॥ राधाया दर्शनं पुण्यं कृष्णप्राप्तेः कारणम् ॥
Narayan - कथा
धार्मिक कथाएं
कथा (16)
Manusmriti Chapter 12
kathaShrijirasik
।।मनुस्मृति द्वादश अध्याय।।
चातुर्वर्णस्य कृत्सनोऽयमुक्तो धर्मस्त्वयानघ।
कर्मणां फलनिवृत्तिं शंस नस्त्वतः पराम् ॥ 1 ॥
ऋषि ने कहा- हे पापरहित महर्षि भृगु ! आपने कृपापूर्वक हमें चारों वर्णों के धर्मों से अवगत कराया है। अब कृपया हमें कर्मों के विविध शुभ-अशुभ फलों व उनसे मुक्ति के उपायों के बारे में भी बतलाइए।
स तानुवाच धर्मात्मा महर्षीन् मानवो भृगुः ।
अस्य सर्वस्य शृणुत कर्मयोगस्य निर्णयम् ॥ 2 ॥
मनु पुत्र धर्मात्मा भृगु जी ने महर्षियों के इस निवेदन का आदर करते हुए कहा, "मैं आपको सम्पूर्ण कर्मयोग के निर्णय के विषय में विस्तारपूर्वक बतलाता हूं।"
शुभाशुभफलं कर्म मनोवाग्देहसम्भवम् ।
कर्मजा गतयो नृणामुत्तमाधममध्यमा ।॥ 3 ॥
मनुष्य अपने मन, वाणी व शरीर से जो भी सुकर्म-दुष्कर्म करते हैं तदनुसार वे उत्तम, मध्यम व अधम योनियों को प्राप्त होते हैं।
तस्येह त्रिविधस्यापि त्र्यधिष्ठानस्य देहिनः ।
दशलक्षणयुक्तस्य मनः विद्यात्प्रवर्तकम् ॥ 4 ॥
मन, वाणी व शरीर-इन तीन साधनों से मनुष्य कर्म करता है और उसकी तीन गतियां होती हैं-उत्तम, मध्यम व अधम। (ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रिय के) दस लक्षणों से युक्त मनुष्य का मन ही उसे शुभ-अशुभ कर्मों की ओर प्रवृत्त करता है।
परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसाऽनिष्टचिन्तनम् ।
वितथाभिनिवेषश्च त्रिविधं कर्म मानसम् ॥ 5 ॥
पराई धन-सम्पत्ति को हथियाने की चाह, दूसरे व्यक्ति के अनिष्ट की इच्छा और परलोक में विश्वास न करना- ये तीनों मन द्वारा किए जाने वाले पाप हैं।
पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः । असम्बद्धप्रलापश्च वाड्.मयं स्याच्चतुर्विधम् ॥ 6 ॥
निरर्थक प्रलाप, चुगली करना, झूठ बोलना व कठोर वचन- ये सभी वाणी से किए जाने वाले पाप हैं।
अदत्तानामुपादानं चैवाविधानतः । हिंसा परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम् ॥ 7 ॥
इस जगत में तीन प्रकार के शारीरिक पाप कर्म हैं- अन्याय से दूसरे व्यक्ति का धन हड़प लेना, शास्त्रों का उल्लंघन कर की गई हिंसा एवं परस्त्री के साथ सहवास ।
मानसं मनसैवायमुपभुंक्ते शुभाशुभम् । वाचाऽवाचा कृतं कर्म कायेनैव च कायिकम् ॥ 8 ॥
मनुष्य को मन, वचन व शरीर द्वारा किए गए पाप कर्मों का फल क्रमशः मन, वाणी व देह से ही भोगना पड़ता है।
शरीरजैर्कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः ।
वाचिकैः पक्षिमृगतां मानसैरन्त्यजातिताम् ॥ 9 ॥
शरीर द्वारा किए गए पाप कर्मों के परिणामस्वरूप मनुष्य जड़ (वृक्ष, लता, पौधे इत्यादि) योनि में, वाणी द्वारा किए दोष कर्मों के परिणामस्वरूप पशु-पक्षियों की योनि में तथा मानस पाप कर्मों के फलस्वरूप मनुष्य अछूत योनि को प्राप्त होता है।
वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायादण्डस्तथैव च।
यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते ॥ 10 ॥
जो महानुभाव अपने विवेक द्वारा विचार कर वाणी, शरीर व मन को दृढ़ता से अनुशासित करते हैं उन्हें त्रिदण्डी कहा जाता है।
त्रिदण्डमेतन्निक्षिप्य सर्वभूतेषु मानवः ।
कामक्रोधौ तु संयम्य ततः सिद्धिं नियच्छति ॥ 11 ॥
यदि मनुष्य सभी जीवों पर तीनों - मन, शरीर व वाणी-प्रकार के दण्डों का पालन करता है अर्थात् वह मन, वचन व शरीर से किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं देता तथा काम व क्रोध पर संयम कर लेता है तो वह सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।
योऽस्यात्मनः कारयिता तं क्षेत्रज्ञं प्रचक्षते।
यः करोति तु कर्माणि स भूतात्मोच्यते बुधैः ।। 12 11
विवेकशील विद्वज्जनों द्वारा आत्मा को कर्म करने में प्रवृत्त करने वाले को क्षेत्रज्ञ व कर्म में प्रवृत्त होने वाले को भूतात्मा कहा गया है।
जीव संज्ञोऽन्तरात्मान्यः सहजः सर्वदेहिनाम्।
येन वेदयते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु ॥ 13 ॥
जीव वही है जो सभी प्राणियों में अंतरात्मा के रूप में रहता है और सभी जन्मों में मिलने वाले सुख-दुःखों को भोगता है।
तावुभौ भूतसम्पृक्तौ महान् क्षेत्रज्ञ एव च।
उच्चावचेषु भूतेषु स्थितं तं व्याप्य तिष्ठतः ।। 14 ।।
महान व क्षेत्रज्ञ जो पृथ्वी आदि पंचभूतों से मिलकर बने हैं- ये भी सभी प्राणियों में वास करने वाले ईश्वर के ही संरक्षण में रहते हैं।
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वरः ।। 15 ।।
क्षेत्रज्ञ व भूतात्मा-इन दोनों से भिन्न व उत्तम पुरुष कोई और है जिसे 'परमात्मा' कहा जाता है। वह सर्वसमर्थ, अनश्वर तीनों लोकों में स्थित तथा इस सृष्टि को धारण व उसका पालन करने वाला है।
असंख्याः मूर्त्तयस्तस्य निष्यतन्ति शरीरतः ।
उच्चावचानि भूतानि सततं देष्टयन्ति याः ॥ 16 ॥
पृथ्वी, वायु, अग्नि, आकाश व जल-ईश्वर के शरीरभूत इन पंचतत्वों से उच्च व अधम योनियों में असंख्य शरीर जन्म लेते रहते हैं तथा उन्हें निरंतर कर्म में प्रवृत्त करते रहते हैं।
पञ्चभ्य एव मात्राभ्यः प्रेत्य दुष्कृतिनां नृणाम् ।
शरीरं यातनार्थीयमन्यदुत्पद्यते ध्रुवम् ॥ 17 ॥
दुष्कर्म करने वाले मनुष्यों को अपने पाप कर्मों के फलस्वरूप कष्ट भोगने के लिए पंच तन्मात्राओं के जरिए दूसरे-तीसरे शरीर में पुनः जन्म लेना ही पड़ता है।
तेनानुभूयता यामीः शरीरेणेह यातनाः ।
तास्वेव भूतमात्रासु प्रलीयन्ते विभागशः ॥ 18 ॥
नए शरीर में अपने कर्मानुसार यमराज द्वारा (उनके लिए) जो कष्ट निर्धारित किए गए हैं उन्हें भोगकर पापात्मा फिर उन्हीं पंचतत्वों में विलीन हो जाता है।
सोऽनुभूयासुखादर्कान्दोषान्विषयसङ्गजान् । व्यपेतकल्मषोऽभ्येति तावेवोभौ महौजसौ ।। 19 ॥
निषेध विषयों के भोग से उत्पन्न दुःखों को भोगने के पश्चात् जीव पाप मुक्त हो जाता है व महान एवं क्षेत्रज्ञ को प्राप्त होता है।
तौ धर्म पश्यतस्तस्य पापं चातन्द्रितौ सह।
याभ्यां प्राप्नोति सम्पृक्तः प्रेत्येह च सुखासुखम् ।। 20 ।।
महान व क्षेत्रज्ञ द्वारा सदा निर्लिप्त भाव से जीवात्मा के पाप कर्मों को देखा जाता है। इन्हीं के जरिए जीव इस लोक में तथा परलोक में सुख की प्राप्ति करता है।
यद्याचरति धर्मं स प्रायशोऽधर्ममल्पशः ।
तैरेव चावृतो भूतैः स्वर्गे सुखमुपाश्नुते ।। 21 ।।
पाप की अपेक्षा पुण्य अधिक करने से जीव के पाप का पलड़ा हल्का हो जाता है अतः यह श्रेष्ठ पंचभूतों से युक्त हो स्वर्ग का सुख प्राप्त करता है।
यदि तु प्रायशोऽधर्म सेवते धर्ममल्पशः ।
तैर्भूतैः सः परित्यक्तो यामीः प्राप्नोति यातनाः ।। 22 ।।
किन्तु यदि जीव द्वारा पुण्य की तुलना में पाप अधिक किया गया है तो उसका धर्म हल्का हो जाता है। परिणामस्वरूप उत्तम पंचभूतों द्वारा उसका त्याग कर दिया जाता है और उसे यमराज के हाथों अनेक यातनाओं को सहना पड़ता है।
यामीस्ताः यातनाः प्राप्य स जीवो वीतकल्मषः ।
तान्येव पञ्चभूतानि पुनरप्येति भागशः ॥ 23 ।।
यम द्वारा दिए गए कष्टों व दुःखों के भोग से निष्कलुष अथवा शुद्ध हुआ जीव क्रमशः पुनः उन्हीं श्रेष्ठ पंचतत्वों को प्राप्त होता है।
एता दृष्ट्वास्यजीवस्य गतिः स्वेनैव चेतसा ।
धर्मतोऽधर्मतश्चैव धर्मे दध्यात्सदा मनः ।। 24 ।।
अतः धर्म कार्यों द्वारा जीव की सद्गति व दुष्कर्मों द्वारा उसकी दुर्दशा को जानकर मनुष्य को सदैव सत्कर्मों के प्रति प्रवृत्त होना चाहिए।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव त्रीन्विद्यादात्मनो गुणान् ।
यैर्व्याप्येमान्स्थितो भावान्महान्सर्वानशेषतः ।। 25 ।।
सत्वगुण, रजोगुण व तमोगुण- आत्मा की प्रकृति के तीन गुण हैं। यह विशाल स्थावर व जंगम रूप संसार इन तीन गुणों से व्याप्त होकर ही स्थित है।
यो यदैषां गुणो देहे साकल्येनातिरिच्यते।
तं तदा तद्गुणप्रायं तं करोति शरीरिणम् ॥ 26 ।।
सत्व, रज व तम-इन तीन गुणों में से प्राणी में जिस गुण की अधिकता पाई जाती है, वह उस गुण के लक्षणों से युक्त होता है।
सत्त्वं ज्ञानं तमोऽज्ञानं राग द्वेषौ रजः स्मृतम्।
एतद् व्याप्तमिदेतेषां सर्वभूताश्रितं वपुः ।। 27 ।।
ज्ञान के सत्य रूप को जानना सत्वगुण का, अज्ञान अर्थात् जानने योग्य सत्य को न जानना तमोगुण का एवं राग, द्वेष, मोह इत्यादि रजोगुण का लक्षण है। इन्हीं तीनों गुणों से सभी जीवों का शरीर व्याप्त है।
तत्र यत्प्रीतिसंयुक्तं किञ्चिदात्मनि लक्षयेत्।
प्रशान्तमिव शुद्धाभं सत्त्वं तदुपधारयेत् ॥ 28 ॥
मनुष्य की आत्मा को जिस गुण से प्रसन्नता मिले, उसे शांति व निर्मल ज्योति का अनुभव हो व उसका आचरण करने की जिज्ञासा होने लगे - उसे ही सत्वगुण जानें।
यत्तु दुःखसतायुक्तमप्रीतिकरमात्मनः ।
तद्रजोऽप्रतितं विद्यात्सततं हारि देहिनाम् ॥ 29 ।।
आत्मा के लिए अप्रिय, दुःख से युक्त एवं मन को परमात्मा से विरक्त कर इन्द्रियों के विषय में लगाने वाले गुण को रजोगुण समझें।
यत्तु स्यान्मोहसंयुक्तमव्यक्तं विषयात्मकम् ।
अप्रतर्व्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ।। 30 ।।
जो जीव को मोह व अज्ञान में प्रवृत्त करे, अप्रकट रहस्यों की ओर आकर्षित करे तथा जिसे तर्क से न जाना जा सके उसे ही तमोगुण समझना चाहिए।
त्रयाणामपि चैतेषां गुणानां यः फलोदयः ।
अग्रयोमध्यो जघन्यश्च तं प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ 31 ॥
इन तीन गुणों के क्रमशः उत्तम, मध्यम व अधम फलों के बारे में अब मैं आपको विस्तार से समझाता हूं।
वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धर्मक्रियात्मचिन्ता च सात्त्विकं गुणलक्षणम् ॥ 32 ।।
सत्वगुण के लक्षण हैं- वेदाभ्यास, तप, ज्ञान, पवित्रता, अनुशासन, इंद्रिय-निग्रह, धर्माचरण तथा आत्मा का चिन्तन ।
आरम्भरुचिताऽधैर्यमसत्कार्यपरिग्रहः ।
विषयोपसेवा चा जस्त्रं राजसं गुणलक्षणम् ॥ 33 ॥
नवीन कार्यों को आरम्भ करने में रुचि, कर्मों के फल-प्राप्ति के लिए बेसब्री, निषिद्ध कर्मों को करने की प्रवृत्ति एवं विषयों का निरंतर भोग ये रजोगुण के चिह्न हैं।
लोभः स्वप्नोऽधृतिः क्रौर्य नास्तिक्यं भिन्नवृत्तिता ।
याचिष्णुता प्रमादश्च तामसं गुणलक्षणम् ।। 34 ।।
तमोगुण के लक्षण इस प्रकार हैं- लोभ, आलस्य, क्रूरता, अधैर्य, ईश्वर पर आस्था न होना, दुराचार, प्रमाद एवं याचनावृत्ति ।
त्रयाणामपि चैतेषां गुणानां त्रिषु तिष्ठताम् ।
इदं सामासिकं ज्ञेयं क्रमशो गुणलक्षणम् ॥ 35 ॥
सत्वगुण, रजोगुण व तमोगुण-इन तीनों में स्थित कर्मों के गुण लक्षण निम्रलिखित हैं।
यत्कर्म कृत्वा कुर्वश्च करिष्यंश्च लज्जति।
तज्ज्ञेयं विदुषा सर्व तामसं गुणलक्षणम् ॥ 36 ॥
जो कार्य करते हुए एवं करने के पश्चात् तथा भविष्य में उसे करने के विचार से ही मनुष्य में लज्जा का भाव उत्पन्न हो, विद्वज्जनों द्वारा उसे तमोगुणी माना जाता है।
येनास्मिन्कर्मणा लोके ख्यातिमिच्छति पुष्कलाम् ।
न च शोचत्यसम्पत्तौ तद्विज्ञेयं तु राजसम् ।। 37 ।।
जो कर्म करने से समाज में प्रचुर प्रसिद्धि प्राप्त हो व न करने से दुःख होता हो, उसे रजोगुणी कार्य मानें।
यत्सर्वेणेच्छति ज्ञातुं यन्नलज्जति चाचरन्।
येन तुष्यति चात्माऽस्य तत्सत्त्वगुणलक्षणम् ॥ ३8 ॥
यदि एक कार्य करने से उसके बारे में सभी को बताने की इच्छा हो, उसे करते हुए किसी प्रकार की लज्जा महसूस न हो तथा जिसे करने से आत्मा को संतोष एवं आनंद प्राप्त हो-वही सत्वगुणी कर्म होता है।
तमसो लक्षणं कामो रजसस्त्वर्थ उच्यते।
सत्त्वस्य लक्षणं धर्मः श्रेष्ठ्यमेषां यथोत्तरम् ॥ 39 ॥
काम-वासना को तमोगुण का, अर्थ की इच्छा रजोगुण का तथा धर्मभावना को सत्वगुण का लक्षण कहा गया है। तमोगुण की अपेक्षा रजोगुण एवं रजोगुण की अपेक्षा सत्वगुण उत्तम है।
येन यस्तु गुणेनैषां संसारान्प्रतिपद्यते।
तत्समासेन वक्ष्यामि सर्वस्यास्य यथाक्रमम् ।। 40 ।।
अब मैं आपको उस गति के बारे में विस्तार से क्रमानुसार बतलाता हूं, जिसे मनुष्य इन तीनों गुणों के पालन से प्राप्त करता है।
देवत्वं सात्त्विका यान्ति मनुष्यत्वं च राजसाः ।
तिर्यक्त्वं तामसाः नित्यमित्येषा त्रिविधा गतिः ।। 41 ॥
सत्वगुणी देवयोनि को, रजोगुणी मनुष्य योनि को तथा तमोगुणी पक्षी योनि को प्राप्त होते हैं। अतः तीन प्रकार के कर्मों के अनुसार जीव तीन तरह की गति को प्राप्त होता है।
त्रिविधा त्रिविधैषा तु विज्ञेया गौणिकी गतिः ।
अधमा-मध्यमाग्ग्रा च कर्मविद्याविशेषतः ।। 42 ।।
देश, काल एवं गुण आदि के भेद से तीनों गुणों के आधार पर जीव की तीन गतियां पुनः तीन प्रकार की होती हैं, उत्तम, मध्यम व अधम ।
स्थावराः कृमिकीटाश्च मत्स्याः सर्पाः सकच्छपाः ।
पशवश्च मृगाश्चैव जघन्या तामसी गतिः ॥ 43 ॥
तमोगुण के परिणामस्वरूप मिलने वाली निकृष्ट योनियां हैं, कीट, मत्स्य, वृक्षादि स्थावर, सर्प, कछुआ, पशु एवं शिकार किए जाने वाले मृगादि।
हस्तिनश्चतुरङ्गाश्च शूद्रा म्लेच्छाश्च गर्हिताः ।
सिंहव्याघ्रवराहाश्च मध्यमा तामसी गतिः ॥ 44 ॥
रजोगुण के फलस्वरूप हाथी, घोड़ा, शूद्र, म्लेच्छ, सिंह, व्याघ्र एवं सुअर जैसी योनियां मध्यम समझी जाती हैं।
चारणाश्च सुपर्णाश्च पुरुषाश्चैव दाम्भिकाः ।
रक्षांसि च पिशाचाश्च तामसीषूत्तमा गतिः ।। 45 ।।
चापलूसी करने वाले, खुशामदी करने वाले, पक्षी, अहंकारी, राक्षस व पिशाच योनियां - तमोगुणी योनियों में उत्तम मानी गई हैं।
झल्लाः मल्लाः नटाश्चैव पुरुषाः शास्त्रवृत्तयः ।
द्यूतपानप्रसक्ताश्च जघन्या राजसी गतिः ।। 46 ।।
रजोगुण की अधम योनियों के अंतर्गत झल्ल, मल्ल, नट शास्त्र से जीवन यापन करने वाले, जुए व मदिरा में लिप्त रहने वाले व्यक्ति माने जाते हैं।
राजानः क्षत्रियाश्चैव राज्ञां चैव पुरोहिताः ।
वादयुद्धप्रधानाश्च मध्यमा राजसी गतिः ॥ 47 ।
राजा, क्षत्रिय, राजा के पुरोहित, वाक्पटु विद्वान एवं कुशल योद्धा राजसी गति की योनियां हैं।
गन्धर्वाः गुह्यका यक्षाः विबुधानुचराश्च ये।
तथैवाप्सरसः सर्वाः राजसीषूत्तमा गतिः ॥ 48 ।।
रजोगुण की श्रेष्ठ योनियों के जीव हैं गंधर्व, गुह्यक यक्ष, देवताओं के सेवक एवं अप्सराएं इत्यादि ।
तापसाः यतयो विप्राः ये च वैमानिकाः गणाः ।
नक्षत्राणि च दैत्याश्च प्रथमा सात्त्विकी गतिः ।। 49 ॥
सत्वगुण की अधम योनि के जीव इस प्रकार हैं, तपस्वी, संन्यासी, ब्राह्मण, विमानों में घूमने वाले देवगण, नक्षत्र व दैत्य।
यज्वान ऋषयो देवाः वेदो ज्योतीषि वत्सराः ।
पितरश्चैव साध्याश्च द्वितीया सात्त्विकी गतिः ॥ 50 ॥
यज्ञ करने वाले, ऋषि, देवता, वेद, नक्षत्र, दिन, पितर एवं साध्य गण सत्वगुण की द्वितीय अर्थ मध्यम गति की योनियां मानी जाती हैं।
ब्रह्माविश्वसृजो धर्मो महानव्यक्तमेव च।
उत्तमां सात्त्विकीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः ।। 51 ।।
विद्वज्जनों द्वारा विश्व के रचयिता ब्रह्मा, धर्म, अव्यक्त प्रकृति तथा महत्तत्व को सत्वगुण की उत्तम गति कहा गया है।
एषः सर्वः समुद्दिष्टस्त्रिप्रकारस्य कर्मणः ।
त्रिविधस्त्रिविधः कृत्स्नः संसारः सार्वभौतिकः ।। 52 ।।
ये सब तीन गुणों के आधार पर तीन प्रकार के कर्मों व तदनुसार सम्पूर्ण संसार में प्राणियों की तीन प्रकार की स्थितियों का विस्तृत वर्णन है।
इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन धर्मस्यावनेन च।
पापान् संयान्ति संसारानविद्वांसो नराधमाः ।। 53 11
इंद्रियों के वशीभूत हो मूर्ख प्राणी धर्म की उपेक्षा कर देते हैं, जिसके फलस्वरूप अधम योनियों में जन्म लेकर कष्ट भोगते हैं।
यां यां योनिं तु जीवोऽयं येन येनेह कर्मणा।
क्रमशोयाति लोकेऽस्मिस्तत्तत्सर्वं निबोधत ।। 54 ।।
जीव को इस लोक में पाप-पुण्य कर्मानुसार जिस-जिस शुभाशुभ योनि में जन्म लेना पड़ता है, अब आप उसके बारे में एकचित्त होकर सुनें।
बहून् वर्ष गणान्गोरान्नरकान्प्राप्य तत्क्षयात् ।
संसारान्प्रतिपद्यन्ते महापातकिनस्त्विमान् ।। 55 ।।
जो प्राणी गंभीर एवं जघन्य पाप करते हैं वे अनेक वर्षों तक नरक की भीषण यातनाओं को झेलने के पश्चात् पाप कर्मों के फलों का क्षय हो जाने से पुनः इस संसार में उत्पन्न होते हैं।
श्वसूकर खरोष्ट्राणां गोजाविमृगपक्षिणाम्।
चण्डालपुक्कसानां च ब्रह्महा योनिमृच्छति ।। 56 ।।
यदि किसी व्यक्ति पर ब्रह्म हत्या का पाप है तो वह कुत्ते, सुअर, गधे, बैल, ऊंट, बकरे, भेड़, पशु, पक्षी, चाण्डाल व अन्त्यज योनि को प्राप्त होता है।
कृमिकीटपतङ्गानां विड्भुजां चैव पक्षिणाम्।
हिंस्त्रानां चैव सत्त्वानां सुरापी ब्राह्मणो व्रजेत् ॥ 57 ।।
जो ब्राह्मण मदिरापान करता है वह कीट-पतंगों, विष्ठा खाने वाले कौए जैसे पक्षियों व हिंसक पशुओं की योनि में जन्म लेता है।
लूताहिसरठानां च तिरश्चां चाम्बुचारिणाम्।
हिंस्त्राणां च पिशाचानां स्तेनो विप्रः सहस्त्रशः ।। 58 ।।
यदि कोई ब्राह्मण चोरी करता है तो वह सहस्त्र बार सर्प, मकड़ी, गिरगिट, जल में रहने वाले मगरमच्छ आदि जीवों एवं जीव हत्या करने वाले पिशाचों की योनि को प्राप्त होता है।
तृणगुल्मलतानां च क्रव्यादां दंष्ट्रिणामपि।
क्रूरकर्मकृतां चैव शतशो गुरुतल्पगः ।। 59 ॥
अपने गुरु की पत्नी से सहवास करने वाला पापी व्यक्ति सैंकड़ों बार घास-फूस, लता एवं मांसाहारी दाढों वाले जानवरों तथा क्रूर राक्षसों की योनि में उत्पन्न होता है।
हिंस्त्रा भवन्ति क्रव्यादाः कृमयोऽभक्ष्यभक्षिणः ।
परस्परादिनः स्तेनाः प्रेत्यान्त्यस्त्रीनिषेविणः ।। 60 ॥
यदि प्राणी पर जीव हत्या का पाप है तो वह मांसभक्षी जीवों, अभक्ष्य खाने वाले कीड़े-मकोड़ों, चोर एवं एक-दूसरे का भक्षण करने वाले भयंकर जीवों की योनि को प्राप्त होता है। चाण्डाल की स्त्री का गमन करने वाला मृत्यु उपरांत चाण्डाल के रूप में जन्म लेता है।
संयोगं पतितैर्गत्वा परस्यैव च योषितम् ।
अपहृत्य च विप्रस्वं भवति ब्रह्मराक्षसः ॥ 61 ॥
धर्म से भ्रष्ट लोगों की संगत में रहने वाला, परस्त्री गमन व ब्राह्मण के धन को हड़पने वाला मृत्यु के पश्चात् ब्रह्म राक्षस की योनि को प्राप्त होता है।
मणिमुक्ताप्रवालानि हृत्वा लोभेन मानवः ।
विविधानि च रत्नानि जायते होमकर्तृषु ॥ 62 ।।
यदि व्यक्ति लालच के कारण मोती, मणि, मूंगा एवं अन्य विविध प्रकार के रत्नों की चोरी करने का दुष्कर्म करता है तो वह होम में बलि दिए जाने वाले जीवों की योनि में उत्पन्न होता है।
धान्यं हृत्वा भवत्याखुः कांस्यं हंसो जलप्लवः ।
मधु दशं पयः काको रसं श्वानकुलो घृतम् ।। 63 ॥
अन्न, जल, कांस्य, मधु, दुग्ध, रस व घी चुराने वाला व्यक्ति क्रमशः चूहे, हंस, मेंढक, मक्खी, कौवे, कुत्ते और नेवले की योनि को प्राप्त होता है।
मांसं गृधोवसां मद्गुस्तैलं तैलपकः खगः ।
चीरीवाकस्तु लवणं बलाका शकुनिर्दधिः ॥ 64 ॥
जो व्यक्ति मांस, वसा, तेल, नमक एवं दही चुराने का पाप करता है वह क्रमशः गिद्ध, जलकौआ, तेल पीने वाले पक्षी, झींगर व बलाका पक्षी की योनि को प्राप्त होता है।
कौशेयं तित्तिरिं हृत्वा क्षौमं हृत्वा तु दर्दुरः ।
कार्षासतान्तवं क्रौञ्चो गोधा गां वाग्गुदोगुडम् ॥ 65 ॥
जो मनुष्य रेशमी कपड़े, अलसी (मूल्यवान रेशम) के वस्त्र, सूती कपड़े, गाय तथा गुड़ चुराता है वह क्रमशः तीतर, मेंढक, सारस, गोधा और वाग्गुद पक्षी की योनि में पैदा होता है।
छुच्छन्दरिः शुभानान्धान्पत्रशाकसुबर्हिणः ।
श्वावित्कृतान्नं विविधमकृतान्नं तु शल्यकः ॥ 66 ।। ।
इत्रादि सुगन्धि पदार्थ, सब्जियां, पका अन्न व कच्चे अन्न को चुराने वाला व्यक्ति क्रमशः छुछुन्दर, मोर, गीदड़ और शल्यक की योनि में जन्म पाता है।
बको भवति हृत्वाग्निं गृहकारी ह्यपस्करम् ।
रक्तानि हृत्वा वासांसि जायते जीवजीवकः ॥ 67 ॥
यदि किसी व्यक्ति पर अग्नि को चुराने, घर में कूटने-पीसने का सामान, रंगीन वस्त्रों की चोरी का पाप है तो वह क्रमशः बगुले, मकड़ी और चकोर की योनि में उत्पन्न होता है।
वृकमृगेभव्याघ्घ्राश्व फलमूलं तु मर्कटः ।
स्त्रीमृक्षस्तोक को वारियानान्युष्टः पशूनजः ॥ 68 ।।
जो व्यक्ति हिरण व हाथी, घोड़े, कंदमूल, स्त्री, पेयजल, रथ, नावादि तथा पशुओं को चुराता है, उसे क्रमशः भेड़िए, व्याघ्र, वानर, रीछ, चातक, ऊंट एवं बकरे की योनि में जन्म लेना पड़ता है।
यद्वा तद्वा परद्रव्यमपहृत्य बलान्नरः ।
अवश्यं याति तिर्यक्त्वं जग्ध्वा चैवाऽहुतहविः ॥ 69 ।।
यदि व्यक्ति बलपूर्वक दूसरे का धन हर लेता है और देवों को हवि अर्पित किए बिना ही भोजन ग्रहण करता है तो वह अवश्य ही पक्षी योनि को प्राप्त होता है।
स्त्रियोऽप्येतेन कल्पेन हत्वा दोषमवाप्नुयुः ।
एतेषामेव जन्तूनां भार्यात्वमुपयान्ति ताः ॥ 70 ॥
स्त्रियों को भी पुरुषों के समान ही इन दोषों के अनुसार उपरिलिखित दण्डों को भोगना पड़ता है। स्त्रियां इन जंतुओं की मादा के रूप में पैदा होती हैं।
स्वेभ्यः स्वेभ्यस्तु कर्मेभ्यश्च्युताः वर्णाः ह्यनापदि ।
पापान् संसृत्य संसारान् प्रेष्यतां यान्ति शत्रुषु ॥ 71 ॥
सामान्य परिस्थितियों में चारों वर्णों के लोग अपने धर्मोचित व आचरण योग्य कर्मों के परित्याग से न केवल तुच्छ योनियों में जन्म लेते हैं बल्कि उन्हें शत्रुओं की दासता भी झेलनी पड़ती है।
वान्ताश्युल्कामुखः प्रेतो विप्रः धर्मात्स्वकाच्च्युतः ।
अमेध्यकुणपाशी च क्षत्रियः कटपूतनः ।। 72 ।।
मैत्राक्षज्योतिकः प्रेतो वैश्यो भवति पूयभुक् ।
चैलाशकश्च भवति शूद्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः ।। 73 ॥
जो ब्राह्मण अपने धर्मोचित कर्म से भ्रष्ट होता है वह मरणोपरांत वमन का भोजन करने वाले प्राणी की योनि को प्राप्त होता है। आचरण योग्य कर्म का परित्याग करने वाला क्षत्रिय शव व पुरीष को खाने वाले कटपूतन नाम के प्राणी की योनि में, पीब का भक्षण करने वाले मैत्राक्षज्योतिक नामक प्राणी की योनि में कर्मच्युत वैश्य एवं वस्त्रों की जूं का भोजन करने वाले चैलाशक जीव की योनि में कर्मों से भ्रष्ट शूद्र पैदा होता है।
यथा यथा निषेवन्ते विषयान्विषयात्मकाः ।
तथा तथा कुशलता तेषां तेषूपजायते ।। 74 ।।
तेऽभ्यासात्कर्मणां तेषां पापानामल्पबुद्धयः ।
सम्प्राप्नुवन्ति दुःखानि तासु तास्विह योनिषु ।। 75 ॥
जैसे-जैसे प्राणी विषयों का भोग करता है, उसे उनमें सुख प्राप्त होने लगता है और धीरे-धीरे वह विषयों में आसक्त हो जाता है। परिणामस्वरूप वह इन पाप कर्मों को करके विविध योनियों में पैदा होकर कष्टों का भागी होता है।
तामिस्त्रादिषु चोग्रेषु नरकेषु विवर्तनम् ।
असिपत्रवनादीनि बन्धनच्छेदनानि च॥ 76 ॥
विविधाश्चैव सम्पीडाः काकोलूकैश्च भक्षणम् । करम्भबालुकातापान् कुम्भीपाकांश्च दारुणान् ॥ 77 ॥
तामिस्त्र-अन्धतामिस्त्र आदि नरकों में गिरकर पापी व्यक्ति बहुत से कष्ट भोगते हैं तो कभी शरीर को भेदने वाले असिपत्रवन जैसे नरकों की पीड़ा को।
जीव द्वारा कौए-उल्लू द्वारा नोचे जाने तथा तपती हई बालू में तपाया जाने जैसे अनेक प्रकार के असह्य कष्टों को भोगना पडता है।
सम्भवश्च वियोनिषु दुःखप्रायासु नित्यशः ।
शीतातपाभिघातांश्च विविधानि भयानि च ॥ 78 ॥
असकृद्गर्भवासेषु वासं जन्म च दारुणम्।
बन्धनानि च कष्टानि परप्रेष्यत्वमेव च ॥79 ।।
इस संसार में नित्य ही पापी जीव तुच्छ एवं कष्टकर योनियों में पैदा होते हैं। भयंकर शीत व आतप आदि के दुःख भोगते हैं और अनेक प्रकार के भय उनका पीछा करते रहते हैं।
ऐसे प्राणी बार-बार जन्म लेते व मृत्यु को प्राप्त होते हैं। गर्भावस्था में भी उनका जीवन अत्यंत कष्टप्रद होता है। उनका जन्म भी पीड़ाजनक होता है तथा जन्म मेने पर कारावास तथा लोकनिन्दा जैसे दुःखों का शिकार होते हैं।
बन्धु प्रियवियोगांश्च संवासं चैव दुर्जनैः ।
द्रव्यार्जनं च नाशं च मित्रामित्रस्य चार्जनम् ॥ 8० ।।
जरां चैवाप्रतिकारां व्याधिभिश्चोपपीडनम्।
क्लेशांश्च विविधांस्तांस्तान्मृत्युमेव च दुर्जयम् ।। 81 ।।
पाप कर्म करने वाले को जीवन में अपने प्रियजनों का विरह, बुरी संगति, धनार्जन में बाधाएं, कमाए हुए धन का खत्म होना, मित्रों की हानि एवं शत्रुओं की संख्या अधिक होना आदि कष्टों को भोगना पड़ता है।
अपरिहार्य वृद्धावस्था और गंभीर रोगों के कष्ट से दुष्ट लोगों को अधिक गुजरना पड़ता है। इस प्रकार उनका सारा जीवन दुःख व कष्ट झेलते हुए ही व्यतीत हो जाता है। अंततः वे मृत्यु का ग्रास बन जाते हैं।
यादृशेन तु भावेन शरीरेण यद्यत्कर्म निषेवते ।
तादृशेत शरीरेण तत्तत्फलमश्नुते ।। 82 ।।
इस प्रकार सात्विक, राजसी अथवा तामसी - जिस भी भाव से जो-जो कर्म किए जाते हैं उन्हीं के अनुसार प्राणी सुख एवं दुःख पाता है।
एष सर्वः समुद्दिष्टः कर्मणां वः फलोदयः ।
नैश्रेयस्करं कर्म विप्रस्येदं निबोधत ॥ 83 ॥
यह कर्मों के फलों के सम्बन्ध में समुचित जानकारी है। अब मैं आपको ब्राह्मण के लिए कल्याणकारी धर्म व आचरण के बारे में बताता हूं।
वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः ।
अहिंसा गुरुसेवा च निःश्रेयस्करं परम् ॥ 84 ॥
छः कर्म परम कल्याणकारी माने जाते हैं। ये इस प्रकार हैं- वेदाभ्यास, तप ज्ञान, इंद्रिय-निग्रह, अहिंसा एवं गुरु सेवा।
सर्वेषामपि चैतेषां शुभानामिह कर्मणाम्।
किञ्चिच्छ्रेयस्करतरं कर्मोक्तं पुरुषं प्रति ॥ 85 ॥
ब्राह्मण के लिए अपेक्षाकृत अधिक कल्याणकारी कर्म इन सभी शुभ कार्यों में से कौन-सा है-यह मैं अब बतलाता हूं।
सर्वेषामपि चैतेषामात्मज्ञानं परं स्मृतम्।
तद्व्यग्यं सर्वविद्यानां प्रमाप्यतेह्यमृतं ततः ॥ 86 ।।
षण्णामेषां सर्वेषां कर्मणां प्रेत्य चेह च।
श्रेयस्करतरं ज्ञेयं सर्वदा कर्म वैदिकम् ॥ 87 ॥
उपरिलिखित सभी कार्यों में आत्मज्ञान सर्वश्रेष्ठ है। यह सभी विद्याओं एवं तत्वों से उत्कृष्ट इसलिए है क्योंकि इससे मोक्ष प्राप्त होता है।
वेदाभ्यास, तप, ज्ञान, इंद्रिय-निग्रह, अहिंसा व गुरु सेवा-इन छः कर्मों में वेदाभ्यास ही इहलोक एवं परलोक में कल्याणकारी है।
वैदिके कर्मयोगे तु सर्वाण्येतान्यशेषतः ।
अन्तर्भवन्ति क्रमशस्तस्मिंस्तत्क्रियाविधौ ।। 88 ।।
वेदों के ज्ञान से सभी कर्म स्वतः सिद्ध हो जाते हैं अर्थात् वैदिक कर्मयोग में ही ज्ञानादि सारे कार्य निहित हैं।
सुखाभ्युदयिकं चैव नैश्रेयसिकमेव च।
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम् ॥ 89 ।।
इस संसार में निरंतर सुख की वृद्धि करने वाला तथा परलोक में मोक्ष प्रदान करने वाला धर्ममूलक वैदिक कर्म दो प्रकार का माना जाता है-प्रवृत्ति व निवृत्ति।
इह चामुत्र वा काम्यं प्रवृत्तं कर्म कीर्त्यते।
निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमुपदिश्यते ॥ 9० ॥
वह कर्म जो इस लोक एवं परलोक में सुख प्राप्ति की इच्छा से किया जाता है वह प्रवृत्तिमूलक होता है। निष्काम ज्ञान अर्थात सभी कामनाओं एवं स्वार्थ से रहित ज्ञान ही निवृत्तिमूलक कहा गया है।
प्रवृत्तं कर्म संसेव्यं देवानामेति साम्यताम्।
निवृत्तं सेवमानस्तु भूतान्यत्येति पञ्च वै ॥ 91 ।।
मनुष्य यदि प्रवृत्तिमूलक कर्मों को करता है तो वह देवताओं के समान हो जाता है अर्थात् वह एक निश्चित समय के लिए दिव्य सखों को प्राप्त करता है लेकिन निवृत्तिमूलक कर्म को करने के फलस्वरूप वह पंचभूत तत्वों से परे जाकर जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है तथा मोक्ष प्राप्त करता है।
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
समं पश्यन्नात्मयाजी स्वराज्यमधिगच्छति ।। 92 ।।
आत्मा को सभी प्राणियों में व्याप्त, आत्मा में सभी प्राणियों को देखना व संसार के सभी प्राणियों को समान रूप से देखना आत्म यज्ञ कहलाता है। इसी आत्म यज्ञ का पालन करने वाले को ही मोक्ष प्राप्त होता है।
यथोक्तान्यपि कर्माणि परिहाय द्विजोत्तमः ।
आत्मज्ञाने शमे च स्याद् वेदाभ्यासे च यत्नवान् ।। 93 ।।
जो कर्म उसके वर्णधर्मानुकूल कहे गए हैं, उन्हें त्यज कर भी यदि ब्राह्मण आत्मज्ञान व इंद्रियों के संयम द्वारा वेदाभ्यास में चित्त लगाता है तो वह ब्राह्मण भी श्रेष्ठ व उत्तम हो जाता है।
एतद्धि जन्मसाफल्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः ।
प्राप्यैतत्कृतकृत्यो हि द्विजो भवति नान्यथा ॥ 94 ॥
उसी ब्राह्मण विशेष का जीवन सफल है जो अपने चित्त को इस प्रकार वश में कर लेता है, अन्य का नहीं।
पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम्।
अशक्यं चाऽप्रमेयं च वेदशास्त्रमिति स्थितिः ॥ 95 ॥
वेद पितरों, देवों व मनुष्यों के सनातन नेत्र हैं। वेदों का ज्ञान अप्रमेय है। हमारी परम्परा में वेदशास्त्रों की यही अनिवार्य उपस्थिति है जिसकी पूर्ति अन्य ग्रंथ नहीं कर सकते।
याः वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः ।
सर्वास्ताः निफलाः प्रेत्य तमोनिष्ठाहिता स्मृताः ॥ 96 ॥
स्मृति आदि शास्त्र यदि वेद विरोधी हैं तो वे भ्रमित करने वाले एवं अंधकार की ओर ले जाने वाले हैं। इसीलिए उनका अध्ययन निष्फल व व्यर्थ हो जाता है।
उत्पद्यन्ते च्यवन्ते च यान्यतोऽन्यानिकानिचित् । तान्यर्वाक्कालिकतया निष्फलान्यनृतानि च ॥ 97 ॥
वेदेतर ग्रंथों की उत्पत्ति व नाश होता रहता है। आधुनिक काल में रचे जाने के कारण वे पूर्ण सत्य नहीं हैं तथा निष्फल भी हैं। वेद ही सत्य के एकमात्र साक्षी हैं।
चातुर्वर्ण्य त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक् ।
भूतं भाव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिध्यति ॥ १8 ।।
वेदों पर ही चारों वर्णों, तीन लोकों, चार आश्रमों और भूत, वर्तमान एवं भविष्य- समय के तीन कालों की स्थिति आधारित है।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसूतिगुणकर्मतः ॥ 99 ।।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध-इन पांच विषयों की तथा ज्ञानेन्द्रियों की अनुभूति भी वेदों के ज्ञान के माध्यम से ही होती है।
बिभर्ति सर्वभूतानि वेदशास्त्रं सनातनम्।
तस्मादेतत्परं मन्ये यज्जन्तोरस्य साधनम् ॥ 100 ॥
सभी प्राणियों का धारण व उनका भरण-पोषण सनातन वेद ही करता है। चूंकि वेद सभी जीवों के कल्याण का परम साधन है अतः मैं उसे परम तत्व समझता हूं।
सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च।
सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रौविदर्हति ॥ 101 ॥
जो व्यक्ति वेदों को भली-भांति जानता है वही सेनापति, राजा, दण्डनायक तथा शासन के अन्य सभी पदों पर आसीन होने का उचित अधिकारी है।
यथा जातबलो वह्निर्दहत्यार्द्रानपि द्रुमान्।
तथा दहति वेदज्ञः कर्मजं दोषमात्मनः ॥ 102 ॥
प्रबल रूप से प्रज्वलित अग्नि जिस प्रकार गीले पेड़ों को भी भस्म कर डालती है, उसी प्रकार वेदों का ज्ञाता व्यक्ति कर्मों से पैदा होने वाली त्रुटियों व दोषों को भी जला देता है।
वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो यत्रतत्राश्रमे वसन् ।
इहैव लोके तिष्ठन् सः ब्रह्मभूयाय कल्पते ।। 103 ॥
वह व्यक्ति जो वेदों के मर्म को भली-भांति जानता है, वह चाहे किसी भी आश्रम में जीवन व्यतीत करे. इसी लोक में ब्रह्मत्व को प्राप्त हो जाता है।
यज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठाः ग्रन्थिभ्यो धारिणो वरा।
धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठाः ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः ।। 104 ।।
ग्रंथों का अध्ययन करने वाले अशिक्षितों से श्रेष्ठ होते हैं, ग्रंथों का अर्थ समझने बाले व्यक्ति उन लोगों से श्रेष्ठ होते हैं, जो केवल ग्रंथों को पढ़ते हैं, ग्रंथों के तत्व को समझने वाले व्यक्ति और वेदों के अनुसार अपने जीवन को वहन करने वाले व्यवसायी ज्ञानियों से श्रेष्ठ होते हैं।
तपोविद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम्।
तपसा किल्विषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते ।। 105 ।।
ब्राह्मण का परम कल्याण करने वाले मुख्य दो साधन हैं- तप एवं विद्या। तप से पापों का नाश होता है और विद्या से अमृतत्व की प्राप्ति होती है।
प्रत्यक्षं चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम् ।
त्रयं सुविदितं कार्यं धर्मशुद्धिमभीप्सिता ।। 106 ।।
धर्म के मर्म को जानने के इच्छुक व्यक्ति को प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द-विविध शास्त्र-इन तीनों को भली-भांति जान लेना चाहिए।
आर्ष धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राऽविरोधिना ।
यस्तर्केणानुसन्धत्ते सः धर्म वेद नेतरः ।। 107 ।।
ऋषि-मुनियों द्वारा दिए गए धर्मोपदेश के समान ही वेदों में तर्क ढूंढ़ने वाला धर्म के अर्थ को समझ पाता है, अन्य नहीं।
नैःश्रेयसमिदं कर्म यथोदीरितमशेषतः ।
मानवस्य शास्त्रस्य रहस्यमुपदिश्यते ।। 108 ।।
जो सभी कार्य कल्याण हेतु किए जाने चाहिए उनका विस्तृत परिचय मैंने आपको दिया। अब मैं मनु स्मृति के रहस्य की व्याख्या करूंगा।
अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेद् भवेत्।
यं शिष्टाः ब्राह्मणाः ब्रूयुः धर्मः स्यादशंकितः ॥ 109 ॥
यदि वेदों में किसी धर्म अथवा आचरण योग्य नियम की व्याख्या विद्यमान नहीं है तो ऐसी स्थिति में विद्वान एवं शिष्ट ब्राह्मण जो परामर्श दें उसी का शंका रहित हो आचरण करना चाहिए।
धर्मेणाधिगतैः यैस्तु वेदः सपरिवृंहणः ।
ते शिष्टाः ब्राह्मणाः ज्ञेयाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः ।। 110 ॥
जिन्होंने छः अंगों समेत सभी वेदों का अध्ययन किया है और इस प्रकार वेदों से साक्षात् किया है, वे ही शिष्ट ब्राह्मण हैं। उनके वचनों का निश्शंक होकर आचरण करना चाहिए।
दशावरा वा परिषद्यं धर्म परिकल्पयेत्।
त्र्यवरा वापि वृत्तस्थाः तं धर्म न विचालयेत् ॥ 111 ।।
जो दस उत्तम ब्राह्मण या तीन विद्वान अधिकारियों के अनुसार धर्म कहा जाए-उसका उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
त्रैविद्यो हेतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः ।
त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत्स्याद्दशावरा ।। 112 ।।
तीनों वेदों के ज्ञाता, वेदशास्त्रों में व्याख्यायित न्याय शास्त्र के पंडित, तर्कशास्त्री, निरुक्त के विद्वान, धर्मशास्त्र के पंडित और संन्यास से पहले ब्रह्मचारी, गृहस्थ व वानप्रस्थ - इन सभी के समुदाय को सभा कहा जाता है।
ऋग्वेदविद्यजुर्वेदविच्च सामवेदविदेव च।
त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयनिर्णये ।। 113 ।।
धर्म के विषय में यदि संशय हो तो उसके निर्णय हेतु तीनों वेदों के ज्ञाता विद्वज्जनों को संयुक्त रूप से सभा मान लेना चाहिए।
एकोऽपि वेदविद् धर्मं यं व्यवस्येद् द्विजोत्तमः ।
स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानामुदितोऽयुतैः ।। 114 ॥
एक वेद ज्ञाता ब्राह्मण का कथन सहस्त्रों मूर्खी के कथन की अपेक्षा उत्तम होता है। ऐसे ब्राह्मण के कथन को परम धर्म मान स्वीकार कर लेना चाहिए।
अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् ।
सहस्त्रशः समेतानां परिषत्वं न विद्यते ।। 115 ।।
केवल जाति से ही स्वयं को श्रेष्ठ मानने वाले, व्रत भ्रष्ट एवं मंत्रज्ञान के बारे में कुछ न जानने वाले हजारों लोग भी एकस्वर होकर जो मत व्यक्त करते हैं, उसे धर्म न समझें।
यं वदन्ति तमोभूताः मूर्खाधर्मऽतद्विदः ।
तत्पापं शतधा भूत्वा तद् वक्तृमनुगच्छति ।। 116 ।।
यदि अंधकार (अंधकार अर्थात् अज्ञान) में पड़े हुए मूर्ख व्यक्ति पाप कर्म को धर्म कहते हैं तो वह पाप सौ गुना होकर बोलने वाले को लगता है।
एतद्वोऽभिहितं सर्वं निःश्रेयसकरं परम् ।
यस्मादप्रच्युतो विप्रः प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ 117 ॥
तप के धनी ऋषियो ! मैंने आपको परम कल्याण देने वाला संम्पूर्ण उपाय बताया है। इसका पालन कर मानव मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।
एवं सः भगवान्देवो लोकानां हितकाम्यया।
धर्मस्य परमं गुह्यं ममेदं सर्वमुक्तवान् ॥ 118 ।।
इस भांति लोकहित की कामना से भगवान मनु ने मुझे परम गोपनीय धर्म का उपदेश प्रदान किया।
सर्वमात्मनि सम्पश्येत्सच्चासच्चसमाहितः ।
सर्वं ह्यात्मनि सम्पश्यन्नाऽधर्मे कुरुते मनः ।। 119 ।।
सावधान चित्त से सभी सत् तथा असत् को अपने अंदर ही देखें। इस तरह जो अपनी आत्मा में ही सब कुछ देखता है उसका मन कभी अधर्म में नहीं लगता।
आत्मैव देवताः सर्वाः सर्वमात्मन्यवस्थितम् ।
आत्मा हि जनयत्येषां कर्मयोगं शरीरिणाम् ॥ 120 ॥
समस्त देवता आत्मा में ही हैं, सब कुछ आत्मा में ही पूरी तरह स्थित है। आत्मा ही शरीरधारी जीवों को कर्म योग द्वारा उत्पन्न करता है।
खं सन्निवेशयेत्खसु चेष्टनस्पर्शनेऽनिलम् ।
पंक्तिदृष्ट्योः परं तेजः स्नेहेऽपोगां च मूर्तिषु ॥ 121 ।।
शारीरिक आकाश में बाहर के आकाश को, स्पर्श और चेष्टा करने में वायु को, उदर की भोजन पचाने वाली अग्नि तथा नेत्रों में परमतेज को, स्नेह में पानी (जल) को एवं शारीरिक पार्थिव तत्व में बाह्य पृथ्वी को सन्निविष्ट करना चाहिए।
विशेष - इसे अनेक टीकाकार ब्रह्म ध्यान की एक विधि बताते हैं जिसमें साधक सभी पंचमहाभूतों (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) का ध्यान अपने अंदर ही करते हुए ब्रह्म में लीन होने की साधना करते हैं।
मनसीन्दुं दिशः श्रोत्रे क्रान्ते विष्णुं बले हरम् ।
वाच्यग्निं मित्रमुत्सर्गे प्रेजने च प्रजापतिम् ।। 122 ।।
प्रेशासितारं सर्वेषामणीयांसमणोरपि ।
रुक्माभस्वप्नधीगम्य विद्यात्तं पुरुषं परम् ॥ 123 ।।
मन में चंद्र को, कानों में दिशाओं को पैरों में विष्णु को, शक्ति में शिव को वचनों या वाणी में अग्नि को, गुदा में सूर्य को, शिश्न में प्रजापति को लीन हुआ अनुभव करते हुए एकत्व की भावना करें।
कल्पनातीत परम पुरुष परमात्मा को, जो सबका नियन्ता है जो अणु से भी सूक्ष्म परमाणु अर्थात् सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है और स्वर्ण के समान दीप्तमान है, उसका ध्यान स्वप्न बुद्धि से करना चाहिए। यहां स्वप्न बुद्धि से आशय मनोमस्तिष्क की उस ध्यानपूर्ण स्थिति से है जब उसमें केवल साक्षी भाव रह जाता है जैसा कि स्वप्न में होता है।
एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् ।
इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ।। 124 ।।
परमशक्ति परमात्मा को ही कुछ विद्वान अग्नि, कुछ लोग मनु और अन्य जन इन्द्र या प्राण तत्व कहते हैं।
एष सर्वाणि भूतानि पञ्चभिर्व्याप्य मूर्तिभिः ।
जन्मवृद्धिक्षयैर्नित्यं संसारयति चक्रवत् ॥ 125 ।।
यही आत्मा पंचमहाभूतों के रूप में सभी जीवों के शरीरों में रहते हुए जन्म, विकास और क्षरण की क्रियाओं द्वारा संसार को चक्रवत् निरंतर घुमाता रहता है।
एवं यः सर्वभूतेषु पश्यत्यात्मानमात्मना ।
सः सर्वसमतामेत्य ब्रह्माभ्येति परंपदम् ।। 126 ।।
सभी जीवों में आत्मा और परमात्मा को देखने वाला इस भांति समद्रष्टा बनकर परमपद ब्रह्म अर्थात् परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।
इत्येतन्मानवं शास्त्रं भृगुप्रोक्तं पठन् द्विजः ।
भवत्याचारवान्नित्यं यथेष्टां प्राप्नुयाद् गतिम् ॥ 127 ॥
ऋषियों को भृगु जी द्वारा सुनाई इस मनु स्मृति को पढ़ने वाला द्विज (ब्राह्मण) आचारशील बन जाता है जिसके फलस्वरूप वह गति अर्थात् मोक्ष प्राप्त करता है।
॥ इति मनु स्मृतिः ॥
Manusmriti Chapter 11
kathaShrijirasik
।।मनुस्मृति एकादश अध्याय।।
सान्तानिकं यक्ष्यमाणमध्वगं सर्ववेदसम् ।
गुर्वर्थं पितृमात्रर्थं स्वाध्यायायु॑ पतापिनौ ॥ 1 ॥
नवैतान् स्नातकान् विद्याद् ब्राह्मणान् धर्मभिक्षुकान्।
निःस्वेभ्यो देयमेतेभ्यो दाने विद्या विशेषतः ॥ 2 ॥
सन्तान हेतु विवाह के इच्छुक, यज्ञ-यागादि के इच्छुक, मार्ग चलने वाले, सभी वेदों के ज्ञाता, गुरु, माता, पिता के लिए धनाकांक्षी, स्वाध्याय करने वाला विद्यार्थी तथा रोगी-इन नौ प्रकार के स्नातकों को इनकी आवश्यकतानुसार दान-दक्षिणा देनी चाहिए।
एतेभ्यो हि द्विजाग्रेभ्यो देयमन्नं सदक्षिणम्।
इतरेभ्यो बहिर्वेदि कृतान्नं देयमुच्यते ॥ 3 ॥
इन द्विजाग्रों को दक्षिणा के साथ अन्न भी देना चाहिए। शेष अन्य को वेदी के बाहर पके हुए अन्न को देने का नियम है।
सर्वरत्नानि राज्ञा तु यथाईं प्रतिपादयेत् ।
ब्राह्मणान्वेदविदुषो यज्ञार्थं चैच दक्षिणाम् ॥4॥
वेद-विद्या के विद्वान ब्राह्मणों को यज्ञ के लिए तथा पुरोहितों को दान-दक्षिणा देने के लिए राजा द्वारा रत्न व धन दिए जाने चाहिए।
कृतदारोऽपरान्दारान्भिक्षित्वा योऽधिगच्छति ।
रतिमात्रं फलं तस्य द्रव्यदातुस्तु सन्ततिः ॥ 5 ॥
पूर्व विवाहित पुरुष यदि भिक्षा मांग कर पुनर्विवाह करता है तो उसको दूसरी पत्नी से केवल रतिभोग का सुख ही प्राप्त होता है। उसके गर्भ से उत्पन्न संतान पर विवाह के लिए धन देने वाले का अधिकार होता है।
धनानि तु यथाशक्ति विप्रेषु प्रतिपादयेत्।
वेदवित्सु विविक्तेषु प्रेत्य स्वर्ग समश्नुते ॥ 6 ॥
जो ब्राह्मण वेदों के ज्ञाता हैं तथा निसंग हैं- उन्हें जितना सम्भव हो, उतना दान देना चाहिए। इससे दान देने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये।
अधिकं वापि विद्येत सः सोमं पातुमर्हति ॥ 7 ॥
जिस व्यक्ति के पास तीन अथवा तीन वर्षों से अधिक परिवार सहित अपने भरण-पोषण के लिए धन है, वह सोमयज्ञ करने का अधिकारी होता है।
अतः स्वल्पीयसि द्रव्ये यः सोमं पिबति द्विजः ।
सः पीतसोमपूर्वोऽपि न तस्याप्नोति तत्फलम् ॥ 8 ॥
इस निश्चित मात्रा से कम धन होने पर जो सोमयज्ञ करता है उसका प्रथम सोमयज्ञ ही व्यर्थ हो जाता है फिर दूसरे की तो क्या कहें।
शक्तः परजने दाता स्वजने दुःखजीविनि।
मध्वापातो विषास्वादः सः धर्मप्रतिरूपकः ॥ १ ॥
जो व्यक्ति स्वजनों द्वारा कष्ट से पीड़ित होने पर भी अपरिचितों को दान देता है वह मानो मधु को तज कर विष ग्रहण करता है।
भृत्यानामुपरोधेन यत्करोत्यौर्ध्वदैहिकम्।
तद् भवत्यसुखोदर्क जीवतश्च मृतस्य च ॥ 10 ॥
वह व्यक्ति जो खुद पर आश्रित स्त्री-पुरुषों को वंचित रखकर परलोक सुधारने के लिए दान-पुण्यादि करता है उसके लिए यह दान जीवन में व परलोक में दुखदायक ही सिद्ध होता है।
यज्ञश्चेत्प्रतिरुद्धः स्यादेकेनाङ्गेन यज्वनः ।
ब्राह्मणस्य विशेषेण धार्मिके सति राजनि ॥ 11 ॥
यः वैश्यः स्याद् बहु पशुर्डीनक्रतुरसोमपः ।
कुटुम्बात्तस्य तद्रव्यमाहरेद्यज्ञसिद्धये ॥ 12 ॥
धार्मिक राजा के शासन में द्विजातियों के- विशेषकर ब्राह्मण के यज्ञ का यदि कोई एक अंग सम्पन्न नहीं हो पाता तो उसके लिए अपेक्षित धन साधन-सम्पन्न किन्तु यज्ञ न करने वाले विशेषकर सोमयज्ञ रहित वैश्य से ग्रहण करना चाहिए।
आहरेत् त्रीणि वा द्वे वा कामं शूद्रस्यवेश्मनः ।
न हि शूद्रस्य यज्ञेषु कश्चिदस्ति परिग्रहः ।॥ 13 ॥
यदि यज्ञ के दो या तीन अंग किसी कारणवश पूरे न हए हों तो शद्र के घर से श्री द्रव्य ले लेना चाहिए क्योंकि वैसे भी यज्ञ में शूद्र का कुछ खर्च नहीं होता है।
योऽनाहिताग्निः शतगुरयज्वा च सहस्त्रगुः ।
तयोरपि कुटुम्बाभ्यामाहरेदविचारयन् ।। 14 ।।
सौ गायों का स्वामी यदि अग्निहोत्र न हो तथा अन्य धनपति हजार गायों के परिमित धन का स्वामी होने पर भी यजनशील न हो तो राजा को यज्ञ पूर्ति के लिए इन दोनों परिवारों से बिना सोच-विचार के धन ले लेना चाहिए।
आदाननित्याच्चादातुराहरेदप्रयच्छतः ।
तथा यथाऽस्य प्रथते धर्मश्चैव प्रवर्धते ।। 15 ॥
यदि एक व्यक्ति नित्य दान के रूप में धन लेता तो है किंतु देता कभी नहीं तो ऐसे व्यक्ति के घर से उसकी अनिच्छा के बावजूद धन ले लेना चाहिए। इससे उसी व्यक्ति का यश व धन संवर्द्धन होता है।
तथैव सप्तमे भक्ते भक्तानि षडनश्नतो।
अश्वस्तन विधानेन हर्तव्यं हीनकर्मणः ।। 16 ॥
ऐसे हीन कर्मी व्यक्ति से, चाहे वह तीन दिन से भूखा ही क्यों न हो, उसके पास अगले भोजन लायक धन छोड़कर शेष धन यज्ञ कार्य के लिए ले लेना चाहिए। धन होते हुए भी उसका उपयोग न करने वाले कंजूस धनी के लिए यही विधान नियत किया गया है।
खलात्क्षेत्रादगाराद्वा युतोवाप्युपलभ्यते ।
आख्यातव्यं तु तत्तस्मै पृच्छते यदि पृच्छति ॥ 17 ।।
इस प्रकार के व्यक्ति का धन खेत से, घर से अथवा जहां से भी मिले तत्काल ले लेना चाहिए। यदि धनपति पूछे तो उसे बता देना चाहिए कि छः समय के भोजन जितना ही धन लिया गया है।
ब्राह्मणस्य न हर्तव्यं क्षत्रियेण कदाचन।
दस्युनिष्क्रिययोस्तु स्वमजीवन्हर्तुमर्हति ।। 18 ॥
ऊपर वर्णित परिस्थिति में भी क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मण की वस्तु कभी ग्रहण नहीं करनी चाहिए। आवश्यकता पडने पर क्षत्रिय दस्यु व निष्क्रिय व्यक्ति का धन ही छीने।
योऽसाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यः सम्प्रयच्छति।
सः कृत्वा प्लवमात्मानं सन्तारयति तावुभौ ।। 19 ॥
जो व्यक्ति असाधुओं से धन लेकर साधुओं को देता है वह मानो स्वयं को नाव बनाकर उन दोनों का ही उद्धार करता है।
यद्धनं यज्ञशीलानां देवस्यं तद् विदुर्बुधाः ।
अयज्वानां तु यद् वित्तमासुरत्वं तदुच्यते ।। 20 ॥
विद्वज्जनों के अनुसार यजन करने वालों के धन को 'देवधन' व यजन न करने वालों के धन को 'असुरधन' माना गया है।
न तस्मिन् धारयेद्दण्डं धार्मिकः पृथिवीपतिः ।
क्षत्रियस्य हि बालिश्याद् ब्राह्मणः सीदति क्षुधा ।॥ 21 ॥
धार्मिक राजा को छः समय के भूखे ब्राह्मण को आर्थिक दण्ड नहीं देना चाहिए। क्षत्रिय राजा की मूर्खता से ही ब्राह्मण भूख से पीड़ित होता है।
तस्य भृत्यजनं ज्ञात्वा स्वकुटुम्बान्महीपतिः ।
श्रुतशीले च विज्ञाय वृत्तिं धर्त्यां प्रकल्पयेत् ।। 22 ।।
इसके विपरीत उस ब्राह्मण पर निर्भर परिवार के सदस्यों, उसकी विद्या व चरित्र को जानकर राजा द्वारा उस ब्राह्मण के अनुकूल जीविकोपार्जन की व्यवस्था होनी चाहिए।
कल्पयित्वाऽस्य वृत्तिं च रक्षेदेनं समन्ततः ।
राजा हि धर्मं षड् भागं तस्मात्प्राप्नोति रक्षितात् ।। 23 ।।
जो राजा ऐसे ब्राह्मण की आजीविका की व्यवस्था करके उसे सब प्रकार की सुरक्षा प्रदान करता है, वह उस ब्राह्मण द्वारा आचरित धर्म के छठे भाग का अधिकारी होता है।
न यज्ञार्थं दानं शूद्राद् विप्रो भिक्षेत कर्हिचित्।
यजमानो हि भिक्षित्वा चाण्डालः प्रेत्य जायते ।। 24 ।।
यज्ञ के लिए ब्राह्मण को शूद्र से धन की याचना कभी नहीं करनी चाहिए। शूद्र से धन लेने वाला यजनशील ब्राह्मण भी मृत्यु उपरांत चाण्डाल योनि में जन्म पाता है।
यज्ञार्थमर्थं भिक्षित्वा यो न सर्वं प्रयच्छति।
स याति भासतां विप्रः काकतां वा शतं समाः ।। 25 ।।
यज्ञ के लिए भिक्षा मांग कर उस सारे धन को यज्ञ में न लगाने वाला व्यक्ति सौ वर्षों तक चिडिया या कौए की योनि में जन्म लेता है।
देवस्वं ब्राह्मणस्वं वा लोभेनोपहिनस्ति यः।
सः पापात्मा परोलोके गृधोच्छिष्टे न जीवति ।। 26 ।।
देवधन व ब्राह्मण के धन का लोभवश हरण करने वाला दुरात्मा अगले जन्म में गीध की जूठन ग्रहण करके जीवन चलाता है।
दृष्टिं वैश्वानरीं नित्यं निर्वपेददपर्यये।
क्लृप्तानां पशुसोमानां निष्कृत्यर्थसम्भवे ।। 27 ।।
यदि किसी ब्राह्मण ने अब्दपर्यय- एक वर्ष की समाप्ति व दूसरे वर्ष के आरम्भ के अवसर पर सोमयज्ञ करने के उद्देश्य से शूद्रादि से धन लिया हो तो इस दोष के निवारण के लिए उसे प्रायश्चित के रूप में वैश्वानरी यज्ञ करना चाहिए।
आपत्कल्पेन यः धर्मं कुरुतेऽनापदि द्विजः ।
सः नाप्नोति फलं तस्य परत्रेति विचारितम् ॥ 28 ।।
आपत्काल में मृत्यु से भयभीत होकर सभी देवों, साध्यगणों, ब्राह्मणों व महर्षियों ने विधि के प्रतिनिधि के रूप में आपद धर्म निर्धारित किया है।
विश्वैश्च देवैः साध्यैश्च ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः ।
आपत्सु मरणाद्भीतैर्विधेः प्रतिनिधिः कृतः ।। 29 ॥
विद्वानों का मत है कि यदि ब्राह्मण द्वारा आपातकालीन धर्म का आचरण सामान्य परिस्थिति में किया जाता है, तो उसका कर्म परलोक में निष्फल हो जाता है।
प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पेन वर्तते ।
न साम्परायिकं तस्य दुर्मतेर्विद्यते फलम् ॥ 30 ।।
वेदों के अनुसार सामान्य स्थिति में अनुष्ठान के विधान में समर्थ व्यक्ति यदि आपातकालीन अनुष्ठानों का आसरा लेता है तो उसे पारलौकिक फल प्राप्त नहीं होते।
न ब्राह्मणो वेदयेत्किञ्चिद्राजनि धर्मवित् ।
स्ववीर्येणैव तान् शिष्यान्मानवानपकारिणः ।। 31 ।।
यदि ब्राह्मण को किसी से थोड़ी-बहुत हानि होती है तो उसे इसकी शिकायत राजा से न करके अपने ही सामर्थ्य से उन अपकारी लोगों को समझाने का प्रयास, करना चाहिए।
स्ववीर्याद्राजवीर्याच्च स्ववीर्य बलवत्तरम्।
तस्मात् स्वेनैव वीर्येण निगृह्णीयादीन् द्विजः ।। 32 ।।
स्वयं अपनी क्षति पूर्ति का प्रयास करने का कारण बताते हुए महर्षि भृगु कहते हैं- ब्राह्मण की अपनी शक्ति राजा व उसकी शक्ति से निश्चित रूप से अधिक महत्वपूर्ण है। अतः ब्राह्मण को चाहिए कि वह अपने विरोधियों को अपनी ही सामर्थ्य से वश में करने का प्रयत्न करे।
श्रुतीरथर्वाङ्गिरसीः कुर्यादित्यविचारयन्।
वाक्शस्त्रं वै ब्राह्मणस्य तेन हन्यादरीन् द्विजः ।। 33 ॥
अपने अपकारियों को अनुशासित करने के लिए ब्राह्मण को बिना विचारे ही अथर्ववेद के अभिचार परक मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए। ब्राह्मण की वाणी ही उसका बहुत बड़ा शस्त्र है। अपने शत्रुओं को ब्राह्मण इसी शस्त्र से परास्त करे।
