॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhagavad Geeta Chapter 5
श्रीमद्भगवत गीता पंचम अध्याय
अध्याय पाँच: कर्म संन्यास योग
वैराग्य का योग
इस अध्याय में कर्म संन्यास के मार्ग की तुलना कर्मयोग के मार्ग के साथ की गयी है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि दोनों मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं और हम इनमें से किसी एक का चयन कर सकते हैं। लेकिन कर्म का त्याग तब तक पूर्णरूप से नहीं किया जा सकता। जब तक मन पूर्णतः शुद्ध न हो जाए और मन की शुद्धि भक्ति के साथ कर्म करने से प्राप्त होती है। इसलिए कर्मयोग बहुसंख्यक लोगों के लिए उपयुक्त विकल्प है। कर्मयोगी अपने सांसारिक दायित्वों का निर्वहन शुद्ध बुद्धि के साथ करते हुए अपने कर्म फलों की आसक्ति का त्याग कर उन्हें भगवान को अर्पित करते हैं। इस प्रकार से वे पाप से उसी प्रकार से अप्रभावित रहते हैं जिस प्रकार से कमल का पत्ता जल में तैरता है किन्तु जल उसे स्पर्श नहीं कर पाता। ज्ञान के आलोक में वे शरीर को नवद्वारों के एक नगर के रूप में देखते हैं जिसमें आत्मा निवास करती है। इसलिए वे न तो स्वयं को कर्म का कर्ता और न ही कर्म का भोक्ता मानते हैं। वे ब्राह्मण, गाय, हाथी, और कुत्ते का मांस भक्षण करने वाले चांडाल को एक समान दृष्टि से देखते हैं। ऐसे सच्चे संत भगवान के दिव्य गुणों को अपने भीतर विकसित करते हैं और परम सत्य में स्थित हो जाते हैं किन्तु सांसारिक लोग यह नहीं जानते कि इन्द्रिय और विषयों के संपर्क से मिलने वाले सुख वास्तव में कष्टों के कारण हैं। अतः वे अज्ञानता के कारण इनसे मिलने वाले सुखों को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। लेकिन कर्मयोगी इनसे प्रसन्न नहीं होते बल्कि इसकी अपेक्षा वे अपने भीतर भगवदीय आनन्द की अनुभूति करना पसंद करते हैं।
आगे यह अध्याय संन्यास के मार्ग का वर्णन करता है। कर्म संन्यासी अपने मन, इन्द्रियों और बुद्धि को नियंत्रित करने के लिए तपस्या करते हैं। इस प्रकार से वे भौतिक सुख के विचारों को त्याग कर इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त हो जाते हैं। फिर, वे भगवान की भक्ति के द्वारा अपनी तपस्या को सम्पूर्ण करते हैं और अनंत शांति प्राप्त करते हैं।
अर्जुन उवाच |
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि |
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् || 1||
अर्जुन ने कहा-हे कृष्ण! पहले आपने कर्म संन्यास की सराहना की और फिर आपने मुझे भक्ति युक्त कर्मयोग का पालन करने का उपदेश भी दिया। कृपापूर्वक अब मुझे निश्चित रूप से बताएँ कि इन दोनों में से कौन सा मार्ग अधिक लाभदायक है।
यह अर्जुन के सोलह प्रश्नों में से पाँचवाँ प्रश्न है। श्रीकृष्ण कर्म के परित्याग और भक्तिपूर्वक कर्म-दोनों की सराहना करते हैं। अर्जुन इन विरोधाभासी उपदेशों को सुनकर विचलित हो जाता है और वह यह जानना चाहता है कि इन दोनों में से कौन सा मार्ग उसके लिए अधिक लाभदायक है। इस प्रश्न के प्रसंग की समीक्षा की जानी आवश्यक है।
प्रथम अध्याय में अर्जुन के विषाद का वर्णन किया गया था जिसके परिणामस्वरूप श्रीकृष्ण ने उसे आध्यात्मिक ज्ञान देना आरम्भ किया। दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा के विज्ञान का बोध कराया और यह समझाया कि आत्मा अविनाशी है इसलिए युद्ध में कोई नहीं मरेगा। अतः शोक करना मूर्खता है। तत्पश्चात् वे अर्जुन को स्मरण कराते हैं कि एक योद्धा के रूप में उसका कर्त्तव्य धर्म के पक्ष में युद्ध करना है। चूंकि कर्म मनुष्य को कर्मों के प्रतिफल से बांधते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण उसे अपने कर्म-फल भगवान को अर्पित करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं ताकि उसका कर्म कर्मयोग बन जाए या वह 'कर्म द्वारा भगवान के साथ एकीकृत' हो सके।
तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया कि मनुष्य के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करना अनिवार्य है क्योंकि ये मन को शुद्ध करने में सहायता प्रदान करते हैं। किन्तु उन्होंने यह भी कहा कि जिस मनुष्य ने पहले ही अंत:करण को शुद्ध कर लिया है उसके लिए किसी प्रकार के सामाजिक दायित्वों का पालन आवश्यक नहीं होता (भगवद्गीता-3:13)।
चौथे अध्याय में भगवान ने विभिन्न प्रकार के यज्ञों, वे कार्य जिन्हें भगवान के सुख के लिए सम्पन्न किया जाता है, की व्याख्या की थी। उन्होंने यह निष्कर्ष दिया कि ज्ञान युक्त होकर सम्पन्न किए गए यज्ञ कर्मकाण्डों से श्रेष्ठ होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सभी यज्ञों का सार भगवान से संबंध स्थापित करना है। अन्त में भगवद्गीता-4.41 में उन्होंने कर्म संन्यास के सिद्धान्त का वर्णन किया, जिसमें वैदिक कर्मकाण्डों और सामाजिक दायित्वों को त्याग कर मनुष्य शरीर, मन और आत्मा से भगवान की सेवा में तल्लीन हो जाता है।
इन सभी उपदेशों ने अर्जुन को भ्रमित कर दिया। उसने सोंचा कि कर्म का त्याग और कर्मयोग अर्थात् (श्रद्धाभक्ति पूर्ण कार्य) विरोधाभासी प्रवृत्ति के हैं और इन दोनों का एक साथ पालन करना संभव नहीं है। इसलिए वह श्रीकृष्ण के समक्ष संदेह व्यक्त करता है।
श्रीभगवानुवाच |
संन्यास: कर्मयोगश्च नि:श्रेयसकरावुभौ |
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते || 2||
भगवान ने कहा-कर्म संन्यास और कर्मयोग दोनों मार्ग परम लक्ष्य की ओर ले जाते हैं लेकिन कर्मयोग कर्म संन्यास से श्रेष्ठ है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने कर्म संन्यास और कर्मयोग की तुलना की है। यह अति गंभीर श्लोक है। इसलिए इसे ध्यानपूर्वक समझना चाहिए। कर्मयोगी वह है जो अपने आध्यात्मिक और सामाजिक दोनों कर्त्तव्यों का पालन करता है। सामाजिक दायित्वों का निर्वहन शरीर द्वारा किया जाता है जबकि मन भगवान में अनुरक्त रहता है। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने कहा है-
सोंचु मन यह कर्म मम सब लखत हरि गुरु प्यारे।
(साधन भक्ति तत्त्व)
अर्थात् प्यारे! 'तुम्हारे सभी कर्मों को भगवान और गुरु देखते हैं।' यही कर्मयोग की साधना है जिसके द्वारा हम धीरे-धीरे स्वयं को शारीरिक चेतना से ऊपर उठाकर आत्मिक चेतना में स्थित हो जाते हैं। कर्म संन्यास उन के उत्थान के लिए है जो पहले से ही दैहिक स्तर से परे हो चुके हैं। पूर्णतया भगवान में अनुरक्त होने के कारण कर्म संन्यासी अपने सामाजिक दायित्वों का परित्याग कर देते हैं और पूर्ण रूप से आध्यात्मिक कर्तव्यों का पालन करने में तल्लीन रहते हैं। जब श्रीराम वनवास जाते समय लक्ष्मण को अपने सांसारिक कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए कहते हैं तब उस समय लक्ष्मण ने कर्म संन्यास की अतिसुन्दर मनोभावना को इस प्रकार से व्यक्त किया-
मोरे सबइ एक तुम स्वामी।
दीनबन्धु उर अन्तरयामी।।
(रामचरितमानस)
लक्ष्मण ने राम से कहा, "तुम मेरे स्वामी, पिता, माता, बंधु, भाई, मित्र सब कुछ हो। मैं अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ केवल आपके प्रति ही अपने कर्तव्यों का पालन करूँगा। इसलिए कृपया मुझे मेरे दैहिक कर्त्तव्यों के पालन के संबंध में कुछ न कहो।"
वे जो कर्म संन्यास का अभ्यास करते हैं वे अपने दैहिक कर्तव्यों का निर्वहन करना आवश्यक नहीं समझते। ऐसे कर्म संन्यासी अपना पूरा समय और अपनी ऊर्जा को आध्यात्मिक कार्य-कलापों में समर्पित करते हैं जबकि कर्मयोगी को अपना समय सांसारिक और आध्यात्मिक कर्तव्यों का पालन करने में विभाजित करना पड़ता है। इसलिए कर्म संन्यासी तीव्र गति से भगवान के सम्मुख होता है जबकि कर्मयोगी सामाजिक दायित्वों से भारग्रस्त रहते हैं फिर भी इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने कर्म संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग की प्रशंसा की है और वे अर्जुन को इसी श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण करने की सलाह देते हैं। कर्म संन्यासी यदि अपने कर्मों का त्याग करने के पश्चात् यदि अपना मन भगवान में पूरी तरह से तल्लीन नहीं कर पाते, तब उनकी महती हानि तय है।
