॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Bhajan Bin Kukar Sukar Jaiso
भजन बिनु कूकर सूकर जैसो
भजन बिनु कूकर−सूकर−जैसो।
जैसैं घर बिलाव के मूसा, रहत बिषय−बस वैसौ॥
बग−बगुली अरु गीध−गीधिनी, आइ जनम लियौ तैसौ।
उनहू कैं गृह, सुत, दारा हैं, उन्हैं भेद कहु कैसौ?
जीव मारि कै उदर भरत हैं, तिन कौ लेखौ ऐसौ।
सूरदास भगवंत−भजन बिनु, मनौ ऊँट−बृष−भैंसौ॥
भजन किए बिना तो कुत्ते या सूअर के समान मनुष्य-जीवन है। जैसे बिल्लीवाले घर में चूहे (सदा मृत्यु के ग्रास बने रहते हैं), वैसे ही (मनुष्य भी) विषय−वासना के वश हुआ मृत्यु के चंगुल में रहता है। जैसे बगुले−बगुली और गिद्ध−गिद्धनी जन्म लेते हैं, वैसे ही उसने भी पृथ्वी पर व्यर्थ जन्म लिया है। बगुले−गिद्ध आदि के भी घर, पुत्र, स्त्री आदि तो हैं ही; फिर मनुष्य का उनसे किस बात में भेद कहा जाए। जो लोग दूसरे जीवों को मार कर अपना पेट भरते हैं, उनकी गणना तो बगुले−गिद्ध में ही है। सूरदास कहते हैं−भगवान का भजन किए बिना तो मनुष्य ऊँट, बैल और भैंसे के समान ही है।
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