॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhagavad Geeta Chapter 8
श्रीमद्भगवद् गीता अष्टम अध्याय
अध्याय आठ: अक्षर ब्रह्म योग
अविनाशी भगवान का योग
यह अध्याय संक्षेप में कुछ महत्वपूर्ण अवधारणाओं का वर्णन करता है जिनका उपनिषदों में विस्तार से उल्लेख किया गया है। इसमें यह वर्णन भी किया गया है कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा के गन्तव्य का निर्धारण किस प्रकार से होता है।
देह का त्याग करते समय यदि हम भगवान का स्मरण करते हैं तब हम निश्चित रूप से उन्हें पा लेंगे। इसलिए अपने दैनिक कार्यों को सम्पन्न करने के साथ-साथ हमें सदैव उनकी विशेषताओं, गुणों और दिव्य लीलाओं का चिन्तन करना चाहिए। जब हम अनन्य भक्ति से अपने मन को भगवान में पूर्णतया तल्लीन कर लेते हैं तब हम भौतिक आयामों से परे आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं। तत्पश्चात् इस अध्याय में भौतिक क्षेत्र में स्थित कुछ लोकों की चर्चा की गयी है। इसमें बताया गया है कि सृष्टि में ये लोक और इन पर निवास करने वाले असंख्य प्राणी कैसे इनमें प्रकट होते हैं और प्रलय के समय पुनः अव्यक्त हो जाते हैं। किन्तु इस व्यक्त और अव्यक्त सृष्टि से परे भगवान का दिव्य लोक है। वे जो प्रकाश के मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे अंततः दिव्यलोक में पहुँचते हैं और फिर कभी नश्वर संसार में लौट कर नहीं आते जबकि अंधकार के मार्ग का अनुसरण करने वाले लोग जन्म, रोग, बुढ़ापे और मृत्यु के चक्रों में घूमते रहते हैं
अर्जुन उवाच |
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम |
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते || 1||
अधियज्ञ: कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन |
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभि: || 2||
अर्जुन ने कहाः हे भगवान! 'ब्रह्म' क्या है? 'अध्यात्म' क्या है और कर्म क्या है? 'अधिभूत' को क्या कहते हैं और 'अधिदैव' किसे कहते हैं? हे मधुसूदन। अधियज्ञ कौन है और यह अधियज्ञ शरीर में कैसे रहता है? हे कृष्ण! दृढ़ मन से आपकी भक्ति में लीन रहने वाले मृत्यु के समय आपको कैसे जान पाते हैं?
सातवें अध्याय का उपसंहार करते समय भगवान ने ब्रह्म, अधिभूत, अध्यात्म, अधिदैव, अधियज्ञ जैसे शब्दों का उल्लेख किया था। अर्जुन इन शब्दों के संबंध में और अधिक जानने के लिए उत्सुक है इसलिए उसने इन दो श्लोकों में सात प्रश्न पूछे हैं। इनमें से छः प्रश्न श्रीकृष्ण द्वारा उल्लिखित शब्दों से संबंधित है। सातवाँ प्रश्न मृत्यु के संबंध में है। श्रीकृष्ण ने स्वयं इस विषय को श्लोक 7.30 में उठाया था। अर्जुन अब यह जानना चाहता है कि मृत्यु के क्षण कोई भगवान का स्मरण कैसे कर सकता है।
श्रीभगवानुवाच |
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते |
भूतभावोद्भवकरो विसर्ग: कर्मसञ्ज्ञित: || 3||
परम कृपालु भगवान ने कहाः परम अविनाशी सत्ता को ब्रह्म कहा जाता है। मनुष्य की अपनी आत्मा को अध्यात्म कहा जाता है। प्राणियों के दैहिक कर्मों और उनकी विकास प्रक्रिया को कर्म या सकाम कर्म कहा जाता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि परम सत्ता को ब्रह्म कहा जाता है। वेदों में भगवान के कई नामों का उल्लेख किया गया है। उनमें से एक नाम ब्रह्म है जो स्थान, समय, घटनाक्रमों और उसके परिणामों तथा कर्म और कर्मफल के बंधनों से परे है। ये सब तो भौतिक संसार के लक्षण हैं जबकि ब्रह्म लौकिक सृष्टि से परे है। वह ब्रह्माण्ड के परिवर्तनों से भी प्रभावित नहीं होता और अविनाशी है। इसलिए इसे अक्षर कहा गया है। बृहदारण्यकोपनिषद् 3.8.8 में ब्रह्म को इसी प्रकार से व्यक्त किया है। विद्वज्जन ब्रह्म को 'अक्षर' कहते हैं। इसे 'परम' नाम भी दिया गया है क्योंकि वह ऐसे गुणों का स्वामी है जो माया और जीवात्मा से परे हैं। आत्मा के विज्ञान को अध्यात्म कहा गया है। किन्तु यहाँ इस शब्द का प्रयोग जीवात्मा के लिए किया गया है जिसमें आत्मा, शरीर, मन और बुद्धि सम्मिलित हैं। कर्म शरीर द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले कार्य हैं जो जीवात्मा को जीवन की विचित्र परिस्थिति में फँसा देते हैं। ये कर्म जीवात्मा को जीवन-मरण के चक्र में डाल देते हैं।
अधिभूतं क्षरो भाव: पुरुषश्चाधिदैवतम् |
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर || 4||
हे देहधारियों में श्रेष्ठ! भौतिक अभिव्यक्ति जो निरन्तर परिवर्तित होती रहती है उसे अधिभूत कहते हैं। भगवान का विश्व रूप जो इस सृष्टि में देवताओं पर भी शासन करता है उसे अधिदैव कहते हैं। सभी प्राणियों के हृदय में स्थित, मैं परमात्मा अधियज्ञ या सभी यज्ञों का स्वामी कहलाता हूँ।
पाँच तत्त्वों-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को मिलाकर बहुरूपदर्शक ब्रह्माण्ड अधिभूत कहलाता है। विराट पुरुष जो भगवान का समस्त भौतिक सृष्टि में व्याप्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय स्वरूप है वह अधिदैव कहलाता हैं, क्योंकि सभी देवताओं पर उसका आधिपत्य है एवं जो ब्रह्माण्ड के विभिन्न कार्यों-विभागों के प्रशासक भी हैं। परम पुरुषोत्तम पुरुष जो सभी जीवों के हृदय में परमात्मा के रूप में निवास करते हैं उन्हें अधियज्ञ कहा जाता है। सभी यज्ञ उनकी संतुष्टि के लिए सम्पन्न किए जाते हैं। इस प्रकार से वे सभी यज्ञों की दिव्यता और प्रतिष्ठा हैं और केवल वही सभी कर्मों का फल प्रदान करते हैं।
इस श्लोक और पिछले श्लोक में अर्जुन के छः प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। आगे कुछ श्लोकों में मृत्यु के क्षण से संबंधित प्रश्नों का उत्तर दिया गया है।
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् |
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय: || 5||
वे जो शरीर त्यागते समय मेरा स्मरण करते हैं, वे मेरे पास आएँगे। इस संबंध में निश्चित रूप से कोई संदेह नहीं है।
अगले श्लोक में श्रीकृष्ण इस सिद्धान्त की व्याख्या करेंगे कि मृत्यु के समय मनुष्य की चेतनावस्था और तन्मयता का भाव उसके अगले जन्म का निर्धारण करता है। इसलिए यदि कोई मृत्यु के समय मन को भगवान के दिव्य नाम, रूप, गुण, लीलाओं और भगवान के लोकों में तल्लीन रखता है तब वह भगवत्प्राप्ति के अपने मनवांछित लक्ष्य को पा लेगा। श्रीकृष्ण ने 'मत्-भावम्' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ 'भगवान जैसी प्रकृति' होने से है। इस प्रकार मृत्यु के समय यदि किसी की चेतना भगवान में लीन होती है तब वह उन्हें पा लेता है और भगवान जैसा बन जाता है।
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् |
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित: || 6||
हे कुन्ती पुत्र! मृत्यु के समय शरीर छोड़ते हुए मनुष्य जिसका स्मरण करता है वह उसी गति को प्राप्त होता है क्योंकि वह सदैव ऐसे चिन्तन में लीन रहता है।
हम एक तोते को 'शुभ प्रभात' बोलने के लिए शिक्षित करने में तो सफल हो सकते हैं किन्तु यदि उसका गला जोर से दबा देते हैं तब वह भूल जाएगा कि उसने कृत्रिम रूप से क्या सीखा है और फिर अपनी स्वाभाविक भाषा में 'कैंऽऽ' बोलेगा। समान रूप से मृत्यु के समय हमारा मन स्वाभाविक रूप से विचारों की शृंखलाओं द्वारा प्रवाहित होता है जो दीर्घकालीन प्रवृत्ति के द्वारा रचित होते हैं। हमारी यात्रा की योजना का निर्णय उस समय नहीं लिया जाता जब यात्रा अगले ही दिन हो बल्कि इसके लिए पहले से सुविचारित योजना और उसके क्रियान्वयन की आवश्यकता होती है।
