॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhagavad Geeta Chapter 12
श्रीमद्भगवत गीता द्वादश अध्याय
अध्याय बारह: भक्तियोग
भक्ति का विज्ञान
इस अध्याय में के अन्य मार्गों की अपेक्षा भक्ति मार्ग की सर्वोत्कृष्टता पर प्रकाश डाला गया है। इसका प्रारम्भ अर्जुन द्वारा श्रीकृष्ण से पूछे गए इस प्रश्न से होता है कि वह योग में किन्हें पूर्ण माने, क्या जो भगवान की साकार रूप में भक्ति करते हैं या वे जो निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं? इसका उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि दोनों मार्ग भगवत्प्राप्ति की ओर ले जाते हैं किन्तु वे उनकी साकार रूप की पूजा करने वाले भक्त का श्रेष्ठ योगी के रूप में सम्मान करते हैं। वे स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि मायाबद्ध जीवों के लिए उनके निराकार रूप की आराधना करना अत्यंत कठिन है जबकि साकार रूप की आराधना करने वाले भक्त भगवान के चिंतन में लीन हो जाते हैं और उनके प्रत्येक कर्म भगवान को समर्पित होते हैं। तथा वे शीघ्रता से जीवन मरण के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी बुद्धि उन्हें समर्पित करने और अपने मन को केवल उनकी प्रेममयी भक्ति में स्थिर करने के लिए कहते हैं।
किन्तु ऐसा प्रेम प्रायः सरलतया लभ्य नहीं होता। इसलिए श्रीकृष्ण अन्य विकल्प देते हुए कहते हैं कि यदि अर्जुन अपने मन को पूर्ण रूप से भगवान में एकाग्र करने की अवस्था प्राप्त नहीं कर सकता तब भी उसे निरन्तर अभ्यास द्वारा पूर्णता की अवस्था को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। भक्ति को निरन्तर प्रयास द्वारा ही पोषित किया जा सकता है। यदि अर्जुन इतना भी नहीं कर सकता तब भी उसे पराजय स्वीकार नहीं करनी चाहिए अपितु इसके विपरीत उसे केवल श्रीकृष्ण के सुख के लिए अपने कर्त्तव्यों का पालन करने का अभ्यास करना चाहिए। यदि उसके लिए ऐसा करना भी संभव नहीं है तब उसे अपने कर्म फलों का त्याग कर देना चाहिए और अपनी आत्मा में स्थित हो जाना चाहिए। अब श्रीकृष्ण बताते हैं कि लौकिक कर्मों से श्रेष्ठ ज्ञान है और ज्ञान अर्जन से श्रेष्ठ ध्यान है। और ध्यान से श्रेष्ठ कर्म फलों का त्याग करना है, जो तुरन्त परम शांति प्राप्त की ओर ले जाता है। इस अध्याय के शेष श्लोकों में उनके प्रिय भक्तों के अद्भुत गुणों का वर्णन किया गया है जो भगवान को अत्यन्त प्रिय हैं।
अर्जुन उवाच |
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते |
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमा: || 1||
अर्जुन ने पूछा-आपके साकार रूप की आराधना करने वालों तथा आपके अव्यक्त निराकार रूप की आराधना करने वालों में से आप किसे श्रेष्ठ मानते हैं?
पिछले अध्याय में अर्जुन ने भगवान के विराट रूप को देखा था जिसमें समस्त ब्रह्माण्ड समाया हुआ था। उसे देखकर अब अर्जुन भगवान के गुण, विशेषता और लीलाओं सहित उनके साकार रूप को पसंद करता है। इसलिए वह यह जानने का उत्सुक है कि साकार रूप में भगवान की भक्ति करने वाले भक्त या वे जो उनके निराकार अव्यक्त ब्रह्म रूप की उपासना करते हैं, में से पूर्ण योगी कौन है?
अर्जुन का प्रश्न पुनः यह पुष्ट करता है कि भगवान के दो रूप हैं-एक सर्वव्यापक निराकार ब्रह्म रूप और दूसरा उनका साकार रूप। जो यह कहते हैं कि भगवान साकार रूप धारण नहीं कर सकते वे भगवान को अपूर्ण सिद्ध करते हैं और इसी प्रकार से जो यह कहते हैं कि भगवान केवल साकार रूप में विद्यमान रहते हैं वे भी भगवान को अपूर्ण ही सिद्ध करते हैं। भगवान पूर्ण और सिद्ध हैं इसलिए वे साकार और निराकार दोनों रूपों में रहते हैं। हम जीवात्माओं के व्यक्तित्त्व के भी दो पहलू हैं। आत्मा निराकार है फिर भी यह अनंत बार शरीर धारण करती है। यदि जीवात्माओं के दो स्वरूप संभव हैं तब फिर सर्वशक्तिमान परमात्मा अपनी इच्छानुसार जब चाहे साकार रूप धारण क्यों नहीं कर सकता? यहाँ तक कि ज्ञान योग के प्रबल समर्थक शंकराचार्य ने भी कहा है-
मूर्तम् चैवामूर्तम् द्वावेव ब्रह्मणो रूपे, इत्युपनिषत् तयोर्वा द्वौ
भक्तौ भगवदुपदिष्टौ, क्लेशादक्लेशाद्वा मुक्तिस्यादेरतयोर्मध्ये
"भगवान के साकार और निराकार दोनों रूप हैं। आध्यात्मिक मार्ग के साधक भी दो प्रकार के होते हैं-एक निराकार ब्रह्म के उपासक और दूसरे साकार रूप की आराधना करने वाले किन्तु निराकार रूप की उपासना अत्यंत कठिन है।"
श्रीभगवानुवाच |
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते |
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता: || 2||
भगवान ने कहा-वे जो अपने मन को मुझमें स्थिर करते हैं और सदैव पूर्ण श्रद्धा के साथ मेरी भक्ति में तल्लीन रहते हैं, मैं उन्हें सर्वश्रेष्ठ योगी मानता हूँ।
भगवान की निकटता अनेक प्रकार से अनुभव की जा सकती है। इसे एक उदाहरण से समझें। मान लो कि आप एक रेलवे प्लेटफार्म पर खड़े हैं। एक ट्रेन चमकती हुई हेडलाइट के साथ दूर से आ रही हैं। पहले आपको ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे कोई रोशनी चली आ रही है। जब ट्रेन कुछ समीप पहुंचती है तब तुम रोशनी के साथ ट्रेन की धुँधली छवि भी देखते हो। अंततः ट्रेन जब तुम्हारे सामने प्लेटफार्म पर आकर खड़ी हो जाती है तब तुम्हें अनुभव होता है-'ओह, यह तो ट्रेन है और मैं इसके भीतर लोगों को बैठे हुए देख सकता हूँ। 'यही ट्रेन दूर से एक रोशनी के समान दिखाई दे रही थी। जब यह कुछ समीप आई तो रोशनी के साथ एक आकृति दिखाई दी। अंत मे जब यह एकदम समीप आयी तब तुम्हें बोध हुआ कि यह ट्रेन है। यह वही ट्रेन थी लेकिन इसके समीप आते-आते तुम्हें इसके विभिन्न गुणों जैसे आकार, रंग, यात्री, कम्पार्टमेन्ट, इसके गेट और खिड़कियों का बोध होने लगा।" समान रूप से भगवान पूर्ण हैं और अनंत शक्तियों के स्वामी हैं। उनका स्वरूप दिव्य नामों, रूपों, लीलाओं, गुणों, संतों और लोकों से परिपूर्ण है किन्तु उनकी निकटता विभिन्न स्तरों पर अनुभव होती है जैसे ब्रह्म (निराकार रूप में भगवान की सर्वव्यापक अभिव्यक्ति) परमात्मा (सभी जीवों के हृदय में स्थित) और भगवान (साकार रूप) जिसके द्वारा वह पृथ्वी पर अवतार लेते हैं। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन किया गया है-
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञान मद्वयम्।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ।।
(श्रीमद्भागवतम्-1.2.11)
