॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Manusmriti Chapter 8
मनुस्मृति अष्टम अध्याय
।।मनुस्मृति अष्टम अध्याय।।
व्यवहारान्दिदृक्षुस्तु ब्राह्मणैः सह पार्थिवः ।
मन्त्रज्ञैर्मन्त्रिभिश्चैव विनीतः प्रविशेत्सभाम् ॥ 1 ॥
व्यवहार (मुकदमों) को देखने का इच्छुक राजा विद्वान ब्राह्मणों तथा राजनीति एवं व्यवहार में कुशल मंत्रियों के साथ विनीत भाव से राजसभा (राज-न्यायालय) में प्रवेश करे।
. तत्रासीनः स्थितोवापि पाणिमुद्यम्य दक्षिणम्।
विनीतवेशाभरणः पश्येत्कार्याणि कार्यिणाम् ॥ 2 ॥
सुन्दर वेशभूषा धारण किए हुए राजा सभा में खड़े होकर या बैठकर दाएं हाथ को उठाकर सभी कर्मचारियों के कार्यों का निरीक्षण करे।
प्रत्यहं देशदृष्टैश्च शास्त्रदृष्टैश्च हेतुभिः ।
अष्टादशसु मार्गेषु निबद्धानि पृथक् पृथक् ॥ ३ ॥
राजा को प्रतिदिन अठारह तरह के अलग-अलग विभागों में बंटे हुए कार्यों की प्रत्येक दिन शास्त्रीय दृष्टि तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समीक्षा करनी चाहिए।
टिप्पणी-- 18 प्रकार के ये विभाग मुकदमों से संबंधित हैं।
तेषामाद्यामृणादानं निक्षेपोऽस्वामिविक्रयः ।
सम्भूय च समुत्थानं दत्तस्यानप कर्म च ॥4॥
वेतनस्यैव चादानं संविदश्च व्यतिक्रमः ।
क्रयविक्रयानुशयोविवादः स्वामिपालयोः ॥ 5 ॥
सीमाविवादधर्मश्च पारुष्ये दण्डवाचिके ।
स्तेयं च साहसं चैव स्त्रीसंग्रहणमेव च ॥6॥
स्त्रीपुन्धर्मो विभागश्च द्यूतमाह्वय एव च।
पदान्यष्टादशैतानि व्यवहारस्थिताविह ।। 7॥
ये 18 प्रकार के कार्य है-
1. उधार लेकर नहीं देना या बिना उधार दिए ही मांगना
2. धरोहर सम्बन्धित विवाद
3. किसी वस्तु, भूमि आदि का स्वामी नहीं होने पर भी उसे बेच देना
4. साझे के व्यापार से संबंधित विवाद
5. दान में दी हुई वस्तु वापस ले लेना
6. कर्मचारियों को वेतन नहीं देना
7. प्रतिज्ञापत्र में लिखी बात का पालन नहीं करना
8. विक्रय या क्रय संबंधी विवाद
9. पशु पालने वाले तथा पशु के स्वामी के मध्य विवाद
10. सीमा सम्बन्धी विवाद
11. गाली-गलौच करना
12. मारपीट से संबंधित विवाद
13. चोरी करने से संबंधित विवाद
14. बलात् किसी से उसकी वस्तु छीन लेना
15. दूसरे की स्त्री का हरण कर लेना
16. स्त्रियों तथा पुरुषों के अलग-अलग धर्माचार
17. धन के विभाजन संबंधी विवाद
18. जुआ खेलने तथा पशु युद्ध में बाजी लगाने संबंधी विवाद
राजा को इन अट्ठारह प्रकार के विषयों पर विचार करना होता है।
एषु स्थानेषु भूयिष्ठं विवादं चरतां नृणाम्।
धर्म शाश्वतमाश्रित्य कुर्यात्कार्यांविनिर्णयम् ॥ 8॥
राजा को इन 18 विषयों में होने वाले विवाद को लेकर उपस्थित लोगों के पक्षों को सुनकर सनातन धर्म-न्याय के अनुसार अपना निर्णय देना चाहिए।
यदा स्वयं न कुर्यात्तु नृपतिः कार्यदर्शनम्।
तदा नियुज्याद्विद्वांसं ब्राह्मणं कार्यदर्शने ॥ 9॥
इन 18 विषयों में से किसी विषय पर, किसी कारणवश जब राजा स्वयं विचार नहीं कर सके तो उसे निपटाने के लिए किसी योग्य विद्वान ब्राह्मण को नियुक्त करे।
सोऽस्य कार्याणि सम्पश्येत्सभ्यैरेव त्रिभिर्वृतः ।
सभामेव प्रविश्याग्रयामासीनः स्थित एव वा ॥ 10 ॥
तीन सभ्य पुरुषों को साथ लेकर राजा द्वारा नियुक्त ब्राह्मण सभा में प्रवेश करे तथा खड़े होकर एकाग्रता से राजा द्वारा देखे-सुने जाने वाले विषयों को सुने।
यस्मिन्देशे निषीदन्ति विप्राः वेदविदस्त्रयः ।
राज्ञश्चाधिकृतो विद्वान् ब्रह्मणस्तां सभां विदुः ।॥ 11 ॥
जिस देश के राजा की सभा में उसके द्वारा दिए गए अधिकार प्राप्त तीन वेदवेत्ता ब्राह्मण तथा एक विद्वान रहते हों उस राजा की सभा को ब्रह्मा की सभा के समान समझना चाहिए।
धर्मों विद्धस्त्वधर्मेण सभां यत्रापतिष्ठते ।
शल्यं चास्य न कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः ॥ 12 ॥
जिस सभा में अधर्म द्वारा धर्म को बींधा जाता है अर्थात् उसकी हत्या की जाती है और सभा के सदस्य इस अन्याय को दूर नहीं करते वहां जिस अधर्मपूर्ण कांटे से धर्म को बींधा जाता है, वही सभासदों को पीड़ित करता है।
सभां वा न प्रवेष्टव्यं वक्तव्यं वा समञ्जसम् ।
अनुवन्विब्रुन्वापि नरो भवति किल्विषी ॥ 13 ॥
जो ब्राह्मण राजा द्वारा नियुक्त किया जाए वह चाहे सभा में नहीं जाए लेकिन जब वहां जाए तो उसे सच ही बोलना चाहिए। झूठ बोलने या चुप रहने से मनुष्य पर पाप पड़ता है।
यत्र धर्मोह्यधर्मेण सत्यं यत्राऽनृतेन च।
हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ॥ 14 ॥
ऐसी सभा में जहां सभासदों के सम्मुख ही अमृत (झूठ) सत्य को तथा अधर्म धर्म को दबाता है, उस सभा के सभासद इस पाप के कारण शीघ्र ही नाश को प्राप्त होते हैं।
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नोधर्मोहतोऽवधीत् ॥ 15 ॥
जो धर्म की हत्या करता है, धर्म उसका पूरी तरह नाश कर देता है। जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का नाश कभी नहीं करें ताकि सुरक्षित धर्म हमारी रक्षा कर सके।
वृषोहि भगवान्धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्ययम्।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्म न लोपयेत् ॥ 16 ॥
भगवान धर्म को वृष रूप कहते हैं। जो मनुष्य उसका नाश करता है उसे देवतागण 'वृषल' अर्थात धर्म को काटने वाला या शूद्र कहते हैं। अतएव धर्म का नाश नहीं करें।
एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः ।
शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति ॥ 17 ।।
एकमात्र धर्म ही ऐसा मित्र है जो मरने के बाद भी साथ चलता है अन्यथा शारीर का नाश हो जाने के बाद सब कुछ इसी लोक में नष्ट हो जाता है।
पादोऽधर्मस्य कर्तारं पादः साक्षिणमृच्छति ।
पादः सभासदः सर्वान् पादो राजानमृच्छति ॥ 18 ॥
न्यायाधीश द्वारा उचित न्याय नहीं करने पर, अधर्म का पहला चौथाई भाग अधर्म करने वाले को, द्वितीय चौथाई भाग गवाह (द्रष्टा) को, तीसरा चौथाई भाग राजा द्वारा नियुक्त सभा के सदस्यों को तथा चतुर्थ चौथाई भाग राजा को मिलता है। टिप्पणी- अभिप्राय यह है कि राजा न्याय की व्यवस्था इस प्रकार करे कि अधर्म या अन्याय हो ही नहीं सके।
राजा भवत्यनेनास्तु मुच्यन्ते च सभासदः ।
एनो गच्छति कर्तारं निन्दाहों यत्र निन्द्यते ॥ 19 ॥
जब निन्दा योग्य पापी व्यक्ति की निन्दा की जाती है और उसे दण्ड दिया बाता है तो पाप उसके करने वाले (पापी) को ही लगता है। राजा और दण्डाधिकारी पाप भोग से मुक्त हो जाते हैं। 1
जातिमात्रोपजीवी वा कामंस्याद् ब्राह्मणब्रुवः ।
धर्मप्रवक्ता नृपतेर्न तु शूद्रः कथञ्चन ।। 20 11
जो ब्राह्मण केवल जाति से ही ब्राह्मण हो परन्तु वेदवेत्ता नहीं हो तथा राजा को भी धर्म का ज्ञान देने की सामर्थ्य नहीं रखता हो. ऐसा ब्राह्मण पूजा के योग्य नहीं फिर भी उसे शुद्र नहीं समझना चाहिए।
यस्य शूद्रस्तु कुरुते राज्ञो धर्मविवेचनम्।
तस्य सीदति तद्राष्ट्र पङ्के गौरिव पश्यतः ॥ 21 ॥
जिस राजा के राज्य का धर्माधिकारी शूद्र होता है, उस राजा का राज्य देखते. देखते कीचड़ में फंसी गाय के समान दुखग्रस्त हो जाता है।
यद्राष्ट्रं शूद्रभूयिष्ठं नास्तिकाक्रान्तमद्विजम् ।
विनश्यत्याशु तत्कृत्स्नं दुर्भिक्षव्याधिपीडितम् ।। 22 ।।
जिस राज्य में आस्तिकों एवं ब्राह्मणों की जगह शूद्रों तथा नास्तिकों की अधिकता और प्रभुत्व होता है, वह सम्पूर्ण राज्य शीघ्र ही अकाल तथा रोग आदि प्राकृतिक विपदाओं से पीड़ित होकर नष्ट हो जाता है।
धर्मासनमधिष्ठाय संवीताङ्ग समाहितः ।
प्रणम्य लोकपालेभ्यः कार्यदर्शनमाचरेत् ।। 23 ।।
राजा को धर्मासन पर आसीन होकर, अपना शरीर आवृत करके तथा सावधानी से लोकपालों को प्रणाम कर विवादों की सुनवाई शुरू करनी चाहिए।
टिप्पणी - यहां धर्मासन से आशय न्याय करते समय जिस आसन या कुसी का उपयोग किया जाता है उससे है, शरीर को ढकने से अभिप्राय उस विशेष वस्त्र को धारण करने से है जिसे न्यायाधीश पहनते हैं।
अर्थानर्थावुभौ बुद्धवा धर्माधर्मों च केवलौ।
वर्णक्रमेण सर्वाणि पश्येत्कार्याणि कार्यिणाम् ।। 24 ॥
राजा को अर्थ तथा अनर्थ, धर्म एवं अधर्म को अपने ध्यान में रखते हुए वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) के क्रम से लोगों के विवादों को निपटाना चाहिए।
बाद्यैर्विभावयेल्लिङ्गैर्भावमन्तर्गतं नृणाम् । स्वरवर्णेङ्गिताकारैश्चक्षुषा चेष्टितेन च ।। 25 ।।
विवादों को निपटाते समय राजा को अपराधियों के बाहरी चिन्हों स्वर, मुख का रंग, आंखों से ऊपर-नीचे देखना (पसीना आना, घबड़ाना या रोमांचित होना) से उनके मन के भावों को जानने तथा समझने का प्रयत्न करना चाहिए।
आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च।
नेत्रवक्त्रविकारैश्च गृह्यन्ते ऽन्तर्गतं मनः ।। 26 ॥
व्यक्ति की मुख-मुद्रा, अंगों द्वारा किए जाने वाले संकेतों, चेष्टाओं, बोलने के ढंग, आंखों और चेहरे पर आने वाले विकारों द्वारा उसके मन के भावों का पता लग जाता है। कहने का आशय यह कि न्याय देने वाले को वादी तथा प्रतिवादी की इन क्रियाओं पर अपना ध्यान एकाग्र करना चाहिए।
बालदायादिकं रिक्थं तावद्राजानुपालयेत् ।
यावत्सः स्यात्समावृत्तो यावच्चातीतशैशवः ।। 27 ।।
बालक की सम्पत्ति का संरक्षण राजा को उस समय तक करना चाहिए जब तक वह गुरुकुल से विद्या पुरी करके नहीं लौटता अथवा (गुरुकुल नहीं जाने पर) उसकी बाल्यावस्था नहीं बीत जाती।
वशाऽपुत्रासु चैवं स्याद्रक्षणं निष्कुलासु च।
पतिव्रतासु च स्त्रीषु विधवास्वातुरासु च ॥ 28 ।।
राजा को आवश्यकता के अनुसार बन्ध्या, पुत्रहीन, कुल के बाहर की, पतिव्रता, विधवा और रोगी स्त्री की सम्पत्ति की भी रक्षा करनी चाहिए।
जीवन्तीनां तु तासां ये तद्धरेयुः स्वबान्धवाः । तांछिष्याच्चौरदण्डेन धार्मिकः पृथिवीपतिः ॥ 29 ॥
ऊपर के श्लोक में बताई स्त्रियों की सम्पत्ति अगर उनकी जीवन अवधि में उनके सम्बन्धी बलात् लेते हैं तो धर्मानुयायी राजा द्वारा उन्हें चोरों को दिया जाने वाला दण्ड प्रदान करना चाहिए।
प्रणष्टस्वामिकं रिक्थं राजा त्र्यब्दं निधापयेत् । अर्वाक्यब्दाद्धरेत्स्वामी परेण नृपतिर्हरेत् ॥ 30 ॥
राजा को ऐसी लावारिस सम्पत्ति की जिसका मालिक मर गया हो तीन वर्ष तक देखभाल करनी चाहिए। इस तीन वर्ष की अवधि में यदि कोई उस सम्पत्ति पर अपना अधिकार सिद्ध नहीं कर पाता तो वह सम्पत्ति राजा की हो जाती है।
ममेदमिति यो ब्रूयात्सोऽनुयोज्यो यथाविधिः । सवाद्यरूपसंख्यादीन् स्वामीतद्रव्यमर्हति ।। 31 ॥
राजा को चाहिए कि राज्य द्वारा अधिगृहीत सम्पत्ति पर अपना अधिकार बताने वाले से वह सम्पत्ति का स्वरूप, संख्या और सोना आदि होने पर उसके मूल्य आदि के सम्बन्ध में आवश्यक प्रश्न पूछे तथा सही उत्तर प्राप्त होने पर उसका स्वामित्व स्वीकार कर ले।
अवेदयानो नष्टस्य देशं कालं च तत्त्वतः ।
वर्णं रूपं प्रमाणं च तत्समं दण्डमर्हति ॥ 32 ॥
राज्य द्वारा अधिगृहीत सम्पत्ति पर अपना अधिकार बतलाने वाला व्यक्ति अगर उस सम्पत्ति के रूप, वर्ण, संख्या, परिमाण आदि की सही जानकारी नहीं दे पाता अर्थात् झूठा अधिकार प्रस्तुत करता है तो राजा को उस पर सम्पत्ति के बराबर अर्थ दण्ड (जुर्माना) लगाना चाहिए।
आददीताथ षड्भागं प्रणष्टाधिगतान्नृपः ।
दशमं द्वादशं वापि सतां धर्ममनुस्मरन् ।। 33 ॥
राजा को सज्जनों के धर्म का पालन करते हुए राज्य द्वारा अधिगृहीत धन को वास्तविक अधिकारी को वापिस करते हुए (प्रचलित प्रथा अनुसार) उसका छठा, दसवां या बारहवां भाग अपने पास रखना चाहिए।
प्रणष्टाधिगतं द्रव्यं तिष्ठेद् युक्तैरधिष्ठितम् ।
यास्तत्र चौरान्गृह्णीयात्तान् राजेभेन घातयेत् ।। 34 ॥
राजा ऐसे व्यक्ति को जो किसी के नष्ट, गिरे, खोए और राजपुरुषों की देखभाल में रखे हुए धन को चुराता या छिपाता है. हाथी के पैरों तले कुचलवा डाले।
ममायमिति यो ब्रूयान्निधिं सत्येन मानवः ।
तस्याददीत षड्भागं राजा द्वादशमेव वा ॥ 35 ॥
जो व्यक्ति खोयी हुई सम्पत्ति पर अपना वास्तविक अधिकार सिद्ध कर देता है, राजा को उस सम्पत्ति का छठा या बारहवां भाग अपने पास रखकर शेष राशि उसे वापिस कर देनी चाहिए।
अनृतं तु वदन्दण्ड्यः स्ववित्तस्यांशमष्टमम् ।
तस्यैव वा विधानस्यसंख्यायाल्पीयसींकलाम् ।। 36 ॥
जो व्यक्ति खोयी हुई सम्पत्ति पर अपना झूठा अधिकार बतलाता है उस पर सम्पत्ति या धन के आठवें भाग के बराबर अथवा उस व्यक्ति की सामर्थ्य के अनुसार अर्थ दण्ड (रुपयों का जुर्माना) लगाना चाहिए।
विद्वांस्तु ब्राह्मणो दृष्ट्वा पूर्वोपनिहितं निधिम् । अशेषतोऽप्याददीत सर्वस्याधिपतिर्हि सः ॥ 37 ॥
अगर नष्ट निधि का वास्तविक दावेदार विद्वान ब्राह्मण हो तो बिना कोई कटौती किए राजा को सारी सम्पत्ति उसे लौटा देनी चाहिए।
टिप्पणी-कुछ टीकाकारों ने नष्ट विधि को पूर्व स्थापित धन कहा है। कुछ इसे धरती में गड़े खजाने या सम्पत्ति के अर्थ में लेते हैं।
यं तु पश्येन्निधिं राजा पुराणं निहितं क्षितौ ।
तस्माद्विजेभ्यो दत्त्वार्धमध कोषे प्रवेशयेत् ॥ 38 ॥
यदि भूमि में गड़ा हुआ कोई पुराना खजाना राजा या राजकर्मचारियों को मिल जाए तो उसमें से आधा भाग ब्राह्मणों को दान में देकर शेष भाग राजा अपने कोश में रख ले।
निधीनां तु पुराणानां धातूनामेव च क्षितौ।
अर्धभाग्रक्षणाद्राजा भूमेरधिपतिर्हि सः ॥ 39 ॥
भूमि का स्वामी होने से धरती में पायी जाने वाली सभी निधियों, वस्तुओं तथा धातओं के आधे भाग का स्वामी राजा होता है।
दातव्यं सर्ववर्णेभ्यो राजा चैरेर्हतं धनम् ।
राजा तदुपयुञ्जानश्चोरस्याप्नोति किल्विषम् ॥ 40 ॥
राजकर्मचारियों द्वारा खोजे गए तथा चोरों द्वारा चुराए गए धन को उसके स्वामी को लौटा देना चाहिए चाहे वह किसी भी वर्ण का हो। ऐसे धन को न लौटाकर उसका स्वयं सेवन करने वाले राजा पर चोरी का पाप लगता है।
जातिजानपदान्धर्मान्श्रेणीधर्मांश्च धर्मवित् ।
समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्म प्रतिपादयेत् ॥ 41 ।।
धर्मज्ञ राजा को जाति धर्मों, जनपद के धर्मों, श्रेणी धर्मों (व्यापारी आदि के नियत धर्म) तथा कुल धर्मों को अच्छी तरह समझ कर अपने धर्म का अनुसरण करना चाहिए।
स्वानि कर्माणि कुर्वाणो दूरे सन्तोऽपिमानवाः ।
प्रियाः भवन्ति लोकस्य स्वेस्वे कर्मण्यवस्थिताः ।। 42 ।।
जाति, देश, कुल के धर्मानुसार अपने-अपने कामों को करने वाले तथा अपने-अपने कार्य में स्थित होकर, दूर रहते हुए भी मनुष्य लोक में प्रिय हो जाते हैं।
नोत्पादयेत्स्वयं कार्यं राजा नाप्यस्यपूरुषः ।
न च प्रापितमन्येन ग्रसेदर्थं कथञ्चन ।। 43 ।।
राजपुरुष अथवा राजा को न तो स्वयं किसी विवाद को पैदा करना चाहिए तथा न ही किसी के द्वारा प्रस्तुत किए गए विवाद की अनदेखी करनी चाहिए।
यथा नयत्यसृक्पातैर्मृगस्य मृगयुः पदम् ।
नयेत्तथाऽनुमानेन धर्मस्य नृपतिः पदम् ।। 44 ॥
जिस तरह शिकारी घायल हिरन के शरीर से बहते रक्त का अनुसरण करता हुआ छिपे हिरन को खोज लेता है, उसी तरह राजा को विवाद सम्बन्धी तथ्य के सूत्र द्वारा सही जानकारी पाने का प्रयत्न करना चाहिए।
सत्यमर्थ च सम्पश्येदात्मानमथ साक्षिणः ।
देशरूपं च कालं च व्यवहारविधौ स्थितः ।। 45 ॥
विवाद का निर्णय करने के लिए उद्यत राजा को या उसके प्रतिनिधि को सत्य से युक्त व्यवहार को, अपने को (अपना मन कोई पक्षपात तो नहीं कर रहा), गवाहियों को देश, काल तथा रूप को देखकर निर्णय करना चाहिए।
सद्भिराचरितं यत्स्याद्धार्मिकैश्च द्विजातिभिः । तद्देशकुलजातीनामविरुद्धं प्रकल्पयेत् ।। 46 ॥
राजा को धर्म का अनुसरण करने वाली तथा सदाचरण करने वाली द्विजातियों द्वारा प्रमाणित एवं देश, कुल तथा जाति के अनुकूल ही विवाद का निर्णय करना चाहिए।
अधमर्णार्थसिद्धयर्थमुत्तमर्णेन चोदितः ।दापयेद्धनिकस्यार्थमधमर्णाद्विभावितम्।। 47 ।।
धन के लेन-देन सम्बन्धी व्यवसाय को चालू रखने के उद्देश्य से राजा को ऋण लेने वाले से ऋण दाता का धन लौटवाना चाहिए।
यैर्यैरुपायैरर्थं स्वं प्राप्नुयादुत्तमर्णिकः ।
तैस्तैरुपायैः संगृह्य दापयेदधमर्णिकम् ॥ 48 ।।
कर्जा देने वाला जिन-जिन तरीकों से अपना धन वापस पा सके, राजा को उन-उन उपायों द्वारा धन की व्यवस्था करनी चाहिए।
धर्मेण व्यवहारेण छलेनाचरितेन च।
प्रयुक्तं साध्येदर्थं पञ्चमेन बलेन च ॥ 49 ॥
राजा को पहले धर्म अनुसार अर्थात् सीधी-सरल रीति से, किसी अन्य से लिए जाने वाले धन से, छल से, मान-हानि और लोकनिन्दा का भय दिखाकर तथा इन चारों साधनों के असफल हो जाने पर बल प्रयोग द्वारा ऋण लेने वाले से महाजन (कर्जा देने वाले) की धनराशि लौटवानी चाहिए।
यः स्वयं साधयेदर्थमुत्तमर्णोऽधमर्णिकात् ।
न सः राजाभियोक्तव्यः स्वकं संसाधयन्धनम् ॥ 50 ।।
अपने ऋणकर्ता से जो महाजन स्वयं ही कर्जे की वसूली कर रहा हो और जिसने राजा से सहायता नहीं मांगी हो तो राजा को इस बारे में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
अर्थेऽपव्ययमानं तु करणेन विभावितम्।
दापयेद्धनिकस्यार्थं दण्डलेशं च शक्तितः ॥ 51 ।।
जो उधार लेने वाला उधार लेकर मुकर जाए लेकिन लिखा-पढ़ी और मौखिक गवाहियों से यह सिद्ध हो कि उसने महाजन से कर्जा लिया था तो राजा को चाहिए कि वह महाजन का कर्जा वापिस करवाए और बेईमान व्यक्ति से महाजन को हर्जाना भी दिलवाए।
अपह्नवेऽधमर्णस्य देहीत्युक्तस्य संसदि । अभियोक्तादिशेद्देश्यकरणं वान्यदुद्दिशेत् ।। 52 ।।
