॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhagavad Geeta Chapter 4
भगवद्गीता चतुर्थ अध्याय
अध्याय चार: ज्ञान कर्म संन्यास योग
ज्ञान का योग और कर्म करने का विज्ञान
चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को दिए जा रहे दिव्य ज्ञान के उद्गम को प्रकट करते हुए उसके विश्वास को पुष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि यह वही शाश्वत ज्ञान है जिसका उपदेश उन्होंने आरम्भ में सर्वप्रथम सूर्यदेव को दिया था और फिर परम्परागत पद्धति से यह ज्ञान निरन्तर राजर्षियों तक पहँचा। अब वे अर्जुन, जो उनका प्रिय मित्र और परमभक्त है, के सम्मुख इस दिव्य ज्ञान को प्रकट कर रहे हैं। तब अर्जुन प्रश्न करता है कि वे श्रीकृष्ण जो वर्तमान में उसके सम्मुख खड़े हैं वे इस ज्ञान का उपदेश युगों पूर्व सूर्यदेव को कैसे दे सके? इसके प्रत्युत्तर में श्रीकृष्ण अपने अवतारों का रहस्य प्रकट करते हैं। वे बताते हैं कि भगवान अजन्मा और सनातन हैं फिर भी वे अपनी योगमाया शक्ति द्वारा धर्म की स्थापना के लिए पृथ्वी पर प्रकट होते हैं लेकिन उनके जन्म और कर्म दिव्य होते हैं और वे भौतिक विकारों से दूषित नहीं हो सकते। जो इस रहस्य को जानते हैं वे अगाध श्रद्धा के साथ उनकी भक्ति में तल्लीन रहते हैं और उन्हें प्राप्त कर फिर इस संसार में पुनः जन्म नहीं लेते।
इसके पश्चात् इस अध्याय में कर्म की प्रकृति का व्याख्यान किया गया है और कर्म, अकर्म तथा विकर्म से संबंधित तीन सिद्धातों पर चर्चा की गयी है। इनसे विदित होता है कि कर्मयोगी अनेक प्रकार के सांसारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए अकर्मा की अवस्था प्राप्त कर लेते हैं और इसलिए वे कर्मचक्र में नहीं फंसते।
इसी ज्ञान के कारण प्राचीन काल में ऋषि मुनि सफलता और असफलता, सुख-दुःख से प्रभावित हुए बिना केवल भगवान के सुख के लिए कर्म करते थे। यज्ञ कई प्रकार के होते हैं और इनमें से कई यज्ञों का उल्लेख यहाँ किया गया है। जब यज्ञ पूर्ण समर्पण की भावना से सम्पन्न किए जाते हैं तब इनके अवशेष अमृत के समान बन जाते हैं। ऐसे अमृत का पान करने से साधक के भीतर की अशुद्धता समाप्त हो जाती है। इसलिए यज्ञों का अनुष्ठान पूर्ण निष्ठा और ज्ञान के साथ करना चाहिए। ज्ञान रूपी नौका की सहायता से महापापी भी संसार रूपी कष्टों के सागर को सरलता से पार कर लेता है। ऐसा दिव्य ज्ञान वास्तविक आध्यात्मिक गुरु से प्राप्त करना चाहिए जो परम सत्य को जान चुका हो। श्रीकृष्ण गुरु के रूप में अर्जुन से कहते हैं कि ज्ञान की खड्ग से अपने हृदय में उत्पन्न हुए सन्देहों को काट दो, उठो और युद्ध लड़ने के अपने कर्त्तव्य का पालन करो।
श्रीभगवानुवाच |
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् |
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् || 1||
परम भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-मैने इस शाश्वत ज्ञानयोग का उपदेश सूर्यदेव, विवस्वान् को दिया और विवस्वान् ने मनु और फिर इसके बाद मनु ने इसका उपदेश इक्ष्वाकु को दिया।
किसी मनुष्य को केवल ज्ञान प्रदान करना ही पर्याप्त नहीं होता। ज्ञान प्राप्त करने वालों के लिए उसकी महत्ता समझना और उसकी प्रामाणिकता पर विश्वास करना आवश्यक होता है। तभी वे अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से इसका क्रियान्वयन करने का प्रयास करेंगे। इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिए जा रहे आध्यात्मिक ज्ञान की विश्वसनीयता और महत्व को प्रतिपादित किया है। श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि उसे युद्ध करने की प्रेरणा प्रदान करने हेतु दिया जा रहा ज्ञान कोई नवीन ज्ञान नहीं है। यह वही शाश्वत ज्ञान योग है जिसका उपदेश उन्होंने सबसे पहले विवस्वान् या सूर्यदेव को दिया था और फिर सूर्य देवता ने इस ज्ञान का उपदेश सृष्टि के प्रथम मानव मनु को और फिर बाद में मनु ने इसे सूर्य वंशज के पहले राजा इक्ष्वाकु को दिया। इसे अधोगामी ज्ञान पद्धति कहा जाता है। इस पद्धति में ज्ञानी व्यक्ति इस ज्ञान को अन्य व्यक्ति को प्रदान करता है।
इसके विपरीत उध्वगामी ज्ञान पद्धति है जिसमें कोई व्यक्ति अपने प्रयासों द्वारा ज्ञान को बढ़ाता है। यह स्व-अर्जित प्रक्रिया श्रम साध्य, अपूर्ण और अधिक समय लेने वाली होती है। उदाहरणार्थ हम भौतिक शास्त्र सीखना चाहते हैं। हम या तो स्व-अर्जित पद्धति से इसे सीखने का प्रयास करते हैं जिसके लिए हमें अपनी पूरी बुद्धि लगते हैं और फिर बाद में किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं या फिर अधोगामी पद्धति का आश्रय लेते हैं और इस विषय में निपुण अध्यापक से संपर्क करते हैं। स्व अर्जित पद्धति अत्यधिक समय लेती है और हम अपने जीवन काल में पूर्ण ज्ञान भी नहीं प्राप्त कर पाते। हम अपने निष्कर्षों की सटीकता के प्रति आश्वस्त भी नहीं हो सकते। किंतु अन्य पद्धति द्वारा हम शीघ्र ही भौतिक शास्त्र के गूढ़ रहस्यों को जान सकते हैं। यदि हमारे अध्यापक को भौतिक विज्ञान का पूर्ण ज्ञान है तब हम उससे इस विज्ञान को सुगमता से ग्रहण कर सकते हैं। ज्ञान की यह पद्धति सरल और दोष रहित है।
प्रत्येक वर्ष हजारों ऐसी पुस्तकें बाजार में आती हैं जिनके लेखक जीवन की सामान्य समस्याओं का हल भी उसमें प्रस्तुत करते हैं। ये पुस्तकें एक सीमा तक सहायक होती हैं क्योंकि ये ज्ञान प्राप्त करने की स्व अर्जित पद्धति पर आधारित होती हैं इसलिए ये अपूर्ण होती हैं। कुछ वर्षों पश्चात् नए सिद्धान्त स्थापित होते हैं जो वर्तमान सिद्धान्त को खंडित कर देते हैं। यह स्व अर्जित पद्धति परम सत्य का बोध कराने में अनुपयुक्त होती है। दिव्य ज्ञान को प्रकट करने के लिए निजी प्रयत्नों की आवश्यकता नहीं होती। यह भगवान की शक्ति है। यह तब से अस्तित्त्व में हैं जब से भगवान हैं। जैसे गर्मी और प्रकाश उतने ही पुराने हैं जितनी कि अग्नि जिससे ये प्रकट होते हैं। भगवान और जीवात्मा दोनों सनातन हैं और इसलिए भगवान और आत्मा को एकीकृत करने वाला योग विज्ञान भी शाश्वत है। अतः इसके लिए नये सिद्धान्त की कल्पना और रचना करने की कोई आवश्यकता नहीं होती। इसकी साक्षात् उदाहरण स्वयं भगवद्गीता है जो अपनी ज्ञान की विलक्षणता के द्वारा लोगों को विस्मित करती है और जो आज से 50वीं शताब्दी पहले सुनायी जाने के बावजूद वर्तमान में भी हमारे दैनिक जीवन के लिए प्रासंगिक है। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि योग का जो ज्ञान वे अर्जुन को दे रहे हैं वह शाश्वत और प्राचीन काल से गुरु-शिष्य परम्परा द्वारा एक-दूसरे तक पहुँचता रहा है।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदु: |
स कालेनेह महता योगो नष्ट: परन्तप || 2||
हे शत्रुओं के दमन कर्ता! इस प्रकार राजर्षियों ने गुरु परम्परा पद्धति द्वारा ज्ञान योग की विद्या प्राप्त की किन्तु अनन्त युगों के साथ यह विज्ञान संसार से लुप्त हो गया।
दिव्य ज्ञान प्राप्त करने की परम्परागत पद्धति के अंतर्गत शिष्य, भगवत्प्राप्ति गुरु परम्परा द्वारा अपने गुरु से पाते थे जो गुरु को भी परम्परागत पद्धति से प्राप्त होती थी। इसी परम्परा के अंतर्गत निमी और जनक जैसे राजर्षियों ने ज्ञानयोग की विद्या प्राप्त की। इस परम्परा का आरम्भ स्वयं भगवान ने किया जो इस संसार के प्रथम गुरु हैं। पद्धति से प्राप्त होती थी। इसी परम्परा के अंतर्गत निमि और जनक जैसे राजर्षियों ने ज्ञानयोग की विद्या प्राप्त की। इस परम्परा का आरम्भ स्वयं भगवान ने किया जो इस संसार के प्रथम गुरु हैं।
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवयेमुह्यन्ति यत्सूरयः। (श्रीमद्भागवतम्-1.1.1)
भगवान ने सर्वप्रथम आदिजन्मा ब्रह्माजी के हृदय में बैठकर उन्हें इसका ज्ञान दिया और ब्रह्माजी से यह परम्परा निरन्तर चलती रही। श्रीकृष्ण ने पिछले श्लोक में कहा कि उन्होंने यह ज्ञान सूर्य देवता विवस्वान् को दिया जिससे यह परम्परा आगे बढ़ती रही। किन्तु लौकिक जगत की प्रकृति इस प्रकार की है कि कालक्रम के साथ यह ज्ञान विलुप्त हो गया। अब लौकिक मनोवृत्ति वाले और निष्ठाहीन शिष्य इस ज्ञान की व्याख्या अपने निहित उद्धेश्यों के अनुसार करते हैं। केवल कुछ पीढ़ियों में ही इसकी पवित्रता दूषित हो गयी। जब ऐसा होता है तब भगवान अपनी अकारण कृपा द्वारा इस परम्परागत ज्ञान पद्धति को मानव समाज के कल्याण के लिए पुनः स्थापित करते हैं। वह ऐसा लोक कल्याण का कार्य संसार में स्वयं प्रकट होकर करते हैं या अपने भगवद् अनुभूत श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ संतों द्वारा करवाते हैं जो पृथ्वी पर भगवान के कार्य के वाहक के रूप में प्रकट होते हैं।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज जो भारतीय इतिहास में पाँचवें मूल जगद्गुरु थे। वे ऐसे भगवतप्राप्त संत थे जिन्होंने आधुनिक समय में प्राचीन वैदिक ज्ञान की महत्ता को पुनः स्थापित किया। जब वे केवल 34 वर्ष के थे तब काशी विद्वत् परिषद के 500 विद्वानों की सर्वोच्च सभा ने उन्हें 'जगद्गुरु' अर्थात 'विश्व के आध्यात्मिक गुरु' की उपाधि से सम्मानित किया। इस प्रकार से वे भारतीय इतिहास में 'जगद्गुरु' की उपाधि प्राप्त करने वाले पाँचवें संत बने। इससे पूर्व इतिहास में केवल 4 ही मूल गुरु हुए-1. आदि जगद्गुरु श्री शंकराचार्य, 2. जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, 3. जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य और 4. जगद्गुरु श्री माध्वाचार्य। प्राचीन वैदिक ग्रंथों पर उनके पूर्ण ज्ञान से काशी विद्वत् परिषद के सभी विद्वान इतने अभिभूत हुए कि उन्होंने इन्हें बहुत सी उपाधियों से विभूषित किया। भगवद्गीता का यह भाष्य और इसके श्लोकों का ज्ञान श्री कृपालु जी महाराज द्वारा मुझे दिए गए दिव्यज्ञान पर आधारित है।
स एवायं मया तेऽद्य योग: प्रोक्त: पुरातन: |
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् || 3||
उसी प्राचीन गूढ़ योगज्ञान को आज मैं तुम्हारे सम्मुख प्रकट कर रहा हूँ क्योंकि तुम मेरे मित्र एवं मेरे भक्त हो इसलिए तुम इस दिव्य ज्ञान को समझ सकते हो।
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि उसे दिया जा रहा यह पुरातन गूढ़ विज्ञान असाधारण रहस्य है। संसार में रहस्य रखने के दो मुख्य कारण हैं-या तो स्वार्थवश सत्य को अपने तक ही सीमित रखना या फिर ज्ञान के दुरूपयोग को बचाने के लिए। किन्तु ज्ञानयोग की विद्या का रहस्य इन दोनों कारणों से गुप्त नहीं रखा जाता अपितु इसे गुप्त इसलिए रखते हैं क्योंकि इसको समझने की योग्यता का होना अति आवश्यक है। इस श्लोक में इसकी योग्यता को भक्ति के रूप में व्यक्त किया गया है। भगवद्गीता के गहन संदेश को समझने के लिए केवल विद्वत्ता या संस्कृत भाषा में पारंगत होना आवश्यक नहीं है। इसे समझने के लिए भक्ति आवश्यक है जो भगवान के प्रति जीवात्मा के सूक्ष्म द्वेष का विनाश कर देती है और हमें भगवान के अणु अंश और दास के रूप में अपनी स्थिति को स्वीकार करने के योग्य बनाती है।
अर्जुन इस ज्ञान को पाने योग्य विद्यार्थी था क्योंकि वह भगवान का परम भक्त था। भगवान की भक्ति का अभ्यास यथाक्रम निम्नांकित पाँच उच्च भावों में से किसी एक भाव से किया जा सकता है।
1. शांत भाव-भगवान को अपना स्वामी मानना।
2. दास्य भाव-स्वामी के रूप में भगवान की दासता स्वीकार करने की भावना।
3. सख्य भाव-भगवान को अपना मित्र समझना।
4. वात्सल्य भाव-भगवान को अपना पुत्र मानना।
5. माधुर्य भाव-भगवान को अपना प्रियतम समझ कर उनकी उपासना करना।
