॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhagavad Geeta Chapter 7
श्रीमद्भगवत गीता सप्तम अध्याय
अध्याय सात: ज्ञान विज्ञान योग
दिव्य ज्ञान की अनुभूति द्वारा प्राप्त योग
यह अध्याय भगवान की शक्तियों के भौतिक और आध्यात्मिक आयामों के वर्णन के साथ आरम्भ होता है। श्रीकृष्ण व्यक्त करते हैं कि ये सब उन्हीं से प्रकट होते हैं और धागे में गुंथे मोतियों की भाँति उनमें स्थित रहते हैं। वे समूची सृष्टि के स्रोत हैं और ये सब उन्हीं में पुनः विलीन हो जाते हैं। उनकी प्राकृत शक्तिमाया पर विजय प्राप्त करना अत्यंत दुष्कर है लेकिन वे जो भगवान के शरणागत हो जाते हैं, वे उनकी कृपा प्राप्त करते हैं और इस माया पर सरलता से विजय पा लेते हैं। आगे श्रीकृष्ण उनके शरणागत न होने वाले चार प्रकार के लोगों और उनकी भक्ति में तल्लीन रहने वाले चार प्रकार के लोगों का वर्णन करते हैं। वे अपने भक्तों में उन्हें अत्यंत प्रिय मानते हैं जो अपने मन और बुद्धि को उनमें लीन कर ज्ञान में स्थित होकर उनकी आराधना करते हैं। कुछ लोग जिनकी बुद्धि सांसारिक कामनाओं द्वारा हर ली जाती हैं वे स्वर्ग के देवताओं की शरण में जाते हैं किन्तु ये स्वर्ग के देवता केवल अस्थायी भौतिक सुख प्रदान कर सकते हैं और इन क्षणभंगुर सुखों को भी वे भगवान द्वारा प्राप्त होने पर ही प्रदान कर सकते हैं। इस प्रकार से भक्ति का अंतिम लक्ष्य स्वयं भगवान हैं। श्रीकृष्ण पुष्टि करते हैं कि वे परम सत्य और अंतिम गंतव्य हैं और सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान भी हैं। चूँकि उनका वास्तविक स्वरूप उनकी दिव्य योगमाया शक्ति के आवरण द्वारा आच्छादित रहता है इसलिए उनके अविनाशी दिव्य स्वरूप को सब नहीं जान सकते। यदि हम उनकी शरण ग्रहण करते हैं तब वे हमें अपना दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं और उनको जानकर हम भी आत्मज्ञान और कर्मचक्र का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं।
श्रीभगवानुवाच |
मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रय: |
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु || 1||
परम प्रभु ने कहा-हे अर्जुन! अब यह सुनो कि भक्तियोग के अभ्यास द्वारा और मेरी शरण ग्रहण कर मन को केवल मुझमें अनुरक्त कर और संदेह मुक्त होकर तुम मुझे पूर्णतया किस प्रकार जान सकते हो।
छठे अध्याय के समापन पर श्रीकृष्ण ने घोषणा की थी कि वे जो मन को केवल उनमें स्थिर कर श्रद्धा भक्ति से उनकी सेवा करते हैं वे सब योगियों में श्रेष्ठ हैं। इस कथन द्वारा मन में कुछ स्वाभाविक प्रश्न उठते हैं कि परमात्मा को जानने का मार्ग क्या है? कोई भगवान का ध्यान कैसे करे? भक्त भगवान की आराधना कैसे करें?
यद्यपि अर्जुन द्वारा ये प्रश्न नहीं किए गए किन्तु अपनी अनुकंपा से भगवान इनका पूर्वानुमान कर उत्तर देना प्रारम्भ करते हैं। उन्होंने 'श्रृणु' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ सुनना है और इसके साथ 'मदाश्रयः' शब्द का भी प्रयोग किया है जिसका अर्थ 'अपने मन को मुझमें केन्द्रित करना' है।
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषत: |
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते || 2||
अब मैं तुम्हारे समक्ष उस ज्ञान और विज्ञान को पूर्णतः प्रकट करूँगा जिसको जान लेने पर इस संसार में तुम्हारे जानने के लिए और कुछ शेष नहीं रहेगा।
इन्द्रियों, मन और बुद्धि से अर्जित जानकारी को ज्ञान कहते हैं। आध्यात्मिक अभ्यास के परिणामस्वरूप अपने अन्तःकरण में प्राप्त ज्ञान को 'विज्ञान' कहा जाता है। विज्ञान बौद्धिक ज्ञान नहीं है क्योंकि इसकी प्रतीति प्रत्यक्ष अनुभव से होती है। उदाहरणार्थ यदि हम बंद बोतल में रखी शहद की मिठास की प्रशंसा सुनते हैं, किन्तु सुनी-सुनाई बात से केवल सैद्धान्तिक ज्ञान प्राप्त होता है। किन्तु जब हम बोतल के ढक्कन को खोलकर शहद का स्वाद चखते हैं तब हम उसकी मिठास का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। उसी तरह गुरु और शास्त्रों से प्राप्त सैद्धान्तिक जानकारी 'ज्ञान' है और जब हम उस ज्ञान के अनुसार साधना का अभ्यास करते हुए अपने मन को शुद्ध करते हैं तब हमारे भीतर अनुभूति के रूप में प्रकाशित ज्ञान 'विज्ञान' कहलाता है। जब वेदव्यास ने श्रीमद्भागवतम् लिखने का निर्णय लिया तब उसमें प्रकृति, भगवान की महिमा और भक्ति के विषय का वर्णन करने के लिए वे ज्ञान को आधार मानने में संतुष्ट नहीं थे।
भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले।
अपश्यत्पुरुषं पूर्वं मायां च तदपाश्रयाम्।।
(श्रीमद्भागवतम्-1.7.4)
"भक्तियोग द्वारा वेदव्यास जी ने लौकिक भावनाओं से रहित होकर अपने मन को पूर्णतया एकाग्र और निर्मल करके भगवान और उनकी बाह्यशक्ति माया के पूर्ण दर्शन प्राप्त किये। तब ऐसी अनुभूति से युक्त होकर उन्होंने भागवत की रचना की। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे अर्जुन के भीतर भगवान संबंधी सैद्धान्तिक ज्ञान प्रकाशित करेंगे और उसे भगवान का वास्तविक ज्ञान प्रदान करने में भी उसकी सहायता करेंगे। इस ज्ञान का बोध हो जाने पर फिर उसके लिए कुछ जानना शेष नहीं रहेगा।
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये |
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत: || 3||
हजारों में से कोई एक मनुष्य आध्यात्मिक सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और सिद्धि प्राप्त करने वालों में से कोई एक विरला ही वास्तव में मुझे जान पाता है।
इस श्लोक में 'सिद्धि' शब्द का प्रयोग किया गया है। इस शब्द के कई अर्थ हैं। संस्कृत शब्दकोश से लिए गए सिद्धि शब्द के कुछ अर्थ इस प्रकार से हैं-अलौकिक शक्तियों की प्राप्ति, उपलब्धि, सफलता, निष्पादन, पूर्ति, समस्याओं का समाधान, कार्य को सम्पूर्ण करना, उपचार करना, लक्ष्य साधना, परिपक्वता, परम सुख, मोक्ष, असाधारण दक्षता और पूर्णता। श्रीकृष्ण अध्यात्मवाद के लिए पूर्णता शब्द का प्रयोग करते हुए कहते हैं-“हे अर्जुन! असंख्य आत्माओं में से कुछ को ही मानव शरीर प्राप्त होता है। मनुष्य जन्म पाने वालों में केवल कुछ लोग ही पूर्णता के लिए प्रयास करते हैं और हजारों सिद्धावस्था प्राप्त आत्माओं में से मेरी सर्वोच्च स्थिति और दिव्य महिमा से परिचित होने वाली आत्माएँ विरली ही होती हैं।"
फिर ऐसी आत्माएँ जो आध्यात्मिक अभ्यास द्वारा पूर्णता को प्राप्त कर लेती हैं वे भगवान को क्यों नहीं जान सकतीं? इसका कारण यह है कि भक्ति और प्रेममय समर्पण के बिना भगवान को जान पाना या उनकी अनुभूति करना सम्भव नहीं है। आध्यात्मिक पथ के साधक कर्म, ज्ञान, हठयोग आदि के अभ्यास के साथ भक्ति को सम्मिलित किए बिना भगवान को नहीं जान सकते। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने इस सत्य को कई बार दोहराया है।
"यद्यपि वे सर्वव्यापक हैं और सभी प्राणी उनमें स्थित हैं तथापि उन्हें केवल भक्ति द्वारा ही जाना जा सकता है।" (8.22)
"हे अर्जुन! मैं तुम्हारे समक्ष खड़ा हुआ अपने जिस स्वरूप में हूँ, उसे भक्ति के अलावा अन्य किसी साधन से नहीं देखा जा सकता। इस प्रकार से तुम मेरे दिव्य स्वरूप को देख सकते हो और मुझे जानने के रहस्यों को जान सकते हो।" (11.54)
"केवल प्रेममयी भक्ति से ही कोई यह जान पाता है कि मैं वास्तव में क्या हूँ। फिर तब वह भक्ति के माध्यम से मेरे दिव्य स्वरूप को जानकर मेरे दिव्य लोक में प्रवेश करता है।" (18.55)
इस प्रकार से जो आध्यात्मिक साधक अपनी साधना में भक्ति को सम्मिलित नहीं करते और भगवान के संबंध में सैद्धान्तिक ज्ञान तक ही सीमित रहते हैं उन्हें परम सत्य का अनुभवात्मक ज्ञान नहीं हो पाता।
यह कहने के पश्चात् कि कई मनुष्यों में कोई एक ही उन्हें वास्तव में जान पाता है, श्रीकृष्ण अब अपनी भौतिक और आध्यात्मिक शक्तियों के आयामों का उल्लेख करना आरम्भ कर रहे हैं। वे सर्वप्रथम अपनी अपरा प्रकृति, भौतिक शक्ति का क्षेत्र जोकि निकृष्ट शक्ति होते हुए भी भगवान की शक्ति है, का उल्लेख करते हैं।
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च |
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा || 4||
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार ये सब मेरी प्राकृत शक्ति के आठ तत्त्व हैं।
माया शक्ति द्वारा रचित संसार विचित्र, जटिल और अगाध है। इसे वर्गीकृत करके हम अपनी परिमित बुद्धि से इसे कुछ-कुछ समझ सकते हैं। हालाँकि इनमें से प्रत्येक श्रेणी की आगे असंख्य उप श्रेणियाँ हैं। आधुनिक विज्ञान में पदार्थ को तत्त्वों के संयोजन के रूप में देखा जाता है। वर्तमान में 118 तत्त्वों की खोज की गयी है और इन्हें आवधिक सारणी में सम्मिलित किया गया है। सामान्य रूप से भगवद्गीता और वैदिक दर्शन में मूलभूत रूप से अलग-अलग प्रकार का वर्गीकरण किया गया है। पदार्थ को प्रकृति या भगवान की शक्ति के रूप में देखा जाता है और इस श्लोक में इस शक्ति के आठ खंडों का उल्लेख किया गया है। पिछली शताब्दी में आधुनिक विज्ञान की प्रगति को देखते हुए यह कितनी आश्चर्यजनक और व्यावहारिक जानकारी है।