क्षत्रियो बाहुवीर्येण तरेदापदात्मनः ।
धनेन वैश्यशूद्रौ तु जपहोमैर्द्विजोत्तमः ।। 34 ।।
क्षत्रिय अपने बाहुबल से, वैश्य व शूद्र धन से तथा ब्राह्मण जय एवं यज्ञ-हवनादि से अपने ऊपर आए संकट से अपना उद्धार करें।
विधाता शासिता वक्ता मैत्री ब्राह्मण उच्यते ।
तस्मै नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गिरमीरयेत् ॥ 35 ।।
सब कर्मों का अनुष्ठान कराने वाला होने के कारण ब्राह्मण विधाता, वेद-विद्या का शिक्षण करने व अधर्म को वश में रखने वाला होने से शास्ता व सत्य का व्याख्याता होने से वक्ता है। इन रूपों में ब्राह्मण सभी वर्णों का मित्र होता है। अतः मनुष्य को चाहिए कि उनके प्रति अनुचित व रूखी वाणी कभी न बोले।
न वै कन्या न युवतिर्नाल्पविद्यो न बालिशः ।
होता स्यादग्निहोत्रस्य नार्तो नासत्कृतस्तथा ।। 36 ।।
कन्या अथवा युवती, अल्पशिक्षित, मूर्ख, रोगी और पापाचारी को अग्निहोत्र का होता कदापि न बनाएं।
नरके हि पतन्त्येते जुह्वतः स च यस्य तत् ।
तस्माद्वै तानकुशलो होता स्याद्वेदपारगः ।॥ 37 ॥
यदि कन्या या रोगी को होता बनाया जाए तो वे स्वयं को और यजमान को नरक में धकेलते हैं। अतः वेद के ज्ञाता तथा श्रौत्र कर्म में कुशल विद्वान व्यक्ति को ही होता कर्म के लिए नियुक्त करना चाहिए।
प्राजापत्यमदत्त्वाश्वामग्न्याधेयस्य दक्षिणाम्।
अनाहिताग्निर्भवति ब्राह्मणो विभवे सति ॥ 38 ॥
अश्वमेध यज्ञ में प्रजापति हेतु अश्व व अग्न्याधेय की दक्षिणा धन होने पर भी न देने से ब्राह्मण अनाहिताग्नि हो जाता है जिससे यजमान को यज्ञादि का फल प्राप्त नहीं होता।
पुण्यान्यन्यानि कुर्वीत श्रद्दधानो जितेन्द्रियः ।
न त्वल्पदक्षिणैर्यज्ञैर्यजेतेह कथञ्चन ।। 39 ।।
जो श्रद्धालु व जितेन्द्रिय यजमान प्रचुर मात्रा में दक्षिणा देने में असमर्थ है, उसे अन्य पुण्य कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए किंतु किसी भी परिस्थिति में वह कम दक्षिणा वाला यज्ञ न करे।
इन्द्रियाणि यशः स्वर्गमायुः कीर्त्ति प्रजाः पशून् ।
हन्त्यल्पदक्षिणो यज्ञस्तस्मान्नाल्पधनो यजेत् ॥ 40 ।।
कम दक्षिणा वाला यज्ञ इन्द्रियों, यश, स्वर्ग, आयु, कीर्ति, संतान व पशुओं का विनाश करता है। अतः यजमान को चाहिए कि कभी कम दक्षिणा वाला यज्ञ न करे।
अग्निहोत्र्यपविध्याग्नीन् ब्राह्मणः कामकारतः ।
चान्द्रायणं चरेन्मासं वीरहत्यासमं हि तत् ॥ 41 ॥
स्वस्थ सकुशल होने पर यदि अग्निहोत्र ब्राह्मण लापरवाही से प्रातःकाल तथा सायंकाल यज्ञ नहीं करता तो उसका कर्तव्य है कि एक मास तक चान्द्रायण व्रत करे। यज्ञादि की उपेक्षा करना पुत्रहत्या तुल्य भयंकर पाप है।
ये शूद्रादधिगम्यार्थमग्निहोत्रमुपासते ।
ऋत्विजस्ते हि शूद्राणां ब्रह्मवादिषु गर्हिताः ।। 42 ।।
जो ब्राह्मण शूद्रों से धन लेकर यज्ञ करते हैं वे शूद्रों के ही ऋत्विज कहे जाते हैं व ब्रह्मवादियों में वे निन्दनीय होते हैं तथा उन्हें तुच्छ मानकर उनका अपमान किया जाता है।
तेषां सततमज्ञानां वृषलाग्न्युपसेविनाम् ।
पदा मस्तकमाक्रम्य दाता दुर्गाणि सन्तरेत् ॥ 43 ॥
वे मूर्ख ब्राह्मण जो शूद्रों से धन लेकर उनका यज्ञ करते हैं, उनके सिर पर पैर रखकर शूद्र संकट से उबर जाते हैं किंतु ब्राह्मणों का तिरस्कार होता है।
अकुर्वन्विहितं कर्म निन्दितं च समाचरन्।
प्रसक्तश्चेन्द्रियार्थेषु प्रायश्चित्तीयते नरः ।। 44 ।।
जो व्यक्ति वेदों में कहे गए कर्मों को नहीं करता, निन्दनीय कार्यों को करता है तथा इन्द्रियों में आसक्त रहता है वह व्यक्ति प्रायश्चित करके ही पापमुक्त हो सकता है।
अकामतः कृते पापे प्रायश्चित्तं विदुर्बुधाः।
कामकार कृतेऽप्याहुरेके श्रुतिदर्शनात् ।। 45 ।।
कुछ विद्वानों के अनुसार अनिच्छा से किए गए पापों का प्रायश्चित होता है किंतु कुछ विद्वान इच्छा से किए गए पापों से भी मुक्ति के लिए प्रायश्चित होता है-ऐसा मानते हैं।
अकामतः कृतं पापं वेदाभ्यासेन शुद्धयति ।
कामतस्तु कृतं मोहात्प्रायश्चित्तैः पृथक्विधैः ।॥ 46 ॥
जो पाप अनिच्छा से किया गया हो, उससे वेदाभ्यास द्वारा निवृत्त हुआ जा सकता है किंतु मोहवश किए गए पाप से मुक्ति अनेक प्रकार के प्रायश्चित को करने से ही होती है।
प्रायश्चित्तीयतां प्राप्य दैवात्पूर्वकृतेन वा।
न संसर्गं व्रजेत्सद्भिः प्रायश्चित्तेऽकृते द्विजः ।। 47 ।।
यदि कोई ब्राह्मण दैववश या पूर्वजन्म के कर्मों के कारण प्रायश्चित का पात्र बन जाता है तो उसे बिना प्रायश्चित किए सज्जनों की संगति नहीं करनी चाहिए।
इह दुश्चरितैः केचित्केचित्पूर्वकृतैस्तथा ।
प्राप्नुवन्ति दुरात्मानो नराः रूपविपर्ययम् ॥ 48 ।।
इस जन्म में किए गए दुराचारों के कारण कुछ लोग अपयश के पात्र बनते हैं तो कुछ लोग पूर्वजन्मों के कर्मों के कारण दुराचारी कहलाते हैं।
सुवर्ण चौरः कौनख्यं सुरापः श्यामदन्तताम् ।
ब्रह्महा क्षयरोगित्वं दोश्चर्यं गुरुतल्पगः ।। 49 ।।
पिशुनः पौतिनासिक्यं सूचकः पूतिवक्त्रताम्।
धान्यचौरोऽङ्गहीनत्वमातिरेक्यं तु मित्रकः ॥ 50 ॥
अन्नहर्तामयावित्वं मौक्यं वागपहारकः ।
वस्त्रापहारकः श्वेत्र्यं पंगुतामश्वहारकः ॥ 51 ।।
एवं कर्मविशेषेण जायन्ते सद् विगर्हिताः।
जडमूकान्धबधिरा विकृताकृतयस्तथा ।। 52 ।।
स्वर्ण चुराने वाला, गन्दे नाखूनों वाला, मदिरा पीने वाला, गंदे-मैले दांतों वाला, ब्रह्महत्या करने वाला, क्षयरोगी, गुरु पत्नी गामी, चर्मरोगी, चुगलखोर, दुर्गन्धित नासिका वाला, झूठी निन्दा करने वाला, अदर्शनीय, धन चुराने वाला, अंगहीन, धान्यादि में अभक्ष्य पदार्थ मिलाने वाला, अधिकांगी, अन्न चुराने वाला, मन्दाग्नि रोग से पीडित, वाणी का चोर, गंगा, वस्त्रों की चोरी, श्वेत कोढ से ग्रस्त तथा घोडे को चुराने वाला इत्यादि दुष्ट लोग सज्जनों द्वारा निन्दित होते हैं तथा मूर्ख, गूंगे, अन्धे बहरे व विकृत आकृति वाले पुरुष की योनि में जन्म लेते हैं।
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चरितव्यमतो नित्यं प्रायश्चित्तं विशुद्धये।
निन्द्यैर्हि लक्षणैर्युक्ताः जायन्तेऽनिष्कृतैनसः ॥ 53 ।।
जो पापी लोग प्रायश्चित नहीं करते वे परिणामस्वरूप अगले जन्म में निन्दनीय लक्षणों से युक्त होकर पैदा होते हैं। अतः विवेकशील मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी शुद्धि के लिए नित्य प्रायश्चित करे।
ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः ।
महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्चापि तैः सह ।। 54 ।।
चार कृत्य महापाप माने जाते हैं- ब्रह्महत्या, मदिरापान, चोरी व गुरु पत्नी गमन। इन पापों को करने वालों के साथ कोई सम्बन्ध रखना भी पाप है।
अनृतं च समुत्कर्षे राजगामि च पैशुनम् ।
गुरोश्चालीकनिर्बन्धः समानि ब्रह्महत्यथा ॥ 55 ।।
स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने के लिए झूठ बोलना, राजा से चुगली करना व गुरु को झूठी सूचना देना-ये भी ब्रह्महत्या के समान ही घोर पाप हैं।
ब्रह्मोज्झता वेदनिन्दा कौटसाक्ष्यं सुहृद्वधः ।
गर्हितानाद्ययार्जग्धिः सुरापान समानि षट् ॥ 56 ॥
वेदों के स्वाध्याय का त्याग, वेदों की आलोचना, झूठी गवाही, मित्र हत्या, निन्दित लशुन का सेवन तथा अभक्ष्य का भक्षण मदिरापान तुल्य ही निन्दित कार्य हैं।
निक्षेपस्यापहरणं नराश्वरजतस्य च।
भूमिवज्रमणीनां च रुक्मस्तेयसमं स्मृतम् ॥ 57 ॥
किसी की धरोहर, दास, अश्व, चांदी, जमीन, हीरे मोती व पक्षियों की चोरी स्वर्ण की चोरी के समान ही मानी गई है।
रेतः सेकः स्वयोनिषु कुमारीष्वन्त्यजासु च।
सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु गुरुतल्पसमं विदुः ।। 58 ।।
सगी बहन, चांडाल कुमारी, मित्र की पत्नी व पुत्रवधू से व्यभिचार गुरु पत्नी गमन जितना बड़ा पाप समझें अतः इन पापों का प्रायश्चित भी उसी के अनुसार होना चाहिए।
गोवधोऽयाज्यसयाज्य पारदार्यात्मविक्रयाः ।
गुरुमातृपितृत्यागः स्वाध्यायाग्नयोः सुतस्य च ॥ 59 ॥
परिवर्तिताऽनुजेऽनूढे परिवेदनमेव च।
तयोर्दानं च कन्यायास्तयोरेव च याजनम् ॥ 60 ॥
कन्यादूषणं चैव वार्धष्यं व्रतलोपनम् । तडागारामदाराणामपत्यस्य च विक्रयः ॥ 61 ॥
व्रत्यताबान्धवत्यागो भृताध्यापनमेव च।
भृताच्चाध्ययनादानमपण्यानां च विक्रयः ॥ 62 ॥
सर्वाकारेस्वधिकारो महायन्त्रप्रवर्तनम् ।
हिंसौषधीनां स्त्र्याजीवोऽभिचारो मूलकर्म च ॥ 63॥
इन्धनार्थमशुष्काणां द्रुमाणामवपातनम् ।
आत्मार्थं च क्रियारम्भो निन्दितान्नादनं तथा ।। 64 ॥
अनाहिताग्निता स्तेयमृणानामनपक्रियां।
असच्छास्त्राधिनमनं कौशीलव्यस्य च क्रिया ॥ 65 ॥
धान्यं कुप्यपशुस्तेयंमद्यपस्त्रीनिषेवणम् ।
स्त्रीशूद्रविट् क्षत्रवधो नास्तिक्यं चोपपातकम् ॥ 66 ॥
गाय का वध, जो यज्ञ करने योग्य नहीं हैं उनका यज्ञ करना, परस्त्रीगमन, अपनी आत्मा को बेचना, गुरु, माता-पिता, स्वाध्याय, यज्ञ व पुत्र का त्याग, बड़े भाई से पूर्व छोटे का विवाह, ज्येष्ठ व कनिष्ठ को कन्या देना, ज्येष्ठ व कनिष्ठ का यज्ञ कराना, अपनी कन्या से व्यभिचार, ब्याज लेना (वैश्य के अतिरिक्त), व्रत भंग करना, तालाब, उपवन, अपनी पत्नी व संतान को बेचना, निर्धारित अवधि में उपनयन संस्कार न कराना, अपने बन्धुओं को त्याग देना, नियत वेतन लेकर अध्यापन करना। वेतन शुल्क देकर शिक्षा ग्रहण करना, जो वस्तुएं बेचने योग्य नहीं हैं, उन्हें बेचना, स्वर्णादि की खानों पर अधिकार जमा लेना, बड़े यंत्र का संचालन करना, औषधियों को जडों से उखाड़ फेंकना, परिवार की स्त्रियों से कृषि करवा कर जीविकोपार्जन करना, मारण, उच्चाटन व वशीकरण अभिचारों का प्रयोग, ईंधन के लिए हरे वृक्ष काटना, केवल अपना पेट भरने के लिए अन्न पकाना, निन्दित अन्न का सेवन, अग्निहोत्र न करना, चोरी, ऋण न चुकाना, असत् शास्त्रों का अध्ययन नाचने-गाने का व्यवसाय करना, धान्य व पशुओं की चोरी, मदिरापान करने वाली स्त्री का संसर्ग. स्त्री तथा शूद्र, वैश्य व क्षत्रिय की हत्या व नास्तिकता- ये सभी उपपातक कृत्य हैं।
ब्राह्मणस्य रुजकृत्वा घ्घ्रातिरघ्नेयमद्ययोः ।
जैह्मयं च मैथुनं पुंसिजातिभ्रंशकरं स्मृतम् ॥ 67 ।।
डण्डे से पीटकर ब्राह्मण को कष्ट देना, मदिरादि दुर्गन्धित पदार्थों को सूंघना, कुटिलता करना तथा पुरुष से मैथुन करना जैसे पाप मनुष्य जाति भ्रंशकर कृत्य होते हैं।
खराश्वोष्ट्रमृगेभानामजाविकवधस्तथा ।
सङ्करीकरणं ज्ञेयं मीनाहिमहिषस्य च ॥ 6811
गधे, घोड़े, ऊंट, हिरण, हाथी, बकरा, भेड़, मछली, सर्प व भैंसे की हत्या जैसे कृत्य संकरीकरण पाप माने जाते हैं।
निन्दिभ्यो धनादानं वाणिज्यं शूद्रसेवनम् ।
अपात्रीकरणं ज्ञेयमसत्यस्य च भाषणम् ।। 69 ।।
अपात्र बना देने वाले पाप इस प्रकार हैं, निन्दित पुरुषों से धन लेना, वैश्य न होते हुए भी व्यापार करना, शूद्र की सेवा करना व असत्य बोलना।
कृमिकीटवयोहत्या मद्यानुगतभोजनम् ।
फलेन्धनकुसुमस्तेयमधैर्यं च मलावहम् ॥ 70 ।।
मलिन कर देने वाले पाप इस प्रकार हैं, कीड़े-मकोड़ों व पक्षियों की हत्या, मदिरा के साथ मांसादि खाना, ईंधन व फूलों को चुराना तथा अधैर्य।
एतान्येनांसि सर्वाणि यथोक्तानि पृथक् पृथक् ।
यैर्यैव्रतैरपोह्यन्ते तानि सम्यङ् निबोधत ।। 71 ।।
भृगु जी बोले- ब्राह्मणो ! आप लोगों को मैंने इन सभी पापों के बारे में पृथक-पृथक रूप से बतलाया। अब मैं यह वर्णन करता हूं कि किन-किन व्रतों से किन-किन पापों की निवृत्ति हो जाती है। एकाग्रचित्त होकर सुनिए।
ब्रह्महा द्वादशसमाः कुटीं कृत्वा वने वसेत् ।
भैक्ष्याश्यात्म विशुद्धयर्थं कृत्वा शवशिरोध्वजम् ॥ 72 ।।
लक्ष्यं शस्त्रभृतां वा स्याद् विदुषामिच्छयात्मनः । प्रास्येदात्मानमग्नौ वा समिद्धैः त्रिरवाक् शिराः ।। 73 ॥
यजेत वाश्वमेधेन स्वर्जिता गोसवेन वा।
अभिजिद् विश्वजिद्भ्यां वा त्रिकृताग्निष्ठतोपि वा ।। 74 ॥
जपन्वाऽन्यतमं वेदं योजनानां शतं व्रजेत् ।
ब्रह्महत्यापनोदायमितभुङ् नियतेन्द्रियः ।। 75 ।।
सर्वस्वं वेदविदुषे ब्राह्मणायोपयादयेत्।
धनं वा जीवनायालं गृहं वा सपरिच्छदम् ।। 76 ।।
हविष्यभुग्वानुसरेत्प्रतिस्त्रोतः सरस्वतीम्।
पठेद्वानियताहारस्त्रिवै वेदस्य संहिताम् ।। 77 ।।
कृतवपनो निवसेद् ग्रामान्ते गोव्रजेऽपि वा।
आश्रमे वृक्षमूले वा गोब्राह्मण हिते रतः ॥ 78 ॥
ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा सद्यः प्राणान्परित्यजेत् ।
मुच्यते ब्रह्महत्यायाः गोप्ता गोर्बाह्मणस्य च ॥ 79॥
त्रिवारं प्रतिरोद्धा वा सर्वस्वमविजित्य वा।
विप्रस्य तन्निमित्ते वा प्राणलाभे विमुच्यते ।। 8० ॥
एवं दृढव्रतो नित्यं ब्रह्मचारी समाहितः ।
समाप्ते द्वादशे वर्षे ब्रह्महत्यां व्यपोहतिः ।। 81 ॥
शिष्टवा वा भूमिदेवानां नरदेवसमागमे ।
स्वमेनोऽवभृथस्नातो हृयमेधे विमुच्यते ।। 82 ।।
जो व्यक्ति ब्राह्मण की हत्या करता है वह इन बारह उपायों में से किसी एक का पालन करके इस भयंकर पाप की निवृत्ति कर सकता है- 1. बारह वर्ष तक वन में कुटिया बनाकर और मृतक की खोपड़ी का चिन्ह अपने शरीर पर अंकित कर भिक्षा मांग कर निर्वाह करे, 2. स्वेच्छा से स्वयं को धर्मात्मा शस्त्रधारियों के तीखे बाणों का लक्ष्य बना ले, 3. जलती हुई अग्नि में अपने सिर को नीचा कर तीन बार डाले, 4. अश्वमेध, स्वर्जित, गोसवन, अभिजित, विश्वजित, त्रिवृत, अग्निष्ठत् आदि यज्ञों में से किसी एक का अनुष्ठान करे, 5. किसी एक वेद का जाप करते हुए सौ योजन पैदल चले 6. अपनी सारी पूंजी तथा सामान सहित अपना घर वेदज्ञ ब्राह्मण को दान कर दे, 7. हविष मात्र भोजन करता हुआ सरस्वती नदी के स्रोत की ओर चलता जाए व नियमपूर्वक कम भोजन खाते हुए नित्य तीन बार वेद संहिता पढ़े, 8. बारह वर्ष तक सिर मुंडाकर किसी ग्राम के बाहर गोशाला या वृक्ष के नीचे अथवा किसी अन्य पवित्र स्थल पर रहकर गौ व ब्राह्मण की सेवा करता रहे, 9. ब्राह्मण अथवा गाय के लिए तत्काल प्राणत्याग दे, 10. ब्राह्मण के धन को चोरों द्वारा तीन बार अथवा तीन ब्राह्मणों के धन को चोरों से एक बार बचाने में सफल हो जाए, 11. ब्राह्मण के धन को चोरों से बचाने में प्राणों की आहुति दे, तथा 12. ब्राह्मण के प्राणों पर आए संकट से उसे मुक्ति दिला पाए। बारह वर्षों तक इन सभी उपायों से अपने व्रत पर दृढ़ रहने वाला तथा ब्रह्मचर्य व इंद्रिय निग्रह से अपने चित्त को समाहित करने वाले को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल जाती है।
एक और उपाय भी है- पापी व्यक्ति अश्वमेध यज्ञ का आयोजन कर ब्राह्मणों व राजा के सामने अपने पाप को स्वीकार करते हए पश्चाताप की भावना व्यक्त करे एवं तत्पश्चात् अवभृथ स्नान करे।
धर्मस्य ब्राह्मणो मूलमग्रं राजन्य उच्यते ।
तस्मात्समागमे तेषामेना विख्याप्य शुद्धयति ॥ 83 ।।
धर्म का मूल ब्राह्मण है, क्षत्रिय उसका अग्रभाग है। अतः यदि इन दोनों के सामने पाप को स्वीकार कर पश्चाताप किया जाए तो पापी व्यक्ति शुद्धि को प्राप्त होता है।
ब्राह्मणः सम्भवेनैव देवानामपि दैवतम् ।
प्रमाणं चैव लोकस्य ब्रह्मात्रैव हि कारणम् ।। 84 ॥
स्वयं ब्रह्मा के प्रतिनिधिस्वरूप ब्राह्मण का जन्म देवों के देवत्व व लोक में धर्म की प्रामाणिकता सिद्ध करता है। सृष्टि का कारण भी स्वयं ब्राह्मण है और वह कार्य भी है।
तेषां वेदविदो ब्रूयुस्त्रयोऽप्येनः सुनिष्कृतिम्।
स तेषां पावनाय स्यात् पवित्रा विदुषां हि वाक् ।। 85 ।।
इस पाप का (ब्रह्महत्या का) तीन वेदज्ञाता व सदाचारी ब्राह्मणों द्वारा जो प्रायश्चित बताया जाए, उसका पालन करने से भी व्यक्ति पाप मुक्त हो जाता है क्योंकि विद्वज्जनों की वाणी पवित्र होती है।
अतोऽन्यतममास्थाय विधिं विप्रः समाहितः ।
ब्रह्महत्याकृतं पापं व्यपोहत्यात्मवत्तया ।। 86 ।।
पूर्वोक्त बारह उपायों में से किसी एक को अथवा तीन विद्वानों द्वारा बताए उपाय को एकाग्रचित्त होकर करने से ब्रह्महत्या पाप की निवृत्ति हो जाती है।
हत्वा गर्भमविज्ञातमेतदेव व्रतं चरेत् ।
राजन्यवैश्यौ चेजानावात्रेयीमेव च स्त्रियम् ॥ 87 ।।
अपरिचित गर्भस्थ बालक, गर्भवती स्त्री तथा क्षत्रिय व वैश्य की हत्या का भी 'यही प्रायश्चित बताया गया है।
उक्त्वा चैवानृतं साक्ष्ये प्रतिरुध्य गुरुं तथा।
अपहृत्य च निःक्षेपं कृत्वा च स्त्रीसुहृद्वधम् ॥ 88 ॥
असत्य साक्षी देने, गुरु विरोध, धरोहर को हड़प लेने, पत्नी व मित्र की हत्या के पाप का भी प्रायश्चित यही है।
नयं विशुद्धिरुदिता प्रमाप्याकामतो द्विजम्।
कामतो ब्राह्मणवधे निष्कृतिर्न विधीयते ।। 89 ॥
हे महात्माओ ! अनजाने में तथा बिना चाहे ही ब्राह्मण की हत्या हो जाने के प्रायश्चित तो यही हैं किंतु जानबूझकर किए गए इस पाप के निवारण का कोई उपाय नहीं।
सुरां पीत्वा द्विजो मोहादग्निवर्णां सुरां पिबेत् ।
तथा सः काये निर्दग्धे मुच्यते किल्विषात्ततः ॥ 9० ॥
जो ब्राह्मण मोहवश सुरापान करता है, वह आग में उबलती हुई सुरा पिए, जिससे उसका शरीर जल जाए व उसे असह्य पीड़ा हो। इस प्रकार उसे इस पाप से छुटकारा मिल जाता है।
गोमूत्रमग्निवर्णं वा पिबेदुदकमेव वा।
पयो घृतं वाऽऽमरणाद् गोशकृद्रसमेव वा ॥ 91॥
कणान्वा भक्षयेदब्दं पिण्याकं वा सकृन्निशि ।
सुरापानापनुत्त्यर्थं बालवासा जटी ध्वजी ॥ 92 ॥
गोमूत्र अथवा पानी को आग में खूब गरम करके पीना, मृत्युपर्यंत दूध व घी पीकर निर्वाह करना अथवा गोबर का रस पीना- ये मोहवश सुरापान करने के अन्य प्रायश्चित हैं।
एक और उपाय भी है-एक वर्ष तक एक समय चावल की कुट्टी या कटे तिलों को खाएं, कम्बल का मोटा वस्त्र पहनें, सिर पर बाल रखें और स्वयं को सुरापान के दोष से कलंकित होने के कारण व्रती होने की घोषणा करता रहे।
सुरा वै मलमन्नानां पाप्मा च मलमुच्यते।
तस्माद् ब्राह्मणराजन्यौ वैश्यश्च न सुरां पिबेत् ॥ 9३ ॥
सभी अन्नों के मल को सुरा कहा गया है और मल का ही दूसरा नाम पाप है। अतः ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य सुरापान न करें।
गौडी तैष्ठी च माध्वी च विज्ञेया त्रिविधा सुरा।
यथैवैका तथा सर्वाः न पातव्याः द्विजोत्तमैः ॥ 94 ॥
सुरा तीन प्रकार की होती है- गुड. पीठी तथा महवे से बनने वाली। ये तीनों ही मलस्वरूप हैं अतः द्विजोत्तम इसका सेवन कदापि न करें।
यज्ञरक्षः पिशाचान्नं मद्यं मांसं सुरासवम् ।
तद् ब्राह्मणेन नात्तव्यं देवानामश्नता हवि ॥ 95 ॥
जो तुच्छ प्रकार के मादक द्रव्य हैं जैसे- मदिरा, मांस, सुरा आसव-ये यक्षों, राक्षसों व पिशाचों द्वारा पिए जाने वाले पदार्थ हैं। अतः देवों को पवित्र हवि देने वाले द्विजातियों को चाहिए कि इन सबका सेवन न करें।
अमेध्ये वा पतेन्मत्तो वैदिकं वाप्युदाहरेत् ।
अकार्यमन्यत्कुर्याद्वा ब्राह्मणः मदमोहितः ॥ 96 ।।
यदि ब्राह्मण मदिरा पीता है तो वह या तो गंदी नाली में गिरेगा या फिर वेद मंत्रों का गलत उच्चारण करेगा अथवा अन्य निषिद्ध कार्यों को करेगा। अतः मदिरा का परित्याग करना ही श्रेष्ठ है।
यस्य कायगतं ब्रह्म मद्येनाप्लाव्यते सकृत्।
तस्य व्यपैति ब्राह्मण्यं शूद्रत्वं च स गच्छति ॥ 97 ॥
यदि ब्राह्मण के शरीर में उपस्थित ब्रह्म एक बार भी मदिरा के प्रवाह में डूब जाए तो उसका ब्राह्मणत्व जाता रहता है और वह शूद्र पद को प्राप्त होता है।
एषा विचित्राभिहिता सुरापानस्य निष्कृतिः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सुवर्णस्तेयनिष्कृतिम् ॥ 98 ।।
भृगु जी ने कहा- ये विचित्र उपाय सुरापान के दोष से मुक्त होने के हैं। अब मैं आपको स्वर्ण की चोरी के पाप से मुक्ति के उपाय बतलाता हूं।
सुवर्णस्तेयकृद्विप्रो राजानमभिगम्यतु ।
स्वकर्माख्यापयन् ब्रूयान्मां भवाननुशात्विति ॥ 99 ॥
यदि ब्राह्मण स्वर्ण की चोरी करता है तो उसे राजा के समक्ष जाकर अपने पाप के बारे में बताते हुए राजा से दण्ड देने का निवेदन करना चाहिए।
गृहीत्वा मुसलं राजा सकृद्धन्यात्तु तं स्वयम् ।
वधेन शुध्यति स्तेनो ब्राह्मणस्तपसैव तु ॥ 100 ॥
अपने हाथ में दण्ड लेकर स्वयं राजा स्वर्ण की चोरी करने वाले पर प्रहार करे। यूं तो ब्राह्मण तप से शुद्ध होता है किंतु चोर ब्राह्मण तो दण्ड पाकर ही शद्धि प्राप्त करता है।
तपसाऽपनुनुत्सुस्तु सुवर्णस्तेयजं मलम्।
चोरवासा द्विजोऽरण्ये चरेद् ब्राह्मणोव्रतम् ॥ 101 ।।
जो ब्राह्मण अपने चोरी के पाप को तप-साधना से दूर करना चाहता है उसे वन में जाकर चोरों के समान वस्त्र धारण कर ब्रह्महत्या के लिए बताए गए किसी एक व्रत का पालन करना चाहिए।
एतैः व्रतैरपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः।
गुरुस्त्रीगमनाधं तु व्रतैरेभिरपानुदेत् ।। 102 ।।॥
जो व्रत ब्रह्महत्या के संदर्भ में बताए गए हैं उनके पालन से ब्राह्मण चोरी के पाप से मुक्ति पा सकता है। गुरु पत्नी गमन के पाप से मुक्ति के उपाय इस प्रकार हैं।
गुरुतल्पाभिभाष्यैनस्तप्ते स्वप्यादयोमये।
सूर्मी ज्वलन्तीं स्वाश्लिष्येन्मृत्युना स विशुद्धयति ॥ 103 ॥
जो व्यक्ति गुरु पत्नी गमन के पाप से ग्रस्त है वह सार्वजनिक रूप से अपने पाप को स्वीकार करे व लोहे की जलती शय्या पर लोहे की जलती स्त्री का आलिंगन कर मृत्यु का वरण करे, तभी वह इस पाप से मुक्त हो सकता है।
स्वयं वा शिश्नवृषणावुत्कृत्याधाय चाञ्जलौ।
नैर्ऋतीं दिशमातिष्ठेदानिपातादजिह्मगः ।। 104 ॥
पापी व्यक्ति अपने हाथों से अपना लिंग व अण्डकोश काटकर अपनी हथेली में रख ले तथा शरीर के गिरने तक सीधी गति से नैऋत्य दिशा की ओर चलता रहे-गुरु पत्नी गमन के पाप की निवृत्ति का यह भी एक उपाय है।
खट्वाङ्गी चीरवासा वा श्मश्रुलो विजनेवने।
प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रमब्दमेकं समाहितः ।। 105 ॥
दूसरी सरल विधि इस प्रकार है- पापी व्यक्ति मस्तक पर योनि का चिन्ह धारण कर वल्कल वस्त्र पहन ले तथा केश, नख, लोम, श्मश्रु रख के एक वर्ष तक सावधानीपूर्वक कठिन प्राजापत्य व्रत का पालन करे।
चान्द्रायणं वा त्रीन्मासानभ्यस्येन्नियतेन्द्रियः ।
हविष्येण यवाग्वा वा गुरुतल्पापनुत्तये ।। 106 ॥
अथवा इन्द्रिय निग्रह कर पापी व्यक्ति तीन माह तक चान्द्रायण व्रत करे तथा इस दौरान हवि व यवागू के भोजन से ही निर्वाह करे।
एतैर्वतैरपोहेयुर्महापातकिनो मलम् ।
उपपातनिक स्त्वेवमेभिर्नानाविधैव्रतैः ।। 107 ।।
ये उपाय तो गुरु पत्नी गमन के पाप निवारण के लिए हैं। अन्य उपपातकों के पाप निवारण के कुछ सरल उपाय इस प्रकार हैं-
उपपातकसंयुक्तो गोष्घ्नो मासं यवान् पिबेत्।
कृतपापो वसेद् गोष्ठे कर्मणा तेन संवृत्तः ।। 108 ॥
जो व्यक्ति गोवध का पाप करता है उसे एक माह तक केवल जौ का पानी पीना चाहिए तथा गाय का ही चमड़ा ओढ़कर गोशाला में रहना चाहिए।
चतुर्थकालमश्नीयादक्षारलवणं मितम् ।
गोमूत्रेणाचरेत्स्नानं द्वौ मासौ नियतेन्द्रियः ॥ 109 ।।
एक अन्य उपाय है- पापी व्यक्ति को दो माह तक जितेन्द्रिय होकर प्रतिदिन गोमूत्र से स्नान करना चाहिए और रात्रि के प्रथम प्रहर में बिना नमक का थोड़ा सा भोजन करना चाहिए।
दिवानुगच्छेद्गास्तास्तु तिष्ठन्तूर्वं रजः पिबेत् ।
शुश्रूषित्वा नमस्कृत्य रात्रौ वीरासनं वसेत् ॥ 110 ॥
दिन के समय वह गायों के पीछे चलता रहे, जहां गाएं रुक जाएं, वहीं ठहर जाए और उनके खुरों की धूल-मिट्टी चाटता रहे। दिन में इस प्रकार उसे गायों की सेवा करनी चाहिए तथा रात में उन्हें नमस्कार करके 'वीरासन' में बैठे रहकर उनकी रखवाली करनी चाहिए।
तिष्ठन्तीष्वनुतिष्ठेत्तु व्रजन्तीष्वनुव्रजेत् ।
आसीनासु तथासीनो नियतो वीतमत्सरः ॥ 111 ॥
वह गायों के ठहरने पर ठहर जाए, चलने पर चले व उनके बैठने पर बैठ जाए। इस प्रकार करते हुए वह न तो कुढ़े और न ही इस कार्य में कोई कोताही करे।
आतुरामभिशस्तां वा चौरव्याघ्घ्रादिभिर्भयैः ।
पतितां पङ्कलग्नां वा सर्वोपायैर्विमोचयेत् ।। 112 |
यदि उसे कोई गाय रोगग्रस्त, चोट व व्याघ्रादि के भय से आकुल धरती पर गिरी हुई या कीचड़ में धंसी हुई दिखाई दे तो वह उसकी सभी प्रकार से सेवा करे तथा उसकी रक्षा भी।
उष्णे वर्षति शीते वा मारुतेवातिगा भृशम्।
न कुर्वीतात्मनस्त्राणं गोरकृत्वा तु शक्तितः ।। 113 ॥
उसे गर्मी, वर्षा, सर्दी, आंधी इत्यादि की चिंता न करते हुए अपनी सामर्थ्यानुसार गाय की सेवा करनी चाहिए।
आत्मनो यदि वाऽन्येषां गृहे क्षेत्रेऽथवाखले।
भक्षयन्तीं न कथयेत् पिबन्तं चैव वत्सकम् ।। 114 ॥
यदि उसे अपने अथवा दूसरे के घर में, खेत व खलिहान में सिर्फ अपने बछड़े को दूध पिलाती हई गाय दिखे तो इसकी जानकारी किसी को न दे अर्थात् गाय के इस कार्य में वह किसी प्रकार का व्यवधान न डाले।
अनेन विधिनाघ्नस्तु गोष्घ्नो गामनुगच्छति।
स गोहत्याकृतं पापं त्रिभिर्मासैर्व्यपोहति ।। 115 ।।
इस प्रकार नियमपूर्वक गाय की सेवा करने से वह व्यक्ति तीन महीने के पश्चात् गोहत्या के पाप से शुद्ध हो जाता है।
वृषभ एकोदशगाश्च दद्यात्सुचरितव्रतः ।
अविद्यमाने सर्वस्वं वेदविद्भ्यो निवेदयेत् ।। 116 ।।
जो व्यक्ति गोहत्या के पाप से मुक्ति की इच्छा से इस प्रकार का व्रतानुष्ठान करता है उसे एक बैल व दस गाएं या इनके अभाव में अपना सब कुछ वेद ज्ञाता ब्राह्मण को प्रदान करना चाहिए।
एतदेव व्रतं कुर्युरुपपातकिनो द्विजाः ।
अवकीर्णिवर्ज्यशुद्धयर्थ चान्द्रायणमथापि वा ॥ 117 ॥
स्वेच्छा से वीर्यपात करने वाले ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार के उपपातकों से कलुषित व्यक्ति भी इसी प्रकार चान्द्रायण व्रत का पालन कर अपनी शुद्धि कर सकते हैं।
अवकीर्णी तु काणेन गर्दभेन चतुष्पथे।
पाकयज्ञविधानेन यजेत निर्ऋतिं निशि ॥ 118 ।।
अवकीर्णी ब्राह्मण को चाहिए कि वह अपने पाप से मुक्ति के लिए काने गधे पर सवार होकर चौराहे पर जाए व पाक यज्ञ की विधि से निऋति देवता का यज्ञ करे।
हुत्वाग्नौ विधिवद् द्योमानन्ततश्च समेत्यूचा ।
वातेन्द्रगुरुवह्नीनां जुहुयात्सर्पिषाहुतिः ।। 119 ।।
वह अग्नि में विधिपूर्वक यज्ञ करके मरुत, इन्द्र, बृहस्पति व अग्निदेव को घृत से आहुति दे।
कामतो रेतसः सेकं व्रतस्थस्य द्विजन्मनः ।
अतिक्रामं व्रतस्याहुर्धर्मज्ञाः ब्रह्मवादिनः ।। 120 ।।
धर्मवेत्ता ब्रह्मवादी साधुओं के मत में ब्रह्मचर्य आश्रम में स्थित ब्राह्मण द्वारा स्वेच्छा से वीर्यस्खलन करने से व्रत भंग हो जाता है।
मारुतं पुरुहूतं च गुरुं पावकमेव च।
चतुरान्व्रतिनोऽभ्येति ब्राह्यं तेजोऽवकीर्णिनः ।। 121 ।।
काम भावना के वशीभूत होकर वीर्यपात करने वाला ब्रह्मचारी अर्थात् अवकीर्णी का अपने व्रत से प्राप्त ब्रह्मतेज वायु, इन्द्र, बृहस्पति व अग्नि के पास चला जाता है।
एतस्मिन्नेनसि प्राप्ते वसित्वा गर्दभाजिनम् ।
सप्तागारांश्चरेद् भैक्षं स्वकर्म परिकीर्तयेत् ॥ 122 ।।
यदि अवकीर्णी अपने पाप से शुद्ध होना चाहता है तो उसे अपने नीच कर्म को बताते हुए गधे का चमड़ा ओढ़ कर सात घरों से भीख मांग कर जीवन व्यतीत करना चाहिए।
तेभ्यो लब्धेन भैक्षेण वर्तयनेककालिकम् ।
उपस्पृशंस्त्रिषवणं त्वब्देन सः विशुद्धयति ॥ 123 ।।
उसे इस भिक्षान्न को एक ही समय खाना चाहिए व तीन समय स्नान करके सन्ध्योपासना करनी चाहिए। एक वर्ष तक इस प्रकार व्रत का पालन करने से ब्रह्मचारी पाप से मुक्त हो जाता है।
जातिभ्रंशकरं कर्म कृत्वाऽन्यतममिच्छया।
चरेत्सान्तपनं कृच्छ्रं प्राजापत्यममिच्छया ।। 124 II
यदि कोई व्यक्ति जानबूझ कर जातिभ्रंशक कर्म करे तो उसे कृच्छ्र सान्तपन व्रत का पालन करना चाहिए और यदि अनजाने में उससे ऐसा हो जाता है तो वह प्राजापत्य व्रत का अनुष्ठान करे।
सङ्कराऽपात्रकृत्यासु मासंशोधनमैन्दवम् ।
मलिनीकरणीयेषु तप्तः स्यद्यावकैस्त्र्यहम् ॥ 125 ।।
ऐसे व्यक्ति को संकरीकरण व अपात्रीकरण दोषों के निवारण के लिए एक माह तक चान्द्रायण व्रत करना चाहिए व मलिनीकरणों से शुद्धि के लिए निरंतर तीन दिन तक गरम द्रव्य को पीना चाहिए।
तुरीयो ब्रह्महत्यायाः क्षत्रियस्य वधे स्मृतः ।
वैश्येऽष्टमांशो वृत्तस्थे शूद्रे ज्ञेयस्तु षोडशः ।। 126 ॥
यदि व्यक्ति पर कर्तव्य कर्मों का निर्वाह करने वाले सदाचारी, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र हत्या का पाप है तो उसे ब्राह्मण वध के पाप का क्रमशः चौथा, आठवां व सोलहवां भाग प्रायश्चित करना चाहिए।
अकामतस्तु राजन्यं विनिपात्य द्विजोत्तमः ।
वृषभैकसहस्त्राः गाः दद्यात्सुचरितव्रतः ।। 127 ॥
यदि अनजाने और अनचाहे ही क्षत्रिय हत्या हो जाए तो ब्रह्मण को नियमपूर्वक व्रत का पालन करते हुए एक बैल व हजार गायों का दान करना चाहिए।
त्र्यब्दं चरेद्वा नियतो जटी ब्रह्मणो व्रतम् ।
वसन् दूरतरे ग्रामाद् वृक्षमूलं निकेतनः ।। 128 ।।
अन्य उपाय यह है कि गांव से दूर किसी वृक्ष के नीचे घर बनाकर तथा जटाएं धारण कर तीन वर्षों तक संयम-नियम का पालन करते हुए निर्वाह करे।
एतदेव चरेदब्दं प्रायश्चित्तं द्विजोत्तमः ।
प्रमाप्य वैश्यं वृत्तस्थं दद्याच्चैकशतं गवाम् ॥ 129 ।।
ब्राह्मण द्वारा अनजाने में सदाचारी वैश्य का वध हो जाता है तो उसे भी एक वर्ष तक यही प्रायश्चित करना चाहिए तथा एक सौ गायों का दान भी करना चाहिए।
एतदेव व्रतं कृत्स्नं षण्मासाञ्छूद्रहा चरेत्।
वृषभैकादशा वापि दद्याद्विप्राय गाः सिताः ॥ 130 ।।
जिस ब्राह्मण ने शूद्र का वध किया है उसे इस सारे व्रत को छः माह के लिए करना चाहिए तथा एक ब्राह्मण को एक बैल तथा ग्यारह सफेद गाएं दान में देना चाहिए।
मार्जारनकुलौ हत्वा चाषं मण्डूकमेव च।
श्वगोधोलककाकांश्च शूद्रहत्याव्रनं चरेत् ॥ 131 ॥
शुद्र वध के विषय में जो प्रायश्चित बताया गया है उसी का बिल्ली, नेवला, चिड़िया, मेंढक, कुत्ता, गधा, उल्लू व कौए की हत्या करने वाले को भी पालन करना चाहिए।
पयः पिबेत् त्रिरात्रं वा योजनं वाध्वनो व्रजेत्।
उपस्पृशेत्त्रवन्त्यां वा सूक्तं वाब्दैवतं जपेत् ।। 132 ।।
इसका एक और भी प्रायश्चित है- व्यक्ति तीन दिनों तक केवल जल पर आश्रित रहे, एक योजन मार्ग चले तथा दिन में तीन बार नदी में स्नान करे व वरुणदेव की प्रार्थना में मंत्रों का जाप करे।
अभिं कार्णायसीं दद्यात्सर्प हत्वा द्विजोत्तमः ।
पलाकभारकं षण्डे सैसकं चैकमाषकम् ।। 133 ।।
सांप के वध का प्रायश्चित करना हो तो लोहे की कड़छी व नपुंसक की हत्या के प्रायश्चित के लिए धान्य का ढेर व एक मासा सीसा दान कर दें।
घृतकुम्भं वराहे तु तिलद्रोणं तु तित्तिरौ।
शकेद् विहायनं वत्सं क्रौञ्चं हत्वा त्रिहायणम् ॥ 134 ॥
सूअर, तोता, तीतर व क्रौंच के वध का प्रायश्चित करना हो तो क्रमशः एक मटका घी, चार किलो तिल, दो वर्ष का बछड़ा और तीन वर्ष का बछड़ा दान में दें।
हत्वा हंसं बलाकां च बकं बर्हिणमेव च।
वानरं श्येनभासौ च स्पर्शयेद् ब्राह्मणाय गाम् ॥ 135 ॥
यदि हंस, बलाका, बगुला, मोर, वानर, बाज व मास (एक प्रकार की चिड़िया) हत्या का प्रायश्चित करना हो तो ब्राह्मण को एक गाय दान देकर उसके चरण-स्पर्श करें।
वासो दद्याद्धयं हत्वा पञ्चनीलान्वृषान्गजम् ।
अजमेषानड्वाहं खरं हत्वैकहायनम् ।। 136 ।।
अश्व व हाथी के वध का प्रायश्चित क्रमशः वस्त्र व पांच नीले बैलों के दान के रूप में करना चाहिए। बकरे व मेढ़े की हत्या का प्रायश्चित भी बैलों का दान ही है। गधे को मारने का प्रायश्चित एक वर्ष के बछड़े को दान करके होता है।
क्रव्यादांस्तु मृगान् हत्वा धेनुं दद्यात्पयस्विनीम्। अक्रव्यादान्वत्सतरीमुष्टं हत्वा तु कृष्णलम् ॥ 137 ।।
मांसाहारी पशुओं को मारने पर प्रायश्चित के रूप में दुधारू गाय व मांस न खाने वाला मृग दान में दें तथा बछिया व ऊंट के वध का प्रायश्चित एक तोला सोना दान करके होता है।
जीन कार्मुकबस्तावान् पृथग्दद्याद् विशुद्धये।
चतुर्णामपि वर्गाणां नारीर्हत्वाऽनवस्थिताः ।। 138 ।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र- इन चारों वर्णों की पतित स्त्रियों का अनजाने में वध हो जाए तो क्रमशः चर्मपुट, धनुष, बकरा व मेढ़ा दान में देकर प्रायश्चित करना चाहिए।
दानेन वधनिर्णेकं सर्पादीनामशक्नुवन्।
एकैकशश्चरेत् कृच्छ्रं द्विजः पापानुपत्तये ॥ 139 ।।
जो ब्राह्मण सर्पादि की हत्या के प्रायश्चित में दान न कर सकता हो उसे कृच्छ व्रत का पालन करना चाहिए।
अस्थिमत्तां तु सत्त्वानां व्रतसहस्त्रस्य प्रमापणे।
पूर्णे चानस्यनस्थां तु शूद्रहत्या व्रतं चरेत् ॥ 140 ।।
जो छोटे-छोटे अस्थिविहीन जीवों को मारता है उसे वही प्रायश्चित करना चाहिए जो शूद्र वध के विषय में कहा गया है। अनेक ऐसे जीवों को मारने का प्रायश्चित भी यही है।
किञ्चिदेव तु विप्राय दद्यादस्थिमतां वधे।
अनस्थां चैव हिंसायां प्राणायामेन शुद्धयति ।। 141 ।।
अनजाने में अस्थि वाले छोटे-छोटे जीवों के वध पर भी ब्राह्मण को प्रायश्चित स्वरूप कुछ दान कर दें। अस्थि रहित जीवों पर अनजाने में हुई हिंसा से लगे पाप से मुक्ति तो प्राणायाम से होती है।
फलदानां तु वृक्षाणां छेदने जप्यमृक्शतम्।
गुल्मवल्लीलतानां च पुष्पितानां च वीरुधाम् ।। 142 ।।
यदि कोई फल देने वाले वृक्षों, झाड़ियों, छोटी लताओं व बेलों तथा फूल भरे पौधों को काटने का पाप करे तो उसे सौ बार गायत्री मंत्र का जाप कर इस दोष से मुक्त हो जाना चाहिए।
अन्नाद्यजानां सत्त्वानां रसजानां च सर्वशः ।
फलपुष्पोद्भवानां च घृत प्राशोविशोधनम् ॥ 143 ।।
अन्न में, रसों, फलों तथा फूलों में पैदा होने वाले जीवों की हत्या का दोष होने पर 'घृत प्राशन' ही प्रायश्चित बताया गया है।
कुष्ठजानामोषधीनां जातानां च स्वयं वने।
वृथालम्भेऽनुगच्छेद् गां दिनमेकं पयोव्रतः ।। 144 ॥
खेत में उत्पन्न धान्य एवं वन में स्वतः जन्मी औषधियों को व्यर्थ में उखाड़ने वाले को प्रायश्चित में एक दिन केवल दुग्धाहार करना चाहिए तथा गाय के पीछे-पीछे चलना चाहिए।
एतैव्रतैरपोह्यं स्यादेनो हिंसासमुद्भवम्।
ज्ञानाज्ञानकृतं कृत्स्नं शृणुतानाद्यभक्षणे ।। 145 ।।
भृगु जी ने कहा, महर्षियो ! जाने-अनजाने में किए सभी पापों से प्रायश्चित के इन उपायों द्वारा मुक्ति प्राप्त होती है। अब मैं आपसे अभक्ष्य-भक्षण के प्रायश्चित कहता हूं।
अज्ञानाद् वारुणीं पीत्वा संस्कारेणैव शुद्धयति ।
मतिपूर्वमनिर्देश्यं प्राणान्तकमिति स्थितिः ।। 146 ।।
यदि कोई व्यक्ति अनजाने में मदिरापान कर ले तो प्रायश्चित के तौर पर उसका पुनः उपनयन संस्कार होना चाहिए किंतु जानबूझ कर सुरापान करने का प्रायश्चित प्राणत्याग ही होता है।
अपः सुराभाजनस्था मद्यभाण्डस्थितास्तथा ।
पञ्चरात्रं पिबेन्पीत्वा शङ्खपुष्पीभृतं पयः ।। 147 ।।
जो व्यक्ति मदिरा की बोतल में अथवा प्याले में पानी पी लेता है उसे पांच दिन पानी में शंखपुष्पी औटा कर पीने के रूप में प्रायश्चित करना चाहिए।
स्पृष्ट्वा दत्त्वा च मदिरां विधिवत्प्रतिगृह्य च।
शूद्रोच्छिष्टाश्च पीत्वापः कुशवारि पिबेत् त्र्यहम् ॥ 148 ।।
यदि कोई व्यक्ति मदिरा को छू लेता है, किसी को मदिरा देता है अथवा लेता है, तो उसे प्रायश्चित के तौर पर तीन दिन शूद्र का जूठा पानी पीना चाहिए व विधिपूर्वक कुशों का काढ़ा पीना चाहिए।
ब्राह्मणस्तु सुरापस्य गन्धमाघ्राय सोमपः ।
प्राणानप्सु त्रिरायम्य घृतं प्राश्य विशुद्धयति ।। 149 ।।
मदिरा पीने वाले का यदि सोमयज के अनुष्ठान से शुद्ध ब्राह्मण तीन बार संघ कर उसे जल की छटि दे, उसे प्राणायाम व घृत-प्राशन कराए तो वह इस दोष से मुक्त हो जाता है।
अज्ञानात्प्राश्य विण्मूत्रं सुरासंस्पृष्टमेव च।
पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णाः द्विजातयः ।। 150 ॥
तीनों वर्णों के व्यक्ति यदि अनजाने में मलमूत्र का सेवन व सुरा का स्पर्श कर लेते हैं तो उन्हें पुनः यज्ञोपवीत संस्कार करवा लेना चाहिए।
वपनं मेखलादण्डौ भेक्षचर्या व्रतानि च।
निवर्तन्ते द्विजातीनां पुनः संस्कारकर्मणि ।। 151 ।।
प्रायश्चित के रूप में यदि तीनों वर्णों के लोग पुनः उपनयन संस्कार करवाते हैं तो उसमें मुण्डन, मेखला धारण, दण्ड धारण तथा व्रतानुष्ठान जरूरी नहीं होता।
अभोज्यानां तु भुक्त्वान्नं स्त्रीशूद्रोच्छिष्टमेव च।
जग्ध्वा मांसमभक्ष्यं च सप्तरात्रं यवान्पिबेत् ।। 152 ॥
जिस व्यक्ति पर पतित मनुष्य के घर का अन्न, स्त्रियों तथा शूद्रों की जूठन, मांस तथा अन्य अभक्ष्य वस्तुओं को खाने का दोष है उसे सात दिन तक यवागू पीकर प्रायश्चित करना चाहिए।
शुक्तानि च कषायांश्च पीत्वामेध्यान्यपि द्विजः ।
तावद्भवत्यप्रयतो यावत्तन्न व्रजत्यधः ।। 153 ।।
यदि कोई व्यक्ति सिरके जैसा दुर्गन्धित व अपेय द्रव्य पीता है तो वह तब तक अशुद्ध रहता है जब तक वे द्रव्य मल-मूत्र के रूप में उसके शरीर से बाहर न निकल जाएं।
विड्वराहखरोष्ट्राणां गोमायोः कपिकाकयोः ।
प्राश्य मूत्रपुरीषाणि द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥ 154 ।।
यदि किसी द्विजातीय पर गांव के सूअर, गधे, ऊंट, गीदड़, वानर व कौए के मल-मूत्र का सेवन करने का दोष है तो वह चान्द्रायण व्रत का पालन करने से ही दोषमुक्त होता है।
शुष्काणि भुक्त्वा मांसानि भौमानि कवकानि च।
अज्ञातं चैव सूनास्थमेतदेव व्रतं चरेत् ॥ 155 ॥
जो व्यक्ति अनजाने में सूखे मांस को, भूमि में पैदा होने वाले कुकुरमुत्ते को तथा वधस्थली के मांस को खाने से दोषयुक्त होता है उसे भी प्रायश्चित के तौर पर चान्द्रायण व्रत करना चाहिए।
क्रव्याद सूकरोष्ट्राणां कुक्कुटानां च भक्षणे।
नर काकखराणां च तप्तकृच्छ्रं विशोधनम् ॥ 156 ।।
जो व्यक्ति कच्चे मांस, सुअर, ऊंट, मुर्गा, मनुष्य, कौए और गधे के मांस को खाने का पाप करे उसे तप्त कृच्छ्र व्रत से शुद्धि करनी चाहिए।
मासिकान्नं तु योऽश्नीयादसमावर्त्तको द्विजः ।
स त्रीण्यहाण्युपवसेदेकाहं चोदकं वसेत् ॥ 157 ॥
यदि कोई ब्रह्मचारी मासिक श्राद्ध के अन्न को खाने का पाप करे तो उसे तीन दिनों का उपवास व एक दिन जल में रहकर प्रायश्चित करना चाहिए।
ब्रह्मचारी तु याऽश्नीयान्मधु मांसं कथञ्चन।
स कृत्वा प्राकृतं कृच्छ्रं व्रतशेषं समापयेत् ॥ 158 ॥
मदिरापान व मांस खाने वाले ब्रह्मचारी को प्राकृत कृच्छ्र व्रत का पालन करके अपने शेष व्रत को सम्पन्न करना चाहिए।
विडालकाकाखूच्छिष्टं जग्ध्वाश्वनकुलस्य च।
केशकीटावपन्नं च पिबेद् ब्रह्मसुवर्चलाम् ॥ 159 ॥
जो व्यक्ति बिल्ली, कौए, चूहे, कुत्ते व नेवले की जूठन तथा कीड़ों व बालों से युक्त दूषित अन्न खा ले उसे ब्रह्म सुवर्चला के काढ़े का सेवन करना चाहिए।
अभोज्यमन्नं नात्तव्यमात्मनः शुद्धिमिच्छता ।
अज्ञानभुक्तं तूत्तार्य शोध्यं वाप्याशुशोधनः ॥ 160 ।।
यदि व्यक्ति स्वयं को शुद्ध रखने का इच्छुक है तो उसे अभक्ष्य भक्षण कदापि नहीं करना चाहिए। अनजाने में खाए अभक्ष्य को वमन के माध्यम से निकाल देना चाहिए तथा शोधक द्रव्यों से अपनी शुद्धि कर लेनी चाहिए।
एषोऽनाद्यनस्योक्तो व्रतानां विविधोविधिः ।
स्तेयदोषापहर्तृणां व्रतानां श्रूयतां विधिः ॥ 161 ॥
ब्राह्मणो! ये मैंने आपको अभक्ष्य भक्षण के दोष निवारण के लिए प्रायश्चित तथा इसके विविध नियमों के विषय में बतलाया। अब मैं आपको चोरी के दोष से मुक्ति दिलाने वाले व्रतों के नियमादि बतलाता हूं।
धान्यान्नधनचौर्याणि कृत्वा कामाद् द्विजोत्तमः । स्वजातीयगृहादेव कृच्छाब्दे च विशुद्धयति ॥ 162 ॥
यदि जानबूझकर द्विजातीय अपनी ही जाति वालों के यहां से धन, धान्य व अन्न की चोरी करता है तो उसे एक वर्ष तक कृच्छ्र व्रत का पालन करना चाहिए।
मनुष्याणां तु हरणे स्त्रीणां क्षेत्रगृहस्य च।
कृपवापीजलानां च शुद्धिश्चान्द्रायणं स्मृतम्।। 163 ॥
जो व्यक्ति पुरुषों, स्त्रियों, खेत, घर, कूप व बावड़ी आदि के जल हरण का पाप करे उसे चान्द्रायण व्रत का पालन करके प्रायश्चित करना चाहिए।
द्रव्याणामल्पहाराणां स्तेयं कृत्वाऽन्यवेश्मतः ।
चरेत्सान्तपनं कृच्छ्रं तन्निर्यात्यात्मशुद्धये ।। 164 ।।
अल्पाहार के रूप में खाए जाने वाले पदार्थों को दूसरे के घर से चुराने पर प्रायश्चित के रूप में सान्तपन कृच्छ्र व्रत करने को कहा गया है।
भक्ष्यभोजापहरणे यानशय्यासनस्य च।
पुष्पमूलफलानां च पञ्चगव्यं विशोधनम् ॥ 165 ।।
खाद्य पदार्थों, वाहन, शय्या, आसन, पुष्पों, कन्दमूल व फलों की चोरी का प्रायश्चित स्वामी को उसकी वस्तुएं लौटाना तथा पंचगव्य (गो दुग्ध, दही, घी, गोबर-रस तथा मूत्र) पीना है।
तृणकाष्ठद्रुमाणां च शुष्कान्नस्य गुडस्य च।
चैलचर्मामिषाणां च त्रिरात्रं स्यादभोजनम् ॥ 166 |
घास, लकड़ी, वृक्ष, रूखे अन्न, गुड़, वस्त्र, चमड़ा व मांस चुराने वाला प्रायश्चित के तौर पर तीन दिन-रात बिना भोजन किए रहे।
मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च।
अयः कांस्योपलानां च द्वादशाहं कणान्नता ।। 167 ।।
जो व्यक्ति मणि, मोती, मूंगा, तांबा, चांदी, कांस्य, मूल्यवान पत्थरों को चुराए उसे बारह दिनों तक चावल के कणों पर निर्वाह करके प्रायश्चित करना चाहिए।
कार्पासकीटजीर्णानां द्विशफैकशफस्य च।
पक्षिगन्धौषधीनां च रज्जवाश्चैव त्र्यहः पयः ।। 168 ॥
जो कपास, रेशम, दो खुरों वाले बैलादि पशुओं, एक खुर वाले अश्वादि पशुओं, सुगन्धित द्रव्यों, औषधियों व रस्सी को चुराता है उसे तीन दिन तक केवल जल ग्रहण करके प्रायश्चित करना चाहिए।
एतैर्वतैरपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः ।
अगम्यागमनीयं तु व्रतैरेभिरपानुदेत् ।। 169 ॥
इन व्रतों के पालन से द्विज अपने चोरी सम्बन्धी पापों से निवृत्त हो जाता है। अब मैं आपसे अगम्या के साथ रति भोग करने के पाप का प्रायश्चित कहता हूं।
गुरुतल्पव्रतं कुर्याद्रेतः सिक्त्वा स्वयोनिषु।
सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च ॥ 170 ।।
सगी बहन, मित्र पत्नी, पुत्र वधू, पुत्री व चाण्डाल स्त्री से सहवास का प्रायश्चित गुरु पत्नी गमन के प्रायश्चित जैसा ही है।
पैतृऽवसेयीं भगिनीं स्वस्त्रियां मातुरेव वा।
मातुश्च भ्रातुस्तनयां गत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ 171 ॥
बुआ, मौसी व मामा की कन्याओं से सहवास करने का प्रायश्चित होता है चान्द्रायण व्रत का पालन ।
एतास्तिस्त्रस्तु भार्यार्थे नोपयच्छेत्तु बुद्धिमान्। ज्ञातित्वेनोपनेयास्ताः पतितो ह्युपयन्नधः ।। 172 ।।
विवेकशील पुरुष को चाहिए कि वह पूर्वोक्त तीनों कन्याओं से कभी विवाह न करे क्योंकि अपनी ही जाति की होने से ये तीनों कन्याएं विवाह के योग्य नहीं होतीं। इनसे विवाह करने वाला अधोगति व अपयश पाता है।
अमानुषीषु पुरुषः उदक्यायामयोनिषु ।
रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रे सान्तपनं चरेत् ॥ 173 ॥
अमानुषी योनियों, रजस्वला स्त्री की योनि तथा जल में वीर्यपात करने वाला प्रायश्चित के तौर पर कृच्छ्र सान्तपन व्रत का पालन करे।
मैथुनं तु समासेव्य पुंसि योषिति वा द्विजः ।
गोयानेऽप्सु दिवा चैव सवासः स्नानमाचरेत् ॥ 174 ।।
पुरुष से या ब्राह्मण स्त्री से बैलगाड़ी में, पानी में व दिन में मैथुन करने का दोषी व्यक्ति वस्त्रों सहित स्नान करे।
चाण्डालान्त्यस्त्रियो गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च।
पतत्यज्ञानतो विप्रः ज्ञानात्साम्यं तु गच्छति ॥ 175 ।।
अनजाने ही चाण्डाल व अछूत स्त्री से सम्भोग तथा भोजन करने वाला तथा उनसे व्यवहार रखने वाला पतित हो जाता है किंतु जान-बूझकर उनसे सम्बन्ध रखने वाला उन्हीं की जाति का हो जाता है।
विप्रदुष्टो स्त्रियं भर्त्ता निरुन्ध्यादेकवेश्मनि ।
यत्पुंसः परदारेषु तच्चैनां चारयेद् व्रतम ॥ 176 ॥
दुष्ट स्त्री के पति को यह अधिकार है कि वह उसे घर में बंद करके रखे तथा परस्त्रीगामी के लिए निर्धारित प्रायश्चित उस स्त्री द्वारा करवाए।
सा चेत्पुनः प्रदुष्येत्तु सदृशेनोपयन्त्रिता ।
कृच्छ्रं चान्द्रायणे चैव तदस्याः पावनं स्मृतम् ॥ 177 ।।
वह स्त्री यदि परिवार के किसी सदस्य के बहकावे में आकर पुनः परपुरुषगामी हो जाती है तो उसकी शुद्धि कृच्छ्र चान्द्रायण व्रत के पालन से हो सकती है।
यत्करोत्येकरात्रेण वृषली सेवनाद् द्विजः ।
भैक्ष्यभुग्जपन्नित्यं त्रिभिर्वर्षेर्व्यपोहति ।। 178 ।।
एक रात में किसी वेश्या अथवा शूद्रा से सम्भोग कर ब्राह्मण जो पाप करता है उसका निवारण ब्राह्मण को तीन वर्षों तक भिक्षान्न पर रहकर तथा निरन्तर गायत्री मंत्र के जाप से करना चाहिए।
एषा पापकृतामुक्ता चतुर्णामपि निष्कृतिः ।
पतितैः सम्प्रयुक्तानामिमाः शृणुत निष्कृतीः ॥ 179 ॥
महर्षियो! चारों वर्णों के पापियों के पापों की शुद्धि के उपाय मैंने आपसे कहा। अब मैं पतितों के साथ सम्बन्ध रखने वालों के प्रायश्चित विधान का वर्णन करता हूं।
संवत्सरेण पतितः पतितेन सहाचरन् ।
याजनाध्यापनाद्यौनान्न त् यानासनाशनात् ॥ 180 ।।
पतित व्यक्ति के साथ निरंतर एक वर्ष तक यज्ञ करने, वेद पढ़ाने व यौन सम्बन्ध रखने वाला स्वयं पतित हो जाता है। एक साथ सवारी करने, इकट्ठे आसन पर बैठने व खाने-पीने से मनुष्य पतित नहीं होता।
यो येन पतितेनैषां संसर्ग याति मानवः ।
स तस्यैव व्रतं कुर्यात्तत्सर्ग विशुद्धये ॥ 181 ॥
जिस-जिस पतित व्यक्ति के साथ मनुष्य सम्बन्ध रखता है उसे उस-उस पाप के निवारण के लिए नियत प्रायश्चित करना चाहिए।
पतितस्योदकं कार्य सपिण्डैर्बान्धवैर्बहिः ।
निन्दितेऽहनि सायाले ज्ञात्वृत्विग्गुरुसन्निधौ ।। 182 ।।
यदि पतित व्यक्ति मर जाता है तो उसके सजातीय बन्धुओं को गांव के बाहर जाकर किसी निन्दित दिन के सायंकाल में अपनी जाति के पुरोहित द्वारा गुरु के सान्निध्य में उसका श्राद्ध-तर्पण करना चाहिए।
दासीघटमपां पूर्ण पर्यस्येत्प्रेतवत् पदा।
अहोरात्रमुपासीरन्नाशौचं बान्धवैः सह ।। 183 ॥
भ्रष्ट व्यक्ति के तर्पण में दासी को दक्षिण की ओर मुख करके जल से भरे मटके से अपने पैर से नीचे जल गिराना चाहिए। मृतक व्यक्ति के सभी जाति-बन्धु उसके भाई-बन्धुओं से एक दिन-रात का अशौच रखें।
निवर्तेरंश्च तस्मात्तु सम्भाषणसहासने ।
दायाद्यस्य प्रदानं च यात्रा चैव हि लौकिकी ।। 184 ।।
जो व्यक्ति पतित है उसके सभी सम्बन्धियों को उसके जीवित रहते उसके साथ उठना-बैठना, बोलना, दाय भाग में सहभागी बनाना व उसके यहां आना-जाना बंद कर देना चाहिए।
ज्येष्ठता च निवर्तेत ज्येष्ठावाप्य च यद्धनम्।
ज्येष्ठांशं प्राप्नुयाच्चास्य यवीयान्गुणतोऽधिकः ॥ 185 ।।
पतित मनुष्य को ज्येष्ठ होने का भी अधिकार नहीं है। उससे छोटा भाई ही ज्येष्ठ कहलाता है यदि गुणों की दृष्टि से भी छोटा भाई उससे श्रेष्ठ है तो उसके अधिकार को वही प्राप्त करता है।
प्रायश्चित्ते तु चरिते पूर्णकुम्भमपां नवम् ।
तेनैव सार्ध प्रास्येयुः स्नात्वा पुण्ये जलाशये ।। 186 ।।
यदि भ्रष्ट व्यक्ति प्रायश्चित कर ले तो उसके भाई-बन्धु उसके साथ किसी पवित्र सरोवर में स्नान करें तथा उसके साथ जल भरे कुम्भ को पकड़ कर जल में छोड़ दें।
स त्वप्सु तं घटं प्रास्य प्रविश्य भवनं स्वकम् ।
सर्वाणि ज्ञातिकार्याणि यथापूर्व समाचरेत् ॥ 187 ।।
जिस व्यक्ति ने प्रायश्चित किया है उसे कुम्भ को जल में फेंकने के बाद घर में प्रवेश करना चाहिए और पूर्ववत् अपने वर्णगत धर्म का पालन करना चाहिए।
एतदेवं विधिं कुर्याद्योषित्सु पतितास्वपि।
वस्त्रान्नपानं देयं तु वसेयुश्च गृहान्तके । 188 ।।
जो स्त्रियां भ्रष्ट हो जाती हैं उनके साथ भी ऐसा ही व्यवहार करें। खाना, पीना व वस्त्र देते हुए भी उन्हें घर में अलग रखना चाहिए।
एनस्विभिरनिर्णिक्तैर्नार्थं किञ्चित्सहाचरेत्।
कृतनिर्णेजमांश्चैवं न जुगुप्सेत कर्हिचित् ॥ 189 ॥
यदि पापी व्यक्ति प्रायश्चित नहीं करते तो उनके साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध न रखें किंतु पाप का प्रायश्चित कर लेने के उपरान्त उनकी किसी प्रकार की आलोचना भी न करें।
बालघ्नांश्च कृतघ्नांश्च विशुद्धनपि धर्मतः ।
शरणागतहन्तूंश्च स्त्रीहन्तूंश्च न संवसेत् ।। 190 ।।
बच्चों की हत्या करने वालों, कृतघ्न, शरणागत व स्त्रियों के हत्यारों से प्रायश्चित से शुद्ध होने पर भी उनसे कोई संबंध नहीं रखना चाहिए।
येषां द्विजानां सावित्री नानूच्येत यथाविधि।
तांश्चारयित्वा त्रीन् कृच्छ्रान् यथाविध्युपनाययेत् ।। 191 ।।
पूर्वोक्त समय पर उपनयन संस्कार व गायत्री का उपदेश ग्रहण न करने वाले द्विजों को तीन कृच्छ्र व्रत करके विधिवत् उपनयन संस्कार कराना चाहिए।
प्रापश्चित्तं चिकीर्षन्ति विकर्मस्थास्तु ये द्विजाः ।
ब्राह्मणाः च परिव्यक्तास्तेषामप्येतदादिशेत् ॥ 192 ।।
वेद ज्ञान से रहित व निरर्थक काम करने वाला पतित ब्राह्मण यदि अपने सुधार के लिए प्रायश्चित करना चाहे तो उसे भी कृच्छ्र व्रत के अनुष्ठान का निर्देश दें।
यद् गर्हितेनार्चयन्ति कर्मणा ब्राह्मणाः धनम्।
मत्स्योत्सर्गेण शुध्यन्ति जपेन तपसैव च ।। 193 ।।
यदि कोई ब्राह्मण निन्दित कार्य करके धनार्जन करता है तो उस धन को दान में दे देने तथा तप करने से वह पाप मुक्त हो जाता है।
जपित्वा त्रीणि सावित्र्याः सहस्त्राणि समाहिताः ।
मासं गोष्ठे पयः पीत्वा मुच्यतेऽसत्प्रतिग्रहात् ।। 194 ।।
यदि ब्राह्मण ने असत् द्रव को दान के रूप में स्वीकार कर लिया है तो उसे एक माह गोशाला में रहकर पवित्र भाव से नित्य तीन हजार बार गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए तथा दुग्धाहार करना चाहिए।
उपवासकृशं तं तु गोव्रजात्पुनरागतम् ।
प्रणतं प्रतिपृच्छेयुः साम्यं सौम्येच्छसीति किम् ॥ 195 ।।
गोशाला से उपवास के कारण क्षीण हुए तथा प्रणाम करते हुए ब्राह्मण से ज्ञानी ब्राह्मण को पूछना चाहिए-सौम्य ! क्या तुम हमारे जैसा बनना चाहते हो ?