अर्जुन ने भगवान को अपना मित्र मानकर उनकी आराधना की और इसलिए श्रीकृष्ण उसे अपना परम मित्र और भक्त कहते हैं। हृदय में श्रद्धा भक्ति के बिना कोई भी भगवद्गीता के दिव्य ज्ञान को ग्रहण नहीं कर सकता। यह श्लोक भगवान के प्रति श्रद्धा भक्ति न रखने वाले विद्वानों, ज्ञानियों, योगियों, तपस्वियों आदि द्वारा भगवद्गीता पर लिखी गयी टीका-टिप्पणियों को अमान्य सिद्ध करता है। इस श्लोक के अनुसार क्योंकि वे भक्त नहीं होते इसलिए वे अर्जुन के सम्मुख जो दिव्य ज्ञान प्रकट किया गया था, उसके अभिप्राय को वास्तव में समझ नहीं सकते। अतः भगवद्गीता पर उनका भाष्य अनुचित और अधूरा होता है।
अर्जुन उवाच |
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वत: |
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति || 4||
अर्जुन ने कहा! आपका जन्म विवस्वान् के बहुत बाद हुआ तब मैं फिर यह कैसे मान लूं कि प्रारम्भ में आपने उन्हें इस ज्ञान का उपदेश दिया था।
अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के कथनों में घटनाओं की असंगति से विचलित हो जाता है। सूर्य देवता का अस्तित्त्व सृष्टि के प्रारम्भ से ही है जबकि श्रीकृष्ण ने अभी इस संसार में जन्म लिया है। यदि श्रीकृष्ण वसुदेव और देवकी के पुत्र हैं तब उनका यह कहना कि उन्होंने इस ज्ञान को विवस्वान् सूर्य देव को दिया था, अर्जुन को असंगत प्रतीत होता है इसलिए वह इसकी सत्यता को जानना चाहता है। अर्जुन का प्रश्न भगवान की अवतार के रहस्य की व्याख्या करने का अनुरोध है और श्रीकृष्ण अगले श्लोक में इसका उत्तर देते हैं।
श्रीभगवानुवाच |
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन |
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप || 5||
तुम्हारे और मेरे अनन्त जन्म हो चुके हैं किन्तु हे परन्तप! तुम उन्हें भूल चुके हो जबकि मुझे उन सबका स्मरण है।
श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे अर्जुन के समक्ष एक मनुष्य के रूप में खड़े हैं केवल इस कारण से उनकी तुलना मानव मात्र से करना भोलापन है। कोई राष्ट्राध्यक्ष यदि कारागार को देखने का निर्णय लेता है और यदि हम उसे कारागार में खड़ा पाते हैं तब हमें यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि वह भी एक बन्दी है। हम जानते हैं वह केवल कारागार का निरीक्षण करने के प्रयोजन से वहाँ आया है। इसी प्रकार से भगवान भी कई बार अवतार लेकर संसार में प्रकट होते हैं किन्तु वह अपने दिव्य गुणों और शक्तियों को कभी नहीं त्यागते।
इस श्लोक पर अपनी टीका प्रस्तुत करते हुए शंकराचार्य कहते हैं- “या वासुदेवेअनीश्वरासर्वज्ञाशंका मूर्खाणां तां परिहरन् श्रीभगवान् उवाच।" (शारीरिक भाष्य श्लोक 4.5) अर्थात् "श्रीकृष्ण के मुख से उच्चारित इस श्लोक द्वारा उन मूर्ख लोगों की भर्त्सना की गयी है जो उन्हें भगवान मानने में संदेह करते हैं।" ये अविश्वासी लोग यह तर्क देते हैं कि श्रीकृष्ण ने भी उन सबके समान ही जन्म लिया था और उनके समान ही भोजन एवं जल आदि ग्रहण करते थे इसलिए वे भगवान नहीं हो सकते। यहाँ इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण जीवात्मा और भगवान के बीच के भेद को समझाते हुए कहते हैं कि यद्यपि वे इस संसार में अनन्त बार अवतार लेते हैं तथापि वे सदैव सर्वज्ञ रहते हैं।
जीवात्मा और परमात्मा में कई प्रकार की समानता होती है, जैसे दोनों सत्-चित्-आनन्द (नित्य, चेतन और आनन्द) हैं फिर भी दोनों में अनेकों भेद हैं। भगवान सर्वव्यापक हैं किन्तु आत्मा केवल शरीर में व्याप्त रहती है। भगवान सर्वशक्तिमान हैं जबकि आत्मा में भगवान की कृपा के बिना स्वयं को माया से मुक्त करवाने की शक्ति भी नहीं होती। भगवान सृष्टि के नियमों के निर्माता हैं जबकि आत्मा इन नियमों के अधीन है भगवान समस्त सृष्टि के नियन्ता हैं जबकि आत्मा उनके नियंत्रण में रहती है, भगवान सर्वज्ञ हैं और जीवात्मा को किसी एक विषय का भी पूर्ण ज्ञान नहीं होता।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस श्लोक में 'परन्तप' कह कर संबोधित किया है जिसका अर्थ 'शत्रुओं का दमनकर्ता' है। वे कहते हैं, "अर्जुन तुम पराक्रमी योद्धा हो, तुमने कई शक्तिशाली शत्रुओं का वध किया है। अब तुम इस संदेह को जो तुम्हारे मस्तिष्क में प्रविष्ट हो गया है, उससे अपनी पराजय स्वीकार न करो। ज्ञान की जो खड्ग मैं तुम्हे दे रहा हूँ, इससे अपने अज्ञान का नाश करो और ज्ञान में स्थित हो जाओ।"
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् |
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया || 6||
यद्यपि मैं अजन्मा और समस्त जीवों का स्वामी और अविनाशी हूँ तथापि मैं इस संसार में अपनी दिव्य शक्ति योगमाया द्वारा प्रकट होता हूँ।
कुछ लोग इस मत का विरोध करते हैं कि भगवान मनुष्य का रूप धारण करते हैं। वे भगवान के निराकार रूप के साथ अधिक सहज रहते हैं जो सर्वत्र व्याप्त, अमूर्त और सूक्ष्म है। भगवान निश्चित रूप से अमूर्त और निराकार है किन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि भगवान एक साथ अपने निराकार और साकार रूप में नहीं रह सकते। यदि कोई कल्पना करता है कि भगवान का साकार रूप नहीं है तब इसका यह अर्थ होगा कि वह व्यक्ति भगवान को सर्व शक्तिशाली नहीं मानता इसलिए यह कहना कि 'भगवान निराकार है' यह एक अधूरा कथन है। अन्य शब्दों में यह कहना कि 'भगवान साकार रूप में प्रकट होते हैं' यह भी एक अधूरा सत्य है। सर्वशक्तिमान भगवान के साकार और निराकार दो रूप हैं। इसलिए बृहदारण्यकोपनिषद् में वर्णन है-
द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च। (बृहदारण्यकोपनिषद्-2.3.1)
भगवान दो रूपों में प्रकट होते हैं-निराकार 'ब्रह्म' के रूप में और साकार 'भगवान' के रूप में। ये दोनों भगवान के व्यक्तित्त्व के आयाम हैं। वास्तव में जीवात्मा में भी ये दोनों आयाम होते हैं। यह निराकार है और इसलिए जब यह मृत्यु के समय शरीर को त्याग देती है तब यह दिखाई नहीं देती। फिर भी यह दूसरा शरीर धारण करती है और केवल एक बार ही नहीं बल्कि अनन्त बार क्योंकि वह एक जन्म से दूसरे जन्म में शरीर बदलती रहती है। जब अणु आत्मा शरीर धारण करने के योग्य हो सकती है तब फिर सर्वशक्तिशाली भगवान साकार रूप धारण क्यों नहीं कर सकते? या भगवान क्या यह कहते हैं-"मेरे पास साकार रूप में प्रकट होने की शक्ति नहीं है और इसलिए मैं केवल एक निराकार ज्योति हूँ।" सर्वज्ञता और पूर्णता के दिव्य गुणों से परिपूर्ण होने के लिए भगवान का साकार और निराकार दोनों रूपों में होना आवश्यक है। भगवान और जीवात्मा में यह भेद इसलिए है कि हमारा शरीर प्राकृत अर्थात् माया शक्ति से निर्मित है। भगवान का साकार रूप उनकी दिव्य शक्ति योगमाया द्वारा निर्मित होता है इसलिए यह दिव्य है और भौतिक विकारों से परे है। पद्मपुराण में इसका विशद वर्णन इस प्रकार से है-
यस्तु निर्गुण इत्युक्तः शास्त्रेषु जगदीश्वरः।
प्राकृतैर्हेय संयुक्तैर्गुणैर्लीनत्वमुच्यते ।।
"जबकि वैदिक ग्रंथों में वर्णन किया गया है कि भगवान का कोई रूप नहीं होता इससे उनका यह ताप्तर्य है कि भगवान का रूप प्राकृतिक विकार से ग्रस्त नहीं होताअपितु इसके विपरीत वह दिव्य रूप होता है"।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् || 7||
जब जब धरती पर धर्म की ध्वनि और अधर्म में वृद्धि होती है तब उस समय मैं पृथ्वी पर अवतार लेता हूँ।
वस्तुतः धर्म एक नियत कर्म है जो हमारे आध्यात्मिक उत्थान और उन्नति में सहायक होता है और धर्म के प्रतिकूल आचरण को अधर्म कहा जाता है। जब धरती पर अधर्म प्रबल हो जाता है तब संसार के सृष्टि कर्ता और नियामक भगवान प्रकट होकर अधर्म का विनाश कर धर्म की स्थापना करते हैं। इस प्रकार से भगवान के प्रकट होने को अवतार कहा जाता है। संस्कृत भाषा के शब्द 'अवतार' शब्द को अंग्रेजी भाषा के शब्दकोश में भी सम्मिलित किया गया है और इसका प्रयोग प्रायः स्क्रीन पर अपना चित्र दर्शाने के लिए किया जाता है। इस पुस्तक में हम भगवान के दिव्य प्राकट्य के अर्थ के लिए इस शब्द का प्रयोग करेंगे। श्रीमद्भागवतम् में 24 अवतारों का उल्लेख मिलता है किन्तु वैदिक धर्मग्रंथों में अनन्त अवतारों का वर्णन किया गया है।
जन्मकर्माभिधानानि सन्ति मेऽङ्ग सहस्रशः।
न शक्यन्तेऽनुसंख्यातुमनन्तत्त्वान्मयापि हि।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.51.36)
"कोई भी ईश्वर के अनन्त अवतारों की गणना नहीं कर सकता। इन अवतारों का वर्गीकरण निम्न चार प्रकार से किया गया है"
1. आवेशावतार-जब भगवान अपनी दिव्य शक्तियाँ किसी पुण्य जीवात्मा में प्रकट कर उसके माध्यम से अपनी लीलाएँ करते हैं। नारद मुनि इस का उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त महात्मा बुद्ध का अवतार भी इसका उदाहरण है।
2. प्रभवावतार-ये भगवान के साकार रूप के अवतार हैं जिसमें वे अपनी कुछ दिव्य शक्तियों
का प्रदर्शन करते हैं। प्रभवावतार भी दो प्रकार के होते हैं।
(क) जब भगवान थोड़े समय के लिए प्रकट होकर अपना कार्य सम्पन्न कर चले जाते हैं। हंसावतार इसका उदाहरण है जहाँ भगवान ने प्रकट होकर चार कुमारों के प्रश्नों के उत्तर दिये और फिर अन्तर्ध्यान हो गये।
(ख) जब भगवान अवतार लेकर कई वर्षों तक पृथ्वी पर रहते हैं। वेदव्यास जिन्होंने 18 पुराणों और महाभारत की रचना की एवं वेदों को चार भागों में विभक्त किया था, वे इस प्रकार के अवतार का उदाहरण है।
3. वैभवातार-जब भगवान विराट रूप में प्रकट होकर अपनी दिव्य शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं। जैसे मत्स्यवतार, कूर्मावतार और वराहावतार ये सभी वैभावतार के उदाहरण हैं।
4. परावस्थावतार-जब भगवान अपनी दिव्य शक्तियों सहित स्वयं अवतार लेकर पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। श्रीकृष्ण, श्रीराम और नृसिंहावतार सभी परावस्थावतार हैं।
इस वर्गीकरण का तात्पर्य यह दर्शाना नहीं है कि कोई अवतार अन्य अवतारों से श्रेष्ठ है। वेदव्यासजी जो स्वयं भगवान का अवतार थे, ने स्पष्ट वर्णन किया है-" सर्वे पूर्णाः शाश्वताश्च देहास्तस्यपरमात्मनः" (पद्मपुराण) अर्थात् "सभी अवतार भगवान की दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण थे।" इसलिए हमें किसी अवतार की तुलना में किसी अन्य अवतार को बड़ा या छोटा नहीं समझना चाहिए। भगवान अवतारों के दौरान सम्पन्न किए जाने वाले कार्यों के आधार पर अपेक्षित शक्तियों के साथ प्रकट होते हैं। शेष शक्तियाँ अवतार में अप्रकट रहती हैं इसलिए उपर्युक्त वर्गीकरण किया गया है।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे || 8||
भक्तों का उद्धार, दुष्टों का विनाश और धर्म की मर्यादा को पुनः स्थापित करने के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ।
पिछले श्लोक में यह कहने के पश्चात् कि भगवान संसार में अवतार लेते हैं अब श्रीकृष्ण भगवान के अवतार लेने के तीन कारणों की व्याख्या कर रहे हैं-(1) दुष्टों के विनाश के लिए, (2) भक्तों के उद्धार के लिए, (3) धर्म की स्थापना के लिए। किंतु यदि हम इन तीनों बिन्दुओं का गहन अध्ययन करते हैं तब भी तीनों कारणों में से कोई भी अधिक विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता।
1) भक्तों के उद्धार के लिए: भगवान अपने भक्तों के हृदय में वास करते हैं और उनके भीतर रहकर सदैव उनकी रक्षा करते हैं। इस प्रयोजन हेतु भगवान को अवतार लेने की आवश्यकता नहीं होती।
2) दुष्टों के विनाश हेतुः भगवान सर्वशक्तिमान हैं और केवल अपने संकल्प से उन्हें मार सकते हैं। इसलिए ऐसा करने के लिए उन्हें अवतार लेने की क्या आवश्यकता है?