वर्ष 1905 में अपने अनुस मिरबिल पत्रों में अल्बर्ट आइंस्टीन ने पहले पदार्थ ऊर्जा समतुल्यता के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया था। उन्होंने कहा कि पदार्थ में शक्ति में परिवर्तित होने की क्षमता होती है और इसे संख्यात्मक रूप से समीकरण E = mc द्वारा निर्धारित किया जा सकता है। यह ज्ञान न्यूटन की पिछली अवधारणा कि 'ब्रह्माण्ड की रचना ठोस पदार्थों को मिलाकर की गयी है', को मूलभूत रूप से परिवर्तित करता है। इसके पश्चात् वर्ष 1920 में नील्स बोर और अन्य वैज्ञानिकों ने क्वांटम सिद्धान्त स्थापित किया जिसके अनुसार पदार्थ की प्रकृति दोहरी होती है। क्वांटम सिद्धान्त, पदार्थ द्वारा ऊर्जा के उत्सर्जन, अवशोषण और कणों की गति के साथ संबंधित है। तब से वैज्ञानिक एकीकृत क्षेत्र सिद्धान्त की खोज कर रहे हैं जिसमें सभी बलों और पदार्थों को ब्रह्माण्ड के एक क्षेत्र के रूप में समझा जा सकेगा।
इसी एकीकृत क्षेत्र सिद्धान्त को श्रीकृष्ण ने आधुनिक वैज्ञानिक युग से 5000 वर्ष पूर्व अर्जुन को एकदम सटीक रूप से समझाया था। वे कहते हैं-"अर्जुन! ब्रह्माण्ड में व्याप्त सभी पदार्थों का अस्तित्व मेरी माया अर्थात् प्राकृत शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं।" यह मेरी प्राकृत शक्ति है जो संसार में असंख्य आकारों, रूपों और अस्तित्वों में प्रकट होती है। तैत्तिरीयोपनिषद् में इसका विस्तार से इस प्रकार वर्णन किया गया है:
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः।
आकाशाद्वायुः। वायोरग्रिः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या औषधयः।
औषधीभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुषः। स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः।
(तैत्तिरीयोपनिषद्-2.1.2)
"भौतिक ऊर्जा का आदि रूप प्रकृति है। जब भगवान संसार के सृजन की इच्छा करते हैं तब वे प्रकृति पर दृष्टि डालते हैं जिससे उसमें विकार उत्पन्न होता है और फिर वह महान के रूप में प्रकट होती है", फिर महान में विकार उत्पन्न होने से अगला तत्त्व अहंकार प्रकट होता है जोकि विज्ञान के जानने योग्य किसी भी ईकाई की तुलना में सूक्ष्म है। अहंकार से पंचतन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है। ये पाँच तन्मात्राएँ-स्वाद, स्पर्श, गंध, रूप और शब्द हैं। इन से पाँच स्थूल तत्त्व-आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी प्रकट होते हैं।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण न केवल इन पाँच स्थूल तत्त्वों को अपितु वे मन, बुद्धि और अहंकार को भी अपनी शक्ति के विशिष्ट तत्त्वों के रूप में सम्मिलित करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये सब उनकी प्राकृत शक्ति माया का ही अंश हैं। इससे परे आत्मा (जीव शक्ति) या भगवान की परा शक्ति है जिसकी व्याख्या वे अगले श्लोक में करते हैं।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् |
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् || 5||
ये मेरी अपरा शक्तियाँ हैं किन्तु हे महाबाहु अर्जुन! इनसे अतिरिक्त मेरी परा शक्ति है। यह जीव शक्ति है जिसमें देहधारी आत्माएँ (जीवन रूप) सम्मिलित हैं जो इस संसार में जीवन का आधार हैं।
श्रीकृष्ण अब पूर्णतया भौतिक ज्ञान के क्षेत्र से परे विषय की चर्चा कर रहे हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि पिछले श्लोक में उन्होंने अपनी जिन आठ प्रकार की अपरा शक्तियों का उल्लेख किया है केवल वही अभिव्यक्तियाँ ही सब कुछ नहीं हैं। वे कहते हैं कि मेरी परम आध्यात्मिक शक्ति भी है जो जड़ पदार्थ से पूर्णतः परे है। यह शक्ति 'जीव शक्ति' है जिसमें आत्माएँ अर्थात् विभिन्न जीवन रूप सम्मिलित हैं। भगवान और जीव (जीवात्मा) के संबंध में महान भारतीय दार्शनिकों ने विभिन्न परिप्रेक्ष्यों का निरूपण किया है। अद्वैत मत के तत्त्व ज्ञानी कहते हैं, “जीवो ब्रह्मैव नापरः" अर्थात् “आत्मा स्वयं भगवान है किन्तु इस मत पर कई अनुत्तरित प्रश्न उत्पन्न होते हैं।
1. भगवान सर्व शक्तिशाली है और माया उनकी दासी है। यदि आत्मा भगवान है तब माया उस पर कैसे हावी हो जाती है? क्या माया भगवान से शक्तिशाली है?
2. हम जानते हैं कि आत्मा अज्ञान के कारण भटकती रहती है, इसलिए इसे समझाने के लिए भगवद्गीता जैसे धार्मिक ग्रंथों और संतों के उपदेशों की आवश्यकता पड़ती है। अज्ञानता के कारण पराधीन आत्मा को भगवान के समान कैसे माना जा सकता है जो कि सर्वज्ञ हैं।
3. भगवान सर्वव्यापक हैं। इसे वेदों में बार-बार दोहराया गया है। यदि आत्मा ही भगवान है तब आत्मा को भी एक ही समय में सब स्थानों पर व्याप्त रहना चाहिए तब फिर मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग और नरक जाने का प्रश्न ही कहाँ रहेगा?
4. जीवात्माओं की संख्या अनन्त है और उनका स्वतंत्र अस्तित्व होता है जबकि भगवान एक ही हैं। अगर सभी जीवात्माएँ भगवान होतीं तो भगवान भी अनेक होते।
इस प्रकार हम देखते हैं कि अद्वैतवादी दार्शनिकों का यह दावा कि आत्मा स्वयं भगवान है, तर्क संगत नहीं है।
दूसरी ओर द्वैतवादी दार्शनिक कहते हैं कि आत्मा भगवान से भिन्न है। यह उपर्युक्त कुछ प्रश्नों का उत्तर अवश्य है किन्तु यह इस श्लोक में श्रीकृष्ण द्वारा किए गए वर्णन की तुलना में अपूर्ण ज्ञान है। वे कहते हैं कि आत्मा भगवान की शक्ति का अणु अंश है। इसलिए केवल एक भगवान परम शक्तिमान हैं और दृश्य जगत में जो भी आध्यात्मिक और भौतिक तत्त्व हैं, दोनों उनकी विविध प्रकार की परा और अपरा शक्तियों से निर्मित हैं।
एक देशस्थितस्याग्निर्ज्योत्स्ना विस्तारिणी यथा।
परस्य ब्रह्मणः शक्तिस्तथैदम् अखिलं जगत्।।
(विष्णुपुराण 1.22.53)
"जिस प्रकार सूर्य एक स्थान पर रहता है किन्तु उसका प्रकाश सम्पूर्ण सौरमण्डल में व्याप्त रहकर उसे प्रकाशित करता है उसी प्रकार से भगवान अपनी अनन्त शक्तियों द्वारा संसार में व्याप्त रहते हैं।" चैतन्य महाप्रभु ने कहा है:
जीवतत्त्व-शक्ति, कृष्णतत्त्व-शक्तिमान।
गीताविष्णुपुराणादि ताहाते प्रमाण ।।
(चैतन्य चरित्रामृत, आदि लीला-7.117)
"आत्मा भगवान की शक्ति है जबकि भगवान परम शक्तिमान है।" एक बार जब हम इस अवधारणा को स्वीकार कर लेते हैं कि आत्मा भगवान की शक्ति है तब सारी सृष्टि के अद्वैतों को सरलता से समझा जा सकता है। कोई भी शक्ति एक साथ अपने शक्तिमान से अभिन्न और भिन्न भी हो सकती है। उदाहरणार्थ अग्नि का ताप और प्रकाश विभिन्न तत्त्व समझे जा सकते हैं, किन्तु इन सबको एक साथ एक भी समझा जा सकता है। इस प्रकार से हम शक्ति (आत्मा) और शक्तिमान (परमात्मा) के दृष्टिकोण से आत्मा और परमात्मा को एक समान मान सकते हैं किन्तु हम आत्मा और भगवान में भेद को भी मान सकते हैं, क्योंकि शक्ति और शक्तिमान का पृथक अस्तित्त्व भी होता है। इस प्रकार से भगवान और आत्मा में भेदाभेद है।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने श्रीकृष्ण के इस श्लोक और पिछले श्लोक के कथन का संपुटीकरण करते हुए इसकी अत्यंत सटीक व्याख्या की है
"जिवु', 'माया', दुइ शक्ति हैं, शक्तिमान भगवान ।
शक्तिहिँ भेद अभेद भी, शक्तिमान ते जान ।।
(भक्ति शतक श्लोक-42)
"आत्मा और माया भगवान की दो शक्तियाँ है। इसलिए दोनों का भगवान के साथ भेद और अभेद भी है।"
शक्ति और शक्तिमान के बीच एकता के दृष्टिकोण से समूचा संसार भगवान से अभिन्न नहीं है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि सारा संसार भगवान का यथार्थ रूप है।
सर्वं खल्विदं ब्रह्म
(छान्दोग्योपनिषद्-3.14.1)
"सभी ब्रह्म है।"
ईशावास्यमिदं सर्वम्।
(ईशोपनिषद्-1)
"संसार में व्यक्त प्रत्येक वस्तु भगवान है।" ।
पुरुष एवेदं सर्वं
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-3.15)
"सभी अस्तित्वों में परम पुरुषोत्तम भगवान ही सब कुछ हैं।"
ये सभी वैदिक मंत्र कह रहे हैं कि संसार में भगवान के अतिरिक्त कुछ नहीं है। शक्ति और शक्तिमान में विविधता के परिप्रेक्ष्य को इस प्रकार से समझ सकते हैं कि इस एकता में भी अनेकता हैं। आत्मा भिन्न है, पदार्थ भिन्न है, भगवान भिन्न हैं। पदार्थ जड़ है जबकि आत्मा चेतन है और भगवान आत्मा और पदार्थ दोनों के परम चेतन स्रोत और आधार हैं। कई वैदिक मंत्रों में सृष्टि में तीन प्रकार की सत्ता का उल्लेख किया गया है।
क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः
क्षरात्मानावीशते देव एकः।
तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावाद्
भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-1.10)
"सृष्टि में तीन सत्ता अस्तित्व में हैं-(1) पदार्थ जो नाशवान है (2) जीवात्मा जो अविनाशी है। (3) भगवान जो पदार्थ और जीवात्माओं का नियंता है। भगवान का चिन्तन करके और उसके समान बनकर जीवात्मा सांसारिक मोह माया से मुक्त हो सकती है।"
हम देखते हैं कि वेद कैसे दोनों प्रकार के द्वैतवादी और अद्वैतवादी मतों को प्रतिपादित करते हैं। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज परमात्मा और आत्मा के बीच अचिन्त्य अभेद और भेद के मत का समर्थन करते हैं।