मृत्यु के क्षण किसी पर जो विचार प्रमुख रूप से हावी होते हैं उसी के अनुसार अगला जन्म निर्धारित होता है। यही सब श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में व्यक्त किया है। कोई व्यक्ति अपनी प्रवृत्तियों और संगत के प्रभाव के अनुसार अपने जीवनकाल में निरन्तर जिसका चिन्तन करता है और जिस पर अपना ध्यान एकाग्र करता है उसी के अनुसार स्वभाविक रूप से उसके अंतिम विचारों का निर्धारण होता है। पुराणों में भरत महाराज की कथा का वर्णन मिलता है। वह एक राजा थे किन्तु उन्होंने राज्य त्याग दिया और तपस्वी के भेष में वन में जाकर भगवत्प्राप्ति के लिए साध ना करने लगे।
एक दिन उन्होंने एक गर्भवती हिरणी को सिंह की गर्जना सुनने पर नदी में छलाँग लगाते हुए देखा। भय के कारण गर्भवती हिरणी ने बच्चे को जल में ही जन्म दिया और वह डूबने लगा। भरत को हिरणी के उस बच्चे पर दया आई और उन्होंने उसे डूबने से बचा लिया। वह उसे अपनी कुटिया में ले आए और उसका पालन-पोषण करने लगे। वह अति अनुराग के साथ उसकी चंचल क्रीड़ाओं का अवलोकन करते हुए प्रसन्न होते और उसके साथ लाड़-प्यार करते। वह उसके लिए घास इकट्ठी करके लाते और प्रेम से उसे खिलाते। उसे गर्म रखने के लिए अपने से चिपटाए रखते। धीरे-धीरे उनका मन भगवान से विमुख होकर हिरणी के उस बच्चे में आसक्त हो गया। यह आसक्ति इतनी गहन हो गयी कि वे पूरे दिन हिरण के बच्चे के स्मरण में खोये रहते और यह चिंता करने लगे कि उनकी मृत्यु के पश्चात् उसका क्या होगा।
परिणामस्वरूप अगले जन्म में भरत महाराज को हिरण का जन्म मिला। किन्तु उन्होंने पूर्व जन्म में आध्यात्मिक साधना कर रखी थी और उन्हें अपने पिछले जन्म की भूल का ज्ञान था। इसलिए हिरण होते हुए भी वह वन में संत पुरुषों के आश्रम के आस-पास ही रहते थे। अन्ततः जब उन्होंने हिरण के शरीर का त्याग किया तो उन्हें पुनः मनुष्य जन्म मिला। फिर वह महान संत जड़ भरत बने और अपनी साधना पूर्ण कर इन्होंने भगवत्प्राप्ति की।
इस श्लोक को पढ़कर किसी को यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि केवल मृत्यु के समय भगवान का ध्यान कर हम उन्हें पा सकते हैं। स्कन्ध पुराण में उल्लेख है कि मृत्यु के क्षणों में भगवान का स्मरण करना अत्यंत कठिन है।
मृत्यु एक पीड़ादायक अनुभव है इसलिए उस समय मन स्वाभाविक रूप से किसी की आंतरिक प्रकृति के अनुसार पूर्व निर्मित विचारों की ओर आकर्षित हो जाता है। मन में भगवान का चिन्तन करने के लिए किसी की आंतरिक प्रकृति का भगवान के साथ एकीकृत होना आवश्यक होता
चेतना आंतरिक प्रकृति है जो किसी के मन और बुद्धि के साथ टिकी रहती है। यदि हम किसी का निरन्तर चिन्तन करते हैं तब वह हमारी आंतरिक प्रकृति के अंश के रूप में प्रकट होता है। अन्तकाल में भगवच्चेतना विकसित करने के लिए जीवन के प्रत्येक क्षण में भगवान का स्मरण और चिन्तन करना आवश्यक है। इन सबका वर्णन श्रीकृष्ण अगले श्लोक में करेंगे।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च |
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् || 7||
इसलिए सदा मेरा स्मरण करो और युद्ध लड़ने के अपने कर्त्तव्य का भी पालन करो, अपना मन और बुद्धि मुझे समर्पित करो तब तुम निचित रूप से मुझे पा लोगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।
इस श्लोक की प्रथम पंक्ति भगवद्गीता के उपदेशों का सार है। इसमें हमारे जीवन को दिव्य बनाने की शक्ति निहित है। यह कर्मयोग की परिभाषा को भी स्पष्ट करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं- "अपने मन को मुझमें अनुरक्त रखो और शरीर से अपने सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते रहो।" यह उपदेश सभी व्यवसाय के लोगों, डॉक्टर, इंजीनियर, अधिवक्ताओं, गृहिणियों पर लागू होता है। विशेष रूप से अर्जुन के संदर्भ में जो एक योद्धा है और युद्ध लड़ना जिसका धर्म है। इसलिए उसे मन भगवान में अनुरक्त कर अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करने का उपदेश दिया गया है। कुछ लोग इस तर्क के आधार पर अपने लौकिक कर्त्तव्यों की उपेक्षा करते हैं कि उन्होंने आध्यात्मिक जीवन धारण कर लिया है। कुछ आध्यात्मिकता के अभ्यास से छुटकारा पाने हेतु सांसारिक कार्य-कलापों में व्यस्त रहने का बहाना करते हैं। लोग यह मानते हैं कि अध्यात्मवाद और भौतिकवाद परस्पर विरोधी हैं। लेकिन भगवान मनुष्य को शुद्धिकरण का उपदेश देते हैं।
जब हम कर्मयोग का अभ्यास करते हैं तब सांसारिक कार्य कोई बाधा उत्पन्न नहीं कर सकते क्योंकि उनमें शरीर ही व्यस्त होता है लेकिन मन भगवान में अनुरक्त होता है। तब ये कार्य किसी को कर्म के नियम में नहीं बाँध सकते। केवल उन्हीं कार्यों के परिणाम होते हैं जिन्हें आसक्ति के साथ किया जाता है। ऐसी आसक्ति न होने पर सांसारिक नियम भी किसी को दोषी नहीं ठहरा सकते। उदाहरणार्थ एक व्यक्ति ने किसी अन्य व्यक्ति को मार डाला और उसे न्यायालय में ले जाया गया। न्यायाधीश ने पूछा-'क्या आपने उस व्यक्ति को मारा?' उस व्यक्ति ने उत्तर दिया-'हाँ मान्यवर! इस मामले में किसी प्रकार के साक्ष्य की आवश्यकता नहीं है। मैं स्वीकार करता हूँ कि मैने उस व्यक्ति को मारा।' न्यायाधीश ने कहा 'तुम्हें दण्ड मिलना चाहिए।' 'नहीं मान्यवर! आप मुझे दण्डित नहीं कर सकते' न्यायाधीश ने पूछा क्यों? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया-'मेरा उसे मारने का कोई प्रयोजन नहीं था। मैं सड़क पर उचित दिशा में निर्धारित गति सीमा में कार चला रहा था और मेरी दृष्टि सामने की ओर ही थी। मेरी कार के ब्रेक, स्टेयरिंग आदि सब कुछ ठीक थे। वह व्यक्ति अचानक सामने आकर मेरी कार से टकरा गया तब उस स्थिति में मैं क्या कर सकता था।' यदि आरोपी व्यक्ति का वकील यह सिद्ध कर दे कि उस दुर्घटना में हत्या का कोई इरादा नहीं था तब न्यायाधीश उस व्यक्ति को बिना कोई साधारण दण्ड दिए आरोप मुक्त कर देगा।
उपर्युक्त उदाहरण के अनुसार भौतिक जगत में भी हमें उन कार्यों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता जिन्हें हम बिना आसक्ति के सम्पन्न करते हैं। कर्म नियम के लिए भी समान सिद्धान्त लागू होता है। इसलिए महाभारत के युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण के उपदेशों का अनुसरण करते हुए अर्जुन ने युद्ध क्षेत्र में अपने कर्त्तव्य का निर्वहन किया। युद्ध समाप्त होने पर श्रीकृष्ण ने कहा कि अर्जुन ने कोई पाप कर्म नहीं किया। वह कर्म बंधन में तब उलझ गया होता जब वह आसक्ति सहित सांसारिक सुखों और यश प्राप्ति के लिए युद्ध कर रहा होता। चूँकि उसका मन श्रीकृष्ण में अनुरक्त था और इसलिए वह जो कर रहा था वह शून्य को गुना करने के समान था। इसका तात्पर्य संसार में आसक्ति रहित अपने कर्तव्य का पालन करना है। अगर हम 10 लाख को शून्य से गुणा करते हैं तब उसका उत्तर शून्य ही होगा।
इस श्लोक में कर्मयोग की अति स्पष्ट व्याख्या की गयी है जिसके अनुसार मन को निरन्तर भगवान के चिन्तन में तल्लीन रखना चाहिए। जिस क्षण मन भगवान को विस्मृत कर देता है उस समय माया की सेना के बड़े-बड़े सेना नायक काम, क्रोध, ईष्या, द्वेष, आदि उस पर आक्रमण कर देते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि मन सदैव भगवान में अनुरक्त रहे। प्रायः लोग कर्मयोगी होने का दावा करते हैं क्योंकि वे कहते हैं कि वे कर्म और योग दोनों का पालन करते हैं। पूरे दिन में अधिकांश समय वे कार्य करते हैं और कुछ क्षणों के लिए योग (भगवान की साधना) करते हैं। किन्तु यह श्रीकृष्ण द्वारा दी गयी कर्मयोग की परिभाषा नहीं है। वे कहते हैं-(1) कार्य करते समय भी मन को भगवान के चिन्तन में लगाया जाना चाहिए। (2) भगवान का स्मरण रुक-रुक कर नहीं होना चाहिए बल्कि निरन्तर किया जाना चाहिए। संत कबीर ने अपने प्रसिद्ध दोहे में इसे इस प्रकार से व्यक्त किया है-
