॥ राधे राधे ॥

श्रीगणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीमद् गोस्वामि तुलसीदास-कृत
रामचरितमानस
प्रथम सोपान
बालकाण्ड
अनुष्टुप्-वृत्त।
श्लोक —
वर्णानामर्थसङ्घनां रसानां छन्दसामपि।
मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥१॥
अक्षर, अर्थ-समूह, रस, छन्द और मङ्गल के करनेवाले सरस्वती और गणेशजी को मैं प्रणाम करता हूँ॥१॥
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥२॥
श्रद्धा और विश्वास रूपी भवानी-शङ्कर की मैं वन्दना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने हृदय में स्थित ईश्वर को नहीं देखते ॥२॥
श्रद्धा में पार्वती के आरोप और विश्वास में शिवजी के आरोप से 'सम अभेद रूपक अलङ्कार' है। उत्तराद्ध में अर्थ का श्लेष है अर्थात् जिस श्रद्धा-विश्वास के बिना और जिन पार्वतीशिव के बिना सिद्ध पुरुषों को हृदयस्थ ईश्वर नहीं देख पड़ते।
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं, शङ्कररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥३॥
ज्ञानमय, नित्य, शंकर रूपी गुरु की मैं वंदना करता हूँ, जिनका आश्रित हो कर टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है॥३॥
ज्ञानरूप नित्य गुरु में शङ्कर का आरोप 'सम अभेद रूपक' है । शिवजी के गुण से टेढ़े चन्द्र का गुणवान होना 'प्रथम उल्लास' है। संज्ञा साभिप्राय है, क्योंकि गोस्वामीजी अपनी बुद्धि को मलिन मान कर वन्दना करते हैं कि जिन्होंने वक्र चन्द को वन्दनीय बनाया वे मेरी मति निर्मल कर देंगे 'परिकराङ्कुर अलंकार की ध्वनि' है।
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥४॥
सीता और रामचन्द्रजी के गुण-समूह रूपी पवित्र वन में बिहार करनेवाले विशुद्ध विज्ञानसम्पन्न कवीश्वर (वाल्मीकि मुनि) और कपीश्वर (हनूमानजी) की मैं वन्दना करता हूँ॥४॥
मुनि और बन्दर कानन-विहारी होते हैं, इसलिये सीताराम के गुण-ग्राम में वन का आरोपण किया गया है। सब वन पुनीत नहीं होते, पर इसमें पवित्रता का गुण 'अधिक अभेद रूपक' है।
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥५॥
उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाली, फ्लेशों के हरनेवाली, सम्पूर्ण कल्याणों के करने वाली, रामचन्द्र की प्रियतमा सीताजी को मैं नमस्कार करता हूँ॥५॥
शार्दूलविक्रीडित-वृत्त।
यन्मायावशवर्त्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुराः।
यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाऽहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लव एक एव हि भवास्सोधेस्तितीविताम्।
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥६॥
जिनको माया के वश में सम्पूर्ण संसार ब्रह्मादिक देवता और देत्य हैं, जिनके बल से झूठा यह सारा जगत् रस्सी में साँप के भ्रम के समान सत्यप्रतीत होता है। जिनके चरण ही संसार-सागर से पार जाने की इच्छा रखनेवालों के लिये एकमात्र नौका-स्वरूप है, समस्त कारणों से परे जिनका नाम राम है, उन ईश्वर विष्णु भगवान को मैं प्रणाम करता हूँ॥६॥
ग्रन्थारम्भ में नमस्कारात्मक, वस्तु निर्देशात्मक और आशीर्वादात्मक तीन प्रकार के मङ्गलाचरण होते हैं। गोस्वामीजी ने नमस्कारात्मक मङ्गलाचरण किया है।
वसन्ततिलका-वृत्त।
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखायतुलसी रघुनाथगाथाभाषानिवन्धमतिमञ्जुलमातनोति॥७॥
नाना पुराण वेद और शास्त्र की सम्मति के अनुसार तथा जो रामायणों में वर्णित है, और कुछ अन्यत्र से भी श्रीरघुनाथजी की कथा को तुलसीदास अपने अन्तःकरण के सुख के लिए अत्यन्त मनोहर भाषा की रचना से विस्तृत करता है॥७॥
'कचिदन्यतोऽपि' पर लोग शङ्का करते हैं कि जब वेद, शास्त्र, पुराण, रामायण कह चुके तो "कुछ अन्यत्र" से कौन सा तात्पर्य है? उत्तर -स्मृति, नाटक आदि, लोकोक्तियाँ और अपना विचार रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा इत्यादि।
सोरठा-जेहि सुमिरत सिधि होइ, गन-नायक करि-बर-बदन।
करउ अनुग्रह सोइ, बुद्धि-रासि सुभ-गुन-सदन॥
जिनके स्मरण ले (सम्पूर्ण मनोरथ) सिद्ध होते हैं, गुणों के मालिक, हाथी के समान सुन्दर मुखवाले बुद्धि की राशि और अच्छे गुणों के स्थान श्रीगणेशजी मुझ पर कृपा करें।