कर्जा देने वाले महाजन द्वारा अभियोग लगाए जाने पर जब राजा और उसका प्रतिनिधि, राजसभा में ऋणकर्ता से पूछता है तथा कर्जा लेने वाला (ऋणकर्ता) कर्जा लेने से मुकरता है तो न्यायकर्ता महाजन को आज्ञा दे कि वह अपने पक्ष में लिखित या मौखिक साक्ष्य दे।
अदेश्यं यस्य दिशति निर्दिश्यापहृते चयः । यश्चाधरोत्तरानर्थान्विगीतान्नावबुध्यते 11 53 11
अपदिश्यापदेश्यं च पुनर्यस्त्वपधावति ।
सम्यग्प्रणिहितं चार्थं पृष्ठः सन्नाभिनन्दति ।। 54 ।।
असम्भाष्ये साक्षिभिश्च देशेसम्भाषते मिथः ।
निरुच्यमानं प्रश्नं च नेच्छेद्यश्चापि निष्पतेत् ।। 55 ॥
ब्रूहीत्युक्तश्च न ब्रूयादुक्तं च न विभावयेत्।
न च पूर्वापरं विद्यात्तस्मादर्थात्स हीयेत् ॥ 56 ।।
ग्यारह दोषों से ग्रस्त व्यक्ति अपना मुकदमा हार जाता है। ये ग्यारह दोष हैं-
1. झूठी साक्षी या जाली कागज-पत्र दिखाने वाला,
2. अपने प्रथम बयान से मुकर जाने वाला,
3. अपने बयान में बताई बातों में संगति का ध्यान नहीं रखने वाला,
4. अपनी ही बात के विरुद्ध बोलने वाला,
वाला, 5. न्यायाधीश के पूछने पर अपने बदले हुए बयान को बदला हुआ नहीं मानने
6. न्यायालय में ही गवाहों के साथ सलाह करने वाला।
7. विवाद की सुनवाई के समय बेकार की बातें करने तथा इधर-उधर घूमने
वाला,
8. न्यायाधीश द्वारा पूछे गए प्रश्नों की उपेक्षा करने वाला,
9. न्यायाधीश द्वारा पूछे गए प्रश्नों पर चुप रहने वाला,
10. अपने पक्ष को दृढ़तापूर्वक नहीं कहने वाला,
11. विवाद के आगे-पीछे के सभी पहलुओं को नहीं जानने वाला।
साक्षिणः सन्ति मेत्युक्त्वा दिशेत्युक्तोदिशेन्न यः।
धर्मस्थः कारणैरेतैर्हीनं तमपि निर्दिशेत् ।। 57 ॥
न्यायाधीश को ऐसे व्यक्ति को पराजित घोषित कर देना चाहिए जो पहले अपना साक्षी प्रस्तुत करने की अनुमति चाहता है परन्तु अनुमति मिलने के बाद उसे नहीं ला पाता।
अभियोक्ता न चेद्ब्रूयाद् बध्यो दण्ड्यश्च धर्मतः ।
न चेत्त्रिपक्षात् प्रब्रूयाद्धर्म प्रति पराजितः ॥ 58 ॥
न्यायाधीश को उस विवाद करने वाले को भी पराजित घोषित कर देना चाहिए जो किसी व्यक्ति पर कोई दण्डनीय अभियोग लगाता है परन्तु न्यायालय द्वारा बुलाए जाने पर डेढ़ माह तक स्वयं उपस्थित नहीं होता।
यो यावन्निह्नवीतार्थं मिथ्या यावति वा वदेत्।
ता नृपेण ह्यधर्मज्ञो दाप्यो तद्विगुणं धनम् ॥ 59 ।।
जो ऋण लेने वाला मूल धन में से जितना नहीं दे और विवाद लाने वाला मूलधन से जितना अधिक धन की मांग करे, न्यायाधीश को चाहिए कि वह उन दोनों को अपने-अपने हिसाब से दूने धन का भुगतान करने का दण्ड दे।
पृष्टोऽपव्ययमानस्तु कृतावस्थो धनैषिणा।
त्र्यवरैः साक्षिभिर्भाव्यो नृपब्राह्मणसन्निधौ ॥ 60 1
राजा तथा ब्राह्मण के सम्मुख पूछे जाने पर कोई अपराधी किसी सत्य से इन्कार करता है तो उसे झूठा सिद्ध करने के लिए कम से कम तीन साक्षियों के बयान सुने। अपराधी के विरुद्ध तीन गवाह नहीं मिलने पर अपराधी की बात को ही सच्चा मानें।
यादृशा धनिभिः कार्या व्यवहारेषु साक्षिणः । तादृशान्सम्प्रवक्ष्यामि यथावाच्यमृतं च तैः ॥ 61 ।।
महर्षि भग कहते हैं- विद्वान ब्राह्मणो ! धनवानों को विवादों में जिस तरह के गवाह (साक्षी) बनाने चाहिए तथा उन गवाहों को जिस प्रकार से सच्ची गवाही देनी चाहिए, मैं उन सबकी जानकारी आप सभी को देता हूं।
गृहिणः पुत्रिणा मौलाः क्षत्रविट्शूद्रयोनयः ।
अयुक्ताः साक्ष्यमर्हन्ति न ये केचिदनापदि ।। 62 ॥
'घर-गृहस्थी वाले, सन्तान वाले, देश के मूल निवासी, किसी विपत्ति से ग्रस्त नहीं हुए क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र जाति के लोग गवाह (साक्षी) बन सकते हैं।
आप्ताः सर्वेषु वर्णेषु कार्याः कार्येषु साक्षिणः । सर्वधर्मविदोऽलुब्धाः विपरीतांस्तु वर्जयेत् ॥ 63 ॥
साक्षी उन्हीं को बनाना चाहिए जो चारों वर्णों में प्रामाणिक माने जाते हों, जो धर्मात्मा हो तथा जो प्रलोभन में नहीं आने वाले व्यक्ति हों। इसके विपरीत लोगों को साक्षी नहीं बनाएं।
नोऽर्थसम्बन्धिनोऽनाप्ताः न सहाया न वैरिणः ।
न दृष्टदोषाः कर्तव्याः न व्याध्यार्ताः न दूषिताः ।। 64 ॥
ऐसे व्यक्तियों को साक्षी नहीं बनाना चाहिए जो धन के लोभी हों, असत्य बोलने वाले हों, दूसरों पर आश्रित शत्रु हों, दुष्ट प्रकृति के अर्थात् अपनी बात बदल जाने वाले हों।
न साक्षी नृपतिः कार्यों न कारुककुशीलवौ।
न श्रोत्रियो न लिङ्गस्थो न सङ्गेभ्योविनिर्गतः ।। 65 ॥
नाध्यधीनो न वक्तव्यो न दस्युर्नविकर्मकृत ।
न वृद्धो न शिशुनैको नान्त्यो न विकलेन्द्रियः ।। 66 ।।
नार्ती न मत्तो नोन्मत्तो न क्षुत्तृष्णोपपीडितः ।
न श्रमातॊ न कामार्तों न कुद्धो नापि तस्करः ॥ 67 ।।
इन व्यक्तियों को साक्षी नहीं बनाएं- 1. राजा, 2. कारीगर, 3. नट, 4. वेदपाठी ब्राह्मण, 5. समाज से सम्बन्ध नहीं रखने वाले व्यक्ति या संन्यासी, 6. जो दूसरों के अधीन हों, 7. जो समाज में बदनाम हो, 8. डाकू, 9. निषिद्ध कार्य करने वाले, 10. बालक, 11. बुड्डे, 12. चाण्डाल, 13. जिनकी इन्द्रियां विकार ग्रस्त हों, 14. रोगी, 15. शराब पीने वाले, 16. पागल, 17. भूख-प्यास से ग्रस्त, 18. थका-मांदा रहने वाला, 19. काम में आसक्त, 20. क्रोध करने वाला, 21. चोरी करने वाला।
स्त्रीणां साक्ष्यं स्त्रियः कुर्युर्द्विजानां सदृशाः द्विजाः ।
शूद्राश्च सन्तः शूद्राणामन्त्यानामन्त्ययोनयः ।। 68 ॥
नारियों का साक्ष्य नारियों को, द्विजों का साक्ष्य उनके ही समान द्विजों को, शूद्रों का अच्छे आचरण वाले शूद्रों को तथा चाण्डालों का साक्ष्य चाण्डालों को करना चाहिए।
अनुभावी तु यः कश्चित्कुर्यात्साक्ष्यं विवादिनाम्।
अन्तर्वेश्मन्यरण्ये वा शरीरस्यापि चात्यये ।। 69 ॥
घर के अन्दर होने वाले, अरण्य (वन) में होने वाले या जिन लोगों के बीच शारीरिक रक्त सम्बन्ध हों, उनके मध्य होने वाले विवादों में किसी भी अनुभव प्राप्त व्यक्ति को साक्षी बनाया जा सकता है।
स्त्रियोऽप्यसम्भवे कार्य बालेन स्थविरेण वा।
शिष्येण बन्धुना वापि दासेन भृतकेन वा ॥ 70॥
यदि अनुभवी व्यक्ति की साक्षी नहीं मिले तो स्त्रियों, बच्चों, वृद्धों, शिष्यों, सम्बन्धियों तथा भृत्यों-सेवकों को साक्षी बनाया जा सकता है।
बालवृद्धातुराणां च साक्ष्येषु वदतां मृषा।
जानीयादस्थिरां वाचमुत्सिक्त मनसां तथा ।। 71 ॥
बालकों, वृद्धों तथा रोगग्रस्त व्यक्तियों के साक्ष्य में असत्य बोलने पर उनकी बातों पर विश्वास नहीं करें क्योंकि उनका मन अस्थिर होता है।
साहसेषु च सर्वेषु स्तेयसंग्रहणेषु च।
वाग्दण्डयोश्च पारुष्ये न परीक्षेत साक्षिणः ।। 72 ।।
साहस से किए जाने वाले अपराध जैसे चोरी-डाका, आग से जलाना, बलात्कार, अपहरण तथा परस्त्री संग के विषयों में और मार-पीट के मामलों में साक्षी देने वालों के कथन की ज्यादा परीक्षा नहीं करनी चाहिए और ऐसे अपराधियों को शीघ्रातिशीघ्र दण्ड देना चाहिए।
बहुत्वं परिगृह्णीयात्साक्षिद्वैधे नराधिपः ।
समेषुतुगुणोत्कृष्टान् गुणिद्वैधे द्विजोत्तमान् ॥ 73 ॥
आपस में विरोधी-साक्षियों में अधिक संख्या वालों को ही राजा को प्रमाण मानना चाहिए। अगर परस्पर विरोधी साक्ष्य समान संख्या में हों तो गुणी लोगों को संख्या के अनुपात को तथा इस अनुपात के भी बराबर होने पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साक्ष्य को प्रमाण माने।
समक्षदर्शनात्साक्ष्यं श्रवणाच्चैव सिद्धयति।
तत्र सत्यं बुवन्साक्षी धर्मार्थाभ्यां न हीयते ॥ 74॥
ऐसा साक्ष्य सब प्रकार से प्रामाणिक होता है जिसने अपने सामने देखा तथा अपने कानों से सना हो। ऐसे साक्षियों में भी उस साक्षी का कथन सबसे प्रामाणिक होता है जो सर्वदा सत्य बोलता है तथा जो कभी धर्म एवं अर्थ से हीन नहीं होता।
साक्षी दृष्टश्रुतादन्यद्विब्रुवन्नार्य संसदि।
अवाङ् नरकमभ्येति प्रेत्य स्वर्गाच्च हीयते ॥ 75 ॥
वह व्यक्ति इस जन्म में अपमान और बदनामी से पीड़ित रहता है जो आर्यों की सभा में नेत्रों से देखे तथा कानों से सुने सत्य के विरुद्ध साक्षी देता है। वह मृत्यु के बाद अगर अपने अच्छे कर्मों के फलस्वरूप स्वर्ग में भी चला जाए तो वहां से पतित हो जाता है।
यत्रानिबद्धोऽपीक्षेत शृणुयाद्वापि किञ्चन।
पृष्ठस्तत्रापि तद्ब्रूयाद्यथादृष्टं यथाश्रुतम् ।। 76 ॥।
अगर किसी ऐसे व्यक्ति से जिसे विवाद में गवाह नहीं बनाया गया है, उससे (विवाद से) संबंधित कुछ पूछा जाए तो उसे वही बताना चाहिए जो उसने वास्तव में देखा तथा सुना हो। वास्तविकता से अलग उसे कुछ नहीं बताना चाहिए।
एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्याद्बह्वयः शुच्योऽपि न स्त्रियः । स्त्रीबुद्धेरस्थिरत्वाच्च दोषैश्चान्येऽपि ये वृत्ताः ।। 77 ॥
मात्र एक ही लोभ रहित व्यक्ति की गवाही (साक्षी) पर्याप्त होती है। इसके विपरीत अनेक पवित्र नारियों की साक्षी भी विश्वास योग्य नहीं होती क्योंकि नारियों की बुद्धि सदा अस्थिर रहती है। इसी तरह अस्थिर बुद्धि वाले पुरुषों की साक्षी (गवाही) को भी प्रमाण नहीं मानना चाहिए।
स्वभावेनैव यद्ब्रूयुःस्तद्ग्राह्यं व्यावहारिकम् ।
अतो यदन्यद्वि ब्रूयुर्धर्मार्थं तदपार्थकम् ॥ 78 ॥
उसी साक्ष्य को निर्णय करने के लिए उपयोगी समझना चाहिए जो बिना किसी डर या लालच के, सहज भाव से दी गई हो। इसके विपरीत डर अथवा लालच से प्रेरित बनावटी गवाही को व्यर्थ समझना चाहिए।
सभान्तः साक्षिणः प्राप्तानर्थिप्रत्यर्थिसन्निधौ। प्राङ्विवाकोऽनुयुञ्जीत विधिनानेन सान्त्वयन् ।। 79 ॥
पक्ष और विपक्ष के साक्षियों के वकील को न्यायसभा में आने के बाद अत्यन्त धैर्यपूर्वक आगे बताई विधि से दोनों से प्रश्न करने चाहिए।
यद्वयोरनयोर्वेत्थकार्ये ऽस्मिंश्चेष्टितं मिथः ।
तद्भूत सर्वं सत्येन युष्माकं ह्यत्र साक्षिता ॥ 8० ॥
उसे साक्षियों से कहना चाहिए-वादी प्रतिवादी के इस मुकदमे के बारे में आप लोग जो कुछ जानकारी रखते हैं वह सब सत्य-सत्य बतलाएं क्योंकि आपकी
सत्यं साक्ष्ये ब्रुवन्साक्षी लोकानाप्नोति पुष्कलान्।
इहचानुत्तमां कीर्ति वागेषा ब्रह्मपूजिताः ।। 81 ॥
वकील कहे-गवाही में सच बोलने वाला व्यक्ति इस संसार में उत्तम यश को तथा परलोक में सद्गति पाता है, क्योंकि सच बोलने से वाणी की शक्ति बढ़ती है।
साक्ष्येऽनृतं वदन्पाशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम् ।
विवशः शतमाजातीस्तस्मात्साक्ष्यं वदेदृतम् ॥ 82 ।।
झूठी गवाही देने वाला वरुण देव के पाशों से बांधा जाकर सौ-सौ जन्मों तक जलोदर आदि बीमारियों से ग्रस्त रहता है। अतः साक्षी को हमेशा सच बोलना चाहिए।
सत्येन पूज्येत साक्षी धर्मः सत्येन वर्धते ।
तस्मात्सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर्णेषु साक्षिभिः ॥ 83 ।।
सत्य से धर्म का विकास होता है। इस भांति सच बोलने से साक्षी का मान-सम्मान बढ़ता है। अतः सभी वर्णों के साक्षियों को सच बोलना चाहिए।
आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी गतिरात्मा तथात्मनः ।
मावसंस्थाः स्वमात्मानं नृणां साक्षिणमुत्तमम् ॥ 84 ॥
मनुष्य की आत्मा स्वयं ही साक्षी और स्वयं की ही शरण में है अर्थात् व्यक्ति स्वयं यह जानता है कि वह सच बोल रहा है या झूठ।
मन्यन्ते वै पापकृतो न कश्चित्पश्यतीति नः।
तास्तु देवाः प्रपश्यन्ति स्वस्यैवान्तर पूरुषः ।। 85 ॥
जो व्यक्ति पाप करते हुए यह समझता है कि हमें कौन देखता है, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि देवता तथा उनके शरीर के भीतर का पुरुष (आत्मा) उन्हें देखता रहता है।
द्यौर्भूमिरापो हृदयं चन्द्रर्काग्नि यमानिलाः।
रात्रिः सन्ध्ये च धर्मश्च वृत्तजाः सर्वदेहिनाम् ।। 86 ।।
सभी प्राणियों के सत्-असत् कर्मों को आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, चन्द्र, सूर्य, आग, यम, वायु, रात, सन्ध्या और धर्म देखते हैं। अभिप्राय यह है कि इन देवताओं को सदैव प्रत्यक्ष समझकर व्यक्ति को पाप कर्म नहीं करना चाहिए।
देव ब्राह्मण सान्निध्ये साक्ष्यं पृच्छेदृतं द्विजान्।
उदडमुखान्प्राङ् मुखान्वा पूर्वाह्ने वैशुचिः शुचीन् ।। 87 ।।
शुद्ध हृदय न्यायकर्ता साक्षियों को देवता की मूर्ति तथा ब्राह्मणों के पास ले जाकर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके खड़ा करे और दोपहर के पहले उनकी गवाही लेते हुए उनसे सच बोलने को कहे।
ब्रूहीति ब्राह्मणं पृच्छेत्सत्यं ब्रूहीति पार्थिवम् । गोबीजकाञ्चनैवैश्यं शूद्रं सर्वैस्तु जातकैः ।। 88 ।।
चारों वर्णों के गवाहों से सत्य बुलवाने हेतु क्रमशः आगे बताए भिन्न-भिन्न वाक्यों का उपयोग करें-
ब्राह्मण से कहें- महाराज ! बोलिए।
क्षत्रिय से कहें-राजन् ! सच बोलिए।
वैश्य से कहें- महाजन ! तुम्हें पशु, धन तथा कृषि की शपथ! सच बोलिए।
शूद्र से कहें-सच नहीं बोलोगे तो तुम अन्याय के लिए जिम्मेवार होगे और सारे पाप के भागीदार बनोगे।
ब्रह्मघ्नो येस्मृताः लोकाः ये च स्त्रीबालघातिनः ।
मित्रद्रुहः कृतघ्नस्य ते च स्युर्बुवतोमृषा ।। 89 ॥
जो व्यक्ति झूठी गवाही देता है उसे वही नरक लोक प्राप्त होता है जो कि ब्रह्म हत्या, स्त्री हत्या, बाल हत्या करने वाले मित्र से विश्वासघात करने वाले तथा कृतघ्र व्यक्ति को मिलता है।
जन्मप्रभृति यत्किञ्चित्पुण्यं भद्र त्वया कृतम्।
तत्तेसर्व शुनोगच्छेद्यदि ब्रूयास्त्वमन्यथा ॥ 9० ॥
वकील को चाहिए कि वह साक्षियों से कहे कि सारे जीवन में आपने अच्छे कर्मों द्वारा जो पुण्य कमाया है, झूठी गवाही देते ही वह समस्त पुण्य कुत्तों को चला जाएगा अर्थात् समाप्त हो जाएगा।
एकोऽहमस्मीत्यात्मानं यत्त्वं कल्याण मन्यसे ।
नित्यं स्थितस्ते हृद्येष पुण्यपापेक्षिता मुनिः ॥ 91 ॥
अगर तुम यह समझ कर झूठी गवाही दे रहे हो कि तुम अकेले हो और तुम्हारी सच्चाई कोई नहीं जानता तो तुम गलती कर रहे हो क्योंकि तुम्हारे पाप-पुण्य को देखने वाला परमात्मा तुम्हारे हृदय में रहता है।
यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैष हृदिस्थितः ।
तेन चेदविवादस्ते मा गङ्गा मा कुरून् गमः ।। 92 ।।
तुम्हारे हृदय में भगवान विवस्वान यम साक्षी रूप में रहते हैं। यदि तुम्हें उनसे विवाद नहीं करना है तथा गाङ्ग प्रदेश या कुरु प्रदेश में प्रायश्चित करने हेतु नहीं जाना है तो तुम्हें झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए।
नग्नो मुण्डः कपालेन भिक्षार्थी क्षुत्पिपासितः ।
अन्धः शत्रुकुलं गच्छेद्यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ॥ 93 ॥
झूठी गवाही देने वाले व्यक्ति के शरीर पर कपड़े तथा सिर पर बाल नहीं रह जाते। वह नंगा तथा गंजा हो जाता है। वह हाथ में खप्पर लेकर भीख मांगकर अपना जीवन चलाता है और भूख-प्यास से व्याकुल रहता है तथा नेत्रहीन होकर शत्रुओं द्वारा पीड़ित किया जाता है।
अवाविशरास्समस्यन्धे किल्वषी नरकं व्रजेत्।
यः प्रश्नवितथं ब्रूयात्पृष्ठः सन्धर्मनिश्चये ।। 94 ॥
धर्म निर्णय हेतु प्रश्न पूछे जाने पर उसके उत्तर में झूठ बोलने वाला भयानक अंधेरे से भरे नरक में मुंह के बल गिरता है।
अन्धो मत्स्यानिवाश्नाति सः नरः कण्टकैः सह।
यः भाषतेऽथवैमल्पकप्रत्यक्षं सभां गतः ॥ 95 ॥
न्याय सभा में जाकर अनदेखी बात को आंखों देखी हुई बताने अर्थात् झूठी गवाही देने वाला अन्धा बनता है और मछली के मांस को कांटों सहित खाने के लिए मजबूर होता है।
यस्य विद्वान् हि वदतः क्षेत्रज्ञो नाभिशङ्कते।
तस्मान्न देवाः श्रेयांसं लोकेऽन्यं पुरुषं विदुः ॥ 96 ||
गवाही में बोलते हुए जिस मनुष्य की अन्तरात्मा में कोई भय या शंका नहीं रहती (क्योंकि वह सत्य बोलता है) इस लोक में देवता उससे अधिक श्रेष्ठ किसी दूसरे को नहीं मानते।
यावतोबान्धवान् यस्मिन् हन्तिसाक्ष्येऽनृतंवदन्।
तावतः संख्यया तस्मिन्शृणु सौम्यानुपूर्वशः ।॥ 97 ॥
भृगु जी कहते हैं- हे सौम्य ! गवाही में झूठ बोलने वाला जितने बान्धवों की हत्या करने का फल पाता है. उनकी संख्या क्रमशः मुझसे सुनिए ।
पञ्च पश्वनृते हन्ति दशहन्ति गवानृते ।
शतमश्वानृते हन्ति सहस्त्रं पुरुषानृते ॥ 98 ।।
गऊ, घोड़ा, ऊंट आदि साधारण पशुओं और पुरुष के बारे में झूठी गवाही देने बाला क्रमशः पांच, दस, सौ तथा हजार बान्धवों की हत्या करने का पाप प्राप्त करता है।
हन्ति जातानऽजातांश्च हिरण्यार्थेऽनुनं वदन् ।
सर्वभूम्यऽनृते हन्ति मा स्म भून्यऽनृतं वदीः ॥ 99 ।।
जो व्यक्ति स्वर्ण धातु के बारे में झूठ बोलता है वह जन्मे और अजन्मे पुत्रों की हत्या करने का पाप भोगता है। भूमि के लिए झूठ बोलने वाला समस्त लोकों की हत्या करने का पाप प्राप्त करता है। इसलिए भूमि के लिए कभी किसी तरह का असत्य नहीं बोलना चाहिए।
अप्सु भूमिवदित्याहुः स्त्रीणां भोगे च मैथुने।
अब्जेषु चैव रत्नेषु सर्वेष्वश्ममयेषु च ॥ 100 ।।
तालाब, बावड़ी आदि जलाशयों तथा स्त्रियों के साथ मैथुन करने और जल में उत्पन्न मोती, मूंगा आदि रत्नों के बारे में असत्य भाषण करने वाला उसी पाप का भागीदार होता है जो भूमि के विषय में झूठ बोलने वाला होता है।
एतान्दोषानवेक्ष्य त्वं सर्वाननृत भाजणे।
यथाश्रुतं यथादृष्टं सर्वमेवाञ्जसा वद ॥ 101 ।।
इस तरह सभी विषयों के बारे में झूठ बोलने से मिलने वाले भयानक पापों को ध्यान में रखकर व्यक्ति को अपनी आंखों से देखे और कानों से सुने को ही जैसे का तैसा (अर्थात् सच्चा) तथा उसी समय बता देना चाहिए।