सुमिरन की सुधि यों करो, ज्यौं गागर पनिहार।
बोलत डोलत सुरति में, कहे कबीर विचार ।।
भगवान का स्मरण उसी प्रकार से करो, जैसे कि गाँव की महिलाएँ सिर पर रखे मटके का करती हैं। वे परस्पर वार्तालाप करते हुए अपने मार्ग पर आगे बढ़ती जाती हैं लेकिन उनका मन सिर पर उठाए हुए मटके पर केन्द्रित रहता है। श्रीकृष्ण कर्म योग के पालन के लाभों का वर्णन अगले श्लोक में करेंगे।
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना |
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् || 8||
हे पार्थ! अभ्यास के द्वारा जब तुम अविचलित भाव से मन को मुझ पुरुषोत्तम भगवान के स्मरण में लीन करोगे तब तुम निश्चित रूप से मुझे पा लोगे।
मन को सदैव भगवान की साधना में तल्लीन रखने का उपदेश गीता में अनेक बार दोहराया गया है। यहाँ इस संबंध में कुछ श्लोक निम्नांकित हैं-
1. अनन्यचेताः सततं 8.14
2. मय्येव मन आधत्स्व 12.8
3. तेषां सततयुक्तानां 10.10
अभ्यास शब्द से तात्पर्य मन को भगवान की साधना में अभ्यस्त करने से है। ऐसा अभ्यास केवल निर्धारित समय पर नहीं किया जाना चाहिए अपितु निरन्तर दैनिक जीवन के कार्य कलापों के साथ करना चाहिए। यदि मन भगवान में अनुरक्त हो जाता है तब सांसारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए भी मन शुद्ध हो जाता है। यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि हम अपने मन में जो सोचते हैं उसी से हमारे भविष्य का निर्माण होता है न कि शरीर से सम्पन्न की गयी गतिविधियों द्वारा। यह मन ही है जिसे भक्ति में तल्लीन होना है और मन को ही भगवान के प्रति शरणागत होना है। जब चेतना का पूर्ण रूप से भगवान में समावेश हो जाता है तभी कोई दिव्य कृपा प्राप्त करेगा। भगवान की कृपा प्राप्त कर ही कोई माया के बंधनों से मुक्त हो पाएगा। असीम दिव्य आनंद, दिव्य ज्ञान और दिव्य प्रेम प्राप्त करेगा। ऐसी पुण्य आत्मा इसी शरीर में भगवद्प्राप्ति कर लेगी और शरीर त्यागने पर भगवान के लोक में प्रवेश करेगी।
कविं पुराणमनुशासितार
मणोरणीयांसमनुस्मरेद्य: |
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप
मादित्यवर्णं तमस: परस्तात् || 9||
प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव |
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् || 10||
भगवान सर्वज्ञ, आदि पुरुष, नियन्ता, सूक्ष्म से सूक्ष्मतम, सबका पालक, अज्ञानता के सभी अंधकारों से परे और सूर्य से अधिक तेजवान हैं और अचिंतनीय दिव्य स्वरूप के स्वामी हैं। मृत्यु के समय जो मनुष्य योग के अभ्यास द्वारा स्थिर मन के साथ अपने प्राणों को भौहों के मध्य स्थित कर लेता है और दृढ़तापूर्वक पूर्ण भक्ति से दिव्य भगवान का स्मरण करता है वह निश्चित रूप से उन्हें पा लेता है।
भगवान का ध्यान विभिन्न प्रकार से किया जा सकता है। कोई भगवान के नाम, रूप, गुण लीला धाम और भगवान के संतों का ध्यान कर सकता है। इस प्रकार से ये विभिन्न स्वरूप परम दैवत्य स्वरूप भगवान से किसी भी दृष्टि से अलग नहीं हैं। जब हमारा मन इनमें से किसी पर भी अनुरक्त हो जाता है तब हम भगवान के दिव्य क्षेत्र में प्रवेश करते हैं और हमारा मन शुद्ध हो जाता है। इसलिए इन सब में से किसी को भी ध्यान का लक्ष्य बनाया जा सकता है। इस श्लोक में भगवान के आठ गुणों का वर्णन किया गया है जिन पर मन को एकाग्र किया जा सकता है।
कवि का अर्थ कवि या संत हैं और इसका व्यापक अर्थ सर्वज्ञ है। जैसा कि श्लोक सं 7.26 में व्यक्त किया गया है कि भगवान भूत, वर्तमान और भविष्य को जानते हैं।
पुराण का अर्थ है - अनादि अर्थात् जिसका कोई आरम्भ नहीं है और जो सबसे पहले है। भगवान सभी प्रकार की भौतिकता और आध्यात्मिकता के मूल हैं। ऐसा कुछ नहीं है जिससे उनका जन्म हुआ हो। कुछ भी उनके पहले का नहीं है।
अनुशासितारम् का अर्थ 'शासक' है। भगवान ही सृष्टि के नियमों के नियामक हैं। वे ब्रह्माण्ड का संचालन करते हैं। इस प्रकार से सब कुछ उनके शासन के आधीन है। स्वयं प्रत्यक्ष रूप से और अपने द्वारा नियुक्त देवताओं के माध्यम से वे अप्रत्यक्ष रूप से ब्रह्माण्ड का संचालन करते हैं।
अणोरणीयान् का अर्थ सूक्ष्म से सूक्ष्मतम हैं। आत्मा पदार्थ से सूक्ष्म है किन्तु भगवान उस आत्मा में वास करते हैं और इसलिए वे सूक्ष्मतम हैं।
सर्वस्य धाता का अर्थ सबका पालनकर्ता है, जैसे समुद्र लहरों का धाता है।
अचिन्त्य रूप का अर्थ कल्पनातीत रूप का होना है क्योंकि हमारा मन केवल लौकिक रूपों को समझ सकता है। भगवान हमारे मायिक मन की परिधि से परे हैं किन्तु यदि वे अपनी कृपा प्रदान कर दें तब वे अपनी योगमाया की शक्ति से हमारे मन को दिव्य बना सकते हैं। अत: केवल उनकी कृपा से उन्हें समझा जा सकता है।
आदित्य वर्णम् का अर्थ सूर्य के समान तेजस्वी होने से है।
तमसः परस्तात् से तात्पर्य अंधकार से परे होना है। जिस प्रकार से सूर्य को कभी बादलों से आच्छादित नहीं किया जा सकता किन्तु फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि बादलों से ढकने के कारण सूर्य हमारी दृष्टि से ओझल हो गया है। समान रूप से यद्यपि भगवान संसार में माया शक्ति से युक्त रहते हैं तथापि भगवान को माया शक्ति से आच्छादित नहीं किया जा सकता।
भक्ति में मन को भगवान के दिव्य रूपों, गुणों और लीलाओं आदि में केन्द्रित करना होता है। जब भक्ति केवल मन से की जाती है तब इसे शुद्ध भक्ति कहते हैं। जब भक्ति अष्टांग योग के साथ की जाती है तब इसे योग मिश्रित भक्ति कहते हैं। श्लोक 10 से 13 तक श्रीकृष्ण योग मिश्रित भक्ति का वर्णन करेंगे। भगवद्गीता का ऐसा वैलक्षण्य है कि इसमें विविध प्रकार की साधनाओं को सम्मिलित किया गया है। इस प्रकार से यह विभिन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों और व्यक्तित्वों का परिचय देते हुए उन्हें अपने में अन्तर्निहित करती है। जब पश्चिमी विद्वान बिना गुरु की सहायता के हिन्दू धार्मिक ग्रंथ को पढ़ने का प्रयास करते हैं तब वे प्रायः विभिन्न धर्म शास्त्रों में वर्णित विभिन्न प्रकार के मार्गों, उपदेशों और दार्शनिक विचारधाराओं के कारण विचलित हो जाते हैं। किन्तु वास्तव में यह विविधता एक प्रकार का वरदान है क्योंकि अनन्त जन्मों के संस्कारों के कारण हम सब की प्रकृति भिन्न-भिन्न होती हैं। जब चार लोग अपने लिए कपड़ा खरीदने जाते हैं तब वे अपनी-अपनी पसंद के अनुसार विभिन्न प्रकार के रंगों, ढंगों और फैशन के कपड़ों का चयन करते हैं। यदि किसी दुकान पर केवल एक ही रंग और फैशन के कपड़े हों तब यह मानव प्रकृति की विविधताओं का अपमान होगा। समान रूप से अध्यात्म मार्ग में भी लोग अपने पूर्व जन्मों की विभिन्न साधना पद्धतियों के अनुसार साधना करते हैं। वैदिक ग्रंथों में इन विविधताओं को समाविष्ट किया गया है और साथ ही साथ भगवान की भक्ति करने पर बल दिया गया है जो इन सभी को एक साथ बाँधे रखती है।
अष्टांग योग में मेरूदण्ड में स्थित सुषुम्ना नाड़ी द्वारा प्राण शक्ति को ऊपर तक बढ़ाया जाता है। इसे भौहों के मध्य लाया जाता है जो तीसरे नेत्र का क्षेत्र अर्थात् आंतरिक दृष्टि का क्षेत्र है। तब बाद में मन को भक्ति के साथ परमात्मा पर केन्द्रित किया जाता है।
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागा: |
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये || 11||
वेदों के ज्ञाता उसका वर्णन अविनाशी के रूप में करते हैं। महान तपस्वी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं और उसमें स्थित होने के लिए सांसारिक सुखों का त्याग करते हैं। मैं तुम्हें इस मुक्ति के मार्ग के संबंध में संक्षेप में बताऊंगा।