भारत में हजारों की संख्या में ऐसे साधु हैं जिन्हें विरक्ति का भ्रम हुआ और इसलिए उन्होंने संसार का त्याग कर दिया किन्तु उनका मन भगवान में अनुरक्त नहीं हो पाया। परिणामस्वरूप वे आध्यात्मिक मार्ग से प्राप्त होने वाले परम आनन्द की अनुभूति नहीं कर सके। यद्यपि वे साधकों जैसा भगवा चोला पहनते हैं किन्तु वास्तव में वे अफीम आदि का सेवन करने जैसे सभी प्रकार के पापमयी दुष्कर्मों में लिप्त हो जाते हैं। अज्ञानी केवल अपनी तंद्रा को संसार से विरक्ति के रूप में देखने की भूल करते हैं।
दसरी ओर कर्मयोगी लौकिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के कर्त्तव्यों का निर्वहन करते हैं। इसलिए यदि उनका मन आध्यात्मिकता से भी गया है तब भी उनके पास कम से कम अपना लौकिक कार्य करने का विकल्प होता है। इसलिए कर्मयोग का मार्ग जन साधारण के लिए सरल मार्ग है जबकि कर्म संन्यास का अनुसरण योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही किया जा सकता है।
ज्ञेय: स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ् क्षति |
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते || 3||
वे कर्मयोगी जो न तो कोई कामना करते हैं और न ही किसी से घृणा करते हैं उन्हें नित्य संन्यासी माना जाना चाहिए। हे महाबाहु अर्जुन! सभी प्रकार के द्वन्द्वों से मुक्त होने के कारण वे माया के बंधनों से सरलता से मुक्ति पा लेते हैं।
कर्मयोगी विरक्ति का अभ्यास करते हुए अपने सांसारिक दायित्वों का निरन्तर निर्वहन करते रहते हैं। इसलिए वे सकारात्मक और नकारात्मक दोनों परिस्थितियों को भगवान की कृपा के रूप में समभाव से स्वीकार करते हैं। भगवान ने इस सृष्टि की संरचना अति विलक्षणता से की है जिसमें हमें अपने आध्यात्मिक उत्थान के लिए सुख और दुःख दोनों का अनुभव करना आवश्यक है। यदि हम नियमित रूप से जीवन निर्वाह करते हुए अपने मार्ग में आने वाली सभी चुनौतियों को सहन कर प्रसन्नतापूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करते रहते हैं तब संसार हमें उत्तरोत्तर आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।
इस दृष्टिकोण को समझने के लिए एक रोचक कथा इस प्रकार से है-एक बार लकड़ी का एक टुकड़ा बढ़ई के पास जाकर कहने लगा-"क्या आप मुझे सुंदर बना सकते हो?" बढ़ई ने कहा-मैं ऐसा करने के लिए तैयार हूँ, क्या तुम भी इसके लिए तैयार हो?" लकड़ी के टुकड़े ने उत्तर दिया "हाँ, मैं भी तैयार हूँ।" बढई अपने औजार निकालकर लकड़ी को थोड़ा छीलने लगा। लकड़ी ने भयभीत होकर कहा-आप क्या कर रहे हो? “कृपया रुको! यह बहुत पीड़ादायक है।" बढ़ई ने कहा-अगर तुम सुन्दर बनना चाहते हो, तब तुम्हें पीड़ा सहन करनी पड़ेगी। लकड़ी के टुकड़े ने कहा "ठीक है। अपना काम करते रहो, किन्तु सहजता से और ध्यानपूर्वक।" कुछ देर बाद लकड़ी ने कहा “आज के लिए बस इतना ही पर्याप्त है, मैं आज और पीड़ा सहन नहीं कर सकती कृपया शेष कार्य कल करना।" बढ़ई अपने काम के प्रति अडिग था और कुछ ही दिनों में लकड़ी एक सुन्दर मूर्ति बन गई और उसे मन्दिर की वेदी में स्थापित कर दिया गया। उसी तरह हमारा हृदय अनन्त जन्मों से सांसारिक पदार्थों में आसक्त रहने के कारण अशुद्ध होता है। यदि हम आंतरिक रूप से पवित्र होना चाहते हैं तब हमें अवश्य ही पीड़ा सहन करनी पड़ेगी और माया के संसार को हमें शुद्ध करने की छूट देनी होगी। इसलिए कर्मयोगी श्रद्धा भक्ति के साथ कर्म करते हैं तथा सुखद और दुःखद परिणामों से विचलित न होकर समता की भावना में लीन रहते हैं और मन को भगवान में अनुरक्त करने का अभ्यास करते रहते हैं।
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता: |
एकमप्यास्थित: सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् || 4||
केवल अज्ञानी ही 'सांख्य' या 'कर्म संन्यास' को कर्मयोग से भिन्न कहते हैं जो वास्तव में ज्ञानी हैं, वे यह कहते हैं कि इन दोनों में से किसी भी मार्ग का अनुसरण करने से वे दोनों का फल प्राप्त कर सकते हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण ने सांख्य शब्द का प्रयोग कर्म संन्यास या ज्ञान पूर्वक कर्म का परित्याग करने के रूप में किया है। वैराग्य के दो प्रकार है-(1) फल्गु वैराग्य। (2) युक्त वैराग्य। फल्गु वैराग्य वह है जिसमें लोग संसार को बोझ के रूप में देखते हैं और अपने उत्तरदायित्वों से छुटकारा पाने की इच्छा से इसका त्याग करते हैं। ऐसा वैराग्य पलायनवादी मनोवृत्ति का परियाचक है और यह स्थायी नहीं होता। ऐसे मनुष्यों का वैराग्य चुनौतियों से भागने की इच्छा से प्रेरित होता है। ऐसे मनुष्यों को जब आध्यात्मिक मार्ग में आने वाली विपत्तियों का सामना करना पड़ता है तब वे अध्यात्मिक मार्ग को त्यागकर लौकिक जीवन में लौटने की इच्छा करते हैं। युक्त वैराग्य में लोग समस्त जगत को भगवान की शक्ति के रूप में देखते हैं। जो कुछ भी उनके स्वामित्व में होता है उसे वे अपना नहीं समझते और अपने लिए उसका उपयोग भी नहीं करना चाहते। इसके स्थान पर भगवान ने उन्हें जो कुछ दिया है उसी के द्वारा वे भगवान की सेवा करना चाहते हैं। युक्त वैराग्य स्थायी होता है और इसका अनुसरण करने वाले कभी विपत्तियों से भयभीत नहीं होते।
कर्मयोगी बाह्य रूप से अपने दैनिक कार्यों को करते हुए युक्त वैराग्य को विकसित करते हैं। वे भगवान को भोक्ता और स्वयं को भगवान का सेवक मानते हैं तथा इसलिए वे समस्त कार्य कलापों को भगवान के सुख के लिए करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार से उनकी आंतरिक अवस्था उन कर्म संन्यासियों के समान हो जाती है जो पूर्ण रूप से दिव्य चेतना में लीन रहते हैं। बाह्य दृष्टि से वे सांसारिक व्यक्ति प्रतीत होते हैं किन्तु आन्तरिक रूप से वे किसी संन्यासी से कम नहीं होते।
पुराणों और इतिहास में कई महान राजाओं के उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने यद्यपि बाह्य दृष्टि से अपनी पूरी कुशलता से शासकीय कर्तव्यों का निर्वहन किया और राजसी ठाट बाट में जीवन व्यतीत किया किन्तु मानसिक दृष्टि से वे लोग पूर्णतया भगवत्च्चेतना में तल्लीन रहे। प्रह्लाद, धुव्र, अम्बरीष, पृथु, विभीषण और युधिष्ठिर आदि सब राजा ऐसे कर्मयोगियों के उदाहरण हैं। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है:
गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति।
विष्णोर्मायामिदं पश्यन् स वै भागवतोत्तमः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.2.48)
"वह जो इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण तो करता है किन्तु न तो उनके लिए ललचाता है और न ही उनसे दूर भागता है, वह इस दिव्य चेतना में स्थित होता है कि संसार में सब कुछ भगवान की शक्ति है और इनका उपयोग उन्हीं की सेवा के लिए करना चाहिए, ऐसा व्यक्ति परम भक्त होता है।" इस प्रकार सच्चे ज्ञानियों की दृष्टि में कर्मयोग और कर्म संन्यास में कोई भेद नहीं होता क्योंकि दोनों में से किसी एक का अनुसरण करने से दोनों का फल प्राप्त होता है।
यत्साङ्ख्यै: प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते |
एकं साङ्ख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति || 5||
परमेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म संन्यास के माध्यम से जो प्राप्त होता है उसे भक्ति युक्त कर्मयोग से भी प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार जो कर्म संन्यास और कर्मयोग को एक समान देखते हैं वही वास्तव में सभी वस्तुओं को यथावत् रूप में देखते हैं।
आध्यात्मिकता के अभ्यास में मनोवृत्ति ही प्रमुख होती है। यदि कोई वृंदावन जैसे तीर्थ स्थान पर रह रहा है किन्तु उसका मन कोलकाता में रसगुल्ला खाने का चिन्तन करता है तब भगवत्क्षेत्र में यही माना जाएगा कि वह कोलकाता में ही है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति कोलकाता की भीड़-भाड़ में रहता है किन्तु अपने मन को वृंदावन की दिव्य भूमि में तल्लीन रखता है तब वह वहाँ होने का लाभ पा सकता है। सभी वैदिक ग्रंथों में उल्लेख है कि हमारे मनोभावों के अनुसार ही हमारी चेतना का स्तर निर्धारित होता है।
मन एव मनुष्याणां कारणंबन्ध मोक्षयोः।
(पंचदशी)
"मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है।" जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज ने इसी सिद्धान्त को इस प्रकार से व्यक्त किया है-
बंधन और मोक्ष का, कारण मनहिं बखान।
याते कौनिउ भक्ति करु, करु मन ते हरिध्यान ।।
(भक्ति शतक-19)
