॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Maiya More Mai Nahi Makhan Khayo
मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो
Surdas Ji
Kavi: Surdas Ji
मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो ।
भोर भयो गैयन के पाछे, मधुवन मोहिं पठायो ॥
चार पहर वंशीवट भटक्यो, साँझ परे घर आयो ।
मैं बालक बैंयन को छोटो, छींको केहि बिधि पायो ॥
ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो ।
तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे पतिआयो ॥
जिय तेरे कछु भेद उपज है, जानि परायो जायो ।
यह ले अपनी लकुट कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो ॥
सूरदास तब विहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो ॥
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