॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhagavad Geeta Chapter 6
श्रीमद्भागवत गीता षष्ठम अध्याय
अध्याय छह: ध्यानयोग
ध्यान का योग
श्रीकृष्ण कर्मयोग और कर्म संन्यास के तुलनात्मक विवेचन को छठे अध्याय में भी जारी रखते हैं और कर्मयोग की संस्तुति करते हैं।जब हम समर्पण की भावना से कार्य करते हैं तब इससे हमारा मन शुद्ध हो जाता है और हमारी आध्यात्मिक अनुभूति गहनहो जाती है।मन के शांत हो जाने पर साधना उत्थान का मुख्य साधन बन जाती है।ध्यान द्वारा योगी मन को वश में करने काप्रयास करते हैं क्योंकि अनियंत्रित मन हमारा शत्रु है और नियंत्रित मन हमारा प्रिय मित्र है।श्रीकृष्ण अर्जुन को सावधान करतेहैं कि कठोर तप में लीन रहने से कोई सफलता प्राप्त नहीं कर सकता इसलिए मनुष्य को अपने खान-पान, कार्य-कलापों, आमोद-प्रमोद और निद्रा को संतुलित रखना चाहिए। फिर वे मन को भगवान में एकीकृत करने के लिए साधना विधि का वर्णनकरते हैं।जिस प्रकार से वायु रहित स्थान पर रखे दीपक की ज्वाला अचल होती है। ठीक उसी प्रकार साधक को भी मनसाधना में स्थिर रखना चाहिए।वास्तव में मन को वश में करना कठिन है लेकिन अभ्यास और वैराग्य द्वारा इसे नियंत्रित कियाजा सकता है।इसलिए मन यदि कहीं भटकने लगे तो हमें वहाँ से इसे वापस लाकर निरन्तर भगवान में लगाना चाहिए। जब मनशुद्ध हो जाता है तब यह दिव्य बन जाता है।आनन्द की इस अवस्था को समाधि कहते हैं।
इसके पश्चात् अर्जुन उस साधक की गति के संबंध में प्रश्न करता है जो इस मार्ग का अनुसरण करना आरम्भ तो करता हैलेकिन अस्थिर मन के कारण लक्ष्य तक पहुँचने में असमर्थ रहता है। श्रीकृष्ण उसे आश्वस्त करते हैं कि जो भगवत्प्राप्ति केलिए प्रयास करता है, उसका कभी पतन नहीं हो सकता।भगवान हमारे पूर्व जन्मों में संचित आध्यात्मिक गुणों का लेखा-जोखारखते हैं और अगले जन्मों में उस ज्ञान को पुनः जागृत करते हैं ताकि हमने अपनी यात्रा को जहाँ छोड़ा था उसे वहीं से पुनः आगेजारी रख सकें।पूर्व जन्मों से अर्जित कर्मों के बल पर योगी अपने वर्तमान जीवन में भगवान तक पहुँचने में समर्थ हो सकता है।इस अध्याय का समापन इस उद्घोषणा के साथ होता है कि योगी भगवान के साथ एकीकृत होने का प्रयास करता है इसलिएवह तपस्वी, ज्ञानी और कर्मी से श्रेष्ठ होता है। सभी योगियों में से जो भक्ति में तल्लीन रहता है वह सर्वश्रेष्ठ होता है
श्रीभगवानुवाच |
अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य: |
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय: || 1||
प्रभु ने कहा! वे मनुष्य जो कर्मफल की कामना से रहित होकर अपने नियत कर्मों का पालन करते हैं वे वास्तव में संन्यासी और योगी होते हैं, न कि वे जो अग्निहोत्र यज्ञ संपन्न नहीं करते या शारीरिक कर्म नहीं करते।
वेदों में वर्णित धार्मिक अनुष्ठानों में अग्नि प्रज्ज्वलित कर यज्ञों को संपन्न करना प्रमुख है, जैसे अग्निहोत्र यज्ञ। संसार कापरित्याग करने वालों लिए और 'संन्यास' आश्रम में प्रवेश करने वालों के लिए ऐसे नियम हैं कि वे धार्मिक विधियों काअनुपालन नहीं करेंगे और किसी भी रूप में अग्नि का प्रयोग नहीं करेंगे तथा वे केवल भिक्षा माँग कर जीवन निर्वाह करेंगे।किन्तु इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह अभिव्यक्त किया है कि केवल अग्नि का त्याग करने से कोई संन्यासी नहीं बन सकता।
सच्चा योगी और सच्चा संन्यासी कौन है? इस विषय पर अत्यधिक भ्रम है। प्रायः लोग कहते हैं-"यह स्वामी जी फलाहारी हैंइसलिए अवश्य सिद्ध योगी होंगे।" "यह दुग्धाहारी बाबाजी हैं जो केवल दूध पर निर्भर रहते हैं, अतः ये अवश्य ही महायोगी कीअवस्था को प्राप्त होंगे।" "यह पवनाहारी गुरुजी है, जो कुछ ग्रहण नहीं करते इसलिए निश्चित रूप से इन्हें भगवत्प्राप्ति होचुकी होगी।" "यह साधु नागा बाबा हैं जो कोई वस्त्र धारण नहीं करते इसलिए यह पूर्ण संन्यासी हैं।" भगवान श्रीकृष्ण कहतेहैं कि संन्यास के ऐसे बाहरी लक्षणों को दर्शाने से कोई न तो संन्यासी बन सकता है और न ही योगी। वे ज्ञानी जन जो अपनेकर्मफलों का त्याग कर उन्हें भगवान को समर्पित कर देते हैं वही सच्चे संन्यासी या योगी होते हैं।
आजकल पश्चिम जगत में 'योगा' एक रोमांचक शब्द बन गया है। संसार के सभी देशों में कुकुरमुत्ते की तरह योग संस्थानस्थापित हो रहे हैं।आँकड़े यह दर्शाते हैं कि अमेरिका के दस प्रतिशत व्यक्ति योग का अभ्यास करते हैं किन्तु संस्कृत धर्म ग्रंथोंमें 'योगा' शब्द का वर्णन नहीं किया गया है। अपितु वास्तविक शब्द 'योग' है और इसका अर्थ 'जुड़ना' है, जो मनुष्य की चेतनाको दिव्य चेतना के साथ एकीकृत करने का बोध कराता है। अन्य शब्दों में योगी वही है जिसका मन भगवान में पूर्णतयातल्लीन है। यह भी माना जाता है कि ऐसे योगी का मन स्वाभाविक रूप से संसार से विरक्त रहता है इसलिए वास्तविक योगीसच्चा संन्यासी भी होता है।
इस प्रकार जो मनुष्य भगवान की श्रद्धापूर्वक सेवा की भावना से कर्मयोग का अनुसरण करते हुए फल की इच्छा से रहितहोकर कर्म करते हैं चाहे वे गृहस्थी ही क्यों न हों, ऐसे मनुष्य ही वास्तव में सच्चे योगी और वास्तविक संन्यासी होते हैं।
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव |
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन || 2||
जिसे संन्यास के रूप में जाना जाता है वह योग से भिन्न नहीं है। कोई भी सांसारिक कामनाओं का त्याग किए बिना संन्यासी नहीं बन सकता।
संन्यासी वही है जो मन और इन्द्रियों के सुखों का परित्याग करता है | किन्तु केवल संन्यास लेना ही लक्ष्य नहीं है और न ही यह परम लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त है। वैराग्य का अर्थ स्वयं को गलत दिशा की ओर अग्रसर होने से रोकना है। हम संसार में सुखों को खोजते हैं और जब हम यह जान जाते हैं कि भौतिक पदार्थों से कोई सुख नहीं मिल सकता तब हम संसार की ओर भागना बंद कर देते हैं। किन्तु केवल रुकने से हम गन्तव्य तक नहीं पहुँच सकते। आत्मा का गन्तव्य भगवत्प्राप्ति है। भगवान की ओर सम्मुख होने के लिए उसमें मन को तल्लीन करना है जोकि योग का मार्ग है। जिन्हें अपने जीवन के परम लक्ष्य का अपूर्ण ज्ञान होता है वे संन्यास को आध्यात्मिकता के परम लक्ष्य के रूप में देखते हैं। किन्तु जो वास्तव में जीवन के परम लक्ष्य को जानते हैं वे श्रद्धापूर्वक भगवत्प्राप्ति को अपना परम लक्ष्य मानते हैं।
श्लोक 5.4 का अभिप्राय यह स्पष्ट करना था कि वैराग्य दो प्रकार का होता है-पहला-'फल्गु वैराग्य' और दूसरा 'युक्त वैराग्य' होता है। फल्गु वैराग्य में सांसारिक पदार्थों को माया के रूप में देखा जाता है और इसलिए संन्यासियों द्वारा उनका परित्याग कर दिया जाता है क्योंकि वे आत्मिक उन्नति के लिए दृढ़ संकल्पित होते हैं। युक्त वैराग्य वह है जिसमें सभी पदार्थों में भगवान का रूप दिखाई देता है और इसलिए उनका प्रयोग भगवान की सेवा के निमित्त किया जाता है। फल्गु वैराग्य में कोई योगी यह कह सकता है- 'धन का त्याग करो', 'इसे छुओ भी मत', 'यह माया का रूप है' और 'आध्यात्मिकता के पथ की ओर अग्रसर होने में बाधा डालता है।' दूसरे प्रकार के वैराग्य में कोई यह कह सकता है-'धन भगवान की माया शक्ति का रूप है। इसलिए इसे व्यर्थ मत करो या फेंको मत, जो भी तुम्हारे स्वामित्व में है उसे भगवान के सेवार्थ अर्पित कर दो।'
फल्गु वैराग्य अस्थायी है और यह सरलता से सांसारिक आसक्ति में खींच सकता है। इसका फल्गु नाम बिहार राज्य के गया नगर में बहने वाली नदी के नाम पर पड़ा है। फल्गु नदी सतह से नीचे बहती है। ऊपर से ऐसा लगता है कि नदी में पानी नहीं है किन्तु अगर हम कुछ गहराई तक इसे खोदते हैं तब हमें नीचे पानी की धारा मिल जाती है। सामान्यतः कई लोग संसार को त्याग कर मठों में रहने लगते हैं। किन्तु कुछ समय में उनका वैराग्य समाप्त हो जाता है और मन पुनः संसार की ओर आसक्त हो जाता है। उनकी संसार के प्रति अनासक्ति फल्गु वैराग्य जैसी ही थी। संसार को बोझ और कष्टदायी समझ कर उन्होंने संसार से सन्यास लेने की इच्छा की और मठों में आश्रय लिया। जब उन्हें यह प्रतीत हुआ कि आध्यात्मिक जीवन भी कठिन और दुष्कर है तब उनकी आध्यात्मिकता से भी उसी प्रकार से विरक्ति हो गयी। दूसरी ओर अन्य लोग भगवान के साथ मधुर संबंध स्थापित करने के लिए और उनकी सेवा की इच्छा से प्रेरित होकर संसार का त्याग कर मठों में जीवन व्यतीत करते हैं। उनका वैराग्य 'युक्त वैराग्य' है। वे प्रायः कठिनाइयों का सामना करने पर भी अपनी आध्यात्मिक यात्रा जारी रखते हैं।
इस श्लोक की प्रथम पंक्ति में श्रीकृष्ण ने यह अभिव्यक्त किया है कि सच्चा संन्यासी ही योगी होता है अर्थात् वह जो अपने मन को भगवान की प्रेममयी सेवा में लगा देता है। दूसरी पंक्ति में श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि लौकिक कामनाओं का त्याग किए बिना कोई भी योगी नहीं बन सकता। यदि मन में सांसारिक कामनाएँ रहती हैं तब स्वाभाविक रूप से मन सांसारिक आकर्षणों की ओर भागेगा। क्योंकि यह मन ही है, जिसे भगवान के साथ युक्त होना है और यह तभी सम्भव है जब मन सभी प्रकार की सांसारिक कामनाओं से मुक्त हो। इसलिए किसी को योगी बनने के लिए भीतर से संन्यासी बनना पड़ेगा और संन्यासी केवल वही हो सकता है जो योगी भी हो।
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते |
योगारूढस्य तस्यैव शम: कारणमुच्यते || 3||
जो योग मार्ग से भगवत्प्राप्ति की अभिलाषा करते हैं उनके लिए बिना आसक्ति के कर्म करना साधन है और वे योगी जिन्हें पहले से योग में उच्चता प्राप्त है, उनके लिए ध्यानावस्था में परमशांति को साधन कहा जाता है।
तीसरे अध्याय के तीसरे श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह उल्लेख किया था कि आत्म कल्याण के दो मार्ग हैं-पहला 'ज्ञान का मार्ग' और दूसरा 'कर्म का मार्ग।' इनमें से श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म के मार्ग का अनुसरण करने का उपदेश दिया। पाँचवें अध्याय के दूसरे श्लोक में उन्होंने पुनः उसे उत्तम मार्ग बताया। क्या इसका अभिप्राय यह है कि हमें जीवन पर्यन्त कर्म करना चाहिए? इस प्रश्न का पूर्वानुमान कर श्रीकृष्ण इसकी सीमा निर्धारित करते हैं। जब हम कर्मयोग का अनुपालन करते हैं तब यह मन को शुद्धिकरण और आध्यात्मिक ज्ञान की परिपक्वता की ओर ले जाता है। किन्तु एक बार जब हमारा मन शुद्ध हो जाता है और हम योग में स्थित हो जाते हैं तब हम कर्मयोग का त्याग कर संन्यास ले सकते हैं। फिर लौकिक गतिविधियों का कोई प्रयोजन नहीं रहता और ध्यान हमारी साधन बन जाती है। इसलिए हमें उसी मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो हमारी योग्यता के अनुरूप हो। श्रीकृष्ण इस श्लोक में योग्यता का वर्णन करते हैं। इसलिए वे कहते हैं कि जो योग प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं उनके लिए कर्मयोग उपयुक्त है और जो योग में उन्नत हैं उनके लिए कर्म संन्यास अधिक उपयुक्त है। योग शब्द लक्ष्य और साधन दोनों के लिए प्रयुक्त है। जब हम इसे लक्ष्य के रूप में स्वीकार करते हैं तब हम योग शब्द का प्रयोग 'भगवान के साथ एकीकृत होने' के अर्थ के रूप में कर सकते हैं और जब हम इसे प्रक्रिया के रूप में देखते हैं तब योग का अभिप्राय 'भगवान के साथ जुड़ने का मार्ग' हो जाता है।
इस दूसरे संदर्भ में योग उस सीढ़ी के समान है जिस पर चढ़कर हम भगवान तक पहुंचते हैं। सीढ़ी के नीचे के पायों पर लौकिक विषयों में तल्लीन आत्मा सांसारिकता में जकड़ी रहती है। योग रूपी सीढ़ी आत्मा को इस स्तर से ऊपरी स्तर तक ले जाती है जहाँ चेतना दिव्यता में तल्लीन होती है। सीढ़ी के विभिन्न पायों के अलग-अलग नाम हैं लेकिन सबके लिए योग एक सामान्य शब्द है। 'योग-आरुरुक्षो' वे साधक हैं जो भगवान में एकाकार होने की अभिलाषा करते हैं और इस योग रुपी सीढ़ी पर चढ़ना आरम्भ करते हैं। 'योग-आरुढस्य' वे साधक हैं जो इस सीढ़ी के सबसे ऊपर के पाये तक पहुँच चुके होते हैं। इसलिए हम योग विज्ञान में कैसे उन्नत हो सकें, इसकी विवेचना श्रीकृष्ण अगले श्लोक में करेंगे।
