॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhagavad Geeta Chapter 3
भगवद्गीता अध्याय 3
श्रीमद्भगवत गीता अध्याय तीन: कर्मयोग
कर्म का विज्ञान
इस अध्याय में श्रीकृष्ण यह समझाते हैं कि सभी जीव अपनी स्वाभाविक प्रकृति के गुणों के कारण कार्य करने के लिए बाध्य होते हैं और कोई भी प्राणी एक क्षण के लिए भी अकर्मा नहीं रह सकता। वे जो गेरुए वस्त्र धारण कर बाह्य रूप से वैराग्य प्रदर्शित करते हैं लेकिन आंतरिक रूप से भोगों के प्रति आसक्ति रखते हैं, वे ढोंगी हैं। जो कर्मयोग का अनुपालन करते हुए बाह्य रूप से निरन्तर कर्म करते रहते हैं लेकिन उनमें आसक्त नहीं होते, वे उनसे श्रेष्ठ हैं। इसके बाद श्रीकृष्ण इस पर बल देते हैं कि सभी जीवित प्राणियों को भगवान की सृष्टि की व्यवस्था के अभिन्न अंग के रूप में अपने दायित्वों का निर्वाहन करना पड़ता है। जब हम भगवान के प्रति सेवा भावना रखते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं तब ऐसे कर्म यज्ञ बन जाते हैं। यज्ञों का अनुष्ठान वास्तव में स्वर्ग के देवताओं को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है और वे हमें सांसारिक सुख और समृद्धि प्रदान करते हैं। ऐसे यज्ञों के कारण वर्षा होती है और वर्षा से अन्न उत्पन्न होता है जो जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक है। वे जो इस सृष्टि चक्र में अपने उत्तरदायित्व को स्वीकार नहीं करते, वे पापी हैं। वे केवल इन्द्रिय सुख प्राप्त करने के लिए जीवित रहते हैं और उनका जीवन व्यर्थ हो जाता है।
फिर आगे श्रीकृष्ण कहते हैं कि भगवत्प्राप्त महापुरुष जो आत्मज्ञान में स्थित रहते हैं, वे शारीरिक उत्तरदायित्वों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं होते क्योंकि वे आत्मा के स्तर पर अपने उच्च दायित्वों का निर्वहन कर रहे होते हैं। हालांकि वे अपने सामाजिक दायित्वों का त्याग करते हैं तो सामान्य मनुष्यों के मन में असमंजस की भावना उत्पन्न होती है जो उनके पदचिह्नों पर चलना चाहते हैं। इसलिए ज्ञानी पुरुषों को संसार के लाभार्थ उच्च आदर्श प्रस्तुत करने के लिए बिना किसी प्रयोजन और व्यक्तिगत लाभ के भी निरन्तर कर्म करना पड़ता है। यह योजना अज्ञानी को अपरिपक्व अवस्था में अपने नियत दायित्वों का त्याग करने से रोकेगी। अतीत में महान राजर्षियों जैसे कि राजा जनक और अन्य राजाओं का भी यही उद्देश्य था जिन्होंने अपने सांसारिक दायित्वों का निर्वहन किया था।
तत्पश्चात् अर्जुन पूछता है कि लोग अनिच्छा से पापपूर्ण कर्मों में प्रवृत्त क्यों होते हैं? क्या उन्हें बलपूर्वक पाप कर्मों में लगाया जाता है। परम प्रभु श्रीकृष्ण बताते हैं कि संसार का सबसे बड़ा शत्रु केवल काम-वासना है। जिस प्रकार से अग्नि धुंए से ढकी रहती है, दर्पण धूल से ढका रहता है उसी प्रकार से कामना मनुष्य के ज्ञान पर आवरण डाल देती है और उसकी बुद्धि का विनाश कर देती है। फिर श्रीकृष्ण अर्जुन से आह्वान करते हैं कि वह इस कामना रूपी शत्रु का संहार कर दें जो पाप का मूर्तरूप है और अपनी इन्द्रिय, मन और बुद्धि को वश में करे।
अर्जुन उवाच |
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन |
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव || 1||
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे |
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् || 2||
अर्जुन ने कहा! हे जनार्दन, यदि आप ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं तब फिर आप मुझे इस भीषण युद्ध में भाग लेने के लिए क्यों कहते हैं? आपके अस्पष्ट उपदेशों से मेरी बुद्धि भ्रमित हो गयी है। कृपया मुझे निश्चित रूप से कोई एक ऐसा मार्ग बताएँ जो मेरे लिए सर्वाधिक लाभदायक हो।
पहले अध्याय में उस परिवेश का परिचय दिया गया था जिसमें अर्जुन के भीतर दुःख और अवसाद उत्पन्न हुआ और जिसके कारण श्रीकृष्ण को दिव्य आध्यात्मिक उपदेश देना पड़ा। दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अविनाशी आत्मा के दिव्यज्ञान का वर्णन किया। उन्होंने तब अर्जुन को एक क्षत्रिय योद्धा के धर्म के पालन का स्मरण करवाया और कहा कि इसका पालन करने के फलस्वरूप उसकी कीर्ति बढ़ेगी और स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी। अर्जुन को एक क्षत्रिय के रूप में अपने वर्ण से संबंधित धर्म का पालन करने की प्रेरणा देने के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण ने फिर कर्मयोग के विज्ञान का सर्वोत्तम सिद्धान्त प्रकट किया और अर्जुन को कर्मफलों से विरक्त रहने का उपदेश दिया और यह कहा कि ऐसा करने से बंधन उत्पन्न करने वाले कर्म बंधनमुक्त कर्मों में परिवर्तित हो जायेंगे। उन्होंने बिना फल की इच्छा से कर्म करने के विज्ञान का नाम 'बुद्धियोग' रखा। इससे उनका अभिप्राय निश्चयात्मक बुद्धि द्वारा मन को नियंत्रित करते हुए उसे सांसारिक लालसाओं से विरक्त रखने और आध्यात्मिक ज्ञान के संवर्धन द्वारा बुद्धि को स्थिर रखने से था। उन्होंने कर्म का त्याग करने का परामर्श नहीं दिया अपितु इसके विपरीत उन्होंने कर्म के फल की आसक्ति का त्याग करने का उपदेश दिया। अर्जुन श्रीकृष्ण के अभिप्राय को यह सोंचकर गलत समझता है कि यदि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है तब फिर वह इस युद्ध में भाग लेने जैसे कर्त्तव्य का पालन क्यों करें? इसलिए वह कहता है-"विरोधाभासी कथनों से आप मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रहे हैं। मैं जानता हूँ कि आप करुणामय हैं और आपकी इच्छा मुझे निष्फल करने की नहीं है, अतः कृपया मेरे संदेह का निवारण करें।"
श्रीभगवानुवाच |
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ |
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् || 3||
श्री भगवान ने कहा, हे निष्पाप अर्जुन! मैं पहले ही भगवत्प्राप्ति के दो मार्गों का वर्णन कर चुका हूँ। ज्ञानयोग उन मनुष्यों के लिए है जिनकी रुचि चिन्तन में होती है और कर्मयोग उनके लिए है जिनकी रुचि कर्म करने में होती है।
श्लोक-2.39 में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा आध्यात्मिक परिपूर्णता की ओर ले जाने वाले दो मार्गों का वर्णन किया गया। जिनमें से प्रथम मार्ग विश्लेषणात्मक अध्ययन द्वारा आत्मा के स्वरूप और शरीर से उसके भेद को जानने का ज्ञान प्राप्त करना है।
श्रीकृष्ण ने इसे सांख्य योग कहा है, दार्शनिक मनोवृत्ति वाले लोगों की रुचि बौद्धिक चिन्तन द्वारा आत्मा को जानने के लिए ज्ञानमार्ग की ओर होती है। दूसरे प्रकार के लोग अपने समस्त कर्म भगवान को समर्पित करने की भावना से 'कर्मयोग' करते हैं। पिछले श्लोक में किए गए वर्णन के अनुसार श्रीकृष्ण इसे बुद्धि-योग भी कहते हैं। ऐसी पद्धति द्वारा कार्य करने से अन्त:करण की शुद्धि होती है और शुद्ध अन्तःकरण में स्वाभाविक रूप से ज्ञान प्रकट होता है। अतः यह मार्ग परम लक्ष्य की प्राप्ति की ओर प्रवृत्त करता है।
आध्यात्मिक मार्ग में रुचि रखने वालों में ऐसे लोग भी सम्मिलित होते हैं जो चिन्तन एवं मनन में रुचि रखते हैं और कुछ ऐसे लोग भी सम्मिलित होते हैं जो कर्म करने में रुचि रखते हैं। इस प्रकार से इन दोनों मार्गों का अस्तित्व तब तक बना रहता है जब तक आत्मा की भगवत्प्राप्ति की अभिलाषा विद्यमान रहती है। श्रीकृष्ण इन दोनों पद्धतियों का अनुसरण करने वालों का उल्लेख करते हैं क्योंकि उनका संदेश सभी प्रकार की मनोवृत्ति और रुचि रखने वाले लोगों के कल्याण के लिए है।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते |
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति || 4||
न तो कोई केवल कर्म से विमुख रहकर कमर्फल से मुक्ति पा सकता है और न केवल शारीरिक संन्यास लेकर ज्ञान में सिद्धावस्था प्राप्त कर सकता है।
इस श्लोक की प्रथम पंक्ति कर्मयोगी, स्वयं दूसरी पंक्ति सांख्य योगी, ज्ञान योग के अनुयायियों के सम्बन्ध में है।
प्रथम पंक्ति में श्रीकृष्ण कहते हैं कि कार्य के प्रति केवल उदासीन रहने से कर्मफलों से मुक्ति की अवस्था प्राप्त नहीं होती। मन निरन्तर फलप्राप्ति का चिन्तन करता रहता है और क्योंकि मानसिक कार्य भी कर्म का ही रूप है इसलिए यह भी शारीरिक कार्य के समान मनुष्य को कर्म के बंधनो में बांधता है। सच्चे कर्मयोगी को कर्मफलों की आसक्ति से रहित होकर जीवन निर्वाह करना अवश्य सीखना चाहिए। इसके लिए बौद्धिक ज्ञान को उन्नत करना आवश्यक होता है। इसलिए कर्मयोग में सफलता पाने के लिए तत्त्वज्ञान भी अनिवार्य है।
दूसरी पंक्ति में श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि सांख्य योगी केवल संसार से संन्यास लेकर और संन्यासी बनकर आत्मज्ञान की अवस्था प्राप्त नहीं कर सकता। कोई भी मनुष्य भोगों का परित्याग कर सकता है। किन्तु जब तक मन अशुद्ध रहता है तब तक वास्तविक ज्ञान का उदय नहीं होता। मन की प्रवृत्ति पिछले विचारों की पुनरावृत्ति करना है। ऐसी पुनरावृत्ति मन के भीतर एक कड़ी का रूप ले लेती है और साथ में नए विचार भी निर्बाध रूप से समान दिशा में उमड़ते रहते हैं। अपनी पुरानी प्रवृत्तियों के कारण लौकिक चिन्तन से मन चिन्ता, तनाव, भय, घृणा, शत्रुता आदि सांसारिक विषयजन्य दोषों से युक्त रहता है। इस प्रकार केवल भौतिक रूप में संसार से संन्यास लेने से अशुद्ध अन्तःकरण में वास्तविक ज्ञान प्रकट नहीं होगा। यह उपयुक्त कर्म से युक्त होना चाहिए जो मन और बुद्धि को शुद्ध करता है। इस प्रकार से सांख्य योग में भी सफलता के लिए कर्म करना अनिवार्य है। यह कहा जाता है कि तत्त्वज्ञान के बिना भक्ति भावना मात्र होती है और बिना भक्ति के तत्त्वज्ञान बुद्धि की कल्पना मात्र है। कर्मयोग और सांख्य योग दोनों के लिए कर्म और ज्ञान अनिवार्य हैं। यह केवल इनका आनुपातिक अंतर है जो इन दो मार्गों के बीच भेद उत्पन्न करता है।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् |
कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: || 5||
कोई भी मनुष्य एक क्षण के लिए अकर्मा नहीं रह सकता। वास्तव में सभी प्राणी प्रकृति द्वारा उत्पन्न तीन गुणों के अनुसार कर्म करने के लिए विवश होते हैं।
कुछ लोग सोंचते हैं कि कर्म का संबंध केवल व्यवसायिक कार्यों का निष्पादन करने से है न कि दिनचर्या संबंधी कार्य जैसे कि-खाना, पीना, निद्रा, जागना, और विचार करना। इसलिए प्रायः ऐसे लोग जब अपना व्यवसाय छोड़ देते हैं तब वह यह समझते हैं कि वे कर्म नहीं कर रहे हैं। लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं कि शरीर, मन और वाणी द्वारा निष्पादित की जाने वाली सभी गतिविधियाँ कर्म ही हैं। इसलिए वे अर्जुन को बताते हैं कि एक क्षण के लिए भी पूर्णरूप से निष्क्रिय रहना असंभव है। यदि हम केवल कहीं बैठे हैं तो यह भी एक क्रिया है और जब हम लेटते हैं तो यह भी एक क्रिया है। यदि हम निद्रा में होते हैं तब भी मन स्वप्न देखने में व्यस्त हो जाता है। यहाँ तक कि जब हम गहन निद्रा में चले जाते हैं, तब भी हमारे हृदय और शरीर के अन्य अंग कार्य करते रहते हैं। इस प्रकार से श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि किसी भी मनुष्य के लिए पूर्णतया अकर्मा रहना असंभव है। क्योंकि शरीर, मन और बुद्धि अपनी प्रकृति द्वारा निर्मित तीन गुणों-सत्व, रज, तम के अधीन होकर संसार में कार्य करने के लिए विवश होती है। श्रीमद्भागवतम् में भी इसी प्रकार का श्लोक है।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म गुणैः स्वाभाविकैबलात् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-6.1.53)
"कोई भी मनुष्य एक क्षण के लिए अकर्मा नहीं रह सकता। सभी जीव अपने प्राकृतिक गुणों द्वारा कर्म करने के लिए बाध्य होते हैं।"
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् |
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते || 6||
जो अपनी कर्मेन्द्रियों को तो नियंत्रित करते हैं लेकिन मन से उनके विषयों का चिन्तन करते हैं, वे निःसन्देह स्वयं को धोखा देते हैं और पाखण्डी कहलाते हैं।
संन्यासी जीवन के प्रति आकर्षित होकर लोग प्रायः अपने कर्मों का परित्याग कर देते हैं और बाद में उन्हें ज्ञात होता है कि उनका वैराग्य सांसारिक विषयभोगों के प्रति विरक्ति से युक्त नहीं है। इससे मिथ्याचरिता की ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहाँ लोग स्वयं बाह्य दृष्टि से आध्यात्मवादी होने का ढोंग करते हैं जबकि आंतरिक रूप से निकृष्ट मनोभावों के साथ अधम उद्देश्यों के लिए जीवन निर्वाह करते हैं। इसलिए संसार में कर्मयोगी के रूप में रहना पाखण्डपूर्ण संन्यासी जीवन व्यतीत करने से श्रेष्ठ है। अपरिपक्व अवस्था में संन्यास लेकर अपने जीवन की समस्याओं से दूर भागना आत्मा के उद्धार की यात्रा में नहीं बाधक है। संत कबीर ने कहा है:
मन न रंगाए हो, रंगाए योगी कपड़ा।
जतवा बढ़ाए योगी धुनिया रमौले,
दढ़िया बढ़ाए योगी बनि गयेले बकरा ।।
"हे तपस्वी योगी! तुमने अपने वस्त्रों को भगवा (गहरे पीले रंग में) रंग से रंगवा लिया है किन्तु तुमने अपने मन को वैराग्य के रंग से रंगने पर ध्यान नहीं दिया। स्वयं को संन्यासी दर्शाने के लिए तुमने प्रतीक के रूप में अपने केश बढ़ा लिए हैं और अपने शरीर पर राख मल ली है किन्तु भीतर से समर्पण भाव के बिना बाहरी रूप से मुख पर दाढ़ी बढ़ाकर अपना रूप बकरे जैसा बना लिया है।" इस प्रकार श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह व्यक्त करते हैं कि जो लोग बाह्य दृष्टि से इन्द्रियों के विषय भोगों का त्याग करते हैं किन्तु मन से निरन्तर उनका चिन्तन करते हैं, वे मिथ्याचारी हैं और स्वयं को धोखा देते हैं।
इस तत्त्व को समझाने के लिए पुराणों में तावृत और सुवृत दो भाइयों की कथा का वर्णन इस प्रकार से है-एक दिन दोनों भाई अपने घर से श्रीमद्भागवतम् का प्रवचन सुनने मंदिर जा रहे थे। बीच मार्ग में मूसलाधार वर्षा होने लगी। अतः वे आश्रय लेने के लिए समीप के भवन में चले गये। उन्होंने पाया कि वे वेश्यालय में आ गये हैं जहाँ पर गणिकाएँअपने ग्राहकों का मनोरंजन करने के लिए नृत्य कर रही थीं। बड़ा भाई तावृत वहाँ से बाहर निकल कर वर्षा में भींगता हुआ मन्दिर की ओर जाने लगा। छोटे भाई सुवृत ने वर्षा में भींगने से बचने के लिए कुछ समय और वहाँ बैठने में कोई बुराई नहीं समझी। तावृत मन्दिर पहुंचा और वहाँ बैठकर प्रवचन सुनने लगा किन्तु वह मन से पश्चात्ताप करने लगा-“यह कैसा नीरस करने वाला प्रवचन है। मैंने बड़ी भूल की, मुझे वेश्यालय में रुकना चाहिए था। मेरा भाई अवश्य ही वहाँ के उत्सव में आनन्दित हो रहा होगा।" दूसरी ओर सुवृत यह सोचने लगता है-“मैं इस पाप के स्थान पर क्यों रुक गया? मेरा भाई पुण्यात्मा है और वह अवश्य भागवत के ज्ञान से अपने मन और बुद्धि को निमज्जित कर रहा होगा। मुझे भी साहस जुटा कर वर्षा से भयभीत हुए बिना मंदिर पहुँचना चाहिए था। आखिरकार मैं कोई नमक का बना हुआ नहीं हूँ जो थोड़ी वर्षा में घुल जाता।" जब वर्षा समाप्त हुई तो दोनों भाई अपने-अपने स्थानों से बाहर निकले और एक-दूसरे की दिशा की ओर बढ़े। जिस क्षण में वह एक-दूसरे से मिले तब अचानक उन पर बिजली गिरी और उसी स्थान पर उनकी मृत्यु हो गयी। तब यमदूत वहाँ आकर तावृत को नरक ले जाने लगे तब तावृत ने आपत्ति करते हुए कहा-"तुमसे भूल हुई है। मैं तावृत हूँ। वह मेरा भाई था जो कुछ समय पहले वेश्यालय में बैठा था। अतः तुम्हें उसे नरक में ले जाना चाहिए।" यमदूतों ने उत्तर दिया-"हमने कोई भूल नहीं की। तुम्हारा भाई वहाँ वर्षा से बचने के लिए बैठा था किन्तु उसका मन भागवत के प्रवचन में तल्लीन था। दूसरी ओर प्रवचन सुनते समय तुम्हारे मन में वेश्यालय में ठहरने की लालसा उत्पन्न हो रही थी।" तावृत ने बिलकुल वैसा ही किया जैसा कि श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में व्याख्या की है। उसने बाह्य दृष्टि से तो विषय भोगों के प्रति विरक्ति प्रकट की किन्तु मन से विषय भोगों का चिन्तन किया था। यह अनुचित वैराग्य है।
अब अगले श्लोक में श्रीकृष्ण वास्तविक वैराग्य का वर्णन करेंगे।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन |
कर्मेन्द्रियै: कर्मयोगमसक्त: स विशिष्यते || 7||
हे अर्जुन! लेकिन वे कर्मयोगी जो मन से अपनी ज्ञानेन्द्रियों को नियंत्रित करते हैं और कर्मेन्द्रियों से बिना किसी आसक्ति के कर्म में संलग्न रहते हैं, वे वास्तव में श्रेष्ठ हैं।
इस श्लोक में कर्मयोग शब्द का प्रयोग किया गया है। यह दो अवधारणाओं का योग है। कर्म अर्थात् व्यावसायिक कार्य और योग अर्थात भगवान में एकत्व। इस प्रकार कर्मयोगी वह है जो मन को भगवान में अनुरक्त कर सांसारिक दायित्वों का निर्वहन करता है। ऐसा कर्मयोगी सभी प्रकार के कर्म करते हुए भी कर्म के बंधन से मुक्त रहता है। इस प्रकार के कर्म किसी मनुष्य को कर्म के फलों से नहीं बाँधते किन्तु उन कर्मों के फलों में आसक्ति रखने पर वह कर्म के बंधन में बंध जाता है।
कर्मयोगी की कर्म के फलों में कोई आसक्ति नहीं होती। दूसरी ओर एक पाखंडी संन्यासी जो कर्म से तो विरक्त रहता है परन्तु आसक्ति का त्याग नहीं करता, वह कर्म के बंधन में बंध जाता है। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि गृहस्थ जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति जो कर्मयोग में रत रहते हैं, वे मन से निरन्तर विषय-भोगों का चिन्तन करने वाले मिथ्याचारी संन्यासी से अधिक श्रेष्ठ हैं। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने इन दोनों विचारों की तुलना अति विशद प्रकार से की है:
मन हरि में तन जगत में, कर्मयोग तेही जान।
तन हरि में मन जगत में, यह महान अज्ञान ।।
(भक्ति शतक-84)
"जब कोई संसार में शरीर से काम करता है किन्तु मन भगवान में अनुरक्त रखता है तो उसे कर्मयोग समझना चाहिए। जब कोई शरीर को आध्यात्मिकता या भक्ति में लीन करता है किन्तु मन को संसार में आसक्त रखता है तब उसे पाखंडी मानो।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: |
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मण: || 8||
इसलिए तुम्हें निर्धारित वैदिक कर्म करने चाहिए क्योंकि निष्क्रिय रहने से कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म का त्याग करने से तुम्हारे शरीर का भरण पोषण भी संभव नहीं होगा।
जब तक मन और बुद्धि भगवान में तल्लीन होने की अवस्था तक न पहुँचे तब तक कर्त्तव्य का पालन करने की दृष्टि से किया गया शारीरिक कार्य अन्त:करण को शुद्ध करने में सहायक होता है। इसलिए वेदों में मनुष्यों के लिए अपने मन और इन्द्रियों पर संयम रखने के लिए कुछ कर्तव्य निश्चित किए गए हैं। आलस्य को आध्यात्मिक मार्ग में अवरोध बताया गया है।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ।।
"आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और यह घातक शत्रु, उसके शरीर में ही निवास करता है।" कर्म मनुष्य का विश्वस्त मित्र है और उसे निश्चित रूप से अधोपतन से बचाता है। मुख्य शारीरिक कार्य जैसे भोजन ग्रहण करना, स्नान करना तथा शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए कर्म करना अनिवार्य होता है। इन अनिवार्य कर्मों को नित्यकर्म कहा जाता है। शरीर को सुचारु रूप से क्रियाशील रखने वाले इन कार्यों की उपेक्षा करना उचित नहीं है अपितु ये आलसी होने का संकेत है जो मन और शरीर दोनों को क्षीण और दुर्बल करता है। दूसरी ओर शरीर की देखभाल और पोषण करना आध्यात्मिकता के मार्ग में सहायक है। इस प्रकार अकर्मण्यता न तो भौतिक और न ही आध्यात्मिक उपलब्धि की साधिका है। अपनी आत्मा के उत्थान के लिए हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। वे हमारे मन और बुद्धि को उन्नत और पवित्र करने में सहायता करते हैं।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन: |
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर || 9||
परमात्मा के लिए यज्ञ-स्वरूप में कर्मों का निष्पादन करना चाहिए अन्यथा कर्म बंधन का कारण बनेंगे। इसलिए हे कुन्तीपुत्र! भगवान के सुख के लिए और फल की आसक्ति के बिना अपने नियत कर्म करो।
डाकू हत्या करने के प्रयोजन से चाकू का प्रयोग करता है जबकि एक सर्जन उसी चाकू का प्रयोग एक उपकरण के रूप में लोगों का जीवन बचाने के लिए करता है। यह चाकू स्वयं न तो किसी की हत्या करता है और न ही किसी के जीवन की रक्षा करता है। इसका इसके प्रयोग करने के प्रयोजन से ज्ञात होता है। जैसा कि शेक्सपीयर ने कहा है-"कोई भी कर्म बुरा या अच्छा नहीं होता किन्तु हमारी सोंच इन्हें ऐसा बनाती है।" इसी प्रकार से कर्म अपने आप में शुभ या अशुभ नहीं होता। मनुष्य की मनोदशा के अनुसार यह बंधन या उत्थान का कारण हो सकता है।
इन्द्रिय सुख और अपने अहम् की तुष्टि के लिए किया गया कार्य भौतिक संसार में बंधन का कारण होता है और भगवान के सुख के लिए यज्ञ के रूप में किया गया कर्म माया के बंधनों से मुक्त करता है तथा भगवान की दिव्य कृपा प्राप्त कराता है। क्योंकि कर्म करना हमारी प्रकृति है अतः हम इन दो प्रकार के कार्यों में से किसी एक को करने के लिए बाध्य होते हैं। हम एक क्षण के लिए भी अकर्मा नहीं रह सकते क्योंकि हमारा मन खाली नहीं रह सकता। अगर कोई भी कार्य हम भगवान को अर्पण किए बिना करते हैं तब हम अपने मन और इन्द्रियों की तुष्टि के लिए कार्य करने के लिए विवश होंगे। जब हम किसी कार्य को समर्पण की भावना से सम्पन्न करते हैं तब हम यह पाते हैं कि यह सारा संसार और उसमें व्याप्त सभी वस्तुएँ भगवान से संबंधित हैं और उनका उपयोग भगवान की सेवा के लिए ही है। भगवान राम के पूर्वज राजा रघु द्वारा इसका उच्च आदर्श स्थापित किया गया। रघु ने विश्वजित् यज्ञ का अनुष्ठान किया जिसमें अपने स्वामित्व की सभी वस्तुएँ और धन संपदा की परोपकार के लिए दान में देना आवश्यक होता है।
स विश्वजितम् आजह्वे यज्ञं सर्वस्व दक्षिणम्।
आदानं हि विसर्गाय सतां वारिमुचाम् इव।।
(रघुवंश-4.86)
"रघु ने इसी भावना से यज्ञ किया। जिस प्रकार बादल पृथ्वी से अपने सुख के लिए जल एकत्रित नहीं करते अपितु वर्षा के रूप में उसे पृथ्वी को लौटा देते हैं। इसी प्रकार राजा द्वारा जनता से कर के रूप में इकट्ठा की गयी धन सम्पदा उसके सुख के लिए नहीं होती अपितु प्रजा तथा भगवान के सुख के लिए होती है। इसलिए उन्होंने अपनी धन सम्पदा को भगवान के सुख के लिए अपने नागरिकों की सेवा में अर्पित करने का निर्णय लिया।" यज्ञ के पश्चात् रघु ने अपनी सारी सम्पत्ति अपनी प्रजा को दान में दे दी और फिर वह भिखारी के भेष में मिट्टी का पात्र उठाकर भिक्षा के लिए निकल पड़े। जब वह एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे, तब उन्होंने कुछ लोगों द्वारा किए जा रहे इस वार्तालाप को सुना-"हमारा राजा अत्यंत परोपकारी है। राजा ने अपना सर्वस्व दान कर दिया।" रघु को अपनी प्रशंसा सुनकर दुःख हुआ और वह बोले-"तुम क्या चर्चा कर रहे हो?" उन्होंने उत्तर दिया-"हम अपने राजा का गुणगान कर रहे हैं। हमारे राजा जैसा दानी इस संसार में कोई दूसरा नहीं है।" रघु ने कहा-"पुनः ऐसा न कहना। रघु ने कुछ भी दान नहीं किया।" तब उन्होंने कहा, "तुम किस प्रकार के मनुष्य हो जो हमारे राजा की बुराई कर रहे हो? सभी जानते हैं कि रघु ने जो भी अर्जित किया वह सब दान में दे दिया।" रघु ने उत्तर दिया-"जाओ और अपने राजा से पूछो कि जब वह संसार में आया था तब उसके पास क्या था? क्या उसने खाली हाथ जन्म नहीं लिया? आख़िर उसका क्या था जिसका उसने त्याग कर दिया?" यही कर्मयोग है जिससे हमें यह ज्ञात होता है कि समस्त संसार भगवान का है और यहाँ का सब कुछ भगवान को संतुष्ट करने के निमित्त है, तभी हम अपने कर्तव्यों का निर्वहन अपने मन और इन्द्रियों की तुष्टि के लिए न करके केवल भगवान के सुख के लिए करते हैं।
भगवान विष्णु ने प्रचेताओं को इस प्रकार से उपदेश दिया।
गृहेष्वाविशतां चापि पुंसां कुशलकर्मणाम् ।
मद्वार्तायातयामानां न बन्धाय गृहा मता।।
(श्रीमद्भागवतम्-4.30.19)
"सच्चे कर्मयोगी अपनी गृहस्थी के कार्यों को पूरा करते हुए अपने सभी कार्यों को मेरे यज्ञ के रूप में करते हैं और मुझे ही सभी कर्मों का भोक्ता मानते हैं। उन्हें जब भी खाली समय मिलता है, तब उस समय वे मेरी महिमा का श्रवण एवं गान करते हैं। ऐसे मनुष्य संसार में रहते हुए कभी भी अपने कर्मों के बंधन में नहीं फंसते।"
सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति: |
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् || 10||
सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा ने मानव जाति को उनके नियत कर्तव्यों सहित जन्म दिया और कहा “इन यज्ञों का विधिपूर्वक अनुष्ठान करने पर तुम्हें सुख समृद्धि प्राप्त होगी और इनसे तुम्हें सभी वांछित वस्तुएँ प्राप्त होंगी।”
प्रकृति के सभी उपादान भगवान की सृष्टि के अभिन्न अंग हैं। भगवान की सृष्टि के समस्त उपादान जो भी सृष्टि से प्राप्त करते हैं उन्हें वे पुनः भगवान की सृष्टि को लौटा देते हैं। सूर्य, पृथ्वी के अस्तित्व को बनाए रखने और जीवन निर्वाह के लिए ताप और प्रकाश की व्यवस्था करता है। भूमि अपनी मिट्टी से हमारे पालन-पोषण के लिए खाद्य पदार्थ उत्पन्न करती है और उत्तम जीवन शैली के लिए अपने गर्भ में आवश्यक खनिज पदार्थों को समाए रखती है। वायु हमारे शरीर में प्राण शक्ति को संचालित करता है और ध्वनि को प्रसारित करता है। हम मानव भी भगवान की सृष्टि रचना के अभिन्न अंग हैं। वायु द्वारा हम सांस लेते हैं, धरती पर हम चलते हैं, जल का हम सेवन करते हैं और सूर्य का प्रकाश हमारे जीवन को प्रकाशित करता है। ये सभी हमारे लिए भगवान की सृष्टि के अद्भुत उपहार हैं। जिस प्रकार हम अपने जीवन को बनाए रखने के लिए इन तत्त्वों का उपयोग करते हैं उसी प्रकार से हमें अपने नियत कर्त्तव्यों का पालन करते हुए प्रकृति की शक्तियों का उपयोग भगवान की सेवा के लिए करना चाहिए। भगवान हम मनुष्यों से ऐसे ही यज्ञ की अपेक्षा करते हैं।
