॥ नाहं स्मरामि कृष्णं तु राधास्मरणवर्जितम् ॥
मीराबाई जी - पद
Meera Bai Ji - Pads
Pads (16)
Mero Toh Girdhar Gopal Dusro Na Koi
padMeera Bai Ji
मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई ।
जाके सिर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई ॥
तात-मात-भ्रात-बंधु, आपनो न कोई ।
छाँड़ि दई कुल की कानि, कहा करिहै कोई ॥
संतन ढिग बैठि-बैठि, लोक-लाज खोई ।
अब तो बात फैल गई, जाणत सब कोई ॥
अंसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोई ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, जो होणी सो होई ॥
Payo Ji Maine Ram Ratan Dhan Payo
padMeera Bai Ji
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो ॥
जनम-जनम की पूँजी पायी, जग में सभी खोवायो ।
खरचै नहिं कोई चोर न लेवै, दिन-दिन बढ़त सवायो ॥
सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख-हरख जस गायो ॥
Mai Girdhar Ke Ghar Jau
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मैं गिरधर के घर जाऊँ।
गिरधर म्हाँरो साँचो प्रीतम
देखत रूप लुभाऊँ॥
रैण पड़ै तब ही उठ जाऊँ
भोर भये उठ आऊँ।
रैण दिना वा के संग खेलूँ
ज्यूँ त्यूँ ताही रिझाऊँ॥
जो पहिरावै सोई पहिरूँ
जो दे सोई खाऊँ।
मेरी उण की प्रीत पुराणी
उण बिन पल न रहाऊँ॥
जहाँ बैठावें तितही बैठूँ
बेचै तो बिक जाऊँ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर
बार-बार बलि जाऊँ॥
मैं गिरधर के घर जाती हूँ। गिरधर मेरा सच्चा प्रीतम है। जिसका हुस्न देखकर मेरा दिल ख़ुश हो जाता है। रात होते ही मैं उठकर चली जाती हूँ। रात-दिन उसके साथ खेलती हूँ और हर मुमकिन तरीक़े से उसे रिझाती हूँ। जो वह पहनाता है वही पहनती हूँ। जो देता है वही खाती हूँ, मेरी उनकी मुहब्बत बहुत पुरानी है, उसके बग़ैर एक पल नहीं रह सकती। वह जहाँ बिठाएगा वहीं बैठ जाऊँगी और अगर बेचेगा तो बिक जाऊँगी। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, उन पर क़ुर्बान जाऊँ।
Nahi Bhave Tharo Desalado Rangrudo
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नहिं भावै थारो देसलड़ो रंगरुड़ो।
थाराँ देसाँ में राणा साध नहीं छै लोग बसै सब कूड़ो॥
गहणा गाँठी राना हम सब त्याग्या त्याग्यो है बाँधना जूड़ो।
मेवा मिसरी हम सब ही त्याग्या त्याग्या छै सक्कर बूरो॥
तन की आस कबहूँ नहिं कीनी ज्यूँ रण माहि सूरो।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर वर पायो म्हे पूरो॥
हे राणा! तेरे देस के रंग-ढंग अच्छे नहीं लगते। राणा, तेरे देस में साधु नहीं, सब नाकारा लोग बसते हैं। हमने गहना-पाती सब छोड़ दिया; हमने काजल-टीका-सब छोड़ दिया, जूड़ा बाँधना भी त्याग दिया। मेवा-मिस्री और शक्कर का चूरा, हमने यह सब ही छोड़ दिया है। शरीर की परवा कभी नहीं की, जैसे मैदान-ए-जंग में बहादुर परवाह नहीं करता। मीरा के प्रभु गिरधर नागर मैंने पूरा वर पा लिया।
Shri Radhe Rani De Daro Bansuri Mori
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श्रीराधे रानी दे डारो बाँसुरी मोरी।
जा बंसी में मेरी प्राण बसत है, सो बंसी गई चोरी॥
काहे से गाऊँ प्यारी काहे से बजाऊँ, काहे से लाऊँ गईयाँ फेरी।