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते |
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते || 4||
जब कोई मनुष्य न तो भौतिक विषयों में और न ही कर्मों के अनुपालन में आसक्त होता है, वैसा मनुष्य कर्म फलों की सभी इच्छाओं का त्याग करने के कारण योग मार्ग में आरूढ़ कहलाता है।
जब मन भगवान में अनुरक्त हो जाता है तब यह स्वतः संसार से विरक्त हो जाता है। अतः किसी के मन की दशा का मूल्यांकन यह निरीक्षण करके किया जा सकता है कि क्या उसका मन सभी प्रकार की लौकिक कामनाओं के चिन्तन से मुक्त हो गया है? वही व्यक्ति संसार से विरक्त समझा जाता है जो न तो भौतिक सुखों की लालसा करता है और न ही उन्हें पाने के लिए कर्म करता है। ऐसा व्यक्ति इन्द्रिय सुखों को उत्पन्न करने वाले अवसरों की खोज करना बंद कर देता है और अंततः विषय भोग से सुख पाने के सभी विचारों का शमन कर देता है तथा सभी पुराने सुखों की स्मृतियों को मिटा देता है। तब मन निजी स्वार्थों की तुष्टि हेतु किसी बहकावे में कभी नहीं फँसता। जब हम मन पर इस तरह शासन करने की अवस्था पा लेते हैं तभी हम योग में उन्नत माने जाते हैं।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् |
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: || 5||
मन की शक्ति द्वारा आत्म उत्थान करो और स्वयं का पतन न होने दो। मन ही जीवात्मा का मित्र और शत्रु दोनों हो सकता है
हम अपने आत्म उत्थान और पतन के लिए स्वयं उत्तरदायी होते हैं। हमारे लिए भगवत्प्राप्ति के मार्ग में कोई भी बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता। संत और गुरु हमें मार्ग दिखाते हैं, किन्तु हम अपनी इच्छा के मार्ग पर चलना चाहते हैं। हिन्दी में कहावत है- 'एक पेड़ पर दो पक्षी बैठे, एक गुरु एक चेला, अपनी करनी गुरु उतरे, अपनी करनी चेला।' इसका अर्थ यह है कि एक पेड़ पर दो पक्षी बैठे हैं-एक गुरु और चेला। गुरु का पतन उसके स्वयं के कर्मों से होगा और चेला भी अपने कर्मों से नीचे की ओर गिरेगा।
इस जन्म से पूर्व हमारे अनन्त जन्म हो चुके हैं और भगवत्प्राप्त संत भी सदा धरती पर रहे हैं। यदि किसी भी समय संसार ऐसे संतों से विहीन होता तब उस समय जीवात्माओं को भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती थी। अतः फिर लोग मानव जीवन के परम लक्ष्य भगवत्प्राप्ति को कैसे पा सकते थे? इसलिए भगवान यह सुनिश्चित करते हैं कि महापुरुष सदा प्रत्येक युग में विद्यमान रहकर निष्ठावान भक्तों का मार्गदर्शन करें और मानवता के प्रेरक बनें। इस प्रकार हम अनन्त पूर्व जन्मों में कई बार इस प्रकार के संतों से मिले हैं किन्तु फिर भी हमें कभी भगवत्प्राप्ति नहीं हुई। इसका तात्पर्य यह है कि उचित मार्गदर्शन का अभाव कभी नहीं था लेकिन या तो इन संतों के उपदेशों को स्वीकार करने में हमारी मूर्खता या इनका अनुपालन न करना ही मुख्य समस्या रही होगी। इसलिए हमें पहले अपनी वर्तमान आध्यात्मिक अवस्था या इसकी कमी को स्वीकार करना चाहिए। यदि हमें अपनी वर्तमान अवस्था का बोध हो जाता है केवल तभी हमारे भीतर आत्म विश्वास जागृत होता है और हम अपने प्रयत्नों से भी स्वयं का उत्थान कर सकते हैं।
जब हम आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग में प्रतिकूलताओं का सामना करते हैं तब हम यह शिकायत करते हैं कि अन्य लोग हमारे कष्ट का कारण हैं और वे हमारे शत्रु हैं। जबकि हमारा सबसे बड़ा शत्रु हमारा अपना मन है। विध्वंस का कारण यही मन है। मन हमारी परम लक्ष्य की अभिलाषा को निष्फल कर देता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि एक ओर जीवात्मा के परम हितैषी के रूप में मन में हमें परम लाभ प्रदान करने की क्षमता होती है तथा दूसरी ओर उसमें हमें अधिकतम हानि पहुँचाने की क्षमता भी होती है। नियंत्रित मन अद्भुत कार्य पूर्ण कर सकता है जबकि अनियंत्रित मन अति अधम विचारों के द्वारा हमारी चेतना को विकृत कर सकता है। मन का मित्र के रूप में प्रयोग करने के लिए इसकी प्रवृति को समझना आवश्यक है। हमारा मन चार तत्त्वों द्वारा संचालित होता है-
मनः जब इसमें विचार उत्पन्न होते हैं तब हम इसको मन कहते हैं।
बुद्धिः जब यह विश्लेषण और निर्णय करता है तब हम इसे बुद्धि कहते हैं।
चित्तः जब यह किसी विषय या व्यक्ति के प्रति आसक्त हो जाता है तब हम इसे चित्त कहते हैं।
अहंकारः जब हमें धन, प्रतिष्ठा, सुन्दरता और ज्ञान जैसी चीजों पर अहंकार हो जाता है तब हम इसे अहंकार कहते हैं।
यह चारों पृथक तत्त्व नहीं है। यह केवल मन की चार उपाधियाँ हैं। इसलिए हम इन्हें 'मन या मन-बुद्धि' या 'मन-बुद्धि-अहंकार' या 'मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार' कह सकते हैं। इन सबका अभिप्राय एक ही है।
फ्रॉयडियन मनोविज्ञान में अहंकार शब्द का प्रयोग भिन्न अर्थ में किया गया है। सिगमंड फ्रॉयड (1856-1939)। इन्होने मन कैसे कार्य करता है, इसका पहला मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त प्रस्तुत किया। उसके अनुसार अहंकार हमारा 'वास्तविक स्वरुप' है जो हमारी कामनाओं (इड) और बचपन में सीखे गए संस्कारों को जोड़ता है।
विभिन्न ग्रंथ मन का निरूपण करने के लिए इन चारों अवयवों में से किसी एक का विश्लेषण करते हैं। यह सभी पद उसी तंत्र की ओर संकेत करते हैं जिसे अन्तःकरण या मन कहा जाता है। उदाहरणार्थ-
1. पंचदशी इन सभी चारों का एक साथ मन के रूप में उल्लेख करता है और यह व्यक्त करता है कि यह भौतिक बंधनों का कारण हैं।
2. भगवद्गीता में श्रीकृष्ण बार-बार मन और बुद्धि की चर्चा करते हैं और इन्हें भगवान को समर्पित करने पर बल देते हैं।
3. योग दर्शन प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों का विश्लेषण करते समय तीन तत्त्वों मन, बुद्धि और अहंकार की चर्चा करता है।
4. शंकराचार्य ने आत्मा को स्पष्ट करते समय मन को चार प्रकार से वर्गीकृत किया है-मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार।
इसलिए जब श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमें मन का प्रयोग स्वयं के उत्थान के लिए करना चाहिए तब उनका कहने का तात्पर्य यह होता है कि हमें अपने उन्नत मन या बुद्धि का प्रयोग कर अपने अवनत मन को ऊपर उठाना चाहिए। दूसरे शब्दों में हमें बुद्धि का प्रयोग मन को नियंत्रित करने के लिए करना चाहिए। ऐसा कैसे संभव है? इसकी विस्तृत व्याख्या श्लोक 2.41 और 2.44 और पुनः श्लोक 3.33 में की गयी है।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित: |
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् || 6||
जिन्होंने मन पर विजय पा ली है, मन उनका मित्र है। किन्तु जो ऐसा करने में असफल होते हैं मन उनके शत्रु के समान कार्य करता है।
हम जिन लोगों को अपना शत्रु समझते हैं, उनसे संघर्ष करने में ही हम अपनी विचार शक्ति और ऊर्जा को नष्ट कर देते हैं। वैदिक ग्रंथों में कहा गया है कि काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, मोह इत्यादि शत्रु हमारे भीतर रहते हैं। यह भीतरी शत्रु बाहरी शत्रुओं से अधिक घातक होते हैं। बाहरी दुराचारी लोग हमें कुछ समय के लिए ही चोट पहुंचा सकते हैं। परन्तु हमारे मन के भीतर बैठे ये दानव हमें निरन्तर दुःख पहुंचाते हैं । हम सब ऐसे लोगों को जानते हैं जिन्हें किसी वस्तु का अभाव नहीं होता किन्तु फिर भी वे दयनीय स्थिति में रहते हैं क्योंकि उनका अपना मन हताशा, घृणा, तनाव, चिन्ता और कुण्ठा द्वारा उन्हें निरन्तर संताप देता रहता है।
वैदिक दर्शन में विचारों की गंभीरता पर विशेष बल दिया गया है। विषाणु और जीवाणु ही केवल रोग का कारण नहीं होते अपितु वे नकारात्मक विचार भी होते हैं जिन्हें हम अपने मन में प्रश्रय देते हैं। यदि कोई भूलवश तुम पर पत्थर फेंकता है तब उससे तुम्हें कुछ समय तक ही दर्द होगा और अगले दिन तुम संभवतः उसे भूल जाओगे। किन्तु यदि कोई तुम्हें कुछ आपत्तिजनक शब्द कहे तो वे निरन्तर तुम्हारे मन में चुभते रहते हैं। यह विचारों की असीम शक्ति है। बौद्ध धर्म के ग्रंथ धम्मपद में (1.3) महात्मा बुद्ध ने इस सत्य को दो प्रकार से स्पष्ट किया है-
1) 'मेरा अपमान हुआ', 'मुझे चोट पहुंचाई गई', 'मुझे पीटा गया', 'मुझे लूट लिया गया'-जो इस प्रकार के विचारों को अपने मन में प्रश्रय देते हैं उनके कष्ट दूर नहीं होते।'
2) 'मेरा अपमान हुआ', 'मुझे चोट पहुंचाई गई', 'मुझे पीटा गया', 'मुझे लूट लिया'-जो इस प्रकार के विचारों को अपने मन में प्रश्रय नहीं देते उनमें क्रोध नहीं होता' अर्थात्
जब हम अपने मन में किसी के प्रति विद्वेष रखते हैं तो हमारे ये नकारात्मक विचार हमें उस व्यक्ति से भी अधिक हानि पहुँचाते हैं। यह भी कहा गया है-"कटुता स्वयं विष का सेवन कर किसी अन्य व्यक्ति के मरने की आशा करने के समान है।" समस्या यह है कि अधिकतर लोगों को यह आभास नहीं होता कि उनका अनियंत्रित मन ही उनके अधि कतर कष्टों का कारण है। इसलिए जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज यह उपदेश देते हैं
मन को मानो शत्रु उसकी, सुनहु जनि कछु प्यारे।
(साधन भक्ति तत्त्व)
"प्रिय आध्यात्मिक साधक अपने अनियंत्रित मन को शत्रु के रूप में देखो। उसके प्रभुत्व में मत आओ।" परन्तु इसी मन में हमारा प्रिय मित्र बनने की क्षमता होती है जब हम आध्यात्मिक अभ्यास द्वारा अपने मन को बुद्धि के नियंत्रण में ले आते हैं। जिस पदार्थ की शक्ति अधिक होती है, उसका दुरुपयोग उतना ही अधिक घातक होता है और उसके सदुपयोग से उसकी व्यापकता भी बृहत् हो जाती है क्योंकि मन एक ऐसा यन्त्र है जो दो धार वाली तलवार की तरह काम करता है। इस प्रकार जो आसुरी व्यक्ति हैं वे मलिन मन के कारण ऐसा करते हैं और जो उन्नत अवस्था प्राप्त कर लेते हैं वे भी अपने मन के शुद्धिकरण के कारण ऐसा करते हैं। तदनुसार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट ने इसे अत्यंत सुन्दरता से व्यक्त किया है-"मनुष्य भाग्य के अधीन नहीं हैं लेकिन वे केवल अपने मन के दास बने रहते हैं" आगे के तीन श्लोकों में श्रीकृष्ण योग में आरुढ़ पुरुष के लक्षणों का विवेचन करेंगे।
जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहित: |
शीतोष्णसुखदु:खेषु तथा मानापमानयो: || 7||
वे योगी जिन्होंने मन पर विजय पा ली है वे शीत-ताप, सुख-दु:ख और मान-अपमान के द्वंद्वों से ऊपर उठ जाते हैं। ऐसे योगी शान्त रहते हैं और भगवान की भक्ति के प्रति उनकी श्रद्धा अटल होती है।
श्रीकृष्ण ने दूसरे अध्याय के चौदहवें श्लोक में स्पष्ट किया था कि इन्द्रियों और उसके विषयों के संपर्क से मन शीत और ताप तथा सुख-दु:ख का अनुभव करता है। जब तक मन वश में नहीं होता तब तक मनुष्य इन्द्रिय सुखों के लिए उनके पीछे भागता रहता है और दुःख का अनुभव होने पर पीछे हट जाता है। जो योगी मन पर विजय पा लेता है वह इन क्षणभंगुर सुखों को आत्मा से भिन्न शारीरिक इन्द्रियों की क्रियाशीलता के रूप में देखता है। ऐसे सिद्ध योगी ताप और शीत तथा सुख और दु:ख आदि के दैत से परे रहते हैं। मन दो क्षेत्रों में भ्रमण करता है-एक माया का क्षेत्र और दूसरा भगवान का क्षेत्र। यदि मन संसार के विषयों से ऊपर उठ जाता है तब वह सुगमता से भगवान में तल्लीन हो सकता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण कहते हैं कि सिद्ध योगी का मन समाधि में स्थिर अर्थात् भगवान की गहन साधना में लीन हो जाता है।
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रिय: |
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चन: || 8||
वे योगी जो ज्ञान और विवेक से युक्त होते हैं और जो इन्द्रियों पर विजय पा लेते हैं, वे सभी परिस्थितियों में अविचलित रहते हैं। वे धूल, पत्थर और सोने को एक समान देखते हैं।
गुरु के वचनों को सुनकर और शास्त्रों के अध्ययन द्वारा प्राप्त की गयी सैद्धान्तिक जानकारी को ज्ञान कहते है। विज्ञान उस ज्ञान की अनुभूति है जो आंतरिक जागरण और विवेक के रूप में हमारे भीतर निहित है। उन्नत योगी की बुद्धि ज्ञान और विज्ञान से प्रकाशित रहती है। विवेक सम्पन्न योगी सभी सांसारिक विषयों को माया शक्ति के विकृत रूप में देखता है। सिद्ध योगी सभी पदार्थों का संबंध भगवान के साथ देखते हैं क्योंकि माया का संबंध भगवान से होता है और सभी वस्तुएँ उनकी सेवा के निमित्त होती हैं।