वेदों में भगवान के अनेक नामों का उल्लेख किया गया है। जिनमें से कुछ नाम सत्, अव्याकृत प्राण, इन्द्र, देव, ब्राह्मण, भगवान, पुरुष इत्यादि हैं। विभिन्न स्थानों पर भगवान के निराकार रूप के लिए उसे अक्षर नाम से भी पुकारा जाता है। अक्षर शब्द का अर्थ अविनाशी है-
बृहदारण्यकोपनिषद् में वर्णन है
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्यचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः।
(बृहदारण्यकोपनिषद्-3.8.9)
"अविनाशी भगवान के नियंत्रण में सूर्य और चन्द्रमा अपनी कक्षा में घूमते रहते हैं।" इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने भगवान का निराकार रूप प्राप्त करने के लिए योग मिश्रित भक्ति का वर्णन किया है। संग्रहेण शब्द का अर्थ 'संक्षेप' है। वे इस पथ का वर्णन विस्तार से करने की अपेक्षा संक्षेप में करते हैं क्योंकि यह मार्ग सबके लिए उपयुक्त नहीं है।
इस पथ का पालन करने के लिए मनुष्य को कठोर तपस्या करनी पड़ती है। सांसारिक कामनाओं का त्याग करना पड़ता है, कठिन आत्म संयमित जीवन निर्वाह करना पड़ता है तथा ब्रह्मचर्य के व्रत का पालन करना पड़ता है। इसके द्वारा मनुष्य की शारीरिक ऊर्जा संरक्षित हो जाती है और फिर वह साधना के माध्यम से आध्यात्मिक शक्ति में परिवर्तित हो जाती है। ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले साधक की स्मरण शक्ति बढ़ती है और उसकी बुद्धि आध्यात्मिक विषयों को समझने में समर्थ हो जाती है। इसका विस्तृत वर्णन पहले ही श्लोक 6.14 में किया गया है।
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च |
मूर्ध्न्याधायात्मन: प्राणमास्थितो योगधारणाम् || 12||
शरीर के समस्त द्वारों को बंद कर मन को हृदय स्थल पर स्थिर करते हुए और प्राण वायु को सिर पर केन्द्रित करते हुए मनुष्य को दृढ़ यौगिक चिन्तन में स्थित हो जाना चाहिए।
इन्द्रियों के माध्यम से मन संसार में प्रवेश करता है। हम सबसे पहले देखते सुनते, स्पर्श करते हैं और स्वाद लेते हैं तथा पदार्थों की गंध ग्रहण करते हैं। तब मन इन पदार्थों में प्रविष्ट हो जाता है। बार-बार चिन्तन से आसक्ति उत्पन्न होती है जिससे पुनः मन में विचारों की पुनरावृति उत्पन्न होती रहती है। इसलिए संसार को मन के बाहर रोके रखने के लिए इन्द्रियों पर संयम रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह व्यक्ति जो इस बिन्दु की उपेक्षा करता है उसे निरन्तर अनियंत्रित इन्द्रियों द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले संसारिक विचारों की धारा से जूझना पड़ता है। इसलिए श्रीकृष्ण यह उपदेश देते हैं कि अपने शरीर के द्वारों की रक्षा करो। 'सर्वद्वाराणि संयम्य' का अर्थ–'उन छिद्रों को नियंत्रित करना है जो शरीर में प्रवेश करते हैं।' इसका तात्पर्य इन्द्रियों की सामान्य बहिर्गामी प्रवृत्तियों को प्रतिबंधित करना है। 'हृदि निरुध्य' शब्द का अर्थ 'मन को हृदय में स्थित करना है।' इसका तात्पर्य मन के विचारों को 'अक्षरम्', अविनाशी परमात्मा की ओर आकर्षित करने का निर्देश देने से है। योगधारणाम् का अर्थ 'अपनी चेतना को भगवान के साथ जोड़ना है' जिसका तात्पर्य पूर्ण मनोयोग के साथ भगवान का ध्यान करने से है।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् |
य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् || 13||
जो देह त्यागते समय मेरा स्मरण करता है और पवित्र अक्षर ओम् का उच्चारण करता है वह परम गति को प्राप्त करता है।
पवित्र अक्षर ओम् को प्रणव भी कहा जाता है जो भगवान के निर्विशेष, निर्गुण निराकार अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए इसे भगवान के समान अविनाशी माना जाता है। चूँकि श्रीकृष्ण अष्टांग योग साधना के संदर्भ में साधना की क्रिया का वर्णन कर रहे हैं वे कहते हैं कि तपस्या और ब्रह्मचर्य व्रत का अभ्यास करते हुए साधक को अपना मन केन्द्रित करने के लिए पवित्र शब्द ओम् का उच्चारण करना चाहिए। वैदिक साहित्य में भी ओम शब्द को 'अनाहत नाद' कहा गया है। यह वह ध्वनि है जो समूची सृष्टि में व्याप्त रहती है और इसे योगी ही सुन सकते हैं।
बाइबिल में कहा गया है, "आरम्भ में शब्द था और शब्द भगवान के साथ था और शब्द भगवान था।" (जॉन-1.1) वैदिक ग्रंथों में वर्णन है कि भगवान ने सर्वप्रथम शब्द उत्पन्न किया और शब्द से आकाश और फिर इसके पश्चात् सृष्टि की प्रक्रिया आरम्भ की। मूल शब्द 'ओम्' था। इसलिए वैदिक दर्शन में इसे अत्यधिक महत्व दिया गया है। इसे महावाक्य या वेदों की महान स्पंदन ध्वनि कहा गया है। इसे बीज मंत्र भी कहा जाता है क्योंकि प्रायः इसका उच्चारण वैदिक मंत्रों जैसे ह्रीं, क्लीं इत्यादि वेदों मंत्रों के प्रारम्भ में किया जाता है। 'ओम्' शब्द तीन अक्षरों अ-उ-म् से निर्मित है। ओम् का शुद्ध उच्चारण हमें अपनी नाभि और खुले गले और मुख से 'अ' की ध्वनि उत्पन्न कर आरम्भ करना चाहिए। 'उ' ध्वनि मुँह के मध्य से उच्चारित होती है, और अंतिम अनुक्रम में मुँह को बंद कर 'म्' का उच्चारण किया जाता है।
ओम् के उच्चारण अ-उ-म् के तीनों वर्गों के अनेक अर्थ और व्याख्याएँ हैं। भक्तों के लिए ओम् भगवान के निराकार स्वरूप का नाम है।
प्रणव शब्द अष्टांग योग साधना का लक्ष्य है। भक्ति योग के मार्ग के भक्त भगवान के नामों जैसे-राम, कृष्ण, आदि का उच्चारण कर साधना करना पसंद करते हैं क्योंकि भगवान का अनन्त आनंद इन विशिष्ट नामों में व्याप्त होता है। इनका भेद गर्भ में पल रहे बच्चे और गोद में लिए हुए बालक जैसा होता है। गोद में उठाए हुए बच्चे का सुखद अनुभव गर्भ में पल रहे बच्चे की अपेक्षा अधिक होता है। हमारी साधना की अंतिम परीक्षा मृत्यु के समय पर होती है। वे लोग जो अपनी चेतना को भगवान पर स्थिर करने के योग्य हो जाते हैं, वे मृत्यु के समय घोर पीड़ा सहने पर भी इस परीक्षा में उत्तीर्ण होते हैं। ऐसे लोग शरीर त्याग कर परम धाम को प्राप्त करते हैं। यह सब अत्यंत कठिन है और इसके लिए जीवनपर्यन्त अभ्यास करना आवश्यक होता है। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण ऐसी प्रवीणता प्राप्त करने के लिए सरल उपाय की व्याख्या करेंगे।
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश: |
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन: || 14||
हे पार्थ! जो योगी अनन्य भक्ति भाव से सदैव मेरा चिन्तन करते हैं, उनके लिए मैं सरलता से सुलभ रहता हूँ क्योंकि वे निरन्तर मेरी भक्ति में तल्लीन रहते हैं।
पूरी भगवद्गीता में श्रीकृष्ण बारम्बार भक्ति की महत्ता पर बल देते हैं। पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने भगवान के निराकार स्वरूप और निर्गुण साधना को प्रतिपादित किया है। जो केवल नीरस ही नहीं अपितु अत्यंत कठिन भी है। इसलिए अब वे सरल विकल्प को अभिव्यक्त कर रहे हैं जो भगवान के दिव्य साकार रूप जैसे कृष्ण, राम, शिव, विष्णु इत्यादि हैं। इनमें भगवान का नाम, रूप, गुण, लीला, धाम और उनके परम दिव्य स्वरूप युक्त संत सम्मिलित हैं। पूरी गीता में केवल यही एक श्लोक है जिसमें श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्हें पाना सरल है किन्तु इसकी शर्तों के संबंध में 'अनन्यचेताः' अर्थात् 'कोई अन्य नहीं' शब्द कहा गया है जिसका अर्थ है कि मन अनन्यता से केवल उनमें तल्लीन रहना चाहिए। अनन्य शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। व्युत्पत्ति विज्ञान में इसका अर्थ 'न अन्य, या कोई अन्य नहीं है। अर्थात् मन भगवान के अलावा किसी और में आसक्त नहीं होना चाहिए। इस अनन्यता की शर्त को भगवद् गीता में बार-बार दोहराया गया है। अनन्याश्चिन्तयन्तो मां (9.22), तमेव शरणं गच्छ (18.62), मामेकं शरणं व्रज। (18.66)
