॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhagavad Geeta Chapter 10
श्रीमद्भगवत गीता दशम अध्याय
अध्याय दस: विभूति योग
भगवान के अनन्त वैभवों की स्तुति द्वारा प्राप्त योग
इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने अपनी महिमा का वर्णन किया है जिससे अर्जुन को भगवान में ध्यान केन्द्रित करने में सहायता मिल सके। नौवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने भक्ति योग की व्याख्या करते हुए अपने वैभवों का वर्णन किया था। यहाँ इस अध्याय में वे अर्जुन के भीतर श्रद्धा-भक्ति को बढ़ाने के प्रयोजनार्थ अपनी अनन्त महिमा का पुनः वर्णन करते हैं। इन श्लोकों को पढ़ने से आनन्द की अनुभूति होती है और इनका श्रवण करने से मन प्रफुल्लित हो जाता है।
श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे सृष्टि में प्रकट प्रत्येक वस्तु का स्रोत हैं। मनुष्यों में विविध प्रकार के गुण उन्हीं से उत्पन्न होते हैं। सात महर्षि, चार ऋषि और चौदह मनुओं का जन्म उनसे हुआ और बाद में संसार के सभी मनुष्य इनसे प्रकट हुए। जो यह जानते हैं कि सबका उद्गम भगवान हैं, वे अगाध श्रद्धा के साथ उनकी भक्ति में तल्लीन रहते हैं। ऐसे भक्त उनकी महिमा का वर्णन कर पूर्ण संतुष्टि एवं मानसिक शांति प्राप्त करते हैं और अन्य लोगों को भी जगाते हैं क्योंकि उनका मन उनमें एकीकृत हो जाता है। इसलिए भगवान उनके हृदय में बैठकर उन्हें दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं ताकि वे उन्हें सुगमता से प्राप्त कर सकें।
श्रीकृष्ण से यह सब सुनकर अर्जुन कहता है कि उसे पूर्ण रूप से भगवान के स्वरूप का बोध हो गया है और वह यह घोषणा करता है कि भगवान श्रीकृष्ण संसार के परम स्वामी हैं। फिर वह भगवान से अनुरोध करता है कि वे पुनः अपनी अनुपम महिमा का और अधिक से अधिक वर्णन करें। इसका श्रवण करना अर्जुन के लिए अमृत का सेवन करने के समान है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ही सभी का आदि, मध्य और अन्त हैं। इसलिए कुछ उनकी शक्तियों की अभिव्यक्ति हैं। वे सौंदर्य, वैभव, शक्ति, ज्ञान और समृद्धि का अनन्त महासागर हैं। जब हम कहीं किसी असाधारण शक्ति को देखते हैं जो हमारी कल्पना से परे होती है और हमें आनन्द में निमग्न कर देती है तब हमें उसे और कुछ न मानकर भगवान की महिमा का स्फुलिंग मानना चाहिए। वे ऐसे विद्युत् गृह के समान हैं जहाँ से मानवजाति के साथ-साथ ब्रह्माण्ड के सभी पदार्थ ऊर्जा प्राप्त करते हैं। तत्पश्चात् शेष अध्याय में वे उन सभी श्रेष्ठ पदार्थों, व्यक्तित्वों और क्रियाओं का वर्णन करते हैं जो उनके विशाल वैभव को प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार से वे यह कह कर इस अध्याय का समापन करते हैं कि उन्होंने अभी तक अपनी जिस अनुपम महिमा का वर्णन किया है उससे उनकी अनन्त महिमा के महत्त्व का अनुमान नहीं लगाया जा सकता क्योंकि वे अनन्त ब्रह्माण्डों को अपने दिव्य स्वरूप के एक ही अंश में धारण किए हुए हैं। इसलिए हम मानवों को भगवान को ही, जो सभी प्रकार के वैभवों का स्रोत हैं, अपनी आराधना का लक्ष्य मानना चाहिए।
श्रीभगवानुवाच |
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वच: |
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया || 1||
श्री भगवान ने कहाः हे महाबाहु अर्जुन! अब आगे मेरे सभी दिव्य उपदेशों को पुनः सुनो। चूंकि तुम मेरे प्रिय सखा हो इसलिए मैं तुम्हारे कल्याणार्थ इन्हें प्रकट करूँगा।
श्रीकृष्ण अर्जुन द्वारा व्यक्त की गयी तीव्र उत्कंठा से प्रसन्न हुए। श्रीकृष्ण अब अपनी प्रेममयी भक्ति के लिए अर्जुन के मन में अनुराग को बढ़ाने के लिए कहते हैं कि वे अब अपनी महिमा और अद्वितीय गुणों का वर्णन करेंगे। उन्होंने 'प्रीयमाणाय' शब्द का प्रयोग किया है जिसका तात्पर्य 'तुम मेरे सबसे प्रिय और विश्वस्त मित्र हो इसलिए मैं तुम्हारे समक्ष इस अद्भुत ज्ञान को प्रकट कर रहा हूँ।'
न मे विदु: सुरगणा: प्रभवं न महर्षय: |
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश: || 2||
न तो स्वर्ग के देवता और न ही महान ऋषि मेरी उत्पत्ति या वैभव को जानते हैं क्योंकि मैं ही सभी देवताओं और महान ऋर्षियों का उद्गम हूँ।
एक पिता ही अपने पुत्र के जन्म और उसके जीवन के विषय में जानता है क्योंकि वह इसका साक्षी होता है। किन्तु पिता के जन्म और बचपन की जानकारी पुत्र के ज्ञान से परे होती है क्योंकि ये सब घटनाएँ उसके जन्म से पूर्व घट चुकी होती हैं। इस प्रकार से देवता और ऋषिगण उस भगवान के उद्गम की मूल प्रकृति को जान नहीं सकते। इसी प्रकार का वर्णन ऋग्वेद में किया गया है-
को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आ जाता कुत इयं विसृष्टिः ।
अर्वाग् देवा अस्य विसर्ज नेनाया, अथा को वेद यत आबभूव।।
(ऋग्वेद-10.129.6)
"संसार में कौन है जो स्पष्ट रूप से जान सकता है? कौन यह सिद्ध कर सकता है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कहाँ से प्रारम्भ हुई? कौन यह बता सकता है कि सृष्टि की उत्पत्ति कहाँ से हुई? देवताओं का जन्म सृष्टि के उपरान्त हुआ। इसलिए कौन जान सकता है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कहाँ से हुई?" उपनिषदों में भी वर्णन किया गया है
नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत्।
(ईषोपनिषद्-4)
"भगवान को स्वर्ग के देवता नहीं जान सकते क्योंकि वे उनसे पूर्व अस्तित्व में थे।" फिर भी अपने प्रिय मित्र की भक्ति को पुष्ट करने हेतु श्रीकृष्ण भगवान अब ऐसा गूढ ज्ञान प्रकट करेंगे-
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् |
असम्मूढ: स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते || 3||
वे जो मुझे अजन्मा, अनादि और समस्त ब्रह्माण्डों के स्वामी के रूप में जानते हैं, मनुष्यों में वे मोह रहित और समस्त बुराइयों से मुक्त हो जाते हैं।
यह कहकर कि उन्हें कोई नहीं जान सकता, श्रीकृष्ण अब कहते हैं कि कुछ लोग उन्हें जान सकते हैं। क्या यह उनके कथनों का विरोधाभास नहीं है? नहीं, क्योंकि उनके कहने का सही में तात्पर्य यह है कि स्वयं के प्रयत्नों द्वारा उन्हें कोई नहीं जान सकता लेकिन जब भगवान किसी पर कृपा करते हैं, तब वह सौभाग्यशाली जीवात्मा उन्हें जान सकती है। इस प्रकार वे सब जो भगवान को जान जाते हैं ऐसा केवल भगवान की कृपा से होता है, जैसा कि इस अध्याय के 10वें श्लोक में उल्लेख किया गया है। वे भक्त जिनका मन सदैव मेरी भक्ति में तल्लीन रहता है, मैं उन्हें ऐसा दिव्य और अप्रतिम ज्ञान प्रदान करता हूँ जिससे वे पुण्य आत्माएँ मुझे सुगमता से पा लेती हैं। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो मुझे परमेश्वर के रूप में जानते हैं, वे भ्रमित नहीं होते। ऐसी भाग्यशाली पुण्य आत्माएँ अपने वर्तमान और पूर्वजन्मों के कर्म फलों के बंधनों से मुक्त हो जाती हैं और भगवान की प्रेममयी भक्ति में लीन हो जाती हैं। वे अपने और जीवात्मा के बीच के भेद को स्पष्ट करते हुए घोषित करते हैं कि वे 'लोकमहेश्वरम्' सभी लोकों के परमस्वामी हैं। इसी प्रकार की उद्घोषणा 'श्वेताश्वतरोपनिषद्' में भी की गयी है।
तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् ।
पति पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम् ।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.7)
"परमात्मा सभी नियन्ताओं का नियामक है, वह सभी मानवों और ब्रह्माण्ड में विधित पदार्थों का परमेश्वर है। वह सभी प्रियों का प्रियतम है। वह संसार का नियामक और प्राकृत शक्ति से परे है।"
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोह: क्षमा सत्यं दम: शम: |
सुखं दु:खं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च || 4||
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयश: |
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधा: || 5||
जीवों में विविध प्रकार के गुण जैसे-बुद्धि, ज्ञान, विचारों की स्पष्टता, क्षमा, सत्यता, इन्द्रियों और मन पर नियंत्रण, सुख और दु:ख, जन्म-मृत्यु, भय, निडरता, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश केवल मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
इन दोनों श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण अपनी परम भगवत्ता और सृष्टि में व्याप्त सभी तत्त्वों पर अपने प्रभुत्व की पुष्टि कर रहे हैं। वे यह स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य की विविध प्रकार की चित्तवृत्ति, स्वभाव, रुचि आदि सब उनसे उत्पन्न होती है।
बुद्धिः परिस्थितियों का विश्लेषण करने की क्षमता।
ज्ञानम्: आत्मा और भौतिक पदार्थ के भेद को जानने की विवेक शक्ति।
असम्मोहः मोह-ममता से रहित।
क्षमाः स्वयं को कष्ट पहुँचाने वालों को क्षमा करना।
सत्यम्: सभी के कल्याणार्थ सत्य को प्रकट करना।
दमः से तात्पर्य इन्द्रियों को उनके विषयों के आकर्षण से रोकना है।
शमः अपने मन को अनावश्यक विचारों का चिन्तन करने से रोकना
सुखम्: प्रसन्नता के भाव।
दु:खमः वेदना के भाव।
भवः “मैं" अर्थात् शरीर के बोध होने का भाव।
अभावः मृत्यु का अनुभव।
भयः आने वाली विपत्तियों का भय।
अभयः भय से मुक्ति।
अहिंसाः वाणी, कर्म और विचारों से किसी को कष्ट न पहुँचाना।
समताः अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में समभाव होना।
तुष्टिः कर्म के अनुसार जो प्राप्त हो जाए, उसी में संतोष करना।
तपः वेदों के अनुसार आध्यात्मिक लाभार्थ स्वेच्छा से कष्ट सहना।
दानः अपनी सामर्थ्यानुसार धार्मिक और शुभ कार्यों के लिए दान करना।
यशः सद्गुणों से युक्त होने पर प्राप्त होने वाली प्रसिद्धि।
अपयशः दुर्गुणों और बुरे कार्यों में संलिप्त होने के कारण मिलने वाला अपयश।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्यों में ये सब गुण केवल उनके द्वारा निश्चित की गयी स्वीकृति के अनुसार प्रकट होते हैं इसलिए वे मनुष्यों में अच्छी और बुरी प्रवृत्तियाँ के स्रोत हैं। इसकी तुलना विद्युत् गृह द्वारा विभिन्न उपकरणों के उपयोग के लिए बिजली की आपूर्ति करने से की जा सकती है। एक ही विद्युतीय ऊर्जा विभिन्न उपकरणों में प्रवेश कर विविध प्रकार से प्रकट होती है। यह किसी उपकरण में ध्वनि, अन्यों में प्रकाश और किसी तीसरे में ताप उत्पन्न करती है। यद्यपि सभी उपकरणों में प्रकटीकरण विभिन्न है किन्तु उनकी आपूर्ति का स्रोत वही विद्युत् गृह ही होता है। उसी प्रकार से भगवान की शक्ति हमारे वर्तमान और पूर्वजन्मों के पुरुषार्थ के अनुसार सकारात्मक और नकारात्मक रूप में हमारे भीतर प्रकट होती है।
महर्षय: सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा |
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमा: प्रजा: || 6||
सप्त महर्षिगण और उनसे पूर्व चार महर्षि और चौदह मनु सब मेरे मन से उत्पन्न हुए हैं तथा संसार में निवास करने वाले सभी जीव उनसे उत्पन्न हुए हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण निरन्तर यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वे किस प्रकार से सभी के स्रोत हैं। पहले उन्होंने बीस भावों का उल्लेख किया। अब वे पच्चीस सिद्ध महानुभावों का वर्णन कर रहे हैं। इनमें सात महर्षि, चार ऋषि और चौदह मनु हैं। वे उनसे उत्पन्न ब्रह्माण्ड की वंशावली का भी निरूपण करते हैं।
ब्रह्मा की उत्पत्ति विष्णु की 'हिरण्यगर्भ' शक्ति (भगवान का वह रूप जो पंचमहाभूतों से निर्मित सृष्टि का पालन करता है।) से हुई। ब्रह्मा से चार महर्षि सनक, सनंदन, सनत्कुमार, सनातन उत्पन्न हुए। इन्हें चार कुमार भी कहा जाता है। हमारे ब्रह्माण्ड में चारों कुमार ब्रह्मा के सबसे ज्येष्ठ पुत्र हैं क्योंकि अकेले पिता के मन से इनका जन्म हुआ था। इसलिए इनकी माता नहीं थी। नित्य मुक्त आत्मा और योग विज्ञान के ज्ञाता होने के कारण वे आध्यात्मिक साधना द्वारा अन्य जीवों को सांसारिक बंधनों से मुक्त करवाने हेतु सहायता करने में समर्थ थे। चार कुमारों के पश्चात् सप्त महर्षियों का जन्म हुआ। ये मरीचि, अंगीरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ हैं। इन्हें मानव जाति की वृद्धि करने का दायित्व सौंपा गया था। इसके पश्चात् स्वायंभुव, स्वरोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सवर्णी, दक्षसवर्णी, ब्रह्मसवर्णी, धर्मसवर्णी, रुद्र-पुत्र, रौच्य और भौतयक नामक चौदह मनुओं का जन्म हुआ। इन सभी को स्वर्गलोक से मानव जाति के कल्याणार्थ शासन करने तथा वैदिक धर्म का प्रचार और उसकी रक्षा करने का अधिकार दिया गया। हम वर्तमान में सातवें मनु जिसे वैवस्वत मनु कहा जाता है, के युग में रह रहे हैं। इसलिए इस युग को वैवस्वत मनवन्तर कहा जाता है। वर्तमान कल्प (ब्रह्मा के दिन) में अभी सात और मनु हैं जिनका युग आना अभी शेष है। स्वर्गलोक में अनेक देवता हैं जो ब्रह्माण्ड की देखभाल करने के दायित्व का निर्वहन कर रहें हैं। ये सब दैव पुरुष ब्रह्मा के पुत्र और पौत्र हैं जो भगवान विष्णु से उत्पन्न हैं और वे भगवान श्रीकृष्ण के विस्तार से भिन्न नहीं हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि श्रीकृष्ण ही सभी पितामहों के पूर्वज प्रपितामह हैं।
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वत: |
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशय: || 7||
जो मेरी महिमा और दिव्य शक्तियों को वास्तविक रूप से जान लेता है वह अविचल भक्तियोग के माध्यम से मुझमें एकीकृत हो जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है।
'विभूति' शब्द ब्रह्माण्ड में प्रकट भगवान की परम शक्तियों से संबंधित है। 'योगम्' शब्द इन अद्भुत शक्तियों के साथ भगवान के संबंध का उल्लेख करता है। श्रीकृष्ण इस श्लोक में स्पष्ट करते हैं कि जब हम परमात्मा के वैभव से परिचित होकर उनकी दिव्य एवं अनुपम महिमा को स्वीकार कर लेते हैं तब हम वास्तव में उनकी भक्ति में लीन होने में रुचि लेते हैं। भगवान की महानता का ज्ञान होने से भक्तों का प्रेम पोषित होता है और उनकी श्रद्धाभक्ति बढ़ती है। प्रेम और ज्ञान में परस्पर सीधा संबंध होता है जैसा कि निम्न उदाहरण से प्रकट होता है-
'यदि आपका मित्र आपको चमकते काले पत्थर की गोली दिखाता है तब तुम्हें इसके महत्त्व की जानकारी नहीं होती और इसलिए आपके भीतर उस काले पत्थर के प्रति किसी प्रकार का लगाव उत्पन्न नहीं होता। लेकिन जब आपका मित्र आपको बताता है कि यह 'शालीग्राम' है तथा इसे किसी सिद्ध संत ने उसे उपहार के रूप में दिया है। 'शालीग्राम' एक विशेष प्रकार का प्राचीन पत्थर है जो भगवान विष्णु का प्रतिरूप है जब आपको उस काले पत्थर की विशेषता का ज्ञान हो जाता है तब आपके लिए उस काले पत्थर का महत्त्व बढ़ जाता है। यदि फिर आपका मित्र आपको यह कहता है कि क्या आप जानते हैं कि पांच सौ वर्ष पूर्व महान संत स्वामी रामानन्द इस पत्थर का प्रयोग उपासना के लिए करते थे? जैसे ही आपको यह विशेष जानकारी प्राप्त होती है तब आपका उस काले पत्थर के प्रति श्रद्धा भाव और अधिक बढ़ जाता है। प्रत्येक समय पत्थर के संबंध में प्राप्त हो रही जानकारी से आपके भीतर उस काले पत्थर के प्रति श्रद्धा में निरन्तर वृद्धि होती रहती है। इसी प्रकार से भगवान का वास्तविक ज्ञान उनके प्रति हमारी श्रद्धा भक्ति बढ़ाता है। इस प्रकार भगवान की अनन्त ब्रह्माण्डों में व्याप्त अद्भुत शक्तियों का वर्णन करने के पश्चात श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे भक्त और पुण्य आत्माएँ जो इस ज्ञान में स्थित हो जाती हैं, वे आत्माएँ वास्तव में अविचल भक्ति के माध्यम से भगवान में एकनिष्ठ हो जाते हैं।'
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्त: सर्वं प्रवर्तते |
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता: || 8||
मैं समस्त सृष्टि का उद्गम हूँ। सभी वस्तुएँ मुझसे ही उत्पन्न होती हैं। जो बुद्धिमान यह जान लेता है वह दृढ़ विश्वास और प्रेमा भक्ति के साथ मेरी उपासना करता है।
श्रीकृष्ण इस श्लोक का आरम्भ 'अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः' कह कर करते हैं जिसका तात्पर्य है-"मैं ही अन्तिम सत्य और सब कारणों का कारण हूँ।" उन्होंने इसे भगवद् गीता के श्लोक संख्या 7.7, 7.12, 10.5 और 15.15 में कई बार दोहराया है। अन्य ग्रंथों में भी इसे प्रमाणित किया गया है। ऋग्वेद में वर्णन है-
ऋग्वेद में वर्णन हैयं कामये तं तं उग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तं ऋषिं तं सुमेधाम्।
(ऋग्वेद-10.125.5)
"मैं जिन मनुष्यों से प्रेम करता हूँ, उन्हें शक्तिशाली बना देता हूँ। मैं उन्हें स्त्री या पुरुष बनाता हूँ। मैं उन्हें ज्ञानी संत बनाता हूँ। मैं जीवात्मा को ब्रह्मा का पद पाने के लिए समर्थ बनाता हूँ। जो बुद्धिमान लोग इस सत्य को समझ लेते हैं वे मुझमें दृढ़ विश्वास रखते हैं और री उपासना करते हैं।" इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण भौतिक और आध्यात्मिक दोनों लोकों के परमेश्वर हैं किन्तु भगवान का मुख्य कार्य सृष्टि की शासन व्यवस्था का संचालन करना नहीं है। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं-
स्वयं भगवानेर कर्म नहे भारहरण।
(चैतन्य चरितामृत आदि लीला-4.8)
"श्रीकृष्ण संसार के सृजन, पालन और संहार के कार्य के लिए प्रत्यक्ष रूप से स्वयं को सम्मिलित नहीं करते।" भगवान श्रीकृष्ण का मुख्य कार्य अपने दिव्य धाम 'गोलोक' में मुक्त आत्माओं के साथ प्रेममयी लीलाओं में लीन होना है। सृष्टि के प्रयोजनार्थ वे स्वयं का विस्तार कारणोदकशायी विष्णु के रूप में करते हैं, जिन्हें महाविष्णु कहा जाता है फिर महाविष्णु भगवान के रूप में भौतिक जगत पर शासन करते हैं। महाविष्णु को प्रथम पुरुष अर्थात भौतिक क्षेत्र में भगवान के सर्वप्रथम विस्तार के रूप में जाना जाता है। वे कारण नामक सागर के दिव्य जल में निवास करते हैं और अपने दिव्य शरीर के रोमों से अनन्त भौतिक ब्रह्माण्डों को प्रकट करते हैं। तत्पश्चात् वे प्रत्येक ब्रह्माण्ड के तल पर रहने वाले गर्भोदकशायी विष्णु के रूप में अपना विस्तार करते हैं जिन्हें द्वितीय पुरुष अर्थात् भौतिक जगत में भगवान का द्वितीय विस्तार कहा जाता है।
गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का जन्म हुआ। उनके मार्गदर्शन में ब्रह्माण्ड के विभिन्न स्थूल और सूक्ष्म तत्त्वों एवं पदार्थों का निर्माण, प्राकृतिक नियमों का निर्माण, आकाश गंगाओं और ग्रहों की सूक्ष्म और स्थूल प्रणालियों का निर्माण और उनमें निवास करने वाले जीवों आदि को उत्पन्न करने की प्रक्रिया का सृजन किया जाता है। प्रायः ब्रह्मा का उल्लेख ब्रह्माण्ड के सृजनकर्ता के रूप में किया जाता है। वास्तव में वे सृष्टि के दूसरे क्रम के सृजनकर्ता हैं। गर्भोदकशायी विष्णु आगे फिर क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में अपना विस्तार करते हैं और प्रत्येक ब्रह्माण्ड के ऊपर क्षीरसागर नामक स्थान पर रहते हैं। क्षीरोदकशायी विष्णु को तृतीय पुरूष अर्थात् भौतिक जगत में भगवान का तीसरा विस्तार कहा गया है। प्रत्येक ब्रह्माण्ड के शीर्ष पर रहने के साथ-साथ वह परमात्मा के रूप में ब्रह्माण्ड के सभी जीवों के हृदय में भी वास करते हैं और उनके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं और उपयुक्त समय पर उन्हें उनके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। इसलिए उन्हें सभी ब्रह्माण्डों का पालक और संचालक कहा जाता है।
यहाँ उल्लिखित भगवान विष्णु के रूप भगवान श्रीकृष्ण से किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं हैं। इसलिए श्रीकृष्ण इस श्लोक में कहते हैं कि समस्त आध्यात्मिक और भौतिक सृष्टि उनसे ही प्रकट होती है। श्रीकृष्ण को अवतारी भी कहा जाता है क्योंकि वे सभी अवतारों के स्रोत हैं।
श्रीमद्भागवतम् में वर्णन है
एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।
(श्रीमद्भागवतम्-1.3.28)
"भगवान के सभी रूप उनका विस्तार हैं या श्रीकृष्ण के विस्तारों के विस्तार हैं जो कि भगवान का मूल स्वरूप है और इसलिए सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्मा, परम परमेश्वर श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं।"
यस्यैकनिश्वासितकालमथावलंब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः।।
विष्णुर्महान् सैहयस्य कलाविशेषो।
गोविन्दमादि पुरुषं तमहं भजामि ।।
(ब्रह्मसंहिता-5.48)
"अनन्त ब्रह्माण्डों में से प्रत्येक ब्रह्माण्ड के शंकर, ब्रह्मा और विष्णु, महाविष्णु के श्वास भीतर लेने पर उनके शरीर के रोमों से प्रकट होते हैं और श्वास बाहर छोड़ने पर पुनः उनमें विलीन हो जाते हैं। मैं, उन श्रीकृष्ण की वन्दना करता हूँ जिनके महाविष्णु विस्तार हैं।" अब श्रीकृष्ण यह व्याख्या करेंगे कि भक्त जन उनकी आराधना कैसे करते हैं।
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम् |
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च || 9||
मेरे भक्त अपने मन को मुझमें स्थिर कर अपना जीवन मुझे समर्पित करते हुए सदैव संतुष्ट रहते हैं। वे एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करते हुए मेरे विषय में वार्तालाप करते हुए और मेरी महिमा का गान करते हुए अत्यंत आनन्द और संतोष की अनुभूति करते हैं।