गोरक्षकान्वाणिजिकांस्तथा कारुकुशीलवान् ।
प्रैष्यान्वार्धिकांश्चैव विप्रान् शूद्रवदाचरेत् ।। 102 ॥
किसी विवाद की पूछताछ में गउओं की रक्षा करने वालों, बनियों, लोहार बढई आदि का कार्य करने वालों गाने-बजाने वालों, डाक बांटने का कार्य करने वालों और सूदखोरी से अपनी जीविका चलाने वाले ब्राह्मणों से शूद्रों की तरह व्यवहार करना चाहिए।
तद्वदन्धर्मतोऽर्थेषु जानन्नप्यन्यथा नरः ।
न स्वर्गाच्च्यवते लोकाद्दैवीं वाचं वदन्ति ताम् ॥ 103 ॥
जो मनुष्य सत्य की जानकारी होते हुए भी धर्म के अनुरोध (समाज तथा धर्म रक्षा हेतु) से सत्य नहीं बोलता वह स्वर्गलोक से नहीं गिरता क्योंकि वह असत्य तो लोक कल्याण करने वाला होने से देवता की वाणी की भांति है।
शूद्रविट्क्षत्रविप्राणां यत्रर्तोक्ते भवेद्वधः ।
तत्र वक्तव्यमनृतं तद्धि सत्याद्विशिष्यते ।। 104 ॥
जिस विवाद में सच बोलने से शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मणों की हत्या निश्चित हो वहां झूठ भी बोलना चाहिए। वास्तव में वह झूठ, सच से अधिक महत्व रखता है।
वाग्दैवत्यैश्च चरुभिर्यजेरंस्ते सरस्वतीम् ।
अनृतस्यैनसस्तस्य कुर्वाणानिष्कृतिः पराम् ॥ 105 ॥
कूष्माण्डैर्वापि जुहुयात् घृतमग्नौ यथाविधिः ।
उदित्यृचा वा वारुण्या तृचेनाब्दैवतेन वा ॥ 106 ।।
मनुष्य की रक्षा के हेतु बोले गए असत्य के लिए आगे बतायी गई विधि से प्रायश्चित करना चाहिए-
सरस्वती जी का यजन-पूजन वाग्देवता सम्बन्धी चरु से करे (यद्देवादेवहेडनम) आदि यजुर्वेद के मंत्रों से विधिपूर्वक घी से आग में हवन करे या 'उदुत्तम वरुण पाशमस्मदबाधम्' मंत्रों से वरुण देव से अपराध की क्षमायाचना करे या 'आपो हिष्ठाः मयोभुवः' तीन ऋचाओं से जल से मार्जन करता हुआ वरुण देवता की पूजा करे।
टिप्पणी - मनु महाराज ने सामान्य परिस्थितियों में विवाद होने पर असत्य बोलने को पाप माना है परन्तु जहां व्यर्थ में किसी का वध होता हो अथवा कोई ऐसा सत्य हो जिसे बोलने से समाज का अहित होता हो उसे भी नहीं बोलना चाहिए। स्पष्ट है कि मनु जी ने सत्य भाषण के विषय पर समाज उपयोगी दृष्टि अपनाई है। उनके कथनों में वदतो-व्याघात दोष नहीं है।
त्रिपक्षादब्रुवन्साक्ष्यमृणादिषु नरोऽगदः ।
तदृणं प्राप्नुयात्सर्व दशबन्ध च सर्वतः ॥ 107 ।।
अगर कर्ज की उगाही के विवाद में कोई नीरोग तथा निरापद पुरुष तीन पक्ष अर्थात् 45 दिन तक गवाही देने के लिए न्याय सभा में उपस्थित नहीं होता तो उसे महाजन द्वारा लिए ऋण की सारी राशि का भुगतान करना चाहिए तथा इस राशि के दसवें भाग के बराबर धन दण्ड के रूप में राजा को देना चाहिए।
यस्य दृश्येत सप्ताहादुक्तवाक्यस्य साक्षिणः । रोगोऽग्निर्ज़ातिमरणमृणं दाप्योदमं च सः ॥ 108 ॥
गवाही देने के सात दिन के अन्दर जिस गवाह के घर में रोग, अग्निदाह, पुत्र आदि की मृत्यु जैसे दैवी उत्पात होने लगें तो गवाह को झूठा मानते हुए उसे महाजन के सारे धन का और राजा को दण्ड रूप में धन के दसवें भाव का भुगतान करने की आज्ञा देनी चाहिए।
असाक्ष्यकेषु त्वर्थेषु मिथे विवदमानयोः ।
अविन्दन्तत्त्वतः सत्यं शपथेनापि लम्भयेत् ।। 109 ।।
जिन विषयों में कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं हो तथा वादी प्रतिवादी की बातों (बयानों) से सत्य का ज्ञान नहीं होता हो वहां राजा को चाहिए कि दोनों से शपथ उठवा कर निर्णय करने का प्रयत्न करे।
महर्षिभिश्च देवैश्च कार्यार्थ शपथाः कृताः ।
वसिष्ठश्चापि शपथं शेपे वै यवने नृपे ॥ 110 ॥
महर्षियों तथा देवताओं ने भी प्राचीनकाल में न्याय निर्णय हेतु शपथ का सहारा लिया था। यवन नरेश के सम्मुख महर्षि वसिष्ठ ने सत्य को स्थापित करने के लिए शपथ का आश्रय लिया था।
न वृथा शपथं कुर्यात्स्वल्पेऽप्यर्थे नरो बुधः ।
वृथा हि शपथं कुर्यात्प्रेत्य चेह च नश्यति ॥ 111 ॥
बुद्धिमान व्यक्ति को साधारण बातों के लिए शपथ नहीं उठानी चाहिए क्योंकि जो बेकार में शपथ खाता है वह इस संसार में तथा परलोक में नाश को प्राप्त होता है।
कामिनीषु विवाहेषु गवां भक्ष्ये तथेन्धने।
ब्राह्मणाभ्युपपत्तौ च शपथे नास्ति पातकम् ।। 112 ॥
स्त्रियों के साथ विवाह करने अथवा उनके साथ भोग-विलास करने, गायों के चारे के बारे में, लडकी तथा ब्राह्मण की रक्षा करने के लिए झूठी शपथ खाने से कोई पाप नहीं लगता।
सत्येन शापयेद्विप्रं क्षत्रियं वाहनायुधैः ।
गोबीजकाञ्चनैवैश्यं शूद्रं सर्वैस्तु पातकैः ॥ 113 ।।
ब्राह्मण से सत्य की शपथ ले, क्षत्रिय से उसके रथादि वाहन और धनुष्ष आदि आयुध की शपथ ले, वैश्य से पशु, कृषि तथा व्यापार की शपथ ले एवं शूद्र से सभी पापों के लगने की शपथ करानी चाहिए।
अग्निं वा हारयेदेनमप्सु चैनं निमज्जयेत् ।
पुत्रदारस्य वाप्येनं शिरांसि स्पर्शयेत्पृथक् ॥ 114 ।।
अपनी शपथ की सच्चाई सिद्ध करने के लिए शूद्र को जलती अग्नि को हाथ से उठाना तथा पानी में डुबो देना चाहिए और उसे अपने बेटे और पत्नी के सिर पर अलग-अलग हाथ रखना चाहिए।
यमिद्धो न दपत्यग्निरापो नोन्मज्जयन्ति च।
न चार्तिमृच्छति क्षिप्रं सः ज्ञेयः शपथे शुचिः ।। 115 ।।
जिस शूद्र को जलती अग्नि जलाती नहीं, जल डुबोता नहीं तथा पुत्र आदि की मृत्यु रूपी पीड़ा दुःखी नहीं करती. उसे सत्यपूर्ण शपथ लेने वाला समझना चाहिए। टिप्पणी - महर्षि मनु जैसे महान विद्वान एवं चिन्तक द्वारा शूद्रों के प्रति इस प्रकार का अप्राकृतिक विचार बहुत अस्वाभाविक लगता है। ऐसे गुण तो महान योगी अथवा आध्यात्मिक ज्ञान युक्त कर्मयोगी में ही पाए जा सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस तरह के पक्षपातपूर्ण विचार बाद में मिलाए गए हैं।
वत्सस्य ह्यभिशस्तस्य पुरा भ्रात्रा यवीयसा।
नाग्निर्ददाह रोमापि सत्येन जगतः स्पृशः ॥ 116 ॥
प्राचीनकाल में वत्स ऋषि को जब उनके लघु भ्राता ने ब्राह्मण-पुत्र न होकर शुद्र पुत्र होने का उपालम्भ दिया तो उसने सत्य की साक्षी अग्नि में प्रवेश किया और अग्नि ने उसके एक रोम को भी नहीं जलाया।
टिप्पणी- यह प्रतीकों से पूर्ण काव्यात्मक वर्णन है। इसका शाब्दिक नहीं बरन भावार्थ समझना चाहिए। इसका वास्तविक अर्थ इस प्रकार होगा-
वत्स ऋषि को अपने छोटे भाई के उपालम्भ से इतनी पीड़ा हो सकती थी जितनी किसी को अग्नि में जलने से होती है परन्तु उनको कुछ नहीं हुआ अर्थात् उन्होंने उस उपालम्भ को शांतिपूर्वक सहते हुए यह सिद्ध करने में सफलता पाई कि वह ब्राह्मण-पुत्र हैं।
यस्मिन्यस्मिन्विवादे तु कौट साक्ष्यं कृतं भवेत्।
तत्तत्कार्यं निवर्तेत कृतं चाप्यकृतं भवेत् ॥ 117 ।।
जिस-जिस विवाद में, झूठी गवाही दी गई है, ऐसा संदेह न्यायकर्ता को हो तो उसे चाहिए कि वह उस-उस विवाद को फिर से सुने और उस संदर्भ में दिए निर्णय को निरस्त कर दे।
लोभान्मोहाद्भयान्मैत्र्यात्कामात् क्रोधात्तथैव च। अज्ञानाद्बालभावाच्च साक्ष्यं वितथमुच्यते ॥ 118 ॥
ऐसी गवाही झूठी मानी जाती है जो लालच, मोह-ममता, डर, मित्रता, काम, क्रोध, अज्ञान अथवा बचपने में दी गई हो।
एषामन्यतमे स्थाने यः साक्ष्यमनृतं वदेत्।
तस्य दण्डविशेषांस्तु प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥ 119 ।।
महर्षि भृगु ने कहा- ब्राह्मणो! लालच और मोह में आकर असत्य साक्ष्य देने वालों को विशेष दण्ड देने के बारे में क्रमशः बताता हूं।
लोभात्सहस्रं दण्ड्यस्तु मोहात्पूर्व तु साहसम्।
भयाद्वौ मध्यमौदण्डौ मैत्र्यात्पूर्व चतुर्गुणम् ॥ 120 11
लोभ के वश में झूठी गवाही देने पर हजार पणों का, मोह के वशीभूत हो असत्य बोलने वाले साक्षी को ढाई सौ पणों का, भय के वश में आकर झूठी गवाही देने वालों को पांच सौ पणों का और मित्रता के कारण असत्य बोलने वाले को दो हजार पणों का दण्ड देना चाहिए।
टिप्पणी - पण का अर्थ तत्कालीन सिक्के से है।
कामाद्दशगुणं पूर्व क्रोधात्तु त्रिगुणं परम्।
अज्ञानाद्द्वेशतेपूर्णे बालिश्याच्छतमेव तु ॥ 121 ॥
काम के वश में झूठी गवाही देने पर दस पणों का, क्रोध वश झूठी गवाही देने वाले को तीस पणों का, अज्ञानवश झूठी साक्षी देने वाले को दो सौ पणों का तथा मूर्खतावश झूठी गवाही देने वाले को एक सौ पर्णों का अर्थ दण्ड देना चाहिए।
एतानाहुः कौटसाक्ष्ये प्रोक्तान्दण्डान् मनीषिभिः । धर्मस्याव्यभिचारार्थमधर्म नियमाय च ।। 122 ।।
महर्षि भृगु बोले- ब्राह्मणो ! सत्य के रूप धर्म की व्यवस्था को बनाए रखने तथा अधर्म पर नियंत्रण रखने के लिए ही विद्वानों ने इस तरह की असत्य साक्षियों के लिए उपर्युक्त अर्थ दण्डों का विधान किया है।
कौटसाक्ष्यं तु कुर्वाणांस्त्रीन्वर्णान्धार्मिकोनृपः । प्रवासयेद्दण्डयित्वा ब्राह्मणस्तु विवासयेत् ।। 123 ।।
क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र-तीनों वर्षों के लोगों द्वारा असत्य साक्ष्य देने पर उन्हें दण्ड देकर देश से निकाल देना चाहिए। ब्राह्मण वर्ण के लोगों को दण्ड न देकर देश से निकाल देना चाहिए।
दशस्थानानि दण्डस्य मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।
त्रिषु वर्णेषु यानि स्युरक्षतो ब्राह्मणो व्रजेत् ।। 124 ॥
भृगु जी कहते हैं- विप्रो ! महाराज स्वायम्भुव मनु ने दण्ड के जो दस भेद बताए हैं, वे सब क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तीन वर्षों के लिए हैं। शारीरिक और आर्थिक आदि दण्ड ब्राह्मण को देना मना है। उसे केवल देश-निकाले का दण्ड दिया जा सकता है।
उपस्थमुदरं जिह्वा हस्तौ पादौ च पञ्चमम् ।
चक्षुर्नासा च कर्णों च धनं देहस्तथैव च ॥ 125॥
अनुबन्धं च परिज्ञाय देशकालौ च तावतः ।
सारापगधौ चालोक्य दण्डं दण्ड्येषु पातयेत् ॥ 126 ।।
दण्ड देने के दस स्थान हैं- उपस्थ (लिंग), पेट, जीभ, हाथ, पैर, आंखें, नाक, कान, शरीर तथा धन। इन्हें विकृत करना अर्थात् इन्हें पीड़ा देना ही दण्डित करना है।
विवाद, देश तथा काल को भली प्रकार देख, सुन तथा समझ कर जिनको दण्ड दिया जाए उनके साथ ही अपराधी के अपराध तथा उसकी सामर्थ्य को दण्ड देना चाहिए।
अधर्मदण्डनं लोके यशोघ्नं कीर्तिनाशनम् ।
अस्वर्यं परत्रापि तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ।। 127 ।।
दण्ड देने में अधर्म करने से (अन्यायपूर्ण दण्ड देने से) इस लोक में अपयश मिलता है तथा मृत्यु के बाद भी अपकीर्ति मिलती है और नरक प्राप्त होता है। अतएव अन्याय से किसी को दण्डित नहीं करना चाहिए।
अदण्ड्यान्दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन् ।
अयशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति ।। 128 ।।
जो व्यक्ति ऐसे लोगों को दण्ड देता है, जिन्हें दण्ड नहीं देना चाहिए तथा जिनको दण्ड देना चाहिए, उन्हें दण्ड नहीं देता, उसे संसार में बहुत अधिक अपयश मिलता है और मरने के बाद वह नरक जाता है।
वाग्दण्डं प्रथमं कुर्याद्धिग्दण्डं तदनन्तरम्।
तृतीयं धनदण्डं तु वधदण्डमतः परम् ।। 129 ।।
वधेनापि यदा त्वेतान्निग्रहीतुं न शक्नुयात्।
तदेषु सर्वमप्येतत्प्रयुञ्जीत चतुष्टयम् ॥ 130 ।।
सबसे पहले अपराध करने वाले को समझाना चाहिए। जब इसका असर नहीं पड़े, उसकी भर्त्सना करनी चाहिए। जब इससे भी वह न समझे तो उस पर अर्थ दण्ड लगाना चाहिए। जब इसका भी अनुकूल असर नहीं पड़े तो उसे शारीरिक दण्ड देना चाहिए।
शारीरिक दण्ड देने पर उसका अभीष्ट प्रभाव नहीं पड़ने पर चारों प्रकार के दण्डों का उपयोग एक साथ करना चाहिए।
लोकसंव्यवहारार्थं या संज्ञाः प्रथिताः भुवि ।
ताम्ररूप्यसुवर्णानां ताः प्रवक्ष्याम्यशेषतः ।। 131 ।।
महर्षि भृगु जी ने कहा-तांबा, चांदी तथा स्वर्ण से बने पणों के जो नाम संसार में व्यवहार के लिए प्रसिद्ध हैं, मैं आप लोगों को उन सबके बारे में जानकारी देता हूं जिससे आपको इनकी चोरी करने पर दिए जाने वाले दण्ड आदि का ज्ञान हो जाए।
जलान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः ।
प्रथमं तत्प्रमाणानां त्रसरेणुं प्रचक्षते ।। 132 ।।
खिड़की या रोशनदान की जाली के छिद्रों में गुजरती सूर्य किरणों में जो छोटे-छोटे धूल-कण दिखाई देते हैं उन्हें 'त्रसरेणु' कहते हैं।
त्रसरेणावष्टौ विज्ञेया लिक्षेका परिमाणतः ।
ताः राजसर्षपस्तिस्त्रस्ते त्रयोगौरसर्षपः ॥ 133 ॥
ऐसे आठ त्रसरेण के समूह का नाम लिक्षा है। तीन लिक्षाओं से मिलकर एक राई (राजसर्षप) तथा तीन राइयों को मिलाकर एक सफेद सरसों बनती है।
सर्षपाः षड्यवो मध्यस्त्रियवं त्वेककृष्णलम्।
पञ्चकृष्णलको माषस्ते सुवर्णस्तु षोडश ॥ 134 ॥
छह श्वेत सरसों के दानों से एक मझोला जौ, तीन जौ से एक कृष्णल (रत्ती),
पांच कृष्णल या रत्ती से एक माशा (माष) तथा सोलह माशों का एक तोला (सुवर्ण) होता है।
पलं सुवर्णाश्चत्वारः पलानि धरणं दश।
द्वे कृष्णले समधृते विज्ञेयो रौप्यमाषकः ।। 135 ॥
चार सुवर्णों (तोलों) का एक पल (छटांक), दश पलों का एक 'धरण' और दो रत्तियों (कृष्णल) को तराजू पर रखने से उसके बराबर एक 'रौप्य माषक' जानना चाहिए (रौप्य माषक अर्थात् चांदी का माषक) ।
ते षोडश स्याद्धरणं पुराणश्चैव राजतः ।
कार्षापणं तु विज्ञेयस्ताग्निकः कार्षिकः पणः ॥ 136 ॥
उन 16 रौप्य माषकों का एक रौप्यवरण (धरण) तथा चांदी का पुराण भी होता है। तांबे के पैसे को 'कर्ष' तथा 'पण' भी कहते हैं।
धरणानि दश ज्ञेयाः शतमानस्तु राजतः ।
चतुः यौवर्णिको निष्को विज्ञेयस्तु प्रमाणतः ।। 137 ।।
पणानां द्वे शते सार्धे प्रथमः साहसः स्मृतः ।
मध्यमः पञ्च विज्ञेयः सहस्त्रं त्वेव चोत्तमः ॥ 138 ॥
चांदी की दश धरण का एक 'शतमान', चार सुवर्णों के परिमाण का एक निष्क (अशर्फी), 250 पणों का 'प्रथम साहस', 500 पणों का 'मध्यम साहस' तथा एक हजार पणों का 'उत्तम साहस' होता है।
ऋणे देये प्रतिज्ञाते पञ्चकं शतमर्हति।
अपह्नवे तद्विगुणं तन्मनोरनुशासनम् ॥ 139 ॥
वसिष्ठविहितां वृद्धिं सृजेद्वित्तविवर्धनीम् ।
अशीतिभागं गृह्णीयान्मासाद्वाधुषिकः शते ।। 140 ॥
मनु महाराज ने यह विधान किया है कि यदि ऋण लेने वाला न्यायालय में महाजन से ऋण लेने की बात मान लेता है तो उस पर 5 प्रतिशत के हिसाब से और नहीं मानने पर (लेकिन बाद में झूठा सिद्ध होने पर) दस प्रतिशत पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
वसिष्ठ जी का मत इसके विपरीत है। उनके अनुसार ऋण लेना अस्वीकार करने (पर बाद में झूठा सिद्ध होने पर) वाले व्यक्ति से एक रुपया बीस पैसे प्रतिशत के हिसाब से दण्ड वसूलना चाहिए।
द्विकं शतं वा गृह्णीयात्सतां धर्ममनुस्मरन् ।
द्विकं शतं हि गृह्णानो न भवत्यर्थकिल्विषी ।। 141 ॥
सज्जनों की परम्परा के अनुसार दो प्रतिशत ब्याज लेना चाहिए। दो प्रतिशत ब्याज लेने वाला किसी भी प्रकार से पाप का भागी नहीं होता।
द्विकं त्रिकं चतुष्कं च पञ्चकञ्चशतं समम् ।
मासस्य वृद्धिं गृह्णीयाद्वर्णानामनुपूर्वशः ।। 142 ।।
ब्राह्मण से दो प्रतिशत, क्षत्रिय से तीन प्रतिशत, वैश्य से चार प्रतिशत तथा शूद्र से पांच प्रतिशत प्रतिमाह ब्याज लेना चाहिए।
नत्वेवाधोसोपकारे कौसीदीं वृद्धिमाप्नुयात्।
न चाधेः कालसंरोधान्निसर्गोऽस्ति न विक्रयः ।। 143 ।।
ऋण में दी गई राशि जब भोगयुक्त पदार्थों (जैसे भूमि, पशु आदि) को रेहन (बन्धक) रख कर दी जाती है तब उस पर ब्याज लेना अनुचित होता है। उन्हें निश्चित समय पर नहीं छुड़ाए जाने पर भी कर्जा देने वाले को उन्हें बेचने या किसी और को देने का अधिकार नहीं होता।
न भोक्तव्यो बलादाधिर्भुञ्जानो वृद्धिमुत्सृजेत् ।
मूल्येन तोषयेच्चैनमाधिंस्तेनोऽन्यथा भवेत् ॥ 144 ।।
बन्धक (रेहन) के रूप में रखे पदार्थ का अनुचित उपभोग नहीं करे। उसका उपभोग करने पर ऋण में दी गई राशि पर ब्याज लेने का अधिकार समाप्त हो जाता है। यदि ऋण देने वाले द्वारा पदार्थ का उपभोग किया जाता है तो आधि (रेहन रूप में आई) में आई किसी भी तरह की क्षति को उसे पूरा करना चाहिए।
आधिश्चोपनिधिश्चोभौ न कालात्ययमर्हतः ।
अवहार्यों भवेतां तौ दीर्घकालमवस्थितौ ।। 145 ।।
अमानत में रखे पदार्थों की निश्चित अवधि व्यतीत हो जाने पर भी स्वामी का स्वामित्व समाप्त नहीं होता। बहुत दिनों के बाद भी स्वामी अपनी सुविधा के अनुसार गिरवी और अमानत रखे पदार्थों को छुड़ा सकता है।
सम्प्रीत्याभुज्यमानानि न नश्यन्ति कदाचन।
धेनुरुष्टो वहन्नश्वो यश्च दम्यः प्रयुज्यते ।। 146 ।।
गाय, ऊंट, घोड़ा आदि पशुओं का दूसरों द्वारा प्रेम सहित उपभोग करते रहने पर भी उनके मूल स्वामी का अधिकार खत्म नहीं होता।
यत्किञ्चिद्दशवर्षाणि सन्निधो प्रेक्षतो धनी।
भुज्यमानं परैस्तूष्णीं न स तल्लब्धुमर्हति ।। 147 ।।
अगर गिरवी रखी या किसी (विधि सम्मत) और प्रकार से अधिकार में आई वस्तु या पदार्थ को कोई अन्य व्यक्ति स्वामी की जानकारी में दस वर्षों तक बराबर अपने उपयोग में लाता रहता है और स्वामी चुप रहता है (कोई विवाद नहीं करता) तो उस वस्तु पर उसका उपयोग करने वाले का ही अधिकार हो जाता है।
अजडश्चेदपौगण्डो विषये चास्य भुज्यते।
भग्नं तद्व्यवहारेण भोक्ता तद् द्रव्यमर्हति ।। 148 ।।
अगर बंधक (गिरवी) या धरोहर रखने वाला बालक या पागल नहीं है और उसके सम्मुख ही दूसरा व्यक्ति उस वस्तु का उपभोग करता रहता है तो न्यायालय उपभोग करने वाले को ही उस वस्तु का स्वामी बना देता है।
टिप्पणी - इस श्लोक के अर्थ को श्लोक संख्या 147 के संदर्भ में ही लेना चाहिए।
आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधिः स्त्रियः ।