अन्य वैदिक ग्रंथों में भी अनन्य भक्ति के महत्त्व पर बल दिया गया है।
"मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम्।"
(श्रीमदभागवतम्-11.12.15)
"तुम सब प्राणियों के आत्मस्वरूप मुझे एक परमात्मा की ही शरण ग्रहण करो।"
एक भरोसो एक बल एक आस विस्वास।
(रामाचरितमानस)
"मेरा केवल एक सहायक, एक सामर्थ्य, एक विश्वास और शरण श्री राम है"
अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता ।।
(नारद भक्ति दर्शन सूत्र-10)
"भगवान को छोड़कर दूसरे आश्रयों के त्याग का नाम अनन्यता है।"
अनन्य भक्ति से तात्पर्य यह है कि केवल भगवान के नाम, रूप, गुण, लीला, धाम और भगवान के संतों के प्रति ही मन की आसक्ति होनी चाहिए। इसका तर्क अत्यंत सरल है। साधना का उद्देश्य मन को शुद्ध करना है और यह केवल मन को पूर्ण शुद्धात्मा भगवान में अनुरक्त करने पर ही संभव है। किन्तु यदि हम भगवान का चिन्तन कर मन को शुद्ध करते हैं और फिर सांसारिकता में डूब कर उसे पुनः मलिन कर देते हैं, तब चाहे हम कितनी अवधि तक ही क्यों न प्रयास करें, हम कभी इसे शुद्ध नहीं कर सकते।
इस प्रकार की भूल प्रायः कई लोग करते हैं। वे भगवान से प्रेम करते हैं और संसार के लोगों और पदार्थों में भी आसक्त रहते हैं। साधना भक्ति द्वारा वे जो कुछ भी आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करते हैं वह सब सांसारिक आसक्ति के कारण दूषित हो जाता है। यदि हम साबुन से कपड़ों को साफ करते हैं किन्तु साथ ही साथ उन पर गंदगी डालते हैं तब हमारा प्रयास व्यर्थ हो जाएगा। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि केवल भक्ति नहीं अपितु उनके प्रति अनन्य भक्ति से ही वे सरलता से प्राप्त होते हैं।
मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयमशाश्वतम् |
नाप्नुवन्ति महात्मान: संसिद्धिं परमां गता: || 15||
मुझे प्राप्त कर महान आत्माएँ फिर कभी इस संसार में पुनः जन्म नहीं लेतीं जो अनित्यऔर दु:खों से भरा है। वे पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर चुकी होती हैं।
भगवत्प्राप्ति का परिणाम क्या होता है। वे सिद्ध पुरुष जो भगवत्पारायण हो जाते हैं, वे जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं और भगवान के परमधाम में प्रवेश करते हैं। इसलिए वे दु:खों से परिपूर्ण मायाबद्ध संसार में पुनः जन्म नहीं लेते। हम जन्म की कष्टदायी प्रक्रिया को सहन करते हैं और असहाय होकर चिल्लाते हैं। शिशु के रूप में जब हमें किसी ऐसी वस्तु की आवश्यकता होती है जिसे हम बोलकर व्यक्त नहीं कर सकते तो उसे पाने के लिए हम रोते हैं। युवावस्था में दैहिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए हमें संघर्ष करना पड़ता है जिससे हमें मानसिक कष्ट झेलने पड़ते हैं। वैवाहिक जीवन में हमें अपनी जीवन संगिनी के स्वभाव से जूझना पड़ता है। जब हम वृद्धावस्था में आते हैं तब हमें शारीरिक दुर्बलता को सहन करना पड़ता है। जीवन भर हमें मानसिक और शारीरिक कष्टों का सामना करना पड़ता है, दूसरों के व्यवहार और प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझना पड़ता है। अन्त में हमें मृत्यु की पीड़ा सहनी पड़ती है। यह सब दु:ख निरर्थक नहीं है अपितु इनका उद्देश्य भगवान की सृष्टि संचालन की व्यापक अभिकल्पना पर ध्यान से विचार करना है। ये हमें अनुभव कराते हैं कि भौतिक जगत हमारा स्थायी निवास नहीं है अपितु हम जीवात्माओं के लिए सुधार गृह है जो भगवान की ओर पीठ किए हुए हैं अर्थात् भगवान से विमुख हैं। यदि हम इस संसार के दु:खों को सहन नहीं करते तब फिर हमारे भीतर भगवान को पाने की इच्छा कभी विकसित नहीं हो सकती।
उदाहरणार्थ यदि हम आग में अपना हाथ डालते हैं तब इसके दो परिणाम होंगे-हमारी त्वचा जलने लगती है और हमारी स्नायु कोशिका मस्तिष्क में पीड़ा की अनुभूति उत्पन्न करती है। त्वचा का जलना अप्रिय घटना है किन्तु यह पीड़ा की अनुभूति अच्छी होती है। यदि हम पीड़ा का अनुभव नहीं करते तब फिर हम आग से हाथ बाहर नहीं निकालते और फिर हमें अत्यंत क्षति सहन करनी पड़ती। पीड़ा यह संकेत करती है कि कुछ गड़बड़ है जिसे सुधारना आवश्यक है। समान रूप से भौतिक जगत में जिन कष्टों को हम झेलते हैं, वे भगवान की ओर से प्राप्त होने वाले संकेत हैं जो यह बोध कराते हैं कि हमारी चेतना दूषित है और हमें अपनी लौकिक चेतना को उन्नत कर उसे भगवान के साथ एकीकृत करना चाहिए। अंततः अपने उत्तम प्रयासों के माध्यम से हम अपनी पसंद के पदार्थों को प्राप्त करने में समर्थ हो सकते हैं। वे लोग जो अपनी चेतना को भगवान से विमुख रखते हैं वे निरन्तर जन्म और मृत्यु के चक्कर में घूमते रहते हैं और जो भगवान की अनन्य भक्ति करते हैं वे उनका परमधाम प्राप्त करते हैं।
आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन |
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते || 16||
हे अर्जुन! इस भौतिक सृष्टि के सभी लोकों में ब्रह्मा के उच्च लोक तक जाकर भी तुम्हें पुनर्जन्म प्राप्त होगा। हे कुन्ती पुत्र! परन्तु मेरा धाम प्राप्त करने पर फिर आगे पुनर्जन्म नहीं होता।
वैदिक ग्रंथों में पृथ्वी लोक से नीचे सात लोकों-तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल,और पाताल के अस्तित्व का वर्णन किया गया है। इन सबको नरक या नरक लोक कहा जाता है। पृथ्वी लोक से आरम्भ होकर इसके उपर सात लोक-भूः, भूव:, स्व:, मह:, जनः, तपः, और सत्य: लोक अस्तित्व में हैं। इन सबको 'स्वर्ग' या 'देवलोक' भी कहा जाता है। अन्य धार्मिक परंपराओं में भी सात स्वर्गों का वर्णन मिलता है। यहूदी धर्म के तलमुड ग्रंथ में अराबोथ नाम के उच्च लोक सहित सात स्वर्गों का उल्लेख किया गया है (सॉल्म-68.4)। इस्लाम में भी सात स्वर्ग लोकों का उल्लेख किया गया है जिसमें 'सातवाँ आसमान' की गणना सबसे उच्च लोक के रूप में की गई है। सृष्टि में भिन्न-भिन्न ग्रह जिनका अस्तिव है, उन्हें विभिन्न लोक कहा गया है। हमारे भौतिक ब्रह्माण्ड में 14 लोक हैं। इसमें सबसे उच्चतम ब्रह्मा का लोक है जिसे ब्रह्मलोक कहा जाता है। इन सभी लोकों में माया का प्रभुत्व रहता है। इन लोकों के निवासी जन्म-मृत्यु के चक्र के अधीन होते हैं। श्रीकृष्ण ने पिछले श्लोक में इन्हें 'दुःखालयम् और अशाश्वतम्' अस्थायी एवं दुखों से भरा कहा है। यहाँ तक कि स्वर्ग के राजा की भी एक दिन मृत्यु होती है। पुराणों में वर्णन है कि एक बार इन्द्र ने देवलोक के अभियन्ता विश्वकर्मा को भव्य महल का निर्माण करने का कार्य सौंपा। इस महल के निर्माण का कार्य पूर्ण नहीं हो रहा था इसलिए थक-हार कर विश्वकर्मा ने भगवान से सहायता करने की प्रार्थना की। भगवान ने वहाँ प्रकट होकर इन्द्र से पूछा कि इस भव्य महल के निर्माण में कितने विश्वकर्मा लगाए गए हैं। इन्द्र ने चकित होकर इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा-"मेरे विचार से केवल एक ही विश्वकर्मा है।" भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा-"इस ब्रह्माण्ड सहित ऐसे 14 लोक हैं और सृष्टि में अनन्त ब्रह्माण्ड हैं और सभी में एक इन्द्र और एक विश्वकर्मा हैं।"
