॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhagavad Geeta Chapter 9
श्रीमद्भगवत गीता नवम अध्याय
अध्याय नौ: राज विद्या योग
राज विद्या द्वारा योग
सातवें और आठवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने भक्ति को भगवत्प्राप्ति का सरल साधन और योग की सर्वोच्च स्थिति बताया था। नौवें अध्याय में उन्होंने अपनी महिमा का व्याख्यान किया है जिससे, श्रद्धा और भक्ति उत्पन्न होती है। वे यह बोध कराते हैं कि यद्यपि वे अर्जुन के सम्मुख साकार रूप में खड़े हैं किन्तु उन्हें सामान्य मनुष्य समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। वे स्पष्ट कहते हैं कि वे समस्त प्राकृतिक शक्तियों के अध्यक्ष हैं और सृष्टि के आरम्भ में अनगिनत जीवों को उत्पन्न करते हैं और प्रलय के समय वापस उन्हें अपने में विलीन कर लेते हैं तथा सृष्टि के अगले चक्र में उन्हें पुनः प्रकट करते हैं। जिस प्रकार से शक्तिशाली वायु सभी स्थानों पर प्रवाहित होती है और सदैव आकाश में स्थित रहती है। उसी प्रकार से सभी जीव भगवान में निवास करते हैं फिर भी वे अपनी योगमाया शक्ति द्वारा तटस्थ बने रहकर इन सभी गतिविधियों से विरक्त रहते हैं।
केवल भगवान ही आराधना का एक मात्र लक्ष्य हैं। इसे स्पष्ट करते हुए भगवान श्रीकृष्ण देवी-देवताओं की पूजा के मिथ्या भ्रम का समाधान करते हैं। भगवान सभी प्राणियों के लक्ष्य, सहायक, शरणदाता और सच्चे मित्र हैं। जिन मनुष्यों की रुचि वैदिक कर्मकाण्डों का पालन करने में होती है वे स्वर्गलोक प्राप्त करते हैं, किन्तु जब उनके पुण्य कर्म क्षीण हो जाते हैं तब उन्हें लौटकर पुनः पृथ्वीलोक में आना पड़ता है लेकिन जो परम प्रभु की भक्ति में तल्लीन रहते है वे उनके परम धाम में जाते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण उनके प्रति की जाने वाली विशुद्ध भक्ति को सर्वोत्तम बताते हुए उसकी प्रशंसा करते हैं। ऐसी भक्ति में लीन होकर जो कुछ हमारे पास है वह सब भगवान को समर्पित करते हुए हमें भगवान की इच्छा के साथ पूर्ण रूप से एकनिष्ठ होकर जीवनयापन करना चाहिए। ऐसी शुद्ध भक्ति पाकर हम कर्म के बंधनों से मुक्त रहेंगे और भगवान का प्रेम प्राप्त करने के लक्ष्य को पा सकेंगे।
आगे श्रीकृष्ण दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि वे न तो किसी का पक्ष लेते हैं और न ही किसी की उपेक्षा करते हैं। वह सभी प्राणियों के प्रति निष्पक्ष रहते हैं। यहाँ तक कि अधम पापी भी यदि उनकी शरण में आते हैं तब भी वे प्रसन्नता से उनको अपनाते हैं और उन्हें शीघ्र सद्गुणी बनाकर पवित्र कर देते हैं। वे वचन देते हैं कि उनके भक्त का कभी पतन नहीं हो सकता। अपने भक्तों के हृदय में आसीन होकर वे उनके आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं और जो पहले से उनके स्वामित्व में होता है उसकी रक्षा करते हैं। इसलिए हमें सदैव उनका ही चिन्तन और आराधना करनी चाहिए तथा मन और शरीर को पूर्णतया उनके प्रति समर्पित कर उन्हें अपना परम लक्ष्य बनाना चाहिए।
श्रीभगवानुवाच |
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे |
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् || 1||
परम प्रभु ने कहाः हे अर्जुन! क्योंकि तुम मुझसे ईर्ष्या नहीं करते इसलिए मैं तुम्हें विज्ञान सहित परम गुह्म ज्ञान बताऊँगा जिसे जानकर तुम भौतिक जगत के कष्टों से मुक्त हो जाओगे।
प्रारम्भ में ही श्रीकृष्ण उनके उपदेशों को सुनने की पात्रता के संबंध में बताते हैं। 'अनसूयवे' शब्द का तात्पर्य 'इर्ष्या न करने' से है। श्रीकृष्ण इसे इसलिए स्पष्ट करना चाहते हैं क्योंकि भगवान यहाँ अपनी अतिशय महिमा का वर्णन कर रहे हैं। 'अनसूयवे' शब्द का एक अन्य अर्थ 'जो घृणा नहीं करता है' भी है।
वे श्रोता जो श्रीकृष्ण का इसलिए उपहास उड़ाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि श्रीकृष्ण डींग मार रहे हैं, उन्हें श्रीकृष्ण के उपदेशों का श्रवण करने से कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा। निःसंदेह भगवान के संबंध में ऐसा सोचकर-'देखो इस अहंकारी मनुष्य को यह अपनी प्रशंसा स्वयं कर रहा है', वे स्वयं को हानि पहुँचाते हैं।
ऐसी मनोवृति अज्ञान और घमंड के कारण उत्पन्न होती है और इससे मनुष्य की श्रद्धा भक्ति समाप्त हो जाती है। ईर्ष्यालु लोग इस सत्य को ग्रहण नहीं कर पाते कि भगवान को अपने लिए कुछ प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होती और वे जीवात्मा के कल्याण के लिए ही सब कुछ करते हैं। वे जीवात्मा में अपनी भक्ति बढ़ाने के प्रयोजनार्थ अपनी प्रशंसा करते हैं न कि सांसारिक अहंभाव के दोष के कारण जैसा कि हम करते हैं। जब नाज़रेथ के यीशू मसीह ने कहा-"मैं ही मार्ग और मैं ही लक्ष्य हूँ" तब वे उनके उपदेश सुन रही जीवात्माओं को करुणा भाव से प्रेरित होकर ऐसा कह रहे थे न कि अहं भाव से। एक सच्चे गुरु के रूप में वे अपने शिष्यों को समझा रहे थे कि भगवान का धाम गुरु के माध्यम से मिलता है। किन्तु ईर्ष्यालु मनोवृत्ति के लोग इन उपदेशों के पीछे छिपी करुणा को नहीं समझ सकते और उन पर आत्म-दंभी होने का दोषारोपण करते हैं। क्योंकि अर्जुन उदारचित्त है और ईर्ष्या के दोष से मुक्त है इसलिए वह गुह्यत्तम ज्ञान को जानने का पात्र है जिसे भगवान श्रीकृष्ण इस अध्याय में प्रकट कर रहे हैं।
दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने आत्मा के ज्ञान की व्याख्या शरीर से भिन्न एक विशिष्ट इकाई के रूप में की थी। सातवें और आठवें अध्याय में उन्होंने अपनी परम शक्तियों की व्याख्या की है जोकि गुह्यतम ज्ञान है और अब इस नौवें और इसके बाद के अध्यायों में श्रीकृष्ण अपनी विशुद्ध भक्ति का ज्ञान प्रकट करेंगे जो कि गुह्यतम या अत्यन्त गोपनीय ज्ञान है।
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् |
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् || 2||
राज विद्या का यह ज्ञान सभी रहस्यों से सर्वाधिक गहन है। जो इसका श्रवण करते हैं उन्हें यह शुद्ध कर देता है और यह प्रत्यक्ष अनुभूति कराने वाला है। धर्म की मर्यादा के पालनार्थ इसका सरलता से अभ्यास किया जा सकता है और यह नित्य प्रभावी है
राजाः का अर्थ 'शासक' है। श्रीकृष्ण 'राजा' शब्द का प्रयोग ज्ञान की उस सर्वोच्च अवस्था के महत्व को व्यक्त करने के लिए करते हैं।
विद्या का अर्थ 'विज्ञान' है। श्रीकृष्ण अपने उपदेशों को पंथ, धर्म, हठधर्मिता, सिद्धान्त या विश्वास के रूप में उद्धृत नहीं करते। वे घोषणा करते हैं कि वे अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ विज्ञान का वर्णन करने जा रहे हैं।
गुह्यः का अर्थ 'रहस्य' है। यह ज्ञान भी परम रहस्यमयी है क्योंकि प्रेम केवल वहीं संभव होता है जहाँ स्वतंत्रता हो। भगवान जान बूझकर स्वयं को प्रत्यक्ष अनुभूति से गुप्त रखते हैं। इस प्रकार से वे जीवात्मा को उनसे प्रेम करने या न करने का विकल्प प्रदान करते हैं। एक यंत्र प्रेम नहीं कर सकता क्योंकि वह विकल्प रहित होता है। भगवान चाहते हैं कि हम उनसे प्रेम करें और इसलिए वह हमारी इच्छा के अनुसार उनका चयन करने या न करने का हमें विकल्प देते हैं। हम जो भी विकल्प चुनते हैं वे उसके परिणामों के संबंध में केवल सचेत करते हैं और हमारे मार्ग के चयन का निर्णय हम पर छोड़ देते हैं।
पवित्रम का अर्थ शुद्ध है। भक्ति का ज्ञान परम शुद्ध है क्योंकि यह स्वार्थों से दूषित नहीं होता। यह जीवात्मा को दिव्य प्रेम की वेदी पर भगवान के लिए समर्पित होने को प्रेरित करता है। भक्ति अपने भक्तों के पाप बीजों और अविद्या का विनाश कर उन्हें पवित्र करती है। पाप जीवात्मा के अनन्त जन्मों के बुरे कर्मों का संचय हैं। भक्ति इन्हें घास के गट्ठर के समान भस्म कर देती है। बीज से तात्पर्य अन्तःकरण की अशुद्धता से है जो पापजन्य कर्मों के बीज होते हैं। जब तक ऐसे बीज विद्यमान रहते हैं तब तक पिछले जन्मों के पापों को नष्ट करने के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे और पाप करने की प्रवृत्ति अन्त:करण में रहेगी। परिणामत: मनुष्य पुनः पाप करेगा।
भक्ति अन्तःकरण को शुद्ध करती है और पाप के बीजों को नष्ट कर देती है। किन्तु फिर भी बीजों का विनाश होना ही पर्याप्त नहीं है। तब अन्त:करण के अशुद्ध होने का क्या कारण है? इसका कारण अविद्या है जिसके कारण हम स्वयं की पहचान शरीर के रूप में करते हैं। इस गलत पहचान के कारण हम शरीर को आत्मा मान लेते हैं और इसलिए हमारे भीतर शारीरिक सुखों की कामनाएं उदित होती हैं और हम सोचते हैं कि इनसे हमारी आत्मा को सुख मिलेगा। ऐसी सांसारिक कामनाओं की पूर्ति हमें काम, क्रोध, लोभ और अन्त:करण को दूषित करने वाली अन्य बुराइयों की ओर धकेल देती हैं। जब तक अज्ञानता बनी रहती है तब तक हृदय शुद्ध किये जाने पर भी पुनः अशुद्ध हो जाता है। भक्ति के फलस्वरूप अन्ततः भगवान और आत्मा के ज्ञान का बोध होता है जिसके परिणामस्वरूप अज्ञानता नष्ट हो जाती है। भक्तिरसामृतसिंधु में भक्ति का वर्णन इस प्रकार किया गया है-
क्लेशस्-तु पापं तद्बीजम् अविद्या चेति ते त्रिधा।
(भक्तिरसामृतसिंधु-1.1.18)
" भक्ति पाप, बीज और अविद्या तीन प्रकार के विषों का विनाश करती है। जब इन तीनों का पूर्ण विनाश हो जाता है तब अन्त:करण वास्तव में स्थायी रूप से शुद्ध हो जाता है।"
प्रत्यक्षः का अर्थ 'प्रत्यक्ष अनुभूति' होना है। भक्ति योग का अभ्यास श्रद्धा के साथ शुरू होता है और इसके परिणामस्वरूप भगवान की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। यह शोध की अन्य प्रणालियों की भाँति नहीं है जहाँ हम अवधारणाओं के साथ आरम्भ करते हैं और निश्चित परिणाम प्राप्त करते हैं।
धर्म्यम का अर्थ 'पुण्य कर्म करना' है। सांसारिक सुख की कामनाओं से रहित भक्ति पुण्य कर्म है। यह निरन्तर पुण्य कर्मों से पोषित होती है जैसे कि गुरु की सेवा द्वारा।
कर्तुम् सुसुखम् का तात्पर्य 'अति सहजता से पालन करने' से है। भगवान हमसे किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं करते। यदि हम प्रेम करना सीख लें तब वे सहजता से मिल जाते हैं।
यदि यह सर्वोत्तम ज्ञान है जिसका सहजता से अभ्यास किया जा सकता है तब फिर लोग इसका पालन क्यों नहीं करते? श्रीकृष्ण इसकी व्याख्या अगले श्लोक में करेंगे।
अश्रद्दधाना: पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप |
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि || 3||
हे शत्रु विजेता! वे लोग जो इस धर्म में श्रद्धा नहीं रखते वे मुझे प्राप्त नहीं कर सकते। वे जन्म-मृत्यु के मार्ग पर चलते हुए बार-बार इस संसार में लौटकर आते रहते हैं।
पिछले दो श्लोकों में श्रीकृष्ण ने ज्ञान और इसकी पात्रता के आठ गुणों का वर्णन किया है। यहाँ इसका उल्लेख धर्म या भगवान के प्रति प्रेममयी भक्ति के मार्ग के रूप में किया गया है। ज्ञान चाहे कितना भी अद्भुत और मार्ग कितना ही परिणाममूलक क्यों न हो? अगर कोई उसका अनुसरण करने से मना कर देता है तब यह उसके लिए अनुपयोगी होता है। जैसाकि पिछले श्लोक में स्पष्ट किया गया है कि भगवान की प्रत्यक्ष अनुभूति विलम्ब से होती है। इस प्रकिया के आरम्भ में अगाध श्रद्धा अपेक्षित होती है। भक्ति रसामृत सिंधु (1.4.15) में उल्लेख है-“आदौ श्रद्धा ततः साधुसंगोऽथ भजनक्रिया" अर्थात् "भगवान की अनुभूति करने का पहला सोपान श्रद्धा है। तब मनुष्य सत्संग में भाग लेता है। यह एकांत साधना के अभ्यास की ओर ले जाता है।"