"सत्य को जानने वाले कहते हैं कि एक ही परम सत्ता संसार में तीन प्रकार से अर्थात् ब्रह्म, परमात्मा और भगवान के रूप में प्रकट होती है।" ये तीनों अलग-अलग नहीं है अपितु एक ही सर्वशक्तिमान की तीन भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। ये जल, भाप और बर्फ के समान हैं जो सब एक ही तत्त्व-हाईड्रोजन डाईआक्साइड के कण हैं लेकिन इनके भौतिक रूप अलग विभिन्न होते हैं। अगर कोई प्यासा व्यक्ति जल मांगता है तब यदि हम उसे बर्फ दें तो उससे उसकी प्यास नहीं बुझेगी। बर्फ और जल दोनों एक ही तत्त्व हैं किन्तु उनके भौतिक गुण भिन्न-भिन्न हैं। इस प्रकार ब्रह्म, परमात्मा और भगवान सभी एक ही परम प्रभु की अभिव्यक्तियाँ हैं किन्तु उनके गुण विभिन्न हैं। ब्रह्म भगवान का सर्वव्यापक रूप है जो सर्वत्र विद्यमान है। श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णन है-
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.11)
अनंत ब्रह्माण्डों में एक ही परम सत्ता है। वह सभी वस्तुओं और सभी जीवों में स्थित है। भगवान के इस सर्वव्यापक रूप को ब्रह्म कहते हैं। यह सत्-चित्-आनन्द अर्थात् नित्य, सर्वज्ञ और आनन्द स्वरूप है। अपने इस रूप में भगवान अनंत गुणों, अनंत सौंदर्य और मधुर लीलाओं को व्यक्त नहीं करते। वह एक दिव्य ज्योति है जो कि निर्गुण निर्विशेष और निराकार है। जो ज्ञान मार्ग का अनुसरण करते हैं वे भगवान के इसी स्वरूप की उपासना करते हैं।
परमात्माः यह भगवान का वह स्वरूप है जो सबके हृदय में स्थित है। श्लोक 18.61 में श्रीकृष्ण कहते हैं-हे अर्जुन! परमात्मा सभी जीवों के हृदयों में वास करता है। उनके कर्मों के अनुसार वह आत्माओं को निर्देश देता है जो माया शक्ति से निर्मित यंत्र पर सवार रहती हैं। हमारे हृदय में बैठकर भगवान हमारे सभी कर्मों को देखते हैं और उनका लेखा-जोखा रखते हैं और उचित समय पर उन कर्मों का फल देते हैं। हम जो कर्म करते हैं उसे भूल जाते हैं। भगवान हमारे सभी विचारों और कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं। उन्हें हमारे सभी विचारों, शब्दों, कार्यों और हमारे सभी जन्मों का स्मरण रहता है। न केवल इस जन्म में अपितु अनंत जन्मों में हम जहाँ भी रहे और हमने जो भी शरीर पाया वे सदैव हमारे साथ ही रहे। वे हमारे ऐसे मित्र हैं जो क्षण भर को भी हमारा साथ नहीं छोड़ते। हमारे हृदय में स्थित भगवान का यह स्वरूप परमात्मा है।
पतंजलि ने अपने योग दर्शन में जिस अष्टांग योग का उल्लेख किया है उसका उद्देश्य अपने भीतर स्थित भगवान की अनुभूति का प्रयास करना है और यह परमात्मा की ओर ले जाता है। जिस प्रकार ट्रेन दूर से एक रोशनी के रूप में दिखाई देती है और समीप आने पर वह झिलमिलाती रोशनी के साथ दिखाई देती है। उसी तरह परमात्मा की अनुभूति ब्रह्म की अपेक्षा अधिक समीपस्थ होती है। 'भगवान' परमेश्वर का वह स्वरूप है जो साकार रूप में प्रकट होता है।
श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है-
कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्।
जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.14.55)
"भगवान जो सभी आत्माओं की आत्मा हैं वे श्रीकृष्ण के रूप में संसार के कल्याणार्थ पृथ्वी पर साकार रूप में प्रकट हुए। संसार के कल्याण के लिए भगवान अपने सब मधुर नामों, रूपों, गुणों, धामों, लीलाओं और संतों के रूप में प्रकट होते हैं। ये गुण ब्रह्म और परमात्मा में भी उसी प्रकार से प्रकट होते हैं किन्तु अव्यक्त रहते हैं जैसे कि माचिस की तीली में आग केवल तभी प्रकट होती है जब उसे माचिस की डिबिया पर चिपकी ज्वलंत स्ट्रिप पर रगड़ा जाता है। उसी तरह भगवान की सभी शक्तियाँ जोकि अन्य स्वरूपों में अव्यक्त रहती हैं वे सब भगवान के स्वरूप में प्रकट होती हैं। भक्ति का मार्ग ही भगवान के वास्तविक स्वरूप की अनुभूति की ओर ले जाता है। यह भगवान की निकटतम अनुभूति का स्वरूप है वैसे ही जैसे कि रेलवे प्लेटफार्म पर खड़े व्यक्ति के सामने ट्रेन रूकने पर ट्रेन के भीतर और बाहर का दृश्य स्पष्ट दिखाई देता है। इसलिए श्लोक 18.55 में श्रीकृष्ण कहते हैं-"मुझ पुरुषोत्तम भगवान के वास्तविक स्वरूप को केवल भक्ति द्वारा ही जाना जा सकता है।" इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए स्पष्ट करते हैं कि उनके साकार रूप की भक्ति करने वाले भक्त ही श्रेष्ठ योगी हैं।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते |
सर्वत्रगमचिन्त्यञ्च कूटस्थमचलन्ध्रुवम् || 3||
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धय: |
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता: || 4||
लेकिन जो लोग अपनी इन्द्रियों का निग्रह करके सर्वत्र समभाव से मेरे परम सत्य, निराकार, अविनाशी, निर्वचनीय, अव्यक्त, सर्वव्यापक, अकल्पनीय, अपरिवर्तनीय, शाश्वत और अचल रूप की पूजा करते हैं, वे सभी जीवों के कल्याण में संलग्न रहकर मुझे प्राप्त करते हैं।
ऐसा कहने के पश्चात् कि उनके साकार रूप की पूजा करना उत्तम है अब श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि वे उनके निराकार रूप की आराधना को अस्वीकृत नहीं करते। वे जो उनके सर्वव्यापक, अनिर्वचनीय, अव्यक्त, अचिंतनीय, अचल, शाश्वत ब्रह्म के स्वरूप की पूजा करते हैं वे भी भगवान को पाते हैं। पृथ्वी पर विभिन्न प्रकृति वाले जीव हैं। जीवों की विविध प्रकृति की रचना करने वाले भगवान का व्यक्तित्त्व भी अनंत रूपों का स्वामी है। अपनी सीमित बुद्धि के कारण हम भगवान की अनंत अभिव्यक्तियों को श्रेणियों में वर्गीकृत करते हैं। तदनुसार वेदव्यास ने भगवान की अभिव्यक्तियों को ब्रह्म, परमात्मा और भगवान के रूप में वर्गीकृत किया है। कोई भी व्यक्ति इन रूपों में से किसी एक रूप की पूजा कर सकता है। किन्तु किसी को यह दावा नहीं करना चाहिए कि भगवान के किसी एक रूप की अवधारणा ही दोषरहित है और अन्य दोनों त्रुटिपूर्ण हैं। श्लोक 4.11 में श्रीकृष्ण ने कहा था कि जिसप्रकार से लोग मेरे प्रति भावना रखते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार का प्रतिफल प्रदान करता हूँ। हे पृथा पुत्र! सभी लोग किसी न किसी प्रकार से मेरे मार्ग का ही अनुसरण करते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण पुष्टि करते हैं कि उनके निराकार रूप की उपासना करने वाले उपासक भी उन्हें पाते हैं क्योंकि उनकी इच्छा परम सत्य भगवान की निर्गुण और निर्विशेष स्वरूप को प्राप्त करने को होने की होती है। इसलिए भगवान उन्हें अव्यक्त सर्वव्यापक ब्रह्म के रूप में मिलते हैं।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ||
अव्यक्ता हि गतिर्दु:खं देहवद्भिरवाप्यते || 5||
जिन लोगों का मन भगवान के निराकार रूप पर अनुरक्त होता है उनके लिए भगवान की अनुभूति का मार्ग अतिदुष्कर होता है। अव्यक्त रूप की उपासना देहधारी जीवों के लिए अत्यंत दुष्कर होती है।