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय |
अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा || 6||
यह जान लो कि सभी प्राणी मेरी इन दो शक्तियों द्वारा उत्पन्न होते हैं। मैं सम्पूर्ण सृष्टि का मूल कारण हूँ और ये पुनः मुझमें विलीन हो जाती हैं।
भौतिक जगत के सभी प्राणी आत्मा और पदार्थ के संयोग से अस्तित्त्व में आते हैं। पदार्थ अपने आप में जड़ है, आत्मा को शरीर रूपी वाहन की आवश्यकता पड़ती है। इन दोनों शक्तियों के संयोजन से जीव उत्पन्न होते हैं।
भगवान इन दोनों शक्तियों का मूल कारण हैं। समूची सृष्टि उन्हीं से उत्पन्न होती है। जब ब्रह्मा के जीवन के एक सौ वर्ष के अन्त में सृष्टि अपना चक्र पूरा कर लेती है तब भगवान सृष्टि का संहार कर देते हैं। पाँच स्थूल तत्त्व पाँच सूक्ष्म तत्त्वों में विलीन हो जाते हैं और पाँच सूक्ष्म तत्त्व अहंकार में, अहंकार महान में, और महान प्रकृति में विलीन हो जाता है और प्रकृति महाविष्णु के शरीर में स्थित हो जाती है। जो जीवात्माएँ सृष्टि के चक्र में बंधनमुक्त नहीं हो पाती वे भी अव्यक्त रूप में भगवान के उदर में समा जाती हैं और सृष्टि के अगले चक्र की प्रतीक्षा करती हैं।
एक बार पुनः भगवान जब सृष्टि-सर्जन की इच्छा करते हैं तब श्लोक संख्या 7.4 में किए गए उल्लेख के अनुसार सृष्टि चक्र आरंभ हो जाता है और संसार प्रकट हो जाता है इसलिए भगवान सभी पदार्थों के स्रोत, पालक और अंतिम आश्रय हैं।
मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय |
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव || 7||
हे अर्जुन! मुझसे श्रेष्ठ कोई नहीं है। सब कुछ मुझ पर उसी प्रकार से आश्रित है, जिस प्रकार से धागे में गुंथे मोती।
यह कहने के पश्चात् कि वे सबके मूल और सभी अस्तित्त्वों के आधार हैं परम प्रभु श्रीकृष्ण अब अपनी सर्वोच्चता और सब पर अपने आधिपत्य की चर्चा करते हैं। वे ब्रह्माण्ड के स्रष्टा, निर्वाहक और संहारक हैं। वे सृष्टि में व्याप्त सभी तत्त्वों के आधार हैं। इस श्लोक में धागे में गुंथे मोतियों की उपमा का प्रयोग किया गया है। उसी प्रकार से जीवात्माएँ यद्यपि अपनी इच्छा के अनुसार कर्म करने में स्वतंत्र होती हैं लेकिन इसकी शक्ति उन्हें केवल भगवान द्वारा प्राप्त होती है जो उन सबका पालन-पोषण करते हैं और जिनमें सभी स्थित रहते हैं। इसलिए श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णन किया गया
न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते ।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.8)
"न तो कुछ भी भगवान के बराबर है और न ही कुछ उनसे श्रेष्ठ है।"
भगवद्गीता का यह श्लोक कई लोगों के मन से उस संदेह का निवारण करता है जो श्रीकृष्ण को परम सत्य के रूप में नहीं स्वीकार करते और यह कल्पना करते हैं कि कोई अन्य निराकार सत्ता है जो न केवल सबका बल्कि श्रीकृष्ण का भी परम स्रोत है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे जिस साकार पुरुषोत्तम रूप में अर्जुन के समक्ष खड़े हैं वही श्रीकृष्ण अंतिम परम सत्य हैं।
इसलिए प्रथम जन्मे ब्रह्मा श्रीकृष्ण से इस प्रकार की प्रार्थना करते हैं।
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्।।
(ब्रह्मसंहिता-5.1)
" श्रीकृष्ण ही परम प्रभु हैं। वह नित्य, अविनाशी और परम आनन्द स्वरुप हैं। उनका कोई आदि और अंत नहीं है। वे सभी का उद्गम हैं और सभी कारणों के कारण हैं।"
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययो: |
प्रणव: सर्ववेदेषु शब्द: खे पौरुषं नृषु || 8||
हे कुन्ती पुत्र! मैं ही जल का स्वाद हूँ, सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश हूँ, मैं वैदिक मंत्रों में पवित्र अक्षर ओम हूँ, मैं ही आकाश में ध्वनि और मनुष्यों में सामर्थ्य हूँ।
यह कहने के पश्चात् कि वे ही जो सब का मूल और आधार हैं, अब श्रीकृष्ण सत्य का निरूपण इन चार श्लोकों में कर रहे हैं। जब हम फलों का सेवन करते हैं तब हमें उनकी मिठास से उनमें शक्कर होने का आभास होता है। उसी प्रकार से श्रीकृष्ण अपनी शक्तियों के सभी विकृत रूपों में व्याप्त रहते हैं। इसलिए वह कहते हैं-"मैं जल में स्वाद हूँ" जोकि उसका सार भूत गुण है। क्या कोई भी जल के स्वाद को उसमें से अलग कर सकता है? भौतिक शक्तियों के अन्य सभी रूपों-गैस, अग्नि, ठोस पदार्थों को अपना स्वाद बनाए रखने के लिए तरल की आवश्यकता पड़ती है। यदि हम किसी ठोस पदार्थ को अपनी सूखी जिह्वा पर रखते हैं तब हम उसका स्वाद ग्रहण नहीं कर सकते किन्तु जब ठोस पदार्थ मुँह की लार से घुल जाता है तब फिर उसका रस स्वाद कलिकाओं द्वारा जिह्वा पर ग्रहण किया जा सकता है।
उसी प्रकार से आकाश ध्वनि के संवाहक के रूप में कार्य करता है। ध्वनि भी स्वयं को विभिन्न भाषाओं में रूपांतरित करती रहती है और श्रीकृष्ण यह व्यक्त करते हैं कि वे इस सबका आधार हैं क्योंकि आकाश में शब्द उनकी शक्ति है। इससे आगे वे कहते हैं कि वे पवित्र मंत्र 'ओम्' हैं जो वैदिक मंत्रों का मूलतत्त्व है। वे मनुष्य में प्रकट होने वाली सभी क्षमताओं के मूल कारण हैं।
पुण्यो गन्ध: पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ |
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु || 9||
मैं पृथ्वी की शुद्ध सुगंध और अग्नि में प्रकाश हूँ। मैं सभी प्राणियों में जीवन शक्ति हूँ और तपस्वियों का तप हूँ।
श्रीकृष्ण अपना वक्तव्य जारी रखते हुए आगे वर्णन करते हैं कि वे किस प्रकार से सभी वस्तुओं का आधारभूत तत्त्व हैं। आत्मशुद्धि के लिए शारीरिक सुखों को अस्वीकार करना और स्वेच्छा से आत्म संयमी होना तपस्वियों की विशेषता होती है। भगवान कहते हैं कि वे तपस्वियों में उनका सामर्थ्य हैं। पृथ्वी पर वे सुगंध हैं जोकि उसका मूल गुण है और अग्नि में वे प्रकाश हैं।
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् |
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् || 10||
हे अर्जुन! यह समझो कि मैं सभी प्राणियों का आदि बीज हूँ। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ?
कारण को ही अपने फल के बीज के रूप में जाना जाता है इसलिए समुद्र को बादलों का बीज माना जा सकता है और बादल वर्षा के जनक होते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिससे सभी प्राणियों की उत्पत्ति हुई, वे उसका आदि बीज हैं क्योंकि सभी वस्तुएँ जो दिखाई देती हैं, भगवान की शक्ति का रूप हैं। मनुष्यों में दिखने वाले सारे सद्गुण भगवान की शक्तियाँ ही हैं जो उनमें प्रकट होती हैं। बुद्धिमान पुरुष अपने विचार और मतों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करते हैं। भगवान कहते हैं कि वे ऐसी सूक्ष्म शक्ति हैं जो उनके विचारों को प्रभावशाली और विश्लेषणात्मक बनाती हैं।
जब कुछ मनुष्य ऐसी असाधारण प्रतिभा प्रदर्शित करते हैं जिससे संसार सकारात्मक दिशा की ओर अग्रसर होता है तब उस समय यह भगवान की शक्ति ही होती है जो उनके द्वारा क्रियान्वित होती है। विलियम शेक्सपियर ने साहित्य के क्षेत्र में ऐसी विलक्षण प्रतिभा प्रदर्शित की जिसकी आधुनिक साहित्य से तुलना नहीं की जा सकती। संभवतः भगवान ने उसकी बुद्धि को इतना कुशाग्र बनाया कि उसका साहित्य लेखन का कार्य अंग्रेजी भाषा को समृद्ध कर सके।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि ब्रिटिश साम्राज्य का उद्देश्य संसार को एक भाषा के साथ जोड़ना था। बिल गेट्स ने मार्केटिंग के क्षेत्र में ऐसी अभूतपूर्व सफलता पायी है कि माइक्रोसॉफ्ट की विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम की विश्व बाजार में 90 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। यदि ऐसा न होता तब पूरे विश्व में कंप्यूटर के लिए कई ऑपरेटिंग सिस्टम प्रचलित होते जिससे संसार में अत्यधिक उथल-पुथल होती, जैसे कि वीडियो संपादन क्षेत्र की कई प्रणालियाँ-एन.टी. एस.सी. पॉल, सेकम आदि हैं। संभवतः भगवान की यह इच्छा हुई कि विश्व में केवल एक मुख्य ऑपरेटिंग सिस्टम होना चाहिए जिससे सुचारू संपर्क सुनिश्चित किया जा सके। इसलिए भगवान ने इस प्रयोजन के लिए एक ही व्यक्ति की बुद्धि को अति तीक्ष्ण बनाया। संत निश्चित रूप से अपने कार्य और ज्ञान को भगवान की कृपा के रूप में स्वीकार करते हैं।
संत तुलसीदास ने वर्णन किया है
न मैं किया न करि सकू, साहिब करता मोर।
करत करावत आप हैं, तुलसी तुलसी शोर ।।
"न तो मैंने रामायण की रचना की और न ही मैं इसकी रचना करने के योग्य था। भगवान राम मेरे कर्ता हैं। उन्होंने मेरे कार्यों को निर्देशित किया और मुझे माध्यम बनाकर मुझसे काम कराया लेकिन संसार सोचता है कि तुलसीदास सब कुछ कर रहा है। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सभी प्रतिभाशालियों की प्रतिभा और सभी बुद्धिमानों की बुद्धि हैं।
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् |
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ || 11||