मन की प्रवृत्ति अपनी पसंद की वस्तु में लीन होने की होती है। भगवान के भक्त उनके स्मरण में तल्लीन रहते हैं क्योंकि वे परमेश्वर में अगाध श्रद्धा विकसित करते हैं। ईश्वर की भक्ति उनके जीवन का आधार बन जाती है, जिससे उन्हें जीवन को जीने का अर्थ, उद्देश्य और शक्ति प्राप्त होती है। वे भक्त अपने सबसे प्रिय भगवान के स्मरण को उसी प्रकार से आवश्यक मानते हैं, जिस प्रकार मछली को श्वास लेने और जीवित रहने के लिए जल की आवश्यकता होती है।
मानवीय हृदय को क्या अतिप्रिय है, इसे उनके मन और शरीर के समर्पण तथा संपत्ति के उपयोग से ज्ञात किया जा सकता है। बाइबल में वर्णन है, "जहाँ तुम अपनी धन-संपत्ति का व्यय करोगे, तुम्हारा मन भी उसी ओर आकर्षित होगा" (मैथ्यू 6.21)।
हम लोगों की चैक बुक और क्रेडिट कार्ड की विवरणी को देखकर यह जान सकते हैं कि उनका अंत:करण किस ओर आकर्षित है। यदि वे विलासिता पूर्ण छुट्टियाँ व्यतीत करते हैं तब ऐसी मौज मस्ती उन्हें अधिक प्रिय लगती है। यदि वे एड्सग्रस्त अफ्रीकी बच्चों के उपचार के लिए धन दान करते हैं तब उनका ध्यान इन कल्याणकारी कार्यों में लीन रहता है। अपने बच्चों के लिए अभिभावकों का प्रेम इस वास्तविकता को दर्शाता है कि वे अपने बच्चों के कल्याण के लिए अपना समय और धन त्याग करने में किस प्रकार तैयार रहते हैं। उसी प्रकार से भक्तों का प्रेम भगवान के प्रति उनके समर्पण में प्रकट होता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'मत्-गत-प्राणा:' जिसका तात्पर्य है-'मेरे भक्त अपना जीवन मुझे समर्पित करते हैं।' ऐसे समर्पण से संतोष प्राप्त होता है क्योंकि भक्त अपने कर्मों के फलों को भगवान की इच्छा पर छोड़ देते हैं और वे अपने जीवन में आयी सभी प्रकार की परिस्थितियों को भगवान की ओर से उत्पन्न हुई मानते हैं। इसलिए वे अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों को प्रसन्नतापूर्वक भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार करते हैं और दोनों को समदृष्टि से देखते हैं। हालांकि भक्तों के भगवान के प्रति प्रेम को उपर्युक्त लक्षणों के रूप में दर्शाया गया है परन्तु यह उनके शब्दों द्वारा भी प्रकट होता है। वे भगवान की महिमा, नाम, रूप, गुण, लीला, धामों और संतों के गुणगान में मधुर रस प्राप्त करते हैं। इस प्रकार वे कीर्तन और भगवान की महिमा का श्रवण कर उनका प्रेम रस पाते हैं और उसे उसी प्रकार से अन्य भक्तों में बांटते हैं। इस प्रकार से भगवान के दिव्य ज्ञान का बोध अन्य लोगों को करवाने में अपना योगदान देते हैं। भगवान की महिमा का गान भक्तों को अत्यंत संतोष और आनन्द प्रदान करता है। इस प्रकार वे स्मरण, श्रवण, और गुणगान के माध्यम से भगवान की आराधना करते हैं। यह त्रिधा भक्ति है जिसमें श्रवण, कीर्तन और स्मरण सम्मिलित है। पिछले अध्याय के 14वें श्लोक में पहले ही इसका वर्णन किया जा चुका है। 'उनके भक्त उनकी आराधना कैसे करते हैं?' इसका वर्णन करने के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण अब उनकी भक्ति पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे।
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् |
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते || 10||
जिनका मन सदैव मेरी प्रेममयी भक्ति में एकीकृत रहता है, मैं उन्हें दिव्य ज्ञान प्रदान करता हूँ, जिससे वे मुझे पा सकते हैं।
हमारी बुद्धि की उड़ान भगवान के दिव्य ज्ञान को नहीं पा सकती। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हमारा तंत्र कितना शक्तिशाली है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारी बुद्धि माया शक्ति से निर्मित है। इसलिए हमारे विचार, ज्ञान और विवेक भौतिक जगत तक ही सीमित है भगवान और उनका दिव्य संसार हमारी लौकिक बुद्धि की परिधि से पूर्णरूप से परे है। वेदों में इसे प्रभावशाली ढंग से घोषित किया गया है
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्।।
(केनोपनिषद्-2.3)
"वे जो यह सोचते हैं कि वे भगवान को अपनी बुद्धि से समझ सकते हैं उन्हें भगवान का ज्ञान नहीं हो सकता। वे जो यह सोचते हैं कि वह उनकी समझ से परे है, केवल वही वास्तव में भगवान को जान पाते हैं।" बृहदारण्यकोपनिषद् में वर्णन है
स एष नेति नेत्यात्मागृह्योः।
(बृहदारण्यकोपनिषद-3.9.26)
"कोई भगवान को अपनी बुद्धि के अनुसार अपने स्वयं के प्रयत्नों द्वारा कभी नहीं समझ सकता।" रामचरितमानस में भी ऐसा वर्णन किया गया है
राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी।
मत हमार अस सुनहु सयानी ।।
"भगवान राम हमारी बुद्धि, मन और वाणी की परिधि से परे हैं।" अब भगवान को जानने के विषय के संबंध में ये कथन स्पष्ट रूप से घोषित करते हैं कि भगवान को जानना संभव नही है, तब फिर कोई भगवान को कैसे जान सकता है? श्रीकृष्ण यहाँ यह प्रकट करते हैं कि भगवान का ज्ञान कैसे प्राप्त किया जा सकता है। वे कहते हैं कि भगवान अपनी कृपा से जीवात्मा को अपना ज्ञान करवाते हैं और भाग्यशाली आत्माएँ उनकी कृपा से उन्हें जानने में समर्थ हो सकती हैं। यजुर्वेद में वर्णन है-
तस्य नो रास्व तस्य नो धेहि।
"भगवान के चरण कमलों से प्रवाहित अमृत जल में स्नान किए बिना कोई भी उन्हें कैसे जान सकता है।" इस प्रकार भगवान का सच्चा ज्ञान बौद्धिक व्यायाम के फलस्वरूप प्राप्त नहीं होता अपितु यह भगवान की दिव्य कृपा के परिणामस्वरूप मिलता है। श्रीकृष्ण ने यह भी उल्लेख किया है कि वे उनकी कृपा प्राप्त करने के पात्र मनुष्य का चयन मनचाहे ढंग से नही करते अपितु जो अपने मन को उनकी भक्ति में एकनिष्ठ रखता है, श्रीकृष्ण ऐसे भक्त पर कृपा बरसाते हैं। आगे वे उनकी दिव्य कृपा के परिणामस्वरूप होने वाली प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करेंगे।
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम: |
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता || 11||
उन पर करुणा करने के कारण मैं उनके हृदयों में वास करता हूँ और ज्ञान के दीपक द्वारा अज्ञान रूपी अन्हकार को नष्ट करता हूँ।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण पुनः कृपा की अवधारणा को विस्तार से बताते हैं। पहले भी उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे उन पर अपनी कृपा करते हैं जो प्रेम-भाव से अपना मन उनमें तल्लीन करते हैं और उन्हें अपनी योजनाओं, विचारों और कार्यों का परम लक्ष्य मानते हैं। अब वे यह प्रकट कर रहे हैं कि जब कोई उनकी कृपा प्राप्त करता है तब क्या होता है? वे कहते हैं कि वे उनके अन्त:करण के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से नष्ट कर देते हैं।
अज्ञान अंधकार का प्रतीक है किन्तु ज्ञान का दीपक क्या है जिसकी भगवान चर्चा करते हैं? वास्तव में हमारी इन्द्रिय, बुद्धि और मन सभी मायिक हैं अर्थात् प्राकृतिक पदार्थों से निर्मित हैं जबकि भगवान दिव्य हैं। इसलिए हम उन्हें देख सुन और जान नहीं सकते परन्तु जब भगवान अपनी कृपा बरसाते हैं तब वे जीवात्मा को अपनी योगमाया शक्ति प्रदान करते हैं जिसे शुद्ध सत्त्वगुण कहा जाता है तथा यह माया के सत्त्व गुण से भिन्न होता है। जब हम शुद्ध सत्त्व शक्ति प्राप्त करते हैं तब हमारी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि दिव्य हो जाती है। इस प्रकार भगवान केवल अपनी कृपा द्वारा अपनी दिव्य इन्द्रिय, दिव्य मन और दिव्य बुद्धि जीवात्मा को प्रदान करते हैं। इन दिव्य उपकरणों से युक्त होकर जीवात्मा भगवान को देखने, सुनने, जानने और उनमें एकनिष्ठ होने में समर्थ हो जाती है। इसलिए वेदान्त दर्शन (3.4.38) में वर्णन है-"विशेषानुग्रहश्च" अर्थात् "केवल भगवान की कृपा से ही कोई दिव्य ज्ञान प्राप्त कर सकता है।" इस प्रकार श्रीकृष्ण प्रकाश के जिस ज्योति पुंज का उल्लेख करते हैं, वह उनकी दिव्य शक्ति है। भगवान की दिव्य शक्ति के प्रकाश से माया शक्ति का अंधकार मिट जाता है।
अर्जुन उवाच |
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् |
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् || 12||
आहुस्त्वामृषय: सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा |
असितो देवलो व्यास: स्वयं चैव ब्रवीषि मे || 13||
अर्जुन ने कहा-“आप परम पुरुषोत्तम, परमधाम, परम शुद्ध, अविनाशी, आदि पुरुष, अजन्मा तथा महानतम हैं। नारद, असित, देवल और व्यास जैसे महान ऋषि सभी इस सत्य की पुष्टि करते हैं और अब आप स्वयं भी मुझे यही सब बता रहे हैं।"
वैदिक ग्रंथों के टीकाकार कभी-कभी अज्ञान के कारण श्रीकृष्ण और श्रीराम आदि को परम सत्ता नहीं मानते। वे दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि परम सत्य निराकार और निर्गुण है. वह रूप धारण कर अवतार लेकर साकार रूप में प्रकट होता है और इसलिए श्रीकृष्ण और श्रीराम का अवतार भगवान से निम्न कोटि का है। किन्तु अर्जुन इस मत का खंडन करते हुए कहता है कि श्रीकृष्ण अपने साकार रूप में सभी कारणों के परम कारण हैं।
पिछले चार श्लोकों को सुनकर अर्जुन श्रीकृष्ण की सर्वोच्च सत्ता को पूर्ण रूप से स्वीकार करता है और दृढ़ विश्वास के साथ अपने भीतर भी इसकी प्रतीति करता है। जब कोई श्रेष्ठ व्यक्ति ज्ञान को प्रमाणित करता है तब उसकी विश्वसनीयता स्थापित हो जाती है। महान संत अध्यात्मिक ज्ञान के भण्डार होते हैं इसलिए अर्जुन ने नारद, असित, देवल और व्यास जैसे महान संतो के नाम का उल्लेख किया है जिनके द्वारा श्रीकृष्ण के परम दिव्य स्वरूप की और सभी कारणों का परम कारण होने की पुष्टि की गयी है। महाभारत के भीष्म पर्व में कई संतों ने भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की है। संत नारद मुनि कहते हैं-"श्रीकृष्ण समस्त संसारों के सृजनकर्ता हैं और सबके भीतर के विचारों को जानते हैं। वे ब्रह्माण्ड पर शासन करने वाले समस्त स्वर्ग के देवताओं के भगवान हैं।" (श्लोक 68.2)। ऋषि मार्कण्डेय ने वर्णन किया है-"भगवान श्रीकृष्ण सभी धार्मिक यज्ञों का लक्ष्य और तपस्याओं का सार तत्त्व हैं। वे सभी का वर्तमान, भूतकाल, और भविष्य हैं" (श्लोक 68.3)। भृगु ऋषि कहते है-“वे सभी ईश्वरों के परमेश्वर और भगवान विष्णु का प्रथम मूल रूप हैं" (श्लोक 68.4)। वेदव्यास ने उल्लेख किया है-“हे भगवान श्रीकृष्ण! आप सभी वसुओं के भगवान हैं। आप ने ही इन्द्र और अन्य स्वर्ग के देवताओं को शक्तियों से सम्पन्न किया है" (श्लोक 68.5)। अंङ्गिरा ऋषि कहते हैं, "भगवान श्रीकृष्ण सभी जीवों के सृजक हैं। सभी तीनों लोक उनके उदर में रहते हैं। वे सभी देवों का परमस्वरूप हैं" (श्लोक 68.6)। इसके अतिरिक्त महाभारत में असित और देवल ऋषि यह वर्णन करते हैं, “श्रीकृष्ण तीन लोकों की रचना करने वाले ब्रह्मा के जन्मदाता हैं" (महाभारत का वन पर्व 12.50)। इन सिद्ध महापुरुषों का उल्लेख करते हुए अर्जुन यह कहता है कि भगवान स्वयं अब यह घोषित करते हुए कहते है कि वे संपूर्ण सृष्टि के परम कारण हैं। इस प्रकार वे अपने कथनों की पुनः पुष्टि कर रहे हैं।