श्रीकृष्ण पुनः अपने साकार रूप की उपासना की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि निराकार ब्रह्म की उपासना का मार्ग अत्यंत दुष्कर है। निराकार ब्रह्म की उपासना इतनी कठिन क्यों है? इसका प्रथम और महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि हम मनुष्य देहधारी हैं और अनंत जन्मों से साकार रूपों के साथ व्यवहार करने के आदी हो चुके हैं। अतः प्रेम करने के प्रयास में भी इसी प्रकार से यदि हम भगवान के साकार रूप पर अपने मन को केंद्रित करते हैं तो यह सुगमता से भगवान पर एकाग्र हो जाता है और भगवान के प्रति हमारे अनुराग को बढ़ाता है। किंतु इसके विपरीत निराकार रूप की उपासना में हमारी बुद्धि निराकार रूप को ग्रहण नहीं कर पाती क्योंकि मन और इन्द्रियों के सामने कोई स्थूल पदार्थ नहीं होता जिस पर वे अपना ध्यान केन्द्रित कर सकें। इसलिए भगवान का मनन करने का प्रयास और मन में भगवान की प्रीति को बढ़ाना दोनों कठिन हो जाते हैं। एक अन्य कारण से भी ब्रह्म की आराधना भगवान की उपासना की अपेक्षा कठिन है। इसके अंतर को 'मर्कट किशोर न्याय' अर्थात् 'बंदर के बच्चे' और 'मार्जर किशोर न्याय' अर्थात् बिल्ली के बच्चे के अन्तर से समझा जा सकता है। अपनी मां के पेट को कसकर पकड़ने का दायित्व बन्दर के बच्चे का ही होता है जबकि इसमें उसकी माँ कोई सहायता नहीं करती। जब मादा बंदर अपने बच्चे को लेकर वृक्ष की एक शाखा से दूसरी शाखा पर छलांग लगाती है तब माँ को कसकर पकड़ने का दायित्व बच्चे पर होता है। यदि वह ऐसा करने में समर्थ नहीं होता तब वह नीचे गिर सकता है। इसके विपरीत बिल्ली का बच्चा बहुत छोटा और कोमल होता है। लेकिन उसकी गर्दन से उसे मुँह से पकड़ कर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का दायित्व बिल्ली का होता है।
समान रूप से भगवान के निराकार रूप के उपासक की तुलना बंदर के बच्चे से की जा सकती है और साकार रूप के उपासक की तुलना बिल्ली के बच्चे से की जा सकती है। वे जो निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं, अपनी उपासना के मार्ग पर आगे बढ़ने का उत्तरदायित्व उन्हीं पर होता है क्योंकि ब्रह्म उन पर कोई कृपा नहीं करता। ब्रह्म केवल निराकार ही नहीं अपितु निर्गुण भी है। उसका वर्णन निर्गुण, निर्विशेष और निराकार के रूप में किया गया है। इससे बोध होता है कि ब्रह्म में कृपा का गुण व्यक्त नहीं होता। ज्ञानीजन जो निर्गुण, निर्विशेष और निराकार भगवान की उपासना करते हैं, उन्हें केवल अपने प्रयासों पर निर्भर रहना पड़ता है। दूसरी ओर भगवान का साकार रूप करुणा और दया का सागर है। इसलिए भगवान के साकार रूप की उपासना करने वाले भक्त अपनी साधना भक्ति द्वारा भगवान की दिव्य कृपा प्राप्त करते हैं और भगवान अपने भक्तों की रक्षा का दायित्व स्वयं ले लेते हैं। इसी आधार पर श्रीकृष्ण ने नौंवे अध्याय के 31वें श्लोक में यह कहा था-हे कुन्ती पुत्र! निडर होकर यह घोषणा करो कि मेरे भक्त का कभी पतन नहीं होता। श्रीकृष्ण इस कथन की पुष्टि अगले दो श्लोकों में करते हैं।
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्न्यस्य मत्परा: |
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते || 6||
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् |
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् || 7||
लेकिन जो अपने सभी कर्मों को मुझे समर्पित करते हैं और मुझे परम लक्ष्य समझकर मेरी आराधना करते हैं और अनन्य भक्ति भाव से मेरा ध्यान करते हैं, मन को मुझमें स्थिर कर अपनी चेतना को मेरे साथ एकीकृत कर देते हैं। हे पार्थ! मैं उन्हें शीघ्र जन्म-मृत्यु के सागर से पार कर उनका उद्धार करता हूँ।
श्रीकृष्ण दोहराते हैं कि उनके भक्त शीघ्र उनकी प्राप्ति करते हैं। सर्वप्रथम भगवान के साकार रूप की भक्ति वे अपने मन और इन्द्रियों को सुगमता से उसमें स्थिर करते हैं। वे अपनी जिह्वा और कानों को भगवान के दिव्य नामों का गुणगान करने और सुनने में लगाते हैं। अपनी आंखों को भगवान के दिव्य रूपों को देखने में और अपने शरीर को उन्हें सुख प्रदान करने वाले कार्यों में लगाकर तथा अपने मन को उनकी अद्भुत लीलाओं और गुणों के चिन्तन में व्यस्त कर एवं अपनी बुद्धि को उनकी महिमा के मनन में तल्लीन करते हैं। ऐसे भक्त भक्ति के मार्ग में आने वाली बाधाओं को हृदय से स्वीकार करते हैं। इसलिए भगवान शीघ्र उन पर अपनी कृपा दृष्टि करते हैं और उनके मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं। जो उनके साथ एक हो जाते हैं भगवान उनके अज्ञान को ज्ञान के दीपक द्वारा मिटा देते हैं। इस प्रकार भगवान स्वयं अपने भक्तों के रक्षक बन जाते हैं और उन्हें 'मृत्यु-संसार-सागरात्' अर्थात् जीवन और मृत्यु के सागर से पार लगा देते हैं।
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय |
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशय: || 8||
अपने मन को केवल मुझ पर स्थिर करो और अपनी बुद्धि मुझे समर्पित कर दो। इस प्रकार से तुम सदैव मुझ में स्थित रहोगे। इसमें कोई संदेह नहीं हैं।
यह व्याख्या करने के पश्चात् कि भगवान के साकार रूप की आराधना सर्वोत्कृष्ट है अब श्रीकृष्ण यह व्याख्या करना आरम्भ करते हैं कि उनकी आराधना कैसे की जाए। वे अर्जुन को दो उपदेशों का पालन करने के लिए कहते हैं। एक तो वह अपना मन उनमें स्थिर करें और अपनी बुद्धि उन्हें समर्पित कर दें। मन का कार्य कामनाएँ, आकर्षण और द्वेष उत्पन्न करना है। बुद्धि का कार्य विचार, विश्लेषण और विभेद करना है। वैदिक ग्रथों में मन के महत्त्व का बार-बार वर्णन किया गया है।
चेतः खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम्।
गुणेषु सक्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तये ।।
(श्रीमदभागवतम्-3.25.15)
"माया के बंधन में रहना या माया से मुक्त रहना इसका निश्चय मन ही करता है। यदि मन संसार में आसक्त है तब मनुष्य माया के बंधन में बंध जाता है और यदि मन संसार से विरक्त हो जाता है तब मनुष्य माया के बंधनों से मुक्त हो जाता है।"
मन एव मनुष्याणाम् कारणम् बंधमोक्ष्योः।
(पंचदशी)