प्रायः लोग कहते है कि वे केवल उसमें विश्वास करना चाहते हैं जिसकी प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। और चूँकि भगवान की तत्काल प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं होती इसलिए वे उसमें विश्वास नहीं करते। किन्तु वे वास्तव में संसार में अनेक ऐसी चीजों पर बिना प्रत्यक्ष अनुभूति के विश्वास करते हैं। एक न्यायाधीश अतीत में कई वर्ष पूर्व घटित घटना से संबंधित प्रकरण पर अपना निर्णय देता है। यदि न्यायाधीश प्रत्यक्ष अनुभव के सिद्धान्त के अनुपालन में विश्वास करेगा तब पूरी न्याय व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाएगी। राज्याध्यक्ष अपने देश का शासन पूरे क्षेत्र से प्राप्त होने वाली सूचनाओं के आधार पर करता है। उसके लिए अपने अधिकार क्षेत्र के सभी गांवों और नगरों का निरीक्षण करना संभव नहीं हो पाता और यदि वह यह कारण प्रस्तुत कर इन सूचनाओं पर विश्वास न करे कि तब फिर वह पूरे देश पर शासन करने के योग्य नहीं हो सकता। यहाँ तक कि सांसारिक कार्यों के लिए भी प्रत्येक कदम पर श्रद्धा आवश्यक है। बाइबिल में इसका सुन्दर ढंग से वर्णन किया गया है-"हम दृष्टि से नहीं, विश्वास के बल पर चलते हैं।" (2 कोरिन्थिअन्स-5.7)
भगवान की अनुभूति से संबंधित एक रोचक कथा इस प्रकार से है। एक बार एक राजा ने एक साधु के सम्मुख यह कहा-“मैं भगवान में विश्वास नहीं करता क्योंकि मैं उसे देख नहीं सकता।" साधु ने राजा से अपने दरबार में एक गाय को लाने को कहा। राजा ने उसकी आज्ञा का पालन करते हुए अपने सेवकों को गाय लाने का आदेश दिया। तब साधु ने गाय का दूध दुहने का अनुरोध किया। राजा ने पुनः अपने सेवकों को साधु की आज्ञा का पालन करने का आदेश दिया। फिर साधु ने पूछाः हे राजन्! अभी गाय से दुहे गये ताजा दूध में क्या मक्खन व्याप्त है? राजा ने उत्तर दिया कि उसे पूर्ण विश्वास है कि इसमें मक्खन है। तब साधु ने राजा से पूछा-'तुमने दूध में मक्खन को देखा नहीं तब फिर तुम्हें यह विश्वास क्यों है कि इसमें मक्खन है।' राजा ने उत्तर दिया-'हम इसे अभी प्रत्यक्ष देख नहीं सकते, किन्तु इसको देखने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया है। यदि हम दूध को दही में परिवर्तित करें और फिर दही को मथें तो उसमें मक्खन को देख सकते हैं।' तब साधु ने कहा-'जैसे दूध में मक्खन है उसी प्रकार भगवान भी सर्वत्र है। यदि हम उसकी शीघ्र अनुभूति नहीं कर सकते उससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि भगवान नहीं है। उसकी अनुभूति करने की भी एक प्रक्रिया है। यदि हम उस प्रक्रिया पर विश्वास करके उसका पालन करते हैं तब हम प्रत्यक्ष उसकी अनुभूति कर पाएँगे और भगवत्प्राप्ति कर लेंगे।" भगवान में विश्वास एक स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं है जिसका हम सरलतया पालन कर सकें। हमें अपनी स्वतंत्र इच्छा का प्रयोग करते हुए सक्रिय होकर भगवान पर विश्वास करने का निर्णय लेना होगा। कौरवों की सभा में जब दुःशासन ने द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का प्रयास किया तब भगवान ने उसकी साड़ी की लम्बाई को बढ़ाकर उसे लज्जित और अपमानित होने से बचाया। वहाँ सभी कौरव उपस्थित थे और उन्होंने इस चमत्कार को देखा लेकिन उन्होंने श्रीकृष्ण के सर्वशक्तिमान होने पर विश्वास करना स्वीकार नहीं किया और इस कारण उनकी चेतना जागृत नहीं हुई। परम प्रभु इस श्लोक में कहते हैं कि जो आध्यात्मिक पथ में विश्वास रखना पसंद नहीं करते, वे दिव्य ज्ञान से वंचित रहते हैं और निरन्तर जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमते रहते हैं।
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना |
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित: || 4||
यह समूचा ब्रह्माण्ड अव्यक्त रूप में मेरे द्वारा व्याप्त है। सभी जीवित प्राणी मुझमें निवास करते हैं लेकिन मैं उनमें निवास नहीं करता।
वैदिक दर्शन इस अवधारणा को स्वीकार नहीं करता कि भगवान सृष्टि का सृजन करने के पश्चात् सातवें आसमान से झाँक कर यह जाँच करे कि उसके संसार का संचालन भली भाँति हो रहा है अथवा नहीं। वे इस मूल तत्त्व को बार-बार प्रतिपादित करते हैं कि भगवान इस संसार में सर्वत्र व्याप्त रहते हैं।
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी
(श्वेताश्वरोपनिषद्-6.11)
"एक ही परमेश्वर है। वह प्रत्येक के हृदय में निवास करता है और वह संसार में सर्वत्र व्याप्त है।"
ईशावास्यमिदंसर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
(ईशोपनिषद्-1)
"भगवान संसार में सर्वत्र व्याप्त है।"
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्।
(पुरुष सूक्तम)
"भगवान उन सब में व्याप्त है जिनका अस्तित्व है और जिनका आगे अस्तित्व होगा।"
भगवान के सर्वव्यापक होने की अवधारणा को व्यक्तिपरक समझा जाता है। दार्शनिक दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि संसार भगवान का रूपांतरण है। उदाहरणार्थ दूध शुद्ध पदार्थ है। जब यह अम्ल के संपर्क में आता है तब परिवर्तित होकर दही बन जाता है। इस प्रकार जब दूध परिवर्तित हो जाता है तब दही दूध का परिणाम, प्रभाव या उत्पाद बन जाता है। इसी प्रकार परिणामवाद के समर्थक कहते हैं कि भगवान संसार के रूप में परिवर्तित हो गया है।
अन्य दार्शनिक यह दावा करते हैं कि संसार ब्रह्म का विवर्त अर्थात् भ्रम है। उदहारणार्थ अँधेरे में भूल से रस्सी में सांप का भ्रम हो जाता है। इसी प्रकार से चाँदनी में चमकते हुए मोती में चांदी का भ्रम हो जाता है। समान रूप से वे कहते हैं कि केवल एक भगवान ही है और कुछ नहीं है। हम जिसे संसार के रूप में देख रहे हैं वह वास्तव में ब्रह्म है। किन्तु श्लोक 7.4 और 7.5 के अनुसार संसार न तो परिणाम और न ही विवर्त है। यह भगवान की शक्ति जिसे माया शक्ति कहते है, से निर्मित हुआ है। जीवात्माएँ भी भगवान की शक्ति हैं लेकिन ये परा शक्ति हैं जिन्हें जीव शक्ति भी कहा गया है। इसलिए माया और समस्त आत्माएँ दोनों भगवान की शक्तियाँ हैं और उनके परम व्यक्तित्व के भीतर हैं। किन्तु श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि वे सभी प्राणियों में निवास नहीं करते अर्थात् असीम सीमित में समाविष्ट नहीं हो सकता क्योंकि वे इन दोनों शक्तियों के कुल योग से परे हैं। जिस प्रकार समुद्र से कई लहरें निकलती हैं और ये लहरें समुद्र का अंश होती हैं लेकिन समुद्र इन सब लहरों के कुल योग से अधिक विशाल होता है। समान रूप से जीवात्माओं और माया का अस्तित्व भगवान के स्वरूप के भीतर समाविष्ट है किन्तु भगवान फिर भी उनसे परे है।
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् |
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन: || 5||
मेरी दिव्य शक्तियों के रहस्य को देखो। यद्यपि मैं सभी जीवित प्राणियों का रचयिता और पालक हूँ तथापि मेरे द्वारा उत्पन्न प्राणी मुझमें स्थित नहीं रहते और मैं उनसे या माया शक्ति से प्रभावित नहीं होता।
पिछले श्लोक में कथित रूप से उल्लिखित दो शक्तियों का अभिप्राय 'माया शक्ति और 'जीव' शक्ति से है किन्तु इनसे परे भगवान की तीसरी शक्ति भी है जिसे 'योगमाया' शक्ति कहते हैं। इस 'योगमाया' शक्ति को इस श्लोक में दिव्य शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। 'योगमाया' भगवान की सबसे प्रबल शक्ति है। इसे 'कर्तुम्-अकर्तुम्-समर्थः' कहते हैं अर्थात् "जो असंभव को संभव बना सकती है" और यह योगमाया शक्ति भगवान के विराट व्यक्तित्व की विशेषताओं और गुणों को प्रकट करने तथा विस्मयकारी कार्यों का निर्वहन करती है।
उदाहरणार्थ भगवान हमारे हृदय में निवास करते हैं किन्तु फिर भी हमें इसका बोध नहीं होता, क्योंकि भगवान की योगमाया शक्ति हमें उनसे विलग रखती है। समान रूप से भगवान भी स्वयं को मायाशक्ति के प्रभाव से विलग रखते हैं। वेदों में भगवान की इस प्रकार से प्रशंसा की गयी है
विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया।
(श्रीमद्भागवतम्-2.5.13)
"माया शक्ति भी भगवान के समक्ष खड़े रहने में लज्जा का अनुभव करती है। क्या यह एक आश्चर्य नहीं है कि यद्यपि भगवान माया में व्याप्त हैं किन्तु फिर भी वे उससे अछूते हैं? यह योगमाया की एक अन्य रहस्यमयी शक्ति है।"
यदि संसार भगवान को प्रभावित कर सकता फिर जब प्रलय हो जाता है तब उसकी प्रकृति और विराट व्यक्तित्व में भी विकृति होनी चाहिए। किन्तु संसार में होने वाले सभी परिवर्तनों के पश्चात् भी भगवान अपने दिव्य स्वरूप में प्रतिष्ठित रहते हैं। तदनुसार वेदों में भगवान को दशांगुली के नाम से भी पुकारा जाता है। वे संसार में हैं किन्तु फिर भी उससे दस अंगुल परे और अछूते हैं।
यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान् |
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय || 6||
यह जान लो कि जिस प्रकार प्रबल वायु प्रत्येक स्थान पर प्रवाहित होती है और आकाश में जाकर स्थित हो जाती है, वैसे ही सभी जीव सदैव मुझमें स्थित रहते हैं।
श्रीकृष्ण ने चौथे श्लोक से छठे श्लोक तक 'मत्स्थानि' शब्द का तीन बार प्रयोग किया है। इसका अर्थ यह है कि सभी प्राणी उनमें स्थित रहते हैं और वे भगवान से विलग नहीं हो सकते, भले ही वे विभिन्न शरीरों में निवास करते हैं और संसार के विषयों का भोग करते हैं। यह समझना कठिन है कि संसार भगवान में कैसे स्थित रह सकता है। ग्रीक लोक कथाओं में एटलस को ग्लोब उठाए दिखाया गया है। एटलस ने टाइटन्स के साथ ओलम्पस पर्वत के देवताओं के विरुद्ध युद्ध लड़ा था। पराजित होने पर उसे अपमानित किया गया था और उसे सदा के लिए अपनी पीठ पर एक बड़े स्तंभ के साथ स्वर्ग और पृथ्वी का भार सहन करना पड़ा जो उसके कंधों पर पृथ्वी और स्वर्ग को अलग करता हुआ दिखाई देता है। किन्तु यहाँ इसका अभिप्राय ऐसा नहीं है कि जब वे यह कहते हैं कि उन्होंने सभी प्राणियों को धारण किया हुआ है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आकाश में है और आकाश भगवान द्वारा निर्मित है। इसलिए सभी जीवों को भगवान में स्थित बताया जाता है।
परम प्रभु श्रीकृष्ण अब अर्जुन को इस अवधारणा का बोध करवाने के लिए एक उपमान देते हैं। वायु का आकाश से पृथक् स्वंतत्र अस्तित्व नहीं है। यह निरंतर प्रचण्ड वेग के साथ प्रवाहित होती है फिर भी आकाश में स्थित रहती है। इसी प्रकार से जीवात्माओं का भगवान से पृथक् अस्तित्व नहीं है। वे अनित्य शरीर द्वारा काल, स्थान और चेतनाओं में कभी तीव्रता से और कभी धीरे-धीरे अपनी जीवन यात्रा पूरी करती हैं, परन्तु फिर भी वे सदैव भगवान के भीतर स्थित रहती हैं। एक अन्य परिप्रेक्ष्य में ब्रह्माण्ड में व्याप्त सभी तत्त्व भगवान की इच्छा के अधीन हैं। यह सब उनकी इच्छा के अनुरूप उत्पन्न, पोषित और विनष्ट होते हैं। अतः इस प्रकार से भी कहा जा सकता है कि सब कुछ भगवान में स्थित है।
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् |
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् || 7||
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन: |
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् || 8||