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव |
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवा: || 14||
हे कृष्ण! मैं आपके द्वारा कहे गए सभी कथनों को पूर्णतया सत्य के रूप में स्वीकार करता हूँ। हे परम प्रभु! न तो देवता और न ही असुर आपके वास्तविक स्वरूप को समझ सकते हैं।
भगवान के दिव्य ऐश्वर्य और अनन्त महिमा को ध्यानपूर्वक सुनते हुए अर्जुन की और अधिक सुनने की प्यास बढ़ती गयी। अब वह श्रीकृष्ण से पुनः उनकी महिमा का वर्णन करने की इच्छा व्यक्त करता है। वह भगवान को आश्वस्त करना चाहता है कि वह उनकी अनुपम महिमा को पूरी तरह से जान गया है। 'यत्' शब्द के प्रयोग से अर्जुन का तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्ण ने सातवें अध्याय से नौवें अध्याय तक जो भी कहा उसे वह सत्य मानता है। वह दृढ़ता से कहता है कि श्रीकृष्ण ने जो सब कहा वह सत्य है न कि लाक्षणिक वर्णन। वह श्रीकृष्ण को 'भगवान' या 'परम प्रभु' कह कर संबोधित करता है। भगवान शब्द की परिभाषा को देवीभागवतपुराण में सुन्दर ढंग से व्यक्त किया गया है
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णाम् भगवान्नीह ।।
"भगवान छः अनन्त ऐश्वर्यों के स्वामी है-शक्ति, ज्ञान, सौंदर्य, कीर्ति, ऐश्वर्य और वैराग्य"। जिन्हें जानने एवं समझने के लिए दानव और मानव सभी की बुद्धि बहुत ही सीमित है। ये आत्माएं कभी भी भगवान की दिव्य लीलाओं और उनके पूर्ण व्यक्तित्व को नहीं समझ सकते।
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम |
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते || 15||
हे परम पुरुषोत्तम। आप सभी जीवों के उदगम और स्वामी हैं, देवों के देव और ब्रह्माण्ड नायक हैं। वास्तव में आप अकेले ही अपनी अचिंतनीय शक्ति से स्वयं को जानने वाले हो।
Commentary
श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप के महत्त्व को प्रकट करते हुए अर्जुन उन्हें इस प्रकार से संबोधित करता है-
भूत-भावन:- सभी जीवों का स्रष्टा, ब्रह्माण्ड का पिता।
भूतेशः-सभी जीवों का विधाता और परम नियन्ता।
जगत्पते- सृष्टि का स्वामी और विधाता।
देव-देवः स्वर्ग के समस्त देवताओं के पूज्य। श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी इसी सत्य को व्यक्त किया गया है।
यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-3.9)
"भगवान का कभी पार नहीं पाया जा सकता, वह सबसे परे है।" गत श्लोक में यह व्यक्त किया गया था कि भगवान को किसी के द्वारा जाना नहीं जा सकता। यह स्पष्ट रूप से तर्कसंगत है क्योंकि हम सभी जीवात्माओं की बुद्धि सीमित है इसलिए वे हमारी बुद्धि की पहुँच से परे हैं। इससे भगवान का महत्त्व कम नहीं होता अपितु बढ़ता है। पश्चिमी दार्शनिक एफ. ए. जकोबी का यह कथन है, "जिसे हम जान सके वह भगवान नहीं हो सकता।" किन्तु इस श्लोक में अर्जुन कहता है कि केवल एक ही पुरुष भगवान को जानता है जोकि स्वयं भगवान ही हैं। इस प्रकार अकेले श्रीकृष्ण ही स्वयं को जानते हैं और यदि वे जीवात्मा पर कृपा करके उसे अपनी शक्तियाँ प्रदान करने का निर्णय कर ले तब वह भाग्यशाली जीवात्मा उन्हें उन्हीं की भांति जान सकती है।
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतय: |
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि || 16||
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् |
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया || 17||
प्रभु कृपया विस्तारपूर्वक मुझे अपने दिव्य ऐश्वर्यों से अवगत कराएँ जिनके द्वारा आप समस्त संसार में व्याप्त होकर उनमें रहते हो। हे योग के परम स्वामी! मैं आपको अच्छे से कैसे जान सकता हूँ और कैसे आपका मधुर चिन्तन कर सकता हूँ। हे परम पुरुषोत्तम भगवान! ध्यानावस्था के दौरान मैं किन-किन रूपों में आपका स्मरण कर सकता हूँ।
इस श्लोक में योग का उल्लेख योगमाया अर्थात् भगवान की दिव्य शक्ति के रूप में किया गया है और योगी का तात्पर्य योगमाया के स्वामी से है। यहाँ अर्जुन जान चुका है कि श्रीकृष्ण ही भगवान हैं। उत्सुकतावश अब वह यह जानना चाहता है कि सृष्टि में व्याप्त श्रीकृष्ण की विभूतियाँ अर्थात् उनका अलौकिक और भव्य ऐश्वर्य जिनका पहले कभी भी और कहीं वर्णन नहीं किया गया है, उन सभी विभूतियों को श्रीकृष्ण कैसे अन्य प्रकार से प्रकट करते हैं? अर्जुन समस्त सृष्टि के परम नियन्ता श्रीकृष्ण की महानता और सर्वोपरि प्रतिष्ठा के संबंध में सुनना चाहता है। वह कहता है, "मैं आपकी दिव्य महिमा को जानने की जिज्ञासा कर रहा हूँ ताकि मैं दृढ़तापूर्वक आपकी भक्ति करने में समर्थ हो सकूँ। लेकिन आपकी कृपा के बिना आपके स्वरूप को समझना असंभव है। इसलिए कृपया अपनी महिमा प्रकट करो जिससे मैं आपको समझ सकूँ।"
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन |
भूय: कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् || 18|
हे जनार्दन! कृपया मुझे पुनः अपनी दिव्य महिमा, वैभवों और अभिव्यक्तियों के संबंध में विस्तृत रूप से बताएँ, मैं आपकी अमृत वाणी को सुनकर कभी तृप्त नहीं हो सकता।
अर्जुन "आपकी वाणी अमृत के समान है" यह कहने के स्थान पर "आपकी अमृत वाणी सुनकर" जैसे शब्दों का प्रयोग करता है। वह यह नहीं कहता "आपकी वाणी उसके समान है।" या "आपकी वाणी उसके जैसी है।" यह साहित्यिक अलंकार है जिसे अतिशयोक्ति कहते हैं जिसमें किसी गुण, स्थिति या वस्तु का बढ़ा चढ़ाकर वर्णन किया जाता है। वह श्रीकृष्ण को जनार्दन कहकर भी संबोधित करता है जिसका तात्पर्य ऐसे उदारवादी महापुरुष से है जिनसे दुःखी लोग दुःख दूर करने की कामना करते हैं।
भगवान की दिव्य और सुन्दर महिमा का विस्तारपूवर्क वर्णन उन लोगों के लिए अमृत के समान है जो उनसे प्रेम करते हैं और भक्ति में लीन रहना पसंद करते हैं। अर्जुन, श्रीकृष्ण द्व रा उच्चारित अमृत से भरे शब्दों को अपने कानों से श्रवण करते हुए अमृत सुधा का पान कर रहा है एवं सुखद अनुभव कर रहा है और अब वह उन्हें 'भूयः कथय' जिसका अर्थ 'एक बार और' कहिये कहकर प्रसन्न करता है। आपकी महिमा का श्रवण करने की मेरी प्यास अभी बुझी नहीं है। दिव्य अमृत का यही स्वभाव है। इससे हमारी तृप्ति तब होती है जब इसकी प्यास निरन्तर बढ़ती जाती है। नैमिषारण्य के ऋषियों ने सुत गोस्वामी से श्रीमद्भागवतम् की कथा सुनते हुए ऐसे ही कथन व्यक्त किए थे।
वयं तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमे।
यच्छृण्वतां रसज्ञानां स्वादु स्वादु पदे पदे।।
(श्रीमद्भागवतम्-1.1.19)
"वे जो भगवान श्रीकृष्ण के शरणागत हैं, भगवान की दिव्य लीलाओं का श्रवण करने से कभी तृप्त नहीं होते। इन लीलाओं का अमृतरस ऐसा है कि इनका जितना अधिक आस्वादन किया जाता है ये उतना अधिक आनन्द प्रदान करती हैं।"
श्रीभगवानुवाच |
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतय: |
प्राधान्यत: कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ||19||
भगवान ने कहा! अब मैं तुम्हें अपनी दिव्य महिमा का संक्षिप्त रूप से वर्णन करूँगा। हे श्रेष्ठ कुरुवंशी! इस वर्णन का कहीं भी कोई अंत नहीं है।
अमरकोष (अति प्रतिष्ठित प्राचीन संस्कृत शब्द कोष) में विभूति की परिभाषा 'विभतिर्भूतिरैश्वर्यम् ऐश्वर्यम्' (शक्ति और समृद्धि) के रूप में उल्लिखित है। भगवान की शक्तियाँ और ऐश्वर्य अनन्त हैं। वास्तव में भगवान से संबंधित सभी वस्तुएँ अनन्त हैं। उनके अनन्त रूप, अनन्त नाम, अनन्त लोक, अनन्त अवतार, अनन्त लीलाएँ, अनन्त भक्त और सब कुछ अनन्त हैं। इसलिए वेद उन्हें अनन्त नाम से संबोधित करते हैं।
अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता
(श्वेताश्वरोपनिषद्-1.9)
"भगवान अनन्त हैं और ब्रह्माण्ड में अनन्त रूप लेकर प्रकट होते हैं। यद्यपि वे ब्रह्माण्ड के शासक हैं तथापि अकर्ता हैं।"
रामचरितमानस में भी वर्णन किया गया है
हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता।
"भगवान और उसकी लीलाएँ अनन्त हैं। वे अवतार लेकर जो लीलाएँ करते हैं, वे भी अनन्त हैं।" महर्षि वेदव्यास इससे भी परे जाते हुए वर्णन करते हैं
यो वा अनन्तस्य गुणाननन्ताननुक्रमिष्यन् स तु बालबुद्धिः।
रजांसि भूमेर्गणयेत् कथञ्चित् कालेन नैवाखिलशक्तिधाम्नः।।
(श्रीमद्भागवतम्-11.4.2)
"वे जो भगवान के गुणों की गणना करने की बात करते हैं वे मंदबुद्धि हैं। हम धरती पर बिखरे रेत के कणों को गिनने में सफलता पा सकते हैं लेकिन हम भगवान के अनन्त गुणों की गणना नहीं कर सकते" इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे यहाँ केवल अपनी विभूतियों के लघु अंश का वर्णन करेंगे।
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित: |
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च || 20||
विभूति योग मैं सभी जीवित प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मैं ही समस्त जीवों का आदि, मध्य तथा अन्त हूँ।
श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि वे आत्मा से दूर नहीं हैं बल्कि वास्तव में वे आत्मा के निकटस्थ हैं। परमात्मा सभी जीवों के हृदय में स्थित है। वेदों में वर्णन है-“य आत्मनि तिष्ठति" अर्थात् "भगवान हम सभी जीवों की आत्मा में स्थित हैं।" वे भीतर बैठकर आत्मा को चेतना शक्ति और अमरता प्रदान करते हैं। यदि वे अपनी शक्तियों को कम कर दें, तब हम आत्माएँ जड़वत् और नष्ट हो जाएगी। इसलिए हम जीवात्माएँ अपनी स्वयं की शक्ति से अविनाशी और चेतन नहीं होती अपितु परम चेतन और अविनाशी भगवान की कृपा से चेतन रहती हैं इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सभी जीवों के हृदय में रहते हैं। हमारी आत्मा भगवान का शरीर है जो सब आत्माओं की आत्मा अर्थात् परमात्मा हैं। श्रीमद्भागवतम् में भी ऐसा वर्णन किया गया है
हरिर्हि साक्षाद्भगवान् शरीरिणा
मात्मा झषाणामिव तोयमीप्सितम्।
(श्रीमद्भागवतम्-5.18.13)
"भगवान सभी जीवों की आत्मा की आत्मा है।" भागवत में पुनः कहा गया है कि जब शुकदेव ने यह वर्णन किया कि किस प्रकार से गोपियाँ अपने बच्चों को घर पर छोड़कर बाल श्रीकृष्ण को निहारने के लिए जाती थी, तब परीक्षित ने प्रश्न किया कि ऐसा कैसे संभव था। ब्रह्मन्
परोद्भवे कृष्णे इयान् प्रेमा कथं भवेत् ।।
(श्रीमद्भागवतम्-10.14.49)
"हे ब्राह्मण देव, सभी माताओं की अपने बच्चों में आसक्ति होती है तब गोपियों की श्रीकृष्ण के साथ ऐसी गहन आसक्ति कैसे हो गयी जितनी वे अपने स्वयं के बच्चों में भी अनुभव नहीं करती थीं।" शुकदेव ने उत्तर देते हुए कहा-
कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्
(श्रीमद्भागवतम्-10.14.55)
"कृपया यह समझो कि श्रीकृष्ण इस ब्रह्माण्ड के सभी जीवों की परम आत्मा हैं। वे मानव मात्र के कल्याण के लिए अपनी अतरंग शक्ति 'योगमाया' द्वारा मनुष्य के रूप में धरती पर प्रकट होते हैं।" श्रीकृष्ण पुनः कहते हैं कि वे सभी प्राणियों के आदि, मध्य और अन्त हैं। वे सब भगवान से उत्पन्न होते हैं इसलिए भगवान उनके आदि हैं। सृष्टि के सभी जीवित प्राणियों का निर्वाह उनकी शक्ति से होता है इसलिए वे सबके मध्य हैं और जो मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं वे उनके दिव्य लोक में उनके साथ सदा के लिए रहने आ जाते हैं। इसलिए भगवान सभी जीवों के अन्त भी हैं।
वेदों में प्रदत्त भगवान की विभिन्न परिभाषाओं में से एक इस प्रकार है-
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति ।
यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।
(तैत्तरीयोपनिषद-3.1.1)
"भगवान वह है जिससे सभी जीवों की उत्पत्ति हुई है। भगवान वह है जिसमें सभी जीव स्थित हैं। भगवान वह है जिसमें सभी जीव लीन हो जाएंगे।"
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् |
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी || 21||
मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु हूँ, प्रकाशवान पदार्थों में सूर्य, मरूतों में मुझे मरीचि और नक्षत्रों में चन्द्रमा समझो
पुराणों में ऐसी जानकारी मिलती है कि कश्यप ऋषि की अदिति और दिति नाम से दो पत्नियाँ थी। उनकी पहली पत्नी अदिति से उनकी बारह दिव्य सन्तानें धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरूण, अंश, भाग, विवस्वान, पूषा, सविता, त्वष्टा और वामन उत्पन्न हुईं। इनमें से वामन परमात्मा विष्णु के अवतार थे। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे आदित्यों में भगवान विष्णु हैं। विष्णु ने वामन के रूप में अपने वैभव को प्रकट किया। ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं में सूर्य सबसे अधिक दीप्तिमान होता है।
रामचरितमानस में वर्णन है-
राकापति शोरस उनहिं तारागन समुदाइ।
सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ।।
"रात्रिकाल में आकाश के सभी तारों और चन्द्रमा सहित सभी दीपक मिलकर भी अंधकार को मिटाने के लिए पर्याप्त नहीं होते। लेकिन जिस क्षण सूर्योदय होता है उसी क्षण रात्रि समाप्त हो जाती है।" यह सूर्य की शक्ति है जिसे कृष्ण अपनी विभूति के रूप में प्रकट करते हैं।
वे आगे रात्रि के आकाश का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं-"एक चन्द्रमा हजारों तारों से श्रेष्ठ है।" श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे रात्रि के आकाश में सभी नक्षत्रों और तारों के बीच चन्द्रमा हैं क्योंकि चन्द्रमा उनके वैभव को सर्वोत्तम ढंग से प्रकट करता है।
पुराणों में आगे यह वर्णन मिलता है कि कश्यप ऋषि की दूसरी पत्नी दिति से सन्तान के रूप में दैत्यों ने जन्म लिया। फिर दैत्यों के जन्म के पश्चात् दिति में इन्द्र से भी अधिक शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न करने की इच्छा उत्पन्न हुई इसलिए उसने अपने शिशु को एक वर्ष तक अपने गर्भ में रखा। तब इन्द्र ने वज्र का प्रयोग कर उसके गर्भ में पल रहे बालक के कई टुकड़े कर दिए और वे कई मारूत में बदल गये। वे सब 59 मारूत अर्थात् ब्रह्मांड में प्रवाहित होने वाली वायु बन गये। इनमें से सबसे मुख्य-अवाह, प्रवाह, निवाह, पूर्वाह, उद्वाह, संवाह, परिवाह हैं। सबसे प्रमुख वायु को 'परिवाह' के नाम से जाना जाता है और इसे 'मरीचि' भी कहा जाता है। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनका वैभव ‘मरीचि' नामक वायु में प्रकट होता है।
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासव: |
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना || 22||
मैं वेदों में सामवेद, देवताओं में स्वर्ग का राजा इन्द्र हूँ। इन्द्रियों के बीच में मन और जीवित प्राणियों के बीच चेतना हूँ।
चार वेदों के नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं। इनमें से सामवेद में भगवान के वैभवों का वर्णन किया गया है, जैसे कि ये स्वर्ग के देवताओं में प्रकट होते हैं जो ब्रह्माण्ड का संचालन करते हैं। सामवेद संगीतमय है और इसे भगवान की प्रशंसा में गाया जाता है। यह उनका मन हर लेता है जो इसे समझते हैं और यह इसे श्रवण करने वालों में भक्ति भाव उत्पन्न करता है। स्वर्ग के देवता इन्द्र का दूसरा नाम वासव है। उसका यश, शक्ति और पदवी जीवात्माओं में अद्वितीय है। कई जन्मों के पुण्य कर्मों के फलस्वरूप किसी विरले पुण्यात्मा को इन्द्र के पद पर नियुक्त किया जाता है इसलिए इन्द्र भगवान की दीप्तिमान महिमा को दर्शाता है। पाँचों इन्द्रियाँ तभी सुचारू रूप से काम करती हैं जब मन सचेत रहता है। यदि मन भटक जाता है तब इन्द्रियाँ सुचारू रूप से कार्य नहीं कर सकती।
उदाहरणार्थ हम अपने कानों से लोगों के वार्तालाप को सुनते हैं किन्तु यदि उनके बोलते समय हमारा मन भटक जाता है तब उनके शब्द हमारे कानों को सुनाई नहीं देते। इसलिए मन इन्द्रियों का राजा है। श्रीकृष्ण इसकी चर्चा अपनी शक्ति को दर्शाने के लिए करते हैं और बाद में भगवद्गीता के अध्याय 15.6 में उन्होंने मन का उल्लेख छठी और महत्वपूर्ण इन्द्रिय के रूप में किया है। चेतना जीवात्मा का वह गुण है जिसके द्वारा जड़ और चेतन पदार्थों में अन्तर का बोध होता है। जीवित मनुष्यों के शरीर में चेतना की उपस्थिति और मृत व्यक्ति में चेतना के अभाव से ही जीवित और मृत व्यक्ति के अन्तर का पता चलता है। भगवान की दिव्य शक्ति द्वारा चेतना आत्मा में व्याप्त रहती है।
चेतनश्चे तनानाम्।
(कठोपनिषद्-2.2.13)
"भगवान सभी चेतन पदार्थों में परम चेतन है।"
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् |
वसूनां पावकश्चास्मि मेरु: शिखरिणामहम् || 23||
रुद्रों में मुझे शंकर जानो, यक्षों में मैं कुबेर हूँ, वसुओं में मैं अग्नि हूँ और पर्वतों में मेरु हूँ।
भगवान शिव के ग्यारह स्वरूप रुद्र कहलाते हैं-हर, बहुरूप, त्रयंबक, अपराजित, वृषकपि, शंकर कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, सर्व और कपाली। पुराणों में विभिन्न स्थानों में इनको विभिन्न नाम दिए गए हैं। इनमें से शंकर ब्रह्माण्ड में भगवान शिव का मूल रूप हैं।
यक्षों और राक्षसों की रूचि संपत्ति अर्जित करने में होती है। यक्षों का नायक कुबेर विपुल धन-संपदा से सम्पन्न और देवताओं का कोषाध्यक्ष है। इस प्रकार वह यक्षों में सर्वव्यापी भगवान की विभूति प्रदर्शित करता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, अंतरिक्ष, सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र आठ प्रकार के वसु कहलाते हैं। ये सभी ब्रह्माण्ड की स्थूल संरचना का निर्माण करते हैं। इनमें से अग्नि गर्मी उत्पन्न करती है और अन्य तत्त्वों को ऊर्जा प्रदान करती है। इसलिए श्रीकृष्ण ने इसका उल्लेख अपनी विशेष अभिव्यक्ति के रूप में किया है। स्वर्गलोक में मेरु पर्वत अपनी प्राकृतिक सम्पदा के लिए प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि स्वर्ग की कई इकाइयाँ इसकी धुरी के चारों ओर चक्कर लगाती रहती हैं। इसलिए श्रीकृष्ण इसके वैभव की चर्चा करते हैं। जिस प्रकार समृद्धि से धनवान व्यक्ति की पहचान होती है उसी प्रकार उपर्युक्त सभी वैभव भगवान की विभूतियों अर्थात् अनन्त शक्तियों को प्रकट करते हैं।
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् |
सेनानीनामहं स्कन्द: सरसामस्मि सागर: || 24||
हे अर्जुन! पुरोहितों में मुझे बृहस्पति जानो और सेना नायकों में मैं कार्तिकेय हूँ और सभी जलाशयों में समुद्र हूँ।
पुरोहित मंदिरों और घरों में धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा और अनुष्ठानों आदि का पालन करवाते हैं। बृहस्पति स्वर्ग के मुख्य पुरोहित हैं इसलिए वे सभी पुरोहितों में श्रेष्ठ हैं। किन्तु श्रीमद्भागवतम् के श्लोक 11.16.22 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे पुरोहितों में विशिष्ट हैं। उन्होंने दो स्थानों पर पृथक्-पृथक् उल्लेख क्यों किया है? इसका तात्पर्य यह है कि हमें पदार्थ के महत्त्व के स्थान पर पदार्थ में प्रकट हो रहे भगवान के वैभव की ओर ध्यान देना चाहिए। सभी वस्तुओं के जिस वैभव का भगवान श्रीकृष्ण यहाँ वर्णन कर रहे हैं, उन्हें भी इसी प्रकार से समझना चाहिए। ऐसा नहीं है कि पदार्थ के महत्त्व पर बल दिया जा रहा है अपितु उसमें प्रकट होने वाले भगवान का वैभव अधिक महत्त्वपूर्ण है। कार्तिकेय भगवान शिव के पुत्र हैं जिसे स्कन्द नाम से भी जाना जाता है। वह स्वर्ग के देवताओं के महासेनानायक है। इसलिए समस्त सेनापतियों में श्रेष्ठ कार्तिकेय में भगवान का वैभव प्रदर्शित होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि सभी जलाशयों में वे उग्र और शक्तिशाली समुद्र हैं।
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् |
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालय: || 25||
मैं महर्षियों में भृगु हूँ, ध्वनियों में दिव्य ओम् हूँ। मुझे यज्ञों में जपने वाला पवित्र नाम समझो। अचल पदार्थों में मैं हिमालय हूँ।
यद्यपि सभी प्रकार के फल और फूल एक ही धरती पर उगते हैं किन्तु प्रदर्शन के लिए उनमें से उत्तम का चयन किया जाता है। इसी प्रकार से ब्रह्माण्ड में सभी व्यक्त और अव्यक्त पदार्थ भगवान का वैभव है, फिर भी भगवान की विभूतियों का वर्णन करने हेतु इनमें से सर्वश्रेष्ठ का चयन किया जाता है। देवलोक में स्थित ऋषियों में प्रमुख भृगु ऋषि हैं। वे ज्ञान, वैभव और भक्ति से सम्पन्न हैं। विष्णु भगवान की छाती पर भृगु के पदचिह्न है जिसका उल्लेख पुराणों में किया गया है। इसमें वर्णन है कि भृगु ने त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और शिव के धैर्य का परीक्षण किया था। अतः भृगु ऋषि के माध्यम से श्रीकृष्ण की विलक्षण महिमा प्रकट होती है।
भगवान के निराकार रूप की आराधना 'ओम्' स्पंदन का ध्यान करके की जाती है जोकि भगवान की एक अन्य विभूति है। श्रीकृष्ण ने श्लोक 7.18 और 8.13 में यह व्याख्या की है कि प्रणव शब्द 'ओम्' पवित्र ध्वनि है। यह अनाहत नाद है और यही स्पंदन ध्वनि सृष्टि में व्याप्त है। प्रायः मांगलिक कार्यों के आरम्भ में इसका उच्चारण किया जाता है। यह कहा जाता है कि एक अक्षर 'ओम्' से गायत्री मंत्र प्रकट हुआ और गायत्री मंत्र से वेद प्रकट हुए।