हे भरत श्रेष्ठ! मैं बलवान पुरुषों का काम और आसक्ति रहित बल हूँ। मैं सभी प्राणियों में धर्मानुगत काम हूँ।
आसक्ति-अप्राप्त सुख के लिए तीव्र उत्कंठा है। आसक्ति एक विकृत मनोभावना है जो इच्छित पदार्थों का उपभोग करने के उपरांत भी उनकी प्यास को बढ़ाती है। श्रीकृष्ण 'कामराग - विवर्जितम्' शब्द का प्रयोग करते हैं जिसका अर्थ "कामना और आसक्ति रहित होना" है। ऐसा कहकर वे अपनी शक्ति के स्वरुप को स्पष्ट करते हैं। वे परम उदात्त शक्ति हैं जो लोगों को बिना भटकाव या विराम के अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए सामर्थ्य प्रदान करती है।
मैथुन क्रिया जब शास्त्रीय सिद्धान्तों से विहीन हो जाती है और इन्द्रियों के आनन्द को पाने के प्रयोजन से क्रियान्वित की जाती है तब उसे पशु प्रवृत्ति माना जाता है। किन्तु गृहस्थ जीवन के अंग के रूप में जब यह धर्म से अविरुद्ध रूप में और सन्तानोत्पति के उद्देश्य से की जाती है तब इसे शास्त्रीय ग्रंथों के अनुकूल माना जाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ऐसे पवित्र, संयत और सदिच्छा से युक्त वैवाहिक संबंध में कामस्वरूप हूँ।
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये |
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि || 12||
तीन प्रकार के प्राकृतिक गुण-सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण मेरी शक्ति से ही प्रकट होते हैं। ये सब मुझमें हैं लेकिन मैं इनसे परे हूँ।
पिछले चार श्लोकों में अपनी महिमा का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण इस श्लोक में उनकी समीक्षा करते हैं। वे प्रभावशाली शैली में अभिव्यक्त करते हैं-"अर्जुन मैं यह व्याख्या कर चुका हूँ कि मैं किस प्रकार से सभी पदार्थों का सार हूँ
लेकिन इस बिन्दु पर विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। सभी शुभ-अशुभ, और सृष्टि में व्याप्त सभी जड़-चेतन जीवों और पदार्थों का अस्तित्त्व केवल मेरी शक्ति द्वारा ही संभव है।"
यद्यपि सभी वस्तुएँ भगवान से प्रकट होती हैं, तथापि वे इनसे स्वतंत्र और परे हैं। अल्फ्रेड टेनीसन ने अपनी प्रसिद्ध कविता 'इन मैमोरियम' में इसे इस प्रकार से व्यक्त किया है
1. हमारी लघु ग्रह प्रणालियों का समय निश्चित है।
2. इनका आदि और अन्त है।
3. ये केवल आपका विखंडित प्रकाश है।
4. और हे भगवान! आपकी अनुपम महिमा अनन्त और इनसे परे है।
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत् |
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम् || 13||
माया के तीन गुणों द्वारा मोहित इस संसार के लोग मेरे नित्य और अविनाशी स्वरूप को जान पाने में असमर्थ होते हैं।
पिछले श्लोकों को सुनकर संभवत: अर्जुन यह सोचता होगा “हे भगवान यदि तुम्हारी ऐसी दिव्य विभूतियाँ हैं तब तुम्हें अरबों मनुष्य परम नियन्ता और सृष्टि का मूल कारण क्यों नहीं मानते? इसका उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार के लोग माया के तामसिक, राजसिक और सत्त्वगुणों से मोहित होते हैं। माया के ये तीन गुण मनुष्य की चेतना को आच्छादित कर देते हैं और जिसके परिणामस्वरूप वे शारीरिक सुखों के क्षणभंगुर आकर्षणों से मोहित हो जाते हैं।"
माया शब्द "मा" धातु से बना है। मा का अर्थ 'नहीं' और या का अर्थ 'जो' है इस प्रकार से माया का अर्थ-"वह ऐसा नहीं है जैसा दिखायी दे रहा है।" भगवान की शक्ति होने के कारण माया भी भगवान की सेवा में लगी रहती है। माया उन जीवात्माओं से भगवान के दिव्य स्वरूप को आच्छादित करने का काम करती है जिन्होंने अभी तक भगवत्प्राप्ति नहीं की होती। यह माया इसलिए उन जीवात्माओं को मोहित कर देती है क्योंकि वे भगवान से विमुख होती हैं अर्थात् भगवान की ओर पीठ किए होती हैं। प्रकृति के तीन गुणों के वशीभूत होने के कारण माया मनुष्य को विभिन्न संकटों में डालकर कष्ट देती है। इस प्रकार से वह जीवात्माओं को यह अनुभव करवाने का प्रयास करती है कि वे भगवान के सम्मुख हुए बिना कभी सुख नहीं पा सकती।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया |
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते || 14||
प्रकति के तीन गुणों से युक्त मेरी दैवीय शक्ति माया से पार पाना अत्यंत कठिन है किन्तु जो मेरे शरणागत हो जाते हैं, वे इसे सरलता से पार कर जाते हैं।
कुछ लोग यह स्वीकार करते हैं कि माया मिथ्या है और इसका कोई अस्तित्त्व नहीं है। वे कहते हैं कि हमें माया की अनुभूति केवल अज्ञानता के कारण होती है किन्तु जब हम ज्ञान से युक्त हो जाते हैं तब माया का अस्तित्त्व समाप्त हो जाएगा। वे दावा करते हैं कि इससे हमारा भ्रम दूर हो जाएगा और हम आत्मा को परम सत्य मानने लगेंगे। किन्तु भगवद्गीता का यह श्लोक ऐसे सिद्धान्त का खण्डन करता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि माया भ्रम नहीं है, यह भगवान की शक्ति है। श्वेताश्वतरोपनिषद् में इस प्रकार से वर्णन किया गया है-
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-4.10)
"माया भगवान की शक्ति है जबकि भगवान शक्तिमान हैं।"
रामचरितमानस में उल्लेख किया गया है
सो दासी रघुबीर कि समुझें मिथ्या सोपि।
"कुछ लोगों का विचार है कि माया मिथ्या अर्थात् अस्तित्वहीन है परन्तु माया वास्तव में एक शक्ति है जो भगवान की सेवा में लगी रहती है।"
यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि माया पर विजय पाना अत्यंत कठिन है क्योंकि यह उनकी शक्ति है। यदि कोई माया पर विजय पा लेता है तब उसका अर्थ यह होगा कि उसने स्वयं भगवान को जीत लिया है। इसलिए न तो कोई भगवान को पराजित कर सकता है और न ही माया को। मन माया से निर्मित है इसलिए कोई भी योगी, ज्ञानी, तपस्वी या कर्मी केवल अपने प्रयास से मन पर सफलतापूर्वक नियंत्रण प्राप्त नहीं कर सकता।
उस समय अर्जुन यह प्रश्न कर सकता था-"फिर मैं माया पर कैसे विजय पा सकूँगा" इसका उत्तर श्रीकृष्ण ने इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में दिया है। वे कहते हैं-"अर्जुन, यदि तुम मेरे शरणागत हो जाते हो तब मैं अपनी कृपा से तुम्हें संसार रूपी महासागर से पार करा दूंगा। मैं माया को संकेत कर दूंगा कि यह आत्मा मेरी हो गयी है अतः इसे मुक्त करो।" भगवान का आदेश पाने पर माया शक्ति मनुष्य को अपने बंधन से मुक्त कर देती है। माया कहती है-"मेरा कार्य केवल इतना ही था कि जीवात्मा को तब तक कष्ट दिया जाए जब तक वह भगवान के चरणों का आश्रय नहीं लेती। अब चूँकि इस जीवात्मा ने भगवान की शरण ले ली है इसलिए मेरा कार्य संपूर्ण हो गया है।"
हम अपने जीवन के उदाहरण से भी इसे समझ सकते हैं। आप अपने मित्र से भेंट करने के लिए उसके घर के बाहर के द्वार पर पहुँच जाते हैं। उसके घर के बाहर लगे सूचना पट्ट पर 'कुत्ते से सावधान रहें' लिखा हुआ है। उसका पालतु कुत्ता जर्मन शेफर्ड उसके लॉन में खड़ा है। वह कुत्ता आप पर भौंकने लगता है। फिर आप बाड़े के आस-पास जाकर पिछले द्वार से उसके घर में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं। किन्तु वही कुत्ता वहाँ भी आ जाता है और क्रोध से गुर्राने लगता है जैसे कि यह कह रहा हो-"देखता हूँ कि तुम कैसे घर में प्रवेश करने का साहस कर सकते हो।" जब आपके पास कोई अन्य विकल्प नहीं होता तब आप अपने मित्र को पुकारते हैं और फिर वह अपने घर से बाहर निकल कर देखता है कि उसका कुत्ता आपको तंग कर रहा है। तब वह कहता है-'टॉमी नहीं! टॉमी आओ और यहाँ बैठो।' कुत्ता तुरन्त शांत हो जाता है और अपने स्वामी की ओर आकर बैठ जाता है। अब आप भयमुक्त होकर प्रवेश द्वार खोलकर घर में प्रवेश करते हैं। समान रूप से प्राकृत शक्ति माया जो हमें सताती है वह भगवान की दासी है। अपने प्रयासों से हम उस पर विजय नहीं पा सकते। उससे पार पाने का एक मात्र उपाय भगवान की शरणागति है।
इसे इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने महत्त्वपूर्ण ढंग से संप्रेषित किया है। यदि हम माया पर विजय पाना चाहते हैं तब हमें केवल भगवान के शरणागत होना चाहिए। तब फिर लोग भगवान के शरणागत क्यों नहीं होते? इसकी व्याख्या श्रीकृष्ण अगले श्लोक में करेंगे।
न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा: |
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता: || 15||
चार प्रकार के लोग मेरी शरण ग्रहण नहीं करते-वे जो ज्ञान से वंचित हैं, वे जो अपनी निकृष्ट प्रवृत्ति के कारण मुझे जानने में समर्थ होकर भी आलस्य के कारण मुझे जानने का प्रयास नहीं करते, जिनकी बुद्धि भ्रमित है और जो आसुरी प्रवृत्ति के हैं।
श्रीकृष्ण ने उन चार प्रकार के मनुष्यों की श्रेणियाँ बताई हैं जो उनकी शरण ग्रहण नहीं करते।
(1) अज्ञानी मनुष्यः ये लोग आध्यात्मिक ज्ञान से वंचित होते हैं। वे शाश्वत आत्मा के रूप में अपनी पहचान करने और जीवन के लक्ष्य भगवत्प्राप्ति के संबंध में अनभिज्ञ रहते हैं। ज्ञान की कमी उन्हें भगवान के शरणागत होने से रोकती है।