कूटस्थ शब्द का प्रयोग उनके लिए किया गया है जो मन को विषयों की अनुभूतियों से दूर रखते हैं। वे न तो सुखद परिस्थितियों की इच्छा करते हैं और न ही दु:खद परिस्थितियों की उपेक्षा करते हैं। विजितेन्द्रिय शब्द का अर्थ मनुष्य द्वारा इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना है। युक्त शब्द का अर्थ यह है कि जो सदा के लिए परम भगवान में एकनिष्ठ हो जाता है। ऐसा मनुष्य भगवान के दिव्य आनन्द का आस्वादन करता है और इसलिए 'तृप्तात्मा' बन जाता है अर्थात् अनुभूत ज्ञान के बल पर पूर्ण रूप से संतुष्ट हो जाता है।
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु |
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते || 9||
योगी शुभ चिन्तकों, मित्रों, शत्रुओं पुण्यात्माओं और पापियों को निष्पक्ष होकर समान भाव से देखते हैं। इस प्रकार जो योगी मित्र, सहयोगी, शत्रु को समदृष्टि से देखते हैं और शत्रुओं एवं सगे संबंधियों के प्रति तटस्थ रहते हैं तथा पुण्यात्माओं और पापियों के बीच भी निष्पक्ष रहते हैं, वे मनुष्यों के मध्य विशिष्ट माने जाते हैं।
यह मनुष्य की प्रकृति है कि वह मित्रों और शत्रुओं के साथ अलग-अलग व्यवहार करता है किन्तु सिद्ध योगी की प्रकृति भिन्न होती है। भगवद्ज्ञान से सम्पन्न योगी समस्त सृष्टि को भगवान के साथ एक रूप में देखते हैं। इस प्रकार से वे सभी प्राणियों को समदृष्टि से देखने में समर्थ होते हैं। दृष्टि की इस समानता की भी अनेक अवस्थाएँ होती हैं
1. "सभी जीव दिव्य आत्माएँ है और इसलिए वे भगवान का अंश हैं। इसलिए उन्हें एक समान समझना चाहिए। “आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डित:।" अर्थात् "सच्चा पंडित वही है जो सभी प्राणियों को आत्मा के रूप में देखता है और इसलिए सबको अपने समान देखता है।"
2. उत्तम दृष्टि यह है कि भगवान प्रत्येक प्राणी के भीतर विराजमान हैं और इसलिए समस्त प्राणी आदर के योग्य हैं।
3. उच्चावस्था प्राप्त योगी 'प्रत्येक में भगवान का रूप' देखने वाली दृष्टि विकसित करता है। वैदिक ग्रंथों में भी बार-बार वर्णित है कि समस्त संसार भगवान का ही रूप है-ईशावास्यमिदम् सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। (ईशोपनिषद-1) अर्थात् "जड़ एवं चेतन पदार्थों के साथ ही समस्त ब्रह्माण्ड भी भगवान की अभिव्यक्ति है जोकि उनके भीतर व्याप्त है।" पुरुष एवेदं सर्वं (पुरुष सूक्तम्) अर्थात "भगवान इस संसार में सर्वत्र व्याप्त हैं और सब कुछ उनकी ही शक्ति है।" इसलिए उच्चावस्था प्राप्त योगी सभी में भगवान की अभिव्यक्ति देखता है। ऐसी दृष्टि से सम्पन्न हनुमान जी कहते हैं-सिया राममय सब जग जानी। (रामचरितमानस) “मैं सभी में सीता राम का रूप देखता हूँ।"
सम दृष्टि की इन श्रेणियों पर श्लोक 6.31 में विस्तृत टिप्पणी की गयी है। उपर्युक्त तीनों श्रेणियों का उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह योगी जो सभी प्राणियों में समदृष्टि बनाए रख सकता है वह पिछले श्लोक में वर्णित योगी की तुलना में अधिक उन्नत योगी है। योग की अवस्था का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण अगले श्लोक का आरम्भ यह व्यक्त करते हुए करेंगे कि किस पद्धति द्वारा इस अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है।
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थित: |
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रह: || 10||
योग की अवस्था प्राप्त करने के इच्छुक साधकों को चाहिए कि वे एकान्त स्थान में रहें और मन एवं शरीर को नियंत्रित कर निरन्तर भगवान के चिन्तन में लीन रहें तथा समस्त कामनाओं और सुखों का संग्रह करने से मुक्त रहें
योग की अवस्था प्राप्त मनुष्य की विशेषताओं का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण आत्म प्रयास के संबंध में चर्चा कर रहे हैं। किसी भी क्षेत्र में निपुणता के लिए दैनिक अभ्यास करना आवश्यक होता है। तैराकी में ओलिंपिक चैम्पियन वह नहीं हो सकता जो सप्ताह में केवल शनिवार सायंकाल में किसी स्थानीय पड़ोस के स्विमिंग पूल पर अभ्यास करता हो अपितु वही बन सकता है जो प्रतिदिन कई घंटे अभ्यास कर तैराकी में निपुण हो जाता है। अतः आध्यात्मिकता में प्रवीणता पाने के लिए भी इसी प्रकार से अभ्यास करना आवश्यक है। श्रीकृष्ण प्रतिदिन साधना के अभ्यास की अनुशंसा करते हुए आध्यात्मिकता में प्रवीणता प्राप्त करने की पूरी प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। प्रथम चरण के लिए वे एकान्त स्थान की अनिवार्यता का उल्लेख करते हैं। प्रायः दिनभर हम सांसारिक वातावरण से घिरे रहते हैं। शारीरिक गतिविधियाँ, लोगों से संपर्क और वार्तालाप आदि सब मन को और अधिक सांसारिक बना देते हैं। मन को भगवान की ओर सम्मुख करने के लिए हमें प्रतिदिन एकान्त में साधना करने के लिए कुछ समय समर्पित करना चाहिए।
दूध और पानी के उदाहरण से इस बिन्दु को स्पष्ट करने में सहायता मिल सकती है। यदि दूध को पानी में डाल देते हैं तब यह अपनी पहचान नहीं रख सकता क्योंकि पानी स्वभावत: इसमें मिश्रित हो जाता है। किन्तु जब दूध को पानी से अलग रखते हैं और दही जमा लेते हैं और फिर उससे मक्खन निकाल लेते हैं तब मक्खन पानी में घुल नहीं पाता । मक्खन अब पानी को चुनौती देते हुए कह सकता है-'मैं तुम्हारे शीर्ष पर बैलूंगा और तैरता रहूँगा और तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते क्योंकि मैं मक्खन बन गया हूँ।' हमारा मन दूध के समान है और संसार के साथ संपर्क होने से हमारा मन इससे प्रभावित होकर सांसारिक हो जाता है। किन्तु एकांत वातावरण, इन्द्रियों का विषयों के साथ कम से कम संपर्क रखने का अवसर प्रदान करता है और मन को ऊपर उठाकर उसे भगवान में लगाने में सहायक होता है। एक बार जब मन भगवान में पूर्णतः अनुरक्त हो जाता है तब कोई भी संसार को चुनौती देते हुए कह सकता है-"मैं माया के सभी गुणों के बीच रहते हुए उनसे अछूता रहूँगा।"
एकान्तवास के उपदेश को श्रीकृष्ण ने श्लोक 18.52 में दोहराया है-"विविक्तसेवी लध्वाशी" अर्थात् "एकान्त स्थान में रहो, अपने आहार को संतुलित करो।" अपने व्यावसायिक और सामाजिक कार्यों से छेड़छाड़ किए बिना इस उपदेश का व्यावहारिक रूप से अनुपालन करने का सुन्दर और सरल उपाय यही है। अपने दैनिक कार्यक्रम में हमें कुछ समय साधना या आध्यात्मिक अभ्यास के लिए निश्चित करना चाहिए। हमें स्वयं को एकांत कमरे में जहाँ सांसारिक विघ्न न हों वहाँ संसार से अलग-थलग होकर अपने मन को शुद्ध करके और मन को दृढ़ता से भगवान में केन्द्रित करने के लिए साधना करनी चाहिए। यदि हम इस विधि से दो घंटे अभ्यास करते हैं तब हम सांसारिक गतिविधियों में व्यस्त रहते हुए भी दिन भर इसका लाभ पा सकते हैं। इस विधि द्वारा हम उच्च चेतनावस्था बनाए रखने के योग्य हो सकेंगे जिसका हमने संसार से अलग होकर दैनिक साधना के दौरान संग्रह किया था।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मन: |
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् || 11||
योगाभ्यास के लिए स्वच्छ स्थान पर भूमि पर कुशा बिछाकर उसे मृगछाला से ढककर उसके ऊपर वस्त्र बिछाना चाहिए। आसन बहुत ऊँचा या नीचा नहीं होना चाहिए।
श्रीकृष्ण इस श्लोक में साधना के बाहरी क्रियाओं का वर्णन कर रहे हैं। 'शुचौ देशे' से तात्पर्य पवित्र या स्वच्छ स्थान है। प्रारम्भिक चरणों में बाहरी वातावरण मन को प्रभावित करता है लेकिन बाद के चरणों में कोई भी गंदे और अस्वच्छ स्थानों पर आंतरिक शुद्धता को प्राप्त करने के योग्य हो सकता है। स्वच्छ वातावरण मन को स्वच्छ रखने में अत्यधिक सहायता करता है। कुश (घास) की चटाई आजकल के योग मैट के समान ही तापमान रोधक होती है। मृगछाला विषैले कीटों जैसे सर्प और बिच्छुओं को साधना में लीन साधक के पास जाने से रोकती है। यदि आसन अधिक ऊँचा है तब वहाँ से गिरने का जोखिम बना रहता है और यदि आसन बहुत नीचा है तब भूमि पर रेंगने वाले कीटों से साधना में बाधा उत्पन्न होती है। इस श्लोक में आसन पर बैठने के दिशा-निर्देश कुछ सीमा तक आधुनिक समय से भिन्न हैं। प्राचीन और आधुनिक दोनों कालों के निर्देशों का लक्ष्य भगवान के चिन्तन में लीन होना है जबकि आंतरिक अभ्यास के निर्देश समान हैं।
तत्रैकाग्रं मन: कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रिय: |
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये || 12||
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर: |
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् || 13||
योगी को उस आसन पर दृढ़तापूर्वक बैठ कर मन को शुद्ध करने के लिए सभी प्रकार के विचारों तथा क्रियाओं को रोक कर मन को एक बिन्दु पर स्थिर करते हुए साधना करनी चाहिए। उसे शरीर, गर्दन और सिर को सीधा रखते हुए और आँखों को हिलाए बिना नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि स्थिर करनी चाहिए।
साधना के लिए आसन पर बैठने का वर्णन करने के पश्चात् श्रीकृष्ण आगे मन की एकाग्रता के लिए शरीर की उत्तम मुद्रा का वर्णन कर रहे हैं। साधना करते समय प्रायः लोगों में आलस्य तथा झपकी लेने की प्रवृत्ति पायी जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि हमारे मायाबद्ध मन को आरम्भ में भगवान के चिन्तन में वैसा आनन्द प्राप्त नहीं होता जैसा वह विषयों का भोग करने में पाता है। इससे मन को भगवान पर केन्द्रित करते समय उसके शिथिल होने की संभावना बनी रहती है। हम लोगों को भोजन ग्रहण करते हुए बीच में ऊँघते हुए नहीं पाते लेकिन लोगों को साधना करते हुए या भगवान के नाम का जप करते हुए उन्हें सोते हुए देख सकते हैं। इससे बचने के लिए श्रीकृष्ण सीधा बैठने का उपदेश देते हैं। ब्रह्मसूत्र में भी साधना की मुद्रा के संबंध में तीन सूत्रों का वर्णन किया गया है-
आसीनः संभवात् ।।4.1.7।। 'उपयुक्त आसन पर बैठकर साधना करों।'
अचलत्वं चापेक्ष्य-।।4.1.19।। 'सुनिश्चित करो कि आप सीधे और स्थिर बैठे हैं।'
ध्यानाच्च-।।4.1.8।। 'ऐसी मुद्रा में बैठो जिसमें मन साधना में केन्द्रित रहें।'
हठयोग प्रदीपका में साधना के लिए कई प्रकार के आसनों का वर्णन किया गया है, जैसे-पद्मासन, अर्धपद्मासन, ध्यानवीरासन, सिद्धासन और सुखासन। हम साधना की अवधि के दौरान किसी भी ऐसे आसन जिसमें हम सुविधापूर्वक स्थिरता से बैठ सकते हैं, का चयन कर सकते हैं।
महर्षि पतंजलि कहते हैं
"स्थिरसुखमासनम्।।"
(पतंजलि योग सूत्र-2.46)
"साधना का अभ्यास करने के लिए सुविधानुसार मुद्रा में स्थिर बैठो।" कुछ लोग घुटनों में दर्द के कारण फर्श पर बैठने में असमर्थ होते हैं। उन्हें हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। वे सीधा और स्थिर बैठने के लिए कुर्सी पर बैठकर साधना कर सकते हैं। इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह अभिव्यक्त किया है कि आँखें नासिका के अग्र भाग पर केन्द्रित होनी चाहिए और हिलने से बचना चाहिए। विकल्प के लिए आँखों को बंद भी रखा जा सकता है। ये दोनों ही विधियाँ सांसारिक आकर्षणों को रोकने में सहायक होगी। बाहरी आसन और मुद्रा का उपयुक्त होना आवश्यक है किन्तु साधना वास्तव में हमारे भीतर की यात्रा है। साधना के माध्यम से हम अपने स्वरुप में गहनता से उतर सकते हैं और मन के अनन्त जन्मों की मैल को स्वच्छ कर सकते हैं। मन को एकाग्र करना सीखकर हम इसकी अप्रतिम क्षमता पर अंकुश लगा सकते हैं। साध ना के अभ्यास से हमें अपने व्यक्तित्व को उन्नत करने में सहायता मिलती है, हमारी आंतरिक चेतना जागृत होती है और हमारा आत्म ज्ञान बढ़ता है।
साधना के आध्यात्मिक लाभों का वर्णन श्लोक 6.15 की व्याख्या में किया जाएगा। साधना के कुछ अन्य लाभ इस प्रकार है
1. यह अनियंत्रित मन पर अंकुश लगाती है और कठिन लक्ष्यों पाने के लिए विचार शक्ति को नियमित है।
2. प्रतिकूल परिस्थतियों में मानसिक संतुलन बनाये रखने में सहायता करती है।