सत्यमुक्त्वा तु विप्रेषु विकिरेद्यवसं गवाम्।
गोभिः प्रवर्तिते तीर्थे कुर्युस्तस्य परिग्रहम् ।। 196 ।।
ज्ञानवान वृद्धों के प्रश्न का वह शुद्ध होने की आकांक्षा रखने वाला ब्राह्मण उचित उत्तर दे। तत्पश्चात् गायों को घास दे। इस प्रकार गायों द्वारा पवित्र किए गए नीर्थ पर वे विद्वज्जन उस ब्राह्मण को अपने समान स्तर प्रदान करें।
व्रात्यानां याजनं कृत्वा परेषामन्त्यकर्म च।
अभिचारमहीनं च त्रिभिः कृच्छ्रेव्र्व्यपोहति ।। 197 ।।
जो व्यक्ति व्रात्यों द्वारा यज्ञ कराए, दूसरों की अन्त्येष्टि तथा सशक्त अभिचार कराए तो उसे प्रायश्चित के तौर पर तीन दिनों कृच्छ्र व्रत का पालन करना चाहिए।
शरणागतं परित्यज्य वेदं वप्लाव्य च द्विजः ।
संवत्सरं यवाहारस्तत्पापमसेधति ।। 198 ।।
यदि व्यक्ति शरणागत को त्याग दे और अनधिकारी को वेद पढ़ाए तो उसे एक वर्ष जौ खाकर प्रायश्चित करना चाहिए। इस प्रकार ही इन पापों से वह शुद्ध हो सकता है।
श्वशृगालखरैर्दष्टो ग्राम्यैः क्रव्याद्भिरेव वा।
नराश्वोष्ट्रवराहैश्च प्राणायामेन शुध्यति ॥ 199 ॥
मनुष्य यदि कुत्ते, गीदड़, गधे, मनुष्य, अश्व, ऊंट, सुअर व अन्य मांसाहारी पालतू पशुओं को काटे तो वह प्राणायाम करने से ही शुद्धि प्राप्त करता है।
षष्ठान्नकालता मासं संविताजप एव वा।
होमाश्च सकलाः नित्यमपाङ्क्त्यानां विशोधनम् ।। 200 ।।
जो अपनी पंक्ति से बहिष्कृत हैं उन्हें तीन दिन का उपवास करके एक माह तक एक समय भोजन करना चाहिए तथा वेद संहिता का पाठ व यज-होम आदि करना चाहिए।
ऊष्ट्यानं समारुह्य खरयानं तु कामतः ।
स्नात्वा तु विप्रो दिग्वासा प्राणायामेन शुध्यति ।। 201 ॥
अपनी इच्छा से गधे व ऊंट की सवारी करने वाला ब्राह्मण जल में नग्न स्नान करने के पश्चात् प्राणायाम करने से ही शुद्धि प्राप्त करता है।
विनाद्भिरप्सु वाष्पातः शरीरं सन्निवेश्य च।
सचैला बहिराप्लुत्य गामालभ्य विशुध्यति ।। 202 ।।
सरोवर यदि सूर्य की किरणों के कारण जलरहित हो गया है तो गांव के बाहर किसी सरोवर में वस्त्रों सहित स्नान करके पृथ्वी को छूने से व्यक्ति शुद्ध हो जाता है।
वेदोदितानां नित्यानां कर्मणां समतिक्रमे ।
स्नातकव्रतलापे च प्रायश्चित्तमभोजनम् ।। 203 ।।
यदि वेदों की नित्यचर्या छूट जाती है या ब्रह्मचर्य व्रत टूट जाता है तो इसका प्रायश्चित उपवास ही है।
हुङ्कारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वङ्कारं च गरीयसः ।
स्नात्वाऽनश्नन्नहः शेषमभिवाद्य प्रसादयेत् ॥ 204 ।।
यदि कोई व्यक्ति ब्राह्मण को 'तुम' तथा विद्या व ज्ञान में श्रेष्ठजन को 'तू' कहकर सम्बोधित करता है तो उसे प्रायश्चित के रूप में स्नान करके पूरा दिन भूखा रहना चाहिए तथा दिन भर हाथ जोड़कर अभिवादन करते हुए सम्बन्धित व्यक्ति को प्रसन्न करना चाहिए।
ताडयित्वा तृणेनापि कण्ठे वावध्यवाससा ।
विवादे च विनिर्जित्य प्रणिपत्य प्रसादयेत् ॥ 205 ।।
घास के तिनके से भी ब्राह्मण को मारने वाला या उसके गले में कपड़ा डालकर उसे बांधने वाला या विवाद में उससे अपशब्द बोलने वाला व्यक्ति ब्राह्मण को प्रणाम आदि द्वारा प्रसन्न करके पश्चाताप करे।
अवगूर्य त्वब्दशतं सहस्त्रमभिहत्य च।
जिघांसिया ब्राह्मणस्य नरकं प्रतिपद्यते ।। 206 ।।
जो व्यक्ति ब्राह्मण को मारने के लिए डण्डा उठाता है उसे सौ वर्षों तक नरक भोगना पड़ता है और जो ब्राह्मण पर डण्डे से प्रहार करता है उसे हजार वर्ष तक नरक भोगना पड़ता है।
शोणितं यावतः पांसून् संगृह्णाति महीतले।
तावत्यब्दसहस्त्राणि तत्कर्ता नरके वसेत् ॥ 207 ॥
जो व्यक्ति ब्राह्मण को मारता है, उसे उतने हजार वर्ष नरक में वास करना पडता है जितने धूलि कण ब्राह्मण के रक्त से भीग जाते हैं।
अवगूर्यं चरेत्कृच्छ्रमतिकृच्छं निपातने।
कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ कुर्वीत विप्रस्योत्पाद्य शोणितम् ॥ 208 ॥।
कृच्छ्र व्रत का पालन ब्राह्मण को मारने के लिए डण्डा उठाने का प्रायश्चित होता है। डण्डा मारने का प्रायश्चित अति-कृच्छ्र व्रत है और यदि ब्राह्मण का रक्त निकल जाए ऐसा मारने का प्रायश्चित दोनों ही व्रतों के पालन से होता है।
अनुक्तनिष्कृतीनां तु पापानामनुपत्तये ।
शक्तिं चावेक्ष्य पापं च प्रायश्चित्तं प्रकल्पयेत् ।। 209 ॥
अन्य जिन पापों का वर्णन नहीं हुआ उनके निवारण के लिए पाप की गंभीरता व प्रायश्चित करने की क्षमता को देखकर उसके अनुसार ही प्रायश्चित निर्धारण कर लेना चाहिए।
यैरभ्युपायैरेनांसि मानवो व्यपकर्षति ।
तान्वोऽभ्युपायान्वक्ष्यामि देवर्षिपितृसेवितान् ।। 210 ॥
महर्षियो ! अब मैं आपको उन देवों, ऋषियों व पितरों की उपासना सम्बन्धी उपायों के बारे में बताता हूं जिनका पालन करने से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।
त्र्यहं प्रातस्त्र्यहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम्।
त्र्यहं परं च नाश्नीयात्प्राजापत्यं चरन् द्विजः ॥ 211 ॥
प्राजापत्य कृच्छ्र व्रत में ब्राह्मण को तीन दिन प्रातःकाल व तीन दिन सायंकाल भोजन करना चाहिए व तीन दिन अयाचित अन्न खाना चाहिए उसके बाद तीन दिन तक वह उपवास करे। इस तरह बारह दिनों के इस व्रत को प्राजापत्य कृच्छ्र व्रत कहा जाता है।
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिकुशोदकम्।
एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रे सान्तपनं व्रतम् ॥ 212 ॥
गोमूत्र, गोबर, दही, घी और कुशों के जल का दिन में सेवन, तत्पश्चात् एक दिन व रात का उपवास सान्तपन कृच्छ्र व्रत होता है।
एकैकं ग्रासमश्नीयात् त्र्यहाणि त्रीणि पूर्ववत् ।
त्र्यहं चोपवसेदन्त्यमतिकृच्छ्रं चरन् द्विजः ।। 213 ॥
तीन दिन सायंकाल, तीन दिन प्रातःकाल व तीन दिन केवल एक ग्रास अयाचित भोजन तथा तदोपरांत तीन दिन केवल एक ग्रास अयाचित भोजन तथा तदोपरांत तीन दिन तक पूर्ण उपवास - इस विधि को अतिकृच्छ्र व्रत कहा जाता है।
तप्तकृच्छ्रं चरन् विप्रो जलक्षीर घृतानिलान् ।
प्रतित्र्यहं पिबेदुष्णान् कृतस्नायी समाहितः ।। 214 ।।
स्थिरचित्त व्यक्ति स्नान के बाद तीन दिन गर्म जल व तीन दिन गर्म दूध पिए। इसी प्रकार अगले तीन दिन गर्म घी व उसके अगले तीन दिन गर्म वायु का सेवन करे-इसे तप्तकृच्छ्र व्रत कहा जाता है।
यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाह्रभोजनम्।
पराका नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापापनोदनः ।। 215 ॥
स्वस्थ व स्वाधीन भाव से बारह दिनों का निराहार व्रत पराक नामक कृच्छ व्रत कहलाता है। इससे उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
एकैकं ह्रासयेत्पिण्डं कृष्णे शुक्ले च वर्धयेत्। उपस्पृशंस्त्रिषवणमेतच्चान्द्रायणं स्मृतम् ।। 216 ।।
प्रतिदिन तीन बार स्नान करके कृष्ण पक्ष में आहार का एक-एक ग्रास घटाते हुए व शुक्ल पक्ष में एक-एक ग्रास बढ़ाकर सेवन करना ही चान्द्रायण व्रत है।
एतमेव विधिं कृत्स्नमाचरेद्यवमध्यमे ।
शुक्ल पक्षादिनियतश्चरंश्चान्द्रायणं व्रतम् ॥ 217 ।।
यव मध्याख्य व्रत में इसी चान्द्रायण व्रत का पालन करते हुए प्रतिदिन तीन बार स्नान करके जौ के समान भोजन के ग्रास को कृष्ण पक्ष में बीच में मोटा तथा किनारों पर पतला व शुक्ल पक्ष में इसके विपरीत करके ग्रहण किया जाता है।
अष्टावष्टौ समश्नीयात् पिण्डान्मध्यन्दिने स्थिते।
नियतात्मा हविष्याशी यतिचान्द्रायणं चरन् ॥ 218॥
यति चान्द्रायण व्रत में चान्द्रायण व्रत का पालन करते हुए दोपहर के समय केवल हवि के अन्न के आठ ग्रासों का सेवन किया जाता है।
चतुरः प्रातरश्नीयात् पिण्डान् विप्रः समाहितः ।
चतुरोऽस्तमिते सूर्ये शिशुचान्द्रायणं स्मृतम् ।। 219 ॥
प्रातःकाल भोजन के चार ग्रास व सायंकाल भी भोजन के चार ग्रास ग्रहण करने पर यही चान्द्रायण व्रत शिशु चान्द्रायण हो जाता है।
यथाकथञ्चित्पिण्डानां तिस्त्राऽशीतीः समाहितः । मासेनाश्नन्हविष्यस्य चन्द्रस्यैति सलोकताम् ।।
हवि के 240 भाग बनाकर पूरे माह उन्हें स्वस्थ चित्त से खाने वाला साधक चन्द्र लोक को प्राप्त करता है।
एतद्रुद्रास्तथादित्याः वसवश्चाचरन्व्रतम् ।
सर्वाऽकुशलमोक्षाय मरुतश्च महर्षिभिः ।। 221 ।।
अनेक महर्षियों के साथ रुद्र, आदित्य, वसु तथा मरुत प्रभृति कितने ही देवों ने अपने पाप की निवृत्ति के लिए इस चान्द्रायण व्रत का पालन किया है।
महाव्याहृतिभिर्होमः कर्तव्यः स्वयमन्वहम् ।
अहिंसा सत्यमक्रोधमार्जवं च समाचरेत् ।। 222 ।।
इस व्रत का पालन करते समय नित्य महाव्याहृतियों से होम करना चाहिए और इस दौरान अहिंसा, सत्य, शांति व सरलता का आचरण करना चाहिए।
त्रिरहस्त्रिर्निशायां च सवासो जलमाविशेत्।
स्त्रीशूद्रपतितांश्चैव नाभिभाषेत् कर्हिचित् ।। 223 11
दिन व रात में तीन-तीन बार वस्त्र सहित जल में गोता लगाएं तथा इस दौरान स्त्रियों, शूद्रों व पतितों से किसी प्रकार का कोई भी वार्तालाप न करें।
स्थानासनाभ्यां विहरेदशक्तोऽधः शयीत वा।
ब्रह्मचारी व्रती च स्याद् गुरुदेवद्विजार्चकः ।। 224 ॥
इस व्रत का अनुष्ठान करते हुए आसन पर ही उठना-बैठना चाहिए। रोगी या दुर्बल व्यक्ति अवश्य धरती पर सो सकता है। यह व्रत करने वाला ब्रह्मचर्य धारण करके गुरु, देव व द्विजों की सेवा में लगा रहे।
सावित्रीं च जपेन्नित्यं पवित्राणि च शक्तितः ।
सर्वेष्वेव व्रतेष्वेवं प्रायश्चित्तार्थमादृतः ।। 225 ।।
इस व्रत का पालन करने वाला नित्य यथाशक्ति गायत्री मंत्र का तथा अन्य पवित्र वेद मंत्रों का जाप करता रहे। इसी प्रकार प्रायश्चित के रूप में अपनाए गए व्रतों में श्रद्धा भाव रखे।
एतैर्द्विजातयः श्लाघ्यः व्रतैराविष्कृतैनसः ।
अनाविष्कृतपापांस्तु मन्त्रैर्होमैश्च शोधयेत् ।। 226 11
जो लोग अपने पाप को लोक में व्यक्त कर देते हैं वे इन्हीं व्रतों के पालन से शुद्ध हो जाते हैं। अपने पापों को गुप्त रखने वालों को मंत्रों के जाप व होम आदि से स्वयं की शुद्धि करनी चाहिए।
ख्यापनेनानुतापेन तपसाऽध्ययनेन च।
पापकृन्मुच्यते पापात्तथा दानेन चापदि ।। 227 ॥
पापी व्यक्ति अपने पाप का प्रचार करके, पश्चाताप, तप व स्वाध्याय करके पाप से निवृत्त हो जाता है। संकट की स्थिति में या तप व स्वाध्याय न कर पाने की स्थिति में वह दान करने से शुद्ध हो जाता है।
यथा यथा नरोऽधर्मं स्वयं कृत्वाऽनुभाषते ।
तथा तथा त्वचेवाहिस्तेनाधर्मेण मुच्यते ।। 228 ।।
पापी व्यक्ति जितना अधिक अपने कुकृत्य के बारे में बताता है उतनी ही जल्दी वह पाप से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है जैसे सांप अपनी केंचुली से।
यथा यथा मनस्तस्य दुष्कृतं कर्म गर्हति।
तथा तथा शरीरं तत्तेनाधर्मेण मुच्यते ॥ 229 ।।
अपने दुष्कृत्य पर पापी व्यक्ति जितना अधिक आत्मग्लानि अनुभव करता है उतना ही शीघ्र वह पाप कर्म से मुक्ति पा लेता है।
कृत्वा पापं हि सन्तप्य तस्मात् पापात्प्रमुच्यते ।
नैवं कुर्यां पुनरिति निवृत्त्या पूयते तु सः ॥ 230 ।।
पाप कर्म करने पर यदि वह व्यक्ति पश्चाताप की अग्नि में जलता है तो वह उस पाप से मुक्त हो जाता है। यदि वह पुनः ऐसा दुष्कर्म न करने का संकल्प करता है तो वह पाप से मुक्त ही नहीं होता वरन् पवित्र भी हो जाता है।
एवं सञ्चिन्त्य मनसा प्रेत्य कर्मफलोदयम्।
मनोवाड्.मूर्तिभिर्नित्यं शुभं कर्म समाचरेत् ॥ 231 ॥
यह सोचकर कि इस लोक में अथवा परलोक में किए गए पाप का फल अवश्य भोगना होगा-मनुष्य को मन, वचन व शरीर से सदैव शुभ कर्मों को ही करना चाहिए।
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानात्कृत्वा कर्म विगर्हितम्।
तस्माद् विमुक्तिमन्विच्छन् द्वितीयं न समाचरेत् ।। 232 ।।
अज्ञान या ज्ञान से निन्दनीय कार्य कर उससे मुक्ति की आकांक्षा रखने वाला व्यक्ति कदापि अन्य पापकर्म न करे।
यस्मिन्कर्मण्यस्य कृते मनसः स्यादलाघ्वम्।
तस्मिंस्तावत्तपः कुर्याद्यावत्तुष्टिकरं भवेत् ।। 233 ।।
पश्चाताप के रूप में यज्ञ, तप, जप व स्वाध्याय इनमें से जिस भी कर्म को करने में सबसे अधिक कष्ट व दुःख हो, मनुष्य को वही कर्म करना चाहिए ताकि उसे यह संतोष हो कि उसने अपने पाप का प्रायश्चित कर लिया है।
तपोमूलमिदं सर्वं दैवमानुषकं सुखम् ।
तपोमध्यं बुधैः प्रोक्तं तपोऽन्तं वेददर्शिभिः ।। 234 ।।
वेद ज्ञानी महात्माओं का यह मत है कि देवों व मनुष्यों के सुख का मूल, मध्य व अंत तप ही है।
ब्राह्मणस्य तपो ज्ञानं तपःक्षत्रस्य रक्षणम्।
वैश्यस्य तपो वार्ता तपः शूद्रस्य सेवनम् ।। 235 ।।
ज्ञान ब्राह्मण का, लोक रक्षा क्षत्रिय का, व्यापार कर्म वैश्य का व द्विजाति सेवा शूद्र का तप है अर्थात् स्वधर्म का पालन ही तप है।
ऋषयः संयतात्मानः फलमूलानिलाशनाः ।
तपसैव प्रपश्यन्ति त्रैलोक्यं सचराचरम् ।। 236 ।।
इन्द्रिय निग्रह करके, फल, कन्द-मूल व वायु का सेवन कर निर्वाह करने वाले ऋषि तप के द्वारा ही ज्ञान चक्षु में समस्त जड़-चेतन विश्व को देखने में सफल हो जाते हैं।
औषधान्यगदो विद्या दैवी च विविधा स्थितिः ।
तपसैव प्रसिध्यन्ति तपस्तेषां हि साधनम् ।। 237 ।।
तप से ही औषधि में रोग नाशक शक्ति, विद्या में दैवी गुण व देवों की सत्ता सिद्ध होती है। तप ही उनका साधन होता है।
यद् दुस्तरं यद् दुरापं यद् दुर्गं यच्च दुष्करम्।
सर्वन्तु तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥ 238 ॥
जो भी दुस्तर, दुर्लभ, दुष्कर व कठिनता से जा सकने वाला है वह सब तप से सिद्ध हो सकता है। अतः तप सर्वाधिक शक्ति रखता है।
महापातकिनश्चैव शेषाश्चाकार्यकारिणः ।
तपसैव सुतप्तेन मुच्यन्ते किल्विषात्ततः ।। 239 ।।
अनुचित कार्य करने वाले महापातकी तथा अन्य उपपातक के रूप में परिगणित (व्यक्ति) भली-भांति तप करने के फलस्वरूप पापों से मुक्ति पा जाते हैं।
कीटाश्चाहिपतङ्गाश्च पशवश्च वयांसि च।
स्थावराणि च भूतानि दिवं यान्ति तपोबलात् ।। 240 ।।
तप की शक्ति से कीड़े, सांप, पतंगे, पशु, पक्षी व वृक्ष भी स्वर्ग लाभ करने में समर्थ हो जाते हैं।
यत्किञ्चिदेनः कुर्वन्ति मनोवाड्.मूर्तिभिर्जनाः ।
तत्सर्वं निर्दहन्त्याशु तपसैव तपोधनाः ।। 241 ।।
मन, वाणी व शरीर से किए गए सभी पापों को तपस्वी व्यक्ति तप की अग्नि में भस्म कर देता है।
तपसैव विशुद्धस्य ब्राह्मणस्य दिवौकसः ।
इज्याश्च प्रतिगृह्णन्ति कामान् संवर्धयन्ति च ।। 242 ।।
तप से विशुद्ध हुए ब्राह्मणों के यज्ञ को ही देव स्वीकार करते हैं तथा उनकी कामनाओं को पूरा करते हैं।
प्रजापतिरिदं शास्त्रं तपसैवासृजत्प्रभुः ।
तथैव वेदानृषयस्तपसा प्रतिपेदिरे ।। 243 ।।
तप से ही प्रजापति ब्रह्मा ने इस शास्त्र का सृजन किया है तथा तप की शक्ति से ही ऋषियों ने वेदों को पाया है।
इत्येत्तत्तपसो देवाः महाभाग्यं प्रचक्षते।
सर्वस्यास्य प्रपश्यन्तस्तपसः पुण्यमुत्तमम् ।। 244 ।।
देवगण तप की विलक्षण शक्ति व उत्तम फल को देखते हुए इसकी महिमा का गान करते नहीं थकते और सदा मनुष्यों से अनुरोध करते हैं कि वे तप को अपनाएं।
वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या महायज्ञक्रिया क्षमा।
नाशयन्त्याशु पापानि महापातकजान्यपि ।। 245 ।।
नित्य यथाशक्ति वेदों का स्वाध्याय, पंच महायज्ञों का अनुष्ठान व सहनशीलता बड़े-बड़े व भयंकर पापों से जनित संताप का भी विनाश कर देते हैं।
यथोघस्तेजसां वह्निः प्राप्य निर्दहति क्षणात् ।
तथा ज्ञानाग्निना पापं सर्वं दहति वेदवित् ।। 246 ।।
वेद विद्या में कुशल व्यक्ति ज्ञान की अग्नि से सभी पापों को उसी प्रकार भस्म कर डालता है जैसे अग्नि अपने तेज से लकड़ियों के भार को क्षण भर में नष्ट कर डालती है।
इत्येतदेनसामुक्तं प्रायश्चित्तं यथाविधिः ।
अत ऊर्ध्वं रहस्यानां प्रायश्चित्तं निबोधत ।। 247 ।।
भृगु जी ने कहा-विप्रो ! यह मैंने पापों के विधिपूर्वक प्रायश्चित का विधान आपको बतलाया। अब आप रहस्यों (गुप्त पापों) के प्रायश्चित के बारे में दत्तचित्त होकर सुनें।
सव्याहृतिप्रणवकाः प्राणायामास्तु षोडश।
अपि भ्रूणहणं मासात्पुनरहरहः कृताः ।। 248 ।।
भ्रूण हत्या के दोष का निवारण एक माह प्रतिदिन प्रणव व व्याहृतियों के साथ सोलह बार प्राणायाम करने से हो जाता है।
कौत्सं जप्त्वाप इत्येतद्वासिष्ठं च प्रतीत्यृचम् ।
माहित्रं शुद्धवत्त्यश्च सुरापोऽपि विशुध्यति ॥ 249 ।।
जो व्यक्ति मदिरापान के दोष से ग्रसित है वह कुत्स तथा वसिष्ठ ऋषियों द्वारा प्रणीत सूक्तों व ऋचाओं का जप करने से शुद्धि प्राप्त करता है।
सकृज्जप्त्वास्यवामीयं शिवसङ्कल्पमेव च।
अपहृत्य सुवर्णं तु क्षणाद् भवति निर्मलः ।। 250 ।।
'अस्यवामीय' ऋचा के बाद तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु ऋचाओं के पाठ से स्वर्ण की चोरी करने वाला पाप मुक्त हो जाता है।
हविष्यन्तीयमभ्यस्य न तमंहीनं इतीति च।
जपित्वा पौरुषं सूक्तं मुच्यते गुरुतल्पगः ।। 251 ॥
जो व्यक्ति 'हविष्यान्तमजिरम्' ऋचा सूक्त के पश्चात् पौरुष सूक्त अथवा 'न तमम्हीनम्' सूक्त का जप करता है, वह गुरु पत्नी सहवास के पाप से मुक्त हो जाता है।
एनसां स्थूल सूक्ष्माणां चिकीर्षन्नपनोदनम्।
अवेत्य च जपेदब्दं यत्किञ्श्चेदमितीति च ।। 252 ॥
जो मनुष्य छोटे-बड़े पापों से मुक्त होना चाहता है उसे लगातार एक वर्ष तक 'वरुण योनिः' या 'यत्किंचेदवरुण देव्यै' सूक्तों का जप करना चाहिए।
प्रतिगृह्याप्रतिग्राह्यं भुक्त्वा चान्नं विगर्हितम्।
जपंस्तरेत्समन्दीयं पूयते मानवस्त्र्यहात् ।। 253 ॥
यदि किसी ने प्रतिग्रह के अयोग्य दान दिया है या फिर निन्दनीय अन्न को ग्रहण किया है, तो वह तीन दिन तक 'तत्समन्दी धावति' प्रभृति ऋचाओं के पाठ से शुद्ध हो जाता है।
सोमा रौद्रं तु बह्वेना मासमस्यस्य शुध्यति । त्रवत्त्यामोचरन्नानसर्यम्णामिति च तृचम् ॥ 254 ॥
यदि व्यक्ति एक मास तक 'सोमारुद्रा धारये', 'अर्यम्णामिति' एवं 'स्रवत्यामोचरन्' नाम के सूक्तों का अध्ययन करे तो भी वह अनेक पापों से शुद्ध हो जाता है।
अब्दार्थमिन्द्रमित्येतदेनस्वी सप्तकं जपेत्।
अप्रशस्तं तु कृत्वाप्सु मासमासीत् भैक्षभुक् ॥ 255 ।।
'इंद्रमित्रम् वरुणमग्नि' मंत्र का जप पापी मनुष्य को छः मास तक करना
चाहिए। जल में जो क्रिया निषेध है, उसे करने वाले मनुष्य को एक मास तक भिक्षा के भोजन से जीवन व्यतीत करना चाहिए।
मन्त्रैश्शाकलहोमीयैरब्दं हुत्वा घृतं द्विजः ।
सुगुर्वप्यहन्त्येनो जप्त्वा वा नम इत्यृचम् ॥ 256 ।।
जो ब्राह्मण एक वर्ष तक 'नमः कपर्दिने' आदि शाकलहोत्रीय मंत्रों से अग्नि में घी की आहुति देता है और 'नमो मित्रस्य वरुणस्य' ऋचा का जप करता है, वह गंभीर पापों से भी मुक्त हो जाता है।
महापातकसंयुक्तोऽनुचच्छेदगाः समाहितः ।
अभ्यस्याब्दं पावमानीभैक्षाहारो विशुध्यति ।। 257 ।।
यदि मनुष्य एक वर्ष तक गायों को चराए व पवमानीय ऋचाओं का पाठ करे तथा भिक्षा से जीवन यापन करे तो वह बड़े से बड़े पापों से भी शुद्ध हो जाता है।
अरण्ये वा त्रिरभ्यस्य प्रयतो वेदसंहिताम्।
मुच्यते पातकैः सर्वैः पराकैः शोधितस्त्रिभिः ।। 258 ॥
वह प्राणी जो वन में इंद्रिय निग्रह करके रहता है और प्रतिदिन वेदमंत्रों का जाप करता है, मृत्यु के पश्चात् सभी छोटे व बडे पापों से मुक्त हो शुद्ध हो जाता है।
त्र्यहं तूपवसेद्युक्तस्त्रिरह्नो ऽभ्युपयन्नपः ।
मुच्यते पातकैः सर्वैस्त्रिर्जपित्वाऽघमर्षणम् ।। 259 ।।
निरंतर तीन दिन-रात संयम व अनुशासन से उपवास करने, जल में खड़े होकर 'ऋतं च सत्यं च' मंत्र का एवं अघमर्षण सूक्त का जप करने से भी प्राणी पापों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।
यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापोपनोदनः ।
तथाऽघमर्षणं सूक्तं सर्वपापोपनोदनम् ।। 260 ॥
अघमर्षण सूक्त उसी प्रकार सभी पापों का विनाश करने वाला है, जिस प्रकार अश्वमेध यज्ञ सभी यज्ञों में श्रेष्ठ एवं सर्वपापमोचक है।
हत्वा लोकानपीमांस्त्रीननन्नापियतस्ततः ।
ऋग्वेदं धारयन्विप्रो नैनः प्राप्नोति किञ्चन ।। 261 ॥
चाहे प्राणी ने तीनों लोकों का नाश करने का पाप ही क्यों न किया हो या उसने कहीं से कुछ भी खाने का अपराध क्यों न किया हो, ऋग्वेद का पालन करने से वह सभी पापों से मुक्त व शुद्ध हो जाता है।
ऋक्संहितां त्रिरभ्यस्य यजुषां च समाहितः ।
साम्नां च सरहस्यानां सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। 262 ।।
जो व्यक्ति ऋक्, यजु व साम संहिता का उपनिषदों समेत एकचित्त हो तीन बार अध्ययन करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
यथा महाहृदं प्राप्य क्षिप्रं लोष्ठं विनश्यति।
तथा दुश्चरितं सर्वं वेदे त्रिवृत्तिमज्जति ।। 263 ।।
वेदों की तीन बार आवृत्ति करने से सभी पाप उसी प्रकार सर्वथा नष्ट हो जाते हैं जैसे विशाल सरोवर में फेंका गया मिट्टी का ढेला तुरंत गल जाता है।
ऋचो यजूंषि चान्यानि सामानि विविधानि च।
एष ज्ञेयस्त्रिवृद्वेदो यो वेदैनं स वेदवित् ॥ 264 ।।
मनुष्यों को ऋग्वेद, यजुर्वेद व सामवेद के अतिरिक्त अन्य विविध मंत्रों को जानना चाहिए। ये जीवों के लिए कल्याणकारक होते हैं। जो इन तीन वेदों को भली-भांति जानता है वही वेदवेत्ता कहलाता है।
आद्यं यत्त्र्यक्षरं ब्रह्म त्रयो यस्मिन् प्रतिष्ठिताः ।
सः गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्वेदो यस्तं वेद सः वेदवित् ॥ 265 ।।
'ओ३म्'- यह तीन अक्षरों का शब्द, जो सभी वेद मंत्रों के आदि में प्रयोग किया जाता है, उसी में तीनों वेद प्रतिष्ठित हैं। जो व्यक्ति वेदों के इस गूढ़ रहस्य को जानता है वह ईश्वर व वेदों को ही नहीं जान लेता, वरन् स्वयं भी ब्रह्म स्वरूप हो जाता है अर्थात् न तो वह दुष्काम अथवा पाप करता है और न ही शुद्धि की कामना।
॥ मनुस्मृति एकादश अध्याय सम्पूर्ण।।
Manusmriti Chapter 10
kathaShrijirasik
।।मनुस्मृति दशम अध्याय।।
अधीयीरंस्त्रयो वर्णाः स्वकर्मस्थाः द्विजातयः ।
प्रब्रूयाद् ब्राह्मणास्त्वेषां नेतराविति निश्चयः ॥ 1 ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य-इन तीन वर्षों के लोग अपने कर्मों को करते हुए वेद का अध्ययन करें। वेदों की शिक्षा देने का कार्य केवल ब्राह्मण को ही करना चाहिए- यही शास्त्रों में निश्चित किया गया है।
सर्वेषां ब्राह्मणो विद्याद् वृत्त्युपायान्यथाविधिः ।
प्रब्रूयादितरेभ्यश्च स्वयं चैव तथा भवेत् ॥ 2 ॥
सभी वर्गों के लोगों का जीवन किस विधि से चले- इस विषय में ब्राह्मण स्वयं जाने तथा अन्य वर्णों को बतलाए। साथ-साथ ब्राह्मण को अपने कर्तव्य कर्मों का पालन भी निरंतर करते रहना चाहिए।
वैशेष्यात्प्रकृति श्रेष्ठठ्यान्नियमस्य च धारणात्।
संस्कारस्य विशेषाच्च वर्णानां ब्राह्मणः प्रभुः ॥ 3 ॥
ब्राह्मण विशेषकर अपनी प्रकृति की श्रेष्ठता, नियमों का पालन करने व उच्च संस्कारों के बाहुल्य के कारण सभी वर्णों का स्वामी होता है।
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णाद्विजातयः ।
चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पञ्चमः ॥ 4 ॥
तीन वर्ण द्विजाति होते हैं- ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य। चौथी जाति शूद्र होती है। इनके अतिरिक्त पांचवां कोई वर्ण नहीं होता।
सर्ववर्णेषु तुल्यासु पत्नीष्वक्षतयोनिषु।
आनुलोम्येन सम्भूता जात्या ज्ञेयस्त एव ते ॥5॥
इन चारों वर्णों की सजातीय व सर्वथा पवित्र पत्नियों से उत्पन्न संतान ही अपनी-अपनी जाति को धारण करती है।
स्त्रीष्वनन्तरजातासु द्विजैरुत्पादितान्सुतान् ।
सदृशानेव तानाहुर्मातृदोषविगर्हितान् ।। 6 ।।
अपने क्रम से हीन जाति की स्त्रियों द्वारा उत्पन्न द्विजातियों की संतान माता के दोष के कारण पतित मानी जाती है।
ब्राह्मणाद् वैष्यकन्यायाः अम्बष्ठो नाम जायते।
निषादः शूद्रकन्यायां यः पारशव उच्यते ॥ 7 ॥
यदि ब्राह्मण वैश्य स्त्री से बालक प्राप्त करे तो वह 'अम्बष्ठ' तथा शूद्र स्त्री से संतान पाए तो उसे 'निषाद' तथा 'पारशव' कहते हैं।
क्षत्रियाच्छूद्र कन्यायां क्रूराचारविहारवान् ।
क्षत्रशूद्रवपुर्जन्तुरुग्रो नाम प्रजायते ॥ 8 ॥
जो बालक क्षत्रिय द्वारा शूद्र स्त्री से जन्म लेता है वह क्रूर आचार-विचार का होता है। शारीरिक रूप से क्षत्रिय व शूद्र का मिश्रित रूप धारण करने वाला वह बालक उग्र स्वभाव होने के कारण 'उग्र बालक' कहलाता है।
विप्रस्य त्रिषु वर्णेषु नृपतेवर्णयोर्द्वयोः ।
वैश्यस्य वर्णे चैकस्मिन् षडेतेऽपसदाः स्मृताः ॥ 9 ॥
क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र स्त्रियों से ब्राह्मण द्वारा, अन्य दो वर्षों की स्त्रियों से क्षत्रिय द्वारा तथा वैश्य द्वारा एक वर्ण की स्त्री से उत्पन्न इन छः प्रकार के बालकों को 'अपसद' कहा जाता है।
क्षत्रियाद् विप्रकन्यायां सूतो भवति जातितः ।
वैश्यान्मागधवैदेहौ राजविप्राङ्गनासुतौ ।। 10 ।।
जो पुत्र क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मण स्त्री से उत्पन्न हों उन्हें 'सूत' तथा जो वैश्य द्वारा क्षत्रिय तथा ब्राह्मण स्त्री से जन्मा हो उन्हें क्रमशः 'मागध' तथा 'वैदेह' कहा जाता है।
शूद्रादायोगवक्षेत्ता चाण्डालश्चाधमो नृणाम्।
वैश्यराज्यन्य विप्रासु जायन्ते वर्णसङ्कराः ॥ 11 ॥
वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मण स्त्री से शूद्र द्वारा जन्मे पुत्रों को क्रमशः 'आयोगव', 'क्षत्ता' व 'चाण्डाल' कहा जाता है। ये मनुष्यों में वर्णसंकर समझे जाते हैं।
एकान्तरे त्वानुलोम्यादम्बष्ठोग्रौ यथास्मृतौ ।
क्षतृवैदेहकौ तद्वत्प्रतिलोम्येऽपि जन्मनि ।। 12 ।।
जिस प्रकार अनुलोम (अर्थात् ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिय व वैश्य आदि स्त्री से) से जन्मे बालक 'अम्बष्ठ' व 'उग्र' कहलाते हैं उसी प्रकार प्रतिलोम (अर्थात् क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मण स्त्री से) से उत्पन्न बालक को 'क्षतृ' व 'वैदेह' कहा जाता है।
पुत्राः येऽनन्तरस्त्रीजाः क्रमेणोक्ताः द्विजन्मनाम्। ताननन्तरनाम्नस्तु मातृदोषात्प्रचक्षते ।। 13 ।।
क्रम से एक वर्ण नीचे की स्त्री से उत्पन्न ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य के पुत्र को माता दोष के कारण 'अनन्तर' कहा जाता है।
ब्राह्मणादुग्र कन्यायामावृत्तो नाम जायते ।
आभीरोऽम्बष्ठ कन्यायामायोगव्यांस्तु धिग्वणः ॥ 14 ॥
'उग्र' कन्या से ब्राह्मण द्वारा उत्पन्न पुत्र को 'आवृत्त', अम्बष्ठ कन्या से जन्मे बालक को 'आभीर' तथा आयोगव स्त्री से जन्मे बालक को 'धिग्वण' कहा जाता है।
आयोगवश्चक्षता चैव चण्डालाश्चाधमोनृणाम्।
प्रातिलोम्येन जायन्ते शूद्रादपसदस्त्रियः ।। 15 ।।
अधर्म से उत्पन्न आयोगव, क्षत्ता व चाण्डाल नामक तीन संतानें प्रतिलोम से जन्मे शूद्र से भी नीच मानी जाती हैं।
वैश्यान्मागधवैदेहौ क्षत्रियात्सूत एव तु ।
प्रतीपमेते जायन्ते परेऽपसदस्त्रियः ।। 16 ।।
जैसा कि पहले वर्णन किया गया, वैश्य द्वारा उत्पन्न 'मागध' और 'वैदेह' तथा क्षत्रिय द्वारा जन्मे 'सूत' को भी प्रतिलोम संतान होने के कारण अत्यन्त तुच्छ माना जाता है।
जातो निषादाच्छूद्रायां जात्या भवति पुक्कसः ।
शूद्राज्जातो निषाद्यां तु स वै कुक्कुटकः स्मृतः ।। 17 ॥
शूद्र स्त्री से निषाद द्वारा जन्मी संतान की जाति 'पुक्कस' व निषाद स्त्री से शूद्र द्वारा जन्मी संतान की जाति 'कुक्कुटक' मानी जाती है।
क्षतुर्जातस्तथोग्रायां श्वपाक इति कीर्त्यते।
वैदेहकेन त्वम्बष्ट्यामुत्पन्नो वेण उच्यते ॥ 18।।
उग्र कन्या से क्षत्ता द्वारा जन्मी संतान 'श्वपाक' तथा अम्बष्ठ कन्या से वैदेह द्वारा जन्मी संतान 'वेण' जाति की समझी गई है।
द्विजातयः सवर्णासु जनयन्त्यव्रतांस्तु यत्।
तान्सावित्रीपरिभ्रष्टान् व्रात्यानिति विनिर्दिशेत् ॥ 19 ॥
अपनी सवर्णा स्त्रियों से भी द्विजाति पुरुषों द्वारा जिन असंस्कारी पुत्रों का जन्म होता है, उपनयन संस्कार व गायत्री मंत्र से भ्रष्ट उन पुत्रों को 'व्रात्य' कहा जाना चाहिए।
ब्रात्यात्तु जायते विप्रात् पापात्मा भूर्जकण्टकः।
आवन्त्यवाटधानौ च पुष्पधः शैख एव च ॥ 20 ।।
जो पापात्मा व्रात्य ब्राह्मण से उत्पन्न होता है उसे 'भूर्जकण्टक' कहा जाता है। देश भेद से इसी प्रकार की संतान का नाम 'आवन्त्य', 'वाटधान', 'पुष्पध' और 'शैख' भी हैं।
झल्लोमल्लश्च राजन्याद् व्रात्यान्निच्छिविरेव च।
नटश्च करणश्चैव खसो द्रविड एव च ॥ 21 ॥
जो पुत्र व्रात्य क्षत्रिय से उत्पन्न होता है उसे 'झल्ल', 'मल्ल', 'निच्छिवि', 'नट', 'करण', 'खस' व द्रविड़ कहा जाता है।
वैश्यात्तु जायते व्रात्यात् सुधन्वाचार्य एव च।
कारूषश्च विजन्मा च मैत्रः सत्वत एव च ।। 22 ।।
जो व्रात्य वैश्य से उत्पन्न हो उसे सुधन्वा, आचार्य, कारूष, विजन्मा, मैत्र व सत्वत भी कहा गया है।
व्यभिचारेण वर्णानामवेद्यावेदनेन च।
स्वकर्मणां च त्यागेन जायन्ते वर्णसङ्कराः ।। 23 ।।
सभी वर्गों के पुरुषों द्वारा व्यभिचार करने तथा अगम्या स्त्री से सम्बन्ध स्थापित करने तथा स्वकर्म का त्याग करने के फलस्वरूप वर्णसंकर संतान का जन्म होता है।
सङ्कीर्णयोनयो ये तु प्रतिलोमाऽनुलोमजाः । अन्योऽन्यव्यतिषिक्ताश्च तान्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ।। 24 ।।
महर्षियो, अब मैं प्रतिलोम व अनुलोम जातियों के परस्पर सम्बन्ध से उत्पन्न होने वाली संकीर्ण योनियों का विस्तार से वर्णन करता हूं।
सूतो वैदेहकश्चैव चण्डालश्च नराधमः ।
मागधः क्षतृजातिश्च तथाऽऽयोगव एव च ॥ 25 ।।
एते षट् सदृशान् वर्णान् जनयन्ति स्वयोनिषु।
मातृजात्यां प्रसूयन्ते प्रवरासु च योनिषु ॥ 26 ॥
यदि सूत, वैदेह, अधम, चाण्डाल, मागध, क्षतृ तथा आयोगव-ये छः अपनी ही जाति की स्त्री से संतानोत्पत्ति करते हैं तो वह संतान इन्हीं की जाति को धा करती है किंतु इनके द्वारा यदि उच्च जाति की स्त्री से संतान जन्मे तो वह अपनी माता की जाति में गिनी जाएगी। धारण
यथा त्रयाणां वर्णानां द्वयोरात्माऽस्य जायते ।
आनन्तर्यास्वयोन्यां तु तथा बाह्येष्वपि क्रमात् ।। 27 ।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य-इन तीन वर्षों के लोगों द्वारा जिस प्रकार सवर्णा से उत्पन्न संतान में ही उनकी आत्मा होती है किन्तु विजातीय से उत्पन्न संतान भिन्न जाति की मानी जाती है- उसी प्रकार इन बाह्य वर्ण संकरों के क्रम को भी मानें।
ये चापि बाह्यान्सबहूंस्ततोऽप्यधिकदूषितान् ।
परस्परस्य दारेषु जनयन्ति विगर्हितान् ।। 28 ।।
यदि आयोगव आदि नीच जातियों के लोग एक-दूसरे की स्त्रियों से सम्बन्ध स्थापित करते हैं तो उनसे भी अधिक दुष्ट व निन्दनीय संतान उत्पन्न होती है।
यथैव शूद्रो ब्राह्मण्यां बाह्यं जन्तुं प्रसूयते।
तथा बाह्यान्तरात् बाह्यश्चातुर्वर्ण्य प्रसूयते ।। 29 1
जिस तरह ब्राह्मण स्त्री से शूद्र द्वारा उत्पन्न संतान अधम मानी जाती है उसी तरह यह अधम संतान यदि अपने से इतर जाति में सम्बन्ध स्थापित करती है तो और भी निकृष्ट संतान को उत्पन्न करती है। इस तरह से वर्ण संकरता में निकृष्टता का स्तर बढ़ता जाता है।
प्रतिकूलं वर्तमानाबाह्यतरान्पुनः ।
हीना हीनान्प्रसूयन्ते वर्णान्पञ्चदशैव तु ॥30॥
अधम, सूत, वैदेह व चाण्डाल प्रतिकूल आचरण करने के फलस्वरूप चारों वर्णों की स्त्रियों से निकृष्टतर संतान को जन्म देते हैं जो कुल मिलाकर पन्द्रह कही गई हैं।
प्रसाधनोपचारज्ञमदासं दासजीवनम् ।
सैरिन्धं वागुरावृत्तिं सूते दस्युरयोगवे ॥ 31 ॥
सौंदर्य प्रसाधन लगाने, चरणादि धोने, स्नानादि करवाने जैसे दास कर्म करने बाले तथा जाल में बांधकर आजीविका चलाने वाले सैरिन्ध्र दस्यु से आयोगव संतान का जन्म होता है।
मैत्रेयकं तु वैदेहो माधूकं सम्प्रसूयते।
नन्प्रशंसत्यजस्त्रं यो घण्टताण्डोऽरुणोदये ।। 32 ॥।
वैदेह पुरुष के द्वारा आयोगव स्त्री से मधुभाषी 'मैत्रेयक' का जन्म होता है, जिसका कार्य है- प्रातःकाल घंटा आदि बनाकर राजा की स्तुति करना।
निषादो भार्गवं सूते दासो नौकर्म जीविनम्।
कैवर्तमिति यं प्राहुरार्यावर्तनिवासिनः ।। 33 ॥
निषाद के द्वारा आयोगव स्त्री से 'भार्गव' दास का जन्म होता है जो नौका कर्म से जीवन यापन करता है। आर्यावर्त में इसी को 'कैवर्त' कहा जाता है।
मृतवस्त्रभृत्सु नारीषु गर्हितान्नाशनासु च।
भवन्त्यायोगवीष्वेते जातिहीनाः पृथक् त्रयः ।। 34 ।।
जो आयोगव स्त्री मृतक के वस्त्र पहने, गन्दा व त्याज्य भोजन खाए, वह निम्रोक्त तीन प्रकार की जातियों की संतान को जन्म देती है।
कारावरो निषादात्तु चर्मकारः प्रसूयते।
वैदेहिकान्ध्रभेदौ बहिर्गाम प्रतिश्रयौ ।। 35 ॥
'करावर' नाम वाले निषाद से, 'अन्ध्र' व 'भेद' नामक जाति के लोग वैदेह से उत्पन्न होते हैं- ये प्रायः ग्राम सीमा से बाहर रहते हैं।
चाण्डालात् पाण्डुसोपाकस्त्वक्सार व्यवहारवान् ।
आहिण्डिको निषादेन वैदेह्यामेव जायते ॥ 36 ॥
वैदेह स्त्री चाण्डाल द्वारा 'पाण्डु सोपाक' जाति को उत्पन्न करती है। इस जाति के लोग बांस के सूप व पंखे बनाकर जीविकोपार्जन करते हैं। निषाद से वह 'आहिण्डक' जाति को पैदा करती है।
चाण्डालेन तु सोपाको मूलं व्यसनवृत्तिमान् ।
पुक्कस्यां जायते पापः सदा सज्जनगर्हितः ॥ 37 ॥
चाण्डाल द्वारा पुक्कसी 'सोपाक' को उत्पन्न करती है, जिसका जल्लाद कर्म होता है। वह पापात्मा सज्जनों द्वारा सदा ही निन्दनीय रहता है।
निषादस्त्री तु चण्डालात्पुत्रमन्त्यावसायिनम् ।
श्मशानगोचरं सूते बाह्यानामपि गर्हितम् ॥ 38 ॥
चाण्डाल द्वारा निषाद स्त्री अत्यंत निन्दनीय व चाण्डालों में भी सर्वथा निकृष्ट तथा श्मशान में रहकर उसी वृत्ति को स्वीकारने वाले पुत्र को जन्म देती है।
संकरे जातयस्त्वेताः पितृमातृप्रदर्शिताः ।
प्रच्छन्नाः वा प्रकाशाः वा वेदितव्याः स्वकर्मभिः ॥ 39 ॥
ब्राह्मणो ! मैंने आपको माता-पिता के भेद से उत्पन्न वर्णसंकर जातियों के बारे में बतलाया। शेष प्रच्छन्न अथवा प्रकट वर्णसंकर जातियों को उनके कर्मों द्वारा जानना चाहिए।
सजातिजानन्तरजाः षट्सुताः द्विजधर्मिणः ।
शूद्राणां तु सधर्माणः सर्वेऽपध्वंसजाः स्मृताः ॥ 40 ।।
जो छः पुत्र द्विजातियों द्वारा अनुलोम से उत्पन्न होते हैं वे तो द्विजधर्मी हैं किंतु प्रतिलोम से उत्पन्न उनके सभी पुत्र शूद्र तुल्य होते हैं।
तपोबीजप्रभावैस्तु ते गच्छन्ति युगे युगे।
उत्कर्षं चापकर्षं च मनुष्येष्विह जन्मतः ॥ 41 ॥
तप व बीज के प्रभाव से ही हर युग में उत्पन्न मनुष्य अपने जन्म के उत्कर्ष व अपकर्ष को प्राप्त करते रहते हैं।
शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः ।
वृषलत्वं गताः लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ।। 42 ॥
अपने कर्तव्य-कर्मों के परित्याग से निम्नलिखित क्षत्रिय जातियां ब्राह्मणों द्वारा तिरस्कृत होने पर धीरे-धीरे शूद्र तुल्य हो गईं।
पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः काम्बोजा यवनाः शकाः । पारदापह्नवाश्चीनाः किराताः दरदाः खशाः ॥ 43 ॥
ये जातियां हैं- पौंड्रक, औंड्र, द्रविड़, काम्बोज, यवन, शक, पारद, अपह्लव, चीन, किरात, दरद तथा खश।
मुखबाहूरुपञ्जानां या लोके जातयो बहिः ।
म्लेच्छवाचश्चार्यवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृतः ॥ 44 ।।
मुंह, बाहु, उरु तथा पद (क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) वर्ण के लोगों द्वारा अपने कर्तव्यों का त्याग करने से जन्मी अधर्म जातियां दस्यु कहलाती हैं- चाहे वे म्लेच्छ भाषा के बोलने वाले हों या आर्य भाषी।
ये द्विजानामपसदा ये चापध्वन्सजाः स्मृताः ।
ते निन्दितैर्वर्तेयुर्बुद्धिजानामेव कर्मभिः ॥ 45 ॥
जो लोग द्विजों द्वारा अनुलोम से उत्पन्न अपसद व प्रतिलोम से जन्मे अपध्वंस पत्र हों उन्हें द्विजों के निन्दित कर्मों अर्थात सफाई, वस्त्र प्रक्षालन आदि सेवा कार्यों से ही जीविकोपार्जन करना चाहिए।
सूतानामश्वसारथ्यानाम्बष्ठानां चिकित्सनम् ।
वैदेहकानां स्त्रीकार्य मागधानां वणिक् पथः ॥ 46 ।।
सूत, अम्बष्ठ, वैदेह व मागध जाति के लोग क्रमशः सारथि, चिकित्सा, अंतःपुर की देखभाल तथा व्यापार करें।
मत्स्यघातो निषादानां त्वष्टिस्त्वायोगवस्य च। मेदान्ध्रचुञ्चुमद्गूनामारण्यपशुहिंसनम् 11 47 ।।
मछली पकड़ना तथा लकड़ी चीरना क्रमशः निषादों व आयोगवों का कार्य है मेदों, अन्ध्रों, चुंचुओं व मद्गुओं का काम जंगली पशुओं का वध करना कहा गया है।
क्षेत्तुग्रपुक्कसानां तु विलोको वधबन्धनम् ।
धिग्वणानां चर्मकार्यं वेणानां भाण्डवादनम् ।। 48 ।।
बिल में रहने वाले पशुओं को बींधना तथा मारना क्षत्ता, उग्र व पुक्कस जाति के लोगों का कार्य है। चमड़े का सामान बनाना धिग्वणों का तथा बाजा बजाना, वेणों का कार्य है।
चैत्यद्रुमश्मशानेषु शैलेषूपवनेषु च।
वसेयुरेते विज्ञाताः वर्तयन्तः स्वकर्मभिः ॥ 49 ।।
इन सभी निकृष्ट जाति वालों को अपने निर्धारित कार्यों को करते हुए गांवों के निकट (अर्थात् सीमा पर) स्थित देवस्थानों में, वृक्षों के नीचे, श्मशान में, पर्वतों पर तथा उपवनों में रहना चाहिए।
चण्डालश्वपचानां तु बहिर्गामात्प्रतिश्रयः ।
अपपात्राश्च कर्तव्याः धनमेषां श्वगर्दभम् ॥ 50 ।।
वासांसि धृतचलानि भिन्नभाण्डेषु भोजनम्।
कार्णायसमलङ्कारः परिव्रज्या च नित्यशः ॥ 51 ॥
चाण्डाल व श्वपच को ग्राम के बाहर रहना चाहिए, निषिद्ध पात्रों का प्रयोग करना चाहिए तथा अपने धन तुल्य कुत्तों व गधों को पालना चाहिए। इन्हें शवों से उतारे तथा फटे-पुराने वस्त्र पहनने चाहिए। इन दो जाति के लोगों के बर्तन मिट्टी के व आभूषण लोहे के होने चाहिए। इन्हें एक स्थान पर न ठहरकर भ्रमण करते रहना चाहिए।
न तैः समयमन्विच्छेत्पुरुषो धर्ममाचरन् ।
व्यवहारो मिथस्तेषां विवाहः सदृशैः सह ।। 52 ॥
इन पतितों के साथ धर्मानुष्ठान करते समय किसी प्रकार का सम्पर्क व व्यवहार नहीं रखना चाहिए। पतित जातियों का व्यवहार व विवाह परस्पर ही होना चाहिए।
अन्नमेषां पराधीनं देयं स्याद् भिन्नभाजने।
रात्रौ न विचरेयुस्ते ग्रामेषु नगरेषु च ॥ 53 ॥
अपने प्रयोग में न आने वाले पात्रों में इन लोगों को भोजन देना चाहिए व रात्रि में इन्हें नगर व ग्राम में विचरने की आज्ञा नहीं होनी चाहिए।
दिवा चरेयुः कार्यार्थं चिह्नितराजशासनैः ।
अबान्धवं शवं चैव निर्हरेयुरिति स्थितिः ।। 54 ।।
किसी विशेष कार्य के लिए ही ये लोग दिन में राजा की अनुमति से ही नगर व गांव में घूम सकते हैं। लावारिस शव ले जाने का अधिकार इनको है- शास्त्रों में यही कहा गया है।
बध्यांश्च हन्युः सततं यथाशास्त्रं नृपाज्ञया ।
वध्यवासांसि गृह्णीयुः शय्याश्चाभरणानि च ॥ 55 ॥
राजा की आज्ञा से मृत्युदण्ड प्राप्त लोगों का इन्हीं लोगों द्वारा शास्त्रानुसार वध करना चाहिए तथा मृतक के वस्त्र, शय्या और आभूषण ले लेना चाहिए।
वर्णापेतमविज्ञातं नरं कलुषयोनिजम्।
आर्यरूपमिवानार्य कर्मभिः स्वैर्विभावयेत् ॥ 56
जो लोग परिवर्तित रूप-रंग के हों, वर्णसंकर होने पर भी वास्तविक रूप में पहचान न आते हों, आर्य दिखते हों किंतु हों अनार्य - ऐसे निकृष्ट लोगों की परख उनके कार्य व व्यवहार से होनी चाहिए।
अनार्यता निष्ठुरता क्रूरता निष्क्रियात्मता।
पुरुषं व्यञ्जयन्तीह लोके कलुषयोनिजम् ॥ 57 |
व्यक्ति के नीच कूल का परिचय उसका असभ्य आचरण, वाणी की कठोरता, व्यवहार की निर्दयता व कर्मानुष्ठान का अभाव देते हैं।
पित्र्यं वा भजते शीलं मातुर्वोभयमेव वा।
न कथञ्चन दुर्योनिः प्रकृतिं स्वां नियच्छति ॥ 58 ।
जो बालक वर्णसंकर से उत्पन्न होता है वह अपने माता-पिता दोनों की प्रकृति को ग्रहण करता है लेकिन वह अपनी असलियत को गुप्त नहीं रख पाता।
कुलेमुख्येऽपि जातस्य यस्य स्याद्योनिसङ्करः ।
संश्रयत्येव तच्छीलं नरोऽल्पमपि वा बहु ॥ 59 ॥
प्रच्छन्न वर्णसंकर यदि बड़े कुल में जन्मा हो तो भी अपनी माता के स्वभाव को थोड़ा-बहुत अवश्य ग्रहण करता है। इस तरह उसकी सच्चाई भी गुप्त नहीं रह पाती।
यत्र त्वेते परिध्वन्साज्जायन्ते वर्णदूषकाः ।
राष्ट्रकैः सह तद्राष्ट्रं क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ 60 ॥
वह राज्य जहां वर्णसंकरों का बाहुल्य हो शीघ्र नष्ट हो जाता है। वहां के निवासियों का भी शीघ्र ही पतन हो जाता है।
ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा देहत्यागोऽनुपस्कृतः ।
स्त्रीबालाभ्युपपत्तौ वा बाह्यानां सिद्धिकारणम् ॥ 61 ॥
यदि ये पतित लोग ब्राह्मण, गौ, स्त्री तथा बालक की रक्षा हेतु प्राण त्याग दें तो वे उच्च पद प्राप्त करते हैं।
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वण्यॆऽब्रवीन्मनुः ।। 62 ।।
चारों वर्णों के लिए मनु जी के अनुसार आचरण भी योग्य धर्म हैं- हिंसा न करना, सत्य बोलना, चोरी न करना, पवित्रता व इंद्रियों पर संयम।
शूद्रायां ब्राह्मणाज्जाताः श्रेयसा चेत्प्रजायते।
अश्रेयात् श्रेयसीं जातिं गच्छत्यासप्तमाद्युगात् ।। 63 ।।
ब्राह्मण द्वारा शद्र स्त्री से उत्पन्न कन्या भी कभी-कभी कल्याण का माध्यम बन जाती है। जब उसकी सात पीढियां निरन्तर ब्राह्मण से विवाह करती रहें तो सातवीं पीढी में जन्मी संतान ब्राह्मणत्व को प्राप्त होती है।
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्। क्षत्रियाज्जातमेवन्तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥ 64॥
जिस प्रकार शूद्र ब्राह्मणत्व को व ब्राह्मण शूद्रता को पा लेता है। उसी तरह क्षत्रिय तथा वैश्य से जन्मे बालक भी अपने जन्म से इतर वर्ण को पा लेते हैं।
आचार्यायां समुत्पन्नो ब्राह्मणात्तु यदृच्छया। ब्राह्मण्यामप्यनार्यात्तत् श्रेयस्त्वं क्वेति चेद् भवेत् ।। 65 ।।
यदि ब्राह्मण द्वारा शूद्र स्त्री से और शूद्र द्वारा ब्राह्मण स्त्री के गर्भ से संयोगवश बालक जन्म लेते हैं, तो उसमें श्रेष्ठता का निष्कर्ष इस प्रकार निकाल सकते हैं।
जातो नार्यामनार्यायामार्यादार्यो भवेद् गुणैः। जातोऽप्यनार्यादार्यायामनार्य इति निश्चयः ।। 66 ॥
आर्य द्वारा अनार्य स्त्री के गर्भ से उत्पन्न बालक आर्य गुणों से युक्त हो सकता है व होता है जबकि अनार्य द्वारा आर्य स्त्री के गर्भ से जन्मा बालक गुण-युक्त नहीं हो सकता-यह निश्चित है।
तावुभावप्यसंस्कार्याविति धर्मो व्यवस्थितः ।
वैगुण्याज्जन्मनः पूर्व उत्तरः प्रतिलोमतः ।। 67 1
धर्म मर्यादा के अनुसार ये दोनों ही उपनयन के अयोग्य हैं, क्योंकि एक जाति से हीन है तथा दूसरा प्रतिलोम द्वारा जन्मा है।
सुबीजं चैव सुक्षेत्रे जातं सम्पद्यते यथा।
तथार्याज्जात आर्यायां सर्वसंस्कारमर्हति ।। 68 ।।
आर्य द्वारा आर्य स्त्री के गर्भ से जन्मा बालक उपनयनादि संस्कार के योग्य होता है जिस प्रकार अच्छे क्षेत्र में अच्छे बीज का संवर्द्धन (फलना-फूलना) अपेक्षित ही होता है।
बीजमेके प्रशंसन्ति क्षेत्रमन्येमनीषिणः ।
बीजक्षेत्रे तथैवान्ये तत्रेयं तु व्यवस्थितिः ॥ 69 ।।
कुछ विद्वज्जन बीज को, कुछ क्षेत्र को और अन्य दोनों अर्थात् बीज व क्षेत्र को श्रेष्ठ मानते हैं। वास्तविकता यह है-
अक्षेत्रे बीजमुत्सृष्टमन्तरेव विनश्यति ।
अबीजकमपिक्षेत्रं केवलं स्थण्डिलं भवेत् ॥ 70 ॥
यस्माद्द्बीजप्रभावेण तिर्यग्जा ऋषयोऽभवन्।
पूजिताश्च प्रशस्ताश्च तस्माद्बीजं प्रशस्यते ।। 71 ।।
जो बीज ऊसर क्षेत्र में डाला गया हो वह धरती के नीचे ही नष्ट हो जाता है और यदि बीज घटिया हो तो उपजाऊ क्षेत्र भी व्यर्थ हो जाता है। इस तरह क्षेत्र व बौज दोनों का समान महत्व है। फिर भी बीज के प्रभाव से पक्षी योनि में उत्पन्न प्राणी (ऋष्य ऋग ऋषि) पूजनीय व सम्मानीय ऋषि बने- इससे बीज की श्रेष्ठता सिद्ध होती है।
अनार्यमार्यकर्माणमार्य चानार्यकर्मिणम्।
सम्प्रधार्याब्रवीद्धाता न समौ नाऽसमाविति ॥ 72 ॥
श्रेष्ठ कर्म करने वाले अनार्य व नीच कर्म करने वाले आर्य को न तो समान कह सकते हैं न ही असमान - ब्रह्मा जी का यही मत है।
ब्राह्मणाः ब्रह्मयोनिस्थाः ये स्वकर्मण्यवस्थिताः ।
ते सम्यगुपजीवेयुः षट्कर्माणि यथाक्रमम् ॥ 73 ॥
जो ब्राह्मण; ब्राह्मण द्वारा ब्राह्मण स्त्री के गर्भ से जन्मा हो तथा अपने लिए निश्चित कर्मों में उद्यत हो उसे आगे कहे गए छः कर्मों को विधिपूर्वक करना चाहिए।
अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा।
दानं प्रतिग्रहश्चैव षट् कर्माण्यग्रजन्मनः ।। 74 ॥
वेद विद्याध्ययन व वेद पढ़ाना, यज्ञ करना तथा कराना और दान लेना व देना-ये ब्राह्मण के छः कर्तव्य कर्म हैं।
षण्णां तु कर्मणामस्य त्रीणि कर्माणि जीविका।
याजनाध्यापने चैव विशुद्धाच्च प्रतिग्रहः ॥ 75 ।।
इन छः में से पढ़ाना, यज्ञ कराना और शुद्ध व्यक्तियों से दान लेना- इन तीन कर्मों से ब्राह्मण की आजीविका चलती है।
त्रयो धर्मा निवर्तन्ते ब्राह्मणात्क्षत्रियं प्रति ।
अध्यापनं याजनं च तृतीयश्च प्रतिग्रहः ।। 76 ।।
जो छः धर्म ब्राह्मण के लिए बताए गए हैं उनमें से तीन-वेद पढ़ना, यज्ञ करना व दान देना-कर्म क्षत्रिय के लिए छोड़े गए हैं।
वैश्यं प्रति तथैवैते निवर्तेरन्निति स्थितिः ।
न तौ प्रति हि तान् धर्मान् मनुराह प्रजापतिः ।। 77 ।।
प्रजापति मनु का मत है कि वैश्य के भी यही तीन कर्म हैं- पढ़ना, यज्ञ करना व दान देना।
शस्त्रास्त्रभृत्त्वं क्षत्रस्य वणिक्पशुकृषिर्विशः ।
आजीवनार्थं धर्मस्तु दानमध्ययनं यजिः ॥ 78 ॥
जिस प्रकार क्षत्रिय के लिए जीविकोपार्जन के कर्म हैं-शस्त्र-अस्त्र धारण करना और वैश्यों के लिए पशुपालन व कृषि करना, उसी प्रकार दान देना, वेद पढ़ना व यज्ञ करना इन दोनों वर्णों का धर्म माना जाता है।
वेदाभ्यासो ब्राह्मणस्य क्षत्रियस्य च रक्षणम्।
वार्ताकर्मैव वैश्यस्य विशिष्टानि स्वकर्मसु ॥ 79 ।।
इन तीनों वर्षों के विविध कर्मों में क्रमशः ब्राह्मण का वेदाभ्यास, क्षत्रिय का रक्षा करना व वैश्य का व्यापार करना - विशिष्ट कर्म हैं।
अजीवंस्तु यथोक्तेन ब्राह्मणः स्वेन कर्मणा।
जीवेत् क्षत्रियधर्मेण सह्यस्य प्रयत्नतः ।। 80 ।।
उभाभ्यामप्यजीवंस्तु कथं स्यादिति यद् भवेत्।
कृषि गोरक्षमास्थाय जीवेद् वैश्यस्य जीविकाम् ॥ 81 ॥
यदि अपने यथोक्त कर्म- अध्यापन, याजन तथा प्रतिग्रह द्वारा ब्राह्मण अपनी जीविका नहीं चला पाता तो उसे आपातकालीन धर्म के अनुसार क्षत्रिय धर्म से जीविकोपार्जन करना चाहिए। यदि वह ब्राह्मण कर्म व क्षत्रिय कर्म से भी जीविका न चला पाए तो वैश्य के कृषि व पशुपालन कर्म का पालन करे।
वैश्यवृत्त्यापि जीवंस्तु ब्राह्मणः क्षत्रियोऽपि वा।
हिंसाप्रायां पराधीनां कृषिं यत्नेन वर्जयेत् ॥ 82 ।।
आपातकाल में भी ब्राह्मण व क्षत्रिय द्वारा वैश्य कर्म को अपनाने पर उनके लिए हिंसा व दूसरे के अधीन कृषि वर्जित है।
कृषिः साध्विति मन्यन्ते सा वृत्तिः सद्भिर्विगर्हिता।
भूमिं भूमिशयांश्चैव हन्ति काष्ठमयो मुखम् ॥ 8३ ॥
कुछ लोग कृषि को अच्छा व्यवसाय मानते हैं किन्तु सज्जन इसे दोषपूर्ण व निन्दित समझते हैं क्योंकि लकड़ी के हत्थे वाले लोहे के यंत्रों से धरती व धरती के भीतर रहने वाले जीवों की हत्या हो जाती है।
इदं तु वृत्तिवैकल्यात्त्यजतो धर्मनैपुणम्।
विट् पण्यमुद्धृतोद्धारं विक्रेयं वित्तवर्धनम् ॥ 84 ।।
यदि ब्राह्मण व क्षत्रिय अपने निर्धारित कर्मों से जीविका न चला पाएं तो वे कुछ द्रव्यों को छोडकर धन वृद्धि करने वाले व्यापार कर सकते हैं।
सर्वान् रसानपोहेत कृतान्नं च तिलैः सह।
अश्मनो लवणं चैव पशवो ये च मानुषाः ॥ 85 ॥।
वणिक कर्म करते हुए ब्राह्मण व क्षत्रिय को आपातकाल में सम्पूर्ण रसों, पके अन्न, तिल, सेंधा नमक तथा पालतू पशुओं का व्यापार नहीं करना चाहिए।
सर्वं च तान्तवं रक्तं शाणक्षौमाविकानि च।
अपि चेत् स्युररक्तानि फलमूले तथौषधिः ॥ 86 ।।
अपः शस्त्रं विषं मांसं सोमं गन्धांश्च सर्वशः ।
क्षीरं क्षौद्रं दधि घृतं तैलं मधु गुडं कुशान् ॥ 87 ॥
अरण्यांश्च पशून् सर्वान् दष्ट्रिणश्च वयांसि च ।
मद्यं नीलिं च लाक्षां च सर्वांश्चैकशफांस्तथा ।। 88 ॥
ऐसी परिस्थिति में ब्राह्मण व क्षत्रिय सभी रंगों के तथा सन के वस्त्र, रंगे या बिना रंग के ऊनी वस्त्र, फल, कन्दमूल, औषधियां, जल, शस्त्र, विष, मांस, सोमलता, सब तरह के इत्र, दूध, शहद, दही, घी, तेल, गुड़ व कुशाओं को न बेचें।
काममुत्पाद्य कृष्यां तु स्वयमेव कृषीवलः ।
विक्रीणीत् तिलान्शूद्रान् धर्मार्थं चिरस्थितान् ।। 89 ।।
किसान या वैश्य द्वारा कृषि से उत्पादित व बहुत दिनों से शुद्ध पड़े तिल को किसी धार्मिक कार्य की पूर्ति के लिए चाहे, तो शूद्र को बेच देना चाहिए।
भोजनाभ्यञ्जनाद्दानाद् यदन्यत्कुरुते तिलैः ।
कृमिभूतः श्वविष्ठायां पितृभिः सह मज्जति ॥ 90 ।।
जो व्यक्ति तिलों को भोजन, अभ्यंजन व दान के अतिरिक्त किसी अन्य कार्य के लिए बेचता है वह स्वयं तो कुत्ते की विष्ठा का कीड़ा बनता ही है, अपने पितरों को भी अपने साथ पतित कर देता है।
सद्यः पतति मांसेन लाक्षया लवणेन च।
त्र्यहेण शूद्रो भवति ब्राह्मणः क्षीरविक्रयात् ॥ 91 ॥
वह ब्राह्मण तरत भ्रष्ट हो जाता है जो मांस, लाख और नमक का व्यापार करे। दूध बेचने वाला ब्राह्मण तो तीन दिन में ही शूद्र तुल्य हो जाता है।
इतरेषां तु पण्यानां विक्रयादिह कामतः ।
ब्राह्मणः सप्तरात्रेण वैश्यभावं नियच्छति ।। 92 ।।
इन पदार्थों के अतिरिक्त अन्य पदार्थों की स्वेच्छा से खरीद-बेच करने वाला ब्राह्मण सात दिनों में वैश्य हो जाता है।
रसाः रसैर्निर्मातव्याः न त्वेव लवणं रसैः।
कृतान्नं चाकृतान्नेन तिलधान्येन तत्समाः ।॥ 93 ।।
तरल पदार्थों-तेल, घी आदि को रसमय पदार्थों-गुड़ दुग्धादि से विनिमय कर लेना चाहिए, किन्तु नमक का रसों से विनिमय न करना चाहिए। पके अन्न का कच्चे अन्न से तथा तिल का धान्य से विनिमय हो सकता है।
जीवेदेतेन राजन्यः सर्वेणाप्यनयं गतः।
न त्वेव जायसीं वृत्तिमभिमन्येत कर्हिचित् ॥ 94 ।।
क्षत्रिय संकट की स्थिति में वैश्य वृत्ति को तो अपना सकता है किंतु वह किसी भी आपत्तिवश अपने से ऊंचे वर्ण के ब्राह्मण के कर्म को न अपनाए।
यो लोभादधमो जात्या जीवेदुत्कृष्टकर्मभिः ।
तं राजा निर्धनं कृत्वा क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ॥ 95 ।।
यदि कोई निकृष्ट जाति का व्यक्ति लोभवश उच्च जाति के कर्म को अपना ले तो राजा को उसका सब कुछ छीन कर उसे देश से निर्वासित कर देना चाहिए।
वरं स्वधर्मे विगुणो न पारक्यः स्वनुष्ठितः ।
परधर्मेण जीवन्हि सद्यः पतति जातितः ॥ 96 ॥
स्वधर्म चाहे कितना ही तुच्छ व निस्सार क्यों न हो वह श्रेष्ठ व आचरण योग्य होता है। दूसरे के धर्म को अपनाना अनुचित है। ऐसा करने वाला अपनी जाति से भी भ्रष्ट हो जाता है।
वैश्योऽजीवन् स्वधर्मेण शूद्रवृत्त्यापि वर्त्तयेत् ।
अनाचरन्न कार्याणि निवर्तेत न शक्तिमान् ॥ 97 ।।
वह वैश्य जो अपने निर्धारित कर्म से जीविकोपार्जन नहीं कर पाता, भले ही शूद्र के कर्म को अपना ले लेकिन उसे अपने से उच्च वर्ण की वृत्ति को न करने का यथासम्भव प्रयास करना चाहिए।
अशक्नुवन् तु शुश्रूषां शूद्रङ कर्तुं द्विजन्मनाम् ।
पुत्रदारात्ययं प्राप्तो जीवेत् कारुककर्मभिः ॥ 98 ।।
वह शूद्र जो द्विजातीय की सेवा से अपने पुत्र व पत्नी का भरण-पोषण न कर पाए उसे कारुक (लकड़ी की मूर्तियां बनाने का) कर्म से जीविकोपार्जन करना चाहिए।
यैः कर्मभिः प्रचारितैः शुश्रूष्यन्ते द्विजातयः।
तानि कारुककर्माणि शिल्पानि विविधानि च ।। ११ ।।
उन विविध प्रकार के शिल्प को कारुक कर्म कहा जाता है, जिनके प्रचार से दिजातियों का उपकार होता है।
वैश्यवृत्तिमनातिष्ठन्ब्राह्मणः स्वेपथि स्थितः ।
अवृत्तिकर्षितः सीदन्निमं धर्म समाचरेत् ॥ 100 ।।
जो ब्राह्मण जीविका के संकट को सहते हुए स्वधर्म पर दृढ़ रहे तथा वैश्य वृत्ति को न अपनाए-उसे पात्र-कुपात्र सभी से दान ले लेना चाहिए क्योंकि पवित्र कभी कलुषित नहीं होता। यह धर्म का विधान है।