हिमालय उत्तर भारत में एक पर्वत श्रृंखला है। प्राचीन काल से ही ये पर्वत श्रृंखलाएँ करोडों भक्तों में आध्यात्मिक कौतुहल, विस्मय और आश्चर्य उत्पन्न करती रही हैं। इन पर्वत श्रृंखलाओं की जलवायु, पर्यावरण और निर्जनता तपस्या एवं आत्मिक उन्नति के अत्यंत अनुकूल है। इसलिए कई महान ऋषि हिमालय में अपने सूक्ष्म शरीर में रहते हुए स्वयं के आत्म उत्थान और मानव मात्र के कल्याणार्थ घोर तपस्या का अभ्यास करते हैं। इसलिए विश्व की बहुसंख्यक पर्वत श्रृंखलाओं में हिमालय भगवान के गौरव को अनुपम ढंग से प्रदर्शित करता है।
यज्ञ परमात्मा के प्रति हमारे समर्पण से संबंधित कर्म है। भगवान के पावन नाम को जपना सबसे सरल यज्ञ है। इसे जप यज्ञ या श्रद्धापूर्वक भक्तिभाव से भगवान के दिव्य नामों का बार-बार जप करना कहा जाता है। वैदिक यज्ञों के लिए कई प्रकार के नियम निर्धारित किए गये हैं। इन सबका सावधानी से पालन करना आवश्यक होता है जबकि जप यज्ञ या कीर्तन में कोई नियम नहीं होता। यह यज्ञ किसी भी स्थान और किसी भी समय किया जा सकता है और अन्य प्रकार के यज्ञों की तुलना में यह अधिक आत्म शुद्धि करता है। कलियुग में भगवान के नाम स्मरण पर ही अधिक बल दिया गया है।
कलिजुग केवल नाम आधारा।
सुमिरि सुमिरि नर उतरहैं पारा ।।
(रामचरित्मानस)
"कलियुग में भगवान के नाम का स्मरण और जप माया रूपी संसार के समुद्र को पार करने का सशक्त साधन है।"
अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारद: |
गन्धर्वाणां चित्ररथ: सिद्धानां कपिलो मुनि: || 26||
वृक्षों में मैं बरगद का वृक्ष हूँ और देव ऋषियों में मैं नारद हूँ, गंधों में मैं चित्ररथ हूँ, सिद्ध पुरुषों में मैं कपिल मुनि हूँ।
बरगद के वृक्ष के नीचे बैठने वालों को शीतलता का आभास होता है। यह वृक्ष घना होता है और विस्तृत क्षेत्र में ठण्डी छाया प्रदान करता है। यह अपनी जड़ों को नीचे पहुँचा कर फैलाता है। महात्मा बुद्ध को बरगद के वृक्ष के नीचे ध्यान लगाते हुए ज्ञान प्राप्त हुआ था। महर्षि नारद कई महान ऋषियों एवं संतों जैसे ऋषि वेदव्यास, वाल्मीकि, ध्रुव और प्रह्लाद के गुरु हैं। वे निरन्तर भगवान की महिमा का गान व बखान करते रहते हैं और तीनों लोकों में दिव्य कार्यों की पूर्ति करते हैं। वह समस्याएँ उत्पन्न करने के लिए प्रसिद्ध हैं और कभी-कभी कुछ गन्धर्व उन्हें उपद्रवी समझने लगते हैं जबकि उनकी यह इच्छा होती है कि महान लोगों के बीच विवाद उत्पन्न कर अंततः आत्मनिरीक्षण द्वारा उनके अत:करण को शुद्ध किया जाए। गन्धर्व लोक में ऐसे लोग निवास करते हैं जो मधुर वाणी में गाते हैं और इनमें चित्ररथ सर्वश्रेष्ठ गायक हैं। सिद्ध पुरुष वे योगी होते हैं जो आध्यात्मिक रूप से परिपूर्ण होते हैं। इन सिद्धों में कपिल मुनि ने सांख्य दर्शन प्रकट किया और भक्तियोग की महिमा की भी शिक्षा दी जिसका वर्णन श्रीमद्भागवतम् के तीसरे स्कन्ध में मिलता है। वे भगवान के अवतार थे और इसलिए श्रीकृष्ण ने अपनी महिमा को प्रकट करने के लिए विशेष रूप से इनका उल्लेख किया है।
उच्चै:श्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् |
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् || 27||
अश्वों में मुझे उच्चैश्रवा समझो जो समुद्र मंथन के समय प्रकट हुआ था। हाथियों में मुझे ऐरावत समझो और मनुष्यों में मैं राजा हूँ।
श्रीकृष्ण निरन्तर अर्जुन को अपना गौरव प्रकट करने प्रत्येक श्रेणी के अति प्रतिष्ठित व्यक्तियों और भव्य पदार्थों का नाम ले रहे हैं। उच्चैश्रवा अलौकिक पंखों वाला स्वर्ग लोक के राजा इन्द्र का घोड़ा है। सफेद रंग का यह घोड़ा ब्रह्माण्ड में सबसे तीव्र गति से दौड़ने वाला है। यह देवताओं और दैत्यों द्वारा समुद्रमंथन के दौरान प्रकट हुआ था। इन्द्र ऐरावत नाम के सफेद हाथी पर सवारी करता है। इसे 'अर्धमातंग' या 'बादलों का हाथी' भी कहा जाता है।
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् |
प्रजनश्चास्मि कन्दर्प: सर्पाणामस्मि वासुकि: || 28||
शस्त्रों में मैं वज्र हूँ और गायों में कामधेनु हूँ। सन्तति के समस्त कारणों में मैं प्रेम का देवता कामदेव और सर्पो में वासुकि हूँ।
पुराणों में महान ऋषि दधीचि के बलिदान से संबंधित कथा का वर्णन मिलता है जोकि इतिहास में अनूठी है। स्वर्ग के राजा इन्द्र से एक बार वृत्रासुर नामक राक्षस ने स्वर्ग का राज्य छीन लिया। वृत्रासुर को प्राप्त वरदान के अनुसार उस समय उपलब्ध किसी भी शस्त्र से उसका वध नहीं किया जा सकता था। देवलोक नरेश इन्द्र हताश होकर भगवान शिव की शरण में गये और शिव देवलोक नरेश को भगवान विष्णु के पास ले गये। विष्णु भगवान ने बताया कि महर्षि दधीचि की अस्थियों से बने वज्र नामक शस्त्र से ही वृत्रासुर को मारा जा सकता है। इन्द्र ने तब महर्षि दधीचि से प्रार्थना की कि वे अपने प्राणों का बलिदान दें ताकि उनकी अस्थियों का प्रयोग वज्र बनाने के लिए किया जा सके। दधिची ने प्रार्थना स्वीकार तो कर ली लेकिन उससे पहले उन्होंने सभी पवित्र नदियों की तीर्थ यात्रा पर जाने की इच्छा व्यक्त की। इन्द्र तब सभी पवित्र नदियों का जल एक साथ ले आया ताकि महर्षि दधीचि बिना समय व्यर्थ किए अपनी अभिलाषा पूर्ण कर सकें। इसके पश्चात् महर्षि दधीचि ने यौगिक प्रक्रिया से अपने प्राण त्याग दिए। फिर दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र नामक अस्त्र का निर्माण किया गया और उस हथियार का प्रयोग कर वृत्रासुर को पराजित करके इन्द्र ने अपना स्वर्ग का राज्य सिंहासन पुनः प्राप्त किया। इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने जानबूझकर अपनी महिमा करने के लिए वज्र के नाम का उल्लेख किया है और इसे विष्णु भगवान के हाथों में सदैव धारण किए जाने वाली गदा और चक्र की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि जब सम्भोग क्रिया सन्तान की उत्पत्ति के उद्देश्य से की जाती है तब उसे अपवित्र नहीं कहा जा सकता। कामदेव विपरीत लिंगों में आकर्षण उत्पन्न करने के दायित्व का निवर्हन करता है ताकि प्रजनन प्रक्रिया द्वारा सहज रूप से मानव जाति का अस्तित्व बना रहे। इस आकर्षण का मूल भगवान हैं और इसका प्रयोग कामुक आनन्द के लिए न करके केवल योग्य संतान की उत्पत्ति के लिए करना चाहिए। सातवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने इसी प्रकार की घोषणा की थी कि वे ऐसे आकर्षण हैं जो सदाचरण और शास्त्रीय आज्ञाओं के विरुद्ध नहीं हैं।
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् |
पितृणामर्यमा चास्मि यम: संयमतामहम् || 29||
विभूति योग अनेक फणों वाले सों में मैं अनन्त हूँ, जलचरों में वरुण हूँ, पितरों में अर्यमा हूँ और नियामकों में मैं मृत्यु का देवता यमराज हूँ।
अनन्त एक दिव्य सर्प है जिस पर विष्णु भगवान विश्राम करते हैं। उसके दस हजार फण हैं। ऐसा कहा गया है कि वह सृष्टि के प्रारम्भ से अपने प्रत्येक फण से निरन्तर भगवान की महिमा का गान कर रहा है किन्तु उसका वर्णन अभी तक पूरा नहीं हुआ है। वरुण समुद्र के देवता हैं। अर्यमा अदिति के तीसरे पुत्र हैं। दिवंगत पितरों के प्रमुख के रूप में उनकी पूजा की जाती है। यमराज मृत्यु का देवता है। वह मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा के नश्वर शरीर को ले जाता है। वह भगवान की ओर से न्याय करते हैं और मनुष्य के इस जीवन के कर्मों के अनुसार उसे अगले जन्म में दण्ड या फल प्रदान करता है। वह अपने कर्त्तव्य पालन में किसी प्रकार की कोताही नहीं करते चाहे वे जीवात्मा के लिए सुखद या पीड़ादायक ही क्यों न हो। वह निष्पक्ष परम न्यायकर्ता के रूप में भगवान की महिमा को प्रदर्शित करते है।
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां काल: कलयतामहम् |
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् || 30||
दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूँ और दमनकर्ताओं में मैं काल हूँ। पशुओं में मुझे सिंह मानो और पक्षियों में मुझे गरूड़ जानो।
प्रह्लाद ने शक्तिशाली दैत्यराज हिरण्यकश्यप के पुत्र के रूप में जन्म लिया था किन्तु वह बाल्यावस्था से ही भगवान विष्णु का परम भक्त हो गया। इस प्रकार प्रह्लाद के व्यक्तित्त्व में भगवान की महिमा सर्वोत्कृष्ट ढंग से प्रदर्शित होती है। काल अत्यंत बलवान है जो कि ब्रह्माण्ड के बड़े से बड़े शक्तिशाली मनुष्यों को धूल में मिला देता है। उसी तरह अहंकारी हिरण्यकश्यप का भी अंत भगवान विष्णु ने किया। खूखार सिंह जंगल का राजा है और पशुओं में भगवान की शक्ति वास्तव में सिंह में ही प्रदर्शित होती है। गरुड़ भगवान विष्णु का दिव्य वाहन है और पक्षियों में सबसे बड़ा है।
पवन: पवतामस्मि राम: शस्त्रभृतामहम् |
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी || 31||
पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ और शस्त्र चलाने वालों में मैं भगवान श्रीराम हूँ, जलीय जीवों में मगरमच्छ और बहती नदियों में गंगा हूँ।
प्रकृति में वायु अति प्रभावी ढंग से शुद्धिकरण का कार्य करती है। यह अशुद्ध जल को वाष्प में परिवर्तित करती है और पृथ्वी से दुर्गंध को दूर करती है। यह ऑक्सीजन के साथ अग्नि प्रज्जवलित करती है। इस प्रकार से यह प्रकृति को शुद्ध करती है। भगवान श्रीराम पृथ्वी पर सबसे पराक्रमी योद्धा थे और उनका धनुष घातक शस्त्र था। फिर भी उन्होंने अपनी प्रबल शक्तियों का कभी दुरुपयोग नहीं किया। हर समय उन्होंने शुभ कार्य के लिए हथियार उठाएँ। इस प्रकार से वे श्रेष्ठ शस्त्रधारी थे।
राम भगवान के अवतार थे। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने उनके साथ अपनी पहचान को दर्शाया है। पवित्र नदी गंगा भगवान के दिव्य चरणों से प्रवाहित होती है। वह स्वर्ग से नीचे पृथ्वी पर आती है। कई महान ऋषि मुनियों ने इसके किनारे पर तपस्या की है। यह तथ्य पहले भी उजागर हो चुका था कि यदि गंगा जल को किसी बर्तन में भरकर वर्षों तक भी रखा जाए तब भी सामान्य जल की भाँति उसमें सड़न उत्पन्न नहीं होती। लेकिन आधुनिक युग में इस तथ्य की प्रबलता थोड़ी घट गयी है क्योंकि लाखों गैलन गंदगी गंगा में डाली जा रही है।
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन |
अध्यात्मविद्या विद्यानां वाद: प्रवदतामहम् || 32||
हे अर्जुन! मुझे समस्त सृष्टियों का आदि, मध्य और अंत जानो। सभी विद्याओं में मैं अध्यात्म विद्या हूँ और सभी तर्कों का मैं तार्किक निष्कर्ष हूँ।