राजस्वं श्रोत्रियस्वं च न भोगेन प्रणश्यति ।। 149 ।।
बन्धक, बालधन, धरोहर की राशि, नारियां, राजा का धन तथा श्रोत्रिय-धन आदि का दूसरे द्वारा भोग किए जाने पर भी भोगने वाले के नहीं होते और अपने स्वामी के ही बने रहते हैं।
यः स्वामिनाऽननुज्ञातमाधिभुङ्ङ्क्ते विचक्षणः । तेनार्धवृद्धिर्भोक्तव्या तस्य भोगस्य निष्कृतिः ॥ 150 ।।
यदि कोई चालाक व्यक्ति किसी भी बन्धक को उसकी आज्ञा लिए बिना ही उपयोग में लाता है तो उसे भोग करने के बदले में निश्चित ब्याज की राशि का आधा हिस्सा ही वसूलने का अधिकार होता है।
कुसीदवृद्धिद्वैगुण्य नास्त्येति सकृदाहृता।
धान्ये सदे लवे बाह्ये नातिक्रामति पञ्चताम् ॥ 151 ॥
एक बार नकद मूलधन का ब्याज लेने पर, ब्याज पुनः मूलधन से दो गुना नहीं हो सकता। धान्य, पेड-मूल, फल, ऊन तथा वाहन आदि के मूलधन पर ब्याज उससे (मूलधन से) पांच गुने से ज्यादा नहीं हो सकता।
कृतानुसारादधिका व्यतिरिक्ता न सिध्यति ।
कुसीदपथमाहुस्तं पञ्चकं शतमर्हति ।। 152 ॥
ब्याज की जो दर निर्धारित की गई है, शास्त्र उससे अधिक वसूली करने की
आज्ञा नहीं दे सकता। किसी भी रूप में ब्याज दर पांच प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
नातिसांवत्सरीं वृद्धिं न चादृष्टां पुनर्हरत ।
चक्रवृद्धिः कालवृद्धिः कारिका कायिता च या ॥ 153 ॥
मासिक दर से निश्चित किए गए ब्याज को एक वर्ष के बाद वसूल कर लेना चाहिए। इस बारे में न तो ज्यादा बढ़ाना चाहिए और न ही सूद-पर-सूद लेना चाहिए तथा सूद के बदले शारीरिक परिश्रम भी नहीं कराना चाहिए।
ऋणं दातुमशक्तो यः कर्तुमिच्छेत् पुनः क्रियाम्।
स दत्त्वा निर्जितावृद्धिकरणं परिवर्तयेत् ।। 154 ।।
जो व्यक्ति कर्ज चुकाने में असमर्थ हो, वह ब्याज की धनराशि चुकता करने के बाद नए ढंग से लिखा-पढ़ी करे।
अदर्शयित्वा तत्रैव हिरण्यं परिवर्तयेत् ।
यावती सम्भवेत् वृद्धिस्तावतीं दातुमर्हति ।। 155 ।।
जो व्यक्ति ब्याज की राशि देने में समर्थ नहीं हो उसके मूलधन में ब्याज को जोड़ देना चाहिए और कुल राशि पर उससे आगे का ब्याज वसूलना चाहिए।
चक्रवृद्धिं समारूढा देशकालव्यवस्थितः ।
अतिक्रामन्देशकालौ न तत्फलमवाप्नुयात् ॥ 156 ॥
उस धनवान व्यक्ति को जो चक्रवृद्धि ब्याज (सूद पर सूद) लेता है, देश तथा काल में प्रचलित नियमों का पालन करना चाहिए। ऐसा नहीं करने वाला व्यापारी फल को प्राप्त नहीं कर पाता।
समुद्रयानकुशला देशकालार्थदर्शिनः ।
स्थापयन्ति तु यां वृद्धिं सा तत्राधिगमं प्रति ।। 157 ॥।
देश, काल तथा अर्थ के उपयोग की जानकारी रखने वाले तथा समुद्री जहाज से यात्रा करने में कुशल व्यापारी जिस तरह अपने धन को बढ़ाते हैं, वही इस तथ्य का प्रमाण है कि धन का उपयोग किस प्रकार करना चाहिए।
यो यस्य प्रतिभूस्तिष्ठेद्दर्शनायेह मानवः ।
अदर्शयन् सतं तस्य प्रयच्छेत्स्वधनादृणम् ॥ 158 ।।
जो व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की जमानत या उसको प्रस्तुत करने का उत्तरदायित्व लेता है, लेकिन वह उसे प्रस्तुत नहीं कर पाता तो उसे उस दूसरे व्यक्ति का कर्जा स्वयं चुकाना चाहिए।
प्रतिभाव्यं वृथादानमाक्षिकं सौरिकं च यत्।
दण्डशुक्लावशेषं च न पुत्रो मातुमर्हति ॥ 159 ।।
पिता की मृत्यु होने पर उसके जमानती होने, बेकार में गंवाए (शराब पीने या वेश्यागमन करने के उद्देश्य से लिए उधार) धन का, जुए में हारी धनराशि का, शराब बेचने वाले के उधार का और आर्थिक दण्ड की बची राशि का उत्तरदायित्व पुत्र पर नहीं होता।
दर्शनं प्रातिभाव्ये तु विधिः स्यात्पूर्व चोदितः ।
दान प्रतिभुवि प्रेते दायादानपि दापयेत् ।। 160 ॥
कर देने के विवाद में भी पिता का दाय पुत्र पर नहीं होता। इसमें भी पहले बताई विधि ही अपनाई जाती है। जमानत देने वाले व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर उसके उत्तराधिकारियों की सहमति से, उनसे जमानत दिलायी जा सकती है।
अदातरि पुनर्दाता विज्ञातप्रकृतावृणम् ।
पश्चात्प्रतिभुवि प्रेते परीप्सेत्केन हेतुना ।। 161 ।।
केवल कर्जा लेने वाले को न्यायायल में पेश करने की जमानत लेने वाला (उसके कर्जे को चुकाने की नहीं) जमानती (प्रतिभू) अगर मर जाता है और कर्जा देने वाले को यह सब ज्ञात है तो जमानती के पुत्र-पौत्र आदि किसी भी तरह जिम्मेवार नहीं होते।
निरादिष्टधनश्चेत्तु प्रतिभूः स्यादलङ्घनः ।
स्वधनादेव तद्दद्यान्निरादिष्ट इति स्थितिः ॥ 162 ।।
पूर्व श्लोक में कहे गए प्रतिभू (जमानती) को अगर कर्जा लेने वाले ने कर्जे की राशि दे दी है लेकिन कर्जा देने वाले ने धन वापिस करने के लिए नहीं कहा और ऐसी स्थिति में प्रतिभु (जमानती) की मृत्यु हो जाए तथा उसका पुत्र उस कर्जे के धन को अपनी सम्पत्ति में से चुकाने में समर्थ हो तो वह कर्जा देने वाले का कर्ज चुका दे, यही शास्त्र मर्यादा है।
मत्तोन्मत्तार्ताध्यधीनैर्बालेन स्थविरेण वा।
असम्बद्ध कृतश्चैव व्यवहारो न सिद्धयति ॥ 163 ॥
ऐसे व्यक्तियों के साथ किया गया लेन-देन जो शराब आदि नशों के वश में पड़ा हो, पागल, रोगग्रस्त या पीड़ित हो अथवा धन नहीं कमाता हो या बालक अथवा वृद्ध हो तथा किया गया लेने-देन असम्बद्ध हो उसे प्रामाणिक नहीं मान। जाता।
सत्या न भाषा भवति यद्यपि स्यात्प्रतिष्ठिता।
बहिश्चेद्भाष्यते धर्मान्नियताद्व्यावहारिकात ।। 164 ।।
ऐसे प्रतिज्ञा-पत्र जो कानून या परम्परा के विरुद्ध हो प्रामाणिक नहीं माना जाता चाहे वह आपस में निश्चित करके मौखिक या लिखित रूप में प्राप्त हो।
योगाधनमविक्रीतं योगदानप्रतिग्रहम् ।
यत्र वाप्युपधिं पश्येत्तत्सर्वं विनिवर्तयेत् ॥ 165 ।।
बन्धक में रखी वस्तु का जो विक्रय-पत्र छल-कपट से बनाया गया हो या छल से बंधक रखी वस्तु का दान करने या वापस करने की लिखा-पढ़ी की गई हो उसे रद्द कर देना चाहिए। बन्धक तथा धरोहर को वापस कर देना चाहिए।
ग्रहीता यदि नष्टः स्यात्कुटुम्बार्थे कृतोव्ययः ।
दातव्यं बान्धवैस्तत्स्यात्प्रतिभक्तैरपि स्वतः ।। 166 ॥
परिवार का पालन-पोषण करने के लिए कर्ज लेने वाले की मृत्यु हो जाने पर परिवार के सदस्यों पर संपत्ति का बंटवारा होने या न होने पर उस कर्जे को चुकाने की पूरी जिम्मेवारी है।
कुटुम्बार्थेऽप्यधीनोऽपि व्यवहारं समाचरेत् ।
स्वदेशे व विदेशे वा तं ज्यायान्नविचालयेत् ।। 167 ।।
अपने परिवार की ओर से परिवार का कोई अधीन वयस्क सदस्य (जैसे पत्नी, पुत्र आदि) अपने या दूसरे देश में कोई लेन-देन करता है तो परिवार के मुखिया को उसे अमान्य (न मानने योग्य) नहीं करना चाहिए।
बलाद्दत्तं बलाद्भुक्तं बलाद्यच्चापि लेखितम्। सर्वान्बलकृतानर्थानकृतान्मनुरब्रवीत् II 168 II
भृगु महाराज कहते हैं-ऋषियो! भगवान मनु का स्पष्ट आदेश है कि बल प्रयोग द्वारा लिखाया गया या कराया गया कार्य अथवा भोगी गयी वस्तु को अप्रामाणिक मानना चाहिए (अर्थात् बल दिखाकर भोगी गई या ली गई वस्तु, धन, स्त्री आदि पर उसके स्वामी का ही अधिकार है)।
त्रयः परार्थे क्लिश्यन्ति साक्षिणः प्रतिभूः कुलम्। चत्वारस्तूपचीयन्ते विप्रआढ्योवणिङ् नृपः ।। 169 ॥
साक्षी (गवाही देने वाला), जमानती तथा परिवार ये तीनों दूसरों के लिए दुख सहते हैं और ब्राह्मण, वैश्य, साहूकार तथा राजा ये चारों दूसरों के कारण बढ़ते हैं अर्थात् उन्नति करते हैं।
अनादेयस्य चादानादादेयस्य च वर्जनात् ।
दौर्बल्यं ख्याप्यते राज्ञः स प्रेत्येह च नश्यति ।। 170 ॥
राजा द्वारा जो देने योग्य नहीं उसे देने तथा देने योग्य को नहीं देने से उसकी दुर्बलता सिद्ध होती है और इससे वह इहलोक एवं परलोक में नष्ट हो जाता है।
स्वादानाद्वर्णसंसर्गादबलानां च रक्षणात्।
बलं सञ्जायते राज्ञः स प्रेत्येह च वर्धते ।। 171 ।।
राजा की शक्ति न्याय के अनुसार उचित तथा ग्रहण करने योग्य को ग्रहण करने, सभी वर्गों के लोगों को अपने-अपने नियमों का पालन करने में स्थिर रखने तथा कमजोरों की रक्षा करने से बढ़ती है। वह इस संसार में तथा परलोक में यश प्राप्त करता है।
तस्माद्यम इव स्वामी स्वयं हित्वाप्रियाप्रिये।
वर्तेत याम्यया वृत्त्या जितक्रोधोजितेन्द्रियः ॥ 172 ॥
राजा तथा यम को इसलिए समान माना गया है क्योंकि राजा को यम की भांति अपने क्रोध तथा इन्द्रियों पर विजय पाकर, अपने प्रिय तथा अप्रिय को बिना महत्व दिए
सब लोगों के साथ उनके कर्मों के अनुसार व्यवहार करना होता है।
यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात्कुर्यान्नराधिपः ।
अचिरात्तं दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रवः ॥ 173 ॥
मोह के वश में आकर या अधर्म में पड़कर व्यवहार करने वाले दुरात्मा राजा को उसके शत्रु जल्दी ही अपने वश में कर लेते हैं।
कामक्रोधौ तु संयम्य योऽर्थान् धर्मेण पश्यति।
प्रजास्तमनुवर्तन्ते समुद्रमिव सिन्धवः ॥ 174 ॥
जो राजा काम तथा क्रोध को त्याग कर धर्मानुसार आर्थिक विवादों को निपटाता है उसकी प्रजा इस तरह उसके अनुकूल रहती है जैसे नदियां सागर की ओर बहती हैं।
यः साधयन्तं छन्देन वेदयेद्धमिकं नृपे।
स राज्ञा तच्चतुर्भागं दाप्यस्तस्य च तद्धनम् ।। 175 ।।
कर्जा लेने वाला जो व्यक्ति कर्जा देने वाले द्वारा मनमानी रीति से अधिक धन बसल करने की शिकायत करे तो राजा को चाहिए कि न्याय द्वारा उचित रीति से उसको रुपया वापस दिलवाते हुए, कर्जा देने वाले पर मूलधन का चतुर्थांश आर्थिक दण्ड लगाए।
कर्मणापि समं कुर्याद्धनिकायाधमर्णिकः ।
समोऽवकृष्टजातिस्तु दद्याच्छ्रेयास्तु तच्छनैः ।। 176 ।।
यदि ऋणी (कर्जा लेने वाला) ऋण देने की सामर्थ्य नहीं रखता तथा वह ऋण दाता की समान या उससे छोटी जाति वाला हो तो वह ऋणी कर्जा देने वाले (ऋणदाता) के यहां कार्य करके अपने कर्जे को चुकता करे। अगर ऋण लेने वाला, ऋण देने वाले से ऊंची जाति का हो तो अपना कर्जा किश्तों में चुकता करे।
अनेन विधिना राजा मिथोविवदतां नृणाम्।
साक्षिप्रत्ययसिद्धानि कार्याणि समता नयेत् ।। 177 ॥
राजा को चाहिए कि वह प्रजाजनों के पारस्परिक विवादों को गवाहों, दस्तावेजों और अन्य प्रमाणों के अनुसार न्यायपूर्वक निपटाए।
कुलजे वृत्तसम्पन्ने धर्मज्ञे सत्यवादिनि ।
महापक्षे धनिन्यार्ये निक्षेपं निक्षिपेद्बुधः ॥ 178 ।।
बुद्धिमान पुरुष को अच्छे कुल वाले, आचारवान, धर्मात्मा, सत्य बोलने वाले, प्रसिद्ध और आर्य समझे जाने वाले धनवान व्यक्ति के यहां ही अपनी चीज (वस्तु आदि) धरोहर रखनी चाहिए।
यो यथा निक्षिपेद्धस्ते यमर्थं यस्य मानवः ।
स तथैव ग्रहीतव्यो यथा दायस्तथाग्रहः ।। 179 ।।
जो व्यक्ति अपनी वस्तु को जिस हालत में किसी व्यक्ति के यहां रखता है, उस व्यक्ति को चाहिए कि दूसरे को वह वस्तु उसी रूप या स्थिति में वापिस करे। लेन-देन में एकरूपता का होना जरूरी है।
यो निक्षेपं याच्यमानो निक्षेप्तुर्न प्रयच्छति।
सः याच्यः प्राङ्विवाकेन तन्निक्षेसुरसन्निधौ ।। 180 ॥
अगर धरोहर रखने वाले से धरोहर का स्वामी अपना धरोहर वापस मांगे और वह उसे नहीं दे तो न्यायाधीश धरोहर रखने वाले की अनुपस्थिति में उससे पूछताछ करे।
साक्ष्यऽभावे प्रणिधिभिर्वयोरूपसमन्वितैः ।
अपदेशैश्च संन्यस्य हिरण्यं तस्य तत्त्वतः ॥ 181 ।।
किसी भी साक्षी के नहीं होने पर न्यायकर्ता को अपने वृद्ध तथा आचारवान (गुप्त) दूतों द्वारा उस व्यक्ति के पास मूल्यवान पदार्थ किसी बहाने से धरोहर रूप में रखवा देने चाहिए।
स यदि प्रतिपद्येत यथान्यस्तं यथाकृतम्।
न तत्र विद्यते किञ्चिद्यत्परैरभियुज्यते ।। 182 ।।
यदि गुप्त दूत के मांगने वह व्यक्ति उसकी धरोहर सुरक्षित दशा में वापिस कर देता है तो न्यायकर्ता को शिकायत करने वाले व्यक्ति को झूठा समझना चाहिए।
तेषां न, दद्याद्यदि तु सद्धिरण्यं यथाविधिः ।
उभौनिगृह्य दाप्यः स्यादिति धर्मस्य धारणा । 183 ।।
यदि धरोहर रखने वाला गुप्त दूतों को भी उनकी धरोहर रखी वस्तु नहीं वापस करता तो उसे ताड़न आदि दण्ड से वश में करके दोनों (शिकायतकर्ता तथा गुप्त दूत) की धरोहर वापिस निकलवानी चाहिए।
निक्षेपापनिधी नित्यं न देयोप्रत्यनन्तरे।
नश्यतो विनिपाते तावनिपातत्वनाशिनौ ॥ 184 ॥
बन्धक तथा धरोहर की वस्तुओं को उनके सच्चे स्वामी के अतिरिक्त उनके उत्तराधिकारियों को नहीं देना चाहिए। अगर इन चीजों के स्वामी की मृत्यु हो जाती है और वह अपने उत्तराधिकारियों को आवश्यक तथ्य बताए बिना मर गया है तो वे वस्तुएं धरोहर रखने वाले की ही हो जाती हैं।
स्वयमेव तु यो दाद्यान्मृतस्य प्रत्यनन्तरे ।
न स राज्ञा नियोक्तव्यो न निक्षेप्तश्च बन्धभिः ॥ 185 ॥
धरोहर को रखने वाला व्यक्ति अगर धरोहर के वास्तविक अधिकारी की मृत्यु के पश्चात् अपनी इच्छा से उस धरोहर की वस्तु को उसके उत्तराधिकारियों को वापस कर देता है तो राजा को उसमें दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए।
अच्छलेनैव चान्विच्छेत्तमर्थं प्रीतिपूर्वकम्।
विचार्य तस्य वा वृत्तं साम्नैव परिसाधयेत् ॥ 186 ।।
जो व्यक्ति अपने स्वर्गीय पिता द्वारा किसी के यहां रखी धरोहर या बन्धक को वापस लेना चाहता है उसे निश्च्छलता तथा प्रेमपूर्वक इसके लिए प्रयत्न करना चाहिए। उसे अपनी कमजोर स्थिति का ध्यान रखते हुए अपने कार्य को सिद्ध करने का प्रयत्न करना चाहिए।
निक्षेपेष्वेषु सर्वेषु विधिः स्यात्त्वरिसाधने। समुद्रेनाप्नुयात्किञ्चिद्यदि तस्मान्न संहरेत् ॥ 187 ।।
सभी तरह की धरोहरों की वस्तुओं की सत्यता को बनाए रखने की एक विधि उन पर गोपनीय रूप से अपनी मोहर लगाना या विशेष चिह्न बनाना है। इससे किसी तरह के छल-कपट की आशंका नहीं रहती।
चौरैर्हतं जलेनोढमग्निना दग्धमेव वा।
न दद्याद्यदि तस्मात्सः न संहरति किंचन ।। 188 ।।
नक्षेपस्यापहर्तारमऽविक्षेप्तारमेव च। सर्वैरुपायैरन्विच्छेच्छपथैश्चैव वैदिकैः ।। 189 ॥
अगर धरोहर रखने वाले व्यक्ति के यहां रखी धरोहर की चोरी हो जाए अथवा वह जल द्वारा बह जाए या आग द्वारा जल जाए तो उस धरोहर के विषय में उस पर कोई मुकदमा अथवा अभियोग नहीं चलाया जा सकता।
न्यायाधीश साम (समझाने-बुझाने) आदि उपायों और वैदिक शपथों से धरोहर का हरण करने वाले तथा धरोहर रखे बिना ही उसकी झूठी मांग करने वाले से पूछताछ कर सच्चाई जानने का प्रयत्न करे।
यौ निक्षेपं नार्पयति यश्चानिक्षिप्य याचते।
तावुभौ चौरवच्चास्यौ दाप्यौ वा तस्समं दमम्॥ 190 |
धरोहर को नहीं लौटाने वाले तथा धरोहर रखे बिना ही उसको मांगने वाले दोनों को ही चोर के समान दण्ड देना चाहिए। धरोहर की राशि के बराबर ही उन दोनों पर अर्थदण्ड (जुर्माना) लगाना चाहिए।
निक्षेपस्यापहर्तारं तत्समं दापयेद्दमम्।
तथोपनिधिहर्तारमविशेषेण पार्थिवः ।। 191 ॥
धरोहर रखकर फिर उसे न देने वाले को राजा धरोहर राशि के बराबर अर्थ दण्ड दे। इसी तरह बन्धक को नहीं लौटाने वाले को भी यही अर्थदण्ड देना चाहिए।
उपधानिश्च यः कश्चित्परद्रव्यं हरेन्नरः ।
स सहायः स हन्तव्यः प्रकाशंविविधैर्वधैः ।। 192 ॥
राजा का जो कर्मचारी अपने को राजा का प्रिय बताकर तथा राजकृपा का आश्वासन देकर प्रजा से घूस ग्रहण करता है उसे सबके सामने तरह-तरह की यातनाएं देकर जान से मार देना चाहिए।
निक्षेपो यः कृतो येन यावांश्च कुलसन्निधौ।
तावानेव स विज्ञेया विब्रुवन्दण्डमर्हति ।। 193 ।।
यदि कोई व्यक्ति गवाहों की उपस्थिति में स्वर्णादि को धरोहर स्वरूप रखवाता है और उसे वापिस लेते समय वह बहुमूल्य वस्तु वजन में कुछ कम हो, तो धरोहर रखने वाले को साक्षी लोगों के वचन को प्रमाण मानते हुए उस वस्तु के वजन को पूरा करना चाहिए।
मिथो दायः कृतोयेन गृहीतो मिथ एव वा।
मिथएव प्रदातव्यो यथादायस्तथा ग्रहः ।। 194 ॥
यदि धरोहर देने व रखने वाले ने परस्पर विश्वास के आधार पर ही धरोहर दी-ली हो, तो ऐसी स्थिति में धरोहर की वापसी भी परस्पर विश्वास पर ही होनी चाहिए और लेन-देन के दौरान इस भरोसे को बनाए रखना चाहिए।
निक्षिप्तस्य धनस्यैवं प्रीत्योपनिहितस्य च।
राजा विनिर्णयं कुर्यादक्षिण्वन्न्यासधारिणम् ॥ 195 ।।
धरोहर स्वरूप रखे हुए धन तथा स्वेच्छा व प्रेम से दूसरे को इस्तेमाल के लिए दी गई वस्तुओं को वापिस लेने के लिए ऐसे व्यवहार अथवा बर्ताव का पालन करना चाहिए कि धरोहर रखने वाले व्यक्ति को कष्ट न हो और उसे बुरा न लगे।
विक्रीणिते परस्य स्वंयोऽस्वामी स्वाम्यसम्मतः ।
न तं नयेत साक्ष्यंतु स्तेनमस्तेनमानिनम् ॥ 196 ॥
जो व्यक्ति धरोहर के स्वामी की अनुमति लिए बिना उसे बेच देता है और स्वयं को सज्जन व सच्चरित्र कहता है, उसे चोर समझें तथा उसके कथ्य अथवा गवाही पर भरोसा न करें।
अवहार्योभवेच्चैव सान्वयः षट्शतं दमम् ।
निरन्वयोऽनपसरः प्राप्तः स्याच्चौरकिल्विषम् ।। 197 ।।
दूसरे की वस्तु को उसकी आज्ञा बिना ही बेचने वाला व्यक्ति यदि धन के स्वामी का कर्मचारी हो तो उसे छः गुना दण्ड देना चाहिए। अगर वह धन के स्वामी का न तो सम्बन्धी है न ही कर्मचारी तो वह निश्चित ही चोर है, अतः इसी रूप में उसे दण्ड मिलना चाहिए।
अस्वामिना कृतोयस्तु दायो विक्रय एव वा।
अकृतः स तु विज्ञेयो व्यवहारे यथास्थितिः ।। 198 ।।
वस्तु के मालिक की अनुमति के बगैर उसकी खरीद-बेच को मर्यादानुसार किया गया क्रय-विक्रय नहीं समझना चाहिए।
सम्भोगो दृश्यते यत्र नदृश्येतागमः क्वचित्।
आगमः कारणं तत्र न सम्भोग इति स्थितिः ॥ 199 ॥
यदि वस्तु की खरीद का कोई सबूत न हो, लेकिन उसका उपभोग सर्वविदित हो, इसके उलट वस्तु के क्रय का प्रमाण तो हो किंतु वह उसका उपभोक्ता न हो-ऐसी स्थिति में जिस व्यक्ति ने वस्तु खरीदी है-उसे ही वास्तविक स्वामी समझना चाहिए।