नाध्यापनाद्याजनाद्वा गर्हिताद्वाप्रतिग्रहात् ।
दोषो भवति विप्राणां ज्वलनाम्बुसमा हि ते ।। 101 ॥
संकट की स्थिति में ब्राह्मण द्वारा निन्दित व्यक्ति को पढ़ाने, उसका यज्ञ कराने व उससे दान लेने में उसे दोष नहीं लगता क्योंकि ब्राह्मण तो अग्नि व जल की भांति सदैव पवित्र होते हैं।
अजीगर्तः सुतं हन्तुमुपासर्पबुभुक्षितः ।
न चालिप्यत पापेन क्षुत्प्रतीकारमाचरन् ॥ 102 II
अजीगर्त नाम के ऋषि ने भूख से त्रस्त होने पर अपने पुत्र को मारकर खाने का निश्चय किया था किंतु वे भूख का यह उपचार करने पर भी पाप ग्रस्त न हुए।
श्वमांसमिच्छन्नार्तो तु धमोऽधर्मविचक्षणः ।
प्राणानां परिरक्षार्थ वामदेवो न लिप्तवान् ॥ 103 ।।
विपत्ति में फंसे तथा धर्म-अधर्म के विवेक में समर्थ महर्षि वामदेव ने प्राणों की रक्षा के लिए कुत्ते का मांस खाने का निश्चय किया किन्तु वे भी किसी पाप के भागी न हुए।
भरद्वाजः क्षुधार्त्तस्तु सुपुत्रो विजने वने ।
बहीर्गाः प्रतिजग्राह वृधोस्तक्ष्णोः महातपाः ।। 104 ॥
निर्जन वन में अपने पुत्र के साथ भूख से अत्यंत पीड़ित होने पर महातपी महर्षि भारद्वाज ने वृधु नामक तरखान की अनेक गायों का भक्षण किया। उन्हें भी इसका कोई दोष न लगा।
क्षुधार्त्तश्चात्तुमभ्यागाद्विश्वामित्रः श्वजाघनीम्।
चण्डालहस्तादादाय धर्माधर्मविचक्षणः ।। 105 ।।
महर्षि विश्वामित्र, जो धर्म-अधर्म के विवेक में विलक्षण थे, भूख से पीड़ित होने पर चाण्डाल के हाथ से कुत्ते की जांघ का मांस खाने को तैयार हो गए थे। वे भी पाप से कलंकित न हुए।
प्रतिग्रहाद्याजनाद्वा तथैवाध्यापनादपि ।
प्रतिग्रहः प्रत्यवरः प्रेत्य विप्रस्य गर्हितः ।। 106 ॥
कुपात्र को पढ़ाना, उससे यज्ञ कराना तथा उससे दान लेना- इनमें से दान लेना सबसे निकृष्ट कार्य है तथा परलोक को बिगाड़ता है। इसलिए पतित व्यक्ति के दान से ब्राह्मण को बचना चाहिए। अध्यापन व याजन से प्राप्त धन से ही जीविका अर्जित कर लेनी चाहिए।
याजनाध्यापने नित्यं क्रियते संस्कृतात्मनाम् ।
प्रतिग्रहस्तु क्रियते शूद्रादप्यन्त्यजन्मनः ।। 107 ।।
अध्यापन व याजन तो संस्कारी व्यक्ति को ही कराया जाता है। पतित होने पर भी ऐसे व्यक्ति द्विज तो होते ही हैं किंतु दान अंत्यज शूद्र से भी ग्रहण किया जा सकता है-अतः ऐसा दान लेने से यथासम्भव बचना चाहिए।
जपहोमैरपेत्येनो याजनाध्यापनैः कृतम् ।
प्रतिग्रहनिमित्तं तु त्यागेन तपसैव च ।। 108 ।।
पतित व्यक्ति को पढ़ाने व याजन कराने से लगने वाले पाप का परिहार ब्राह्मण को जप व होम से करना चाहिए तथा दान लेने से लगे पाप का प्रायश्चित त्याग व तप से होना चाहिए।
शिलोञ्छमप्याददीत विप्रोऽजीवन्यतस्ततः ।
प्रेतिग्रहाच्छलः श्रेयांस्ततोऽप्युञ्छः प्रशस्यते ॥ 109 ॥
सवृत्ति से जीविकोपार्जन न कर पाने की स्थिति में ब्राह्मण को चाहिए कि कुपात्र को पढ़ाने व याजन कराने की अपेक्षा शिलोञ्छ का आश्रय ले। शिल (खेत में बिखरे अन्न को चुनना) कुपात्र के दान से श्रेष्ठ होता है तथा उंछ (खेत से घर ले जाते हुए मार्ग में जा बिखरे अन्न को चुनना) शिल की तुलना में उत्तम होता है।
सीदभिः कुप्यमिच्छद्भिर्धनं वा पृथिवीपतिः ।
याच्यः स्यात्स्नातकैर्विप्रैर दित्सस्त्यागमर्हति ।। 110 ॥
जो स्नातक ब्राह्मण धन-धान्य के अभाव से ग्रस्त हों तथा परिवार के पोषण की चिंता से व्याकुल हों, उन्हें राजा से निवेदन करनी चाहिए। वह राजा सर्वथा त्याज्य है जो स्नातक ब्राह्मणों को निराश करे।
अकृतं वा कृतात् क्षेत्राद् गौरजाविकमेव च।
हिरण्यं धान्यमन्नं च पूर्व पूर्वमदोषवत् ।। 111 ॥
अकृत खेत से कृत खेत, गाय, बकरी, भेड़, सोना, धान्य व अन्न में से पूर्व-पूर्व में अपेक्षाकृत कम दोष होता है। अज से धान्य, धान्य से स्वर्ण में, स्वर्ण की अपेक्षा भेड़, बकरी, गाय तथा अकृत खेत से कृत खेत को ग्रहण करने में कम दोष लगता है।
सप्तवित्तागमा धर्माः दायो लाभः क्रयो जपः ।
प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च ॥ 112 ॥
इन सात प्रकार के धनों की प्राप्ति धर्म व शास्त्र के अनुकूल होती है-1. उत्तराधिकार से प्राप्त धन 2. भूमि आदि में पूर्वजों के गड़े हुए धन की प्राप्ति 3. सस्ती वस्तु के क्रय से हुआ धन लाभ 4. युद्ध में विजय से प्राप्त धन 5. ब्याज व कृषि से मिला हुआ धन 6. नौकरी आदि से वेतन के रूप में मिला धन तथा 7. सज्जन व्यक्ति से मिला हुआ दान।
विद्या शिल्पं भृतिः सेवा गोरक्षं विपणिः कृषिः ।
धृतिभैक्ष्यं कुसीदं च दश जीवनहेतवः ॥ 113 ।।
विद्याध्ययन, शिल्प, नौकरी, चाकरी, पशुपालन, व्यापार, कृषि, संतोष (सम्पत्ति -से होने वाली आय से ही संतुष्ट हो जाना) भीख मांगना तथा ब्याज लेना-= जीविकोपार्जन के ये दस साधन माने गए हैं।
ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि वृद्धिं नैव प्रयोजयेत् ।
कामं तु खलु धर्मार्थं दद्यात्पापीयसेऽल्पिकाम् ।। 114 ।।
व्याज से धन कमाने के बारे में ब्राह्मण व क्षत्रिय को सोचना भी न चाहिए। किंतु विपत्ति के समय धर्मकार्य को करने के लिए किसी निकृष्ट व्यक्ति को थोडा सा धन देकर उससे थोडा सा ब्याज अवश्य लिया जा सकता है।
चतुर्थमाददानोऽपि क्षत्रियो भागमापदि ।
प्रजां रक्षन्परंशक्त्या किल्विषात्परिमुच्यते ।। 115 ।।
जो राजा आपत्ति काल में नीच को दिए गए धन का चौथा भाग व्याज के रूप में प्राप्त करता है वह पूरी सामर्थ्य से प्रजा की रक्षा करने में तत्पर होकर इस दोष से मुक्ति पा लेता है।
स्वधर्मो विजयस्तस्य नाहवे स्यात् पराङ्मुखः ।
शस्त्रेण वैश्यान् रक्षित्वा धर्म्यमाहरेद्बलिम् ।। 116 ।।
राजा का धर्म है कि वह युद्ध में विजय प्राप्त करे। पीठ दिखा कर पलायन करना उसके लिए सर्वथा अनुचित है। शास्त्र के अनुसार वही राजा प्रजा से कर लेने का अधिकारी है जो प्रजा की रक्षा करता है।
धान्येऽष्टमं विशां शुल्कं विशं कार्षापणावरम् ।
कर्मोपकरणाः शूद्राः कारवः शिल्पिनस्तथा ॥ 117 ॥
संकट काल में राजा को वैश्यों से धान्य के लाभ का आठवां भाग, स्वर्णादि के लाभ का बीसवां भाग कर के रूप में वसूलना चाहिए। किन्तु शूद्र, शिल्पकारों व बढ़ई आदि से कोई कर नहीं लेना चाहिए क्योंकि वे तो अपना ही निर्वाह कठिनाई से कर पाते हैं।
शूद्रस्तु वृत्तिमाकांक्षन् क्षत्रमाराधयेद्यदि ।
धनिनं वाप्युपाराध्यः वैश्यं शूद्रो जिजीविषेत् ।। 118 ।।
जो शूद्र जीविकोपार्जन करना चाहता है उसे क्षत्रिय की सेवा करनी चाहिए अथवा वह किसी धनिक वैश्य की सेवा में नियुक्त हो जाए।
स्वर्गार्थमुभयार्थं वा विप्रानाराधयेत्तु सः ।
जात ब्राह्मणशब्दस्य सा ह्यस्य कृतकृत्यता ।। 119 ।।
वह शूद्र जो जीवन में जीविकोपार्जन की तथा मृत्यु उपरांत स्वर्ग लाभ की इच्छा करता है, उसे ब्राह्मण की सेवा करनी चाहिए। ब्राह्मण का सेवक बन शूद्र का जीवन सार्थक हो जाता है।
विप्रसेवैव शूद्रस्य विशिष्टं कर्म कीर्त्यते।
यदतोऽन्यद्धि कुरुते तद्भवत्यस्य निष्फलम् ।। 120 11
शूद्र के सभी कर्मों में ब्राह्मण की सेवा ही अति विशिष्ट कर्म है। इसके अतिरिक्त वह जो भी करता है, वह सब निष्फल अर्थात् व्यर्थ ही होता है।
प्रकल्प्या तस्य तैर्वृत्तिः स्वकुटुम्बाद् यथार्हतः ।
शक्तिं चावेक्ष्य दायं च भृत्यानां च परिग्रहम् ॥ 121 ||
शूद्र को परिचारक नियुक्त करते समय द्विजों को उसकी कार्यक्षमता, कार्य रुचि, विश्वसनीयता, उसके परिवार, अपने घर की स्थिति तथा कार्य का स्वरूप देखकर ही उसका वेतन निश्चित करना चाहिए।
उच्छिष्टमन्नं दातव्यं जीर्णानि वसनानि च।
पुलाकाश्चैव धान्यानां जीर्णाश्चैव परिच्छदाः ।। 122 ॥
भोजन के पश्चात् शेष अन्न, पुराने वस्त्र, धान्य की छूटन तथा पुराने बर्तन -ये सब शूद्र सेवक को दे देने चाहिए।
न शूद्रे पातकं किञ्चिन्न च संस्कारमर्हति।
नास्याधिकारो धर्मेऽस्ति न धर्मात्प्रतिषेधनम् ।। 123 ।।
जो शूद्र द्विजों के घर सेवा में नियुक्त होता है उसे कोई पाप नहीं लगता न ही उसके लिए किसी प्रकार की शुद्धि का कोई नियम है। द्विजों के धर्मकार्य में शामिल होने का उसे कोई अधिकार नहीं। इसीलिए उसके विषय में निषेध का कोई नियम नहीं है।
धर्मेप्सवस्तु धर्मज्ञाः सतां वृत्तिमनुष्ठिताः ।
मन्त्रवर्जाः न दुष्यन्ति प्रशंसां प्राप्नुवन्ति च ।। 124।
वे शूद्र जो धर्मकार्यों में रुचि रखते हैं तथा धर्म के तत्व को जानते हैं- मंत्रों में निषिद्ध कार्यों को करते हुए भी पापग्रस्त न होकर प्रशंसा पाते हैं।
यथा-यथा हि सवृत्तमात्तिष्ठन्त्यनसूयकः ।
तथा तथेमं चामुं च लोकं प्राप्नोत्यनिन्दितः ।। 125 ।।
जैसे-जैसे शूद्र सदृत्ति का पालन करते हुए द्विजातियों के प्रति ईर्ष्या-द्वेष त्यागकर शास्त्रोक्त विधान को ईश्वरीय विधान मानकर सहज रूप से स्वीकारता चलता है-वैसे-वैसे उसे इस लोक तथा परलोक में उच्चता प्राप्त होने लगती है।
शक्तेनापि हि शूद्रेण न कार्योधनसञ्चयः ।
शूद्रो हि धनमासाद्य ब्राह्मणानेव बाधते ।। 126 ।।
शूद्र यदि समर्थ है तो भी उसे धन संचय नहीं करना चाहिए क्योंकि धनवान बनने के बाद शूद्र ब्राह्मण को पीड़ित करने लगता है। परिणामस्वरूप और भी अधिक पतित हो जाता है।
एते चतुर्णां वर्णानामापद्धर्माः प्रकीर्तिताः ।
यान् सम्यगनुतिष्ठन्तो व्रजन्ति परमां गतिम् ।। 127 ।।
भृगु जी ने कहा-विप्रो ! मैंने आप लोगों को चारों वर्णों के आपातकालीन धर्म के विषय में बतलाया। इनका पालन करने से वे मोक्ष के अधिकारी बन जाते हैं।
एष धर्मविधिः कृत्स्नश्चातुर्वर्ण्यस्य कीर्तितः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रायश्चित्तविधिं शुभम् ॥ 128 ॥
जो मैंने अभी आपको बतलाई वही चारों वर्णों की सम्पूर्ण धर्म विधि है। अब मैं आपको इन धर्मों के अनुष्ठान में आए दोषों के प्रायश्चित के नियम बताऊंगा। एकचित्त होकर सुनें।
॥ मनुस्मृति दशम अध्याय सम्पूर्ण ।।
Manusmriti Chapter 9
kathaShrijirasik
।।मनुस्मृति नवम अध्याय।।
पुरुषस्य स्त्रियाश्चैव धर्मेवर्त्मनि तिष्ठतोः ।
संयोगे विप्रयोगे च धर्मान्वक्ष्यामि शाश्व तान् ॥ 1 ॥
भृगु जी ने कहा, विप्रो, मैं अब आपको धर्म का पालन करने वाले स्त्रियों व पुरुषों के साथ-साथ एवं अलग-अलग रहने के सनातन धर्मों के विषय में बतलाता हूं। एकाग्रचित्त होकर सुनें।
अस्वतन्त्राः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशम् ।
विषयेषु च सज्जन्त्यः संस्थाप्याः आत्मनोवशे ।। 2 ।।
जो स्त्रियां विषयों में आसक्त रहती हैं, उनके पतियों द्वारा उन्हें सदैव अपने नियन्त्रण में रखना चाहिए।
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्राः न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ ३ ॥
बाल्यावस्था में स्त्री की रक्षा पिता करता है, यौवनावस्था में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है। वह सदा (किसी न किसी के) अधीन रहती है क्योंकि वह स्वतंत्रता के योग्य नहीं।
कालेऽदाता पितावाच्यो वाच्यश्चानुपयन्यतिः ।
मृते भर्तरि पुत्रस्तु वाच्यो मातुररक्षिता ॥ 4 ॥
वह पिता जो उचित समय आने पर कन्या का विवाह नहीं करता, वह पति जो ऋतुकाल में अपनी पत्नी से सहवास नहीं करता तथा वह पुत्र जो पिता की मृत्यु के पश्चात् मां का भरण-पोषण नहीं करता ये सब निश्चित रूप से निन्दा योग्य हैं।
सूक्ष्मेभ्योऽपि प्रसङ्गेभ्यः स्त्रियोरक्ष्या विशेषतः ।
द्वयोर्हि कुलयोः शोकमावहेयुररक्षिताः ॥ 5 ॥
स्त्रियों को बिगडने के छोटे से मौके से भी यत्न एवं कठोरतापूर्वक बचाना चाहिए क्योंकि न बचाने से पतित स्त्रियां पिता व पति दोनों के कुल पर कलंक तुल्य होती हैं।
इमं हि सर्ववर्णानां पश्यन्तो धर्ममुत्तमम् ।
यतन्ते रक्षितुं भार्यां भर्तारो दुर्बला अपि ॥ 6 ॥
स्त्री पर नियंत्रण रखना सभी वर्षों में उत्तम धर्म के रूप में देखा जाता है। अतः दुर्बल पतियों का भी कर्तव्य है कि वे अपनी पत्नी को वश में रखने का भरसक प्रयत्न करें।
स्वां प्रसूतिं चरित्रं च कुलमात्मानमेव च।
स्वं च धर्म प्रयत्नेन जायां रक्षन् हि रक्षति ॥ 7 ॥
जो पुरुष यत्नपूर्वक अपनी स्त्री की रक्षा करता है वही अपनी संतान, चरित्र, कुल, स्वयं अपनी तथा अपने धर्म की रक्षा करने में समर्थ हो पाता है।
पतिभार्या सम्प्रविश्य गर्भोभूत्वेह जायते।
जायायास्तद्धि जायात्वं यदस्यां जायते पुनः ॥ ४ ॥
पत्नी के गर्भ में प्रविष्ट होकर पति ही समय आने पर इस संसार में जन्म लेता है। पुनः जनने के कारण ही पत्नी को 'जाया' की संज्ञा दी जाती है।
यादृशं भजते हि स्त्री सुतं सूते तथाविधम् । तस्मात्प्रजाविशुद्धयर्थं स्त्रियं रक्षेत्प्रयत्नतः ॥ १॥
जिस प्रकार के पुरुष से स्त्री सहवास करती है, उसी तरह के (उत्तम, मध्यम अथवा अधम) पुत्र को जन्म देती है। अतः स्त्री की रक्षा व उत्तम संतानोत्पत्ति के लिए पति को सदैव प्रयत्नरत रहना चाहिए।
न कश्चिद्योषितः शक्तः प्रसह्य परिरक्षितुम् ।
एतैरुपाययोगैस्तु शक्यास्ताः परिरक्षितुम् ॥ 10 ॥
बल व शक्ति से अथवा जबरदस्ती कोई भी पुरुष स्त्रियों की दुराचरण से रक्षा नहीं कर सकता। केवल समझाने-बुझाने तथा आगे बताए गए उपायों का पालन करने से ही ऐसा संभव हो सकता है।
अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये चैव नियोजयेत् ।
शौचे धर्मेऽन्नपक्त्यां च पारिणाह्यस्य योजने ॥ 11 ॥
धन को जमा एवं खर्च करना, घर की स्वच्छता, भोजन बनाना तथा घर की सभी वस्तुओं की देखरेख का काम स्त्रियों के सुपुर्द कर देना चाहिए। इस प्रकार स्त्रियां घर से बाहर भ्रमण नहीं कर पातीं।
अरक्षिता गृहे रुद्धाः पुरुषैराप्तकारिभिः ।
आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः ।। 12 ।।
जो स्त्रियां सच्चरित्र के संरक्षण में घर में ही रहती हैं वे भी सुरक्षित रहती हैं। वही स्त्रियां सर्वाधिक सुरक्षित हैं जो स्वयं अपनी रक्षा करती हैं।
पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम्।
स्वप्नोऽन्यगेहेवासश्च नारीणां दूषणानि षट् ॥ 13 ॥
मदिरापान, दुष्ट पुरुष का संसर्ग, पति से अलग वास, व्यर्थ इधर-उधर भ्रमण करना, असमय एवं देर तक सोते रहना व दूसरे के घर में रहना- ये छः दोष स्त्रियों को दूषित कर देते हैं।
नैता रूपं परीक्षन्ते नासां वयसि संस्थितिः ।
सुरूपं वा विरूपं वा पुमानित्येव भुञ्जते ।। 14 ।।
ऐसा करने वाली स्त्रियां पुरुष के रूप अथवा आयु का कोई विचार नहीं करतीं। इन्हें तो केवल पुरुष के पुरुष होने से ही मतलब है और वे किसी भी पुरुष के समक्ष संसर्ग के लिए उपस्थित हो जाती हैं।
पाँश्चल्याच्चलचित्ताच्च नस्नेह्याच्च स्वभावतः ।
रक्षिता यत्नतोऽपीह भर्तृष्वेता विकुर्वते ।। 15 ॥
स्त्रियां चूंकि स्वभाव से ही पर पुरुषों पर रीझने वाली, चंचल व अस्थिर अनुराग वाली होती हैं अतः यत्नपूर्वक रक्षित होने पर भी वे पति को धोखा दे देती हैं।
एवं स्वभावं ज्ञात्वाऽऽसां प्रजापतिनिसर्गजम् ।
परमं यत्नमातिष्ठेत्पुरुषो रक्षणं प्रति ॥ 16 ।।
जब से ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की तब से लेकर आज तक स्त्रियों के स्वभाव को ऐसा ही जानकार पुरुषों का कर्तव्य है कि वे स्त्रियों की रक्षा के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहें।
शय्यासनमलङ्कारः कामं क्रोधमनार्जवम् ।
द्रोहभावं कुचर्या च स्त्रिभ्यो मनुरकल्पयत् ॥ 17 ।।
मनु महाराज के विचार में ब्रह्मा जी ने स्त्रियों में कुछ प्रवृत्तियां सहज ही पायी हैं जैसे-उत्तम शय्या व आभूषणों का मोह, काम, क्रोध, जटिल स्वभाव, ईर्ष्या, द्रोह भाव के कुचर्या।
नास्ति स्त्रीणां क्रियामन्त्रैरिति धर्मे व्यवस्थितिः ।
निरिन्द्रियाः ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमितिस्थितिः ।। 18 ॥
शास्त्र की यह मर्यादा है कि स्त्रियों के जातकर्म व नामकर्म संस्कारों में वेदमंत्रों का उच्चारण न हो। निरेन्द्रिय व अमंत्रा होने के कारण स्त्रियों की स्थिति ही असत्य रूप होती है।
तथा च श्रुतयो बह्वयो निगीता निगमेष्वपि।
स्वालक्षण्यपरीक्षार्थं तासां शृणुत निष्कृतीः ॥ 19 ॥
वेदों में स्त्रियों के सहज दुराचरण के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। उन दोषों से स्त्रियों को किस प्रकार पवित्र किया जाए- इस संदर्भ में कुछ बातें यहां वर्णित हैं।
यन्मे माता प्रलुलुभे विचरन्त्यऽपतिव्रता।
तन्मे रेतः पिता वृक्तामित्यस्यैतन्निदर्शनम् ।। 20 ॥
वेदों का एक प्रसंग है- मां के बुरे विचारों से खिन्न पुत्र कहता है- परपुरुष की आकांक्षा से अपवित्र हुई मेरी मां की योनि का मेरे पिता के वीर्य द्वारा शोधन होना चाहिए।
ध्यायत्यनिष्टं यत्किञ्चित्पाणिग्राहस्य चेतसा ।
तस्यैष व्यभिचारस्य निह्नवः सम्यगुच्यते ॥ 21 ॥
यदि विवाहिता स्त्री के हृदय में परपुरुष से सहवास की कामना उठती है तो वैचारिक व्यभिचार के पाप के शुद्धीकरण का मंत्र इस प्रकार है।
यादृग्गुणेनभर्चा स्त्री संयुज्येत यथाविधिः ।
तादृग्गुणा सा भवति समुद्रेणेव निम्नगाः ।। 22 ।।
स्त्रियां पति के अनुरूप ही समाज में अपनी प्रतिष्ठा बनाती हैं ठीक जिस प्रकार नदियां समुद्र में विलीन होकर समुद्र का ही रूप ले लेती हैं।
अक्षमाला वसिष्ठेन संयुक्ताऽधमयोनिजा ।
शारंगी मन्दपालेन जगामभ्यर्हणीयताम् ।। 23 ।।
नीच कुल में जन्मी अक्षमाला ने महर्षि वशिष्ठ से विवाह करके तथा सामान्य कुल की शारंगी ने मन्दपाल से विवाह कर समाज में अति प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त किया।
एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्टप्रसूतयः ।
उत्कर्षं योषिताः प्राप्ताः स्वैः स्वैः भर्तृगुणैः शुभैः ।। 24 ।।
अधम योनि में जन्म लेकर भी अपने पतियों के सदाचरण व कल्याणकारी गुणों से समाज में प्रतिष्ठा पाने वाली अनेक स्त्रियां हुई हैं।
एषोदिता लोकयात्रा नित्यंस्त्रीपुंसयोः शुभा।
प्रेत्येह च सुखोदर्कान्ग्रजा धर्मान्निबोधतः ।। 25 ।।
भृगु जी ने कहा- ब्राह्मणो! यह उपर्युक्त स्त्री-पुरुषों के नित्य लोक-व्यवहार का वर्णन था। अब मैं आपसे इस लोक एवं परलोक में सुख देने वाली संतान का धर्म कहता हूं।
प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हाः गृहदीप्तयः ।
स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन ।। 26 ।।
स्त्रियां चूंकि संतान को जन्म देती हैं अतः वे शुभ, पूजनीय व घर की आभा हैं। घर में स्त्री व लक्ष्मी के बीच कोई विशेष अंतर नहीं।
उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम्।
प्रत्यहं लोकयात्रायाः प्रत्यक्षं स्त्रीनिबन्धनम् ॥ 27 ॥
स्त्री ही संतान को जन्म देने, उसका पालन-पोषण करने, प्रतिदिन के लोक व्यवहार, वृद्धों की सेवा व अतिथि सत्कार तथा धर्मानुष्ठानादि इन सभी कार्यों का आधार स्तम्भ है।
अपत्यं धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तमा ।
दाराधीनस्तथा स्वर्गः पितृणामात्मनश्च हि ॥ 28 ।।
गृहस्थ जीवन के सभी कार्य अर्थात् संतानोत्पत्ति, धर्मकार्य, सेवा, उत्तम रति, पितरों का उद्धार व स्वर्ग के दिव्य सुखों की प्राप्ति- ये सब स्त्री के ही अधीन हैं अर्थात् स्त्री के माध्यम से ही संभव हैं।
पतिं वा नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता ।
सा भर्तृलोकमवाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते ।। 29 ।।
जो स्त्री अपने मन, वचन व शरीर को संयत रखती है तथा पति से इतर पुरुष की इच्छा भी नहीं करती वह स्त्री इस लोक में 'पतिव्रता' अर्थात् साध्वी कही जाती है तथा मृत्यु उपरांत पतिलोक को प्राप्त करती है।
व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोके प्राप्नोति निन्द्यताम् ।
शृगालयोनिं चाप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते ॥ ३० ॥
यदि विवाहित स्त्री परपुरुष का संग करती है तो वह इस लोक में निन्दित होती है, अनेक योनि सम्बन्धी रोगों से ग्रस्त हो जाती है तथा मृत्यु के बाद गीदड़ी के रूप में जन्म लेती है।
पुत्रं प्रत्युदितं सद्भिः पूर्वजैश्च महर्षिभिः ।
विश्वजन्यमिमं पुण्यमुपन्यासं निबोधत ॥ 31 ॥
भृगु जी ने कहा-विप्रो ! प्राचीन श्रेष्ठ मुनियों ने पुत्र के सम्बन्ध में जो शुभ, पवित्र व लोकहितकारी मत रखे हैं- अब आप उनको सुनें।
भर्तुः पुत्रं विजानन्ति श्रुतिद्वैधं तु भर्तरि ।
आहुरुत्पादकं केचिदपरे क्षेत्रिणं विदुः ।। 32 ।।
लोग जानते ही हैं कि पुत्र, पति का ही रूप होता है किंतु संतान को उत्पन्न करने वाला या स्त्री का स्वामी- इन दोनों में से किसकी संतान को मान्यता देनी चाहिए-इस विषय में मतभेद हो सकते हैं।
क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृतः पुमान् । क्षेत्रबीजसमायोगात्सम्भवः सर्वदेहिनाम् ॥ 33 ॥
स्त्री को क्षेत्ररूप तथा पुरुष को बीजरूप समझा जाता है। क्षेत्र व बीज के समायोग से ही सभी देहधारियों की उत्पत्ति संभव होती है।
विशिष्टं कुत्रचिबीजं स्त्रीयोनिस्त्वेव क्वचित्।
उभयं तु समं यत्र सा प्रसूतिः प्रशस्यते ।। 34 ।।
कुछ परिस्थितियों में बीज-विशिष्ट होता है तो कुछ में स्त्री का योनिरूप क्षेत्र। जहां दोनों की समान स्थिति हो वहीं श्रेष्ठ संतान का जन्म होता है।
बीजस्य चैव योन्याश्च बीजमुत्कृष्टमुच्यते ।
सर्वभूतप्रसूतिर्हि बीजलक्षणलक्षिता ।। 35 ।।
बीज व क्षेत्र में बीज को ही श्रेष्ठ कहा गया है क्योंकि सभी जीवों के जन्म को बीज के लक्षणों के अनुरूप ही देखा जाता है।
यादृशं तूप्यते बीजं क्षेत्रे कालोपपादिते।
तादृग्रोहति तत्तस्मिन्बीजं स्वैर्व्यञ्जितैर्गुणैः ॥ 36 ॥
जिस प्रकार का बीज उचित ऋतु में क्षेत्र में रोपा जाता है उसी प्रकार के गुणों से युक्त होकर ही वह क्षेत्र में जन्म लेता है।
इयं भूमिर्हि भूतानां शाश्वती योनिरुच्यते ।
न च योनिगुणान् कांश्चिद्बीजं पुश्यति पुष्टिषु ।। 37 ॥
इस धरती को प्राणियों की उत्पत्ति करने वाली सनातन योनि माना गया है। बीज योनि के गुणों को संवर्द्धित नहीं करता बल्कि अपने ही गुणों को प्रकाशित करता है।
भूमावप्येककेदारे कालोप्तानि कृषीबलैः ।
नानारूपाणि जायन्ते बीजानीह स्वभावतः ।। 38 ॥
जिस प्रकार किसान एक ही खेत में समयानुसार भिन्न-भिन्न बीज रोपते हैं तथा उन्हीं बीजों के अनुरूप फसल प्राप्त करते हैं- यह इस बात की पुष्टि करता है कि फसल में क्षेत्र के नहीं बीज के गुण आते हैं।
ब्रीहयः शालयोमुद्गस्तिला माषास्तथा यवाः ।
यथा बीजं प्ररोहन्ति लशुनानीक्षवस्तथा ॥ 39 ॥
जिस प्रकार के बीज बोए जाते हैं- धान, मूंग, तिल, उड़ जौ, लहसुन तथा ईखादि-वैसी ही फसल पैदा होती है।
अन्यदुप्तं जातमन्यदित्येतन्नोपपद्यते ।
उप्यते यद्धि यद्बीजं तत्तदेव प्ररोहति ।। 40 ।।
बोया कुछ और जाए लेकिन पैदा कुछ और हो - ऐसा कदापि नहीं होता। जिस वस्तु का बीज बोया जाता है वही वस्तु पैदा होती है।
तत्प्राज्ञेन विनीतेन ज्ञानविज्ञानवेदिना।
आयुष्कामेनष्वतव्यं न जातु परयोषिति ॥ 41 ।।
जो पुरुष बुद्धिमान, शिष्ट, विज्ञानवेत्ता और दीर्घायु आकांक्षी है उसे कभी भी पराए क्षेत्र में (परायी स्त्री) में बीजारोपण नहीं करना चाहिए।
नश्यतीषुर्यथाविद्धः खेविद्धमनुविध्ययः ।
तथा नश्यति वैक्षिप्तं बीजं परपरिग्रहे ।। 42 ।।
जिस प्रकार पहले से ही बिंधे मृग को बींधने के लिए छोडा गया बाण व्यर्थ होता है-ठीक उसी प्रकार दूसरे क्षेत्र में रोपा गया गया बीज भी निष्फल हो जाता है।
पृथोरषीमां पृथिवीं भार्या पूर्वविदो विदुः ।
स्थाणुच्छेदस्य केदारमाहुः शल्यवतो मृगम् ॥ 43 ।।
इस विषम धरातल वाली पृथ्वी को राजा पृथु ने समतल किया था- इसीलिए इस धरती का नाम हुआ-पृथ्वी ।
एतावानेव पुरुषो यज्जायात्मा प्रजेति ह।
विप्राः प्राहुस्तथा चैतद्या भर्त्ता सा स्मृताङ्गना ।।॥ 44 ॥
वेदवेत्ता ब्राह्मणों के अनुसार स्त्री, स्वयं पुरुष व संतान- इन तीनों को संयुक्त रूप से पुरुष कहा जाता है। इस प्रकार पति ही पत्नी है और पति ही पुत्र है।
न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या विमुच्यते ।
एवं धर्म विजानीमः प्राक्प्रजापतिनिर्मितम् ॥ 45 ।।
पति चाहे स्त्री को बेच दे या उसका परित्याग कर दे, किन्तु वह उसकी पत्नी ही कहलाती है- प्रजापति द्वारा स्थापित यही सनातन धर्म है।
सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते।
सकृदाह ददामीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् ॥ 46 ॥
इस संसार में धन का बंटवारा, कन्या दान व वचन एक बार ही किया जाता है, सत्पुरुष इन विषयों में बदलते नहीं।
यथा गोऽश्वोष्टदासीषु महिष्यजाविकासु च।
नोत्पादकः प्रजाभागी तथैवान्याङ्गनास्वपि ॥ 47 ॥
दूसरे की स्त्री में बीजारोपण करने वाला व्यक्ति संतान का स्वामी उसी प्रकार नहीं कहलाता जिस प्रकार गाय, अश्व, ऊंटनी, दासी, भैंस व बकरी में संतानोत्पत्ति करने वाले पशु एवं उसके स्वामी संतान के मालिक नहीं बन सकते।
येऽक्षेत्रिणः बीजवन्तः परक्षेत्रप्रवापिणः ।
ते वै सस्यस्य जातस्य न लभन्ते फलं क्वचित् ॥ 48 ।।
दूसरों के खेत में बीज बोने वाले जन उस खेत में होने वाले अन्न-धान्यादि के अधिकारी नहीं होते, ठीक उसी प्रकार दूसरे की पत्नी से संतान उत्पन्न करने वाले का संतान पर कोई अधिकार नहीं बनता।
यदन्यगोषु वृषभो वत्सानां जनयेच्छतम्।
गोमिनामेव ते वत्साः मोघं स्कन्दितमाषभम् ॥ 49 ॥
दूसरे की गायों से सौ बछडों को जन्म देने वाले सांड या उसके मालिक का उन पर कोई अधिकार नहीं होता बल्कि गाय के स्वामी का उन पर अधिकार होता है। अतः सांड द्वारा वीर्य का आरोपण व्यर्थ जाता है।
तथैवाऽक्षेत्रिणो बीजं परक्षेत्रप्रवापिणः ।
कुर्वन्ति क्षेत्रिणामर्थं न बीजीलभते फलम् ॥ 50 ॥
इसी प्रकार जिस व्यक्ति के पास अपना खेत नहीं, वह यदि दूसरे के खेत में बीजारोपण करता है तो वह खेत के स्वामी के लिए ही लाभप्रद होता है। बीज वाले व्यक्ति का फल पर कोई अधिकार नहीं बनता।
फलं त्वनभिसन्धाय क्षेत्रिणां बीजिनां तथा।
प्रत्यक्षं क्षेत्रिणामर्थो बीजाद्योनिर्गरीयसी ।। 51 ॥
बीज वाला व्यक्ति यदि फल का विभाजन किए बिना दूसरे के खेत में बीज रोपता है तो प्रत्यक्षतः उससे खेत के स्वामी को ही लाभ मिलता है। इसीलिए योनि को बीज से अधिक शक्तिशाली समझा जाता है।
क्रियाभ्युपगमात्त्वेतद्बीजार्थं यत्प्रदीयते।
तस्येह भागिनौ दृष्टौ बीजी क्षेत्रिक एव च ॥ 52 ॥
यदि फल के विभाजन का निर्णय करके ही दूसरे के खेत में बीज बोया जाता है तो पूर्व निश्चित निर्णय के अनुसार ही खेत का स्वामी फल का अधिकारी होता है।
ओघवाताहृतं बीजं यस्य क्षेत्रे प्ररोपति।
क्षेत्रिकस्यैव तद्बीजं न वप्ता लभते फलम् ॥ 53 ॥
यदि बीज हवा के तेज झोंके से दूसरे खेत में जा गिरता है तो उस बीज के फल पर बीज वाले का नहीं वरन् खेत के स्वामी का अधिकार होता है।
एष धर्मों गवाश्वस्य दास्युष्ट्राजाविकस्य च।
विहङ्गमहिषीणां च विज्ञेयः प्रसवं प्रति ॥ 54 ॥
पशुओं अर्थात् गाय, घोड़ी, ऊंटनी, बकरी, भेड़, पक्षी और भैंसादि तथा दासी के संदर्भ में भी संतान विषयी यही नियम सर्वमान्य है।
एतद्वः सारफल्गुत्वं बीजयोन्योः प्रकीर्तितम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि योषितां धर्ममापदि ॥ 55 1
महर्षियो। बीज व योनि की प्रधानता अप्रधानता का मैंने विस्तार से विवरण दिया। अब मैं आपात्काल में स्त्रियों के धर्म के सम्बन्ध में आपको बतलाता हूं।
भ्रातुर्येष्ठस्य भार्या या गुरुपल्यनुजस्य सा।
यवीयसस्तु या भार्या स्नुषा ज्येष्ठस्य सा स्मृता ।। 56 ॥
छोटे भाई के लिए बड़े भाई की पत्नी गुरु पत्नी तुल्य है और छोटे भाई की पत्नी बड़े भाई के लिए पुत्रवधू जैसी होती है।
ज्येष्ठो यवीयसो भार्यां यवीयान् वाग्रजस्त्रियम् ।
पतितौ भवतो गत्वा नियुक्तावप्यनापदि ॥ 57 ॥
यदि बड़ा भाई छोटे भाई की पत्नी तथा छोटा भाई बड़े भाई की पत्नी से संकट की परिस्थिति (संतान के अभाव) के अलावा नियोग विधि से भी सम्भोग करता है तो वे दोनों धर्मभ्रष्ट हो जाते हैं।
देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रियासम्यङ् नियुक्तया । प्रजेप्सिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये ।। 58 ॥
जो स्त्री संतान न होने के कारण संतान की इच्छा से नियोग के लिए प्रस्तुत होती है, उससे स्त्री के देवर अथवा सजातीय पुरुष को सहवास कर लेना चाहिए।
विधवायां नियुक्तस्तु घृताक्तो वाग्तोनिशि ।
एकमुत्पादयेत्पुत्रं न द्वितीयं कथञ्चन ॥ 59 ॥
जो पुरुष छोटे अथवा बड़े भाई की विधवा स्त्री से नियोग करता है उसे रात्रि में शरीर पर घी मलकर तथा मौन रहकर सहवास करना चाहिए और ऐसा केवल एक पुत्र उत्पन्न करने के उद्देश्य से करना चाहिए।
द्वितीयमेके प्रजनं मन्यन्तेस्त्रीषु तद्विदः ।
अर्निर्वृत्तं नियोगार्थं पश्यन्तोधर्मतस्तयोः ।। 60 ।।
जो विद्वान नियोग से संतानोत्पत्ति के नियमों की गहन जानकारी रखते हैं उनका यह भी विचार है कि नियोग के उद्देश्य की पूर्ति न होने पर (अर्थात् प्रथम पुत्र के रोगी होने पर) दूसरा पुत्र उत्पन्न करना धर्मोचित ही है।
विधवायां नियोगार्थे निर्वृत्ते तु यथाविधि।
गुरुवच्च स्नुषावच्च वत्तेयातां परस्परम् ॥ 61।।
जब विधवा स्त्री से नियोग द्वारा पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है तो छोटा भाई बडे भाई की पत्नी से गुरु पत्नी तुल्य व बड़ा भाई छोटे भाई की पत्नी से पुत्रवधू जैसा ही व्यवहार करे।
नियुक्तौ यौ विधिं हित्वा वर्त्तयातां तु कामतः ।
तावुभौ पतितौ स्यातां स्नुषागगुरुतल्पगौ ।। 62 ॥
यदि नियोग के उद्देश्य से नियुक्त छोटा व बड़ा भाई अपनी भाभियों से विधि को त्याग कर सुख-भोग के लिए सहवास करने लगते हैं तो वे धर्म से भ्रष्ट हो जाते हैं। बड़ा भाई पुत्रवधू से तथा छोटा भाई गुरु पत्नी से सहवास करने के लिए दण्डनीय हो जाते हैं।
अन्यस्मिन्विधवा नारी नियोक्तव्या द्विजातिभिः ।
अन्यस्मिन्हि नियुञ्जाना धर्म हन्युः सनातनम् ।। 63 ॥
द्विजातीय अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य वर्ण की विधवा स्त्री को अपने वर्ण से भिन्न पुरुष से नियोग नहीं करना चाहिए। ऐसे नियोग से उत्पन्न संतान धर्म का विनाश करने वाली होती है।
नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित्।
न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुनः ॥ 64 ।।
जो वेद मंत्र विवाह के सम्बन्ध में कहे गए हैं, उनमें न तो नियोग का वर्णन है और न ही विधवा विवाह का।
अयं द्विजैर्हिविद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः ।
मनुष्याणामपि प्रोक्तो वेने राज्यं प्रशासति ॥ 65 ॥
नियोग का प्रयोग राजा वेन के शासनकाल में अवश्य हुआ था लेकिन तब भी विद्वज्जनों ने इसे पशुधर्म कहा था और मनुष्यों के लिए निषिद्ध बताया था।
स महीमखिलां भुञ्जन् राजर्षिप्रवरः पुरा।
वर्णानां संकरं चक्रे कामोपहतचेतनः ।। 66 ।।
जो राजा वेन सम्पूर्ण धरती को भोगने वाला तथा श्रेष्ठ राजर्षि के रूप में सम्मानित तथा आदरणीय था, कामवासना के वशीभूत हो उसी राजा ने वर्णसंकर संतान उत्पन्न करने के दुष्चक्र का आरंभ किया।
ततः प्रभृति यो मोहात्प्रमीतपतिकां स्त्रियम् ।
नियोजयत्यरत्यार्थं तं विगर्हन्ति साधवः ॥ 67 ।।
साधु व विद्वान तभी से राजा वेन के इस दुष्कर्म को देखकर संतान के मोह के वशीभूत हो विधवा से नियोग करने की भी भर्त्सना करते हैं।
यस्याः नियेत कन्यायाः वाचा सत्ये कृते पतिः ।
तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः ।। 68 ॥
यदि कन्या के विवाह के पश्चात् उसके पति की मृत्यु हो जाए तो कन्या के देवर द्वारा विधि-विधान पूर्वक उसे ग्रहण किया जाना चाहिए।
यथा विध्यधिगम्यैनां शुक्लवस्त्रां शुचिव्रताम्।
मिथो भजेतां प्रसवात्सकृत्सकृदृतावृतौ ।। 69 ॥
पवित्र व्रत वाली तथा शुक्ल वस्त्रधारी भाभी से देवर संतानोत्पत्ति के उद्देश्य की पूर्ति हो जाने तक संसर्ग करे तथा स्त्री के गर्भवती होते ही वे दोनों अलग हो जाएं।
न दत्त्वा कस्यचित्कन्यां पुनर्दद्याद्विचक्षणः ।
दत्त्वा पुनः प्रयच्छन् हि प्राप्नोति पुरुषोऽनृतम् ॥ 70 ॥
विवेकशील पुरुष को चाहिए कि एक बार अपनी कन्या का (विवाह में) दान कर पुनः उसका विवाह न करे। जो व्यक्ति एक बार कन्यादान करके फिर उससे इन्कार कर देता है और अपनी कन्या किसी दूसरे को दे देता है वह झूठ बोलने का अपराध करता है।
विधिवत्प्रतिगृह्यापि त्यजेत्कन्यां विगर्हिताम्।
व्याधितां विप्रदुष्टां वा छद्मनाचोपपादिताम् ॥ 71 ॥
यदि विधिपूर्वक विवाह में ग्रहण की गई कन्या निन्दित, रोगग्रस्त या छलपूर्वक दी गई सिद्ध होती है तो वह परित्याग के योग्य ही होती है।
यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्यायोपपादयेत् ।
तस्य तद्वितथं कुर्यात् कन्या दातुर्दुरात्मनः ।। 72 ।।
जो कन्या दोषपूर्ण है-उसके दोषों को बिना बताए उसका सम्बन्ध विवाह में स्थापित करने वाले दुष्ट व्यक्ति के इस काम को निष्फल कर देना चाहिए अर्थात् विवाह सम्बन्ध विच्छेद कर देना चाहिए।
विधाय वृत्तिं भार्यायाः प्रवसेत कार्यवान्नरः ।
अवृत्तिकर्षिता हि स्त्री प्रदुष्येत्थितिमत्यपि ।। 73 ॥
यदि व्यक्ति को कार्यवश विदेश जाना पड़ता है तो उसे अपने पीछे पत्नी के भरण-पोषण का समुचित प्रबंध करके जाना चाहिए क्योंकि भूख से पीड़ित स्त्री शील व सदाचार युक्त हो, तो भी पतित हो सकती है।
विधाय प्रोषिते वृत्तिं जीवेन्नियममास्थिता।
प्रोषितो त्वविधायैव जीवेच्छिल्पैरगर्हितैः ।। 74 ।।
पुरुष यदि पत्नी के भरण-पोषण का उचित प्रबन्ध करके ही विदेश जाता है तो पत्नी को संयम व नियम अनुसार ही आचरण करना चाहिए।
प्रोषितो धर्मकार्यार्थ प्रतीक्ष्योऽष्टौ नरः समाः।
विद्यार्थं षड्यशसोऽर्थं वा कामार्थत्रींस्तुवत्सरान् ।। 75 ।।
पति धर्म कार्य के लिए विदेश जाता है तो पत्नी आठ वर्ष, विद्या-यशोपलब्धि के लिए पति के विदेश जाने पर छः वर्ष तथा व्यापार के उद्देश्य से पति द्वारा विदेश गमन पर पत्नी को तीन वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए।
संवत्सरं प्रतीक्षेत द्विषन्तीं योषितं पतिः ।
ऊर्ध्वं संवत्सरात्त्वेनां दायं हृत्वा न संवसेत् ॥ 76 ॥
पति का कर्त्तव्य है कि वह द्वेष करने वाली पत्नी (में परिवर्तन) की एक वर्ष तक प्रतीक्षा करे। यदि वह इस अवधि में स्वयं को न बदल पाए तो पति को उसके सारे आभूषण छीनकर उससे सम्बन्ध विच्छेद कर लेना चाहिए।
अतिक्रामेत्प्रमत्तं या मत्तं रोगार्तमेव वा।
सा त्रीन्मासान्परित्याज्या विभूषण परिच्छदा ॥ 77 ॥
जो स्त्री अपने आलसी, नशा करने वाले अथवा रोगग्रस्त पति की आज्ञा का उल्लंघन करती है उसे तीन माह के लिए वस्त्राभूषण उतार कर अलग कर देना चाहिए।
उन्मत्तं पतितं क्लीवमबीजं पापरोगिणम् ।
न च त्यागोऽस्ति द्विषन्त्याश्च न दाया प्रवर्तनम् ।। 78 ॥
यदि पत्नी पागल, पतित, नपुंसक, क्षीणवीर्य, रोगग्रस्त, पाप कर्मों में रत तथा पति से घृणा करने वाली हो तो भी पति उसका परित्याग न करे न ही उसका धन छीने।
मद्यपाऽसाधुवृत्ता वा प्रतिकूला च या भवेत्।
व्याधिताबाधि वेत्तव्या हिंसार्थघ्नी च सर्वदा ॥ 79 ॥
किंतु यदि पत्नी मदिरापान करने वाली, व्यभिचारिणी, पति के विरुद्ध चलने वाली, रोगग्रस्त, भूताविष्ट व उत्पात मचाने वाली हो तो पति द्वारा दूसरा विवाह करने का विधान है।
वन्ध्याऽष्टमेधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजा।
एकादशे स्त्री जननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ।। 8० ॥
पत्नी यदि वन्ध्या हो, मृत बच्चों को अथवा केवल कन्याओं को ही जन्म दे तो विवाह के क्रमशः आठवें, दसवें व ग्यारहवें वर्ष में पति दूसरा विवाह करने का अधिकारी है। कटुभाषिणी स्त्री का पति तत्काल दूसरा विवाह कर सकता है।
या रोगिणीस्यात्तुहिता संपन्ना चैव शीलतः ।
साऽनुज्ञाप्याधिवेत्तव्या नावमान्या च कर्हिचित् ॥ 81 ॥
स्त्री के बहुत दिनों से रोगी होने पर किन्तु चरित्र की धनी तथा पति का हित चाहने वाली होने पर पति को चाहिए कि वह पत्नी की अनुमति लेकर ही दूसरा विवाह करे।
अधिविन्ना तु या नारीनिर्गच्छेद्रुषिता गृहात् ।
सा सद्यः सन्निरोधव्या त्याज्या वा कुलसन्निधौ ।। 82 ।।
यदि दूसरी स्त्री के आने से पहली पत्नी रूठ कर घर छोड़कर जाने लगे तो उसे या तो समझा कर घर पर रोक लेना चाहिए या उसे शांतिपूर्वक उसके मायके पहुंचा देना चाहिए।
प्रतिषिद्धापि चेद्या तु मद्यसभ्युदयेष्वपि ।
प्रेक्षासमाजं गच्छेद्वा सा दण्ड्या कृष्णलानि षट् ॥ 8३ ॥
जो स्त्री विवाहादि समारोहों में रोके जाने पर भी मदिरापान करे या नाच-तमाशे में जाए तो उस पर छः कृष्णल राजदण्ड लगाने का विधान है।
यदि स्वांश्चापरांश्चैव विन्देरन्योषितो द्विजाः ।
तासां वर्णक्रमेण स्याज्यैष्ठं पूजा च वेश्म च ॥ 84 ॥
जो द्विजातीय पुरुष अपनी जाति की स्त्रियों से या अन्य जाति की स्त्रियों से विवाह करते हैं उनकी कुलीनता वर्णक्रम से ही मानी जानी चाहिए अर्थात् वह ब्राह्मण जो क्षत्रिय स्त्री से विवाह करता है उस ब्राह्मण की अपेक्षा हीन है जो ब्राह्मणी से विवाह करे।
भर्तुः शरीरशुश्रूषां धर्मकार्य च नैत्यिकम् ।
स्वा चैव कुर्यात्सर्वेषां नाऽस्वजातिः कथञ्चन ॥ 85 ॥
पति की सेवा-शुश्रूषा करना तथा प्रतिदिन के धर्म कार्य सजातीय स्त्री को करने चाहिए, विजातीय स्त्री को नहीं। उदाहरण के लिए यदि क्षत्रिय पुरुष ने क्षत्रिय तथा वैश्य कन्या से विवाह किया है तो पुरुष की सेवा तथा यज्ञादि में उसके साथ बैठने का अधिकार केवल क्षत्रिय कन्या को ही होता है।
यस्तु तत्कारयेन्मोहात्सजात्या स्थितयाऽन्यया।
यथा ब्राह्मणचाण्डालः पूर्वद्रष्टस्तथैव सः ॥ 86 ।।
यदि एक व्यक्ति सजातीय को छोड़कर मोहवश अन्य जाति वालों से सेवादि कार्य कराए तो वह ब्राह्मण के चाण्डाल रूप में पतित होने जितना ही भ्रष्ट हो जाता है।
उत्कृष्टायाभिरूपाय वराय सदृशाय च।
अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद्यथाविधिः ।। 87 ।।
यदि सभी तरह से श्रेष्ठ गुण सम्पन्न, सुन्दर, सदाचारी व समान कुल गौरव वाला वर उपलब्ध हो तो उससे अपनी उस कन्या का भी विवाह कर देना चाहिए जो अभी युवा न हुई हो।
काममामरणात्तिष्ठेत् गृहे कन्यर्तुमत्यपि।
न चैवेनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ॥ 88 ।।
चाहे कन्या ऋतुमती होकर जीवन पर्यंत पिता के घर कुंआरी ही रहती रहे किंतु उसका विवाह गुणहीन अयोग्य पुरुष से नहीं करना चाहिए।
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत् कुमार्यतुमती सती।
ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद्विन्देत सदृशं पतिम् ॥ 89 ।।
ऋतुमती होने के पश्चात् कन्या तीन वर्षों तक पिता द्वारा वर चुने जाने की प्रतीक्षा करे। यदि इस समय में पिता ऐसा न कर पाए तो कन्या को स्वयं किसी योग्य व्यक्ति के साथ विवाह कर लेना चाहिए।
अदीयमाना भर्तारमधिगच्छेद्यदि स्वयम् ।
नैनः किञ्चिदवाप्नोति न च यं साधिगच्छति ॥ 9० ॥
उपर्युक्त अवधि के पश्चात् पिता द्वारा विवाह में न दी गई कन्या स्वयं अपने लिए वर चुन ले तो न तो वह स्वयं पाप करती है न ही उससे विवाह करने वाला कोई पाप करता है।
अलङ्कारं नाददीत पित्र्यं कन्या स्वयंवरा।
मातृकभ्रातृदत्तं वा स्तेना स्याद्यदि तं हरेत् ॥ 91 ||
जो कन्या स्वयं अपने लिए वर निश्चित करती है उसे माता, पिता व भाई द्वारा दिए गए आभूषणों को ले जाने का अधिकार नहीं है। उनके दिए गए अलंकारों को न लौटाना चोरी के समान है।
पित्रे न दद्याच्छुल्कं तु कन्यामृतुमतीं हरन्। स हि स्वाम्यादतिक्रामेदृतूनां प्रतिरोधनात् ॥ 92 ॥
जो पुरुष ऋतुमती कन्या का हरण करता है उसे कन्या के पिता को शुल्क देने की जरूरत नहीं, क्योंकि कन्या के लिए उचित वर न खोज पाने के कारण पिता शुल्क के अधिकार से वंचित हो जाता है।
त्रिंशद्वर्षेद्वहेत्कन्यां हृद्यां द्वादशवार्षिकीम् । त्र्यष्टवर्षोष्ठवर्षां वा धर्मे सीदति सत्वरः ॥ 93 ॥
यदि तत्काल कर्म न करने से धर्म रक्षा में रुकावट उत्पन्न होती हो तो तीस व चौबीस वर्ष के पुरुष को क्रमशः बारह व आठ वर्ष की कन्या का पाणिग्रहण कर लेना चाहिए।
देवदत्तां पतिर्भार्यां विन्दते नेच्छत्यात्मनः ।
तां साध्वीं बिभृयान्नित्यं दीनां प्रियमाचरन् ।। 94 ।।
वास्तविकता यह है कि पुरुष स्वेच्छा से नहीं, वरन् देवों द्वारा पूर्व-निर्धारित स्त्री को ही पत्नी रूप में पाता है। देवों के प्रति अपनी श्रद्धा दर्शाने के लिए पुरुष का कर्तव्य है कि वह अपने पर निर्भर पत्नी का भरण-पोषण करे।
प्रजनार्थं स्त्रियः सृष्टा सन्तानार्थं च मानवाः ।
तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतोपल्यासहोदितः ॥ 95 ।।
पुरुषों को गर्भ आरोपण व स्त्रियों को गर्भधारण करना संतान उत्पन्न करने के उद्देश्य से ही ईश्वर द्वारा निर्धारित किया गया है। इसी कारण से वेदों में भी स्त्री व पुरुष के सहधर्म का विवरण है।
कन्यायां दत्तशुल्कायां नियेत् यदि शुल्कदः ।
देवराय प्रदातव्या यदि कन्याऽनुमन्यते ॥ 96 ।।
यदि कन्या का शुल्क देने वाला संयोगवश मृत्यु को प्राप्त होता है तो कन्या की सहमति प्राप्त कर उसका विवाह मृत पुरुष के भाई के साथ कर दिया जाना चाहिए।
आददीत न शूद्रोऽपि शुल्कं दुहितरं ददन् ।
शुल्कं हि गृह्णन्कुरुते छन्नं दुहितृ विक्रयम् ॥ 97 ॥
द्विजातियों को ही नहीं वरन् शूद्र को भी अपनी कन्या के विवाह के दौरान वर पक्ष से कोई शुल्क नहीं लेना चाहिए। कन्या के बदले शुल्क लेना तो एक प्रकार उसका विक्रय करना है जो गंभीर पाप कर्म है।
एतत्तु न परे चक्कुर्नापरे जातु साधवः ।
यदन्यस्य प्रतिज्ञाय पुनरन्यस्य दीयते ॥ 98 ॥
प्राचीनकाल में तथा वर्तमान में भी सज्जन पुरुष यदि एक बार कन्या दान कर देते हैं तो फिर दूसरे को नहीं देते।
नानुशुश्रुम जात्वेतत्पूर्वेष्वपि जन्मसु ।
शुल्कसंज्ञेन मूल्येन छन्नं दुहितृविक्रयम् ॥ 99 ।।
ब्राह्मणो ! शुल्क के रूप में मूल्य लेकर प्रच्छन्न रूप से कन्या को बेचने का प्रचलन हमने अपने पूर्वजों से कभी नहीं सुना।
अन्योऽन्यस्याव्यभिचारो हि भवेदामरणान्तिकः ।
एष धर्मः समासेन ज्ञेयः स्त्रीपुंसयोः परः ।। 100 ।।
परस्पर विवाह होने के बाद भी विषय भोग में लिप्त न होने को ही स्त्री-पुरुष का उत्तम धर्म मानना चाहिए।
तथा नित्यं यतेयातां स्त्रीपुंसौ तु कृतक्रियौ।
यथा नाभिचरेतां तौ वियुक्तावितरेतरम् ॥ 101 ।।
एक बार यदि स्त्री-पुरुष दम्पति बन जाते हैं तो उनका निरंतर प्रयास रहना चाहिए कि वे पति-पत्नी बने रहें, कभी एक-दूसरे से अलग न हों।
एष स्त्रीपुंसयोरुक्तो धर्मो यो रतिसंहितः ।
आपद्यपत्यप्राप्तिश्च दायभागं निबोधत् ॥ 102 ॥
भृगु जी ने कहा- हे ऋषियो! स्त्री व पुरुष के पारस्परिक प्रेमयुक्त धर्म व आपात्काल में संतान प्राप्ति के नियमों के सम्बन्ध में मैंने आपको जानकारी दी। अब मैं आपको सम्पत्ति के अधिकार सम्बन्धी विधान का विवरण देता हूं।
ऊर्ध्वं पितुश्च मातुश्च समेत्य भ्रातरः समम् ।
भजेरन्यैतृकं रिक्थमनीशास्ते हि जीवतोः ।। 103 ।।
माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् सभी भाइयों को उनकी सम्पत्ति समान रूप से विभाजित कर लेनी चाहिए। किंतु यदि माता-पिता जीवित हैं तो पुत्रों को ऐसा कोई अधिकार नहीं कि वे उनकी सम्पत्ति आपस में बांटें।
ज्येष्ठ एव तु गृह्णीयात्पित्र्यं धनमशेषतः ।
शेषास्तमुपजीवेयुर्यथैवं पितरं तथा ।। 104 ॥
दूसरा विधान यह है कि माता-पिता की मृत्यु के बाद उनकी सारी सम्पत्ति बड़े पुत्र के अधिकार में चली जाए तथा सभी छोटे पुत्र बड़े भाई के संरक्षण में वैसे ही रहें जैसे पिता के संरक्षण में रहते थे।
ज्येष्ठेन जातमात्रेण पुत्रो भवति मानवः ।
पितृणामनृणश्चैव स तस्मात्सर्वमर्हति ।। 105 ॥
ज्येष्ठ पुत्र महत्वपूर्ण इसलिए होता है क्योंकि उसके जन्मते ही मनुष्य पुत्र वाला हो जाता है तथा पितृऋण से मुक्त भी। अतः बड़ा पुत्र ही पिता की सम्पूर्ण सम्पत्ति का अधिकारी माना गया है।
यस्मिन्नृणं सन्नयति येन चानन्त्यमश्नुते।
स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान्विदुः ।। 106 ।।
धर्म से उत्पन्न सच्चा पुत्र वही है जिसके जन्म से मनुष्य पितृऋण से मुक्त हो जाए व मोक्ष-प्राप्ति का अधिकारी बने अन्यथा शेष तो कामवासना की तृप्ति में रत माता-पिता के 'कामज पुत्र' होते हैं।
पितेव पालयेत्पुत्रान्ज्येष्ठो भ्रातृन् यवीयसः ।
पुत्रवच्चापिवर्तेरन् ज्येष्ठे भ्रातरि धर्मतः ।। 107 ।।
बड़े भाई का कर्तव्य है कि वह पिता की भांति अपने छोटे भाइयों का पालन-पोषण करे तथा छोटे भाइयों का कर्तव्य है कि वे बड़े भाई से पिता तुल्य व्यवहार करें।
ज्येष्ठः कुलं वर्धयति विनाशयति वा पुनः ।
ज्येष्ठः पूज्यतमो लोके ज्येष्ठः सद्भिरगर्हितः ।। 108 ।।
बड़े पुत्र से कुल बढ़ता है और वही कुल का विनाश करता है। इसी कारण संसार में ज्येष्ठ पुत्र को पूजनीय माना गया है तथा सत्पुरुष द्वारा उसकी कदापि निंदा नहीं की जाती।
यो ज्येष्ठो ज्येष्ठवृत्तिः स्यान्मातेव स पितेव सः ।
अज्येष्ठवृत्तिर्यस्तु स्यान्न सम्पूज्यस्तु बन्धुवत् ॥ 109 ॥
ज्येष्ठ भाई को सदा ज्येष्ठ वृत्ति अर्थात् बड़प्पन दिखलाना चाहिए। उसे माता-पिता के समान ही छोटे भाइयों की देखभाल करनी चाहिए। यदि ज्येष्ठ भ्राता बड़प्पन नहीं दिखलाता, तो वह साधारण रिश्तेदारों जितना भी आदरणीय नहीं रहता।
एवं सहवसेयुर्वा पृथग्वा धर्मकाम्यया।
पृथग्विवर्धते धर्मस्तस्माद्धर्ष्या पृथक्क्रिया ।। 110 ॥
इस तरह (माता-पिता की मृत्यु के बाद) सभी भाई सम्पत्ति का विभाजन किए बिना साथ-साथ रहें या फिर धर्मानसार सम्पत्ति का बंटवारा करके अलग-अलग रहें।
ज्येष्ठस्य विंशउद्धारः सर्वद्रव्याच्च यद्वरम् ।
ततोऽर्थः मध्यमस्य स्यात्तुरीयं यवीयसः ।। 111 ।।
उद्धार भाग के अतिरिक्त सभी द्रव्यों से उत्तम सम्पत्ति का एक भाग बड़े भाई को मिलना चाहिए। शेष सम्पत्ति का बंटवारा इस प्रकार करें। ज्येष्ठ को बीसवां भाग, मंझले को चालीसवां भाग, छोटे को अस्सीवां और उसके बाद के शेष भाइयों को एक सौ आठवां भाग मिलना चाहिए।
ज्येष्ठश्चैव कनिष्ठश्च संहरेतां यथोदितम् ।
येऽन्येज्येष्ठकनिष्ठाभ्यां तेषां स्यान्मध्यमं धनम् ॥ 112 ॥
जैसा कि बताया गया है, ज्येष्ठ व कनिष्ठ भ्राता अपना-अपना भाग लें तथा दोनों के बीच मंझले भाइयों को धन का मध्यम भाग प्रदान करें।
सर्वेषां धनजातानामाददीताग्रयमग्रजः ।
यच्च सातिशयं किञ्चिद्दशतश्चाप्नुयाद्वरम् ॥ 113 ॥
ज्येष्ठ भ्राता ही (सम्पत्ति में) सभी धनों में सर्वश्रेष्ठ, सर्वाधिक व दुर्लभ द्रव्य का अधिकारी होता है।
उद्धारो न दशस्वस्ति सम्पन्नानां स्वकर्मसु।
यत्किञ्चिदेव देयं तु ज्यायसे मानवर्धनम् ।। 114 ।।
सम्पत्ति की दस श्रेष्ठ वस्तुओं का एकमात्र अधिकारी बड़ा भाई होता है। ऐसा नियम पिता की सम्पत्ति के सम्बन्ध में है। माता-पिता के जीवनकाल में यदि भाइयों ने स्वयं कुछ अर्जित अथवा संगृहीत किया है तो बड़े भाई को देना या न देना इच्छा पर निर्भर करता है। दरअसल ज्येष्ठ भ्राता को जो कुछ भी दिया जाता है वह उसके प्रति सम्मान सूचक होता है। उनकी
एवं समुद्धतोद्धारे समानांशान्प्रकल्पयेत् ।
उद्धारेऽनुद्धते त्वेषामियं स्यादंशकल्पना ॥ 115 ॥
बड़े भाई को देने के लिए उद्धार भाग निकालने के बाद शेष सम्पत्ति के समान भाग कर लें। यदि उद्धार भाग नहीं निकाला जाता तो आगे बताई रीति से बंटवारा करें।
एकाधिकं हरेज्येष्ठः पुत्रोऽध्यर्धं ततोऽनुजः ।
अंशमंशं यवीयांस इति धर्मो व्यवस्थितः ॥ 116 ॥
बड़ा भाई दो भाग, उससे छोटा भाई डेढ़ भाग तथा शेष सभी भाइयों को एक-एक भाग ग्रहण करना चाहिए।
स्वेभ्योंऽशेभ्यस्तु कन्याभ्यः प्रदद्युर्भातरः पृथक् । स्वात्स्वादंशाच्चतुर्भागं पतिताः स्युरदित्सवः ॥ 117 ।।
सभी भाइयों का कर्तव्य है कि वे अपने-अपने सम्पत्ति भाग का चौथा भाग बहिनों को प्रदान करें। ऐसा न करने वाले भाइयों को पतित कहा जाता है।
अजाविकं सैकशफं न जातु विषमं भजेत्।
अजाविकं तु विषमं ज्येष्ठस्यैव विधीयते ॥ 118 ।।
यदि भाई चार हों तथा पशुओं अर्थात् बकरी, भेड़, घोड़ा आदि की संख्या विषम हो-तो उनका विभाजन नहीं करना चाहिए बल्कि वे सभी पशु बड़े भाई को समर्पित कर देने चाहिए।
यवीयान् ज्येष्ठभार्यायां पुत्रमुत्पादयेद्यदि ।
समस्तत्र विभागः स्यादिति धर्मोव्यवस्थितः ।। 119 ॥
अगर ज्येष्ठ भाई की पत्नी से छोटा भाई नियोग द्वारा पुत्र को जन्म देता है तो उस सम्पत्ति का विभाजन दोनों में समान रूप से करना चाहिए। यही विधान है।
उपसर्जनं प्रधानस्य धर्मतो नोपपद्यते ।
पिता प्रधानं प्रजने तस्माद्धर्मेण तं भजेत् ॥ 120 ।।
धर्मानुसार ज्येष्ठ पुत्र की प्रधानता सिद्ध नहीं है। वास्तव में सम्पत्ति के संवर्द्धन में पिता ही प्रधान होता है। अतः धर्म यही कहता है कि पिता ही सेवा योग्य है।
पुत्रः कनिष्ठो ज्येष्ठायाः कनिष्ठायां च पूर्वजः ।
कथं तत्र विभागः स्यादिति चेत्संशयो भवेत् ॥ 121 ।।
यदि पहली पत्नी से छोटा पुत्र और दूसरी पत्नी से बड़ा पुत्र पैदा हुआ हो तो सम्पत्ति के विभाजन में उत्पन्न दुविधा को कैसे दूर किया जाए उसकी विधि आगे वर्णित है।
एकं वृषभमुद्धारं संहरेत् सः पूर्वजः ।
ततोऽपरे ज्येष्ठवृषास्तदूनानां स्वमातृतः ।। 122 ।।
प्रथम विवाहिता पत्नी से जन्मा छोटा पुत्र एक अतिरिक्त बैल पाने का अधिकारी है। शेष सम्पत्ति में से माताओं के विवाह के क्रमानुसार ही पुत्र अपना-अपना भाग लें।
ज्येष्ठस्तु जाते ज्येष्ठायां हरेवृषभषोडशाः।
ततः स्वमातृतः शेषाः भजेरन्निति धारणा ॥ 123 ।।
प्रथम पत्नी से जन्मे बड़े पुत्र को सोलह अतिरिक्त बैल मिलने चाहिए। तत्पश्चात् शेष भाई अपनी माताओं के विवाह के क्रमानुसार अपना-अपना भाग लें-यही नियम है।
सदृशस्त्रीषु जातानां पुत्राणामविशेषतः ।
न मातृतोज्यैष्ठ्यमस्ति जन्मतो ज्यैष्ठ्यमुच्यते ।। 124 ।।
सजातीय स्त्रियों से (अर्थात् सभी पत्नियां यदि एक ही जाति की हों) जन्मे पुत्रों में माता के विवाह के क्रमानुसार ज्येष्ठता नहीं माननी चाहिए। ऐसी स्थिति में जन्म से ही जो ज्येष्ठ है उसे बड़ा पुत्र मानना चाहिए।
जन्मज्यैष्ठ्ययेन चाह्वानं सुब्रह्मण्यास्वापि स्मृतम्।
यमयोश्चैव गर्भेषु जन्मतोज्येष्ठता स्मृता ।। 125 ।।
जिन वेद मंत्रों में बड़े पुत्र द्वारा देवों के आह्वान का वर्णन है या जुड़वां पुत्रों में कौन बड़ा है-यह निर्णय करने के नियम वर्णित हैं- उनमें जन्म को ही ज्येष्ठ व कनिष्ठ के निर्णय का आधार समझा गया है।
अपुत्रोऽनेन विधिना सुतां कुर्वीत पुत्रिकाम्।
यदपत्यं भवेदस्यां तन्मम स्यात्स्वधाकरम् ।। 126 ।।
जिस पुरुष के पुत्र न हो वह अपनी कन्या को पुत्रिका बनाए और उसके विवाह के समय घोषणा करे कि उसके गर्भ से जन्मा पुत्र ही मेरा श्राद्ध-तर्पण करने का अधिकारी होगा।
अनेन तु विधानेन पुरा चक्रेऽथ पुत्रिकाः ।
विवृद्धयर्थं स्ववंशस्य स्वयं दक्षः प्रजापतिः ।। 127 ।।
प्राचीनकाल में प्रजापति दक्ष ने भी इसी प्रकार अपनी पुत्रियों से जन्मे पुत्रों से वंश का संवर्द्धन किया था।
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।
सोमाय राज्ञे सत्कृत्य प्रीतात्मा सप्तविंशतिम् ।। 128 ।।
प्रसन्नतापूर्वक व सत्कार करके प्रजापति दक्ष ने अपनी दस कन्याओं का विवाह धर्म से. तेरह का कश्यप से और सत्ताईस पुत्रियों का विवाह चन्द्रमा से इसी प्रकार किया था अर्थात् उनके गर्भ से उत्पन्न पुत्रों को ग्रहण किया था।
यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा।
तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्योधनं हरेत् ।। 129 ।।
मनुष्य भी पुत्र रूप में जन्म लेता है और कन्या भी पुत्र तुल्य होती है तो फिर कन्या के रहते पुत्र का धन पराए लोग कैसे ले सकते हैं?