3. जीवन में सफलता पाने के लिए अनिवार्य दृढ़ संकल्प को विकसित करने में सहायता करती है। यह मनुष्य को बुरे संस्कारों और प्रवृत्तियों का उन्मूलन करने और सद्गुणों को उत्पन्न करने के योग्य बनाती है।
एक उत्तम प्रकार की साधना वह है जिसमें मन भगवान पर केन्द्रित किया जाता है। इसे अगले दो श्लोकों में स्पष्ट किया गया है।
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थित: |
मन: संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्पर: || 14||
इस प्रकार शांत, भयरहित और अविचलित मन से ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा में निष्ठ होकर उस प्रबुद्ध योगी को मन से मेरा चिन्तन करना और केवल मुझे ही अपना परम लक्ष्य बनाना चाहिए।
श्रीकृष्ण साधना में सफलता के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करने पर बल देते हैं। प्रजनन हेतु में पशुओं में भी काम वासना की प्रवृति पायी जाती है और पशु केवल इसी उद्देश्य से इसमें लिप्त रहते हैं। अधिकतर पशु जातियों में निश्चित ऋतु में मैथुन क्रिया होती है। पशु इच्छानुसार मैथुन क्रिया में युक्त नहीं रहते जबकि पशुओं से अधिक बुद्धिमान मनुष्य के अपनी इच्छानुसार इसमें लिप्त रहने की स्वतंत्रता होने के कारण प्रजजन की विधि अनैतिक आनन्द पाने के साधन में परिवर्तित हो जाती है। वैदिक ग्रंथों में ब्रह्मचर्य का पालन करने पर बल दिया गया है। महर्षि पतंजलि ने कहा है-"ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः” (योगसूत्र-2.38) अर्थात् "ब्रह्मचर्य का पालन अति शक्तिवर्धक होता है।"
आयुर्वेद में भी असाधारण स्वास्थ्य लाभों के कारण ब्रह्मचर्य की प्रशंसा की गयी है। धन्वन्तरि के एक शिष्य ने उनसे एक प्रश्न पूछा-“हे महर्षि! कृपया मुझे स्वस्थ रहने का रहस्य बताएँ?" उन्होंने ने उत्तर दिया-"वीर्य ही वास्तव में आत्मस्वरूप है। स्वास्थ्य का रहस्य इसी शक्ति के संरक्षण में निहित है। वह जो इस महत्वपूर्ण और अनमोल शक्ति को व्यर्थ करता है उसका शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास नहीं हो सकता।" आयुर्वेद के अनुसार रक्त की चालीस बूंदों से वीर्य की एक बूंद बनती है। वे जो अपने वीर्य को नष्ट करते हैं वे अस्थिर रहते हैं और प्राणों को उत्तेजित करते हैं। इससे उनकी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा को क्षति पहुँचती है तथा स्मरणशक्ति, मन और बुद्धि दुर्बल हो जाती है। ब्रह्मचर्य के पालन से शारीरिक ऊर्जा, बुद्धि की तीक्ष्णता, दृढ़ इच्छा शक्ति, स्मरण शक्ति और आध्यात्मिक बोध की उत्कंठा में वृद्धि होती है। इससे आँखों में चमक और कपोलों पर लालिमा आती है। ब्रह्मचर्य की परिभाषा केवल शारीरिक काम वासना मात्र से दूर रहने तक सीमित नहीं है। अग्नि पुराण में मैथुन से संबंधित आठ प्रकार की गतिविधियों को नियंत्रित करने का वर्णन किया गया है
1. इसके बारे में सोचना, 2. इसके बारे में चर्चा करना, 3. इस विषय पर उपहास करना, 4. इसको देखना, 5. इसकी रुचि उत्पन्न करना, 6. किसी को ऐसा करने के लिए आकर्षित करना, 7. किसी को इसमें रुचि लेने के लिए उत्तेजित करना, 8. इसमें लिप्त रहना। इस प्रकार ब्रह्मचर्य के लिए केवल शारीरिक संभोग से दूर रहना ही आवश्यक नहीं है अपितु हस्तमैथुन, समलैंगिक गतिविधियों आदि यौनाचार से भी दूर रहना चाहिए।
आगे श्रीकृष्ण यह वर्णन करेंगे कि साधना का लक्ष्य केवल भगवान का ध्यान करना है। इस बिन्दु पर पुनः अगले श्लोक में प्रकाश डाला जाएगा।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानस: |
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति || 15||
इस प्रकार मन को संयमित रखने वाला योगी मन को निरन्तर मुझमें तल्लीन कर निर्वाण प्राप्त करता है और मुझ में स्थित होकर परम शांति पाता है।
संसार में ध्यान की कई पद्धतियाँ विद्यमान हैं। जैन पद्धति, बौद्ध पद्धति, तांत्रिक पद्धति, ताओवादी पद्धति और वैदिक पद्धति इत्यादि प्रचलन में हैं। इनमें से प्रत्येक की कई उप शाखाएँ हैं। हिन्दू धर्म के अनुयायियों के बीच भी अनेक पद्धतियों का पालन किया जा रहा है। हमें अपने व्यक्तिगत अभ्यास के लिए किस पद्धति को अपनाना चाहिए? श्रीकृष्ण इस प्रश्न का सरलता से समाधान करते हैं। वे कहते हैं कि साधना का लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ भगवान ही होना चाहिए।
साधना का लक्ष्य केवल एकाग्रता और ध्यान को बढ़ाना ही नहीं है अपितु मन को शुद्ध करना भी है। श्वास, चक्र, शून्य और ज्योति आदि का ध्यान एकाग्रता को विकसित करता है। फिर भी मन की शुद्धता तभी संभव है जब हम इसे शुद्ध तत्त्व पर स्थिर करें जो कि स्वयं भगवान हैं। इसलिए 14वें अध्याय के 26वे श्लोक में वर्णन किया गया है कि भगवान प्रकृति के तीनों गुणों से परे हैं। जब कोई मनुष्य अपने मन को भगवान में स्थिर करता है तब वह भी प्रकृति के तीनों गुणों से ऊपर उठकर गुणातीत हो जाता है। इसलिए प्राणों पर ध्यान करने की क्रिया को लोकातीत कहा जाता है किन्तु वास्तविक इन्द्रियातीत साधना केवल भगवान में ध्यान स्थिर करना है।
मन को भगवान में कैसे स्थिर करें? इसके लिए हम भगवान की दिव्य विशेषताओं, नाम, गुणों, रूपों, लीलाओं, धामों और संतों को अपने ध्यान का लक्ष्य बना सकते हैं। ये सब भगवान से अभिन्न हैं तथा उनकी सभी दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण हैं। इसलिए साधक इनमें से किसी एक का भी ध्यान कर सकता है। भारत में प्रचलित विभिन्न ‘भक्ति' परम्पराओं में भगवान के नाम को चिन्तन का आध पर बनाया जाता है। इसलिए रामचरितमानस में कहा गया है
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बड़दायक बड़दानि।
"आत्मा के लाभ के प्रयोजन से भगवान का नाम स्वयं भगवान से बड़ा है।" भगवान का स्मरण करने के लिए भगवान का नाम लेना एक सरल उपाय है क्योंकि इसे कहीं भी तथा सर्वत्र चलते, बोलते, बैठते और खाते हुए सहजता से लिया जा सकता है।
किन्तु अधिकतर साधकों को मन को वश में करने के लिए केवल नाम लेना पर्याप्त नहीं लगता। अनन्त जन्मों के संस्कारों के कारण मन स्वभावतः रूप की ओर आकर्षित होता है। भगवान के रूप को आधार बनाकर की गयी साधना स्वाभाविक और सरल होती है। इसे रूपध्यान साधना कहा जाता है।
एक बार जब मन भगवान पर केन्द्रित हो जाता है तब फिर हम आगे चलकर भगवान के गुणों उनके पार्षदों, उनके सौंदर्य, उनके दिव्य ज्ञान, प्रेम, उनकी करुणा और उनकी कृपा आदि गुणों का चिन्तन कर मन को और अधिक उत्साहित कर सकते हैं। इस प्रकार से कोई भी मनुष्य मन को भगवान की सेवा भक्ति में लगाकर साधना में उन्नति कर सकता है। हम भगवान को खाद्य पदार्थों का भोग लगाने, उनकी सेवा करने, उनका गुणगान करने, उन्हें स्नान कराने और उनके लिए भोजन पकाने इत्यादि की कल्पना कर सकते हैं। इसे मन से भगवान की सेवा करना अर्थात् 'मानसी सेवा' कहते हैं। इस प्रकार से हम भगवान के नाम, रूप, गुण लीलाओं का ध्यान करते हुए उनका चिन्तन कर सकते हैं।
इस श्लोक के अन्त में श्रीकृष्ण साधना के लाभों का वर्णन कर रहे हैं जो हैं - माया के बंधनों से मुक्त होना और परम आनन्द की प्राप्ति करना।
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नत: |
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन || 16||
हे अर्जुन! जो लोग बहुत अधिक भोजन ग्रहण करते हैं या अल्प भोजन ग्रहण करते हैं, बहुत अधिक या कम नींद लेते हैं, वे योग में सफल नहीं हो सकते।
साधना के ध्येय का वर्णन करने के पश्चात् श्रीकृष्ण कुछ नियमों का पालन करने के लिए कहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे मनुष्य जो शरीर की देखभाल के नियमों को भंग करते हैं, योग में सफलता नहीं प्राप्त कर सकते। प्रायः इस पथ का अनुसरण करने वाले साधक अपने अधूरे ज्ञान के कारण कहते हैं-"तुम आत्मा हो न कि शरीर" इसलिए वे केवल आध्यात्मिक साधना में लिप्त हो जाते हैं और शरीर की देखभाल करना छोड़ देते हैं किन्तु उनकी ऐसी धारणा उन्हें बहुत आगे तक नहीं ले जा सकती। यह सत्य है कि हम शरीर नहीं हैं फिर भी हम जब तक जीवित रहते हैं, शरीर हमारा वाहक होता है और हमें कृतज्ञतापूर्वक इसकी देखभाल करनी चाहिए। आयुर्वेदिक ग्रंथ चरक संहिता में वर्णन है-"शरीरमाधं खलु धर्म - साधनम्" अर्थात् "हमारा शरीर हमें धार्मिक गतिविधियों में तल्लीन रखने का साधन है।" यदि शरीर अस्वस्थ हो जाता है, तब अध्यात्मिक कार्यों में भी बाधा उत्पन्न होती है। रामचरितमानस में भी उल्लेख है, "तन बिनु भजन बेद नहिं बरना।" अर्थात् वेद शरीर की उपेक्षा करने की अनुशंसा नहीं करते। वास्तव में वे हमें शरीर की देखभाल करने का उपदेश देते हैं। ईशोपनिषद् में इस प्रकार से वर्णन किया गया है।
अन्धंतमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः।।
(ईशोपनिषद्-9)
"जो केवल भौतिक विज्ञान को पोषित करते हैं, वे नरक में जाते हैं किन्तु जो केवल आध्यात्मिक ज्ञान को पोषित करते हैं, वे और अधिक गहन नरक में जाते हैं।" शरीर की देखभाल के लिए भौतिक विज्ञान आवश्यक है जबकि आध्यात्मिक ज्ञान हमारे भीतर की दिव्यता के आविर्भाव के लिए अनिवार्य है। जीवन के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए हमारे जीवन में दोनों का संतुलन होना चाहिए इसलिए योगासन, प्राणायाम, और उपयुक्त आहार विहार आदि वैदिक ज्ञान का अनिवार्य अंग हैं। चारों वेदों में प्रत्येक वेद का एक उपवेद है। जैसे अथर्व वेद का सहायक वेद आयुर्वेद है जो औषधीय चिकित्सा और उत्तम स्वास्थ्य का प्राचीन विज्ञान है। यह दर्शाता है कि वेद शारीरिक स्वास्थ्य की देख-रेख करने पर बल देते हैं। तदनुसार श्रीकृष्ण कहते हैं कि अधिक भोजन करना या बिल्कुल अन्न ग्रहण न करना, अति सक्रियता और पूर्ण अकर्मण्यता आदि सब योग के लिए बाधक हैं। आध्यात्मिक साधकों को ताजा भोजन, पौष्टिक खाद्य पदार्थ, दैनिक व्यायाम और प्रत्येक रात्रि को भरपूर निद्रा लेकर अपने शरीर की भली-भाँति देखभाल करनी चाहिए।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु |
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा || 17||
लेकिन जो आहार और आमोद-प्रमोद को संयमित रखते हैं, कर्म को संतुलित रखते हैं और निद्रा पर नियंत्रण रखते हैं, वे योग का अभ्यास कर अपने दु:खों को कम कर सकते हैं।
योग भगवान के साथ आत्मा का मिलन है। इसके विपरीत भोग का आशय इन्द्रिय सुख में लिप्त होना है। भोग में संलिप्तता शरीर के स्वाभाविक नियमों के विपरीत है और इसके परिणामस्वरूप रोग पनपते हैं। पिछले श्लोक में किए गए वर्णन के अनुसार यदि शरीर रोगग्रस्त हो जाता है तब योग के अभ्यास में बाधा उत्पन्न होती है। इसलिए इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है कि शारीरिक गतिविधियों को संयमित कर योग के अभ्यास द्वारा हम शारीरिक और मानसिक दु:खों से मुक्त हो सकते हैं।
श्रीकृष्ण के पच्चीस सौ वर्षों के पश्चात् गौतम बुद्ध ने भी यही उपदेश दिया। उन्होंने कठोर तप और कामुक भोग के बीच मध्यम मार्ग का पालन करने की अनुशंसा की। इस संबंध में एक रोचक कथा इस प्रकार से है-
ऐसा कहा जाता है कि ज्ञान प्राप्त करने से पूर्व गौतम बुद्ध एक बार अन्न और जल का त्याग कर ध्यान में लीन हो गये। इस प्रकार कुछ दिनों की साधना के अभ्यास के पश्चात् वे दुर्बल हो गये और उन्हें चक्कर आने लगे तब उन्हें आभास हुआ कि मन को साधना में स्थिर रखना असंभव है। उसी समय कुछ ग्रामीण महिलाएँ वहाँ से निकल रही थीं। उन्होंने जल से भरा मटका अपने सिर पर रखा हुआ था जिन्हें वे समीप की नदी से भरकर ला रही थीं और गीत गा रही थीं। उस गीत के स्वर इस प्रकार के थे-"तानपुरे के तारों को कस कर रखो किन्तु इतना भी न कसो कि वे टूट जाए।" उनके शब्द गौतम बुद्ध के कानों में पड़े तब वे अचम्भित होकर बोले, 'ये अनपढ़ ग्रामीण महिलाएँ ऐसे ज्ञान के शब्द गा रही हैं। उनका संदेश हम मनुष्यों के लिए है कि हमें भी अपने शरीर रूपी तानपुरे को कस कर रखना चाहिए किन्तु इतना भी न कसें कि शरीर ही नष्ट हो जाए।'