विक्रयाद्योधनं किञ्चिद् दृह्णीयात्कुलसन्निधौ ।
क्रयेण सः विशुद्धं हि न्यायतो लभते धनम् ।। 200 ।।
यदि व्यक्ति अपने परिवार के सान्निध्य के माध्यम से विक्रय में धन प्राप्त करता है तो क्रय से विशुद्ध उस धन को न्यायोचित रूप से प्राप्त समझना चाहिए।
अथ मूलमनाहार्य प्रकाशक्रयशोधितः ।
अदण्ड्योमुच्यते राज्ञा नाष्टिको लभते धनम् ॥ 201 ।।
स्वयं को वस्तु का स्वामी कहने वाला या स्वामी के स्थान पर किसी व्यक्ति से सार्वजनिक रूप से वस्तु खरीदने वाला व्यक्ति यदि विक्रेता को न भी ला सके, तो भी वह दण्ड योग्य नहीं है।
नान्यदन्येन संसृष्टरूपं विक्रयमर्हति ।
न चासारं न च न्यूनं न दूरेण तिरोहितम् ॥ 202।।
मनुष्य वस्तु विशेष के स्थान पर किसी और वस्तु को, सड़ी-गली, वजन में कम, केवल दूर से ही ठीक दिखने वाली तथा ढकी हुई वस्तु को न बेचे। बिक्री के समय ग्राहक को वस्तु की ठीक-ठीक स्थिति बता देनी चाहिए।
अन्यां चेद्दर्शयित्वाऽन्यो वोढुः कन्या प्रदीयते।
उभे ते एकशुल्केन वहेदित्यब्रवीन्मनुः ।। 203 ।।
माता-पिता किसी दूसरी कन्या को दिखलाकर विवाह किसी और कन्या से करवा दें तो मनु जी के मतानुसार दोनों कन्याओं का समान शुल्क होता है।
नोन्मत्तायाः न कुष्ठिन्याः न चया स्पृष्टमैथुना।
पूर्व दोषाननभिख्याप्य प्रदाता दण्डमर्हति ॥ 204 ।।
विवाह के समय कन्या के पागलपन, कोढ़ादि रोग एवं अन्य से सहवासादि दोषों को छिपाने वाले कन्या के माता-पिता, भाई इत्यादि दण्डनीय होते हैं।
ऋत्विग्यदि वृतोयज्ञे स्वकर्म परिहापयेत् ।
तस्य कर्मानुरूपेण देयोंऽशः सह कर्तृभिः ।। 205 ।।
रोगादि अपरिहार्य कारणवश यदि यक्ष में वरण किया गया ऋत्विज काम को बीच में ही छोड़ देता है तो उसे उसके द्वारा किए गए कर्म के आधार पर दक्षिणा मिलनी चाहिए।
दक्षिणासु च दत्तासु स्वकर्म परिहापयन् ।
कृत्स्नमेव लभेतांशमन्येनैव च कारयेत् ।। 206 ।।
ऋत्विज अगर दक्षिणा लेने के पश्चात् अपने कार्य को किसी कारणवश पूर्ण न कर पाए तो उससे दक्षिणा वापिस लेकर उस व्यक्ति को दे देना चाहिए जो यह कार्य पूरा करे।
यस्मिन् कर्मणि यास्तु स्युरुक्ताः प्रत्यङ्गदक्षिणाः ।
स एव ता आददीत भजेरन्सर्वएव वा ।। 207 ।।
वह कर्म जिसमें हर भाग के लिए भिन्न दक्षिणा का विधान है, उसमें जो व्यक्ति जितने भाग को सम्पन्न करे, उसे उतने अंश की दक्षिणा देनी चाहिए।
रथं हरेत वाध्वर्युर्ब्रह्माधाने च वाजिनम्।
होता वापि हरेदश्वमुद्द्याताचाप्यनः क्रये ।। 208 ।।
यज्ञ में अध्वर्यु रथ को, अश्व को ब्रह्मा एवं होता और उद्गाता सोमक्रय को धारण करने के लिए शकट को ग्रहण करें।
।सर्वेषामर्धिनो मुख्यास्तथार्थेनाधिनोऽपरे। तृतीयिनस्तृतीयांशाश्चतुर्थांशाश्च पादिनः ।। 209 ।।
चार मुख्य ऋत्विज सभी यज्ञों में दक्षिणा का आधा भाग लेते हैं। उनसे आधा भाग लेने वाले अन्य चार, उनसे तीसरा भाग लेने वाले दूसरे चार और उनसे चौथा भाग लेने वाले और चार ऋत्विज होते हैं। अतः कुल सोलह ऋत्विज होते हैं।
सम्भूय स्वानि कर्माणि कुर्वद्भिरिह मानवैः ।
अनेन विधियोगेन कर्तव्यांशप्रकल्पना ।। 210 ।।
इस प्रकार मिलकर कार्य करने वाले लोगों को अपने-अपने भाग को लेना चाहिए।
धर्मार्थं येन दत्तं स्यात्कस्मैचिद्याचते धनम् ।
पश्चाच्च न तथा तत्स्यान्न देयं तस्य तद्भवेत् ।। 211 ।।
यदि कोई व्यक्ति धर्म-कार्य हेतु धन देता है तो उस पः उसका अधिकार खत्म हो जाता है। उसी धन को वह दूसरी बार किसी अन्य को नहीं दे सकता।
यदि संसाधयेत्तत्तु दर्पाल्लोभेन वा पुनः ।
राज्ञादाप्यः सुवर्णः स्यात्तस्यस्तेयस्य निष्कृतिः ।। 212 ॥
एक बार लोभवश या अहंकार से दिए गए दान को वापस लेना पाप है। राजा द्वारा ऐसे व्यक्ति को इस पाप से मुक्त करने के लिए सुवर्ण का दण्ड देना चाहिए।
दत्तस्यैषोदिता धर्या यथावदनपक्रिया।
अतऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वेतनस्यानपक्रियाम् ।। 213 ॥
भृगु जी ने कहा-जिस दण्ड विधान की जानकारी मैंने अभी तक आपको दी, उसके अंतर्गत धरोहर, बंधक दानादि के देने-लेने एवं रखने के नियम आते हैं। अब मैं आपको वेतन देने अथवा न देने के संदर्भ में क्या विधान है- इसके बारे में बतलाता हूं।
भृत्यो नार्तों न कुर्याद्यो दर्पात्कर्म यथोदितम् ।
स दण्ड्यः कृष्णलान्यष्टौ न देयं चास्यवेतनम् ।। 214 ।।
यदि भृत्य अर्थात् नौकर स्वस्थ होने के बावजूद अपने मालिक के द्वारा निर्दिष्ट कार्य को नहीं करता तो उसे आठ बेंतों का दण्ड मिलना चाहिए तथा उसे वेतन भी नहीं मिलना चाहिए।
आर्तस्तु कुर्यात्स्वस्थः सन्यथाभाषितमादितः ।
सः दीर्घस्यापि कालस्य तल्लभेतैव वेतनम् ॥ 215 ॥
किन्तु जो नौकर स्वस्थ अवस्था में ईमानदारी व निष्ठा से मालिक के आदेश का पालन करता है, वह रोगादि के कारण यदि लंबे समय तक अनुपस्थित भी रहे, तो भी उसे वेतन मिलना चाहिए।
यथोक्तमार्तः सुस्थोवा यस्तत्कर्म न कारयेत् ।
न तस्य वेतनं देयमल्पोऽनस्यापि कर्मणः ।। 216 ॥
पूर्व निश्चित कार्य को स्वस्थ अथवा बीमार व्यक्ति यदि पूरा नहीं करता, तो थोड़ा सा कार्य बचे रहने पर भी उसे पूरे काम का वेतन नहीं देना चाहिए।
एषधर्मोऽखिलेनोक्तो वेतनादानकर्मणः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि धर्म समयभेदिनाम् ।। 217 ॥
वेतन सम्बन्धी इन नियमों के पश्चात् अब मैं आपसे प्रतिज्ञा भंग करने वालों के लिए नियत दण्ड विधान के बारे में कहता हूं।
योग्रामदेशसङ्घानां कृत्वा सत्येन संविदम् ।
विसंवदेन्नरो लोभात्तं राष्ट्राद्विप्रवासयेत् ।। 218 ।।
यदि ग्राम, देश और संघों के साथ किसी वस्तु को देने का वचन देकर लोभवश वह व्यक्ति अपने वायदे से मुकर जाता है तो उसे देश से निर्वासित कर देना चाहिए।
निगृह्य दापयेच्चैनं समयव्यभिचारिणाम्।
चतुः सुवर्णान्वण्निष्कांश्छतमानं च राजतम् ।। 219 ॥
जो व्यक्ति काम पूरा करने की प्रतिज्ञा करके समय पर कार्य पूरा न करे उस व्यभिचारी को राजा द्वारा पकड़ लेना चाहिए और उसे चार सुवर्ण, छः निष्क और चांदी के शतमान को देने का दण्ड मिलना चाहिए।
एतद्दण्डविधिः कुर्याद्धार्मिकः पृथिवीपतिः ।
ग्रामजातिसमूहेषु समयव्यभिचारिणाम् ।। 220 ।।
पूर्व निश्चित समय पर कार्य पूरा न करने वाले व्यक्ति को ग्राम, जाति व समुदायों में राजा द्वारा इसी प्रकार दण्ड मिलना चाहिए।
क्रीत्वा बिक्रीय वा किञ्चिद्यस्येहानुशयो भवेत् । सोऽन्तर्दशाहात्तद्रव्यं दद्याच्चैवाददीत च ।। 221 ।।
जो वस्तु खरीद अथवा बेच दी जाने के बाद पसंद न आए उसे दस दिन के भीतर वापिस कर दिया जाना चाहिए। विक्रेता को भी चाहिए कि उस वस्तु को वापिस ले।
परेण तु दशाहस्य न दद्यान्नापि दाययेत्।
आददानाददच्चैव राज्ञादण्ड्यः शतानिषद् ।। 222 ।।
खरीदा-बेचा हुआ सामान दस दिन के बाद वापिस लिया-दिया नहीं जा सकता। जो क्रेता-विक्रेता इस प्रकार का कार्य करते हैं, राजा द्वारा उन्हें छः सौ पणों का दण्ड देना चाहिए।
यस्तु दोषावतीं कन्यामाख्याय प्रयच्छति।
तस्य कुर्वन्नृपो दण्डं स्वयं षण्णवतिं पणान् ॥ 223 ।।
अपनी कन्या के दोषों, कमजोरियों को छिपाकर उसका विवाह कर देने वाले व्यक्ति पर आठ सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
अकन्येति तु यः कन्यां ब्रूयाद्वेषेण मानवः ।
सः शतं प्राप्नुयाद्दण्डं तस्या दोषमदर्शयन् ।। 224 ।।
यदि कोई मनुष्य द्वेष पूर्वक दोष रहित कन्या पर भी दोषारोपण करता है और उसके दोष को दिखा नहीं पाता अर्थात् सिद्ध नहीं कर पाता तो ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति पर सौ पणों का दण्ड लगाने का विधान है।
पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः ।
नरकन्यासु क्वचिन्नृणां लुप्तधर्मक्रिया हि ताः ।। 225 ।।
चूंकि विवाह सम्बन्धी मंत्र कन्याओं के विषय में कहे गए हैं अतः उपरिवर्णित दण्ड का विधान है, ताकि किसी पर झूठा आरोप न लग सके। ये आचारहीन कन्याओं के लिए नहीं है। ऐसी कन्याओं के लिए धर्म-कार्य सम्पन्न नहीं किए जाते।
पाणिग्रहणिका मन्त्राः नियतं दारलक्षणम्।
तेषां निष्ठातु विज्ञेया विद्वद्भिः सप्तमे पदे ॥ 226 ।।
विवाह सम्बन्धी मंत्र निश्चित रूप से कन्या के स्त्री हो जाने के सूचक होते हैं। सप्तपदी के सप्तम पद के समय पढ़े जाने वाले मंत्र के साथ ही इन मंत्रों को पूर्ण हुआ जानें।
यस्मिन्कस्मिन्कृते कार्ये यस्येहानुशयो भवेत्।
तमनेन विधानेन धर्मे पथि निवेशयेत् ॥ 227 ।।
राजा को यदि किसी भी कार्य में दोष का संशय हो, तो वह उसे विधिपूर्वक धर्मानुकूल बनाने का प्रयास करे।
पशुषु स्वामिनां चैव पालनां च व्यतिक्रमे।
विवादं सम्प्रवक्ष्यामि यथावद्धर्मतत्त्वतः ।। 228 ।।
भृगुजी ने कहा- ब्राह्मणो अब पशुओं, पशुपालकों व पशु के स्वामी के बीच होने वाले मतभेदों के विषय में धर्मशास्त्रानुकूल जो विधान है, वह मैं आपको बतलाता हूं।
दिवा वक्तव्यता पाले रात्रौ स्वामिनि तद्गृहे।
योगक्षेमेऽन्यथा चेत्तु पालो वक्तव्यमियात् ।। 229 ।।
दिन में पशुओं की सुरक्षा पशुपालक करें और रात्रि में पशुओं का मालिक उनकी रक्षा करे चूंकि रात में पशु अपने स्वामी के घर में ही रहते हैं अतः चारे व पानी की कमी की स्थिति में भी दिन में पशुओं की सुरक्षा व कल्याण का दायित्व पशुपालक पर ही होता है।
गोपः क्षीरभृतो यस्तु स दुह्यद्दशतोवराम् ।
गोस्वाम्यनुमते भृत्यः सा स्यातपालेऽभृते भृतिः ।। 230 ॥
वेतन के रूप में दूध निश्चित किए जाने पर ग्वाला गायों के स्वामी की अनुपस्थिति में श्रेष्ठ दस गायों में से एक गाय को दुह ले। वही दूध उसका वेतन होगा।
नष्टं विनष्टं कृमिभिः श्वहतं विषमेमृतम्।
हीन पुरुषकारेण प्रदद्यात्पाल एव तु ॥ 231 ।।
पशु के नष्ट होने, नकारा हो जाने, कीड़ों द्वारा खा लिए जाने, कुत्तों द्वारा फाड़ दिए जाने, वन में खो जाने या वनचरों द्वारा वध किए जाने की स्थिति में पशु के स्वामी को ग्वाले द्वारा ही क्षतिपूर्ति करवानी चाहिए।
विघुष्य तु हृतं चौरैर्न पालो दातुमर्हति।
यदि देशे च काले स्वामिनः स्वस्यशंसति ।। 232 ।।
यदि ग्वाले से बलपूर्वक पशु को हर लिया जाता है और वह समय पर अर्थात् तत्काल इसकी सूचना पशु के स्वामी को दे देता है तो पशु की चोरी का पाप उसे नहीं लगता।
कर्णो चर्म च बालांश्च वस्तिं स्नायं च रोचनाम्।
पशुषु स्वामिनां दद्वान्मृतेष्वङ्गानि दर्शयेत् ।। 233 ।।
किसी पशु की मृत्यु हो जाने पर ग्वाले को उसके अंग पशु के स्वामी को दिखला देना चाहिए। मृत पशु के विभिन्न अंगों पर भी पशु के स्वामी का ही अधिकार होता है।
अजाविके तु संरुद्धे वृकैः पाले त्वानयति ।
यां प्रसह्यवृकोहन्यात् पाले तत्किल्विषं भवेत् ॥ 234 ।।
यदि भेड़-बकरियों को कोई भेड़िया पकड़ लेता है और चरवाहा उन्हें भेड़िये के शिकंजे से छुड़ाने का कोई प्रयास नहीं करता तो ऐसी स्थिति में पशु की मृत्यु का अपराधी ग्वाला होता है और उसकी मौत के पाप का भागीदार भी।
तासां चेदवरुद्धानां चरन्तीनां मिथो वने।
यामुत्प्लुत्य वृकोहन्यान्न पालस्तत्र किल्विषी ।। 235 ।।
चरवाहे की देखरेख में जंगल में चरती भेड़-बकरियों पर अचानक भेड़िया धावा बोलकर एकाध भेड़-बकरी को ले जाता है तो इसके लिए चरवाहे को उत्तरदायी नहीं माना जा सकता।
धनुःशत परीहारो ग्रामस्य स्यात्समन्ततः ।
शम्यापातास्त्रयो वाऽपि त्रिगुणो नगरस्य तु ॥ 236 ॥
पशुओं के चारागाह के लिए गांव के चारों ओर चार सौ हाथ परिमाण में या तीन बार लाठी फेंकने से घिरने वाली जमीन तथा नगर में इससे तिगुनी धरती छोड़ देनी चाहिए।
तत्रापरिवृतं धान्यं विहिंस्युः पशवो यदि ।
न तत्र प्रणयेद्दण्डं नृपतिः पशुरक्षिणाम् ॥ 237 ॥
यदि पशुओं द्वारा चारागाह नष्ट किया जाता है तो उसके लिए राजा पशुओं की देखभाल करने वाले पशुपालक को दण्डित न करे।
वृत्तिं तत्र प्रकुर्वीत यामुष्ट्रो न विलोकयेत् ।
छिद्रं च वारयेत् सर्वं श्वसूकरमुखानुगम् ॥ 238 ।।
राजा को चाहिए कि वह चारागाह की सुरक्षा के लिए इतनी ऊंची दीवार बनवाए कि ऊंट भी भीतर न देख सके और दीवार के छिद्रों को इस प्रकार बंद करवाए कि कुत्ते व सुअर भीतर मुख न डाल सकें।
पथिक्षेत्रे परिवृते ग्रामान्तीयेऽथवा पुनः ।
सपालः शतदण्डार्हो विपालांश्चारयेत्पशून् ।। 239 ।।
यदि चरवाहे की उपस्थिति में चारागाह की चारदीवारी से बाहर उसके निकट स्थित गांव के खेतों में पशु घुसते हैं तो चरवाहे पर सौ पण का दण्ड लगाना चाहिए और यदि चरवाहा उपस्थित नहीं है तो खेत का स्वामी पशु को अपने अधिकार में रख ले।
क्षेत्रेस्वन्येषु तु पशुः सपादं पणमर्हति।
सर्वत्र तु सदा देयः क्षेत्रकस्येति धारणा ।। 240 ।।
यदि किसी पशुपालक के पशु दूसरे के खेतों में चरने चले जाते हैं तो उस पर सवा पण का दण्ड लगाना चाहिए और पशुपालक के द्वारा ही खेतों में हुए नुकसान की भरपाई करवाना चाहिए।
अनिर्दशाहां गां सूनां वृषान्देवपशुंस्तथा। सपालान्वाविपालान्वामदण्ड्यान्मनुरब्रवीत् ।। 241 ।।
मनु जी के अनुसार यदि दस दिन की ब्यायी गाय द्वारा वृषभ एवं यज्ञ पशु चरवाहे की देखरेख में अथवा अकेले ही किसी के खेत में प्रवेश कर जाते हैं तो इसके लिए पशु, पशु का स्वामी व पशुपालक दण्ड योग्य नहीं हैं।
क्षेत्रियस्यात्यये दण्डो भागाद्दशगुणो भवेत्।
ततोऽर्थदण्डो भृत्यानामज्ञानात्क्षत्रियस्य तु ।। 242 ।।
यदि कोई खेत का स्वामी अपने पशुओं को किसी अन्य के खेत में चरने देता है तो उसे निश्चित दण्ड से दस गुना अधिक दण्ड मिलना चाहिए और यदि ऐसा मालिक के बिना जाने ही पशुपालक की देखरेख में होता है तो स्वामी आधा ही दण्ड देने के लिए उत्तरदायी है।
एतद्विधानमातिष्ठेद्धार्मिकः पृथिवीपतिः ।
स्वामिनां च पशूनां च पालानां च व्यतिक्रमे ।। 243 ।।
पशु स्वामियों व पशुपालकों के बीच उठने वाले मतभेदों का धार्मिक राजा द्वारा इसी प्रकार निर्धारण होना चाहिए।
सीमां प्रति समुत्पन्ने विवादे ग्रामयोर्द्वयोः ।
ज्येष्ठे मासि नयेत्सीमां सुप्रकाशेषु सेतुषु ॥ 244 ॥
यदि दो गांवों में सीमा-सम्बन्धी विवाद हो तो जेठ मास में जब घास-फूस सूख जाए और भूमि सीमा के चिह्न स्पष्ट हो जाएं तभी कोई निर्णय करें।
सीमावृक्षांश्च कुर्वीत न्यग्रोधश्वत्थकिंशुकान् । शाल्मलीन्शलतालांश्च क्षीरिणश्चैवपादपान् ।। 245 ।।
भूमि सीमा के चिह्न के रूप में वट, पलाश, शाल व अन्य दूध वाले वृक्ष रोपने चाहिए।
गुल्मान्वेणूंश्च विविधाञ्छमीवल्लीस्थलानि च।
शरन्कुब्जगुल्मांश्च तथा सीमा न नश्यति ।। 246 ॥
सीमा पर विभिन्न प्रकार के गुल्मों, बांसों के झाड़, शमी व अन्य लताएं लगाने से सीमा नष्ट नहीं होती।
तडागान्युदपानानि वाप्यः प्रस्त्रवणानि च।
सीमासन्धिषु कार्याणि देवतायतनानि च ।। 247 ।।
दो गांवों के बीच सीमा-स्थल पर तालाब, जलपान गृह, कुओं, बावली, झरनों तथा मंदिरों का निर्माण करवाना चाहिए। इससे लोगों का वहां आना-जाना लगा रहेगा और सीमा सुरक्षित व स्पष्ट रहेगी।
उपच्छन्नानि चान्यानि सीमालिङ्गानिकारयेत्।
सीमाज्ञाने नृणां वीच्य नित्यं लोकेविपर्ययम् ।। 248 ।।
लोगों में प्रायः सीमा को लेकर होने वाले विवादों को देखते हुए राजा द्वारा निम्रलिखित गूढ़ सीमा चिह्न बनवाने चाहिए।
अश्मनोऽस्थीनि गोबालांस्तुषान्भस्म कपालिका। करीषमिष्टकाङ्गारांश्छर्करा बालुकास्तथा ।। 249 ।।
यानि चैव प्रकाराणि कालाद्भूमिर्न भक्षयेत् ।
तानि सन्धिषु सीमायामप्रकाशानि कारयेत ।। 250 ।।
जो वस्तुएं धरती में दबा दी जाने पर नष्ट नहीं होतीं अर्थात् हड्डी, पत्थर, भस्म, तुष, गोबाल, खप्पर, शीशा, ईंट, कोयला, शक्कल इत्यादि-ऐसी ही वस्तुओं को सीमा-संधि स्थल पर गुप्त रूप से गड़वा देनी चाहिए।
एतैर्लिङ्गैर्नयेत्सीमां राजा विवदमानयोः ।
पूर्वभुक्त्या च सततमुदकस्यागमेन च ॥ 251 ।।
यदि सीमा-सम्बन्धी मतभेद पैदा होता है तो राजा को इन्हीं चिह्नों की सहायता से, पहले से भोगी जाने वाली जगह तथा नदी के जलप्रवाह के मार्ग से ही तत्सम्बन्धी निर्णय करना चाहिए।
यदि संशय एव स्याल्लिङ्गानामपि दर्शने।
साक्षिप्प्रत्यय एव स्यात् सीमावादविनिर्णयः ।। 252 ।।
यदि सीमा के निश्चय में उपरिलिखित प्रमाणों द्वारा भी संशय की स्थिति बनी रहती है तो साक्षी अर्थात् गवाह के सबूत से ही निर्णय करना चाहिए।
ग्रामोयककुलानां च समक्षं सीग्निसाक्षिणः ।
प्रष्टव्यः सीमलिङ्गानि तयोश्चैव विवादिनोः ।। 253 ॥
साक्षियों से सीमा-सम्बन्धी पूछताछ गांव के मुखिया समूह एवं संशय रखने वाले लोगों - अर्थात् दोनों पक्षों के सामने ही करनी चाहिए।
ते पृष्ठास्तु यथाब्रूयुः समस्ताः सीग्नि निश्चयम् ।
निबधीयात्तथा सीमां सर्वांस्तांश्चैव नामतः ।। 254 ।।
साक्षी अर्थात् गवाह सीमा निर्धारण के संदर्भ में पूछे गए सवालों का जो-जो उत्तर दें- वैसे ही सीमा निश्चित कर देनी चाहिए तथा साथ ही साथियों के नामों का भी उल्लेख कर देना चाहिए।
शिरोभिस्ते गृहीत्वोर्वी स्त्रग्विणो रक्तवाससः ।
सुकृतैः शापिताः स्वैः स्वैर्नयैर्युक्तं समञ्जसम् ।। 255 ।।
जो भी व्यक्ति सीमा निर्धारण में साक्षी बने उन्हें शरीर पर लाल वस्त्र, गले में फूलों की माला और सिर पर मिट्टी को धारण कर यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि यदि हम झूठ बोलें तो हमारे सारे पुण्यों का नाश हो जाए।
यथोक्तेन नयन्तस्ते पूयन्ते सत्यसाक्षिणः ।
विपरीतं नयन्तस्तु दाप्याः स्युर्द्विशतदमम् ।। 256 ।।