इससे पहले 20वें श्लोक में श्रीकृष्ण ने व्याख्या की थी कि वे सभी प्राणियों के आदि, मध्य और अंत हैं। अब वे यही बात सभी सृष्टियों के लिए कह रहे हैं। सभी प्रकार की सृष्टियाँ जैसे अंतरिक्ष, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को सर्ग कहा जाता है। मैं इनका 'सृजक' अर्थात् आदि, 'पालक' अर्थात् मध्य और 'संहारक' अर्थात् अंत हूँ। इसलिए सृष्टि का सृजन, पालन और संहार मेरी विभूतियों द्वारा किया जाता है। विद्या वह है जिसके द्वारा मनुष्य को किसी विषय से संबंधित ज्ञान प्राप्त होता है। धार्मिक ग्रंथों में 18 प्रकार की विद्याओं का वर्णन किया गया है जिनमें से प्रमुख चौदह का वर्णन निम्न प्रकार से किया गया है:
अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्याय विस्तरः।
पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्योताश्चर्तुदश ।।
विभूति योग आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चैव ते त्रयः।
अर्थशास्त्रं चतुर्थं तु विद्या ह्यष्टादशैव ताः।।
(विष्णु पुराण-3.6.27.28)
"शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्ति, ज्योतिष और छंद, ये छः प्रकार की विद्याओं को वेदों का अंग कहा जाता है। ऋक्, यजु, साम, अथर्व ये वैदिक ज्ञान की चार शाखाएँ हैं। मीमांसा, न्याय, धर्म शास्त्र और पुराणों सहित प्रमुख चौदह विद्याएँ हैं।" इन विद्याओं का अभ्यास बुद्धि, दिव्य ज्ञान और धर्म के मार्ग के प्रति जागरूकता को बढ़ाता है। इसके अतिरिक्त आध्यत्मिक ज्ञान मनुष्य को माया के बंधनों से मुक्त कर उसे अमरत्व प्रदान करता है। इस प्रकार से यह पहले उल्लिखित विद्याओं में सर्वोत्कृष्ट है। श्रीमद्भागवतम् में भी इसका उल्लेख किया गया है
सा विद्या तन्मतिर्यया
(श्रीमद्भागवतम्-4.29.49)
"सर्वोत्तम ज्ञान वह है जिसके द्वारा मनुष्य में भगवान के चरण कमलों में अनुराग उत्पन्न हो।" विवाद और तर्क के क्षेत्र में 'जल्प' का अर्थ प्रतिद्वन्दी के कथनों में दोष ढूँढ कर अपने मत को स्थापित करने से है। 'वितण्डा' से तात्पर्य कपटपूर्ण और असार तर्कों द्वारा स्पष्ट रूप से जानबूझकर सत्य को अस्वीकार करने से है। वेद, वाद-विवाद का तार्किक निष्कर्ष हैं। तर्क विचारों के संप्रेषण और सत्य की स्थापना का आधार है। इसलिए तर्क के सार्वभौमिक बोध के कारण मानव समाज में ज्ञान को सरलता से सीखा, सिखाया और विकसित किया जा सकता है। तर्क का सार्वभौमिक सिद्धान्त भगवान की विभूतियों का प्रकटीकरण है।
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्व: सामासिकस्य च |
अहमेवाक्षय: कालो धाताहं विश्वतोमुख: || 33||
मैं सभी अक्षरों में प्रथम अक्षर 'आकार' हूँ और व्याकरण के समासों का द्वन्द्व समास हूँ। मैं शाश्वत काल हूँ और में ब्रह्मा हूँ।
संस्कृत वर्णमाला के सभी वर्ण 'अ' अक्षर के साथ मिलकर बने होते हैं। उदाहरणार्थ क् + अ = क। इसलिए 'अ' अक्षर संस्कृत वर्णमाला का महत्त्वपूर्ण अक्षर है। 'अ' वर्णमाला का प्रथम स्वर भी है क्योंकि स्वर व्यंजन से पहले लिखा जाता है और 'अ' सबसे पहला स्वर है। यद्यपि संस्कृत ऐसी प्राचीन भाषा है जो अति परिष्कृत और सशक्त है। संस्कृत भाषा की सामान्य प्रक्रिया में एकल शब्दों को मिलाकर समास शब्द बनाए जाते हैं। जब दो या अधिक शब्द अपने सम्बन्धी शब्दों या विभक्तियों को छोड़कर एक साथ मिल जाते हैं तब उनके इस मेल को समास कहते हैं। समास द्वारा मिले हुए शब्दों को सामासिक शब्द अथवा समस्तपद कहा जाता है। प्रमुख रूप से छः प्रकार के समास हैं-1. द्वंद्व, 2. बहुब्रीहि, 3. कर्मधारय, 4. तत्पुरुष, 5. द्विगु, 6. अव्यवीभाव। इनमें से द्वन्द्व सर्वोत्तम है क्योंकि इनमें दोनों शब्दों की प्रमुखता होती है जबकि अन्य समासों में किसी एक शब्द की तुलना में दूसरे शब्द की अधिक प्रमुखता होती है या दोनों शब्दों का संयोग तीसरे शब्द का अर्थ स्पष्ट करता है। 'राधा-कृष्ण' यह दो शब्द द्वन्द समास का उदाहरण है।
श्रीकृष्ण इसलिए इसे अपनी विभूति के रूप में प्रकट कर रहे हैं। सृष्टि की रचना अद्भुत कार्य है और इसका अवलोकन विस्मयकारी है जबकि अति प्रबुद्ध अविष्कारों से उन्नत मानवजाति इसकी तुलना में निष्प्रभ है। इसलिए श्रीकृष्ण प्रथम जन्में ब्रह्मा का नाम लेते हैं जिन्होंने समूची सृष्टि की रचना की और वे यह कहते हैं कि सृष्टाओं में ब्रह्मा की रचनात्मक क्षमता भगवान की महिमा को सर्वोत्तम ढंग से प्रदर्शित करती है।
मृत्यु: सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् |
कीर्ति: श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृति: क्षमा || 34||
मैं सर्वभक्षी मृत्यु हूँ और भविष्य में होने वालों अस्तित्वों को उत्पन्न करने वाला मूल मैं ही हूँ। स्त्रियों के गुणों में मैं कीर्ति, समृद्धि, मधुर वाणी, स्मृति, बुद्धि, साहस और क्षमा हूँ।
अंग्रेजी में एक कहावत है 'मृत्यु के समान अटल'। जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी निश्चित है और इस प्रकार से 'डेड एन्ड' अर्थात् सभी के जीवन का अटल सत्य मृत्यु है ऐसा वर्णित है। भगवान में केवल सृजन की ही शक्ति नहीं है अपितु उनमें सृष्टि का संहार करने की भी शक्ति है। वे मृत्यु के रूप में उन सबका भक्षण करते हैं जो जन्म और मृत्यु के चक्र में घूमते रहते हैं और पुनः जन्म लेते रहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे भविष्य में उत्पन्न होने वाले सभी प्राणियों के मूल हैं। स्त्रियों के व्यक्तित्त्व में कुछ गुण अलंकारों के रूप में देखे जाते हैं जबकि पुरुषों में कुछ अन्य गुणों को विशेषतः प्रशंसनीय रूप में देखा जाता है। आदर्श रूप से बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व वह है जो दोनों प्रकार के गुणों से सम्पन्न हो। यहाँ श्रीकृष्ण ने कीर्ति, समृद्धि, मृदुवाणी, स्मृति, बुद्धि, साहस और क्षमा आदि गुणों का उल्लेख किया है जो स्त्रियों को गौरवशाली बनाते हैं। इनमें प्रथम तीन बाह्य रूप से और अगले चार आंतरिक रूप में प्रकट होते हैं। इसके अतिरिक्त मानव जाति के प्रजनक प्रजापति दक्ष की चौबीस कन्याएँ थी जिनमें से पाँच कीर्ति, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा श्रेष्ठ स्त्रियाँ थी। 'श्री' ऋषि भृगु की पुत्री थी तथा 'वाक्' ब्रह्मा की कन्या थी। अपने विशिष्ट नामों के अनुसार ये सात स्त्रियाँ इस श्लोक में वर्णित सात गुणों की अधिष्ठात्री देवियाँ हैं। यहाँ श्रीकृष्ण ने इन गुणों को अपनी विभूतियों के रूप में प्रकट किया है।
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् |
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकर: || 35||
सामवेद के स्तोत्रों में मुझे बृहत्साम और छन्दों में मुझे गायत्री समझो। मैं बारह मासों में मार्ग शीर्ष और ऋतुओं में पुष्प खिलाने वाली वसन्त ऋतु हूँ।
इससे पहले श्रीकष्ण ने कहा था कि वेदों में वे सामवेद हैं जो सुन्दर भक्तिमय गीतों से परिपूर्ण है। अब वे कहते हैं कि सामवेद में वे बृहत्साम हूँ जिसका स्वर अत्यंत मधुर है और ये विशेष रूप से मध्यरात्रि में गाए जाते हैं। अन्य भाषाओं के समान संस्कृत भाषा में काव्य रचना के लिए विशिष्ट पद्यों और छंदो की व्यवस्थाएँ हैं। वेदों में कई छंद हैं। इनमें गायत्री अति आकर्षक और मधुर है। जिस छंद में प्रसिद्ध गायत्री मंत्र सम्मिलित है वह गायत्री छंद ही है। यह गहन सार्थक प्रार्थना भी है।
ओउम् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
(ऋग्वेद-3.62.10)
"हम तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाले और हमारे लिए पूजनीय भगवान का ध्यान करते हैं। वह सभी पापों का और अज्ञानता का विनाश करता है। वह हमारी बुद्धि को उचित दिशा की ओर प्रेरित करे।" गायत्री मंत्र युवा पुरुषों के लिए पवित्र उपनयन संस्कार का भी अंग है और दैनिक धार्मिक अनुष्ठानों में गाया जाता है। इसके अतिरिक्त देवी गायत्री, रुद्र गायत्री, ब्रह्म गायत्री, परमहंस गायत्री और कुछ अन्य गायत्री मंत्र भी वेदों में मिलते हैं। मार्गशीर्ष हिन्दू पंचाङ्ग (कैलेंडर) का ग्यारहवाँ मास है। यह नवम्बर और दिसम्बर माह में पड़ता है।
भारत में तापमान की दृष्टि से यह मास उत्तम माना जाता है क्योंकि यह न तो अधिक गर्म न ही अधिक ठंडा होता है। वर्ष में इस समय में खेतों से फसल काटी जाती है। इन कारणों से इस मास को प्रायः सभी पसंद करते हैं। वसंत ऋतु को ऋतु राज या ऋतुओं के राजा के रूप में जाना जाता है। इस समय प्रकृति जीवन में उल्लास की बौछारें छिटका कर सबको प्रफुल्लित करती है। कई उत्सव भी इस ऋतु में मनाये जाते हैं। वसंत ऋतु वातावरण में व्याप्त होने वाले हर्षोल्लास का प्रतीक है। इस प्रकार ऋतुओं में वसंत भगवान के वैभव को प्रकट करती है।
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् |
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् || 36||
समस्त छलियों में मैं जुआ हूँ और तेजस्वियों में तेज हूँ। विजेताओं में विजय हूँ। संकल्पकर्ताओं का संकल्प और धर्मात्माओं का धर्म हूँ।
श्रीकृष्ण केवल गुणों का नहीं बल्कि अवगुणों का भी अपनी महिमा के रूप में उल्लेख करते हैं। जुआ एक बुराई है जो परिवार, व्यवसाय और जीवन का विनाश करता है। युधिष्ठिर की जुआ खेलने की दुर्बलता के कारण महाभारत का युद्ध हुआ। यदि जुआ भी भगवान की महिमा है और इसमें कोई बुराई नहीं है तब फिर इसकी मनाही क्यों है। इसका उत्तर यह है कि भगवान जीवात्मा को अपनी शक्ति प्रदान करते हैं और इसके साथ वह उसे चयन करने की स्वतंत्रता भी देते हैं। यदि हम उनको भूलना चाहते हैं तब वे हमें उन्हें भूल जाने की शक्ति देते हैं। यह विद्युत् शक्ति के समान है जिसका प्रयोग हम घर को गर्म या ठंडा करने के लिए करते हैं।
उपभोक्ता अपनी इच्छानुसार इसका प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र होता है। किन्तु पावर हाऊस जो बिजली की आपूर्ति करता है, वह इसके सदुपयोग या दुरूपयोग के लिए उत्तरदायी नहीं होता। समान रूप से जुआरी में भगवान द्वारा प्रदत्त बुद्धि और शक्ति होती है। लेकिन यदि वह भगवान द्वारा प्रदत्त उपहार का दुरूपयोग करना चाहता है तब भगवान उसके पापमय कर्म के लिए उत्तरदायी नहीं होते। सभी मनुष्य विजयी होना चाहते हैं। इसमें प्रभु की महिमा प्रकट होती है। श्रीकृष्ण ने दृढ़ संकल्प की गुणवत्ता पर भी अत्यंत बल दिया है। इसका पहले भी श्लोक संख्या 2.41, 2.44, और 9.30 में उल्लेख किया गया है। धर्मात्मा के गुण भी भगवान की शक्ति का ही प्रकटीकरण हैं। सभी सद्गुण, उपलब्धियाँ, महिमा, विजय, और दृढ़ संकल्प भगवान से उत्पन्न होते हैं। इसलिए इन्हें अपना समझने के स्थान पर हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि ये सब भगवान से ही हमारे पास आते हैं।
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जय: |
मुनीनामप्यहं व्यास: कवीनामुशना कवि: || 37||
विभूति योग वृष्णिवंशियों में मैं कृष्ण और पाण्डवों में अर्जुन हूँ, ऋषियों में मैं वेदव्यास और महान विचारकों में शुक्राचार्य हूँ।
भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर वृष्णि वंश में वसुदेव के पुत्र के रूप में जन्म लिया। वे वास्तव में वृष्णि वंश के सबसे गौरवशाली व्यक्तित्व हैं। पाँच पांडव युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल सहदेव, जो पाण्डु के पुत्र थे, इनमें अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे और श्रीकृष्ण के परम मित्र थे। भगवान उन्हें अपना परम मित्र मानते थे। ऋषियों में वेदव्यास का विशिष्ट स्थान है। उन्हें 'बादरायण' और 'कृष्ण द्वैपायन' नामों से भी जाना जाता है। उन्होंने वैदिक ज्ञान को अनेक प्रकार से प्रस्तुत किया और मानव मात्र के कल्याणार्थ कई धार्मिक ग्रंथों की रचना की। वास्तव में वेदव्यास श्रीकृष्ण के अवतार थे और श्रीमद्भागवतम् में अवतारों की सूची में उनके नाम का उल्लेख है। शुक्राचार्य विद्वान थे और उन्हें नीति शास्त्र के ज्ञाता के रूप में जाना जाता है। उन्होंने असुरों को अपने शिष्य बनाना स्वीकार किया और उनकी उन्नति के लिए उनका मार्गदर्शन दिया। अपनी विद्वत्ता के बल पर उन्हें भगवान की विभूति के रूप में जाना जाता है।
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् |
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् || 38||
मैं अराजकता को रोकने वाले साधनों के बीच न्यायोचित दण्ड और विजय की आकांक्षा रखने वालों में उनकी उपयुक्त नीति हूँ। रहस्यों में मौन और बुद्धिमानों में उनका विवेक हूँ।
मानव जाति की ऐसी प्रवृत्ति है कि लोगों के भीतर सदाचरण विकसित करने के लिए केवल उपदेश देना ही पर्याप्त नहीं होता। न्यायोचित ढंग से जब समय पर दण्ड दिया जाता है तब यह लोगों के पापमय आचरण में सुधार लाने और उन्हें सदाचरण पर चलने का प्रशिक्षण देने का महत्त्वपूर्ण उपकरण सिद्ध होता है। आधुनिक प्रबंधन सिद्धान्तों में अत्यंत कुशलता से वर्णन किया गया है कि दुराचार के लिए एक मिनट का दण्ड और सदाचार के लिए एक मिनट के उपयुक्त प्रोत्साहन से मनुष्यों के दुर्व्यवहार को रोका जा सकता है। विजय की अभिलाषा सार्वभौमिक है लेकिन जो उच्च चरित्रवान हैं वे नीति और सिद्धान्तों को त्याग कर अधर्म के मार्ग का अनुसरण कर विजय प्राप्त नहीं करना चाहते। ऐसी विजय जो धर्म के मार्ग का अनुसरण कर प्राप्त की जाती है वह भगवान की शक्ति का गौरव है। रहस्य वह है जिसे किसी विशिष्ट उद्देश्य से सामान्य जन से गुप्त रखा जाता है। कहा जाता है-"रहस्य एक व्यक्ति की जानकारी में ही रहस्य है। दो व्यक्ति की जानकारी में वह रहस्य गोपनीय नहीं रहता और तीन लोगों के बीच जानकारी होने का अर्थ है कि वह समूचे संसार में समाचार बन कर फैल चुका है।" इस प्रकार से सर्वोत्कृष्ट रहस्य वह है जो मौन में छिपा रहता है।
सच्चा ज्ञान मनुष्य में आध्यात्मिक ज्ञान की परिपक्वता और आत्मबोध या भगवद्ज्ञान द्वारा आता है। इसमें संपन्न मनुष्य सभी घटनाओं, मनुष्यों, और पदार्थों को भगवान के साथ संबंधित देखता है। ऐसा ज्ञान मनुष्य को परिशुद्ध, पूर्ण, तृप्त और उन्नत बनाता है। यह जीवन को दिशा देता है तथा अन्याय और परिवर्तन का सामना करने की शक्ति और मृत्यु तक क्रियाशील रहने की दृढ़ता प्रदान करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ऐसा ज्ञान हैं जो बुद्धिमानों में प्रकट होता है।
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन |
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् || 39||
मैं सभी प्राणियों का जनक बीज हूँ। कोई भी चर या अचर मेरे बिना नहीं रह सकता।
श्रीकृष्ण समस्त सृष्टि के निमित्त कारण और उपादान कारण दोनों हैं। निमित्त कारण से तात्पर्य यह है कि वे स्रष्टा हैं जो संसार को प्रकट करने के कार्य का निष्पादन करते हैं। उपादान कारण का अभिप्राय यह है कि वे वह तत्त्व हैं जिससे सृष्टि का सृजन होता है। श्लोक 7.10 और 9.18 में श्रीकृष्ण ने स्वयं को अनादि बीज घोषित किया था। यहाँ वे पुनः कहते हैं कि वे 'जनक बीज' हैं। वह इस पर पूर्णतः बल देते हैं कि वे सभी घटित घटनाओं का कारण हैं। उनकी शक्ति के बिना किसी का कोई अस्तित्त्व नहीं है। सभी जीव चार प्रकार से जन्म लेते हैं
1. अंडज-अण्डे से जन्म लेने वाले जैसे पक्षी, सर्प और छिपकली आदि।
2. जरायुज-गर्भ से जन्म लेने वाले जैसे मनुष्य, गाय, कुत्ता और बिल्ली आदि।
3. स्वेदज-पसीने से जन्म लेने वाले जैसे घु, खटमल आदि।
4. उद्भिज पृथ्वी से उगने वाले जैसे पेड़, लताएँ, घास और अनाज का पेड़ आदि। इसके अतिरिक्त अन्य योनियाँ भी हैं, जैसे भूत, प्रेतात्माएँ इत्यादि। श्रीकृष्ण इन सबका मूल कारण हैं।
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप |
एष तूद्देशत: प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया || 40||
हे शत्रु विजेता! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अन्त नहीं है। मैंने जो तुमसे कहा यह मेरी अनन्त महिमा का संकेत मात्र है।
श्रीकृष्ण अब अपने ऐश्वर्यों से संबंधित विषय का समापन कर रहे हैं। श्लोक संख्या 20 से 39 तक उन्होंने अपने बयासी ऐश्वर्यों का वर्णन किया। अब वे कहते हैं कि उन्होंने इस विषय का एक भाग ही उदाहरणार्थ प्रस्तुत किया है। अब यह प्रश्न सामने आता है कि यदि सब कुछ भगवान का ही ऐश्वर्य है तब इनका उल्लेख करने की क्या आवश्यकता है? इसका उत्तर यह है कि अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा था कि वह उनके दिव्य स्वरूप को कैसे समझे इसलिए अर्जुन के प्रश्न के प्रत्युत्तर में श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों का वर्णन किया। मन विशिष्ट गुणों की ओर आकर्षित होता है इसलिए भगवान ने अपनी शक्तियों की विलक्षणताओं को प्रकट किया है। जब कभी हम कहीं पर विशद वैभवशाली अभिव्यक्तियों को देखते हैं, यदि हम उन्हें भगवान की महिमा के रूप में देखते हैं तब हमारा मन स्वाभाविक रूप से भगवान के सम्मुख हो जाता है चूँकि। जबकि सृष्टि निर्माण की वृहत् योजना में भगवान की महिमा सभी छोटी और बड़ी वस्तुओं में व्याप्त है इसलिए हम यह समझ सकते हैं कि सारा संसार हमारी श्रद्धा भक्ति बढ़ाने के लिए असंख्य आदर्श और अवसर उपलब्ध करवाता है। भारत में एक पेंट कम्पनी अपने विज्ञापन में इसे इस प्रकार से व्यक्त करती है-'जब भी आप रंगों को देखोगे तब हमारे बारे में सोचोगे।' इस प्रकरण में श्रीकृष्ण का कथन भी समान है-"जहाँ भी आप महिमा की अभिव्यक्तियों को देखें तब मेरे बारे में सोंचें।"
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा |
तत्देवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् || 41||
तुम जिसे सौंदर्य, ऐश्वर्य या तेज के रूप में देखते हो उसे मेरे से ही उत्पन्न किन्तु मेरे तेज का स्फुलिंग मानो।
स्पीकर द्वारा प्रवाहित हो रही विद्युत्ध्वनि उत्पन्न करती है किन्तु जो इसके पीछे के सिद्धान्त को नहीं जानता। वह सोंचता है कि ध्वनि स्पीकर से आती है। समान रूप से जब हम किसी असाधारण प्रतिभा को देखते है वो हमारी कल्पना शक्ति को उन्मादिन कर देती है और हमें आनन्द में निमग्न कर देती है तब हमें उसे और कुछ न मानकर भगवान की महिमा का स्फुलिंग मानना चाहिए। वे सौंदर्य, महिमा, शक्ति, ज्ञान और ऐश्वर्य के अनन्त सरोवर हैं। वे विद्युत् गृह (पावर हाउस) हैं जहाँ से सभी जीव और पदार्थ ऊर्जा प्राप्त करते हैं। इसलिए हमें भगवान जो सभी प्रकार के वैभवों का स्रोत हैं उन्हें अपनी पूजा का लक्ष्य मानना चाहिए।
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन |
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् || 42||
हे अर्जुन! इस प्रकार के विस्तृत ज्ञान की क्या आवश्यकता है। केवल इतना समझ लो कि मैं अपने एक अंश मात्र से ही सकल सृष्टि में व्याप्त होकर उसे धारण करता हूँ।
श्रीकृष्ण का उपर्युक्त कथन यह इंगित करता है कि उन्होंने प्रश्न का उत्तर पहले ही दे दिया है। अब वह कुछ उल्लेखनीय तथ्य बताना चाहते हैं। अपना अद्भुत रूप प्रकट करने के पश्चात् वे कहते हैं कि अपनी महिमा के संबंध में उन्होंने जो कुछ वर्णन किया उन सबसे उनकी अनन्त महिमा के महत्त्व को आँका नहीं जा सकता क्योंकि अनन्त ब्रह्माण्डों की समस्त सृष्टि उनके एक अंश में स्थित है। वे यहाँ पर अपने अंश का उल्लेख क्यों कर रहे हैं?
इसका कारण है कि असंख्य ब्रह्माण्डों की सारी भौतिक सृष्टियाँ भगवान का केवल एक चौथाई अंश हैं। शेष तीन चौथाई आध्यात्मिक अभिव्यक्तियाँ हैं।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।
(पुरुष सूक्तम् मंत्र-3)
"भौतिक शक्ति से निर्मित अस्थायी संसार पुरुषोत्तम भगवान का केवल एक अंश है। अन्य तीन अंश उनके नित्य लोक हैं जो जन्म और मृत्यु से परे हैं।"
यह अत्यंत रोचक विषय है कि श्रीकृष्ण इस संसार में अर्जुन के सम्मुख खड़े हैं फिर भी वे यह कहते हैं कि समस्त संसार उनके स्वरूप का एक अंश है। यह गणेश और भगवान शिव की कथा के समान है। एक बार नारद मुनि ने भगवान शिव को एक विशेष फल दिया। भगवान शिव के दो पुत्र कार्तिकेय और गणेश उनसे उस फल की माँग करने लगे। भगवान शिव ने सोचा कि यदि वह किसी एक पुत्र को फल देते हैं तब दूसरा पुत्र सोचेगा कि उनके पिता पक्षपाती हैं। इसलिए भगवान शिव ने दोनों पुत्रों के लिए प्रतियोगिता की घोषणा की कि जो भी पूरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा पहले करके लौटेगा, फल उसे मिलेगा।
यह सुनकर कार्तिकेय ने तत्काल ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करना आरम्भ कर दी। वह बलिष्ठ और शक्तिशाली थे और उन्होंने इसका लाभ उठाना चाहा। उसकी अपेक्षा गणेश मोटे शरीर वाले थे और वे अपने भाई के साथ प्रतिस्पर्धा करने में स्वयं को असहाय मानते थे। इसलिए उन्होंने बुद्धि का सदुपयोग करने का निश्चय किया। भगवान शिव और पार्वती वहीं खड़े थे। गणेश ने उनकी तीन बार परिक्रमा की और घोषणा की-“पिताजी मैंने आपकी आज्ञा का पालन कर लिया कृपया मुझे फल प्रदान करें।" भगवान शिव ने कहा-"तुमने ब्रह्माण्ड की परिक्रमा कैसे कर ली तुम तो अब तक हमारे ही पास खड़े थे।" गणेश ने कहा-"पिताजी आप भगवान हैं। समस्त ब्रह्माण्ड आपके भीतर विद्यमान हैं।" भगवान शिव को इससे सहमत होना पड़ा कि उनका पुत्र गणेश बुद्धिमान है और वास्तव में उसने प्रतियोगिता में विजय प्राप्त की है।
जिस प्रकार भगवान शिव एक स्थान पर खड़े थे फिर भी सारा संसार उनमें समाविष्ट था, समान रूप से श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि असंख्य भौतिक ब्रह्माण्डों की सृष्टि उनके स्वरूप के एक अंश के रूप में उनमें स्थित है।
।। श्रीमद्भगवत गीता का दशम अध्याय सम्पूर्ण हुआ।।
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