"बंधन और मोक्ष मनःस्थिति द्वारा निर्धारित होते है। केवल शारीरिक भक्ति ही पर्याप्त नहीं है। हमें अपने मन को भगवान के चिंतन में लीन करना चाहिए क्योंकि मन को तल्लीन किए बिना मात्र शारीरिक गतिविधियों का कोई महत्त्व नहीं होता। उदाहरणार्थहम कोई प्रवचन सुनते हैं किन्तु यदि मन अन्यत्र भटकता है तब हमें यह बोध नहीं होता कि हमने क्या सुना। हमारे कानों में शब्द तो पड़ते हैं किन्तु वह हृदय में प्रविष्ट नहीं होते। यह दर्शाता है कि मन की तल्लीनता के बिना इन्द्रियों के कार्य निरर्थक हैं। दूसरे शब्दों में मन एक ऐसा यंत्र है जिसमें सभी इन्द्रियाँ सूक्ष्म रूप से रहती हैं। इसलिए वास्तविक क्रियाओं के बिना भी मन रूप, गंध, स्वाद, स्पर्श और शब्द का अनुभव करता है। उदाहरणार्थ जब हम रात को सो जाते हैं, उस समय हमारी इन्द्रियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं। किंतु जब हम स्वप्न देखते हैं तब हमारा मन सभी इन्द्रियों के विषयों का अनुभव करता है। इससे सिद्ध होता है कि मन स्थूल इन्द्रियों के बिना भी सभी विषयों का अनुभव करने में समर्थ होता है। इसलिए जब भगवान हमारे कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं तब वह हमारे मानसिक विचारों को महत्त्व देते हैं न कि शारीरिक कार्यों को। फिर भी मन से परे बुद्धि है। हम अपने मन को भगवान में तभी स्थिर कर सकते हैं जब हम अपनी बुद्धि उन्हें समर्पित करें। भौतिक जगत में भी जब विपरीत परिस्थितियों का सामना करने में हमारी बुद्धि समर्थ नहीं होती, तब हम अपने से अधिक बुद्धिमान व्यक्ति से मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। उदाहरणार्थ अस्वस्थ होने पर हम डॉक्टर के पास जाते हैं क्योंकि हमें स्वयं आयुर्विज्ञान की जानकारी नहीं होती। डॉक्टर हमारे लक्षणों और चिकित्सा रिपोर्टों की जांच कर रोग का पता लगाता है और तब वह औषधि देता है। समान रूप से जब हम किसी कानूनी विवाद में फंस जाते हैं तब हम वकील की सहायता लेते हैं। वकील हमें यह सिखाता है कि किस प्रकार से विरोधी पक्ष के वकील के प्रश्नों का उत्तर देना है। कानून की जानकारी न होने के कारण हमें वकील के प्रति अपनी बुद्धि का समर्पण करना पड़ता है और हम केवल उसके मार्गदर्शन पर चलते हैं। इसी प्रकार वर्तमान में हमारी बुद्धि कई विकारों से ग्रस्त है।
श्रीकृष्ण को मथुरा ले जाते समय कंस के दूत अक्रूर, बुद्धि के इन्हीं दोषों का वर्णन करते हुए कहते हैं-
अनित्यानात्मदुः खेषु विपर्ययमतिमुहम्।
(श्रीमद्भागवतम्-10.40.25)
अक्रूर ने कहा-"हमारी बुद्धि अज्ञान से ग्रस्त है। यद्यपि हम शाश्वत जीवात्माएँ हैं किन्तु हम केवल अपनी नश्वर देह की चिंता करते हैं। यद्यपि संसार के सभी पदार्थ नश्वर हैं किन्तु हम यही सोंचते हैं कि ये सदा हमारे साथ रहेंगे और इसलिए हम दिन-रात उनका संचय करने में रत रहते हैं। आगे जाकर अंततः इन्द्रिय सुख का परिणाम दुखदः होता है किन्तु फिर भी हम इस आशा से इनके पीछे भागते रहते हैं कि इनसे हमें सुख प्राप्त होगा।" हमारी बुद्धि के उपर्युक्त तीन विकारों को 'विपर्यय' या मिथ्या ज्ञान कहते हैं। इससे हमारी समस्या में बढ़ोतरी होती है क्योंकि हमारी बुद्धि अनंत जन्मों से इसी प्रकार दुर्विचारों को ग्रहण करने की आदी होती है। यदि हम अपनी बुद्धि के निर्देशानुसार अपना जीवन यापन करते हैं तब हम निश्चित रूप से दिव्य आध्यात्मिकता के मार्ग में होने में अधिक प्रगति नहीं कर सकेंगे। इस प्रकार यदि हम भगवान में मन को अनुरक्त कर आध्यात्मिक सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें उन्हें अपनी बुद्धि का समर्पण और उनके उपदेशों का पालन करना चाहिए। बुद्धि का समर्पण करने का अभिप्राय शास्त्रों और प्रामाणिक गुरु के माध्यम से प्राप्त भगवत्प्राप्ति के विज्ञान के अनुसार ही चिंतन करने से है।
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् |
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय || 9||
हे अर्जुन! यदि तुम दृढ़ता से मुझ पर अपना मन स्थिर करने में असमर्थ हो तो सांसारिक कार्यकलापों से मन को विरक्त कर भक्ति भाव से निरंतर मेरा स्मरण करने का अभ्यास करो।
मन को श्रीकृष्ण में स्थिर करना ही साधना की पूर्णता है किन्तु इस मार्ग के आरम्भ में हम पूर्ण होने की अभिलाषा नहीं कर सकते। इसलिए ऐसे लोगों को क्या करना चाहिए जो अपने मन को भगवान के प्रति पूर्ण रूप से स्थिर नहीं कर सकते। श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं कि उन्हें श्रद्धा भक्ति युक्त होकर उनका स्मरण करने का प्रयास करना चाहिए। जैसा कि कहा गया है-'अभ्यास मनुष्य को पूर्ण बनाता है' उसी प्रकार से इसे अभ्यास योग या बार-बार अभ्यास द्वारा भगवान के साथ एकीकृत होना कहा जाता है। हर समय मन भौतिक पदार्थों के चिन्तन में भटकता रहता है। ऐसी स्थिति में भक्त को भगवान के नाम, रूप, गुण, लीलाओं, धामों और संतो के स्मरण द्वारा इसे वापस लाकर भगवान के चिन्तन में लगाना चाहिए। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज अपने उपदेशों में साधक को बार-बार यह अभ्यास करने पर बल देते हैं-
जगत ते मन को हटा कर, लगा हरि में प्यारे
इसी का अभ्यास पुनि-पुनि, करु निरंतर प्यारे
(साधना करु प्यारे)
हे प्रिय साधक मन का ध्यान संसार से हटा कर इसे भगवान पर स्थिर करो। इसका निरंतर अभ्यास करो।
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव |
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि || 10||
यदि तुम मेरा स्मरण करने का अभ्यास नहीं कर सकते तब मेरी सेवा के लिए कर्म करने का अभ्यास करो। इस प्रकार तुम पूर्णता की अवस्था को प्राप्त कर लोगे।
भगवान का स्मरण करने के अभ्यास स्मरण करने की अपेक्षाकृत अत्यंत सरल है। हमारा मन माया से निर्मित है इसलिए यह स्वाभाविक रूप से संसार के भौतिक पदार्थों की ओर भागता है। किंतु इसे भगवान में अनुरक्त करने के लिए दृढ़ता से प्रयत्न करना आवश्यक होता है। हमें उन उपदेशों का श्रवण करना चाहिए जिनसे हम भगवान का चिंतन कर सकें और हमें अपने कार्यों में व्यस्त रहते हुए भी उनका अनुपालन करना चाहिए। लेकिन जब भगवान के ध्यान से मन हट जाए तब ऐसे लोगों को क्या करना चाहिए इसका उत्तर श्रीकृष्ण उपर्युक्त श्लोक में देते हैं। वे जो निरंतर भगवान का स्मरण नहीं कर सकते उन्हें अपने सभी कार्य केवल भगवान की सेवा के लिए ही करने चाहिए। वे जो भी कार्य करें उन्हें यह मनोभावना विकसित करनी चाहिए कि वे सब कार्यों का निष्पादन भगवान के सुख के लिए कर रहे हैं जैसा कि पिछले अध्याय के श्लोक 9.27 और 9.28 में वर्णन किया गया है। गृहस्थ जीवन में अधिक समय परिवार की देखभाल में व्यतीत होता है। किसी को भी अपना कार्य सुचारू रूप से अवश्य करना चाहिए लेकिन अपनी आंतरिक चेतना को भी बदलना चाहिए। इन कार्यों को दैहिक आसक्ति और परिवारिक मोह के कारण सम्पन्न करने की अपेक्षा हमें यह चेतना विकसित करनी चाहिए कि परिवार के सभी सदस्य भगवान की संतान हैं और भगवान के सुख के लिए उनकी देखभाल करना हमारा दायित्व है। हमें जीविका अर्जन का कार्य जारी रखना चाहिए लेकिन उन कार्यों को सम्पन्न करने की चेतना को परिवर्तित करना चाहिए। फिर हमारा धन अर्जन करने का उद्देश्य सांसारिक सुखों को प्राप्त करने की अपेक्षा इस दृढ़ भावना से युक्त होगा–'मैं चाहता हूँ कि मैं अपनी और परिवार के सदस्यों की देखभाल के लिए धन इसलिए अर्जित करूंगा जिससे मैं भगवान की भक्ति में लीन होने में समर्थ हो सकूँ और मैं जो भी धन अर्जित करूँगा उसे भगवान की सेवा के लिए दान करूंगा।' समान रूप में खाने, सोने, स्नान करने जैसी शारीरिक क्रियाओं का त्याग नहीं किया जा सकता किन्तु ऐसा करते हुए भी हम यह दिव्य चेतना विकसित कर सकते हैं-'मुझे अपने शरीर को स्वस्थ रखना है ताकि मैं अपने शरीर से भगवान की सेवा कर पाऊँ। इसलिए मैं सावधानीपूर्वक इसे स्वस्थ रखने का सभी प्रकार से प्रयास करूंगा।'