मातुस्तु यौतक यत्स्यात्कुमारी भाग एव सः ।
दौहित्र एव च हरेदपुत्रस्याखिलं धनम् ।। 130 ।।
जो धन माता के द्वारा जोड़ा जाता है वह पुत्री का ही होता है। इस प्रकार जो पुरुष पुत्रहीन है उसकी सारी सम्पत्ति का अधिकारी उसका नाती होता है।
दौहित्रो ह्यखिलं रिक्थमपुत्रस्य पितुहरेत् ।
स एव दद्याद् द्वौ पिण्डौ पित्रे मातामहाय च ।। 131 ।।
यदि कोई व्यक्ति पुत्रहीन है तो उसकी सारी सम्पत्ति पर उसके नाती का ही अधिकार होता है। वही अपने पिता व नाना को पिण्डदान करता है।
पौत्रदौहित्रयोलोंके विशेषोऽस्ति धर्मतः ।
तयोर्हि मातापितरौ सम्भूतौ तस्य देहतः ।। 132 ।।
वस्तुतः पौत्र व नाती में कोई फर्क नहीं है। एक का पिता और एक की माता- समान माता-पिता से ही उत्पन्न होते हैं।
पुत्रिकायां कृतायां तु यदि पुत्रोऽनुजायते ।
समस्तत्रविभागः स्याज्येष्ठता नास्ति हि स्त्रियः ।। 133 ।।
नाती अर्थात् पुत्री के पुत्र को यदि गोद लिया जाता है और तब पुत्र का जन्म होता है तो दोनों में सम्पत्ति को समान रूप से बांट देना चाहिए। नाती को ज्येष्ठ नहीं माना जाता।
अपुत्रायां मृतायां तु पुत्रिकायां कथञ्चन।
धनं तत्पुत्रिकाभर्त्ता हरेतैवाऽविचारयन् ।। 134 ।।
यदि पुत्री को पुत्रिका बना लेने के पश्चात् कन्या का पुत्रवती हुए बिना ही देहान्त हो जाता है तो कन्या का पति ही कन्या के पिता की सारी सम्पत्ति प्राप्त करने का अधिकारी बन जाता है।
अकृता वा कृत्ता वापि यं विन्देत्सदृशात्सुतम्।
पौत्रा मातामहस्तेन दद्यात्पिण्डं हरेद्धनम् ॥ 135 ।।
चाहे कन्या को पुत्रिका बनाएं या न बनाएं, सजातीय दामाद से पुत्र पाने पर पुरुष पुत्रवान् कहलाता है। वही बालक नाना को पिण्ड दान करता है। इसलिए नाना की सम्पत्ति भी उसे ही मिलनी चाहिए।
पुत्रेण लोकान् जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते।
अथ पुत्रस्य पौत्रेण ब्रध्नस्याप्नोति विष्टपम् ।। 136 ।।
व्यक्ति के जब पुत्र होता है तो वह लोक विजयी बन जाता है, पौत्र के जन्म से वह अनंतकाल तक सुखानंद उठाने का अधिकारी बनता है और प्रपौत्र का जन्म उसे आदित्य लोक में वास करने का अधिकारी बनाता है।
पुन्नाम्ना नरकस्तस्मात्त्रायते पितरं. सुतः ।
तस्मात्पुत्र इतिप्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा ।। 137 ।।
'पु' शब्द से अभिप्राय है 'नरक' तथा 'त्र' का अर्थ है 'रक्षक'। अतः पितरों - की नरक से रक्षा करने वाले को ही ब्रह्मा जी ने 'पुत्र' कहा है।
पौत्रदौहित्रयोर्लोके विशेषो नोपपद्यते ।
दौहित्रोऽपिह्यमुत्रैनं सन्तारयति पौत्रवत् ॥ 138 ।।
मनुष्य को चाहिए कि वह पौत्र तथा दौहित्र में कोई फर्क न समझे क्योंकि दौहित्र भी पौत्र के समान ही नाना का कल्याणकारक होता है।
मातुः प्रथमतः पिण्डं निर्वपेत्पुत्रिकासुतः ।
द्वितीयं तु पितुस्तस्यास्तृतीयं तत्पितुः पितुः ।। 139 ॥
दौहित्र द्वारा प्रथम पिण्ड अपनी मां को, दूसरा नाना को तथा तीसरा नाना के -पिता को दिया जाना चाहिए।
उपपन्नो गुणैः सर्वैः पुत्रो यस्य तु दत्रिमः ।
स हरेतैव तद्रिक्थं सम्प्राप्तोऽप्यन्यगोत्रतः ।। 140 ।।
यदि दत्तक पुत्र दूसरे गोत्र का हो तो भी शिक्षा, विनय व शीलादि गुणों से युक्त होने पर वह अपने धर्मपिता की सम्पूर्ण सम्पत्ति का उत्तराधिकारी बन जाता है।
गोत्ररिक्थे जनयितुर्न हरेत्त्रिमः क्वचित् ।
गोत्रारिक्थानुगः पिण्डो व्यपैति ददतः स्वधा ।। 141 ॥
जो पुत्र दूसरे को दे दिया जाए वह अपने पिता व गोत्र को पुनः नहीं अपना सकता। वह जिसका पिण्डदान करता है. उसी का धन व गोत्र उसे प्राप्त होता है। वह अपने पिता का पिण्डदान नहीं करता। फलस्वरूप पिण्डदान से ही उत्तराधिकार का निर्णय हो जाता है।
अनियुक्तः सुतश्चैव पुत्रिण्याप्तश्च देवरात् ।
उभौ तौ नार्हतो भागं जारजातककामजौ ।। 142 ॥
नियोग विधि के बगैर जन्मा पुत्र तथा लड़की के देवर से नियोग विधि द्वारा जन्मा दौहित्र-दाय भाग के अधिकारी नहीं माने जाते। इन्हें जार से उत्पन्न व कामज ही समझना चाहिए।
नियुक्तायामपि पुमान्नार्या जातोऽविधानतः ।
नैवार्हः पैतृकं रिक्थं पतितोत्पादितो हि सः ।। 143 ।।
बिना विधान के नियुक्ता स्त्री से जन्मा पुत्र भी अपने पिता का उत्तराधिकारी नहीं होता क्योंकि धर्मभ्रष्ट रूप से उत्पन्न ऐसा बालक तो परित्याग योग्य ही होता है।
हरेत्तत्र नियुक्तायां जातः पुत्रो यथौरसः ।
क्षेत्रिकस्य हि तद्बीजं धर्मतः प्रसवश्च सः ॥ 144 ॥
नियुक्ता स्त्री तथा नियम पालन करने वाले पुरुष के विधान पूर्वक संसर्ग से जन्मा औरस पुत्र ही अपने पिता की सम्पत्ति पर अधिकार रखता है। चूंकि उसका जन्म धर्मानुकूल विधि से होता है। अतः वह क्षेत्र वाले के बीज से ही जन्मा माना जाता है।
धनं यो बिभृयाद्भातुर्मतस्य स्त्रियमेव च।
सोऽपत्यं भ्रातुरुत्पाद्य दद्यात्तस्यैव तद्धनम् ।। 145 ।।
जो पुरुष अपने मृत भाई की पत्नी व उसके धन पर अधिकार कर लेता है उसे भाभी से संतान उत्पन्न करके भाई का धन भतीजे को सौंप देना चाहिए।
याऽनियुक्ताऽन्यतः पुत्रं देवराद्वाप्यवाप्नुयात्।
तं कामजमरिक्थीयं वृथोत्पन्नं प्रचक्षते ॥ 146 ।।
जो पुत्र नियोग बगैर ही देवर से या अन्य किसी पुरुष से उत्पन्न हो उसे कामज व व्यर्थ ही समझा जाता है। ऐसे पुत्र का पिता की सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता।
एतद् विधानं विज्ञेयं विभागस्यैकयोनिषु।
बह्वीषु चै जातानां नानास्त्रीष् निबोधत ।।। 147 ।।
भूगु जी ने कहा- विप्रो ! समाज में सजातीय स्त्री के गर्भ से उत्पन्न हुए पूत्रों निर्धारित नियमों के बारे में बतलाता हं जिसमें एक ही पति द्वारा अनेक स्त्रियों के में धन के विभाजन का यही विधान है। अब मैं आपको उस परिस्थिति के लिए गर्भ से पुत्र प्राप्ति हुई हो।
ब्राह्मणस्यानुपूर्येण चतस्त्रस्तु यदि स्त्रियः ।
तासां पुत्रेषु जातेषु विभागोऽयं विधिः स्मृतः ।। 148 ॥
यदि एक ब्राह्मण का चार विभिन्न वर्णों की स्त्रियों से विवाह हुआ है तो उन चारों से उत्पन्न पुत्रों के बीच धन का विभाजन इस प्रकार करना चाहिए।
कीनाशो गो वृषो यानमलङ्कारश्च वेश्म च।
विप्रस्यौद्धारिकं देयमेकांशश्च प्रधानतः ।। 149 ॥
ब्राह्मण पत्नी के गर्भ से जन्मे पुत्र को कृषि योग्य बैल, गाय, अश्वादि, वाहन, आभूषण, घर व विशिष्ट दुर्लभ पदार्थ दे देने चाहिए।
त्र्यंशदायाद्धरेद्विप्रः द्वावंशौ क्षत्रियासुतः ।
वैश्याजः सार्धमेवांशमंशं शूद्रासुतो हरेत् ॥ 150 ॥
पिता द्वारा अर्जित धन का तीन, दो, डेढ़ व दशम भाग के अधिकारी क्रमशः ब्राह्मणी, क्षत्रिया तथा वैश्य व शूद्र पत्नियों के पुत्र होते हैं।
सर्वं वा रिक्थजातं तद्दशधा परिकल्प्य च।
धम्र्यं विभागं कुर्वीत विधिनाऽनेन धर्मवित् ॥ 151 ।।
धर्मात्मा पुरुष ब्राह्मणी के पुत्र के लिए विशेष रूप से कुछ निकाले बिना ही सम्पूर्ण धन के दस भाग करे और आगे बताई जा रही विधि द्वारा इसका बंटवारा करे।
चतुरोंऽशन्हरेद्विप्र स्त्रीनंशान्क्षत्रियासुतः ।
वैश्यापुत्रो हरेद्धयंशमंशं शूद्रासुतो हरेत् ॥ 152 ॥
उन दस भागों में से ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्य पत्नी व शूद्र स्त्री से उत्पन्न पुत्रों को क्रमशः चार, तीन, दो और एक भाग ग्रहण करना चाहिए।
यद्यपि स्यात्तु सत्पुत्रोऽप्यसत्पुत्रोऽपि वा भवेत् ।
नाधिकं दशमादद्याच्छूद्रापुत्राय धर्मतः ॥ 153 ॥
जो ब्राह्मण पुत्र शूद्र पत्नी के गर्भ से जन्मा है, वह चाहे कितना भी योग्य अथवा अयोग्य हो, पिता की सम्पत्ति के दसवें भाग से ज्यादा सम्पत्ति पाने का अधिकारी नहीं होता।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्रापुत्रो न रिक्थभाक् ।
यदेवास्य पिता दद्यात्तदेवास्य धनं भवेत् ॥ 154 ।।
शूद्र स्त्री के गर्भ से ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य पुरुषों द्वारा उत्पन्न पुत्र का अपने पिता की सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता। पिता द्वारा अपनी इच्छा से दिया गया धन ही उसका भाग होता है।
समवर्णाषु ये जाताः सर्वे पुत्राः द्विजन्मनाम्।
उद्धारं ज्यायसे दत्त्वा भजेरन्नितरे समम् ॥ 155 ।।
सजातीय पत्नियों से उत्पन्न सभी पुत्रों को ज्येष्ठ भ्राता के लिए विशिष्ट भाग निकाल कर पिता की शेष सम्पत्ति को समान रूप से विभाजित कर लेना चाहिए।
शूद्रस्य तु सवर्णैव नान्या भार्या विधीयते।
तस्यां जाताः समांशाः स्युर्यदि पुत्रशतं भवेत् ।। 156 ।।
शूद्र पुरुष के लिए यह विधान है कि वह केवल शूद्र स्त्री से ही विवाह कर सकता है, अन्य से नहीं। उस शूद्रा के यदि सौ पुत्र हुए हों तो वे सभी पिता की सम्पत्ति में समान भाग के अधिकारी हैं।
पुत्रान् द्वादश यानाह नृणांस्वायम्भुवः मनुः ।
तेषां षड्बन्धदायादाः षडदायादबान्धवा ।। 157 ॥
स्वायम्भुव मनु ने जो वर्णन किया है उसके अनुसार मनुष्य के बारह पुत्रों में छः भाई पिता की सम्पत्ति के अधिकारी है और छः नहीं।
औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिम एव च।
गूढोत्पन्नोऽपविद्धश्च दायादा बान्धवाश्च षट् ॥ 158 ॥
पिता के दाय भाग के अधिकारी छः पुत्र इस प्रकार हैं, (1) अपनी धर्मपत्नी से औरस पुत्र (2) नियोग से उत्पन्न पुत्र (3) दत्तक पुत्र (4) दूसरे की सहमति से अपनाया हुआ उसका पुत्र (5) गुप्त रूप से जन्मा पुत्र (6) तथा माता-पिता द्वारा परित्यक्त तथा किसी अन्य द्वारा अपनाया गया पुत्र।
कानीनश्च सहोढश्च क्रीतः पौनर्भवस्तथा ।
स्वयंदत्तश्च शौद्रश्च षडदायाद बान्धवा ॥ 159 ।।
पिता की सम्पत्ति के अधिकारी जो पुत्र नहीं होते वे इस प्रकार हैं, (1) अविवाहित कन्या का पुत्र (2) विवाह के साथ ही स्त्री द्वारा लाया गया पुत्र (3) खरीदा हुआ (4) स्त्री के द्वितीय विवाह से जन्मा पुत्र (5) बिना मांगे ही किसी के द्वारा दिया गया तथा (6) शूद्र स्त्री से जन्मा पुत्र।
यादृशं फलमाप्नोति कुप्लवैः सन्तरञ्जलम् ।
तादृशं फलमाप्नोति कुपुत्रैः सन्तरस्तमः ॥ 160 ॥
कुपुत्रों से सद्गति चाहने वाले उसी प्रकार नरक जाते हैं जिस प्रकार टूटी हुई नाव से समुद्र पार करने की चाह रखने वाला डूब जाता है।
यद्येकरिक्थिनौ स्यातामौरसक्षेत्रजौ सुतौ।
यस्य यत्पैतृकं रिक्थं स तद् गृह्णीत नेतरः ।। 161 ।।
नियोग विधि से प्राप्त किए गए पुत्र के बाद यदि औरस पुत्र भी उत्पन्न हो जाता है तो दोनों अपने-अपने पिता की सम्पत्ति का भाग ही ग्रहण करें। उन्हें एक-दूसरे का भाग हड़पने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।
एक एवौरसः पुत्रः पित्र्यस्य वसुनः प्रभुः ।
शेषाणामानृशंस्यार्थं प्रदद्यात् प्रजीवनम् ॥ 162 ।।
वास्तविकता तो ये है कि एक औरस पुत्र ही पिता की सम्पत्ति का अधिकारी होता है। शेष पुत्रों को दयावश इतना दे देना चाहिए कि वे जीवन यापन कर सकें।
षष्ठं तु क्षेत्रजस्यांशं प्रदद्यात् पैतृकाद्धनात् ।
औरसो विभजन्दायं पित्र्यं पञ्चमेव वा ॥ 163 ॥
औरस पुत्र द्वारा क्षेत्रज पुत्र को पैतृक कुल सम्पत्ति का पांचवां एवं छठा भाग प्रदान करना चाहिए।
औरसक्षेत्रजौ पुत्रौ पितृरिक्थस्य भागिनौ।
दशापरेतु क्रमशो गोत्ररिक्थांशभागिनः ॥ 164 ।।
इसी प्रकार पैतृक धन क्षेत्रज व औरस पुत्रों में बांटना चाहिए। यदि पिता के अन्य दस प्रकार के पुत्र भी हों तो वे केवल गोत्रधन के ही अधिकारी हैं।
स्वक्षेत्रे संस्कृतायां तु स्वयमुत्पादयेद्धि यम् ।
तमौरसं विजानीयात्पुत्रं प्रथमकल्पितम् ॥ 165 ।।
वह पुत्र जो विवाहिता स्त्री से अपने वीर्य का आधान करके प्राप्त किया जाता है, वही औरस पुत्र है-उसे ही अपनी प्रथम संतान मानना चाहिए।
यस्तल्पजः प्रमीतस्य क्लीबस्य व्याधितस्य वा।
स्वधर्मेण नियुक्तायां सपुत्रः क्षेत्रजः स्मृतः ॥ 166 ।।
यदि पुरुष मृत, क्लीव (नपुंसक) अथवा गंभीर रोग से ग्रस्त हो तो उसकी स्त्री से नियोग विधि द्वारा उत्पन्न पुत्र ही 'क्षेत्रज' कहा जाता है।
माता पिता वा दद्यातां यमद्भिः पुत्रमापदि ।
सदृशं प्रीतिसंयुक्तं ज्ञेयो दत्रिमः सुतः ॥ 167 1
कोई विपत्ति आ पडने पर माता-पिता जिस सजातीय व्यक्ति को संकल्प करके अपना पुत्र बिना कुछ लिए-दिए दे देते हैं-वही 'दत्तक' पुत्र समझा जाता है।
सदृशं तु प्रकुर्याद्यं गुणदोषविचक्षणम्।
पुत्रं पुत्रगुणैर्युक्तं सः विज्ञेयश्च कृत्रिमः ।। 168 ॥
गुणदोष के पार जिस सजातीय बालक को 'पुत्र' मान लिया जाता है वह 'कृत्रिम' पुत्र कहलाता है।
उत्पद्यते गृहे यस्य न य ज्ञायेत कस्य सः ।
स गृहे गूढउत्पन्नस्तस्य स्यद्यस्य तल्पजः ।। 169 ।।
जिस बालक के जन्म पर घर में उसके माता-पिता का निश्चय न हो, उसे 'गूढ़ उत्पन्न' पुत्र कहा जाता है और जो कोई भी उसे स्वीकार कर लेता है, वही उसका संरक्षक हो जाता है।
मातृपितृभ्यामुत्सृष्टः ययोरन्यतरेण वा।
यं पुत्रं परिगृह्णीयादपविद्धः स उच्यते ।। 170 ॥
माता-पिता द्वारा अथवा उनमें से किसी एक द्वारा त्यक्त अथवा किसी आवश्यकता वाले व्यक्ति द्वारा परिगृहीत पुत्र को 'अपविद्ध' समझें।
पितृवेश्मनि कन्या तु यं पुत्रं जनयेद्रहः ।
तं कानीनं वदेन्नाम्ना वोढः कन्यासमुद्भवम् ।। 171 ।।
कन्या यदि पिता के घर में गुप्त रूप से बालक को जन्म देती है और उसके बाद बालक का पिता कन्या से विवाह करके उसे अपना लेता है तो वह बालक 'कानीन' पुत्र कहा जाता है।
या गर्भिणी संस्क्रियते ज्ञाताऽज्ञातापि वा सती ।
वोढुः सगर्भो भवति सहोढ इति चोच्यते ।। 172 ।।
अनजाने में अथवा जान-बूझकर यदि गर्भवती कन्या से विवाह किया जाता है तो उसके गर्भ से जन्मा बालक उसी का होता है जिसने कन्या से विवाह किया है। इस बालक को 'सहोढ' कहा जाता है।
क्रीणीयाद्यस्त्वपत्यार्थं मातापित्रोर्यमन्तिकात्।
सः क्रीतकः सुतस्त्वस्य सदृशोऽपि वा ॥ 173 ॥
माता-पिता से मूल्य देकर खरीदा गया अथवा लगभग वैसा ही (अर्थात् माता-पिता को कीमत ने देकर उनकी इच्छा से) लिया गया बालक 'क्रीतक पुत्र' कहा जाता है।
या पत्या वा परित्यक्ता विधवा वा स्वयमिच्छ्या। उत्पादेयत्पुनर्भूत्वा स पौनर्भव उच्यते ।। 174 ॥
पति द्वारा परित्यक्त अथवा विधवा स्त्री अपनी इच्छा से किसी दूसरे व्यक्ति के साथ विवाह करके पुत्र को जन्म देती है तो ऐसे पुत्र को 'पौनर्भव' कहा जाता है।
सा चेदक्षतयोनिः स्याद्गतप्रत्यागतापि वा।
पौनर्भवेन भर्त्रा सा पुनः संस्कारमर्हति ।। 175 ॥
ऐसी स्त्री का यदि अपने पूर्व पति से सम्बन्ध ही न हुआ हो या एकाध बार पति के पास जाकर लौट आई हो तो वह जिससे संतान उत्पन्न करती है, उसके साथ उसका विवाह संभव है।
मातृपितृविहीनो यस्त्यक्तो वा स्यादकारणात्।
आत्मानं स्पर्शयेद्यस्मै स्वयंदत्तस्तु सः स्मृतः ।। 176 ॥
माता-पिता द्वारा निरपराध बालक को यदि छोड़ दिया जाता है अथवा माता-पिता विहीन बालक स्वेच्छा से जिस किसी को अपना संरक्षक मान लेता है वह उसका 'स्वयंदत्त' पुत्र कहा जाता है।
यम्ब्राह्मणस्तु शूद्रायां कामादुत्पादयेत्सुतम्।
स पारयन्येव शवस्तस्मात्पारशवः स्मृतः ।। 177 ॥
शूद्र स्त्री के गर्भ से ब्राह्मण द्वारा उत्पन्न बालक 'पारशव' अथवा 'शौद्र' कहलाता है क्योंकि वह जीवित होते हुए भी शव के समान ही है।
दास्यां वा दासदास्यां वा यः शूद्रस्य सुतो भवेत्।
सोऽनुज्ञातो हरेदंशमिति धर्मो व्यवस्थितः ॥ 178 ॥
वह शूद्र पुत्र जो दासी अर्थात् दास की स्त्री से जन्मा है, अपने पिता की सम्पत्ति में भाग रखता है-यही शास्त्रों का विधान है।
क्षेत्रजादीन्सुतानेतानेकादश यथोदितान् ।
पुत्रप्रतिनिधीनाहुः क्रियालोपान्मनीषिणः ।। 179 ।।
उपर्युक्त क्षेत्रजादि ग्यारह प्रकार के पत्रों को 'पुत्र' इसलिए कहा गया है ताकि माता-पिता के पिण्डदान की क्रिया लुप्त न हो।
य एतेऽभिहिताः पुत्राः प्रसङ्गादन्यबीजजाः ।
यस्य ते बीजतो जातास्तस्य ते नेतरस्य तु ॥ 180 ।।
जिन अन्य क्षेत्रज पुत्रों का औरस के प्रसंग से वर्णन किया गया है, वस्तुतः वे जिनके वीर्य से जन्म लेते हैं, उन्हीं के पुत्र होते हैं।
भ्रातृणामेक जातानामेकश्चेत्पुत्रवान् भवेत्।
सर्वांस्तांस्तेन पुत्रेण पुत्रिणो मनुरब्रवीत् ॥ 181 ॥
मनु महाराज का मत है कि सगे भाइयों में से यदि एक भाई के भी पुत्र हों तो सभी भाइयों को पुत्र वाला ही मानना चाहिए तथा उन्हें क्षेत्रजादि पुत्रों की प्राप्ति का प्रयत्न नहीं करना चाहिए।
सर्वासामेकपत्नीनामेका चेत्पुत्रिणी भवेत्।
सर्वास्तास्तेन पुत्रेण प्राह पुत्रवतीर्मनुः ।। 182 ।।
इसी प्रकार एक पुरुष की अनेक पत्नियों में से यदि एक भी पुत्रवती हो जाती है तो सभी स्त्रियों को पुत्रवती ही समझना चाहिए-ऐसा ही मनु जी का मत है।
श्रेयसः श्रेयसोऽलाभे पापीयान् रिक्थमर्हति ।
बहवश्चेत्तु सदृशाः सर्वेरिक्थस्य भागिनः ।। 183 ।।
यदि औरसादि पुत्र न हों तो अन्य प्रकार के पुत्र पिता की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होते हैं। समान स्थिति वाले अनेक पुत्र होने की परिस्थिति में, सम्पत्ति का बराबर विभाजन कर देना चाहिए।
न भ्रातरो न पितरः पुत्राः रिक्थहराः पितुः ।
पिता हरेदपुत्रस्य रिक्थं भ्रातर एव च ॥ 184 ।।
जो व्यक्ति पुत्रवान् है उसकी सम्पत्ति के अधिकारी केवल पुत्र ही होते हैं पिता व भाई नहीं। सभी प्रकार के पुत्रों से विहीन व्यक्ति की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी निश्चित रूप से पिता तथा भाई ही होते हैं।
त्रयाणामुदकं कार्यं त्रिषु पिण्डः प्रवर्तते।
चतुर्थः सम्प्रदातैषां पञ्चमो नोपपद्यते ॥ 185 ॥
पहले तीन प्रकार के पुत्रों को पिण्ड व उदक तर्पण का तथा चौथे प्रकार के पुत्र को केवल पिण्डदान का अधिकार होता है। पांचवें प्रकार के पुत्र को ऐसा कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता।
अनन्तरः सपिण्डाद्यास्तस्य तस्य धनं भवेत् ।
अतऊर्ध्वं सकुल्यः स्यादाचार्यः शिष्य एव वा ॥ 186 ।।
जो पुरुष पुत्रहीन है उसकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी उसके निकट सम्बन्धी (सपिण्डी) होते हैं। यदि वे भी न हों तो दूर के सम्बन्धी, उनके अभाव में आचार्य तथा आचार्य के भी न होने पर शिष्य उसकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होते हैं।
सर्वेषामप्यभावे तु ब्राह्मणाः रिक्थभागिनः ।
त्रैविद्यः शुचयो दान्तास्तथा धर्मो न हीयते ॥ 187 ॥
यदि पूर्व वर्णित-तीनों प्रकार के लोग अनुपस्थित हों तो सम्पत्ति के उत्तराधिकारी तीनों वेदों के ज्ञाता, सदाचारी व संयमी ब्राह्मण ही होते हैं। इस प्रकार धर्म की हानि नहीं होती।
अहार्यं ब्राह्मणद्रव्यं राज्ञा नित्यमितिस्थितिः ।
इतरेषां तु वर्णानां सर्वाभावे हरेन्नृपः ॥ 138 ।।
यदि ब्राह्मण संतानहीन हो तो उसकी सम्पत्ति ब्राह्मणों में ही विभाजित कर देनी चाहिए। राजा उसे अपने अधिकार में न ले किंतु अन्य वर्णों के पूर्व वर्णित उत्तराधिकारियों में योग्य ब्राह्मण भी उपलब्ध न हो तो राजा सम्पत्ति पर अधिकार कर ले। शास्त्रों का यही विधान है।
संस्थितस्यानपत्यस्य सगोत्रात्पुत्रमाहरेत् ।
तत्र यद्रिक्थजातं स्यात्तत्तस्मिन्प्रतिपादयेत् ।। 189 ।।
यदि कोई ब्राह्मण संतानविहीन ही मर जाता है तो राजा को चाहिए कि वह किसी समान गोत्र वाले व्यक्ति को समझाकर उसके पुत्र को मृत ब्राह्मण का पुत्र घोषित कर दे तथा उसी बालक को उत्तराधिकार में ब्राह्मण की सारी सम्पत्ति दे दे।
द्वौ तु यौ विवदेयातां द्वाभ्यां जातौ स्त्रियः धने।
तयोर्यद्यस्य पित्र्यं स्यात्तत्सः गृह्णीत नेतरः ॥ 190 ॥
यदि दो पिताओं व एक माता से जन्मे पुत्रों में पिता की सम्पत्ति के बंटवारे को लेकर मतभेद हो तो दोनों पिताओं के पुत्रों को अपने-अपने पिता का धन दिलवाया जाए-एक को दूसरे का धन कदापि नहीं।
जनन्यां संस्थितायां तु समं सर्वे सहोदराः ।
भजेरन्मातृकं रिक्थं भगिन्यश्च सनाभयः ।। 191 ॥
सभी भाई तथा बहिनें मां की मृत्यु के पश्चात् उसकी सम्पत्ति अपने बीच समान रूप से विभाजित कर लें।
यास्तासां स्युर्दुहितरस्तासामपि यथार्हतः । मातामह्या धनात्किञ्चित्प्रदेयं प्रीतिपूर्वकम् ।। 192 ।।
पुत्रियों की अविवाहित कन्याओं को भी नानी के धन से प्रेम-पूर्वक थोड़ा-बहुत धन प्रदान करना चाहिए।
अध्यग्न्यध्यावाहनिकं दत्तञ्च प्रीतिकर्मणि ।
भ्रातृमातृपितृप्राप्तं षड्विधं स्त्रीधनं स्मृतम् ॥ 193 ॥
विवाद के समय अग्नि के समक्ष माता-पिता द्वारा दिया गया धन, गृह-प्रवेश, पुत्र-जन्मादि समारोहों में बुलाकर दिया गया धन, प्रीतिकर्म एवं समयान्तर में पति द्वारा दिया गया धन, पिता, माता तथा भाई द्वारा दिया गया धन- ये छः प्रकार के स्त्री धन हैं।
अन्वाधेयं च यद्दत्तं पत्याप्रीतेन चैव यत् ।
हा पत्यौजीवति वृत्तायाः प्रजायास्तद्धनं भवेत् ।। 194 ।।
विवाह में तथा उसके बाद पति के परिवार वालों द्वारा तथा पति द्वारा प्रेमपूर्वक स्त्री को दिए गए धन पर संतान का अधिकार तो होता है पर पति का अधिकार नहीं होता।
ब्राह्मदैवार्षगन्धर्वप्राजापत्येषु यद्वसु ।
अप्रजायामतीतायां भर्तुरेव तदिष्यते ।। 195 ।।
ब्राह्म, दैव, आर्ष, गान्धर्व तथा प्राजापत्य- इन पांच प्रकार के विवाहों में पति
के जीवित रहते यदि स्त्री पुत्रविहीन ही मृत्यु को प्राप्त हो, तो पूर्व वर्णित छः प्रकार के स्त्री धन पर पति का अधिकार माना जाता है।
यत्त्वस्याः स्याद्धनं दत्तं विवाहेष्वासुरादिषु।
अप्रजायामतीतायां मातापित्रोस्तदिष्यते ।। 196 ।।
यदि विवाह असुरादि रीति से हुआ है तो पति के जीवित रहते संतानविहीन स्त्री की मृत्यु के बाद स्त्री धन पर माता-पिता का अधिकार होता है पति का नहीं।
स्त्रियां तु यद्भवेद्वित्तं पित्रा दत्तं कथञ्चन।
ब्राह्मणीतद्धरेतकन्या यदपत्यस्य वा भवेत् ॥ 197 ॥
यदि ब्राह्मणी की कन्या है तो पिता द्वारा किसी भी रूप में दिए गए अथवा स्त्री द्वारा स्वयं अर्जित धन पर उसी का अधिकार समझा जाता है।
न निर्धारं स्त्रियः कुर्युः कुटुम्बाद्बहुमध्यगात्।
स्वकादपि च वित्ताद्धि स्वस्य भर्तुरनाज्ञया ।। 198 ।।
परिवार के अथवा पति की आज्ञा बिना अपने धन से स्त्री को लोभवश व्यापार नहीं करना चाहिए।
पत्यौ जीवति यः स्त्रीभिरलङ्कारोधृतोभर्वेत् ।
न तं भजेरन्दायादाः भजमानाः पतन्ति ते । 199 ।।
स्त्री ने पति के जीवनकाल में जो भी आभूषण पहने हों उसका बंटवारा नहीं करना चाहिए। ऐसा करने पर उत्तराधिकारी धर्मभ्रष्ट हो जाते हैं।
अनंशौ क्लीबपतितौ जात्यन्धबधिरौ तथा।
उन्मत्तजडमूकाश्च ये च केचिन्निन्द्रियः ।। 200 ।।
जो पुत्र नपुंसक, धर्मभ्रष्ट जाति से निष्कासित, जन्मान्ध, बहरा, पागल, मूर्ख, गूंगा, निरिन्द्रीय हो-वह अपने पिता का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता।
सर्वेषामपि तु न्याय्यं दातुंशक्त्या मनीषिणा।
ग्रामाच्छादनमत्यन्तं पतितो ह्यददद् भवेत् ॥ 201 ॥
विवेकशील व्यक्ति को चाहिए कि उपर्युक्त बन्धुओं को सामर्थ्यानुसार जीवन भर भोजन वस्त्रादि दे। ऐसा न करने वाला धर्मभ्रष्ट हो जाता है।
यद्यर्थिता तु दारैः स्यात्क्लीवादीनां कथञ्चन।
तेषामुत्पन्नतन्तू नामपत्यं दायमर्हति ।। 202 ।।
जैसा कि सम्पत्ति के अनधिकारी पहले बताए गए हैं, यदि उनमें से कोई विवाह कर लेता है, तो उसकी संतान को उनका भाग मिलना चाहिए।
यत्किञ्चित्पितरि प्रेते धनं ज्येष्ठोऽधिगच्छति ।
भागो यवीयसां तत्र यदि विद्यानुपालितः ॥ 203 ।।
ज्येष्ठ भाई को पिता की मृत्यु के पश्चात् जो धन मिलता है उसमें छोटे भाई यदि गुणी हों तो उन्हें भी उनका भाग देना चाहिए।
अविद्यानां तु सर्वेषामीहातश्चेद्धनं भवेत् ।
समस्तत्र विभागः स्यादपित्र्य इति धारणा ॥ 204 ॥
सभी विवेकशील भाइयों द्वारा पैतृक धन के अतिरिक्त जो कुछ उन्होंने श्रम से अर्जित किया है उसे आपस में बराबर बांट लेना चाहिए।
विद्याधनं तु तद्यस्य तत्तस्यैव धनं भवेत्।
मैत्र्यमौद्वाहिकं चैव माधुपर्किकमेव च ।। 205 ।।
जो धन विद्या से, मित्रों से तथा विवाह में कन्या पक्ष से मिले तथा मधुपर्क दान में मिलता है उस पर केवल उसी व्यक्ति विशेष का अधिकार होता है।
भ्रातृणां यस्तु नेहेत धनं शक्तः स्वकर्मणा।
सनिर्भाज्यः स्वकादंशात्किञ्चिद्दत्वोपजीविनम् ।। 206 ।।
यदि भाइयों में से एक अपने श्रम से धनार्जन करना चाहता हो और अपने भाइयों के भाग से कुछ भी नहीं लेना चाहता, उसको उसके अंश का निर्वाह योग्य धन देकर अलग कर दें।
अनुपघ्नन्पितृद्रव्यं श्रमेण यदुपार्जितम्।
स्वयमीहितलब्धं तन्नाकामोदातुमर्हति ।। 207 ॥
जो भाई पिता के धन को व्यय नहीं करता और अपने परिश्रम से ही धनार्जन करता है यदि उसकी इच्छा न हो तो वह अपने भाइयों में धन बांटने को बाध्य नहीं होता।
पैतृकं तु पिता द्रव्यमनवाप्तं यदाप्नुयात्।
न तत्पुत्रैर्भजेत्सार्धमकामः स्वयमर्जितम् ॥ 208 ।।
यदि पहले न पाए धन को पिता अपने परिश्रम से प्राप्त करने में सफल हो जाए तो इच्छा न होने पर उस धन को तथा अर्जित धन को अपने पुत्रों में विभाजित न करे।
विभक्ताः सह जीवन्तो विभजेरन् पुनर्यदि ।
समस्तत्र विभागः स्याज्ज्यैष्ठ्यं तत्र न विद्यते ।। 209 ॥
यदि एक बार सम्पत्ति विभाजन हो जाता है, उसके बाद फिर सभी भाई संयुक्त रूप से व्यापार करने लगते हैं, तो फिर से बंटवारा होने पर सभी भाइयों को समान भाग मिलना चाहिए। बड़ा भाई कुछ भी अतिरिक्त पाने का अधिकारी नहीं होता।
येषां ज्येष्ठः कनिष्ठो वा हीयेतांश प्रदानतः ।
नियेतान्यतरोवापि तस्य भागो न लुप्यते ॥ 210 ॥
यदि कोई छोटा अथवा बड़ा भाई अपना भाग किसी कारणवश लेने से वंचित रह जाए या मर जाए तो भी उसके भाग का लोप नहीं होता।
सोदर्याः विभजेरंस्तं समेत्य सहिताः समम्।
भ्रातरो ये च संसृष्टाः भगिन्यश्च सनाभयः ।। 211
यदि कोई भाई संन्यास ले लेता है या मृत्यु को प्राप्त होता है तो उसके शेष सगे भाई व सगी बहिनों को मिलकर पैतृक सम्पत्ति का समान भाग कर लेना चाहिए।
यो ज्येष्ठोविनिकुर्वीत लोभाद्भातृन्यवीयसः ।
सोऽज्येष्ठो स्यादभागश्च नियन्तव्यश्च राजभिः ।। 212 ।।
राजा का कर्तव्य है कि छोटे भाइयों को ठगने वाले ज्येष्ठ भाई को उसके अधिकार से वंचित करके उसे दण्ड दे।
सर्व एव विकर्मस्था नार्हन्ति भ्रातरो धनम्।
न चाऽदत्त्वाकनिष्ठेभ्योज्येष्ठः कुर्वीतयौतुकम् ।। 213 ॥
जो भाई शास्त्र विरोधी आचरण करते हैं वे पैतृक धन के उत्तराधिकारी होने के योग्य नहीं। ज्येष्ठ भाई द्वारा अपने छोटे भाइयों को उनका भाग दिए बिना पैतृक धन को व्यापार में नहीं लगाना चाहिए।
भ्रातृणामविभक्तानां यद्युत्थानं भवेत्सह।
न पुत्रभागं विषमं पिता दद्यात्कथञ्चन ।। 214 ।।
यदि सभी भाई मिल-जुलकर रहते हैं तथा संयुक्त रूप से धनार्जन करते हैं उन्हें बंटवारे में विषमता नहीं बरतनी चाहिए अर्थात् समान रूप से विभाजन करना चाहिए।
ऊर्ध्व विभागाज्जातस्तु पित्र्यमेव हरेद्धनम् ।
संसृष्टास्तेन वा ये स्युर्विभजेत स तैः सह ।। 215 ।।
पिता अपने जीवनकाल में ही अपने धन का पुत्रों में बंटवारा कर दे और इसके बाद यदि उसके पुत्र उत्पन्न हो जाए तो वह पुत्र अपने पिता की बची हुई सम्पत्ति का ही अधिकारी होता है। जो भाई पिता के साथ रहते हों, उनके साथ भी विभाजन सम्भव है।
अनपत्यस्य पुत्रस्य माता दायमवाप्नुयात् ।
मातर्यपि च वृत्तायां पितुर्माता हरेद्धनम् ॥ 216 ।।
पुत्र यदि संतान रहित है तो उसका दाय भाग मां को लेना चाहिए और माता की मृत्यु पर उसकी दादी को।
ऋणे धने च सर्वस्मिन्प्रविभक्ते यथाविधि।
पश्चादृश्येत यत्किञ्चित्तत्सर्वं समतां नयेत् ।। 217 ॥
यदि ऋण व धन का सभी भाइयों में उचित विभाजन हो गया हो और उसके बाद कुछ नया पता चले तो उसे भी समान रूप से विभाजित कर लेना चाहिए।
वस्त्रं पत्रमलङ्कारं कृतान्नमुदकं स्त्रियः।
योगक्षेमं प्रचारं च न विभाज्यं प्रचक्षते ॥ 218 ॥
वस्त्र, वाहन, आभूषण, पका हुआ अन्न व जल, स्त्रियां और निर्वाह की अन्य विविध आवश्यक वस्तुएं विभाजन योग्य नहीं होतीं।
अयमुक्तो विभागो वः पुत्राणां च क्रियाविधिः ।
क्रमशः क्षेत्रजादीनां द्यूतधर्म निबोधत ॥ 219 ॥
भृगु जी बोले-विप्रो ! औरस - क्षेत्रज आदि पुत्रों के बीच पिता की सम्पत्ति विभाजन संबंधी विधान के बारे में मैंने आपको बताया। अब मैं आपको द्यूत के विषय में निश्चित नियमों के बारे में बतलाता हूं।
द्यूतं समाह्वयं चैव राजा राष्ट्रान्निवारयेत्।
राज्यान्तकरणावेतौ द्वौ दोषौ पृथिवीक्षिताम् ।। 220 ॥
अपने राज्य में राजा द्वारा द्यूत व समाह्वय को निषेध कर देना चाहिए। ये दोनों ही राज्य के लिए विनाशकारी तत्व हैं।
प्रकाशमेतत्तास्कर्यं यद्देवनरासुराह्वयौ।
तयोर्नित्यं प्रतीघाते नृपतिर्यत्नवान्भवेत् ।। 221 ।।
द्यूत व समाह्वय दोनों ही खुलेआम डकैती के बराबर हैं और देवों, मनुष्यों व असुरों का सर्वस्व विनाश कर देते हैं। अतः इन दोनों दोषों को दूर करने में राजा सदा प्रयत्नशील रहे- यही विधान है।
अप्राणिभिर्यत्क्रियते तल्लोके द्यूतमुच्यते ।
प्राणिभिः क्रियतेयस्तु सः विज्ञेयः समाह्वयः ।। 222 ।।
जिस खेल में कौड़ी, रुपया, पैसा- इन निर्जीव वस्तुओं से हार-जीत का निश्चय हो-वह खेल जुआ कहलाता है। पशु-पक्षी, स्त्री व पुरुषादि सजीव प्राणियों को दांव पर रखकर खेले जाने वाले खेल का नाम समाह्वय है।
द्यूतं समाह्वयं चैव यः कुर्यात्कारयेत वा।
तान्सर्वान्धातयेद्राजा शूद्रांश्च द्विजलिङ्गनीः ।। 223 ।।
जो लोग द्यूत व समाह्वय जैसे खेलों का आयोजन करवाते हैं या जो शूद्र ब्राह्मण के चिह्न धारण करते हैं. उनको राजा द्वारा मृत्युदण्ड देना चाहिए अथवा कठोर शारीरिक दण्ड देना चाहिए।
कितवान्कुशीलवान्क्रूरान्याषण्डस्थांश्च मानवान् । विकर्मस्थान्शौण्डिकांश्च क्षिप्रं निर्वासयेत्पुरात् ।। 224 ।।
राजा को उन मनुष्यों को नगर से निर्वासित कर देना चाहिए जो जुआ खेलते हैं, धूर्त, क्रूर, पाखण्डी होते हैं तथा घृणित कार्य करते हैं।
एते राष्ट्र वर्तमाना राज्ञः प्रच्छन्नतस्कराः ।
विकर्म क्रिययानित्य बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः ॥ 225 ॥
वास्तविकता तो ये है कि ऐसे लोग राज्य में प्रच्छन्न डाकू होते हैं और वे हमेशा अपने कुकर्मों से भोली-भाली प्रजा को कष्ट देते रहते हैं।
द्यूतमेतत्पुराकल्पे दृष्टं वैरकरं महत्।
तस्माद्यूतं न सेवेत हास्यार्थमपि बुद्धिमान् ।। 226 ।।
इतिहास साक्षी है कि द्यूत वह घृणित कृत्य है जो खिलाडियों में शत्रुता पैदा कर देता है। अतः विवेकशील पुरुष को मनोरंजन के लिए भी द्यूत-क्रीड़ा में भाग नहीं लेना चाहिए।
प्रच्छन्नं वा प्रकाशं वा तन्निषेवेत यो नरः ।
तस्य दण्डविकल्पः स्याद्यथेष्टं नृपतेस्तथा ।। 227 ।।
राजा उन लोगों को यथोचित एवं यथेष्ट दण्ड दे जो प्रच्छन्न अथवा प्रकट रूप से जुआ खेलते हैं।
क्षत्रविद् शूद्रयोनिस्तु दण्डं दातुमशक्नुवन्।
आनृण्यं कर्मणा गच्छेद्विप्रो दद्याच्छन्नैः शनैः ।। 228 ।।
द्यूत खेलने के अपराध में जो क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र दरिद्रतावश राजदण्ड देने में असमर्थ हों, उन्हें राजा की सेवा करके राजदण्ड से उऋण होना चाहिए। किन्तु ब्राह्मण को चाहिए कि वह धीरे-धीरे भुगतान करने की सुविधा जुटाए।
स्त्री बालोन्मत्तवृद्धानां दरिद्राणां च रोगिणाम्। शिफाविदलरज्ज्वाद्यै विद्ध्यान्नृपतिर्दमम् ।। 229 ।।
जो स्त्री, बालक, पागल, वृद्ध, गरीब व रुग्ण जुआ खेलें उन्हें राजा को बेंतों,चाबुकों व रस्सियों से पिटवाना चाहिए और उन्हें बांध कर रखना चाहिए।
ये नियुक्तास्तुकार्येषु हन्युः कार्याणि कार्यिणाम्।
धनोष्मणा पञ्चमानांस्तान्निस्वान्कारयेन्नृपः ।। 230 ।।
राजा को चाहिए कि वह उन लोगों का सब कुछ छीनकर उन्हें सेवा निवत्त कर दे जो द्यूत आदि कार्यों को रोकने के लिए नियुक्त होने पर भी रिश्वत आदि लेकर इसके निवारण की बजाय इसके प्रसारण में लगे हों।
कूटशासनकर्तृश्च प्रकृतीनां च दूषकान् ।
स्त्रीबालब्राह्मणघ्नांश्च हन्याद् द्विट्सेविनस्तथा ।। 231 ॥
राजा के चिह्न की नकल से अपना मतलब निकालने वालों, प्रजा को भ्रष्ट करने में रत लोगों, स्त्रियों, बालकों व ब्राह्मणों की हत्या करने वाले और शत्रु से सांठ-गांठ करने वाले लोगों को राजा द्वारा शीघ्र अति शीघ्र मरवा डालना चाहिए।
तीरितं चानुशिष्टं च यत्र क्वचन तद्भवेत्।
कृतं तद्धर्मतो विद्यान्न तद्भूयो निवर्तयेत् ।। 232 ।।
जिस विवाद का अंतिम निर्णय हो चुका हो और अपराधी दण्ड भी भोग चुका हो, उस विवाद को किसी भी प्रकार पुनः नहीं उठने देना चाहिए।
अमात्याः प्राङ्गिङ्ङ्गवाको वा यत्कुर्युः कार्यमन्यथा । तत्स्वयंनृपतिः कुर्यात्तान्सहस्त्रं च दण्डयेत् ।। 233 ।।
उस सुलझे हुए विवाद को जो वादी या प्रतिवादी मंत्री अथवा वकील के माध्यम से फिर उठाना चाहें, तो राजा को इसकी अनुमति नहीं देनी चाहिए और उन पर एक हजार रुपए का दण्ड लगाना चाहिए।
ब्रह्महा च सुरापश्च स्तेयी च गुरुतल्पगः ।
एते सर्वे पृथग्ज्ञेयाः महापातकिनो नराः ।। 234 ।।
जो व्यक्ति ब्राह्मण को मारे, मदिरापान करे, चोरी व गुरु पत्नी से व्यभिचार करे-उसे महापापी मनुष्य मानें।
चतुर्णामपि चैतेषां प्रायश्चित्तमकुर्वताम् ।
शरीरं धनसंयुक्तं दण्डं धर्यं प्रकल्पयेत् ॥ 235 ।।
इन चार प्रकार के पापों का प्रायश्चित न करने पर राजा द्वारा अपराधी को धर्मानुसार शारीरिक व आर्थिक दण्ड देना चाहिए।
गुरुतल्पे, भगः कार्यः सुरापाने सुराध्वजः ।
स्तेयेऽश्वपदकं कार्यं ब्रह्मण्यशिराः पुमान् ॥ 236 ॥
जो पापी गुरु पत्नी से व्यभिचार करे, मदिरापान करे तथा चोर हो उसके मस्तक पर तपे हुए लोहे से क्रमशः भग, सुरापात्र तथा कत्ते के पैर का चिह्न अंकित कर देना चाहिए।
असम्भोज्याः ह्यसंयाज्याः असम्पाठ्याऽविवाहिनः ।
चरे युः पृथिवीं दीनाः सर्वधर्मबहिष्कृताः ।। 237 ।।
ये तीन प्रकार के व्यक्ति पंक्ति में बैठा कर भोजन कराने, स्वाध्याय, यज्ञ-यागादि करने के अधिकारी नहीं होते। न ही इनके साथ विवाह सम्बन्ध स्थापित करने चाहिए। सभी धर्मों से बहिष्कृत लोग इस धरती पर दीन-हीन रूप में ही विचरण करते हैं।
ज्ञातिसम्बन्धिनस्त्वेते त्यक्तव्याः कृतलक्षणाः ।
निर्देयाः निर्नमस्कारास्तन्मनोरनुशासनम् ।। 238 ।।
भग, सुरापात्र तथा कुत्ते के पैर के चिह्न से अंकित लोगों को सम्बन्धियों व बिरादरी वालों द्वारा त्यज देना चाहिए। ये दया के योग्य नहीं होते, न ही इन्हें नमस्कार करना चाहिए। मनु महाराज द्वारा उक्त यही नियम है।
प्रायश्चित्तं तु कुर्वाणाः सर्ववर्णाः यथोदितम्।
नाङ्कया राज्ञा ललाटे स्युर्दाप्यास्तूत्तमसाहसम् ।। 239 ।।
सभी वर्गों के वे लोग जो शास्त्रोक्त रीति से प्रायश्चित करते हैं, उन पर ये चिह्न अंकित नहीं करने चाहिए। उन पर केवल 'उत्तम साहस' का दण्ड ही लगाना चाहिए।
आगः सु ब्राह्मणस्यैव कार्यो मध्यमसाहसः ।
विवास्योवा भवेद्राष्टात्सद्रव्यः सपरिच्छदः ।। 240 ।।
यदि ब्राह्मण इस प्रकार का अपराध करे तो उसे मध्यम साहस का दण्ड देना = चाहिए या उसे उसके धनादि सहित देश से निष्कासित कर देना चाहिए।
इतरे कृतवन्तस्तु पापान्येतान्यऽकामतः ।
सर्वस्वहारयर्हन्ति कामतस्तु प्रवासनम् ।। 241 ।।
अन्य वर्णों के लोगों द्वारा यदि विवशता में ये कुकर्म किए गए हों तो राजा को उनका सर्वस्व छीन लेना चाहिए और यदि स्वेच्छा से ये कर्म किए गए हों तो उस व्यक्ति को देश से निर्वासित कर देना चाहिए।
ना ददीत नृपः साधुर्महापातकिनो धनम्।
अददानस्तु तल्लोभात्तेन दोषेण लिप्यते ॥ 242 ।।
महापापी के धन को राजा कदापि ग्रहण न करे। जो राजा लोभवश इस धन को स्वीकारता है वह भ्रष्ट व पापी हो जाता है।
अप्सु प्रवेश्य तं दण्डं वरुणायोपपादयेत्।
श्रूतवृत्तोपपन्ने वा ब्राह्मणे प्रतिपादयेत् ।। 243 ।।
यदि राजा इन महापापियों का दण्ड स्वीकार भी कर लेता है, तो उसे जल से धोकर वरुण के यज्ञ में लगा देना चाहिए या वेद-विद्या में लगे विद्वानों को दान कर देना चाहिए।
ईशोदण्डस्य वरुणो राज्ञां दण्डधरोहि सः ।
ईशः सर्वस्य जगतो ब्राह्मणः वेदपारगः ।। 244 ।।
वेद विद्या में निपुण विद्वान ब्राह्मण उसी प्रकार इस सारे संसार का स्वामी होता है जिस प्रकार दण्ड के स्वामी वरुण का प्रतिनिधि तुल्य राजा दण्ड देने का अधिकारी होता है।
यत्र वर्जयते राजा पापकृद्भ्यो धनागमम्।
तत्र कालेन जायन्ते मानवाः दीर्घजीविनः ।। 245 ।।
उस देश के प्रजाजन दीर्घायु होते हैं, जिस देश का राजा इन पापियों के धन को स्वीकार नहीं करता।
निष्पद्यन्ते च सस्यानि यथोप्तानि विशां पृथक् ।
बालाश्च न प्रमीयन्ते विकृतं न च जायते ।। 246 ।।
जो राजा पापियों के धन को ग्रहण नहीं करता, उसके राज्य में धान्य प्रचुर मात्रा में पैदा होते हैं, बालक नहीं मरते और अन्य प्रकार के विकार भी नहीं होते।
ब्राह्मणान्बाधमानं तु कामादऽऽवरवर्णजम्। हन्याच्चित्रैर्वधोपायैरुद्वेजनकरैर्नृपः 11 247 ।।
जो व्यक्ति जानबूझ कर ब्राह्मणों को कष्ट दे, निरर्थक मार-पीट करे उसको तथा शूद्रादि को राजा द्वारा कठोर उपायों से नियंत्रित करना चाहिए।
यावानऽवध्यस्य वधेत्तावान्वध्यस्य मोक्षणे ।
अधर्मो नृपतेर्दृष्टो धर्मस्तु विनियच्छतः ।। 248 ।।
जो वध करने योग्य है उसको राजा द्वारा छोड़े जाने पर वैसा ही पाप लगता है जैसा कि अवध्यों के वध पर। ऐसा धर्मशास्त्रों में कहा गया है। दोनों ही स्थितियों में धर्म की अवज्ञा पाप है।
उदितोऽयं विस्तरशो मिथो विवदमानयोः ।
अष्टादशसु मार्गेषु व्यवहारस्य निर्णयः ।। 249 ।।
भृगु जी ने कहा- महर्षियो ! इस प्रकार मैंने आपको को सुलझाने की विधि बतलाई। अट्ठारह तरह के विवादों
एवं धर्याणि कार्याणि सम्यक्कुर्वन्महीपतिः । देशानलब्धांल्लिप्सेत लब्धांश्च परिपालयेत् ॥ 250 ।।
इस प्रकार धर्मकार्यों की भली-भांति देख-रेख करते हुए राजा को अप्राप्त देशों को विजित करने का तथा प्राप्त देशों की रक्षा का प्रयास करना चाहिए।
सम्यग्निविष्टदेशस्तु कृतदुर्गश्च शास्त्रतः ।
कण्टकोद्धरणे नित्यमातिष्ठेद्यत्नमुत्तमम् ।। 251 ।।
जो राज्य भली-भांति बसा हुआ हो उसे राजा को शास्त्रोक्त रीति से दुर्गादि बनवा कर सुरक्षित कर लेना चाहिए तथा शत्रुओं व डाकुओं के नाश के लिए निरंतर श्रेष्ठ प्रयत्न करते रहना चाहिए।
रक्षणादार्यवृत्तानां कण्टकानां च शोधनात् ।
नरेन्द्रास्त्रिदिवं यान्ति प्रजापालनतत्पराः ।। 252 ।।
वही राजा स्वर्ग की प्राप्ति करता है जो सज्जनों की रक्षा और चोर-डाकुओं से प्रजा की रक्षा करते हुए प्रजा के पालन में उद्यत रहता हो।
आशसंस्तस्करान्यस्तु बलिं गृह्णाति पार्थिवः ।
तस्य प्रक्षुभ्यते राष्ट्र स्वर्गाच्च परिहीयते ॥ 253 ।।
जो राजा प्रजा से केवल कर वसूलता रहे और चोर-डाकुओं को दण्ड न देता हो-उसकी प्रजा में क्षोभ फैलता है और वह राजा नरक को प्राप्त होता है।
निर्भयं तु भवेदस्य राष्ट्र बाहुबलाश्रितम् ।
तस्य तद्वर्धते नित्यं सिच्यमान इव द्रुमः ।। 254 ।।
जिस राज्य की प्रजा अपने राजा के बाहुबल से सुरक्षित रहती है, वह राज्य ठीक उसी प्रकार बढ़ता है जिस प्रकार नियमित रूप से सींचा गया वृक्ष फलता-फूलता है।
द्विविधांस्तस्करान्विद्यात्हरन् द्रव्याऽपहारकान् । प्रकाशांश्चाऽप्रकाशांश्च चारचक्षर्महीपतिः ।। 255 ।।
जो राजा प्रजा की देख-रेख करता है उसे गुप्त रूप से गुप्तचरों द्वारा तथा प्रकट रूप में दूसरों का धन छीनने वाले चोरों पर नजर रखनी चाहिए।
प्रकाशवञ्चकास्तेषां नाम पण्योपजीविनः ।
प्रच्छन्नवञ्चकास्त्वेते ये स्तेनाऽटविकादयः ।। 256 ।।
जो व्यापारी अनेक प्रकार के कारोबार करते हैं वे प्रकट अर्थात् प्रत्यक्ष चोर होते हैं तथा चोर व जंगलों में रहने वाले लुटेरे प्रच्छन्न चोर होते हैं।
उत्कोचकाश्चोपधिका पञ्चकाः कितवास्तथा ।
मङ्गलादेशवृत्ताश्च भद्राश्चेक्षणिकैः सह ।। 257 ।।
असम्यक्कारिणश्चैव महामात्राश्चिकित्सकाः ।
शिल्पोपचारयुक्ताश्च निपुणाः पण्ययोषितः ।। 258 ।।
एवमादीन्विजानीयात्प्रकाशांल्लोककण्टकान् । निगूढचारिणश्चान्याननार्यालिङ्गिनस्तथा II 259 ।।
राजा को चाहिए कि वह गुप्तचरों के माध्यम से प्रकट चोरों की खबर भी रखे। ये प्रकट चोर इस प्रकार के होते हैं- रिश्वतखोर, धमका कर धन ऐंठने वाले, धोखेबाज, जुआरी, राजा के नाम पर भलाई होने की सूचना देकर धन लूटने वाले, भद्र उपायों से लूटने वाले, ज्योतिष के नाम पर धोखा देने वाले, उच्च कर्मचारी, चिकित्सक, धूर्त व्यक्ति तथा वेश्याएं।
प्रत्यक्ष रूप से प्रजा को ठगने वाले और आर्य वेश में विचरण करते अनार्यों की सूचना राजा के पास होनी चाहिए।
तान्विदित्वा सुचरितैर्मूढैस्तत्कर्मकारिभिः ।
चारैश्चानेकसंस्थानैः प्रोत्साद्य वशमानयेत् ।। 260 ।।
पूर्वोक्त ठगों जैसा ही काम करने वाले तथा अनेक विविध सूचनाएं देने वाले गुप्तचरों द्वारा राजा को चोरों को पकड़वा कर अपने नियंत्रण में कर लेना चाहिए।
तेषां दोषानभिख्याप्य स्वे स्वे कर्मणि तत्त्वतः ।
कुर्वीत शासनं राजा सम्यक्सारापराधतः ।। 261 ॥
इस प्रकार के प्रत्यक्ष व प्रच्छन्न चोरों को पकड़वा कर राजा को उन्हें उनके दोषों से अवगत कराना चाहिए तत्पश्चात् उनके अपराध व सामर्थ्य के अनुसार शारीरिक तथा आर्थिक दण्ड निश्चित करना चाहिए।
न हि दण्डादृते शक्यः कर्तुं पापविनिग्रहः ।
स्तेनानां पापबुद्धीनां निभृतं चरतां क्षितौ ।। 262 ॥
यह सम्भव नहीं कि साधु वेश में विचरने वाले चोर-डाकुओं व पापकर्म करने वालों को दण्डित किए बगैर ही पाप पर अंकुश लगाया जा सके।
सभाप्रपापूपशाला वेशमद्यन्नविक्रयाः ।
चतुष्पथाश्चैत्यवृक्षाः समाजा प्रेक्षणानि च ।। 263 ।।
जीर्णोद्यानान्यरण्यानि कारुकावेशनानि च।
शून्यानि चाप्यगाराणि वनान्युपवनानि च ।। 264 ।।
एवं विद्यान्नृपो देशान्गुल्मैः स्थावरजङ्गमैः ।
तस्करप्रतिषेधार्थं चौरैश्चाप्यनुचारयेत् ।। 265 ।।
निम्नलिखित स्थानों पर तस्करी रोकने के लिए राजा द्वारा स्थिर व चलती-फिरती चौकसी टुकड़ियां रखवानी चाहिए तथा गुप्तचरों की नियुक्ति भी आवश्यक है, लोगों के एकत्रित होने का स्थान, प्याऊ, हलवाई की दुकान, वेश्यालय, मदिरालय, अनाज मण्डी, चौराहा, विशाल व सुप्रसिद्ध वृक्ष, लोगों के मेले का स्थान, तमाशे के स्थान, उजड़ी वाटिका, घने वन, शिल्पगृह, बाग-बगीचे, उजड़े हुए घर, वन-उपवनादि ।
तत्सहायैरनुगतैर्नानाकर्मप्रवेदिभिः ।
विद्यादुत्सादयेच्चैव निपुणैः पूर्वतस्करैः ।। 266 ।।
चोरों के सहायकों और उनके कार्यों को जानने वाले तथा पहले चोर रहे किन्तु अब राजा की सेवा में नियुक्त गुप्तचरों द्वारा राजा को डाकुओं की सूचना एकत्रित कर उन्हें पकड़ कर दण्ड देना चाहिए। इस प्रकार राजा तस्करी जैसे कृत्य को जड़ से समाप्त कर दे।
भक्ष्यभोज्योपदेशैश्च ब्राह्मणानां च दर्शनैः ।
चौर्यकर्मापदेशैश्च कुर्युस्तेषां समागमम् ॥ 267 ।।
जासूसों द्वारा तस्करों को उत्तम भोजन खिलाने, ब्राह्मण के दर्शन के बहाने तथा चोरों को चोरी आदि कार्य करने के बहाने पूर्व निर्धारित स्थान पर लाकर पकड़वा देना चाहिए।
ये तत्र नोपसर्पेयुर्मूलप्रणिहिताश्च ये।
तान्प्रसह्य नृपो हन्यात् समित्रज्ञातिबान्धवान् ।। 268 ।।
यदि पकड़े जाने के भय से तस्कर जासूसों के जाल में न आएं तथा गुप्तचरों के साथ रहते हुए भी चतुराई से बच निकलें तो राजा द्वारा उन्हें सैनिक भेजकर बलपूर्वक पकड़वा लेना चाहिए और मित्रों तथा सम्बन्धियों समेत उनका वध कर देना चाहिए।
न होढेन बिना चौरं घातयेद्धार्मिको नृपः ।
सहौढं सोपकरणं च घातयेदविचारयन् ।। 269 ।।
यदि चोरी का अपराध सिद्ध नहीं होता है तो धर्म का पालन करने वाले राजा का कर्तव्य है कि वह चोर को मृत्युदण्ड न दे किन्तु प्रत्यक्ष में चोरी का प्रमाण देखते ही राजा तत्काल चोर का वध करवा दे।
ग्रामेष्वपि च ये किञ्चिच्चौराणां भक्तदायकाः । भाण्डावकाशदाश्चैव सर्वांस्तानपि घातयेत् ।। 270 ।।
जो लोग तस्करों को गांव में भोजन, पात्र, शरण व आश्रय देते हैं राजा को उन सभी लोगों का वध करवा देना चाहिए।
राष्ट्रेषु रक्षाधिकृतां सामस्तांश्चैव चोदितान् ।
अभ्याघातेषु मध्यस्थांशिष्याञ्चौरानिवद्रुतम् ।। 271 ।।
जो लोग राज्य की रक्षा में और सीमा की सुरक्षा के लिए नियुक्त किए गए हों यदि वे भी गुप्त रूप से तस्करी के कर्म में संलग्न पाए जाते हैं तो राजा को उन्हें भी तत्काल मरवा देना चाहिए।
यश्चापि धर्मसमयात्प्रच्युतो धर्मजीविनः ।
दण्डेनैव तमप्योषेत् स्वकाद्धर्माद्धि विच्युतम् ।। 272 ।।
जो व्यक्ति न्याय के आसन पर बैठकर चरित्र से भ्रष्ट हो जाता है उस पतित व्यक्ति को राजा द्वारा दण्ड मिलना चाहिए।
ग्रामघाते हिताभङ्गे पथियोषाभिमर्शने। शक्तितोनाभिधावन्तोनिर्वास्याः सपरिच्छदाः ।। 273 ।।
गांव के आसपास रहने वाले लोग यदि गांव लूटने वालों, आगजनी करने वालों और राह चलती स्त्रियों को छेड़ने वाले लोगों को पकड़ने में मदद नहीं करते, राजा को उन्हें सपरिवार राज्य से निष्कासित कर देना चाहिए।
राज्ञः कोषोपहतॄश्च प्रतिकूलेषु च स्थितान् । घातयेद्विविधैर्दण्डैररीणां चोपजापकान् ॥ 274 ।।
जो लोग राजा के खजाने में चोरी करते हैं, राजा की अवज्ञा करते हैं तथा शत्रुओं से मिले हुए होते हैं उन्हें राजा द्वारा प्राणघातक दण्ड दिया जाना चाहिए।
सन्धिं छित्त्वा तु ये चौर्य रात्रौ कुर्वन्ति तस्कराः ।
तेषांछित्त्वा नृपो हस्तौ तान् शूले विनिवेशयेत् ।। 275 ॥
जो डाकू रात में घरों में सेंध लगाकर चोरी करते हैं, राजा को उनके हाथ कटवा देने चाहिए और उन्हें सूली पर चढ़ा देना चाहिए।
अंगुलीग्रन्थिभेदस्य छेदयेत्प्रथमे ग्रहे।
द्वितीये हस्तचरणौ तृतीये वधमर्हति ।। 276 ।।
यदि कोई जेबकतरा पहली बार चोरी करते हुए पकड़ा जाए तो उसकी उंगलियां कटवा देनी चाहिए, दूसरी बार पकड़े जाने पर हाथ-पैर काट देने चाहिए तथा तीसरी बार पकड़े जाने पर उसको मृत्युदण्ड देना ही उचित है।
अग्निदान्भक्तदांश्चैव तथा शस्त्रावकाशदान् ।
सन्निधातूंश्चैव मोषस्य हन्याच्चौरमिवेश्वरः ।। 277 ।।
जो भी लोग इस प्रकार के चोरों को अग्नि, भोजन, शस्त्र, वस्त्र व आसरा देते हैं, राजा को उन्हें भी चोरों के समान मृत्युदण्ड ही देना चाहिए।
तडागभेदकं हन्यादप्सु शुद्धवधेन वा।
यद्वापि प्रतिसंस्कुर्याद् दाप्यस्तूत्तमसाहसम् ।। 278 ।।
जो व्यक्ति तालाब तोड़ डाले उसे पानी में डुबा देना चाहिए अथवा प्राणदण्ड देना चाहिए। यदि तालाब तोड़ने वाला उसकी मरम्मत कराने के लिए सहर्ष तैयार हो तो उस पर उत्तम साहसिक का दण्ड लगाना चाहिए।
कोष्ठागारमायुधागारं देवतागारभेदकान् ।
हस्त्यश्वरथहतूंश्च हन्यदेवाऽविचारयन् ।। 279 ।।
उन चोरों को तत्काल मृत्युदण्ड दे देना चाहिए जो राजा के धान्यागार, शस्त्र भण्डार तथा मंदिरों को तोड़ते हैं तथा हाथी-घोड़े व रथों को चुराते हैं।
यस्तु पूर्वनिविष्टस्य तडागस्योदकं हरेत् ।
आगमं वाप्यपां भिन्द्यात्स दाप्यः पूर्वसाहसम् ।। 280 ।।
जो चोर पहले से बने हुए तालाब के पानी को चुराते हैं, जल के स्त्रोत में तोड़-फोड़ करते हैं और तड़ागों को सुखा देते हैं, राजा उन पर एक सहस्त्र पण का दण्ड लगाए।
समुत्सृजेद्राजमार्गे यस्त्वऽमेध्यमनापदि ।
स द्वौ कार्षापणौ दद्यादमेध्यं चाशुशोधयेत् ।। 281 ।।
सड़क पर कूड़ा फेंकने वाले लोगों को रोग-दुख की स्थिति को छोड़कर दो कार्षाय का दण्ड देना चाहिए और गंदगी को तुरंत साफ करवा देना चाहिए।
आपद्गतोऽथवा वृद्धो गर्भिणी बाल एव वा।
परिभाषणमर्हन्ति तच्च शोध्यमिति स्थितिः ॥ 282 |
यदि कोई विपत्तिग्रस्त, वृद्ध, गर्भवती महिला तथा बच्चा सड़क पर कचरा फेंके तो उन्हें सिर्फ धमकाना चाहिए और गंदगी को साफ करवा लेना चाहिए-शास्त्रों द्वारा यही नियम निर्धारित किया गया है।
चिकित्सकानां सर्वेषां मिथ्या प्रचरतां दमः ।
अमानुषेषु प्रथमो मानुषेषु च मध्यमः ।। 283 ।।
जो चिकित्सक गलत-सलत इलाज करते हैं उन्हें भी दण्ड देना चाहिए। पशु-पक्षियों का गलत इलाज करने वाले पर 'प्रथम' तथा मनष्यों की गलत चिकित्सा करने वाले पर 'मध्यम' दण्ड लगाना चाहिए।
संक्रमध्वजयष्टीनां प्रतिमानां च भेदकः ।
प्रतिकुर्याच्च तत्सर्वं पञ्चदद्याच्छतानि च ।। 284 ॥
लकड़ी के पुल, ध्वज की लकड़ी व प्रतिमा को तोड़ने वाले व्यक्ति पर पांच सौ पणों का दण्ड लगाने का विधान है और उन्हें फिर से बनवाने का निर्देश भी देने का नियम है।
अदूषितानां द्रव्याणां दूषणे भेदने तथा।
मणीनामपवेधे च दण्डः प्रथमसाहसः ।। 285 ॥
उन लोगों पर हजार पणों का दण्ड लगाया जाए जो सद् पदार्थों को दूषित करते हैं और मणियों को गलत ढंग से बींधते हैं।
समैर्हि विषमं वस्तु चरेद्वैमूल्यतोऽपि वा।
समाप्नुयाद्दमं पूर्व नरोमध्यममेव वा ।। 286 ।।
जो व्यापारी उचित मूल्य पर घटिया या कम परिमाण की वस्तु बेचे उसे 'पूर्व साहस' या 'मध्यम साहस' दण्ड मिलना चाहिए।
बन्धनानि च सर्वाणि राजा मार्गे निवेशयेत् ।
दुःखिताः यत्र दृश्येरन्विकृताः पापकारिणः ।। 287 ।।
ऐसे मार्गों पर राजा द्वारा बन्दी गृह बनवाने चाहिए जहां से चोर-डाकुओं व लुटेरों से सताए गए लोग उन लोगों को सड़ता हुआ देखें जिन्होंने उन्हें कष्ट दिया।
प्राकारस्य च भेत्तारं परिखाणां च पूरकम् ।
द्वाराणां चैव भङ्क्तारं क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ।। 288 ।।
उन लोगों को जल्द ही राज्य से निकाल देना चाहिए जो दीवार को तोडकर खाइयों को भर तथा द्वारों को तोड कर दुश्मन के आने का रास्ता बनाते हैं।
अभिचारेषु सर्वेषु कर्त्तव्यो द्विशतो दमः।
मूलकर्मणि चानाप्तेः कृत्यासु विविधासु च ।। 289 ।।
जो व्यक्ति सभी प्रकार के अभिचारों के प्रयोक्ता हों उनका कर्तव्य है कि उन्हें दो सौ पणों का दण्ड दे। दस प्रकार के विविध दुष्ट प्रयोगों के कर्ता को दो सौ पणों का दण्ड देना चाहिए चाहे मूल कर्म से अभीष्ट मनुष्य की मौत न हुई हो।
अबीजविक्रयी चैव बीजोत्कृष्टं तथैव च।
मर्यादाभेदकश्चैव विकृतं प्राप्नुयाद्वधम् ।। 290 11
अच्छे बीजों में घटिया बीज मिलाकर बेचने वाले तथा परम्परागत नियमों की मर्यादा का उल्लंघन करने वाले मनुष्य को मृत्युदण्ड देना ही उचित है।
सर्वकण्टकपापिष्ठं हेमकारं तु पार्थिवः ।
प्रवृत्तमानमन्याये छेदयेल्लवशः क्षुरैः ।। 291 |
सुनार, जो सभी पापियों का शिरोमणि है, यदि अन्याय करता है तो राजा को चाहिए कि वह चाकू से उसके टुकड़े-टुकड़े करवा डाले।
सीताद्रव्यापहरणे शास्त्राणामौषधस्य च।
कालमासाद्यकार्यं च राजा दण्डं प्रकल्पयेत् ।। 292 ।।
अपराधी द्वारा हल, कुदाल आदि शस्त्रों, धन व औषधियों को चुराते हुए क्या स्थिति थी व चोरी की क्या मात्रा थी- इसके अनुसार ही राजा अपराधी के लिए दण्ड निर्धारित करे।
स्वाम्यमात्यौ पुरं राष्ट्र कोशदण्डौ सुहृत्तथा।
सप्तप्रकृतयो होताः सप्ताङ्गं राज्यमुच्यते ॥ 293 ।।
राज्य के सात अंग या सात प्रकृतियां इस प्रकार हैं- राजा, मंत्री, नगर, राष्ट्र, राजकोश, दण्डाधिकारी व मित्र।
सप्तानां प्रकृतीनां तु राज्यस्यासां यथाक्रमम् ।
पूर्वं पूर्व गुरुतरं जानीयाद्वयसनं महत् ।। 294 ।।
इन सात प्रकृतियों में से क्रमशः पूर्व-पूर्व पर आई विपत्ति को अपेक्षाकृत अधिक वृहद् व गंभीर मानना चाहिए।
सप्ताङ्गस्येह राज्यस्य विष्टब्धस्य त्रिदण्डवत् । अन्योऽन्यगुणवैशिष्यान्न किञ्चिदतिरिच्यते ।। 295 ।।
राज्य की सात प्रकृतियां एक-दूसरे के सहारे ठीक उसी प्रकार टिकी होती है जिस प्रकार तीन डण्डे एक-दूसरे के सहारे खडे रहते हैं। यह न समझना चाहिए कि इन सातों में से किसी की अहमियत कम है। वास्तविकता तो यह है कि इन सातों की समग्र स्थिति में ही राज्य सुरक्षित व स्थिर रहकर समृद्ध बनता है।
तेषु तेषु च कृत्येषु यत्तदङ्गं विशिष्यते।
येन यत्साध्यते कार्य तत्तस्मिन् श्रेष्ठमुच्यते ।। 296 ।।
जिस समय जिस अंग का प्रयोग होता है उस समय उसकी विशेषता अधिक हो जाती है। प्रजा का कार्य जिस समय जिससे सिद्ध हो, उस समय वही उत्तम होता है।
चारेणोत्साहयोगेन विक्रययैव च कर्मणाम्।
स्वशक्तिं परशक्तिं च नित्यं विद्यान्महीपतिः ।। 297 ।।
गुप्तचरों, उत्साह की परीक्षा करने वाले कर्मों तथा अन्य विशेष कार्यों के सहयोग से राजा निरंतर अपनी तथा अपने शत्रु की सामर्थ्य को तौलता रहे।
पीडनानि च सर्वाणि व्यवसनानि तथैव वा।
आरभेत ततः कार्यं संचिन्त्यगुरुलाघवम् ।। 298 ।।
किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पहले राजा को भविष्य में सम्भावित सभी प्रकार की व्यथाओं, कष्टों, बाधा, महत्व व हीनता के बारे में भली-भांति सोच लेना चाहिए।
आरभेतैव कर्माणि श्रान्तःश्रान्तः पुनःपुनः ।
कर्मण्यारभमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषेवते ।। 299 ।।
राजा का कर्तव्य है कि एक कार्य को सम्पन्न करके कुछ विश्राम करे और फिर दूसरे-तीसरे कार्य को प्रारम्भ कर दे क्योंकि लक्ष्मी उसी को प्राप्त होती है जो कर्मों में उद्यत रहता है।
कृतं त्रेतायुगं चैव द्वापरं कलिरेव च।
राज्ञोवृत्तानि सर्वाणि राजा हि युगमुच्यते ॥ 300 II
राजा की ही चेष्टाओं के नाम हैं- सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग। राजा को ही युग कहा गया है अर्थात् वह राज्य की जैसी व्यवस्था करता है, युग को उसी प्रकार का नाम दे दिया जाता है।
कलिः प्रसुप्तो भवति सः जाग्रद्वापरं युगम् ।
कर्मस्वभ्युद्यतस्त्रेता विचरंस्तु कृतं युगम् ॥ 301 |
कलियुग, द्वापर, त्रेता व सत्ययुग क्रमशः राजा के निरुद्यम होने, जागने, कर्म में तत्पर होने तथा शास्त्रोक्त कर्मानुष्ठान करने का ही नाम है।
इन्द्रस्यार्कस्य वायोश्च यमस्य वरुणस्य च।
चन्द्रस्याग्नेः पृथिव्याश्च तेजोवृत्तं तपश्चरेत् ।। 302 ।।
राजा को इन्द्र, सूर्य, वायु, यम, वरुण, चन्द्र, अग्नि व पृथ्वी के सामर्थ्य रूप कर्मों का वहन करना चाहिए।
वार्षिकांश्चतुरो मासान्यथेन्द्रोऽभिप्रवर्षति ।
तथाभिवर्षेत्राष्ट्र कामैरिन्द्रव्रतं चरन् ।। 303 ।।
राजा को अपने राज्य में अभीष्ट पदार्थों की वर्षा ठीक उसी प्रकार करनी चाहिए जिस प्रकार इंद्र देव चार मास वर्षा करते हैं।
अष्टौमासान्यथादित्यस्तोयं हरति रश्मिभिः ।
तथा हरेत्करंराष्ट्रान्नित्यमर्कव्रतं हि तत् ॥। 304 ।।
राजा को प्रजा से वैसे ही कर वसूली करनी चाहिए जिस प्रकार सूर्य आठ माह तक अपनी किरणों से धरती से जल ग्रहण कर लेता है।
प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः ।
तथा चारैः प्रवेष्टव्यं व्रतमेतद्धि मारुतम् ॥ 305 ।।
राजा को दूतों के माध्यम से सभी प्रजाजनों की मनोवृत्ति की खबर उसी प्रकार रखनी चाहिए जिस प्रकार वायु सभी जीवों में प्रविष्ट होकर घूमता रहता है।
यथायमः प्रियद्वेष्यो प्राप्तेकाले नियच्छति ।
तथा राज्ञा नियन्तव्याः प्रजास्तद्धि यमव्रतम् ।। 306 ।।
अपराध करने वाले मित्रों व शत्रुओं दोनों को राजा द्वारा समान रूप से दण्ड मिलना चाहिए ठीक उसी प्रकार जैसे यमराज समय आने पर प्रिय अथवा अप्रिय सभी को एक ही तरह से अपना ग्रास बनाता है।
वरुणेन यथा पाशैर्बद्ध एवाभिदृश्यते ।
तथा पापन्निगृह्णीयाद् व्रतमेतद्धि वारुणम् ॥ 307 ।।
राजा को पापियों को उसी प्रकार बंदी बनाकर रखना चाहिए जिस प्रकार वरुणदेव धर्मभ्रष्ट जनों को अपने पाश में बांध कर रखते हैं।
परिपूर्ण यथा चन्द्रं दृष्ट्वा हृष्यन्ति मानवाः ।
तथाप्रकृतयो अस्मिन् सः चान्द्रव्रतिकोनृपः ।। 308 ।।
राजा के दर्शन से प्रजा का प्रसन्न होना ही राजा का चंद्रव्रत निभाना है, जिस प्रकार लोग पूर्ण चन्द्र को देख कर हर्षित होते हैं।
प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्यात्पापकर्मसु।
दुष्टसामन्तहिंस्त्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतम् ॥ 309 ।।
राजा का आग्नेय व्रत यही है कि वह पापियों के लिए सदैव प्रताप युक्त व तेजस्वी रहे तथा दुष्ट सामंतों के लिए हिंसक।
यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम् ।
तथा सर्वाणि भूतानि बिभ्रतः पार्थिवं व्रतम् ॥ 310 ।।
राजा का पृथ्वी धर्म यही है कि जिस प्रकार पृथ्वी सभी प्राणियों को समान रूप से धारण करती है उसी प्रकार राजा को भी अपनी प्रजा का समान रूप से पालन करना चाहिए।
एतैरुपायैरन्यैश्च युक्तो नित्यमतन्द्रितः ।
स्तेनान्राजा निगृह्णीयात्स्वराष्ट्र पर एव च ॥ 311 ।।
इन्हीं तथा अन्य विविध उपायों द्वारा राजा को सदा उत्साहपूर्वक अपने राज्य के चोरों व दूसरे राज्य में शरणागत विद्रोहियों को बंदी बनाना चाहिए।
परामप्यापदं प्राप्तो ब्राह्मणान्न प्रकोपयेत् ।
ते होनं कुपिताः हन्युः सद्यः सबलवाहनम् ।। 312 ।।
राजा यदि परम संकट की परिस्थिति में हो तो भी उसे ब्राह्मणों को कुपित नहीं करना चाहिए क्योंकि कुपित ब्राह्मण सेना व वाहन सहित राजा का विनाश कर डालते हैं।
यैः कृतः सर्वभक्षोऽग्निरपेयश्च महोदधिः ।
क्षयीचाप्यायितः सोमः को न नश्येत्प्रकोप्य तान् ॥ 313 ॥
उन ब्राह्मणों को रुष्ट करने से भला कौन कुपित न होगा जिन्होंने आग को सर्वभक्षी, समुद्र को अपेय और क्षय होने वाले चंद्र को अमृतमय बना दिया।
लोकानन्यान्सृजेयुर्ये लोकपालांश्च कोपिताः ।
देवान्कुर्युरदेवांश्चकः क्षिण्वस्तान्समृध्नुयात् ॥ 314 ।।
कुपित होने पर जिन्होंने दूसरे लोक व लोकपालों का सृजन कर दिया तथा देवों को अपूज्य बना दिया उन उत्तम ब्राह्मणों को कष्ट देकर कौन समृद्ध हो सकता है अर्थात् कोई नहीं।
यामुपाश्रित्य तिष्ठन्ति लोकाः देवाश्च सर्वदा।
ब्राह्म चैव धनं येषां को हिंस्यात्ताञ्जिजीविषुः ।। 315 ।।
जिन ब्राह्मणों का आश्रय लेकर देवता व लोक स्थित हैं तथा वेद ही जिनका धन हैं, उन्हें त्रास देने का साहस कौन जिजीविषा रखने वाला मूर्ख करेगा ?