'बुद्धिराशि', 'सुभ-सुगुन-सदन' और 'गननायक' संज्ञाएँ साभिप्राय है, क्योंकि बुद्धि की राशि ही बुद्धि निर्मल कर सकती है। शुभ-गुणों का स्थान ही गुणवान् बना सकता है और गणों का स्वामी ही कामना सिद्ध करने में समर्थ हो सकता है। यह 'परिकराङ्कर अलंकार' है।
मूक होइ बाचाल, पङ्गु चढ़इ गिरिवर गहन।
जासु कृपा सो दयाल, द्रवउ सकल-कलिमल-दहन॥
जिनकी कृपा से गूंगा बोलनेवाला होता है और पंगुल दुरारोह पहाड़ पर बढ़ जाता है, कलि के सम्पूर्ण पापों को जलानेवाले वे (सूर्य भगवान) मुझ पर प्रसन्न हों।
गूंगे को वाचाल कथन और पंगु को ऊँचे दुर्गम पर्वत पर चढ़नेवाला कहने में किया विरोध का आभास 'विरोधासास अलंकार' है। इसमें भी सब संज्ञाएँ साभिप्राय हैं, रामचरित वर्णन करने में गोसाँई जी, अपने को मूक, पंगु और कलिमल-ग्रस्त मान कर वन्दना करते हैं। जिनकी कृपा से मूक वाचाल होता है; वही बोलने की शक्ति प्रदान करने से समर्थ हो सकता है, जो पंगुल को पर्वत विहारी बनाता है, वही गमन-शक्ति प्रदान कर सकता है और पापों को जलानेवाला ही निष्पाप बना सकता है, यह 'परिकरराङ्कुर अलंकार' है। कोई कोई 'मूक करोति वाचालं' के आधार पर विष्णु भगवान् पर अर्थ घटाते हैं पर विष्णु की वन्दना नीचे के सोरठा में की गई है।
नील-सरोरुह-स्याम, तरुन-अरुन-बारिज नयन।
करउ सो मम उर धाम, सदा छीर-सागर-सयन।
जिनका शरीर नील-कमल के समान श्याम है और नवीन लिखे हुए लाल कमल के समान नेत्र हैं, जो सदा क्षीरसागर में शयन करते हैं, वे (विष्णु भगवान्) मेरे हृदयमन्दिर में निवास करें।
जो क्षीर सागर में शयन करते हैं वे हृदय मन्दिर में निवास कर उसे शुद्ध बनावे, परिकराङ्कुर की ध्वनि है। गुण और निवासस्थान कह कर विष्णु का परिचय कराना, किन्तु नाम न लेना 'प्रथम पर्यायोक्ति अलंकार' है।
कुन्द-इन्दु-सम देह, उमा-रमन करुना-अयन।
जाहि दोन पर नेह, करउ कृपा मर्दन-मयन॥
कुन्द के फूल और चन्द्रमा के समान देहवाले, उमावर, दया के स्थान, कामदेव को भस्म करनेवाले, जिन्हें दीनजनों पर स्नेह है, वे (शिवजी मुझ पर) कृपा करें।
बन्दउँ गुरु-पद-कञ्ज, कृपा-सिन्धु नर-रूप-हरि।
महामोह-तम-पुञ्ज, जासु बचन-रबि-कर-निकर॥
मैं गुरुजी के चरण-कमलों को प्रणाम करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नर रूपी हरि है, जिनके वचन रूपी सूर्य की किरणों से प्रधान रूपी अन्धकारसमूह नष्ट हो जाता है।
चौ॰—बन्दउँ गुरु-पद-पदुम-परागा। सुरुचि-सुबास सरस अनुरागा॥
अमिय मूरि-मय चूरन चारू समन सकल-भव-रुज-परिवारू॥१॥
श्रीगुरु महाराज के चरण-कमलों की धूलि को मैं प्रणाम करता हूँ, जो सुरुचि (प्राप्त होने की उत्कण्ठा) रूपी सुगन्ध और प्रेम रूपी रस से भरी है। वह अमृत को जड़ से बना हुआ चूर्ण है, जिसके सेवन से संसार-सम्बन्धी रोग (काम, क्रोधादि) नष्ट हो जाते हैं॥१॥
सुकृत सम्भू-तन विमल बिभूती। मज्जुल मङ्गल-मोद-प्रसूती॥
जन मन मज्जु मुकुर मल हरनी। किये तिलक गुन-गन बस करनी॥२॥
पुण्य रूपी शङ्कर के शरीर पर शोभित होनेवाली यह स्वच्छ विभूति है और सुन्दर कल्याण तथा आनन्द की माता (उत्पन्न करनेवाली) है। भक्तों के मन रूपी दर्पण की मैल को दूर करनेवाली है और तिलक करने से सम्पूर्ण गुणों को वश में करनेवाली है॥२॥
सुकृत में शम्भु तन का आरोप और गुरु-पद-रज में निर्मल विभूति का आरोपण है। प्रथम रूपक के अन्तर्गत दूसरा रूपक उत्कर्ष का हेतु होने से 'परम्परित' है।
श्रीगुरु-पद-नख मनि-गन-जोती। सुमिरत दिव्य-दृष्टि हिय होती।
दलन मोह-तम सासु प्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥३॥
श्रीगुरु महाराज के चरण-नखों का प्रकाश समूह मणियों का उजाला है, जिसका स्मरण करने से हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है। वह अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करने के लिए सूर्य का प्रकाश है। जिसके हृदय में यह प्रकाश आ जाय उसके बड़े भाग्य हैं॥३॥
उघरहिँ बिमल बिलोचन ही के। मिटहिँ दोष दुख भव-रजनी के॥
सूझहिँ रामचरित-मनि-मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥४॥
इस ज्योति के हृदय में आते ही हृदय के नेत्र खुल जाते हैं और ससार रूपिणी रात्रि के विकार तथा कष्ट मिट जाते हैं। तब रामचरित रूपी मणि-माणिक छिपे हुए जो जहाँ जिस खानि के हैं, ये दिखाई पड़ने लगते हैं॥४॥
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