बैंजामिन फ्रैंकलिन (1706-1790) संयुक्त राज्य अमेरिका के संस्थापकों में से एक, ने अपने चरित्र का विकास करने के लिए बीस वर्ष की आयु में डायरी लिखना आरम्भ किया था जिसमें उन्होंने तेरह कार्यों का उल्लेख किया जिनमें वे उन्नति करना चाहते थे। उनकी पहली प्रतिज्ञा थी खान-पान संतुलित करो ताकि सुस्ती न आए और अधिक मदिरा पान न करो।
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते |
नि:स्पृह: सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा || 18||
पूर्ण रूप से अनुशासित होकर जो अपने मन को लालसाओं से हटाना सीख लेते हैं और इसे अपनी आत्मा के लाभ में लगा देते हैं, ऐसे मनुष्यों को योग में स्थित कहा जा सकता है और वे सभी प्रकार की इन्द्रिय लालसाओं से मुक्त होते हैं।
मनुष्य कब योग का अभ्यास पूर्ण कर लेता है? इसका उत्तर यह है कि जब नियंत्रित मन केवल एक परमात्मा में स्थिर और केन्द्रित हो जाता है। तब यह स्वतः सांसारिक भोगों के लिए इन्द्रिय सुख की सभी लालसाओं और कामनाओं से दूर हो जाता है। उस समय मन की ऐसी अवस्था प्राप्त करने वाले मनुष्य को 'युक्त' अर्थात 'पूर्ण योग में स्थित' माना जा सकता है। इस अध्याय के अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं-"सभी योगियों में जिस योगी का मन सदैव मुझमें तल्लीन हो जाता है और जो पूर्ण श्रद्धायुक्त होकर मेरी भक्ति में लीन रहता है, मैं उसे सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ।" (श्लोक 6.47)
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता |
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मन: || 19||
जिस प्रकार वायुरहित स्थान में दीपक की ज्योति झिलमिलाहट नहीं करती उसी प्रकार से संयमित मन वाला योगी आत्म चिन्तन में स्थिर रहता है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण दीपक की ज्योति की उपमा देते हैं। वायु वाले स्थान पर जिसकी ज्योति स्वाभाविक रूप से झिलमिलाहट करती है और जिसे स्थिर रखना असंभव होता है। जबकि वायु रहित स्थान में यह चित्र की भाँति स्थिर रहती है। इसी प्रकार से मन भी स्वाभाविक रूप से चंचल होता है और इसे वश में करना कठिन होता है। किन्तु जब किसी योगी का मन भगवान में लीन होकर उसमें एकीकृत हो जाता है तब वह कामनाओं की आँधी से बचने का आश्रय पा लेता है। ऐसा योगी भक्ति की शक्ति द्वारा मन को स्थिर एवं नियंत्रित करता है।
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया |
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति || 20||
जब मन भौतिक क्रियाओं से दूर हट कर योग के अभ्यास द्वारा स्थिर हो जाता है तब योगी शुद्ध मन से आत्म-तत्त्व को देख सकता है और आंतरिक आनन्द में मग्न हो सकता है।
साधना की प्रक्रिया को प्रस्तुत करने तथा इसमें सिद्धि की अवस्था का वर्णन करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब इसके परिणामों से अवगत करा रहे हैं। जब मन शुद्ध हो जाता है, तब कोई भी मनुष्य आत्मा की शरीर से भिन्नता को जानने के योग्य हो सकता है। यदि किसी गिलास में मिट्टी से युक्त जल भरा है तब हम इसके आर-पार नहीं देख सकते। किन्तु यदि हम इस जल में फिटकरी डाल देते हैं तो मिट्टी नीचे बैठ जाती है और जल स्वच्छ हो जाता है। समान रूप से मन जब अशुद्ध होता है तब आत्मा के संबंध में इसकी अवधारणा धुंधली होती है और शास्त्रों द्वारा प्राप्त आत्मा का ज्ञान केवल सैद्धान्तिक स्तर का ही होता है। किन्तु मन जब शुद्ध हो जाता है तब प्रत्यक्ष अनुभूति से आत्म तत्त्व का बोध होता है।
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् |
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वत: || 21||
योग में चरम आनन्द की अवस्था को समाधि कहते हैं और इसमें स्थित मनुष्य परम सत्य के पथ से विचलित नहीं होता।
सुख की लालसा करना आत्मा का स्वभाव है। इसका कारण यह है कि हम आनन्द के महासागर भगवान के अणु अंश हैं। वैदिक ग्रंथों में दिए अनेक उदाहरणों द्वारा इसे सिद्ध किया गया है जिनकी व्याख्या पाँचवें अध्याय के 21वें श्लोक में की गयी है। यहाँ अनन्त सुखों के महासागर भगवान के स्वरूप को अभिव्यक्त करने के लिए कुछ और उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं
रसो वै सः। रसँ ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति।
(तैत्तिरीयोपनिषद्-2.7)
"भगवान स्वयं आनन्द है। जीवात्मा उसे पाकर आनन्दमयी हो जाती है।"
"आनन्दमयोऽभ्यासात्"
(ब्रह्मसूत्र-1.1.12)
"भगवान परमानंद स्वरूप है"
सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः।
(श्रीमद्भागवतम्-10.13.54)
"भगवान का दिव्य स्वरूप सत्-चित्-आनन्द से निर्मित है।"
आनंद सिंधु मध्य तव वासा। बिनु जाने कत मरसि पियासा॥
(रामचरितमानस)
"आनन्द के महासागर भगवान, जो तुम्हारे भीतर बैठे हैं, उन्हें जाने बिना आनन्द प्राप्ति की तुम्हारी इच्छा की तृप्ति कैसे हो सकती है।" हम युगों से पूर्ण आनन्द प्राप्त करना चाह रहे हैं और इसी आनन्द की खोज में हम सब कुछ करते हैं। हालाँकि विषयों से मन और इन्द्रियों को वास्तविक सुख की छायात्मक अनुभूति होती है। इस प्रकार इन्द्रिय सुख भगवान का असीम सुख पाने के लिए दीर्घ काल से तड़प रही आत्मा को संतुष्ट करने में असफल होती है। जब मन भगवान में एकनिष्ठ हो जाता है तब आत्मा अनिर्वचनीय और परम आनन्द प्राप्त करती है, जोकि इन्द्रियों की परिधि से परे होता है। वैदिक ग्रंथों में योग की इस अवस्था को समाधि कहा जाता हैं। महर्षि पतंजलि ने भी इस प्रकार से कहा है
समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ।।
(पंतजलि योग दर्शन-2.45)
"समाधि में सफलता के लिए परमात्मा की शरणागति प्राप्त करो।" समाधि की अवस्था में पूर्ण तृप्ति और संतोष की अनुभूति होती है और आत्मा की कोई इच्छा शेष नहीं रह जाती। इस प्रकार से वह एक क्षण के लिए भी डिगे बिना दृढ़ता से परमसत्य में स्थित हो जाती है।
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत: |
यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते || 22||
ऐसी अवस्था प्राप्त कर कोई और कुछ श्रेष्ठ पाने की इच्छा नहीं करता। ऐसी सिद्धि प्राप्त कर कोई मनुष्य बड़ी से बड़ी आपदाओं में विचलित नहीं होता।
भौतिक जीवन में किसी भीउपलब्धि से कोई भी प्राणी पूर्णतः संतुष्ट नहीं हो पाता। निर्धन व्यक्ति धनवान बनने के लिए कड़ा परिश्रम करता है और जब वह लखपति हो जाता है तब स्वयं को संतुष्ट मानने लगता है। किन्तु जब वह करोड़पति को देखता है तब पुनः दु:खी हो जाता है। करोड़पति भी अपने से अधिक धनवान को देखकर असंतोष प्रकट करता है। चाहे हम कितने भी सुखी हों जब हम उच्चावस्था वाले सुखों की ओर देखते हैं तब हमें अपने सुख बौने दिखाई देने लगते हैं और हमारे भीतर अतृप्ति की भावना जागृत हो जाती है। लेकिन योग की अवस्था में प्राप्त होने वाला सुख भगवान का असीम सुख है क्योंकि इससे श्रेष्ठ कुछ नहीं है। इस सुख की अनुभूति से आत्मा को स्वाभाविक रूप से यह बोध हो जाता है कि उसने अपने चरम लक्ष्य को पा लिया है। भगवान का दिव्य आनन्द भी शाश्वत है और एक बार जो योगी इसे पा लेता है फिर उससे यह दिव्य आनंद छिन नहीं सकता। ऐसी भगवत्प्राप्त आत्माएँ भौतिक शरीर में रहते हुए भी दिव्य चेतना की अवस्था में स्थित रहती हैं।
कभी-कभी बाहर से देखने पर प्रतीत होता कि ऐसे सिद्ध संत अस्वस्थता, विरोधी लोगों और कष्टदायी परिवेश के रूप में संकटों का सामना कर रहे हैं किन्तु आंतरिक दृष्टि से वे दिव्य चेतना में लीन रहते हैं और निरन्तर भगवान के दिव्य सुख का आस्वादन करते रहते हैं। इस प्रकार बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ भी ऐसे संतों को विचलित नहीं कर सकतीं। भगवान के साथ संबंध स्थापित कर ऐसे संत शारीरिक चेतना से ऊपर उठ जाते हैं और इसलिए वे शारीरिक कष्टों से होने वाली क्षति से प्रभावित नहीं होते। तदनुसार हमने पुराणों में यह सुना है कि प्रह्लाद को कैसे सोँ के गड्ढे में डाला गया, हथियारों से यातना दी गयी, अग्नि में बिठाया गया, पहाड़ से गिराया गया आदि। किन्तु कोई भी विपत्ति प्रह्लाद को भगवान की भक्ति से विलग नहीं कर पायी।
तं विद्याद् दु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् |
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा || 23||
दु:ख के संयोग से वियोग की अवस्था को योग के रूप में जाना जाता है। इस योग का दृढ़तापूर्वक निराशा से मुक्त होकर पालन करना चाहिए।
भौतिक जगत में माया का आधिपत्य होता है और श्रीकृष्ण ने इसे आठवें अध्याय के 15वें श्लोक में अस्थायी और दु:खों से भरा हुआ कह कर परिभाषित किया है। इस प्रकार माया की तुलना अंधकार से की जाती है। यह हमें अज्ञान के अंधकार में रखकर संसार में दु:ख उठाने के लिए विवश करती है। हालाँकि माया का अंधकार स्वाभाविक रूप से तब मिट जाता है जब भगवान का दिव्य प्रकाश हमारे हृदय में आलोकित होता हैं। चैतन्य महाप्रभु ने इसे अति सुन्दरता से व्यक्त किया है
कृष्ण सूर्यसम, माया हय अन्धकार।
यहाँ कृष्ण, ताहाँ नाहि मायार अधिकार।।
(चैतन्य चरितामृत, मध्य लीला-22.31)
"भगवान प्रकाश के समान है और माया अंधकार के समान है। जिस प्रकार से अंधकार प्रकाश के सामने खड़ी नहीं हो सकती उसी प्रकार से माया कभी भगवान पर हावी नहीं हो सकती।" भगवान का स्वरूप दिव्य आनन्दमय है और जबकि माया का परिणाम दु:ख है। इस प्रकार जब कोई भगवान का दिव्य सुख प्राप्त कर लेता है तब माया शक्ति के दु:ख उस पर हावी नहीं हो सकते।
इस प्रकार योग में सिद्धि की अवस्था का तात्पर्य–(1) भगवान की कृपा प्राप्त करना है, (2) दुखों से छुटकारा पाना है। श्रीकृष्ण क्रमशः दोनों पर प्रकाश डालते हैं। पिछले श्लोक में योग के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाले भगवान के दिव्य परमानंद पर प्रकाश डाला गया था और इस श्लोक में दु:खों से मुक्ति पर विशेष बल दिया गया है। इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में श्रीकृष्ण ने यह व्यक्त किया है कि दृढ़तापूर्वक अभ्यास द्वारा ही योग में सिद्धता की अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है। हमें किस विधि से ध्यान लगाना चाहिए, श्रीकृष्ण अब आगे इसे स्पष्ट करेंगे।
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषत: |
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्तत: || 24||
शनै: शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया |
आत्मसंस्थं मन: कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् || 25||
संसार संबंधित सभी इच्छाओं का पूर्ण रूप से त्याग कर हमें मन द्वारा इन्द्रियों पर सभी ओर से अंकुश लगाना चाहिए, फिर धीरे-धीरे निश्चयात्मक बुद्धि के साथ मन केवल भगवान में स्थिर हो जाएगा और भगवान के अतिरिक्त कुछ नहीं सोचेगा।
ध्यान के लिए मन को संसार से हटाने और भगवान में स्थिर करने का अभ्यास करना आवश्यक है। यहाँ श्रीकृष्ण मन को संसार से हटाने की प्रक्रिया का वर्णन कर रहे हैं। जब मन संसार में आसक्त हो जाता है तब मन में सांसारिक वस्तुओं, लोगों, घटनाओं के विचार उमड़ते रहते हैं। प्रायः ये विचार आरम्भ में स्फुरणा (भावनाओं और विचारों की झलक) के रूप में होते हैं। जब हम स्फुरणा को कार्यान्वित करने पर बल देते हैं तब यह संकल्प (विचारों का कार्यरूप) बन जाता है। इस प्रकार से विचार संकल्प की ओर ले जाते हैं और विकल्प (विविधता या अनिश्चित विचार) इस पर निर्भर करता है कि आसक्ति सकारात्मक है या नकारात्मक। संकल्प के बीज इच्छाओं के पौधों का रूप लेकर विकसित होते हैं। यह होना चाहिए था' 'यह नहीं होना चाहिए था' जैसे संकल्प और विकल्प दोनों मन पर तत्काल प्रभाव डालते हैं। इस प्रकार से दोनों भगवान में मन एकाग्र करने में प्रत्यक्ष रूप से बाधा उत्पन्न करते हैं। उनकी स्वाभाविक रूप से वृद्धि की प्रवृति होती है और इच्छा जोकि आज चिनकारी के रूप में है वही कल दावानल बन सकती है। इसलिए जो ध्यान में सफलता पाना चाहते हैं उन्हें सांसारिक पदार्थों के आकर्षणों का त्याग करना चाहिए। संसार से मन हटाने की प्रक्रिया के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण अब दूसरे भाग को व्यक्त कर रहे हैं। मन भगवान पर कैसे स्थिर करें? इस संबंध में वे कहते हैं कि ऐसा स्वतः नहीं होगा लेकिन दृढ़ता से प्रयास करने पर धीरे-धीरे सफलता मिलेगी।