3) धर्म की स्थापना के लिए: वेदों में नित्य धर्म का वर्णन किया गया है। भगवान संतों के माध्यम से इसकी पुनः स्थापना कर सकते हैं। अतः इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए अवतार लेना आवश्यक नहीं है।
ऐसे में फिर उपर्युक्त श्लोक में वर्णित कारणों के अभिप्राय को हम कैसे समझ सकते हैं? श्रीकृष्ण के कथनों का आशय ग्रहण करने के लिए हमें गहनता से विचार करना होगा।
इसे भगवान की भक्ति में तल्लीन होना ही आत्मा का सबसे बड़ा धर्म है इसलिए भगवान अवतार लेकर इसे शक्ति प्रदान करते हैं। जब भगवान पृथ्वी पर अवतरित होते हैं तब वह अपने दिव्य रूप, नाम, गुण, लीला, धाम और संतों के साथ प्रकट होते हैं जिससे आत्मा को भगवान की भक्ति में लीन होने का सरल आधार प्राप्त होता है। चूँकि मन को अपना ध्यान स्थिर रखने के लिए किसी रूप का आश्रय लेने की आवश्यकता पड़ती है इसलिए भगवान के निराकार रूपों की उपासना कठिन होती है। अन्य शब्दों में साकार भगवान की भक्ति को समझना, करना और उसमें तल्लीन होना रुचिकर होता है।
इस प्रकार 5000 वर्ष पूर्व हुए श्रीकृष्ण के अवतार से अब तक करोड़ों आत्माओं ने उनकी लीलाओं की भक्ति का आधार बनाते हुए सहजता के साथ अपने मन को शुद्ध किया। इसी प्रकार से रामायण ने सदियों से जीवात्मा को भक्ति का सुखद आधार प्रदान किया है। जब भारत में दूरदर्शन पर सर्वप्रथम रामायण श्रृंखला का प्रसारण प्रत्येक रविवार को प्रात:काल में आरम्भ हुआ था तब उस टी. वी. प्रसारण को देखने के लिए पूरे देश के सभी गली मुहल्ले खाली हो जाते थे। भगवान राम की लीलाओं ने लोगों को ऐसा मंत्रमुग्ध किया कि वे भगवान की लीलाओं को देखने के लिए अपने टी. वी की स्क्रीन से चिपके रहते थे। इससे यह ज्ञात होता है कि इतिहास में भगवान राम के अवतार ने अनन्त जीवात्माओं को भक्ति का आधार प्रदान किया। रामचरितमानस में इस प्रकार से वर्णन किया गया है-
राम एक तापस तिय तारी।
नाम कोटि खल कुमति सुधारी।।
"अपने अवतार काल में राम ने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को स्पर्श कर पत्थर के शरीर से मुक्ति प्रदान की थी।" इस प्रकार तब से 'राम' के नाम की महिमा का गान करते हुए अनेक पतित आत्माएँ पवित्र हो गयीं। इस श्लोक का गूढ ज्ञान इस प्रकार से है-
धर्म की स्थापनाः भगवान अवतार लेकर जीवात्माओं को अपना नाम, रूप, लीला, गुण, धाम और संतों का संग प्रदान कर धर्म की स्थापना करते हैं, जिससे सभी जीव भक्ति में लीन होकर अपने अन्तःकरण को पवित्र करते हैं।
दुष्टों का संहार करनाः भगवान की दिव्य लीलाओं को सुकर बनाने के लिए कुछ जीवन मुक्त संत भी उनके साथ अवतार लेकर आते हैं और वे खलनायक का अभिनय करते हैं। उदाहरणार्थ रावण और कुंभकरण जय और विजय थे जो भगवान के दिव्य धाम से अवतार लेकर प्रकट हुए थे। उन्होंने राक्षस का अभिनय किया और भगवान राम से शत्रुता कर उनसे युद्ध किया। वे किसी के द्वारा भी मारे नहीं जा सकते थे क्योंकि वे दिव्य पुरुष थे। इसलिए भगवान ने अपनी लीला के प्रदर्शन हेतु ऐसे राक्षसों का वध किया और उन्हें मारने के पश्चात् भगवान श्रीराम ने उन्हे अपने उसी दिव्य धाम में पहुँचा दिया जहाँ से वे पहले आए थे।
भक्तों के उद्धार के लिए: अनेक जीवात्माएँ भगवान का साक्षात्कार करने की पात्रता प्राप्त करने के लिए अपनी साधना भक्ति में अत्यंत उन्नत हो चुकी थीं। जब श्रीकृष्ण संसार में अवतरित हुए तब इन सिद्ध आत्माओं को भगवान की लीलाओं में भाग लेने का प्रथम बार सुअवसर प्राप्त हुआ। उदाहरणार्थ कुछ गोपियाँ (वृंदावन की ग्वालिनें जहाँ श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाएँ प्रकट की), जीवन मुक्त आत्माएँ थी जो श्रीकृष्ण की लीलाओं के प्रदर्शन में सहायतार्थ उनके दिव्य धाम से अवतार लेकर प्रकट हुई थीं। अन्य गोपियाँ मायाबद्ध जीवात्माएँ थीं जिन्हें भगवान से मिलने और उनकी सेवा करने का प्रथम बार अवसर प्राप्त हुआ और उन्होंने भी उनकी मधुर लीलाओं में भाग लिया। इस प्रकार जब श्रीकृष्ण संसार में अवतरित हुए तब इन जीवात्माओं को भगवान की लीलाओं में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने और अपनी भक्ति पूर्ण करने का सुअवसर मिला। यही इस श्लोक का गूढ़ अर्थ है। फिर भी यदि कोई इस श्लोक पर अधिक साहित्यिक या शाब्दिक दृष्टि से विचार करना चाहता है तब यह अनुचित नहीं होगा।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत: |
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन || 9||
हे अर्जुन! जो मेरे जन्म एवं कर्मों की दिव्य प्रकृति को जानते हैं वे शरीर छोड़ने पर संसार में पुनः जन्म नहीं लेते अपितु मेरे नित्य धाम को प्राप्त करते हैं।
गत श्लोक के संदर्भ में इस श्लोक को समझना चाहिए। श्रद्धापूर्वक भगवान के स्मरण में तल्लीन रहने से मन पवित्र होता है। यह भक्ति या तो निराकार भगवान या उनके साकार रूप के प्रति हो सकती है। भगवान के निराकार रूप की भक्ति अमूर्त होती है। इस प्रकार की साधना भक्ति के दौरान लोगों को अपना ध्यान केन्द्रित करने या संपर्क स्थापित करने के लिए कोई आधार दिखाई नहीं देता। साकार भगवान की भक्ति सरल है, ऐसी भक्ति के लिए भगवान के प्रति दिव्य मनोभावों का होना आवश्यक होता है। श्रीकृष्ण की भक्ति में तल्लीन होने के लिए लोगों को उनके नाम, रूप, गुण, लीलाओं, धाम और संतों में दिव्य मनोभाव विकसित करना चाहिए।
उदाहरणार्थ लोग भगवान की पत्थर की मूर्ति की पूजा करके अपने अन्त:करण को पवित्र करते हैं क्योंकि उन्हें यह पूर्ण विश्वास है कि इन मूर्तियों में भगवान का वास है। यही भावनाएँ भक्त के अन्तःकरण को शुद्ध करती हैं। महाराज मनु इस प्रकार से व्यक्त करते हैं:
न काष्ठे विद्यते देवो न शिलायां न मृत्सु च।
भावे हि विद्यते देवस्तस्मात्भावं समाचरेत् ।।
"भगवान न तो लकड़ी में और न ही पत्थर में अपितु भक्तों के हृदय में निवास करते हैं। इसलिए पूर्ण भावना के साथ मूर्ति की पूजा करो।" उसी प्रकार यदि हम भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन होना चाहते हैं तब हमें उनकी लीलाओं के प्रति अपने मन में दिव्य मनोभावों को प्रश्रय देना होगा। वे टीकाकार जो महाभारत या भगवद्गीता की लाक्षणिक विवेचना करते हैं, वे लोगों में श्रीकृष्ण की भक्ति को समाप्त कर घोर अन्याय करते हैं। इस श्लोक में श्रीकृष्ण हमारी भक्ति को प्रगाढ़ करने के लिए उनकी लीलाओं के प्रति दिव्य मनोभावना रखने की आवश्यकता पर बल देते हैं। ऐसी दिव्य मनोभावना विकसित करने के लिए हमें भगवान और हमारे अपने कर्मों के बीच के भेद को समझना होगा। हम मायाबद्ध जीव हैं और हमें अभी तक परमानंद प्राप्त नहीं हुआ और आत्मा की कामनाओं की अभी तक तृप्ति नहीं हुई है इसलिए हमारे कर्म निजी स्वार्थों और निजी आवश्यकताओं की पूर्ति की इच्छा से प्रेरित होते हैं जबकि भगवान के कर्म किसी निजी कारण से प्रेरित नहीं होते क्योंकि वे अनन्त सुखों से नित्य तृप्त रहते हैं। भगवान को कर्मों द्वारा आनन्द प्राप्त करने की अपेक्षा नहीं होती। इसलिए भगवान जो भी करते हैं वे मायाबद्ध जीवात्माओं के कल्याणार्थ करते हैं। इन दिव्य कर्मों को भगवान की लीलाएँ कहा जाता है जबकि हमारे कर्मों को कार्य कहा जाता है। समान रूप से भगवान का जन्म भी दिव्य होता है और हमारी तरह किसी माता के गर्भ में नहीं होता इसलिए परमानन्द से परिपूर्ण भगवान को किसी माता के गर्भ में उल्टा लटकने की आवश्यकता नहीं होती। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है-
तमद्भूतं बालकमम्बुजेक्षणं चतुर्भुजं शङ्खगदायुदायुधम्।
(श्रीमद्भागवतम्-10.3.9)
"जब श्रीकृष्ण अवतार लेने से पूर्व वसुदेव और देवकी के सम्मुख प्रकट हुए तब वह चतुर्भुज विष्णु के रूप में थे।" भगवान का वह विराट रूप निश्चित रूप से देवकी के गर्भ में नहीं ठहर सकता था फिर भी देवकी को यह आभास दिलाने के लिए कि वे उसके गर्भ में है उन्होंने अपनी योगमाया शक्ति द्वारा देवकी के गर्भ को सुगमता से फैला दिया। अंततः वे बाहर से प्रकट हुए जिससे ज्ञात होता कि वे कभी भी गर्भ में नहीं थे।
आविरासीद् यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.3.8)
"जैसे आकाश में रात्रि के समय चन्द्रमा पूर्ण आभा के साथ प्रकट होता है उसी प्रकार से भगवान श्रीकृष्ण देवकी और वसुदेव के समक्ष प्रकट हुए।" यह भगवान के जन्म की विशेषता है। यदि हम भगवान की लीलाओं और जन्म की दिव्यता में विश्वास रखते हैं तब हम भगवान के साकार रूप की भक्ति में सरलता से तल्लीन हो सकते हैं और अपने परम लक्ष्य को पा सकते हैं।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता: |
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता: || 10||
आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त होकर पूर्ण रूप से मुझमें तल्लीन होकर मेरी शरण ग्रहण कर पहले भी अनेक लोग मेरे ज्ञान से पवित्र हो चुके हैं और इस प्रकार से उन्होंने मेरा दिव्य प्रेम प्राप्त किया है।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया था कि वे लोग जो उनके जन्म और उनकी लीलाओं की दिव्य प्रकृति को वास्तव में जानते हैं वे उन्हें पा लेते हैं। वे अब इसकी पुष्टि करते हैं कि सभी कालों में असंख्य मनुष्यों ने इस साधन से भगवत्प्राप्ति की है। उन्होंने श्रद्धा भक्ति द्वारा अपने अन्तःकरण को शुद्ध कर इस परम लक्ष्य को प्राप्त किया है। श्री अरविंद ने इसे अति सुन्दरता से व्यक्त किया है, "तुम्हें अपने हृदय रूपी मन्दिर को शुद्ध रखना चाहिए यदि तुम इसमें किसी दिव्या मूर्ति को रखना चाहते हो।" बाइबिल में वर्णन है-"शुद्ध हृदय वाले भाग्यशाली हैं क्योंकि वे ही वह भगवान को देख सकते हैं।" (मैथ्यू 5.8)
अब मन को कैसे शुद्ध किया जाए? आसक्ति, भय और क्रोध को त्यागने से और मन को भगवान में अनुरक्त करने से अन्त:करण कैसे शुद्ध होता है? वास्तव में आसक्ति ही भय और क्रोध का कारण है। जिन सांसारिक वस्तुओं में हमारी आसक्ति है वे हमसे छिन जाएंगी, इसकी आशंका से भय उत्पन्न होता है और विषयों की प्राप्ति में बाधा आने से क्रोध उत्पन्न होता है। इसलिए आसक्ति ही मन के अशुद्ध होने का मुख्य कारण है। यह माया का संसार तीन प्राकृतिक गुणों से निर्मित है-सत्व, रजस और तमस। संसार के सभी विषय और सभी मनुष्य इन तीन गुणों के आधिपत्य में हैं। जब हम स्वयं को किसी सांसारिक पदार्थ, विषय या व्यक्ति में अनुरक्त कर देते हैं तब हमारा मन भी इन तीन गुणों से प्रभावित होता है। इसके विपरीत जब हम अपने मन को भगवान (जो तीनों गुणों से परे हैं,) में अनुरक्त करते हैं तब ऐसी समर्पण भक्ति से मन शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार से मन को काम-वासना, क्रोध, लोभ, शत्रुता और मोह के विकारों से शुद्ध करने का श्रेष्ठ उपाय इसे संसार से विरक्त करना और भगवान में अनुरक्त करना है। इसलिए रामायण में वर्णन किया गया है-
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
अभ्यंतर मल कबहुँन जाई ।।
" भगवान की भक्ति बिना, मन का मैल नहीं धुल सकता" ज्ञान योग के महान् प्रवर्तक शंकराचार्य ने कहा है
शुद्धयति हि नान्तरात्मा कृष्णपदाम्भोज-भक्तिमृते।
(प्रबोध सुधाकर)
"भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों की भक्ति में लीन हुए बिना मन शुद्ध नहीं होगा" पिछले श्लोक को पढ़ने से यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि भगवान कृष्ण पक्षपात करते हुए अपनी कृपा उस पर बरसाते हैं जो अपने मन को उनमें लीन करते हैं न कि सांसारिक मनोवृत्ति वाले जीवात्माओं पर। परम पिता अगले श्लोक में इसे स्पष्ट करते हैं।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् |
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: || 11||
जिस भाव से लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं उसी भाव के अनुरूप मैं उन्हें फल देता हूँ। हे पृथा पुत्र! सभी लोग जाने या अनजाने में मेरे मार्ग का ही अनुसरण करते हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण यह व्यक्त करते हैं कि भगवान सभी के साथ उनके समर्पण के स्तर के अनुसार व्यवहार करते हैं। जो लोग भगवान के अस्तित्त्व को स्वीकार नहीं करते उनके प्रति वे कर्म के अनुसार उनसे व्यवहार करते हैं।वे उनके हृदय में बैठते हैं, उनके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं और तदनुसार फल देते हैं किन्तु ऐसे नास्तिक लोग भी भगवान की दासता से बच नहीं सकते। भगवान की शक्ति माया उन्हें धन-संपत्ति, विलासिता, सगे संबंधी, प्रतिष्ठा आदि के मोह जाल में फंसा कर भगवान की दासता करने के लिए बाध्य करती है। माया उन्हें क्रोध, काम-वासना और लोभ के नियंत्रण में ले आती है। दूसरी ओर जो लोग अपने मन से सांसारिक आकर्षणों को हटाकर भगवान को अपना लक्ष्य और आश्रय मानकर उनके सम्मुख होते हैं, उनके लिए भगवान अपने बालक का पालन पोषण करने वाली एक माँ के समान उनकी देखभाल करते हैं।