मुख से गावो कान्हा हाथों से बजाओ, लकुटी से लाओ गईयाँ घेरी॥
हा हा करत तेरे पैयाँ परत हूँ, तरस खाओ प्यारी मोरी।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बंसी लेकर छोरी॥
राधे रानी! मेरी बाँसुरी मुझे दे दो। जिस बाँसुरी में मेरी जान है वही बाँसुरी चोरी चली गई। अब मैं किससे गाऊँ, किससे बजाऊँ और गायों को कैसे वापस बुलाऊँ? कन्हैया, तुम मुँह से गाओ, हाथों से बजाओ और लाठी से गायों को वापस ले जाओ। मैं तुम्हारी मिन्नत करता हूँ। तुम्हारे पाँव पड़ता हूँ। मेरी प्यारी मुझ पर तरस खाओ। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, मेरी बाँसुरी लेकर छीन लो।
Shyam Mhane Chakar Rakho Ji
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एक
हरि आप हरो जन री भीर।
द्रोपदी री लाज राखी, आप बढ़ायो चीर।
भगत कारण रूप नरहरि, धर्यो आप सरीर।
बूढ़तो गजराज राख्यो, काटी कुण्जर पीर।
दासी मीराँ लाल गिरधर, हरो म्हारी भीर॥
दो
स्याम म्हाने चाकर राखो जी,
गिरधारी लाला म्हाँने चाकर राखोजी।
चाकर रहस्यूँ बाग लगास्यूँ नित उठ दरसण पास्यूँ।
बिन्दरावन री कुंज गली में, गोविन्द लीला गास्यूँ।
चाकरी में दरसण पास्यूँ, सुमरण पास्यूँ खरची।
भाव भगती जागीरी पास्यूँ, तीनूं बाताँ सरसी।
मोर मुगट पीताम्बर सौहे, गल वैजन्ती माला।
बिन्दरावन में धेनु चरावे, मोहन मुरली वाला।
ऊँचा ऊँचा महल बणावं बिच बिच राखूँ बारी।
साँवरिया रा दरसण पास्यूँ, पहर कुसुम्बी साड़ी।
आधी रात प्रभु दरसण, दीज्यो जमनाजी रे तीरां।
मीराँ रा प्रभु गिरधर नागर, हिवड़ो घणो अधीराँ॥
Bhor Or Barkha
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जागो बंसीवारे ललना!
जागो मोरे प्यारे!
रजनी बीती, भोर भयो है, घर-घर खुले किंवारे।
गोपी दही मथत, सुनियत हैं कंगना के झनकारे॥
उठो लालजी! भोर भयो है, सुर-नर ठाढ़े द्वारे।
ग्वाल-बाल सब करत कुलाहल, जय-जय सबद उचारै॥
माखन-रोटी हाथ मँह लीनी, गउवन के रखवारे।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, सरण आयाँ को तारै॥
बरसे बदरिया सावन की।
सावन की मन-भावन की॥
सावन में उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन की।
उमड़-घुमड़ चहुँदिस से आया, दामिन दमकै झर लावन की॥
नन्हीं-नन्हीं बूँदन मेहा बरसे, शीतल पवन सुहावन की।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर! आनंद-मंगल गावन की॥
Ranaji Mhe To Govind Ka Gun Gansya
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राणाजी म्हें तो गोविंद का गुण गास्याँ।
चरणामृत को नेम हमारो नित उठ दरसण जास्याँ॥
हरि मंदिर में निरत करास्याँ घुँघरियाँ घमकास्याँ।
राम नाम का झाँझ चलास्याँ भव सागर तर जास्याँ॥
यह संसार बाड़ का काँटा ज्याँ संगत नहिं जास्याँ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर निरख परख गुण गास्याँ॥
राणाजी, मैं तो गोविंद का गुण गाऊँगी। चरण-अमृत लेना मेरा दस्तूर है इसलिए हमेशा सवेरे उठकर दर्शन को जाऊँगी। हरि मंदिर में नाचूँगी और घुँघरू झनकाऊँगी। राम नाम झाँझ पर गाऊँगी और भवसागर से पार हो जाऊँगी। यह संसार अहाते का काँटा है, जिसको साथ नहीं ले जाऊँगी। मीरा के प्रभु गिरधर नागर जाँच-परखकर गुण गाऊँगी।
Lagi Mohe Shyam Khumari Ho