जब हम सभी कार्यों का अभ्यास भगवान के सुख के लिए करते हैं तब स्वाभाविक रूप से हमारे मन का स्वार्थभाव नष्ट होगा और हम उन कार्यों की ओर प्रवृत्त होगें जो अधिक सेवा भक्ति वाले होते हैं। इस प्रकार सभी कर्मों का निष्पादन केवल परमात्मा श्रीकृष्ण की संतुष्टि के लिए करना चाहिए जिससे हमारा मन स्थिर होकर शीघ्र भगवान की ओर केन्द्रित होने में समर्थ हो, तब धीरे-धीरे हमारे हृदय में भगवान का प्रेम प्रकट होगा और हम भगवान का निरंतर चिन्तन करने में सफल होंगे।
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रित: |
सर्वकर्मफलत्यागं तत: कुरु यतात्मवान् || 11||
यदि तुम भक्तियुक्त होकर मेरी सेवा के लिए कार्य करने में असमर्थ हो तब अपने सभी कर्मों के फलों का त्याग करो और आत्म स्थित हो जाओ।
इस अध्याय के 8वें श्लोक का आरम्भ करने के साथ श्रीकृष्ण ने अर्जुन के कल्याणार्थ तीन मार्ग बताए थे। तीसरे मार्ग में उन्होंने अर्जुन को उनकी सेवार्थ कार्य करने को कहा लेकिन इस प्रयोजन हेतु भी शुद्धता और निश्चयात्मक बुद्धि का होना आवश्यक है। जो लोग भगवान के साथ अपने संबंध के बारे में नहीं जानते और जिन्होनें भगवत्प्राप्ति को अपने जीवन का लक्ष्य नहीं बनाया है उनके लिए भगवान के सुख के लिए कार्य करना असंभव होता है।
इसलिए श्रीकृष्ण अब जीवात्मा के कल्याणार्थ चौथा मार्ग बताते हैं-"अर्जुन तुम पहले की भांति अपना कार्य करते रहो लेकिन उनके कर्म-फलों से विरक्त रहो।" ऐसी विरक्ति हमारे अंतःकरण को तमस् और रजस् गुणों से रहित करेगी और सत्त्वगुण की ओर ले जाएगी। इस प्रकार कर्म-फलों का त्याग करने का प्रयास हमारे मन से सांसारिकता को हटाने और बुद्धि को दृढ़ करने में सहायता करेगा। तब हमारी बुद्धि शीघ्रता से शुद्ध होगी और अलौकिक ज्ञान को समझने में समर्थ होगी और हम साधना के उच्च स्तर की ओर अग्रसर होने में समर्थ होंगे।
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते |
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् || 12||
शारीरिक अभ्यास से श्रेष्ठ ज्ञान है, ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान है और ध्यान से श्रेष्ठ कर्म फलों का परित्याग है और ऐसे त्याग से शीघ्र मन को शांति प्राप्त होती है।
कई लोग शारीरिक अभ्यास तक ही सीमित रहते हैं। उन्हें कर्मकाण्डों के पालन में आनन्द मिलता है लेकिन वे मन को भगवान में अनुरक्त नहीं करते। जब वे नया घर या नयी कार ख़रीदते हैं तब वे पंडित को बुलाकर अनुष्ठान करवाते हैं और जब पंडित पूजा करता है, उस समय वे दूसरे कमरों में बैठकर वार्तालाप करते हैं और चाय की चुस्कियाँ लेते हैं। उनके लिए भक्ति केवल कर्मकाण्डों के प्रदर्शन से अधिक और कुछ नहीं। यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करने की प्रवृत्ति है जो संस्कारवश हमें पूर्वजों से प्राप्त होती है। धार्मिक अनुष्ठान करना अनुचित नहीं है क्योंकि कुछ न करने से कुछ करना अच्छा होता है। आखिरकार ऐसे लोग बाह्य रूप से भक्ति में लीन तो रहते हैं। हालांकि श्रीकृष्ण कहते हैं कि शारीरिक अभ्यास से श्रेष्ठ आध्यात्मिक ज्ञान को पोषित करना है। इस ज्ञान से यह बोध होता है कि भगवत्प्राप्ति ही जीवन का लक्ष्य है न कि भौतिक उन्नति। जो ज्ञानयुक्त हो जाता है वह खोखली धार्मिक विधियों से परे हो जाता है और अंत:करण को शुद्ध करने की अभिलाषा विकसित करता है किन्तु केवल कोरे ज्ञान से मन की शुद्धि नहीं हो सकती। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि ज्ञान अर्जन करने से श्रेष्ठ मन को ध्यान की प्रक्रिया में लगाना है। वास्तव में ध्यान द्वारा हम मन को वश में कर सांसारिक सुखों के प्रति विरक्ति की भावना को विकसित कर सकते हैं। जब मन विरक्ति विकसित करता है तब हम अगले चरण का अभ्यास कर सकते हैं जो कि कर्म-फलों का परित्याग है। जैसा कि पिछले श्लोक में व्याख्या की गयी है कि इससे मन को सांसारिक विषयों से हटाने में और बुद्धि को दृढ़ कर उच्चावस्था की ओर ले जाने में सहायता मिलती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च |
निर्ममो निरहङ्कार: समदु:खसुख: क्षमी || 13||
सन्तुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चय: |
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्त: स मे प्रिय: || 14||
जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करते, सबके मित्र हैं, दयालु हैं, ऐसे भक्त मुझे अति प्रिय हैं क्योंकि वे स्वामित्व की भावना से रहित और मिथ्या अहंकार से मुक्त रहते हैं, दुःख और सुख में समभाव रहते हैं और सदैव क्षमावान होते हैं। वे सदा तृप्त रहते हैं, मेरी भक्ति में दृढ़ता से एकीकृत हो जाते हैं, वे आत्म संयमित होकर, दृढ़-संकल्प के साथ अपना मन और बुद्धि मुझे समर्पित करते हैं।
यह बताने के पश्चात् कि उनके साकार रूप की भक्ति श्रेष्ठ है, अब श्रीकृष्ण 13वें से 19वें श्लोक तक अपने प्रिय भक्तों की विशेषताओं का वर्णन करेंगे।
सभी जीवों के प्रति द्वेष भावना से मुक्तः भक्त सभी प्राणियों को भगवान के अंश के रूप में देखते हैं। यदि वे अपने मन में अन्य लोगों के प्रति ईर्ष्या के भाव को प्रश्रय देते हैं तब वे उसे भगवान के प्रति ईर्ष्या करना समझते हैं। ऐसे भक्त अपना अहित करने वाले लोगों के प्रति भी द्वेष भावना से मुक्त रहते हैं।
मैत्री और दया भावना से युक्तः भक्ति सभी जीवों में एकता की भावना उत्पन्न करती है क्योंकि सभी जीव एक ही भगवान की संतानें हैं। इस प्रकार से दूसरों को अपने से भिन्न देखने की धारणा समाप्त हो जाती है। यह भावना भक्तों में शालीनता और दूसरों के कष्टों के प्रति सहानुभूति विकसित करती है।
स्वामित्व एवं मिथ्या अहंकार से मुक्तः भक्ति का सबसे बड़ा शत्रु अहंकार है। अपने भीतर के अहं भाव को मिटाने का अभ्यास करके ही कोई आध्यात्मिक मार्ग पर उन्नति कर सकता है। निष्काम भक्त स्वाभाविक रूप से विनम्र रहते हैं और अहं भावना तथा अपने स्वामित्व के भाव को त्याग देते हैं और उसी प्रकार से शरीर के रूप में अपनी मिथ्या पहचान का उन्मूलन कर देते हैं।
सुख और दुःख में समभावः भक्त यह विश्वास करते हैं कि केवल प्रयास करना ही उनके हाथ में है और फल प्रदान करना भगवान के हाथ में होता है। इस प्रकार अपने कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाले अनुकूल या प्रतिकूल परिणाम को वे भगवान की इच्छा समझते हैं और उन्हें समभाव से स्वीकार करते हैं।