(2) वे जो आलस्य के कारण निकृष्ट प्रवृत्ति का अनुसरण करते हैं: वे मनुष्य जिनके पास मौलिक आध्यात्मिक ज्ञान होता है और उन्हें यह बोध भी होता है कि उन्हें क्या करना है, किन्तु फिर भी ऐसे मनुष्य अपनी निकृष्ट प्रवृत्ति के कारण भगवान की शरण ग्रहण करने का प्रयास नहीं करते। धार्मिक सिद्धान्तों के अनुसार किसी मनुष्य द्वारा आध्यात्म मार्ग पर अग्रसर न होने में आलस्य को सबसे बड़ा दोषी माना गया है।
संस्कृत भाषा में इस प्रकार से कहा गया है-
आलस्य ही मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ।।
"आलस्य एक बड़ा शत्रु है और यह हमारे शरीर में रहता है। कर्म मनुष्य का अच्छा मित्र है जो कभी पतन की ओर नहीं ले जाता।"
(3) वे जो भ्रमित बुद्धि वाले होते हैं: संसार में ऐसे कई मनुष्य हैं जिन्हें अपनी बुद्धि पर घमंड होता है। यद्यपि वे संतो और धार्मिक ग्रंथो के उपदेशों को सुनते हैं किन्तु श्रद्धा के साथ उन्हें स्वीकार करने की इच्छा नहीं रखते। सभी आध्यात्मिक सत्य तुरन्त सुस्पष्ट नहीं होते। सर्वप्रथम हमें इस सिद्धान्त में विश्वास रखना होगा और फिर इसके लिए अभ्यास आरम्भ करना चाहिए। तब फिर अनुभव द्वारा हम उनके उपदेशों को समझ सकेंगे। ऐसे लोग कोई भी विषय जो उनके लिए वर्तमान में सुस्पष्ट नहीं है, उस पर विश्वास करने से मना कर देते हैं और वे भगवान जो इन्द्रियों की समझ से परे हैं, की शरण ग्रहण करना अस्वीकार कर देते हैं। श्रीकृष्ण ऐसे लोगों को तीसरी श्रेणी में रखते हैं।
(4) वे जो आसुरी प्रवृत्ति के अधिभूत हैं: ये ऐसे मनुष्य है जो स्वीकार करते हैं कि भगवान है किन्तु संसार में भगवान के प्रयोजन को विफल करने के लिए वे प्रतिकूल, बुरे और अनुचित कार्य करते हैं तथा अपनी आसुरी प्रवृत्ति के कारण वे भगवान के दिव्य व्यक्तित्त्व से घृणा करते हैं। वे किसी को भगवान की महिमा का गान करते हुए या भगवान की भक्ति में लीन होते हुए देखना सहन नहीं कर सकते। स्पष्ट है कि ऐसे लोग भगवान की शरण ग्रहण नहीं करते।
चतुर्विधा: भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन |
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ || 16||
हे भरतश्रेष्ठ! चार प्रकार के पवित्र लोग मेरी भक्ति में लीन रहते हैं: आर्त अर्थात् पीड़ित, ज्ञान की जिज्ञासा रखने वाले जिज्ञासु, संसार के स्वामित्व की अभिलाषा रखने वाले अर्थार्थी और जो परमज्ञान में स्थित ज्ञानी है
उन मनुष्यों की जो भगवान की शरणागति नहीं करना चाहते, की व्याख्या करने के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण अब भगवान की शरण ग्रहण करने वाले मनुष्यों की श्रेणियों को व्यक्त करते हैं-
1. आर्तः कुछ मनुष्यों के लिए जब सांसारिक दु:खों का पात्र अत्यधिक भर जाता है तब वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सांसारिक पदार्थों के पीछे भागना व्यर्थ है और भगवान की शरण ग्रहण करना ही उत्तम है। इसप्रकार जब वे देखते हैं कि सांसारिक आश्रय उनकी रक्षा करने में असमर्थ हैं तब वे भगवान की ओर मुड़ते हैं।
इस प्रकार के समर्पण का एक सटीक उदाहरण द्रौपदी का श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण है। जब कौरवों की सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र किया जा रहा था तब सर्वप्रथम उसने अपनी रक्षा हेतु अपने पतियों के नाम लिए। जब वे चुप रहे तब उसने सभा में उपस्थित सम्मानित वयोवृद्ध द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म पितामह और विदुर पर भरोसा करते हुए उनसे अपनी रक्षा हेतु सहायता माँगी। किन्तु जब वे भी मौन रहकर उसकी रक्षा न कर सके, तब फिर द्रौपदी ने साड़ी को अपने दाँतो के बीच फँसा दिया। उस समय तक भी श्रीकृष्ण द्रौपदी की रक्षा के लिए नहीं आए। अंत में जब दुःशासन ने एक झटके के साथ उसकी साड़ी को खींचा तो साड़ी दाँतो की पकड़ से छूट गयी। ऐसी दशा में जब उसे अपनी रक्षा हेतु न तो अपने पतियों पर, न किसी अन्य पर तथा न ही अपनी शक्ति पर विश्वास रहा तब उसने अपनी रक्षा के लिए श्रीकृष्ण के पूर्ण शरणागत होने का निश्चय किया तब भगवान ने उसकी पूरी रक्षा की। वे वहाँ प्रकट होकर उसकी साड़ी का विस्तार करते रहे। दुःशासन साड़ी खींचता गया किन्तु इसका कुछ प्रभाव नहीं पड़ा और वह द्रौपदी को निर्वस्त्र करने में विफल रहा।
2. ज्ञान प्राप्त करने वाले जिज्ञासुः भगवान को जानने की अपनी इच्छा के परिणामस्वरूप कुछ जिज्ञासु मनुष्य भगवान की शरण में जाते हैं। उन्होंने आध्यात्मिक जगत में परम आनन्द की खोज करने वाले महापुरुषों के संबंध में सुना होता है और यह सब उन्हें भगवान के बारे में जानने के लिए उत्साहित करता है। इसलिए वे अपनी जिज्ञासा को संतुष्ट करने के लिए भगवान की ओर अग्रसर होते हैं।
3. सांसारिक संपत्ति की अभिलाषा रखने वाले अथार्थीः अन्य प्रकार के मनुष्य जिन्हें यह स्पष्ट है कि उन्हें क्या चाहिए और वे यह समझते है कि केवल भगवान ही उन्हें मनोवांछित पदार्थ प्रदान कर सकते हैं, वे कामनाओं की पूर्ति हेतु भगवान की शरण में जाते हैं। ध्रुव ने अपने पिता राजा उत्तानपाद से अधिक शक्तिशाली होने की कामना के साथ भगवान की भक्ति आरम्भ की थी किन्तु जब उसकी भक्ति परिपक्व हो गयी और भगवान ने उसे दर्शन दिए तब उसने अनुभव किया कि उसने जो कामना की थी वह परमात्मा के दिव्य प्रेम रुपी अमूल्य रत्न की तुलना में काँच के टूटे हुए टुकड़े के समान थी तब फिर उसने भगवान से निष्काम, नि:स्वार्थ भक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की।
4. ज्ञान में स्थित ज्ञानी मनुष्यः अन्ततः कुछ जीवात्माओं को यह बोध हो जाता है कि वे भगवान के अणु अंश हैं और उनका परम धर्म भगवान से प्रेम और उनकी सेवा करना ही है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये चौथी श्रेणी वाले ही वे मनुष्य हैं जो भगवान की भक्ति में तल्लीन रहते हैं।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते |
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय: || 17||
इनमें से मैं उन्हें श्रेष्ठ मानता हूँ जो ज्ञान युक्त होकर मेरी आराधना करते हैं और दृढ़तापूर्वक अनन्य भाव से मेरे प्रति समर्पित होते हैं। मैं उन्हें बहुत प्रिय हूँ और वे भी मुझे अत्यंत प्रिय हैं।
वे जो भगवान का दु:ख में, सांसारिक सुख समृद्धि की प्राप्ति के लिए या जिज्ञासा के कारण स्मरण करते हैं, वे अब तक निष्काम भक्ति से युक्त नहीं होते। लेकिन धीरे-धीरे समर्पण भक्ति की प्रक्रिया से उनका हृदय शुद्ध हो जाता है और वे भगवान के साथ अपने नित्य संबंध का ज्ञान प्राप्त करते हैं। तत्पश्चात् भगवान के प्रति उनकी भक्ति अनन्य, एकचित्त और अविरल होती है। चूँकि उन्हें ऐसा ज्ञान प्राप्त हो जाता है कि संसार उनका नहीं है और यह आनन्द का स्रोत नहीं है अत: वे न तो अनुकूल परिस्थितियों की तृष्णा और न ही प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए शोक व्यक्त करते हैं। इस प्रकार से वे निष्काम भक्ति में स्थित हो जाते हैं। पूर्ण आत्मसमर्पण की भावना से वे अपने परम प्रियतम श्रीकृष्ण के लिए प्रेम की अग्नि में स्वयं को आहुति के रूप में अर्पित करते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे भक्त जो ऐसे सत्य ज्ञान में स्थित हो जाते हैं, मुझे अत्यंत प्रिय हैं।
उदारा: सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् |
आस्थित: स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् || 18||
वास्तव में वे सब जो मेरे प्रति शरणागत हैं, निःसंदेह महान हैं। लेकिन जो ज्ञानी हैं और स्थिर मन वाले हैं और जिन्होंने अपनी बुद्धि मुझमें विलय कर दी है और जो केवल मुझे ही परम लक्ष्य के रूप में देखते हैं, उन्हें मैं अपने समान ही मानता हूँ
श्लोक 7.17 में ज्ञानी भक्त को श्रेष्ठ बताने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब स्पष्ट करते हैं कि अन्य तीन प्रकार के भक्त भी पुण्यात्मा हैं। जो मनुष्य किसी भी कारण से भक्ति में लीन रहते हैं, वे भी सौभाग्यशाली हैं। फिर भी वे भक्त जो ज्ञान में स्थित होते हैं, वे भौतिक सुखों को प्राप्त करने के प्रयोजन से भगवान की भक्ति नहीं करते। जिसके परिणामस्वरूप भगवान ऐसे भक्तों के निष्काम और निश्छल प्रेम में बँध जाते हैं। पराभक्ति या दिव्य प्रेम सांसारिक प्रेम से अत्यंत भिन्न होता है। यह परम प्रियतम के सुख की भावना से ओत-प्रोत होता है जबकि सांसरिक प्रेम आत्म सुख की इच्छा से प्रेरित होता है। दिव्य प्रेम देने और अपने प्रियतम की सेवा के लिए प्रेयसी के त्याग की भावना से युक्त होता है किन्तु संसारिक प्रेम में लेने की भावना प्रधान होती है। सांसारिक प्रेम में लेने की प्रवृत्ति ही चित्रित होती है जिसमें प्रियतम से कुछ प्राप्त करना ही चरम लक्ष्य होता है। चैतन्य महाप्रभु ने इस प्रकार से वर्णन किया है
कामेर तात्पर्य निज-सम्भोग केवल ।
कृष्ण-सुख-तात्पर्य-मात्र प्रेम त' प्रबल ।।
अतएव काम-प्रेमे बहुत अन्तर ।
काम अन्ध-तम प्रेम निर्मल भास्कर ।।
(चैतन्य चरितामृत आदि लीला-4.166-167)