"बंधन और मोक्ष मन की दशा पर निर्भर करते हैं। तुम चाहे जिस भी भक्ति के साधन का चयन करो परन्तु मन को भगवान के स्मरण में लीन रखो।" वे लोग जो ऐसा आध्यात्मिक दृष्टिकोण नहीं रखते, वे कर्म संन्यास और कर्मयोग में अन्तर देखते हैं और कर्म संन्यासी को उसके बाह्य परित्याग के कारण श्रेष्ठ घोषित करते हैं। किन्तु ज्ञानीजन यह देखते हैं कि कर्म संन्यासी और कर्मयोगी दोनों ही अपने मन को भगवान की भक्ति में तल्लीन कर लेते हैं इसलिए वे दोनों उनकी दृष्टि में एक समान होते हैं।
संन्यासस्तु महाबाहो दु:खमाप्तुमयोगत: |
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति || 6||
भक्तियुक्त होकर कर्म किए बिना पूर्णतः कर्मों का परित्याग करना कठिन है। हे महाबलशाली अर्जुन! किन्तु जो संत कर्मयोग में संलग्न रहते हैं, वे शीघ्र ही ब्रह्म को पा लेते हैं।
हिमालय की गुफाओं में रहने वाला योगी यह समझता है कि उसने वैराग्य प्राप्त कर लिया है किन्तु उसके वैराग्य का वास्तविक परीक्षण उसके नगर में लौटने पर होता है। उदाहरणार्थ एक साधु जिसने 12 वर्षों तक गढ़वाल के पहाड़ों में तपस्या की थी, वह हरिद्वार में पवित्र कुम्भ मेला देखने आया। कुम्भ मेले की भीड़-भाड़ में किसी व्यक्ति ने भूल से अचानक अपने जूते साधु के नंगे पैरों पर रख दिए। साधु ने क्रोधित होकर चिल्ला कर कहा-"क्या तुम अंधे हो" क्या तुम्हें दिखाई नहीं देता है कि तुम क्या कर रहे हो?" बाद में वह क्रोध को अपने ऊपर हावी होते देखकर पश्चात्ताप करते हुए लज्जित होकर सोचता है-"एक दिन नगर में रहने से उसकी 12 वर्षों तक पर्वतों पर की गई तपस्या व्यर्थ हो गयी।" संसार वह क्षेत्र है जहाँ वैराग्य का परीक्षण होता है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस संसार में रहते हुए मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए धीरे-धीरे क्रोध, लोभ और कामनाओं पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। यदि इसके स्थान पर कोई पहले ही अपने कर्मों का त्याग कर देता है तो मन को शुद्ध करना अत्यंत कठिन हो जाता है और शुद्ध मन के बिना वास्तविक विरक्ति होना स्वप्न के समान है। अर्जुन एक योद्धा था और यदि वह भ्राणवश अपने कर्तव्यों का निर्वहन न कर संन्यास के लिए वन में चला जाता तब भी उसे अपनी प्रवृत्ति के अनुसार वहाँ कार्य करने के लिए विवश होना पड़ता। वह वहाँ आदिवासी लोगों को एकत्रित कर स्वयं को उनका राजा घोषित कर सकता था। लेकिन इसके विपरीत अब भगवान की सेवार्थ अपनी स्वाभाविक प्रतिभा का उपयोग करना अर्जुन के लिए अधिक लाभदायक होगा। इसलिए भगवान ने उसे उपदेश दिया-"युद्ध लड़ना जारी रखो, लेकिन अपने मनोभाव को बदलो। पहले तुम अपने राज्य को बचाने की प्रत्याशा से इस युद्ध भूमि पर आए थे। अब इसके स्थान पर निःस्वार्थ भाव से केवल अपनी सेवाएँ भगवान को समर्पित करो। इस प्रकार से तुम सहजता से अपने मन को शुद्ध कर पाओगे और मन में सच्चे वैराग्य की अनुभूति करोगे।" कच्चे फल जिन्हें वृक्ष धारण और पोषित करता है, वे उसके साथ दृढ़तापूर्वक चिपटे रहते हैं किन्तु वही फल जब पक जाते हैं तब वे वृक्ष के साथ सम्बन्ध तोड़ देते हैं। समान रूप से भौतिक जगत में कर्मयोगी जो अनुभव प्राप्त करता है उससे उसका ज्ञान परिपक्व होता है। जिस प्रकार गहन निद्रा तभी संभव है जब कोई कठोर परिश्रम करता है उसी प्रकार से गहन साधना भी उन्हें प्राप्त होती है जो कर्मयोग द्वारा अपने मन को शुद्ध कर लेते हैं।
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रिय: |
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते || 7||
जो कर्मयोगी विशुद्ध बुद्धि युक्त हैं, अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में रखते हैं और सभी जीवों में आत्मरूप परमात्मा को देखते हैं, वे सभी प्रकार के कर्म करते हुए कभी कर्मबंधन में नहीं पड़ते।
वैदिक ग्रंथों में आत्मा शब्द का कई अर्थों में प्रयोग किया गया है, जैसे कि भगवान के लिए, आत्मा के लिए, मन के लिए और बुद्धि के लिए। इस श्लोक में इन सभी प्रतीकों के लिए आत्मा शब्द का प्रयोग हुआ है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म योगी योग युक्त होता है अर्थात् अपनी चेतना को भगवान के साथ युक्त करता है। आगे वे कहते हैं कि ऐसी पुण्य आत्माएँ तीन प्रकार की होती है-(1) विशुद्धात्माः विशुद्ध बुद्धि युक्त (2) विजितात्माः जिसने मन पर विजय प्राप्त कर ली है और (3) जितेन्द्रियः जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया है। ऐसे कर्मयोगी विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर सभी जीवों में भगवान को बैठा देखते हैं और बिना आसक्ति के सबके साथ सम्मानजनक व्यवहार करते हैं। चूंकि उनके कार्य स्वयं को सुखी रखने की कामना से प्रेरित नहीं होते अतः उनका ज्ञान उत्तरोत्तर स्पष्ट होता रहता है और उनकी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जो पहले तो भौतिक सुख के लिए लालायित होती थी, वे सब अब नियंत्रण में आ जाती हैं। अब ये सब साधन भगवान की सेवा में तत्पर रहते हैं। सेवा और समर्पण भाव से उन्हें अपने भीतर आंतरिक ज्ञान की अनुभूति होती है। इस प्रकार कर्मयोग स्वभाविक रूप से उत्तरोत्तर ज्ञानोदय की इन अवस्थाओं में पहुँचा देता है और इसलिए यह कर्म संन्यास से भिन्न नहीं होता।
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् |
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् || 8||
प्रलपन्विसृजन्गृह्ण्न्नुन्मिषन्निमिषन्नपि |
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् || 9||
कर्मयोग में दृढ़ निश्चय रखने वाले सदैव देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूंघते, चलते-फिरते, सोते हुए, श्वास लेते हुए, बोलते हुए, त्यागते हुए, ग्रहण करते हुए और आंखें खोलते या बंद करते हुए सदैव यह सोचते हैं- 'मैं कर्ता नहीं हूँ' और दिव्य ज्ञान के आलोक में वे केवल यह देखते हैं कि भौतिक इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में क्रियाशील रहती हैं आत्मा नहीं।
जब हम किसी महत्त्वपूर्ण कार्य को कुशलतापूर्वक सम्पन्न कर लेते हैं तब हमें यह अभिमान हो जाता है कि हमने कोई महान कार्य किया है। स्वयं को किसी कार्य का कर्ता मानने का अभिमान हमें लौकिक चेतना से ऊपर उठने में बाधा उत्पन्न करता है किन्तु भगवच्चेतना में लीन योगी इस बाधा को सरलता से पार कर लेते हैं। बुद्धि के शुद्धिकरण द्वारा वे स्वयं को शरीर से भिन्न देखते हैं और वे शरीर द्वारा किए गए कर्मों का श्रेय स्वयं को नहीं देते। यह शरीर भगवान की माया शक्ति से निर्मित है इसलिए वे अपने सभी कार्यों का श्रेय भगवान को देते हैं क्योंकि ये भगवान की शक्ति से सम्पन्न होते हैं। वे स्वयं को भगवान की इच्छा पर समर्पित कर देते हैं। वे अपने मन और बुद्धि को भगवान की दिव्य इच्छा के अनुसार नियोजित करते हैं। अतः वे यही मानते हैं कि भगवान ही सब कार्यों के कर्ता हैं।
कर्ता बहिरकर्तान्तरलोके विहर राघव।
(योग वाशिष्ठ)
"हे राम, बाह्य दृष्टि से परिश्रम करते रहो लेकिन आंतरिक दृष्टि से स्वयं को अकर्ता के रूप में देखो और भगवान को अपने सभी कार्यों का कर्त्ता मानो।" इस दिव्य चेतना में लीन योगी स्वयं को केवल भगवान के हाथों का खिलौना मानते हैं। श्रीकृष्ण अगले श्लोक में इस दिव्य चेतना में किए जाने वाले कार्यों के परिणाम की व्याख्या करते हैं।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति य: |
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा || 10||
वे जो अपने कर्मफल भगवान को समर्पित कर सभी प्रकार से आसक्ति रहित होकर कर्म करते हैं, वे पापकर्म से उसी प्रकार से अछूते रहते हैं जिस प्रकार से कमल के पत्ते को जल स्पर्श नहीं कर पाता।
हिन्दू और बौद्ध दोनों धर्मों के धार्मिक ग्रंथ कमल के पुष्प की उपमाओं से भरे पड़े हैं। भगवान के दिव्य स्वरूप के विभिन्न अंगों का निरूपण करते समय कमल के पुष्प का नाम आदरपूर्वक लिया जाता है। इसलिए चरण कमल का अर्थ 'कमल के समान चरण', 'कमलेक्षण' का अर्थ कमल के समान नेत्र, 'कर कमल' का अर्थ 'कमल के समान हाथ' इत्यादि। कमल के पुष्प का एक अन्य नाम 'पंकज' है जिसका अर्थ 'कीचड़ में जन्म लेना' है।कमल का फूल सरोवर के तल पर जमे कीचड़ में जन्म लेता है, फिर भी यह अपनी सुन्दरता को बनाए रखते हुए जल से ऊपर आकर सूर्य की ओर खिलता है। इसलिए संस्कृत साहित्य में गंदगी में उत्पन्न होने वाली उस वस्तु के लिए कमल के फूल का उदाहरण दिया जाता है जो विकसित होकर अपने सौन्दर्य और पवित्रता को बनाए रखता है।