तत्पश्चात् इन्द्र ने उसकी ओर बढ़ती हुई चीटियों की पंक्ति देखी। वह आश्चर्यचकित होकर कहने लगा कि इतनी बड़ी संख्या में चीटियाँ कहाँ से आई। भगवान ने कहा-मैंने उन सब आत्माओं को बुलाया है जो पूर्वजन्म में इन्द्र थी और ये सब अब चींटियों के शरीर में हैं। इन्द्र उनकी विशाल संख्या देखकर चकित हो गया। कुछ समय पश्चात् वहाँ पर लोमश ऋषि प्रकट हुए। उन्होंने अपने सिर पर चटाई रखी हुई थी और उनके वक्ष स्थल पर बालों का एक चक्र था। उस चक्र से कुछ बाल गिरे हुए थे जिससे चक्र में कहीं-कहीं रिक्त स्थान दिखाई दे रहा था। इन्द्र ने ऋषि का स्वागत किया और उनसे विनम्रतापूर्वक पूछा-" श्रीमान् आपने सिर पर पूस की चटाई क्यों रखी हुई है और आपके वक्ष पर बालों का चक्र होने का क्या अभिप्राय है?" लोमश ऋषि ने उत्तर देते हुए कहा-"मुझे चिरायु होने का वरदान प्राप्त है। इस ब्रह्माण्ड में एक इन्द्र का कार्यकाल पूरा होने पर एक बाल टूटकर गिर जाता है। जिससे इस चक्र में रिक्त स्थान दिखाई देते हैं। मेरे शिष्य मेरे रहने के लिए घर का निर्माण करना चाहते थे परन्तु मैने विचार किया कि जीवन अस्थायी है तब फिर यहाँ घर क्यों बनाया जाए? मैं फूस की चटाई अपने पास रखता हूँ जो मुझे वर्षा व धूप से बचाती है। रात्रि के समय मैं इसे पृथ्वी पर बिछाकर सो जाता हूँ।" इन्द्र यह सोचकर अचंभित हुआ, “इस ऋषि का जीवनकाल कई इन्द्रों की आयु है और फिर भी यह कह रहा है कि जीवन अस्थायी है। तब फिर मैं ऐसे भव्य महल का निर्माण क्यों कर रहा हूँ?" उसका घमंड चूर-चूर हो गया और उसने विश्वकर्मा को महल बनाने के कार्य से मुक्त कर दिया।
इन कथाओं को पढ़ते हुए हमें भगवद्गीता के ब्रह्माण्डीय विज्ञान की अद्भुत अंत:दृष्टि युक्त चमत्कार की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। निकोलस कॉपरनिकस पहले पश्चिम वैज्ञानिक थे जिन्होंने एक उपयुक्त सिद्धांत स्थापित करते हुए कहा कि वास्तव में सूर्य ब्रह्माण्ड का केन्द्र है। उससे पहले पश्चिम जगत यह विश्वास करता था कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केन्द्र थी। तत्पश्चात् खगोल विज्ञान में हुई प्रगति से ज्ञात हुआ कि सूर्य भी ब्रह्माण्ड का केन्द्र नहीं है बल्कि यह तो आकाशगंगा के चारों ओर भ्रमण करता है। विज्ञान में आगे हुई प्रगति से वैज्ञानिक यह जानने में समर्थ हुए कि हमारी आकाश गंगा के समान कई अन्य आकाशगंगायें है और इनमें से प्रत्येक में हमारे लोक के सूर्य के समान असंख्य तारे होते हैं। इसके विपरीत पाँच हजार वर्ष पूर्व वैदिक दर्शन में वर्णन किया गया है कि पृथ्वी भूर्लोक है, जो स्वर्लोक के चारों ओर घूर्णन करती है। इनके बीच के क्षेत्र को भुव: लोक कहा गया है। किन्तु स्वर्लोक भी स्थिर नहीं है यह जनलोक के गुरुत्व में स्थित है और इनके बीच के क्षेत्र को महर लोक कहा जाता है किन्तु जनलोक भी स्थिर नहीं है। यह ब्रह्मलोक (सत्यलोक) के चारों ओर घूर्णन कर रहा है और इनके बीच के क्षेत्र को तपलोक कहा जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि सात उच्चलोक और समान रूप से सात निम्नलोक हैं। इस प्रकार पाँच सहस्त्र वर्ष पूर्व प्रकट किया गया यह ज्ञान अत्यन्त अद्भुत है।
श्रीकृष्ण इस श्लोक में कहते हैं कि ब्रह्माण्ड के सभी 14 लोकों में माया का आधिपत्य है। इसलिए यहाँ के निवासी जन्म-मृत्यु के चक्र में फँसे रहते हैं। किन्तु जो भगवत्प्राप्ति कर लेते हैं, वे माया के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और मृत्यु होने पर भौतिक शरीर को त्याग कर वे भगवान का परमधाम प्राप्त करते हैं। उन्हें दिव्य शरीर प्राप्त होता है जिससे वे नित्य भगवान की दिव्य लीलाओं में भाग लेते हैं। इस प्रकार से वे इस मायाबद्ध भौतिक संसार में पुनः जन्म नहीं लेते। कुछ संत माया से मुक्ति पाने के पश्चात् भी लौटकर संसार में आते हैं किन्तु वे अन्य लोगों को उसी प्रकार से माया के बंधनों से मुक्त करवाने हेतु संसार में अवतरित होते हैं। ये सब महान अवतारी होते हैं जो मानवता के कल्याण में लगे रहते हैं।
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदु: |
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जना: || 17||
चार युग (महायुग) के हज़ार चक्र को ब्रह्म का (कल्प) एक दिन माना जाता है और इतनी ही अवधि की उसकी एक रात्रि होती है। इसे वही बुद्धिमान समझ सकते हैं जो दिन और रात्रि की वास्तविकता को जानते है
वैदिक ब्रह्माण्डीय ज्ञान पद्धति में समय की गणना करने की विधि अत्यन्त गहन, स्थिर और प्रामाणिक है। उदाहरणार्थः कुछ कीट रात्रि में जन्म लेते हैं और एक ही रात्रि में बड़े होते हैं, प्रजनन करते हैं, अण्डे देते हैं और बूढ़े हो जाते हैं। प्रातः काल हम इन सबको मार्ग में लगे बिजली के खम्बों के नीचे मरा हुआ पाते हैं। यदि इन कीटों को यह कहा जाए कि उनका पूर्ण जीवन काल केवल मनुष्य की एक रात्रि के बराबर है तब वे इस पर संदेह करेंगे।
समान रूप से वेदों में वर्णन किया गया है कि स्वर्ग के देवताओं जैसे इन्द्र और वरुण का एक दिन और रात्रि पृथ्वीलोक के एक वर्ष के समतुल्य है। स्वर्ग के देवताओं का एक वर्ष पृथ्वी लोक के 360 वर्षों के बराबर होता है। स्वर्ग के देवताओं के 12,000 वर्षों के बराबर का एक महायुग (चार युगों का चक्र) पृथ्वी लोक के 4 लाख 32 हजार वर्ष के समतुल्य है। ऐसे 1000 महायुग का समूह ब्रह्मा का एक दिन होता है। इसे 'कल्प' कहा जाता है और यह समय की सर्वोच्च ईकाई है। ब्रह्मा की रात्रि भी इसके बराबर है। इन गणनाओं के अनुसार ब्रह्मा की आयु 100 वर्ष की होती है। पृथ्वीलोक की गणना के अनुसार यह 311,400,000,000,000 वर्ष है।
इस प्रकार से वैदिक गणना के अनुसार युगों की गणना निम्न प्रकार से है
कलियुग - 432,000 वर्ष
द्वापरयुग - 8,64,000 वर्ष
त्रेतायुग - 1,296,000 वर्ष
सतयुग - 1,728,000 वर्ष
इन सबको मिलाकर एक महायुग - 4,320,000 वर्ष
एक हजार महायुग का ब्रह्मा का एक दिन है जिसे एक कल्प कहते हैं और इसी अवधि के समान ब्रह्मा की एक रात्रि है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो इसे समझ पाते हैं, वे दिन और रात्रि के सत्य को जान जाते हैं।
ब्रह्माण्ड की पूरी अवधि ब्रह्मा की आयु के 100 वर्षों के बराबर है। ब्रह्मा भी एक आत्मा हैं जिन्होंने यह पदवी प्राप्त की है और वह भगवान के लिए अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहा है। इस प्रकार से ब्रह्मा भी जीवन और मृत्यु के चक्र के अधीन है। किन्तु अत्यंत उन्नत चेतना से युक्त होने के कारण उसे यह आश्वासन प्राप्त है कि उसका जीवन समाप्त होने पर वह जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाएगा और भगवान के धाम में प्रवेश करेगा। कभी-कभी जब कोई भी आत्मा सर्जन के समय ब्रह्मा के दायित्वों का पालन करने की पात्र नहीं पायी जाती, तब ऐसी स्थिति में भगवान स्वयं ब्रह्मा बन जाते हैं।
अव्यक्ताद्व्यक्तय: सर्वा: प्रभवन्त्यहरागमे |
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके || 18||
ब्रह्मा के दिन के आरंभ में सभी जीव अव्यक्त अवस्था से व्यक्त होते हैं और रात्रि होने पर पुनः सभी जीव अव्यक्त अवस्था में लीन हो जाते हैं।
ब्रह्माण्ड में विभिन्न लोकों के सृजन, स्थिति और प्रलय के चक्रों की पुनरावृति होती रहती है। ब्रह्मा के दिन की समाप्ति पर जो 4,3,20,000,000 वर्षों के बराबर है, महर् लोक तक की ग्रह प्रणालियाँ विनष्ट हो जाती हैं। इसे नैमित्तिक प्रलय अर्थात् आंशिक प्रलय कहा जाता है। श्रीमद्भागवतम् में शुकदेव जी परीक्षित को अवगत कराते हैं कि जिस प्रकार से बालक दिन में खिलौने से संरचनाएँ बनाता है और उन्हें सोने से पहले नष्ट कर देता है। उसी प्रकार से ब्रह्मा दिन में अपनी जागृत अवस्था में ग्रह प्रणालियों की रचना करते हैं और रात्रि में सोने से पूर्व उन्हें नष्ट कर देते हैं।