अविद्वांश्च विद्वांश्च ब्राह्मणोदैवतं महत्।
प्रणीतश्चाऽप्रणीतश्च यथाऽग्निदैवतं महत् ।। 316 ।।
ब्राह्मण चाहे विद्वान हो अथवा मूर्ख निस्संदेह महत्वपूर्ण व पूजनीय होता है जिस प्रकार प्रणीत तथा अप्रणीत दोनों ही प्रकार की अग्नि पवित्र व महान होती है।
श्मशानेष्वपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति ।
हूयमानश्च यज्ञेषु भूय एवाभिवर्धते ॥ 317 ।।
श्मशान में प्रज्वलित अग्नि दूषित नहीं होती। वही अग्नि यज्ञ व हवनादि में पुनः अभिवृद्धि को प्राप्त होती है।
एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तन्ते सर्वकर्मसु।
सर्वथा ब्राह्मणाः पूज्याः परमं दैवतं हि तत् ।। 318 ॥
ठीक इसी प्रकार ब्राह्मण चाहे सभी प्रकार के अनिष्ट कर्म करता हुआ क्यों न विचरे, फिर भी परमदेव होने के कारण वह पूजनीय होता है।
क्षत्रस्यातिप्रवृद्धस्य ब्राह्मणान्प्रति सर्वशः ।
ब्रह्मणैव सन्नियन्तृ स्यात्क्षत्रं हि ब्रह्मसम्भवम् ॥ 319 ॥
प्रबुद्ध ब्राह्मणों को चाहिए कि वे ब्राह्मणों को सताने वाले क्षत्रियों को वश में रखें चूंकि ब्राह्मण जिनका पथ-प्रदर्शन करते हैं, वही क्षत्रिय प्रगति कर पाते हैं।
अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम्।
तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ।। 320 ।।
अग्नि, क्षत्रिय व लोहे का तेज क्रमशः जल, ब्राह्मण व पत्थर से उत्पन्न होते हैं और सभी स्थानों पर अपनी तीव्रता का प्रदर्शन करते हैं किंतु जो कारण उन्हें उत्पन्न करते हैं, उन्हीं से वे शांत भी हो सकते हैं।
नाऽब्रह्मक्षत्रमृघ्नोति नाऽक्षत्रं ब्रह्मवर्धते।
ब्रह्मक्षत्रं च संयुक्तमिह चामुत्र वर्धते ॥ 321 ॥
ब्राह्मण के बिना क्षत्रिय और क्षत्रिय के बिना ब्राह्मण उन्नति नहीं कर सकता। दोनों मिलकर ही इस लोक एवं परलोक में संवर्द्धित होते हैं।
दत्त्वा धनं तु विप्रेभ्यः सर्व दण्डं समुत्थितम्।
पुत्रे राज्यं समासृज्य कुर्वीत प्रयाणं रणे ॥ 322 ।।
दण्ड से प्राप्त धन ब्राह्मण को तथा अपना राज्य पुत्र को प्रदान कर राजा रण में प्रस्थान करे।
एवं चरन्सदा युक्तो राजधर्मेषु पार्थिवः ।
हितेषु चैव लोकस्य सर्वान्धृत्यान्नियोजयेत् ।। 323 ।।
इस प्रकार राजधर्म का पालन करते हुए राजा द्वारा प्रजाजनों के हित में सभी भृत्यों का प्रबन्ध करना चाहिए।
एषोऽखिलः कर्मविधिरुक्तो राज्ञः सनातनः ।
इमं कर्मविधिं विद्धिक्रमशो वैश्यशूद्रयोः ।। 324 ।।
महर्षियो ! राजा के सभी सनातन कर्तव्य व कर्मों के बारे में मैंने आपको बतलाया। इन्हें ही आप वैश्य व शूद्रों की कर्म विधि जानें।
वैश्यस्तु कृतसंस्कारः कृत्वा दारपरिग्रहम् ।
वार्तायां नित्ययुक्तः स्यात् पशूनां चैव रक्षणे ॥ 325 ॥
वैश्य यज्ञोपवीत संस्कार के बाद विवाह करे तथा पशुपालन एवं व्यापार का कार्य करे।
प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददे पशून् ।
ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः ॥ 326 ॥
वैश्य की सृष्टि कर स्वयं ब्रह्मा जी ने उसे पशु सौंपे हैं। ब्रह्मा जी ने ही ब्राह्मण एवं राजा को प्रजा की सुरक्षा का उत्तरदायित्व दिया है।
न च वैश्यस्य कामः स्यान्न रक्षेयं पशूनिति ।
वैश्येचेच्छति नान्येन रक्षितव्या कथञ्चन ॥ 327 ॥
पशु रक्षा के अपने कर्तव्य को न करने के बारे में वैश्य को सोचना भी नहीं चाहिए और यदि वैश्य ऐसा करता है (अर्थात् पशु रक्षा नहीं करता) तो अन्य वर्ण के व्यक्ति को यह कार्य नहीं करना चाहिए।
मणिमुक्ताप्रवालानां लौहानां तांतवस्य च।
गन्धानां च रसानां च विद्यादर्थं बलाबलम् ॥ 328 ।।
मणि मुक्ता, प्रवाल (मूंगा), लोहा, वस्त्र और कपूर आदि गंध व रसों के गुण-दोषों, भाव में उतार-चढ़ाव का पूरा ज्ञान रखना भी वैश्यों का कर्तव्य है।
बीजानामुप्तिविच्च स्यात्क्षेत्रदोषगुणस्य च।
मानयोगं च जानीयात्तुलायोगांश्च सर्वशः ।। 329 ।।
बीजों को किस प्रकार बोया जाए, खेत के क्या गुण-दोष हैं तथा सभी प्रकार के नाप-तोलों की जानकारी रखना भी वैश्यों का कर्तव्य कर्म है।
सारासारं च भाण्डानां देशानां च गुणागुणान्।
लाभालाभञ्च पण्यानां पशूनां परिवर्धनम् ॥ 330 ।।
भृत्यानां च भृतिं विद्याद्भाषाश्च विविधा नृणाम्।
द्रव्याणां स्थानयोगांश्च क्रयविक्रयमेव च ॥। 331 ।।
विभिन्न अन्नों के अच्छे-बुरे होने की जानकारी, विविध देशों में उसके गुण-दोष, सस्ते महंगे भाव, बिकने वाली वस्तुओं की लाभ-हानि, पशुओं के परिवर्धन के तरीके, नौकरों के भुगतान का तरीका, अनेक भाषाएं, विविध वस्तुओं के भण्डारण तथा क्रय-विक्रय की विधि वैश्य को आनी चाहिए।
धर्मेण च द्रव्यवृद्धावातिष्ठेद्यत्नमुत्तमम् ।
दद्याच्च सर्वभूतानामन्नमेव प्रयत्नतः ।। 332 ।।
उसे कर्मानुसार अपने धन के संवर्द्धन एवं सभी प्राणियों तक अन्न पहुंचाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।
विप्राणां वेदविदुषां गृहस्थानां यशस्विनाम्।
शुश्रूषैव तु शूद्रस्य धर्मो नैश्रेयसः परः ॥ 333 11
धर्म है। वेदों के ज्ञाता विद्वान, यशस्वी एवं गृहस्थ ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्र का
शुचिरुत्कृष्टशुश्रूषुर्मृद्वांगाऽनहंकृतः ।
ब्राह्मणाद्याश्रयो नित्यमुत्कृष्टां जातिमश्नुते ।। 334
जो शूद्र नित्य ब्राह्मणों की सेवा करता है, पवित्र, सदाचारी, परिश्रमी, विनम्र व अहंकार रहित होता है- वह उच्च जाति को प्राप्त कर लेता है।
एषोऽनापदि वर्णानामुक्तः कर्मविधिः शुभः ।
आपद्यपि हि यस्तेषां क्रमशस्तं निबोधत ।। 335 ।।
भृगु जी ने कहा, विद्वज्जनो! यह मैंने चारों वर्णों के सामान्य धर्म बतलाए। अब मैं आपको उनके आपातकालीन धर्म के बारे में बतलाऊंगा।
।। मनुस्मृति नवम अध्याय सम्पूर्ण ।।
Manusmriti Chapter 8
kathaShrijirasik
।।मनुस्मृति अष्टम अध्याय।।
व्यवहारान्दिदृक्षुस्तु ब्राह्मणैः सह पार्थिवः ।
मन्त्रज्ञैर्मन्त्रिभिश्चैव विनीतः प्रविशेत्सभाम् ॥ 1 ॥
व्यवहार (मुकदमों) को देखने का इच्छुक राजा विद्वान ब्राह्मणों तथा राजनीति एवं व्यवहार में कुशल मंत्रियों के साथ विनीत भाव से राजसभा (राज-न्यायालय) में प्रवेश करे।
. तत्रासीनः स्थितोवापि पाणिमुद्यम्य दक्षिणम्।
विनीतवेशाभरणः पश्येत्कार्याणि कार्यिणाम् ॥ 2 ॥
सुन्दर वेशभूषा धारण किए हुए राजा सभा में खड़े होकर या बैठकर दाएं हाथ को उठाकर सभी कर्मचारियों के कार्यों का निरीक्षण करे।
प्रत्यहं देशदृष्टैश्च शास्त्रदृष्टैश्च हेतुभिः ।
अष्टादशसु मार्गेषु निबद्धानि पृथक् पृथक् ॥ ३ ॥
राजा को प्रतिदिन अठारह तरह के अलग-अलग विभागों में बंटे हुए कार्यों की प्रत्येक दिन शास्त्रीय दृष्टि तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समीक्षा करनी चाहिए।
टिप्पणी-- 18 प्रकार के ये विभाग मुकदमों से संबंधित हैं।
तेषामाद्यामृणादानं निक्षेपोऽस्वामिविक्रयः ।
सम्भूय च समुत्थानं दत्तस्यानप कर्म च ॥4॥
वेतनस्यैव चादानं संविदश्च व्यतिक्रमः ।
क्रयविक्रयानुशयोविवादः स्वामिपालयोः ॥ 5 ॥
सीमाविवादधर्मश्च पारुष्ये दण्डवाचिके ।
स्तेयं च साहसं चैव स्त्रीसंग्रहणमेव च ॥6॥
स्त्रीपुन्धर्मो विभागश्च द्यूतमाह्वय एव च।
पदान्यष्टादशैतानि व्यवहारस्थिताविह ।। 7॥
ये 18 प्रकार के कार्य है-
1. उधार लेकर नहीं देना या बिना उधार दिए ही मांगना
2. धरोहर सम्बन्धित विवाद
3. किसी वस्तु, भूमि आदि का स्वामी नहीं होने पर भी उसे बेच देना
4. साझे के व्यापार से संबंधित विवाद
5. दान में दी हुई वस्तु वापस ले लेना
6. कर्मचारियों को वेतन नहीं देना
7. प्रतिज्ञापत्र में लिखी बात का पालन नहीं करना
8. विक्रय या क्रय संबंधी विवाद
9. पशु पालने वाले तथा पशु के स्वामी के मध्य विवाद
10. सीमा सम्बन्धी विवाद
11. गाली-गलौच करना
12. मारपीट से संबंधित विवाद
13. चोरी करने से संबंधित विवाद
14. बलात् किसी से उसकी वस्तु छीन लेना
15. दूसरे की स्त्री का हरण कर लेना
16. स्त्रियों तथा पुरुषों के अलग-अलग धर्माचार
17. धन के विभाजन संबंधी विवाद
18. जुआ खेलने तथा पशु युद्ध में बाजी लगाने संबंधी विवाद
राजा को इन अट्ठारह प्रकार के विषयों पर विचार करना होता है।
एषु स्थानेषु भूयिष्ठं विवादं चरतां नृणाम्।
धर्म शाश्वतमाश्रित्य कुर्यात्कार्यांविनिर्णयम् ॥ 8॥
राजा को इन 18 विषयों में होने वाले विवाद को लेकर उपस्थित लोगों के पक्षों को सुनकर सनातन धर्म-न्याय के अनुसार अपना निर्णय देना चाहिए।
यदा स्वयं न कुर्यात्तु नृपतिः कार्यदर्शनम्।
तदा नियुज्याद्विद्वांसं ब्राह्मणं कार्यदर्शने ॥ 9॥
इन 18 विषयों में से किसी विषय पर, किसी कारणवश जब राजा स्वयं विचार नहीं कर सके तो उसे निपटाने के लिए किसी योग्य विद्वान ब्राह्मण को नियुक्त करे।
सोऽस्य कार्याणि सम्पश्येत्सभ्यैरेव त्रिभिर्वृतः ।
सभामेव प्रविश्याग्रयामासीनः स्थित एव वा ॥ 10 ॥
तीन सभ्य पुरुषों को साथ लेकर राजा द्वारा नियुक्त ब्राह्मण सभा में प्रवेश करे तथा खड़े होकर एकाग्रता से राजा द्वारा देखे-सुने जाने वाले विषयों को सुने।
यस्मिन्देशे निषीदन्ति विप्राः वेदविदस्त्रयः ।
राज्ञश्चाधिकृतो विद्वान् ब्रह्मणस्तां सभां विदुः ।॥ 11 ॥
जिस देश के राजा की सभा में उसके द्वारा दिए गए अधिकार प्राप्त तीन वेदवेत्ता ब्राह्मण तथा एक विद्वान रहते हों उस राजा की सभा को ब्रह्मा की सभा के समान समझना चाहिए।
धर्मों विद्धस्त्वधर्मेण सभां यत्रापतिष्ठते ।
शल्यं चास्य न कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः ॥ 12 ॥
जिस सभा में अधर्म द्वारा धर्म को बींधा जाता है अर्थात् उसकी हत्या की जाती है और सभा के सदस्य इस अन्याय को दूर नहीं करते वहां जिस अधर्मपूर्ण कांटे से धर्म को बींधा जाता है, वही सभासदों को पीड़ित करता है।
सभां वा न प्रवेष्टव्यं वक्तव्यं वा समञ्जसम् ।
अनुवन्विब्रुन्वापि नरो भवति किल्विषी ॥ 13 ॥
जो ब्राह्मण राजा द्वारा नियुक्त किया जाए वह चाहे सभा में नहीं जाए लेकिन जब वहां जाए तो उसे सच ही बोलना चाहिए। झूठ बोलने या चुप रहने से मनुष्य पर पाप पड़ता है।
यत्र धर्मोह्यधर्मेण सत्यं यत्राऽनृतेन च।
हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ॥ 14 ॥
ऐसी सभा में जहां सभासदों के सम्मुख ही अमृत (झूठ) सत्य को तथा अधर्म धर्म को दबाता है, उस सभा के सभासद इस पाप के कारण शीघ्र ही नाश को प्राप्त होते हैं।
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नोधर्मोहतोऽवधीत् ॥ 15 ॥
जो धर्म की हत्या करता है, धर्म उसका पूरी तरह नाश कर देता है। जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का नाश कभी नहीं करें ताकि सुरक्षित धर्म हमारी रक्षा कर सके।
वृषोहि भगवान्धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्ययम्।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्म न लोपयेत् ॥ 16 ॥
भगवान धर्म को वृष रूप कहते हैं। जो मनुष्य उसका नाश करता है उसे देवतागण 'वृषल' अर्थात धर्म को काटने वाला या शूद्र कहते हैं। अतएव धर्म का नाश नहीं करें।
एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः ।
शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति ॥ 17 ।।
एकमात्र धर्म ही ऐसा मित्र है जो मरने के बाद भी साथ चलता है अन्यथा शारीर का नाश हो जाने के बाद सब कुछ इसी लोक में नष्ट हो जाता है।
पादोऽधर्मस्य कर्तारं पादः साक्षिणमृच्छति ।
पादः सभासदः सर्वान् पादो राजानमृच्छति ॥ 18 ॥
न्यायाधीश द्वारा उचित न्याय नहीं करने पर, अधर्म का पहला चौथाई भाग अधर्म करने वाले को, द्वितीय चौथाई भाग गवाह (द्रष्टा) को, तीसरा चौथाई भाग राजा द्वारा नियुक्त सभा के सदस्यों को तथा चतुर्थ चौथाई भाग राजा को मिलता है। टिप्पणी- अभिप्राय यह है कि राजा न्याय की व्यवस्था इस प्रकार करे कि अधर्म या अन्याय हो ही नहीं सके।
राजा भवत्यनेनास्तु मुच्यन्ते च सभासदः ।
एनो गच्छति कर्तारं निन्दाहों यत्र निन्द्यते ॥ 19 ॥
जब निन्दा योग्य पापी व्यक्ति की निन्दा की जाती है और उसे दण्ड दिया बाता है तो पाप उसके करने वाले (पापी) को ही लगता है। राजा और दण्डाधिकारी पाप भोग से मुक्त हो जाते हैं। 1
जातिमात्रोपजीवी वा कामंस्याद् ब्राह्मणब्रुवः ।
धर्मप्रवक्ता नृपतेर्न तु शूद्रः कथञ्चन ।। 20 11
जो ब्राह्मण केवल जाति से ही ब्राह्मण हो परन्तु वेदवेत्ता नहीं हो तथा राजा को भी धर्म का ज्ञान देने की सामर्थ्य नहीं रखता हो. ऐसा ब्राह्मण पूजा के योग्य नहीं फिर भी उसे शुद्र नहीं समझना चाहिए।
यस्य शूद्रस्तु कुरुते राज्ञो धर्मविवेचनम्।
तस्य सीदति तद्राष्ट्र पङ्के गौरिव पश्यतः ॥ 21 ॥
जिस राजा के राज्य का धर्माधिकारी शूद्र होता है, उस राजा का राज्य देखते. देखते कीचड़ में फंसी गाय के समान दुखग्रस्त हो जाता है।
यद्राष्ट्रं शूद्रभूयिष्ठं नास्तिकाक्रान्तमद्विजम् ।
विनश्यत्याशु तत्कृत्स्नं दुर्भिक्षव्याधिपीडितम् ।। 22 ।।
जिस राज्य में आस्तिकों एवं ब्राह्मणों की जगह शूद्रों तथा नास्तिकों की अधिकता और प्रभुत्व होता है, वह सम्पूर्ण राज्य शीघ्र ही अकाल तथा रोग आदि प्राकृतिक विपदाओं से पीड़ित होकर नष्ट हो जाता है।
धर्मासनमधिष्ठाय संवीताङ्ग समाहितः ।
प्रणम्य लोकपालेभ्यः कार्यदर्शनमाचरेत् ।। 23 ।।
राजा को धर्मासन पर आसीन होकर, अपना शरीर आवृत करके तथा सावधानी से लोकपालों को प्रणाम कर विवादों की सुनवाई शुरू करनी चाहिए।
टिप्पणी - यहां धर्मासन से आशय न्याय करते समय जिस आसन या कुसी का उपयोग किया जाता है उससे है, शरीर को ढकने से अभिप्राय उस विशेष वस्त्र को धारण करने से है जिसे न्यायाधीश पहनते हैं।
अर्थानर्थावुभौ बुद्धवा धर्माधर्मों च केवलौ।
वर्णक्रमेण सर्वाणि पश्येत्कार्याणि कार्यिणाम् ।। 24 ॥
राजा को अर्थ तथा अनर्थ, धर्म एवं अधर्म को अपने ध्यान में रखते हुए वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) के क्रम से लोगों के विवादों को निपटाना चाहिए।
बाद्यैर्विभावयेल्लिङ्गैर्भावमन्तर्गतं नृणाम् । स्वरवर्णेङ्गिताकारैश्चक्षुषा चेष्टितेन च ।। 25 ।।
विवादों को निपटाते समय राजा को अपराधियों के बाहरी चिन्हों स्वर, मुख का रंग, आंखों से ऊपर-नीचे देखना (पसीना आना, घबड़ाना या रोमांचित होना) से उनके मन के भावों को जानने तथा समझने का प्रयत्न करना चाहिए।
आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च।
नेत्रवक्त्रविकारैश्च गृह्यन्ते ऽन्तर्गतं मनः ।। 26 ॥
व्यक्ति की मुख-मुद्रा, अंगों द्वारा किए जाने वाले संकेतों, चेष्टाओं, बोलने के ढंग, आंखों और चेहरे पर आने वाले विकारों द्वारा उसके मन के भावों का पता लग जाता है। कहने का आशय यह कि न्याय देने वाले को वादी तथा प्रतिवादी की इन क्रियाओं पर अपना ध्यान एकाग्र करना चाहिए।
बालदायादिकं रिक्थं तावद्राजानुपालयेत् ।
यावत्सः स्यात्समावृत्तो यावच्चातीतशैशवः ।। 27 ।।
बालक की सम्पत्ति का संरक्षण राजा को उस समय तक करना चाहिए जब तक वह गुरुकुल से विद्या पुरी करके नहीं लौटता अथवा (गुरुकुल नहीं जाने पर) उसकी बाल्यावस्था नहीं बीत जाती।
वशाऽपुत्रासु चैवं स्याद्रक्षणं निष्कुलासु च।
पतिव्रतासु च स्त्रीषु विधवास्वातुरासु च ॥ 28 ।।
राजा को आवश्यकता के अनुसार बन्ध्या, पुत्रहीन, कुल के बाहर की, पतिव्रता, विधवा और रोगी स्त्री की सम्पत्ति की भी रक्षा करनी चाहिए।
जीवन्तीनां तु तासां ये तद्धरेयुः स्वबान्धवाः । तांछिष्याच्चौरदण्डेन धार्मिकः पृथिवीपतिः ॥ 29 ॥
ऊपर के श्लोक में बताई स्त्रियों की सम्पत्ति अगर उनकी जीवन अवधि में उनके सम्बन्धी बलात् लेते हैं तो धर्मानुयायी राजा द्वारा उन्हें चोरों को दिया जाने वाला दण्ड प्रदान करना चाहिए।
प्रणष्टस्वामिकं रिक्थं राजा त्र्यब्दं निधापयेत् । अर्वाक्यब्दाद्धरेत्स्वामी परेण नृपतिर्हरेत् ॥ 30 ॥
राजा को ऐसी लावारिस सम्पत्ति की जिसका मालिक मर गया हो तीन वर्ष तक देखभाल करनी चाहिए। इस तीन वर्ष की अवधि में यदि कोई उस सम्पत्ति पर अपना अधिकार सिद्ध नहीं कर पाता तो वह सम्पत्ति राजा की हो जाती है।
ममेदमिति यो ब्रूयात्सोऽनुयोज्यो यथाविधिः । सवाद्यरूपसंख्यादीन् स्वामीतद्रव्यमर्हति ।। 31 ॥
राजा को चाहिए कि राज्य द्वारा अधिगृहीत सम्पत्ति पर अपना अधिकार बताने वाले से वह सम्पत्ति का स्वरूप, संख्या और सोना आदि होने पर उसके मूल्य आदि के सम्बन्ध में आवश्यक प्रश्न पूछे तथा सही उत्तर प्राप्त होने पर उसका स्वामित्व स्वीकार कर ले।
अवेदयानो नष्टस्य देशं कालं च तत्त्वतः ।
वर्णं रूपं प्रमाणं च तत्समं दण्डमर्हति ॥ 32 ॥
राज्य द्वारा अधिगृहीत सम्पत्ति पर अपना अधिकार बतलाने वाला व्यक्ति अगर उस सम्पत्ति के रूप, वर्ण, संख्या, परिमाण आदि की सही जानकारी नहीं दे पाता अर्थात् झूठा अधिकार प्रस्तुत करता है तो राजा को उस पर सम्पत्ति के बराबर अर्थ दण्ड (जुर्माना) लगाना चाहिए।
आददीताथ षड्भागं प्रणष्टाधिगतान्नृपः ।
दशमं द्वादशं वापि सतां धर्ममनुस्मरन् ।। 33 ॥
राजा को सज्जनों के धर्म का पालन करते हुए राज्य द्वारा अधिगृहीत धन को वास्तविक अधिकारी को वापिस करते हुए (प्रचलित प्रथा अनुसार) उसका छठा, दसवां या बारहवां भाग अपने पास रखना चाहिए।
प्रणष्टाधिगतं द्रव्यं तिष्ठेद् युक्तैरधिष्ठितम् ।
यास्तत्र चौरान्गृह्णीयात्तान् राजेभेन घातयेत् ।। 34 ॥
राजा ऐसे व्यक्ति को जो किसी के नष्ट, गिरे, खोए और राजपुरुषों की देखभाल में रखे हुए धन को चुराता या छिपाता है. हाथी के पैरों तले कुचलवा डाले।
ममायमिति यो ब्रूयान्निधिं सत्येन मानवः ।
तस्याददीत षड्भागं राजा द्वादशमेव वा ॥ 35 ॥
जो व्यक्ति खोयी हुई सम्पत्ति पर अपना वास्तविक अधिकार सिद्ध कर देता है, राजा को उस सम्पत्ति का छठा या बारहवां भाग अपने पास रखकर शेष राशि उसे वापिस कर देनी चाहिए।
अनृतं तु वदन्दण्ड्यः स्ववित्तस्यांशमष्टमम् ।
तस्यैव वा विधानस्यसंख्यायाल्पीयसींकलाम् ।। 36 ॥
जो व्यक्ति खोयी हुई सम्पत्ति पर अपना झूठा अधिकार बतलाता है उस पर सम्पत्ति या धन के आठवें भाग के बराबर अथवा उस व्यक्ति की सामर्थ्य के अनुसार अर्थ दण्ड (रुपयों का जुर्माना) लगाना चाहिए।
विद्वांस्तु ब्राह्मणो दृष्ट्वा पूर्वोपनिहितं निधिम् । अशेषतोऽप्याददीत सर्वस्याधिपतिर्हि सः ॥ 37 ॥
अगर नष्ट निधि का वास्तविक दावेदार विद्वान ब्राह्मण हो तो बिना कोई कटौती किए राजा को सारी सम्पत्ति उसे लौटा देनी चाहिए।
टिप्पणी-कुछ टीकाकारों ने नष्ट विधि को पूर्व स्थापित धन कहा है। कुछ इसे धरती में गड़े खजाने या सम्पत्ति के अर्थ में लेते हैं।
यं तु पश्येन्निधिं राजा पुराणं निहितं क्षितौ ।
तस्माद्विजेभ्यो दत्त्वार्धमध कोषे प्रवेशयेत् ॥ 38 ॥
यदि भूमि में गड़ा हुआ कोई पुराना खजाना राजा या राजकर्मचारियों को मिल जाए तो उसमें से आधा भाग ब्राह्मणों को दान में देकर शेष भाग राजा अपने कोश में रख ले।
निधीनां तु पुराणानां धातूनामेव च क्षितौ।
अर्धभाग्रक्षणाद्राजा भूमेरधिपतिर्हि सः ॥ 39 ॥
भूमि का स्वामी होने से धरती में पायी जाने वाली सभी निधियों, वस्तुओं तथा धातओं के आधे भाग का स्वामी राजा होता है।
दातव्यं सर्ववर्णेभ्यो राजा चैरेर्हतं धनम् ।
राजा तदुपयुञ्जानश्चोरस्याप्नोति किल्विषम् ॥ 40 ॥
राजकर्मचारियों द्वारा खोजे गए तथा चोरों द्वारा चुराए गए धन को उसके स्वामी को लौटा देना चाहिए चाहे वह किसी भी वर्ण का हो। ऐसे धन को न लौटाकर उसका स्वयं सेवन करने वाले राजा पर चोरी का पाप लगता है।
जातिजानपदान्धर्मान्श्रेणीधर्मांश्च धर्मवित् ।
समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्म प्रतिपादयेत् ॥ 41 ।।
धर्मज्ञ राजा को जाति धर्मों, जनपद के धर्मों, श्रेणी धर्मों (व्यापारी आदि के नियत धर्म) तथा कुल धर्मों को अच्छी तरह समझ कर अपने धर्म का अनुसरण करना चाहिए।
स्वानि कर्माणि कुर्वाणो दूरे सन्तोऽपिमानवाः ।
प्रियाः भवन्ति लोकस्य स्वेस्वे कर्मण्यवस्थिताः ।। 42 ।।
जाति, देश, कुल के धर्मानुसार अपने-अपने कामों को करने वाले तथा अपने-अपने कार्य में स्थित होकर, दूर रहते हुए भी मनुष्य लोक में प्रिय हो जाते हैं।
नोत्पादयेत्स्वयं कार्यं राजा नाप्यस्यपूरुषः ।
न च प्रापितमन्येन ग्रसेदर्थं कथञ्चन ।। 43 ।।
राजपुरुष अथवा राजा को न तो स्वयं किसी विवाद को पैदा करना चाहिए तथा न ही किसी के द्वारा प्रस्तुत किए गए विवाद की अनदेखी करनी चाहिए।
यथा नयत्यसृक्पातैर्मृगस्य मृगयुः पदम् ।
नयेत्तथाऽनुमानेन धर्मस्य नृपतिः पदम् ।। 44 ॥
जिस तरह शिकारी घायल हिरन के शरीर से बहते रक्त का अनुसरण करता हुआ छिपे हिरन को खोज लेता है, उसी तरह राजा को विवाद सम्बन्धी तथ्य के सूत्र द्वारा सही जानकारी पाने का प्रयत्न करना चाहिए।
सत्यमर्थ च सम्पश्येदात्मानमथ साक्षिणः ।
देशरूपं च कालं च व्यवहारविधौ स्थितः ।। 45 ॥
विवाद का निर्णय करने के लिए उद्यत राजा को या उसके प्रतिनिधि को सत्य से युक्त व्यवहार को, अपने को (अपना मन कोई पक्षपात तो नहीं कर रहा), गवाहियों को देश, काल तथा रूप को देखकर निर्णय करना चाहिए।
सद्भिराचरितं यत्स्याद्धार्मिकैश्च द्विजातिभिः । तद्देशकुलजातीनामविरुद्धं प्रकल्पयेत् ।। 46 ॥
राजा को धर्म का अनुसरण करने वाली तथा सदाचरण करने वाली द्विजातियों द्वारा प्रमाणित एवं देश, कुल तथा जाति के अनुकूल ही विवाद का निर्णय करना चाहिए।
अधमर्णार्थसिद्धयर्थमुत्तमर्णेन चोदितः ।दापयेद्धनिकस्यार्थमधमर्णाद्विभावितम्।। 47 ।।
धन के लेन-देन सम्बन्धी व्यवसाय को चालू रखने के उद्देश्य से राजा को ऋण लेने वाले से ऋण दाता का धन लौटवाना चाहिए।
यैर्यैरुपायैरर्थं स्वं प्राप्नुयादुत्तमर्णिकः ।
तैस्तैरुपायैः संगृह्य दापयेदधमर्णिकम् ॥ 48 ।।
कर्जा देने वाला जिन-जिन तरीकों से अपना धन वापस पा सके, राजा को उन-उन उपायों द्वारा धन की व्यवस्था करनी चाहिए।
धर्मेण व्यवहारेण छलेनाचरितेन च।
प्रयुक्तं साध्येदर्थं पञ्चमेन बलेन च ॥ 49 ॥
राजा को पहले धर्म अनुसार अर्थात् सीधी-सरल रीति से, किसी अन्य से लिए जाने वाले धन से, छल से, मान-हानि और लोकनिन्दा का भय दिखाकर तथा इन चारों साधनों के असफल हो जाने पर बल प्रयोग द्वारा ऋण लेने वाले से महाजन (कर्जा देने वाले) की धनराशि लौटवानी चाहिए।
यः स्वयं साधयेदर्थमुत्तमर्णोऽधमर्णिकात् ।
न सः राजाभियोक्तव्यः स्वकं संसाधयन्धनम् ॥ 50 ।।
अपने ऋणकर्ता से जो महाजन स्वयं ही कर्जे की वसूली कर रहा हो और जिसने राजा से सहायता नहीं मांगी हो तो राजा को इस बारे में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
अर्थेऽपव्ययमानं तु करणेन विभावितम्।
दापयेद्धनिकस्यार्थं दण्डलेशं च शक्तितः ॥ 51 ।।
जो उधार लेने वाला उधार लेकर मुकर जाए लेकिन लिखा-पढ़ी और मौखिक गवाहियों से यह सिद्ध हो कि उसने महाजन से कर्जा लिया था तो राजा को चाहिए कि वह महाजन का कर्जा वापिस करवाए और बेईमान व्यक्ति से महाजन को हर्जाना भी दिलवाए।
अपह्नवेऽधमर्णस्य देहीत्युक्तस्य संसदि । अभियोक्तादिशेद्देश्यकरणं वान्यदुद्दिशेत् ।। 52 ।।
कर्जा देने वाले महाजन द्वारा अभियोग लगाए जाने पर जब राजा और उसका प्रतिनिधि, राजसभा में ऋणकर्ता से पूछता है तथा कर्जा लेने वाला (ऋणकर्ता) कर्जा लेने से मुकरता है तो न्यायकर्ता महाजन को आज्ञा दे कि वह अपने पक्ष में लिखित या मौखिक साक्ष्य दे।
अदेश्यं यस्य दिशति निर्दिश्यापहृते चयः । यश्चाधरोत्तरानर्थान्विगीतान्नावबुध्यते 11 53 11
अपदिश्यापदेश्यं च पुनर्यस्त्वपधावति ।
सम्यग्प्रणिहितं चार्थं पृष्ठः सन्नाभिनन्दति ।। 54 ।।
असम्भाष्ये साक्षिभिश्च देशेसम्भाषते मिथः ।
निरुच्यमानं प्रश्नं च नेच्छेद्यश्चापि निष्पतेत् ।। 55 ॥
ब्रूहीत्युक्तश्च न ब्रूयादुक्तं च न विभावयेत्।
न च पूर्वापरं विद्यात्तस्मादर्थात्स हीयेत् ॥ 56 ।।
ग्यारह दोषों से ग्रस्त व्यक्ति अपना मुकदमा हार जाता है। ये ग्यारह दोष हैं-
1. झूठी साक्षी या जाली कागज-पत्र दिखाने वाला,
2. अपने प्रथम बयान से मुकर जाने वाला,
3. अपने बयान में बताई बातों में संगति का ध्यान नहीं रखने वाला,
4. अपनी ही बात के विरुद्ध बोलने वाला,
वाला, 5. न्यायाधीश के पूछने पर अपने बदले हुए बयान को बदला हुआ नहीं मानने
6. न्यायालय में ही गवाहों के साथ सलाह करने वाला।
7. विवाद की सुनवाई के समय बेकार की बातें करने तथा इधर-उधर घूमने
वाला,
8. न्यायाधीश द्वारा पूछे गए प्रश्नों की उपेक्षा करने वाला,
9. न्यायाधीश द्वारा पूछे गए प्रश्नों पर चुप रहने वाला,
10. अपने पक्ष को दृढ़तापूर्वक नहीं कहने वाला,
11. विवाद के आगे-पीछे के सभी पहलुओं को नहीं जानने वाला।
साक्षिणः सन्ति मेत्युक्त्वा दिशेत्युक्तोदिशेन्न यः।
धर्मस्थः कारणैरेतैर्हीनं तमपि निर्दिशेत् ।। 57 ॥
न्यायाधीश को ऐसे व्यक्ति को पराजित घोषित कर देना चाहिए जो पहले अपना साक्षी प्रस्तुत करने की अनुमति चाहता है परन्तु अनुमति मिलने के बाद उसे नहीं ला पाता।
अभियोक्ता न चेद्ब्रूयाद् बध्यो दण्ड्यश्च धर्मतः ।
न चेत्त्रिपक्षात् प्रब्रूयाद्धर्म प्रति पराजितः ॥ 58 ॥
न्यायाधीश को उस विवाद करने वाले को भी पराजित घोषित कर देना चाहिए जो किसी व्यक्ति पर कोई दण्डनीय अभियोग लगाता है परन्तु न्यायालय द्वारा बुलाए जाने पर डेढ़ माह तक स्वयं उपस्थित नहीं होता।
यो यावन्निह्नवीतार्थं मिथ्या यावति वा वदेत्।
ता नृपेण ह्यधर्मज्ञो दाप्यो तद्विगुणं धनम् ॥ 59 ।।
जो ऋण लेने वाला मूल धन में से जितना नहीं दे और विवाद लाने वाला मूलधन से जितना अधिक धन की मांग करे, न्यायाधीश को चाहिए कि वह उन दोनों को अपने-अपने हिसाब से दूने धन का भुगतान करने का दण्ड दे।
पृष्टोऽपव्ययमानस्तु कृतावस्थो धनैषिणा।
त्र्यवरैः साक्षिभिर्भाव्यो नृपब्राह्मणसन्निधौ ॥ 60 1
राजा तथा ब्राह्मण के सम्मुख पूछे जाने पर कोई अपराधी किसी सत्य से इन्कार करता है तो उसे झूठा सिद्ध करने के लिए कम से कम तीन साक्षियों के बयान सुने। अपराधी के विरुद्ध तीन गवाह नहीं मिलने पर अपराधी की बात को ही सच्चा मानें।
यादृशा धनिभिः कार्या व्यवहारेषु साक्षिणः । तादृशान्सम्प्रवक्ष्यामि यथावाच्यमृतं च तैः ॥ 61 ।।
महर्षि भग कहते हैं- विद्वान ब्राह्मणो ! धनवानों को विवादों में जिस तरह के गवाह (साक्षी) बनाने चाहिए तथा उन गवाहों को जिस प्रकार से सच्ची गवाही देनी चाहिए, मैं उन सबकी जानकारी आप सभी को देता हूं।
गृहिणः पुत्रिणा मौलाः क्षत्रविट्शूद्रयोनयः ।
अयुक्ताः साक्ष्यमर्हन्ति न ये केचिदनापदि ।। 62 ॥
'घर-गृहस्थी वाले, सन्तान वाले, देश के मूल निवासी, किसी विपत्ति से ग्रस्त नहीं हुए क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र जाति के लोग गवाह (साक्षी) बन सकते हैं।
आप्ताः सर्वेषु वर्णेषु कार्याः कार्येषु साक्षिणः । सर्वधर्मविदोऽलुब्धाः विपरीतांस्तु वर्जयेत् ॥ 63 ॥
साक्षी उन्हीं को बनाना चाहिए जो चारों वर्णों में प्रामाणिक माने जाते हों, जो धर्मात्मा हो तथा जो प्रलोभन में नहीं आने वाले व्यक्ति हों। इसके विपरीत लोगों को साक्षी नहीं बनाएं।
नोऽर्थसम्बन्धिनोऽनाप्ताः न सहाया न वैरिणः ।
न दृष्टदोषाः कर्तव्याः न व्याध्यार्ताः न दूषिताः ।। 64 ॥
ऐसे व्यक्तियों को साक्षी नहीं बनाना चाहिए जो धन के लोभी हों, असत्य बोलने वाले हों, दूसरों पर आश्रित शत्रु हों, दुष्ट प्रकृति के अर्थात् अपनी बात बदल जाने वाले हों।
न साक्षी नृपतिः कार्यों न कारुककुशीलवौ।
न श्रोत्रियो न लिङ्गस्थो न सङ्गेभ्योविनिर्गतः ।। 65 ॥
नाध्यधीनो न वक्तव्यो न दस्युर्नविकर्मकृत ।
न वृद्धो न शिशुनैको नान्त्यो न विकलेन्द्रियः ।। 66 ।।
नार्ती न मत्तो नोन्मत्तो न क्षुत्तृष्णोपपीडितः ।
न श्रमातॊ न कामार्तों न कुद्धो नापि तस्करः ॥ 67 ।।
इन व्यक्तियों को साक्षी नहीं बनाएं- 1. राजा, 2. कारीगर, 3. नट, 4. वेदपाठी ब्राह्मण, 5. समाज से सम्बन्ध नहीं रखने वाले व्यक्ति या संन्यासी, 6. जो दूसरों के अधीन हों, 7. जो समाज में बदनाम हो, 8. डाकू, 9. निषिद्ध कार्य करने वाले, 10. बालक, 11. बुड्डे, 12. चाण्डाल, 13. जिनकी इन्द्रियां विकार ग्रस्त हों, 14. रोगी, 15. शराब पीने वाले, 16. पागल, 17. भूख-प्यास से ग्रस्त, 18. थका-मांदा रहने वाला, 19. काम में आसक्त, 20. क्रोध करने वाला, 21. चोरी करने वाला।
स्त्रीणां साक्ष्यं स्त्रियः कुर्युर्द्विजानां सदृशाः द्विजाः ।
शूद्राश्च सन्तः शूद्राणामन्त्यानामन्त्ययोनयः ।। 68 ॥
नारियों का साक्ष्य नारियों को, द्विजों का साक्ष्य उनके ही समान द्विजों को, शूद्रों का अच्छे आचरण वाले शूद्रों को तथा चाण्डालों का साक्ष्य चाण्डालों को करना चाहिए।
अनुभावी तु यः कश्चित्कुर्यात्साक्ष्यं विवादिनाम्।
अन्तर्वेश्मन्यरण्ये वा शरीरस्यापि चात्यये ।। 69 ॥
घर के अन्दर होने वाले, अरण्य (वन) में होने वाले या जिन लोगों के बीच शारीरिक रक्त सम्बन्ध हों, उनके मध्य होने वाले विवादों में किसी भी अनुभव प्राप्त व्यक्ति को साक्षी बनाया जा सकता है।
स्त्रियोऽप्यसम्भवे कार्य बालेन स्थविरेण वा।
शिष्येण बन्धुना वापि दासेन भृतकेन वा ॥ 70॥
यदि अनुभवी व्यक्ति की साक्षी नहीं मिले तो स्त्रियों, बच्चों, वृद्धों, शिष्यों, सम्बन्धियों तथा भृत्यों-सेवकों को साक्षी बनाया जा सकता है।
बालवृद्धातुराणां च साक्ष्येषु वदतां मृषा।
जानीयादस्थिरां वाचमुत्सिक्त मनसां तथा ।। 71 ॥
बालकों, वृद्धों तथा रोगग्रस्त व्यक्तियों के साक्ष्य में असत्य बोलने पर उनकी बातों पर विश्वास नहीं करें क्योंकि उनका मन अस्थिर होता है।
साहसेषु च सर्वेषु स्तेयसंग्रहणेषु च।
वाग्दण्डयोश्च पारुष्ये न परीक्षेत साक्षिणः ।। 72 ।।
साहस से किए जाने वाले अपराध जैसे चोरी-डाका, आग से जलाना, बलात्कार, अपहरण तथा परस्त्री संग के विषयों में और मार-पीट के मामलों में साक्षी देने वालों के कथन की ज्यादा परीक्षा नहीं करनी चाहिए और ऐसे अपराधियों को शीघ्रातिशीघ्र दण्ड देना चाहिए।
बहुत्वं परिगृह्णीयात्साक्षिद्वैधे नराधिपः ।
समेषुतुगुणोत्कृष्टान् गुणिद्वैधे द्विजोत्तमान् ॥ 73 ॥
आपस में विरोधी-साक्षियों में अधिक संख्या वालों को ही राजा को प्रमाण मानना चाहिए। अगर परस्पर विरोधी साक्ष्य समान संख्या में हों तो गुणी लोगों को संख्या के अनुपात को तथा इस अनुपात के भी बराबर होने पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साक्ष्य को प्रमाण माने।
समक्षदर्शनात्साक्ष्यं श्रवणाच्चैव सिद्धयति।
तत्र सत्यं बुवन्साक्षी धर्मार्थाभ्यां न हीयते ॥ 74॥
ऐसा साक्ष्य सब प्रकार से प्रामाणिक होता है जिसने अपने सामने देखा तथा अपने कानों से सना हो। ऐसे साक्षियों में भी उस साक्षी का कथन सबसे प्रामाणिक होता है जो सर्वदा सत्य बोलता है तथा जो कभी धर्म एवं अर्थ से हीन नहीं होता।
साक्षी दृष्टश्रुतादन्यद्विब्रुवन्नार्य संसदि।
अवाङ् नरकमभ्येति प्रेत्य स्वर्गाच्च हीयते ॥ 75 ॥
वह व्यक्ति इस जन्म में अपमान और बदनामी से पीड़ित रहता है जो आर्यों की सभा में नेत्रों से देखे तथा कानों से सुने सत्य के विरुद्ध साक्षी देता है। वह मृत्यु के बाद अगर अपने अच्छे कर्मों के फलस्वरूप स्वर्ग में भी चला जाए तो वहां से पतित हो जाता है।
यत्रानिबद्धोऽपीक्षेत शृणुयाद्वापि किञ्चन।
पृष्ठस्तत्रापि तद्ब्रूयाद्यथादृष्टं यथाश्रुतम् ।। 76 ॥।
अगर किसी ऐसे व्यक्ति से जिसे विवाद में गवाह नहीं बनाया गया है, उससे (विवाद से) संबंधित कुछ पूछा जाए तो उसे वही बताना चाहिए जो उसने वास्तव में देखा तथा सुना हो। वास्तविकता से अलग उसे कुछ नहीं बताना चाहिए।
एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्याद्बह्वयः शुच्योऽपि न स्त्रियः । स्त्रीबुद्धेरस्थिरत्वाच्च दोषैश्चान्येऽपि ये वृत्ताः ।। 77 ॥
मात्र एक ही लोभ रहित व्यक्ति की गवाही (साक्षी) पर्याप्त होती है। इसके विपरीत अनेक पवित्र नारियों की साक्षी भी विश्वास योग्य नहीं होती क्योंकि नारियों की बुद्धि सदा अस्थिर रहती है। इसी तरह अस्थिर बुद्धि वाले पुरुषों की साक्षी (गवाही) को भी प्रमाण नहीं मानना चाहिए।
स्वभावेनैव यद्ब्रूयुःस्तद्ग्राह्यं व्यावहारिकम् ।
अतो यदन्यद्वि ब्रूयुर्धर्मार्थं तदपार्थकम् ॥ 78 ॥
उसी साक्ष्य को निर्णय करने के लिए उपयोगी समझना चाहिए जो बिना किसी डर या लालच के, सहज भाव से दी गई हो। इसके विपरीत डर अथवा लालच से प्रेरित बनावटी गवाही को व्यर्थ समझना चाहिए।
सभान्तः साक्षिणः प्राप्तानर्थिप्रत्यर्थिसन्निधौ। प्राङ्विवाकोऽनुयुञ्जीत विधिनानेन सान्त्वयन् ।। 79 ॥
पक्ष और विपक्ष के साक्षियों के वकील को न्यायसभा में आने के बाद अत्यन्त धैर्यपूर्वक आगे बताई विधि से दोनों से प्रश्न करने चाहिए।
यद्वयोरनयोर्वेत्थकार्ये ऽस्मिंश्चेष्टितं मिथः ।
तद्भूत सर्वं सत्येन युष्माकं ह्यत्र साक्षिता ॥ 8० ॥
उसे साक्षियों से कहना चाहिए-वादी प्रतिवादी के इस मुकदमे के बारे में आप लोग जो कुछ जानकारी रखते हैं वह सब सत्य-सत्य बतलाएं क्योंकि आपकी
सत्यं साक्ष्ये ब्रुवन्साक्षी लोकानाप्नोति पुष्कलान्।
इहचानुत्तमां कीर्ति वागेषा ब्रह्मपूजिताः ।। 81 ॥
वकील कहे-गवाही में सच बोलने वाला व्यक्ति इस संसार में उत्तम यश को तथा परलोक में सद्गति पाता है, क्योंकि सच बोलने से वाणी की शक्ति बढ़ती है।
साक्ष्येऽनृतं वदन्पाशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम् ।
विवशः शतमाजातीस्तस्मात्साक्ष्यं वदेदृतम् ॥ 82 ।।
झूठी गवाही देने वाला वरुण देव के पाशों से बांधा जाकर सौ-सौ जन्मों तक जलोदर आदि बीमारियों से ग्रस्त रहता है। अतः साक्षी को हमेशा सच बोलना चाहिए।
सत्येन पूज्येत साक्षी धर्मः सत्येन वर्धते ।
तस्मात्सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर्णेषु साक्षिभिः ॥ 83 ।।
सत्य से धर्म का विकास होता है। इस भांति सच बोलने से साक्षी का मान-सम्मान बढ़ता है। अतः सभी वर्णों के साक्षियों को सच बोलना चाहिए।
आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी गतिरात्मा तथात्मनः ।
मावसंस्थाः स्वमात्मानं नृणां साक्षिणमुत्तमम् ॥ 84 ॥
मनुष्य की आत्मा स्वयं ही साक्षी और स्वयं की ही शरण में है अर्थात् व्यक्ति स्वयं यह जानता है कि वह सच बोल रहा है या झूठ।
मन्यन्ते वै पापकृतो न कश्चित्पश्यतीति नः।
तास्तु देवाः प्रपश्यन्ति स्वस्यैवान्तर पूरुषः ।। 85 ॥
जो व्यक्ति पाप करते हुए यह समझता है कि हमें कौन देखता है, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि देवता तथा उनके शरीर के भीतर का पुरुष (आत्मा) उन्हें देखता रहता है।
द्यौर्भूमिरापो हृदयं चन्द्रर्काग्नि यमानिलाः।
रात्रिः सन्ध्ये च धर्मश्च वृत्तजाः सर्वदेहिनाम् ।। 86 ।।
सभी प्राणियों के सत्-असत् कर्मों को आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, चन्द्र, सूर्य, आग, यम, वायु, रात, सन्ध्या और धर्म देखते हैं। अभिप्राय यह है कि इन देवताओं को सदैव प्रत्यक्ष समझकर व्यक्ति को पाप कर्म नहीं करना चाहिए।
देव ब्राह्मण सान्निध्ये साक्ष्यं पृच्छेदृतं द्विजान्।
उदडमुखान्प्राङ् मुखान्वा पूर्वाह्ने वैशुचिः शुचीन् ।। 87 ।।
शुद्ध हृदय न्यायकर्ता साक्षियों को देवता की मूर्ति तथा ब्राह्मणों के पास ले जाकर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके खड़ा करे और दोपहर के पहले उनकी गवाही लेते हुए उनसे सच बोलने को कहे।
ब्रूहीति ब्राह्मणं पृच्छेत्सत्यं ब्रूहीति पार्थिवम् । गोबीजकाञ्चनैवैश्यं शूद्रं सर्वैस्तु जातकैः ।। 88 ।।
चारों वर्णों के गवाहों से सत्य बुलवाने हेतु क्रमशः आगे बताए भिन्न-भिन्न वाक्यों का उपयोग करें-
ब्राह्मण से कहें- महाराज ! बोलिए।
क्षत्रिय से कहें-राजन् ! सच बोलिए।
वैश्य से कहें- महाजन ! तुम्हें पशु, धन तथा कृषि की शपथ! सच बोलिए।
शूद्र से कहें-सच नहीं बोलोगे तो तुम अन्याय के लिए जिम्मेवार होगे और सारे पाप के भागीदार बनोगे।
ब्रह्मघ्नो येस्मृताः लोकाः ये च स्त्रीबालघातिनः ।
मित्रद्रुहः कृतघ्नस्य ते च स्युर्बुवतोमृषा ।। 89 ॥
जो व्यक्ति झूठी गवाही देता है उसे वही नरक लोक प्राप्त होता है जो कि ब्रह्म हत्या, स्त्री हत्या, बाल हत्या करने वाले मित्र से विश्वासघात करने वाले तथा कृतघ्र व्यक्ति को मिलता है।
जन्मप्रभृति यत्किञ्चित्पुण्यं भद्र त्वया कृतम्।
तत्तेसर्व शुनोगच्छेद्यदि ब्रूयास्त्वमन्यथा ॥ 9० ॥
वकील को चाहिए कि वह साक्षियों से कहे कि सारे जीवन में आपने अच्छे कर्मों द्वारा जो पुण्य कमाया है, झूठी गवाही देते ही वह समस्त पुण्य कुत्तों को चला जाएगा अर्थात् समाप्त हो जाएगा।
एकोऽहमस्मीत्यात्मानं यत्त्वं कल्याण मन्यसे ।
नित्यं स्थितस्ते हृद्येष पुण्यपापेक्षिता मुनिः ॥ 91 ॥
अगर तुम यह समझ कर झूठी गवाही दे रहे हो कि तुम अकेले हो और तुम्हारी सच्चाई कोई नहीं जानता तो तुम गलती कर रहे हो क्योंकि तुम्हारे पाप-पुण्य को देखने वाला परमात्मा तुम्हारे हृदय में रहता है।
यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैष हृदिस्थितः ।
तेन चेदविवादस्ते मा गङ्गा मा कुरून् गमः ।। 92 ।।
तुम्हारे हृदय में भगवान विवस्वान यम साक्षी रूप में रहते हैं। यदि तुम्हें उनसे विवाद नहीं करना है तथा गाङ्ग प्रदेश या कुरु प्रदेश में प्रायश्चित करने हेतु नहीं जाना है तो तुम्हें झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए।
नग्नो मुण्डः कपालेन भिक्षार्थी क्षुत्पिपासितः ।
अन्धः शत्रुकुलं गच्छेद्यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ॥ 93 ॥
झूठी गवाही देने वाले व्यक्ति के शरीर पर कपड़े तथा सिर पर बाल नहीं रह जाते। वह नंगा तथा गंजा हो जाता है। वह हाथ में खप्पर लेकर भीख मांगकर अपना जीवन चलाता है और भूख-प्यास से व्याकुल रहता है तथा नेत्रहीन होकर शत्रुओं द्वारा पीड़ित किया जाता है।
अवाविशरास्समस्यन्धे किल्वषी नरकं व्रजेत्।
यः प्रश्नवितथं ब्रूयात्पृष्ठः सन्धर्मनिश्चये ।। 94 ॥
धर्म निर्णय हेतु प्रश्न पूछे जाने पर उसके उत्तर में झूठ बोलने वाला भयानक अंधेरे से भरे नरक में मुंह के बल गिरता है।
अन्धो मत्स्यानिवाश्नाति सः नरः कण्टकैः सह।
यः भाषतेऽथवैमल्पकप्रत्यक्षं सभां गतः ॥ 95 ॥
न्याय सभा में जाकर अनदेखी बात को आंखों देखी हुई बताने अर्थात् झूठी गवाही देने वाला अन्धा बनता है और मछली के मांस को कांटों सहित खाने के लिए मजबूर होता है।
यस्य विद्वान् हि वदतः क्षेत्रज्ञो नाभिशङ्कते।
तस्मान्न देवाः श्रेयांसं लोकेऽन्यं पुरुषं विदुः ॥ 96 ||
गवाही में बोलते हुए जिस मनुष्य की अन्तरात्मा में कोई भय या शंका नहीं रहती (क्योंकि वह सत्य बोलता है) इस लोक में देवता उससे अधिक श्रेष्ठ किसी दूसरे को नहीं मानते।
यावतोबान्धवान् यस्मिन् हन्तिसाक्ष्येऽनृतंवदन्।
तावतः संख्यया तस्मिन्शृणु सौम्यानुपूर्वशः ।॥ 97 ॥
भृगु जी कहते हैं- हे सौम्य ! गवाही में झूठ बोलने वाला जितने बान्धवों की हत्या करने का फल पाता है. उनकी संख्या क्रमशः मुझसे सुनिए ।
पञ्च पश्वनृते हन्ति दशहन्ति गवानृते ।
शतमश्वानृते हन्ति सहस्त्रं पुरुषानृते ॥ 98 ।।
गऊ, घोड़ा, ऊंट आदि साधारण पशुओं और पुरुष के बारे में झूठी गवाही देने बाला क्रमशः पांच, दस, सौ तथा हजार बान्धवों की हत्या करने का पाप प्राप्त करता है।
हन्ति जातानऽजातांश्च हिरण्यार्थेऽनुनं वदन् ।
सर्वभूम्यऽनृते हन्ति मा स्म भून्यऽनृतं वदीः ॥ 99 ।।
जो व्यक्ति स्वर्ण धातु के बारे में झूठ बोलता है वह जन्मे और अजन्मे पुत्रों की हत्या करने का पाप भोगता है। भूमि के लिए झूठ बोलने वाला समस्त लोकों की हत्या करने का पाप प्राप्त करता है। इसलिए भूमि के लिए कभी किसी तरह का असत्य नहीं बोलना चाहिए।
अप्सु भूमिवदित्याहुः स्त्रीणां भोगे च मैथुने।
अब्जेषु चैव रत्नेषु सर्वेष्वश्ममयेषु च ॥ 100 ।।
तालाब, बावड़ी आदि जलाशयों तथा स्त्रियों के साथ मैथुन करने और जल में उत्पन्न मोती, मूंगा आदि रत्नों के बारे में असत्य भाषण करने वाला उसी पाप का भागीदार होता है जो भूमि के विषय में झूठ बोलने वाला होता है।
एतान्दोषानवेक्ष्य त्वं सर्वाननृत भाजणे।
यथाश्रुतं यथादृष्टं सर्वमेवाञ्जसा वद ॥ 101 ।।
इस तरह सभी विषयों के बारे में झूठ बोलने से मिलने वाले भयानक पापों को ध्यान में रखकर व्यक्ति को अपनी आंखों से देखे और कानों से सुने को ही जैसे का तैसा (अर्थात् सच्चा) तथा उसी समय बता देना चाहिए।
गोरक्षकान्वाणिजिकांस्तथा कारुकुशीलवान् ।
प्रैष्यान्वार्धिकांश्चैव विप्रान् शूद्रवदाचरेत् ।। 102 ॥
किसी विवाद की पूछताछ में गउओं की रक्षा करने वालों, बनियों, लोहार बढई आदि का कार्य करने वालों गाने-बजाने वालों, डाक बांटने का कार्य करने वालों और सूदखोरी से अपनी जीविका चलाने वाले ब्राह्मणों से शूद्रों की तरह व्यवहार करना चाहिए।
तद्वदन्धर्मतोऽर्थेषु जानन्नप्यन्यथा नरः ।
न स्वर्गाच्च्यवते लोकाद्दैवीं वाचं वदन्ति ताम् ॥ 103 ॥
जो मनुष्य सत्य की जानकारी होते हुए भी धर्म के अनुरोध (समाज तथा धर्म रक्षा हेतु) से सत्य नहीं बोलता वह स्वर्गलोक से नहीं गिरता क्योंकि वह असत्य तो लोक कल्याण करने वाला होने से देवता की वाणी की भांति है।
शूद्रविट्क्षत्रविप्राणां यत्रर्तोक्ते भवेद्वधः ।
तत्र वक्तव्यमनृतं तद्धि सत्याद्विशिष्यते ।। 104 ॥
जिस विवाद में सच बोलने से शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मणों की हत्या निश्चित हो वहां झूठ भी बोलना चाहिए। वास्तव में वह झूठ, सच से अधिक महत्व रखता है।
वाग्दैवत्यैश्च चरुभिर्यजेरंस्ते सरस्वतीम् ।
अनृतस्यैनसस्तस्य कुर्वाणानिष्कृतिः पराम् ॥ 105 ॥
कूष्माण्डैर्वापि जुहुयात् घृतमग्नौ यथाविधिः ।
उदित्यृचा वा वारुण्या तृचेनाब्दैवतेन वा ॥ 106 ।।
मनुष्य की रक्षा के हेतु बोले गए असत्य के लिए आगे बतायी गई विधि से प्रायश्चित करना चाहिए-
सरस्वती जी का यजन-पूजन वाग्देवता सम्बन्धी चरु से करे (यद्देवादेवहेडनम) आदि यजुर्वेद के मंत्रों से विधिपूर्वक घी से आग में हवन करे या 'उदुत्तम वरुण पाशमस्मदबाधम्' मंत्रों से वरुण देव से अपराध की क्षमायाचना करे या 'आपो हिष्ठाः मयोभुवः' तीन ऋचाओं से जल से मार्जन करता हुआ वरुण देवता की पूजा करे।
टिप्पणी - मनु महाराज ने सामान्य परिस्थितियों में विवाद होने पर असत्य बोलने को पाप माना है परन्तु जहां व्यर्थ में किसी का वध होता हो अथवा कोई ऐसा सत्य हो जिसे बोलने से समाज का अहित होता हो उसे भी नहीं बोलना चाहिए। स्पष्ट है कि मनु जी ने सत्य भाषण के विषय पर समाज उपयोगी दृष्टि अपनाई है। उनके कथनों में वदतो-व्याघात दोष नहीं है।
त्रिपक्षादब्रुवन्साक्ष्यमृणादिषु नरोऽगदः ।
तदृणं प्राप्नुयात्सर्व दशबन्ध च सर्वतः ॥ 107 ।।
अगर कर्ज की उगाही के विवाद में कोई नीरोग तथा निरापद पुरुष तीन पक्ष अर्थात् 45 दिन तक गवाही देने के लिए न्याय सभा में उपस्थित नहीं होता तो उसे महाजन द्वारा लिए ऋण की सारी राशि का भुगतान करना चाहिए तथा इस राशि के दसवें भाग के बराबर धन दण्ड के रूप में राजा को देना चाहिए।
यस्य दृश्येत सप्ताहादुक्तवाक्यस्य साक्षिणः । रोगोऽग्निर्ज़ातिमरणमृणं दाप्योदमं च सः ॥ 108 ॥
गवाही देने के सात दिन के अन्दर जिस गवाह के घर में रोग, अग्निदाह, पुत्र आदि की मृत्यु जैसे दैवी उत्पात होने लगें तो गवाह को झूठा मानते हुए उसे महाजन के सारे धन का और राजा को दण्ड रूप में धन के दसवें भाव का भुगतान करने की आज्ञा देनी चाहिए।
असाक्ष्यकेषु त्वर्थेषु मिथे विवदमानयोः ।
अविन्दन्तत्त्वतः सत्यं शपथेनापि लम्भयेत् ।। 109 ।।
जिन विषयों में कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं हो तथा वादी प्रतिवादी की बातों (बयानों) से सत्य का ज्ञान नहीं होता हो वहां राजा को चाहिए कि दोनों से शपथ उठवा कर निर्णय करने का प्रयत्न करे।
महर्षिभिश्च देवैश्च कार्यार्थ शपथाः कृताः ।
वसिष्ठश्चापि शपथं शेपे वै यवने नृपे ॥ 110 ॥
महर्षियों तथा देवताओं ने भी प्राचीनकाल में न्याय निर्णय हेतु शपथ का सहारा लिया था। यवन नरेश के सम्मुख महर्षि वसिष्ठ ने सत्य को स्थापित करने के लिए शपथ का आश्रय लिया था।
न वृथा शपथं कुर्यात्स्वल्पेऽप्यर्थे नरो बुधः ।
वृथा हि शपथं कुर्यात्प्रेत्य चेह च नश्यति ॥ 111 ॥
बुद्धिमान व्यक्ति को साधारण बातों के लिए शपथ नहीं उठानी चाहिए क्योंकि जो बेकार में शपथ खाता है वह इस संसार में तथा परलोक में नाश को प्राप्त होता है।
कामिनीषु विवाहेषु गवां भक्ष्ये तथेन्धने।
ब्राह्मणाभ्युपपत्तौ च शपथे नास्ति पातकम् ।। 112 ॥
स्त्रियों के साथ विवाह करने अथवा उनके साथ भोग-विलास करने, गायों के चारे के बारे में, लडकी तथा ब्राह्मण की रक्षा करने के लिए झूठी शपथ खाने से कोई पाप नहीं लगता।
सत्येन शापयेद्विप्रं क्षत्रियं वाहनायुधैः ।
गोबीजकाञ्चनैवैश्यं शूद्रं सर्वैस्तु पातकैः ॥ 113 ।।
ब्राह्मण से सत्य की शपथ ले, क्षत्रिय से उसके रथादि वाहन और धनुष्ष आदि आयुध की शपथ ले, वैश्य से पशु, कृषि तथा व्यापार की शपथ ले एवं शूद्र से सभी पापों के लगने की शपथ करानी चाहिए।
अग्निं वा हारयेदेनमप्सु चैनं निमज्जयेत् ।
पुत्रदारस्य वाप्येनं शिरांसि स्पर्शयेत्पृथक् ॥ 114 ।।
अपनी शपथ की सच्चाई सिद्ध करने के लिए शूद्र को जलती अग्नि को हाथ से उठाना तथा पानी में डुबो देना चाहिए और उसे अपने बेटे और पत्नी के सिर पर अलग-अलग हाथ रखना चाहिए।
यमिद्धो न दपत्यग्निरापो नोन्मज्जयन्ति च।
न चार्तिमृच्छति क्षिप्रं सः ज्ञेयः शपथे शुचिः ।। 115 ।।
जिस शूद्र को जलती अग्नि जलाती नहीं, जल डुबोता नहीं तथा पुत्र आदि की मृत्यु रूपी पीड़ा दुःखी नहीं करती. उसे सत्यपूर्ण शपथ लेने वाला समझना चाहिए। टिप्पणी - महर्षि मनु जैसे महान विद्वान एवं चिन्तक द्वारा शूद्रों के प्रति इस प्रकार का अप्राकृतिक विचार बहुत अस्वाभाविक लगता है। ऐसे गुण तो महान योगी अथवा आध्यात्मिक ज्ञान युक्त कर्मयोगी में ही पाए जा सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस तरह के पक्षपातपूर्ण विचार बाद में मिलाए गए हैं।
वत्सस्य ह्यभिशस्तस्य पुरा भ्रात्रा यवीयसा।
नाग्निर्ददाह रोमापि सत्येन जगतः स्पृशः ॥ 116 ॥
प्राचीनकाल में वत्स ऋषि को जब उनके लघु भ्राता ने ब्राह्मण-पुत्र न होकर शुद्र पुत्र होने का उपालम्भ दिया तो उसने सत्य की साक्षी अग्नि में प्रवेश किया और अग्नि ने उसके एक रोम को भी नहीं जलाया।
टिप्पणी- यह प्रतीकों से पूर्ण काव्यात्मक वर्णन है। इसका शाब्दिक नहीं बरन भावार्थ समझना चाहिए। इसका वास्तविक अर्थ इस प्रकार होगा-
वत्स ऋषि को अपने छोटे भाई के उपालम्भ से इतनी पीड़ा हो सकती थी जितनी किसी को अग्नि में जलने से होती है परन्तु उनको कुछ नहीं हुआ अर्थात् उन्होंने उस उपालम्भ को शांतिपूर्वक सहते हुए यह सिद्ध करने में सफलता पाई कि वह ब्राह्मण-पुत्र हैं।
यस्मिन्यस्मिन्विवादे तु कौट साक्ष्यं कृतं भवेत्।
तत्तत्कार्यं निवर्तेत कृतं चाप्यकृतं भवेत् ॥ 117 ।।
जिस-जिस विवाद में, झूठी गवाही दी गई है, ऐसा संदेह न्यायकर्ता को हो तो उसे चाहिए कि वह उस-उस विवाद को फिर से सुने और उस संदर्भ में दिए निर्णय को निरस्त कर दे।
लोभान्मोहाद्भयान्मैत्र्यात्कामात् क्रोधात्तथैव च। अज्ञानाद्बालभावाच्च साक्ष्यं वितथमुच्यते ॥ 118 ॥
ऐसी गवाही झूठी मानी जाती है जो लालच, मोह-ममता, डर, मित्रता, काम, क्रोध, अज्ञान अथवा बचपने में दी गई हो।
एषामन्यतमे स्थाने यः साक्ष्यमनृतं वदेत्।
तस्य दण्डविशेषांस्तु प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥ 119 ।।
महर्षि भृगु ने कहा- ब्राह्मणो! लालच और मोह में आकर असत्य साक्ष्य देने वालों को विशेष दण्ड देने के बारे में क्रमशः बताता हूं।
लोभात्सहस्रं दण्ड्यस्तु मोहात्पूर्व तु साहसम्।
भयाद्वौ मध्यमौदण्डौ मैत्र्यात्पूर्व चतुर्गुणम् ॥ 120 11
लोभ के वश में झूठी गवाही देने पर हजार पणों का, मोह के वशीभूत हो असत्य बोलने वाले साक्षी को ढाई सौ पणों का, भय के वश में आकर झूठी गवाही देने वालों को पांच सौ पणों का और मित्रता के कारण असत्य बोलने वाले को दो हजार पणों का दण्ड देना चाहिए।
टिप्पणी - पण का अर्थ तत्कालीन सिक्के से है।
कामाद्दशगुणं पूर्व क्रोधात्तु त्रिगुणं परम्।
अज्ञानाद्द्वेशतेपूर्णे बालिश्याच्छतमेव तु ॥ 121 ॥
काम के वश में झूठी गवाही देने पर दस पणों का, क्रोध वश झूठी गवाही देने वाले को तीस पणों का, अज्ञानवश झूठी साक्षी देने वाले को दो सौ पणों का तथा मूर्खतावश झूठी गवाही देने वाले को एक सौ पर्णों का अर्थ दण्ड देना चाहिए।
एतानाहुः कौटसाक्ष्ये प्रोक्तान्दण्डान् मनीषिभिः । धर्मस्याव्यभिचारार्थमधर्म नियमाय च ।। 122 ।।
महर्षि भृगु बोले- ब्राह्मणो ! सत्य के रूप धर्म की व्यवस्था को बनाए रखने तथा अधर्म पर नियंत्रण रखने के लिए ही विद्वानों ने इस तरह की असत्य साक्षियों के लिए उपर्युक्त अर्थ दण्डों का विधान किया है।
कौटसाक्ष्यं तु कुर्वाणांस्त्रीन्वर्णान्धार्मिकोनृपः । प्रवासयेद्दण्डयित्वा ब्राह्मणस्तु विवासयेत् ।। 123 ।।
क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र-तीनों वर्षों के लोगों द्वारा असत्य साक्ष्य देने पर उन्हें दण्ड देकर देश से निकाल देना चाहिए। ब्राह्मण वर्ण के लोगों को दण्ड न देकर देश से निकाल देना चाहिए।
दशस्थानानि दण्डस्य मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।
त्रिषु वर्णेषु यानि स्युरक्षतो ब्राह्मणो व्रजेत् ।। 124 ॥
भृगु जी कहते हैं- विप्रो ! महाराज स्वायम्भुव मनु ने दण्ड के जो दस भेद बताए हैं, वे सब क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तीन वर्षों के लिए हैं। शारीरिक और आर्थिक आदि दण्ड ब्राह्मण को देना मना है। उसे केवल देश-निकाले का दण्ड दिया जा सकता है।
उपस्थमुदरं जिह्वा हस्तौ पादौ च पञ्चमम् ।
चक्षुर्नासा च कर्णों च धनं देहस्तथैव च ॥ 125॥
अनुबन्धं च परिज्ञाय देशकालौ च तावतः ।
सारापगधौ चालोक्य दण्डं दण्ड्येषु पातयेत् ॥ 126 ।।
दण्ड देने के दस स्थान हैं- उपस्थ (लिंग), पेट, जीभ, हाथ, पैर, आंखें, नाक, कान, शरीर तथा धन। इन्हें विकृत करना अर्थात् इन्हें पीड़ा देना ही दण्डित करना है।
विवाद, देश तथा काल को भली प्रकार देख, सुन तथा समझ कर जिनको दण्ड दिया जाए उनके साथ ही अपराधी के अपराध तथा उसकी सामर्थ्य को दण्ड देना चाहिए।
अधर्मदण्डनं लोके यशोघ्नं कीर्तिनाशनम् ।
अस्वर्यं परत्रापि तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ।। 127 ।।
दण्ड देने में अधर्म करने से (अन्यायपूर्ण दण्ड देने से) इस लोक में अपयश मिलता है तथा मृत्यु के बाद भी अपकीर्ति मिलती है और नरक प्राप्त होता है। अतएव अन्याय से किसी को दण्डित नहीं करना चाहिए।
अदण्ड्यान्दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन् ।
अयशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति ।। 128 ।।
जो व्यक्ति ऐसे लोगों को दण्ड देता है, जिन्हें दण्ड नहीं देना चाहिए तथा जिनको दण्ड देना चाहिए, उन्हें दण्ड नहीं देता, उसे संसार में बहुत अधिक अपयश मिलता है और मरने के बाद वह नरक जाता है।
वाग्दण्डं प्रथमं कुर्याद्धिग्दण्डं तदनन्तरम्।
तृतीयं धनदण्डं तु वधदण्डमतः परम् ।। 129 ।।
वधेनापि यदा त्वेतान्निग्रहीतुं न शक्नुयात्।