सदैव क्षमाशीलः भक्त कभी अपनी संतुष्टि के लिए अपने को कष्ट पहुँचाने वालों को दण्ड देने के संबंध में नहीं सोचते। दूसरों के प्रति ऐसे नकारात्मक विचारों से भक्ति नष्ट हो जाती है। इसलिए बुद्धिमान भक्त किसी भी परिस्थिति में इन विचारों को अंतःकरण में शरण देना अस्वीकार कर देते हैं और अधर्म करने वालों को दण्ड प्रदान करने का कार्य भगवान के ऊपर छोड़ देते हैं।
सदैव संतोषीः सुख समृद्धि से हमें संतोष प्राप्त नहीं होता अपितु इकेवल अपनी कामनाओं पर अंकुश लगाने से मिलता है। भक्त सांसारिक पदार्थों को सुख देने के साधन के रूप नहीं देखते और इसलिए भगवत्कृपा से उन्हें जो मिलता है उसी में संतुष्ट रहते हैं।
दृढ़संकल्प से मेरी भक्ति में एकीकृत होनाः जैसे कि पहले से व्याख्या की गयी है कि 'योग' का अर्थ जुड़ना है। भक्त योगी होते हैं क्योंकि उनकी चेतना भगवान में लीन रहती है। यह तल्लीनता यदा-कदा या सविराम नहीं होती अपितु दृढ़तापूर्वक निरंतर बनी रहती है क्योंकि वे भगवान के साथ अटूट संबंध स्थापित कर लेते हैं।
आत्मसंयमीः भक्त भगवान की प्रेममयी भक्ति में अपना मन अनुरक्त करते हैं। इस प्रकार से वह संसार से विरक्त हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप वे अपने मन और इन्द्रियों पर विजय पा लेते हैं।
दृढ़संकल्प युक्तः दृढ़ता का गुण स्थिर बुद्धि से प्राप्त होता है। भक्त शास्त्रों के ज्ञान और गुरु के उपदेशों को अपने साथ जोड़े रखते हैं। इससे बुद्धि इतनी दृढ़ हो जाती है कि यदि पूरा संसार भी दूसरे मार्ग पर जाने का परामर्श ही क्यों न दें तब भी वे अपने संकल्प से कदाचित् पीछे नहीं हटते।
मन और बुद्धि का समर्पणः जीव स्वभावतः भगवान की सेवक है और जैसे ही हम इस ज्ञान से प्रबुद्ध होते हैं तभी हम वास्तव में स्वयं को परमात्मा को समर्पित करते हैं। इस समर्पण में मन और बुद्धि का प्रमुख रूप से महत्त्व होता है। जब ये भगवान के प्रति समर्पित हो जाते हैं तब हमारे व्यक्तित्त्व के शेष सभी अवयव शरीर, कर्म इन्द्रियाँ, ज्ञानेन्द्रियाँ, सांसारिक पदार्थ और आत्मा भी स्वाभाविक रूप से भगवान की सेवा के लिए समर्पित हो जाते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिन भक्तों में ये गुण प्रदर्शित होते हैं वे उन्हें अत्यंत प्रिय लगते हैं।
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य: |
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो य: स च मे प्रिय: || 15||
वे जो किसी को उद्विग्न करने का कारण नहीं होते और न ही किसी के द्वारा व्यथित होते हैं। जो सुख-दुःख में समभाव रहते हैं, भय और चिन्ता से मुक्त रहते हैं मेरे ऐसे भक्त मुझे अति प्रिय हैं।
आत्मा प्राकृतिक रूप से शुद्ध है। समस्या यह है कि वर्तमान में यह अशुद्ध मन द्वारा आच्छादित है। एक बार जब यह अशुद्धता दूर हो जाती है, तत्पश्चात् आत्मा के श्रेष्ठ गुण स्वाभाविक रूप से प्रकाशित हो जाते हैं। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है:
यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चन सर्वैगुणैस्तत्र समासते सुराः।
हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहिः।।
(श्रीमद्भागवतम्-5.18.12)
"वे भक्त जो स्वयं को परमात्मा की भक्ति में तल्लीन कर लेते हैं उनके हृदय में समस्त स्वर्ग के देवताओं के अद्भुत गुण प्रकट होते हैं। किन्तु जो भगवान की भक्ति में लीन नहीं होते और केवल मन को तुच्छ बाहरी विषयों की ओर दौड़ाते हैं उनमें महापुरुषों के गुण नहीं आ सकते।" यहाँ श्रीकृष्ण कुछ और गुणों का वर्णन करते हैं जो उनके भक्तों में प्रकट होते हैं।
किसी की निराशा का कारण न होनाः भक्ति हृदय को पिघला कर उसे कोमल बना देती है। इसलिए भक्त स्वाभाविक रूप से सभी के साथ सद्व्यवहार करते हैं। इसके साथ-साथ वे सबके भीतर भगवान को विद्यमान देखते हैं और सबको भगवान के अंश के रूप में देखते हैं इसलिए वह कभी किसी को कष्ट पहुँचाने की नहीं सोंचते।।
किसी के द्वारा व्यथित न होनाः यद्यपि भक्त किसी को कष्ट नहीं देते किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि दूसरे उन्हें कष्ट पहुँचाने का प्रयास नहीं करते। अखिल विश्व के संतों के इतिहास से यह विदित होता है कि उनके जीवनकाल के दौरान जो लोग उनके कल्याणकारी कार्यों और सिद्धान्तों से भयभीत रहते थे वे प्रायः उन्हें उत्पीड़ित करते थे। लेकिन संतों ने सदैव अपने को कष्ट देने वालों के प्रति दयालुता का भाव ही दर्शाया। इसी प्रकार हम देखते है कि नाज़रेथ के यीशू ने सूली पर चढ़ते हुए यह प्रार्थना की थी-“हे परमात्मा इन्हें क्षमा कर देना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।" (लूक 23.24)।
सुख और दुःख में समभावः भक्त शास्त्रों के ज्ञान से सम्पन्न होते हैं और इसलिए वे जानते हैं कि सुख और दुःख दोनों जीवन के उतार-चढ़ाव हैं। जैसे ग्रीष्म और शरद् ऋतु का आना-जाना। इसलिए वे सुख-दुख दोनों को भगवान की कृपा के रूप में देखते हैं और सभी परिस्थितियों का उपयोग अपनी भक्ति बढ़ाने के लिए करते हैं।
भय और चिंता से मुक्तः भय और चिन्ता का कारण आसक्ति है। इससे हमारे भीतर भौतिक पदार्थों के भोग की इच्छा उत्पन्न होती है और इनके छिन जाने की चिन्ता हमें भयभीत करती है। जिस क्षण हमारे भीतर भौतिक पदार्थों के प्रति विरक्ति उत्पन्न होती है, उसी क्षण हम भय मुक्त हो जाते हैं। भक्त केवल आसक्ति रहित ही नहीं होते बल्कि वे भगवान की इच्छा के साथ सामंजस्य रखते हैं। इसलिए उन्हें भय और चिन्ता का अनुभव नहीं होता।
अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ: |
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्त: स मे प्रिय: || 16||
वे जो सांसारिक प्रलोभनों से उदासीन रहते हैं, बाह्य और आंतरिक रूप से शुद्ध, निपुण, चिन्ता रहित, कष्ट रहित और सभी कार्यकलापों में स्वार्थ रहित रहते हैं, मेरे ऐसे भक्त मुझे अति प्रिय हैं।
सांसारिक सुखों के प्रति उदासीनताः किसी निर्धन व्यक्ति के लिए 100 रुपये की हानि और लाभ एक महत्त्वपूर्ण विषय हो सकता है, किन्तु एक करोड़पति इसे कोई महत्त्व नहीं देगा और इस विषय पर आगे कुछ नहीं सोंचेगा। भक्त भगवान के दिव्य प्रेम से युक्त होते हैं और उससे सम्पन्न होने को ही वे परम निधि मानते हैं। वे भगवान की प्रेममयी सेवा को ही प्राथमिकता देते हैं। इसलिए वे सांसारिक सुखों के प्रति भी उदासीन रहते हैं।
बाह्य और आंतरिक रूप से शुद्धः चूंकि उनका मन निरंतर परम शुद्ध भगवान में तल्लीन रहता है इसलिए भक्त आंतरिक रूप से काम-वासना, क्रोध, लालच, शत्रुता इत्यादि विकारों से मुक्त हो जाते हैं। इस मन:स्थिति में वे स्वाभाविक रूप से अपने शरीर और आस-पास के वातावरण को भी शुद्ध रखते हैं। अतः प्राचीन कहावत के अनुसार 'स्वच्छता का द्वार हैं' को चरितार्थ करते हुए वे बाह्य रूप से भी शुद्ध रहते हैं।
