॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Nahi Bhave Tharo Desalado Rangrudo
नहिं भावै थारो देसलड़ो रंगरुड़ो
Meera Bai Ji
Kavi: Meera Bai Ji
नहिं भावै थारो देसलड़ो रंगरुड़ो।
थाराँ देसाँ में राणा साध नहीं छै लोग बसै सब कूड़ो॥
गहणा गाँठी राना हम सब त्याग्या त्याग्यो है बाँधना जूड़ो।
मेवा मिसरी हम सब ही त्याग्या त्याग्या छै सक्कर बूरो॥
तन की आस कबहूँ नहिं कीनी ज्यूँ रण माहि सूरो।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर वर पायो म्हे पूरो॥
हे राणा! तेरे देस के रंग-ढंग अच्छे नहीं लगते। राणा, तेरे देस में साधु नहीं, सब नाकारा लोग बसते हैं। हमने गहना-पाती सब छोड़ दिया; हमने काजल-टीका-सब छोड़ दिया, जूड़ा बाँधना भी त्याग दिया। मेवा-मिस्री और शक्कर का चूरा, हमने यह सब ही छोड़ दिया है। शरीर की परवा कभी नहीं की, जैसे मैदान-ए-जंग में बहादुर परवाह नहीं करता। मीरा के प्रभु गिरधर नागर मैंने पूरा वर पा लिया।
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