तदेषु सर्वमप्येतत्प्रयुञ्जीत चतुष्टयम् ॥ 130 ।।
सबसे पहले अपराध करने वाले को समझाना चाहिए। जब इसका असर नहीं पड़े, उसकी भर्त्सना करनी चाहिए। जब इससे भी वह न समझे तो उस पर अर्थ दण्ड लगाना चाहिए। जब इसका भी अनुकूल असर नहीं पड़े तो उसे शारीरिक दण्ड देना चाहिए।
शारीरिक दण्ड देने पर उसका अभीष्ट प्रभाव नहीं पड़ने पर चारों प्रकार के दण्डों का उपयोग एक साथ करना चाहिए।
लोकसंव्यवहारार्थं या संज्ञाः प्रथिताः भुवि ।
ताम्ररूप्यसुवर्णानां ताः प्रवक्ष्याम्यशेषतः ।। 131 ।।
महर्षि भृगु जी ने कहा-तांबा, चांदी तथा स्वर्ण से बने पणों के जो नाम संसार में व्यवहार के लिए प्रसिद्ध हैं, मैं आप लोगों को उन सबके बारे में जानकारी देता हूं जिससे आपको इनकी चोरी करने पर दिए जाने वाले दण्ड आदि का ज्ञान हो जाए।
जलान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः ।
प्रथमं तत्प्रमाणानां त्रसरेणुं प्रचक्षते ।। 132 ।।
खिड़की या रोशनदान की जाली के छिद्रों में गुजरती सूर्य किरणों में जो छोटे-छोटे धूल-कण दिखाई देते हैं उन्हें 'त्रसरेणु' कहते हैं।
त्रसरेणावष्टौ विज्ञेया लिक्षेका परिमाणतः ।
ताः राजसर्षपस्तिस्त्रस्ते त्रयोगौरसर्षपः ॥ 133 ॥
ऐसे आठ त्रसरेण के समूह का नाम लिक्षा है। तीन लिक्षाओं से मिलकर एक राई (राजसर्षप) तथा तीन राइयों को मिलाकर एक सफेद सरसों बनती है।
सर्षपाः षड्यवो मध्यस्त्रियवं त्वेककृष्णलम्।
पञ्चकृष्णलको माषस्ते सुवर्णस्तु षोडश ॥ 134 ॥
छह श्वेत सरसों के दानों से एक मझोला जौ, तीन जौ से एक कृष्णल (रत्ती),
पांच कृष्णल या रत्ती से एक माशा (माष) तथा सोलह माशों का एक तोला (सुवर्ण) होता है।
पलं सुवर्णाश्चत्वारः पलानि धरणं दश।
द्वे कृष्णले समधृते विज्ञेयो रौप्यमाषकः ।। 135 ॥
चार सुवर्णों (तोलों) का एक पल (छटांक), दश पलों का एक 'धरण' और दो रत्तियों (कृष्णल) को तराजू पर रखने से उसके बराबर एक 'रौप्य माषक' जानना चाहिए (रौप्य माषक अर्थात् चांदी का माषक) ।
ते षोडश स्याद्धरणं पुराणश्चैव राजतः ।
कार्षापणं तु विज्ञेयस्ताग्निकः कार्षिकः पणः ॥ 136 ॥
उन 16 रौप्य माषकों का एक रौप्यवरण (धरण) तथा चांदी का पुराण भी होता है। तांबे के पैसे को 'कर्ष' तथा 'पण' भी कहते हैं।
धरणानि दश ज्ञेयाः शतमानस्तु राजतः ।
चतुः यौवर्णिको निष्को विज्ञेयस्तु प्रमाणतः ।। 137 ।।
पणानां द्वे शते सार्धे प्रथमः साहसः स्मृतः ।
मध्यमः पञ्च विज्ञेयः सहस्त्रं त्वेव चोत्तमः ॥ 138 ॥
चांदी की दश धरण का एक 'शतमान', चार सुवर्णों के परिमाण का एक निष्क (अशर्फी), 250 पणों का 'प्रथम साहस', 500 पणों का 'मध्यम साहस' तथा एक हजार पणों का 'उत्तम साहस' होता है।
ऋणे देये प्रतिज्ञाते पञ्चकं शतमर्हति।
अपह्नवे तद्विगुणं तन्मनोरनुशासनम् ॥ 139 ॥
वसिष्ठविहितां वृद्धिं सृजेद्वित्तविवर्धनीम् ।
अशीतिभागं गृह्णीयान्मासाद्वाधुषिकः शते ।। 140 ॥
मनु महाराज ने यह विधान किया है कि यदि ऋण लेने वाला न्यायालय में महाजन से ऋण लेने की बात मान लेता है तो उस पर 5 प्रतिशत के हिसाब से और नहीं मानने पर (लेकिन बाद में झूठा सिद्ध होने पर) दस प्रतिशत पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
वसिष्ठ जी का मत इसके विपरीत है। उनके अनुसार ऋण लेना अस्वीकार करने (पर बाद में झूठा सिद्ध होने पर) वाले व्यक्ति से एक रुपया बीस पैसे प्रतिशत के हिसाब से दण्ड वसूलना चाहिए।
द्विकं शतं वा गृह्णीयात्सतां धर्ममनुस्मरन् ।
द्विकं शतं हि गृह्णानो न भवत्यर्थकिल्विषी ।। 141 ॥
सज्जनों की परम्परा के अनुसार दो प्रतिशत ब्याज लेना चाहिए। दो प्रतिशत ब्याज लेने वाला किसी भी प्रकार से पाप का भागी नहीं होता।
द्विकं त्रिकं चतुष्कं च पञ्चकञ्चशतं समम् ।
मासस्य वृद्धिं गृह्णीयाद्वर्णानामनुपूर्वशः ।। 142 ।।
ब्राह्मण से दो प्रतिशत, क्षत्रिय से तीन प्रतिशत, वैश्य से चार प्रतिशत तथा शूद्र से पांच प्रतिशत प्रतिमाह ब्याज लेना चाहिए।
नत्वेवाधोसोपकारे कौसीदीं वृद्धिमाप्नुयात्।
न चाधेः कालसंरोधान्निसर्गोऽस्ति न विक्रयः ।। 143 ।।
ऋण में दी गई राशि जब भोगयुक्त पदार्थों (जैसे भूमि, पशु आदि) को रेहन (बन्धक) रख कर दी जाती है तब उस पर ब्याज लेना अनुचित होता है। उन्हें निश्चित समय पर नहीं छुड़ाए जाने पर भी कर्जा देने वाले को उन्हें बेचने या किसी और को देने का अधिकार नहीं होता।
न भोक्तव्यो बलादाधिर्भुञ्जानो वृद्धिमुत्सृजेत् ।
मूल्येन तोषयेच्चैनमाधिंस्तेनोऽन्यथा भवेत् ॥ 144 ।।
बन्धक (रेहन) के रूप में रखे पदार्थ का अनुचित उपभोग नहीं करे। उसका उपभोग करने पर ऋण में दी गई राशि पर ब्याज लेने का अधिकार समाप्त हो जाता है। यदि ऋण देने वाले द्वारा पदार्थ का उपभोग किया जाता है तो आधि (रेहन रूप में आई) में आई किसी भी तरह की क्षति को उसे पूरा करना चाहिए।
आधिश्चोपनिधिश्चोभौ न कालात्ययमर्हतः ।
अवहार्यों भवेतां तौ दीर्घकालमवस्थितौ ।। 145 ।।
अमानत में रखे पदार्थों की निश्चित अवधि व्यतीत हो जाने पर भी स्वामी का स्वामित्व समाप्त नहीं होता। बहुत दिनों के बाद भी स्वामी अपनी सुविधा के अनुसार गिरवी और अमानत रखे पदार्थों को छुड़ा सकता है।
सम्प्रीत्याभुज्यमानानि न नश्यन्ति कदाचन।
धेनुरुष्टो वहन्नश्वो यश्च दम्यः प्रयुज्यते ।। 146 ।।
गाय, ऊंट, घोड़ा आदि पशुओं का दूसरों द्वारा प्रेम सहित उपभोग करते रहने पर भी उनके मूल स्वामी का अधिकार खत्म नहीं होता।
यत्किञ्चिद्दशवर्षाणि सन्निधो प्रेक्षतो धनी।
भुज्यमानं परैस्तूष्णीं न स तल्लब्धुमर्हति ।। 147 ।।
अगर गिरवी रखी या किसी (विधि सम्मत) और प्रकार से अधिकार में आई वस्तु या पदार्थ को कोई अन्य व्यक्ति स्वामी की जानकारी में दस वर्षों तक बराबर अपने उपयोग में लाता रहता है और स्वामी चुप रहता है (कोई विवाद नहीं करता) तो उस वस्तु पर उसका उपयोग करने वाले का ही अधिकार हो जाता है।
अजडश्चेदपौगण्डो विषये चास्य भुज्यते।
भग्नं तद्व्यवहारेण भोक्ता तद् द्रव्यमर्हति ।। 148 ।।
अगर बंधक (गिरवी) या धरोहर रखने वाला बालक या पागल नहीं है और उसके सम्मुख ही दूसरा व्यक्ति उस वस्तु का उपभोग करता रहता है तो न्यायालय उपभोग करने वाले को ही उस वस्तु का स्वामी बना देता है।
टिप्पणी - इस श्लोक के अर्थ को श्लोक संख्या 147 के संदर्भ में ही लेना चाहिए।
आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधिः स्त्रियः ।
राजस्वं श्रोत्रियस्वं च न भोगेन प्रणश्यति ।। 149 ।।
बन्धक, बालधन, धरोहर की राशि, नारियां, राजा का धन तथा श्रोत्रिय-धन आदि का दूसरे द्वारा भोग किए जाने पर भी भोगने वाले के नहीं होते और अपने स्वामी के ही बने रहते हैं।
यः स्वामिनाऽननुज्ञातमाधिभुङ्ङ्क्ते विचक्षणः । तेनार्धवृद्धिर्भोक्तव्या तस्य भोगस्य निष्कृतिः ॥ 150 ।।
यदि कोई चालाक व्यक्ति किसी भी बन्धक को उसकी आज्ञा लिए बिना ही उपयोग में लाता है तो उसे भोग करने के बदले में निश्चित ब्याज की राशि का आधा हिस्सा ही वसूलने का अधिकार होता है।
कुसीदवृद्धिद्वैगुण्य नास्त्येति सकृदाहृता।
धान्ये सदे लवे बाह्ये नातिक्रामति पञ्चताम् ॥ 151 ॥
एक बार नकद मूलधन का ब्याज लेने पर, ब्याज पुनः मूलधन से दो गुना नहीं हो सकता। धान्य, पेड-मूल, फल, ऊन तथा वाहन आदि के मूलधन पर ब्याज उससे (मूलधन से) पांच गुने से ज्यादा नहीं हो सकता।
कृतानुसारादधिका व्यतिरिक्ता न सिध्यति ।
कुसीदपथमाहुस्तं पञ्चकं शतमर्हति ।। 152 ॥
ब्याज की जो दर निर्धारित की गई है, शास्त्र उससे अधिक वसूली करने की
आज्ञा नहीं दे सकता। किसी भी रूप में ब्याज दर पांच प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
नातिसांवत्सरीं वृद्धिं न चादृष्टां पुनर्हरत ।
चक्रवृद्धिः कालवृद्धिः कारिका कायिता च या ॥ 153 ॥
मासिक दर से निश्चित किए गए ब्याज को एक वर्ष के बाद वसूल कर लेना चाहिए। इस बारे में न तो ज्यादा बढ़ाना चाहिए और न ही सूद-पर-सूद लेना चाहिए तथा सूद के बदले शारीरिक परिश्रम भी नहीं कराना चाहिए।
ऋणं दातुमशक्तो यः कर्तुमिच्छेत् पुनः क्रियाम्।
स दत्त्वा निर्जितावृद्धिकरणं परिवर्तयेत् ।। 154 ।।
जो व्यक्ति कर्ज चुकाने में असमर्थ हो, वह ब्याज की धनराशि चुकता करने के बाद नए ढंग से लिखा-पढ़ी करे।
अदर्शयित्वा तत्रैव हिरण्यं परिवर्तयेत् ।
यावती सम्भवेत् वृद्धिस्तावतीं दातुमर्हति ।। 155 ।।
जो व्यक्ति ब्याज की राशि देने में समर्थ नहीं हो उसके मूलधन में ब्याज को जोड़ देना चाहिए और कुल राशि पर उससे आगे का ब्याज वसूलना चाहिए।
चक्रवृद्धिं समारूढा देशकालव्यवस्थितः ।
अतिक्रामन्देशकालौ न तत्फलमवाप्नुयात् ॥ 156 ॥
उस धनवान व्यक्ति को जो चक्रवृद्धि ब्याज (सूद पर सूद) लेता है, देश तथा काल में प्रचलित नियमों का पालन करना चाहिए। ऐसा नहीं करने वाला व्यापारी फल को प्राप्त नहीं कर पाता।
समुद्रयानकुशला देशकालार्थदर्शिनः ।
स्थापयन्ति तु यां वृद्धिं सा तत्राधिगमं प्रति ।। 157 ॥।
देश, काल तथा अर्थ के उपयोग की जानकारी रखने वाले तथा समुद्री जहाज से यात्रा करने में कुशल व्यापारी जिस तरह अपने धन को बढ़ाते हैं, वही इस तथ्य का प्रमाण है कि धन का उपयोग किस प्रकार करना चाहिए।
यो यस्य प्रतिभूस्तिष्ठेद्दर्शनायेह मानवः ।
अदर्शयन् सतं तस्य प्रयच्छेत्स्वधनादृणम् ॥ 158 ।।
जो व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की जमानत या उसको प्रस्तुत करने का उत्तरदायित्व लेता है, लेकिन वह उसे प्रस्तुत नहीं कर पाता तो उसे उस दूसरे व्यक्ति का कर्जा स्वयं चुकाना चाहिए।
प्रतिभाव्यं वृथादानमाक्षिकं सौरिकं च यत्।
दण्डशुक्लावशेषं च न पुत्रो मातुमर्हति ॥ 159 ।।
पिता की मृत्यु होने पर उसके जमानती होने, बेकार में गंवाए (शराब पीने या वेश्यागमन करने के उद्देश्य से लिए उधार) धन का, जुए में हारी धनराशि का, शराब बेचने वाले के उधार का और आर्थिक दण्ड की बची राशि का उत्तरदायित्व पुत्र पर नहीं होता।
दर्शनं प्रातिभाव्ये तु विधिः स्यात्पूर्व चोदितः ।
दान प्रतिभुवि प्रेते दायादानपि दापयेत् ।। 160 ॥
कर देने के विवाद में भी पिता का दाय पुत्र पर नहीं होता। इसमें भी पहले बताई विधि ही अपनाई जाती है। जमानत देने वाले व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर उसके उत्तराधिकारियों की सहमति से, उनसे जमानत दिलायी जा सकती है।
अदातरि पुनर्दाता विज्ञातप्रकृतावृणम् ।
पश्चात्प्रतिभुवि प्रेते परीप्सेत्केन हेतुना ।। 161 ।।
केवल कर्जा लेने वाले को न्यायायल में पेश करने की जमानत लेने वाला (उसके कर्जे को चुकाने की नहीं) जमानती (प्रतिभू) अगर मर जाता है और कर्जा देने वाले को यह सब ज्ञात है तो जमानती के पुत्र-पौत्र आदि किसी भी तरह जिम्मेवार नहीं होते।
निरादिष्टधनश्चेत्तु प्रतिभूः स्यादलङ्घनः ।
स्वधनादेव तद्दद्यान्निरादिष्ट इति स्थितिः ॥ 162 ।।
पूर्व श्लोक में कहे गए प्रतिभू (जमानती) को अगर कर्जा लेने वाले ने कर्जे की राशि दे दी है लेकिन कर्जा देने वाले ने धन वापिस करने के लिए नहीं कहा और ऐसी स्थिति में प्रतिभु (जमानती) की मृत्यु हो जाए तथा उसका पुत्र उस कर्जे के धन को अपनी सम्पत्ति में से चुकाने में समर्थ हो तो वह कर्जा देने वाले का कर्ज चुका दे, यही शास्त्र मर्यादा है।
मत्तोन्मत्तार्ताध्यधीनैर्बालेन स्थविरेण वा।
असम्बद्ध कृतश्चैव व्यवहारो न सिद्धयति ॥ 163 ॥
ऐसे व्यक्तियों के साथ किया गया लेन-देन जो शराब आदि नशों के वश में पड़ा हो, पागल, रोगग्रस्त या पीड़ित हो अथवा धन नहीं कमाता हो या बालक अथवा वृद्ध हो तथा किया गया लेने-देन असम्बद्ध हो उसे प्रामाणिक नहीं मान। जाता।
सत्या न भाषा भवति यद्यपि स्यात्प्रतिष्ठिता।
बहिश्चेद्भाष्यते धर्मान्नियताद्व्यावहारिकात ।। 164 ।।
ऐसे प्रतिज्ञा-पत्र जो कानून या परम्परा के विरुद्ध हो प्रामाणिक नहीं माना जाता चाहे वह आपस में निश्चित करके मौखिक या लिखित रूप में प्राप्त हो।
योगाधनमविक्रीतं योगदानप्रतिग्रहम् ।
यत्र वाप्युपधिं पश्येत्तत्सर्वं विनिवर्तयेत् ॥ 165 ।।
बन्धक में रखी वस्तु का जो विक्रय-पत्र छल-कपट से बनाया गया हो या छल से बंधक रखी वस्तु का दान करने या वापस करने की लिखा-पढ़ी की गई हो उसे रद्द कर देना चाहिए। बन्धक तथा धरोहर को वापस कर देना चाहिए।
ग्रहीता यदि नष्टः स्यात्कुटुम्बार्थे कृतोव्ययः ।
दातव्यं बान्धवैस्तत्स्यात्प्रतिभक्तैरपि स्वतः ।। 166 ॥
परिवार का पालन-पोषण करने के लिए कर्ज लेने वाले की मृत्यु हो जाने पर परिवार के सदस्यों पर संपत्ति का बंटवारा होने या न होने पर उस कर्जे को चुकाने की पूरी जिम्मेवारी है।
कुटुम्बार्थेऽप्यधीनोऽपि व्यवहारं समाचरेत् ।
स्वदेशे व विदेशे वा तं ज्यायान्नविचालयेत् ।। 167 ।।
अपने परिवार की ओर से परिवार का कोई अधीन वयस्क सदस्य (जैसे पत्नी, पुत्र आदि) अपने या दूसरे देश में कोई लेन-देन करता है तो परिवार के मुखिया को उसे अमान्य (न मानने योग्य) नहीं करना चाहिए।
बलाद्दत्तं बलाद्भुक्तं बलाद्यच्चापि लेखितम्। सर्वान्बलकृतानर्थानकृतान्मनुरब्रवीत् II 168 II
भृगु महाराज कहते हैं-ऋषियो! भगवान मनु का स्पष्ट आदेश है कि बल प्रयोग द्वारा लिखाया गया या कराया गया कार्य अथवा भोगी गयी वस्तु को अप्रामाणिक मानना चाहिए (अर्थात् बल दिखाकर भोगी गई या ली गई वस्तु, धन, स्त्री आदि पर उसके स्वामी का ही अधिकार है)।
त्रयः परार्थे क्लिश्यन्ति साक्षिणः प्रतिभूः कुलम्। चत्वारस्तूपचीयन्ते विप्रआढ्योवणिङ् नृपः ।। 169 ॥
साक्षी (गवाही देने वाला), जमानती तथा परिवार ये तीनों दूसरों के लिए दुख सहते हैं और ब्राह्मण, वैश्य, साहूकार तथा राजा ये चारों दूसरों के कारण बढ़ते हैं अर्थात् उन्नति करते हैं।
अनादेयस्य चादानादादेयस्य च वर्जनात् ।
दौर्बल्यं ख्याप्यते राज्ञः स प्रेत्येह च नश्यति ।। 170 ॥
राजा द्वारा जो देने योग्य नहीं उसे देने तथा देने योग्य को नहीं देने से उसकी दुर्बलता सिद्ध होती है और इससे वह इहलोक एवं परलोक में नष्ट हो जाता है।
स्वादानाद्वर्णसंसर्गादबलानां च रक्षणात्।
बलं सञ्जायते राज्ञः स प्रेत्येह च वर्धते ।। 171 ।।
राजा की शक्ति न्याय के अनुसार उचित तथा ग्रहण करने योग्य को ग्रहण करने, सभी वर्गों के लोगों को अपने-अपने नियमों का पालन करने में स्थिर रखने तथा कमजोरों की रक्षा करने से बढ़ती है। वह इस संसार में तथा परलोक में यश प्राप्त करता है।
तस्माद्यम इव स्वामी स्वयं हित्वाप्रियाप्रिये।
वर्तेत याम्यया वृत्त्या जितक्रोधोजितेन्द्रियः ॥ 172 ॥
राजा तथा यम को इसलिए समान माना गया है क्योंकि राजा को यम की भांति अपने क्रोध तथा इन्द्रियों पर विजय पाकर, अपने प्रिय तथा अप्रिय को बिना महत्व दिए
सब लोगों के साथ उनके कर्मों के अनुसार व्यवहार करना होता है।
यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात्कुर्यान्नराधिपः ।
अचिरात्तं दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रवः ॥ 173 ॥
मोह के वश में आकर या अधर्म में पड़कर व्यवहार करने वाले दुरात्मा राजा को उसके शत्रु जल्दी ही अपने वश में कर लेते हैं।
कामक्रोधौ तु संयम्य योऽर्थान् धर्मेण पश्यति।
प्रजास्तमनुवर्तन्ते समुद्रमिव सिन्धवः ॥ 174 ॥
जो राजा काम तथा क्रोध को त्याग कर धर्मानुसार आर्थिक विवादों को निपटाता है उसकी प्रजा इस तरह उसके अनुकूल रहती है जैसे नदियां सागर की ओर बहती हैं।
यः साधयन्तं छन्देन वेदयेद्धमिकं नृपे।
स राज्ञा तच्चतुर्भागं दाप्यस्तस्य च तद्धनम् ।। 175 ।।
कर्जा लेने वाला जो व्यक्ति कर्जा देने वाले द्वारा मनमानी रीति से अधिक धन बसल करने की शिकायत करे तो राजा को चाहिए कि न्याय द्वारा उचित रीति से उसको रुपया वापस दिलवाते हुए, कर्जा देने वाले पर मूलधन का चतुर्थांश आर्थिक दण्ड लगाए।
कर्मणापि समं कुर्याद्धनिकायाधमर्णिकः ।
समोऽवकृष्टजातिस्तु दद्याच्छ्रेयास्तु तच्छनैः ।। 176 ।।
यदि ऋणी (कर्जा लेने वाला) ऋण देने की सामर्थ्य नहीं रखता तथा वह ऋण दाता की समान या उससे छोटी जाति वाला हो तो वह ऋणी कर्जा देने वाले (ऋणदाता) के यहां कार्य करके अपने कर्जे को चुकता करे। अगर ऋण लेने वाला, ऋण देने वाले से ऊंची जाति का हो तो अपना कर्जा किश्तों में चुकता करे।
अनेन विधिना राजा मिथोविवदतां नृणाम्।
साक्षिप्रत्ययसिद्धानि कार्याणि समता नयेत् ।। 177 ॥
राजा को चाहिए कि वह प्रजाजनों के पारस्परिक विवादों को गवाहों, दस्तावेजों और अन्य प्रमाणों के अनुसार न्यायपूर्वक निपटाए।
कुलजे वृत्तसम्पन्ने धर्मज्ञे सत्यवादिनि ।
महापक्षे धनिन्यार्ये निक्षेपं निक्षिपेद्बुधः ॥ 178 ।।
बुद्धिमान पुरुष को अच्छे कुल वाले, आचारवान, धर्मात्मा, सत्य बोलने वाले, प्रसिद्ध और आर्य समझे जाने वाले धनवान व्यक्ति के यहां ही अपनी चीज (वस्तु आदि) धरोहर रखनी चाहिए।
यो यथा निक्षिपेद्धस्ते यमर्थं यस्य मानवः ।
स तथैव ग्रहीतव्यो यथा दायस्तथाग्रहः ।। 179 ।।
जो व्यक्ति अपनी वस्तु को जिस हालत में किसी व्यक्ति के यहां रखता है, उस व्यक्ति को चाहिए कि दूसरे को वह वस्तु उसी रूप या स्थिति में वापिस करे। लेन-देन में एकरूपता का होना जरूरी है।
यो निक्षेपं याच्यमानो निक्षेप्तुर्न प्रयच्छति।
सः याच्यः प्राङ्विवाकेन तन्निक्षेसुरसन्निधौ ।। 180 ॥
अगर धरोहर रखने वाले से धरोहर का स्वामी अपना धरोहर वापस मांगे और वह उसे नहीं दे तो न्यायाधीश धरोहर रखने वाले की अनुपस्थिति में उससे पूछताछ करे।
साक्ष्यऽभावे प्रणिधिभिर्वयोरूपसमन्वितैः ।
अपदेशैश्च संन्यस्य हिरण्यं तस्य तत्त्वतः ॥ 181 ।।
किसी भी साक्षी के नहीं होने पर न्यायकर्ता को अपने वृद्ध तथा आचारवान (गुप्त) दूतों द्वारा उस व्यक्ति के पास मूल्यवान पदार्थ किसी बहाने से धरोहर रूप में रखवा देने चाहिए।
स यदि प्रतिपद्येत यथान्यस्तं यथाकृतम्।
न तत्र विद्यते किञ्चिद्यत्परैरभियुज्यते ।। 182 ।।
यदि गुप्त दूत के मांगने वह व्यक्ति उसकी धरोहर सुरक्षित दशा में वापिस कर देता है तो न्यायकर्ता को शिकायत करने वाले व्यक्ति को झूठा समझना चाहिए।
तेषां न, दद्याद्यदि तु सद्धिरण्यं यथाविधिः ।
उभौनिगृह्य दाप्यः स्यादिति धर्मस्य धारणा । 183 ।।
यदि धरोहर रखने वाला गुप्त दूतों को भी उनकी धरोहर रखी वस्तु नहीं वापस करता तो उसे ताड़न आदि दण्ड से वश में करके दोनों (शिकायतकर्ता तथा गुप्त दूत) की धरोहर वापिस निकलवानी चाहिए।
निक्षेपापनिधी नित्यं न देयोप्रत्यनन्तरे।
नश्यतो विनिपाते तावनिपातत्वनाशिनौ ॥ 184 ॥
बन्धक तथा धरोहर की वस्तुओं को उनके सच्चे स्वामी के अतिरिक्त उनके उत्तराधिकारियों को नहीं देना चाहिए। अगर इन चीजों के स्वामी की मृत्यु हो जाती है और वह अपने उत्तराधिकारियों को आवश्यक तथ्य बताए बिना मर गया है तो वे वस्तुएं धरोहर रखने वाले की ही हो जाती हैं।
स्वयमेव तु यो दाद्यान्मृतस्य प्रत्यनन्तरे ।
न स राज्ञा नियोक्तव्यो न निक्षेप्तश्च बन्धभिः ॥ 185 ॥
धरोहर को रखने वाला व्यक्ति अगर धरोहर के वास्तविक अधिकारी की मृत्यु के पश्चात् अपनी इच्छा से उस धरोहर की वस्तु को उसके उत्तराधिकारियों को वापस कर देता है तो राजा को उसमें दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए।
अच्छलेनैव चान्विच्छेत्तमर्थं प्रीतिपूर्वकम्।
विचार्य तस्य वा वृत्तं साम्नैव परिसाधयेत् ॥ 186 ।।
जो व्यक्ति अपने स्वर्गीय पिता द्वारा किसी के यहां रखी धरोहर या बन्धक को वापस लेना चाहता है उसे निश्च्छलता तथा प्रेमपूर्वक इसके लिए प्रयत्न करना चाहिए। उसे अपनी कमजोर स्थिति का ध्यान रखते हुए अपने कार्य को सिद्ध करने का प्रयत्न करना चाहिए।
निक्षेपेष्वेषु सर्वेषु विधिः स्यात्त्वरिसाधने। समुद्रेनाप्नुयात्किञ्चिद्यदि तस्मान्न संहरेत् ॥ 187 ।।
सभी तरह की धरोहरों की वस्तुओं की सत्यता को बनाए रखने की एक विधि उन पर गोपनीय रूप से अपनी मोहर लगाना या विशेष चिह्न बनाना है। इससे किसी तरह के छल-कपट की आशंका नहीं रहती।
चौरैर्हतं जलेनोढमग्निना दग्धमेव वा।
न दद्याद्यदि तस्मात्सः न संहरति किंचन ।। 188 ।।
नक्षेपस्यापहर्तारमऽविक्षेप्तारमेव च। सर्वैरुपायैरन्विच्छेच्छपथैश्चैव वैदिकैः ।। 189 ॥
अगर धरोहर रखने वाले व्यक्ति के यहां रखी धरोहर की चोरी हो जाए अथवा वह जल द्वारा बह जाए या आग द्वारा जल जाए तो उस धरोहर के विषय में उस पर कोई मुकदमा अथवा अभियोग नहीं चलाया जा सकता।
न्यायाधीश साम (समझाने-बुझाने) आदि उपायों और वैदिक शपथों से धरोहर का हरण करने वाले तथा धरोहर रखे बिना ही उसकी झूठी मांग करने वाले से पूछताछ कर सच्चाई जानने का प्रयत्न करे।
यौ निक्षेपं नार्पयति यश्चानिक्षिप्य याचते।
तावुभौ चौरवच्चास्यौ दाप्यौ वा तस्समं दमम्॥ 190 |
धरोहर को नहीं लौटाने वाले तथा धरोहर रखे बिना ही उसको मांगने वाले दोनों को ही चोर के समान दण्ड देना चाहिए। धरोहर की राशि के बराबर ही उन दोनों पर अर्थदण्ड (जुर्माना) लगाना चाहिए।
निक्षेपस्यापहर्तारं तत्समं दापयेद्दमम्।
तथोपनिधिहर्तारमविशेषेण पार्थिवः ।। 191 ॥
धरोहर रखकर फिर उसे न देने वाले को राजा धरोहर राशि के बराबर अर्थ दण्ड दे। इसी तरह बन्धक को नहीं लौटाने वाले को भी यही अर्थदण्ड देना चाहिए।
उपधानिश्च यः कश्चित्परद्रव्यं हरेन्नरः ।
स सहायः स हन्तव्यः प्रकाशंविविधैर्वधैः ।। 192 ॥
राजा का जो कर्मचारी अपने को राजा का प्रिय बताकर तथा राजकृपा का आश्वासन देकर प्रजा से घूस ग्रहण करता है उसे सबके सामने तरह-तरह की यातनाएं देकर जान से मार देना चाहिए।
निक्षेपो यः कृतो येन यावांश्च कुलसन्निधौ।
तावानेव स विज्ञेया विब्रुवन्दण्डमर्हति ।। 193 ।।
यदि कोई व्यक्ति गवाहों की उपस्थिति में स्वर्णादि को धरोहर स्वरूप रखवाता है और उसे वापिस लेते समय वह बहुमूल्य वस्तु वजन में कुछ कम हो, तो धरोहर रखने वाले को साक्षी लोगों के वचन को प्रमाण मानते हुए उस वस्तु के वजन को पूरा करना चाहिए।
मिथो दायः कृतोयेन गृहीतो मिथ एव वा।
मिथएव प्रदातव्यो यथादायस्तथा ग्रहः ।। 194 ॥
यदि धरोहर देने व रखने वाले ने परस्पर विश्वास के आधार पर ही धरोहर दी-ली हो, तो ऐसी स्थिति में धरोहर की वापसी भी परस्पर विश्वास पर ही होनी चाहिए और लेन-देन के दौरान इस भरोसे को बनाए रखना चाहिए।
निक्षिप्तस्य धनस्यैवं प्रीत्योपनिहितस्य च।
राजा विनिर्णयं कुर्यादक्षिण्वन्न्यासधारिणम् ॥ 195 ।।
धरोहर स्वरूप रखे हुए धन तथा स्वेच्छा व प्रेम से दूसरे को इस्तेमाल के लिए दी गई वस्तुओं को वापिस लेने के लिए ऐसे व्यवहार अथवा बर्ताव का पालन करना चाहिए कि धरोहर रखने वाले व्यक्ति को कष्ट न हो और उसे बुरा न लगे।
विक्रीणिते परस्य स्वंयोऽस्वामी स्वाम्यसम्मतः ।
न तं नयेत साक्ष्यंतु स्तेनमस्तेनमानिनम् ॥ 196 ॥
जो व्यक्ति धरोहर के स्वामी की अनुमति लिए बिना उसे बेच देता है और स्वयं को सज्जन व सच्चरित्र कहता है, उसे चोर समझें तथा उसके कथ्य अथवा गवाही पर भरोसा न करें।
अवहार्योभवेच्चैव सान्वयः षट्शतं दमम् ।
निरन्वयोऽनपसरः प्राप्तः स्याच्चौरकिल्विषम् ।। 197 ।।
दूसरे की वस्तु को उसकी आज्ञा बिना ही बेचने वाला व्यक्ति यदि धन के स्वामी का कर्मचारी हो तो उसे छः गुना दण्ड देना चाहिए। अगर वह धन के स्वामी का न तो सम्बन्धी है न ही कर्मचारी तो वह निश्चित ही चोर है, अतः इसी रूप में उसे दण्ड मिलना चाहिए।
अस्वामिना कृतोयस्तु दायो विक्रय एव वा।
अकृतः स तु विज्ञेयो व्यवहारे यथास्थितिः ।। 198 ।।
वस्तु के मालिक की अनुमति के बगैर उसकी खरीद-बेच को मर्यादानुसार किया गया क्रय-विक्रय नहीं समझना चाहिए।
सम्भोगो दृश्यते यत्र नदृश्येतागमः क्वचित्।
आगमः कारणं तत्र न सम्भोग इति स्थितिः ॥ 199 ॥
यदि वस्तु की खरीद का कोई सबूत न हो, लेकिन उसका उपभोग सर्वविदित हो, इसके उलट वस्तु के क्रय का प्रमाण तो हो किंतु वह उसका उपभोक्ता न हो-ऐसी स्थिति में जिस व्यक्ति ने वस्तु खरीदी है-उसे ही वास्तविक स्वामी समझना चाहिए।
विक्रयाद्योधनं किञ्चिद् दृह्णीयात्कुलसन्निधौ ।
क्रयेण सः विशुद्धं हि न्यायतो लभते धनम् ।। 200 ।।
यदि व्यक्ति अपने परिवार के सान्निध्य के माध्यम से विक्रय में धन प्राप्त करता है तो क्रय से विशुद्ध उस धन को न्यायोचित रूप से प्राप्त समझना चाहिए।
अथ मूलमनाहार्य प्रकाशक्रयशोधितः ।
अदण्ड्योमुच्यते राज्ञा नाष्टिको लभते धनम् ॥ 201 ।।
स्वयं को वस्तु का स्वामी कहने वाला या स्वामी के स्थान पर किसी व्यक्ति से सार्वजनिक रूप से वस्तु खरीदने वाला व्यक्ति यदि विक्रेता को न भी ला सके, तो भी वह दण्ड योग्य नहीं है।
नान्यदन्येन संसृष्टरूपं विक्रयमर्हति ।
न चासारं न च न्यूनं न दूरेण तिरोहितम् ॥ 202।।
मनुष्य वस्तु विशेष के स्थान पर किसी और वस्तु को, सड़ी-गली, वजन में कम, केवल दूर से ही ठीक दिखने वाली तथा ढकी हुई वस्तु को न बेचे। बिक्री के समय ग्राहक को वस्तु की ठीक-ठीक स्थिति बता देनी चाहिए।
अन्यां चेद्दर्शयित्वाऽन्यो वोढुः कन्या प्रदीयते।
उभे ते एकशुल्केन वहेदित्यब्रवीन्मनुः ।। 203 ।।
माता-पिता किसी दूसरी कन्या को दिखलाकर विवाह किसी और कन्या से करवा दें तो मनु जी के मतानुसार दोनों कन्याओं का समान शुल्क होता है।
नोन्मत्तायाः न कुष्ठिन्याः न चया स्पृष्टमैथुना।
पूर्व दोषाननभिख्याप्य प्रदाता दण्डमर्हति ॥ 204 ।।
विवाह के समय कन्या के पागलपन, कोढ़ादि रोग एवं अन्य से सहवासादि दोषों को छिपाने वाले कन्या के माता-पिता, भाई इत्यादि दण्डनीय होते हैं।
ऋत्विग्यदि वृतोयज्ञे स्वकर्म परिहापयेत् ।
तस्य कर्मानुरूपेण देयोंऽशः सह कर्तृभिः ।। 205 ।।
रोगादि अपरिहार्य कारणवश यदि यक्ष में वरण किया गया ऋत्विज काम को बीच में ही छोड़ देता है तो उसे उसके द्वारा किए गए कर्म के आधार पर दक्षिणा मिलनी चाहिए।
दक्षिणासु च दत्तासु स्वकर्म परिहापयन् ।
कृत्स्नमेव लभेतांशमन्येनैव च कारयेत् ।। 206 ।।
ऋत्विज अगर दक्षिणा लेने के पश्चात् अपने कार्य को किसी कारणवश पूर्ण न कर पाए तो उससे दक्षिणा वापिस लेकर उस व्यक्ति को दे देना चाहिए जो यह कार्य पूरा करे।
यस्मिन् कर्मणि यास्तु स्युरुक्ताः प्रत्यङ्गदक्षिणाः ।
स एव ता आददीत भजेरन्सर्वएव वा ।। 207 ।।
वह कर्म जिसमें हर भाग के लिए भिन्न दक्षिणा का विधान है, उसमें जो व्यक्ति जितने भाग को सम्पन्न करे, उसे उतने अंश की दक्षिणा देनी चाहिए।
रथं हरेत वाध्वर्युर्ब्रह्माधाने च वाजिनम्।
होता वापि हरेदश्वमुद्द्याताचाप्यनः क्रये ।। 208 ।।
यज्ञ में अध्वर्यु रथ को, अश्व को ब्रह्मा एवं होता और उद्गाता सोमक्रय को धारण करने के लिए शकट को ग्रहण करें।
।सर्वेषामर्धिनो मुख्यास्तथार्थेनाधिनोऽपरे। तृतीयिनस्तृतीयांशाश्चतुर्थांशाश्च पादिनः ।। 209 ।।
चार मुख्य ऋत्विज सभी यज्ञों में दक्षिणा का आधा भाग लेते हैं। उनसे आधा भाग लेने वाले अन्य चार, उनसे तीसरा भाग लेने वाले दूसरे चार और उनसे चौथा भाग लेने वाले और चार ऋत्विज होते हैं। अतः कुल सोलह ऋत्विज होते हैं।
सम्भूय स्वानि कर्माणि कुर्वद्भिरिह मानवैः ।
अनेन विधियोगेन कर्तव्यांशप्रकल्पना ।। 210 ।।
इस प्रकार मिलकर कार्य करने वाले लोगों को अपने-अपने भाग को लेना चाहिए।
धर्मार्थं येन दत्तं स्यात्कस्मैचिद्याचते धनम् ।
पश्चाच्च न तथा तत्स्यान्न देयं तस्य तद्भवेत् ।। 211 ।।
यदि कोई व्यक्ति धर्म-कार्य हेतु धन देता है तो उस पः उसका अधिकार खत्म हो जाता है। उसी धन को वह दूसरी बार किसी अन्य को नहीं दे सकता।
यदि संसाधयेत्तत्तु दर्पाल्लोभेन वा पुनः ।
राज्ञादाप्यः सुवर्णः स्यात्तस्यस्तेयस्य निष्कृतिः ।। 212 ॥
एक बार लोभवश या अहंकार से दिए गए दान को वापस लेना पाप है। राजा द्वारा ऐसे व्यक्ति को इस पाप से मुक्त करने के लिए सुवर्ण का दण्ड देना चाहिए।
दत्तस्यैषोदिता धर्या यथावदनपक्रिया।
अतऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वेतनस्यानपक्रियाम् ।। 213 ॥
भृगु जी ने कहा-जिस दण्ड विधान की जानकारी मैंने अभी तक आपको दी, उसके अंतर्गत धरोहर, बंधक दानादि के देने-लेने एवं रखने के नियम आते हैं। अब मैं आपको वेतन देने अथवा न देने के संदर्भ में क्या विधान है- इसके बारे में बतलाता हूं।
भृत्यो नार्तों न कुर्याद्यो दर्पात्कर्म यथोदितम् ।
स दण्ड्यः कृष्णलान्यष्टौ न देयं चास्यवेतनम् ।। 214 ।।
यदि भृत्य अर्थात् नौकर स्वस्थ होने के बावजूद अपने मालिक के द्वारा निर्दिष्ट कार्य को नहीं करता तो उसे आठ बेंतों का दण्ड मिलना चाहिए तथा उसे वेतन भी नहीं मिलना चाहिए।
आर्तस्तु कुर्यात्स्वस्थः सन्यथाभाषितमादितः ।
सः दीर्घस्यापि कालस्य तल्लभेतैव वेतनम् ॥ 215 ॥
किन्तु जो नौकर स्वस्थ अवस्था में ईमानदारी व निष्ठा से मालिक के आदेश का पालन करता है, वह रोगादि के कारण यदि लंबे समय तक अनुपस्थित भी रहे, तो भी उसे वेतन मिलना चाहिए।
यथोक्तमार्तः सुस्थोवा यस्तत्कर्म न कारयेत् ।
न तस्य वेतनं देयमल्पोऽनस्यापि कर्मणः ।। 216 ॥
पूर्व निश्चित कार्य को स्वस्थ अथवा बीमार व्यक्ति यदि पूरा नहीं करता, तो थोड़ा सा कार्य बचे रहने पर भी उसे पूरे काम का वेतन नहीं देना चाहिए।
एषधर्मोऽखिलेनोक्तो वेतनादानकर्मणः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि धर्म समयभेदिनाम् ।। 217 ॥
वेतन सम्बन्धी इन नियमों के पश्चात् अब मैं आपसे प्रतिज्ञा भंग करने वालों के लिए नियत दण्ड विधान के बारे में कहता हूं।
योग्रामदेशसङ्घानां कृत्वा सत्येन संविदम् ।
विसंवदेन्नरो लोभात्तं राष्ट्राद्विप्रवासयेत् ।। 218 ।।
यदि ग्राम, देश और संघों के साथ किसी वस्तु को देने का वचन देकर लोभवश वह व्यक्ति अपने वायदे से मुकर जाता है तो उसे देश से निर्वासित कर देना चाहिए।
निगृह्य दापयेच्चैनं समयव्यभिचारिणाम्।
चतुः सुवर्णान्वण्निष्कांश्छतमानं च राजतम् ।। 219 ॥
जो व्यक्ति काम पूरा करने की प्रतिज्ञा करके समय पर कार्य पूरा न करे उस व्यभिचारी को राजा द्वारा पकड़ लेना चाहिए और उसे चार सुवर्ण, छः निष्क और चांदी के शतमान को देने का दण्ड मिलना चाहिए।
एतद्दण्डविधिः कुर्याद्धार्मिकः पृथिवीपतिः ।
ग्रामजातिसमूहेषु समयव्यभिचारिणाम् ।। 220 ।।
पूर्व निश्चित समय पर कार्य पूरा न करने वाले व्यक्ति को ग्राम, जाति व समुदायों में राजा द्वारा इसी प्रकार दण्ड मिलना चाहिए।
क्रीत्वा बिक्रीय वा किञ्चिद्यस्येहानुशयो भवेत् । सोऽन्तर्दशाहात्तद्रव्यं दद्याच्चैवाददीत च ।। 221 ।।
जो वस्तु खरीद अथवा बेच दी जाने के बाद पसंद न आए उसे दस दिन के भीतर वापिस कर दिया जाना चाहिए। विक्रेता को भी चाहिए कि उस वस्तु को वापिस ले।
परेण तु दशाहस्य न दद्यान्नापि दाययेत्।
आददानाददच्चैव राज्ञादण्ड्यः शतानिषद् ।। 222 ।।
खरीदा-बेचा हुआ सामान दस दिन के बाद वापिस लिया-दिया नहीं जा सकता। जो क्रेता-विक्रेता इस प्रकार का कार्य करते हैं, राजा द्वारा उन्हें छः सौ पणों का दण्ड देना चाहिए।
यस्तु दोषावतीं कन्यामाख्याय प्रयच्छति।
तस्य कुर्वन्नृपो दण्डं स्वयं षण्णवतिं पणान् ॥ 223 ।।
अपनी कन्या के दोषों, कमजोरियों को छिपाकर उसका विवाह कर देने वाले व्यक्ति पर आठ सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
अकन्येति तु यः कन्यां ब्रूयाद्वेषेण मानवः ।
सः शतं प्राप्नुयाद्दण्डं तस्या दोषमदर्शयन् ।। 224 ।।
यदि कोई मनुष्य द्वेष पूर्वक दोष रहित कन्या पर भी दोषारोपण करता है और उसके दोष को दिखा नहीं पाता अर्थात् सिद्ध नहीं कर पाता तो ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति पर सौ पणों का दण्ड लगाने का विधान है।
पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः ।
नरकन्यासु क्वचिन्नृणां लुप्तधर्मक्रिया हि ताः ।। 225 ।।
चूंकि विवाह सम्बन्धी मंत्र कन्याओं के विषय में कहे गए हैं अतः उपरिवर्णित दण्ड का विधान है, ताकि किसी पर झूठा आरोप न लग सके। ये आचारहीन कन्याओं के लिए नहीं है। ऐसी कन्याओं के लिए धर्म-कार्य सम्पन्न नहीं किए जाते।
पाणिग्रहणिका मन्त्राः नियतं दारलक्षणम्।
तेषां निष्ठातु विज्ञेया विद्वद्भिः सप्तमे पदे ॥ 226 ।।
विवाह सम्बन्धी मंत्र निश्चित रूप से कन्या के स्त्री हो जाने के सूचक होते हैं। सप्तपदी के सप्तम पद के समय पढ़े जाने वाले मंत्र के साथ ही इन मंत्रों को पूर्ण हुआ जानें।
यस्मिन्कस्मिन्कृते कार्ये यस्येहानुशयो भवेत्।
तमनेन विधानेन धर्मे पथि निवेशयेत् ॥ 227 ।।
राजा को यदि किसी भी कार्य में दोष का संशय हो, तो वह उसे विधिपूर्वक धर्मानुकूल बनाने का प्रयास करे।
पशुषु स्वामिनां चैव पालनां च व्यतिक्रमे।
विवादं सम्प्रवक्ष्यामि यथावद्धर्मतत्त्वतः ।। 228 ।।
भृगुजी ने कहा- ब्राह्मणो अब पशुओं, पशुपालकों व पशु के स्वामी के बीच होने वाले मतभेदों के विषय में धर्मशास्त्रानुकूल जो विधान है, वह मैं आपको बतलाता हूं।
दिवा वक्तव्यता पाले रात्रौ स्वामिनि तद्गृहे।
योगक्षेमेऽन्यथा चेत्तु पालो वक्तव्यमियात् ।। 229 ।।
दिन में पशुओं की सुरक्षा पशुपालक करें और रात्रि में पशुओं का मालिक उनकी रक्षा करे चूंकि रात में पशु अपने स्वामी के घर में ही रहते हैं अतः चारे व पानी की कमी की स्थिति में भी दिन में पशुओं की सुरक्षा व कल्याण का दायित्व पशुपालक पर ही होता है।
गोपः क्षीरभृतो यस्तु स दुह्यद्दशतोवराम् ।
गोस्वाम्यनुमते भृत्यः सा स्यातपालेऽभृते भृतिः ।। 230 ॥
वेतन के रूप में दूध निश्चित किए जाने पर ग्वाला गायों के स्वामी की अनुपस्थिति में श्रेष्ठ दस गायों में से एक गाय को दुह ले। वही दूध उसका वेतन होगा।
नष्टं विनष्टं कृमिभिः श्वहतं विषमेमृतम्।
हीन पुरुषकारेण प्रदद्यात्पाल एव तु ॥ 231 ।।
पशु के नष्ट होने, नकारा हो जाने, कीड़ों द्वारा खा लिए जाने, कुत्तों द्वारा फाड़ दिए जाने, वन में खो जाने या वनचरों द्वारा वध किए जाने की स्थिति में पशु के स्वामी को ग्वाले द्वारा ही क्षतिपूर्ति करवानी चाहिए।
विघुष्य तु हृतं चौरैर्न पालो दातुमर्हति।
यदि देशे च काले स्वामिनः स्वस्यशंसति ।। 232 ।।
यदि ग्वाले से बलपूर्वक पशु को हर लिया जाता है और वह समय पर अर्थात् तत्काल इसकी सूचना पशु के स्वामी को दे देता है तो पशु की चोरी का पाप उसे नहीं लगता।
कर्णो चर्म च बालांश्च वस्तिं स्नायं च रोचनाम्।
पशुषु स्वामिनां दद्वान्मृतेष्वङ्गानि दर्शयेत् ।। 233 ।।
किसी पशु की मृत्यु हो जाने पर ग्वाले को उसके अंग पशु के स्वामी को दिखला देना चाहिए। मृत पशु के विभिन्न अंगों पर भी पशु के स्वामी का ही अधिकार होता है।
अजाविके तु संरुद्धे वृकैः पाले त्वानयति ।
यां प्रसह्यवृकोहन्यात् पाले तत्किल्विषं भवेत् ॥ 234 ।।
यदि भेड़-बकरियों को कोई भेड़िया पकड़ लेता है और चरवाहा उन्हें भेड़िये के शिकंजे से छुड़ाने का कोई प्रयास नहीं करता तो ऐसी स्थिति में पशु की मृत्यु का अपराधी ग्वाला होता है और उसकी मौत के पाप का भागीदार भी।
तासां चेदवरुद्धानां चरन्तीनां मिथो वने।
यामुत्प्लुत्य वृकोहन्यान्न पालस्तत्र किल्विषी ।। 235 ।।
चरवाहे की देखरेख में जंगल में चरती भेड़-बकरियों पर अचानक भेड़िया धावा बोलकर एकाध भेड़-बकरी को ले जाता है तो इसके लिए चरवाहे को उत्तरदायी नहीं माना जा सकता।
धनुःशत परीहारो ग्रामस्य स्यात्समन्ततः ।
शम्यापातास्त्रयो वाऽपि त्रिगुणो नगरस्य तु ॥ 236 ॥
पशुओं के चारागाह के लिए गांव के चारों ओर चार सौ हाथ परिमाण में या तीन बार लाठी फेंकने से घिरने वाली जमीन तथा नगर में इससे तिगुनी धरती छोड़ देनी चाहिए।
तत्रापरिवृतं धान्यं विहिंस्युः पशवो यदि ।
न तत्र प्रणयेद्दण्डं नृपतिः पशुरक्षिणाम् ॥ 237 ॥
यदि पशुओं द्वारा चारागाह नष्ट किया जाता है तो उसके लिए राजा पशुओं की देखभाल करने वाले पशुपालक को दण्डित न करे।
वृत्तिं तत्र प्रकुर्वीत यामुष्ट्रो न विलोकयेत् ।
छिद्रं च वारयेत् सर्वं श्वसूकरमुखानुगम् ॥ 238 ।।
राजा को चाहिए कि वह चारागाह की सुरक्षा के लिए इतनी ऊंची दीवार बनवाए कि ऊंट भी भीतर न देख सके और दीवार के छिद्रों को इस प्रकार बंद करवाए कि कुत्ते व सुअर भीतर मुख न डाल सकें।
पथिक्षेत्रे परिवृते ग्रामान्तीयेऽथवा पुनः ।
सपालः शतदण्डार्हो विपालांश्चारयेत्पशून् ।। 239 ।।
यदि चरवाहे की उपस्थिति में चारागाह की चारदीवारी से बाहर उसके निकट स्थित गांव के खेतों में पशु घुसते हैं तो चरवाहे पर सौ पण का दण्ड लगाना चाहिए और यदि चरवाहा उपस्थित नहीं है तो खेत का स्वामी पशु को अपने अधिकार में रख ले।
क्षेत्रेस्वन्येषु तु पशुः सपादं पणमर्हति।
सर्वत्र तु सदा देयः क्षेत्रकस्येति धारणा ।। 240 ।।
यदि किसी पशुपालक के पशु दूसरे के खेतों में चरने चले जाते हैं तो उस पर सवा पण का दण्ड लगाना चाहिए और पशुपालक के द्वारा ही खेतों में हुए नुकसान की भरपाई करवाना चाहिए।
अनिर्दशाहां गां सूनां वृषान्देवपशुंस्तथा। सपालान्वाविपालान्वामदण्ड्यान्मनुरब्रवीत् ।। 241 ।।
मनु जी के अनुसार यदि दस दिन की ब्यायी गाय द्वारा वृषभ एवं यज्ञ पशु चरवाहे की देखरेख में अथवा अकेले ही किसी के खेत में प्रवेश कर जाते हैं तो इसके लिए पशु, पशु का स्वामी व पशुपालक दण्ड योग्य नहीं हैं।
क्षेत्रियस्यात्यये दण्डो भागाद्दशगुणो भवेत्।
ततोऽर्थदण्डो भृत्यानामज्ञानात्क्षत्रियस्य तु ।। 242 ।।
यदि कोई खेत का स्वामी अपने पशुओं को किसी अन्य के खेत में चरने देता है तो उसे निश्चित दण्ड से दस गुना अधिक दण्ड मिलना चाहिए और यदि ऐसा मालिक के बिना जाने ही पशुपालक की देखरेख में होता है तो स्वामी आधा ही दण्ड देने के लिए उत्तरदायी है।
एतद्विधानमातिष्ठेद्धार्मिकः पृथिवीपतिः ।
स्वामिनां च पशूनां च पालानां च व्यतिक्रमे ।। 243 ।।
पशु स्वामियों व पशुपालकों के बीच उठने वाले मतभेदों का धार्मिक राजा द्वारा इसी प्रकार निर्धारण होना चाहिए।
सीमां प्रति समुत्पन्ने विवादे ग्रामयोर्द्वयोः ।
ज्येष्ठे मासि नयेत्सीमां सुप्रकाशेषु सेतुषु ॥ 244 ॥
यदि दो गांवों में सीमा-सम्बन्धी विवाद हो तो जेठ मास में जब घास-फूस सूख जाए और भूमि सीमा के चिह्न स्पष्ट हो जाएं तभी कोई निर्णय करें।
सीमावृक्षांश्च कुर्वीत न्यग्रोधश्वत्थकिंशुकान् । शाल्मलीन्शलतालांश्च क्षीरिणश्चैवपादपान् ।। 245 ।।
भूमि सीमा के चिह्न के रूप में वट, पलाश, शाल व अन्य दूध वाले वृक्ष रोपने चाहिए।
गुल्मान्वेणूंश्च विविधाञ्छमीवल्लीस्थलानि च।
शरन्कुब्जगुल्मांश्च तथा सीमा न नश्यति ।। 246 ॥
सीमा पर विभिन्न प्रकार के गुल्मों, बांसों के झाड़, शमी व अन्य लताएं लगाने से सीमा नष्ट नहीं होती।
तडागान्युदपानानि वाप्यः प्रस्त्रवणानि च।
सीमासन्धिषु कार्याणि देवतायतनानि च ।। 247 ।।
दो गांवों के बीच सीमा-स्थल पर तालाब, जलपान गृह, कुओं, बावली, झरनों तथा मंदिरों का निर्माण करवाना चाहिए। इससे लोगों का वहां आना-जाना लगा रहेगा और सीमा सुरक्षित व स्पष्ट रहेगी।
उपच्छन्नानि चान्यानि सीमालिङ्गानिकारयेत्।
सीमाज्ञाने नृणां वीच्य नित्यं लोकेविपर्ययम् ।। 248 ।।
लोगों में प्रायः सीमा को लेकर होने वाले विवादों को देखते हुए राजा द्वारा निम्रलिखित गूढ़ सीमा चिह्न बनवाने चाहिए।
अश्मनोऽस्थीनि गोबालांस्तुषान्भस्म कपालिका। करीषमिष्टकाङ्गारांश्छर्करा बालुकास्तथा ।। 249 ।।
यानि चैव प्रकाराणि कालाद्भूमिर्न भक्षयेत् ।
तानि सन्धिषु सीमायामप्रकाशानि कारयेत ।। 250 ।।
जो वस्तुएं धरती में दबा दी जाने पर नष्ट नहीं होतीं अर्थात् हड्डी, पत्थर, भस्म, तुष, गोबाल, खप्पर, शीशा, ईंट, कोयला, शक्कल इत्यादि-ऐसी ही वस्तुओं को सीमा-संधि स्थल पर गुप्त रूप से गड़वा देनी चाहिए।
एतैर्लिङ्गैर्नयेत्सीमां राजा विवदमानयोः ।
पूर्वभुक्त्या च सततमुदकस्यागमेन च ॥ 251 ।।
यदि सीमा-सम्बन्धी मतभेद पैदा होता है तो राजा को इन्हीं चिह्नों की सहायता से, पहले से भोगी जाने वाली जगह तथा नदी के जलप्रवाह के मार्ग से ही तत्सम्बन्धी निर्णय करना चाहिए।
यदि संशय एव स्याल्लिङ्गानामपि दर्शने।
साक्षिप्प्रत्यय एव स्यात् सीमावादविनिर्णयः ।। 252 ।।
यदि सीमा के निश्चय में उपरिलिखित प्रमाणों द्वारा भी संशय की स्थिति बनी रहती है तो साक्षी अर्थात् गवाह के सबूत से ही निर्णय करना चाहिए।
ग्रामोयककुलानां च समक्षं सीग्निसाक्षिणः ।
प्रष्टव्यः सीमलिङ्गानि तयोश्चैव विवादिनोः ।। 253 ॥
साक्षियों से सीमा-सम्बन्धी पूछताछ गांव के मुखिया समूह एवं संशय रखने वाले लोगों - अर्थात् दोनों पक्षों के सामने ही करनी चाहिए।
ते पृष्ठास्तु यथाब्रूयुः समस्ताः सीग्नि निश्चयम् ।
निबधीयात्तथा सीमां सर्वांस्तांश्चैव नामतः ।। 254 ।।
साक्षी अर्थात् गवाह सीमा निर्धारण के संदर्भ में पूछे गए सवालों का जो-जो उत्तर दें- वैसे ही सीमा निश्चित कर देनी चाहिए तथा साथ ही साथियों के नामों का भी उल्लेख कर देना चाहिए।
शिरोभिस्ते गृहीत्वोर्वी स्त्रग्विणो रक्तवाससः ।
सुकृतैः शापिताः स्वैः स्वैर्नयैर्युक्तं समञ्जसम् ।। 255 ।।
जो भी व्यक्ति सीमा निर्धारण में साक्षी बने उन्हें शरीर पर लाल वस्त्र, गले में फूलों की माला और सिर पर मिट्टी को धारण कर यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि यदि हम झूठ बोलें तो हमारे सारे पुण्यों का नाश हो जाए।
यथोक्तेन नयन्तस्ते पूयन्ते सत्यसाक्षिणः ।
विपरीतं नयन्तस्तु दाप्याः स्युर्द्विशतदमम् ।। 256 ।।
गवाही देने वाले व्यक्तियों के सत्य भाषण पर उन्हें सम्मानित करना चाहिए तथा इसके विपरीत गलत बोलने अथवा पथभ्रष्ट करने वालों पर सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
साक्ष्यभावेतुचत्वारोग्रामा सामन्तवासिनः ।
सीमाविनिर्णयं कुर्युः प्रयता राजसन्निधौ ॥ 257 ॥
यदि साक्षी भी उपस्थित न हों तो आसपास के चार गांवों के निवासी तथा भूपति राजा के सामने गांव की सीमा निश्चित करें।
सामन्तानामभावे तु मौलानां सीग्निसाक्षिणाम् ।
इमानप्यनुयुञ्जीत पुरुषान्वनगोचरान् ।। 258 ।।
यदि निकटवर्ती भपति भी न हों तो वन में विचरने वाले, मूल निवासियों को सीमा-मतभेद का साक्षी मान लेना चाहिए।
व्याधाञ्छाकुनिकान्नगोपान्कैवर्तान्मूलखानकान् । व्यालग्राहानुञ्छवृत्तीनन्यांश्च वनचारिणः ।। 259 ॥
शिकारी, चिड़ीमार, चरवाहे, मल्लाह, खान खोदने वाले, सांप पकड़ने वाले तथा दाने बीन कर जीवन यापन करने वाले कुछ ऐसे वनचर हैं जिन्हें सीमा निर्धारण साक्षी बनाया जा सकता है।
ते पृष्ठास्तु यथा ब्रूयुः सीमासन्धिषु लक्षणम्।
तत्तथास्थापयेद्राजा धर्मेण ग्रामयोर्द्वयोः ।। 260 ।।
पूछे जाने पर ये वनचर राजा के समक्ष सीमा संधि के जो लक्षण बताएं उन्हीं के अनुसार दो ग्रामों की सीमा निश्चित करनी चाहिए।
क्षेत्रकूपतडागानामारामस्य गृहस्य च।
सामन्तप्रत्ययो ज्ञेयः सीमासेतुविनिर्णयः ।। 261 ।।
यदि खेत, कुएं, तालाब, बाग-घरों तथा सेतुओं की सीमा का निर्णय करना है तो आस-पास रहने वाले प्रामाणिक पुरुषों के कथन को ही सत्य मानें।
सामन्ताश्चेन्मृषा ब्रूयुः सेतौ विवदतां नृणाम् ।
सर्वे पृथक्पृथग्दण्ड्याः राज्ञा मध्यमसाहसम् ।। 262 ॥
सेतु सम्बन्धी विवाद में आस-पास रहने वाले सज्जन यदि किसी कारणवश झूठ का आश्रय लें तो उनमें से प्रत्येक को मध्यम स्तर का आर्थिक दण्ड मिलना चाहिए।
गृहं तडागमारामं क्षेत्रं वा भीषयाहरन् ।
शतानि पञ्चदण्ड्यः स्यादज्ञानात् द्विशतोदमः ।। 263 ।।
यदि कोई व्यक्ति डरा-धमका कर दूसरे के घर, तालाब, बाग अथवा खेत को हथिया ले तो उस पर पांच सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए तथा अनजाने में दूसरे की सम्पत्ति पर अधिकार कर लेने वाले को दण्ड स्वरूप दो सौ पण देने चाहिए।
सीमायामविषह्यायां स्वयं राजैव धर्मवित् । प्रदिशेभूमिमेतेषामुपकारादिति स्थितिः ।। 264 ।।
यदि सीमा के संदर्भ में पर्याप्त सबूत उपलब्ध न हों तो धर्मज्ञ राजा को चाहिए कि वह स्वयं ही उस भूमि को परोपकार हेतु बने किसी न्यास को दे दे। ऐसी स्थिति में यही सबसे उचित निर्णय है।
एषोऽखिलेनाभिहितो धर्मः सीमाविनिर्णये।
अतः ऊर्ध्व प्रवक्ष्यामि वाक्पारुष्यविनिर्णयम् ।। 265 ।।
उपरिलिखित मर्यादा सीमा-सम्बन्धी मतभेदों के विषय में निर्धारित की गई है। विप्रो, अब मैं आपको कठोर व रूक्ष वाणी सम्बंधित दण्ड विधान के बारे में सविस्तार बतलाता हूं।
शतं ब्राह्मणमाकुश्य क्षत्रियो दण्डमर्हति ।
वैश्योऽप्यर्धशतं द्वे वा शूद्रस्तुवधमर्हति ।। 266 ।।
पञ्चाशद् ब्राह्मणो दण्डः क्षत्रियस्याभिशंसने।
वैश्ये स्यादर्धपञ्चाशच्छूद्रे द्वादशको दमः ।। 267 ॥
यदि क्षत्रिय ब्राह्मण को अपशब्द कहे तो उस पर सौ पणों का, वैश्य पर डेढ़
सौ पणों का अर्थदण्ड लगाना चाहिए तथा शूद्र को मृत्युदण्ड देना चाहिए। इसके उलट यदि ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र को अपशब्द कहे तो ब्राह्मण को क्रमशः पचास, पच्चीस तथा बारह पण दण्डस्वरूप देना चाहिए।
समवर्णे द्विजातीनां द्वादशैव व्यतिक्रमे ।
वादेष्ववचनीयेषु तदैव द्विगुणं भवेत् ।। 268 ।।
समान वर्ण वाला व्यक्ति यदि अपने ही वर्ण के व्यक्ति को अपशब्द कहे तो उस पर बारह पण दण्डस्वरूप देने का विधान है। यदि कोई बहुत भद्दी गाली देता है तो उसे बारह पण से दुगुना अर्थात् चौबीस पणों का दण्ड मिलना चाहिए।
एकाजातिर्द्विजातीस्तु वाचा दारुण या क्षिपन्।
जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः ॥ 269 ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य को यदि शूद्र द्वारा अपशब्द बोले जाएं तो उस शूद्र की दण्डस्वरूप जिह्वा काट लेनी चाहिए। तुच्छ वर्ण का होने के कारण उसे यही दण्ड मिलना चाहिए।
नामजातिग्रहं त्वेषामभिद्रोहेण कुर्वतः ।
निक्षेप्योऽयोमयः शंकुर्ध्वलन्नास्ये दशांगुलः ।। 270 ॥
यदि कोई शूद्र अहंकारवश, ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य के नाम और जाति का उच्चारण करता है तो उसके मुंह पर लोहे की दस अंगुल जलती हुई कील ठोंक देनी चाहिए।
धर्मोपदेशं दर्पण विप्राणामस्य कुर्वतः ।
तप्तमासेचयेत्तैलं वक्तृ श्रोत्रे च पार्थिवः ।। 271 ।।
जो शूद्र अहंकार के वशीभूत होकर ब्राह्मण को धर्मोपदेश देता है। राजा द्वारा उसके मुंह व कान में गर्म तेल डलवा देना चाहिए।
श्रुतं देशं च जातिं च कर्मशारीरमेव च।
वितथेन ब्रुवन्दर्पाद्दाप्यः स्याद् द्विशतं दमम् ॥ 272 ।।
यदि कोई शिक्षा, देश, जाति, व्यवसायादि के बारे में झूठ व बढ़ा-चढ़ा कर बोलता है, उसे दो सौ पणों का दण्ड मिलना चाहिए।
काणं वाप्यथवा खञ्जमन्यं वापि तथाविधम् ।
तथ्येनापि ब्रुवन्दाप्यो दण्डं कार्षापणा वरम् ।। 273 ॥
किसी विकलांग व्यक्ति को अर्थात् काने, लंगड़े आदि को सत्य होने पर भी यदि उसे कोई अपमानजनक भाषा में पुकारे तो उसे एक काषार्पण तक का दण्ड देना चाहिए।
मातरं पितरं जायां भ्रातरं तनयं गुरुम्।
आक्षारयच्छत दाप्यः पन्थानं चाददद्गुरोः ।। 274 ॥
जो व्यक्ति माता-पिता, स्त्री, भाई, पुत्र व गुरु को अपशब्द कहता है अपने गुरु को सामने आने पर भी विनम्रतापूर्वक मार्ग नहीं देता उसे सौ पणों का दण्ड देना चाहिए।
ब्राह्मणक्षत्रियाभ्यां तु दण्डः कार्यों विजानता ।
ब्राह्मणो साहसः पूर्वं क्षत्रिये त्वेव मध्यमः ॥ 275 ॥
यदि ब्राह्मण व क्षत्रिय के बीच गाली-गलौच होती है तो उन दोनों में ब्राह्मण को प्रथम साहस तथा क्षत्रिय को द्वितीय साहस का दण्ड मिलना चाहिए।
विट्शूद्रयोरेवमेव स्वजातिं प्रतितत्त्वतः ।
छेदवर्ज प्रणयन् दण्डस्येति विनिश्चयः ॥ 276 ।।
वैश्य व शूद्र में परस्पर कठोर संवाद होने की स्थिति में राजा द्वारा उन्हें उनकी जाति में मान्य दण्ड दिया जाना चाहिए। यही विधान है।
एष दण्डविधिः प्रोक्तोवाक्पारुष्यस्य तत्त्वतः ।
अतऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दण्ड पारुष्यस्य निर्णयम् ।। 277 ॥
विप्रो. उपर्युक्त वर्णन कठोर संवाद अथवा अपशब्द वाचन सम्बन्धी दण्ड विधि का वर्णन था। अब मैं आपको मार-पीट अर्थात् हिंसा के प्रयोग के लिए निश्चित दण्ड नियमों के बारे में बतलाता हूं।
येन केनचिदङ्गेन हिंस्याच्चेच्छ्रेष्ठमन्त्यजः ।
छेत्तव्यं तत्तदेवास्य तन्मनोरनुशासनम् ।। 278 ॥
शुद्र अपने शरीर के जिस भी अंग से द्विजातियों अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य पर प्रहार करे, उसका वही अंग काट देना चाहिए। मन जी द्वारा दी गई यही व्यवस्था है।
पाणिमुद्यम्य दण्डं वा पाणिच्छेदनमर्हति।
पादेन प्रहरन्कोपात्पादच्छेदनमर्हति ।। 279 ।।
द्विजाति अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य जाति के व्यक्ति को यदि कोई शूद्र हाथ से चांटा अथवा घूंसा मारता है या लाठी उठाकर हमला करता है तो उसका हाथ काट देना चाहिए और यदि वह क्रोधवश पैर से चोट करता है तो उसका पैर काट देना चाहिए।
सहासनमभि प्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः ।
कठ्या कृताङ्गोनिर्वास्यः स्फिचं वास्यावकर्तयेत् ।। 280 ॥
जो शूद्र उच्च वर्ण के लोगों के साथ बैठने की आकांक्षा रखता है उसकी कमर को दाग कर उसे वहां से भगा देना चाहिए या फिर उसके नितम्ब को इस प्रकार कटवा देना चाहिए कि वह न जीवित रह सके न ही मृत्यु को प्राप्त हो।
अविनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेन्नृपः ।
अवमूत्रयतो मेढ्रमवशर्द्धयतो गुदम् ॥ 281 ।।
यदि नीच जाति का व्यक्ति उच्च वर्ग के व्यक्ति पर थूकता है, पेशाब करता है अथवा पादता है तो क्रमशः उसके दोनों होंठ, लिंग और गुदा कटवा देनी चाहिए।
केशेषु गृह्णतो हस्तौ छेदयेदऽविचारयन्।
पादयोर्दाढिकायां च ग्रीवायां वृषणेषु च ॥ 282 ।।
त्वग्भेदकः शतं दण्ड्यो लोहितस्य च दर्शकः ।
मांसभेत्ता तु षण्निष्कान्प्रवास्यस्त्वस्थिभेदकः ।। 283 ।।
यदि कोई शूद्र जान से मारने के लिए किसी द्विजाति के व्यक्ति के बालों, दाढ़ी, गरदन तथा अण्डकोश को पकड़े तो उसके हाथों को बिना विचार किए तत्काल कटवा देना चाहिए।
यदि वह उच्च जाति के किसी सदस्य की त्वचा काटता है जिससे उसका खून निकल आता है तो उस पर सौ पण और मांस काटने के लिए छः निष्कों का दण्ड लगाना चाहिए। द्विजाति के किसी भी व्यक्ति की हड्डी तोडने के अपराध पर शूद्र को देशनिकाला दे देना चाहिए।
वनस्पतीनां सर्वेषामुपभोगः यथा यथा।
तथा तथा दमः कार्यों हिंसायामिति धारणा ।। 284 ॥
यदि हिंसा के कारण वृक्ष, लता अथवा पौधे आदि वनस्पतियों की क्षति होती है तो उसी क्षति के अनुपात में ही अपराधी को दण्ड मिलना चाहिए।
मनुष्याणां पशूनां च दुःखाय प्रहृते सति।
यथा यथा महदुःखं दण्डं कुर्यात्तथा तथा ।। 285 ॥
अपराधी व्यक्ति मनुष्य व पशुओं को जितने अनुपात में दुःख व कष्ट देता है उसी अनुपात में उसको दण्ड मिलना चाहिए।
अङ्गावपीडनायां च व्रणं शोणितयोस्तथा।
समुत्थानव्ययं दाप्यः सर्वदण्डमथापिवा ।। 286 ।।
लिंग अथवा योनि को पीड़ा पहुंचाने तथा रक्तपात करने पर अपराधी द्वारा प्रभावित व्यक्ति के इलाज का सारा व्यय अपराधी को दण्डस्वरूप देना चाहिए।
द्रव्याणि हिंसाद्यो यस्य ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा।
स तस्योत्पघरदयेत्तुष्टिंराज्ञो दद्याच्च तत्समम् ।। 287 ।।
जो व्यक्ति अपने स्वामी को जाने-अनजाने हानि पहुंचाता है, उसे हर प्रकार से प्रयत्न करना चाहिए कि उसका स्वामी संतुष्ट हो जाए और क्षति-पूर्ति के रूप में दिए गए धन जितना धन ही राजा को भी देना चाहिए।
चर्मचार्मिकभाण्डेषु काष्ठलोष्ठमयेषु च।
मूल्यात्पञ्चगुणो दण्डः पुष्पमूलफलेषु च ॥ 288 ।।