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लागी मोहे श्याम खुमारी हो।
रमझम बरसै मेहंड़ा भीजै तन सारी हो॥
चहूँदिस चमकै दामणी गरजै घन भारी हो।
सत गुरु भेद बताइया खोली भरम किवारी हो॥
सब घट दीसै आतमा सबही सूँ न्यारी हो।
दीपग जोऊँ ग्यान का चढूँ अगम अटारी हो।
मीरा दासी श्याम की इमरत बलिहारी हो॥
मैं राम-नाम के नशे में चूर हूँ। रिमझिम पानी बरसता है और मेरी देह और साड़ी इसमें भीग गई है। चारों ओर बिजली चमकती है और ज़ोर से बादल गरजते हैं। सतगुरु ने भ्रम के तमाम दरवाज़ों को खोलकर रहस्य की बात बता दी। आत्मा हर देह में दिखाई देती है फिर भी सबसे विलग रहती है। मैं ज्ञान का दिव्य प्रकाश देखकर अगम की अटारी पर चढ़ जाती हूँ। मीरा कहती है कि राम के अमृत की बलिहारी है।
Hari Bin Kun Gati Meri
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हरि बिन कूण गति मेरी।
तुम मेरे प्रतिकूल कहिए मैं रावरी चेरी॥
आदि अंत निज नाँव तेरो हीया में फेरी।
बेरी-बेरी पुकारि कहूँ प्रभु आरति है तेरी॥
यौ संसार विकार सागर-बीच में घेरी।
नाव फाटी प्रभु पालि बाँधो बूड़त है बेरी॥
विरहणि पिव की बाट जोवै राखि ल्यौ नेरी।
दासि मीरा राम रटन है मैं सरण हूँ तेरी॥
हरि के बग़ैर मेरी कौन गति! तुम मेरे ख़िलाफ़ कुछ भी कहो लेकिन मैं तो अपने राव कृष्ण की ग़ुलाम हूँ। शुरू से अंत तक मैं हृदय में तुम्हारा ही नाम लेती हूँ। मैं बार-बार पुकारकर कहती हूँ प्रभु, मैं तुझ पर क़ुर्बान हूँ। यह दुनिया विकारों का समुद्र है जिसमें मैं घिरी हुई हूँ। मेरी नाव टूटी हुई है।हे प्रभु! तुम इसमें पाल लगा दो, नहीं तो मैं डूब जाऊँगी। विरह की मारी मैं अपने पिया का रास्ता देखती हूँ, तुम मुझे अपने पास रख लो। दासी मीरा राम का नाम रटती है और कहती है कि मैं तेरी शरण में हूँ।
Chala Vahi Desh
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चालाँ वाही देस प्रीतम पावाँ चलाँ वाही देस।
कहो तो कुसुमल साड़ी रंगावाँ, कहो तो भगवा भेस॥
कहो तो मोतियन माँग भरावाँ, कहो छिरकावाँ केस।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, सुण गयो बिड़द नरेस॥
चलो सखी! उसी देस को चलो जहाँ प्रीतम मिलेंगे। कहो तो कुसुंबल साड़ी रँगा लूँ। कहो तो भगवा भेष पहन लूँ। कहो तो अपनी माँग मोतियों से भरवा लूँ, कहो तो बाल बिखेर लूँ। मीरा के प्रभु गिरधर नागर हैं। यह बात महाराज को सुना दी गई है।
Baso Mere Nainan Mai Nandlal
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बसो मेरे नैनन में नंदलाल।
मोहनी मूरत, साँवरी सूरत, नैना बने बिसाल।
अधर सुधारस मुरली राजत, उर बैजंती माल॥
छुद्रघंटिका कटितट सोभित, नूपुर सबद रसाल।
मीरां प्रभु संतन सुखदाई भगत बछल गोपाल॥
ऐ नंदलाल, मेरी आँखों में आ बसो। कैसी मोहनी मूरत, कैसी साँवली सूरत है। आँखें कितनी बड़ी हैं! तुम्हारे चरणों पर गीतों के रस से भरी हुई बाँसुरी सजी हुई है और सीने पर वैजयंती माला है। कमर के गिर्द छोटी-छोटी घंटियाँ सजी हुई हैं और पैरों में बँधे हुए नूपुर मीठी आवाज़ में बोल रहे हैं। ऐ मीरा के प्रभु, तुम संतों के सुख पहचानते हो और अपने भक्तों के संरक्षक हो।
Jogiya Ri Preetadi Hai Dukhda Ri Mul