"काम-वासना आत्म सुख के लिए होती है, किन्तु दिव्य प्रेम में मन श्रीकृष्ण के सुख में ओत-प्रोत रहता है। इन दोनों में असाधारण भिन्नता पायी जाती है। काम वासना अज्ञान के अंधकार के समान है जबकि दिव्यप्रेम शुद्ध और प्रकाशमय सूर्य के समान होता है।" ।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने इसे अत्यंत सुन्दरता से व्यक्त किया है
ब्रह्मलोक पर्यंत सुख, अरु मुक्तिहुँ सुख त्याग।
तबै धरहु पग प्रेम पथ, नहिं लगि जैहैं दाग।।
(भक्ति शतक-45)
"यदि तुम भक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर होना चाहते हो तब सांसारिक सुखों और मुक्ति की कामनाओं का त्याग कर दो। अन्यथा दिव्यप्रेम का शुद्ध जल स्वार्थ रुपी मल से दूषित हो जाएगा।" नारद मुनि ने विशुद्ध भक्ति का निरूपण इस प्रकार से किया है
तत्सुख्सुखित्वम् ।।
(नारद भक्ति दर्शन, सूत्र-24)
"सच्चा प्यार प्रियतम के सुख के लिए होता है।" सांसारिकता द्वारा अभिप्रेरित भक्त ऐसी भक्ति में लीन नहीं हो सकते लेकिन जिस भक्त को इसका ज्ञान होता है वह निजी स्वार्थ के स्तर से ऊपर उठ जाता है। जब कोई इस प्रकार से भगवान से प्रेम करना सीख जाता है तब भगवान उस भक्त के दास बन जाते हैं। भगवान का सबसे बड़ा गुण भक्तवत्सलता है। पुराणों में ऐसा उल्लेख किया गया है
गीत्वा च मम नामानि विचरेन्मम सन्निधौ।
इति ब्रवीमि ते सत्यं क्रीतोहं तस्य चार्जुन ।।
(आदि पुराण-1.2.231)
श्रीकृष्ण कहते हैं "मैं अपने उन भक्तों का दास बन जाता हूँ जो मेरे नामों की महिमा का गान करते हैं और अपने ध्यान में मेरा ही चिन्तन करते हैं। हे अर्जुन! यह सत्य है-भगवान अपने निष्काम परमभक्तों के ऋणी हो जाते हैं।" गीता के इस श्लोक में तो भगवान यहाँ तक कह देते हैं कि वे ऐसे भक्तों को अपने समान देखते हैं।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते |
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ: || 19||
अनेक जन्मों की आध्यात्मिक साधना के पश्चात् जिसे ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वह मुझे सबका उद्गम जानकर मेरी शरण ग्रहण करता है। ऐसी महान आत्मा वास्तव में अत्यन्त दुर्लभ होती है।
यह श्लोक सामान्य धारणा को स्पष्ट करता है। प्रायः ऐसे लोग जो को ज्ञान से निम्न मानकर उसका उपहास करने में प्रवृत्त रहते हैं। वे ज्ञान प्राप्ति के अपने दंभ को प्रसारित करते रहते हैं और भक्ति में तल्लीन लोगों को निम्न दृष्टि से देखते हैं। किन्तु इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने एकदम विपरीत कहा है। वे कहते हैं कि अनेक जन्मों तक ज्ञान का अनुशीलन करने के पश्चात् जब ज्ञानी का ज्ञान परिपक्व अवस्था को प्राप्त करता है तब वह अंततः भगवान के शरणागत होता है।
वास्तव में सच्चा ज्ञान भक्ति की ओर ले जाता है। एक बार एक व्यक्ति समुद्र के किनारे भ्रमण कर रहा था और उसे वहाँ रेत में अंगूठी मिल गयी। उसने अंगूठी उठा ली लेकिन उसे अंगूठी का मूल्य ज्ञात नहीं था। उसने सोचा कि यह नकली आभूषण होगा और सामान्य रूप से आजकल उसका मूल्य मात्र 100 रुपये होना चाहिए। अगले दिन वह सुनार के पास गया और उससे कहा-'क्या तुम मुझे इस अंगूठी का दाम बता सकते हो? सुनार ने अंगूठी को परखा और कहा-'यह 22 केरेट का सोना है। इसका दाम एक लाख रुपये होना चाहिए।' यह सुनकर उस व्यक्ति का उस अंगूठी में अनुराग बढ़ गया। अब जब वह उस अंगूठी को देखता तब उसे इतनी प्रसन्नता होती जितनी उसे एक लाख रुपये का उपहार प्राप्त होने पर होती।
कुछ दिन व्यतीत होने के पश्चात् उसका चाचा उसे मिला जो एक सुनार था और दूसरे नगर से आया था। उसने अपने चाचा से पूछा-'क्या आप इस अंगूठी और इसमें जड़े रत्न के मूल्य का आंकलन कर सकते हो।' उसके चाचा ने अंगूठी को देखा और चिल्ला कर कहने लगा—'यह तुम्हें कहाँ से मिली? यह शुद्ध हीरा है और इसका दाम एक करोड़ रुपये होगा।' यह सुनकर वह आनन्द से झूम उठा और कहने लगा-'चाचा जी कृपया मेरे साथ उपहास न करें।' चाचा ने कहा-'नहीं मेरे बच्चे! मैं तुमसे कोई उपहास नहीं कर रहा। यदि तुम्हें विश्वास नहीं है तो तुम मुझे यह अंगूठी 75 लाख रुपये में बेच सकते हो' अब अंगूठी के वास्तविक मूल्य के संबंध में उसकी जानकारी पुष्ट हो गयी। तत्क्षण उसकी अंगूठी में आसक्ति बढ़ गयी। उसे लगा कि उसने कोई लॉटरी जीत लिया है और उसके आनन्द की कोई सीमा नहीं थी।
यह देखें कि कैसे उस व्यक्ति का उस अंगूठी के प्रति अनुराग उसके ज्ञान के अनुपात के अनुसार बढ़ता गया। जब उसे ज्ञात हुआ कि अंगूठी का दाम 100 रुपये है तब उसका अनुराग उसके प्रति कुछ सीमा तक बढ़ा। जब उसे यह जानकारी मिली कि उस अंगूठी का दाम एक लाख रुपये है तब उसी अनुपात में अंगूठी के प्रति उसका अनुराग और अधिक बढ़ गया। फिर जब उसे यह ज्ञात हुआ कि अंगूठी का वास्तविक मूल्य एक करोड़ रुपये है फिर उसके प्रति उसकी आसक्ति और बढ़ गई। उपर्युक्त उदाहरण ज्ञान और प्रेम के प्रत्यक्ष पारस्परिक संबंध को चित्रित करता है। रामचरितमानस में भी वर्णन किया गया है
जानें बिन होइ न परतीती।
बिनु परतीती होइ नहिं प्रीती ।।
"बिना ज्ञान के श्रद्धा उत्पन्न नहीं हो सकती और बिना श्रद्धा के प्रेम नहीं बढ़ सकता।" इसलिए सच्चा ज्ञान स्वाभाविक रूप से प्रेम का सूचक प्राप्त होता है। यदि हम यह दावा करते हैं कि हम ब्रह्म के ज्ञान से सम्पन्न हैं लेकिन यदि हम उसके प्रति प्रेम की अनुभूति नहीं करते तब हमारा ज्ञान केवल सैद्धान्तिक ही होता है।
यहाँ श्रीकृष्ण यह व्यक्त करते हैं कि अनेक जन्मों तक ज्ञान का अनुशीलन करने के पश्चात् जब ज्ञानी मनुष्य का ज्ञान परिपक्व होकर सत्य ज्ञान में परिवर्तित हो जाता है तब वह परम प्रभु को सभी का उद्गम जानकर उनके शरणागत होता है। इस श्लोक में यह चित्रित किया गया है कि महान आत्माएँ विरली ही होती हैं। भगवान ऐसे वचन ज्ञानी, कर्मी, हठ योगी इत्यादि के लिए नहीं कहते अपितु वे यह सब केवल अपने भक्त के लिए कहते हैं और यह घोषणा भी करते हैं कि ऐसी महान आत्माएँ अत्यंत दुर्लभ होती हैं, जो यह समझती हैं कि “भगवान ही सबकुछ हैं और उनके शरणागत होती हैं।" ।
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञाना: प्रपद्यन्तेऽन्यदेवता: |
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियता: स्वया || 20||
वे मनुष्य जिनकी बुद्धि भौतिक कामनाओं द्वारा हर ली गयी है, वे देवताओं की शरण में जाते हैं। अपनी-अपनी प्रवृत्ति के अनुसार वे देवताओं की पूजा करते हैं और इन देवताओं को संतुष्ट करने के लिए वे धार्मिक कर्मकाण्डों में संलग्न रहते हैं।
जब भगवान श्रीकृष्ण सभी अस्तित्वों के आधार हैं तब कोई भी देवता अपने आप में स्वतंत्र नहीं हो सकता। जैसे किसी देश का राष्ट्रपति देश की शासन व्यवस्था का संचालन कई अधिकारियों की सहायता से करता है उसी प्रकार से देवता भी भगवान के शासन के अधिकारी हैं। हमारे जैसी जीवात्माएँ जोकि आध्यात्मिक रूप से समुन्नत हैं, वे अपने पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों के परिणामस्वरूप भौतिक जगत की शासन व्यवस्था में उच्च पद प्राप्त कर लेती हैं। वे किसी को माया के बंधनों से मुक्ति नहीं दिला सकतीं क्योंकि वे अपने आप में स्वतंत्र नहीं हैं। वे केवल अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर की भौतिक वस्तुएँ प्रदान कर सकती हैं। लौकिक कामनाओं की पूर्ति हेतु लोग देवताओं की पूजा करते हैं और उनकी पूजा के लिए निश्चित धार्मिक विधियों का पालन करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे लोग जिनका ज्ञान भौतिक इच्छाओं से आच्छादित हो जाता है वही देवताओं की पूजा करते हैं।
यो यो यां यां तनुं भक्त: श्रद्धयार्चितुमिच्छति |
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् || 21||
भक्त श्रद्धा के साथ स्वर्ग के देवता की जिस रूप की पूजा करना चाहता है, मैं ऐसे भक्त की श्रद्धा को उसी रूप में स्थिर करता हूँ।
परमात्मा की पूजा में आस्था होना अत्यंत लाभकारी है और यह सच्चे ज्ञान से प्राप्त होता है। यदि संसार में अपने आस-पास देखें तो हम यह पाते हैं कि स्वर्ग के देवताओं के भक्त भी इसी प्रकार की दृढ़ता और अदम्य श्रद्धा विश्वास के साथ उनकी भक्ति में लीन रहते हैं। आश्चर्य है कि कैसे ये लोग ऐसी निम्न स्तर की आराधना करते हुए उच्च स्तर की श्रद्धा भक्ति विकसित कर लेते हैं। श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में इसका उत्तर प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं कि वे ही देवताओं के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करते हैं। जब वे लोगों को अपनी लौकिक कामनाओं की पूर्ति हेतु देवताओं की पूजा करते हुए देखते हैं तब वे उनके विश्वास को दृढ़ कर उनकी श्रद्धा बढ़ाने में सहायता करते हैं। स्वर्ग के देवताओं में अपने भक्तों में श्रद्धा उत्पन्न करने की सामर्थ्य नहीं होती। यह भीतर निवास करने वाला परमात्मा ही उनमें श्रद्धा उत्पन्न करते हैं। जैसा कि भगवान श्रीकृष्ण ने श्लोक 15.15 में कहा है-"मैं सभी प्राणियों के हृदय में बैठा हूँ। स्मृति, ज्ञान और बुद्धि मुझसे ही प्राप्त होती है।"