गवाही देने वाले व्यक्तियों के सत्य भाषण पर उन्हें सम्मानित करना चाहिए तथा इसके विपरीत गलत बोलने अथवा पथभ्रष्ट करने वालों पर सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
साक्ष्यभावेतुचत्वारोग्रामा सामन्तवासिनः ।
सीमाविनिर्णयं कुर्युः प्रयता राजसन्निधौ ॥ 257 ॥
यदि साक्षी भी उपस्थित न हों तो आसपास के चार गांवों के निवासी तथा भूपति राजा के सामने गांव की सीमा निश्चित करें।
सामन्तानामभावे तु मौलानां सीग्निसाक्षिणाम् ।
इमानप्यनुयुञ्जीत पुरुषान्वनगोचरान् ।। 258 ।।
यदि निकटवर्ती भपति भी न हों तो वन में विचरने वाले, मूल निवासियों को सीमा-मतभेद का साक्षी मान लेना चाहिए।
व्याधाञ्छाकुनिकान्नगोपान्कैवर्तान्मूलखानकान् । व्यालग्राहानुञ्छवृत्तीनन्यांश्च वनचारिणः ।। 259 ॥
शिकारी, चिड़ीमार, चरवाहे, मल्लाह, खान खोदने वाले, सांप पकड़ने वाले तथा दाने बीन कर जीवन यापन करने वाले कुछ ऐसे वनचर हैं जिन्हें सीमा निर्धारण साक्षी बनाया जा सकता है।
ते पृष्ठास्तु यथा ब्रूयुः सीमासन्धिषु लक्षणम्।
तत्तथास्थापयेद्राजा धर्मेण ग्रामयोर्द्वयोः ।। 260 ।।
पूछे जाने पर ये वनचर राजा के समक्ष सीमा संधि के जो लक्षण बताएं उन्हीं के अनुसार दो ग्रामों की सीमा निश्चित करनी चाहिए।
क्षेत्रकूपतडागानामारामस्य गृहस्य च।
सामन्तप्रत्ययो ज्ञेयः सीमासेतुविनिर्णयः ।। 261 ।।
यदि खेत, कुएं, तालाब, बाग-घरों तथा सेतुओं की सीमा का निर्णय करना है तो आस-पास रहने वाले प्रामाणिक पुरुषों के कथन को ही सत्य मानें।
सामन्ताश्चेन्मृषा ब्रूयुः सेतौ विवदतां नृणाम् ।
सर्वे पृथक्पृथग्दण्ड्याः राज्ञा मध्यमसाहसम् ।। 262 ॥
सेतु सम्बन्धी विवाद में आस-पास रहने वाले सज्जन यदि किसी कारणवश झूठ का आश्रय लें तो उनमें से प्रत्येक को मध्यम स्तर का आर्थिक दण्ड मिलना चाहिए।
गृहं तडागमारामं क्षेत्रं वा भीषयाहरन् ।
शतानि पञ्चदण्ड्यः स्यादज्ञानात् द्विशतोदमः ।। 263 ।।
यदि कोई व्यक्ति डरा-धमका कर दूसरे के घर, तालाब, बाग अथवा खेत को हथिया ले तो उस पर पांच सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए तथा अनजाने में दूसरे की सम्पत्ति पर अधिकार कर लेने वाले को दण्ड स्वरूप दो सौ पण देने चाहिए।
सीमायामविषह्यायां स्वयं राजैव धर्मवित् । प्रदिशेभूमिमेतेषामुपकारादिति स्थितिः ।। 264 ।।
यदि सीमा के संदर्भ में पर्याप्त सबूत उपलब्ध न हों तो धर्मज्ञ राजा को चाहिए कि वह स्वयं ही उस भूमि को परोपकार हेतु बने किसी न्यास को दे दे। ऐसी स्थिति में यही सबसे उचित निर्णय है।
एषोऽखिलेनाभिहितो धर्मः सीमाविनिर्णये।
अतः ऊर्ध्व प्रवक्ष्यामि वाक्पारुष्यविनिर्णयम् ।। 265 ।।
उपरिलिखित मर्यादा सीमा-सम्बन्धी मतभेदों के विषय में निर्धारित की गई है। विप्रो, अब मैं आपको कठोर व रूक्ष वाणी सम्बंधित दण्ड विधान के बारे में सविस्तार बतलाता हूं।
शतं ब्राह्मणमाकुश्य क्षत्रियो दण्डमर्हति ।
वैश्योऽप्यर्धशतं द्वे वा शूद्रस्तुवधमर्हति ।। 266 ।।
पञ्चाशद् ब्राह्मणो दण्डः क्षत्रियस्याभिशंसने।
वैश्ये स्यादर्धपञ्चाशच्छूद्रे द्वादशको दमः ।। 267 ॥
यदि क्षत्रिय ब्राह्मण को अपशब्द कहे तो उस पर सौ पणों का, वैश्य पर डेढ़
सौ पणों का अर्थदण्ड लगाना चाहिए तथा शूद्र को मृत्युदण्ड देना चाहिए। इसके उलट यदि ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र को अपशब्द कहे तो ब्राह्मण को क्रमशः पचास, पच्चीस तथा बारह पण दण्डस्वरूप देना चाहिए।
समवर्णे द्विजातीनां द्वादशैव व्यतिक्रमे ।
वादेष्ववचनीयेषु तदैव द्विगुणं भवेत् ।। 268 ।।
समान वर्ण वाला व्यक्ति यदि अपने ही वर्ण के व्यक्ति को अपशब्द कहे तो उस पर बारह पण दण्डस्वरूप देने का विधान है। यदि कोई बहुत भद्दी गाली देता है तो उसे बारह पण से दुगुना अर्थात् चौबीस पणों का दण्ड मिलना चाहिए।
एकाजातिर्द्विजातीस्तु वाचा दारुण या क्षिपन्।
जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः ॥ 269 ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य को यदि शूद्र द्वारा अपशब्द बोले जाएं तो उस शूद्र की दण्डस्वरूप जिह्वा काट लेनी चाहिए। तुच्छ वर्ण का होने के कारण उसे यही दण्ड मिलना चाहिए।
नामजातिग्रहं त्वेषामभिद्रोहेण कुर्वतः ।
निक्षेप्योऽयोमयः शंकुर्ध्वलन्नास्ये दशांगुलः ।। 270 ॥
यदि कोई शूद्र अहंकारवश, ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य के नाम और जाति का उच्चारण करता है तो उसके मुंह पर लोहे की दस अंगुल जलती हुई कील ठोंक देनी चाहिए।
धर्मोपदेशं दर्पण विप्राणामस्य कुर्वतः ।
तप्तमासेचयेत्तैलं वक्तृ श्रोत्रे च पार्थिवः ।। 271 ।।
जो शूद्र अहंकार के वशीभूत होकर ब्राह्मण को धर्मोपदेश देता है। राजा द्वारा उसके मुंह व कान में गर्म तेल डलवा देना चाहिए।
श्रुतं देशं च जातिं च कर्मशारीरमेव च।
वितथेन ब्रुवन्दर्पाद्दाप्यः स्याद् द्विशतं दमम् ॥ 272 ।।
यदि कोई शिक्षा, देश, जाति, व्यवसायादि के बारे में झूठ व बढ़ा-चढ़ा कर बोलता है, उसे दो सौ पणों का दण्ड मिलना चाहिए।
काणं वाप्यथवा खञ्जमन्यं वापि तथाविधम् ।
तथ्येनापि ब्रुवन्दाप्यो दण्डं कार्षापणा वरम् ।। 273 ॥
किसी विकलांग व्यक्ति को अर्थात् काने, लंगड़े आदि को सत्य होने पर भी यदि उसे कोई अपमानजनक भाषा में पुकारे तो उसे एक काषार्पण तक का दण्ड देना चाहिए।
मातरं पितरं जायां भ्रातरं तनयं गुरुम्।
आक्षारयच्छत दाप्यः पन्थानं चाददद्गुरोः ।। 274 ॥
जो व्यक्ति माता-पिता, स्त्री, भाई, पुत्र व गुरु को अपशब्द कहता है अपने गुरु को सामने आने पर भी विनम्रतापूर्वक मार्ग नहीं देता उसे सौ पणों का दण्ड देना चाहिए।
ब्राह्मणक्षत्रियाभ्यां तु दण्डः कार्यों विजानता ।
ब्राह्मणो साहसः पूर्वं क्षत्रिये त्वेव मध्यमः ॥ 275 ॥
यदि ब्राह्मण व क्षत्रिय के बीच गाली-गलौच होती है तो उन दोनों में ब्राह्मण को प्रथम साहस तथा क्षत्रिय को द्वितीय साहस का दण्ड मिलना चाहिए।
विट्शूद्रयोरेवमेव स्वजातिं प्रतितत्त्वतः ।
छेदवर्ज प्रणयन् दण्डस्येति विनिश्चयः ॥ 276 ।।
वैश्य व शूद्र में परस्पर कठोर संवाद होने की स्थिति में राजा द्वारा उन्हें उनकी जाति में मान्य दण्ड दिया जाना चाहिए। यही विधान है।
एष दण्डविधिः प्रोक्तोवाक्पारुष्यस्य तत्त्वतः ।
अतऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दण्ड पारुष्यस्य निर्णयम् ।। 277 ॥
विप्रो. उपर्युक्त वर्णन कठोर संवाद अथवा अपशब्द वाचन सम्बन्धी दण्ड विधि का वर्णन था। अब मैं आपको मार-पीट अर्थात् हिंसा के प्रयोग के लिए निश्चित दण्ड नियमों के बारे में बतलाता हूं।
येन केनचिदङ्गेन हिंस्याच्चेच्छ्रेष्ठमन्त्यजः ।
छेत्तव्यं तत्तदेवास्य तन्मनोरनुशासनम् ।। 278 ॥
शुद्र अपने शरीर के जिस भी अंग से द्विजातियों अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य पर प्रहार करे, उसका वही अंग काट देना चाहिए। मन जी द्वारा दी गई यही व्यवस्था है।
पाणिमुद्यम्य दण्डं वा पाणिच्छेदनमर्हति।
पादेन प्रहरन्कोपात्पादच्छेदनमर्हति ।। 279 ।।
द्विजाति अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य जाति के व्यक्ति को यदि कोई शूद्र हाथ से चांटा अथवा घूंसा मारता है या लाठी उठाकर हमला करता है तो उसका हाथ काट देना चाहिए और यदि वह क्रोधवश पैर से चोट करता है तो उसका पैर काट देना चाहिए।
सहासनमभि प्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः ।
कठ्या कृताङ्गोनिर्वास्यः स्फिचं वास्यावकर्तयेत् ।। 280 ॥
जो शूद्र उच्च वर्ण के लोगों के साथ बैठने की आकांक्षा रखता है उसकी कमर को दाग कर उसे वहां से भगा देना चाहिए या फिर उसके नितम्ब को इस प्रकार कटवा देना चाहिए कि वह न जीवित रह सके न ही मृत्यु को प्राप्त हो।
अविनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेन्नृपः ।
अवमूत्रयतो मेढ्रमवशर्द्धयतो गुदम् ॥ 281 ।।
यदि नीच जाति का व्यक्ति उच्च वर्ग के व्यक्ति पर थूकता है, पेशाब करता है अथवा पादता है तो क्रमशः उसके दोनों होंठ, लिंग और गुदा कटवा देनी चाहिए।
केशेषु गृह्णतो हस्तौ छेदयेदऽविचारयन्।
पादयोर्दाढिकायां च ग्रीवायां वृषणेषु च ॥ 282 ।।
त्वग्भेदकः शतं दण्ड्यो लोहितस्य च दर्शकः ।
मांसभेत्ता तु षण्निष्कान्प्रवास्यस्त्वस्थिभेदकः ।। 283 ।।
यदि कोई शूद्र जान से मारने के लिए किसी द्विजाति के व्यक्ति के बालों, दाढ़ी, गरदन तथा अण्डकोश को पकड़े तो उसके हाथों को बिना विचार किए तत्काल कटवा देना चाहिए।
यदि वह उच्च जाति के किसी सदस्य की त्वचा काटता है जिससे उसका खून निकल आता है तो उस पर सौ पण और मांस काटने के लिए छः निष्कों का दण्ड लगाना चाहिए। द्विजाति के किसी भी व्यक्ति की हड्डी तोडने के अपराध पर शूद्र को देशनिकाला दे देना चाहिए।
वनस्पतीनां सर्वेषामुपभोगः यथा यथा।
तथा तथा दमः कार्यों हिंसायामिति धारणा ।। 284 ॥
यदि हिंसा के कारण वृक्ष, लता अथवा पौधे आदि वनस्पतियों की क्षति होती है तो उसी क्षति के अनुपात में ही अपराधी को दण्ड मिलना चाहिए।
मनुष्याणां पशूनां च दुःखाय प्रहृते सति।
यथा यथा महदुःखं दण्डं कुर्यात्तथा तथा ।। 285 ॥
अपराधी व्यक्ति मनुष्य व पशुओं को जितने अनुपात में दुःख व कष्ट देता है उसी अनुपात में उसको दण्ड मिलना चाहिए।
अङ्गावपीडनायां च व्रणं शोणितयोस्तथा।
समुत्थानव्ययं दाप्यः सर्वदण्डमथापिवा ।। 286 ।।
लिंग अथवा योनि को पीड़ा पहुंचाने तथा रक्तपात करने पर अपराधी द्वारा प्रभावित व्यक्ति के इलाज का सारा व्यय अपराधी को दण्डस्वरूप देना चाहिए।
द्रव्याणि हिंसाद्यो यस्य ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा।
स तस्योत्पघरदयेत्तुष्टिंराज्ञो दद्याच्च तत्समम् ।। 287 ।।
जो व्यक्ति अपने स्वामी को जाने-अनजाने हानि पहुंचाता है, उसे हर प्रकार से प्रयत्न करना चाहिए कि उसका स्वामी संतुष्ट हो जाए और क्षति-पूर्ति के रूप में दिए गए धन जितना धन ही राजा को भी देना चाहिए।
चर्मचार्मिकभाण्डेषु काष्ठलोष्ठमयेषु च।
मूल्यात्पञ्चगुणो दण्डः पुष्पमूलफलेषु च ॥ 288 ।।
यदि कोई व्यक्ति चमड़े व चमड़े से बने मशकादि, लकड़ी तथा मिट्टी की बनी वस्तुओं को क्षति पहुंचाए, तो अपराधी को नष्ट हुई वस्तुओं के मूल्य से पांच गुना अधिक धन दण्ड स्वरूप देना चाहिए।
यानस्यचैव यातुश्च यानस्वामिन एव च।
दशातिवर्तनान्याहुः शेषे दण्डो विधीयते ॥ 289 ॥
अग्र वर्णित दस अवस्थाओं को छोडकर, सवारी, सवारी चालक व यान के स्वामी को अन्य अवस्थाओं में अपराध करने पर अवश्य दण्ड देना चाहिए।
छिन्नेनास्य भग्नयुगे तिर्यक्प्रतिमुखागते।
अक्षभङ्गे च यानस्य चक्रभङ्गे तथैव ॥ 290 ।।
छेदने चैव यन्त्राणां योक्तृरश्म्योस्तथैव च।
आक्रन्दे चाप्यपैहीति न दण्डं मनुरब्रवीत् ।। 291 ।।
(1) नाथ का टूटना (2) जुए का टूटना (3) मार्ग के टेढ़ा-मेढ़ा ऊंचा-नीचा होने के कारण अश्वादि का टेढ़ा-मेढ़ा होकर चलना (4) रुक-रुक कर चलना (5) रथ की धुरी का टूटना (6) पहिए का टूटना (7) रथ में जुड़े यंत्रों का टूटना (8) अश्वादि के गले में पड़ी रस्सी का टूटना (9) लगाम का टूटना (10) अश्वाद्रि के काबू से बाहर हो जाने पर चालक द्वारा 'बचो-बचो' चिल्लाना-आदि इन दस अवस्थाओं में यान के चालक को जान-माल के नुकसान के लिए अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। ऐसा मनु जी का कथन है।
यत्रापवर्तते युग्य वैगुण्यात्प्राजकस्य तु।
तत्र स्वामी भवेद्दण्ड्यो हिंसायां द्विशतं दमम् ।। 292 ।।
यान का चालक यदि अकुशल है और इसी कारणवश वाहन के बेकाबू होकर इधर-उधर चलने से हुई क्षति पूर्ति के लिए वाहन के स्वामी पर दो सौ पणों का दण्ड लगाने का विधान है।
प्राजकाश्चेद्भवेदाप्तः प्राजको दण्डमर्हति।
युग्यस्थाः प्राजके ऽन्नाप्तेसर्वे दण्ड्याः शतंशतम् ।। 293 ।।
किन्तु यदि चालक कुशल व स्वस्थ है और तब दुर्घटना घटती है तो चालक पर ही सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए। यह जानते हुए भी कि चालक अकुशल अथवा अस्वस्थ है, जो लोग वाहन पर सवार होते हैं तो दुर्घटना हो जाने पर वे सभी सौ-सौ पण दण्डस्वरूप देने के उत्तरदायी हैं।
स चेत्तु पथि संरुद्धः पशुभिर्वा रथेन वा।
प्रमापयेत्प्राणभृतस्तत्र दण्डोऽविचारतः ।। 294 ।।
जो कुशल वाहन चालक पशुओं अथवा अन्य वाहनों से मार्ग रुका होने पर भी वाहन उसी मार्ग पर चलाता है- तो ऐसी स्थिति में दुर्घटना होने पर चालक को बिना विचार किए ही दण्डित करना चाहिए।
मनुष्यमारणे क्षिप्तं चौरवत्किल्विषं भवेत्।
प्राणभृत्सु महत्स्वधं गोगजोष्ट्र हयादिषु ।। 295 ।।
कुशल चालक द्वारा वाहन चलाने पर यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है या किसी गाय, हाथी, घोडा आदि पशु की मौत हो जाती है तो चालक पर क्रमशः हजार पणों एवं पांच सौ पणों का दण्ड लगाने का विधान है।
क्षुद्रकाणां पशूनां तु हिंसायां द्विशतोदमः।
पञ्चाशत्तु भवेद्दण्डः शुभेषु मृगपक्षिषु ॥ 296 ।।
यदि किसी क्षुद्र पशु अर्थात् पालतू कुत्ते, बिल्ली, खरगोश या बछड़े आदि की हत्या हो जाती है तो दोषी व्यक्ति से दौ सौ पण और बुलबुल, तोता, मैना व कबूतर इत्यादि की हत्या के अपराध में पचास पणों का दण्ड लेना चाहिए।
गर्दभाजाविकानां तु दण्डः स्यात्पञ्चमाषिकः ।
माषकस्तु भवेद्दण्डः श्वशूकरनिपातने ।। 297 ।।
पांच माषक दण्ड गधे, बकरी और भेड़ादि की हत्या के अपराध में लगाने का विधान है तथा जंगली कुत्ते व सुअर की हत्या पर एक माषक दण्ड का।
माषक - तत्कालीन प्रचलित सिक्का।
भार्श पुत्रश्च दासश्च प्रेष्यो भ्राता च सोदरः ।
प्राप्तापराधास्ताड्याः स्युः रज्ज्वा वेणुदलेन वा ।। 298 ॥
जो स्त्री, पुत्र, दास, पत्रवाहक एवं छोटा सगा भाई किसी प्रकार का अपराध करते हैं तो उनकी रस्सी या बेंत से पिटाई करनी चाहिए।
पृष्ठतस्तु शरीरस्य नोत्तमाङ्गे कदाचन् ।
अतोऽन्यथा तु प्रहरन्प्राप्तः स्याच्च्चौर किल्विषम् ।। 299 ।।
किंतु इन अपराधियों के शरीर पर केवल पीठ पर ही प्रहार करना चाहिए सिर आदि उत्तम अंगों पर नहीं। ऐसा करने पर प्रहार करने वाले व्यक्ति को वही दण्ड मिलना चाहिए जो एक चोर को मिलता है।
एषोऽखिलेनाभिहितो दण्डपारुष्यनिर्णयः ।
स्तेनस्यात प्रवक्ष्यामि विधिं दण्डविनिर्णये ॥ 300 ।।
विप्रो ! मार-पीट सम्बन्धी दण्ड-विधान का यही वर्णन है। अब मैं आपको चोरी के अपराध पर मिलने वाले दण्ड के बारे में बतलाता हूं।
परमं यत्नमातिष्ठेत्स्तेनानां निग्रहे नृपः ।
स्तेनानां निग्रहादस्ययशो राष्ट्र च वर्धते ॥ 301 ॥
चोरों को पकड़ने के लिए राजा को पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि चोरों के पकड़े जाने पर अर्थात् चोरों के कम होने पर राजा की यश वृद्धि होती है तथा राष्ट्र समृद्ध बनता है।
अभयस्य हि यो दाता स पूज्यः सततं नृपः ।
सत्रं हि वर्धते तस्य सदैवाऽभयदक्षिणम् ।। 302 ।।
जो राजा अपनी प्रजा को अभयदान देता है, वह सदैव पूजनीय रहता है। अभय की दक्षिणा उसके यश को निरंतर बढ़ाती है।
सर्वतो धर्मः षड्भागो राज्ञो भवति रक्षतः ।
अधर्मादपि षड्भागो भवत्यस्य यऽरक्षतः ।। 303 ।।
जो राजा अपनी प्रजा की चोरों से रक्षा करता है उसे अपनी प्रजा के समग्र पुण्य फल का छठा भाग प्राप्त होता है। इसके विपरीत करने वाले राजा को प्रजा के समग्र पाप के फल का छठा भाग प्राप्त होता है।
यदधीते यद्यजते यद्ददाति यदर्चति।
तस्य षड्भागभाग्राजा सम्यग्भवति रक्षणात् ॥ 304 ॥
जो राजा प्रजा को अभय दान देता है अर्थात् भय से उनकी रक्षा करता है वह प्रजा के उन लोगों के पुण्य के छठे भाग का अधिकारी होता है जो वेदाध्ययन करते हैं यज्ञ-याग करते हैं, दान-दक्षिणा देते हैं तथा पूजा-अर्चना करते हैं।
रक्षन्धर्मेण भूतानि राजा वध्यांश्च घातयन्।
यजतेऽहरहर्यज्ञैः सहस्त्रशतदक्षिणैः ।। 305 ।।
वह राजा जो धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करता है और वध योग्य दुष्टों को मौत के घाट उतारता है वह नृप मानो सहस्रों रुपया दक्षिणा में दिए जाने वाले यज्ञों का सम्पादन करता है।
योऽरक्षन्बलिमादत्ते करं शुल्कं च पार्थिवः ।
प्रतिभागं च दण्डं च स सद्यो नरकं व्रजेत् ॥ 306 1
यदि राजा प्रजा की रक्षा नहीं करता लेकिन बलि, कर व शुल्क स्वरूप प्रजा से आय का छठा हिस्सा वसूल करता है वह राजा दण्ड पाने योग्य है तथा उसे जल्द ही नरक प्राप्त होता है।
अरक्षितारं राजानं बलिषड्भागहारिणम्।
तमाहुः सर्वलोकस्य समग्रमलहारकम् ।। 307 ॥
जो राजा प्रजा से कर आदि तो वसूल लेता है किन्तु प्रजा की रक्षा नहीं करता, वह सभी प्रजाजनों के सम्पूर्ण पापों को ढोता है।
अनपेक्षितमर्यादं नास्तिकं विप्रलुम्पकम् ।
अरक्षितारंमत्तारं नृपं विद्यादधोगतिम् ॥ 308 ॥
वह राजा, जो लोक मर्यादा का उल्लंघन करता है, ईश्वर में आस्था नहीं रखता, अनुचित रूप से धन जमा करता है, अभक्ष्य का भक्षण करता है और प्रजा की रक्षा नहीं करता वह भ्रष्ट व अधोगामी है, ऐसा जानें।
अधार्मिकं त्रिभिर्त्यायैर्निगृह्णीयात्प्रयत्नतः ।
निरोधनेन बन्देन विविधेन वधेन च ॥ 309 ॥
1. कारावास, 2. बंधन, 3. एवं अनेक प्रकार के आर्थिक अथवा शारीरिक दण्ड जिनमें मृत्यु भी एक है- इन तीन उपायों द्वारा राजा को अधार्मिक पुरुषों का निग्रह करना चाहिए।
निग्रहेण हि पापानां साधूनां संग्रहेण च।
द्विजातय इवेज्याभिः पूयन्ते सततं नृपाः ॥ 310 ।।