ब्रह्मा के जीवन के 100 वर्षों के अन्त में संपूर्ण ब्रह्माण्ड का संहार हो जाता है। उस समय समस्त भौतिक सृष्टि का अंत हो जाता है। पंच महाभूतों का पंच तन्मात्राओं में विलय और पंच तन्मात्राओं का अहंकार और अहंकार का विलय महान् में तथा महान् का विलय प्रकृति में हो जाता है। प्रकृति भौतिक शक्ति माया का सूक्ष्म रूप है। तब माया अपनी मौलिक अवस्था में महा विष्णु परमात्मा के शरीर में जाकर स्थित हो जाती है। इसे प्रकृति प्रलय या महाप्रलय कहते हैं। जब महा विष्णु पुनः सृष्टि करने की इच्छा करते हैं तब वे प्रकृति के रूप में मायाशक्ति पर दृष्टि डालते हैं और वह केवल उनके दृष्टि डालने से विकसित होती है। प्रकृति से महान् और महान् से अहंकार उत्पन्न होता है। अहंकार से पंचतन्मात्राएँ और पंचतन्मात्राओं से पंचमहाभूतों की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार से अनन्त ब्रह्माण्डों की सृष्टि होती हैं। आज के युग के वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार आकाशगंगा में 100 करोड़ तारे हैं। एक आकाशगंगा के समान ब्रह्माण्ड में 1 करोड़ तारा समूह हैं। वेदों के अनुसार हमारे ब्रह्माण्ड के समान विभिन्न आकार के अनन्त ब्रह्माण्ड अस्तित्व में हैं। हर समय जब महाविष्णु श्वास लेते हैं तब उनके शरीर के छिद्रों से असंख्य ब्रह्माण्ड प्रकट होते हैं और जब वे श्वास बाहर छोड़ते हैं तब सभी ब्रह्माण्डों का संहार हो जाता है। इस प्रकार से ब्रह्मा के 100 वर्षों का जीवन महाविष्णु की एक श्वास के बराबर है। प्रत्येक ब्रह्माण्ड का एक ब्रह्मा, विष्णु और शंकर होता है। इस प्रकार असंख्य ब्रह्माण्डों में असंख्य ब्रह्मा, विष्णु और शंकर हैं। सभी ब्रह्माण्डों के समस्त विष्णु, महाविष्णु का विस्तार हैं।
भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते |
रात्र्यागमेऽवश: पार्थ प्रभवत्यहरागमे || 19||
ब्रह्मा के दिन के आरंभ में असंख्य जीव पुनः जन्म लेते हैं और ब्रह्माण्डीय रात्रि होने पर विलीन हो जाते हैं।
वेदों में चार प्रकार के प्रलय का उल्लेख किया गया है-
नित्य प्रलय: हमारी चेतना का प्रतिदिन का प्रलय तब होता है जब हम गहन निद्रा में होते हैं।
नैमित्तिक प्रलयः यह प्रलय महर्लोक तक के सभी लोकों में ब्रह्मा का दिन समाप्त होने पर आती है। उस समय इन लोकों में रहने वाली आत्माएँ अव्यक्त हो जाती हैं। वे प्रसुप्त अवस्था में महा विष्णु के उदर में समा जाती हैं। जब ब्रह्मा इन लोकों की सृष्टि करते हैं तब वे अपने पूर्व कर्मों के अनुसार जन्म लेती हैं।
महाप्रलयः ब्रह्मा के जीवनकाल की समाप्ति पर सभी ब्रह्माण्डों में होने वाले संहार को महाप्रलय कहा जाता है। उस समय ब्रह्माण्ड की सभी जीवात्माएँ महाविष्णु के उदर में प्रसुप्त अवस्था में चली जाती हैं। उनके स्थूल और सूक्ष्म शरीर का विनाश हो जाता है और उनका कारण शरीर शेष रहता है। जब सृष्टि के अगले चक्र का सृजन होता है तब उनके कारण शरीर में संचित उनके कर्मों और संस्कारों के अनुसार उन्हें पुनः जन्म मिलता है।
आत्यन्तिक प्रलयः जब आत्मा अंततः भगवान को प्राप्त कर लेती है तब वह सदा के लिए जीवन और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाती है। आत्यन्तिक प्रलय माया के बंधनों का विनाश है जो आत्मा को नित्य बाँधे रखती थी।
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन: |
य: स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति || 20||
व्यक्त और अव्यक्त सृष्टि से परे एक अव्यक्त सृष्टि है। जब सब कुछ विनष्ट हो जाता है तो भी उसकी सत्ता का विनाश नहीं होता।
लौकिक संसार और उनके अस्थायित्व पर अपना वक्तव्य समाप्त करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अन्य आध्यात्मिक आयाम की चर्चा करते हैं। यह माया शक्ति की परिधि से परे है और भगवान की योगमाया शक्ति द्वारा उत्पन्न होता है। जब समस्त ब्रह्माण्डों का विनाश हो जाता है तब भी इसका विनाश नहीं होता। श्रीकृष्ण 10वें अध्याय के 42वें श्लोक में उल्लेख करते हैं कि यह आध्यात्मिक आयाम समस्त सृष्टि का तीन चौथाई है जब कि भौतिक संसार एक चौथाई है।
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम् |
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम || 21||
यह अव्यक्त स्वरुप ही परम गन्तव्य है और यहाँ पहुंच कर फिर कोई इस नश्वर संसार में लौट कर नहीं आता। यह मेरा परम धाम है।
आध्यात्मिक क्षेत्र के दिव्य आकाश को 'परव्योम' कहते हैं। इसमें भगवान के विविध प्रकार के शाश्वत लोक सम्मिलित हैं, जैसे-गोलोक, (भगवान श्रीकृष्ण का लोक) साकेत लोक, (भगवान राम का लोक) वैकुण्ठ लोक, (नारायण भगवान का लोक), शिव लोक, (सदाशिव का लोक), देवी लोक, (माँ दुर्गा का लोक)। इन लोकों में भगवान नित्य अपने दिव्य रूपों में अपने अनन्त संतो के साथ निवास करते हैं। ये सब भगवान के रूप एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं। ये एक ही भगवान के विभिन्न रूप हैं।
मनुष्य भगवान के जिस रूप की आराधना करता है, भगवत्प्राप्ति होने के पश्चात् वह उसी प्रकार के भगवान के उसी रूप वाले लोक में जाता है। दिव्य शरीर प्राप्त करने के पश्चात् जीवात्मा अनन्त काल के लिए भगवान के दिव्य कार्यों और दिव्यलीलाओं में भाग लेती है।
पुरुष: स पर: पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया |
यस्यान्त:स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् || 22||
परमेश्वर का दिव्य व्यक्तित्व सभी सत्ताओं से परे है। यद्यपि वह सर्वव्यापक है और सभी प्राणी उसके भीतर रहते है तथापि उसे केवल भक्ति द्वारा ही जाना जा सकता है।
परमात्मा जो अपने दिव्य लोक में निवास करते हैं, वे हमारे हृदय में भी निवास करते हैं और वे भौतिक जगत के प्रत्येक परमाणु में भी व्याप्त हैं। भगवान सभी स्थानों पर समान रूप से विद्यमान रहते हैं। हम यह नहीं कह सकते कि सर्वव्यापक भगवान कहीं 25 प्रतिशत विद्यमान हैं तथा वे अपने साकार रूप में शत-प्रतिशत व्याप्त रहते हैं। वे सर्वत्र साकार रूप में शत-प्रतिशत व्याप्त रहते हैं किन्तु हम भगवान की सर्वव्यापकता का लाभ प्राप्त नहीं करते, क्योंकि हमें उनकी अनुभूति नहीं होती।
शाण्डिल्य ऋषि ने कहा हैगवां सप्रिः शरीरस्थं न करोत्यङ्ग-पोषणम्।
(शाण्डिल्य भक्ति दर्शन)
"दूध गाय के शरीर में व्याप्त होता है किन्तु यह दुर्बल गाय को स्वस्थ रखने में सहायक नहीं होता।" जब गाय दुहने से प्राप्त होने वाले दूध को जमाकर उसे दही में परिवर्तित किया जाता है और उस दही में जब काली मिर्च मिलाकर उसे खिलायी जाती है तब उससे गाय का उपचार हो जाता है। उसी प्रकार से भगवान की सर्वव्यापकता की अनुभूति इतनी पक्की नहीं होती कि वह हमारी भक्ति को बढ़ा सके। सर्वप्रथम हमारे लिए उनके दिव्य रूप की आराधना करना और अन्तःकरण को शुद्ध करना आवश्यक होता है। तब हम भगवान की कृपा पाते हैं और उस कृपा से वे अपनी दिव्य योगमाया शक्ति के साथ हमारी बुद्धि, मन और अन्त:करण में व्याप्त हो जाते हैं। तब हमारी इन्द्रियाँ दिव्य होकर भगवान की दिव्यता की अनुभूति करने में समर्थ हो जाती हैं। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्हें केवल भक्ति द्वारा ही जाना जा सकता है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण बारम्बार भक्ति करने की अनिवार्यता पर बल देते हैं।
श्लोक 6.47 में उन्होंने कहा था कि वे उनकी भक्ति में तल्लीन रहने वाले भक्त को सब में श्रेष्ठ मानते हैं। इसलिए उन्होंने विशेष रूप से 'अनन्य' शब्द को अत्यन्त महत्त्व दिया है जिसका अर्थ 'किसी अन्य मार्ग द्वारा भगवान को नहीं जाना जा सकता' है।
चैतन्य महाप्रभु ने इसका अति सुन्दर वर्णन किया है
"भक्ति मुख निरीक्षत कर्म-योग-ज्ञान"
(चौतन्य चरितामृत मध्य लीला-22.17)
"यद्यपि कर्म, ज्ञान और अष्टांग योग भगवत्प्राप्ति के मार्ग हैं किन्तु इन मार्गों में सफलता के लिए भक्ति की सहायता की आवश्यकता पड़ती है।"
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने भी इसका विशद वर्णन किया है-
कर्म, योग, अरु ज्ञान सब, साधन यदपि बखान।
पै बिनु भक्ति सबै जनु, मृतक देह बिनु प्रान ।।
(भक्ति शतक-8)