अपने हाथ का उदाहरण ही लें जो कि हमारे शरीर का अभिन्न अंग है। यह अपने पोषण हेतु शरीर से रक्त, ऑक्सीजन, विटामिन आदि प्राप्त करता है और इसके बदले में यह शरीर के लिए आवश्यक कार्य सम्पादित करता है। यदि हाथ यह सोंचने लगे कि शरीर की सेवा करना एक बोझ है और यह निर्णय कर ले कि शरीर ही उसकी सेवा करे तब हाथ एक क्षण के लिए भी चेतन नहीं रह सकता। यदि वह शरीर के लिए यज्ञ के रूप में कर्म करता है तब हाथ का निजी स्वार्थ भी पूरा हो जाता है। उसी तरह जीवात्माएँ भगवान का अणु अंश हैं अतः भगवान की अनन्त सृष्टि में हम सब को भी अपनी भूमिका का निर्वहन करना चाहिए। जब हम अपने समस्त कार्यों को भगवान की सेवा में अर्पित करते हैं तब इससे हमारे निजी हित की भी सिद्धि होती है।
प्रायः हवन कुंड में अग्नि प्रज्जवलित कर हवन करने को यज्ञ कर्म कहा जाता है। परन्तु भगवद्गीता में वर्णित 'यज्ञ' में शास्त्रों में लिखित सभी नियत कर्म भी सम्मिलित हैं जिन्हें हम भगवान को अर्पित करने के भाव से सम्पन्न करते हैं।
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व: |
परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ || 11||
तुम्हारे द्वारा सम्पन्न किए गए यज्ञों से देवता प्रसन्न होंगे तथा मनुष्यों और देवताओं के इस संबंध के परिणामस्वरूप सभी को सुख समृद्धि प्राप्त होगी।
स्वर्ग के देवता आधिकारिक रूप से ब्रह्मांड का संचालन करते हैं। परमपिता परमात्मा संसार की शासन व्यवस्था के नियंत्रण और संचालन संबंधी अपने कार्य उनके माध्यम से सम्पन्न करते हैं। ये देवता स्वर्ग या देवलोक में निवास करते हैं। देवतागण भगवान नहीं हैं अपितु वे भी हमारे जैसी आत्माएँ हैं। उन्हें संसार के संचालन से संबंधित दायित्वों का निर्वाहन करने हेतु पद सौंपे गये हैं। अपने देश की शासन व्यवस्था पर ध्यान दें जहाँ राज्यमंत्री, वित्त मंत्री, रक्षा सचिव, अटॉर्नी जनरल और अन्य पद हैं। इन पदों पर जिन लोगों का चयन होता है, वे निश्चित समयावधि तक अपने पद पर बने रहते हैं। समयावधि समाप्त होने पर या सत्ता का हस्तान्तरण होने पर सभी पदों पर नियुक्त लोगों को हटा दिया जाता है। समान रूप से संसार के प्रशासन संबंधी कार्यों का संचालन करने के लिए भी कुछ पद जैसे अग्निदेव (अग्नि का देवता), वायु देव (वायु का देवता), वरुणदेव (समुद्र का देवता), इन्द्रदेव (स्वर्ग के देवताओं का राजा) आदि पदों का सृजन किया गया है। पूर्वजन्म के संस्कारों, गुणों और पाप-पुण्यमय कर्मों के आधार पर जीवात्मा को इन पदों पर नियुक्त किया जाता है। ये पद दीर्घकाल के लिए निश्चित होते हैं और इन पदों पर आसीन लोग ब्रह्मांड के शासन का संचालन करते हैं। ये सब देवता हैं।
वेदों में स्वर्ग के देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के कर्मकाण्डों एवं धार्मिक विधि-विधानों का उल्लेख किया गया है और इनके बदले में देवता लौकिक सुख समृद्धि प्रदान करते हैं। जब हम अपने यज्ञ कर्म भगवान की संतुष्टि के लिए करते हैं तब स्वर्ग के देवता भी स्वतः संतुष्ट हो जाते हैं। जिस प्रकार जब हम किसी वृक्ष की जड़ को पानी देते है तब वह स्वतः उसके पुष्पों, फलों, पत्तियों शाखाओं और लताओं तक पहुँच जाता है। स्कन्द पुराण में वर्णन है:
अर्चिते देव देवेशे शङ्ख चक्र गदाधरे।
अर्चिताः सर्वे देवाः स्युर्यतः सर्व गतो हरिः।।
"विष्णु भगवान की उपासना करने से सभी देवताओं की स्वतः उपासना हो जाती है क्योंकि वे अपनी शक्तियाँ उनसे ही प्राप्त करते हैं।" इसलिए यज्ञ कर्म के निष्पादन से देवतागण प्रसन्न होते हैं और वे भौतिक प्रकृति के उपादानों का नियमन करते हुए मानव समाज के लिए सुख समृद्धि की व्यवस्था करते हैं।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविता: |
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव स: || 12||
तुम्हारे द्वारा सम्पन्न यज्ञों से प्रसन्न होकर देवता जीवन निर्वाह के लिए वांछित वस्तुएँ प्रदान करेंगे किन्तु जो प्राप्त वस्तुओं को उनको अर्पित किए बिना भोगते हैं, वे वास्तव में चोर हैं।
ब्रह्मांड के प्रशासक के रूप में देवता हमें वर्षा, वायु, अन्न, खनिज और उपजाऊ भूमि आदि प्रदान करते हैं। देवताओं द्वारा प्रदत्त इन सभी उपहारों के लिए हमें उनका आभारी होना चाहिए। देवता अपने कर्तव्य का पालन करते हैं और यह अपेक्षा करते हैं कि हम मनुष्य भी निष्ठापूर्वक अपने दायित्वों का निर्वहन करें। क्योंकि ये सभी स्वर्ग के देवता परम शक्तिमान भगवान के सेवक हैं और जब वे किसी को भगवान के लिए यज्ञ कर्म करते हुए देखते हैं तब वे प्रसन्न होते हैं और प्रतिफल के रूप में ऐसी जीवात्माओं के लिए भौतिक सुख-सुविधाओं की व्यवस्था करते हैं। इसलिए यह कहा जाता है कि जब हम दृढ़संकल्प के साथ भगवान की सेवा करते हैं तब ब्रह्माण्ड की सभी शक्तियाँ हमारी सहायता करना आरम्भ कर देती हैं।
कुछ लोग प्रकृति द्वारा प्रदत्त उपहारों को भगवान की सेवा के निमित्त नहीं समझते अपितु उन्हें अपने सुख का साधन मानते हैं। ऐसी मनोवृत्ति को श्रीकृष्ण ने चोरी की मानसिकता कहा है। प्रायः लोग यह प्रश्न करते हैं-"मैं सदाचार का जीवन व्यतीत करता हूँ, मैं किसी का अहित नहीं करता और न ही मैं कोई चोरी करता हूँ किन्तु मैं न तो भगवान की उपासना में विश्वास करता हूँ और न ही भगवान के अस्तित्व में। तब मैं क्या कुछ अनुचित कर रहा हूँ?" इस प्रश्न का उत्तर उपर्युक्त श्लोक में मिलता है। सामान्य मनुष्यों की दृष्टि से ऐसे व्यक्ति कुछ अनुचित नहीं करते किन्तु वे परमात्मा की दृष्टि में चोर माने जाते हैं। जैसे कि यदि हम किसी के घर जाते हैं और गृह स्वामी से परिचित न होते हुए भी उसके सोफे पर बैठ जाते हैं, रेफ्रिजरेटर से खाने-पीने के पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और उसके विश्राम कक्ष का प्रयोग करते हैं। फिर हम यह दावा करते हैं कि हम कुछ अनुचित नहीं कर रहे हैं। किन्तु कानून की दृष्टि में हमें चोर माना जाएगा क्योंकि उस घर से हमारा कोई संबंध नहीं है। इसी प्रकार यह संसार जिसमें हम रहते हैं, वह भगवान द्वारा बनाया गया है और उसकी प्रत्येक वस्तु भगवान की ही है। यदि हम सृष्टि के इन सुख साधनों पर भगवान के आधिपत्य को स्वीकार किए बिना अपने सुख के लिए इनका उपभोग करते हैं तब दैवीय दृष्टिकोण से हम निश्चित रूप से चोरी करते हैं।
भारतीय इतिहास के सुप्रसिद्ध राजा चन्द्रगुप्त ने अपने गुरु आचार्य चाणक्य से पूछा-"एक राजा का अपनी प्रजा के प्रति क्या कर्त्तव्य है?" आचार्य चाणक्य ने उत्तर दिया-"राजा प्रजा के सेवक के अलावा कुछ नहीं है। भगवान ने उसे राज्य के नागरिकों की सेवा करने का दायित्व सौंपा है ताकि वे भगवद्धाम की अपनी यात्रा में उन्नति कर सकें।" चाहे कोई राजा, व्यवसायी, किसान या श्रमिक हो, सभी व्यक्ति भगवान के संसार के अभिन्न अंग हैं और उनसे परमात्मा की सेवा के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है।
यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै: |
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् || 13||
आध्यात्मिक मनोवत्ति वाले जो लोग यज्ञ में अर्पित करने के पश्चात् भोजन ग्रहण करते हैं, वे सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं किन्तु जो अपनी इन्द्रिय तृप्ति के लिए भोजन बनाते हैं, वे वास्तव में पाप अर्जित करते हैं।
वैदिक परम्परा में भोजन इस भावना से बनाया जाता था कि यह भोजन भगवान के लिए है। फिर भोज्य पदार्थों को किसी पात्र में रखकर मौखिक रूप से या मन से भगवान से इसका भोग लगाने की प्रार्थना की जाती थी। भोग लगाने के पश्चात् पात्र में रखे भोजन को भगवान का प्रसाद (भगवान की कृपा) समझा जाता है। अन्य धर्म परम्पराओं में भी समान रीति का पालन किया जाता था। ईसाई धर्म में परम प्रसाद ग्रहण करने की रीति है जिसमें मदिरा और रोटी को पवित्र करने के पश्चात् ही उसका सेवन किया जाता है। श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में यह कहा है कि सर्वप्रथम भगवान के भोग के लिए अर्पित किए गए भोजन को जब प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है तब वह मनुष्यों को पाप मुक्त करता है और जो भगवान को भोग लगाए बिना भोजन ग्रहण करते हैं, वे पाप अर्जित करते हैं। अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या हम मांसाहारी भोज्य पदार्थों का भगवान को भोग लगाने के पश्चात् उसे भगवान के प्रसाद के रूप में स्वीकार कर सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि वेदों में मनुष्य के लिए शाकाहारी भोजन का सेवन विहित है जिसमें अन्न, दालें, फलियाँ, शाक-सब्जियाँ, फल, दुग्ध आदि सम्मिलित हैं। वैदिक सभ्यता के अतिरिक्त संसार की सभी सभ्यताओं के इतिहास में पुण्य आत्माओं ने मांसाहारी भोजन के सेवन को अस्वीकार किया और यह कहा कि ऐसा भोजन हमारे पेट को कब्रिस्तान बनाता है। यद्यपि इनमें से कुछ ने मांसाहारी भोजन ग्रहण करने वाले परिवारों में जन्म लिया था तथापि वे शाकाहारी जीवन शैली की ओर आकर्षित हुए। क्योंकि वे आध्यात्मिक पथ पर उन्नत थे। शाकाहार का समर्थन करने वाले विचारकों और महानुभावों के कुछ उद्धरण निम्न प्रकार से है:
"मानवता को आतंक से बचाने के लिए शिष्यों को मांसाहार का सेवन करने से मना करो, बुद्धिमानों का भोजन वह है जिसे साधु लोग ग्रहण करते हैं वह मांस से बना नहीं होता।" महात्मा बुद्ध-
"यदि तुम यह कहते हो कि प्राकृतिक रूप से तुम्हारी रचना ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन करने के लिए हुई है तब फिर तुम उसकी स्वयं हत्या करो जिसे तुम खाना चाहते हो। यह सब केवल स्वयं अपने हाथों से करो, बिना किसी छुरे, लाठी और कुल्हाड़ी की सहायता के बिना।" (रोमन प्लुतार्क का निबन्ध “ऑन ईटिंग फ्लैश")
"जब तक मनुष्य पशुओं का संहार करते हैं, वे एक दूसरे की हत्या करते रहेंगे। वास्तव में जो रक्त और पीड़ा के बीज बोता है, वह प्रेम और आनन्द कैसे प्राप्त कर सकता है।" (पाइथागोरस)
"मनुष्य पशुओं का राजा है क्योंकि वर्बरता में यह उनसे आगे है। हमें दूसरों की मृत्यु पर निर्भर रहना पड़ता है। हमारा शरीर कब्रगाह है। मैने अल्प आयु से ही मांस का सेवन त्याग दिया।" (लियोनार्दो दा विन्ची)
"अहिंसा उच्च संस्कारों की ओर ले जाती है जो कि सभी प्रकार के उत्थान का लक्ष्य है। जब तक हम सभी जीवों को कष्ट देना छोड़ नहीं देते तब तक हम सब असभ्य हैं।" (थॉमस एडिसन)
"मांस खाना स्पष्ट रूप से अनैतिकता है क्योंकि इसमें निहित क्रिया-हत्या- नैतिक मूल्यों के सर्वथा विपरीत है।" (लियो टॉलस्टॉय)
"वास्तव में यह प्रश्न किया जा सकता है कि क्या मांस का सेवन जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक है, शिष्टता किसी भी प्रकार से यह अपेक्षा नहीं करती कि मनुष्य को मांस खाना चाहिए।" (एडम स्मिथ)
"मैं अपनी आयु को देखता हूँ। लेकिन कुछ लोग तो अपनी वास्तविक आयु से बड़े लगते हैं, ऐसे लोगों से तुम क्या अपेक्षा कर सकते हो, जो लाशों का उपभोग करते है।" (जॉर्ज बर्नाड शॉ)
"एक मृत गाय या बकरे को सड़े-गले मांस की तरह देखा जाता है। लेकिन कसाई की दुकान में सड़ी-गली उन्हीं लाशों को सजाकर आहार के रूप में बेचा जाता है।" (जे. एच. केलॉग)
"मेरा यह विचार है कि शाकाहारी रीति से जीवन निर्वाह करने का प्रभाव मनुष्य के स्वभाव पर पड़ता है और यह समूची मानव जाति के उत्थान के लिए लाभकारी होगा।" (अलबर्ट आइंस्टाइन)
"मैं यह अनुभव करता हूँ कि आध्यात्मिक उन्नति किसी एक पड़ाव पर यह अपेक्षा करती है कि हमें अपनी तृप्ति के लिए अपने से छोटे जीवों की हत्या करना बंद कर देना चाहिए।" (महात्मा गांधी)
इस श्लोक में श्रीकृष्ण इससे भी परे जाते हुए कहते हैं कि शाकाहारी जीवन निर्वाह करते हुए भी यदि हम अपनी इंद्रियों की तृप्ति के लिए भोजन ग्रहण करते हैं तब भी हम कर्मफलों के बंधन में पड़ जाते हैं। इस श्लोक में प्रयुक्त शब्द आत्म-कारणात् का अर्थ 'अपना निजी सुख' है। किन्तु यदि हम भगवान को अर्पित करने के पश्चात् यज्ञ के अवशेषों का प्रसाद के रूप में सेवन करते हैं तब हमारी भावना परिवर्तित हो जाती है और हम अपने शरीर को भगवान की धरोहर के रूप में देखते हैं जिसकी देखभाल भगवान की सेवा के लिए की जाती है। हमें भगवान की कृपा से प्राप्त विहित भोजन को इस भावना के साथ ग्रहण करना चाहिए कि यह हमारे शरीर को स्वस्थ बनाए रखेगा। इस भावना से यह पूरी प्रक्रिया भगवान को अर्पित हो जाती है। भरत मुनि ने इस प्रकार से वर्णन किया है:
वसुसतो क्रतु दक्षौ काल कामौ धृतिः कुरुः।