इसके अतिरिक्त कमल के बड़े पत्ते जो सरोवरकी सतह पर तैरते रहते हैं, उनका भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में थाली के रूप में प्रयोग किया जाता है क्योंकि इन पर डाला गया तरल पदार्थ सोखता नहीं, बल्कि बह जाता है। कमल के पत्ते की विशेषता यह है कि यद्यपि कमल का पुष्प अपने जन्म, विकास और जीवन निर्वाह के लिए जल निर्भर होता है किन्तु वह स्वयं को जल से भीगने नहीं देता। कमल के पत्रों पर डाला गया जल उसकी सतह पर उगने वाले छोटे रोयों के कारण एक किनारे की ओर से बह जाता है।
इस प्रकार कमल पर्ण की सुन्दर उपमा देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसे यह जल की सतह पर तैरता रहता है किंतु स्वयं को जल से भीगने नहीं देता उसी प्रकार से कर्मयोगी सभी प्रकार के कर्म करते हुए भी पाप से अछूते रहते हैं क्योंकि वे दिव्य चेतना में लीन होकर अपने कर्म करते हैं।
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि |
योगिन: कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये || 11||
योगीजन आसक्ति को त्याग कर अपने शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि द्वारा केवल अपने शुद्धिकरण के उद्देश्य से कर्म करते हैं।
योग जन यह समझते हैं कि सुख की खोज में लौकिक कामनाओं के पीछे भागना मृग-तृष्णा के समान है। इसी सत्य को जानकर वे अपनी निजी कामनाओं का त्याग करते हैं और अपने सभी कर्म भगवान के सुख के लिए करते हैं “भोक्तारं यज्ञ तपसाम्" अर्थात् जो अकेला सभी कर्मों का परम भोक्ता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण ‘समर्पण' को नवीन शैली में व्यक्त कर रहे हैं। वे कहते हैं कि सिद्ध योगी अन्तःकरण की शुद्धि हेतु कर्म करते हैं। तब फिर कर्म भगवान को कैसे समर्पित हो जाते हैं? वास्तव में भगवान हमसे कुछ अपेक्षा नहीं करते। वे परम सत्य हैं और अपने आप में पूर्ण हैं। हम अणु आत्माएँ सर्व शक्तिमान भगवान को ऐसा क्या दे सकती हैं जो भगवान के पास न हो? इसलिए भगवान को कुछ अर्पित करने के लिए यह कहने की परम्परा है-“हे भगवान! मैं तुम्हारी वस्तु तुम्हें लौटा रहा हूँ।" इसी समान मत को व्यक्त करते हुए संत यमुनाचार्य कहते हैं-
मम नाथ यद् अस्ति योऽस्म्यहं सकलं तद्धी तवैव माधव ।
नियतस्वम् इति प्रबुद्धधैरथावा किं नु समर्पयामि ते।।
(श्रीस्त्रोत रत्न-50)
"हे लक्ष्मी के स्वामी विष्णु भगवान, जब मैं अज्ञानी था तब मैं समझता था कि मैं आपको बहुत सा पदार्थ दे सकता हूँ किन्तु अब जब मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया तब मैं यह मानता हूँ कि मेरे स्वामित्व में जो भी है वह सब पहले से ही आप का है। इसलिए मैं आपको क्या अर्पित कर सकता हूँ।" फिर भी एक कर्म जो भगवान के हाथ में न होकर हमारे हाथ में होता है वह हमारे स्वयं के अन्त:करण (मन और बुद्धि) को शुद्ध करना है। जब हम अपने अन्तःकरण को शुद्ध कर लेते है और उसे भगवान की भक्ति में तल्लीन कर लेते हैं तब भगवान अत्यधिक प्रसन्न होते हैं। इसे जानकर योगी जन अपने निहित स्वार्थों को त्यागकर भगवान के सुख के लिए अपने अन्तःकरण की शुद्धि करते हैं। इस प्रकार से योगी जन यह जानते हैं कि वे भगवान को जो सबसे सर्वोत्तम वस्तु अर्पित कर सकते हैं वह है अन्त:करण की शुद्धि और वे उसके लिए कर्म करते हैं। रामायण में इस सिद्धान्त का रोचक वर्णन मिलता है। भगवान राम ने जब सुग्रीव को युद्ध से पूर्व भयभीत होते हुए देखा तो उन्होंने उसे इस प्रकार से सांत्वना दी-
पिशाचान् दानवान् यक्षान् पृथिव्यां चैव राक्षसान् ।
अङ्गुगेण तान्हन्यामिच्छन् हरी गणेश्वरः।।
(वाल्मीकि रामायण)
भगवान राम ने कहा, “यदि मैं, केवल अपने बांये हाथ की अंगुली को थोड़ा सा ही टेढ़ा कर लूँ तो रावण और कुंभकर्ण की बात ही क्या संसार के समस्त राक्षस धराशायी हो जाएंगे।" सुग्रीव उत्तर देते हुए कहता है, “यदि ऐसा है, फिर रावण का वध करने के लिए आपको इतनी बड़ी सेना एकत्रित करने की आवश्यकता क्या थी।" भगवान ने उत्तर देते हुए कहा, "यह सब तुम्हारी शुद्धि के लिए, तुम्हें सेवा करने का अवसर प्रदान करने हेतु है। इसलिए यह मत समझो कि मुझे इन राक्षसों का दमन करने के लिए तुम्हारी सहायता की आवश्यकता है।" हमारे द्वारा की गई अर्जित मन की शुद्धि ही हमारी स्थायी सम्पत्ति है और यही हमारे साथ अगले जन्म में जाती है शेष सब कुछ इसी संसार में छूट जाता है। इसलिए निष्कर्ष यह है कि हमारे जीवन की सफलता और असफलता हमारे द्वारा अन्त:करण की शुद्धि के लिए किए गए प्रयासों द्वारा निर्धारित होती है। इसी कारण सिद्ध योगी प्रतिकूल परिस्थितियों का स्वागत करते हैं क्योंकि वे इन्हें अन्त:करण की शुद्धि के अवसर के रूप में देखते हैं। संत कबीर ने कहा है:
निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छबाय।
नित साबुन पानी बिना निर्मल करे सुभाय ।।
"यदि तुम अपने मन को शीघ्र निर्मल करना चाहते हो तो किसी निन्दक की संगति में रहो जब तुम उसके निंदनीय शब्दों को सहन करोगे तब तुम्हारा मन बिना जल और साबुन के निर्मल हो जाएगा।" इस प्रकार जब कर्म करने का मुख्य उद्देश्य हृदय को शुद्ध करना होता है तब मनुष्य प्रतिकूल परिस्थितियों को भगवान द्वारा प्रदत्त और आत्म उत्थान का अवसर समझकर इनका स्वागत करता है तथा सफलता और असफलता दोनों परिस्थितियों में समभाव रहता है। यदि हम भगवान के सुख के लिए कार्य करते हैं तब हमारा हृदय शुद्ध हो जाता है और जब हृदय शुद्ध हो जाता है तब स्वाभाविक रूप से हम अपने समस्त कर्मफलों को भगवान को समर्पित करने लगते हैं।
युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् |
अयुक्त: कामकारेण फले सक्तो निबध्यते || 12||
कर्मयोगी अपने समस्त कमर्फलों को भगवान को अर्पित कर परम शांति प्राप्त कर लेते हैं, जबकि वे जो कामनायुक्त होकर निजी स्वार्थों से प्रेरित होकर कर्म करते हैं, वे बंधनों में पड़ जाते हैं क्योंकि वे कमर्फलों में आसक्त होकर कर्म करते हैं।
यह कैसे मान लिया जाए कि एक जैसा कर्म करने से कुछ लोग तो माया के बंधन में पड़ जाते हैं और कुछ माया के बंधनों से मुक्त रहते हैं? श्रीकृष्ण इसका उत्तर इस श्लोक में देते हैं। वे मनुष्य जो भौतिक पदार्थो के प्रति अनासक्त हैं वे कभी कर्म बंधनों में नहीं बंधते किन्तु जो निजी लाभ और कामना युक्त होकर भौतिक सुखों का भोग करना चाहते हैं वे कर्मफलों के बंधनों में पड़ जाते हैं। युक्त शब्द का अर्थ 'भगवच्चेतना से जुड़ना' है। इसका अर्थ 'हृदय के शुद्धिकरण के अतिरिक्त किसी फल की इच्छा न करना' भी होता है। युक्त पुरुष वे हैं जो अपने कर्मफलों का त्याग करते हैं और इसके स्थान पर आत्मशुद्धि के उद्देश्य से कार्य करते हैं। इसलिए वे शीघ्र ही दिव्य चेतना को प्राप्त कर लेते हैं।
दूसरी ओर अयुक्तः का अर्थ 'भगवच्चेतना से युक्त न होना' है। इसे इस प्रकार से भी अभिव्यक्त कर सकते हैं कि-'लौकिक या सांसारिक सुखों की कामना आत्मा के लिए हानिकारक है।' ऐसे लोग अपने कर्मों का फल की तिब्र आकांक्षा करते हैं। इस भाव से सम्पन्न किए गए कर्म इन 'अयुक्त' पुरुषों को 'संसार' या जन्म-मरण के चक्र में डाल देते हैं।
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी |
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् || 13||
जो देहधारी जीव आत्मनियंत्रित एवं निरासक्त होते हैं, नौ द्वार वाले भौतिक शरीर में भी वे सुखपूर्वक रहते हैं क्योंकि वे स्वयं को कर्त्ता या किसी कार्य का कारण मानने के विचार से मुक्त होते हैं।
श्रीकृष्ण अब शरीर की तुलना नौ द्वारों वाले नगर से कर रहे हैं। आत्मा नगर के राजा के समान है जिसका शासन अहंकार, बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और प्राणशक्ति द्वारा निमित्त मंत्रालय द्वारा किया जाता है। इनका शरीर पर शासन तब तक चलता है जब तक कि मृत्यु द्वारा इनका नश्वर शरीर छिन नहीं जाता। किन्तु इनका शरीर पर शासन रहते हुए भी सिद्ध योगी स्वयं को न तो शरीर और न ही शरीर के स्वामी के रूप में देखते हैं अपितु वे शरीर और इसमें होने वाली सभी क्रियाओं को भगवान से संबंधित मानते हैं। मन से सभी कर्मों का परित्याग कर वे अपने शरीर में सुखपूर्वक रहते हैं। इसे (साक्षी भाव) या ‘अपने चारों ओर घटित हो रही सभी क्रियाओं का अनासक्त दृष्टा' होने की मनोवृत्ति भी कहा जा सकता है। इस श्लोक की उपमा श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी दी गयी है-
नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः।
वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-3:18)
"यह शरीर नव द्वारों-दो कान, एक मुख, दो नासिका छिद्र, दो नेत्र, गुदा और लिंग से निर्मित है। भौतिक चेतना से युक्त होकर शरीर में रहने वाली आत्मा स्वयं की पहचान नव द्वारों के नगर के साथ करती है। इस शरीर में परमात्मा भी निवास करते हैं जो संसार के सभी प्राणियों के नियन्ता हैं। जब आत्मा-परमात्मा के साथ अपना संबंध जोड़ती है तब वह शरीर में रहते हुए भी उससे अछूती रहती है।"
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह बोध कराया कि देहधारी जीवात्मा न तो कर्त्ता है और न ही किसी कार्य का कारण। अब यह प्रश्न सामने आता है कि क्या भगवान ही संसार में सभी कर्मों के वास्तविक कारण हैं? इसका उत्तर अगले प्रश्न में दिया गया है।
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु: |
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते || 14||
न तो कर्त्तापन का बोध और न ही कर्मों का सृजन भगवान द्वारा होता है तथा न ही वे कर्मों के फल का सृजन करते हैं। यह सब प्रकृति के गुणों से सृजित होते हैं।
इस श्लोक में 'प्रभु' शब्द का प्रयोग भगवान के लिए किया गया है, जो यह इंगित करता है कि वे सारे संसार के स्वामी हैं। वे सर्वशक्तिमान हैं और समस्त ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करते हैं। यद्यपि वे ब्रह्माण्ड की गतिविधियों का संचालन करते हैं तथापि वे अकर्ता रहते हैं। वे हमारे कर्मों के न तो संचालक हैं और न ही अच्छे-बुरे में प्रेरक अर्थात् हम अच्छे या बुरे जो भी कार्य करेंगे उसका निर्णय भगवान द्वारा नहीं होता। यदि भगवान हमारे कर्मों के संचालक होते तब उन्हें शुभ और अशुभ कर्मों के निर्देश के लिए शास्त्र रचना करने की आवश्यकता न पड़ती। तब तो सभी शास्त्रों का अंत इन तीन छोटे वाक्यों में हो गया होता हे आत्मा! "मैं तुम्हारे सभी कार्यों का संचालक हूँ, इसलिए तुम्हें यह समझने की आवश्यकता नहीं है कि शुभ और अशुभ कर्म क्या है। मैं तुमसे अपनी इच्छानुसार कर्म कराऊँगा।"
उसी प्रकार भगवान हमारे कर्त्तापन होने के बोध के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। यदि भगवान हमारे द्वारा किए गए कार्यों का कर्तव्य करने लगते तब फिर हम उन्हें अपने द्वारा किए गए पाप कर्मों का दोषी ठहराने लगते। वास्तव में आत्मा स्वयं ही अज्ञान के कारण ऐसा अभिमान कर लेती है। यदि आत्मा इस अज्ञान को भी दूर करने का निश्चय कर ले तब भगवान अपनी कृपा से इस अज्ञान को दूर करने में उसकी सहायता करते हैं। अतः कर्त्तापन के बोध को त्यागने का उत्तरदायित्व जीवात्मा का होता है। शरीर प्रकृति के तीन गुणों से निर्मित है और सभी कर्म इन्हीं गुणों के अंतर्गत आते हैं। किन्तु अज्ञानता के कारण आत्मा स्वयं को शरीर मानकर कर्मों के कर्त्तापन के भ्रम में उलझ जाती है जो कि वास्तव में प्रकृति के तीन गुणों द्वारा सम्पन्न होते हैं।
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभु: |
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तव: || 15||
सर्वव्यापी परमात्मा किसी के पापमय कर्मों या पुण्य कर्मों में स्वयं को लिप्त नहीं करते। किन्तु जीवात्माएँ मोहग्रस्त रहती हैं क्योंकि उनका आत्मिक ज्ञान अज्ञान से आच्छादित रहता है।
भगवान किसी के पुण्य या पापकर्मों के लिए उत्तरदायी नहीं होते। इस संबंध में भगवान का कार्य केवल तीन प्रकार का है-(1) वे जीवात्मा को कर्म करने की शक्ति प्रदान करते हैं, (2) जैसे ही हम उनसे शक्ति प्राप्त कर कर्म करने लगते हैं तब वे हमारे कर्मों का लेखा जोखा रखते हैं, (3) वे हमें हमारे कर्मों का फल देते हैं। जीवात्मा स्वेच्छानुसार अच्छे या बुरे कर्म करने के लिए स्वतंत्र होती है। भगवान क्रिकेट मैच के निर्णायक (अम्पायर) की भांति कार्य करते हैं। वे केवल परिणाम घोषित करते हैं-'चार रन' 'छः रन' या खिलाड़ी (आउट) खेल से बाहर। निर्णायक के निर्णय के विरुद्ध कुछ नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके निर्णय खिलाड़ी के खेल कौशल के अनुसार लिए जाते हैं। अब कोई यह कह सकता है कि भगवान जीवात्मा को इच्छानुसार कर्म करने की स्वतंत्रता क्यों देते हैं। इसका कारण यह है कि आत्मा परमात्मा का अणु अंश है और वह कुछ मात्रा में भगवान के गुणों से सम्पन्न होती है और भगवान 'अभिज्ञ-स्वराट्' परम स्वतंत्र हैं। इसलिए जीवात्मा अपनी इच्छानुरूप इन्द्रिय, मन और बुद्धि का प्रयोग करने में अल्प रूप से स्वतंत्र होती है। इसके अतिरिक्त स्वतंत्र इच्छा के बिना प्रेम नहीं हो सकता। मशीन प्रेम नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास चयन करने की स्वतंत्रता नहीं होती। केवल प्राणियों में ही प्रेम करने के विकल्प को चुनने की योग्यता होती है क्योंकि भगवान ने हमारी रचना उनसे प्रेम करने के लिए की है इसलिए उन्होंने हमें स्वतंत्र इच्छा प्रदान की है। अतः हमें अपनी इच्छानुसार किए गए कार्यो के शुभ और अशुभ परिणामों के लिए भगवान को दोषी नहीं ठहराना चाहिए।
कुछ जीवात्माएँ जो यह नहीं जानती हैं कि वे अपने कर्मों का चयन करने के लिए स्वयं स्वतंत्र हैं वे अपनी सभी भूलों के लिए भगवान को उत्तरदायी ठहराती हैं। अन्य जीवात्माएँ यह अनुभव करती हैं कि वे कर्म करने की स्वतंत्र इच्छा से युक्त हैं लेकिन फिर भी वे शरीर होने की धारणा के कारण कर्त्तापन के अभिमान को प्रश्रय देती हैं। यह पुनः अज्ञानता का सूचक है।
श्रीकृष्ण अगले श्लोक में यह व्याख्या करेंगे कि इस अज्ञानता को कैसे मिटाया जा सकता है।
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मन: |
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् || 16||
किन्तु जिनकी आत्मा का अज्ञान दिव्यज्ञान से विनष्ट हो जाता है उस ज्ञान से परमतत्त्व का प्रकाश उसी प्रकार से प्रकाशित हो जाता है जैसे दिन में सूर्य के प्रकाश से सभी वस्तुएँ प्रकाशित हो जाती हैं।
रात्रि के अंधकार को मिटाने की सूर्य की शक्ति अतुल्य है। रामचरितमानस में वर्णन है-
राकापति षोडस उनहिं तारागन समुदाइ।
सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ।।
"पूर्ण चंद्रमा और सभी तारों के प्रकाश से भी रात्रि का अंत नहीं होता किन्तु जिस क्षण सूर्य उदित होता है तब, रात्रि शीघ्र ही प्रस्थान की तैयारी करती है।" सूर्य के प्रकाश के सामने अंधकार ठहर नहीं सकता। इसी प्रकार भगवद्ज्ञान के प्रकाश के प्रभाव से अज्ञान रूपी अंधकार दूर हो जाता है। अंधकार ही भ्रम की उत्पत्ति का कारण होता है।
सिनेमा हॉल के अंधकार में स्क्रीन पर पड़ने वाला प्रकाश भ्रम को वास्तविकता में परिवर्तित कर देता है और लोग उसे देखने में लीन हो जाते हैं। फिर जब सिनेमा हॉल की लाइट जलती है तब लोगों का भ्रम दूर हो जाता है। जब यह भ्रम टूट जाता है, तब उन्हें आभास होता है कि वे तो चलचित्र (मूवी) देख रहे थे। ठीक इसी प्रकार अज्ञान के अंधकार के कारण हम स्वयं को शरीर मान लेते हैं और स्वयं को सभी कार्यों का कर्ता और भोक्ता मान लेते हैं। जब भगवद्ज्ञान का प्रकाश चमकने लगता है तब भ्रम उल्टे पांव भाग जाता है और आत्मा जागृत होकर शरीर रूपी नगर के नवद्वारों में रहते हुए भी अपनी वास्तविकता को पहचान लेती है। आत्मा इससे पहले अंधकार में पड़ी थी क्योंकि भगवान की माया शक्ति, अविद्या ने उसे अंधकार से आच्छादित कर रखा था। जब भगवान की दिव्य अध्यात्मिक शक्ति, ज्ञान के आलोक से उसे प्रकाशित कर देती है तब उसका भ्रम दूर हो जाता है।
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा: |
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा: || 17||
वे जिनकी बुद्धि भगवान में स्थिर हो जाती है और जो भगवान में सच्ची श्रद्धा रखकर उन्हें परम लक्ष्य मानकर उनमें पूर्णतया तल्लीन हो जाते हैं, वे मनुष्य शीघ्र ऐसी अवस्था में पहुँच जाते हैं जहाँ से फिर कभी वापस नहीं आना होता और उनके सभी पाप ज्ञान के प्रकाश से मिट जाते हैं।
