते हैं-"ओ, मैं नकारात्मक दृष्टिकोण से सोच रहा हूँ।" हम बुरे विचारों से जुड़ते है और उन्हें अपने भीतर स्थान और स्वयं को क्षति पहुँचाने की अनुमति देते हैं। इसकी अति तब होती है जब हमारा मन भगवान और गुरु के विरुद्ध विचार बनाता है और हम उन्हें अपने विचार मान लेते हैं। उस समय हमें मन को अपने से अलग तत्त्व के रूप में देखना चाहिए, तभी हम नकारात्मक विचारों से दूर हो सकेंगे। तब हम इस प्रकार मन के विचारों को अस्वीकार करेंगे-“मैं ऐसे विचारों को कोई महत्त्व नही दूंगा जो मेरी भक्ति में सहायक नहीं हैं।" महापुरुष गुणों के प्रभाव से मन में उठने वाले सभी नकारात्मक विचारों से दूर रहता है।
समदु:खसुख: स्वस्थ: समलोष्टाश्मकाञ्चन: |
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति: || 24||
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो: |
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते || 25||
वे जो सुख और दुःख में समान रहते हैं, जो आत्मस्थित हैं, जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने के टुकड़े को समान दृष्टि से देखते हैं, जो प्रिय और अप्रिय घटनाओं के प्रति समता की भावना रखते हैं। जो निंदा और प्रशंसा को समभाव से स्वीकार करते हैं, जो मान-अपमान की स्थिति में सम भाव रहते हैं। जो शत्रु और मित्र के साथ एक जैसा व्यवहार करते हैं, जो सभी भौतिक व्यापारों का त्याग कर देते हैं-वे तीनों गुणों से ऊपर उठे हुए (गुणातीत) कहलाते हैं।
भगवान के समान आत्मा भी तीनों गुणों से परे है। शारीरिक चेतना में रहते हुए हमारी पहचान शरीर के दुःख और सुख के साथ होती है जिसके परिणामस्वरूप हम उत्साह और निराशा की भावनाओं में झूलते रहते हैं। लेकिन जो भगवत्प्राप्ति कर लेते हैं वे अपनी पहचान न तो शरीर के सुखों और न ही दुःखों के साथ करते हैं। ऐसे आत्मनिष्ठ तत्त्वज्ञानी संसार के द्वंद्वो को समझते हुए उनसे अछूते रहते हैं। इस प्रकार से वे निर्गुण हो जाते हैं। इससे उन्हें समदृष्टि प्राप्त होती है, जिसके द्वारा वे पत्थर के टुकड़े, पृथ्वी के ढेले, स्वर्ण, अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों, आलोचनाओं और प्रशंसा सबको एक समान देखते हैं।
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते |
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते || 26||
जो लोग विशुद्ध भक्ति के साथ मेरी सेवा करते हैं, वे माया के तीनों गुणों से ऊपर उठ जाते हैं और ब्रह्म पद को पा लेते हैं।
तीनों गुणों से परे स्थित महापुरुषों के लक्षणों की व्याख्या करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब माया के तीन गुणों से परे होने का एक मात्र उपाय प्रकट कर रहे हैं। उपर्युक्त श्लोक में इंगित किया गया है कि केवल आत्मा का ज्ञान और शरीर के साथ उसकी भिन्नता को जानना ही पर्याप्त नहीं है। गुणातीत होने के लिए भक्तियोग की सहायता से मन परम प्रभु श्रीकृष्ण में स्थिर करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप मन श्रीकृष्ण के समान निर्गुण हो जाएगा।
कई लोग यह सोचते हैं कि यदि मन को भगवान के साकार रूप पर स्थिर किया जाता है तब यह निर्गुण नहीं हो सकेगा और इसे जब निराकार ब्रह्म में अनुरक्त करते हैं, तब मन माया के गुणों से परे होता है। किन्तु यह श्लोक इस मत का खण्डन करता है। भगवान का साकार रूप अनन्त गुणों से सम्पन्न है और ये सभी गुण दिव्य हैं तथा माया से परे हैं। इसलिए भगवान का साकार रूप भी निर्गुण है। ऋषि वेदव्यास ने यह स्पष्ट किया है कि भगवान का साकार रूप किस प्रकार से निर्गुण है।
अस्तु निर्गुण इत्युक्तः शास्त्रेषु जगदीश्वरः।
प्रकृतैर्हेसंयुक्तै-र्गुणैर्हीनत्वमुच्यते।। (पद्म पुराण)
"शास्त्रों में जहाँ भी भगवान का उल्लेख निर्गुण के रूप में किया गया है उसका अर्थ यह है कि वह भौतिक विशेषताओं से रहित है। फिर भी उनका दिव्य स्वरूप गुणों से रहित नहीं है। वे अनन्त गुणों का स्वामी हैं।" इस श्लोक से साधना का ध्येय भी प्रकट होता है। साधना का अर्थ शून्यता पर ध्यान क्रेंडिट करना नहीं है। मायासे परे की सत्ता भगवान है। इसलिए जब हमारे ध्यान का लक्ष्य भगवान होते हैं, वही वास्तव में साधना है।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च |
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च || 27||
मैं ही उस निराकार ब्रह्म का आधार हूँ जो अमर, अविनाशी, शाश्वत धर्म और असीम दिव्य आनन्दस्वरूप है।
पिछले श्लोक में किए गए उल्लेखानुसार श्रीकृष्ण और निराकार ब्रह्म के बीच के संबंधों पर प्रश्न उत्पन्न हो सकते हैं। पहले भी यह व्यक्त किया जा चुका है कि सर्वशक्तिमान भगवान के व्यक्तित्व के निराकार और साकार दो स्वरूप हैं। यहाँ श्रीकृष्ण व्यक्त करते हैं कि जिस ब्रह्म की उपासना ज्ञानी करते हैं, वह भगवान के साकार रूप से प्रकटित ज्योति पुंज है। पद्मपुराण में वर्णन है-
यन्नखंदुरुचिर्ब्रह्म ध्ये ब्रह्मादिभिः सुरैः।
गुणत्रयमतीतं तम वन्दे वृन्दावनेश्वरम् ।।
(पद्मपुराण, पाताल खण्ड-77.60)
वृंदावन के भगवान श्रीकृष्ण के चरणों के नखों से प्रकटित ज्योति परब्रह्म है जिसका ध्यान ज्ञानी और स्वर्ग के देवता करते हैं। चैतन्य महाप्रभु ने भी इसी प्रकार से वर्णन किया है-
ताँहार अंगेर शुद्ध किरन-मंडल
उपनिषद् कहे तांरे ब्रह्म सुनिर्मल
(चैतन्य चरितामृत, अदि लीला-2.12)
भगवान के दिव्य शरीर की 'प्रभा' का ही वर्णन उपनिषदों में ब्रह्म के रूप में किया गया है। इस प्रकार श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि तीनों गुणों के रोग की रामबाण औषधि भगवान के साकार रूप की निश्चल भक्ति में लीन होना है
।। श्रीमद्भगवत गीता चतुर्दश अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
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