संकल्प की दृढ़ता को शास्त्रों में धृति कहा जाता है। यह संकल्प बुद्धि के दृढ़ निश्चय से आता है। कई लोग शास्त्रों में प्रदत्त आत्मा के स्वरुप और संसार की असारता के संबंध में सैद्धान्तिक ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं किन्तु उनका दैनिक जीवन उनके इस ज्ञान से प्रभावित नहीं होता। उन्हें प्रायः पाप, कामुकता और नशे में संलिप्त देखा जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनकी बुद्धि ऐसे ज्ञान को स्वीकार नहीं करती। संसार की नश्वरता का बोध होने और भगवान के साथ शाश्वत संबंध स्थापित करने के बुद्धि के निश्चय से विवेक शक्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार बुद्धि का प्रयोग करते हुए हमें धीरे-धीरे इन्द्रिय सुख में संलिप्तता का त्याग करना होगा। इसे 'प्रत्याहार' कहा जाता है अर्थात् मन और इन्द्रियों को नियंत्रित कर उन्हें विषयों की ओर आकर्षित होने से रोकना है। प्रत्याहार में शीघ्र सफलता नहीं मिलेगी। इसे धीरे-धीरे बार-बार अभ्यास कर प्राप्त किया जा सकता है। इस अभ्यास में क्या सम्मिलित है? इसकी व्याख्या श्रीकृष्ण अगले श्लोक में करेंगे-
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् |
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् || 26||
जब और जहाँ भी मन बेचैन और अस्थिर होकर भटकने लगे तब उसे वापस लाकर भगवान की ओर केन्द्रित करना चाहिए।
साधना में सफलता एक ही दिन में प्राप्त नहीं की जा सकती। यह मार्ग दीर्घकालीन और कठिन है। जब हम मन को भगवान पर केन्द्रित करने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ ध्यान में बैठते हैं तब प्रायः यह सांसारिक संकल्पों और विकल्पों के बीच भटकता रहता है। इसलिए ध्यान प्रक्रिया में सम्मिलित तीन चरणों को समझना आवश्यक है।
1. बुद्धि की विवेक शक्ति द्वारा हम यह निर्णय लेते हैं कि संसार हमारा लक्ष्य नहीं है इसलिए हमें बलपूर्वक मन को संसार से हटा लेना चाहिए। इसके लिए प्रयास करना आवश्यक है।
2. हमें पुनः विवेक शक्ति से युक्त होकर यह समझना चाहिए कि केवल भगवान ही हमारे हैं और भगवत्प्राप्ति हमारा लक्ष्य है। इस प्रकार से हम मन को भगवान में केन्द्रित कर सकते हैं। यह सब प्रयास से ही संभव हो सकता है।
3. जब मन भगवान से विमुख होकर वापस संसार में भटकने लगता है, तब इसके लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता, यह स्वतः हो जाता है।
जब यह तीसरा चरण स्वतः होने लगता है तब साधक निराश होकर सोचते हैं-'हमने भगवान पर ध्यान लगाने के लिए कड़ा परिश्रम किया किन्तु मन वापस संसार में चला गया।' किन्तु श्रीकृष्ण हमें निराश न होने का उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि मन चंचल है और हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि मन को नियंत्रित करने के हमारे प्रयासों के पश्चात् भी क्या यह अपनी आसक्ति के विषयों की ओर भटकता है अथवा नहीं, किन्तु जब यह भटकने लगे तब हमें एक बार पुनः चरण-1 और चरण-2 में दिए गए निर्देशों को दोहराते हुए मन को संसार से हटा कर भगवान में केन्द्रित करना चाहिए। तब हमें एक बार पुनः अनुभव होता है कि तीसरा चरण स्वतः क्रियाशील हो रहा है। ऐसे में हमें पराजित होकर पीछे नहीं हटना चाहिए बल्कि पुनः प्रथम और दूसरे चरण के निर्देशों का पालन करना चाहिए। हमें बार-बार इसका अभ्यास करना होगा। तब धीरे-धीरे मन की भगवान में भक्ति बढ़नी आरम्भ होगी और साथ-साथ संसार से इसकी विरक्ति भी बढ़ेगी। ऐसा होने से मन सुगमता से हमारे वश में हो जाता है जिससे साधना में ध्यान लगाना सुगम और सहज हो जाता है।
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् |
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् || 27||
जिस योगी का मन शांत हो जाता है और जिसकी वासनाएँ वश में हो जाती हैं एवं जो निष्पाप है तथा जो प्रत्येक वस्तु का संबंध भगवान के साथ जोड़कर देखता है, उसे अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है।
सिद्ध योगी अपने मन को भौतिक विषयों से हटाने और उसे भगवान में केन्द्रित करने में निपुण हो जाता है और उसके सभी भाव उसके वश में हो जाते हैं तथा उसका मन पूर्ण रूप से शांत हो जाता है। प्रारंभिक प्रयास तो मन को भगवान की ओर केन्द्रित करने के लिए आवश्यक थे किन्तु अब मन स्वतः भगवान की ओर आकर्षित होता है। ऐसी अवस्था में प्रबुद्ध साधक सब कुछ भगवान से संबंधित मानते हैं।
नारद मुनि ने कहा है
तत् प्राप्य तदेवालोकयती तदेव श्रृणोति ।
तदेव भाषयति तदेव चिन्तयति ।।
(नारद भक्तिदर्शन, सूत्र-55)
"जिस साधक का मन भगवान के प्रेम में डूबकर एक हो जाता है उसकी चेतना सदा भगवान की भक्ति में लीन रहती है। ऐसा साधक भगवान को ही देखता है, भगवान के संबंध में ही सुनता है, भगवान की ही चर्चा करता है और उसके बारे में ही सोचता है।" जब मन इस प्रकार से भगवान की भक्ति में लीन हो जाता है तब आत्मा अपने भीतर विराजमान भगवान के असीम आनन्द की अनुभूति करती है। साधक सदैव यह प्रश्न करते हैं कि वे कैसे जानें कि वे आत्मोन्नति कर रहे हैं। इसका उत्तर इसी श्लोक में दिया गया है। जब हम अपने भीतर के अलौकिक आनन्द को बढ़ता देखते हैं तब हम इस लक्षण को स्वीकार कर सकते हैं कि हमारा मन वश में हो रहा है और हमारी चेतना आध्यात्मिक रूप से ऊपर उठ रही है। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब हम शान्तरजसम् (कामवासना रहित) और अकल्मषम् (पापों से मुक्त) हो जाते हैं तब हम ब्रह्मभूतम्, अर्थात् भगवत्चेतना से युक्त हो जाते हैं। उस अवस्था में हम सुखम्-उत्तमम् अर्थात् परम आनन्द की अनुभूति करते हैं।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मष: |
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते || 28||
इस प्रकार योगी स्वयं को भगवान से एकीकृत कर भौतिक कल्मषों से मुक्त हो जाता है और निरन्तर परमेश्वर में तल्लीन होकर उसकी दिव्य प्रेममयी भक्ति में परम सुख प्राप्त करता है।
सुख को हम चार श्रेणियों में वर्गीकृत कर सकते हैं-
सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तु राजसम्।
तामसं मोहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.25.29)
तामसिक सुखः यह सुख नशा, मदिरा, धूम्रपान, सिगरेट, मांसाहार के सेवन, अहिंसा और अधिक निद्रा करने से मिलता है। राजसिक सुखः यह सुख पाँच इन्द्रियों और मन की तृप्ति से प्राप्त होता है।
सात्त्विक सुखः इस सुख की अनुभूति गुणों, जैस-अनुराग, परोपकार, ज्ञान को विकसित करने तथा मन को शान्त रखने से होती है। इसमें ज्ञानियों के आत्मज्ञान की अनुभूति जिसे वे मन को आत्मा पर केन्द्रित करके प्राप्त करते हैं, भी सम्मिलित है।
निर्गुण सुखः यह भगवान का दिव्य सुख है जो असीम और अनन्त है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जो योगी भौतिक कल्मषों से मुक्त हो जाते हैं और भगवान के साथ एकनिष्ठ हो जाते हैं वे इस उच्चावस्था को पाकर परमानंद प्राप्त करते हैं। उन्होंने पाँचवें अध्याय के 21वें श्लोक में इसे असीम सुख और छठे अध्याय के 21वें श्लोक में परम सुख कहा है।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि |
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन: || 29||
सच्चा योगी अपनी चेतना को भगवान के साथ एकीकृत कर समान दृष्टि से सभी जीवों में भगवान और भगवान को सभी जीवों में देखता है।
भारत में दीपावली के उत्सव के दौरान दुकानों में कई प्रकार की चीनी से बनी मिठाइयाँ, हाथी गेंद और टोपी आदि का आकार बनाकर बेची जाती हैं। बच्चे अपने अभिभावकों से कार, हाथी आदि की आकृतियों में बनी हुई चीनी की मिठाइयाँ लेने की हठ करते हैं। अभिभावक उनकी नासमझी पर यह समझकर हँसते हैं कि ये सब खिलौने एक ही चीनी की सामग्री से बने हैं और सबकी मिठास एक समान है। इसी प्रकार सभी पदार्थों में भगवान अपनी विभिन्न शक्तियों के साथ स्वयं रहते हैं।
एक देशस्थितस्याग्निज्यो॔त्स्ना विस्तारिणी यथा।
परस्य ब्रह्मणः शक्तिस्तथैदमखिलं जगत्।।
(नारद पंचरात्र)
"जिस प्रकार सूर्य एक स्थान पर स्थित रहकर अपना प्रकाश सब जगह फैला देता है उसी प्रकार से भगवान अपनी विभिन्न शक्तियों द्वारा सर्वत्र व्याप्त रहते हैं और इनका पोषण करते हैं।" इस प्रकार पूर्ण सिद्ध योगी सभी वस्तुओं को भगवान से जुड़ा मानता है।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति || 30||
वे जो मुझे सर्वत्र और प्रत्येक वस्तु में देखते हैं, मैं उनके लिए कभी अदृश्य नहीं होता और वे मेरे लिए अदृश्य नहीं होते।
भगवान को भूलने से तात्पर्य मन का भगवान से विमुख होकर भटकना है और उसमें मन के लगने का अर्थ मन को भगवान में एकत्व कर उसके सम्मुख होना है। मन को भगवान के साथ जोड़ने का सरल उपाय सीखने के लिए सभी पदार्थों को भगवान से संबंधित देखना चाहिए। उदाहरणार्थ यदि कोई हमें आहत करता है तब मन अपनी प्रवृत्ति के अनुसार भावुक होकर हमें आहत करने वाले के प्रति रोष और घृणा व्यक्त करता है। यदि हम मन को ऐसा करने की अनुमति देते हैं तब हमारा मन आध्यात्मिक क्षेत्र से दूर भाग जाता है और मन का भगवान से योग समाप्त हो जाती है। इसके स्थान पर यदि हम उस व्यक्ति के भीतर भगवान की अनुभूति करते हैं तब कोई ऐसा सोचेगा-"भगवान इस व्यक्ति के माध्यम से मेरी परीक्षा ले रहे हैं क्योंकि वे मेरे भीतर सहिष्णुता के गुण को बढ़ाना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने इस व्यक्ति को मेरे साथ दुर्व्यवहार करने की प्रेरणा दी होगी लेकिन मैं अपने मन को इस घटना द्वारा मुझे विक्षुब्ध करने की स्वीकृति नहीं दूंगा।" इस प्रकार से सोचकर हम अपने मन को नकारात्मक मनोभावों का शिकार बनने से रोकने में समर्थ हो सकते हैं। इसी प्रकार से मन जब मित्र या सगे संबंधी में आसक्त हो जाता है, तब वह भगवान से विमुख हो जाता है। ऐसे में यदि हम मन को समझायें कि वह उस व्यक्ति में भगवान को देखे तब प्रत्येक समय जब मन उस व्यक्ति या महिला में भटकने लगे तब हम यह सोचने लगेंगे –'भगवान श्रीकृष्ण उस व्यक्ति या महिला के भीतर उपस्थित हैं। इसलिए मैं इन पर आकर्षित हो रहा हूँ।' इस विधि से मन स्थिर होकर निरन्तर परमेश्वर की भक्ति में लीन रहेगा।
कई बार मन अतीत की घटनाओं पर शोक व्यक्त करता है। इससे पुनः मन दिव्य आध्यात्मिक क्षेत्र से विलग हो जाता है। क्योंकि शोक मन को अतीत में उलझा देता है और इससे वर्तमान में भगवान और गुरु का चिन्तन समाप्त हो जाता है। यदि हम उन घटनाओं का संबंध भगवान के साथ जोड़कर देखते हैं तब यह विचार होगा -" भगवान ने जान-बूझकर ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न की थी ताकि मैं संसार के कष्टों का अनुभव कर सकू जिससे मैं सांसारिक आकर्षणों से विरक्त होने के योग्य बन पाऊँ। भगवान मेरे कल्याण के संबंध में अत्यंत चिन्तित हैं इसलिए उन्होंने मुझ पर दया करके ऐसी उपयुक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न की हैं जो कि मेरे आध्यात्मिक उत्थान के लिए अत्यंत लाभदायक हैं।" ऐसा सोचकर हम भगवान की भक्ति पाने के योग्य बन सकते हैं।
लोकहानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्म लोकवेदत्वात् ।।
(नारद भक्तिदर्शन सूत्र-61)
"जब हम संसार में कठिनाइयों का सामना करे, तब हमें शोक या इन पर चिन्ता नहीं करनी चाहिए। इन घटनाओं को भगवान की कृपा के रूप में देखना चाहिए।" यदि हमारा निजी स्वार्थ किसी भी प्रकार से भगवान के अलावा मन में किसी अन्य को प्रश्रय देता है तब इसको समझाने का सरल उपाय सर्वत्र सभी पदार्थों और समस्त जीवों में भगवान को देखना है। यही अभ्यास धीरे-धीरे पूर्णता की ओर ले जाता है और फिर जैसा कि इस श्लोक में उल्लेख किया गया है कि हम कभी भगवान के लिए अदृश्य नहीं होंगे और भगवान हमारे लिए अदृश्य नहीं होंगे।
