॥ नाहं स्मरामि कृष्णं तु राधास्मरणवर्जितम् ॥
सूरदास जी - पद
Surdas Ji - Pads
Pads (7)
Akhiyan Hari Darshan Ki Pyaasi
padSurdas Ji
अखियाँ हरि-दरसन की प्यासी ।
देख्यो चाहति कमल-नैन को, निसि-दिन रहति उदासी ॥
आए ऊधो फिरि गए आँगन, डारि गए गर फाँसी ।
केसर तिलक मोतिन की माला, वृंदावन के वासी ॥
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिन, लेवत करवट फाँसी ॥
Maiya More Mai Nahi Makhan Khayo
padSurdas Ji
मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो ।
भोर भयो गैयन के पाछे, मधुवन मोहिं पठायो ॥
चार पहर वंशीवट भटक्यो, साँझ परे घर आयो ।
मैं बालक बैंयन को छोटो, छींको केहि बिधि पायो ॥
ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो ।
तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे पतिआयो ॥
जिय तेरे कछु भेद उपज है, जानि परायो जायो ।
यह ले अपनी लकुट कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो ॥
सूरदास तब विहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो ॥
Mero Man Anat Kha Sukh Pave
padSurdas Ji
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे ।
जैसे उड़ि जहाज को पंछी, फिरि जहाज पर आवे ॥
कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावे ।
परम गंग को छाँड़ि पियासो, दुरमति कूप खनावे ॥
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल खावे ।
सूरदास प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावे ॥
Sabse Unchi Prem Sagai
padSurdas Ji
सबसे ऊंची प्रेम सगाई
दुर्योधन के मेवा त्याग्यो, साग विदुर घर खाई |
जूठे फल शबरी के खाये, बहु विधि स्वाद बताई |
राजसूय यज्ञ युधिष्ठिर कीन्हा, तामे जूठ उठाई |
प्रेम के बस पारथ रथ हांक्यो, भूल गये ठकुराई |
ऐसी प्रीत बढ़ी वृन्दावन, गोपियन नाच नचाई |
प्रेम के बस नृप सेवा कीन्हीं, आप बने हरि नाई |
गीध को गोद में ले रघुवर ने, अश्रु धार बहाई ।
सूर क्रूर एहि लायक नाहीं, केहि लगो करहुं बड़ाई |
Udho Tum Ho Ati Badbhagi
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ऊधो! तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेहतगा तें, नाहिंन मन अनुरागी॥
पुरइनि-पात रहत जल-भीतर ता रस देह न दाग़ी।
ज्यों जल मांह तेल की गागरि बूँद न ताके लागी॥
प्रीति-नदी में पाँव न बोर्यो, दृष्टि न रूप परागी।
सूरदास अबला हम भोरी गुर चींटी ज्यों पागी॥
गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव, तुम्हीं सबसे अच्छे और भाग्यशाली हो जो समस्त प्रेम-सूत्रों से अनासक्त हो और किसी में भी तुम्हारा मन अनुरक्त नहीं है। तात्पर्य यह है कि तुम अत्यंत अभागे हो जो प्रेम-रस को नहीं समझते। तुम्हारी दशा तो उस कमल-पत्र की भाँति है जिसने जल के भीतर रहते हुए भी जल से अपने शरीर में दाग़ नहीं लगाया। आशय यह है कि तुम रहते तो श्रीकृष्ण के निकट हो, लेकिन उनके प्रेम से सदैव अनासक्त रहे। यही नहीं, जैसे जल में तेल की गगरी को डुबा दिया जाए तो उस पर जल की एक बूँद भी नहीं रुकती। तुम प्रेम के संबंध में क्या जानो जब कि तुमने कभी न तो प्रेम की नदी में अपने पाँव को निमज्जित किया और न श्रीकृष्ण के सौंदर्य पराग में तुम्हारी दृष्टि ही अनुरक्त हुई। सूरदास के शब्दों में गोपियों का कथन है कि सबसे पगली और भोली-भाली हम अबलाएँ ही हैं जो गुड़ और चींटी की भाति श्रीकृष्ण की रूप-माधुरी में चिपट गईं।
Bhajan Bin Kukar Sukar Jaiso
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भजन बिनु कूकर−सूकर−जैसो।
जैसैं घर बिलाव के मूसा, रहत बिषय−बस वैसौ॥
बग−बगुली अरु गीध−गीधिनी, आइ जनम लियौ तैसौ।
उनहू कैं गृह, सुत, दारा हैं, उन्हैं भेद कहु कैसौ?
जीव मारि कै उदर भरत हैं, तिन कौ लेखौ ऐसौ।
सूरदास भगवंत−भजन बिनु, मनौ ऊँट−बृष−भैंसौ॥
भजन किए बिना तो कुत्ते या सूअर के समान मनुष्य-जीवन है। जैसे बिल्लीवाले घर में चूहे (सदा मृत्यु के ग्रास बने रहते हैं), वैसे ही (मनुष्य भी) विषय−वासना के वश हुआ मृत्यु के चंगुल में रहता है। जैसे बगुले−बगुली और गिद्ध−गिद्धनी जन्म लेते हैं, वैसे ही उसने भी पृथ्वी पर व्यर्थ जन्म लिया है। बगुले−गिद्ध आदि के भी घर, पुत्र, स्त्री आदि तो हैं ही; फिर मनुष्य का उनसे किस बात में भेद कहा जाए। जो लोग दूसरे जीवों को मार कर अपना पेट भरते हैं, उनकी गणना तो बगुले−गिद्ध में ही है। सूरदास कहते हैं−भगवान का भजन किए बिना तो मनुष्य ऊँट, बैल और भैंसे के समान ही है।
Mukh Dadhi Lep Kiye
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मुख दधि लेप किए
सोभित कर नवनीत लिए।
घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए॥
चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक दिए।
लट लटकनि मनु मत्त मधुप गन मादक मधुहिं पिए॥
कठुला कंठ वज्र केहरि नख राजत रुचिर हिए।
धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिए॥