अज्ञानता के कारण जीव 'संसार' या 'जीवन और मरण के सतत चक्र' के कष्ट में पड़ता है किंतु ज्ञान में माया के बंधन से मुक्त करने की शक्ति होती है। ऐसा ज्ञान भगवद्भक्ति से युक्त होता है। इस श्लोक में पूर्ण भगवद्च्चेतना का अर्थ प्रकट करने के लिए निम्नांकित सुस्पष्ट शब्दों का प्रयोग किया गया है।
तबुद्धयः का अर्थ बुद्धि को भगवान की ओर ले जाना है।
तदात्मानः का अर्थ अन्तःकरण (मन और बुद्धि) की पूर्णतया भगवान में तल्लीन करना है।
तन्निष्ठाः से तात्पर्य बुद्धि का भगवान में दृढ़ निश्चय होना है तत्परायणाः का अर्थ भगवान को परम लक्ष्य और आश्रय बनाने का प्रयास करना है।
इस प्रकार से वास्तविक ज्ञान वह है जो भगवान के प्रेम की ओर ले जाए। ऐसे प्रेम में तल्लीन भक्त उन्हें सर्वत्र और सबमें देखते हैं।
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि |
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन: || 18||
सच्चे ज्ञानी महापुरुष एक ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल को अपने दिव्य ज्ञान के चक्षुओं द्वारा समदृष्टि से देखते हैं।
जब हम ज्ञान के परिप्रेक्ष्य में वस्तुओं को देखते हैं तब इसका तात्पर्य 'प्रज्ञाचक्षु' अर्थात् 'ज्ञान चक्षु के साथ' देखने से है। श्रीकृष्ण ने समान अर्थ वाले शब्द 'विद्या सम्पन्ने' का प्रयोग किया है और साथ ही उन्होंने 'विनयसम्पन्ने' शब्द जोड़ा है जिसका अर्थ विनम्रता है। दिव्य ज्ञान का लक्षण यह है कि यह दीनता से युक्त होता है जबकि थोथा पुस्तकीय ज्ञान विद्वता के अभिमान से युक्त होता है।
श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह प्रकट करते हैं कि दिव्य ज्ञान किस प्रकार से व्यक्ति को भिन्न दृष्टि प्रदान करता है। इस ज्ञान से युक्त भक्त सभी प्राणियों को आत्मा के रूप में देखते हैं जो दिव्य है और भगवान का अंश है। श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए उदाहरण विविधता से युक्त हैं। वैदिक ब्राह्मण जो धार्मिक अनुष्ठान करते हैं वे सम्मानित कहलाते हैं जबकि कुत्ते के मांस का सेवन करने वाले चाण्डाल को प्रायः निम्न जाति से संबंधित होने के कारण घृणित समझा जाता है। गाय मनुष्यों के उपयोग के लिए दूध देने में समर्थ होती है किन्तु कुत्ता नहीं। हाथी का प्रयोग उत्सवों की शोभायात्रा के लिए किया जाता है जबकि गाय और कुत्ते का नहीं। शारीरिक दृष्टिकोण से प्राणियों इन में अनेक प्रकार की विषमताएँ पायी जाती हैं जबकि आध्यात्मिक ज्ञान से युक्त प्रबुद्ध लोग इन सबको शाश्वत आत्मा मानते हैं और इसलिए इन सबको एक दृष्टि से देखते हैं। वेद इस मत का समर्थन नहीं करते कि ब्राह्मण उच्च जाति है और शूद्र (श्रमिक वर्ग) निम्न जाति है। दिव्य ज्ञान के दृष्टिकोण से यद्यपि ब्राह्मण धार्मिक कर्मकाण्ड करते हैं, क्षत्रिय समाज शासन संचालन का कार्य करते हैं और वैश्य व्यावसायिक गतिविधियों तथा शूद्र श्रम के कार्य में जुटे रहते हैं तथापि सभी अविनाशी आत्माएँ हैं क्योंकि सभी भगवान का अंश हैं और इसलिए सभी समान हैं।
इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन: |
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिता: || 19||
वे जिनका मन समदृष्टि में स्थित हो जाता है, वे इसी जीवन में जन्म और मरण के चक्र से मुक्ति पा लेते हैं। वे भगवान के समान गुणों से संपन्न हो जाते हैं और परमसत्य में स्थित हो जाते हैं।
श्रीकृष्ण ने यहाँ 'सम' शब्द का प्रयोग किया है जिसका तात्पर्य पिछले श्लोक में किए गए वर्णन के अनुसार किसी मनुष्य द्वारा सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखना है। इसके अतिरिक्त समदृष्टि का अर्थ पसंद और नापसंद, सुख और दुःख तथा हर्ष और शोक से ऊपर उठकर देखने से भी है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो समदृष्टि रखते हैं वे 'संसार' अर्थात् जन्म और मृत्यु के अनवरत चक्र से परे हो जाते हैं।
जब तक हम स्वयं को शरीर समझते हैं तब तक हम समदर्शी होने की योग्यता नहीं पा सकते क्योंकि हम शरीर के सुख और दुःख के लिए निरन्तर कामनाओं और विमुखता की अनुभूति करेंगे। संत महापुरुष शारीरिक चेतना से उपर उठकर सांसारिक मोह को त्यागकर अपना मन भगवान में तत्लीन कर लेते हैं। रामचरितमानस में वर्णन है-
सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि।
जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।।
"जिस प्रकार अज्ञानी मनुष्य अपने को शरीर मानकर उसकी सेवा करता है, वैसे ही लक्ष्मण ने भगवान राम और सीता की सेवा की।" जब किसी का मन दिव्यचेतना में स्थित हो जाता है तब वह भौतिक सुखों की आसक्ति और दुःखों की अनुभूति से परे हो जाता है और फिर वह समदृष्टा की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। यह समदृष्टि भौतिक कामनाओं का त्याग करने से प्राप्त होती है और मनुष्य को भगवान के समान आचरण वाला बना देती है। महाभारत में यह वर्णन है-“यो न कामयते किञ्चत् ब्रह्म भूयाय कल्पते" अर्थात् "जो मनुष्य अपनी कामनाओं का त्याग कर देता है वह भगवान के समान हो जाता है।" ।
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् |
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थित: || 20||
परमात्मा में स्थित होकर, दिव्य ज्ञान में दृढ़ विश्वास धारण कर और मोह रहित होकर वे सुखद पदार्थ पाकर न तो हर्षित होते हैं और न ही अप्रिय स्थिति में दुःखी होते हैं।
इस श्लोक का यह अंश 'न तो सुख में प्रसन्न होना और न ही दुःख में शोक करना' बौद्ध धर्म की साधना पद्धति विपस्सना का सर्वोत्तम ध्येय है। अंततोगत्वा समदृष्टि की ओर अग्रसर करने वाली इस शुद्धता अभ्यास की अवस्था प्राप्त करने के लिए कठोर प्रशिक्षण करना आवश्यक है। किन्तु जब हम भगवान को अपनी सभी इच्छाएँ समर्पित कर देते हैं तब यही समान अवस्था स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाती है। श्लोक 5.17 के अनुसार यदि हम अपनी इच्छाओं को भगवान की इच्छा से जोड देते हैं तब सुख और दुःख दोनों को उसकी कृपा मानकर सहर्ष स्वीकार किया जा सकता है। इस सिद्धांत से संबंधित एक सुन्दर कथा इस प्रकार है-एक बार एक जंगली घोड़ा किसी किसान के खेत में आ गया। लोगों ने उस किसान को उसके भाग्य के लिए बधाई दी। किसान ने कहा- “सौभाग्य और दुर्भाग्य के बारे में कौन जानता है। यह सब भगवान की इच्छा है।" कुछ समय पश्चात् वह घोड़ा वापिस जंगल में चला गया। उसके पड़ोसी इसे दुर्भाग्य बताते हुए उसे सांत्वना देने लगे। बुद्धिमान किसान ने उत्तर देते हुए कहा-“दुःख और सुख केवल भगवान की इच्छा के अनुसार मिलता है।"कुछ दिन व्यतीत होने पर वह घोड़ा 20 अन्य जंगली घोड़ों के साथ वापस आ गया। लोगों ने किसान को फिर उसके सौभाग्य के लिए बधाई दी। किसान ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा-“सौभाग्य और दुर्भाग्य क्या है? यह सब भगवान की इच्छा पर निर्भर है।" कुछ दिनों बाद घोड़े पर सवारी करते हुए किसान के पुत्र की टांग टूट गयी। लोगों ने इस पर अपना शोक व्यक्त किया लेकिन किसान ने फिर भी यह उत्तर दिया-"दुःख और सुख केवल भगवान की इच्छा है।" इसके पश्चात् एक दिन राजा के सैनिक शीघ्र होने वाले युद्ध के लिए नवयुवकों को सेना में भर्ती करने के लिए गांव में आते हैं। किसान के पड़ोस में रहने वाले सभी युवकों को सेना में भर्ती कर लिया जाता है किन्तु किसान के पुत्र को उसकी टूटी टांग के कारण छोड़ दिया जाता है।
दिव्यज्ञान से हमें यह बोध होता है कि हमारा निजी हित केवल भगवान के सुख में निहित है। इसलिए हम अपनी सभी कामनाएँ भगवान को समर्पित कर देते हैं। जब हमारी निजी कामनाएँ भगवान की इच्छा में जुड़ जाती हैं तब किसी मनुष्य में भगवान की कृपा से दुःख और सुख दोनों को एक समान स्वीकार करने की दृष्टि विकसित होती है। समता में स्थित मनुष्य के यही लक्षण हैं।
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् |
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते || 21||
जो बाह्य इन्द्रिय सुखों में आसक्त नहीं होते वे परम आनन्द की अनुभूति करते हैं। भगवान के साथ एकनिष्ठ होने के कारण वे असीम सुख भोगते हैं।
वैदिक धर्म ग्रंथ बार-बार वर्णन करते हैं कि भगवान अनन्त आनन्द के महासागर हैं।
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ।
(तैत्तिरीयोपनिषद्-3.6)
"भगवान को आनन्द मानो"
केवलानुभवानन्दस्वरुपः परमेश्वरः।
(श्रीमद्भागवतम्-7.6.23)
"भगवान का स्वरूप वास्तविक आनंद ही है।"
आनन्द मात्र कर पाद मुखोदरादि।