हे कुन्ती पुत्र! कल्प के अन्त में सभी प्राणी मेरी प्राकृत शक्ति में विलीन हो जाते हैं और अगली सृष्टि के प्रारंभ में, मैं उन्हें पुनः प्रकट कर देता हूँ। प्राकृत शक्ति का अध्यक्ष होने के कारण मैं बारम्बार असंख्य योनियों के जीवों को उनकी प्रकृति के अनुसार पुनः-पुनः उत्पन्न करता हूँ।
पिछले दो श्लोकों में श्रीकृष्ण ने यह व्याख्या की है कि सभी जीव उनमें स्थित रहते हैं। उनके इस कथन से यह प्रश्न उत्पन्न होता है-"जब महाप्रलय होती है तब समस्त संसार का संहार हो जाता है तब सभी प्राणी कहाँ जाते हैं?" इसका उत्तर इस श्लोक में दिया गया है।
पिछले अध्याय के सोलहवें से उन्नीसवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया था कि सृजन, स्थिति तथा प्रलय के चक्र का पुनरावर्तन होता रहता है। यहाँ 'कल्पक्षये' शब्द का अर्थ 'ब्रह्मा के जीवन काल का अन्त है।' ब्रह्मा के जीवन के 100 वर्ष, पूर्ण होने के पश्चात् सभी ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्तियाँ अव्यक्त अवस्था में चली जाती हैं। पंच महाभूत पंच तन्मात्राओं में विलीन हो जाते हैं और पंच तन्मात्राएँ अहंकार में, अहंकार महान में और महान माया शक्ति के आदि रूप प्रकृति में विलीन हो जाती है और प्रकृति परम पिता महाविष्णु के दिव्य शरीर में विलीन होकर उनमें स्थित हो जाती है।
उस समय सभी जीवात्माएँ अव्यक्त अवस्था में भगवान के दिव्य शरीर में स्थित हो जाती हैं। उनका स्थूल और सूक्ष्म शरीर जड़ माया में विलीन हो जाता है। किन्तु उनका कारण शरीर बना रहता है। श्लोक 2.28 में उल्लिखित टिप्पणी में तीन प्रकार के शरीरों का विस्तार से वर्णन किया गया है। प्रलय के पश्चात् जब भगवान पुनः संसार की रचना करते हैं तब माया (भौतिक शक्ति) प्रकृति-महान-अहंकार-पंचतन्मात्राओं-पंचमहाभूतों को विपरीत क्रम में प्रकट करती है तब जो जीवात्माएँ केवल कारण शरीर के साथ सुप्त अवस्था में पड़ी थी उन्हें पुनः संसार में भेजा जाता है। अपने कारण शरीर के अनुसार वे पुनः सूक्ष्म और स्थूल शरीर प्राप्त करती हैं और ब्रह्माण्ड में जीवों की विभिन्न योनियाँ उत्पन्न होती हैं। इनकी प्रकृति विभिन्न ग्रहों में भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। कुछ ग्रहों में शरीर में अग्नि तत्त्व का प्रभुत्व होता है। जिस प्रकार से पृथ्वी ग्रह पर शरीर में पृथ्वी और जल का प्रभुत्व होता है। इस प्रकार शरीरों में ये विविधता उनकी सूक्ष्मता के अनुसार होती हैं इसलिए श्रीकृष्ण इन्हें असंख्य जीवन रूप कहते हैं।
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय |
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु || 9||
हे धनंजय! इन कर्मों में से कोई भी कर्म मुझे बाँध नहीं सकता। मैं तटस्थ नियामक के रूप में रहता हूँ और इन कर्मों से विरक्त रहता हूँ।
चेतना जीवन का आधार है। मायाशक्ति वास्तव में जड़ होती है फिर यह संसार के सृजन जैसा अद्भुत कार्य कैसे कर सकती है जिसे देखकर कोई भी आश्चर्य चकित हो जाता है। रामचरितमानस में इसका सुन्दर वर्णन मिलता है
जासु सत्यता तें जड़ माया।
भास सत्य इव मोह सहाया।।
"माया शक्ति अपने आप में जड़ है लेकिन यह भगवान की आज्ञा प्राप्त कर इस प्रकार से अपना कार्य करना आरम्भ करती है, जैसे कि यह चेतन हो।" यह रसोई घर में पड़े चिमटे के जोड़े के समान है। वे भी अपने आप में निर्जीव होते हैं। लेकिन रसोइए के हाथ में आकर ये सजीव के समान होकर बहुत गर्म पतीलों को उठाने जैसे कई अद्भुत कार्य करते हैं। उसी प्रकार से माया शक्ति के पास स्वयं कुछ करने का बल नहीं होता। जब भगवान सृष्टि के सृजन की इच्छा करते हैं तब वे केवल माया शक्ति पर दृष्टि डालते हैं और इसे प्रकट करते हैं। इस संबंध में मुख्य रूप से यह ध्यान रखें कि यद्यपि सृष्टि की प्रकिया भगवान की इच्छा और निर्देश से कार्यान्वित होती है किन्तु फिर भी वे माया शक्ति के कार्यों से अप्रभावित रहते हैं। वे सदैव अपनी ह्लादिनी शक्ति (आनन्दमयी शक्ति) के कारण अपने सच्चिदानन्द स्वरूप में स्थित रहते हैं। इसलिए वेद उन्हें 'आत्माराम' कहते हैं जिसका तात्पर्य है वह जो बिना किसी बाहरी सुख के स्वयं में आनन्दमय रहता है।'
अब भगवान श्रीकृष्ण आगे यह स्पष्ट करेंगे कि वे अकर्ता और नियामक किस प्रकार से हैं।
मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम् |
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते || 10||
हे कुन्ती पुत्र! यह प्राकृत शक्ति मेरी आज्ञा से चर और अचर प्राणियों को उत्पन्न करती है। इसी कारण भौतिक जगत में परिवर्तन होते रहते हैं।
Commentary
जैसे कि पिछले श्लोक में यह व्याख्या की गयी है कि भगवान विभिन्न जीवों के सृजन के कार्य में प्रत्यक्ष रूप से संबद्ध नहीं रहते। उनके द्वारा नियुक्त उनकी विभिन्न शक्तियाँ और पुण्य आत्माएँ इस कार्य को सम्पन्न करती हैं। उदाहरणार्थ किसी देश का शासनाध्यक्ष व्यक्तिगत रूप से सरकार के सभी कार्य नहीं करता। उसके अधीन विभिन्न विभागों में नियुक्त अधिकारी विभिन्न कार्य सम्पन्न करते हैं। किन्तु फिर भी सरकार की सफलताओं और असफलताओं के लिए वही उत्तरदायी होता है क्योंकि वह अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले अधिकारियों को कार्यों का निष्पादन करवाने की स्वीकृति प्रदान करता है। समान रूप से प्रथम जन्मे ब्रह्मा और माया शक्ति सृष्टि का सृजन करने और विभिन्न जीवन रूपों को प्रकट करने के कार्यों को कार्यान्वित करते हैं क्योंकि वे भगवान की स्वीकृति से कार्य करते हैं इसलिए भगवान को स्रष्टा के रूप में भी संबोधित किया जाता है।
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् |
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् || 11||
जब मैं मनुष्य रूप में अवतार लेता हूँ तब मूर्ख लोग मुझे समस्त प्राणियों के परमात्मा के रूप में पहचानने में समर्थ नहीं होते।
महान आचार्य भी कभी-कभी अपने विद्यार्थियों को आत्म संतुष्टि की अवस्था से बाहर निकालने के लिए कड़े शब्दों का प्रयोग करता है ताकि वे गहन चिन्तन की अवस्था को प्राप्त कर सकें। यहाँ श्रीकृष्ण ने 'मूढ़' शब्द जिसका तात्पर्य 'मंदबुद्धि' से है, का प्रयोग उन लोगों का वर्णन करने के लिए किया है जो उनके साकार रूप की दिव्यता को स्वीकार नहीं करते।
वे जो यह कहते हैं कि भगवान निराकार है और साकार रूप में प्रकट नहीं हो सकता। वे भगवान के सर्वशक्तिमान और शक्तिशाली होने की परिभाषा का खण्डन करते हैं। भगवान ने विविध रूपों, आकारों और बहुरंगी संसार का सृजन किया है। यदि भगवान संसार में जीवों की अनगिनत योनियों को उत्पन्न करने का अद्भुत कार्य कर सकते हैं तब फिर क्या वह स्वयं साकार रूप धारण नहीं कर सकते? क्या भगवान यह कहते हैं-'मेरे पास स्वयं को साकार रूप में प्रकट करने की कोई शक्ति नहीं है और इसलिए मैं निराकार ज्योति के रूप में हूँ।' ऐसा कहना कि भगवान साकार रूप धारण नहीं कर सकता, भगवान को अपूर्ण रूप में स्वीकार करना होगा। हम अणु जीवात्माएँ साकार रूप धारण करती हैं। यदि कोई मानता है कि भगवान साकार रूप धारण नहीं कर सकते तब इसका निष्कर्ष यह होगा कि वे मनुष्यों से भी कम शक्तिमान हैं। भगवान पूर्ण और सिद्ध हैं। इसके लिए उनके व्यक्तित्व में दो गुणों साकार और निराकार रूप का होना आवश्यक है। वैदिक ग्रंथों में उल्लेख है-
अपश्यं गोपां अनिपद्यमानमा
(ऋग्वेद-1.22.164 सूक्त 31)
"मैंने अविनाशी भगवान जिसका जन्म ग्वालों के परिवार में हुआ, को बालक रूप में देखा।"
द्विभूजं मौन मुद्राध्यम् वन-मालिनमीश्वरम्।
(गोपालतापिन्युपनिषद्-1.13)
"मैने भगवान को वन के फूलों की माला पहने और अपने हाथों से बाँसुरी बजाते हुए मनोहर मौन मुद्रा में देखा।"
गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम्।।
(श्रीमदभागवतम्-7.15.75)
"गूढ ज्ञान यह है कि भगवान मानव रूप को स्वीकार करते हैं।"
यत्रावतीर्णो भगवान् परमात्मा नराकृतिः।
(श्रीमदभागवतम्-9.23.20)
"उस समय परमात्मा सभी वैभवों के स्वामी मनुष्य के रूप में अवतार लेते हैं।"
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द-विग्रहः।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्।।
(ब्रह्मसंहिता-5.1)
इस श्लोक में ब्रह्मा भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहते हैं-"मैं उस भगवान की आराधना करता हूँ जो सत्-चित्-आनन्द है। उनका कोई आदि और अन्त नहीं है और वे सभी कारणों के कारण हैं।" भगवान के साकार रूप के संबंध में हमें यह ध्यान रखना होगा कि वह दिव्य स्वरूप हैं जिसका अर्थ है कि वे लौकिक प्राणियों में पाए जाने वाले सभी प्रकार के दोषों से रहित हैं। भगवान का स्वरूप सत्-चित्-आनन्द है।
अस्यापि देव-वपुषो मदनुग्रहस्य
स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि।
(श्रीमद्भागवतम्-10.14.2)
इस श्लोक में ब्रह्मा श्रीकृष्ण से इस प्रकार से प्रार्थना करते हैं-"हे भगवान आपका शरीर पंचमहाभूतों से नहीं बना है। यह दिव्य है और आप स्वेच्छा से साकार रूप में अवतार लेकर मुझ जैसी जीवात्माओं पर कृपा करते हो।"
भगवद्गीता के चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा है-"यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ और सभी जीवित प्राणियों का स्वामी हूँ तथापि मैं अपनी योगमाया की शक्ति जो मेरा मूल दिव्य स्वरूप है, द्वारा इस संसार में प्रकट होता हूँ।" इसका अर्थ यह है कि भगवान का न केवल साकार रूप है बल्कि वे इस संसार में अवतरित भी होते हैं। चूँकि हम जीवात्माएँ चिरकाल से संसार में जन्म ले रही हैं अतः यह भी संभव है कि जब भगवान अपने पिछले अवतारों में पृथ्वी पर आए उस समय हम भी रहे होंगे। यह भी संभावना है कि हमने उन अवतारों को देखा था। किन्तु भगवान का रूप दिव्य था और हमारी आँखें मायिक थीं इसलिए हमने जब उनको अपनी आँखों से देखा तब हम उनके स्वरूप की दिव्यता को पहचान नहीं पाए।
भगवान के दिव्य रूप की प्रकृति ऐसी है कि प्रत्येक व्यक्ति केवल एक सीमा तक ही उनकी दिव्यता का बोध करता है। जो लोग सत्त्वगुण में प्रवृत होते हैं वे उन्हें देख कर सोचते हैं-" श्रीकृष्ण विशिष्ट मानव हैं, लेकिन निश्चित रूप से भगवान नहीं हैं।" जब वे रजोगुण के प्रभाव में होते हैं तब भगवान को देखकर कहते हैं-"उनमें कुछ विशेष नहीं हैं। वे हमारे जैसे ही हैं।" तमोगुण के प्रभुत्व में रहने वाले लोग उन्हें देखकर कहते है-“वे अहंकारी, चरित्रहीन और हमसे भी बुरे हैं।" केवल भगवत्प्राप्त संत ही उन्हें भगवान के रूप में पहचान सकते हैं क्योंकि उन्हें उनकी कृपा से दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है।" इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब वे अवतार लेते हैं उस समय माया के बंधनों में जकड़ी जीवात्माएँ उन्हें पहचान नहीं पातीं।
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतस: |
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिता: || 12||
माया शक्ति से मोहित होने के कारण ऐसे लोग आसुरी और नास्तिक विचारों को ग्रहण करते हैं। इस अवस्था में उनके आत्मकल्याण की आशा निरर्थक हो जाती है और उनके कर्मफल व्यर्थ हो जाते हैं और उनका ज्ञान निष्फल हो जाता है।
