॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Hari Bin Kun Gati Meri
हरि बिन कूण गति मेरी
हरि बिन कूण गति मेरी।
तुम मेरे प्रतिकूल कहिए मैं रावरी चेरी॥
आदि अंत निज नाँव तेरो हीया में फेरी।
बेरी-बेरी पुकारि कहूँ प्रभु आरति है तेरी॥
यौ संसार विकार सागर-बीच में घेरी।
नाव फाटी प्रभु पालि बाँधो बूड़त है बेरी॥
विरहणि पिव की बाट जोवै राखि ल्यौ नेरी।
दासि मीरा राम रटन है मैं सरण हूँ तेरी॥
हरि के बग़ैर मेरी कौन गति! तुम मेरे ख़िलाफ़ कुछ भी कहो लेकिन मैं तो अपने राव कृष्ण की ग़ुलाम हूँ। शुरू से अंत तक मैं हृदय में तुम्हारा ही नाम लेती हूँ। मैं बार-बार पुकारकर कहती हूँ प्रभु, मैं तुझ पर क़ुर्बान हूँ। यह दुनिया विकारों का समुद्र है जिसमें मैं घिरी हुई हूँ। मेरी नाव टूटी हुई है।हे प्रभु! तुम इसमें पाल लगा दो, नहीं तो मैं डूब जाऊँगी। विरह की मारी मैं अपने पिया का रास्ता देखती हूँ, तुम मुझे अपने पास रख लो। दासी मीरा राम का नाम रटती है और कहती है कि मैं तेरी शरण में हूँ।
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