(पद्म पुराण)
"भगवान के हाथ, पैर, मुख और उदर आदि आनन्द स्वरूप हैं।"
जो आनन्द सिंधु सुखरासी।
(रामचरितमानस)
भगवान आनन्द और सुख के महासागर हैं।
शास्त्रों से लिए गए ये सब मंत्र और श्लोक इस पर बल देते हैं कि दिव्य आनन्द भगवान की प्रकृति है। वे योगी जो अपनी इन्द्रियों, मन और बुद्धि को भगवान में तल्लीन कर देते हैं वे अपने भीतर स्थित असीम आनन्द की अनुभूति करते हैं।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते |
आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध: || 22||
इन्द्रिय विषयों के सम्पर्क से उत्पन्न होने वाले सुख यद्यपि सांसारिक लोगों को आनन्द प्रदान करने वाले प्रतीत होते हैं किन्तु वे वास्तव में दुःखों के कारण हैं। हे कुन्तीपुत्र! ऐसे सुखों का आदि और अंत है इसलिए ज्ञानी पुरुष इनमें आनन्द नहीं लेते।
इन्द्रियों का विषयों से संपर्क होने पर सुख की अनुभूति होती है। मन जो छठी इन्द्रिय है वह सम्मान, प्रशंसा, और सफलता आदि में सुख का अनुभव करता है। शरीर और मन के इन सभी सुखों के भोग को लौकिक सुख के रूप में जाना जाता है। ऐसे सांसारिक सुख निम्नांकित कारणों से आत्मा को संतुष्ट नहीं कर सकते।
सांसारिक सुख सीमित है इसलिए इनमें स्वाभाविक रूप से अल्पता की प्रतीति बनी रहती है। कोई व्यक्ति लखपति होने में प्रसन्न रहता है लेकिन वही लखपति जब करोड़पति को देखता है तब वह असंतुष्ट हो जाता है और सोचता है-"यदि उसके पास एक करोड़ रूपये होते तब वह और भी सुखी होता।" इसके विपरीत भगवान का सुख असीम है और उससे पूर्ण संतुष्टि प्राप्त होती है।
सांसारिक सुख अस्थायी होते हैं क्योंकि एक बार जब यह समाप्त हो जाते हैं तब पुनः दुःख की अनुभूति करवाते हैं। उदाहरणार्थ मदिरा पान करने वाला व्यक्ति मदिरा का सेवन कर आनन्द प्राप्त करता है किन्तु प्रातःकाल में नशे की खुमारी उतर कर सिरदर्द के रूप में फूटती है। किन्तु भगवान का सुख शाश्वत है और एक बार प्राप्त होने पर सदा के लिए रहता है।
सांसारिक सुख जड़ है और इसी कारण उनका निरन्तर ह्रास होता रहता है। जब कोई किसी फिल्म अकादमी द्वारा पुरस्कृत मूवी को देखते हैं तब वे अत्यंत आनन्द प्राप्त करते हैं किन्तु जब वे अपने मित्र के साथ उस मूवी को पुनः देखते हैं तब उन्हें उससे मिलने वाले आनन्द की मात्रा कम हो जाती है और फिर यदि कोई दूसरा मित्र उनसे उस मूवी को पुनः एक बार देखने का आग्रह करता है तब वे खिन्नतापूर्वक उत्तर देते हैं कि 'उन्हें मूवी देखने के स्थान पर कोई दंड दे दिया जाये किन्तु मूवी को पुनः देखने के लिए मत कहो' भौतिक पदार्थों से प्राप्त होने वाले सुखों का जैसे-जैसे उपभोग किया जाता है वैसे-वैसे उनमें निरन्तर ह्रास होता रहता है।
अर्थशास्त्र में इसे 'प्रतिफल ह्रास नियम' के रूप में परिभाषित किया गया है। जैसे-जैसे हम किसी वस्तु का निरन्तर उपयोग करते हैं वैसे वैसे उससे मिलने वाला सुख घटता रहता है। किन्तु भगवान का सुख पूर्ण संतुष्टि प्रदान करता है। यह सत्-चित्-आनन्द अर्थात् शाश्वत, चिरनूतन और दिव्य है। इस प्रकार यदि कोई भगवान का दिव्य नाम पूरा दिन जपता रहता है तब इससे उसे आध्यात्मिक संतुष्टि और सदा के लिए आनन्द की प्राप्ति होती है।
कोई भी स्वस्थ व्यक्ति स्वादिष्ट मिष्ठान का सेवन करने की इच्छा का त्याग कर मिट्टी खाने में आनन्द प्राप्त नहीं कर सकता है। समान रूप से जब कोई परम आनन्द की अनुभूति करना आरम्भ कर देता है तब मन भौतिक वस्तुओं से प्राप्त होने वाले आनंद को भुला देता है। वे जो उचित और अनुचित के विवेक से युक्त हो जाते हैं वे उपर्युक्त लौकिक सुखों की तीनों कमियों को समझ जाते हैं और अपनी इन्द्रियों को उस ओर आकर्षित होने से रोकते हैं।
श्रीकृष्ण अगले श्लोक में इस पर प्रकाश डालेंगे-
शक्नोतीहैव य: सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् |
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त: स सुखी नर: || 23||
वे मनुष्य ही योगी हैं जो शरीर को त्यागने से पूर्व काम और क्रोध के वेग को रोकने में समर्थ होते हैं, केवल वही संसार मे सुखी रहते हैं।
मानव शरीर में ही आत्मा को भगवत्प्राप्ति करने का सुनहरा अवसर प्राप्त होता है। इस शरीर में हम विवेक शक्ति से युक्त होते हैं जबकि पशु अपनी प्रवृत्ति के अनुसार जीवन निर्वाह करते हैं।
श्रीकृष्ण बलपूर्वक कहते हैं कि कामनाओं और क्रोध पर लगाम लगाने के लिए हमें अपनी विवेक शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। 'काम' शब्द का एक अर्थ काम वासना है लेकिन इस श्लोक में काम शब्द का प्रयोग शरीर और मन की तृप्ति के लिए उपायुक्त सभी प्रकार के भौतिक सुखों के लिए किया गया है। जब मन इच्छित पदार्थों को प्राप्त नहीं कर पाता तब वह अपनी व्यथा क्रोध के रूप में प्रकट करता है। काम और क्रोध नदी की तेज धारा की भांति शक्तिशाली होते हैं। पशु भी इन कामनाओं के अधीन होते हैं किन्तु वे मनुष्य की भांति विवेक के गुण से सम्पन्न न होने के कारण इन्हें रोक नहीं सकते। मानव जाति ज्ञान शक्ति से सम्पन्न है। 'सोदुम् ' शब्द का अर्थ 'सहन करना' है। इस श्लोक में हमें कामनाओं और क्रोध के वेग को सहन करने की शिक्षा दी गयी है। कुछ समय तक कोई लज्जावश अपने मनोवेग को रोक सकता है। जैसे कि कोई व्यक्ति हवाई अड्डे पर बैठा हुआ है। कोई सुन्दर महिला उसके बगल में आकर बैठ जाती है। उसके मन में उसके ऊपर अपनी बाजू रख कर आनन्द पाने की इच्छा उठती है किन्तु उसकी बुद्धि उसे ऐसा करने से रोकती है, "यह अनुचित व्यवहार है और महिला मुझे थप्पड़ भी मार सकती है।" अपमान से बचने के लिए वह स्वयं को रोकता है। किन्तु यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को लज्जा, भय और संदेह के कारण नहीं अपितु विवेक द्वारा मन के वेग को रोकने के लिए कह रहे हैं। मन पर अंकुश लगाने के लिए बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए। जैसे ही मन में भौतिक सुखों को प्राप्त करने का विचार उत्पन्न हो, उसी समय हमें बुद्धि को यह समझाना चाहिए कि ये सब दुःख के साधन हैं। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है-
नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते विड्भुजा ये।
तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्धयेद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-5:5:1)
"इस मनुष्य योनि में इन्द्रिय सुख प्राप्त करने के लिए कठोर परिश्रम करना व्यर्थ है क्योंकि ऐसे सुख तो शूकर जैसे जीव जंतुओं को भी प्राप्त हैं, जो विष्ठा का सेवन करते हैं। इसकी अपेक्षा हमें तप करना चाहिए, जिससे हमारा अंत:करण पवित्र हो और हम भगवान के असीम आनन्द में मग्न हो सकें।" विवेक शक्ति के प्रयोग का अवसर केवल मानव शरीर को प्राप्त है। वह इसका प्रयोग कर इसी जीवन में कामनाओं और क्रोध पर अंकुश रखने के योग्य हो जाता है। वह इसी जीवन में योगी बन जाता है। ऐसा सिद्ध पुरुष परम सुख का आस्वादन कर सदा उसी में लीन रहता है।
योऽन्त:सुखोऽन्तरारामस्तथान्तज्र्योतिरेव य: ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ।। 24।।
जो अन्तर्मुखी होकर असीम आत्मिक सुख का अनुभव करते हैं वे और आत्मिक प्रकाश से प्रकाशित रहते हैं, ऐसे योगी भगवान में एकीकृत हो जाते हैं और संसार से मुक्त हो जाते हैं।
'आंतरिक प्रकाश' वह दिव्य ज्ञान है जो भगवान की कृपा द्वारा हमारे भीतर तब प्रकट होता है जब हम भगवान के शरणागत हो जाते हैं।
योगदर्शन में वर्णन है-
ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥
(योगदर्शन-1.48)
"समाधि की अवस्था में मनुष्य की बुद्धि परम सत्य की अनुभूति में डूब जाती है।"
अर्जुन को यह उपदेश देने के पश्चात् कि कामना और क्रोध के आवेग को सहन करना आवश्यक है, अब श्रीकृष्ण इसका अभ्यास करने का उपाय प्रकट करते हैं। 'योऽन्तः सुख' शब्द का अर्थ 'आंतरिक रूप से प्रसन्न होना' है। एक प्रकार की प्रसन्नता हमें बाहरी पदार्थों से प्राप्त होती है और दूसरे प्रकार की प्रसन्नता हमें तब प्राप्त होती है जब हम अपने मन को भगवान में लीन कर लेते हैं। लेकिन जब भगवान का आनन्द हृदय में उमड़ता है तब उसकी तुलना में बाह्य लौकिक सुख तुच्छ दिखाई पड़ने लगते हैं और फिर उनको त्यागना सुगम हो जाता है। संत यमुनाचार्य ने कहा है-
यदावधि मम चेतः कृष्णपदारविन्दे
नव नव रस धामनुद्यत रन्तुम् आसीत् ।
तदावधि बत नारीसंगमे स्मर्यमाने