भगवान के साकार रूप के सम्बन्ध में कई पक्ष संसार में प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मत है कि भगवान संसार में अवतार लेकर नहीं आते। इसलिए वे कहते हैं कि श्रीकृष्ण भगवान नहीं थे। वे मात्र योगी थे। अन्य लोग कहते हैं कि श्रीकृष्ण माया विशिष्ट ब्रह्म हैं अर्थात् जो मायाशक्ति के साथ सम्पर्क होने के कारण भगवान की निम्न श्रेणी है। जबकि अन्य लोग कहते हैं कि वे चरित्रहीन थे जो अविवाहिता गोपियों के आगे-पीछे घूमते रहते थे।
इस श्लोक के अनुसार ये सभी सिद्धान्त अनुचित हैं और वे जिनकी बुद्धि इन सिद्धान्तों का समर्थन करती हैं, वे माया शक्ति से प्रभावित हैं। श्रीकृष्ण ने ऐसे लोगों के लिए कहा है कि जो ऐसी बात को स्वीकार करते हैं, वे आसुरी प्रवृत्ति वाले होते हैं क्योंकि वे परमात्मा के साकार रूप के प्रति अपने हृदय में दिव्य भावों को प्रश्रय नहीं देते। इसलिए वे उनकी भक्ति में लीन नहीं हो सकते। इसके अतिरिक्त चूँकि भगवान के निराकार रूप की आराधना करना अत्यन्त कठिन होता है इसलिए वे दोनों में से किसी एक की भी आराधना नहीं कर पाते जिसके परिणामस्वरूप वे आत्मिक उत्थान के मार्ग पर चलने से वंचित रहते हैं। मायाशक्ति से मोहित होने के कारण उनकी आत्मिक कल्याण की आशा व्यर्थ हो जाती है।
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिता: |
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् || 13||
हे पार्थ! किन्तु वे महान आत्माएँ जो मेरी दिव्य शक्ति का आश्रय लेती हैं, वे मुझे समस्त सृष्टि के उद्गम के रूप में जान लेती हैं। वे अपने मन को केवल मुझमें स्थिर कर मेरी अनन्य भक्ति करती हैं।
श्रीकृष्ण के उपदेशों की यह अद्भुत शैली है कि वह विरोधाभासी दिखने वाले विषय को भी सरलता से समझाते हैं। मोहित मनुष्यों की दशा का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण महान् पुण्य आत्माओं की चर्चा करते हैं। भौतिक जीवन दीर्घकालीन स्वप्न है जिसका अनुभव वे आत्माएँ कर रही हैं जो माया के प्रभुत्व में सोयी रहती हैं। इसके विपरीत महान आत्माएँ वे हैं जो अपनी अज्ञानता से जाग चुकी हैं और जो बुरे स्वप्न की भांति लौकिक चेतना की उपेक्षा करती हैं। माया के बंधनों से मुक्त होकर अब वे दिव्य योगमाया शक्ति की शरण में आ जाती हैं। ऐसी प्रबुद्ध आत्माएँ जागृत होकर भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंध को जान लेती हैं। जैसे भगवान के साकार और निराकार दो रूप हैं, उसी प्रकार से योगमाया के दो रूप होते हैं। यह निराकार शक्ति है लेकिन राधा, सीता, दुर्गा, लक्ष्मी और काली आदि में यह साकार रूप में प्रकट होती है, ये सब दिव्य शक्तियाँ भगवान की अलौकिक शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं और ये सब एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं, जैसे कि कृष्ण, राम, शिव, नारायण इत्यादि एक भगवान के भिन्न-भिन्न रूप नहीं हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण में वर्णन हैं और ये सब एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार जैसे कि कृष्ण, राम, शिव, नारायण इत्यादि भगवान से अभिन्न हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण में वर्णन है
यथा त्वं राधिका देवी गोलोके गोकुले तथा।
वैकुण्ठे च महालक्ष्मी भवति च सरस्वती।
कपिलस्य प्रिया कान्ता भारते भारती सती।
द्वारवत्यां महालक्ष्मी भवती रुक्मिणी सती।
त्वं सीता मिथिलायां च त्वच्छाया द्रौपदी सती।
रावणेन हृता त्वं च त्वं च रामस्य कामिनी ।।
"हे राधा! तुम गोलोक, और गोकुल, जहाँ वे 5,000 वर्ष पूर्व प्रकट हुए थे, की दिव्य देवी हो। तुम द्वारका में रुक्मिणी के रूप में निवास करती हो। तुम मिथिला में सीता के रूप में प्रकट हुईं। पांडवों की पत्नी द्रोपदी तुम्हारी छाया की अभिव्यक्ति थी। तुम वही हो जिसका सीता के रूप में रावण ने हरण किया था और तुम भगवान राम की पत्नी हो।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने उल्लेख किया है कि सभी महान आत्माएँ दिव्य शक्ति की शरण लेती हैं। इसका कारण यह है कि दिव्य कृपा ज्ञान, प्रेम आदि सब भगवान की अलौकिक शक्तियाँ हैं और ये सब दिव्य योगमाया शक्ति (जो 'श्री राधा' हैं) के अधीन हैं। इस प्रकार योगमाया की कृपा से कोई प्रेम, ज्ञान और भगवान की अनुकंपा प्राप्त करता है। ऐसी पुण्य आत्माएँ जो भगवान की दिव्य कृपा प्राप्त कर लेती हैं, वे दिव्य प्रेम से युक्त होकर भगवान की अविरल भक्ति में तल्लीन रहती हैं।
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रता: |
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते || 14||
मेरी दिव्य महिमा का सदैव कीर्तन करते हुए दृढ़ निश्चय के साथ विनय पूर्वक मेरे समक्ष नतमस्तक होकर वे निरन्तर प्रेमा भक्ति के साथ मेरी आराधना करते हैं।
यह कहने के पश्चात् कि पुण्य आत्माएँ उनकी भक्ति में लीन रहती हैं, श्रीकृष्ण अब यह व्याख्या कर रहे हैं कि वे किस प्रकार से उनकी भक्ति करती हैं। वे कहते हैं कि भक्त अपनी भक्ति का अभ्यास करने और उसे बढ़ाने के लिए भगवान की महिमा का कीर्तन करने में संलग्न रहते हैं। भगवान की महिमा के गुणगान को कीर्तन कहते हैं जिसे निम्न प्रकार से परिभाषित किया गया है।
नाम-लीला-गुणादीना उच्चै: भाषा तु कीर्तनम्।
(भक्तिरसामृतसिंधु-1.2.145)
"भगवान के नाम, रूप, गुण, लीला, धाम और संतों की महिमा का गुणगान करना कीर्तन कहलाता है।"
कीर्तन भगवान की भक्ति का अत्यन्त सशक्त माध्यम है। इसमें तीन प्रकार की भक्ति श्रवण, कीर्तन, और स्मरण समाविष्ट है। भगवान में मन को अनुरक्त करने का लक्ष्य तभी प्राप्त हो सकता है जब इसका अभ्यास श्रवण और गायन के साथ किया जाए। जैसा कि छठे अध्याय में कहा गया है कि मन वायु के समान चंचल होता है और स्वाभाविक रूप से एक विचार से दूसरे विचार में घूमता रहता है। श्रवण और गायन ज्ञानेन्द्रियों को दिव्य आध्यात्मिक क्षेत्र में अनुरक्त कर देते हैं जिससे चंचल मन को बार-बार वापस लाकर भगवान की भक्ति में लीन करने में सहायता मिलती है।
कीर्तन के अन्य कई लाभ भी हैं। प्रायः जब लोग जप द्वारा या एकांत में ध्यान लगाकर भक्ति का अभ्यास करते हैं तब उन्हें नींद में ऊँघते हुए देखा जा सकता है। किन्तु कीर्तन भक्ति में तल्लीन होने की ऐसी प्रक्रिया है जो नींद को भगा देता है। कीर्तन गायन के स्वर शोरगुल वातावरण को भी शान्त करते हैं। कीर्तन का अभ्यास सामूहिक रूप में किया जा सकता है। इसमें अधिक संख्या में लोग भाग ले सकते हैं। इसके अतिरिक्त मन विविधता की ओर स्वत: आकर्षित होता है जो भगवान के नाम, गुणों, लीलाओं, धामों आदि के कीर्तनों के माध्यम से प्राप्त हो जाती है। मधुर और उच्च स्वर में कीर्तन करने से भगवान के नाम की दिव्य तरंगें पूरे वातावरण को पवित्र और सुखद बनाती हैं। इन सभी कारणों से भारतीय इतिहास में कीर्तन भक्ति का प्रसिद्ध माध्यम रहा है। भक्ति मार्ग के अनुयायी संत सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, कबीर, तुकाराम, एकनाथ, नरसी मेहता, जयदेव, त्यागराज आदि महान कवि थे। इन्होंने भक्ति रस से पूर्ण सुंदर काव्य और भजनों की रचना की जिनके द्वारा वे भगवान की महिमा के गायन, श्रवण और स्मरण में निमग्न रहे। वैदिक ग्रंथ भी विशेष रूप से कलियुग में भक्ति के सुगम मार्ग के रूप में कीर्तन पद्धति की सराहना करते हैं।
कृते यद् ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-12.3.52)
"सतयुग में भक्ति का उत्तम साधन भगवान का ध्यान करना था। त्रेता युग में यह साधन भगवान के सुख के लिए यज्ञों का अनुष्ठान करना था और द्वापर युग में मूर्ति पूजा की पद्धति प्रचलित थी। वर्तमान कलियुग में केवल कीर्तन का महत्व है।"
अविकारी वा विकारी वा सर्व-दोषैक-भाजनः।
परमेश परं याति राम-नामानुकीर्तनात् ।।
(अध्यात्म रामायण)
"चाहे तुम कामनाओं से युक्त हो या उनसे रहित हो, विकार रहित या विकार युक्त हो यदि तुम भगवान राम के नाम के कीर्तन में लीन रहते हो तब तुम परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हो।"
सर्व-धर्म-बहिर्भूतः सर्व-पापरतस्थथा।
मुच्यते नात्र सन्देहो विष्र्णोनमानुकीर्तनात् ।।
(वैशम्पायन संहिता)
"यहाँ तक कि कोई घोर पापी है या धर्म से च्युत है तब भी वह भगवान विष्णु के नाम का जप कर बच सकता है इसमें कोई संदेह नहीं है।"
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा।
गावत नर पावहिं भव थाहा।।
(रामचरितमानस)
"कलियुग में मुक्ति का उपाय यह है कि भगवान के नाम की महिमा का गान कर कोई भी संसार रूपी समुद्र को पार सकता है।" किन्तु यह स्मरण रहे कि कीर्तन पद्धति में श्रवण और गायन भक्ति में सहायक मात्र है। वस्तुत: भगवान का स्मरण ही भक्ति का सार है। अगर हम इसकी उपेक्षा करते हैं तब कीर्तन से मन शुद्ध नहीं होगा। श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि कीर्तन करते समय निरन्तर मन से भगवान का चिन्तन भी करना चाहिए। हमें दृढ़तापूर्वक मन के शुद्धिकरण हेतु इसका अभ्यास करना चाहिए।
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते |
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् || 15||
अन्य लोग जो ज्ञान के संवर्धन हेतु यज्ञ करने में लगे रहते हैं, वे विविध प्रकार से मेरी ही आराधना में लीन रहते हैं। कुछ लोग मुझे अभिन्न रूप में देखते हैं जोकि उनसे भिन्न नहीं हैं जबकि अन्य मुझे अपने से भिन्न रूप में देखते हैं। कुछ लोग मेरे ब्रह्माण्डीय रूप की अनन्त अभिव्यक्तियों के रूप में मेरी पूजा करते हैं।
साधक परम सत्य को पाने के लिए विभिन्न आध्यात्मिक मार्गों का अनुसरण करते हैं। जो भक्त हैं, श्रीकृष्ण पहले ही उनका वर्णन कर चुके हैं। वे भगवान के अभिन्न अंग और सेवक के रूप में श्रद्धा भक्ति से युक्त होकर स्वयं को भगवान के चरण कमलों पर समर्पित करते हैं। वे अब साधकों द्वारा अनुसरण किए जाने वाले कुछ अन्य मार्गों का वर्णन कर रहे हैं।
वे मनुष्य जो ज्ञान योग के मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे स्वयं को भगवान से भिन्न नहीं मानते। वे जैसे 'सोऽहम्' अर्थात् मैं वही हूँ 'शिवोऽहम्' अर्थात् मैं शिव हूँ जैसे सूत्रों का गहनता से चिन्तन करते हैं। उनका चरम लक्ष्य परम सत्ता के रूप में अभिन्न ब्रह्म की अनुभूति करना होता है जो शाश्वत ज्ञान और आनन्द के गुण से सम्पन्न है लेकिन वह रूप, गुण और लीला से रहित है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे ज्ञानी योगी भी उनकी आराधना करते हैं लेकिन उनके सर्वत्र व्यापक निराकार रूप की। इसके विपरीत अष्टांग योगी स्वयं को भगवान से पृथक् देखते हैं और तदनुसार उनकी आराधना करते हैं। जबकि कुछ ब्रह्माण्ड की ही भगवान के रूप में पूजा करते हैं। वैदिक दर्शन में इसे 'विश्वरूप उपासना' अर्थात् भगवान के ब्रह्माण्डीय रूप की आराधना कहा गया है। पाश्चात्य दर्शन में इसे 'पेंथीजम' और ग्रीक दर्शन में 'पेन' (सब) और 'थियोस' (भगवान) कहा गया है। इस दर्शन का प्रसिद्ध समर्थक (स्पिनोज़ा) है। चूँकि संसार भगवान का अंग है अतः इसके प्रति दिव्य भावना रखना अनुचित नहीं है लेकिन यह अपूर्ण है। ऐसे भक्तों को भगवान के अन्य रूपों जैसे कि 'ब्रह्म' (भगवान की सर्वव्यापक अभिन्न अभिव्यक्ति), 'परमात्मा' (सब के हृदय में स्थित), और 'भगवान' (साकार रूप) का ज्ञान नहीं होता।
इन सब पद्धतियों द्वारा एक ही भगवान की उपासना कैसे की जा सकती है? श्रीकृष्ण इसका उत्तर अगले दो श्लोकों में दे रहे हैं।