"यद्यपि कर्म, ज्ञान और अष्टांग योग भगवद्प्राप्ति के साधन हैं किन्तु भक्ति के सम्मिश्रण बिना ये सब निष्प्राण मृत देह के समान हैं।" विभिन्न धर्मग्रंथों में भी ऐसा वर्णन किया गया है।
भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयाऽऽत्मा प्रियः सताम्।
(श्रीमद्भागवतम्-11.14.21)
"मैं केवल उन भक्तों को प्राप्य हूँ जो श्रद्धा और प्रेम युक्त होकर मेरी भक्ति करते हैं।"
मिलेहिं न रघुपति बिनु अनुरागा, किए जोग तप ज्ञान विरागा
(रामचरितमानस)
"यदि कोई अष्टांग योग का अभ्यास करे, तपस्या करे, ज्ञान अर्जित करे और चाहे विरक्ति भाव विकसित करे फिर भी भक्ति के बिना कोई भी कभी भगवान को नहीं प्राप्त कर सकता।"
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिन: |
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ || 23||
अग्निर्ज्योतिरह: शुक्ल: षण्मासा उत्तरायणम् |
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जना: || 24||
धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण: षण्मासा दक्षिणायनम् |
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते || 25||
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगत: शाश्वते मते |
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुन: || 26||
हे भरत श्रेष्ठ! अब मैं तुम्हें इस संसार से प्रयाण के विभिन्न मार्गों के संबंध में बताऊँगा। इनमें से एक मार्ग मुक्ति की ओर ले जाने वाला है और दूसरा पुनर्जन्म की ओर ले जाता है। वे जो परब्रह्म को जानते हैं और जो उन छः मासों में जब सूर्य उत्तर दिशा में रहता है, चन्द्रमा के शुक्ल पक्ष की रात्रि और दिन के शुभ लक्षण में देह का त्याग करते हैं, वे परम गति को प्राप्त करते हैं। वैदिक कर्मकाण्डों का पालन करने वाले जो साधक, कृष्णपक्ष की रात्रि में, अथवा सूर्य के दक्षिणायन रहते, छ: माह के भीतर मृत्यु को प्राप्त होते हैं, वे स्वर्गलोक को प्राप्त करते हैं। स्वर्ग के सुख भोगने के पश्चात् वे पुनः धरती पर लौटकर आते हैं। प्रकाश और अंधकार के ये दोनों पक्ष संसार में सदा विद्यमान रहते हैं। प्रकाश का मार्ग मुक्ति की ओर तथा अंधकार का मार्ग पुनर्जन्म की ओर ले जाता है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण के कथन श्लोक 8.2 में पूछे गए प्रश्न–'हम मृत्यु के समय आप में कैसे एकीकृत हो सकते हैं?' से सम्बन्धित हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार में दो मार्ग हैं-एक प्रकाश का मार्ग और दूसरा अंधकार का मार्ग। यहाँ हम प्रकाश और अंधकार से संबंधित आध्यात्मिक दृष्टिकोण अभिव्यक्त करने के लिए एक अद्भुत रूपक का प्रयोग कर सकते हैं। उत्तरायण के छः माह को, चन्द्रमा, के शुक्ल पक्ष को प्रकाश के रूप में चित्रित किया गया है। प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है जबकि अंधकार अज्ञानता का प्रतीक है। दक्षिण संक्राति के छः माह तथा चंद्रमा का कृष्ण पक्ष ये सब अंधकार के समानार्थक हैं। वे जिनकी चेतना भगवान में स्थित होती है और जो विषयासक्त कार्यों से विरक्त रहते हैं, वे प्रकाश अर्थात् विवेक और ज्ञान के पथ का अनुसरण करते हुए दिवंगत होते हैं। चूँकि वे भगवच्चेतना में स्थित हो जाते हैं इसलिए वे परमात्मा का धाम प्राप्त करते हैं और संसार के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। किन्तु जिनकी चेतना संसार में संलग्न होती है, वे अंधकार (अज्ञानता) के मार्ग का अनुसरण करते हुए दिवंगत होते है। दैहिक चेतना में उलझने और भगवान से विमुख होने की भूल के कारण वे निरन्तर जीवन और मृत्यु के चक्र में घूमते रहते हैं। यदि उन्होंने वैदिक कर्मकाण्डों का पालन किया होता है तब वे उन्नत होकर अस्थायी रूप से स्वर्ग लोक को जाते हैं और बाद में पुनः पृथ्वी लोक पर लौट कर आते हैं। अब यह उनके कर्मों के अनुसार उन पर निर्भर करता है कि क्या वे प्रकाश के मार्ग या अंधकार के मार्ग की ओर अग्रसर होंगे।
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन |
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन || 27||
हे पार्थ! जो योगी इन दोनों मार्गों का रहस्य जानते हैं, वे कभी मोहित नहीं होते इसलिए वे सदैव योग में स्थित रहते हैं।
जो साधक मन को भगवान में एकनिष्ठ करने का प्रयास करते रहते हैं, वे योगी कहलाते हैं। वे स्वयं को भगवान का अंश और विलासी जीवन को निरर्थक जानकर क्षणिक इन्द्रिय सुख की अपेक्षा भगवान के प्रति अपने प्रेम को बढ़ाने पर महत्त्व देते हैं। इस प्रकार से वे प्रकाश के मार्ग (शुक्ल पक्ष) का अनुसरण करते हैं। ऐसे लोग जो माया से मोहित होकर अस्थायी संसार को स्थायी और अपने शरीर को आत्मा समझकर तथा संसार के कष्टों को सुखों का साधन समझते हैं, वे अंधकार मार्ग (कृष्णपक्ष) का अनुसरण करते हैं। दोनों मार्गों के परिणाम पूर्णतया एक-दूसरे के विपरीत होते हैं। एक आंतरिक परमानंद की ओर ले जाता है तो दूसरा निरन्तर भौतिक संसार के कष्टों की ओर। श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रेरित करते हैं कि वे इन दोनों मार्गों के भेद को समझे और योगी बन कर प्रकाश के मार्ग का अनुसरण करे। उन्होंने यहाँ इस उक्ति-"सर्वेषु-कालेषु" को जोड़ा है जिसका अर्थ सदा के लिए है। हममें से कई लोग कुछ समय के लिए प्रकाश के मार्ग का अनुसरण करते हैं किन्तु फिर पीछे हटते हुए अंधकार के मार्ग का अनुसरण करने लगते हैं। अगर कोई व्यक्ति उत्तर की ओर जाना चाहता हैं किन्तु पूरा प्रयास करने के पश्चात् भी यदि वह प्रत्येक एक मील उत्तर दिशा की ओर चलकर वापस चार मील दक्षिण दिशा की ओर चलता है तब वह व्यक्ति अपनी यात्रा के अंत में दक्षिण दिशा के अंतिम बिन्दु पर पहुँचेगा। इसी प्रकार पूरे दिन में कुछ समय प्रकाश के मार्ग का अनुगमन करने से हमारी आध्यात्मिक उन्नति सुनिश्चित नहीं हो सकती। इसलिए हमें निरन्तर ठीक दिशा की ओर बढ़ना होगा और विपरीत दिशा की ओर बढ़ना बंद करना होगा तभी हम अध्यात्म के क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं-"सदा योगी बने रहो।"
वेदेषु यज्ञेषु तप:सु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् |
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् || 28||
जो योगी इस रहस्य को जान लेते हैं वे वेदाध्ययन, तपस्या, यज्ञों के अनुष्ठान और दान से प्राप्त होने वाले फलों से परे और अधिक लाभ प्राप्त करते हैं। ऐसे योगियों को भगवान का परमधाम प्राप्त होता है।
हम वैदिक अनुष्ठान, तपस्या, ज्ञान संवर्धन, विभिन्न प्रकार की तपस्या करते हैं और दान देते हैं। किन्तु जब तक हम भगवान की भक्ति में तल्लीन नहीं होते तब तक हम प्रकाश के मार्ग की ओर अग्रसर नहीं हो सकते। इन सभी लौकिक कर्मों का परिणाम भौतिक फल हैं। जबकि भगवान की भक्ति के परिणाम-स्वरूप हमें सांसारिक बंधनों से मुक्ति प्राप्त होती है। इसलिए रामचरितमानस में वर्णन किया गया है
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
भेषज पुनि कोटिन्ह नाहिं रोग जाहिं हरिजान ।।
"चाहे तुम सदाचारी, धर्मपरायण, तपस्वी, यज्ञ करने वाले हो और अष्टांग योग, मंत्र उच्चारण तथा दान आदि पुण्य कर्मों में लीन रहते हो किन्तु भक्ति के बिना यह भवरोग समाप्त नहीं हो सकता।"
जो योगी प्रकाश के मार्ग का अनुगमन करते हैं वे मन को संसार से विरक्त कर उसे भगवान में अनुरक्त कर लेते हैं और अपना पूर्ण कल्याण करते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ऐसा फल पाते हैं जो अन्य सभी पद्धतियों से प्राप्त होने वाले फलों से परे होता है।
।। श्रीमद्भगवत गीता अष्टम अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
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