पुरुरवा मद्रवासश्च विश्वदेवाः प्रकीर्तिताः।।
"भोजन पकाते हुए, मूसल, अग्नि, पीसने वाले यंत्रों, जल के बर्तनों और झाड़ का प्रयोग करते हुए भूलवश हिंसा हो जाती है इसलिए जो शरीर की तृप्ति के लिए भोजन बनाते हैं, पाप में फंस जाते हैं किन्तु यज्ञ पाप फलों को निष्प्रभावी करते हैं।"
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव: |
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ: कर्मसमुद्भव: || 14||
सभी लोग अन्न पर निर्भर हैं और अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ का अनुष्ठान करने से होती है और यज्ञ निर्धारित कर्मों का पालन करने से सम्पन्न होता है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण सृष्टि के चक्र का वर्णन कर रहे हैं। वर्षा अन्न उत्पन्न करती है। अन्न का सेवन करने से शरीर में रक्त संचारित होता है और रक्त से वीर्य बनता है। इसी वीर्य से मनुष्य का शरीर बनता है और मनुष्य यज्ञ कर्म करता है तथा इससे स्वर्ग के देवता संतुष्ट होते हैं जो फिर पृथ्वी पर वर्षा करते हैं। इस प्रकार सृष्टि का चक्र निरन्तर चलता रहता है।
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् |
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् || 15||
वेदों में सभी जीवों के लिए कर्म निश्चित किए गए हैं और वेद परब्रह्म भगवान से प्रकट हुए हैं। परिणामस्वरूप सर्वव्यापक भगवान सभी यज्ञ कर्मों में नित्य व्याप्त रहते हैं।
वेद भगवान की श्वास से प्रकट हुए हैं। अरेऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदो तथैवाङिःरसः (बृहदारण्यकोपनिषद् 4.5.11) अर्थात “चारों वेद-ऋग्वेद, यर्जुवेद, सामवेद, अथर्ववेद परम पुरुषोत्तम भगवान की श्वास से प्रकट हुए हैं"। इन शाश्वत वेदों में भगवान ने स्वयं कर्तव्य निर्धारित किए हैं। इन कर्त्तव्यों को इस प्रकार से व्यवस्थित किया गया है कि जिनके निष्पादन से भौतिकता में संलिप्त मनुष्य धीरे-धीरे अपनी कामनाओं पर नियंत्रण करना सीखकर तमोगुण से रजोगुण और रजोगुण से सत्त्वगुण तक ऊपर उठ सके। ये कर्त्तव्य यज्ञ के रूप में भगवान को अर्पित करने के लिए कहे गए हैं। इस प्रकार भगवान को यज्ञ के रूप में अर्पित किए गए ये कर्त्तव्य वास्तव में भगवान के गुणों के समान भगवत्स्वरूप हो जाते हैं और उनसे किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं होते। तंत्र सार में यज्ञों को स्वयं परमात्मा का स्वरूप कहा गया है:
यज्ञो यज्ञ पुमांश्चैव यज्ञशो यज्ञ यज्ञभावनः।
यज्ञभुक् चेति पञ्चात्मा यज्ञेष्विज्यो हरिः स्वयम्।।
श्रीमद्भागवतम् (11.19.39) में श्रीकृष्ण उद्धव को उपदेश देते हुए कहते हैं: 'यज्ञोऽहं भगवत्तमः' अर्थात् मैं वसुदेव का पुत्र यज्ञ हूँ। वेदों में भी कहा गया है: 'यज्ञो वै विष्णुः' अर्थात् वास्तव में भगवान विष्णु ही स्वयं यज्ञ हैं। इसी सिद्धान्त को इस श्लोक में दोहराते हुए श्रीकृष्ण व्यक्त करते हैं कि भगवान यज्ञ कर्मों में साक्षात् रूप से प्रकट हैं।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह य: |
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति || 16||
हे पार्थ! जो मनुष्य वेदों द्वारा स्थापित यज्ञ कर्म के इस चक्र का पालन नहीं करते, वे पाप अर्जित करते हैं, वे केवल अपनी इन्द्रियों की तृप्ति के लिए जीवित रहते हैं, वास्तव में उनका जीवन व्यर्थ ही है।
चक्र या चरण से तात्पर्य घटनाओं की क्रमबद्धता से है। श्लोक संख्या 3.14 में अन्न से वर्षा तक के चक्र का वर्णन किया गया है। इस संसार के कर्म चक्र में सभी जीव अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं और इसका निर्विघ्न गति में अपना योगदान देते हैं। चूँकि हम भी सृष्टि के काल चक्र से बंधे हैं अतः हमें भी सृष्टि की श्रृखला में अपने निश्चित कर्तव्यों का पालन अवश्य करना चाहिए।
सृष्टि की इस श्रृखला में हम मनुष्य ही मात्र ऐसे प्राणी हैं जिन्हें अपनी इच्छा के अनुसार कर्मों का चयन करने की स्वतंत्रता प्राप्त है। इसलिए या तो हम सृष्टि के चक्र के सामंजस्य में योगदान दे सकते हैं या इस ब्रह्माण्डीय संरचना में विसंगति उत्पन्न कर सकते हैं। जब मानव समाज के बहुसंख्यक लोग इस व्यवस्था में जीवनयापन करने के लिए अपने दायित्वों का निर्वहन स्वीकार करते हैं तब उन्हें विपुल भौतिक समृद्धि प्राप्त होती है और उनका आध्यात्मिक विकास होता है। ऐसा काल मानव जाति के सामाजिक और सभ्य इतिहास में स्वर्ण युग कहलाता है। इसके विपरीत जब मानव जाति के अधिकांश लोग भगवान की सृष्टि के नियमों का उल्लंघन करने लगते हैं और ब्रह्मांड का अभिन्न अंग होते हुए भी अपने दायित्वों का निर्वाह करना अस्वीकार कर देते हैं तब भगवान की माया शक्ति उन्हें दण्ड देती है और तब उनकी शान्ति और समृद्धि नष्ट हो जाती है।
काल चक्र की रचना भगवान द्वारा अनुशासन और प्रशिक्षण हेतु तथा चेतना के विभिन्न स्तरों पर सभी मनुष्यों को ऊपर उठाने के लिए की गई है। श्रीकृष्ण अर्जुन को स्पष्ट करते हैं कि वे जो अपने लिए निर्देशित यज्ञ कर्म नहीं करते, वे अपनी इन्द्रियों के दास बन जाते हैं और पापमयी जीवन व्यतीत करते हैं इसलिए वे व्यर्थ में जीवित रहते हैं। किन्तु जो व्यक्ति दैवीय नियमों का पालन करते हैं, उनका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है और वे सभी प्रकार के मानसिक विकारों से मुक्त रहते हैं।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव: |
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते || 17||
लेकिन जो मनुष्य आत्मानंद में स्थित रहते हैं तथा जो प्रबुद्ध और अपने में ही तुष्ट होते हैं, उनके लिए कोई नियत कर्त्तव्य नहीं होता।
केवल वे मनुष्य जो बहिर्मुख विषय भोगों की कामनाओं का त्याग कर देते हैं वही आनन्दमय और आत्मलीन रह सकते हैं। सांसारिक कामनाएँ ही हमारे बंधन का मूल कारण हैं, 'यह होना चाहिए, और यह नहीं होना चाहिए।' श्रीकृष्ण आगे इस अध्याय के 37वें श्लोक में अभिव्यक्त करते हैं कि कामनाएँ ही सभी प्रकार के पापों का कारण हैं इसलिए इनका त्याग करना चाहिए। जैसा कि पहले ही (दूसरे अध्याय के 64वें में श्लोक में) किए गए उल्लेख के अनुसार सदैव यह ध्यान रखें कि जब भी श्रीकृष्ण कामनाओं का त्याग करने का उपदेश देते हैं तब उनका अभिप्राय सांसारिक कामनाओं का त्याग करने से है न कि आध्यात्मिक उन्नति करने की अभिलाषा या भगवत्प्राप्ति की इच्छा का त्याग करने से है।
फिर भी सर्वप्रथम यह विचारणीय है कि सांसारिक कामनाएँ क्यों उत्पन्न होती हैं? जब हम स्वयं को शरीर मानते हैं, तब हमें प्रतीत होता है कि शरीर और मन की कामनाएँ ही आत्मा की इच्छाएँ हैं और ये विचार हमें माया के क्षेत्र में धकेल देते हैं। संत तुलसीदास ने व्यक्त किया है:
जिब जिब ते हरि ते बिलगानो तब ते देह गेह निज मान्यो।
माया बस स्वरूप बिसरायो तेहि भ्रम ते दारुण दुःख पायो।।
"जब जीवात्मा भगवान से विमुख हो जाती है तब माया शक्ति उस पर भ्रम का आवरण डाल देती है। इसी भ्रम के कारण हम स्वयं की पहचान शरीर के रूप में करना आरम्भ कर देते हैं और स्वयं को भूल जाने के कारण हमें अत्यन्त कष्ट सहन करने पड़ते हैं।"
" लेकिन ज्ञानी पुरुष यह अनुभव करते हैं कि आत्मा का कोई भौतिक स्वरूप नहीं है और यह दिव्य है इसलिए यह अविनाशी है। संसार के नश्वर पदार्थ अविनाशी आत्मा की आनंद की क्षुधा को शान्त नहीं कर सकते और इसलिए सांसारिक विषय भोगों के लिए भागना मूर्खता है। इस प्रकार आत्मज्ञान की ज्योति से आलोकित आत्माएँ अपनी चेतना को भगवान के साथ एकीकृत कर देती हैं और अपने भीतर भगवान के असीम आनन्द की अनुभूति करती हैं।
सांसारिकता में लिप्त आत्माओं के लिए निर्धारित कर्म सिद्धावस्था प्राप्त आत्माओं पर लागू नहीं होते क्योंकि उन्होंने ऐसे सभी कर्मों का लक्ष्य पहले ही प्राप्त कर लिया होता है। उदाहरणार्थ जब तक कोई स्नातक का विद्यार्थी रहता है तब उसके लिए विश्वविद्यालय के नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है और जब वह ग्रेजुएट होकर डिग्री प्राप्त कर लेता है तब फिर उसके लिए विश्वविद्यालय के नियम अनावश्यक हो जाते हैं। महापुरुषों के लिए यह कहा गया है: 'ब्रह्मवित् श्रुति मुधिर्न' अर्थात् 'वे जो भगवान के साथ अपना एकत्व स्थापित कर लेते हैं, वे वेदों पर पाँव रखकर चलते हैं' अर्थात् उनके लिए वेदों के नियमों का पालन करना कभी आवश्यक नहीं होता।
वेदों का लक्ष्य जीवात्मा को भगवान के साथ जोड़ने के लिए उनकी सहायता करना है। एक बार जब आत्मा को भगवत्प्राप्ति हो जाती है तब फिर आत्मा को उसके गंतव्य तक पहुँचाने में सहायता करने वाले वेदों के नियम उस पर लागू नहीं होते। ऐसी आत्मा उनके अधिकार क्षेत्र से परे हो जाती है। उदाहरणार्थ पंडित विवाह समारोह में पुरुष और महिला को वैवाहिक गठबंधन में बांध देता है। एक बार जब समारोह समाप्त हो जाता है तब वह कहता है-“अब तुम पति और पत्नी हो, मैं जा रहा हूँ।" उसका काम समाप्त हो जाता है। यदि पत्नी बाद में यह कहती है-"पंडित जी, आपने विवाह समारोह के दौरान जो प्रतिज्ञाएँ करवायी थीं उनका मेरे पति द्वारा पालन नहीं किया जा रहा है।" तब पंडित यह उत्तर देगा-"यह मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर है, मेरा काम तुम दोनों का वैवाहिक गठबंधन करवाना था और यह कार्य हो चुका है।" समान रूप से वेद आत्मा को परमात्मा के साथ मिलाने में सहायता करते हैं। इस प्रकार भगवत्प्राप्ति हो जाने पर वेदों का काम समाप्त हो जाता है। फिर ऐसी पुण्यात्माओं के लिए वैदिक कर्तव्यों का पालन करने की कोई बाध्यता नहीं होती।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन |
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रय: || 18||
ऐसी मुक्त आत्माओं को अपने कर्तव्य का पालन करने या उनसे विमुख होने से कुछ पाना या खोना नहीं होता और न ही उन्हें अपनी निजी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहने की आवश्यकता होती है।
ये आत्मलीन संत आत्मा की अलौकिक अवस्था में स्थित रहते हैं। उनके सभी कर्म लोकातीत और भगवान की सेवा के लिए होते हैं। अतः सांसारिक मनुष्यों के लिए वर्णाश्रम धर्म के आधार पर निर्धारित कर्तव्यों का पालन करना उनके लिए अनिवार्य नहीं होता।
यहाँ कर्म और भक्ति में भेद जानना आवश्यक है। इससे पूर्व श्रीकृष्ण कर्म अर्थात् नियत सांसारिक कर्तव्यों के संबंध में व्याख्या कर रहे थे और यह कह रहे थे कि उन्हें भगवान को समर्पित करना चाहिए। यह मन की शुद्धि और उसे सांसारिक विकारों से ऊपर उठने में सहायता करता है किन्तु आत्मलीन जीवात्मा पहले ही भगवान में विलीन होकर मन को शुद्ध कर चुकी होती है।
ऐसे ज्ञानातीत संत प्रत्यक्ष रूप से भक्ति या पवित्र आध्यात्मिक क्रियाओं, जैसे कि-ध्यान, पूजा, कीर्तन और गुरु की सेवा आदि में तल्लीन रहते हैं। यदि ऐसे आत्मलीन संत सांसारिक कर्मों से विरक्त रहते हैं तो उसे पाप नहीं माना जाता। यदि वे चाहें तो अपने सांसारिक कर्मों का पालन करना आगे जारी रख सकते हैं किन्तु उनका पालन करना उनके लिए अनिवार्य नहीं होता।
इतिहास में दो प्रकार के संत हुए है:
1. प्रह्लाद, ध्रुव, अम्बरीष, पृथु और विभीषण जिन्होंने इस अवस्था को प्राप्त करने के पश्चात् भी अपने सांसारिक कर्तव्यों का निरन्तर पालन किया। ये सब कर्मयोगी थे। बाह्य रूप से वे अपने शारीरिक कर्तव्यों का पालन करते रहे और आंतरिक दृष्टि से उनका मन भगवान में अनुरक्त रहा।
2. शंकराचार्य, माध्वाचार्य, रामानुजाचार्य, चैतन्य महाप्रभु जैसे संत सांसारिक कर्मों से विमुख रहे और इन्होंने वैरागी जीवन स्वीकार किया। ये सब कर्म संन्यासी थे जो शरीर और मन सहित आंतरिक और बाह्य दोनों दृष्टि से भगवान की भक्ति में तल्लीन रहे। इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि भगवत्प्राप्त संत के लिए दोनों विकल्प होते हैं। अब अगले श्लोक में श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करेंगे कि वह अर्जुन के लिए इनमें से कौन-से विकल्प का चयन करने का सुझाव देंगे।
तस्मादसक्त: सततं कार्यं कर्म समाचर |
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुष: || 19||
अतः आसक्ति का त्याग कर अपने कार्य को फल की आसक्ति के बिना करने से ही किसी को परमात्मा की प्राप्ति होती है।
श्लोक 3.8-3.16 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिन मनुष्यों ने अभी तक सिद्धावस्था प्राप्त नहीं की है उन्हें अपने नियत कर्मों का पालन करना चाहिए। श्लोक 3.17-3.18 में उन्होंने व्यक्त किया है कि ज्ञानातीत संतों के लिए नियत कर्मों का पालन करना आवश्यक नहीं होता। अतः अर्जुन के लिए कौन-सा मार्ग अति उपयुक्त है? श्रीकृष्ण उसके लिए कर्मयोगी बनने की संस्तुति करते हैं न कि कर्म संन्यासी बनने की। अब वे श्लोक 3.20-3.26 में इसके कारणों की व्याख्या करेंगे।