अहं क्रतुरहं यज्ञ: स्वधाहमहमौषधम् |
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् || 16||
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामह: |
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च || 17||
मैं ही वैदिक कर्मकाण्ड हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही पितरों को दिया जाने वाला तर्पण हूँ, मैं ही औषधीय जड़ी-बूटी और वैदिक मंत्र हूँ, मैं ही घी, अग्नि और यज्ञ का कर्म हूँ। मैं ही इस ब्रह्माण्ड का पिता, माता, आश्रय और पितामह हूँ। मैं ही शुद्धिकर्ता, ज्ञान का लक्ष्य और पवित्र मंत्र ओम् हूँ, मैं ही ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद हूँ।
इन श्लोकों में श्रीकृष्ण अपने दिव्य व्यक्तित्व के विभिन्न स्वरूपों की झाँकी दिखा रहे हैं। क्रतुः शब्द का अर्थ 'यज्ञ संबंधी कर्मकाण्ड' है, यथा 'अग्निहोत्र' जैसे यज्ञों का उल्लेख वेदों में किया गया है। इन्हें यज्ञ भी कहा जाता है जैसे कि-विश्वदेवा जिसका उल्लेख स्मृति ग्रथों में किया गया है। 'औषधम्' शब्द औषधीय जड़ी-बूटियों की क्षमता को व्यक्त करता है।
सृष्टि भगवान से प्रकट होती है और इसलिए उन्हें उसका पिता कहा गया है। सृष्टि के पूर्व वह अप्रकट प्राकृतिक शक्ति को अपने गर्भ में धारण करता है इसलिए उसको माता भी कहते हैं, वह सृष्टि का रक्षण और पोषण करता है, इसलिए उसे 'धाता' अर्थात् आश्रयदाता कहते हैं। वह स्रष्टा ब्रह्मा का भी पिता है इसलिए उसे पितामह कहते हैं।
वेद भगवान से प्रकट हुए हैं। रामचरितमानस में वर्णन है -
जाकी सहज स्वास श्रुतिचारी।
"भगवान ने अपनी श्वास से वेदों को प्रकट किया।" वे भगवान की ज्ञान शक्ति हैं और इसलिए वे उनके अनन्त विराट व्यक्तित्व का स्वरूप हैं।" यह कहते हुए कि वे ही वेद हैं, श्रीकृष्ण इस सत्य को प्रभावशाली ढंग से प्रकट करते हैं।
गतिर्भर्ता प्रभु: साक्षी निवास: शरणं सुहृत् |
प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम् || 18||
मैं सभी प्राणियों का परम लक्ष्य हूँ और मैं ही सबका निर्वाहक, स्वामी, धाम, आश्रयऔर मित्र हूँ। मैं ही सृष्टि का आदि, अन्त और मध्य (विश्रामस्थल) और मैं ही अविनाशी बीज हूँ।
आत्मा भगवान का अणु अंश है और उसका उनसे सभी प्रकार का संबंध है। किन्तु शारीरिक चेतना के कारण हम अपने शरीर के सगे-संबंधियों जैसे पिता, माता, प्रियजन, बच्चों और मित्र को अपना बंधु-बांधव मानते हैं। हम उनमें मोहित हो जाते हैं और बार-बार मन में उनके साथ अपने संबंधों का चिन्तन कर सांसारिक मोहपाश में बंध जाते हैं। किन्तु संसार के इन सगे-संबंधियों में से कोई भी हमें पूर्ण और सच्चा प्रेम नहीं दे सकता जिसे पाने के लिए हमारी आत्मा तरसती रहती है। इसके दो कारण हैं। पहला यह कि सब नातेदार अस्थायी होते हैं और जब वे या हम शरीर त्यागते हैं तब सबका एक-दूसरे से बिछुड़ना अपरिहार्य हो जाता है। दूसरे जितने समय तक वे जीवित रहते हैं उनका प्रेम स्वार्थ पर आधारित होता है और इसलिए यह प्रेम स्वार्थ की संतुष्टि के अनुपात में घटता बढ़ता रहता है अर्थात् जितना स्वार्थ उतना प्रेम और स्वार्थ सिद्ध होते ही प्रेम समाप्त हो जाता है। दिन भर में सांसारिक प्रेम की गहनता क्षण प्रतिक्षण परिवर्तित होती रहती है। 'मेरी पत्नी बहुत शालीन है, मेरी पत्नी शालीन नहीं है। वह भली है, वह भद्दी है।' इस प्रकार से सांसारिक रंगमंच पर प्रेम इस सीमा तक घटता-बढ़ता रहता है। दूसरी ओर भगवान हमारे ऐसे संबंधी है जो इस जीवन में और मृत्यु के पश्चात् भी हमारे साथ रहते हैं। प्रत्येक जन्म में हम जिस भी योनि में गये, भगवान हमारे साथ रहे और हमारे हृदय में बैठे रहे। इस प्रकार से वे हमारे नित्य संबंधी हैं। इसके अतिरिक्त उनका हमसे कोई स्वार्थ नहीं होता क्योंकि वे पूर्ण और सिद्ध हैं। वे हमसे निःस्वार्थ प्रेम करते हैं क्योंकि उनकी इच्छा हमारा आंतरिक कल्याण करना है। इसलिए भगवान ही हमारे एकमात्र सच्चे संबंधी हैं जो नित्य और निःस्वार्थी दोनों हैं।
इस दृष्टिकोण को बेहतर समझने के लिए समुद्र और उसमें उठने वाली लहरों से इसके सादृश्य पर विचार करें। समुद्र की दो लहरें कुछ समय के लिए एक साथ आपस में खेलती हुईं यह आभास करते हुए बहती हैं कि दोनों के बीच घनिष्ठ मित्रता है। किन्तु कुछ दूरी तक साथ चलते रहने के बाद एक लहर समुद्र में विलीन हो जाती है और कुछ समय पश्चात् दूसरी भी विलीन हो जाती है। क्या उनमें आपस में कोई संबंध था? नहीं, उन दोनों का जन्म समुद्र से हुआ था और उनका संबंध केवल समुद्र के साथ था। समान रूप से भगवान समुद्र हैं और हम लहरों के समान हैं जो भगवान से प्रकट होती हैं। अतः सत्य यह है कि जीवात्माओं में परस्पर कोई संबंध न होकर केवल भगवान से उनका संबंध होता है जिससे वे प्रकट होती हैं।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण हमें शारीरिक चेतना और सगे-संबंधियों की आसक्ति से ऊपर ले जाते हैं। आत्मा के स्तर पर केवल भगवान हमारे सच्चे संबंधी हैं। वे हमारे पिता, माता, बहन, भाई, प्रिय और सखा हैं। इसी प्रसंग को सभी वैदिक ग्रंथों में बार-बार दोहराया गया है।
दिव्यो देव एको नारायणो माता पिता भ्राता सुहृत् गतिः।
निवासः शरणं सुहृत् गतिर्नारायण इति ।।
(सुबालश्रुति मंत्र-6)
"भगवान नारायण ही एकमात्र हमारे माता, पिता, प्रिय और आत्मा का गंतव्य हैं।"
मोरे सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबन्धु उर अन्तरजामी।।
(रामचरितमानस)
"हे भगवान राम केवल आप ही हमारे स्वामी हैं, आप ही निराश्रितों के उद्धारक, सबके हृदय को जानने वाले हो।" भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंध को जानकर हमें केवल उन्हीं में अपने मन को तल्लीन करने का प्रयास करना चाहिए। तभी हमारा मन शुद्ध होगा और उसी स्थिति में हम पूर्ण शरणागति की शर्त पूरी करने में सक्षम हो पाएँगे जोकि भगवान को पाने के लिए अनिवार्य है। हमें इस सत्य को धारण कर मन की सभी आसक्तियों को त्याग कर इसे भगवान में अनुरक्त कर देना चाहिए। इसलिए रामचरितमानस में वर्णन किया गया है
सब के ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँधा बरि डोरी।
"अपने मन से सांसारिक आसक्तियों के सूत को काट दो और इनकी रस्सी बनाकर इसे भगवान के चरण कमलों पर बाँध दो।" अपने मन को भगवान के साथ जोड़ने के सहायतार्थ यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि आत्मा का संबंध केवल एक भगवान के साथ ही है।
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णम्युत्सृजामि च |
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन || 19||
हे अर्जुन! मैं ही सूर्य को गर्मी प्रदान करता हूँ तथा वर्षा को रोकता और लाता हूँ। मैं ही अनश्वर तत्त्व और साक्षात् मृत्यु हूँ। मैं ही आत्मा और मैं ही पदार्थ हूँ।
पुराणों में यह वर्णन मिलता है कि जब भगवान ने ब्रह्माण्ड की रचना की तब उन्होंने सबसे पहले ब्रह्मा को प्रकट किया और फिर उन्हें आगे सृष्टि की रचना करने का दायित्व सौंपा। ब्रह्मा जब ब्रह्माण्ड के प्राकृतिक पदार्थों और विभिन्न योनियों के सृजन के कार्य को संपन्न करने में किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये तब भगवान ने उनके भीतर ज्ञान प्रकट किया जिसे चतुरश्लोकी भागवत कहते हैं। इसके आधार पर ब्रह्मा ने संसार की रचना के कार्य को आगे बढ़ाया। इसका पहला श्लोक इसे अति प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है -
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम्।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्।।
(श्रीमद्भागवतम्-2.9.32)
श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा से कहा, "मैं ही सब कुछ हूँ सृष्टि से पूर्व केवल मैं ही अस्तित्व में था। अब जब सृष्टि प्रकट हो चुकी है, इस प्रकट संसार का स्वरूप जो भी है वह सब मैं हूँ। प्रलय के पश्चात् भी केवल मैं ही रहूँगा। सृष्टि में मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं।" उपर्युक्त सत्य का तात्पर्य यह है कि संसार के जिस पदार्थ के द्वारा हम भगवान की आराधना करते हैं वह भी भगवान है। जब लोग गंगा की पूजा करते हैं तो वे अपने शरीर के निचले अंग को उसमें डुबाते हैं। फिर वे अपनी हथेलियों से जल उठाकर गंगा में डाल देते हैं। इस प्रकार से वे गंगाजल का ही प्रयोग उसकी पूजा के लिए करते हैं। उसी प्रकार से जब भगवान सभी में व्याप्त हैं तब उनकी पूजा करने के लिए प्रयोग किए जाने वाले पदार्थ भी उनसे भिन्न नहीं हो सकते। जैसे कि श्लोक 16 और 17 में श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि वे ही वेद, यज्ञ, अग्नि और पहला अक्षर 'ओम्', और यज्ञ कर्म हैं। हमारी भक्ति का भाव और विधि जो भी हो, कुछ भी भगवान से अलग नहीं है जो हम उन्हें अर्पित करें। इसके पश्चात भी प्रेम भाव से किया गया अर्पण भगवान को प्रसन्न करता है न कि पदार्थ का अर्पण।
त्रैविद्या मां सोमपा: पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते |
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् || 20||
वे जिनकी रुचि वेदों में वर्णित सकाम कर्मकाण्डों में होती है, वे यज्ञों के कर्मकाण्ड द्वारा मेरी आराधना करते हैं। वे यज्ञों के अवशेष सोमरस का सेवन कर पापों से शुद्ध होकर स्वर्ग जाने की इच्छा करते हैं। अपने पुण्य कर्मों के प्रभाव से वे स्वर्ग के राजा इन्द्र के लोक में जाते हैं और स्वर्ग के देवताओं का ऐश्वर्य पाते हैं।
इस अध्याय के श्लोक 11 और 12 में श्रीकृष्ण ने उन आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों की मानसिकता का वर्णन किया जो नास्तिक और आसुरी विचारों को स्वीकार करते हैं और इसके फलस्वरूप परिणाम भी भुगतते हैं। उसके पश्चात् उन्होंने महान आत्माओं की प्रकृति का वर्णन किया जो भगवान की प्रेममयी भक्ति में मग्न रहती हैं। अब इस और अगले श्लोक में उनका उल्लेख किया गया है जो न तो भक्त हैं और न ही नास्तिक हैं। वे वैदिक कर्मकाण्डों का अनुपालन करते हैं। कर्मकाण्ड की प्रक्रिया को 'त्रिविद्या' कहा जाता है। वे लोग जो 'त्रिविद्या' प्रक्रिया द्वारा प्रसन्न होकर यज्ञों या अन्य कर्मकाण्डों द्वारा इन्द्र जैसे देवताओं की पूजा करते हैं वे अप्रत्यक्ष रूप से सर्वात्मा भगवान की पूजा करते हैं क्योंकि उन्हें यह अनुभव नहीं होता कि देवताओं द्वारा प्रदान किए जाने वाले उपहारों की स्वीकृति तो भगवान ही प्रदान करते हैं। धार्मिक कर्मकाण्डों को शुभ कार्य माना जा सकता है लेकिन इनकी गणना भक्ति के रूप में नहीं की जाती। धार्मिक कर्मकाण्डों का अनुपालन करते हुए वे जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो पाते। वे ब्रह्माण्ड के उच्च लोकों जैसे कि स्वर्ग के राजा इन्द्र के लोक में जाते हैं, जहाँ वे स्वर्ग के देवताओं का अत्युत्तम सुख पाते हैं जो पृथ्वी पर मिलने वाले इन्द्रिय सुखों की तुलना में हजारों गुणा अधिक होता है। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण स्वर्ग के सुखों के दोषों की विवेचना करेंगे।
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति |
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते || 21||
जब वे स्वर्ग के सुखों को भोग लेते हैं और उनके पुण्य कर्मों के फल क्षीण हो जाते हैं तब फिर वे पृथ्वीलोक पर लौट आते हैं। इस प्रकार वे जो अपने इच्छित पदार्थ प्राप्त करने हेतु वैदिक कर्मकाण्डों का पालन करते हैं, बार-बार इस संसार में आवागमन करते रहते हैं।