श्रीकृष्ण ने 'भजामि' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ 'सेवा करना' है। वे शरणागत जीवात्माओं के अनन्त पापों का नाश कर देते हैं, माया के बंधनों से मुक्त कर देते हैं, उन्हें भौतिक संसार के अंधकार को मिटा देते हैं और दिव्य कृपा, दिव्य ज्ञान एवं दिव्य प्रेम प्रदान करते हैं। जब भक्त निष्काम भाव से उन्हें प्रेम करते हैं तब वे अपनी स्वेच्छा से उनके प्रेम के कारण दास बन जाते हैं। श्रीराम ने हनुमान से इस प्रकार से कहा-
एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यास्मि ते कपे।
शेषस्येहोपकाराणां भवाम ऋणिनो वयं ।।
(वाल्मिकी रामायण)
"हे हनुमान! तुमने मेरी जो सेवा की है उसके ऋण से उऋण होने के लिए मैं तुम्हें अपना जीवन समर्पित कर दूंगा। तथा तुम्हारी भक्ति के लिए मैं सदैव तुम्हारा ऋणी रहूँगा।" इस प्रकार भगवान सभी के साथ उनके समर्पण के आधार पर व्यवहार करते हैं। यदि भगवान अपने भक्तों पर दया करते हैं तब फिर कुछ लोग स्वर्ग के देवताओं की पूजा क्यों करते हैं? श्रीकृष्ण इसकी व्याख्या अगले श्लोक में करते हैं।
काङ् क्षन्त: कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवता: |
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा || 12||
इस संसार में जो लोग सकाम कर्मों में सफलता चाहते हैं वे लोग स्वर्ग के देवताओं की पूजा करते हैं क्योंकि सकाम कर्मों का फल शीघ्र प्राप्त होता है।
जो लोग सांसारिक पदार्थों को प्राप्त करना चाहते हैं वे स्वर्ग के देवताओं की पूजा करते हैं और उनसे वरदान प्राप्त करते हैं। देवताओं द्वारा प्रदान किए जाने वाले वरदान भौतिक और अस्थायी होते हैं। क्योंकि देवता भी इन्हें केवल भगवान की शक्ति प्राप्त होने पर प्रदान कर सकते हैं। इस संबंध में एक ज्ञानप्रद सुन्दर कथा इस प्रकार से है-
संत फरीद एक बार बादशाह अकबर के दरबार में गए। वह जनता के दरबार में बैठकर बादशाह अकबर की प्रतीक्षा करने लगे जबकि अकबर दूसरे कमरे में प्रार्थना कर रहा था। संत फरीद ने उस कमरे में झांक कर देखना चाहा कि वहाँ क्या हो रहा है। वे यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि अकबर भगवान से अधिक शक्तिशाली सेना, धन से भरी तिजोरियाँ और युद्ध में विजय पाने की प्रार्थना कर रहा था। बादशाह को कुछ बोले बिना बाबा फरीद राज दरबार में लौट आए। अकबर अपनी प्रार्थना पूरी करने के पश्चात् जनता के दरबार में आया और उन्होंने संत फरीद के दर्शन किए। अकबर ने संत फरीद से पूछा कि क्या उन्हें किसी चीज की आवश्यकता है। संत फरीद ने उत्तर दिया, "मैं सम्राट से अपने आश्रम के लिए आवश्यक वस्तुएँ मांगने आया था किन्तु मैंने यह पाया कि बादशाह स्वयं भगवान से भीख मांग रहा है, तब फिर मैंने सोंचा कि उससे कुछ मांगने की अपेक्षा प्रत्यक्ष रूप से भगवान से ही क्यों न मांगूँ?" स्वर्ग के देवता केवल वही वरदान दे सकते हैं जो उन्हें भगवान की शक्तियों द्वारा प्राप्त होते हैं। संकीर्ण बुद्धि वाले लोग देवताओं की शरण में जाते हैं किन्तु ज्ञानी पुरुष यह समझते हैं कि इन से उनका मनोरथ सिद्ध नहीं हो सकता इसलिए वे अपनी अभिलाषाओं की पूर्ति हेतु भगवान की शरण ग्रहण करते हैं। विभिन्न प्रकार के लोगों की भिन्न-भिन्न अभिलाषाएँ होती हैं। श्रीकृष्ण अब आगे चार वर्णों के गुणों और कार्यों का उल्लेख करेंगे।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश: |
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् || 13||
मनुष्यों के गुणों और कर्मों के अनुसार मेरे द्वारा चार वर्णों की रचना की गयी है। यद्यपि मैं इस व्यवस्था का स्रष्टा हूँ किन्तु तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी मानो।
वेदों में लोगों के वर्ण के अनुसार उन्हें चार श्रेणियों में विभक्त किया गया है। यह वर्गीकरण उनके जन्म के अनुसार न होकर उनकी प्रकृति के अनुरूप किया गया है। वर्गों में यह विविध ता प्रत्येक समाज में होती है।
साम्यवादी राष्ट्रों में जहाँ समानता का सिद्धान्त प्रमुख है वहाँ भी मानव समाज में विभिन्नताओं को नकारा नहीं जा सकता। वहाँ कुछ ऐसे दार्शनिक हैं जो साम्यवादी दल के प्रमुख योजनाकार हैं। कुछ लोग सैनिक के रूप में अपने देश की रक्षा करते हैं। वहाँ किसान भी हैं जो खेती-बाड़ी करते हैं और वहाँ कारखानों में कार्य करने वाले कर्मचारी भी हैं।
वैदिक दर्शन में इन वर्णों का और अधिक वैज्ञानिक ढंग से वर्णन किया गया है। इनमें यह वर्णन मिलता है कि प्रकृति की शक्ति द्वारा तीन गुण निर्मित होते हैं-सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। ब्राह्मणों में सत्वगुण की प्रधानता होती है। वे विद्या और पूजा की ओर प्रवृत्त होते हैं। क्षत्रिय वे हैं जिनमें रजोगुण की प्रमुखता और कुछ मात्रा में सत्वगुण मिश्रित होता है। उनकी रुचि प्रशासन और प्रबंधन कार्यों में होती है। वैश्यों में रजोगुण और तमोगुण मिश्रित होते हैं। तदनुसार वे व्यावसायिक और कृषि संबंधी कार्य करते हैं। समाज में शूद्र लोग भी होते हैं। उनमें तमोगुण की प्रबलता होती हैं, इन्हें श्रमिक वर्ग कहा जाता है। इस वर्गीकरण का संबंध न तो जन्म से था और न ही यह अपरिवर्तनीय था।
श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में स्पष्ट किया है कि इस वर्णाश्रम व्यवस्था का वर्गीकरण लोगों के गुणों और कर्मों के अनुसार था। यद्यपि भगवान संसार के स्रष्टा हैं किन्तु फिर भी वे अकर्ता हैं। जैसे कि वर्षा का जल वनों में समान रूप से गिरता है किन्तु कुछ बीजों से बरगद के वृक्ष उगते हैं, कुछ बीजों से सुन्दर पुष्प खिलते हैं और कहीं पर कांटेदार झाड़ियाँ निकल आती हैं।
वर्षा बिना पक्षपात के जल प्रदान करती है अतः इस भिन्नता के लिए उत्तरदायी नहीं होती। इसी प्रकार से भगवान जीवात्माओं को कर्म करने के लिए शक्ति प्रदान करते हैं और जीव अपनी इच्छानुसार इसका प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं और भगवान उनके कर्मों के लिए उत्तरदायी नहीं होते।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा |
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते || 14||
न तो कर्म मुझे दूषित करते हैं और न ही मैं कर्म के फल की कामना करता हूँ जो मेरे इस स्वरूप को जानता है वह कभी कर्मफलों के बंधन में नहीं पड़ता।
भगवान पूर्ण विशुद्ध तत्त्व हैं और वे जो भी कर्म करते हैं वे शुद्ध और पवित्र हो जाते हैं। रामचरितमानस में वर्णन है
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं।
रबि पावक सुरसरि की नाईं।।
"सूर्य, अग्नि और गंगा जैसे विशुद्ध तत्त्व अशुद्ध सत्ता के संपर्क से भी विकारों से दूषित नहीं होते। सूर्य की रोशनी कीचड़ पर पड़ने से दूषित नहीं होती। सूर्य अपनी शुद्धता बनाए रखता है और साथ ही गंदे कीचड़ को भी शुद्ध कर देता है। उसी तरह यदि हम कोई अशुद्ध पदार्थ अग्नि में डालते हैं तो अग्नि की शुद्धता तो बनी रहती है तथा उसमें जो वस्तु डालते हैं वह भी अग्नि का रूप लेकर शुद्ध हो जाती है। इस प्रकार से अनेक बरसाती गटरों का गंदा पानी पवित्र गंगा में मिल जाता है किन्तु वह गंगा को गंदा नहीं कर सकता अपितु पवित्र गंगा इन गटरों के गंदे पानी को शुद्ध कर उसे भी पवित्र कर देती है। इसी प्रकार से भगवान अपने कर्मों का सम्पादन करने से दूषित नहीं होते।" जब फल भोगने की इच्छा से कर्म किए जाते हैं तब वे मनुष्य को कर्म की प्रतिक्रियाओं में बांधते हैं। भगवान के कर्म स्वार्थ से प्रेरित नहीं होते। उनके प्रत्येक कार्य जीव-मात्र पर करुणा करने के लिए होते हैं। इसलिए यद्यपि वे संसार पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शासन करते हैं और इस प्रक्रिया में सभी प्रकार के कार्यों में संलग्न रहते हैं लेकिन वे कर्मों की प्रतिक्रिया से दूषित नहीं होते। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे कर्मफल के चक्र से परे हैं। यहाँ तक कि भगवत् चेतना में लीन महापुरुष भी माया के प्रभाव से परे हो जाते हैं क्योंकि उनके सभी कार्य भगवान के प्रति प्रेम की भावना से युक्त होते हैं। ऐसे शुद्ध अन्तःकरण वाले संत कर्मों के बंधन में नहीं पड़ते। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है-
यत्पादपङ्कजपरागनिषेवतृप्ता योगप्रभावविधुताखिलकर्मबन्धाः।
स्वैरं चरन्ति मुनयोऽपि न नह्यमानास्तस्येच्छयाऽऽत्तवपुषः कुत एव बन्धः।
(श्रीमद्भागवतम्-10.33.35)
" भगवान के उन भक्तों को लौकिक कर्म कभी दूषित नहीं कर सकते जो भगवान के चरण कमलों की धूल पाकर संतुष्ट हो जाते हैं। लौकिक कर्म उन ज्ञानी संतों को दूषित नहीं करते जो योग शक्ति द्वारा कर्म के चक्र से मुक्ति पा लेते हैं। तब फिर ऐसे में यह प्रश्न ही कहाँ रह जाता है कि वे भगवान जो अपनी इच्छानुसार अपने अलौकिक स्वरूप में रहते हैं, कर्म के पाश में बंध सकते हैं?"
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभि: |
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वै: पूर्वतरं कृतम् || 15||
इस सत्य को जानकर प्राचीन काल में मुमुक्षुओं ने भी कर्म किए इसलिए तुम्हे भी उन मनीषियों के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
भगवान को पाने के अभिलाषी संत यद्यपि भौतिक सुखों की कामना से प्रेरित होकर कर्म नहीं करते फिर वे इस संसार में रहकर कर्म ही क्यों करते हैं? इसका कारण यह है कि वे भगवान की सेवा करना चाहते हैं और इसी प्रेरणा से वे भगवान के सुख के लिए ही कर्म करते हैं। पिछले श्लोक में प्रदत्त ज्ञान उन्हें आश्वस्त करता है कि वे उन कार्यों द्वारा कभी बंधन में नहीं बंध सकते जिन्हें श्रद्धा भक्ति की भावना से सम्पन्न किया जाता है। वे भगवत्च्चेतना से रहित सांसारिक बंधनों से दुःख प्राप्त कर रही जीवात्माओं के दुःखों को देखकर करुणा से भर जाते हैं और उनके आध्यात्मिक उत्थान के कार्य करने के लिए प्रेरित होते हैं। महात्मा बुद्ध ने एक बार कहा था, "ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् तुम्हारे पास दो विकल्प होते हैं या तो तुम कुछ मत करो या ज्ञान प्राप्ति हेतु अन्य लोगों की सहायता करो।" इस प्रकार से संत लोग जिनका कर्म करने में अपना कोई निहित स्वार्थ नहीं होता वे भी भगवान के सुख के लिए कर्म करते हैं। श्रद्धायुक्त भक्ति भाव से कर्म करने पर भगवान की दिव्य कृपा भी प्राप्त होती है। श्रीकृष्ण अर्जुन को यही उपदेश दे रहे हैं। अर्जुन को यह उपदेश देने के पश्चात् कि कर्म करने से कोई बंधन में नहीं पड़ता, अब भगवान श्रीकृष्ण कर्म के तत्त्वज्ञान की व्याख्या प्रारम्भ करते हैं।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता: |
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् || 16||
कर्म क्या है और अकर्म क्या है? इसका निर्धारण करने में बद्धिमान लोग भी विचलित हो जाते हैं अब मैं तुम्हें कर्म के रहस्य से अवगत कराऊँगा जिसे जानकर तुम सारे लौकिक बंधनों से मुक्त हो सकोगे।
कर्म के सिद्धान्तों को मानसिक संकल्पना द्वारा निर्धारित नहीं किया जा सकता। बुद्धिमान लोग भी धर्म ग्रंथों और ऋषि मुनियों द्वारा वर्णित विरोधाभासी तर्कों में उलझ कर विचलित हो जाते हैं। उदाहरणार्थ वेदों में अहिंसा की संस्तुति की गयी है। तदनुसार महाभारत के युद्ध में अर्जुन भी इसका पालन करना चाहता है और हिंसा से दूर रहना चाहता है किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं कि यहाँ इस युद्ध में उसे अपने धर्म का पालन करने के लिए हिंसा करनी पड़ेगी। यदि परिस्थितियों के साथ कर्त्तव्य परिवर्तित हो जाते हैं तब किसी विशेष परिस्थिति में व्यक्ति के लिए अपने कर्तव्य को निश्चित करना कठिन हो जाता है। इस संबंध में मृत्यु के देवता यमराज के कथन निम्न प्रकार से है
धर्मं तु साक्षाद्भगवत्प्रणीतं न
वै विदर्ऋषयो नापि देवाः ।
(श्रीमद्भागवतम्-6.3.19)
"उचित और अनुचित कर्म क्या है? महान् ऋषियों और स्वर्ग के देवता के लिए भी यह निर्धारण करना कठिन है। धर्म के संस्थापक स्वयं भगवान हैं और वे ही वास्तव में इसे जानते हैं।" भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि अब वे कर्मयोग और अकर्म के गूढ़ ज्ञान को प्रकट करेंगे जिसके द्वारा वह लौकिक बंधनों से मुक्त हो जाएगा।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण: |
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: || 17||
तुम्हें सभी तीन कर्मों-कर्म, विकर्म और अकर्म की प्रकृति को समझना चाहिए। इनके सत्य को समझना कठिन है।इनका ज्ञान गहन है।
श्रीकृष्ण ने कर्म को तीन श्रेणियों में विभक्त किया है। कर्म, वर्जित कर्म (विकर्म) और अकर्म।
कर्मः कर्म वे पवित्र कार्य हैं जिनकी धर्म ग्रंथों में इन्द्रियों को नियंत्रित करने और मन को शुद्ध करने हेतु संस्तुति की गयी है।
वर्जित कर्मः विकर्म अपवित्र कार्य हैं जिनका धर्म ग्रंथों में निषेध किया गया है क्योंकि ये हानिकारक होते हैं और इनके परिणामस्वरूप आत्मा का पतन होता है।
अकर्मः अकर्म ऐसे कर्म हैं जो फल की आसक्ति के बिना और भगवान के सुख के लिए किए जाते हैं। ना तो कर्मफल बनता है और न ही ये आत्मा को बंधन में डालते हैं।
कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य: |
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत् || 18||
वे मनुष्य जो अकर्म में कर्म और कर्म में अकर्म को देखते हैं, वे सभी मनुष्यों में बुद्धिमान होते हैं। सभी प्रकार के कर्मों में प्रवृत्त रहकर भी वे योगी कहलाते हैं और अपने सभी कर्मों में पारंगत होते हैं।
अकर्म में कर्मः एक प्रकार का अकर्म वह है जिसमें व्यक्ति अपने सामाजिक कर्त्तव्यों को बोझ समझते हुए एक आलसी की भांति उनका त्याग कर देता है। ऐसे लोग शारीरिक रूप से कर्म का त्याग तो करते हैं किन्तु उनका मन निरन्तर इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है। इस प्रकार के लोग अकर्मण्य तो प्रतीत होते हैं लेकिन उनकी कृत्रिम अकर्मण्यता वास्तव में पापमय कार्य है। जब अर्जुन अपने कर्तव्य पालन से संकोच करता है तब श्रीकृष्ण उसे बोध कराते हैं कि ऐसा करने से उसे पाप लगेगा और वह अपनी इस अकर्मण्यता के कारण मृत्यु के पश्चात् निम्नतर लोकों में जाएगा।
कर्म में अकर्मः कुछ दूसरे प्रकार के अकर्म भी होते हैं जो योगियों द्वारा सम्पन्न किए जाते हैं। वे बिना फल की आसक्ति के अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते हैं और अपने कर्मों के फलों को भगवान की सेवा में समर्पित करते हैं। यद्यपि वे सभी प्रकार के कर्म करते हैं किन्तु उनके कर्मफल नहीं भोगते क्योंकि उनका निजी सुख प्राप्त करने का मनोरथ नहीं होता। भारतीय इतिहास में ध्रुव, प्रह्लाद, युधिष्ठिर पृथु और अम्बरीष कई ऐसे महान राजा हुए हैं जिन्होंने अपनी पूर्ण योग्यता से अपने राजसी कर्त्तव्यों का निर्वहन किया और फिर भी उनका मन किसी प्रकार की लौकिक कामनाओं में लिप्त नहीं रहा। इसलिए उनके कार्यों को अकर्म कहा गया। अकर्म का एक अन्य नाम कर्मयोग भी है जिसकी विस्तृत चर्चा पिछले दो अध्यायों में की गयी है।
यस्य सर्वे समारम्भा: कामसङ्कल्पवर्जिता: |
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा: || 19||
जिन मनुष्यों के समस्त कर्म सांसारिक सुखों की कामना से रहित हैं तथा जिन्होंने अपने कर्म फलों को दिव्य ज्ञान की अग्नि में भस्म कर दिया है उन्हें आत्मज्ञानी संत बुद्धिमान कहते हैं।
आत्मा आनन्द के महासागर भगवान का अणु अंश है। माया से आच्छादित होने के कारण आत्मा स्वयं को शरीर समझ लेती है। इस अज्ञानता के कारण वह सांसारिक पदार्थों से सुख पाने के लिए कर्म करती है। चूँकि ये कर्म मानसिक सुखों और इन्द्रिय तृप्ति की कामना से प्रेरित होते हैं इसलिए ये आत्मा को कर्म फलों में लिप्त करते हैं। इसके विपरीत जब आत्मा दिव्य ज्ञान से प्रकाशित हो जाती है और यह अनुभव करती है कि वह भगवान की भक्ति से ही वास्तविक सुख प्राप्त कर सकती है न कि इन्द्रिय विषय भोगों से, तब वह भगवान के सुख के लिए सभी कर्म करने का प्रयास करती है। भगवद्गीता के नौवें अध्याय के 27वें श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है, "हे कुन्ती पुत्र! तुम जो कुछ करते हो, जो भी खाते हो, जो भी यज्ञ में अर्पित करते हो, जो भी दान के रूप में देते हो, जो तपस्या करते हो, वह सब मुझे अर्पित करते हुए करो" क्योंकि ऐसी प्रबुद्ध आत्मा लौकिक सुख पाने के लिए किए जाने वाले कर्मों को त्याग देती है और अपने सभी कर्म भगवान को अर्पित करती है। इस प्रकार से सम्पन्न किए गए कार्यों का कोई प्रतिफल नहीं होता। ऐसे कर्म दिव्य ज्ञान की अग्नि में भस्म हो जाते हैं।
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रय: |
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति स: || 20||
अपने कर्मों के फलों की आसक्ति को त्याग कर ऐसे ज्ञानीजन सदा संतुष्ट रहते हैं और बाह्य विषयों पर निर्भर नहीं होते। कर्मों में संलग्न रहने पर भी वे वास्तव में कोई कर्म नहीं करते।
बाह्य दृष्टि से कर्मों का वर्गीकरण नहीं किया जा सकता। कर्म और अकर्म क्या है, यह निर्धारित करना मन का कार्य है। ज्ञानी मनुष्यों का मन भगवान में तल्लीन रहता है। भगवान के साथ भक्ति भावना से युक्त होकर वे केवल भगवान को ही अपने आश्रयदाता के रूप में देखते हैं और संसार के आश्रयों पर निर्भर नहीं रहते। इस प्रकार की मन:स्थिति के कारण उनके प्रत्येक कर्म को अकर्म कहा जाता है। इस सत्य को समझने के लिए पुराण में एक सुन्दर कथा का वर्णन किया गया है। वृदावन की गोपियों ने एक बार उपवास रखा। उस उपवास को पूर्ण करने के लिए किसी ऋषि को भोजन खिलाना आवश्यक था। श्रीकृष्ण ने उन्हें महान ऋषि दुर्वासा को भोजन खिलाने का सुझाव दिया जो यमुना नदी के दूसरी ओर रहते थे, गोपियों ने स्वादिष्ट भोजन बनाया और दुर्वासा ऋषि को खिलाने के लिए निकल पड़ी किन्तु उस दिन नदी का बहाव बहुत तेज था और कोई भी नाविक उन्हें नदी पार कराने के लिए तैयार नहीं हुआ।
गोपियों ने जब श्रीकृष्ण से इसका समाधान पूछा तब उन्होंने उत्तर दिया-"तुम नदी से कहो कि यदि श्रीकृष्ण अखण्ड ब्रह्मचारी है तब वह उन्हें रास्ता दे।" गोपिया हँसने लगी क्योंकि वह जानती थीं कि श्रीकृष्ण प्रायः उन पर मोहित रहते हैं और इसलिए उनके अखण्ड ब्रह्मचारी होने का कोई प्रश्न नहीं था। लेकिन जब उन्होंने यमुना नदी से इस प्रकार की प्रार्थना की तब नदी ने पुष्पों का सेतु प्रकट कर उन्हें नदी पार जाने का मार्ग दे दिया। गोपियाँ आश्चर्यचकित रह गयीं। वे नदी पार कर दुर्वासा ऋषि के आश्रम पहुँची। उन्होंने दुर्वासा ऋषि से प्रार्थना की कि वह उनके स्वादिष्ट भोजन को ग्रहण करें। एक महान तपस्वी होने के कारण उन्होंने भोजन का कुछ अंश ही ग्रहण किया जिससे गोपियाँ निराश हो गयीं। दुर्वासा ने गोपियों की इच्छा को स्वीकार किया और उन्होंने अपनी योग शक्ति का प्रयोग कर गोपियों का सारा भोजन खा लिया। उन्हें सारा भोजन ग्रहण करते देख गोपियाँ अचम्भित हो गयीं किन्तु उन्हें इस बात की प्रसन्नता थी कि दुर्वासा ने उनके भोजन को ग्रहण करने की कृपा कर उनका मान बढ़ाया।
गोपियों ने अब ऋषि दुर्वासा से वापस नदी पार कराने के लिए सहायता करने को कहा। ऋषि दुर्वासा ने कहा कि "यमुना नदी से कहो कि यदि दुर्वासा ने आज तक केवल दूब के अतिरिक्त कुछ भी ग्रहण न किया हो तब वह उन्हें रास्ता दे" गोपियाँ पुनः हँसने लगी क्योंकि उन्होंने दुर्वासा को अपार भोजन खाते हुए देखा था किन्तु उन्हें तब अत्यंत आश्चर्य हुआ जब उन्होंने यमुना नदी से ऐसी प्रार्थना की और नदी ने पुनः उन्हें रास्ता दे दिया।
गोपियों ने श्रीकृष्ण से इस घटना का रहस्य पूछा तो उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान और संत बाह्य रूप से लौकिक कर्मों में व्यस्त दिखाई देते हैं किन्तु आन्तरिक दृष्टि से वे सदैव इन्द्रियातीत अवस्था में होते हैं इसलिए सभी प्रकार के कर्म करते हुए भी वे सदा अकर्त्ता माने जाते हैं। यद्यपि श्रीकृष्ण बाह्य रूप से गोपियों से प्रेम भाव से मिलते-जुलते थे किन्तु आन्तरिक रूप से अखण्ड ब्रह्मचारी थे। इसी प्रकार दुर्वासा ने गोपियों द्वारा अर्पित किया गया स्वादिष्ट भोजन खाया किन्तु आन्तरिक दृष्टि से उन्होंने मन से दूब का स्वाद ही चखा था। ये दोनों कर्म में अकर्म के सटीक उदाहरण हैं।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रह: |
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् || 21||
ऐसे ज्ञानीजन फल की आकांक्षाओं और ममत्व की भावना से मुक्त होकर अपने मन और बुद्धि को संयमित रखते हैं और शरीर से कर्म करते हुए भी कोई पाप अर्जित नहीं करते।
संसार में दुर्घटनावश घटित हिंसा को दण्डनीय अपराध नहीं माना जाता। यदि कोई अपने क्षेत्र में निर्धारित गति पर और ध्यानपूर्वक सामने देखते हुए कार चला रहा है और अचानक कोई व्यक्ति सामने से आकर कार से टकराकर मर जाता है तब न्यायिक कानून में इसे तब तक दोषपूर्ण अपराध नहीं माना जाएगा जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि कार चालक की उसे मारने की इच्छा थी। इसलिए मुख्यतः मानसिक इच्छा को ही महत्वपूर्ण समझा जाता है न कि कर्म के परिणाम को। समान रूप से तत्त्वदर्शी जो दिव्य चेतना से युक्त होकर कर्म करते हैं वे सभी प्रकार से पापों से मुक्त होते हैं क्योंकि उनका मन आसक्ति और स्वामित्व की भावना से रहित होता है और उनका प्रत्येक कार्य दिव्य भावना के साथ भगवान की प्रसन्नता के निमित्त होता है।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर: |
सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते || 22||
वे जो अपने आप स्वतः प्राप्त हो जाए उसमें संतुष्ट रहते हैं, ईर्ष्या और द्वैत भाव से मुक्त रहते हैं, वे सफलता और असफलता दोनों में संतुलित रहते हैं, जो सभी प्रकार के कार्य करते हुए कर्म के बंधन में नहीं पड़ते।
सिक्के के दो पहलुओं के समान भगवान द्वारा रचित सृष्टि में भी द्वैतता देखने को मिलती है। जैसे कि दिन और रात, मीठा और कड़वा, गर्मी और सर्दी, वर्षा और अकाल आदि। इसी प्रकार से गुलाब की झाड़ियों में सुन्दर फूल और कटीले कांटे भी पाए जाते हैं। जीवन में भी द्वैतता आती रहती है, जैसे-दुःख-सुख, जय और पराजय, यश-अपयश। भगवान राम ने भी अपनी दिव्य लीलाओं का प्रदर्शन करते हुए अयोध्या के राज्याभिषेक से एक दिन पूर्व वनवास प्रस्थान करने की आज्ञा को स्वीकार किया था। इस संसार में रहते हुए कोई भी द्वैतता को निष्प्रभावी कर सदा सकारात्मक अनुभव करने की आशा नहीं कर सकता। तब फिर हम अपने जीवन में आने वाले द्वन्दों का सफलतापूर्वक सामना करने में कैसे समर्थ हो सकते हैं? सभी परिस्थितियों में इन द्वैतताओं से ऊपर उठकर प्रत्येक अवस्था में स्थिर रहना सीखकर ही हम इन द्वैतताओं का समाधान कर सकते हैं। ऐसा तभी संभव हो सकता है, जब हम अपने कर्मों के फलों के प्रति विरक्ति की भावना को विकसित करते हैं और फल की लालसा किए बिना जीवन में केवल अपने कर्तव्यों के निर्वहन की ओर ध्यान देते हैं। जब हम भगवान के सुख के लिए कार्यों का निष्पादन करते हैं तब हम अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिणामों को भगवान की इच्छा के रूप में देखते हैं और हर्ष सहित दोनों को स्वीकार करते हैं।
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतस: |
यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते || 23||
वे सांसारिक मोह से मुक्त हो जाते हैं और उनकी बुद्धि दिव्य ज्ञान में स्थित हो जाती है क्योंकि वे अपने सभी कर्म यज्ञ के रूप में भगवान के लिए सम्पन्न करते हैं और इसलिए वे कर्मफलों से मुक्त रहते हैं।"
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने पिछले पाँच श्लोकों का सार प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारे सभी कर्म इस बोध के कारण भगवान को समर्पित होते हैं कि आत्मा परमात्मा की नित्य दास है। चैतन्य महाप्रभु ने भी कहा है:
जीवेर स्वरूप हय कृष्णेर नित्य दास।
(चैतन्य चरितामृत मध्यलीला 20.108)
"आत्मा स्वभाविक रूप से भगवान का दास है। वे जो इस ज्ञान को विकसित कर अपने सभी कर्म भगवान को समर्पित करते हैं वे अपने कर्मों की पापमयी प्रवृत्ति से मुक्त हो जाते हैं।" ऐसी पुण्य आत्माएँ कैसी दृष्टि विकसित करती हैं? श्रीकृष्ण इसकी व्याख्या अगले श्लोक में करेंगे।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् |
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना || 24||
जो मनुष्य पूर्णतया भगवत्च्चेतना में तल्लीन रहते हैं उनका हवन ब्रह्म है, हवन सामग्री ब्रह्म है और वह पात्र जिससे आहुति डाली जाती है वह ब्रह्म है, अर्पण कार्य ब्रह्म है और यज्ञ की अग्नि भी ब्रह्म है। ऐसे मनुष्य जो प्रत्येक वस्तु को भगवान के रूप में देखते हैं वे सहजता से उसे पा लेते हैं।
वास्तव में संसार के पदार्थ भगवान की माया शक्ति से निर्मित हैं। शक्ति और शक्तिमान दोनों एक भी है और उनमें भेद भी होता है। उदाहरणार्थ प्रकाश अग्नि की शक्ति है। इसे अग्नि से पृथक् माना जाता है क्योंकि यह उससे बाहर होता है किन्तु इसे अग्नि के एक अंश के रूप में भी समझा जाना चाहिए। क्योंकि जब सूर्य की किरणें खिड़की से हमारे कमरे में आती हैं तब लोग कहते हैं कि 'सूर्योदय हो गया।' यहाँ पर लोग सूर्य की किरणों को सूर्य के साथ जोड़ कर देखते हैं। शक्ति और शक्तिमान का एक-दूसरे से भेद होता है किन्तु फिर भी शक्ति उसका अंश होती है। आत्मा भगवान की शक्ति है। इस आध्यात्मिक शक्ति को जीव शक्ति कहा गया है। श्रीकृष्ण ने इसकी व्याख्या सातवें अध्याय के चौथे और पाँचवे श्लोक में की है। चैतन्य महाप्रभु ने कहा है:
जीवतत्त्व-शक्ति, कृष्णतत्त्व-शक्तिमान् ।
गीता-विष्णुपुराणादि ताहाते प्रमाण।।
(चैतन्य चरितामृत, आदि लीला-7.117)
"भगवान श्रीकृष्ण शक्तिमान हैं और आत्मा उनकी शक्ति है। इसका वर्णन भगवद्गीता और विष्णु पुराण में किया गया है।" इस प्रकार आत्मा और भगवान एक भी है और इनमें भेद भी है किंतु जिन मनुष्यों का मन भगवत्च्चेतना में लीन रहता है वे समस्त संसार को भगवान के साथ एकाकार हुए देखते हैं न कि उससे पृथक् रूप में। श्रीमद्भागवतम् में निम्न प्रकार से वर्णन किया गया है:
सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.2.45)
"जो मनुष्य सर्वत्र और सब मनुष्यों में भगवान को देखता है वह परम आध्यात्मवादी है" ऐसे उन्नत आध्यात्मवादी जिनका मन पूर्णतया भगवत् चेतना में तल्लीन होता है, वे यज्ञ के अनुष्ठान, यज्ञ के उद्देश्य, यज्ञ की सामग्री, यज्ञ की अग्नि और यज्ञ के कर्मकाण्ड सबको भगवान से अभिन्न समझते हैं। किस भावना से यज्ञ सम्पन्न किए जाने चाहिए? इसकी व्याख्या करने के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण अब लोगों द्वारा इस संसार में शुद्धिकरण के लिए संपन्न किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के यज्ञों का उल्लेख करेंगे।
दैवमेवापरे यज्ञं योगिन: पर्युपासते |
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति || 25||
कुछ योगी सांसारिक पदार्थों की आहुति देते हुए यज्ञ द्वारा देवताओं की पूजा करते हैं। अन्य लोग जो वास्तव में आराधना करते हैं वे परम सत्य ब्रह्मरूपी अग्नि में आत्माहुति देते हैं।
यज्ञ दिव्य चेतना से युक्त होकर भगवान को अर्पण की भावना से सम्पन्न करना चाहिए। किन्तु लोगों की मति में विविधता पायी जाती है। इसलिए वे सभा भिन्न-भिन्न प्रकार की चेतना के साथ यज्ञ करते हैं। अल्प ज्ञानी और भौतिक पदार्थों की लालसा करने वाले लोग स्वर्ग के देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करते हैं। अन्य प्रकार के मनुष्य यज्ञ के प्रयोजन को गहनता से समझते हुए यज्ञ में परमात्मा को आत्मतत्त्व की आहुति देते हैं। इसे आत्मसमर्पण या आत्माहुति या अपनी आत्मा भगवान को समर्पित कर देना कहा गया है। योगी श्रीकृष्ण प्रेम ने इसे अत्यंत सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है-"इस क्षण भंगुर संसार में जब कोई योगी दिव्य प्रेम की ज्वाला में आत्महुति डालता है तब वहाँ एक विस्फोट होता है जो कि भगवान की कृपा है क्योंकि सच्ची आत्माहुति कभी व्यर्थ नहीं जाती" लेकिन यज्ञ में किसी के लिए आत्म आहुति देने की प्रक्रिया क्या है? ऐसा केवल भगवान की पूर्ण शरणागति प्राप्त कर लेने पर ही होता है। ऐसी शरणागति के छः रूप होते हैं जिनकी व्याख्या अठारहवें अध्याय के 66वें श्लोक में की गयी है। यहाँ श्रीकृष्ण लोगों द्वारा किये जाने वाले विभिन्न प्रकार के यज्ञों की व्याख्या कर रहे हैं।
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति |
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति || 26||
कुछ योगीजन श्रवणादि क्रियाओं और अन्य इन्द्रियों को संयमरूपी यज्ञ की अग्नि में स्वाहा कर देते हैं और जबकि कुछ अन्य शब्दादि क्रियाओं और इन्द्रियों के अन्य विषयों को इन्द्रियों के अग्निरूपी यज्ञ में भेंट चढ़ा देते हैं।
अग्नि में जो भी पदार्थ डाला जाए वह उसका रूप परिवर्तित कर उसे अपना रूप दे देती है। बाह्य वैदिक यज्ञ के अनुष्ठानों में यज्ञ कुण्ड में डाली गयी आहूतियाँ भौतिक रूप में भस्म हो जाती हैं। आध्यात्मिकता के आंतरिक अभ्यास में अग्नि एक प्रतीकात्मक चिह्न है। आत्म संयम की अग्नि इन्द्रियों की कामनाओं को भस्म कर देती है।इस श्लोक में श्रीकृष्ण आत्मिक उत्थान की दो विरोधी पद्धतियों के बीच के अन्तर को स्पष्ट कर रहे हैं। इन दोनों में एक मार्ग इन्द्रियों का दमन करने से संबंधित है जिसका अभ्यास हठ योग में किया जाता है। इस प्रकार के यज्ञ में केवल शरीर के रख-रखाव को छोड़कर इन्द्रियों की समस्त क्रियाओं को स्थगित कर दिया जाता है और आत्मबल से मन को इन्द्रियों से पूर्णतया हटाकर अंतर्मुखी बनाया जाता है।
इसके विपरीत भक्ति योग का अभ्यास है। इस में इन्द्रियाँ सृष्टि में व्याप्त प्रत्येक अणु में उसके स्रष्टा भगवान की महिमा का अवलोकन करती हैं। इन्द्रियाँ लौकिक सुखों का साधन नहीं बनती अपितु इसके विपरीत वे परिष्कृत होकर सभी में भगवान की अनुभूति करती हैं। सातवें अध्याय के आठवें श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं, "रसो अहमत्सु कौन्तेय" अर्थात् 'हे अर्जुन!' मुझे जल के साररूप स्वाद के रूप में जानो। तदानुसार भक्ति मार्ग का अनुसरण करने वाले योगी अपनी समस्त इन्द्रियों द्वारा जो भी देखते, सुनते, आस्वादन करते तथा सूंघते हैं उन सब में वे भगवान को देखने का अभ्यास करते हैं। भक्ति का मार्ग हठयोग के मार्ग से सरल है और इसका अनुसरण करना आनन्ददायक है तथा इस मार्ग में पतन होने का जोखिम भी कम है। यदि कोई साइकिल चला रहा है और जब वह उसे ब्रेक लगाकर रोकता है तब वह अपना संतुलन खो देता है। यदि साइकिल चलाने वाला केवल हैंडल को दायें बायें घुमाता है तब आगे की दिशा में जा रही साइकिल सुगमता से रुक जाती है और साइकिल सवार संतुलन भी नहीं खोता।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे |
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते || 27||
दिव्य ज्ञान से प्रेरित होकर कुछ योगी संयमित मन की अग्नि में अपनी समस्त इन्द्रियों की क्रियाओं और प्राण शक्ति को भस्म कर देते हैं।
कुछ योगी ज्ञानयोग के मार्ग का अनुसरण करते हैं और ज्ञान की सहायता से अपनी इन्द्रियों को संसार से विरक्त कर लेते हैं। जबकि हठयोगी दृढ़ इच्छाशक्ति से इन्द्रियों को नियंत्रित करते हैं। ज्ञानमार्गी संसार के मिथ्यात्व के गहन चिन्तन में रत रहते हैं और स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार से पृथक् मानते हैं। वे इन्द्रियों को संसार से हटाकर मन को आत्म चिन्तन में लीन कर देते हैं। यह अवधारणा धारण कर कि 'आत्मा परम सत्य परमेश्वर के समान है' उनका लक्ष्य व्यावहारिक दृष्टि से इस प्रकार के आत्मज्ञान में स्थिर होने का होता है। सहायतार्थ वे इन मत्तों का उच्चारण करते हैं 'तत्त्वमसि' अर्थात् 'मैं वही हूँ' (छान्दोग्योपनिषद-6.8.7) और 'अहम् ब्रह्मास्मि' अर्थात् 'मैं परम सत्ता हूँ' (वृहदारण्यकोपनिषद-1.4.10)।
ज्ञानयोग के मार्ग का अनुसरण करना अत्यंत कठिन है जिसके लिए दृढ़ निश्चय और बुद्धि कौशल आवश्यक होता है।श्रीमद्भागवतम्-11.20.7 में वर्णन है-'निर्विण्णानां ज्ञानयोगो' ज्ञानयोग के अभ्यास में सफलता केवल उन मनुष्यों के लिए संभव है जो वैराग्य की उन्नत अवस्था प्राप्त कर चुके होते हैं
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे |
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतय: संशितव्रता: || 28||
कुछ लोग यज्ञ के रूप में अपनी सम्पत्ति को अर्पित करते हैं। कुछ अन्य लोग यज्ञ के रूप में कठोर तपस्या करते हैं और कुछ योग यज्ञ के रूप में अष्टांग योग का अभ्यास करते हैं और जबकि अन्य लोग यज्ञ के रूप में वैदिक ग्रंथों का अध्ययन और ज्ञान पोषित करते हैं जबकि कुछ कठोर प्रतिज्ञाएँ करते हैं।
सभी मनुष्य अपनी-अपनी प्रकृति, प्रेरणा, कर्मों, व्यवसाय, अभिलाषाओं और संस्कारों अर्थात् पूर्व जन्म की प्रवृत्ति के अनुसार एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बोध कराना चाहते हैं कि यज्ञ करने के सैकड़ों रूप हो सकते हैं किन्तु जब सभी प्रकार के यज्ञ भगवान को समर्पित करने के प्रयोजन से किए जाते हैं तब वे मन के शुद्धिकरण और आत्मा के उत्थान का साधन बन जाते हैं। इस श्लोक में उन्होंने तीन प्रकार के यज्ञों के अनुष्ठान का उल्लेख किया है-
द्रव्य यज्ञः इस संसार में कुछ लोगों की धन सम्पदा अर्जित करने में रुचि होती है और वे परमार्थ के प्रयोजन से दान पुण्य करते हैं। ऐसे लोग जटिल व्यवसाय और उद्यमों में संलग्न रहते हैं लेकिन उनका आंतरिक उद्देश्य अपने द्वारा अर्जित धन को भगवान की सेवा में अर्पित करना होता है। इस प्रकार से उनकी अभिलाषा भगवान की सेवा के लिए धन अर्जित करने की होती है। जॉन वेस्ली एक ब्रिटिश उपदेशक और मेथोडिस्ट चर्च के संस्थापक थे। उन्होंने अनुयायियों को यह उपदेश दिया-"जितना धन अर्जित कर सकते हो, करो, जितना बचा सकते हो, बचाओ और जितना दान दे सकते हो, दो।"
योग यज्ञः भारतीय दर्शन में योग दर्शन छः दर्शन शास्त्रों में से एक है। जैमिनि ऋषि ने 'मीमांसा दर्शन', वेदव्यास ने, 'वेदान्त दर्शन', गौतम ऋषि ने 'न्याय दर्शन' कणाद ऋषि ने वैशेषिक दर्शन और कपिल मुनि ने 'सांख्य दर्शन' का प्रवर्तन किया। पतंजलि ऋषि ने योग सूत्र की रचना की। योग दर्शन में पतंजलि ने आध्यात्मिक उन्नति के लिए योग के आठ अंगों का वर्णन किया जिसे अष्टांग योग कहा जाता है। यह पद्धति शारीरिक क्रियाओं से प्रारम्भ होकर मन पर विजय पाने के पर समाप्त होती है। कुछ लोग इस मार्ग को आकर्षक मानते हुए यज्ञ के रूप में इसका अभ्यास करते हैं। पतंजलि योग दर्शन में स्पष्ट वर्णित है-
समाधिासिद्धिरीश्वर प्रणिधानात्।। (पतंजलि योग दर्शन-2.45)
"योग में पूर्णता प्राप्त करने के लिए तुम्हें भगवान के शरणागत होना होगा" इसलिए जब मनुष्यों में भगवान से प्रेम करना सीखने के लिए अष्टांग योग में रुचि उत्पन्न होती है तब वे अपनी यौगिक क्रियाओं को यज्ञ रूपा भक्ति की अग्नि में आहुति देते हैं। इस यौगिक पद्धति का सुन्दर उदाहरण 'जगद्गुरु कृपालु योग' में मिलता है जिसमें अष्टांग योग की शारीरिक मुद्राओं का अभ्यास भगवान के यज्ञ के रूप में उनके दिव्य नामों के उच्चारण के साथ किया जाता है। इस प्रकार के अभ्यास के परिणामस्वरूप योगाभ्यास करने वाले की शारीरिक, मानसिक और आत्म शुद्धि होती है।
ज्ञान यज्ञः कुछ लोगों की रुचि ज्ञान का संवर्धन करने में होती है। ऐसी प्रवृत्ति वाले लोग अपना ज्ञान बढ़ाने और भगवान का दिव्य प्रेम पाने के लिए पूर्ण तन्मयता से धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते हैं। “सा विद्या तन्मतिर्यया" (श्रीमद्भागवतम्-4.29.49) अर्थात् “वास्तविक ज्ञान वह है जो भगवान में हमारी भक्ति को बढ़ाता है।" इस प्रकार से अध्ययनशील साधक जब ज्ञान यज्ञ में संलग्न रहते हैं तब फिर बाद में वे भक्ति रस में सराबोर होकर भगवान के प्रेमपूर्ण मिलन की ओर अग्रसर होते हैं।
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे |
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा: || 29||
अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुह्वति |
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषा: || 30||
कुछ अन्य लोग भी हैं जो बाहर छोड़े जाने वाली श्वास को अन्दर भरी जाने वाली श्वास में जबकि अन्य लोग अन्दर भरी जाने वाली श्वास को बाहरी श्वास में रोककर यज्ञ के रूप में अर्पित करते हैं। कुछ प्राणायाम की कठिन क्रियाओं द्वारा भीतरी और बाहरी श्वासों को रोककर प्राणवायु को नियंत्रित कर उसमें पूरी तरह से तल्लीन हो जाते हैं। कुछ योगी जन अल्प भोजन कर श्वासों को यज्ञ के रूप में प्राण शक्ति में अर्पित कर देते हैं। सब प्रकार के यज्ञों को संपन्न करने के परिणामस्वरूप साधक स्वयं को शुद्ध करते हैं।
कुछ लोग प्राणायाम के अभ्यास की ओर आकर्षित होते हैं जिसका सरल शब्दों में अर्थ 'प्राणों पर नियंत्रण है' इसमें निम्न क्रियाएँ सम्मिलित है-
पूरकः यह फेफड़ों में श्वास भरने की प्रक्रिया है।
रेचकः श्वास बाहर छोड़ते हुए फेफड़ों को खाली करने की प्रक्रिया।
अन्तर कुम्भकः फेफड़ों में श्वास भरने के पश्चात् उसे भीतर रोकना। इसमें बाहर छोड़ी जाने वाली श्वास को भीतर की श्वास में निरोधावस्था के दौरान पूर्णतया रोक दिया जाता है।
बाह्य कुम्भकः श्वास बाहर छोड़ते हुए फेफड़ों को खाली करना। इसमें अन्दर भरी जाने वाली श्वास को बाहर छोड़ी जाने वाली श्वास में स्थगित अवधि के दौरान पूर्णतया रोक दिया जाता है।
दोनों कुम्भक क्रियाएँ जटिल हैं और इनका अभ्यास योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में करना चाहिए अन्यथा शरीर को क्षति पहुंच सकती है। प्राणायाम का अभ्यास करने वाले योगी श्वासों को नियंत्रित करने की प्रक्रिया का प्रयोग इन्द्रियों पर अंकुश लगाने और मन को स्थिर करने के लिए करते हैं। फिर वे अपने संयमित मन को यज्ञ की आहुति के रूप में भगवान को अर्पित कर देते हैं।
प्राण वास्तव में श्वास नहीं है। यह सूक्ष्म जीवनदायिनी शक्ति है जो कि विभिन्न चेतन व अचेतन पदार्थों में व्याप्त होती है। वैदिक ग्रंथों में पाँच प्रकार के प्राणों का वर्णन किया गया है-प्राण, पान, व्यान, समान और उदान जो विभिन्न प्रकार से भौतिक शरीर के कार्यों के संचालन में सहायता करते हैं। इनमें से समान शरीर की पाचन क्रिया के कार्य को निभाता है। कुछ लोगों में उपवास रखने की प्रवृत्ति भी होती है। कुछ लोग यह जानकर कि आहार का सबके चरित्र और स्वभाव पर प्रभाव पड़ता है अल्प मात्रा में भोजन करने लगते हैं। ऐसे उपवास भारत में प्राचीनकाल से किए जा रहे हैं और यहाँ इन्हें यज्ञ के रूप में स्वीकार किया गया है। जब कम मात्रा में आहार का सेवन किया जाता है तब इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं और 'समान' जो पाचन शक्ति के लिए उत्तरदायी होता है, स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है। इस प्रकार से यह कुछ लोगों द्वारा किये जाने वाले यज्ञों के स्वरूप हैं। लोग मन की शुद्धि के लिए विभिन्न प्रकार के ऐसे कठोर तप करते हैं। यह इन्द्रियों और मन के तुष्टिकरण की अभिलाषा है जो अन्त:करण को अशुद्ध करती है। इन सभी कठोर तपस्याओं का उद्देश्य इन्द्रियों और मन की सांसारिक पदार्थों से सुख पाने की स्वभाविक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना होता है। जब ये तपस्याएँ भगवान के समर्पण के रूप में की जाती है तब इसके परिणामस्वरूप अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। पहले किए गए उल्लेखानुसार अन्त:करण शब्द का प्रयोग प्रायः मन और बुद्धि के लिए किया जाता है।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् |