जिस प्रकार यज्ञों से ब्राह्मण नित्य पवित्र बने रहते हैं, उसी प्रकार पापियों के निग्रह व साधुओं की रक्षा करने से राजा निरंतर पवित्र रहता है।
क्षन्तव्यं प्रभुणा नित्यं क्षिपतां कार्यिणां नृणाम्।
बालवृद्धातुराणां च कुर्वता हितमात्मनः ॥ 311 ॥
जो राजा अपना हित व कल्याण चाहते हैं उन्हें बहुत यत्न से काम करने वालों अर्थात् बच्चों, बूढ़ों व रोगियों के छोटे-मोटे अपराध माफ कर देने चाहिए।
यः क्षिप्तो मर्षयत्यातैस्तेन स्वर्गे महीयते।
यस्त्वैश्वर्यान्न क्षमते नरकं तेन गच्छति ॥ 312 ।।
दुखियों द्वारा आक्षेप किए जाने पर जो राजा उत्तेजित नहीं होता बल्कि संयत होकर सहन कर लेता है वह स्वर्गलोक में अत्यंत प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त करता है किंतु जो राजा ऐश्वर्य में चूर हो उन्हें क्षमा नहीं करता, वह नरक लोक को प्राप्त होता है।
राजा स्तेनेन गन्तव्यो मुक्तकेशेन धावता।
आचक्षणेन तत्स्तेनेवंकर्मास्मि शाधिमाम् ॥ 313 ।।
जो चोर क्षमा प्रार्थी है उसे अपने केश खोलकर दौडते हुए राजा के पास जाना चाहिए, चोरी को स्वीकार कर राजा से दण्ड के रूप में सुधरने का अवसर पाने की याचना करनी चाहिए।
स्कन्धेनादाय मुसलं लगुडं वापि खादिरम्।
शक्तिं चोभयतस्तीक्ष्णमायसदण्डमेव वा ॥ 314 ।।
क्षमाप्रार्थी चोर को राजा के पास जाकर मूसल अथवा खदिर की लकड़ी से बने मजबूत डण्डे को अथवा दोनों ओर से तीखी धार वाली बरछी या लोहे के कुण्डे को कंधे पर रखकर कहना चाहिए कि वे इससे उसे दण्ड दें।
शासनाद्वा विमोक्षाद्वा स्तेनः स्तेयाद्धि मुच्यते।
अशासित्वा तु तं राजा स्तेनस्याप्नोति किल्विषम् ।। 315 ॥
चोर को दण्डित किया जाए या क्षमा किया जाए, उसके बाद वह चोरी के अपराध से मुक्त हो जाता है किंतु चोर को दण्ड न देने से राजा भी चोरी के अपराध का भागी हो जाता है।
अन्नादे भ्रूणहा माष्टिपत्यौ भार्यापचारिणी।
गुरौशिष्यश्च याज्यश्च स्तेनो राजनिकिल्विषम् ।। 316 ।।
स्त्री द्वारा भ्रूण हत्या के पाप की उपेक्षा कर उसका अन्न ग्रहण करने वाला तथा उसके द्वारा किए गए व्यभिचार को अनदेखा कर उसे छूट देने वाला पति, शिष्य के अपराधों को अनदेखा करने वाला गुरु तथा यजमान के अपराध की उपेक्षा करने वाला ऋत्विज इन सभी पापों के उत्तरदायी बनते हैं, ठीक इसी प्रकार चोर के अपराध की उपेक्षा करने वाला राजा भी उसके पाप का भागीदार होता है।
राजनिर्भूतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः ।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ।। 317 ।।
राजा द्वारा अपने दुष्कर्म का उचित दण्ड पा लेने के पश्चात् मनुष्य संतों के समान निष्पाप हो जाता है तथा स्वर्ग प्राप्त करता है।
यस्तुरज्जुं घटं कूपाद्धरेत् भिन्द्याच्च यः प्रपाम्।
सदण्डं प्राप्नुयान्माषं तच्च तस्मिन्समाहरेत् ॥ 318 ।।
जो व्यक्ति कुएं से पानी निकालने वाली रस्सी और मटके को चुराता है तथा प्याऊ को तोड़ देता है उस पर एक ग्राम स्वर्ण का दण्ड लगाने के साथ-साथ उसे रस्सी-मटका पुनः रखने और प्याऊ की मरम्मत करवाने का आदेश देना चाहिए।
धान्यं दशभ्यः कुम्भेभ्यो हरतोऽभ्यधिकं वधः।
शेषेत्येकादशगुणं दाप्यस्तस्य च तद्धनम् ॥ 319 ॥
जो व्यक्ति दस कुम्भों से अधिक धान्य चुराता है उसकी पिटाई होनी चाहिए और धान्य के स्वामी को उससे ग्यारह कुम्भ धान्य वापिस लेना चाहिए।
तथा धरिममेयानां शतादिभ्यधिके वधः । सुवर्णरजतादीनामुत्तमानां च वाससाम् ॥ 320 ॥
इसी प्रकार तुला द्वारा तौली जाने वाली बहुमूल्य धातुओं तथा वस्त्रों के चोर को भी सौ गुना दण्ड मिलना चाहिए।
पञ्चाशतस्त्वभ्यधिके हस्तच्छेदनमिष्यते ।
शेषे त्वेकादशगुणं मूल्या दण्डं प्रकल्पयेत् ।। 321 ।।
यदि कोई चोर पचास पल से अधिक मूल्यवान् धातु चुराता है तो उसके हाथ काट देने चाहिए। एक से उनचास पल तक का वजन चुराने पर चोर पर मूल्य का ग्यारह गुना धन देने का दण्ड लगाना चाहिए।
पुरुषाणां कुलीनानां नारीणां च विशेषतः ।
मुख्यानां चैव रत्नानां हरणे वधमर्हति ।। 322 ।।
कुलीन व सम्मानित परिवार के पुरुषों विशेषकर कुलीन स्त्रियों द्वारा बहुमूल्य रत्नों के चुराए जाने पर उन्हें मृत्युदण्ड देने का विधान है।
महापशूनां हरणे शास्त्राणामौषधस्य च।
कालमासाद्यकार्यं च दण्डं राजा प्रकल्पयेत् ।। 323 ।।
गाय, बैल, घोड़ा, बकरी व ऊंट आदि बड़े पशुओं, पुस्तकों एवं औषधियों के चोर पर समय व परिस्थिति अनुसार दण्ड लगाना चाहिए।
गोषु ब्राह्मणसंस्थासु कुरिकायाश्च भेदने।
पशूनां हरणे चैव सद्यः कार्योऽर्धपादिकः ॥ 324 ।।
जो व्यक्ति ब्राह्मण परिवार व गायों का हरण तथा नाक छेदन करता है तथा अन्य विविध पशुओं का हरण करता है वह तुरंत अर्ध-पाप के दण्ड का भागी होता है।
सूत्रकार्पासकिण्वानां गोमयस्य गुडस्य च।
दघ्नः क्षीरस्य तक्रस्य पानीयस्य तृणस्य च ॥ 325 ॥
वेणुवैदलभाण्डानां लवणानां तथैव च ।
मृण्मयानां च हरणे मृदोभस्मन एव च ॥ 326 ॥
मत्स्यानां पक्षिणां चैव तैलस्य च घृतस्य च।
मांसस्य मधुनश्चैव यच्चान्यत्पशुसम्भवम् ।। 327 ।।
अन्येषां चैव मादीनामाद्यानामोदनस्य च।
पक्वान्नानां च सर्वेषां तन्मूल्याद् द्विगुणो दमः ॥ 328 ॥
जो व्यक्ति सूत, कपास, मदिरा की गाद, गोबर, गुड़, दही, खीर, छाछ, जल व घास चुराता है, बांस की नली, बांस के बर्तन, नमक, मिट्टी के बर्तन, मिट्टी व राख, मछली, पक्षी, तेल, घी, मांस, शहद, पशु से प्राप्त होने वाले अन्य पदार्थों को चुराता है तथा चावल (पका) व अन्य विविध पकवानों को चुराता है, उसे चुराई गई वस्तु के मूल्य का दुगुना धन देने का दण्ड देना चाहिए।
पुष्पेषु हरिते धान्ये गुल्मवल्ली नगेषु च।
अन्येषु परिपूतेषु दण्डः स्यात्पञ्च कृष्णलः ।। 329 ॥
फूलों, हरे अन्न, गुल्म, वल्ली, वृक्षों व अन्न की वल्लियों के चोर को पांच कृष्णल का दण्ड मिलना चाहिए।
परिपूतेषु धान्येषु शाकमूलफलेषु च।
निरन्वये शतं दण्डः सान्वयेऽर्धशतं दमः ॥ 330 ॥
शुद्ध किए गए व पवित्र अन्नों, सब्जियों, कंद-मूल व फलों का चोर यदि निर्वंश हो तो उस पर सौ पणों का और यदि वंश वाला हो तो पचास पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
स्यात्साहसं त्वन्यत्प्रसभं कर्म यत्कृतम् ।
निरन्वयः भवेत्स्तेयः हृत्वाऽपव्ययते च यत् ॥ 331 ।।
यदि धन-धान्य को बलपूर्वक छीना जाए तो वह भी चोरी ही है। स्वामी से आज्ञा लिए बिना कुछ ले लेना या वस्तु लेकर मुकर जाना भी चोरी के समान ही अपराध है।
यस्त्वेतान्युपक्लृप्तानि द्रव्याणि स्तेनयेन्नरः ।
तमाद्यं दण्डयेद्राजा यश्चाग्निं चोरयेद् ग्रहात् ।। 332 ।।
जो उपर्युक्त वस्तुओं व घर से अग्नि चुराता है उसे 'प्रथम साहस' अर्थात् सौ पण का दण्ड मिलना चाहिए।
येन येन यथाङ्गेन स्तेनो नृषु विचेष्टते ।
तत्तदेव हरेत्तस्य प्रत्यादेशाय पार्थिवः ॥ 333 ॥
जिस प्रकार व जिस-जिस अंग से चोर चोरी करता है- राजा उसके वही अंग कटवा दे ताकि वह भविष्य में चोरी न कर सके।
पिताचार्यः सुहृन्माता भार्यापुत्रः पुरोहितः।
नाऽदण्ड्योनाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति ।। 334 ॥
वह पिता, आचार्य, मित्र, माता, पत्नी, पुत्र व पुरोहित आदि जो अपने धर्म में स्थिर नहीं रह पाते, वे भी राजा से दण्ड पाने योग्य हैं।
कार्षापणं भवेद्दण्ड्यो यत्रान्यः प्रकृतो जनः ।
तत्र राजा भवेद्दण्ड्यः सहस्त्रमिति धारणा ।। 335 ।।
प्रजाजनों पर जिस अपराध के लिए कार्षापण दण्ड लगना चाहिए, उसी अपराध के लिए राजा को सहस्त्रों पणों का दण्ड देना चाहिए।
अष्टापद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्विषम् ।
षोडशैस्तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च ॥ 336 ॥
ब्राह्मणस्य चतुःषष्टि पूर्ण वापि शतं भवेत्।
द्विगुणा च चतुःषष्टिस्तद्दोषगुण विद्धि सः ॥ 337 ।।
चोरी के अपराध का शूद्र, वैश्य व क्षत्रिय पर क्रमशः आठ, सोलह तथा बत्तीस गुना पाप लगता है किंतु ब्राह्मण को उसी अपराध का चौंसठ या एक सौ अट्ठाईस गुना पाप लगता है चूंकि ब्राह्मण को चोरी के गुण-दोषों की जानकारी होती है।
वानस्पत्यं मूलफलं दार्वग्न्यर्थं तथैव च।
तृणं च गोभ्यो ग्रासार्थमस्तेयं मनुरब्रवीत् ।। 338 ।।
मनु जी ने कहा है कि वनस्पति, कन्द-मूल, फल, ईंधन की लकड़ी व गायों के लिए घास की चोरी-चोरी नहीं कहलाती।
योऽदत्तादायिनो हस्ताल्लिप्सेत ब्राह्मणो धनम्। याजनाध्यापनेनापि यथा स्तेनस्तथैव सः ॥ 339 ॥
जो ब्राह्मण चोर के हाथ से यज्ञ करा या उसे वेद पढ़ा कर उससे धन लेने की इच्छा रखता है, उसे भी चोर ही मानना चाहिए।
द्विजोऽध्वगः क्षीणवृत्तिर्दाविभू द्वे च मूलके ।
आददानः परक्षेत्रान्न दण्डं दातुमर्हति ॥ 340 ।।
अपनी क्षीण वृत्ति अर्थात् आय की कमी से परेशान होकर जो ब्राह्मण मार्ग में पड़ने वाले खेत से कुछ कन्द-मूल अथवा गन्ना ले लेता है, उस पर दण्ड नहीं लगना चाहिए।
असन्धितानां सन्धाता सन्धितानां च मोक्षकः ।
दाशाश्वरथहर्ता च प्राप्तः स्याच्चोर किल्विषम् ।। 341 ।।
जो व्यक्ति दूसरें के पशुओं को बांधता है और बंधे हुए पशुओं को खोल देता है तथा दासों, अश्वों और रथों को हर लेता है, वह निश्चय ही दण्डनीय है।
अनेन विधिना राजा कुर्वाणः स्तेन निग्रहम्। यशोऽस्मिन्प्राप्नुयाल्लोके प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ।। 342 ।।
इस प्रकार जो राजा चोरों को दण्डित करके चोरी का निग्रह करता है वह इस लोक में यश प्राप्त करता है तथा परलोक में दिव्य सुखों का आनंद उठाता है।
ऐन्द्रं स्थानमभिप्रेप्सुर्यशश्चाक्षयमव्ययम् ।
नोपेक्षेतक्षणमपि राजा साहसिकं नरम् ।। 343 ।।
जो राजा इस लोक में अक्षय यश व मृत्यु के पश्चात् दिव्यलोक को पाने की कामना रखता है उसे चोरी-डाका डालने वाले व्यक्ति को एक क्षण के लिए भी अनदेखा नहीं करना चाहिए।
वाग्दुष्टास्तस्कराश्चैव दण्डेनैव च हिंसतः ।
साहसस्य नरः कर्त्ता विज्ञेयः पापकृत्तम्ः ॥ 344 ॥
वह व्यक्ति जो अपशब्द भाषण करता है, चोरी करता है, दूसरों के साथ हिंसा व हत्या करता है, उसे बहुत पापी मानें।
साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः ।
सः विनाशं व्रजत्याश् विद्वेषं चाधिगच्छति ।। 345 ।।
यदि राजा दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा कर देता है या उसके कृत्य को अनदेखा कर देता है, तो उसका शीघ्र विनाश हो जाता है- क्योंकि लोगों में उसके प्रति विद्वेष की भावना पैदा हो जाती है।
न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वाधनागमात्। समुत्सृजेत्साहसिकान्सर्वभूतभयावहान् ॥ 346 ।।
राजा को चाहिए कि वह स्नेहवश अथवा भारी धनराशि पाने पर भी प्रजाजन में भय पैदा करने वाले चोरों को बंधनमुक्त न करे।
शस्त्रं द्विजातिभिहियं धर्मो यत्रोपरुध्यते।
द्विजातीनां च वर्णानां विप्लवे कालकारिते ।। 347 ।।
यदि धर्म के अनुष्ठान में रुकावट उपस्थित होती है और द्विजातियों में राजद्रोह फूट पड़ता है तो इन तीनों वर्षों को राष्ट्र रक्षा हेतु शस्त्र धारण करने चाहिए।
आत्मनश्च परित्राणे दक्षिणानां च सङ्गरे।
स्त्रीविप्राभ्युपपत्तौ घ्नन्धर्मेण न दुष्यति ॥ 348 ।।
जो व्यक्ति अपनी प्राण रक्षा, बलपूर्वक छीनी जा रही दक्षिणा की सुरक्षा, स्त्री व ब्राह्मण पर आयी विपत्ति में उनकी रक्षा के लिए धर्म का पालन करते हुए दुष्ट को मौत के घाट उतारता है, वह पापी नहीं होता।
गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् ।
आतितायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ।। 349 ।।
यदि गुरु, बालक, वृद्ध या विद्वान ब्राह्मण अत्याचारी बनकर आए तो बिना कोई विचार किए उसका वध कर देना चाहिए।
नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन।
प्रकाशं वाऽप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्युमृच्छति ।। 350 ।।
जो व्यक्ति प्रकट रूप से या गुप्त रूप से हत्या के लिए आए मनुष्य का वध कर देता है उस पर किसी प्रकार का पाप नहीं लगता। अत्याचारी के दोष से हिंसा व क्रोध का पाप खत्म हो जाता है।
परदाराभिगमनेषु प्रवृत्तान्नृन्महीपतिः ।
उद्वेजनकरैर्दण्डैश्छिन्नयित्वा प्रवासयेत् ॥ 351 ॥
वह पुरुष जिसमें परस्त्रीगमन की प्रवृत्ति हो उसे हृदय विदारक दण्ड देकर तथा उसका लिंग काटकर उसे देश निकाला दे देना चाहिए।
तत्समुत्थो हि लोकस्य जायते वर्णसङ्करः ।
येन मूलहरोऽधर्मः सर्वनाशाय कल्पते ।। 352 I
संसार में परस्त्रीगमन से वर्णसंकर संतान का जन्म होता है, क्योंकि मूल को नष्ट करने के साथ ही अधर्म सर्वस्व विनाश कर देता है।
परस्य पल्या पुरुषः सम्भाषां योजयन् रहः ।
पूर्वमाक्षारितो दोषैः प्राप्नुयात्पूर्वसाहसम् ।। 353 ॥
जो व्यक्ति पहले से ही बदनाम है, वह यदि परायी स्त्री से एकांत में मिलने एवं वार्तालाप करने का प्रयास करता है तो उसे 'प्रथम साहसिक' का दण्ड मिलना चाहिए।
यस्त्वनाक्षारितः पूर्वमभिभाषेत् कारणात्।
न दोषं प्राप्नुयात्किञ्चिन्नहि तस्य व्यतिक्रमः ॥ 354 ।।
किंतु जो पुरुष पहले से निष्कलुष है, वह यदि परिस्थितिवश पराई स्त्री से बातचीत करता है तो उसे अपराध न समझें।
परस्त्रियं योऽभिवदेत्तीर्थेऽरण्येवनेऽपि वा।
नदीनां वापि सम्भेदे सः संग्रहणमाप्नुयात् ।। 355 ।।
यदि पुरुष तीर्थ, वन व नदियों के संगम पर परस्त्री से सम्भोग करता है तो वह परस्त्रीहरण अपराध के लिए दण्डनीय है।
उपहारक्रिया केलिः स्पर्शा भूषणवाससाम्।
सहखट्वासनं चैव सर्व संग्रहणं स्मृतम् ॥ 356 ॥
परस्पर उपहारों का लेन-देन, हास्य-विनोद, आलिंगन, वस्त्रों व आभूषणों को छूकर उसकी प्रशंसा करना साथ-साथ शय्या पर बैठना या लेटना इत्यादि परस्त्री से सम्भोग के समान ही है।
स्त्रियं स्पृशेद्देशे यः स्पृष्टो वा मर्षयेत्तथा।
परस्परस्यानुमते सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ 357 ।।
पराई महिला के गुप्तांगों का स्पर्श करना अथवा अपने अंगों पर उसके स्पर्श से सुख उठाना भी स्त्री भोग ही मानें।
अब्राह्मणः संग्रहणे प्राणान्तं दण्डमर्हति ।
चतुर्णामपि वर्णानां दाराः रक्ष्यतमाः सदा ॥ 358 ।।
सभी वर्णों की स्त्रियां रक्षा योग्य होती हैं अर्थात् उनकी पवित्रता बलात् कलंकित नहीं करनी चाहिए। ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य तीन वर्षों के लोगों को
परस्त्रीगमन के लिए मृत्यु दण्ड मिलना चाहिए।
भिक्षुकाः वन्दिनश्चैव दीक्षिताः कारवस्तथा ।
सम्भाषणं सह स्त्रीभिः कुर्युरप्रतिवादिताः ॥ 359 ।।
उन भिक्षुओं, बन्दियों, स्नातकों वरसोइए को स्त्री से वार्तालाप करने का पूर्ण अधिकार है जिन पर इस प्रकार का प्रतिबंध न लगाया गया हो।
न सम्भाषां परस्त्रीभिः प्रतिषिद्धः समाचरेत्।
निषिद्धो भाषमाणस्तु सुवर्णं दण्डमर्हति ॥ 360 ।।
यदि ऐसा प्रतिबंध लगया गया है, तो पुरुष को परस्त्रियों के साथ संवाद नहीं करना चाहिए। इस प्रतिबंध का सम्मान न करने वाले व्यक्ति पर सुवर्ण के एक सिक्के का दण्ड लगाना चाहिए।
नैषचारणदोषेषु विधिर्नात्मोपजीविषु ।
सञ्जयन्ति हि ते नारी निर्मूढाश्चारयन्ति च ।। 361 ।।
नट व चारण आदि की स्त्रियों व आजीविका के मद्देनजर अपने अधीन पुत्रादि की स्त्रियों से बातचीत करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। भाट व चारण तो स्वयं ही अपनी स्त्रियों का श्रृंगार कर उन्हें पर पुरुषों के पास भेजा करते हैं।
किञ्चिदेव तु दाप्यः स्यात्सम्भाषां ताभिराचरन् ।
प्रैष्यासु चैकभक्तासु रहः प्रव्रजितासु च ॥ 362 ॥
इस तरह की स्त्रियों से एकांत में संवाद करने वाले तथा भक्त एवं वैरागी स्त्रियों से प्रेमक्रीड़ा करने वाले पुरुष दण्डनीय होते हैं।
योऽकामां दूषयेत्कन्यां स सद्यो वधमर्हति ।
सकामां दूषयंस्तुल्यो न वधं प्राप्नुयान्नरः ॥ 363 ।।
जो कन्या सम्भोग की इच्छुक नहीं उससे बलात् सम्भोग करने वाले पुरुष को तुरंत मृत्युदण्ड देना चाहिए। सम्भोग के लिए स्वयं इच्छुक कन्या से सहवास करने वाला व्यक्ति मृत्युदण्ड का अधिकारी नहीं होता। उसे कोई दूसरा दण्ड मिलना चाहिए।
कन्यां भजन्तीमुत्कृष्टं न किञ्चिदपि दापयेत् ।
जघन्यं सेवमानां तु संयतां वासयेद् गृहे ॥ 364 ।।
जो कन्या अपने से उच्च वर्ग के पुरुष के साथ सम्भोग करती है वह दण्डनीय नहीं। यदि उसका सम्बन्ध अपने से हीन वर्ण वाले पुरुष के साथ हो जाता है तो उसे समझा-बुझा कर घर में ही रखना चाहिए।
उत्तमां सेवमानस्तु जघन्यो वधमर्हति ।
शुल्कं दद्यात्सेवमानः समामिच्छेत्पिता यदि ॥ 365 יון
यदि नीच वर्ण का पुरुष उच्च वर्ण की कन्या के साथ व्यभिचार करता है तो उसे मृत्युदण्ड मिलना चाहिए और समान वर्ण वाला पुरुष अपने ही वर्ण की कन्या से सहवास करता है तो कन्या के पिता की सहमति से उस पुरुष द्वारा कन्या के पिता को शुल्क देना चाहिए।
अभिषह्य तु यः कन्या कुर्याद्दर्येण मानवः।
तस्याशु कत्यें अंगुल्यौ दण्डं चार्हति षट्शतम् ॥ 366 ।।
जो पुरुष अपने पौरुष के घमंड में कन्याओं से बलात्कार कर उन्हें अपवित्र करता है, उसकी तत्काल दो उंगलियां काट डालनी चाहिए तथा उसे छः सौ पणों का दण्ड देना चाहिए।
सकामां दूषयंस्तुल्यो नांगुलिच्छेदमाप्नुयात्।
द्विशतं तु दमं दाप्यः प्रेसङ्गविनिवृत्तये ॥ 367 ।।
यदि पुरुष कन्या की सहमति से उसके साथ संम्भोग करता है तो उसकी उंगलियां नहीं काटनी चाहिए किंतु इस पाप से मुक्ति के लिए उस पर दो सौ पणों का दण्ड निश्चय ही लगाना चाहिए।