अब कोई पूछ सकता है कि परमात्मा देवताओं के प्रति श्रद्धा क्यों उत्पन्न करते हैं जबकि ऐसी श्रद्धा अनुपयुक्त रूप से की जाती है। यह उसी प्रकार से है जैसे माता-पिता अपने छोटे बच्चों को बनावटी गुड़िया के साथ खेलने की अनुमति देते हैं, मानो वह जीवंत बच्चा हो। अभिभावक यह जानते हैं कि उनके बच्चे में गुड़िया के प्रति अनुराग अज्ञानता के कारण है पर फिर भी वे इसलिए अपने बच्चे को गुड़िया से प्रेम करने और उसके साथ खेलने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, क्योंकि वे यह जानते हैं कि इससे उसमें अनुराग, प्रेम और देखभाल करने जैसे गुणों को विकसित करने में सहायता मिलेगी और जब वह बच्चा बड़ा होगा तब यह सब उसके लिए लाभदायक होगा। उसी तरह जब जीवात्माएँ सांसारिक सुखों की कामना से देवताओं की आराधना करती हैं तब भगवान उनके विश्वास को इस आशा के साथ दृढ़ करते हैं कि ये सब अनुभव आत्मा के उत्थान में सहायता करेंगे। फिर एक दिन आत्मा भगवान की शरण में आकर उन्हें ही सबका परमार्थ करने वाला समझने लगेगी।
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते |
लभते च तत: कामान्मयैव विहितान्हि तान् || 22||
श्रद्धायुक्त होकर ऐसे भक्त किसी देवता विशेष की पूजा करते हैं और अपनी वांछित वस्तुएँ प्राप्त करते हैं किन्तु वास्तव में ये सारे लाभ मेरे द्वारा ही प्रदान किए जाते हैं।
लभते का अर्थ 'प्राप्त करना' है। देवताओं के भक्त देवता विशेष की पूजा कर अपनी इच्छा के पदार्थ प्राप्त करते हैं किन्तु वास्तव में यह पदार्थ देवता नहीं देते अपितु भगवान ही सब कुछ प्रदान करते हैं। इस श्लोक का अर्थ स्पष्ट है कि देवताओं के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है कि वे भौतिक वस्तुओं को प्रदान कर सकें। भगवान से स्वीकृति प्राप्त होने पर ही वे अपने भक्तों को सांसारिक पदार्थ प्रदान कर सकते हैं। वे अपने भक्तों को सांसारिक पदार्थ तभी प्रदान कर सकते हैं जब भगवान इन्हें प्रदान करने की स्वीकृति प्रदान कर देते हैं। किन्तु अल्प ज्ञानी लोग यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यह सब सुख-सुविधाएँ उन देवताओं से ही प्राप्त होती हैं जिनकी वह पूजा करते हैं।
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् |
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि || 23||
किन्तु ऐसे अल्पज्ञानी लोगों को प्राप्त होने वाले फल भी नश्वर होते हैं। जो लोग देवताओं की पूजा करते हैं, वे देव लोकों को जाते हैं जबकि मेरे भक्त मेरे लोक को प्राप्त करते हैं।
प्राथमिक विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करना अनिवार्य है। लेकिन बड़े होने पर छात्रों को प्राथमिक विद्यालय छोड़ना पड़ता है। यदि कोई छात्र प्राथमिक विद्यालय में आवश्यकता से अधिक रहना चाहता है तब अध्यापक उसे प्रोत्साहित नहीं करेगा और छात्र को जीवन में आगे बढ़ने की शिक्षा देगा। इसी प्रकार से नव दीक्षित साधक देवताओं की पूजा करना चाहते हैं।
श्लोक 7.21 में किए गए वर्णन के अनुसार श्रीकृष्ण उनके विश्वास को दृढ़ करते हैं किन्तु भगवद्गीता आध्यात्मिक छात्रों के लिए कोई प्राथमिक विद्यालय नहीं है और इसलिए वे अर्जुन को आध्यात्मिक सिद्धान्त समझने के लिए कहते हैं-"किसी की पूजा करने से उसी का फल प्राप्त होता है। वे जो देवताओं की पूजा करते हैं वे मृत्यु पश्चात् देवताओं के लोक में जाते हैं और जो मेरी आराधना करते हैं, वे मेरे धाम में प्रवेश करते हैं।" जब देवतागण नश्वर है तब उनकी पूजा से प्राप्त होने वाले फल भी नश्वर होते हैं। किन्तु भगवान अविनाशी हैं इसलिए उनकी पूजा से प्राप्त फल स्थायी अर्थात् अनश्वर होते हैं। भगवान के भक्त उनकी नित्य सेवा और सदा के लिए उनके धाम को प्राप्त करते हैं।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धय: |
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् || 24||
बुद्धिहीन मनुष्य सोचते हैं कि मैं परमेश्वर पहले निराकार था और अब मैंने यह साकार रूप धारण किया है, वे मेरे इस अविनाशी और सर्वोत्तम दिव्य स्वरूप की प्रकृति को नहीं जान पाते।
कुछ लोग दृढ़तापूर्वक यह दावा करते हैं कि भगवान निराकार है जबकि अन्य लोग निश्चयपूर्वक कहते हैं कि भगवान केवल साकार रूप में है। किन्तु ये दोनों दृष्टिकोण सीमित और अपूर्ण हैं। भगवान पूर्ण है इसलिए वे निराकार और साकार दोनों रूप में विद्यमान रहते हैं। इसकी चर्चा श्लोक 4.5 और 4.6 की टिप्पणी में की गयी है। भगवान के दोनों रूपों को स्वीकार करने वाले लोगों के मध्य कभी-कभी यह विवाद उत्पन्न होता है कि भगवान के इन दोनों रूपों में से कौन सा रूप वास्तविक है। क्या निराकार रूप साकार व्यक्तित्त्व के रूप में प्रकट होता है या इसके विपरीत? श्रीकृष्ण यहाँ इस विवाद का समाधान यह कहकर करते हैं कि उनका यह दिव्य रूप अनादिकालीन है और यह निराकार ब्रह्म से प्रकट नहीं हुआ है। भगवान आध्यात्मिक क्षेत्र में अपने दिव्य स्वरूप में नित्य विद्यमान रहते हैं। निराकार ब्रह्म एक ज्योति है जो उसके अलौकिक शरीर से प्रकट होती है। पद्मपुराण में वर्णन है
यन्नखेन्दुरुचिर्ब्रह्म ध्येयं ब्रह्मदिभि: सुरै: ।
गुणत्रयमतीतं तं वन्दे वृन्दावनेश्वरम् ।।
(पद्मपुराण, पाताल खण्ड-77.60)
"भगवान के पैर के नखों से प्रकट होने वाली ज्योति की ज्ञानी ब्रह्म के रूप में पूजा करते हैं।" वास्तव में भगवान के साकार और निराकार रूपों के बीच कोई अन्तर नहीं है। ऐसा नहीं है कि एक बड़ा और दूसरा छोटा है। निराकार ब्रह्म स्वरूप में भगवान की सभी शक्तियाँ विद्यमान रहती हैं किन्तु वे अप्रकट रहती हैं। उनके साकार रूप में उनके नाम, रूप, लीला, गुण, धाम और संत सब उनकी दिव्य शक्ति से प्रकट होते हैं। तब फिर लोग भगवान को साधारण मानव क्यों मानते हैं? इस प्रश्न के उत्तर की व्याख्या अगले श्लोक में की गयी है।
नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत: |
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् || 25||
मैं सभी के लिए प्रकाशित नहीं हूँ क्योंकि सब मेरी अंतरंग शक्ति 'योगमाया' द्वारा आच्छादित रहते हैं। इसलिए मूर्ख और अज्ञानी लोग यह नहीं जानते कि मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ।
श्लोक 7.4 और 7.5 में अपनी दो शक्तियों का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण अपनी तीसरी अतरंग शक्ति 'योगमाया' का उल्लेख करते हैं। यह भगवान की परम शक्ति है। विष्णु पुराण में इस प्रकार से वर्णन किया गया है
विष्णु शक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथाऽपरा।
अविद्या कर्म सञ्ज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ।।
"परमात्मा श्री विष्णु की तीन प्रमुख शक्तियाँ हैं-योगमाया, जीव और माया।" जगद्गुरु श्री कृपालु जी ने भी इसका विशद वर्णन किया है
शक्तिमान की शक्तियाँ, अगनित यदपि बखान।
तिन महँ 'माया', 'जीव', अरु, 'परा' त्रिशक्ति प्रधान ।।
(भक्ति शतक श्लोक-3)
"शक्तिमान परमात्मा श्रीकृष्ण की अनन्त शक्तियाँ हैं। इनमें योगमाया, जीव और माया प्रमुख हैं"
दिव्य अंतरंग शक्ति 'योगमाया' भगवान की सर्वोच्च शक्ति है जिसके द्वारा वे अपनी दिव्य लीलाएँ, अपना दिव्य प्रेम, अपना दिव्य आनन्द और दिव्य लोक प्रकट करते हैं।
भगवान संसार में अवतार लेते हैं और पृथ्वी लोक पर अपनी लीलाओं को प्रकट करते हैं। इसी योगमाया की शक्ति द्वारा वे स्वयं को आच्छादित रखते हैं। यद्यपि भगवान हमारे हृदय में विराजमान हैं किन्तु हमें उनकी उपस्थिति का कोई बोध नहीं होता। जब तक योगमाया उनकी दिव्यता को हमसे गुप्त रखती है तब तक हम उनके दिव्य दर्शन करने में समर्थ नहीं हो सकते। इसलिए यदि हम वर्तमान में भगवान को साकार रूप में भी देखते हैं तब भी हम उन्हें भगवान के रूप में पहचानने में समर्थ नहीं हो सकते। जब भगवान की योगमाया शक्ति हम पर कृपा करती है केवल तभी हम भगवान के दिव्य रूप को देख सकते हैं और उन्हें भगवान के रूप में पहचानने लगते हैं।
चिदानंदमय देह तुम्हारी।
बिगत विकार जान अधिकारी।।
(रामचरितमानस)
"हे भगवान, आपका स्वरूप दिव्य है। केवल वे जिनका हृदय शुद्ध है, आपकी कृपा से आपको जान सकते हैं।"
योगमाया शक्ति निराकार और साकार दोनों रूपों में प्रकट होती है जैसे कि राधा, सीता, काली, लक्ष्मी, पार्वती आदि। ये सब योगमाया शक्ति के दिव्य रूप हैं और वैदिक संस्कृति में इन सबको ब्रह्माण्ड की माँ के रूप में चित्रित किया गया है। ये अपनी उदारता, करुणा, क्षमा, और अकारण प्रेम जैसे गुणों से प्रकाशित हैं। हमारे लिए यह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि ये जीवात्मा पर अपनी दिव्य कृपा बरसाते हुए उन्हें अलौकिक ज्ञान प्रदान करती हैं जिसके द्वारा वह भगवान को जान सके। इसलिए वृंदावन के भक्त 'राधे राधे श्याम मिला दे' गाते रहते है अर्थात 'हे राधे! अपनी अनुकम्पा प्रदान कर कृष्ण से मिलने में मेरी सहायता करो।' इस प्रकार योगमाया दोनों कार्य करती है। वह भगवान को उन जीवात्माओं से आच्छादित रखती है जिनमें भगवान को जानने की पात्रता नहीं होती और शरणागत जीवात्माओं पर कृपा करती है ताकि वे भगवान को जान सके। वे लोग जिन्होंने भगवान की ओर अपनी पीठ कर रखी है अर्थात् जो भगवान से विमुख रहते हैं, वे माया से आच्छादित हो जाते हैं और योगमाया की कृपा से वंचित रहते हैं। जो भगवान की ओर अपना मुख कर लेते हैं वे योगमाया की शरण में आते हैं और माया के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन |
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन || 26||
हे अर्जुन! मैं भूत, वर्तमान और भविष्य को जानता हूँ। मैं सभी प्राणियों को जानता हूँ। लेकिन मुझे कोई नहीं जानता।
भगवान सर्वज्ञ हैं। यहाँ वे स्वयं को त्रिकालदर्शी घोषित करते हैं। उन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य की जानकारी है जबकि हम तो यही भूल जाते हैं कि कुछ घंटे पूर्व हमने क्या सोचा था? भगवान ब्रह्माण्ड की प्रत्येक जीवात्मा के सभी जन्मों का, उनके जीवन के प्रत्येक क्षण के विचारों, शब्दों और कर्मों का स्मरण रखते हैं। यही हमारे संचित कर्म बनते हैं। भगवान इन सब कर्मों का लेखा जोखा रखते हैं, ताकि वे कर्म के अनुसार न्याय प्रदान कर सकें। इसी कारण से वे कहते हैं कि वे भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता हैं। मुंडकोपनिषद् में वर्णन है
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः।
(मुंडकोपनिषद्-1.1.9)
"भगवान सब कुछ जानने वाले और सर्वज्ञ हैं"
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में कहते हैं कि यद्यपि वह सब कुछ जानते हैं किन्तु उन्हें कोई नहीं जानता। भगवान का तेज, वैभव, महिमा, शक्तियाँ, गुण और आयाम अनन्त हैं। हमारी बुद्धि सीमित है, इसलिए ऐसा कोई उपाय नहीं जिससे यह सर्वशक्तिमान भगवान को समझ सके। सभी वैदिक ग्रंथ कहते हैं
नैषा तर्केण मतिरापनेया
(कठोपनिषद्-1.2.9)
"भगवान हमारे तर्क की परिधि से परे हैं।"
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।
(तैत्तिरीयोपनिषद्-2.9.1)
"हमारा मन और वाणी भगवान तक नहीं पहुँच सकती।" ।
राम अतयं बुद्धि मन बानी।
मत हमार अस सुनहि सयानी।।
(रामचरितमानस)
"भगवान का निरूपण तर्कों द्वारा नहीं कीया जा सकता और मन, वाणी और बुद्धि द्वारा उन्हें पाया नहीं जा सकता।"
केवल वही व्यक्ति भगवान को समझ सकता है जो स्वयं भगवान है। यदि वह किसी जीवात्मा पर अपनी कृपा करके, उसे अपनी बुद्धि दे देता है तब ऐसी भाग्यशाली आत्मा भगवान की शक्ति से सम्पन्न होकर भगवान को जान सकती है। भगवान को जानने के लिए भगवान की कृपा का महत्व सर्वोपरि है। इस बिन्दु पर 10वें अध्याय के 11वें श्लोक तथा 18वें अध्याय के 58वें श्लोक में विस्तार से चर्चा की गयी है।
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत |
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप || 27||
हे भरतवंशी! इच्छा तथा द्वेष के द्वन्द्व मोह से उत्पन्न होते हैं। हे शत्रु विजेता! भौतिक जगत में समस्त जीव जन्म से ही इनसे मोहग्रस्त होते हैं।
संसार द्वन्द्वों से भरपूर है, जैसे कि दिन-रात, सर्दी और गर्मी, सुख और दु:ख तथा आनन्द और पीड़ा। सबसे बडा द्वन्द्व जन्म और मृत्यु का है। जिस क्षण जीव जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित हो जाती है। मृत्यु के पश्चात् जीव पुनः अगला जन्म लेता है। जन्म और मृत्यु के दो छोरों के बीच जीवन की रंगभूमि है। ये द्विविधिताएँ सभी के अनुभवों का अभिन्न अंग हैं।
लौकिक चेतना में हम किसी को चाहते हैं और कुछ लोगों से घृणा करते हैं। यह अनुराग और विद्वेष द्वैतता का स्वाभाविक गुण नहीं है अपितु यह हमारी अज्ञानता से उत्पन्न होता है। हमारी विकृत बुद्धि यह समझती है कि लौकिक सुख ही हमारे निजी हितों की पूर्ति कर सकते हैं। हम यह समझते हैं कि पीड़ा हमारे लिए अत्यंत कष्टदायक है। हम यह अनुभव नहीं कर पाते कि भौतिक रूप से सुखदायक परिस्थितियाँ हमारी आत्मा पर पड़े सांसारिक मोह के आवरण को अधिक कठोर बना देती हैं जबकि विपरीत परिस्थितियाँ हमारे मोह को मिटाने और आत्मा को उन्नत करने में समर्थ होती हैं।
हमारे मोह का मूल कारण अज्ञानता है। मनुष्य का राग और द्वेष के द्वन्द्वों से ऊपर उठना, पसंद-नापसंद और इन दोनों को भगवान की सृष्टि के अविभाज्य रूप में अंगीकार करना ही आध्यात्मिक ज्ञान में स्थित होने का लक्षण है।
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् |
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रता: || 28||
लेकिन पुण्य कर्मों में संलग्न रहने से जिन व्यक्तियों के पाप नष्ट हो जाते हैं, वे मोह के द्वन्द्वों से मुक्त हो जाते हैं। ऐसे लोग दृढ़ संकल्प के साथ मेरी पूजा करते हैं।
श्रीकृष्ण ने दूसरे अध्याय के 69वें श्लोक में कहा था कि अज्ञानी जिसे रात्रि कहते हैं, बुद्धिमान उसे दिन कहते हैं। भगवत्प्राप्ति की अभिलाषा करने वाले जागृत हो जाते हैं और आध्यात्मिक विकास के अवसर के रूप में दु:ख एवं पीड़ा का स्वागत करते हैं। वे ऐसे सुखों से सावधान रहते हैं जो आत्मा को अज्ञान से आच्छादित करते हैं। इस प्रकार वे न तो सुख के लिए लालायित होते हैं और न ही दु:ख के लिए शोक करते हैं। ऐसी जीवात्माएँ जो अपने मन को इच्छाओं और घृणा के द्वन्द्वों से मुक्त कर देती हैं, वे अविचलित होकर दृढ़ संकल्प के साथ मेरी पूजा करती हैं।
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये |
ते ब्रह्म तद्विदु: कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् || 29||
जो मेरी शरण ग्रहण कर बुढ़ापे और मृत्यु से छुटकारा पाने की चेष्टा करते हैं, वे ब्रह्म, अपनी आत्मा और समस्त कर्म के क्षेत्र को जान जाते हैं।
जैसा कि श्लोक 7.26 में कहा गया है कि भगवान को बुद्धि की सामर्थ्य से जाना नहीं जा सकता किन्तु जो उनके शरणागत हो जाते हैं वही उनकी कृपा प्राप्त करते हैं। भगवान जब किसी पर अपनी कृपा करते हैं तब वे लोग सरलता से उसे जानने में सक्षम हो जाते हैं।
कठोपनिषद् में वर्णन है
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।
(कठोपनिषद्-1.2.23)
"भगवान को न तो आध्यात्मिक उपदेशों, बुद्धि और न ही विभिन्न प्रकार की शिक्षाओं को सुनकर जाना जा सकता है। भगवान जब किसी पर अपनी कृपा करते हैं तब केवल वही भाग्यशाली आत्मा उन्हें जान पाती है" जब कोई भगवान का ज्ञान प्राप्त कर लेता है तब वह भगवान के संबंध में सब कुछ जान लेता है। वेदों में भी उल्लेख किया गया है-“एकस्मिन् विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति" अर्थात “यदि तुम भगवान को जान जाते हो तब तुम सब कुछ जान जाओगे।"
कुछ अध्यात्मवाद के साधक आत्मज्ञान को ही चरम लक्ष्य मानते हैं। जिस प्रकार जल की बूंद महासागर का लघु अंश होती है, ठीक इसी प्रकार से आत्म ज्ञान ब्रह्म ज्ञान का छोटा सा अंश है। वे जिन्हें बूंद का ज्ञान होता है, उनके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वे महासागर की गहराई चौड़ाई और शक्ति को जान सकें। उसी प्रकार जो आत्मा को समझ लेते हैं, उनके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वे भगवान को भी जानते हों। किन्तु वे जिन्हें भगवान का ज्ञान हो जाता है उन्हें स्वतः उन सब का ज्ञान हो जाता है जो भगवान से संबंधित हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे जो उनकी शरण में आ जाते हैं उन्हें भगवान की कृपा से आत्मा और कर्म के क्षेत्र का ज्ञान हो जाता है।
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदु: |
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतस: || 30||
वे जो मुझे 'अधिभूत' (प्रकृति के तत्त्वों के नियामक) और 'अधिदेव' (देवतागण के नियामक) तथा 'अधियज्ञ' (यज्ञों के नियामक) के रूप में जानते हैं, ऐसी प्रबुद्ध आत्माएँ सदैव यहाँ तक कि अपनी मृत्यु के समय भी मेरी चेतना में लीन रहती हैं।
अगले अध्याय में श्रीकृष्ण उन प्रबुद्ध आत्माओं के संबंध में बताएँगे जो देह त्यागते समय उनका स्मरण करती हैं और उनका लोक प्राप्त करती हैं। किन्तु मृत्यु के समय भगवान का स्मरण अत्यंत कठिन होता है। इसका कारण यह है कि मृत्यु अत्यंत पीड़ादायक है। यह किसी को एक साथ दो हजार बिच्छुओं के काटने के समय होने वाली पीड़ा के समान है। मृत्यु के समय मन और बुद्धि कार्य करना बंद कर देते हैं और व्यक्ति चेतना शून्य हो जाता है तब ऐसी स्थिति में कोई भगवान का स्मरण कैसे कर सकता है?
यह केवल उनके लिए संभव है जो शरीर के सुख और दु:ख से परे हैं। ऐसे लोग बहुत सजगता से देह का त्याग करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो उन्हें अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के नियामक के रूप में जानते हैं, वे अपनी मृत्यु के समय भी उनकी चेतना से परिपूर्ण रहते हैं, क्योंकि सच्चा ज्ञान पूर्ण समर्पण की ओर ले जाता है तब मन भगवान में पूर्ण रूप से अनुरक्त हो जाता है। यह शारीरिक राग और द्वेष के प्रति विरक्त हो जाता है और ऐसी आत्मा फिर कभी शारीरिक चेतना की अनुभूति नहीं करती।
अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ शब्दों की व्याख्या अगले अध्याय में होगी।
।। श्रीमद्भागवत गीता सप्तम अध्याय सम्पूर्ण।।
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