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जोगिया री प्रीतड़ी है दुखड़ा री मूल।
हिलमिल बात बणावट मीठी पाछे जावत भूल॥
तोड़त जेज करत नहिं सजनी जैसे चमेली के मूल।
मीरा कहे प्रभु तुमरे दरस बिन लगत हिवड़ा में सूल॥
जोगी की प्रीति तमाम दु:खों की मूल है। जोगी पहले हिल-मिलकर मीठी-मीठी बातें बनाते हैं, और बाद में भूल जाते हैं। इस मुहब्बत को उतनी ही आसानी से तोड़ देते हैं जैसे चमेली का फूल। मीरा कहती है कि हे प्रभु! तुम्हारे दर्शन के बिना दिल में काँटे से चुभते हैं।
Heri Mai To Prem Diwani
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हे री मैं तो प्रेम दिवानी, मेरा दरद न जाने कोय।
सूली ऊपर सेज हमारी, किस बिध सोना होय।
गगन मंडल पर सेज पिया की, किस बिध मिलना होय॥
घायल की गति घायल जानै, कि जिन लागी होय।
जौहरी की गति जौहरी जाने, कि जिन लागी होय॥
दरद की मारी बन बन डोलूँ वैद मिल्यो नहीं कोय।
मीरां की प्रभु पीर मिटै जब वैद सांवलया होय॥
ऐ सखी, मैं तो इश्क में दीवानी हो गई हूँ, मेरा दर्द कोई नहीं जानता। हमारी सेज सूली पर है, भला नींद कैसे आ सकती है! और मेरे महबूब की सेज आसमान पर है। आख़िर कैसे मुलाक़ात हो। घायल की हालत तो घायल ही जान सकता है, जिसने कभी जख़्म खाया हो; जौहरी के जौहर को जौहरी ही पहचान सकता है बशर्ते कि कोई जौहरी हो। दर्द से बेचैन होकर जंगल-जंगल मारी फिर रही हूँ और कोई मुआलिज मिलता नहीं मेरे मालिक। मीरा का दर्द तो उस वक़्त मिटेगा जब सलोने-साँवले कृष्ण इसका इलाज करेंगे
Mere To Girdhar Gopal
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मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।
माता छोड़ी पिता छोड़े छोड़े सगा सोई।
साधाँ संग बैठ बैठ लोक लाज खोई॥
संत देख दौड़ि आई, जगत देख रोई।
प्रेम आँसू डार-डार अमर बेल बोई॥
मारग में तारण मिले संत नाम दोई।
संत सदा सीस पर नाम हृदै सब होई॥
अब तो बात फैल गई, जानै सब कोई।
दासि मीरा लाल गिरधर, होई सो होई॥
गिरधर गोपाल के सिवा और कौन है जिसे मैं अपना कहूँ! उनके लिए माँ, बाप अज़ीज़-व-अक़ारिब सभी को छोड़ दिया और साधुओं के साथ बैठ-बैठकर अपने दुनियावी शर्म-व-हया तक को छोड़ दिया। जब कोई संत दिखाई दिया तो दौड़कर उसके साथ हो ली, और जब दुनिया सामने आई तो रोने लगी। मैंने मुहब्बत के आँसुओं से इश्क़ की अमरबेल को सींचा है, संतों को सिर पर बिठाया और उसके पाक नाम की माला जपती रही हूँ। अब तो बात फैल चुकी है और मेरा राज़ सबको मालूम हो गया है। मीरा तो गिरधरलाल की दासी बन चुकी है अब जो होना है, सो होगा।
Ab To Hari Naam Lou Lagi
padShrijirasik
मीराबाई पद ॥
राग मिश्र काफी-ताल त्रिताल
अब तौ हरी नाम लौ लागी
सब जग को यह माखन चौरा,
नाम धरयो बैरागीं॥
अब तौ हरी नाम लौ लागी...
कित छोड़ी वह मोहन मुरली,
कित छोड़ी सब गोपी।
अब तौ हरी नाम लौ लागी...
मूड़ मुड़ाइ डोरि कटि बांधी,
मात्थै मोहन टोपी॥
अब तौ हरी नाम लौ लागी...
मात जसोमति माखन-कारन,
बांधे जाके पांव।
अब तौ हरी नाम लौ लागी...
स्याम किसोर भयो नव गौरा,
चैतन्य जाको नांव॥
अब तौ हरी नाम लौ लागी...
पीतांबर को भाव दिखावै,
कटि कोपीन कसै।
गौर कृष्ण की दासी मीरा,रसना कृष्ण बसै॥
अब तौ हरी नाम लौ लागी...