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय: |
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि || 20||
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: |
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते || 21||
राजा जनक और अन्य महापुरुषों ने अपने नियत कर्मों का पालन करते हुए सिद्धि प्राप्त की थी इसलिए तुम्हें भी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए समाज के कल्याण के लिए अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। महापुरुष जो भी कर्म करते हैं, सामान्य जन उनका पालन करते हैं, वे जो भी आदर्श स्थापित करते हैं, सारा संसार उनका अनुसरण करता है।
राजा जनक ने अपने शासकीय कर्त्तव्यों का निर्वहन करते हुए कर्मयोग द्वारा सिद्ध अवस्था प्राप्त कर ली थी। ज्ञानातीत अवस्था प्राप्त करने के पश्चात् भी संसार में सामान्य लोगों के समक्ष आदर्श प्रस्तुत करने के उद्धेश्य से वे अपने नियत सांसारिक कर्त्तव्यों का पालन करते रहे ताकि लोग उनका अनुकरण कर सकें। कई अन्य महान संतों ने भी ऐसा ही किया। इन महापुरुषों द्वारा स्थापित उच्च आदर्शों को देखकर मानवजाति को प्रेरणा मिली।
मानव जाति उन्हीं आदर्शों से प्रेरित होती है जिन्हें वो महापुरुषों के जीवन में देखती है। ऐसे नेता अपने आदर्शों से समाज को प्रेरणा प्रदान करते हैं और सामान्य जन के लिए चमकते हुए प्रकाश स्तम्भ बन जाते हैं ताकि वे उनका अनुसरण कर सकें। समाज के नेताओं का यह नैतिक दायित्व होता है कि वे अपने वचनों, कार्यों और चरित्र द्वारा जनता को प्रेरित करने के लिए उच्च आदर्श स्थापित करें। जब श्रेष्ठ नेता आगे बढ़कर नेतृत्व करते हैं तब स्वाभाविक रूप से शेष समाज नैतिकता, नि:स्वार्थता और आध्यात्मिक शक्ति में ऊपर उठ जाता है। लेकिन जब किसी समय समाज आदर्शवादी नेतृत्व से शून्य होता है तब समाज के लोगों के पास अनुसरण करने के लिए कोई मानदण्ड नहीं होते और इसलिए वे आत्म केन्द्रित होकर, अपना पतन करा लेते हैं। इसलिए महापुरुषों को समाज के लिए उपयुक्त मानदण्ड स्थापित करने चाहिए, भले ही वे स्वयं लोकातीत अवस्था को प्राप्त कर चुके हों और उनके लिए नियत वैदिक कर्मों का पालन करना अनिवार्य न हो। क्योंकि ऐसा करके वे दूसरों को निर्धारित वैदिक कर्तव्यों का पालन करने के लिए प्रेरित करते हैं।
यदि समाज के जननायक कर्म संन्यासी बन जाते हैं और कर्मों का त्याग कर देते हैं तब अधिक लोग पथ से भ्रष्ट हो जायेंगे। जननायक यदि परमगति को पा चुके और पूर्णतया अध्यात्म में तल्लीन गये हों फिर भी समाज के अन्य लोग अपने कर्तव्यों से विमुख होने के लिए उनके आदर्शों का अनुकरण करेंगे। ऐसे पलायनवादी महान कर्म सन्यासियों जैसे शंकराचार्य, माध्वाचार्य, निर्म्बाकाचार्य और चैतन्य महाप्रभु का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उनके पदचिह्नों पर चलने की बात करते हुए ये पाखण्डी भी अपने सांसारिक दायित्वों का परित्याग कर देते हैं और संन्यास धारण कर लेते हैं। यद्यपि उन्होंने उस समय तक इसके लिए इन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षित मन की शुद्धता प्राप्त नहीं की होती। भारत में हमें ऐसे हजारों साधु मिलते हैं जो महान् सन्यासियों का अनुकरण करते हैं और ज्ञान और भक्ति के बिना गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं। यद्यपि वे बाह्य रूप से वैरागी बन जाते हैं किन्तु उनका स्वभाव उन्हें सुख की प्राप्ति के लिए विवश करता है और भगवान के दिव्य आनन्द से विहीन होकर वे मादक द्रव्यों के सेवन रूपी अधम सुखों के चंगुल में फंस जाते हैं। इस प्रकार से वे गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रहे लोगों के स्तर से भी नीचे गिर जाते हैं, जैसा कि निम्न दोहे में वर्णन किया गया है
ब्रह्म ज्ञान जान्यो नहीं, कर्म दिये छिटकाय।
तुलसी ऐसी आत्मा सहज नरक मँह जाय ।।
संत तुलसीदास कहते हैं "वे जो दिव्य ज्ञान की प्राप्ति के बिना सांसारिक कर्त्तव्यों का त्याग करते हैं, वे शीघ्र नरक का मार्ग तैयार करते हैं।" इसके विपरीत यदि महानायक कर्मयोगी होता है तब कम से कम उसके अनुयायी निरन्तर अपने कर्मों को कर्त्तव्यपरायणता के साथ निष्ठापूर्वक सम्पन्न कर अपने दायित्वों का निर्वहन तो करेंगे। इससे उन्हें अपने मन और इन्द्रियों पर संयम रखने में सहायता मिलेगी और शनैः-शनैः वे मायातीत अवस्था तक ऊपर उठ जाएंगे। इसलिए समाज के अनुसरणार्थ आदर्श प्रदर्शित करने के लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग का पालन करने का परामर्श देते हैं। अब उक्त बिंदु को समझाने के लिए वे अगले श्लोक में अपना उदाहरण दे रहे हैं।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन |
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि || 22||
हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरे लिए कोई कर्म निश्चित नहीं है, न ही मुझे किसी पदार्थ का अभाव है और न ही मुझमें कुछ पाने की अपेक्षा है फिर भी मैं कर्म करता हूँ।
हम सब इसलिए कार्य करते हैं क्योंकि हमारी कुछ मूलभूत आवश्यकताएँ होती हैं। हम सब आनंदसिंधु भगवान के अणु अंश हैं इसलिए हम भी आनन्द चाहते हैं। फिर भी हमें अभी तक पूर्ण आनन्द प्राप्त नहीं हुआ है। हम स्वयं को असंतुष्ट और अपूर्ण ही समझते हैं। हम जो कुछ भी करते हैं, केवल आनन्द की प्राप्ति के लिए ही करते हैं लेकिन आनन्द भगवान की एक शक्ति है और केवल वे ही असीम आनन्द के स्वामी हैं। भगवान ही पूर्ण और स्वयंसिद्ध हैं और उन्हें किसी बाहरी पदार्थ की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती इसलिए उन्हें आत्माराम, आत्मरति और आत्मक्रिड भी कहा जाता है।
यदि ऐसा परम पुरुष कोई कार्य करता है तब उसका केवल एकमात्र यह कारण होता है कि वे अपने लिए कुछ न कर लोगों के कल्याण के लिए ही कार्य करेगा। इस प्रकार से श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि साकार रूप में भी ब्रह्माण्ड में मेरे लिए किस भी प्रकार के नियत कर्म नहीं हैं लेकिन फिर भी मैं लोगों के कल्याण के लिए कर्म करता हूँ। अब वे स्पष्ट करते हैं कि जब वे कर्म करते हैं उससे भी किस प्रकार से मानव मात्र का कल्याण होता है।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रित: |
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: || 23||
यदि मैं सावधानीपूर्वक नियत कर्म नहीं करता तो हे पार्थ! सभी लोगों ने निश्चित रूप से सभी प्रकार से मेरे मार्ग का ही अनुसरण किया होता।
पृथ्वी पर अपनी दिव्य लीलाओं को प्रदर्शित करते हुए श्रीकृष्ण एक राजा और महानायक की भूमिका निभा रहे थे।
श्रीकृष्ण ने भौतिक संसार में धर्म परायण वृष्णि वंश के राजा वसुदेव के पुत्र के रूप में जन्म लिया था। यदि भगवान कृष्ण अपने निर्धारित वैदिक कर्मों का निर्वहन नहीं करते तब सामान्य जन भी उनके पदचिह्नों का अनुसरण यह सोंचकर करते कि उनका उल्लंघन करना ही उचित है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा करने से मानव जाति के विनाश का दोष उन पर लगता।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् |
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमा: प्रजा: || 24||
यदि मैं अपने निर्धारित कर्म को नहीं करता तब ये सभी लोक नष्ट हो जाते और मैं संसार में उत्पन्न होने वाली अराजकता के लिए उत्तरदायी होता और इस प्रकार से मानव जाति की शांति का विनाश करने वाला कहलाता।
जब श्रीकृष्ण धरती पर मनुष्य के रूप में प्रकट हुए तब उन्होंने एक क्षत्रिय के रूप में समाज में अपनी प्रतिष्ठा के अनुसार उपयुक्त सभी प्रकार के अपेक्षित शिष्टाचारों और कुलाचारों को अपनाया। यदि वे इसके विपरीत कर्म करते तब अन्य मनुष्य भी यह सोंचकर उनका अनुकरण करते कि उन्हें भी भगवान श्रीकृष्ण के आचरण के अनुरूप ही चलना चाहिए। यदि श्रीकृष्ण वैदिक कर्म का अनुपालन करने में असफल हो जाते तब मानव जाति भी उनके पदचिन्हों का अनुसरण कर कर्म के अनुशासन से पलायन कर अराजकता की स्थिति में आ जाती। यह एक गम्भीर अपराध होता और श्रीकृष्ण इसके दोषी कहलाते इसलिए वे अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि यदि वह अपने वर्ण धर्म का पालन नहीं करेंगे तब उसके कारण समाज में अराजकता उत्पन्न होगी।
अर्जुन अजेय तथा विश्व विख्यात योद्धा था तथा धर्मपरायण राजा युधिष्ठर का भाई था। यदि अर्जुन धर्म की रक्षा के लिए अपने कर्तव्य का पालन करने से मना कर देता तब अन्य पराक्रमी और श्रेष्ठ योद्धा भी उसका अनुकरण करते हुए धर्म की रक्षा के निमित्त अपने नियत कर्त्तव्य के पालन को त्याग देते। इससे संसार का संतुलन डगमगा जाता और निर्दोष तथा गुणी लोगों का विनाश हो जाता। इसलिए श्रीकृष्ण ने समूची मानव जाति के कल्याणार्थ अर्जुन को उसके लिए निश्चित वैदिक कर्तव्यों की उपेक्षा न करने के लिए मनाया।
सक्ता: कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत |
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् || 25||
हे भरतवंशी! जैसे अज्ञानी लोग फल की आसक्ति से कर्म करते हैं, उसी प्रकार बुद्धिमान मनुष्यों को लोगों को उचित मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करने हेतु अनासक्त रहकर कर्म करना चाहिए।
श्लोक 3.20 में पहले श्रीकृष्ण ने 'लोकसंग्रहमेवापि, सम्पश्यन्कुर्तमर्हसि' शब्दों का प्रयोग किया था जिसका अर्थ 'जन कल्याण की भावना से युक्त होना' है। इस श्लोक में 'लोकसंग्रह चिकीर्षुः' शब्द का अर्थ 'विश्व के कल्याण की इच्छा' है। इस प्रकार श्रीकृष्ण पुनः इस पर बल देते हैं कि बुद्धिमान मनुष्य को सदैव मानवता के कल्याणार्थ कार्य करना चाहिए।
इस श्लोक में 'सक्ताः अविद्वांस:' शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए किया गया जो अभी तक शरीर की चेतना में स्थित हैं और सांसारिक सुखों में आसक्त रहते हैं, साथ ही शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित वैदिक रीतियों में पूर्ण विश्वास रखते हैं। उन्हें अज्ञानी कहा जाता है क्योंकि यद्यपि उन्हें धार्मिक ग्रथों का सैद्धांतिक ज्ञान होता है लेकिन वे भगवत्प्राप्ति के परम लक्ष्य को पाना नहीं चाहते। ऐसे अज्ञानी मनुष्य बिना किसी आलस्य के निःसंकोच होकर शास्त्रों के आदेशों के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। उन्हें यह दृढ़ विश्वास होता है कि वैदिक कर्तव्यों और कर्मकाण्डों का अनुपालन करने से उन्हें उनकी इच्छा के अनुरूप भौतिक सुख प्राप्त होंगे। इसलिए यदि ऐसे लोगों का भक्ति में विश्वास विकसित हुए बिना धार्मिक कर्मकाण्डों से विश्वास उठ जाता है तब वे कहीं के नहीं रहेंगे अर्थात् उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है:
तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्देत यावता।
मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ।।
(श्रीमद्भागवतम् 11.20.9)
"मनुष्य को अपने नियत कर्मों का सम्पादन तब तक करना चाहिए जब तक उनमें विषय भोगों के प्रति विरक्ति और भगवान के लिए अनुराग विकसित नहीं होता।" श्रीकृष्ण अर्जुन से आग्रह करते हैं कि जैसे अज्ञानी श्रद्धापूर्वक वैदिक कर्मकाण्डों का पालन करते हैं, उसी प्रकार से ज्ञानी पुरूष को भी भौतिक सुख समृद्धि की अपेक्षा शेष समाज के लिए आदर्श स्थापित करने के लिए निष्ठापूर्वक अपने नियत कर्मों का निष्पादन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जिन विशेष परिस्थितियों में अर्जुन स्वयं को पाता है, वह धर्मयुद्ध है। इसलिए अर्जुन को समाज के कल्याण के लिए अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करना चाहिए।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् |
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन् || 26||
ज्ञानवान मनुष्यों को चाहिए कि वे अज्ञानी लोगों को जिनकी आसक्ति सकाम कर्म करने में रहती है, उन्हें कर्म करने से रोक कर उनकी बुद्धि में संशय उत्पन्न न करें अपितु स्वयं ज्ञानयुक्त होकर अपने कार्य करते हुए उन अज्ञानी लोगों को भी अपने नियत कर्म करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