कार्य-कुशलः भक्त सभी कार्यों को भगवान की सेवा के रूप में देखते हैं इसलिए वे ध्यानपूर्वक और अति सावधानी से अपने कार्य करते हैं। यह स्वाभाविक रूप से उन्हें कार्य कुशल बनाता है।
चिन्ता मुक्तः मन में यह विश्वास रखकर कि भगवान सदैव उनकी शरणागति के अनुसार उनकी रक्षा करते हैं वे चिन्ता मुक्त रहते हैं।
अव्यथितः चूंकि भक्त अपनी इच्छा भगवान को समर्पित कर देते हैं। अतः वे केवल अथक प्रयासों द्वारा अपने समस्त कार्यों को सम्पन्न करते हैं और उनका फल भगवान की इच्छा पर छोड़ देते हैं। इसलिए जो भी फल प्राप्त होता है उससे वे व्यथित नहीं होते और अपनी इच्छा को दिव्य इच्छा के अधीन मानते हैं।
सभी कार्यों को निः स्वार्थ भाव से सम्पन्न करनाः उनकी सेवा करने की मनोभावना उन्हें स्वार्थों से ऊपर उठाती है।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति |
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिय: || 17||
वे जो न तो लौकिक सुखों से हर्षित होते हैं और न ही सांसारिक दुःखों से निराश होते हैं तथा न ही किसी हानि के लिए शोक करते हैं एवं न ही लाभ की लालसा करते हैं, वे शुभ और अशुभ कर्मों का परित्याग करते हैं। ऐसे भक्त जो भक्ति भावना से परिपूर्ण होते हैं, मुझे अति प्रिय हैं।
लौकिक सुखों से हर्षित तथा संसार के दुःखों से निराश न होनाः यदि हम अंधकार में हैं और उस समय कोई दीपक दिखा कर हमारी सहायता करता है, ऐसे में हम स्वाभाविक रूप से प्रसन्न हो जाते हैं। फिर उस समय जब कोई दीपक को बुझा देता है तब हम निराश हो जाते हैं। लेकिन अगर हम दोपहर के समय सूर्य के प्रकाश में खड़े हैं उस समय यदि कोई हमें दीपक दिखाता है और कोई दूसरा उसे बुझा देता है तब हम उदासीन रहते हैं। समान रूप से भगवान के भक्त भगवान के दिव्य प्रेम और आनन्द से तृप्त रहते हैं इसलिए वे प्रसन्नता और निराशा से ऊपर उठ जाते हैं।
लाभ में हर्षित और हानि में शोक न करनाः ऐसे भक्त न तो सांसारिक सुखों के लिए लालायित होते हैं और न ही अप्रिय परिस्थितियों पर शोक करते हैं। नारद भक्ति दर्शन में वर्णन है:
यत्प्राप्य न किञ्चिद्वाञ्छति, न शोचति,
न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साही भवति ।।
(नारद भक्ति सूत्र-5)
1. "भगवान का प्रेम प्राप्त कर भक्त सुखद वस्तुओं को प्राप्त करने की न तो लालसा करते हैं और न ही उनसे वंचित होने पर शोक व्यक्त करते हैं। वे अपने को कष्ट पहुँचाने वालों से द्वेष नहीं करते। वे सांसारिक विषय भोगों को पसंद नहीं करते। वे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए चिन्तित नहीं होते। भक्त भगवान के आनन्द में मग्न रहते हैं" इसलिए तुलनात्मक दृष्टि से उन्हें सभी लौकिक पदार्थों से मिलने वाले सुख तुच्छ और नगण्य प्रतीत
होते हैं।
2. शुभ और अशुभ कर्मों का त्यागः भक्त प्रायः अशुभ कर्मों (विकर्मों) का त्याग करते हैं क्योंकि ये प्रकृति के विरूद्ध हैं और भगवान को अप्रसन्न करते हैं। शुभ कर्मों को श्रीकृष्ण शास्त्रों में उल्लिखित कर्मकाण्डों के रूप में परिभाषित करते हैं। भक्त द्वारा संपादित सभी कर्म, अकर्म बन जाते हैं क्योंकि इनका संपादन बिना किसी स्वार्थ के किया जाता है और ये भगवान को समर्पित होते हैं। अकर्म की व्याख्या चौथे अध्याय के 14वें से 20वें श्लोक में सविस्तार की गयी है।
3. भक्तिभाव से परिपूर्णः 'भक्तिमान्यः' का अर्थ 'भक्तिभाव से परिपूर्ण' होना है। दिव्य प्रेम वो है जो नित्य बढ़ता रहे। भक्ति रस के कवि कहते हैं कि 'प्रेम में पूर्णिमा नहीं' अर्थात् दिव्य प्रेम चन्द्रमा के समान नहीं है जो एक सीमा तक बढ़ता है और फिर घटता है बल्कि दिव्य प्रेम असीम रूप से बढ़ता है। इसलिए भक्त के हृदय में भगवान के लिए प्रेम का समुद्र समाया रहता है। अतः श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे भक्त मुझे अति प्रिय है।
सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो: |
शीतोष्णसुखदु:खेषु सम: सङ्गविवर्जित: || 18||
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् |
अनिकेत: स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नर: || 19||
जो मित्रों और शत्रुओं के लिए एक समान है, मान और अपमान, शीत और ग्रीष्म, सुख तथा दुःख, में समभाव रहते हैं, वे मुझे अति प्रिय हैं। जो सभी प्रकार के कुसंग से मुक्त रहते हैं जो अपनी प्रशंसा और निंदा को एक जैसा समझते हैं, जो सदैव मौन-चिन्तन में लीन रहते हैं, जो मिल जाए उसमें संतुष्ट रहते हैं, घर-गृहस्थी में आसक्ति नहीं रखते, जिनकी बुद्धि दृढ़तापूर्वक मुझमें स्थिर रहती है और जो मेरे प्रति भक्तिभाव से युक्त रहते हैं, वे मुझे अत्यंत प्रिय है। श्रीकृष्ण भक्तों की दस अन्य विशेषताओं का वर्णन करते हैं-
1. शत्रु और मित्र के साथ समान व्यवहारः भक्त सभी के साथ समता का व्यवहार करते हैं तथा शत्रुता और मित्रता की भावना को अपने उपर हावी नहीं होने देते। इस संबंध में प्रह्लाद की एक सुंदर कथा है। एक बार उनका पुत्र-विरोचन अपने गुरु के पुत्र सुधन्वा के साथ वाद-विवाद करने लगा। विरोचन ने कहा-“मैं तुमसे श्रेष्ठ हूँ क्योंकि मैं राजा का पुत्र हूँ।" सुधन्वा ने कहा-"ऋषि का पुत्र होने के कारण मैं तुमसे श्रेष्ठ हूँ।" दोनों युवा थे और अपने उतावलेपन में दोनों ने यह शर्त लगायी-"दोनों में से जो श्रेष्ठ घोषित होगा वही जीवित रहेगा और दूसरे को अपने प्राणों का त्याग करना होगा।" विरोचन ने पूछा-"इसका निर्णय कौन करेगा?" सुधन्वा ने कहा-"इसका निर्णय तुम्हारे पिता प्रह्लाद करेंगे।" विरोचन ने कहा- "ठीक है किन्तु तुम उन पर पक्षपात करने की शिकायत कर सकते हो।" सुन्धवा ने कहा-"मेरे पिता ऋषि अंगिरा ने बताया है कि तुम्हारे पिता प्रह्लाद प्रत्यक्ष न्याय की मूर्ति हैं और वह कभी मित्र और शत्रु में भेदभाव नहीं करेंगे।" दोनों बालक प्रह्लाद के पास गये। विरोचन ने पूछा-"पिता जी मैं श्रेष्ठ हूँ या सुधन्वा।" प्रह्लाद ने पूछा-"यह प्रश्न कैसे उत्पन्न हुआ।" विरोचन ने कहा "पिता जी हमने शर्त लगायी है कि जो भी श्रेष्ठ घोषित होगा वही जीवित रहेगा और दूसरे को अपने प्राण त्यागने पड़ेंगे।" प्रह्लाद प्रसन्न हुआ और कहा-"तुम्हारा मित्र सुधन्वा श्रेष्ठ है क्योंकि वह आपके पिता के गुरु का पुत्र है।" प्रह्लाद ने अपने सेवकों को आदेश दिया-"मेरे पुत्र को फांसी पर लटका कर मार दो।"