भवति मुखविकारः सुष्ठु निष्ठीवनं च ।।
"जब से मैं भगवान श्रीकृष्ण के चरणों का ध्यान करने लगा हूँ तब से मैं नित्य असीम आनन्द अनुभव करने लगा हूँ। यदि अचानक मेरे मन में काम सुख का विचार आ जाए तब उस विचार पर मैं थूकता हूँ और मेरे ओष्ठ अरुचि से सिमट जाते हैं।"
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा: |
छिन्नद्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता: || 25||
वे मनुष्य जिनके पाप समाप्त हो जाते हैं और जिनके संशय मिट जाते हैं और जिनका मन संयमित होता है, वे सभी प्राणियों के कल्याणार्थ कार्य करते हैं। वे भगवान को पा लेते हैं और सांसारिक बंधनों से भी मुक्त हो जाते हैं।
गत श्लोक में श्रीकृष्ण ने उन साधुओं की अवस्था को व्यक्त किया है जो अपने भीतर भगवान के सुख का अनुभव करते हैं। इस श्लोक में वे उन संत महात्माओं की अवस्था का वर्णन कर रहे हैं, जो सभी प्राणियों के कल्याण के कार्य में रत रहते हैं। रामचरितमानस में वर्णन है
पर उपकार बचन मन काया।
संत सहज सुभाउ खगराया।।
"करुणा संतो की स्वाभाविक प्रकृति है। इससे प्रेरित होकर वे अपनी वाणी, मन और शरीर का प्रयोग दूसरों के कल्याण के लिए करते हैं।"
परोपकार प्रशंसनीय कार्य है किन्तु केवल शरीर के कल्याण संबंधी कार्यों का परिणाम अस्थायी होता है। एक भूखे व्यक्ति को जब भोजन परोसा जाता है तब उसकी भूख शांत हो जाती है किन्तु चार घंटे के पश्चात् उसे फिर भूख लगती है। आत्मिक कल्याण के द्वारा सभी प्रकार के लौकिक कष्टों के मूल में पहुंचकर भगवच्चेतना को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाता है। इसलिए परम कल्याण का कार्य मनुष्य की चेतना को भगवच्चेतना के साथ जोड़ने में सहायता करना है। इस परोपकार कार्य में महापुरुष शुद्ध मन से तल्लीन रहते हैं। इससे और अधिक भगवान की कृपा प्राप्त होती है जो उन्हें इस मार्ग की ओर अग्रसर होने के लिए और अधिक प्रेरित करती है। अन्त में जब वे मन को पूर्णतः शुद्ध कर भगवान के पूर्ण शरणागत हो जाते हैं तब वे दिव्य आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश कर सदा के लिए परमात्मा का दिव्य लोक प्राप्त कर लेते हैं।
इसलिए इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने कर्मयोग के मार्ग की प्रशंसा की है। अब वे शेष श्लोकों में कर्म संन्यास की व्याख्या करते हुए यह बता रहे हैं कि कर्म संन्यासी भी उसी अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् |
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् || 26||
ऐसे संन्यासी भी जो सतत प्रयास से क्रोध और काम वासनाओं पर विजय पा लेते हैं एवं जो अपने मन को वश में कर आत्मलीन हो जाते हैं, वे भी माया के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 5.2 में की गयी व्याख्या के अनुसार कर्मयोग अधिकतर लोगों के लिए सरल मार्ग है और इसलिए श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को भी इसका अनुसरण करने की अनुशंसा की गयी है। किन्तु फिर भी कुछ लोग जो वास्तव में संसार से विरक्त हो जाते हैं, उनके लिए कर्म संन्यास भी उपयुक्त है। इसका एक लाभ यह है कि इसमें समय और ऊर्जा का सांसारिक कर्त्तव्यों के प्रति गमन नहीं होता और व्यक्ति आध्यात्मिक अभ्यास के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध हो सकता है।
इतिहास में अनेक कर्मसंन्यासियों का उल्लेख मिलता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे सच्चे संन्यासी आध्यात्मिक क्षेत्र में तीव्रता से प्रगति करते हैं और अनंत शांति प्राप्त करते हैं। कामनाओं और क्रोध का दमन कर तथा मन को वश में करके वे इस लोक और परलोक दोनों में परम शांति प्राप्त करते हैं। हम प्रायः इस मिथ्या धारणा को प्रश्रय देते हैं कि बाह्य परिस्थितियाँ ही हमारे जीवन में अशांति के लिए दोषी हैं और हम यह प्रतीक्षा करते हैं कि परिस्थितियाँ कब अनुकूल होंगी। किन्तु शांति बाह्य परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती क्योंकि यह मन, बुद्धि और इन्द्रियों की शुद्धि का विषय है।
संन्यासी अपने मन और विचारों को भीतर की ओर मोड़ लेते हैं और उसी शांति के महासागर में गोता लगाते हैं। ऐसा करने से वे बाह्य परिस्थितियों से उदासीन हो जाते हैं। ऐसे व्यवस्थित अंतःकरण के साथ वे सर्वत्र उसी शांति का अनुभव करते हैं और इस संसार में से भी मुक्त हो जाते हैं।
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवो: |
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ || 27||
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण: |
विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव स: || 28||
समस्त बाह्य सुख के विषयों का विचार न कर अपनी दृष्टि को भौहों के बीच में स्थित कर, नासिका में विचरने वाली भीतरी और बाहरी श्वासों के प्रवाह को सम करते हुए इन्द्रिय, मन और बुद्धि को संयमित करके जो ज्ञानी कामनाओं और भय को त्याग देता है, वह सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
प्रायः वैरागी लोगों की रुचि अष्टांगयोग या हठयोग में भी होती है। उनकी विरक्ति उन्हें भक्ति के मार्ग से उदासीन रखती है जिसमें भगवान के नाम, रूपों, लीलाओं और धाम का स्मरण करना आवश्यक होता है। श्रीकृष्ण यहाँ तपस्वियों द्वारा अपनाए गए मार्ग का वर्णन करते हैं-
वे कहते हैं कि ऐसे तपस्वी अपनी दृष्टि और श्वास को नियंत्रित कर विषयों का चिंतन बंद कर देते हैं। वे अपनी दृष्टि को भौहों के मध्य में केन्द्रित करते हैं। यदि नेत्रों को पूरी तरह से बंद कर दिया जाए तो निद्रा आने की संभावना रहती है और यदि आंखों को खुला रखा जाये तब वे अपने आस-पास की वस्तुओं से व्याकुल हो सकते हैं। इन दोनों दोषों से बचने के लिए योगी लोग अपनी अधखुली आंखों से दृष्टि को भौहों के मध्य या नासिका के अग्र भाग पर केन्द्रित करते हैं। वे 'प्राण' अर्थात् बाहर छोड़ी जाने वाली श्वास को 'आपान' अर्थात् अन्दर भरी जाने वाली श्वास के साथ तब तक समरूप करते हैं जब तक कि दोनों यौगिक समाधि में विलीन न हो जायें। यह यौगिक क्रिया इन्द्रिय, मन और बुद्धि पर नियंत्रण पाने के योग्य बनाती है। ऐसे योगी लोगों का एक मात्र लक्ष्य माया के बंधनों से मुक्त पाना होता है। ऐसे योगियों को आत्मज्ञान तो प्राप्त हो जाता है किन्तु उन्हें ब्रह्म ज्ञान प्राप्त नहीं होता। किंतु तपस्या का मार्ग भी भगवान की भक्ति के द्वारा ही पूर्ण होता है। इसे अगले श्लोक में व्यक्त किया गया है।
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् |
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति || 29||
जो भक्त मुझे समस्त यज्ञों और तपस्याओं का भोक्ता, समस्त लोकों का स्वामी और सभी प्राणियों का सच्चा हितैषी समझते हैं, वे परम शांति प्राप्त करते हैं।
पिछले दो श्लोकों में जिस साधना पद्धति का उल्लेख किया गया है वह आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्त कराती है। किन्तु ब्रह्मज्ञान के लिए भगवान की कृपा आवश्यक है जो भक्ति के द्वारा ही प्राप्त होती है। 'सर्वलोकमहेश्वरम्' शब्द का अर्थ 'समस्त संसार के परम स्वामी भगवान' तथा 'सुहृदं सर्वभूतानां' शब्द का अर्थ सभी प्राणियों का हितैषी और उपकारी होता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण बल देते हुए कहते हैं कि तपस्या के मार्ग का समापन भी भगवान की शरणागति में ही होता है। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने इसकी सुन्दर व्याख्या इस प्रकार से की है-
हरि का वियोगी जीव गोविन्द राधे।
साँचो योग सोई जो हरि से मिला दे।।
(राधा गोविन्द गीत)
"आत्मा सदा से भगवान से विमुख है। सच्चा योग वही है जो आत्मा को भगवान से जोड़ दे। अतः कोई योग पद्धति भक्ति मार्ग का अनुसरण किए बिना पूर्ण नहीं हो सकती।"
भगवान श्रीकृष्ण ने आध्यात्मिक अभ्यास के लिए सभी मार्गों को सम्मिलित किया है किन्तु हर बार वे इन्हें उपयुक्त बताते हुए कहते हैं कि इन सभी मार्गों में भक्ति का होना भी आवश्यक होता है। उदाहरणार्थ उन्होंने इस का वर्णन श्लोक 6.46-.47, 8.22, 11.53-54, 18.54-55 आदि में किया है। यहाँ भी श्रीकृष्ण ने इस विषय का अवसान भक्ति की अनिवार्यता को प्रकट करते हुए किया है।
।।श्रीमद्भगवत गीता का पंचम अध्याय सम्पूर्ण।।
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