महापुरुषों का दायित्व अति महत्वपूर्ण होता है क्योंकि सामान्य जन उनका अनुसरण करते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि ज्ञानी पुरुष कोई ऐसा कार्य न करें या कुछ ऐसा न कहें कि जो अज्ञानी लोगों को अधोपतन की ओर ले जाए। यहाँ यह तर्क दिया जा सकता है कि यदि ज्ञानीजन अज्ञानियों के प्रति करुणा भाव रखते हैं तब उन्हें उनको भगवत्प्राप्ति का ज्ञान प्रदान करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण इस तर्क को 'न बुद्धिभेदं जनयेत्' कहकर निष्प्रभावी करते हैं जिसका तात्पर्य यह है कि अज्ञानी को दिव्य उपदेश सुनाकर उन्हें कर्मों का परित्याग करने की शिक्षा नहीं देनी चाहिए क्योंकि उनमें ऐसे उपदेशों को समझने की योग्यता नहीं होती। प्रायः लौकिक चेतना युक्त लोगों के पास केवल दो विकल्प होते हैं या तो वे लोग सुखद परिणाम की इच्छा से कड़ा परिश्रम करते हैं या फिर वे यह तर्क देते हुए कर्म करना छोड़ देते हैं कि सभी कार्य अत्यंत कठिन, कष्टदायक और बुराइयों से युक्त होते हैं। इन दोनों में फल की इच्छा से कर्म करना पलायनवादी व्यक्ति के दृष्टिकोण से श्रेष्ठ है। इसलिए वैदिक ज्ञान के विद्वानों को अज्ञानियों को सावधानीपूर्वक और ध्यान से अपने कर्मों का पालन करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। यदि अज्ञानी लोगों का मन विक्षुब्ध और अस्थिर हो जाता है तब उनका कर्म करने से विश्वास उठ जाएगा और नियत कर्मों का त्याग करने से उनका ज्ञान नहीं बढ़ेगा। इस प्रकार अज्ञानियों की दोनों ओर से हानि होगी। यदि अज्ञानी और ज्ञानीजन दोनों वैदिक कर्म करते हैं तब फिर दोनों के बीच क्या भेद रह जाएगा? इस प्रश्न को समझाने के लिए श्रीकृष्ण इसे अगले दो श्लोकों में स्पष्ट कर रहे हैं।
प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश: |
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते || 27||
जीवात्मा देह के मिथ्या ज्ञान के कारण स्वयं को अपने सभी कर्मों का कर्ता समझती है।यद्यपि विश्व के सभी कार्य प्रकृति के तीन गुणों के अन्तर्गत सम्पन्न होते हैं लेकिन अहंकारवश जीवात्मा स्वयं को अपने सभी कर्मों का कर्ता समझती है।
हम जानते हैं कि संसार हमारे द्वारा निर्देशित नहीं होता अपितु प्रकृति द्वारा कार्यान्वित होता है। हमारे शरीर की क्रियाएँ जिन्हें हम प्रायः दो श्रेणियों में विभक्त करते हैं-1. प्राकृतिक जैविक क्रियाएँ, जैसे-पाचन, रक्त संचालन, हृदय गति आदि का संचालन हमारे सोंच-विचार के बिना स्वाभाविक रूप से संपन्न होता है। बोलना, सुनना, चलना, सोना और काम करना आदि क्रियाओं का संचालन हमारे सोंचने और विचारने से होता है।
उपर्युक्त दोनों प्रकार के कार्य इस मानव तंत्र द्वारा संपन्न होते हैं। मानव तंत्र के सभी अंग प्रकृति या भौतिक शक्ति द्वारा निर्मित होते हैं जिसमें तीन गुण-सत्व, रजस, और तमस सम्मिलित हैं। जैसे लहर समुद्र से अलग नहीं होती अपितु उसमें समाकर उसका अंश बनी रहती है, उसी प्रकार से शरीर उसी प्रकृति का अंग है जिससे इसकी रचना होती है। इस प्रकार से प्रकृति अर्थात् माया शक्ति ही संसार में होने वाले सभी कार्यकलापों की जननी है। तब फिर आत्मा स्वयं को कर्मों का कर्ता क्यों समझती है। इसका कारण यह है कि मिथ्या अभिमान के बोध से आत्मा भ्रम के कारण स्वयं को शरीर समझ लेती है। इसलिए उसे कर्ता होने का भ्रम हो जाता है। देखिए, जिस प्रकार अगर रेलवे प्लेटफार्म पर दोनों ओर दो ट्रेन खड़ी है और एक रेलगाड़ी के यात्री दूसरी रेलगाड़ी पर अपनी दृष्टि रखे हुए हैं और फिर जब दूसरी रेलगाड़ी चलने लगती है तब पहली गाड़ी भी चलती हुई प्रतीत होने लगती है। इसी प्रकार से अचल आत्मा स्वयं को सचल प्रकृति के रूप में पहचानने लगती है। जिस क्षण आत्मा अभिमान को त्याग कर भगवान की इच्छा के आगे समर्पण कर देती है तब उसे स्वयं के अकर्ता होने का आभास होता है। अब कोई यह प्रश्न कर सकता है कि यदि आत्मा वास्तव में अकर्ता है तब फिर वह शरीर द्वारा किए गए कार्यों के कारण कर्मों के बंधन में क्यों फंसती है। इसका कारण यह है कि आत्मा स्वयं कोई कार्य नहीं करती लेकिन वह इन्द्रिय-मन-बुद्धि को कार्य करने का निर्देश देती है। उदाहरण गार्थ रथ का सारथी स्वयं रथ को नहीं चलाता अपितु घोड़ों को निर्देश देता है। अब यदि कोई दुर्घटना घटित होती है तब उसका दोष घोड़ों का न होकर अपितु उन्हें निर्देशित करने वाले सारथी का होता है। उसी प्रकार से आत्मा शरीर के कार्यों के लिए उत्तरदायी होती है क्योंकि इन्द्रिय, मन और बुद्धि आत्मा से प्रेरणा पा कर ही कार्य करते हैं।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयो: |
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते || 28||
हे महाबाहु अर्जुन! तत्त्वज्ञानी आत्मा को गुणों और कर्मों से भिन्न रूप में पहचानते हैं वे समझते हैं कि 'इन्द्रिय, मन, आदि के रूप में केवल गुण ही हैं जो इन्द्रिय विषयों, (गुणेषु) में संचालित होते हैं। इसलिए वे उनमें नहीं फंसते।
गत श्लोक में अहंकार विमूढात्मा शब्दों का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ है 'जो अहंकार से मोहित होकर स्वयं को शरीर मान लेते हैं और स्वयं को कर्ता समझने लगते हैं।' इस श्लोक में तत्त्ववित्तु या सत्यदर्शियों के संबंध में व्याख्या की गयी है। जिसका तात्पर्य यह है कि वे अहंकार को त्याग कर शारीरिक चेतना से मुक्त हो जाते हैं और इस शरीर से भिन्न अपने स्वरूप को जानने में समर्थ हो जाते हैं। इसलिए वे अपने लौकिक कर्मों के लिए स्वयं को कर्ता नहीं मानते और सभी क्रियाओं को तीन गुणों का परिणाम मानते हैं। ऐसे भगवतप्राप्त संत कहते हैं, " जो करै सो हरि करै, होत कबीर कबीर।" "सब कुछ भगवान करता है किन्तु लोग स्वयं को कर्ता मानने की भूल करते हैं।"
प्रकृतेर्गुणसम्मूढा: सज्जन्ते गुणकर्मसु |
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् || 29||
जो मनुष्य प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मोहित हो जाते हैं वे फल प्राप्ति की कामना के साथ अपने कर्म करते हैं लेकिन बुद्धिमान पुरुष जो इस परम सत्य को जानते हैं, उन्हें ऐसे अज्ञानी लोगों को विचलित नहीं करना चाहिए।
अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि आत्मा गुणों और उनकी क्रियाओं से पृथक् है तब फिर अज्ञानी मनुष्य विषय भोगों की ओर आसक्त क्यों होते हैं। श्रीकृष्ण इस श्लोक में इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि वे माया के तीन गुणों से मोहित होकर स्वयं को कर्ता मान लेते हैं। माया के तीन गुणों से मुग्ध होकर वे कामसुख और मानसिक आनन्द की प्रप्ति के लिए ही कार्य करते हैं। वे फल की इच्छा के बिना कर्तव्य पालन करने में असमर्थ होते हैं।
फिर भी ‘कृत्स्नवित्' ज्ञानवान मनुष्य को 'अकृत्स्नवित्' अज्ञानी मनुष्य के मन को विक्षुब्ध नहीं करना चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि ज्ञानी पुरूषों को अज्ञानी लोगों पर अपने विचारों को बलात् यह कहकर थोपना नहीं चाहिए 'तुम शरीर नहीं आत्मा हो और इसलिए कर्म करना निरर्थक है, अतः कर्म का त्याग करो' बल्कि इसके विपरीत उन्हें अज्ञानी लोगों को अपने नियत कर्म करने का उपदेश देना चाहिए जिससे उन्हें धीरे-धीरे आसक्ति से ऊपर उठने में सहायता मिल सके। इस प्रकार ज्ञानी और अज्ञानी मनुष्यों के बीच अन्तर स्पष्ट करने के पश्चात् श्रीकृष्ण कहते हैं कि अज्ञानी लोगों के मन को क्षुब्ध नहीं करना चाहिए।
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा |
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर: || 30||
अपने समस्त कर्मों को मुझको अर्पित करके और परमात्मा के रूप में निरन्तर मेरा ध्यान करते हुए कामना और स्वार्थ से रहित होकर अपने सन्तापों को त्याग कर युद्ध करो।
अपनी विलक्षण शैली में श्रीकृष्ण पहले विषय को प्रतिपादित करते हैं और तत्पश्चात् उसका सार प्रकट करते हैं। 'अध्यात्मचेतसा' शब्द का अर्थ 'भगवान को समर्पित करने की भावना के साथ' तथा 'संन्यस्य' शब्द का अर्थ 'जो भगवान को समर्पित न हो उन सबका परित्याग करना' है। 'निराशी' शब्द का तात्पर्य कर्मों के फलों में आसक्ति न रखने से है। स्वामित्व की भावना को त्यागने के लिए सभी कर्मों को भगवान के प्रति समर्पित करना और अपने निजी लाभ, लालसा और शोक का त्याग करना आवश्यक है। पिछले श्लोक में दिए गए उपदेशों का सार यह है कि हमें निष्ठापूर्वक यह चिन्तन करना चाहिए-"मेरी आत्मा परम शक्तिशाली भगवान का अणु अंश है। वे सभी पदार्थों के भोक्ता और स्वामी हैं। मेरे सभी कर्म उनके सुख के निमित्त हों और इसलिए मुझे अपने सभी कर्तव्यों का पालन उनके प्रति यज्ञ या समर्पण की भावना से करना चाहिए। उनके द्वारा प्रदत्त शक्ति से ही मैं अपने यज्ञ कर्म को सम्पन्न करता हूँ। इसलिए मुझे अपने कर्मों के शुभ परिणामों का श्रेय नहीं लेना चाहिए।"
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवा: |
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभि: || 31||
जो मनुष्य अगाध श्रद्धा के साथ मेरे इन उपदेशों का पालन करते हैं और दोष दृष्टि से परे रहते हैं, वे भी कर्म के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।
भगवान ने सिद्धान्त शब्द की व्याख्या 'मत' के रूप में की है। मत एक व्यक्तिगत विचार है जबकि सिद्धान्त सार्वभौमिक सत्य है। आचार्यों के मत विभिन्न हो सकते हैं किन्तु सिद्धान्त समान रहता है। दार्शनिक, आचार्य और शिक्षक अपने मत को सिद्धान्त का नाम देते हैं किन्तु गीता में श्रीकृष्ण ने अपने सिद्धान्तों को मत के रूप में अभिव्यक्त किया है। अपने आचरण द्वारा वे हमें सौहार्दपूर्ण और दीनता का व्यवहार करने का उपदेश दे रहे हैं।
कर्म करने का आह्वान करते हुए श्रीकृष्ण अब भगवद्गीता के उपदेशों के महत्त्व को श्रद्धापूर्वक स्वीकार करने और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का संदेश देते हैं। मानव के रूप में हमारा दायित्व है कि हम सत्य को जानें और तदनुसार अपने जीवन को सुधारे। ऐसा करने से हमारे मानसिक सन्ताप, काम, लोभ, ईर्ष्या, मोह आदि शान्त हो जाते हैं।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को स्पष्ट रूप से अपने सभी कर्म उन्हें समर्पित करने को कहा था। वे जानते हैं कि उनसे ईर्ष्या करने वाले लोगों के लिए उनके कथन उपहास और निंदा का कारण हो सकते हैं। इसलिए अब वे अपने दिव्य उपदेशों को समर्पित भाव से स्वीकार करने पर जोर देते हैं। उनके कथन के अनुसार जो मनुष्य इन उपदेशों का श्रद्धापूर्वक अनुसरण करते हैं, वे कर्म के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। लेकिन जो श्रद्धायुक्त नहीं हैं उनकी क्या दशा होगी? उनकी दुर्दशा को अगले श्लोक में व्यक्त किया गया है।
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् |
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतस: || 32||
किन्तु जो मेरे उपदेशों में दोष ढूंढते हैं, वे ज्ञान से वंचित और विवेकहीन होते हैं, इन सिद्धान्तों की उपेक्षा करने से वे अपने विनाश का कारण बनते हैं।
श्रीकृष्ण द्वारा प्रस्तुत उपदेश हमारे कल्याण के लिए अति उपयुक्त हैं। हमारी मायाबद्ध बुद्धि में अनगिनत दोष हैं जिसके कारण हम भगवान के उपदेशों की महत्ता को समझने या उसकी सराहना करने में सक्षम नहीं होते। यदि ऐसा हो जाये तो परमात्मा और जीवात्मा के बीच क्या भेद रह जाएगा है? इसलिए गीता के दिव्य उपदेशों को स्वीकार करने के लिए श्रद्धा अनिवार्य है। जब हमारी बुद्धि इन्हें समझने की अपेक्षा इन उपदेशों में दोष ढूंढने लगती है तब हमें यह सोंचकर अपनी बुद्धि का समर्पण कर देना चाहिए-" श्रीकृष्ण ने ऐसा कहा है। इसमें अवश्य ही सत्यता है जिसे मैं अभी समझ नहीं सकता। अभी मुझे यह स्वीकार करना चाहिए और आध्यात्मिक साधना करनी चाहिए। इन उपदेशों को मैं तब समझ पाऊँगा जब मैं साधना द्वारा आध्यात्मिक पथ पर उन्नति कर लूंगा।" इसी मनोवृति को श्रद्धा कहते हैं।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने श्रद्धा की परिभाषा इस प्रकार से की है-" गुरु-वेदान्त-वाक्येशु दृढो विश्वासः" अर्थात् 'श्रद्धा गुरु और शास्त्रों के वचनों में दृढ़ विश्वास' है। चैतन्य महाप्रभु ने भी इसी प्रकार की व्याख्या की है-“श्रद्धा शब्दे विश्वास कहे सुदृढ निश्चय" (चैतन्य चरितामृत मध्य लीला 2.62) अर्थात् “श्रद्धा का अर्थ गुरु और भगवान में अटूट विश्वास होना है', भले ही हम वर्तमान में उनके उपदेशों को समझने में असमर्थ हैं। ब्रिटिश कवि अल्फ्रेड टेनिसन ने कहा था- "जहाँ हम सिद्ध नहीं कर सकते वहाँ केवल श्रद्धा द्वारा ही विश्वास को अंगीकार किया जा सकता है।" इसलिए श्रद्धा का अर्थ यह है कि भगवद्गीता के समझे जाने वाले सरल अंशों को विनम्रतापूर्वक आत्मसात् करते हुए और इसके कठिन अंशों को भी इस आशा के साथ स्वीकार करना चाहिए कि ये भी भविष्य में समझ में आ जायेंगे।
मायिक बुद्धि का एक मुख्य दोष अहंकार है। अहंकार के कारण जिसे वर्तमान में बुद्धि समझ नहीं सकती प्रायः उसे दोष युक्त मानकर अस्वीकार कर देती है। यद्यपि सर्वज्ञ भगवान के रूप में भगवान श्रीकृष्ण ने जीवात्मा के कल्याण हेतु अपने दिव्य उपदेश प्रकट किए हैं किन्तु मनुष्य उसमें अभी तक दोष ढूंढते हैं, जैसे-" भगवान स्वयं को सभी कुछ समर्पित करने के लिए क्यों कहते हैं? क्या भगवान लोभी हैं? क्या वे अहंकारी हैं जो अर्जुन को अपनी उपासना करने को कहते हैं?"