श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह स्पष्ट करते हैं कि स्वर्ग लोक के दैवीय सुख अस्थायी हैं। जिन लोगों को स्वर्ग भेजा जाता है वे स्वर्ग के सुखों और ऐश्वर्य का भरपूर भोग करते हैं। बाद में जब उनके पुण्य कर्म समाप्त हो जाते हैं तब उन्हें पृथ्वी लोक पर वापस भेज दिया जाता है। स्वर्गलोक को प्राप्त करने से आत्मा की आनंद की खोज पूरी नहीं होती। हम भी अपने अनन्त पूर्व जन्मों में वहाँ पर कई बार जा चुके हैं तथापि आत्मा की अनन्त सुख पाने की भूख अभी तक शांत नहीं हुई है। सभी वैदिक ग्रंथों में इसका समर्थन किया गया है।
तावत् प्रमोदते स्वर्गे यावत् पुण्यं समाप्यते।
क्षीणपुण्यः पतत्यगिनिच्छन् कालचालितः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.10.26)
"स्वर्ग के निवासी तब तक स्वर्ग के सुखों का भोग करते हैं जब तक उनके पुण्य कर्म समाप्त नहीं हो जाते। कुछ अंतराल के बाद उन्हें अनिच्छा से बलपूर्वक निम्न लोकों में भेज दिया जाता है।"
स्वर्गहु स्वल्प अन्त दुखदाई।
(रामचरितमानस)
"स्वर्ग की प्राप्ति अस्थायी है और वहाँ भी दु:ख पीछा नहीं छोड़ते।"
जिस प्रकार खेल के मैदान में फुटबॉल को चारों ओर खिलाड़ी ठोकर मारते रहते हैं। उसी प्रकार से माया भी जीवात्मा को भगवान को भूल जाने का दण्ड देने के लिए इधर-उधर ठोकर मारती रहती है। आत्मा कभी निम्न लोकों में जाती है और कभी-कभी उच्च लोकों में जाती है। निम्न और उच्च लोकों की असंख्य योनियों जिन्हें यह प्राप्त करती है उनमें से केवल मनुष्य योनि में ही भगवत्प्राप्ति का अवसर मिलता है इसलिए देवता लोग भी मनुष्य जन्म प्राप्त करने हेतु प्रार्थना करते हैं, ताकि वे पिछली भूल को सुधारने और भगवत्प्राप्ति का प्रयास कर सकें।
दुर्लभं मानुषं जन्म प्रार्थ्यते त्रिदशैरपि।
(नारद पुराण)
"मानव जन्म अत्यंत दुर्लभ है। यहाँ तक कि स्वर्ग के देवता भी इसे पाने के लिए प्रार्थना करते हैं।" इसलिए श्रीराम ने अयोध्यावासियों को यह संदेश दिया
बड़े भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।।
(रामचरितमानस)
"हे अयोध्यावासियों! यह आपका परम सौभाग्य है कि आपको मानव जन्म प्राप्त हुआ है जोकि अत्यंत दुर्लभ है और स्वर्ग के देवता भी इसकी इच्छा करते हैं।" जब देवतागण मनुष्य जन्म चाहते हैं तब फिर मनुष्य स्वर्गलोक में क्यों जाना चाहते हैं? इसकी अपेक्षा हमें भगवान की भक्ति में लीन होकर भगवत्प्राप्ति का लक्ष्य रखना चाहिए।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते |
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् || 22||
किन्तु जो लोग सदैव मेरे बारे में सोचते हैं और मेरी अनन्य भक्ति में लीन रहते हैं एवं जिनका मन सदैव मुझमें तल्लीन रहता है, उनकी जो आवश्यकताएँ होती हैं, उन्हें मैं पूरा करता हूँ और जो कुछ उनके स्वामित्व में होता है, उसकी रक्षा करता हूँ।
एक माँ पूर्ण रूप से उस पर आश्रित नवजात शिशु के प्रति अपने दायित्वों का त्याग करने के बारे में सोच नहीं सकती। शिशु की परम और शाश्वत माँ भगवान ही हैं। भगवान केवल उन पर पूर्ण शरणागत जीवात्माओं को माँ जैसी सुरक्षा प्रदान करते हैं। यहाँ 'वहाम्यहम्' शब्द का प्रयोग किया गया हैं जिसका अर्थ यह है 'मैं अपने भक्तों की रक्षा का दायित्व स्वयं लेता हूँ' यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कोई विवाहित व्यक्ति अपनी पत्नी और बच्चों की देखभाल का दायित्व अपने उपर लेता है। भगवान दो वचन देते हैं-पहला 'योग' है जिसके माध्यम से वे अपने भक्तों को आध्यात्मिक समपत्ति प्रदान करते हैं। दूसरा 'क्षेम' है जिसके द्वारा वे भक्तों की उस अध्यात्मिक संपत्ति की रक्षा करते हैं जो उनके पास पहले से है। किन्तु भगवान ने इसके लिए अनन्य शरणागति की शर्त रखी है। इसे पुनः माँ और पुत्र के उदाहरण से समझा जा सकता है। नवजात शिशु अपनी माँ पर पूर्णतया आश्रित होता है जो अपने शिशु की पूरी तरह से देखभाल करती है। बच्चे को जब किसी वस्तु की आवश्यकता होती है तब वह रोने लगता है और फिर माँ उसे दूध पिलाती है, उसे स्वच्छ करती है और स्नान आदि कराती है। लेकिन जब वह शिशु 5 वर्ष का हो जाता है तब वह उपर्युक्त सभी कार्य स्वयं करने लग जाता है और कुछ सीमा तक माँ का दायित्व कम हो जाता है। जब बालक युवा हो जाता है और अपने उत्तरदायित्व को अनुभव करने लगता है, तब माँ अपने कुछ और उत्तरदायित्वों का त्याग कर देती है। अब यदि पिता घर में आकर अपने पुत्र के संबंध में कुछ पूछता है कि 'हमारा पुत्र कहाँ है तब माँ उत्तर देती है, 'वह विद्यालय से घर वापस नहीं आया। संभवतः वह अपने मित्र के साथ मूवी देखने गया होगा।' अब माँ की यह मनोवृति उसके प्रति स्वाभाविक हो जाती है किन्तु जब यही बालक 5 वर्ष का था और यदि उसे विद्यालय से लौटने में 10 मिनट की भी देरी हो जाती थी, तब माता और पिता दोनों ही चिन्तित हो जाते थे-क्या हुआ होगा? वह छोटा बालक है और यह आशंका करने लगते कि उसके साथ कोई दुर्घटना तो नहीं घटी। जरा विद्यालय में फोन कर पता लगाएँ।' इस प्रकार बालक जितना अधिक अपने उत्तरदायित्वों को समझने लगता है माँ उतना ही अपने दायित्वों का निर्वहन करना छोड़ देती है। भगवान का नियम भी कुछ ऐसा है। जब हम स्वयं को कर्त्ता मानकर अपनी स्वेच्छा से कार्य करते हैं और अपनी क्षमता पर भरोसा कर लेते हैं तब भगवान अपनी कृपा नहीं बरसाते। वे केवल हमारे कर्मों का लेखा-जोखा रखकर उसी के अनुरूप हमें फल देते हैं। जब हम भगवान के प्रति आंशिक रूप से शरणागत होते हैं और आंशिक रूप से संसार का आश्रय लेते हैं तब भगवान भी हम पर आंशिक कृपा करते हैं और जब हम स्वयं को पूर्ण शरणागत कर देते हैं। "मामेकं शरणं व्रज" तब भगवान हम पर कृपा करते हैं और जो हमारे पास है उसकी रक्षा करने और जो कमी है उसे पूरा करने का दायित्व अपने ऊपर ले लेते हैं।
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता: |
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् || 23||
हे कुन्ती पुत्र! जो श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, वे मेरी ही पूजा करते हैं। लेकिन वे यह सब अनुचित ढंग से करते हैं।
जो भगवान की पूजा करते हैं, उनकी मनोस्थिति का वर्णन करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब उन लोगों की स्थिति को स्पष्ट कर रहे हैं जो सांसारिक सुख प्राप्त करने के लिए देवताओं की पूजा करते हैं। वे श्रद्धायुक्त भी होते हैं और वे स्वर्ग के देवताओं से अपनी प्रार्थना का फल भी प्राप्त करते हैं, किन्तु ऐसे लोगों का ज्ञान अपूर्ण होता है। वे यह अनुभव नहीं कर पाते कि स्वर्ग के देवतागण अपनी शक्तियाँ भगवान से प्राप्त करते हैं। इस प्रकार वे अप्रत्यक्ष रूप से परमात्मा के दिव्य स्वरूप की भी पूजा करते हैं। यदि कोई सरकारी अधिकारी किसी नागरिक की शिकायत का निवारण करता है तब उसे उस पर कृपा करने का श्रेय नहीं दिया जा सकता। वह केवल अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत सरकार द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करता है। इसी प्रकार की शक्तियाँ देवताओं को भगवान से प्राप्त होती हैं। इस प्रकार से जो सर्वोच्च ज्ञान से युक्त हैं वे अप्रत्यक्ष मार्ग का अनुसरण नहीं करते। वे भगवान को समस्त शक्तियों का स्त्रोत मानकर पूजा करते हैं। सर्वात्मा भगवान को अर्पित की गयी ऐसी पूजा स्वतः समस्त सृष्टि को संतुष्ट करती है।
यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः।
प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां तथैव सर्वाहणमच्युतेज्या।।
(श्रीमद्भागवतम्-4.31.14)
"जब किसी वृक्ष की जड़ को पानी दिया जाता है तब उसके तनों, शाखाओं, टहनियों, पत्तियों और फूलों का भी पोषण होता है। जब हम अपने मुख से अन्न का सेवन करते हैं तब यह हमारी प्राण शक्ति और इन्द्रियों को स्वतः पोषित करता है। इसी प्रकार से जब सर्वात्मा भगवान की पूजा की जाती है तब देवता सहित उनके सभी स्वाशों की भी पूजा हो जाती है।" यदि हम वृक्ष की जड़ों की उपेक्षा कर उनकी पत्तियों पर पानी डालते हैं तब वृक्ष सूख जाता है। इस प्रकार देवताओं को अर्पित पूजा निश्चित रूप से भगवान तक पहुँच तो जाती है लेकिन ऐसे भक्तों को आध्यात्मिक लाभ नहीं मिलता। इसका विस्तृत विवरण अगले श्लोक में है।
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च |
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते || 24||
मैं ही समस्त यज्ञों का एक मात्र भोक्ता और स्वामी हूँ लेकिन जो मेरी दिव्य प्रकृति को पहचान नहीं पाते, वे पुनर्जन्म लेते हैं।
श्रीकृष्ण अब देवताओं की पूजा करने के दोषों को समझा रहे हैं। परम प्रभु द्वारा प्रदत्त शक्तियों से देवतागण अपने भक्तों को सांसारिक पदार्थ प्रदान करने में सक्षम होते हैं लेकिन वे अपने भक्तों को जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त नहीं करवा सकते। वे अपने भक्तों को वही दे सकते हैं जो उनके पास होता है। जब स्वर्ग के देवतागण ही 'संसार' अर्थात जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त नहीं होते, तब ऐसी स्थिति में वे अपने भक्तों को इससे कैसे मुक्ति दिला सकते हैं दूसरी ओर जिनका ज्ञान परिपूर्ण होता है वे अपनी समस्त आराधना को श्रद्धापूर्वक भगवान के चरण कमलों पर समर्पित करते हैं और जब उनकी भक्ति परिपक्व अवस्था में पहुँच जाती है तब वे नश्वर संसार से परे भगवान के दिव्य लोक को प्राप्त करते हैं।
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄ न्यान्ति पितृव्रता: |
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।
जो देवताओं की पजा करते हैं वे देवताओं के बीच जन्म लेते हैं। जो पितरों की पूजा करते हैं वे पितरों की योनियों में जन्म लेते है। भूत-प्रेतों की पूजा करने वाले उन्हीं के बीच जन्म लेते है और केवल मेरे भक्त मेरे धाम में प्रवेश करते हैं।
भक्त जिस सत्ता की आराधना करते हैं वे उसके स्तर तक उठ जाते हैं। जैसे किसी पाइप से जल उसी जलाश्य तक पहुँचता है जिससे उसे जोड़ा जाता है। इस श्लोक में विभिन्न सत्ता की आराधना से प्राप्त होने वाले गन्तव्यों की जानकारी द्वारा श्रीकृष्ण हमें इनकी जटिलताओं को समझा रहे हैं। इस जानकारी द्वारा वे हमें यह निर्णय लेने में सहायता प्रदान करते हैं कि आध्यात्मिक उन्नति पर पहुँचने के लिए हमें केवल भगवान की आराधना करनी चाहिए। वर्षा के देवता 'इन्द्र', 'सूर्य', धन के देवता 'कुबेर' और अग्नि देवता आदि की आराधना करने वाले स्वर्गलोक को जाते हैं। उसके बाद जब उनके पुण्य कर्म क्षीण हो जाते हैं तब उन्हें स्वर्ग से लौटा दिया जाता है। पितर हमारे पूर्वज हैं। उनके प्रति कृतज्ञता के विचारों को प्रश्रय देना उत्तम है लेकिन अनावश्यक रूप से उनके कल्याण की चिन्ता हानिकारक होती है। जो पितरों की पूजा करते हैं, वे मृत्यु के पश्चात् अपने पित्तरों के लोक में जाते हैं।