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित: |
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते || 31||
जो योगी मुझमें एकनिष्ठ हो जाता है और परमात्मा के रूप में सभी प्राणियों में मुझे देखकर श्रद्धापूर्वक मेरी भक्ति करता है, वह सभी प्रकार के कर्म करता हुआ भी केवल मुझमें स्थित हो जाता है।
भगवान सर्वव्यापक हैं। वे परमात्मा के रूप में सभी के हृदय में निवास करते हैं। अठारहवें अध्याय के 61वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने वर्णन किया है-"मैं सभी प्राणियों के हृदय में निवास करता हूँ।" इस प्रकार से सभी प्राणियों के शरीर में दो ही तत्त्व हैं-आत्मा और परमात्मा ।
1. भौतिक चेतना से युक्त लोग सभी को शरीर के रूप में देखते हैं और जाति, नस्ल, लिंग, आयु और सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर एक-दूसरे से भेदभाव बनाए रखते हैं।
2. उच्च चेतना में युक्त मनुष्य सभी को आत्मा के रूप में देखते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण ने पाँचवे अध्याय के 18वें श्लोक में कहा है कि विद्वान लोग दिव्य ज्ञान की दृष्टि से ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और कुत्ते का मांस भक्षण करने वाले चाण्डाल को समान दृष्टि से देखते
3. दिव्य चेतना से युक्त सिद्ध योगी भगवान को परमात्मा के रूप में सब में स्थित देखते हैं। वे संसार का अनुभव भी करते हैं किन्तु उसमें उलझते नहीं। वे उस हंस के समान होते हैं जो दूध और जल के मिश्रण में से केवल दूध का सेवन करता है व जल को छोड़ देता है।
4. सिद्धावस्था प्राप्त योगियों को परमहंस कहा जाता है। वे सर्वत्र भगवान को देखते हैं और संसार का अनुभव नहीं करते। श्रीमद्भागवत् में किए गए वर्णन के अनुसार महर्षि वेदव्यास के सुपुत्र शुकदेव जो परमहंस थे
यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव ।
पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदुस्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ।।
(श्रीमद्भागवत् 1.2.2)
"जब शुकदेव बचपन में ही घर से संन्यास लेकर निकल पड़े उस समय वह ऐसी परम सिद्धावस्था में थे कि उन्हें संसार का बोध नहीं था। उन्होंने सरोवर में नग्न होकर स्नान कर रही सुन्दर स्त्रियों की ओर ध्यान नहीं दिया जबकि वह वहाँ से निकल कर गये थे। उन्होंने केवल भगवान की ही अनुभूति की, भगवान के बारे में ही सुना और भगवान का ही चिन्तन किया।" इस श्लोक में श्रीकृष्ण पूर्ण सिद्ध योगी की चर्चा कर रहे हैं जो तीसरे और चौथे चरण से ऊपर के स्तर की अनुभूति है।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन |
सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मत: || 32||
मैं उन पूर्ण सिद्ध योगियों का सम्मान करता हूँ जो सभी जीवों में समानता के दर्शन करते हैं और दूसरों के सुखों और दु:खों के प्रति ऐसी भावना व्यक्त करते हैं, जैसे कि वे उनके अपने हों।
शरीर के सभी अंग हमारे हैं और यदि किसी भी अंग में विकार आ जाता है तब हम समान रूप से उसकी चिन्ता करते हैं। हम निर्विवाद रूप से स्वीकार करते हैं कि यदि हमारे किसी अंग को कोई कष्ट होता है तो उससे हमें भी कष्ट होगा। उसी तरह जो सब प्राणियों में भगवान को देखते हैं उन्हें सबके सुख और दु:ख अपने समान लगते हैं। इसलिए ऐसे योगी सभी जीवात्माओं के शुभ चिन्तक होते हैं और सभी के आंतरिक लाभ के लिए प्रयास करते हैं। यही पूर्ण योगी का समदर्शन है।
अर्जुन उवाच |
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्त: साम्येन मधुसूदन |
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ||
अर्जुन ने कहा-हे मधुसूदन! आपने जिस योगपद्धति का वर्णन किया वह मेरे लिए अव्यावहारिक और अप्राप्य है क्योंकि मन चंचल है।
अर्जुन इस श्लोक के प्रारम्भ में 'योऽयं' शब्द का उच्चारण करता है। इसका अर्थ 'यह योग की पद्धति है' जिसका इस अध्याय के 10वें श्लोक से आगे वर्णित श्लोकों में उल्लेख किया गया है। श्रीकृष्ण अब योग में सिद्धता के लिए आवश्यक रूप से अनुपालन किए जाने वाले बिन्दुओं को बताते हुए अपनी व्याख्या को समाप्त करते हैं
1. इन्द्रियों का दमन करना।
2. सभी कामनाओं का त्याग करना।
3. मन को केवल भगवान पर केन्द्रित करना।
4. स्थिर मन से भगवान का चिन्तन करना।
5. सबको समान दृष्टि से देखना।
अर्जुन यह कहकर कि जो भी उसने सुना वह अव्यवहारिक है, नि:संकोच अपना संदेह प्रकट करता है। मन को नियंत्रित किए बिना इनमें से किसी का भी पालन नहीं किया जा सकता। यदि मन अस्थिर है तब योग की ये सभी अवस्थाएँ अप्राप्य हो जाती हैं।
चञ्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् |
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् || 34||
हे कृष्ण! क्योंकि मन अति चंचल, अशांत, हठी और बलवान है। मुझे वायु की अपेक्षा मन को वश में करना अत्यंत कठिन लगता है।
अर्जुन द्वारा व्यक्त की गयी मन की दशा हम सबके दुराग्रही मन की दशा की ओर इंगित करती है। यह बेचैन रहता है क्योंकि यह एक विषय से दूसरे विषय की ओर अलग-अलग दिशाओं में भटकता रहता है। यह अशांत रहता है क्योंकि यह किसी की चेतना में घृणा, क्रोध, काम, लोभ, ईर्ष्या, चिन्ता, आसक्ति के रूप में उथल-पुथल उत्पन्न करता है। यह शक्तिशाली है क्योंकि यह अपनी प्रबल धाराओं के बल से बुद्धि पर हावी हो जाता है और विवेक शक्ति को नष्ट कर देता है। मन हठी भी है क्योंकि जब मन में हानिकारक विचार आ जाते हैं तब फिर यह उन्हें मन से बाहर नहीं निकालता और निरन्तर बार-बार उनका तब तक चिन्तन करता है जब तक कि वे बुद्धि को भ्रमित न कर दें। इस प्रकार यहाँ मन के हानिकारक लक्षणों की गणना की गयी है। अर्जुन भी स्वीकार करता है कि वायु की अपेक्षा मन को नियंत्रित करना अत्यंत कठिन है। यह एक उत्तम दृष्टान्त है कि कोई भी व्यक्ति आकाश में व्याप्त वायु शक्ति को नियंत्रित करने की सोच भी नहीं सकता।
इस श्लोक में अर्जुन ने श्रीकृष्ण को भगवान कह कर सम्बोधित किया है। कृष्ण शब्द का अर्थ, "कर्षति योगिनां परमहंसानां चेतांसि इति कृष्णः" अर्थात् "कृष्ण वह है जो मन को बलपूर्वक आकर्षित कर लेता है चाहे कोई दृढ़ मन वाला योगी और परमहंस ही क्यों न हो।" इस प्रकार से अर्जुन यह इंगित कर रहा है कि श्रीकृष्ण को उसके अस्थिर, अशांत, बलशाली और हठी मन को भी अपने आकर्षण में बाँध लेना चाहिए।
श्रीभगवानुवाच |
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् |
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते || 35||
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा-हे महाबाहु कुन्तीपुत्र! जो तुमने कहा वह सत्य है, मन को नियंत्रित करना वास्तव में कठिन है। किन्तु अभ्यास और विरक्ति द्वारा इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
Commentary
अर्जुन को संबोधित कर श्रीकृष्ण में कहते हैं-“हे बलिष्ठ भुजाओं वाले अर्जुन, तुमने युद्ध में महाबलशाली योद्धाओं को पराजित किया है तो क्या तुम मन को वश में नहीं कर सकते?" किन्तु श्रीकृष्ण इस समस्या को यह कहकर अस्वीकार नहीं करते-“हे अर्जुन तुम ऐसी व्यर्थ की चर्चा क्यों कर रहे हो? मन को सुगमता से नियंत्रित किया जा सकता है।" इसके विपरीत वे अर्जुन के इस कथन के साथ कि मन पर नियंत्रण प्राप्त करना कठिन है, अपनी सहमति प्रकट करते हैं। यद्यपि संसार में बहुत-सी वस्तुओं को प्राप्त करना कठिन होता है तथापि हम निडर होकर आगे बढ़ते हैं। नाविकों को ज्ञात होता है कि समुद्र में नाव चलाना जोखिम भरा कार्य है और भयानक तूफान आने की आशंका बनी रहती है। फिर भी वे इन जोखिमों को तट पर खड़े रहने का बहाना नहीं बनाते। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि मन को वैराग्य और अभ्यास द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।
वैराग्य से तात्पर्य संसार से विरक्त होना है। हम देखते हैं कि मन भौतिक विषयों एवं पदार्थों की ओर आकर्षित होता है। इस दिशा की ओर बढ़ने से वह अतीत का चिन्तन करने का आदी हो जाता है। आसक्ति का उन्मूलन मन को अनावश्यक भटकने से रोकता है।
अभ्यास एक ठोस प्रयास है जिसका लक्ष्य पुरानी प्रवृत्तियों को परिवर्तित करना या नवीन विचार उत्पन्न करना है। साधक के लिए अभ्यास शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानवीय प्रयास के सब क्षेत्रों में अभ्यास निपुणता और उत्कृष्टता के द्वार को खोलने की कुंजी है। इसे टाइपिंग कार्य के उदाहरण से समझा जा सकता है। पहली बार जब लोग टाइपिंग करना आरम्भ करते हैं तब वे एक मिनट में एक शब्द टाइप कर पाते हैं। किन्तु एक वर्ष टाइपिंग का अभ्यास करने के पश्चात् उनकी उंगलियाँ टाइपराइटर पर 80 शब्द प्रति मिनट की गति से दौड़ती हैं। यह दक्षता पूर्ण अभ्यास के कारण से आती है। इसी प्रकार हठी और अशांत मन को परम प्रभु के चरण कमल पर स्थिर करने का प्रयास करना चाहिए। मन को संसार से हटाना वैराग्य है और मन को भगवान में स्थित करना अभ्यास है। ऋषि पतंजलि ने भी यही उपदेश दिया है
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:।।
(पतंजली योगदर्शन-1.12)
'मन की चंचलता को निरन्तर अभ्यास और विरक्ति द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।'
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मति: |
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायत: || 36||
जिनका मन निरंकुश है उनके लिए योग करना कठिन है। लेकिन जिन्होंने मन को नियंत्रित करना सीख लिया है और जो समुचित ढंग से निष्ठापूर्वक प्रयास करते हैं, वे योग में पूर्णता प्राप्त कर सकते हैं। यह मेरा मत है।
परम पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण मन को नियंत्रित करने और योग में सफलता पाने के बीच की कड़ी को स्पष्ट करते हैं। वह कहते हैं कि जिन्होंने अभ्यास और वैराग्य द्वारा मन पर अंकुश लगाना नहीं सीखा, उन्हें योग का अभ्यास करना कठिन लगता है। लेकिन जो समुचित उपायों को अपनाते हुए निरन्तर प्रयास द्वारा मन को अपने वश में कर लेते हैं, वे योग में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। इसकी प्रक्रिया का वर्णन श्लोक 6.10 से 6.32 तक में पहले ही किया जा चुका है जिसमें इन्द्रियों का दमन करना, सभी कामनाओं का त्याग करना, मन को केवल भगवान पर केन्द्रित करना, अविचलित मन से भगवान का चिन्तन करना और सभी को समान दृष्टि से देखना आदि सम्मिलित है। इस कथन द्वारा अर्जुन के मन में उस साधक के संबंध में शंका उत्पन्न होती है जो अपने मन को नियंत्रित करने में असमर्थ है। इसलिए वह अब इस संबंध में श्रीकृष्ण से प्रश्न करता है।
अर्जुन उवाच |
अयति: श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानस: |
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति || 37||
अर्जुन ने कहाः हे कृष्ण! योग में असफल उस योगी की गति क्या होती है जो श्रद्धा के साथ इस पथ पर चलना प्रारम्भ तो करता है किन्तु जो अस्थिर मन के कारण भरपूर प्रयत्न नहीं करता और इस जीवन में योग के लक्ष्य तक पहुँचने में असमर्थ रहता है।
भगवत्प्राप्ति की यात्रा श्रद्धा के साथ आरम्भ होती है। कई साधक अपने पूर्व जन्म के संस्कारों से या संतों की संगति या संसार में हानि के कारण धार्मिक ग्रंथों में अपनी श्रद्धा विकसित करती हैं। इस यात्रा में अपेक्षित श्रद्धा के उत्पन्न करने के कई कारण हो सकते हैं। किन्तु यदि ऐसे साधक आवश्यक प्रयास नहीं करते और 'अयतिः' अर्थात आलसी बन जाते हैं तब उनका मन बेचैन रहता है। ऐसे साधक अपने जीवन में इस यात्रा को पूर्ण करने में असमर्थ रहते हैं। अर्जुन ऐसे साधकों का भाग्य जानना चाहता है।
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति |
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मण: पथि || 38||
हे महाबाहु कृष्ण! क्या योग से पथ भ्रष्ट ऐसा व्यक्ति भौतिक एवं आध्यात्मिक सफलताओं से वंचित नहीं होता और छिन्न-भिन्न बादलों की भाँति नष्ट नहीं हो जाता जिसके परिणामस्वरूप वह किसी भी लोक में स्थान नहीं पाता?