कन्यैव कन्यां या कुर्यात्तस्याः स्याद्विशतोदमः ।
शुल्कं तु द्विगुणं दद्याञ्छिफाश्चैवाप्नुयाद्दश ।। 368 ॥
कन्या ही यदि कन्या से संभोग करे और इस दौरान एक कन्या की योनि आहत हो जाए तो ऐसी स्थिति में स्वस्थ लड़की को आहत कन्या के विवाह न हो पाने की क्षतिपूर्ति करनी चाहिए, उसके इलाज का व्यय वहन करना चाहिए तथा दस बेंतों के प्रहार का दण्ड भुगतना चाहिए।
या तु कन्या प्रकुर्यात्स्त्री सः सद्यो मौण्ड्यमर्हति ।
आंगुल्योरेव वाच्छेदं खरेणोद्वहनं यथा ।। 369 ॥
यदि कोई स्त्री कन्या की योनि को अपनी उंगली से क्षत-विक्षत कर देती है तो उसकी उंगलियां कटवा देनी चाहिए तथा उसका सिर मुंडवा कर उसे गधे पर चढ़ाकर सारे नगर में घुमाना चाहिए।
भर्तारं लङ्घयेद्या स्त्री ज्ञाति गुणदर्पिता।
तां श्वाभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते ॥ 370 ॥
जो स्त्री अपने माता-पिता की ऊंची जाति, उच्च शिक्षादि गुणों अथवा धनादि के अहंकारवश अपने पति को छोड़कर परपुरुष से संबन्ध रखती है, राजा द्वारा उस स्त्री को सार्वजनिक स्थान पर जन समूह के समक्ष कुत्ते से नुचवाया जाना चाहिए।
पुभास दाहयेत्पापं शयने तप्तआयसे।
अभ्यादध्युश्च काष्ठानि तत्र दह्येत पापकृत ।। 371।।
यदि पुरुष अपने पति की आज्ञा का उल्लंघन करने वाली स्त्री से सम्बन्ध को उस अग्नि में लकडियां डालनी चाहिए ताकि वह पापी उसी अग्नि में जल कर रखता है उसे जलते हुए लोहे की चारपाई पर सुलाना चाहिए। वहां उपस्थित लोगों मर जाए।
संवत्सराभिशस्तस्य दुष्टस्य द्विगुणो दमः ।
व्रात्यया सह संवासे चाण्डाल्या तावदेव तु ॥ 372 ।।
यदि पुरुष एक वर्ष से अधिक अवधि से परस्त्रीगमन कर रहा हो तो उसे उपर्युक्त दण्ड से दुगुना दण्ड देना चाहिए। जो पुरुष पतित व चाण्डाल स्त्री से सम्बन्ध स्थापित करे उसे भी इतना ही दण्ड मिलना चाहिए।
शूद्रो गुप्तमगुप्तं वा द्वैजातं वर्णमावसन् ।
अगुप्तमङ्ग सर्वस्वैर्गुप्तं सर्वेण हीयते ॥ 373 ॥
द्विजाति वर्ण की एकाकी व अरक्षित स्त्री से बलात् सहवास करने वाले शूद्र को अंगच्छेदन का दण्ड देना चाहिए। यदि शूद्र रक्षित स्त्री की इच्छा से उसके साथ संभोग करे तो उसकी सभी सम्पत्ति पर कब्जा कर लेने की सजा तथा शारीरिक दण्ड भी देना चाहिए।
वैश्यः सर्वस्य दण्ड्यः स्यात्संवत्सरनिरोधतः ।
सहस्त्रः क्षत्रियो दण्ड्यो मौण्ड्यं मूत्रेण चार्हति ।। 374 ।।
जो वैश्य परस्त्री को एक वर्ष तक अपने घर रखे, उसे सर्वस्व हरण का दण्ड मिलना चाहिए। क्षत्रिय द्वारा ऐसा किए जाने पर उसे सहस्र पणों का और शूद्र को मूत्र से उसका सिर मुंडवाने की सजा मिलनी चाहिए।
ब्राह्मणीं यद्यगुप्तां तु गच्छेतां वैश्यपार्थिवौ।
वैश्यं पञ्चाशतं कुर्यात् क्षत्रियं तु सहस्त्रिणम् ॥ 375 ।।
यदि वैश्य एवं क्षत्रिय पुरुष अरक्षित ब्राह्मणी से सहवास करते हैं तो वे दण्डस्वरूप क्रमशः पांच सौ व एक हजार पण देने के अधिकारी बनते हैं।
उभावपि तु तावेव ब्राह्मण्या गुप्तया सह।
विलुप्तौ शूद्रवद्दण्ड्यौ दग्धव्यौ वा कटाग्निना ॥ 376 ।।
जो वैश्य और क्षत्रिय रक्षित ब्राह्मणी से संभोग करते हैं उन्हें वही दण्ड देना चाहिए जो इस कृत्य के लिए शूद्र को मिलता है या फिर उन दोनों को चटाई में लपेटकर अग्नि के सुपुर्द कर देना चाहिए।
सहस्त्रं ब्राह्मणो दण्ड्योगुप्तां विप्रां बलाद् व्रजन् ।
शतानि पञ्च दण्ड्यः स्यादिच्छन्त्या सह सङ्गतः ॥ 377 ॥
यदि ब्राह्मण पुरुष रक्षित ब्राह्मणी से बलात् सम्भोग करे तो उस पर हजार पणों का और ब्राह्मणी की स्वेच्छा से सम्भोग करे तो पांच सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
मौण्ड्यं प्राणान्तिकोदण्डोब्राह्मणस्य विधीयते ।
इतरेषां तु वर्णानां दण्डः प्राणान्तिको भवेत् ॥ 378 ॥
जहां अन्य वर्णों का वास्तविक वध ही मृत्यु दण्ड होता है, वहीं ब्राह्मण का सिर मुंडवाना ही उसके लिए मृत्युदण्ड तुल्य है।
न जातु ब्राह्मणं हन्यात्सर्वपापेष्वपि स्थितम्।
राष्ट्रादेनं बहिः कुर्यात्समग्रधनमक्षतम् ।। 379 ।।
ब्राह्मण चाहे कितने ही और कितने महान पाप क्यों न करे, उसका वध अथवा पिटाई कभी न करें। ज्यादा से ज्यादा उसे राज्य से निष्कासित कर देना चाहिए और निष्कासन के समय उसकी सारी सम्पत्ति उसे दे देना चाहिए।
न ब्राह्मणवधाद्भूयानधर्मो विद्यते भुवि।
तस्मादस्य वधं राजा मनसापि न चिन्तयेत् ।। 380 ।।
ब्राह्मण हत्या से बढ़कर इस दुनिया में अन्य और कोई पाप नहीं। अतः राजा को अपने मन में ब्राह्मण वध का विचार भी नहीं लाना चाहिए।
वैश्यश्चेत्क्षत्रियां गुप्तां वैश्यां वा क्षत्रियो व्रजेत्।
यो ब्राह्मणयामगुप्तायां तावुभौ दण्डमर्हतः ।। 381 ।।
यदि वैश्य पुरुष रक्षित क्षत्रिय स्त्री से और क्षत्रिय पुरुष रक्षित वैश्य स्त्री से सहवास करे तो दोनों पर क्रमशः हजार व पांच सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
सहस्त्रं ब्राह्मणो दण्डं दाप्यो गुप्ते तु ते व्रजन् ।
शूद्रायां क्षत्रियविशो साहस्त्रो वै भवेद्दमः ॥ 382 ।।
जो ब्राह्मण रक्षित क्षत्रिय व वैश्य स्त्री से व जो क्षत्रिय तथा वैश्य शूद्र स्त्री से सहवास करता है उस पर हजार-हजार पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
क्षत्रियायामगुप्तायां वैश्ये पञ्चशत दमः ।
मूत्रेण मौण्ड्यमिच्छेत्तु क्षत्रियो दण्डमेव वा ॥ 383 ।।
यदि क्षत्रिय या वैश्य पुरुष अरक्षित क्षत्रिय स्त्री से संभोग करता है तो उन पर पांच सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए या फिर मूत्र से उनका मंडन करवाना चाहिए।
अगुप्ते क्षत्रिया वैश्ये शूद्रां वा ब्राह्मणोव्रजन् ।
शतानिपञ्च दण्ड्यः स्यात्सहस्त्रंत्वन्त्यजस्त्रियम् ।। 384 ।।
जो ब्राह्मण पुरुष क्षत्रिय व वैश्य जाति की अरक्षित स्त्री से गमन करता है, उस पर पांच सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए। ब्राह्मण द्वारा शूद्र स्त्री से सहवास करने पर उसे हजार पणों का दण्ड देना चाहिए।
यस्यस्तेनः पुरे नास्ति नान्यस्त्रीगो न दुष्टवाक् ।
न साहसिको दण्डघ्नो स राजा शक्रलोकभाक् ।। 385 ।।
वही राजा इन्द्र पद का अधिकारी है जिसके राज्य में चोर, परस्त्रीगामी पुरुष, अपशब्द भाषण व झगड़ा करने वाले और लूटमार तथा हत्या करने वाले लोग नहीं
होते।
एतेषां निग्रहो राज्ञः पञ्चानां विषये स्वके।
साम्राज्यकृत्स जात्येयु लोके चैव यशस्करः ।। 386 ।।
राजा को चाहिए कि वह अपने राज्य में चोर, परस्त्रीगामी, गाली बकने वाले, डाकू, हिंसा करने वाले तथा हत्यारों का निग्रह करे। तभी वह अपने राज्य के विस्तार व यशोपलब्धि में सफल हो सकता है।
ऋत्विक् यस्त्यजेद्याज्यः चत्विक्त्यजेद्यदि ।
शक्तं कर्मण्य दुष्टं च तयोर्दण्डः शतंशतम् ।। 387 ।।
यदि यजमान धार्मिक कर्म करने-कराने में समर्थ व सच्चरित्र पुरोहित का और यदि पुरोहित एकनिष्ठ यजमान का परित्याग करे तो उन दोनों को सौ-सौ पणों का दण्ड मिलना चाहिए।
न माता न पिता न पुत्रस्त्यागमर्हति।
त्यजन्नपतितानेतान् राज्ञा दण्ड्यः शतानिषट् ॥ 388 ।।
माता-पिता व पुत्र अत्याज्य हैं। जो व्यक्ति बिना पतित हुए इनको त्यागता है, राजा द्वारा उस पर छः सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
आश्रमेषु द्विजातीनां कार्ये विवदतांमिथः ।
न विब्रूयान्नृपोधर्म चिकीर्षन्हितमात्मनः ।। 389 ।।
वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाले द्विजातियों के बीच मतभेद अथवा विवाद उत्पन्न होने की स्थिति में राजा तब तक हस्तक्षेप न करे जब तक कि उससे ऐसा निवेदन न किया जाए।
यथार्हमेतानभ्यर्च्य ब्राह्मणैः सह पार्थिवः ।
सान्त्वेन प्रशमय्यादौ स्वधर्म प्रतिपादयेत् ।। 390 ।।
यदि वानप्रस्थ आश्रम के जन राजा के पास आवेदक बनकर आते हैं तो सर्वप्रथम राजा को पुरोहितों समेत उनका यथायोग्य पूजन करना चाहिए फिर उन्हें समझाकर उनके कर्तव्य क्या हैं- यह बताना चाहिए।
प्रतिवेश्यानुवेश्यौ च कल्याणे विंशति द्विजे ।
अर्हावभोजयन्विप्रो दण्डमर्हति माषकम् ॥ 391 ।।
यदि किसी व्यक्ति को बीस ब्राह्मणों को भोजन कराना है और वह इस उद्देश्य के लिए अपने घर में रहने वाले तथा घर में प्रायः आते रहने वाले ब्राह्मणों को भोजन का निमन्त्रण देता है तो उस पर एक मासा चांदी देने का दण्ड लगाना चाहिए।
श्रोत्रियः श्रोत्रियं साधुं भूतिकृत्येष्वभोजयन् ।
तदन्नं द्विगुणंदाप्यो हिरण्यं चैव माषकम् ॥ 392 ।।
यदि कोई विद्वान ब्राह्मण विवाह, गृह प्रवेश तथा अन्य अनेक शुभ समारोहों पर किसी साधु ब्राह्मण को भोजन नहीं कराता है तो उस पर दुगुना अन्न और एक मासा स्वर्ण देने का दण्ड लगना चाहिए।
अन्धो जडः पीठसर्पी सप्तत्याः स्थविरश्च यः ।
श्रोत्रियेषूपकुर्वंश्च न दाप्याः केनचित्करम् ।। 393 ।।
जो सज्जन अंधों, बहरों, लंगड़ों, सत्तर वर्षीय बूढ़ों तथा वेदपाठी ब्राह्मणों के कल्याण में व्यस्त हैं उनसे न ही किसी प्रकार का कर लेना चाहिए और न ही उन्हें किसी प्रकार के कर वसूली के कार्य में लगाना चाहिए।
श्रोत्रियं व्याधितार्तो च बालवृद्धावकिञ्चनम् ।
महाकुलीनमार्य च राजा सम्पूजयेत्सदा ।। 394 ।।॥
श्रोत्रिय ब्राह्मण, रोगी, दुखी, बालक, वृद्ध, गरीब व उच्चकुल में जन्मे आर्य पुरुष का राजा को सदा सम्मान करना चाहिए। उसे इन लोगों का मजाक नहीं बनाना चाहिए।
शाल्मली फलके श्लक्ष्णेनेनिज्यान्नेजकः शनैः ।
न च वासांसि वासोभिर्निहरन्न च वासयेत् ॥ 395 ॥
धोबी द्वारा सेमर लकड़ी के चिकने पट्टे पर कपड़े पटके जाने चाहिए। वह इस बात का ख्याल रखे कि उसके ग्राहक के वस्त्रों में अदला-बदली न हो, न ही वे वस्त्र उसके यहां काफी दिनों तक पड़े रहें।
तन्तुवायो दशपलं दद्यादेकपलाधिकम् ।
अतोऽन्यथा वर्तमानो दाप्यो द्वादशकं दमम् ।। 396 ।।
यदि जुलाहा दस पल सूत लेता है तो उसे ग्यारह पल सूत लौटाना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करता तो राजा को उस पर बारह दमड़ी का दण्ड लगाना चाहिए।
शुल्कस्थानेषु कुशलाः सर्वपण्यविचक्षणाः ।
कुर्युर्वं यथापण्यं ततो विंश नृपो हरेत् ॥ 397 ।।
कर आदि के कार्यों में तथा हर प्रकार के लेन-देन सम्बन्धी कार्यों में राजा द्वारा कुशल व्यक्तियों को रखना चाहिए और इन कार्यों से होने वाले लाभ का बीसवां भाग उन्हें देना चाहिए।
राज्ञः प्रख्यातभाण्डानि प्रतिषिद्धानि यानि च।
तानि निर्हरतो लोभात्सर्वहारं हरेन्नृपः ।। 398 ।।
जो दुष्ट व्यापारी राजा के निजी पात्रों व बिक्री से रोके गए पात्रों को लोभवश दूसरे स्थान पर ले जाकर बेच दे तो राजा को उसकी सारी सम्पत्ति कब्जे में ले लेनी चाहिए।
शुल्कस्थानं परिहरन्नकाले क्रयविक्रयी।
मिथ्यावादी संस्थानेदाप्यो ऽष्टगुणमत्ययम् ॥ 399 ।।
यदि कोई व्यक्ति शुल्क के स्थान से धन बचाता है, छिपा कर चोरी की वस्तुएं खरीदता-बेचता है, मोल-भाव में झूठ बोलता है और वस्तुएं कम तौलता है, उससे बचाए धन का छः गुना और झूठ बोलकर बचाए धन का आठ गुना दण्ड रूप में वसूलना चाहिए।
आगमं निर्गमं स्थानं तथा वृद्धि क्षयावुभौ ।
विचार्य सर्वपण्यानं काम्येत्क्रयविक्रयौ ।। 400 ।।
किसी भी वस्तु के खरीदने के लिए आवागमन, उसके संग्रह, भाव के घटने-बढ़ने का अनुमान लगाकर ही उस वस्तु का भाव निर्धारित करना चाहिए।
पञ्चरात्रे पञ्चरात्रे पक्षे पक्षेऽथवा गते।
कुर्वीत चैषां प्रत्यक्षमर्घसंस्थापनं नृपः ।॥ 401 ।।
राजा को चाहिए कि एक सप्ताह अथवा एक पखवाड़ा बीतने के बाद वह व्यापारियों को वस्तुओं की नई दर निर्धारित करने का आदेश दे।
तुलामान प्रतीमान सर्व एव स्यात्सुरक्षितम्।
षट्सु षट्सु च मासेषु पुनरेव परीक्षयेत् ॥ 402 ।।
राजा द्वारा हर छः माह बाद तुला की, तौल की व अन्य नापों की भली-भांति जांच करवानी चाहिए।
पण यानं तरे दाप्यं पौरुषोऽर्धपणं तरे।
पादं पशुश्च योषिच्च पादार्थ रिक्तकः पुमान् ।। 403 ॥
किसी सेतु से गुजरने वाली गाड़ी पर एक पण, सामान लादे हरेक व्यक्ति पर आधा पण, पशुओं पर चौथाई पण व खाली हाथ जाते स्त्री पुरुषों पर 1/8 पणों का शुल्क निश्चित करना चाहिए।
भाण्डपूर्णानि यानानि तार्यदाप्यानि सारतः ।
रिक्तभाण्डानि यत्किञ्चित्पुमांसश्चापरिच्छदाः ।। 404 ।।
सामान से लदी गाड़ी द्वारा पुल पार करने पर उसका शुल्क गाड़ी में लदे वजन के अनुसार निश्चित करना चाहिए। खाली वाहनों, सवारियों व गरीबों के शुल्क में छूट बरतनी चाहिए।
दीर्घध्वनि यथा देशं यथा कालं तरो भवेत्।
नदीतीरेषु तद्विद्यात्समुद्रे नास्ति लक्षणम् ॥ 405 ।।
यदि पुल लंबा हो तो उस पर से गुजरने का शुल्क देश व काल के अनुसार ही निर्धारित करना चाहिए। पुलों पर शुल्क लगाने का यह नियम समुद्र पर नहीं केवल नदियों पर लागू होता है।
गर्भिणी तु द्विमासादिस्तथा प्रव्रजितो मुनिः ।
ब्राह्मणालिङ्गनश्चैव न दाप्यास्तारिकं तरे ॥ 406 1
यदि दो माह की गर्भवती स्त्री, संन्यासी, ब्राह्मण, वानप्रस्थ व ब्रह्मचारी नदी पार कर रहे हों तो नाविक को उनसे कोई शुल्क नहीं वसूलना चाहिए।
यन्नावि किञ्चिद्दासानां विशीर्येतापराधतः।
तद्दासैरेव दातव्यं समागम्य स्वतोंऽशतः ॥ 407 ।।
नाव पर सवार यात्रियों का नौकर की गलती से कोई नुकसान हो जाने की स्थिति में सभी को मिलकर उनकी क्षति पूर्ति करनी चाहिए। इसमें केवट का योगदान भी वांछनीय है।
एष नौयायिनामुक्तौ व्यवहारस्य निर्णयः।
दासा पराधतस्तोये दैविके नास्ति निग्रहः ।। 408 ।।
जल की जो हानि नाविकों व मल्लाहों के अपराध के परिणामस्वरूप होती है उसकी भरपाई तो उन्हीं से करवानी चाहिए किंतु दैवी प्रकोपों, आंधी-तूफान, ओलावृष्टि आदि के लिए उन्हें दोषी न मानें।
वाणिज्यं कारयेद्वश्यं कुसीदं कृषिमेव च।
पशूनां रक्षणं चैव दास्यं शूद्रं द्विजन्मनाम् ।। 409 ॥
राजा का कर्तव्य है कि वह वैश्यों द्वारा व्यापार, गिरवी वस्तुओं, खेतों व पशुओं की रक्षा करवाए तथा शूद्रों द्वारा द्विजातियों की रक्षा करवाए।
क्षत्रियं चैव वैश्यं च ब्राह्मणोवृत्तिकर्षितौ ।
बिभृयादानृशंस्येन स्वानिकर्माणि कारयन् ॥ 410 ।।
क्षत्रिय व वैश्य के किसी कारणवश कारोबार न चल पाने से अभावग्रस्त होने पर, ब्राह्मण को चाहिए कि अपना कर्तव्य पालन करते हुए वह दयावश क्षत्रिय व वैश्य का पालन-पोषण करे।
दास्यं तु कारयंल्लोभाद् ब्राह्मणः संस्कृतान्द्विजान्।
अनिच्छतः प्रभवत्यांद्राज्ञादण्ड्यः शतानि षट् ॥ 411 ॥
जो ब्राह्मण लोभ एवं क्रूरता के वशीभूत हो विद्वान ब्राह्मणों से बलात् दासता करवाता है, राजा द्वारा उस पर छः सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
शूद्रं तु कारयेद्दास्यं क्रीतमक्रीतमेव वा।
दास्यायैव हि सृष्टोऽसौ ब्राह्मणस्य स्वयम्भुवा ।। 412 ॥
चाहे वह खरीदा गया हो अथवा नहीं लेकिन शूद्र से ही सेवा करवानी चाहिए। शूद्रों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी ने ब्राह्मणों की सेवा के उद्देश्य से ही की है।
न स्वामिना निसृष्टोऽपि शूद्रोदास्याद्विमुच्यते ।
निसर्गजं हि तत्तस्य कस्तस्मात्तदुपोहति ।। 413 ।।
शूद्र को यदि उसके स्वामी से मुक्त करा भी लिया जाए तो भी वह सेवा कर्म से मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि सेवा उसका स्वाभाविक धर्म है जिससे कोई भी उसे मुक्त नहीं कर सकता।
ध्वजाहतो भक्तदासो गृह्वजः क्रीतदत्रिमौ ।
पैत्रिको दण्डदासश्च सप्तैते दासयोनयः ।। 414 ।।
युद्ध में विजय करके लाया हुआ बंदी, वेतन पाने वाला व्यक्ति, घर में काम करने वाले की संतान, क्रीत व्यक्ति, सम्बन्धी अथवा मित्र द्वारा सेवा हेतु दिया गया, वंश परंपरा से ही सेवा कार्य में रत तथा दण्ड के भुगतान के लिए सेवा कार्य अपनाने वाला व्यक्ति-उपर्युक्त सात प्रकार के व्यक्ति दास होते हैं।
भार्यापुत्रश्च दासश्च त्रय एवाऽधनाः स्मृताः ।
यत्ते यमधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम् ।। 415 ।।
स्त्री, पुत्र व दास इन्हें निर्धन माना जाता है क्योंकि इनकी आय उस व्यक्ति के अधिकार में मानी जाती है जो इनका स्वामी होता है।
विस्त्रब्धं ब्राह्मणः शूद्राद् द्रव्योपादाना माचरेत्।
न हि तस्यास्ति किञ्चित्स्वं भर्तृहार्यं धनो हि सः ।। 416 ॥
शूद्र द्वारा अर्जित धन को ब्राह्मण निर्भीक हो ले सकता है क्योंकि शूद्र को धन रखने का अधिकर नहीं है। उसका धन उसके स्वामी के अधीन ही होता है।
वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत्।
तौ हि च्युतो स्वकर्मेभ्यः क्षोभयेतामिदं जगत् ।। 417 ।।
राजा को चाहिए कि वह वैश्यों व शूद्रों को यत्नपूर्वक उनके नियत कर्मों में लगाए रखे। वैश्यों व शूद्रों द्वारा अपने कर्म के परित्याग से संसार में अव्यवस्था फैलने का अंदेशा रहता है।
अहन्यहन्यवेक्षेत कर्मन्तान्वाहनानि च।
आयव्ययौ च नियतावाकरान्कोशमेव च ॥ 418॥
राजा का कर्तव्य है कि वह नित्य कर्मचारियों के काम, वाहनों, आय, व्यय, खदानों व कोश का निरीक्षण करता रहे।
एवं सर्वानिमान् राजा व्यवहारान्समापयन् ।
व्यपोह्यकिल्विषं सर्वं प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ 419 ।।
इस प्रकार सभी प्रकार के कार्यों को ठीक-ठीक धर्मानुसार सम्पन्न करके ही राजा सभी पापों व दोषों से मुक्त हो जाता है तथा उसे परमगति प्राप्त होती है।
॥ मनुस्मृति अष्टम अध्याय समाप्त ।।
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