कुछ लोग अज्ञानतावश भूत-प्रेतों की पूजा करते हैं। पाश्चात्य जगत में लोग 'इंद्रजाल' और 'सम्मोहन', अफ्रीका में 'काला जादू' करने वाले और भारत में 'वाम मार्गी तांत्रिक' भूत प्रेतों का आह्वान करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं जो लोग ऐसे कर्मों में लिप्त रहते हैं वे अगला जन्म भूत पिशाचों की योनियों में लेते हैं। परम भक्त वे हैं जो अपना मन भगवान के दिव्य स्वरूप में अनुरक्त कर देते हैं। व्रत का अर्थ संकल्प लेना और वचनबद्ध होना है। ऐसी भाग्यशाली आत्माएँ जो दृढ़संकल्प से भगवान की आराधना करती हैं और जो दृढ़तापूर्वक उनकी भक्ति में लीन रहती हैं वे अगले जन्म में उनके लोक में जाती हैं।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति |
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन: || 26||
यदि कोई मुझे श्रद्धा भक्ति के साथ पत्र, पुष्प, फल या जल ही अर्पित करता है तब मैं प्रसन्नतापूर्वक अपने भक्त द्वारा प्रेमपूर्वक और शुद्ध मानसिक चेतना के साथ अर्पित उस वस्तु को स्वीकार करता हूँ।
परम प्रभु की आराधना के लाभों को प्रतिष्ठित करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब यह समझाते हैं कि किस प्रकार से इसका अनुपालन करना अत्यंत सरल है। देवताओं और पितरों की पूजा में उन्हें संतुष्ट करने हेतु कई विधियाँ निश्चित की गयी हैं जिनका अनिवार्य रूप से अनुपालन करना पड़ता है। लेकिन भगवान उनके भक्तों द्वारा प्रेमपूर्वक शुद्ध हृदय से अर्पित किए गए किसी भी पदार्थ को स्वीकार करते हैं। यदि आपके पास भगवान को अर्पित करने के लिए केवल फल है तब उसे ही अर्पित करने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। यदि फल उपलब्ध नहीं है तो उन्हें पुष्प अर्पित कर सकते हैं। यदि फूलों का मौसम नहीं है तब भगवान को प्रेमपूर्वक उपहार के रूप में पत्ता अर्पित करना ही पर्याप्त होता है। यदि पत्ते मिलने में कठिनाई हो तो जल जो कहीं भी उपलब्ध हो सकता है, अर्पित किया जा सकता है। किन्तु यह अर्पण श्रद्धा भक्ति युक्त होना चाहिए। इस श्लोक में 'भक्त्या' शब्द का प्रयोग पहली एवं दूसरी पंक्ति में किया गया है। भक्त की यह भक्ति ही भगवान को प्रसन्न करती है न कि अर्पित किए गये उपहार का मूल्य। इस अद्भुत कथन द्वारा श्रीकृष्ण भगवान के दिव्य स्वभाव को प्रकट कर रहे हैं। वे अर्पित की गयी भेंट के मूल्य को महत्व नहीं देते। इसके विपरीत वे हमारे भेंट का मूल्य सभी पदार्थों से अधिक आँकते है। इसलिए हरिभक्ति विलास में यह वर्णन किया गया है
तुलसी-दल-मात्रेण जलस्य चुलुकेन च।।
विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सलः।।
(हरिभक्ति विलास-11.261)
"यदि तुम भगवान को निश्छल प्रेम के साथ केवल तुलसी का एक पत्ता और इतना जल जिसे तुम अपनी हथेली पर रख सको, भेंट करते हो तब वे इसके बदले में वे स्वयं को तुम्हें सौंप देंगे क्योंकि वे प्रेम के बंधन में बँध जाते हैं।" यह कितना आश्चर्यजनक है कि अनन्त ब्रह्माण्डों के स्वामी जिनके गुण और विशेषताएँ अत्यंत अद्भुत और वर्णन से परे हैं और जिनके संकल्प मात्र से असंख्य ब्रह्माण्ड उत्पन्न होते हैं, और पुनः नष्ट हो जाते हैं। वे अपने भक्तों द्वारा सच्चे प्रेम के साथ अर्पित की गयी भेंटों को सहर्ष स्वीकार करते हैं। यहाँ प्रयुक्त 'प्रयतात्मनः' शब्द यह सूचित करता है-'मैं उन्ही की भेंट स्वीकार करता हूँ, जिनका हृदय शुद्ध है।" श्रीमद्भागवत में भी ऐसा ही वर्णन किया गया है। अपने महल में अपने प्रिय मित्र सुदामा के सूखे चावल खाते हुए श्रीकृष्ण ने इस प्रकार से कहा
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन ।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.81.4)
"यदि कोई मुझे श्रद्धा भक्ति के साथ पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, तो मैं शुद्ध चेतना युक्त मेरे भक्त द्वारा प्रेम पूर्वक अर्पित किए उस पदार्थ को सहर्ष स्वीकार करता हूँ।"
भगवान जब पृथ्वी पर अवतार लेते हैं तब वे अपनी दिव्य लीलाओं में इन गुणों को प्रदर्शित करते हैं। महाभारत के युद्ध से पूर्व जब श्रीकृष्ण कौरवों और पाण्डवों में समझौता होने की संभावना का पता लगाने हस्तिनापुर गये तब दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को भोजन खिलाने के लिए 56 भोग तैयार करवाए। श्रीकृष्ण उसके आतिथ्य को ठुकराकर और वहाँ भोजन करने के स्थान पर विदुरानी की कुटिया में गये जो उनकी सेवा का अवसर पाने की अभिलाषा कर रही थी। विदुरानी श्रीकृष्ण को अपने घर में देखकर आनन्द से ओत-प्रोत हो गयी। उसने उन्हें केले अर्पित किये, किन्तु उसकी बुद्धि प्रेमभाव से ऐसी स्तंभित हो गयी कि उसे इसका बोध नहीं रहा कि वह केले के फल को नीचे और केले के छिलके श्रीकृष्ण के मुँह में डाल रही थी। फिर भी उसकी भक्ति भावना को देखकर श्रीकृष्ण ने आनन्दपूर्वक केले के छिलकों को ऐसे खाया जैसे कि वे संसार का अति स्वादिष्ट भोजन हो।
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् |
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् || 27||
हे कुन्ती पुत्र! तुम जो भी करते हो, जो भी खाते हो, पवित्र यज्ञाग्नि में जो आहुति डालते हो, जो भी दान देते हो, जो भी तपस्या करते हो, यह सब मुझे अर्पित करते हुए करो।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा कि सभी पदार्थ उन्हें अर्पित करने चाहिए। अब वे कहते हैं कि समस्त कर्म भी उन्हें अर्पित करने चाहिए। कोई भी व्यक्ति अपने जिन सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करता है, जो भी शाकाहारी भोजन ग्रहण करता है, जो भी पदार्थ सेवन करता है, जो भी वैदिक कर्मकाण्ड करता है, जो भी व्रत या तपस्या करता है, उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि वह मानसिक रूप से भी सभी कार्यों को मुझे समर्पित करते हुए करे।
प्राय: लोग भक्ति को अपने दैनिक जीवन से अलग रखते हैं और वे ऐसा समझते हैं कि यह केवल मंदिर के भीतर किया जाने वाला कार्य है। किन्तु भक्ति को केवल मंदिर के प्रांगण तक सीमित न रखकर अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में इसमें तल्लीन होना आवश्यक है। नारद मुनि ने भक्ति की इस प्रकार से व्याख्या की है
नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारता तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति ।।
(नारद भक्तिदर्शन, सूत्र-19)
"भक्ति का तात्पर्य अपने समस्त कर्मों को भगवान को अर्पित करना है और उनका एक क्षण भी विस्मरण होने पर परम व्याकुल होना है।" जब कर्म मानसिक रूप से भगवान को सौंप दिए जाते हैं तब उसे अर्पण कहते हैं। इस मनोवृत्ति से सभी लौकिक कर्म भगवान की दिव्य सेवा में परिवर्तित हो जाते हैं।
स्वामी विवेकानन्द ने भी कर्म के प्रति इस प्रवृत्ति को व्यक्त किया है-"कोई कार्य लौकिक नहीं है। सब कुछ भक्ति और सेवा है।" संत कबीर अपने दोहे में कहते हैं
जहँ जहँ चलुं करूँ परिक्रमा, जो जो करूँ सो सेवा।
जब सोवू करूँ दंडवत, जानें देव न दूजा।।
"मैं जहाँ भी चलता हूँ, मैं यही अनुभव करता हूँ कि मैं भगवान के मंदिर की परिक्रमा कर रहा हूँ। मैं जो भी कर्म करता हूँ उसे मैं भगवान की सेवा के रूप में देखता हूँ। जब मैं सोता हूँ तब मैं इस भाव का ध्यान करता हूँ कि मैं भगवान की आज्ञा का पालन कर रहा हूँ। इस प्रकार मैं भगवान में एकनिष्ठ हो जाता हूँ।" निम्नांकित श्लोक का अभिप्राय समझे बिना मंदिरों में अधिकतर लोग इसका उच्चारण करते हैं।
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्याऽऽत्मना वानुसृतस्वभावात् ।
करोति यद् यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.2.36)
"कोई भी शरीर से, वाणी से, इन्द्रियों से, बुद्धि से, अहंकार से, अनेक जन्मों अथवा एक जन्म की प्रवृत्तियों से स्वभाववशः जो भी करता है वह सब परम प्रभु नारायण को समर्पित करना चाहिए।" किन्तु यह अर्पण कार्य के अंत में केवल मंत्रों के उच्चारण द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। जैसे कि 'श्रीकृष्ण समर्पण मस्तु' आदि मंत्रों का उच्चारण वैदिक अनुष्ठानों में किया जाता है। इस अर्पण को इस चेतना के साथ क्रियान्वित करना चाहिए कि हम जो भी कार्य करते हैं वे सब भगवान के सुख के लिए हैं। यह कहकर कि सभी कार्य भगवान को अर्पित करने चाहिए, अब श्रीकृष्ण इसके लाभों की व्याख्या करेंगे।
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै: |
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि || 28||
इस प्रकार सभी कार्य मुझे समर्पित करते हुए तुम शुभ और अशुभ फलों के बंधन से मुक्त रहोगे। इस वैराग्य द्वारा मन को मुझ में अनुरक्त कर तुम मुक्त होकर मेरे पास आ पाओगे।
सभी कार्य दोषों से युक्त होते हैं, जैसे अग्नि धुएँ से ढकी होती है। जब हम धरती पर चलते है तब हम अनजाने में लाखों अणु जीवों को मारते हैं। अभी भी हम पर्यावरण को दूषित करने और दूसरों को दु:खी करने में लगे रहते हैं। यहाँ तक कि यदि हम एक कटोरी दही का सेवन करते हैं तब भी हम उसमें व्याप्त जीवों को मारने का पाप अर्जित करते हैं। कुछ धर्मों के संत मुँह पर पट्टी बाँध कर अहिंसा को कम करने का प्रयत्न करते हैं किन्तु इसे पूर्ण रूप से समाप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि हमारी श्वासों से भी इन जीवों का विनाश होता है।
कर्म के नियम के अनुसार हमें अपने कर्म का फल भोगना ही पड़ता है। पुण्य कर्म भी बंधन का कारण हैं क्योंकि वे जीवात्मा को अपने कर्मों का फल भोगने के लिए स्वर्ग जाने के लिए विवश करते हैं। इस प्रकार शुभ और अशुभ कर्मों का परिणाम निरन्तर जन्म और मृत्यु के चक्र में घूमना है। फिर भी श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में सभी कर्मों के फलों को नष्ट करने का सरल उपाय बताया है। उन्होंने 'संन्यास योग' शब्द प्रयोग किया है जिसका अर्थ स्वार्थ को त्यागना है। वे कहते हैं कि जब हम अपने कर्मों को भगवान के सुख के लिए समर्पित करते हैं तब हम शुभ और अशुभ परिणामों के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं जो अपने भीतर ऐसी चेतना विकसित कर लेते हैं उन्हें 'योग युक्तात्मा' कहा जाता है। ऐसे योगी जीवन मुक्त हो जाते हैं और नश्वर शरीर को छोड़ने पर उन्हें दिव्य शरीर और भगवान के दिव्य धाम में नित्य सेवा प्राप्त होती है।
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय: |
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् || 29||
मैं समभाव से सभी जीवों के साथ व्यवहार करता हूँ न तो मैं किसी के साथ द्वेष करता हूँ और न ही पक्षपात करता हूँ लेकिन जो भक्त मेरी प्रेममयी भक्ति करते हैं, मैं उनके हृदय में और वे मेरे हृदय में निवास करते हैं।
हम यह मानते हैं कि यदि कोई भगवान है तो वह अवश्य न्यायी होगा क्योंकि कोई भी अन्यायी भगवान नहीं बन सकता। संसार में अन्याय से पीड़ित लोग यह कहते हैं-'करोड़पति महोदय आप के पास धन की शक्ति है। तुम चाहे जो भी कर लो, भगवान ही हमारे विवाद का निर्णय करेगा। वह सब देख रहा है, तुम्हें अवश्य दण्ड देगा। तुम उसके प्रकोप से बच नहीं सकते।' इस प्रकार के कथन यह नहीं दर्शाते कि ऐसा कहने वाला व्यक्ति कोई संत होगा क्योंकि साधारण मनुष्य भी यह विश्वास करते हैं कि भगवान पूर्ण न्यायी है। किन्तु पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण के वचन यह संदेह उत्पन्न करते हैं कि भगवान अपने भक्त का पक्ष लेते हैं। जब सब कुछ कर्म के नियम के अधीन होता है तब फिर भगवान अपने भक्तों को इससे मुक्त क्यों करते हैं? क्या यह पक्षपात का लक्षण नहीं है?