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्य: कुरुसत्तम || 31||
इन यज्ञों का रहस्य जानने वाले और इनका अनुष्ठान करने वाले, इन यज्ञों के अमृततुल्य अवशिष्टांश का आस्वादन कर परम सत्य की ओर बढ़ते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ! जो लोग यज्ञ नहीं करते, वे न तो इस संसार में और न ही अगले जन्म में सुखी रह सकते हैं।
जैसा पहले उल्लेख किया गया है, यज्ञों का अनुष्ठान भगवान को प्रसन्न करने के लिए किया जाना चाहिए और इनसे प्राप्त होने वाले अवशेषों को उनका प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए। उदाहरणार्थ भगवान के भक्तगण भगवान को भोग लगाने के पश्चात् भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन पकाने के पश्चात् उसे भगवान की प्रतिमा के सामने रखकर भगवान को इसे स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं। अपने मन में यह भावना धारण कर कि भगवान उनकी थाली से भोजन ग्रहण कर रहे हैं फिर वे उस थाली के अवशेषों को प्रसाद या भगवान की कृपा के रूप में सेवन करते हैं। इस प्रसाद रूपी अमृत का आस्वादन करने से ज्ञान की प्राप्ति, मन की शुद्धि और आत्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
इसी तरह कुछ भक्त भगवान को वस्त्र अर्पित करने के पश्चात् उन्हें उनका प्रसाद मानकर उसे पहनते हैं। वे अपने घर में भगवान की मूर्ति स्थापित करते हैं और इस मनोभावना के साथ घर में निवास करते हैं कि उनका घर भगवान का मन्दिर है। जब सभी पदार्थ और कार्य भगवान को अर्पित किए जाते हैं तब उनके अवशेष या प्रसाद जीवात्मा के लिए अमृत रूपी वरदान बन जाते हैं।
परम भक्त उद्धव ने श्रीकृष्ण से कहा था
त्वयोपभुक्तस्रग्गन्धवासोऽलङ्कारचर्चिताः।
उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेमहि ।
(श्रीमद्भागवतम्-11.6.46)
"मैं केवल वही खाऊँगा, सूचूंगा, पहनँगा, वहीं रहँगा और वही करूँगा जो पहले आपको अर्पित किया गया हो। इस प्रकार अवशेषों को आपका प्रसाद मानकर उनका सेवन कर मैं माया पर सुगमता से विजय प्राप्त कर लूंगा।" वे लोग जो यज्ञ नहीं करते, वे कर्मों के प्रतिफल से बंध जाते हैं और निरन्तर माया द्वारा प्रताड़ित होते रहते हैं।
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे |
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे || 32||
विभिन्न प्रकार के इन सभी यज्ञों का वर्णन वेदों में किया गया है और इन्हें विभिन्न कर्मों की उत्पत्ति का रूप मानो, यह ज्ञान तुम्हें माया के बंधन से मुक्त करेगा।
वेदों की एक सुन्दर विशेषता यह है कि वे मनुष्यों की विभिन्न प्रकार की प्रवृत्तियों से परिचित हैं और उसी के अनुसार उनके पालन की व्यवस्था करते हैं। इसलिए विभिन्न प्रकार की रुचि रखने वाले साधकों के लिए वेदों में विभिन्न प्रकार के यज्ञों और उनका अनुष्ठान करने की विधियों का वर्णन किया गया है। इनमें निहित सामान्य सिद्धान्त यह है कि यज्ञ का अनुपालन भक्ति के साथ भगवान को अर्पण के रूप में किया जाना चाहिए। इस ज्ञान द्वारा किसी को वेदों में वर्णित विविध उपदेशों के कारण किंकर्तव्यमूढ़ नहीं होना चाहिए। अपनी प्रकृति के अनुकूल किसी एक विशेष यज्ञ का अनुपालन करने से मनुष्य लौकिक बंधनों से मुक्त हो सकता है।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञ: परन्तप |
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते || 33||
हे शत्रुओं के दमन कर्ता! ज्ञान युक्त होकर किया गया यज्ञ किसी प्रकार के भौतिक या द्रव्य यज्ञ से श्रेष्ठ है। हे पार्थ! अंततः सभी यज्ञों की परिणति दिव्य ज्ञान में होती है।
श्रीकृष्ण अब पहले वर्णित यज्ञों को हमारे समक्ष पुनः रख रहे हैं। वे अर्जुन को बताते हैं कि शारीरिक क्रियाओं द्वारा भगवान की भक्ति करना उत्तम है किन्तु सर्वोत्तम नहीं है। कर्मकाण्ड, उपवास, मंत्र उच्चारण, तीर्थ का दर्शन आदि सभी उत्तम कार्य हैं किन्तु अगर इनका संयोग ज्ञान के साथ नहीं किया जाता तब ये केवल शारीरिक गतिविधियों तक ही सीमित रह जाते हैं। फिर भी ये शारीरिक गतिविधियाँ कुछ न करने से तो अच्छी होती हैं, किन्तु मन को शुद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं होती। कई लोगों का यह विश्वास है कि शारीरिक रूप से सम्पन्न किए गए धार्मिक अनुष्ठान ही उन्हें माया के बंधनों से मुक्त करवाने के लिए पर्याप्त हैं इसलिए वे माला फेर कर भगवान के नाम का जाप करते हैं, एकांत में बैठकर धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हैं, तीर्थ स्थानों की यात्रा करते हैं और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। किन्तु संत कबीर ने अति वाक्पटुता से इस विचार का निम्न प्रकार से खण्डन किया है-
माला फेरत युग फिरा, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि के, मन का मनका फेर ।।
"हे आध्यात्मिक साधक तुम कई युगों से माला के मनके फेर रहे हो किन्तु तुम्हारे मन से छल कपट गया नहीं इसलिए इन माला के मनके फेरना छोड़कर मन के मनके को फेरो।" जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं-
बंधन और मोक्ष का, कारण मनहिं बखान।
याते कौनिउ भक्ति करु, करु मन ते हरिध्यान ।।
(भक्ति शतक-19)
"मन ही मोक्ष और बंधन का कारण है। तुम जिस भी रूप से भक्ति करो, किन्तु मन को भगवान के स्मरण में लगाओ।" भक्ति भावना ज्ञान के संवर्धन से पोषित होती है। उदाहरणार्थ आज आपके जन्मदिन के उपलक्ष्य में भोज का आयोजन किया गया है। लोग आपको शुभकामनाओं सहित उपहार आदि भेंट कर रहे हैं। कोई आकर आपको फटा-पुराना बैग देता है। आप इसे हेय दृष्टि से देखते हुए अन्य उपहारों के साथ उसकी तुलना करने लगते हैं, तभी वह व्यक्ति आपसे बैग के अन्दर देखने का आग्रह करता है। उसे खोलने पर आप उसमें 100 रुपये के 100 नोट पाते हैं और आप तुरन्त उस बैग को अपनी छाती से चिपटाकर कहते हैं-"मुझे यही सबसे उत्तम उपहार प्राप्त हुआ है।" पदार्थ का ज्ञान होने पर वस्तु से प्रेम हो जाता है। उसी तरह भगवान के विषय में जानना उनके साथ हमारे भक्ति की भावनाओं को पुष्ट करता है। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि ज्ञान के साथ किया गया यज्ञ द्रव्य यज्ञ से अधिक श्रेष्ठ है। अब वे ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया का उल्लेख करेंगे।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया |
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन: || 34||
आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर सत्य को जानो। विनम्र होकर उनसे ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा प्रकट करते हुए ज्ञान प्राप्त करो और उनकी सेवा करो। ऐसा सिद्ध सन्त तुम्हें दिव्य ज्ञान प्रदान कर सकता है क्योंकि वह परम सत्य की अनुभूति कर चुका होता है।
यह जानकर कि ज्ञान युक्त होकर यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि हम आध्यात्मिक ज्ञान कैसे प्राप्त करें। श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में इसका उत्तर दिया है। वे कहते हैं-(1) प्रामाणिक गुरु की शरण में जाओ, (2) विनम्रतापूर्वक उनसे ज्ञान प्राप्त करो, (3) उनकी सेवा करो। हम केवल अपने चिन्तन से परम सत्य को नहीं समझ सकते। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है-
अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम् ।
स्वतो न सम्भवादन्यस्तत्त्वज्ञो ज्ञानदो भवेत् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.22.10)
"जीवात्मा की बुद्धि अनन्तकाल से अज्ञानता से आच्छादित है। अज्ञान से ढकी होने के कारण बुद्धि केवल अपने प्रयासों से स्वयं अज्ञानता पर विजय नहीं प्राप्त कर सकती। परम सत्य को जानने के लिए सभी को श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ संत से ज्ञान प्राप्त करना पड़ता है जो परम सत्य को जानता है।" वैदिक ग्रंथों में बार-बार आध्यात्मिक पथ पर चलने के लिए गुरु के महत्व का वर्णन किया गया है।
आचार्यवान् पुरुषो वेदः। (छान्दोग्योपनिषद्-6.14.2)
"केवल गुरु के माध्यम से ही तुम वेदों का ज्ञान प्राप्त कर सकते हो" पंचदशी में वर्णन हैं
तत्पादाम्बुरु हद्वन्द्व सेवा-निर्मल-चेतसाम्।
सुखबोधाय तत्त्वस्य विवेकोऽयं विधीयते ।। (पंचदशी-1.2)
"शुद्ध हृदय से गुरु की सेवा करो और अपने संदेहों का निवारण करो। तब तुम्हें वह परम आनन्द प्रदान करते हुए शास्त्रों का ज्ञान देगा।" जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने भी कहा है: “यावत् गुरुर्न कर्तव्यो तावन्मुक्तिर्न लभ्यते" अर्थात् “जब तक तुम गुरु की शरणागति प्राप्त नहीं करोगे तब तक तुम माया शक्ति से मुक्त नहीं हो सकते।"
भगवान की एक कृपा यह है कि वे जीवात्मा का सच्चे संत से मेल कराते हैं। लेकिन एक गुरु द्वारा शिष्य को आध्यात्मिक ज्ञान देने की प्रक्रिया लौकिक ज्ञान प्रदान करने से अत्यंत भिन्न होती है। लौकिक शिक्षा पाने के लिए गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा रखना आवश्यक नहीं होता। ऐसे ज्ञान की प्राप्ति शिक्षकों को शिक्षा शुल्क देकर ली जा सकती है। जबकि अध्यात्मिक शिक्षा इरन पद्धति द्वारा शिष्य को प्रदान नहीं की जा सकती और न ही इसे मूल्य चुका कर लिया जा सकता है। यह ज्ञान गुरु की कृपा से शिष्य के अंतःकरण में तब प्रकट होता है जब शिष्य में दीनता का भाव विकसित होता है और जब गुरु शिष्य के सेवा भाव से प्रसन्न होता है। इसी कारण से प्रह्लाद महाराज ने कहा-
नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाघ्रिं स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः।
महीयसां पादरजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानांन वृणीत यावत् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-7.5.32)
"जब तक हम भगवान के प्रेमी संतों के चरणों की धूल में स्नान नहीं कर लेते तब तक हमें लोकातीत विषयों का ज्ञान नहीं हो सकता" इसलिए इस श्लोक में श्रीकृष्ण श्रद्धा युक्त होकर गुरु की शरण में जाने और उनसे परम सत्य जानने की जिज्ञासा प्रकट कर दीन भाव से उनकी सेवा करने और उन्हें प्रसन्न करने की अनिवार्यता का उल्लेख कर रहे हैं।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव |
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि || 35||
इस मार्ग का अनुसरण कर और गुरु से ज्ञान को प्राप्त करने पर, हे अर्जुन! तुम कभी मोह में नहीं पड़ोगे क्योंकि इस ज्ञान के प्रकाश में तुम यह देख सकोगे कि सभी जीव परमात्मा के अंश हैं और वे सब मुझमें स्थित हैं।
जिस प्रकार अंधकार सूर्य को छिपा नहीं सकता ठीक उसी प्रकार से वे जीवात्माएँ जो एक बार ज्ञानोदय की अवस्था प्राप्त कर लेती हैं उन पर मोह फिर कभी हावी नहीं हो सकता। “तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः" अर्थात् “वे जो भगवत्प्राप्ति कर चुके हैं, सदैव भगवच्चेतना में लीन रहते हैं।" माया के कारण हम संसार को भगवान से भिन्न देखते हैं और यह देखते हुए कि क्या अन्य लोग हमें सुख देते हैं या हमें क्षति पहुंचाते हैं, इसी आधार पर हम अन्य लोगों के साथ मित्रता या शत्रुता रखते हैं। भगवत्प्राप्ति के बाद प्राप्त होने वाला दिव्यज्ञान संसार के प्रति हमारे विचार को परिवर्तित कर देता है। इस अवस्था को प्राप्त संत संसार को भगवान की शक्ति के रूप में देखते हैं और उन्हें जो प्राप्त होता है उसका उपयोग वे भगवान की सेवा के लिए करते हैं। वे समस्त जीवों को भगवान के अंश के रूप में देखते हैं और सबके प्रति दिव्य मनोभावना रखते हैं। इसलिए राम भक्त हनुमान कहते हैं-
सिया राममय सब जग जानी।
करउँ प्रणाम जोरि जुग पानी।।
(रामचरितमानस)
"मैं सब प्राणियों में भगवान राम और सीता का रूप देखता हूँ और इसलिए मैं दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम करते हुए सबका आदर करता हूँ।
अपि चेदसि पापेभ्य: सर्वेभ्य: पापकृत्तम: |
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि || 36||
जिन्हें समस्त पापियों में महापापी समझा जाता है, वे भी दिव्यज्ञान की नौका में बैठकर संसार रूपी सागर को पार करने में समर्थ हो सकते हैं।