उसी क्षण सुधन्वा ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि 'प्रतीक्षा करो', उसने प्रह्लाद से कहा कि मेरा दूसरा प्रश्न यह है-“मैं श्रेष्ठ हूँ या आप।" प्रह्लाद ने उत्तर दिया कि "मेरा जन्म राक्षस परिवार में हुआ है जबकि तुम ऋषि पुत्र हो जो मेरे गुरु हैं इसलिए तुम श्रेष्ठ हो।" सुधन्वा ने पुनः पूछा “ऐसी स्थिति में क्या तुम मेरे आदेश का पालन करोगे? प्रह्लाद ने उत्तर दिया–“हाँ, निश्चय ही"। तब सुन्धवा ने कहा ठीक है तो फिर विरोचन को मुक्त कर दो" तब प्रह्लाद ने अपने सेवकों को उसी भाव से विरोचन को मुक्त करने का आदेश दिया जिस प्रकार से फांसी पर लटकाने के लिए दिया था।
यह देखकर स्वर्ग के देवताओं ने प्रह्लाद के राज-दरबार में पुष्पों की वर्षा की और प्रह्लाद द्वारा किए गए न्याय की प्रशंसा की। प्रह्लाद में निष्पक्ष न्याय करने का गुण स्वाभाविक रूप से भगवान का परम भक्त होने के कारण उत्पन्न हुआ था। इसलिए वह मित्र, सगे संबंधी, पुत्र, पोते और पराये लोगों के साथ समता का व्यवहार करता था।
मान-अपमान में समभावः श्रीकृष्ण पुनः कहते हैं कि भक्त, मान-अपमान की ओर ध्यान नहीं देते। यह उसी प्रकार से है कि जब कोई व्यक्ति व्यभिचार कर्म में संलिप्त हो जाता है, तब यह सोचता है कि कोई क्या कहेगा किन्तु जब संबंध गहन हो जाते हैं तब वह इसओर ध्यान नहीं देता कि इससे कितना अपयश होगा। इसी प्रकार से भक्त के हृदय में दिव्य प्रेम की ज्योति इतनी दीप्तिमान होकर जलती है कि उसके लिए लौकिक मान और अपमान का कोई महत्त्व नहीं रहता।
शीत और गर्मी तथा सुख और दुःख में समभावः भक्त अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में समभाव रहते हैं। वे जानते हैं कि दोनों में से कोई भी स्थिति स्थायी नहीं है। ये दिन और रात्रि की भांति आते-जाते रहते हैं। इसलिए वे इन द्वन्द्वों को महत्त्व नहीं देते। रामकृष्ण परमहंस के जीवन की एक घटना संतों की इस महानता का उदाहरण है। वृद्धावस्था में वे गले में कैन्सर से ग्रस्त थे। लोग उन्हें इसके उपचार हेतु काली माता की प्रार्थना करने के लिए कहते थे। उन्होंने कहा- "मेरा मन काली मां के प्रेम में निमग्न है। फिर मैं इस तुच्छ शरीर को कैंसर से बचाने के लिए प्रार्थना क्यों करूँ। जो भगवान की इच्छा होगी उसे होने दो।"
कुसंग से मुक्तः किसी भी व्यक्ति या वस्तु के संयोग को संग कहते हैं। संग दो प्रकार के होते है। जो संग हमारे मन को सांसारिकता की ओर ले जाता है उसे कुसंग कहते हैं और जो हमारे मन को सांसारिकता से दूर ले जाता है उसे सत्संग कहते हैं। चूँकि भक्त सांसारिक चिन्तन में आनन्द नहीं लेते इसलिए वे कुसंग की उपेक्षा कर सत्संग में लीन रहते हैं।
प्रशंसा और निंदा में एक समानः वे जो परिस्थितियों द्वारा प्रेरित होते हैं उनके लिए अन्य लोगों की प्रशंसा और निंदा बहुत मायने रखती है। किन्तु भक्त अपने अंतर के सिद्धांतों से प्रेरित होते हैं। इसलिए अन्य लोगों द्वारा की जाने वाली प्रशंसा और निंदा का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
मौन चिंतनः कौए और हंसों की पसंद एक दूसरे से विपरीत होती है। कौएँ गंदगी के ढेर से आकर्षित होते हैं जबकि हंसों का आकर्षण शांत झील आदि होती हैं। समान रूप से सांसारिक लोगों का मन लौकिक विषयों में अत्यंत आनन्द प्राप्त करता है। लेकिन संतों का मन शुद्ध होता है, इसलिए उन्हें सांसारिक विषय उसी प्रकार से आकर्षित नहीं करते जैसे कि वे गंदगी का ढेर हों। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे बातचीत नहीं करते। जिस प्रकार हंस झील की ओर आकर्षित होते हैं उसी प्रकार से उनका मन भगवान के नाम, गुण, रूप, लीलाओं और भगवान की महिमा के व्याख्यान जैसे विषयों की ओर आकर्षित होता है।
जो कुछ मिल जाए उसी में संतुष्ट होनाः शरीर की देखभाल के लिए भक्त न्यूनतम आवश्यकताओं के साथ जीवन निर्वाह करते हैं।
इस संबंध में संत कबीर का प्रसिद्ध दोहा इस प्रकार से है:
मालिक इतना दीजिए, जामे कुटुम्ब समाए।
मैं भी भूखा न रहू, साधु न भूखा जाए,।।
"हे भगवान मुझे केवल उतना ही दीजिए कि जिससे मेरे परिवार की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके और अपने द्वार पर आने वाले साधु को भी मैं कुछ दान दे सकूँ।"
घर-गृहस्थी से ममता रहितः जीवात्मा का पृथ्वी पर स्थायी निवास नहीं होता क्योंकि मृत्यु के पश्चात् यह संसार में ही रह जाता है। जब मुगल शहंशाह अकबर ने फतेहपुर सीकरी में अपनी राजधानी स्थापित की तब उसने मुख्य प्रवेश द्वार पर निम्नलिखित शब्द उत्कीर्ण करवाएँ-"यह संसार एक पुल है इसे पार करो किन्तु इस पर कोई घर न बनाओ।" इसी संबंध में जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने सुंदर वर्णन किया है-
जग में रहो ऐसे गोविन्द राधे।
धर्मशाला में यात्री रहें ज्यों बता दे।।
(राधा गोविन्द गीत)
"संसार में एक यात्री के समान रहो जो मार्ग में स्थित धर्मशाला में ठहरता है। वो यह जानता है कि अगली सुबह उसे इसे खाली करना पड़ेगा।" इस कथन को सत्य समझकर भक्त अपने निवास स्थान को अस्थायी निवास स्थान के रूप में देखता है।
दृढ़ बुद्धि के साथ मेरे प्रति समर्पणः भगवान और उनके साथ अपने नित्य संबंधों के प्रति भक्तों की गहन आस्था होती है। उनमें यह दृढ़ विश्वास होता है कि अगर वे भगवान के शरणागत होते हैं तब वे भगवान की कृपा से परम सत्य को पा सकते हैं। इसलिए वे न तो आकर्षणों और न ही एक मार्ग से दूसरे मार्ग पर भटक सकते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसी दृढ़ बुद्धि वाले भक्त मुझे अति प्रिय है।
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते |
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रिया: || 20||
वे जो यहाँ प्रकट किए गए इस अमृत रूपी ज्ञान का आदर करते हैं और मुझमें विश्वास करते हैं तथा निष्ठापूर्वक मुझे अपना परम लक्ष्य मानकर मुझ पर समर्पित होते हैं, वे मुझे अति प्रिय हैं।
श्रीकृष्ण अब अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए इस अध्याय का समापन करते हैं। इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने उनसे पूछा था कि वे साकार रूप की भक्ति करने वालों तथा ज्ञान मार्ग द्वारा निराकार ब्रह्म की भक्ति करने वालों में से किसे श्रेष्ठ मानते हैं। श्रीकृष्ण ने दूसरे श्लोक में यह उत्तर दिया कि वे उन्हें श्रेष्ठ योगी मानते हैं जो दृढ़तापूर्वक उनके साकार रूप की भक्ति में तल्लीन रहते हैं। इसके पश्चात् उन्होनें पहले तो भक्ति के प्रकारों की व्याख्या की और फिर अपने भक्तों की विशेषताओं का वर्णन किया। इसलिए अब वह समापन करते हुए कहते हैं कि आध्यात्मिकता का सर्वोच्च मार्ग भक्ति ही है। वे जो परमात्मा को अपना परम लक्ष्य मानते हैं और पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर भक्ति करते हैं, ऐसे भक्त भगवान को अतिप्रिय हैं।
।।श्रीमद्भगवत गीता द्वादश अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
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