श्रीकृष्ण कहते हैं-"ऐसे लोग विवेक शून्य हैं क्योंकि वे शुद्ध और अशुद्ध, धर्म और अधर्म सृष्टि के कर्ता और कृत्य, परम स्वामी और दास के बीच के अन्तर को समझने में असमर्थ होते हैं। ऐसे मनुष्य अपने विनाश का कारण बनते हैं" क्योंकि वे परम मुक्ति के मार्ग को अस्वीकार कर देते हैं और जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमते रहते हैं।
सदृशं चेष्टते स्वस्या: प्रकृतेर्ज्ञानवानपि |
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह: किं करिष्यति || 33||
बुद्धिमान लोग भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही कार्य करते हैं क्योंकि सभी जीव अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति से प्रेरित होते हैं। दमन से क्या प्राप्त हो सकता है?
इस श्लोक में श्रीकृष्ण पुनः इस बिन्दु की ओर लौटते हैं कि कर्म करना निष्क्रिय रहने से श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव से प्रेरित होकर लोग अपने व्यक्तिगत गुणों के अनुसार कार्य करने में प्रवृत्त होते हैं जबकि सैद्धान्तिक रूप से शिक्षित लोग भी अपने अनन्त पूर्वजन्मों के संस्कारों, इस जन्म के 'प्रारब्ध' तथा अपने मन और बुद्धि की गठरी को अपने साथ उठाए रहते हैं। उन्हें प्रतीत होता है कि इस प्रकृति और प्रवृत्ति के वेग को रोकना कठिन है। यदि वैदिक ग्रंथ उन्हें सभी प्रकार के कर्मों का त्याग करने का और केवल आध्यात्मिकता में तल्लीन होने का उपदेश देते तब इससे असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो गयी होती। ऐसी कृत्रिम विमुखता का प्रतिकूल प्रभाव होता। आध्यात्मिक उन्नति का उपयुक्त और सरल मार्ग प्रकृति और प्रवृत्ति की असीम शक्ति का प्रयोग करना और इनकी दिशा को भगवान की ओर परिवर्तित करना है। जिस स्थिति में हम हैं वहीं से हमें आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होना आरम्भ करना चाहिए और ऐसा करने के लिए हमें सर्वप्रथम अपनी वर्तमान मनोदशा को स्वीकार करना होगा और तत्पश्चात् इसे सुधारना होगा।
हम देखते हैं कि जानवर भी स्वभाव के अनुसार कार्य करते हैं। चीटियाँ एक सामाजिक प्राणी के रूप में अपने समुदाय की देखभाल के लिए भोजन एकत्रित करती हैं। ऐसा गुण मनुष्य में कठिनता से देखने को मिलता है। एक गाय का अपने बछड़े से स्वाभाविक लगाव होता है। एक क्षण के लिए भी जब वह उसकी आंखों से ओझल होता है तब गाय अत्यंत व्याकुल हो जाती है। कुत्ते की स्वामिभक्ति की तुलना भी सभ्य मनुष्यों से नहीं की जा सकती। उसी तरह मनुष्य भी अपनी प्रकृति से प्रेरित होते हैं। चूँकि अर्जुन योद्धा था इसलिए श्रीकृष्ण ने उससे कहा कि 'तुम्हारा क्षत्रिय स्वभाव तुमसे युद्ध की अपेक्षा करता है' (भगवद्गीता 18.59)। 'तुम अपने जन्मजात स्वभाव से जनित कर्म द्वारा बाध्य होकर इसे करोगे' (भगवद्गीता 18.60)। हमें अपने लक्ष्य को सांसारिक सुखों से हटाते हुए उसे भगवत्प्राप्ति की ओर परिवर्तित कर अपने स्वभाव का परिष्कार करना चाहिए और अपने नियत कर्तव्यों का पालन बिना आसक्ति और द्वेष भाव से ईश्वर सेवा की भावना के साथ करना चाहिए।
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ |
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ || 34||
इन्द्रियों का इन्द्रिय विषयों के साथ स्वाभाविक रूप से राग और द्वेष होता है किन्तु मनुष्य को इनके वशीभूत नहीं होना चाहिए क्योंकि ये आत्म कल्याण के मार्ग के अवरोधक और शत्रु हैं।
यद्यपि श्रीकृष्ण ने पहले यह कहा था कि मन और इन्द्रियाँ अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति द्वारा प्रेरित होती हैं, किन्तु अब वे इन्हें वश में करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाल रहे हैं। जब तक हमारा भौतिक शरीर हमारे साथ है तब तक उसकी देखभाल के लिए हमें विषयों का भोग करना पड़ता है। श्रीकृष्ण उपयोग को रोकने के लिए नहीं कहते किन्तु वे आसक्ति और द्वेष के उन्मूलन का अभ्यास करने का उपदेश देते हैं। पूर्वजन्म के संस्कारों का सभी मनुष्यों के जीवन पर निश्चित रूप से गहन प्रभाव पड़ता है लेकिन यदि हम गीता द्वारा सिखायी गयी विधि का अभ्यास करते हैं तब हम अपनी दशा को सुधारने में सफल हो सकते हैं।
इन्द्रियाँ अपने विषयों की ओर आकर्षित होती हैं और उनके सन्निकर्ष से सुख और दुःख की अनुभूति होती है। जिह्वा स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद चखना चाहती है और कड़वा स्वाद उसे पसंद नहीं आता। मन बार-बार सुख और दुःख से जुड़े विषयों का चिन्तन करता है। विषयों के सुख के अनुभव से आसक्ति और दुःख के अनुभव से द्वेष उत्पन्न होती है। श्रीकृष्ण अर्जुन को न तो आसक्ति और न ही द्वेष के वशीभूत होने को कहते हैं।
अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए हमें अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। हमें न तो अनुकूल परिस्थितियों के लिए लोभ करना चाहिए और न ही प्रतिकूल परिस्थितियों की उपेक्षा करनी चाहिए। जब हम मन और इन्द्रियों के रुचिकर और अरुचिकर दोनों विषयों की दासता से मुक्त हो जाते हैं तब हम अपनी अधम प्रकृति से ऊपर उठ जाते हैं और फिर हम अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करते समय सुख और दुःख दोनों में समभाव से रहते हैं। तब हम वास्तव में अपनी विशिष्ट प्रकृति से मुक्त होकर कार्य करते हैं।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: || 35||
अपने धर्म को दोष युक्त सम्पन्न करना किसी अन्य के धर्म को समुचित ढंग से सम्पन्न करने से कहीं अधिक श्रेष्ठ होता है। वास्तव में अपने कर्तव्य का पालन करते हुए मर जाना दूसरों के कर्तव्य का अनुसरण करने से श्रेयस्कर होता है। दूसरे के धर्म का पालन भययुक्त है।
इस श्लोक में धर्म शब्द चार बार प्रयुक्त हुआ है। धर्म का प्रयोग प्रायः हिन्दुत्व और बौद्ध के लिए किया जाता है किन्तु अंग्रेजी भाषा में इस शब्द का अनुवाद अत्यंत दुष्कर है। धर्म शब्द की रचना 'धृ' धातु से हुई है जिसका अर्थ धारण करने योग्य या उपयुक्त उत्तरदायित्व, कर्तव्य, विचार, और कर्म है। उदाहरणार्थ आत्मा का धर्म भगवान से प्रेम करना है। यह हमारे अस्तित्व का मुख्य सिद्धान्त है।
स्व उपसर्ग का अर्थ 'स्वयं' है। इस प्रकार स्वधर्म हमारा निजी धर्म है। स्व धर्म हमारे निजी जीवन की स्थिति, परिपक्वता और व्यवसाय पर लागू होता है और जैसे-जैसे हम आध्यात्मिक रूप से उन्नत होते हैं वैसे ही हमारी परिस्थितियों में परिवर्तन आने पर हमारा स्वधर्म भी परिवर्तित हो सकता है। श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके स्वधर्म का पालन करने के लिए कहते हुए उसे समझा रहे हैं कि वह अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करे और इसमें कोई शिथिलता प्रदर्शित न करे जिससे कोई दूसरा इसका अनुचित लाभ न उठा सके।
किसी अन्य का अभिनय करने की अपेक्षा अपनी वास्तविकता में आनन्दित होना अत्यंत श्रेयस्कर होता है। प्रकृति द्वारा निश्चित अपने कर्तव्यों का निर्वहन हम मन की स्थिरता के साथ सरलता से कर सकते हैं। दूसरों के कार्य हमें आकर्षित कर सकते हैं और यदि हम तदनुसार अपने कार्यों को परिवर्तित करने का विचार करते हैं तब ऐसा करना उचित नहीं होगा। यदि ये कार्य हमारी प्रकृति के प्रतिकूल हैं तब ये हमारी इन्द्रियों, मन और बुद्धि में असामंजस्य उत्पन्न करेंगे। ऐसा करना हमारी चेतना के लिए हानिकारक और आध्यात्मिक पथ पर हमारी उन्नति के मार्ग में बाधक होगा। श्रीकृष्ण इस बिन्दु पर बल देते हुए यह कहते हैं कि अपने धर्म का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए अपने प्राणों का बलिदान देना दूसरों के कार्यों में प्रवृत्त होकर अप्रिय स्थिति में फंसने से श्रेष्ठ है।
अर्जुन उवाच |
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष: |
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित: || 36||
अर्जुन ने कहा! हे वृष्णिवंशी, श्रीकृष्ण! इच्छा न होते हुए भी मनुष्य पापजन्य कर्मों की ओर क्यों प्रवृत्त होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि उसे बलपूर्वक पाप कर्मों में लगाया जाता है।
श्रीकृष्ण ने पिछले श्लोक में यह अभिव्यक्त किया था कि किसी भी मनुष्य को आसक्ति या द्वेष से युक्त नहीं होना चाहिए। अर्जुन इस प्रकार का उत्तम जीवनयापन करना चाहता है किन्तु उसे भगवान के उपदेश का अनुपालन करना कठिन लगता है। इसलिए वह श्रीकृष्ण से अति एक अत्यंत गंभीर प्रश्न पूछता है। वह कहता है, "कौन सी शक्ति हमें उच्च आदर्शों को प्राप्त करने से रोकती है। मनुष्य राग और द्वेष के वशीभूत कैसे हो जाता है?" हमारी अन्तरात्मा को पाप करते हुए पश्चात्ताप का बोध होता है। यह बोध इस तथ्य पर आधारित है कि भगवान गुणों के धाम हैं और उनके अणु अंश होने के कारण स्वाभाविक रूप से हमारा आकर्षण अच्छाइयों के प्रति होता है। अच्छाई ही जो आत्मा की प्रकृति है तथा यह अंतरात्मा की आवाज को उन्नत करती है। इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि चोरी, ठगी, निंदा, लूट-खसोट, हत्या, अत्याचार और भ्रष्टाचार जैसे कार्य पापजन्य कृत्य नहीं हैं। हमारी अन्तर्दृष्टि यह बोध कराती है कि ये सब कार्य पापजन्य हैं फिर भी हम ऐसे कार्य करते हैं जैसे कि कोई शक्ति हमें बलपूर्वक ऐसा करने के लिए विवश करती है। अर्जुन इसी प्रबल शक्ति के संबंध में जानना चाहता है।
श्रीभगवानुवाच |
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव: ||
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् || 37||
परमात्मा श्रीकृष्ण कहते हैं- काम वासना जो रजोगुण से उत्पन्न होती है और बाद में क्रोध का रूप धारण कर लेती है, इसे पाप के रूप में संसार का सर्वभक्षी शत्रु समझो।
वेदों में प्रयुक्त काम शब्द या वासना केवल यौन इच्छाएँ नहीं हैं बल्कि इसमें सभी प्रकार के भौतिक सुख भी सम्मिलित हैं। इस प्रकार वासना कई रूप दर्शाती है, जैसे धन की इच्छा, शारीरिक लालसाएँ, प्रतिष्ठा की अभिलाषा, सत्ता की भूख इत्यादि। वासना केवल भगवान के प्रति प्रेम का विकृत प्रतिबिंब है जो कि प्रत्येक जीवित प्राणी का अंतर्निहित स्वभाव है। जब आत्मा शरीर से संयुक्त होकर माया शक्ति के सम्पर्क में आती है तब तमोगुण के संयोग से इसका दिव्य प्रेम वासना में परिवर्तित हो जाता है। दिव्य प्रेम भगवान की सर्वोच्च शक्ति है। अतः भौतिक क्षेत्र में इसका विकृत स्वरूप जो कि काम वासना है, वह भी अति प्रबल शक्ति है। श्रीकृष्ण ने सांसारिक सुखों के भोग की लालसा को पाप के रूप में चिह्नित किया है क्योंकि यह प्रलोभन हमारे भीतर छिपा रहता है। रजोगुण आत्मा को यह विश्वास दिलाता है कि सांसारिक विषय भोगों से ही तृप्ति प्राप्त होगी। इसलिए किसी भी मनुष्य में इन्हें प्राप्त करने की कामना उत्पन्न होती है। जब कामना की पूर्ति होती है तब इससे लोभ उत्पन्न होता है और इसकी संतुष्टि न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। कामना, लोभ और क्रोध इन तीनों विकारों से ग्रस्त होकर मनुष्य पाप करता है। लोभ कामनाओं का प्राबल्य है जबकि क्रोध कुण्ठित इच्छा है। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने वासना या कामना को सभी बुराइयों की जड़ के रूप में चिह्नित किया है।
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च |
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् || 38||
जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है, दर्पण धूल से आवृत रहता है तथा भ्रूण गर्भाशय से अप्रकट रहता है, उसी प्रकार से कामनाओं के कारण मनुष्य के ज्ञान पर आवरण पड़ा रहता है।
उचित और अनुचित के ज्ञान को विवेक कहा जाता है। यह विवेक मनुष्य की बुद्धि में होता है। वैसे भी काम-वासना एक ऐसा दुर्जेय शत्रु है जो बुद्धि की विवेक शक्ति को आवृत्त कर देता है। श्रीकृष्ण ने इस सिद्धान्त पर प्रकाश डालने हेतु तीन उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। अग्नि जो प्रकाश का स्रोत है, धुएँ से ढकी रहती है। यह आंशिक अंधकार अर्थात् अविवेक छितराए बादलों जैसा होता है जिससे सात्विक इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं। दर्पण परावर्तन करता है और धूल से ढक जाता है। यह बुद्धि पर राजसिक कामनाओं के प्रभाव जैसी होती है। भ्रूण गर्भाशय से आवृत्त होता है। यह तामसिक कामनाओं का प्रतीक है जो मनुष्य की विवेक शक्ति को नष्ट कर देता है। उसी प्रकार हमारी कामनाओं के कारण हमारे द्वारा सुना और पढ़ा गया आध्यात्मिक ज्ञान आच्छादित हो जाता है।