जीवात्मा में सफलता प्राप्त करने की इच्छा स्वाभाविक होती है। यह भगवान (जो पूर्ण सिद्ध हैं) का अंश होने के कारण उत्पन्न होती है। भौतिक और अध्यात्म दोनों क्षेत्रों में सफलता प्राप्त की जा सकती है। वे जो संसार को सुखों का साधन मानते हैं, वे भौतिक उन्नति के लिए प्रयास करते हैं और जो वास्तविक निधि के रूप में आध्यात्मिक संपदा को प्राप्त करने को अपना सौभाग्य समझते हैं, वे इसके लिए भौतिक उन्नति को अस्वीकार कर देते हैं। किन्तु यदि ऐसे साधक अपने प्रयास में असफल होते हैं तब वे न तो आध्यात्मिक और न ही सांसारिक संपदा को प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा सोचकर अर्जुन पूछता है कि क्या ऐसे साधकों की स्थिति छिन्न-भिन्न बादल की भाँति होती है? जो बादल समूह से टूटकर अलग हो जाता है एवं जो न तो पर्याप्त छाया देता है और न ही भारी होकर वर्षा करता है, वह केवल वायु में उड़ जाता है और अस्तित्व हीन होकर आकाश में विनष्ट हो जाता है।
अर्जुन पूछता है कि क्या असफल योगी ऐसे दुर्भाग्य का सामना करता है और क्या उसे किसी भी लोक में स्थान नहीं मिलता।
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषत: |
त्वदन्य: संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते || 39||
हे कृष्ण! कृपया मेरे इस सन्देह का निवारण करें क्योंकि आपके अतिरिक्त कोई अन्य नहीं है जो ऐसा कर सके।
अज्ञान के कारण ही संदेह उत्पन्न होते हैं और इन सन्देहों का निवारण करने के लिए शास्त्रों का सैद्धान्तिक ज्ञान ही पर्याप्त नहीं होता। क्योंकि शास्त्रों में कई विरोधाभासी विचार सम्मिलित होते हैं जिनका समाधान केवल अनुभव द्वारा ही हो सकता है। महापुरुष ऐसे अनुभवात्मक ज्ञान से संपन्न होते हैं जो सीमित मात्रा का होता है। वे सर्वज्ञ नहीं होते। वे संदेह निवारण करने की शक्ति से सम्पन्न होते हैं किन्तु उनकी भगवान से तुलना नहीं हो सकती जो पूर्ण एवं सर्वज्ञ हैं। केवल भगवान ही 'सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है' इसलिए वे उसी प्रकार से अज्ञानता को दूर करने में समर्थ हैं जिस प्रकार सूर्य अंधकार को मिटाने में पूर्णतः समर्थ होता है।
श्रीभगवानुवाच |
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते |
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति || 40||
परमेश्वर श्रीकृष्ण ने कहाः हे पृथा पुत्र! आध्यात्मिक पथ का अनुसरण करने वाले योगी का न तो इस लोक में और न ही परलोक में विनाश होता है। मेरे प्रिय मित्र! भगवत्प्राप्ति के मार्ग पर चलने वाले का पतन नहीं हो सकता।
'तात' एक स्नेहपूर्ण शब्द है जिसका साहित्यिक अर्थ 'पुत्र' है। अर्जुन को 'तात' शब्द से संबोधित कर श्रीकृष्ण उसके प्रति अपना स्नेह प्रदर्शित करते हैं। पुत्र को स्नेहपूर्वक 'तात' कहकर संबोधित किया जाता है। गुरु शिष्य के लिए पिता समान है और इसलिए गुरु भी कई बार शिष्य को स्नेहपूर्वक 'तात' कहकर पुकारते हैं। यहाँ अर्जुन के प्रति अपना स्नेह और कृपा व्यक्त करते हुए श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि भगवान उनकी सहायता करते हैं जो उनके मार्ग का अनुगमन करते हैं। वे भगवान के प्रिय होते हैं क्योंकि वे अति पुण्यशाली और पवित्र कार्यों में लीन रहते हैं। इस मार्ग पर चलने वाले को कभी कष्ट नहीं होता। यह श्लोक इस बात की पुष्टि करता है कि भगवान अपने भक्त की इस लोक में और परलोक में रक्षा करते हैं। यह उद्घोषणा सभी साधकों के लिए आश्वासन है।
श्रीकृष्ण अब यह स्पष्ट करेंगे कि भगवान योगभ्रष्ट जीव के प्रयासों को कैसे सुरक्षित करके रखते हैं।
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वती: समा: |
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते || 41||
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् |
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् || 42||
योगभ्रष्ट जीव मृत्यु के पश्चात् पुण्य आत्माओं के लोक में जाते हैं। अनेक वर्षों तक वहाँ निवास करने के पश्चात् वे पृथ्वी पर कुलीन या धनवानों के कुल में पुनः जन्म लेते हैं अथवा जब वे दीर्घकाल तक योग के अभ्यास से विरक्त हो चुके होते हैं तब उनका जन्म दिव्य ज्ञान से सम्पन्न परिवारों में होता है। संसार में ऐसा जन्म अत्यंत दुर्लभ है।
जो लौकिक पुण्यकर्मो में संलग्न रहते हैं उन्हें स्वर्गलोक में स्थान मिलता है। वे फल की इच्छा से वेदों में प्रदत्त कर्मकाण्डों का पालन करते हैं। किन्तु योगभ्रष्ट को स्वर्गलोक क्यों भेजा जाता है? इसका कारण भोग है। भोग की कामना के कारण ही व्यक्ति योग मार्ग से भ्रष्ट हो जाता है। इसलिए भगवान एक पिता की भाँति योग मार्ग से भ्रष्ट योगी को अगले जन्म में सुख भोगने और यह अनुभूति करने का अवसर प्रदान करते हैं कि लौकिक सुख व्यर्थ हैं जो अनन्त आनन्द प्राप्त करने के लिए तरसती आत्मा को तृप्त नहीं कर सकता। इसलिए असफल योगी को कभी-कभी दीर्घकाल के लिए स्वर्ग के उच्च लोकों में भेजा जाता है और फिर वे पुनः पृथ्वी पर जन्म लेते हैं।
ऐसी जीवात्माओं को तब ऐसे कुलों में जन्म मिलता है जहाँ उन्हें अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आगे जारी रखने का अवसर मिल सके। 'शुचि' का अर्थ पवित्र और सदाचार का पालन करने वालों से हैं और 'श्री' का अर्थ वे जो धनवान हैं। असफल योगी या तो किसी पुण्य कर्म करने वाले परिवार में जहाँ बचपन से बालक में आध्यात्मिकता का पोषण किया जाता है या किसी धनवान परिवार में जन्म लेता है जहाँ सभी प्रकार की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का ध्यान रखा जाता है और जहाँ किसी प्रकार का संघर्ष नहीं करना पड़ता। ऐसा पारिवारिक परिवेश उन जीवात्माओं को जिनकी आध्यात्मवाद में रुचि होती है, उन्हें आध्यात्मिक गतिविधियों में संलग्न रहने का अवसर प्रदान करता है।
हमारे जीवन पर परिस्थितियों, और हमारे परिवार का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। हमारे माता पिता से हमें वंशानुगत गुण आदि प्राप्त होते हैं। यह वंशानुगत की आनुवांशिक प्रक्रिया है। हालांकि सामाजिक आनुवांशिकता का भी महत्त्व होता है। हम अपने सामाजिक परिवेशों के कारण कई प्रकार के रीति रिवाजों का पालन आँखे मूंद कर करते हैं। हम भारतीय, अमेरीकी और ब्रिटिश होने का चयन नहीं कर सकते। हम अपने जन्म स्थान के आधार पर अपनी राष्ट्रीयता की पहचान करते हैं और यहाँ तक कि हम अन्य राष्ट्रीयता वाले लोगों से शत्रुता रखते हैं। इस प्रकार से हम सामाजिक आनुवांशिकता के आधार पर ही अपने पूर्वजों के धर्म का भी पालन करते हैं।
हमारे जन्मस्थान और जन्म कुल का हमारे जीवन के दिशा और प्रगति पर अत्यंत प्रभाव पड़ता हैं। यदि प्रत्येक जन्म में स्थान और जन्मकुलों का स्वेच्छानुसार निर्णय लिया जाता, तब संसार में कभी कोई न्याय नहीं हो सकता था। चूंकि भगवान हमारे अनन्त जन्मों के विचारों और कर्मों का लेखा-जोखा अपने पास रखते हैं। अतः कर्म के नियमों के अनुसार योगभ्रष्ट को पिछले जन्म में अर्जित आध्यात्मिक संपत्ति का फल मिलता है। तदनुसार ऐसे योगी, जो आध्यात्मिक क्षेत्र में अत्यधिक दूरी तय करने के पश्चात् उदासीन हो जाते हैं, उन्हें उच्च लोकों में नहीं भेजा जाता। उन्हें आध्यात्मिक रूप से उन्नत कुलों में जन्म दिया जाता है, ताकि वे सुगमतापूर्वक अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आगे बढ़ा सकें। इस प्रकार ऐसा जन्म अति सौभाग्यशाली होता है, क्योंकि माता-पिता बच्चों को आरम्भ से ही भगवत्शिक्षा प्रदान करते हैं।
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् |
यतते च ततो भूय: संसिद्धौ कुरुनन्दन || 43||
हे कुरुवंशी! ऐसा जन्म पाकर वे पिछले जन्म के ज्ञान को पुनः प्राप्त करते हैं और योग में पूर्णता के लिए और अधिक परिश्रम करते हैं।
भगवान प्रत्येक प्राणी के हृदय में रहते हैं और पूर्ण न्यायकर्ता हैं। हमने पिछले जीवन में विरक्ति, ज्ञान, भक्ति, श्रद्धा, सहनशीलता, दृढ संकल्प आदि जो भी आध्यात्मिक संपत्ति प्राप्त की थी इन सबका भगवान को ज्ञान होता है। इसलिए भगवान उचित समय पर हमारे अतीत के प्रयत्नों का फल प्रदान करते हैं और हमारी पिछली उपलब्धियों के अनुसार हमारे भीतर आध्यात्मिकता के गुणों को बढ़ाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भौतिकवादी विचारों को मानने वाले कुछ लोग अचानक कैसे आध्यात्मिक हो जाते हैं। जब उनके आध्यात्मिक संस्कार जागृत होते हैं तब उन्हें अपनी पूर्व जन्म की साधना का लाभ मिलता है।
एक यात्री रात्रि के समय मार्ग पर स्थित एक होटल में विश्राम करने के लिए जाता है। लेकिन जब वह प्रात:काल में जागता है तब पहले से तय की गई दूरी पर पुनः वापिस नहीं चलता। वह शेष दूरी को समाप्त करने के लिए आगे बढ़ता जाता है। समान रूप से भगवान की कृपा से ऐसा योगी पूर्वजन्मों में संचित की गयी आध्यात्मिक संपत्ति के बल पर नींद से जागे मनुष्य की भाँति अपनी यात्रा को वहीं से पुनः आरम्भ करने के योग्य हो जाता है जहाँ से उसने इसे छोड़ा था। इसी कारण ऐसे योगी का कभी पतन नहीं होता।
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि स: |
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते || 44||
वास्तव में वे अपने पूर्व जन्मों के संस्कारों के बल पर स्वतः भगवान की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसे जिज्ञासु साधक स्वाभाविक रूप से कर्मकाण्डों से ऊपर उठ जाते हैं।
एक बार जब आध्यात्मिक भावनाएँ उदित होती हैं तब उन्हें समाप्त नहीं किया जा सकता। जीवात्मा वर्तमान और पूर्व जीवन के भक्तिमय संस्कारों के साथ आध्यात्मिकता की ओर प्रेरित होती है। ऐसे मनुष्य भगवान की ओर आकर्षित होते हैं और इस आकर्षण को 'भगवान का आमंत्रण' भी कहा जाता है। पूर्व जन्मों के संस्कारों पर आधारित 'भगवान का यह आमंत्रण' जीवन का सबसे सशक्त निमंत्रण है। जिन्हें इसकी अनुभूति होती है वे समस्त संसार को त्याग देते हैं और अपने मित्रों और सगे-संबंधियों को भी इसी मार्ग पर चलने का परामर्श देते हैं। ऐसा इतिहास में भी देखा गया है कि महान राजाओं, कुलीन पुरुषों, धनाढ्य व्यवसायियों ने तपस्वी, योगी, ऋषी, मनीषी और स्वामी बनने के लिए अपने लौकिक पद प्रतिष्ठा और सुख सुविधाओं का परित्याग किया था। इसके अतिरिक्त उनकी श्रद्धा केवल भगवान को प्राप्त करने के लिए थी, अतः वे स्वाभाविक रूप से भौतिक उन्नति हेतु वेदों में वर्णित कर्म काण्डों से ऊपर उठ गये थे।
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिष: |
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् || 45||
पिछले कई जन्मों में संचित पुण्यकर्मों के द्वारा जब ये योगी आध्यात्मिक मार्ग में उन्नति करने हेतु प्रयत्न में लीन रहते हैं तब वे सांसारिक कामनाओं से मुक्त हो जाते हैं और इसी जीवन में भगवत्प्राप्ति कर लेते हैं।
पिछले जन्म के संचित अभ्यास आध्यात्मिक उन्नति में सहायक वायु बन जाते हैं। इसी अनुकूल वायु में योगी अपने वर्तमान जीवन में प्रयत्नों के द्वारा अपनी नाव को खड़ा करते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण ने 'प्रयत्नाद्यतमानस्तु' शब्द का प्रयोग किया है, जिसका अर्थ 'पहले से अधिक अथक प्रयास' है। 'तु ' शब्द यह इंगित करता है कि उनके वर्तमान प्रयास पूर्वजन्मों से अधिक गहन होते हैं। इस प्रकार से वे अतीत की साधना का लाभ उठाने में समर्थ हो जाते हैं और वर्तमान साधना उन्हें लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायक होती हैं। देखने वालों को ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने इस वर्तमान जीवन में ही संपूर्ण दूरी तय कर ली है। लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं-"जन्मसंसिद्धस्ततो" अर्थात् कई जन्मों के संचित कर्मों के परिणामस्वरूप योग में पूर्णता प्राप्त होती है।
तपस्विभ्योऽधिकोयोगी
ज्ञानिभ्योऽपिमतोऽधिक:|
कर्मिभ्यश्चाधिकोयोगी
तस्माद्योगीभवार्जुन|| 46||
एक योगी तपस्वी से, ज्ञानी से और सकाम कर्मी से भी श्रेष्ठ होता है। अतः हे अर्जुन! तुम सभी प्रकार से योगी बनो।
तपस्वी वह है जो स्वेच्छा से वैराग्य स्वीकार करता है, नितान्त सादा जीवन व्यतीत करता है और मोक्ष प्राप्त करने के साधन के रूप में इन्द्रियों के सुखों और भौतिक संपत्ति के संग्रह से दूर रहता है। ज्ञानी पुरुष वह है जो ज्ञान के संवर्धन में रत रहता है। कर्मी मनुष्य भौतिक समृद्धि और स्वर्ग प्राप्ति की कामना से वेदों में वर्णित कर्मकाण्डों का पालन करता रहता है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि इनमें से सर्वश्रेष्ठ योगी होता है। इसका कारण अत्यंत सरल है-कर्मी, ज्ञानी और तपस्वी का लक्ष्य लौकिक सिद्धि प्राप्त करना होता है क्योंकि वे अभी तक शारीरिक चेतन पर स्थित रहते हैं जबकि योगी सांसारिक सिद्धियाँ प्राप्त करने की अपेक्षा भगवान को पाने के लिए प्रयत्न करता है। योगी की सिद्धि आध्यात्मिक स्तर पर होती है और इसी कारण से वह इन सबमें से श्रेष्ठ होता है।
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना |
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मत: || 47||
सभी योगियों में से जिनका मन सदैव मुझ में तल्लीन रहता है और जो अगाध श्रद्धा से मेरी भक्ति में लीन रहते हैं उन्हें मैं सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ।
योगियों में कर्मयोगी, भक्ति योगी, अष्टांग योगी आदि सम्मिलित हैं। इस श्लोक में केवल यह चर्चा की गयी है कि योग की कौन सी पद्धति सर्वोत्तम है। श्रीकृष्ण भक्ति योगी को अष्टांग योगी और हठ योगी से भी श्रेष्ठ घोषित करते हैं क्योंकि भक्ति भगवान की दिव्य शक्ति है। यह एक ऐसी शक्ति है जो भगवान को भी भक्त का दास बना देती है। इसलिए श्रीमद्भागवतम् में इस प्रकार से वर्णन किया है।
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः।।
(श्रीमद्भागवतम-9.4.63)
"यद्यपि मैं परम स्वतंत्र हूँ, फिर भी मैं अपने भक्त का दास बन जाता हूँ। वे मेरे हृदय को वश में कर लेते हैं। मेरे भक्त का क्या ही वर्णन किया जा सकता है? यहाँ तक कि मेरे भक्त के भक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय हैं।" भक्त योगी दिव्य प्रेम की शक्ति से सम्पन्न होता है और इसलिए वह भगवान का अत्यंत प्रिय है और वे उसे सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।
इस श्लोक में भगवान ने 'भजते' शब्द का प्रयोग किया है। यह 'भज्' धातु से बना है, जिसका अर्थ 'सेवा करना' है। यह भक्ति के लिए 'पूजा' शब्द की अपेक्षा अत्यधिक सार्थक शब्द है जिसका अर्थ 'श्रद्धा रखना' है। यहाँ श्रीकृष्ण उनकी चर्चा कर रहे हैं जो न केवल उनमें श्रद्धा रखते हैं बल्कि अपनी प्रेममयी भक्ति से उनकी सेवा भी करते हैं। इस प्रकार से वे भगवान के सेवक के रूप आत्मा की स्वाभाविक स्थिति में प्रतिष्ठित हो जाते हैं जबकि अन्य श्रेणी के योगी आने स्वरुप के ज्ञान में अभी तक अपूर्ण रहते हैं। वे स्वयं को भगवान के साथ एकीकृत तो कर लेते हैं किन्तु फिर भी वे इस ज्ञान में स्थित नहीं होते कि वे उनके नित्य दास हैं। श्रीमद्भागवतम् में पुनः वर्णन किया गया है
मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः।
सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने।।
(श्रीमद्भागवतम्-6.14.5)
"कई लाखों सिद्ध और मुक्त संतो के मध्य कोई विरला मनुष्य ही परमेश्वर नारायण का भक्त होता है।"
इस श्लोक को इस प्रकार से भी समझा जा सकता है कि भक्ति योग ही भगवान की अंतरंग और पूर्ण अनुभूति करा सकता है। इसकी व्याख्या अठारहवें अध्याय के 55वें श्लोक में की गयी है जहाँ श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि केवल भक्ति योग द्वारा ही भगवान के विराट एवं सच्चिदानन्द स्वरूप को समझा जा सकता है।
।। श्रीमद्भागवत गीता षष्ठम अध्याय सम्पूर्ण ।।
Related Bhajans
Discover more devotional songs