मायाबद्ध संसार गहरे समुद्र की भांति है जिसमें मनुष्य जन्म, रोग, बुढ़ापा और मृत्युरूपी लहरों द्वारा इधर-उधर हचकोले खाता रहता है। माया शक्ति के कारण सभी को तीन प्रकार के दुख सहने पड़ते हैं-
1. आध्यात्मिक दुःख मनुष्य के अपने शारीरिक और मानसिक कष्ट, 2. आधिभौतिक दुःख अन्य लोगों द्वारा दिए जाने वाले दुःख और कष्ट, 3. आधिदैविक दुःख प्राकृतिक आपदाओं के कारण उत्पन्न दुःख। माया के बंधनों में आत्मा को कभी विश्राम नहीं मिलता और ऐसी दुःखद अवस्था में रहते हुए हमारे अनन्त जन्म व्यतीत हो चुके हैं। खेल के मैदान में ठोकर खाकर लुढ़कती हुई फुटबॉल की भांति आत्मा अपने पाप और पुण्य कर्मों के अनुसार कभी स्वर्ग लोक में जाती है और फिर नरक के निम्न लोकों में भेजी जाती है और पुनः पृथ्वी पर लौट आती है। दिव्य ज्ञान मायारूपी सागर को पार करने के लिए नौका प्रदान करता है। अज्ञानी लोग कर्म करते हैं और कर्म बंधन में फंस जाते हैं। जब इन्हीं कर्मों का सम्पादन भगवान के प्रति यज्ञ के रूप में किया जाता है तब यह ज्ञानियों को बंधन मुक्त कर देता है। इस प्रकार का ज्ञान सांसारिक बंधन को काटने का साधन बन जाता है। कठोपनिषद् में वर्णन है-
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः।
सोऽध्वनः परमाप्नेती ति तद्विष्णोः परमं पदम्।।
(कठोपनिषद्-1.3.9)
"दिव्य ज्ञान के द्वारा अपनी बुद्धि को प्रकाशित करो और फिर प्रकाशित बुद्धि द्वारा अनियंत्रित मन को वश में करके संसार रूपी महासागर को पार करो और भगवान के धाम में प्रवेश करो।"
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन |
ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा || 37||
जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि लकड़ी को स्वाहा कर देती है उसी प्रकार से हे अर्जुन! ज्ञान रूपी अग्नि भौतिक कर्मों से प्राप्त होने वाले समस्त फलों को भस्म कर देती है।
अग्नि की छोटी-सी चिंगारी भी भयंकर आग का रूप धारण कर वस्तुओं के बड़े ढेर को जला देती है। 1666 ई. में लंदन में लगी भीषण आग एक बेकरी से आई छोटी-सी चिंगारी से भड़की थी और उसकी चपेट में आकर 13,200 मकान, 87 चर्च और कई कार्यालय जलकर राख हो गये थे। हम सब अनंत जन्मों के संचित कर्मों की गठरी को अपने साथ उठाए रहते हैं। यदि हम कर्मों के फलों को भोगकर इन्हें समाप्त करने का प्रयास करते हैं तब इसमें कई जन्मों का समय लगेगा और इस दौरान हमारे और कर्मों के संचित होने की प्रक्रिया चलती रहेगी लेकिन श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि ज्ञान में वह शक्ति होती है कि वह इस जन्म में ही हमारे संचित कर्मों की गठरी को भस्म कर सकता है क्योंकि आत्मबोध और भगवान के साथ इसके संबंध का ज्ञान हमें भगवान की शरणागति की ओर ले जाता है। जब हम भगवान की शरणागति प्राप्त करते हैं तब वे हमारे अनंतकाल के संचित कर्मों को भस्म कर देते हैं और हमें लौकिक बंधनों से मुक्त कर देते हैं।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते |
तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति || 38||
इस संसार में दिव्यज्ञान के समान कुछ भी शुद्ध नहीं है। जो मनुष्य योग के अभ्यास द्वारा मन को शुद्ध कर लेता है वह हृदय में इस ज्ञान को प्राप्त करता है।
ज्ञान में मन को शुद्ध करने, मनुष्य को ऊपर उठाने, मुक्त करने और भगवान के साथ एकीकृत की शक्ति होती है इसलिए यह उदात्त और शुद्ध होता है किन्तु ज्ञान को दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है-सैद्धान्तिक ज्ञान और व्यवहारिक ज्ञान।
एक प्रकार का ज्ञान वह है जिसे हम धार्मिक ग्रंथों को पढ़कर और गुरु से श्रवण कर प्राप्त करते हैं। इस प्रकार का सैद्धान्तिक ज्ञान अपूर्ण होता है। यह उसी प्रकार का ज्ञान है जैसे किसी ने व्यंजन बनाने की पुस्तक का स्मरण कर लिया हो किन्तु स्वयं कभी रसोई में प्रवेश न किया हो। इस प्रकार के सैद्धान्तिक ज्ञान से भूखे की क्षुधा को शांत नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार जब कोई मनुष्य आत्मा, भगवान, माया, कर्म, ज्ञान और भक्ति से संबंधित विषयों पर गुरु से सैद्धान्तिक ज्ञान अर्जित करता है, वो केवल इस ज्ञान से किसी को भगवत्प्राप्ति नहीं होती।
जब कोई मनुष्य साधना का अभ्यास करता है तब इसके परिणामस्वरूप अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, और फिर मनुष्य आत्मा की प्रकृति और भगवान के साथ इसके संबंध की अनुभूति करता है।
ऋषि पतंजलि ने इस प्रकार से कहा है-
श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ।।
(योग दर्शन-1.49)
"भक्ति योग के अभ्यास द्वारा आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना धार्मिक ग्रंथों के सैद्धान्तिक ज्ञान से श्रेष्ठ है।" ऐसे अनुभूत ज्ञान की श्रीकृष्ण ने प्रशंसा की है।
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: |
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || 39||
वे जिनकी श्रद्धा अगाध है और जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है, वे दिव्य ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। इस दिव्य ज्ञान के द्वारा वे शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त कर लेते हैं।
श्रीकृष्ण अब श्रद्धा के स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। सभी आध्यात्मिक सत्यों का शीघ्र अनुभव नहीं किया जा सकता। इनमें से कुछ को इस मार्ग में अत्यधिक रूप से उन्नत होने पर अनुभव किया जा सकता है। यदि हम केवल उसे स्वीकार करते हैं जिसे हम वर्तमान में परख और समझ सकते हैं तब हम उच्चतम आध्यात्मिक रहस्यों से वंचित हो जाएंगे। जिसे हम वर्तमान में समझ नहीं पा रहे हैं उसे समझने और स्वीकार करने में श्रद्धा हमारी सहायता करती है। जगद्गुरु शंकराचार्य ने श्रद्धा की परिभाषा इस प्रकार से की है-
गुरु वेदान्त वाक्येषु दृढो विश्वासः श्रद्धा।
"श्रद्धा का अर्थ गुरु और शास्त्रों के शब्दों में दृढ़ विश्वास होना है।" यदि ऐसी श्रद्धा किसी ढोंगी व्यक्ति पर रखी जाती है तब इसके विध्वंसात्मक परिणाम होते हैं। जब यह वास्तविक गुरु में होती है तब इससे आत्मकल्याण का मार्ग खुलता है। किन्तु इसके लिए अंध विश्वास वांछनीय नहीं है। हरि-गुरु के प्रति श्रद्धा रखने से पूर्व हमें अपनी बुद्धि का प्रयोग कर यह पुष्टि करनी चाहिए कि हमारे गुरु ने परम सत्य का अनुभव किया है या नहीं और क्या वह वैदिक ग्रंथों का ज्ञान रखते हैं? एक बार जब इसकी पुष्टि हो जाये तब हमें ऐसे गुरु के प्रति शरणागत हो जाना चाहिए और उसके मार्गदर्शन में भगवान की भक्ति करना चाहिए। श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णित है-
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.23)
"वैदिक ज्ञान का प्रकाश उन्हीं मनुष्यों के हृदय में प्रकट होता है जिनकी भगवान और गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा होती है।"
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति |
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन: || 40||
किन्त जिन अज्ञानी लोगों में न तो श्रद्धा और न ही ज्ञान है और जो संदेहास्पद प्रकृति के होते हैं उनका पतन होता है। संशययुक्त जीवात्मा के लिए न तो इस लोक में और न ही परलोक में सुख है।
भक्ति रसामृत सिंधु में साधकों को उनकी श्रद्धा और ज्ञान की योग्यता के आधार पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।
शास्त्र-युक्तौ च निपुण:सर्वथा दृढनिश्चयः।
प्रौढश्रद्धोऽधिकारी यःस भक्तावुत्तमो मतः।।
यः शास्त्रादिष्वपुणः श्रद्धावान् स तु मध्यमः।।
यो भवेत् कोमलश्रद्धः स कनिष्ठो निगद्यते।।
(भक्ति रसामृत सिंधु-1.2.17.19)
"उच्चतम श्रेणी का साधक वह होता है जिसे शास्त्रयुक्ति में निपुणता और जो पूर्ण श्रद्धायुक्त होता है। मध्यम श्रेणी का साधक वह है जिसे धार्मिक ग्रंथों का ज्ञान नहीं होता किन्तु वह भगवान और गुरु के प्रति श्रद्धायुक्त होता है। निम्न श्रेणी का साधक न तो धार्मिक ग्रंथों के ज्ञान से सम्पन्न होता है और न ही उसमें श्रद्धा भावना होती है।" इस तीसरी श्रेणी के साधक के लिए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे साधक को न तो इस जन्म में और न ही अगले जन्मों में शांति प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त सांसारिक कार्यों में भी विश्वास परम आवश्यक है।
उदाहरणार्थ अगर कोई महिला रेस्टोरेन्ट में जाती है और खाने का आर्डर देती है तो उसे यह विश्वास होता है कि रेस्टोरेंट के कर्मचारी उसके भोजन में विष नहीं मिलाएंगे। फिर भी वह यदि संदेहयुक्त होकर सभी खाद्य पदार्थों की जांच करवाने लगे, तो क्या वह भोजन का आनन्द ले सकती है? इसी प्रकार जब कोई व्यक्ति नाई की दुकान में कुर्सी पर बैठता है और जब नाई तेज धार वाले उस्तरे को उसके गले पर रखता है तब ऐसे में यदि वह व्यक्ति यह संदेह करने लगे कि कहीं यह नाई मेरी हत्या तो नहीं करना चाहता तब ऐसी स्थिति में वह नाई की दुकान में सहजतापूर्वक बैठकर नाई को शेव नहीं करने देगा। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि संदेही व्यक्ति को न तो इस संसार में और न ही परलोक में सुख मिल सकता है।
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् |
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय || 41||
हे अर्जुन! जिन्होंने योग की अग्नि में कर्मों को विनष्ट कर दिया है और ज्ञान द्वारा जिनके समस्त संशय दूर हो चुके हैं। कर्म उन लोगों को बंधन में नहीं डाल सकते। वे वास्तव में आत्मज्ञान में स्थित हो जाते हैं।
'कर्म' का अर्थ विधि-विधान और सामाजिक दायित्वों का पालन करने संबंधी क्रियाएँ हैं। 'संन्यास' का अर्थ 'परित्याग' है, जबकि 'योग' का अर्थ 'भगवान में एकीकृत' होना है। यहाँ श्रीकृष्ण ने 'योगसंन्यस्तकर्माणं ' शब्द का प्रयोग उन मनुष्यों के लिए किया है जो सभी वैदिक कर्मों का परित्याग कर देते हैं और अपने शरीर, मन और आत्मा को भगवान की भक्ति में लीन कर देते हैं। ऐसे महापुरुष अपना प्रत्येक कार्य भगवान की सेवा के लिए करते हैं।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि समर्पण की भावना से किए गए उनके कार्य उन्हें माया के बंधन में नहीं बाँधते। केवल वे लोग कर्म के बंधनों में फंसते हैं जो अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति हेतु कार्य करते हैं। जब भगवान के सुख के लिए कार्य किया जाता है तो ऐसे सभी कर्म प्रतिफलों से रहित हो जाते हैं। वे शून्य में अन्य संख्या को गुणा करने के समान होते हैं। यदि हम शून्य को 10 से गुणा करते हैं तो इसका परिणाम शून्य ही होगा। शून्य को 1000 से गुणा करने का परिणाम भी शून्य होता है और शून्य को 100000 से गुणा करने पर भी परिणाम वही शून्य ही रहता है। समान रूप से महापुरुषों द्वारा संसार में किए गए कार्य उन्हें बंधन में नहीं डालते, क्योंकि उन कर्मों को भगवान को अर्पित कर दिया जाता है अर्थात् इनका सम्पादन भगवान के सुख के लिए किया जाता है। इस प्रकार से सभी प्रकार के लौकिक कर्म करते हुए संत महात्मा कर्मफलों के बंधनों से मुक्त रहते हैं।
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मन: |
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत || 42||
अतः तुम्हारे हृदय में अज्ञानतावश जो संदेह उत्पन्न हुए हैं उन्हें ज्ञानरूपी शस्त्र से काट दो। हे भरतवंशी अर्जुन! स्वयं को योग में निष्ठ करो। उठो खड़े हो जाओ और युद्ध करो।
यहाँ हृदय शब्द का अर्थ वक्षस्थल में स्थित शारीरिक अवयव से नहीं है जो शरीर में रक्त को संचारित करता है। वेदों में उल्लेख है कि हमारे सिर में एक भौतिक मस्तिष्क होता है किन्तु हमारा सूक्ष्म मन हृदय के क्षेत्र में रहता है। इसी कारण से ही प्रेम और घृणा की अनुभूति होने पर हमें हृदय में आनन्द और पीड़ा का अनुभव होता है। इस प्रकार से हृदय करुणा, प्रेम सहानुभूति आदि सभी शुभ भावों का स्रोत है। इसलिए जब श्रीकृष्ण यह उल्लेख करते हैं कि हृदय में जो संदेह उत्पन्न हुए हैं तब इसका तात्पर्य मन में संदेह उत्पन्न होने से है क्योंकि मन ही वह सूक्ष्म यंत्र है जो हृदय स्थल पर स्थित रहता है। अर्जुन के आध्यात्मिक गुरु होने की भूमिका का निर्वहन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण अपने शिष्य अर्जुन को अवगत कराते हैं कि कर्मयोग के अभ्यास द्वारा कैसे अन्तर्दृष्टि प्राप्त की जा सकती है। वे अर्जुन को उपदेश देते हैं कि वह अपनी बुद्धि और श्रद्धा दोनों का प्रयोग अपने मन के संदेह को हटाने के लिए करे। तत्पश्चात् वे उसे कर्म करने का आह्वान करते हैं और उसे उठ खड़े होने तथा कर्मयोग की भावना से युक्त होकर युद्ध करने के लिए कहते हैं। एक ही साथ कर्म का त्याग करने और कर्म करने के दो विरोधाभासी उपदेश अर्जुन के मन को विचलित करते हैं जिसे वह अगले अध्याय के प्रारम्भ में प्रकट करता है।
।।श्रीमद्भागवत गीता चतुर्थ अध्याय सम्पूर्ण।।
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