श्रीकृष्ण ने इस विषय को स्पष्ट करना आवश्यक समझते हुए इस श्लोक का आरम्भ 'समोऽहं' शब्द से किया है जिसका अर्थ 'नहीं' है। 'नहीं, नहीं, मैं सबके लिए समान हूँ किन्तु मेरा एक ऐसा नियम है जिसके अन्तर्गत मैं अपनी कृपा बरसाता हूँ।" इस नियम की व्याख्या चौथे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में की गयी है। “हे कुन्ती पुत्र! लोग जिस भाव से मेरे शरणागत होते है, मैं तदानुसार उन्हें प्रतिफल देता हूँ।" वर्षा का जल धरती पर समान रूप से गिरता है। यदि उसकी बूंद किसी खेत पर पड़ती है तब वे अन्न में परिवर्तित हो जाती है। यदि उसकी बूंदें रेगिस्तान की झाड़ी पर पड़ती है तब वह कांटेदार झाड़ी में परिवर्तित हो जाती है। और जब ये बूंदें गंदे नाले में गिरती है तब गंदे पानी में परिवर्तित हो जाती हैं। इस प्रकार वर्षा के जल की ओर से कोई पक्षपात नहीं किया जाता क्योंकि वह भूमि पर अपनी कृपा समान रूप से बरसाती हैं। वर्षा की बूंदों को विभिन्न प्रकार के परिणामों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। ये परिवर्तन प्राप्त करने वाले की प्रकृति के अनुरूप होते हैं। समान रूप से यहाँ भगवान कहते हैं कि मैं सभी प्राणियों के साथ समान व्यवहार करता हूँ किन्तु फिर भी जो उनसे प्रेम नहीं करते वे उनकी कृपा से वंचित रहते हैं क्योंकि उनके अन्तःकरण अशुद्ध होते हैं। श्रीकृष्ण अब भक्ति की शक्ति को बतायेंगे।
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् |
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स: || 30|
यदि कोई महापापी भी अनन्य भक्ति के साथ मेरी उपासना में लीन रहता है तब उसे साधु मानना चाहिए क्योंकि वह अपने संकल्प में दृढ़ रहता है
परम प्रभु के प्रति की जाने वाली भक्ति में इतनी शक्ति होती है कि वह महापापी का भी हृदय परिवर्तित कर देती है। धार्मिक ग्रंथों में इसका उत्तम उदाहरण अजामिल और वाल्मीकि हैं जिनकी कथाएँ प्रायः सभी जगह गायी जाती हैं। वाल्मीकि के पापों की गठरी इतनी भारी थी कि वह दो अक्षर के नाम 'राम' का उच्चारण नहीं कर सका। उसके पाप उसे दिव्य नाम लेने से रोक रहे थे। इसलिए उसके गुरु ने उसे भक्ति में तल्लीन होने का उपाय सुझाते हुए उसे उल्टा नाम 'मरा' जपने को कहा। इसके पीछे यह धारणा थी कि बार बार 'मरा-मरा-मरा-मरा' का उच्चारण करने से 'राम-राम-राम-राम' की ध्वनि स्वतः उत्पन्न होगी। परिणामस्वरूप वाल्मीकि नाम की एक पापात्मा अनन्य भक्ति के परिणामस्वरूप महान संत के रूप में परिवर्तित हो गयी।
उलटा नाम जपत जग जाना।
बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।।
(रामचरितमानस)
"समूचा संसार इस तथ्य का साक्षी है कि भगवान के नाम को उलटे क्रम में उच्चारण करने वाले वाल्मीकि सिद्ध संत कहलाये।" इसलिए पापियों को अनन्त काल तक नरकवास नहीं दिया जाता। भक्ति की शक्ति के संबंध में श्रीकृष्ण उद्घोषणा करते हैं कि यदि महापापी लोग भी भगवान की अनन्य भक्ति करना प्रारम्भ करते हैं तब फिर वे कभी पापी नहीं कहलाते। वे शुद्ध संकल्प धारण कर लेते हैं और इस प्रकार वे धर्मात्मा बन जाते हैं।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति |
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति || 31||
वे शीघ्र धार्मात्मा बन जाते हैं और चिरस्थायी शांति पाते हैं। हे कुन्ती पुत्र! निडर हो कर यह घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी पतन नहीं होता।
केवल उचित संकल्प कर लेने मात्र से भक्त कैसे पूज्य माने जा सकते हैं? श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि यदि वे निरन्तर भगवान की अनन्य भक्ति में अटूट श्रद्धा रखते हैं तब उनका हृदय शुद्ध हो जाएगा और वे सहजता से संतों के गुण विकसित कर लेंगे। दिव्य गुण भगवान से प्रकट होते हैं। वे पूर्णतया न्यायी, सच्चे, करुणामय, प्रिय, दयावान इत्यादि हैं। चूँकि हम जीवात्माएँ उनके अणु अंश हैं इसलिए स्वाभाविक रूप से हम भी इन्हीं गुणों की ओर आकर्षित होते हैं, लेकिन सद्गुणी बनने की प्रक्रिया जटिल ही है। बचपन से हम यह सुनते रहते हैं कि हमें सदा सत्य बोलना चाहिए, दूसरों की सेवा करनी चाहिए और काम क्रोध इत्यादि से मुक्त रहना चाहिए किन्तु फिर भी हम इन शिक्षाओं को व्यावहारिक रूप से अपनाने में असमर्थ रहते हैं। इसका स्पष्ट कारण हमारे मन का अशुद्ध होना है। मन के शुद्धिकरण के बिना दोषों का उन्मूलन पूर्ण रूप से नहीं हो सकता। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने इस दिव्य गुण को विकसित करने के विषय में कहा है -
सत्य अहिंसा आदि मन! बिन हरिभजन न पाय।
जल ते घृत निकले नहीं, कोटिन करिय उपाय।।
(भक्ति शतक-35)
"चाहे कितना भी प्रयत्न क्यों न करें, जल से घी नहीं निकल सकता। उसी प्रकार से सत्य, अहिंसा और अन्य सद्गुण भक्ति में तल्लीन हुए बिना नहीं पाये जा सकते।" ये गुण तभी प्रकट होते हैं जब मन शुद्ध हो जाता है और मन की शुद्धि परम शुद्ध सच्चिदानंद भगवान में अनुरक्त हुए बिना नहीं हो सकती। आगे भगवान अर्जुन को निर्भीक होकर यह घोषणा करने को कहते हैं कि उनके भक्त का कभी पतन नहीं होता। वह यह नहीं कहते कि 'ज्ञानी का पतन नहीं होता और न ही वह यह कहते हैं कि कर्मी (कर्मकाण्ड का पालन करने वाला) का पतन नहीं होता, वे केवल अपने भक्तों को वचन देते हैं कि उनका कभी विनाश नहीं होता।' इस प्रकार वे पुनः वही कहते हैं जो उन्होंने इस अध्याय के बाइसवें श्लोक में कहा है कि वे उनकी अनन्य भक्ति में लीन भक्तों की रक्षा का दायित्व अपने ऊपर लेते हैं। यह भी एक रहस्य सा है कि श्रीकृष्ण यह घोषणा स्वयं करने के स्थान पर अर्जुन को यह घोषणा करने के लिए क्यों कहते हैं? इसका कारण यह है कि विशेष परिस्थितियों में भगवान को कई बार अपना वचन भंग करना पड़ता है किन्तु वह यह नहीं चाहते कि उनका भक्त कभी विवश होकर अपना वचन भंग करे।
उदाहरणार्थ श्रीकृष्ण ने यह संकल्प लिया था कि वे महाभारत के युद्ध के दौरान शस्त्र नहीं उठाएँगे किन्तु जब भीष्म पितामह जिन्हें उनका परम भक्त माना जाता है, ने यह संकल्प लिया कि वह अगले दिन सूर्य अस्त होने तक अर्जुन का वध करेंगे या फिर श्रीकृष्ण को उसकी रक्षा हेतु शस्त्र उठाने के लिए विवश कर देंगे। श्रीकृष्ण ने भीष्म की प्रतिज्ञा की रक्षा हेतु अपने वचन को भंग कर दिया। इसलिए अपने कथन की पुनः पुष्टि के लिए श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं-"अर्जुन तुम यह घोषणा करो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता और मैं तुम्हें आश्वासन देता हूँ कि तुम्हारे वचन का पालन होगा।"
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय: |
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् || 32||
वे सब जो मेरी शरण ग्रहण करते हैं भले ही वे जिस कुल, लिंग, जाति के हों और भले ही समाज से तिरस्कृत ही क्यों न हों, वे परम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।
कुछ जीवात्माओं को ऐसे परिवारों में जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त होता है जहाँ उन्हें बचपन से उच्च आदर्श और सदाचारी जीवनयापन की शिक्षा दी जाती है। यह सौभाग्य पूर्व जन्मों के शुभ कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त होता है। किन्तु कुछ जीवात्माओं को दुर्भाग्य से अपराधियों, जुआरियों और नास्तिकों के परिवारों में जन्म मिलता है। यह दुर्भाग्य भी पूर्व जन्म में किए गए पाप कर्मों के कारण प्राप्त होता है।
यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि किसी भी जाति, लिंग, कुल में जन्म लेने के पश्चात् भी जो उनकी पूर्ण शरणागति प्राप्त करता है वह अपने लक्ष्य को पा लेगा। भक्ति मार्ग की ऐसी महानता है कि सभी लोग इसका पालन करने के योग्य होते हैं जबकि अन्य मार्गों का अनुसरण करने की योग्यता प्राप्त करने हेतु कठोर मापदण्ड निश्चित किए गये हैं। जगद्गुरु शंकराचार्य ने ज्ञान के मार्ग का अनुसरण की पात्रता का वर्णन इस प्रकार से किया है
विवेकिनो विरक्तस्य शमादिगुण-शालिनः।
मुमुक्षोरेव हि ब्रह्मजिज्ञासायोग्यता मताः।।
"केवल वे लोग जो विवेक, विरक्ति, शमादि गुण तथा मुमुक्षा से सम्पन्न होते हैं, उन्हीं लोगों को ज्ञान मार्ग का अनुसरण करने का अधिकारी माना जाता है।" वैदिक कर्मकाण्डों में इसकी पात्रता के लिए छः मापदण्डों का उल्लेख किया गया है। वैदिक कर्मकाण्डों के अनुपालन के लिए निम्नांकित छः मापदण्डों का पालन करना आवश्यक हैः
देशे काले उपायेन द्रव्यं श्रद्धा-समन्वितम्।
पात्रे प्रदीयते यत्तत् सकलं धर्म-लक्ष्णम्।।
"उपयुक्त स्थान, उपयुक्त समय, उपयुक्त प्रक्रिया और मंत्रों का शुद्ध उच्चारण, शुद्ध सामग्री का प्रयोग, यज्ञ करने वाले ब्राह्मण की योग्यता और उसकी दक्षता में पक्का विश्वास होना।" इसी प्रकार से अष्टांग योग के मार्ग के लिए भी कड़े नियम निर्धारित किए गए हैं।
शचौ देशे प्रतिष्ठाप्य
(श्रीमद्भागवतम्-3.28.8)
"हठ योग के अभ्यास हेतु शुद्ध स्थान पर उपयुक्त आसन में स्थिर बैठना आवश्यक है।" इसकी अपेक्षा भक्ति योग एक ऐसा योग है जिसका पालन किसी समय, स्थान, परिस्थितियों और किसी भी सामग्री के साथ किया जा सकता है।
न देश-नियमस्तस्मिन् न काल-नियमस्तथा।।
(पद्मपुराण)
इस श्लोक में वर्णन है कि भगवान भक्ति करने वाले स्थान के संबंध में कोई चिंता नहीं करते। वे केवल हृदय का प्रेम भाव देखते हैं। सभी जीव भगवान की संतान हैं। भगवान अपनी दोनों भुजाओं को फैलाए सभी को स्वीकार करना चाहते हैं यदि हम विशुद्ध प्रेम के साथ उनकी ओर अग्रसर होते हैं।
किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा |
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् || 33||
फिर पुण्य कर्म करने वाले राजर्षियों और धर्मात्मा ज्ञानियों के संबंध में कहना ही क्या है। इसलिए इस अनित्य और आनन्द रहित संसार में आकर मेरी भक्ति में लीन रहो।
यदि अति नृशंस पापी को भी भक्ति मार्ग में सफलता के लिए आश्वस्त किया जाता है तब फिर अधिक पात्रता प्राप्त जीवात्माओं को इस पर संदेह क्यों ही करना चाहिए? राजा और ज्ञानियों को तो अनन्य भक्ति में तल्लीनता द्वारा लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रति और अधिक आश्वस्त होना चाहिए। श्रीकृष्ण अर्जुन को संकेत करते हैं-"तुम जैसे राजर्षि को इस ज्ञान में स्थित होना चाहिए कि संसार अस्थायी और कष्टदायी है। दृढ़ता से मेरी भक्ति में लीन रहो और नित्य असीम आनन्द में मगन रहो अन्यथा राजपरिवार और ऋषि कुलों की उत्तम शिक्षा, सुख सुविधाएँ और अनुकूल परिवेश व्यर्थ हो जाएँगे, यदि तुम इनका उपयोग परम लक्ष्य प्राप्त करने के प्रयोजनार्थ नहीं करते।"
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण: || 34||
सदैव मेरा चिन्तन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो। अपने मन और शरीर को मुझे समर्पित करने से तुम निश्चित रूप से मुझको प्राप्त करोगे।
इस पूरे अध्याय में भक्ति मार्ग का अनुसरण करने पर बल देते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन से उनका भक्त बनने के सुझाव अनुनय-विनय के साथ इसका समापन करते हैं। वे अर्जुन को कहते हैं कि भगवान की भक्ति करते हुए, मन को उनके दिव्य रूप ध्यान में तल्लीन कर और पूर्ण दीनता के भाव से उनके प्रति सच्ची श्रद्धा व्यक्त करते हुए अपनी चेतना को भगवान में एकीकृत करना ही वास्तविक 'योग' है। ‘नमस्कुरु' विनम्रता का ऐसा भाव होता है जो वास्तव में अहंभाव को निष्प्रभावी करता है। यह भाव भक्ति में लीन होने के दौरान उदय होता हैं। इस प्रकार हृदय को भक्ति में निमग्न कर अहंकार रहित होकर मनुष्य को अपने सभी विचारों और कर्मों को भगवान के प्रति समर्पित कर देना चाहिए। श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि भक्ति योग के द्वारा उनके साथ ऐसे पूर्ण समागम के परिणामस्वरूप निश्चित रूप से भगवत्प्राप्ति होती है। इस संबंध में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।
।। श्रीमद्भगवत गीता नवम अध्याय सम्पूर्ण।।
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