इस विषय पर एक सुन्दर कथा इस प्रकार है-एक व्यक्ति जंगल के किनारे प्रतिदिन भ्रमण करता था। एक बार सायंकाल उसने जंगल के भीतर भ्रमण करने का निर्णय लिया। जंगल में कुछ ही मील चलने पर सूर्यास्त होने लगा। जैसे ही वह जंगल से बाहर जाने के लिए वापस मुड़ा तब वह यह देखकर भयभीत हुआ कि दूसरी ओर कई जंगली जानवर खड़े थे। वे खूखार जंगली जानवर उसका पीछा करने लगे और उनसे बचने के लिए वह जंगल में और भीतर की ओर दौड़ने लगा तब उसने अपने सम्मुख एक डायन को खड़ा पाया जो दोनों हाथों को पसारे उसे गले लगाना चाहती थी। उससे बचने के लिए वह दिशा बदलकर भागने लगा और फिर वह पेण्डुलम की भांति डायन और जंगली जानवरों के बीच भागता रहा। इसके बाद अंधेरा हो गया। अधिक दिखाई न देने के कारण वह एक गड्ढे की ओर चला गया जो अंगूर की लताओं से ढका हुआ था। उसमें वह सिर के बल गिरा लेकिन उसके पैर अंगूर की लताओं के बीच फंस गए। परिणामस्वरूप वह गड्ढे के उपर उल्टा झूलने लगा। कुछ समय पश्चात् उसकी चेतना लौटी और उसने देखा कि एक सर्प गड्ढे के नीचे बैठा है जो उसके नीचे गिरने पर उसे डंसने की प्रतीक्षा कर रहा था। कुछ ही क्षणों में वहाँ एक सफेद और एक काले रंग का चूहा दिखा। दोनों चूहें उन टहनियों को काटने लगे जिन पर अंगूर की बेलें लटकी हुई थीं। तभी कुछ ततैये वहाँ आकर उसके मुख पर काटने लगे। किंतु इस विकट परिस्थिति में वह व्यक्ति हँसने लगा। तब कई दार्शनिक वहाँ यह ज्ञात करने आए कि इस प्रतिकूल परिस्थिति में वह व्यक्ति क्यों हँस रहा था। उन्होंने ऊपर की ओर मधुमक्खी के छत्ते को देखा जिसमें से मधु की कुछ बूंदें टपक कर उसकी जीभ पर गिर रही थी। वह मधु को चाटते हुए सोंच रहा था कि यह कितना विलक्षण सुख है और वह जंगली जानवरों, डायन, सर्प, चूहे और ततैयों को भूल गया।
यह व्यक्ति हमें पागल प्रतीत हो सकता है। हालाँकि यह कथा कामनाओं के अधीन रहने वाले सभी मनुष्यों की दशा का वर्णन करती है। जिस जंगल में वह व्यक्ति भ्रमण कर रहा था वह इसी लौकिक संसार का चित्रण करता है जिसमें हम वास करते हैं तथा प्रत्येक क्षण जोखिम से भरा है। उस व्यक्ति का पीछा करने वाले जंगली पशु हमारे जीवन में आने वाले रोगों के द्योतक हैं जो लगातार हमें कष्ट प्रदान करते हैं। डायन वृद्धावस्था का प्रतीक है जो समय व्यतीत होने पर हमारा आलिंगन करने के लिए खड़ी हैं। गड्ढे के नीचे बैठा सर्प प्रतीक्षारत मृत्यु का प्रतीक है। सफेद और काले चूहे जो लताओं को काट रहे थे वे दिन और रात के सूचक है जो हमारे जीवन को धीरे-धीरे मृत्यु के समीप ले जा रहे है। उस व्यक्ति के मुख पर बैठे ततैये हमारी असीम कामनाओं के समान हैं जो हमारी पीड़ा और दुःख का कारण हैं। शहद काम-वासना के सुखों को चित्रित करती है जो हमारे विवेक और बुद्धि को धुंधला करते हैं। विषय भोग में हम इतना लिप्त हो जाते हैं कि हमें अपनी दुर्दशा का आभास नहीं हो पाता । श्रीकृष्ण ने यहाँ व्यक्त किया है कि इस प्रकार की कामनाएँ हमारी विवेक शक्ति पर आवरण डालती हैं।
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा |
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च || 39||
हे कुन्ती पुत्र! इस प्रकार ज्ञानी पुरुष का ज्ञान भी अतृप्त कामना रूपी शत्रु से आच्छादित रहता है जो कभी संतुष्ट नहीं होता और अग्नि के समान जलता रहता है।
यहाँ श्रीकृष्ण ने काम या वासना की कृति को सुस्पष्ट किया है। काम का अर्थ 'इच्छा', दुष्प्रेरण का अर्थ 'अतृप्ति' और अनलेन का अर्थ 'अग्नि के समान' है। कामनाएँ बुद्धिमान पुरूष के विवेक पर विजय पा लेती हैं और अपनी तुष्टि के लिए उन्हें लुभाती हैं । कामना रूपी अग्नि को शांत करने का जितना भी अधिक प्रयास किया जाए यह उतनी ही और अधिक भीषणता से भड़कती है। महात्मा बुद्ध के कथन हैं:
न कहापणवस्सेन, तित्ति कामेसु विज्जति
अप्पस्सादा कामा दुखा कामा, इति विज्ञाय पण्डितो।
(धम्मपद श्लोक-186)
"कामनाएँ अशमनीय अग्नि के समान भड़कती है जो कभी भी किसी को सुख प्रदान नहीं करतीं। ज्ञानी पुरुष इसे दुःख का मूल जानकर इसका परित्याग करते हैं।" किन्तु वे जो इस सत्य को नहीं जानते, वे अपनी वासनाओं की तुष्टि का निरर्थक प्रयास करते हुए अपने जीवन को व्यर्थ कर देते हैं।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते |
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् || 40||
इन्द्रिय, मन और बुद्धि को कामना का अधिष्ठान कहा जाता है जिनके द्वारा यह मनुष्य के ज्ञान को आच्छादित कर लेती है और देहधारियों को मोहित करती है।
काम वासना की शरण स्थली को प्रकट करते हुए भगवान श्रीकृष्ण अब इसे नियंत्रित करने की विधि के संबंध में सूचित करते हैं। शत्रु की घेराबंदी करने से पूर्व शत्रु की दुर्बलता का पता लगाना आवश्यक होता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण व्यक्त करते हैं कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि वह स्थान हैं जहाँ से काम वासना आत्मा पर आधिपत्य जमाने का प्रयास करती है। काम वासना के प्रभाव से इन्द्रियाँ विषय भोगों की कामना करती हैं और मन को सम्मोहित करती हैं। मन बुद्धि को भ्रमित करता है तथा बुद्धि अपनी विवेकी शक्तियाँ खो देती है। जब बुद्धि पर आवरण पड़ जाता है, तब मनुष्य मोहवश वासनाओं के दास बन जाते हैं और उनकी तुष्टि हेतु सब कुछ करने को तत्पर रहते हैं। इन्द्रियाँ मन और बुद्धि अपने आप में किसी प्रकार से बुरे नहीं होते। यह सब भगवत्प्राप्ति के प्रयोजन हेतु हमें भगवान द्वारा प्रदान किए गये हैं। किन्तु हम वासनाओं को इन पर कब्जा करने की अनुमति देते हैं। अब हमें इन्हीं इन्द्रियों, मन और बुद्धि का आत्म उत्थान के लिए प्रयोग करना चाहिए। ऐसा किस प्रकार से किया जाए, इसे श्रीकृष्ण अगले श्लोक में स्पष्ट करेंगे।
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ |
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् || 41||
इसलिए हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ! प्रारम्भ से ही इन इन्द्रियों को नियंत्रण में रखकर कामना रूपी शत्रु का वध कर डालो जो पाप का मूर्तरूप तथा ज्ञान और आत्मबोध का विनाशक है।
इस श्लोक में अब श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि उस काम वासना पर कैसे विजय प्राप्त की जा सकती है जो सभी बुराइयों की जड़ है तथा मानव चेतना के लिए घातक है। काम वासना को बुराइयों का भण्डार बताते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रारम्भ से ही विषय भोगों पर नियंत्रण रखने के लिए कहते हैं। इनकी उत्पत्ति ही हमारे कष्टों का मूल कारण है जबकि इनका दमन करना शांति का मार्ग है।
इसे समझने के लिए प्रस्तुत उदाहरण को समझें। रमेश और दिनेश दो सहपाठी कॉलेज के छात्रावास के एक कमरे में रहते थे। रात्रि 10 बजे रमेश सिगरेट पीने की इच्छा व्यक्त करता है। वह कहता है, “मेरी धूम्रपान करने की तीव्र इच्छा हो रही है। दिनेश कहता है कि बहुत अधिक रात हो गयी है इसलिए धूम्रपान करना भूल कर सो जाओ।" रमेश कहता है-"नहीं-नहीं मैं जब तक सिगरेट के कश नहीं ले लेता, तब तक मैं सो नहीं सकता।" दिनेश सो जाता है और रमेश सिगरेट की खोज में कमरे से बाहर निकल जाता है। छात्रावास के निकट की दुकान बंद हो चुकी थी। दो घंटे के पश्चात् जब अंत में उसे सिगरेट मिलती है तब वह छात्रावास में आकर धूम्रपान करता है।
प्रात:काल दिनेश उससे पूछता है-"रमेश तुम रात को कब सोये?" रमेश–'आधी रात के समय' दिनेश-"क्या, सच में, इसका अभिप्राय है कि तुम दो घंटे तक धूम्रपान करने के लिए तड़पते रहे और धूम्रपान करने के पश्चात् तुम उसी मनोदशा में लौट आये जो कल 10 बजे रात्रि काल में थी।" रमेश ने पूछा-"इससे तुम्हारा क्या मतलब है?" दिनेश ने उत्तर दिया-"देखो रात 10 बजे तुम्हारी धूम्रपान करने की कोई इच्छा नहीं थी और तुम शांत थे किन्तु रात्रिकाल में 10 बजे से 12 बजे अर्धरात्रि तक तुम सिगरेट पीने के लिए तड़पते रहे। अंततः जब तुम्हारी धूम्रपान करने की इच्छा समाप्त हुई तभी तुम सो सके। दूसरी ओर मैंने अपने मन में किसी प्रकार की इच्छा उत्पन्न नहीं की और मैं 10 बजे रात्रि को शांतिपूर्वक सो गया।" इसी प्रकार से हम भोगों की कामनाएँ उत्पन्न करते हैं और बाद में वे हमें दुःखी करती हैं। जब हमें मनचाही वस्तु मिल जाती है तब हमारे द्वारा ही उत्पन्न यह रोग निर्मूल हो जाता है और हम इसे सुख समझने लगते हैं। जब हम स्वयं को आत्मा मानते हैं तो हमारा प्रयोजन केवल आत्मा को सुख प्रदान करना होता है तब हमारे लिए ऐसी कामनाओं का परित्याग करना सुगम होता है। श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि इन इन्द्रियों पर संयम रखो ताकि इनमें व्याप्त वासना का संहार किया जा सके। ऐसी दक्षता पाने के लिए हमें भगवान द्वारा प्रदत्त दिव्य शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए जिनका वर्णन श्रीकृष्ण अगले श्लोक में कर रहे हैं।
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन: |
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स: || 42||
इन्द्रियाँ स्थूल शरीर से श्रेष्ठ हैं और इन्द्रियों से उत्तम मन, मन से श्रेष्ठ बुद्धि और आत्मा बुद्धि से भी परे है।
निम्न तत्त्व को उसके श्रेष्ठ तत्त्व से नियंत्रित किया जा सकता है। श्रीकृष्ण मनुष्य को भगवान द्वारा प्रदत्त अवयवों की श्रेष्ठता को व्यक्त कर रहे हैं। वे वर्णन करते हैं कि शरीर जड़ पदार्थों से निर्मित है श्रेष्ठ पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं जिनके द्वारा स्वाद, स्पर्श, रूप, गंध और शब्द की ग्रहण किया जाता है। इन्द्रियों से उत्तम मन और मन से श्रेष्ठ बुद्धि है जिसकी सहायता से हम विभिन्न पदार्थों में भेद करने के योग्य होते हैं किन्तु आत्मा बुद्धि से भी परे है। इस अध्याय के अंतिम श्लोक में किए गए वर्णन के अनुसार इन्द्रिय, मन, बुद्धि और आत्मा के श्रेष्ठता के इस ज्ञान का प्रयोग हमें काम वासना को जड़ से उखाड़ने के लिए करना चाहिए।
एवं बुद्धे: परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना |
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् || 43||
इस प्रकार हे महाबाहु! आत्मा को बुद्धि से श्रेष्ठ जानकर अपनी इन्द्रिय, मन और बुद्धि पर संयम रखो और आत्मज्ञान द्वारा कामरूपी दुर्जेय शत्रु का दमन करो।
निष्कर्ष के रूप में श्रीकृष्ण इस पर बल देकर कहते हैं कि हमें आत्मज्ञान द्वारा कामरूपी शत्रु का संहार करना चाहिए। क्योंकि आत्मा भगवान का अंश है और यह दिव्य शक्ति है इसलिए दिव्य पदार्थों से ही अलौकिक आनन्द प्राप्त हो सकता है जबकि संसार के सभी पदार्थ भौतिक हैं। ये भौतिक पदार्थ आत्मा की स्वाभाविक उत्कंठा को कभी पूरा नहीं कर सकते इसलिए इनको प्राप्त करने की कामना करना व्यर्थ ही है। इसलिए परिश्रम करते हुए हमें बुद्धि को तदनुसार कार्य करने का प्रशिक्षण देना चाहिए और फिर मन और इन्द्रियों को नियंत्रित रखने के लिए इसका प्रयोग करना चाहिए।
कठोपनिषद् में रथ के सादृश्य से इसे अति विशद ढंग से समझाया गया है:
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयां स्तेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः।।
(कठोपनिषद्-1.3.3-4)
यह उपनिषद् अवगत कराती है कि एक रथ है जिसे पांच घोड़े हाँक रहे हैं। उन घोड़ों के मुख में लगाम पड़ी है। यह लगाम रथ के सारथी के हाथ में है और रथ के पीछे आसन पर यात्री बैठा हुआ है। यात्री को चाहिए कि वह सारथी को उचित निर्देश दे जो लगाम को नियंत्रित कर घोड़ों को उचित दिशा की ओर जाने में मार्गदर्शन दे सके। यदि यात्री सो जाता है तब घोड़े निरंकुश हो जाते हैं।
इस सादृश्य में रथ मनुष्य का शरीर है, घोड़े पाँच इन्द्रियाँ हैं और घोड़ों के मुख में पड़ी लगाम मन है और सारथी बुद्धि है और रथ में बैठा यात्री शरीर में वास करने वाली आत्मा है। इन्द्रियाँ (घोड़े) अपनी पसंद के पदार्थों की कामना करती हैं। मन (लगाम) इन्द्रियों को मनमानी करने से नहीं रोक पाती। बुद्धि (सारथी) मन (लगाम) के समक्ष आत्मसमर्पण कर देती है। इस प्रकार मायाबद्ध आत्मा बुद्धि को उचित दिशा में चलने का निर्देश नहीं देती। इसलिए रथ को किस दिशा की ओर ले जाना है, इसका निर्धारण इन्द्रियाँ अपनी मनमानी के अनुसार करती हैं। आत्मा इन्द्रियों के सुखों का अनुभव परोक्ष रूप में करती है किन्तु ये इन्द्रियाँ उसे तृप्त नहीं कर पाती। इसी कारण से रथ के आसन पर बैठी आत्मा (यात्री) इस भौतिक संसार में अनन्त काल से चक्कर लगा रही है। यदि आत्मा अपनी दिव्यता के बोध से जागृत हो जाती है और अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वहन करने का निश्चय करती है तब वह बुद्धि को उचित दिशा की ओर ले जा सकती है। तब फिर बुद्धि अपने से निम्न मन और इन्द्रियों द्वारा शासित नहीं होगी और रथ आत्मिक उत्थान की दिशा में दौड़ने लगेगा। अतःआत्मा द्वारा इन्द्रियों, मन और बुद्धि को नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए।
।। श्रीमद्भगवत गीता तीसरा अध्याय सम्पूर्ण।।
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