यदि कोई व्यक्ति चमड़े व चमड़े से बने मशकादि, लकड़ी तथा मिट्टी की बनी वस्तुओं को क्षति पहुंचाए, तो अपराधी को नष्ट हुई वस्तुओं के मूल्य से पांच गुना अधिक धन दण्ड स्वरूप देना चाहिए।
यानस्यचैव यातुश्च यानस्वामिन एव च।
दशातिवर्तनान्याहुः शेषे दण्डो विधीयते ॥ 289 ॥
अग्र वर्णित दस अवस्थाओं को छोडकर, सवारी, सवारी चालक व यान के स्वामी को अन्य अवस्थाओं में अपराध करने पर अवश्य दण्ड देना चाहिए।
छिन्नेनास्य भग्नयुगे तिर्यक्प्रतिमुखागते।
अक्षभङ्गे च यानस्य चक्रभङ्गे तथैव ॥ 290 ।।
छेदने चैव यन्त्राणां योक्तृरश्म्योस्तथैव च।
आक्रन्दे चाप्यपैहीति न दण्डं मनुरब्रवीत् ।। 291 ।।
(1) नाथ का टूटना (2) जुए का टूटना (3) मार्ग के टेढ़ा-मेढ़ा ऊंचा-नीचा होने के कारण अश्वादि का टेढ़ा-मेढ़ा होकर चलना (4) रुक-रुक कर चलना (5) रथ की धुरी का टूटना (6) पहिए का टूटना (7) रथ में जुड़े यंत्रों का टूटना (8) अश्वादि के गले में पड़ी रस्सी का टूटना (9) लगाम का टूटना (10) अश्वाद्रि के काबू से बाहर हो जाने पर चालक द्वारा 'बचो-बचो' चिल्लाना-आदि इन दस अवस्थाओं में यान के चालक को जान-माल के नुकसान के लिए अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। ऐसा मनु जी का कथन है।
यत्रापवर्तते युग्य वैगुण्यात्प्राजकस्य तु।
तत्र स्वामी भवेद्दण्ड्यो हिंसायां द्विशतं दमम् ।। 292 ।।
यान का चालक यदि अकुशल है और इसी कारणवश वाहन के बेकाबू होकर इधर-उधर चलने से हुई क्षति पूर्ति के लिए वाहन के स्वामी पर दो सौ पणों का दण्ड लगाने का विधान है।
प्राजकाश्चेद्भवेदाप्तः प्राजको दण्डमर्हति।
युग्यस्थाः प्राजके ऽन्नाप्तेसर्वे दण्ड्याः शतंशतम् ।। 293 ।।
किन्तु यदि चालक कुशल व स्वस्थ है और तब दुर्घटना घटती है तो चालक पर ही सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए। यह जानते हुए भी कि चालक अकुशल अथवा अस्वस्थ है, जो लोग वाहन पर सवार होते हैं तो दुर्घटना हो जाने पर वे सभी सौ-सौ पण दण्डस्वरूप देने के उत्तरदायी हैं।
स चेत्तु पथि संरुद्धः पशुभिर्वा रथेन वा।
प्रमापयेत्प्राणभृतस्तत्र दण्डोऽविचारतः ।। 294 ।।
जो कुशल वाहन चालक पशुओं अथवा अन्य वाहनों से मार्ग रुका होने पर भी वाहन उसी मार्ग पर चलाता है- तो ऐसी स्थिति में दुर्घटना होने पर चालक को बिना विचार किए ही दण्डित करना चाहिए।
मनुष्यमारणे क्षिप्तं चौरवत्किल्विषं भवेत्।
प्राणभृत्सु महत्स्वधं गोगजोष्ट्र हयादिषु ।। 295 ।।
कुशल चालक द्वारा वाहन चलाने पर यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है या किसी गाय, हाथी, घोडा आदि पशु की मौत हो जाती है तो चालक पर क्रमशः हजार पणों एवं पांच सौ पणों का दण्ड लगाने का विधान है।
क्षुद्रकाणां पशूनां तु हिंसायां द्विशतोदमः।
पञ्चाशत्तु भवेद्दण्डः शुभेषु मृगपक्षिषु ॥ 296 ।।
यदि किसी क्षुद्र पशु अर्थात् पालतू कुत्ते, बिल्ली, खरगोश या बछड़े आदि की हत्या हो जाती है तो दोषी व्यक्ति से दौ सौ पण और बुलबुल, तोता, मैना व कबूतर इत्यादि की हत्या के अपराध में पचास पणों का दण्ड लेना चाहिए।
गर्दभाजाविकानां तु दण्डः स्यात्पञ्चमाषिकः ।
माषकस्तु भवेद्दण्डः श्वशूकरनिपातने ।। 297 ।।
पांच माषक दण्ड गधे, बकरी और भेड़ादि की हत्या के अपराध में लगाने का विधान है तथा जंगली कुत्ते व सुअर की हत्या पर एक माषक दण्ड का।
माषक - तत्कालीन प्रचलित सिक्का।
भार्श पुत्रश्च दासश्च प्रेष्यो भ्राता च सोदरः ।
प्राप्तापराधास्ताड्याः स्युः रज्ज्वा वेणुदलेन वा ।। 298 ॥
जो स्त्री, पुत्र, दास, पत्रवाहक एवं छोटा सगा भाई किसी प्रकार का अपराध करते हैं तो उनकी रस्सी या बेंत से पिटाई करनी चाहिए।
पृष्ठतस्तु शरीरस्य नोत्तमाङ्गे कदाचन् ।
अतोऽन्यथा तु प्रहरन्प्राप्तः स्याच्च्चौर किल्विषम् ।। 299 ।।
किंतु इन अपराधियों के शरीर पर केवल पीठ पर ही प्रहार करना चाहिए सिर आदि उत्तम अंगों पर नहीं। ऐसा करने पर प्रहार करने वाले व्यक्ति को वही दण्ड मिलना चाहिए जो एक चोर को मिलता है।
एषोऽखिलेनाभिहितो दण्डपारुष्यनिर्णयः ।
स्तेनस्यात प्रवक्ष्यामि विधिं दण्डविनिर्णये ॥ 300 ।।
विप्रो ! मार-पीट सम्बन्धी दण्ड-विधान का यही वर्णन है। अब मैं आपको चोरी के अपराध पर मिलने वाले दण्ड के बारे में बतलाता हूं।
परमं यत्नमातिष्ठेत्स्तेनानां निग्रहे नृपः ।
स्तेनानां निग्रहादस्ययशो राष्ट्र च वर्धते ॥ 301 ॥
चोरों को पकड़ने के लिए राजा को पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि चोरों के पकड़े जाने पर अर्थात् चोरों के कम होने पर राजा की यश वृद्धि होती है तथा राष्ट्र समृद्ध बनता है।
अभयस्य हि यो दाता स पूज्यः सततं नृपः ।
सत्रं हि वर्धते तस्य सदैवाऽभयदक्षिणम् ।। 302 ।।
जो राजा अपनी प्रजा को अभयदान देता है, वह सदैव पूजनीय रहता है। अभय की दक्षिणा उसके यश को निरंतर बढ़ाती है।
सर्वतो धर्मः षड्भागो राज्ञो भवति रक्षतः ।
अधर्मादपि षड्भागो भवत्यस्य यऽरक्षतः ।। 303 ।।
जो राजा अपनी प्रजा की चोरों से रक्षा करता है उसे अपनी प्रजा के समग्र पुण्य फल का छठा भाग प्राप्त होता है। इसके विपरीत करने वाले राजा को प्रजा के समग्र पाप के फल का छठा भाग प्राप्त होता है।
यदधीते यद्यजते यद्ददाति यदर्चति।
तस्य षड्भागभाग्राजा सम्यग्भवति रक्षणात् ॥ 304 ॥
जो राजा प्रजा को अभय दान देता है अर्थात् भय से उनकी रक्षा करता है वह प्रजा के उन लोगों के पुण्य के छठे भाग का अधिकारी होता है जो वेदाध्ययन करते हैं यज्ञ-याग करते हैं, दान-दक्षिणा देते हैं तथा पूजा-अर्चना करते हैं।
रक्षन्धर्मेण भूतानि राजा वध्यांश्च घातयन्।
यजतेऽहरहर्यज्ञैः सहस्त्रशतदक्षिणैः ।। 305 ।।
वह राजा जो धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करता है और वध योग्य दुष्टों को मौत के घाट उतारता है वह नृप मानो सहस्रों रुपया दक्षिणा में दिए जाने वाले यज्ञों का सम्पादन करता है।
योऽरक्षन्बलिमादत्ते करं शुल्कं च पार्थिवः ।
प्रतिभागं च दण्डं च स सद्यो नरकं व्रजेत् ॥ 306 1
यदि राजा प्रजा की रक्षा नहीं करता लेकिन बलि, कर व शुल्क स्वरूप प्रजा से आय का छठा हिस्सा वसूल करता है वह राजा दण्ड पाने योग्य है तथा उसे जल्द ही नरक प्राप्त होता है।
अरक्षितारं राजानं बलिषड्भागहारिणम्।
तमाहुः सर्वलोकस्य समग्रमलहारकम् ।। 307 ॥
जो राजा प्रजा से कर आदि तो वसूल लेता है किन्तु प्रजा की रक्षा नहीं करता, वह सभी प्रजाजनों के सम्पूर्ण पापों को ढोता है।
अनपेक्षितमर्यादं नास्तिकं विप्रलुम्पकम् ।
अरक्षितारंमत्तारं नृपं विद्यादधोगतिम् ॥ 308 ॥
वह राजा, जो लोक मर्यादा का उल्लंघन करता है, ईश्वर में आस्था नहीं रखता, अनुचित रूप से धन जमा करता है, अभक्ष्य का भक्षण करता है और प्रजा की रक्षा नहीं करता वह भ्रष्ट व अधोगामी है, ऐसा जानें।
अधार्मिकं त्रिभिर्त्यायैर्निगृह्णीयात्प्रयत्नतः ।
निरोधनेन बन्देन विविधेन वधेन च ॥ 309 ॥
1. कारावास, 2. बंधन, 3. एवं अनेक प्रकार के आर्थिक अथवा शारीरिक दण्ड जिनमें मृत्यु भी एक है- इन तीन उपायों द्वारा राजा को अधार्मिक पुरुषों का निग्रह करना चाहिए।
निग्रहेण हि पापानां साधूनां संग्रहेण च।
द्विजातय इवेज्याभिः पूयन्ते सततं नृपाः ॥ 310 ।।
जिस प्रकार यज्ञों से ब्राह्मण नित्य पवित्र बने रहते हैं, उसी प्रकार पापियों के निग्रह व साधुओं की रक्षा करने से राजा निरंतर पवित्र रहता है।
क्षन्तव्यं प्रभुणा नित्यं क्षिपतां कार्यिणां नृणाम्।
बालवृद्धातुराणां च कुर्वता हितमात्मनः ॥ 311 ॥
जो राजा अपना हित व कल्याण चाहते हैं उन्हें बहुत यत्न से काम करने वालों अर्थात् बच्चों, बूढ़ों व रोगियों के छोटे-मोटे अपराध माफ कर देने चाहिए।
यः क्षिप्तो मर्षयत्यातैस्तेन स्वर्गे महीयते।
यस्त्वैश्वर्यान्न क्षमते नरकं तेन गच्छति ॥ 312 ।।
दुखियों द्वारा आक्षेप किए जाने पर जो राजा उत्तेजित नहीं होता बल्कि संयत होकर सहन कर लेता है वह स्वर्गलोक में अत्यंत प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त करता है किंतु जो राजा ऐश्वर्य में चूर हो उन्हें क्षमा नहीं करता, वह नरक लोक को प्राप्त होता है।
राजा स्तेनेन गन्तव्यो मुक्तकेशेन धावता।
आचक्षणेन तत्स्तेनेवंकर्मास्मि शाधिमाम् ॥ 313 ।।
जो चोर क्षमा प्रार्थी है उसे अपने केश खोलकर दौडते हुए राजा के पास जाना चाहिए, चोरी को स्वीकार कर राजा से दण्ड के रूप में सुधरने का अवसर पाने की याचना करनी चाहिए।
स्कन्धेनादाय मुसलं लगुडं वापि खादिरम्।
शक्तिं चोभयतस्तीक्ष्णमायसदण्डमेव वा ॥ 314 ।।
क्षमाप्रार्थी चोर को राजा के पास जाकर मूसल अथवा खदिर की लकड़ी से बने मजबूत डण्डे को अथवा दोनों ओर से तीखी धार वाली बरछी या लोहे के कुण्डे को कंधे पर रखकर कहना चाहिए कि वे इससे उसे दण्ड दें।
शासनाद्वा विमोक्षाद्वा स्तेनः स्तेयाद्धि मुच्यते।
अशासित्वा तु तं राजा स्तेनस्याप्नोति किल्विषम् ।। 315 ॥
चोर को दण्डित किया जाए या क्षमा किया जाए, उसके बाद वह चोरी के अपराध से मुक्त हो जाता है किंतु चोर को दण्ड न देने से राजा भी चोरी के अपराध का भागी हो जाता है।
अन्नादे भ्रूणहा माष्टिपत्यौ भार्यापचारिणी।
गुरौशिष्यश्च याज्यश्च स्तेनो राजनिकिल्विषम् ।। 316 ।।
स्त्री द्वारा भ्रूण हत्या के पाप की उपेक्षा कर उसका अन्न ग्रहण करने वाला तथा उसके द्वारा किए गए व्यभिचार को अनदेखा कर उसे छूट देने वाला पति, शिष्य के अपराधों को अनदेखा करने वाला गुरु तथा यजमान के अपराध की उपेक्षा करने वाला ऋत्विज इन सभी पापों के उत्तरदायी बनते हैं, ठीक इसी प्रकार चोर के अपराध की उपेक्षा करने वाला राजा भी उसके पाप का भागीदार होता है।
राजनिर्भूतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः ।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ।। 317 ।।
राजा द्वारा अपने दुष्कर्म का उचित दण्ड पा लेने के पश्चात् मनुष्य संतों के समान निष्पाप हो जाता है तथा स्वर्ग प्राप्त करता है।
यस्तुरज्जुं घटं कूपाद्धरेत् भिन्द्याच्च यः प्रपाम्।
सदण्डं प्राप्नुयान्माषं तच्च तस्मिन्समाहरेत् ॥ 318 ।।
जो व्यक्ति कुएं से पानी निकालने वाली रस्सी और मटके को चुराता है तथा प्याऊ को तोड़ देता है उस पर एक ग्राम स्वर्ण का दण्ड लगाने के साथ-साथ उसे रस्सी-मटका पुनः रखने और प्याऊ की मरम्मत करवाने का आदेश देना चाहिए।
धान्यं दशभ्यः कुम्भेभ्यो हरतोऽभ्यधिकं वधः।
शेषेत्येकादशगुणं दाप्यस्तस्य च तद्धनम् ॥ 319 ॥
जो व्यक्ति दस कुम्भों से अधिक धान्य चुराता है उसकी पिटाई होनी चाहिए और धान्य के स्वामी को उससे ग्यारह कुम्भ धान्य वापिस लेना चाहिए।
तथा धरिममेयानां शतादिभ्यधिके वधः । सुवर्णरजतादीनामुत्तमानां च वाससाम् ॥ 320 ॥
इसी प्रकार तुला द्वारा तौली जाने वाली बहुमूल्य धातुओं तथा वस्त्रों के चोर को भी सौ गुना दण्ड मिलना चाहिए।
पञ्चाशतस्त्वभ्यधिके हस्तच्छेदनमिष्यते ।
शेषे त्वेकादशगुणं मूल्या दण्डं प्रकल्पयेत् ।। 321 ।।
यदि कोई चोर पचास पल से अधिक मूल्यवान् धातु चुराता है तो उसके हाथ काट देने चाहिए। एक से उनचास पल तक का वजन चुराने पर चोर पर मूल्य का ग्यारह गुना धन देने का दण्ड लगाना चाहिए।
पुरुषाणां कुलीनानां नारीणां च विशेषतः ।
मुख्यानां चैव रत्नानां हरणे वधमर्हति ।। 322 ।।
कुलीन व सम्मानित परिवार के पुरुषों विशेषकर कुलीन स्त्रियों द्वारा बहुमूल्य रत्नों के चुराए जाने पर उन्हें मृत्युदण्ड देने का विधान है।
महापशूनां हरणे शास्त्राणामौषधस्य च।
कालमासाद्यकार्यं च दण्डं राजा प्रकल्पयेत् ।। 323 ।।
गाय, बैल, घोड़ा, बकरी व ऊंट आदि बड़े पशुओं, पुस्तकों एवं औषधियों के चोर पर समय व परिस्थिति अनुसार दण्ड लगाना चाहिए।
गोषु ब्राह्मणसंस्थासु कुरिकायाश्च भेदने।
पशूनां हरणे चैव सद्यः कार्योऽर्धपादिकः ॥ 324 ।।
जो व्यक्ति ब्राह्मण परिवार व गायों का हरण तथा नाक छेदन करता है तथा अन्य विविध पशुओं का हरण करता है वह तुरंत अर्ध-पाप के दण्ड का भागी होता है।
सूत्रकार्पासकिण्वानां गोमयस्य गुडस्य च।
दघ्नः क्षीरस्य तक्रस्य पानीयस्य तृणस्य च ॥ 325 ॥
वेणुवैदलभाण्डानां लवणानां तथैव च ।
मृण्मयानां च हरणे मृदोभस्मन एव च ॥ 326 ॥
मत्स्यानां पक्षिणां चैव तैलस्य च घृतस्य च।
मांसस्य मधुनश्चैव यच्चान्यत्पशुसम्भवम् ।। 327 ।।
अन्येषां चैव मादीनामाद्यानामोदनस्य च।
पक्वान्नानां च सर्वेषां तन्मूल्याद् द्विगुणो दमः ॥ 328 ॥
जो व्यक्ति सूत, कपास, मदिरा की गाद, गोबर, गुड़, दही, खीर, छाछ, जल व घास चुराता है, बांस की नली, बांस के बर्तन, नमक, मिट्टी के बर्तन, मिट्टी व राख, मछली, पक्षी, तेल, घी, मांस, शहद, पशु से प्राप्त होने वाले अन्य पदार्थों को चुराता है तथा चावल (पका) व अन्य विविध पकवानों को चुराता है, उसे चुराई गई वस्तु के मूल्य का दुगुना धन देने का दण्ड देना चाहिए।
पुष्पेषु हरिते धान्ये गुल्मवल्ली नगेषु च।
अन्येषु परिपूतेषु दण्डः स्यात्पञ्च कृष्णलः ।। 329 ॥
फूलों, हरे अन्न, गुल्म, वल्ली, वृक्षों व अन्न की वल्लियों के चोर को पांच कृष्णल का दण्ड मिलना चाहिए।
परिपूतेषु धान्येषु शाकमूलफलेषु च।
निरन्वये शतं दण्डः सान्वयेऽर्धशतं दमः ॥ 330 ॥
शुद्ध किए गए व पवित्र अन्नों, सब्जियों, कंद-मूल व फलों का चोर यदि निर्वंश हो तो उस पर सौ पणों का और यदि वंश वाला हो तो पचास पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
स्यात्साहसं त्वन्यत्प्रसभं कर्म यत्कृतम् ।
निरन्वयः भवेत्स्तेयः हृत्वाऽपव्ययते च यत् ॥ 331 ।।
यदि धन-धान्य को बलपूर्वक छीना जाए तो वह भी चोरी ही है। स्वामी से आज्ञा लिए बिना कुछ ले लेना या वस्तु लेकर मुकर जाना भी चोरी के समान ही अपराध है।
यस्त्वेतान्युपक्लृप्तानि द्रव्याणि स्तेनयेन्नरः ।
तमाद्यं दण्डयेद्राजा यश्चाग्निं चोरयेद् ग्रहात् ।। 332 ।।
जो उपर्युक्त वस्तुओं व घर से अग्नि चुराता है उसे 'प्रथम साहस' अर्थात् सौ पण का दण्ड मिलना चाहिए।
येन येन यथाङ्गेन स्तेनो नृषु विचेष्टते ।
तत्तदेव हरेत्तस्य प्रत्यादेशाय पार्थिवः ॥ 333 ॥
जिस प्रकार व जिस-जिस अंग से चोर चोरी करता है- राजा उसके वही अंग कटवा दे ताकि वह भविष्य में चोरी न कर सके।
पिताचार्यः सुहृन्माता भार्यापुत्रः पुरोहितः।
नाऽदण्ड्योनाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति ।। 334 ॥
वह पिता, आचार्य, मित्र, माता, पत्नी, पुत्र व पुरोहित आदि जो अपने धर्म में स्थिर नहीं रह पाते, वे भी राजा से दण्ड पाने योग्य हैं।
कार्षापणं भवेद्दण्ड्यो यत्रान्यः प्रकृतो जनः ।
तत्र राजा भवेद्दण्ड्यः सहस्त्रमिति धारणा ।। 335 ।।
प्रजाजनों पर जिस अपराध के लिए कार्षापण दण्ड लगना चाहिए, उसी अपराध के लिए राजा को सहस्त्रों पणों का दण्ड देना चाहिए।
अष्टापद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्विषम् ।
षोडशैस्तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च ॥ 336 ॥
ब्राह्मणस्य चतुःषष्टि पूर्ण वापि शतं भवेत्।
द्विगुणा च चतुःषष्टिस्तद्दोषगुण विद्धि सः ॥ 337 ।।
चोरी के अपराध का शूद्र, वैश्य व क्षत्रिय पर क्रमशः आठ, सोलह तथा बत्तीस गुना पाप लगता है किंतु ब्राह्मण को उसी अपराध का चौंसठ या एक सौ अट्ठाईस गुना पाप लगता है चूंकि ब्राह्मण को चोरी के गुण-दोषों की जानकारी होती है।
वानस्पत्यं मूलफलं दार्वग्न्यर्थं तथैव च।
तृणं च गोभ्यो ग्रासार्थमस्तेयं मनुरब्रवीत् ।। 338 ।।
मनु जी ने कहा है कि वनस्पति, कन्द-मूल, फल, ईंधन की लकड़ी व गायों के लिए घास की चोरी-चोरी नहीं कहलाती।
योऽदत्तादायिनो हस्ताल्लिप्सेत ब्राह्मणो धनम्। याजनाध्यापनेनापि यथा स्तेनस्तथैव सः ॥ 339 ॥
जो ब्राह्मण चोर के हाथ से यज्ञ करा या उसे वेद पढ़ा कर उससे धन लेने की इच्छा रखता है, उसे भी चोर ही मानना चाहिए।
द्विजोऽध्वगः क्षीणवृत्तिर्दाविभू द्वे च मूलके ।
आददानः परक्षेत्रान्न दण्डं दातुमर्हति ॥ 340 ।।
अपनी क्षीण वृत्ति अर्थात् आय की कमी से परेशान होकर जो ब्राह्मण मार्ग में पड़ने वाले खेत से कुछ कन्द-मूल अथवा गन्ना ले लेता है, उस पर दण्ड नहीं लगना चाहिए।
असन्धितानां सन्धाता सन्धितानां च मोक्षकः ।
दाशाश्वरथहर्ता च प्राप्तः स्याच्चोर किल्विषम् ।। 341 ।।
जो व्यक्ति दूसरें के पशुओं को बांधता है और बंधे हुए पशुओं को खोल देता है तथा दासों, अश्वों और रथों को हर लेता है, वह निश्चय ही दण्डनीय है।
अनेन विधिना राजा कुर्वाणः स्तेन निग्रहम्। यशोऽस्मिन्प्राप्नुयाल्लोके प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ।। 342 ।।
इस प्रकार जो राजा चोरों को दण्डित करके चोरी का निग्रह करता है वह इस लोक में यश प्राप्त करता है तथा परलोक में दिव्य सुखों का आनंद उठाता है।
ऐन्द्रं स्थानमभिप्रेप्सुर्यशश्चाक्षयमव्ययम् ।
नोपेक्षेतक्षणमपि राजा साहसिकं नरम् ।। 343 ।।
जो राजा इस लोक में अक्षय यश व मृत्यु के पश्चात् दिव्यलोक को पाने की कामना रखता है उसे चोरी-डाका डालने वाले व्यक्ति को एक क्षण के लिए भी अनदेखा नहीं करना चाहिए।
वाग्दुष्टास्तस्कराश्चैव दण्डेनैव च हिंसतः ।
साहसस्य नरः कर्त्ता विज्ञेयः पापकृत्तम्ः ॥ 344 ॥
वह व्यक्ति जो अपशब्द भाषण करता है, चोरी करता है, दूसरों के साथ हिंसा व हत्या करता है, उसे बहुत पापी मानें।
साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः ।
सः विनाशं व्रजत्याश् विद्वेषं चाधिगच्छति ।। 345 ।।
यदि राजा दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा कर देता है या उसके कृत्य को अनदेखा कर देता है, तो उसका शीघ्र विनाश हो जाता है- क्योंकि लोगों में उसके प्रति विद्वेष की भावना पैदा हो जाती है।
न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वाधनागमात्। समुत्सृजेत्साहसिकान्सर्वभूतभयावहान् ॥ 346 ।।
राजा को चाहिए कि वह स्नेहवश अथवा भारी धनराशि पाने पर भी प्रजाजन में भय पैदा करने वाले चोरों को बंधनमुक्त न करे।
शस्त्रं द्विजातिभिहियं धर्मो यत्रोपरुध्यते।
द्विजातीनां च वर्णानां विप्लवे कालकारिते ।। 347 ।।
यदि धर्म के अनुष्ठान में रुकावट उपस्थित होती है और द्विजातियों में राजद्रोह फूट पड़ता है तो इन तीनों वर्षों को राष्ट्र रक्षा हेतु शस्त्र धारण करने चाहिए।
आत्मनश्च परित्राणे दक्षिणानां च सङ्गरे।
स्त्रीविप्राभ्युपपत्तौ घ्नन्धर्मेण न दुष्यति ॥ 348 ।।
जो व्यक्ति अपनी प्राण रक्षा, बलपूर्वक छीनी जा रही दक्षिणा की सुरक्षा, स्त्री व ब्राह्मण पर आयी विपत्ति में उनकी रक्षा के लिए धर्म का पालन करते हुए दुष्ट को मौत के घाट उतारता है, वह पापी नहीं होता।
गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् ।
आतितायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ।। 349 ।।
यदि गुरु, बालक, वृद्ध या विद्वान ब्राह्मण अत्याचारी बनकर आए तो बिना कोई विचार किए उसका वध कर देना चाहिए।
नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन।
प्रकाशं वाऽप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्युमृच्छति ।। 350 ।।
जो व्यक्ति प्रकट रूप से या गुप्त रूप से हत्या के लिए आए मनुष्य का वध कर देता है उस पर किसी प्रकार का पाप नहीं लगता। अत्याचारी के दोष से हिंसा व क्रोध का पाप खत्म हो जाता है।
परदाराभिगमनेषु प्रवृत्तान्नृन्महीपतिः ।
उद्वेजनकरैर्दण्डैश्छिन्नयित्वा प्रवासयेत् ॥ 351 ॥
वह पुरुष जिसमें परस्त्रीगमन की प्रवृत्ति हो उसे हृदय विदारक दण्ड देकर तथा उसका लिंग काटकर उसे देश निकाला दे देना चाहिए।
तत्समुत्थो हि लोकस्य जायते वर्णसङ्करः ।
येन मूलहरोऽधर्मः सर्वनाशाय कल्पते ।। 352 I
संसार में परस्त्रीगमन से वर्णसंकर संतान का जन्म होता है, क्योंकि मूल को नष्ट करने के साथ ही अधर्म सर्वस्व विनाश कर देता है।
परस्य पल्या पुरुषः सम्भाषां योजयन् रहः ।
पूर्वमाक्षारितो दोषैः प्राप्नुयात्पूर्वसाहसम् ।। 353 ॥
जो व्यक्ति पहले से ही बदनाम है, वह यदि परायी स्त्री से एकांत में मिलने एवं वार्तालाप करने का प्रयास करता है तो उसे 'प्रथम साहसिक' का दण्ड मिलना चाहिए।
यस्त्वनाक्षारितः पूर्वमभिभाषेत् कारणात्।
न दोषं प्राप्नुयात्किञ्चिन्नहि तस्य व्यतिक्रमः ॥ 354 ।।
किंतु जो पुरुष पहले से निष्कलुष है, वह यदि परिस्थितिवश पराई स्त्री से बातचीत करता है तो उसे अपराध न समझें।
परस्त्रियं योऽभिवदेत्तीर्थेऽरण्येवनेऽपि वा।
नदीनां वापि सम्भेदे सः संग्रहणमाप्नुयात् ।। 355 ।।
यदि पुरुष तीर्थ, वन व नदियों के संगम पर परस्त्री से सम्भोग करता है तो वह परस्त्रीहरण अपराध के लिए दण्डनीय है।
उपहारक्रिया केलिः स्पर्शा भूषणवाससाम्।
सहखट्वासनं चैव सर्व संग्रहणं स्मृतम् ॥ 356 ॥
परस्पर उपहारों का लेन-देन, हास्य-विनोद, आलिंगन, वस्त्रों व आभूषणों को छूकर उसकी प्रशंसा करना साथ-साथ शय्या पर बैठना या लेटना इत्यादि परस्त्री से सम्भोग के समान ही है।
स्त्रियं स्पृशेद्देशे यः स्पृष्टो वा मर्षयेत्तथा।
परस्परस्यानुमते सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ 357 ।।
पराई महिला के गुप्तांगों का स्पर्श करना अथवा अपने अंगों पर उसके स्पर्श से सुख उठाना भी स्त्री भोग ही मानें।
अब्राह्मणः संग्रहणे प्राणान्तं दण्डमर्हति ।
चतुर्णामपि वर्णानां दाराः रक्ष्यतमाः सदा ॥ 358 ।।
सभी वर्णों की स्त्रियां रक्षा योग्य होती हैं अर्थात् उनकी पवित्रता बलात् कलंकित नहीं करनी चाहिए। ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य तीन वर्षों के लोगों को
परस्त्रीगमन के लिए मृत्यु दण्ड मिलना चाहिए।
भिक्षुकाः वन्दिनश्चैव दीक्षिताः कारवस्तथा ।
सम्भाषणं सह स्त्रीभिः कुर्युरप्रतिवादिताः ॥ 359 ।।
उन भिक्षुओं, बन्दियों, स्नातकों वरसोइए को स्त्री से वार्तालाप करने का पूर्ण अधिकार है जिन पर इस प्रकार का प्रतिबंध न लगाया गया हो।
न सम्भाषां परस्त्रीभिः प्रतिषिद्धः समाचरेत्।
निषिद्धो भाषमाणस्तु सुवर्णं दण्डमर्हति ॥ 360 ।।
यदि ऐसा प्रतिबंध लगया गया है, तो पुरुष को परस्त्रियों के साथ संवाद नहीं करना चाहिए। इस प्रतिबंध का सम्मान न करने वाले व्यक्ति पर सुवर्ण के एक सिक्के का दण्ड लगाना चाहिए।
नैषचारणदोषेषु विधिर्नात्मोपजीविषु ।
सञ्जयन्ति हि ते नारी निर्मूढाश्चारयन्ति च ।। 361 ।।
नट व चारण आदि की स्त्रियों व आजीविका के मद्देनजर अपने अधीन पुत्रादि की स्त्रियों से बातचीत करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। भाट व चारण तो स्वयं ही अपनी स्त्रियों का श्रृंगार कर उन्हें पर पुरुषों के पास भेजा करते हैं।
किञ्चिदेव तु दाप्यः स्यात्सम्भाषां ताभिराचरन् ।
प्रैष्यासु चैकभक्तासु रहः प्रव्रजितासु च ॥ 362 ॥
इस तरह की स्त्रियों से एकांत में संवाद करने वाले तथा भक्त एवं वैरागी स्त्रियों से प्रेमक्रीड़ा करने वाले पुरुष दण्डनीय होते हैं।
योऽकामां दूषयेत्कन्यां स सद्यो वधमर्हति ।
सकामां दूषयंस्तुल्यो न वधं प्राप्नुयान्नरः ॥ 363 ।।
जो कन्या सम्भोग की इच्छुक नहीं उससे बलात् सम्भोग करने वाले पुरुष को तुरंत मृत्युदण्ड देना चाहिए। सम्भोग के लिए स्वयं इच्छुक कन्या से सहवास करने वाला व्यक्ति मृत्युदण्ड का अधिकारी नहीं होता। उसे कोई दूसरा दण्ड मिलना चाहिए।
कन्यां भजन्तीमुत्कृष्टं न किञ्चिदपि दापयेत् ।
जघन्यं सेवमानां तु संयतां वासयेद् गृहे ॥ 364 ।।
जो कन्या अपने से उच्च वर्ग के पुरुष के साथ सम्भोग करती है वह दण्डनीय नहीं। यदि उसका सम्बन्ध अपने से हीन वर्ण वाले पुरुष के साथ हो जाता है तो उसे समझा-बुझा कर घर में ही रखना चाहिए।
उत्तमां सेवमानस्तु जघन्यो वधमर्हति ।
शुल्कं दद्यात्सेवमानः समामिच्छेत्पिता यदि ॥ 365 יון
यदि नीच वर्ण का पुरुष उच्च वर्ण की कन्या के साथ व्यभिचार करता है तो उसे मृत्युदण्ड मिलना चाहिए और समान वर्ण वाला पुरुष अपने ही वर्ण की कन्या से सहवास करता है तो कन्या के पिता की सहमति से उस पुरुष द्वारा कन्या के पिता को शुल्क देना चाहिए।
अभिषह्य तु यः कन्या कुर्याद्दर्येण मानवः।
तस्याशु कत्यें अंगुल्यौ दण्डं चार्हति षट्शतम् ॥ 366 ।।
जो पुरुष अपने पौरुष के घमंड में कन्याओं से बलात्कार कर उन्हें अपवित्र करता है, उसकी तत्काल दो उंगलियां काट डालनी चाहिए तथा उसे छः सौ पणों का दण्ड देना चाहिए।
सकामां दूषयंस्तुल्यो नांगुलिच्छेदमाप्नुयात्।
द्विशतं तु दमं दाप्यः प्रेसङ्गविनिवृत्तये ॥ 367 ।।
यदि पुरुष कन्या की सहमति से उसके साथ संम्भोग करता है तो उसकी उंगलियां नहीं काटनी चाहिए किंतु इस पाप से मुक्ति के लिए उस पर दो सौ पणों का दण्ड निश्चय ही लगाना चाहिए।
कन्यैव कन्यां या कुर्यात्तस्याः स्याद्विशतोदमः ।
शुल्कं तु द्विगुणं दद्याञ्छिफाश्चैवाप्नुयाद्दश ।। 368 ॥
कन्या ही यदि कन्या से संभोग करे और इस दौरान एक कन्या की योनि आहत हो जाए तो ऐसी स्थिति में स्वस्थ लड़की को आहत कन्या के विवाह न हो पाने की क्षतिपूर्ति करनी चाहिए, उसके इलाज का व्यय वहन करना चाहिए तथा दस बेंतों के प्रहार का दण्ड भुगतना चाहिए।
या तु कन्या प्रकुर्यात्स्त्री सः सद्यो मौण्ड्यमर्हति ।
आंगुल्योरेव वाच्छेदं खरेणोद्वहनं यथा ।। 369 ॥
यदि कोई स्त्री कन्या की योनि को अपनी उंगली से क्षत-विक्षत कर देती है तो उसकी उंगलियां कटवा देनी चाहिए तथा उसका सिर मुंडवा कर उसे गधे पर चढ़ाकर सारे नगर में घुमाना चाहिए।
भर्तारं लङ्घयेद्या स्त्री ज्ञाति गुणदर्पिता।
तां श्वाभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते ॥ 370 ॥
जो स्त्री अपने माता-पिता की ऊंची जाति, उच्च शिक्षादि गुणों अथवा धनादि के अहंकारवश अपने पति को छोड़कर परपुरुष से संबन्ध रखती है, राजा द्वारा उस स्त्री को सार्वजनिक स्थान पर जन समूह के समक्ष कुत्ते से नुचवाया जाना चाहिए।
पुभास दाहयेत्पापं शयने तप्तआयसे।
अभ्यादध्युश्च काष्ठानि तत्र दह्येत पापकृत ।। 371।।
यदि पुरुष अपने पति की आज्ञा का उल्लंघन करने वाली स्त्री से सम्बन्ध को उस अग्नि में लकडियां डालनी चाहिए ताकि वह पापी उसी अग्नि में जल कर रखता है उसे जलते हुए लोहे की चारपाई पर सुलाना चाहिए। वहां उपस्थित लोगों मर जाए।
संवत्सराभिशस्तस्य दुष्टस्य द्विगुणो दमः ।
व्रात्यया सह संवासे चाण्डाल्या तावदेव तु ॥ 372 ।।
यदि पुरुष एक वर्ष से अधिक अवधि से परस्त्रीगमन कर रहा हो तो उसे उपर्युक्त दण्ड से दुगुना दण्ड देना चाहिए। जो पुरुष पतित व चाण्डाल स्त्री से सम्बन्ध स्थापित करे उसे भी इतना ही दण्ड मिलना चाहिए।
शूद्रो गुप्तमगुप्तं वा द्वैजातं वर्णमावसन् ।
अगुप्तमङ्ग सर्वस्वैर्गुप्तं सर्वेण हीयते ॥ 373 ॥
द्विजाति वर्ण की एकाकी व अरक्षित स्त्री से बलात् सहवास करने वाले शूद्र को अंगच्छेदन का दण्ड देना चाहिए। यदि शूद्र रक्षित स्त्री की इच्छा से उसके साथ संभोग करे तो उसकी सभी सम्पत्ति पर कब्जा कर लेने की सजा तथा शारीरिक दण्ड भी देना चाहिए।
वैश्यः सर्वस्य दण्ड्यः स्यात्संवत्सरनिरोधतः ।
सहस्त्रः क्षत्रियो दण्ड्यो मौण्ड्यं मूत्रेण चार्हति ।। 374 ।।
जो वैश्य परस्त्री को एक वर्ष तक अपने घर रखे, उसे सर्वस्व हरण का दण्ड मिलना चाहिए। क्षत्रिय द्वारा ऐसा किए जाने पर उसे सहस्र पणों का और शूद्र को मूत्र से उसका सिर मुंडवाने की सजा मिलनी चाहिए।
ब्राह्मणीं यद्यगुप्तां तु गच्छेतां वैश्यपार्थिवौ।
वैश्यं पञ्चाशतं कुर्यात् क्षत्रियं तु सहस्त्रिणम् ॥ 375 ।।
यदि वैश्य एवं क्षत्रिय पुरुष अरक्षित ब्राह्मणी से सहवास करते हैं तो वे दण्डस्वरूप क्रमशः पांच सौ व एक हजार पण देने के अधिकारी बनते हैं।
उभावपि तु तावेव ब्राह्मण्या गुप्तया सह।
विलुप्तौ शूद्रवद्दण्ड्यौ दग्धव्यौ वा कटाग्निना ॥ 376 ।।
जो वैश्य और क्षत्रिय रक्षित ब्राह्मणी से संभोग करते हैं उन्हें वही दण्ड देना चाहिए जो इस कृत्य के लिए शूद्र को मिलता है या फिर उन दोनों को चटाई में लपेटकर अग्नि के सुपुर्द कर देना चाहिए।
सहस्त्रं ब्राह्मणो दण्ड्योगुप्तां विप्रां बलाद् व्रजन् ।
शतानि पञ्च दण्ड्यः स्यादिच्छन्त्या सह सङ्गतः ॥ 377 ॥
यदि ब्राह्मण पुरुष रक्षित ब्राह्मणी से बलात् सम्भोग करे तो उस पर हजार पणों का और ब्राह्मणी की स्वेच्छा से सम्भोग करे तो पांच सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
मौण्ड्यं प्राणान्तिकोदण्डोब्राह्मणस्य विधीयते ।
इतरेषां तु वर्णानां दण्डः प्राणान्तिको भवेत् ॥ 378 ॥
जहां अन्य वर्णों का वास्तविक वध ही मृत्यु दण्ड होता है, वहीं ब्राह्मण का सिर मुंडवाना ही उसके लिए मृत्युदण्ड तुल्य है।
न जातु ब्राह्मणं हन्यात्सर्वपापेष्वपि स्थितम्।
राष्ट्रादेनं बहिः कुर्यात्समग्रधनमक्षतम् ।। 379 ।।
ब्राह्मण चाहे कितने ही और कितने महान पाप क्यों न करे, उसका वध अथवा पिटाई कभी न करें। ज्यादा से ज्यादा उसे राज्य से निष्कासित कर देना चाहिए और निष्कासन के समय उसकी सारी सम्पत्ति उसे दे देना चाहिए।
न ब्राह्मणवधाद्भूयानधर्मो विद्यते भुवि।
तस्मादस्य वधं राजा मनसापि न चिन्तयेत् ।। 380 ।।
ब्राह्मण हत्या से बढ़कर इस दुनिया में अन्य और कोई पाप नहीं। अतः राजा को अपने मन में ब्राह्मण वध का विचार भी नहीं लाना चाहिए।
वैश्यश्चेत्क्षत्रियां गुप्तां वैश्यां वा क्षत्रियो व्रजेत्।
यो ब्राह्मणयामगुप्तायां तावुभौ दण्डमर्हतः ।। 381 ।।
यदि वैश्य पुरुष रक्षित क्षत्रिय स्त्री से और क्षत्रिय पुरुष रक्षित वैश्य स्त्री से सहवास करे तो दोनों पर क्रमशः हजार व पांच सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
सहस्त्रं ब्राह्मणो दण्डं दाप्यो गुप्ते तु ते व्रजन् ।
शूद्रायां क्षत्रियविशो साहस्त्रो वै भवेद्दमः ॥ 382 ।।
जो ब्राह्मण रक्षित क्षत्रिय व वैश्य स्त्री से व जो क्षत्रिय तथा वैश्य शूद्र स्त्री से सहवास करता है उस पर हजार-हजार पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
क्षत्रियायामगुप्तायां वैश्ये पञ्चशत दमः ।
मूत्रेण मौण्ड्यमिच्छेत्तु क्षत्रियो दण्डमेव वा ॥ 383 ।।
यदि क्षत्रिय या वैश्य पुरुष अरक्षित क्षत्रिय स्त्री से संभोग करता है तो उन पर पांच सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए या फिर मूत्र से उनका मंडन करवाना चाहिए।
अगुप्ते क्षत्रिया वैश्ये शूद्रां वा ब्राह्मणोव्रजन् ।
शतानिपञ्च दण्ड्यः स्यात्सहस्त्रंत्वन्त्यजस्त्रियम् ।। 384 ।।
जो ब्राह्मण पुरुष क्षत्रिय व वैश्य जाति की अरक्षित स्त्री से गमन करता है, उस पर पांच सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए। ब्राह्मण द्वारा शूद्र स्त्री से सहवास करने पर उसे हजार पणों का दण्ड देना चाहिए।
यस्यस्तेनः पुरे नास्ति नान्यस्त्रीगो न दुष्टवाक् ।
न साहसिको दण्डघ्नो स राजा शक्रलोकभाक् ।। 385 ।।
वही राजा इन्द्र पद का अधिकारी है जिसके राज्य में चोर, परस्त्रीगामी पुरुष, अपशब्द भाषण व झगड़ा करने वाले और लूटमार तथा हत्या करने वाले लोग नहीं
होते।
एतेषां निग्रहो राज्ञः पञ्चानां विषये स्वके।
साम्राज्यकृत्स जात्येयु लोके चैव यशस्करः ।। 386 ।।
राजा को चाहिए कि वह अपने राज्य में चोर, परस्त्रीगामी, गाली बकने वाले, डाकू, हिंसा करने वाले तथा हत्यारों का निग्रह करे। तभी वह अपने राज्य के विस्तार व यशोपलब्धि में सफल हो सकता है।
ऋत्विक् यस्त्यजेद्याज्यः चत्विक्त्यजेद्यदि ।
शक्तं कर्मण्य दुष्टं च तयोर्दण्डः शतंशतम् ।। 387 ।।
यदि यजमान धार्मिक कर्म करने-कराने में समर्थ व सच्चरित्र पुरोहित का और यदि पुरोहित एकनिष्ठ यजमान का परित्याग करे तो उन दोनों को सौ-सौ पणों का दण्ड मिलना चाहिए।
न माता न पिता न पुत्रस्त्यागमर्हति।
त्यजन्नपतितानेतान् राज्ञा दण्ड्यः शतानिषट् ॥ 388 ।।
माता-पिता व पुत्र अत्याज्य हैं। जो व्यक्ति बिना पतित हुए इनको त्यागता है, राजा द्वारा उस पर छः सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
आश्रमेषु द्विजातीनां कार्ये विवदतांमिथः ।
न विब्रूयान्नृपोधर्म चिकीर्षन्हितमात्मनः ।। 389 ।।
वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाले द्विजातियों के बीच मतभेद अथवा विवाद उत्पन्न होने की स्थिति में राजा तब तक हस्तक्षेप न करे जब तक कि उससे ऐसा निवेदन न किया जाए।
यथार्हमेतानभ्यर्च्य ब्राह्मणैः सह पार्थिवः ।
सान्त्वेन प्रशमय्यादौ स्वधर्म प्रतिपादयेत् ।। 390 ।।
यदि वानप्रस्थ आश्रम के जन राजा के पास आवेदक बनकर आते हैं तो सर्वप्रथम राजा को पुरोहितों समेत उनका यथायोग्य पूजन करना चाहिए फिर उन्हें समझाकर उनके कर्तव्य क्या हैं- यह बताना चाहिए।
प्रतिवेश्यानुवेश्यौ च कल्याणे विंशति द्विजे ।
अर्हावभोजयन्विप्रो दण्डमर्हति माषकम् ॥ 391 ।।
यदि किसी व्यक्ति को बीस ब्राह्मणों को भोजन कराना है और वह इस उद्देश्य के लिए अपने घर में रहने वाले तथा घर में प्रायः आते रहने वाले ब्राह्मणों को भोजन का निमन्त्रण देता है तो उस पर एक मासा चांदी देने का दण्ड लगाना चाहिए।
श्रोत्रियः श्रोत्रियं साधुं भूतिकृत्येष्वभोजयन् ।
तदन्नं द्विगुणंदाप्यो हिरण्यं चैव माषकम् ॥ 392 ।।
यदि कोई विद्वान ब्राह्मण विवाह, गृह प्रवेश तथा अन्य अनेक शुभ समारोहों पर किसी साधु ब्राह्मण को भोजन नहीं कराता है तो उस पर दुगुना अन्न और एक मासा स्वर्ण देने का दण्ड लगना चाहिए।
अन्धो जडः पीठसर्पी सप्तत्याः स्थविरश्च यः ।
श्रोत्रियेषूपकुर्वंश्च न दाप्याः केनचित्करम् ।। 393 ।।
जो सज्जन अंधों, बहरों, लंगड़ों, सत्तर वर्षीय बूढ़ों तथा वेदपाठी ब्राह्मणों के कल्याण में व्यस्त हैं उनसे न ही किसी प्रकार का कर लेना चाहिए और न ही उन्हें किसी प्रकार के कर वसूली के कार्य में लगाना चाहिए।
श्रोत्रियं व्याधितार्तो च बालवृद्धावकिञ्चनम् ।
महाकुलीनमार्य च राजा सम्पूजयेत्सदा ।। 394 ।।॥
श्रोत्रिय ब्राह्मण, रोगी, दुखी, बालक, वृद्ध, गरीब व उच्चकुल में जन्मे आर्य पुरुष का राजा को सदा सम्मान करना चाहिए। उसे इन लोगों का मजाक नहीं बनाना चाहिए।
शाल्मली फलके श्लक्ष्णेनेनिज्यान्नेजकः शनैः ।
न च वासांसि वासोभिर्निहरन्न च वासयेत् ॥ 395 ॥
धोबी द्वारा सेमर लकड़ी के चिकने पट्टे पर कपड़े पटके जाने चाहिए। वह इस बात का ख्याल रखे कि उसके ग्राहक के वस्त्रों में अदला-बदली न हो, न ही वे वस्त्र उसके यहां काफी दिनों तक पड़े रहें।
तन्तुवायो दशपलं दद्यादेकपलाधिकम् ।
अतोऽन्यथा वर्तमानो दाप्यो द्वादशकं दमम् ।। 396 ।।
यदि जुलाहा दस पल सूत लेता है तो उसे ग्यारह पल सूत लौटाना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करता तो राजा को उस पर बारह दमड़ी का दण्ड लगाना चाहिए।
शुल्कस्थानेषु कुशलाः सर्वपण्यविचक्षणाः ।
कुर्युर्वं यथापण्यं ततो विंश नृपो हरेत् ॥ 397 ।।
कर आदि के कार्यों में तथा हर प्रकार के लेन-देन सम्बन्धी कार्यों में राजा द्वारा कुशल व्यक्तियों को रखना चाहिए और इन कार्यों से होने वाले लाभ का बीसवां भाग उन्हें देना चाहिए।
राज्ञः प्रख्यातभाण्डानि प्रतिषिद्धानि यानि च।
तानि निर्हरतो लोभात्सर्वहारं हरेन्नृपः ।। 398 ।।
जो दुष्ट व्यापारी राजा के निजी पात्रों व बिक्री से रोके गए पात्रों को लोभवश दूसरे स्थान पर ले जाकर बेच दे तो राजा को उसकी सारी सम्पत्ति कब्जे में ले लेनी चाहिए।
शुल्कस्थानं परिहरन्नकाले क्रयविक्रयी।
मिथ्यावादी संस्थानेदाप्यो ऽष्टगुणमत्ययम् ॥ 399 ।।
यदि कोई व्यक्ति शुल्क के स्थान से धन बचाता है, छिपा कर चोरी की वस्तुएं खरीदता-बेचता है, मोल-भाव में झूठ बोलता है और वस्तुएं कम तौलता है, उससे बचाए धन का छः गुना और झूठ बोलकर बचाए धन का आठ गुना दण्ड रूप में वसूलना चाहिए।
आगमं निर्गमं स्थानं तथा वृद्धि क्षयावुभौ ।
विचार्य सर्वपण्यानं काम्येत्क्रयविक्रयौ ।। 400 ।।
किसी भी वस्तु के खरीदने के लिए आवागमन, उसके संग्रह, भाव के घटने-बढ़ने का अनुमान लगाकर ही उस वस्तु का भाव निर्धारित करना चाहिए।
पञ्चरात्रे पञ्चरात्रे पक्षे पक्षेऽथवा गते।
कुर्वीत चैषां प्रत्यक्षमर्घसंस्थापनं नृपः ।॥ 401 ।।
राजा को चाहिए कि एक सप्ताह अथवा एक पखवाड़ा बीतने के बाद वह व्यापारियों को वस्तुओं की नई दर निर्धारित करने का आदेश दे।
तुलामान प्रतीमान सर्व एव स्यात्सुरक्षितम्।
षट्सु षट्सु च मासेषु पुनरेव परीक्षयेत् ॥ 402 ।।
राजा द्वारा हर छः माह बाद तुला की, तौल की व अन्य नापों की भली-भांति जांच करवानी चाहिए।
पण यानं तरे दाप्यं पौरुषोऽर्धपणं तरे।
पादं पशुश्च योषिच्च पादार्थ रिक्तकः पुमान् ।। 403 ॥
किसी सेतु से गुजरने वाली गाड़ी पर एक पण, सामान लादे हरेक व्यक्ति पर आधा पण, पशुओं पर चौथाई पण व खाली हाथ जाते स्त्री पुरुषों पर 1/8 पणों का शुल्क निश्चित करना चाहिए।
भाण्डपूर्णानि यानानि तार्यदाप्यानि सारतः ।
रिक्तभाण्डानि यत्किञ्चित्पुमांसश्चापरिच्छदाः ।। 404 ।।
सामान से लदी गाड़ी द्वारा पुल पार करने पर उसका शुल्क गाड़ी में लदे वजन के अनुसार निश्चित करना चाहिए। खाली वाहनों, सवारियों व गरीबों के शुल्क में छूट बरतनी चाहिए।
दीर्घध्वनि यथा देशं यथा कालं तरो भवेत्।
नदीतीरेषु तद्विद्यात्समुद्रे नास्ति लक्षणम् ॥ 405 ।।
यदि पुल लंबा हो तो उस पर से गुजरने का शुल्क देश व काल के अनुसार ही निर्धारित करना चाहिए। पुलों पर शुल्क लगाने का यह नियम समुद्र पर नहीं केवल नदियों पर लागू होता है।
गर्भिणी तु द्विमासादिस्तथा प्रव्रजितो मुनिः ।
ब्राह्मणालिङ्गनश्चैव न दाप्यास्तारिकं तरे ॥ 406 1
यदि दो माह की गर्भवती स्त्री, संन्यासी, ब्राह्मण, वानप्रस्थ व ब्रह्मचारी नदी पार कर रहे हों तो नाविक को उनसे कोई शुल्क नहीं वसूलना चाहिए।
यन्नावि किञ्चिद्दासानां विशीर्येतापराधतः।
तद्दासैरेव दातव्यं समागम्य स्वतोंऽशतः ॥ 407 ।।
नाव पर सवार यात्रियों का नौकर की गलती से कोई नुकसान हो जाने की स्थिति में सभी को मिलकर उनकी क्षति पूर्ति करनी चाहिए। इसमें केवट का योगदान भी वांछनीय है।
एष नौयायिनामुक्तौ व्यवहारस्य निर्णयः।
दासा पराधतस्तोये दैविके नास्ति निग्रहः ।। 408 ।।
जल की जो हानि नाविकों व मल्लाहों के अपराध के परिणामस्वरूप होती है उसकी भरपाई तो उन्हीं से करवानी चाहिए किंतु दैवी प्रकोपों, आंधी-तूफान, ओलावृष्टि आदि के लिए उन्हें दोषी न मानें।
वाणिज्यं कारयेद्वश्यं कुसीदं कृषिमेव च।
पशूनां रक्षणं चैव दास्यं शूद्रं द्विजन्मनाम् ।। 409 ॥
राजा का कर्तव्य है कि वह वैश्यों द्वारा व्यापार, गिरवी वस्तुओं, खेतों व पशुओं की रक्षा करवाए तथा शूद्रों द्वारा द्विजातियों की रक्षा करवाए।
क्षत्रियं चैव वैश्यं च ब्राह्मणोवृत्तिकर्षितौ ।
बिभृयादानृशंस्येन स्वानिकर्माणि कारयन् ॥ 410 ।।
क्षत्रिय व वैश्य के किसी कारणवश कारोबार न चल पाने से अभावग्रस्त होने पर, ब्राह्मण को चाहिए कि अपना कर्तव्य पालन करते हुए वह दयावश क्षत्रिय व वैश्य का पालन-पोषण करे।
दास्यं तु कारयंल्लोभाद् ब्राह्मणः संस्कृतान्द्विजान्।
अनिच्छतः प्रभवत्यांद्राज्ञादण्ड्यः शतानि षट् ॥ 411 ॥
जो ब्राह्मण लोभ एवं क्रूरता के वशीभूत हो विद्वान ब्राह्मणों से बलात् दासता करवाता है, राजा द्वारा उस पर छः सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए।
शूद्रं तु कारयेद्दास्यं क्रीतमक्रीतमेव वा।
दास्यायैव हि सृष्टोऽसौ ब्राह्मणस्य स्वयम्भुवा ।। 412 ॥
चाहे वह खरीदा गया हो अथवा नहीं लेकिन शूद्र से ही सेवा करवानी चाहिए। शूद्रों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी ने ब्राह्मणों की सेवा के उद्देश्य से ही की है।
न स्वामिना निसृष्टोऽपि शूद्रोदास्याद्विमुच्यते ।
निसर्गजं हि तत्तस्य कस्तस्मात्तदुपोहति ।। 413 ।।
शूद्र को यदि उसके स्वामी से मुक्त करा भी लिया जाए तो भी वह सेवा कर्म से मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि सेवा उसका स्वाभाविक धर्म है जिससे कोई भी उसे मुक्त नहीं कर सकता।
ध्वजाहतो भक्तदासो गृह्वजः क्रीतदत्रिमौ ।
पैत्रिको दण्डदासश्च सप्तैते दासयोनयः ।। 414 ।।
युद्ध में विजय करके लाया हुआ बंदी, वेतन पाने वाला व्यक्ति, घर में काम करने वाले की संतान, क्रीत व्यक्ति, सम्बन्धी अथवा मित्र द्वारा सेवा हेतु दिया गया, वंश परंपरा से ही सेवा कार्य में रत तथा दण्ड के भुगतान के लिए सेवा कार्य अपनाने वाला व्यक्ति-उपर्युक्त सात प्रकार के व्यक्ति दास होते हैं।
भार्यापुत्रश्च दासश्च त्रय एवाऽधनाः स्मृताः ।
यत्ते यमधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम् ।। 415 ।।
स्त्री, पुत्र व दास इन्हें निर्धन माना जाता है क्योंकि इनकी आय उस व्यक्ति के अधिकार में मानी जाती है जो इनका स्वामी होता है।
विस्त्रब्धं ब्राह्मणः शूद्राद् द्रव्योपादाना माचरेत्।
न हि तस्यास्ति किञ्चित्स्वं भर्तृहार्यं धनो हि सः ।। 416 ॥
शूद्र द्वारा अर्जित धन को ब्राह्मण निर्भीक हो ले सकता है क्योंकि शूद्र को धन रखने का अधिकर नहीं है। उसका धन उसके स्वामी के अधीन ही होता है।
वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत्।
तौ हि च्युतो स्वकर्मेभ्यः क्षोभयेतामिदं जगत् ।। 417 ।।
राजा को चाहिए कि वह वैश्यों व शूद्रों को यत्नपूर्वक उनके नियत कर्मों में लगाए रखे। वैश्यों व शूद्रों द्वारा अपने कर्म के परित्याग से संसार में अव्यवस्था फैलने का अंदेशा रहता है।
अहन्यहन्यवेक्षेत कर्मन्तान्वाहनानि च।
आयव्ययौ च नियतावाकरान्कोशमेव च ॥ 418॥
राजा का कर्तव्य है कि वह नित्य कर्मचारियों के काम, वाहनों, आय, व्यय, खदानों व कोश का निरीक्षण करता रहे।
एवं सर्वानिमान् राजा व्यवहारान्समापयन् ।
व्यपोह्यकिल्विषं सर्वं प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ 419 ।।
इस प्रकार सभी प्रकार के कार्यों को ठीक-ठीक धर्मानुसार सम्पन्न करके ही राजा सभी पापों व दोषों से मुक्त हो जाता है तथा उसे परमगति प्राप्त होती है।
॥ मनुस्मृति अष्टम अध्याय समाप्त ।।
Manusmriti Chapter 7
kathaShrijirasik
।।मनुस्मृति सप्तम अध्याय।।
राजधर्मान् प्रवक्ष्यामि यथावृत्तो भवेन्नृपः।
सम्भवश्च यथा तस्य सिद्धिश्च परमा यथा ॥ 1 ॥
भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि मैं अब राजा के आचार, उत्पत्ति और उसे इस लोक एवं परलोक में सफलता मिले, ऐसे राजधर्म के बारे में बताता हूं।
ब्राह्मप्राप्तेन संस्कारं क्षत्रियेण यथाविधिः ।
सर्वस्यास्य यथान्यायं कर्त्तव्यं परिरक्षणम् ॥ 2 ॥
वेदोक्त विधि से संस्कार किए गए राज्याभिषिक्त क्षत्रिय को अपने राज्य में रहने वाली प्रजा का न्याय के साथ पालन एवं उसकी रक्षा करनी चाहिए।
अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वगे विद्रुते भयात्।
रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत्प्रभुः ॥ ३ ॥
इस संसार में राजा के नहीं होने पर बलवानों के भय से लोग भयाक्रान्त हो इधर-उधर भागने लगते हैं। इसी कारण से भगवान ने राजा की सृष्टि की।
इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च।
चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्राः निर्हत्य शाश्वतीः ॥ 4 ॥
इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्र तथा कुबेर के दिव्य गुणों को लेकर भगवान ने राजा की सृष्टि की है। कहने का आशय यह है कि राजा देवताओं का प्रतिनिधित्व करता है।
यस्मादेषां सुरेन्द्राणां मात्राभ्यो निर्मितो नृपः ।
तस्मादभिभवत्येष सर्वभूतानि तेजसा ॥ 5 ॥
इन्द्र, अग्नि तथा वरुण आदि देवताओं के अंश से बनने के कारण ही राजा अपने तेज से सभी जीवों को पराजित कर अपने नियंत्रण में लाने योग्य शक्ति रखता है।
तपत्यादित्यवच्चैषां चलूंषि च मनांसि च।
न चैनं भुवि शक्नोति कश्चिदप्यभिवीक्षितुम् ॥ 6 ॥
राजा की आंखों तथा मन में सूर्य के समान तेज होता है। अतः पृथ्वी पर कोई भी उसे देखने में समर्थ नहीं होता।
सोऽग्निर्भवति वायुश्च सोऽर्कः सोमः सधर्मराट् ।
सः कुबेरः स वरुणः स महेशः प्रभावतः ॥7॥
राजा अपनी शक्ति के प्रभाव से अग्नि रूप है, वायु रूप है, सूर्य रूप है, चन्द्र रूप है, यम रूप है, कुबेर रूप है, वरुण रूप है तथा इन्द्र रूप है।
बालोऽपि नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः ।
महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ॥ 8 ॥
राजा यदि बालक भी हो तो उसे सामान्य मान कर उसकी आज्ञा का विरोध नहीं करें क्योंकि वह मनुष्य रूप में इस भूमि पर एक महान देवता के रूप में है।
एकमेव दहत्यग्निर्नरं ह्यपसर्पिणम्।
कुलंदहति राजाग्निः सपशु द्रव्य सञ्चयम् ॥ 9॥
अग्नि उसी व्यक्ति को भस्म करती है जो उसकी अवज्ञा करता है परन्तु राजा के क्रोध की अग्नि व्यक्ति को, उसके कुल को, पशु को, धन तथा सम्पत्ति को भी नष्ट कर देती है।
कार्यं सोऽवेक्ष्य शक्तिं च देशकालौ च तत्त्वतः ।
कुरुते धर्मसिद्धयर्थं विश्वरूपः पुनः पुनः ॥ 10 ॥
राजा कार्य, शक्ति, देश तथा काल को गहराई से देखकर धर्म की सिद्धि हेतु भांति-भांति के रूप अर्थात् कभी उदार तथा कभी कठोर रूप धारण करता है।
यस्य प्रसादे पद्मा श्रीर्विजयश्च पराक्रमे।
मृत्युश्च वसति क्रोधे सर्वतेजमयो हि सः ॥ 11 ॥
राजा की प्रसन्नता में लक्ष्मी, पराक्रम में विजय एवं क्रोध में मृत्यु का वास होता है। अतः वह सभी तेजों से सम्पन्न होता है।
तं यस्तु द्वेष्टि सम्मोहात्स विनश्यत्यसंशयम् ।
तस्य ह्याशु विनाशाय राजा प्रकरुते मनः ।। 12 ||
जो व्यक्ति मूर्खता अथवा अहंकार के वशीभूत होकर राजा की शक्ति को नहीं समझ कर राजा से द्वेष करता है, वह निश्चित रूप से अपने नाश को आमंत्रित करता है। राजा ऐसे व्यक्ति का यथाशीघ्र नाश करने के लिए चेष्टा युक्त हो जाता है।
तस्माद् धर्म यमिष्टेषु सः व्यवस्येन्नराधिपः ।
अनिष्टं चाप्यनिष्टेशु तं धर्म न विचालयेत् ॥ 13 ॥
अतएव वह राजा अपेक्षित कार्यों में जिस धर्म (कानून) की व्यवस्था करता है, उसे न चाहने वालों को भी उस कानून को नहीं तोड़ना चाहिए।
तस्यार्थे सर्वभूतानां गोप्तारं धर्ममात्मजम्।
ब्रह्मतेजोमयं दण्डमुत्सृजत्पूर्वमीश्वरः ।। 14 ॥
परमात्मा ने धर्मानुसार सभी जीवों की रक्षा हेतु ब्रह्मतेज से युक्त अपने प्रतिनिधि के रूप में राजा को दण्ड देने की शक्ति एवं अधिकार दिया है।
तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराधि चराणि च।
भयाद्भोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च ॥ 15 ॥
संसार के सभी स्थावर जंगम जीव राजा के दण्ड के भय से अपने-अपने कर्तव्य कर्मों का पालन करते और अपने-अपने भोग को भोगने के लिए समर्थ होते हैं।
सदेशकालौ शक्तिं च विद्यां चावेक्ष्य तत्त्वतः ।
यथार्हतः सप्रणयेन्नरेष्वन्यायवर्त्तिषु ।। 16 ॥
अन्याय में लगे अपराधियों की शक्ति तथा विद्या एवं देश तथा काल को भली-भांति देखकर राजा उन्हें उचित दण्ड प्रदान करे।
स राजा पुरुषो दण्डः सः नेता शासिता च सः ।
चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥ 17 ।।
सच यह है कि दण्ड ही राजा, दण्ड की पुरुष, दण्ड ही अनुशासन बनाए रखने वाला तथा चारों आश्रमों के धर्म पालन की सुविधाओं की व्यवस्था करने वाला जामिन या मध्यस्थ होता है।
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः दण्ड एवाभिरक्षति ।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्म विदुर्बुधाः ॥ 18 ॥
सारी प्रजा की रक्षा और उस पर शासन दण्ड ही करता है, सबके निद्रा में चले जाने पर दण्ड ही जाग्रत रहता है। अतः बुद्धिमान लोग दण्ड को ही धर्म कहते हैं।
समीक्ष्य सः धृतः सम्यक् सर्वाः रञ्जयति प्रजाः ।
असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः ॥ 19 ॥
भली-भांति विचार कर दिए गए दण्ड के उपयोग से प्रजा खुश होती है। इसके विपरीत बिना विचार कर दिए गए अनुचित दण्ड से राजा की प्रतिष्ठा तथा यश का नाश हो जाता है।
यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः ।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः ।। 20 ॥
अगर अपराधियों को दण्ड देने में राजा सदैव सावधानी से काम नहीं लेता तो शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर लोगों को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है।
अद्यात्काकः पुरोडाशं श्वा च लिह्याद्धविस्तथा ।
स्वाम्यं च न स्यात्कस्मिंश्चित्प्रवर्तेताधरोत्तरम् ॥ 21 ॥
कौआ पुरोडाश खाने लगेगा और श्वान हवि खा जाएगा अगर राजा अपराधियों को दण्ड (सजा) नहीं देगा। कोई किसी को स्वामी नहीं मानेगा और समाज उत्तम स्थिति से मध्यम तत्पश्चात् अधम होकर व्यवस्थाहीन हो जाएगा।
सर्वो दण्डजितो लोके दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।
दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद् भोगाय कल्पते ।। 22 ॥
संसार के लोग दण्ड के डर से ही नियमों तथा अनुशासन का पालन करते हैं। संसार में ऐसे व्यक्तियों का मिलना दुर्लभ है जो स्वभाव से ही पवित्र हों। सारे संसार के जीव दण्ड के भय से ही अपने कर्तव्य का पालन कर सुख भोगते हैं।
देवदानवगन्धर्वा रक्षांसि पन्नगोरगाः ।
तेऽपि भोगाय कल्पन्ते दण्डेनैव निपीडिता ।। 23 ।।
मनुष्येतर सभी जातियों के जीव जैसे- देव, दानव, गन्धर्व, राक्षस, पक्षी तथा सर्प आदि दण्ड के भय से ही कर्तव्य पालन में लगते हैं।
दुष्येयुः सर्ववर्णाश्च भिद्येरन् सर्वसेतवः ।
सर्वलोकप्रकोपश्च भवेद्दण्डस्य विभ्रमात् ॥ 24 ।।
समस्त वर्णों के लोग दण्ड का डर न होने पर दुराचरण में लग सकते हैं, नियम पालन के सभी सेतु टूट सकते हैं और पूरे जगत में उपद्रव फैल सकता है। अकेला दण्ड ही निवारक तथा नियमों का पालन करवाने वाला है।
यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापदा।
प्रजास्तत्र न महान्ति नेता चेत्साध पश्चति ॥25॥
जहां काले रंग और लाल आंखों वाला पापनाशक दण्ड घूमता रहता है अर्थात जिस देश में दण्ड की सुव्यवस्था होती है, राजा उचित रीति से जागरूक रहता है वहां की प्रजा सदैव सावधानीपूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करती रहती है।
तस्याहुः सम्प्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम्।
समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम् ।। 26 ||
सत्य का पालन करने वाले. प्रत्येक कार्य को भली प्रकार विचार कर करने वाले, अर्थ तथा काम के सच्चे स्वरूप को समझने वाले बुद्धिमान राजा को ही विद्वान पुरुष दण्ड देने का अधिकारी मानते हैं।
तं राजा प्रणयन्सम्यक् त्रिवर्गेणाभिवर्धते।
कामात्मा विषमः क्षुद्रो दण्डेनैव निहन्यते ।। 27 ॥
जो राजा दण्ड का न्यायपूर्वक तथा भली प्रकार उपयोग करता है, उसके धर्म, अर्थ एवं काम में वृद्धि होती है। इसके विरुद्ध जो राजा नीच प्रकृति का होता है तथा दण्ड का दुरुपयोग करता है, वह अपने द्वारा दिए गए दण्ड से स्वयं का नाश कर लेता है।
दण्डो हि सुमहत्तेजो दुर्धरश्चाकृतात्मभिः ।
धर्माद्धिचलितं हन्ति नृपमेव सबान्धवम् ।। 28 ॥
दण्ड अत्यन्त तेजवान है, जिसे ऐसे राजागण धारण ही नहीं कर सकते जो संस्कार से विहीन हैं। न्याय तथा व्यवस्था पर आधारित दण्ड राजधर्म का पालन नहीं करने वाला राजा बन्धु-बान्धवों सहित नष्ट हो जाता है।
ततो दुर्गं च राष्ट्र च लोकं च सचराचरम्।
अन्तरिक्षगतांश्चैव मुनीन्देवांश्च पीडयेत् ।। 29 ॥
अन्याय से प्रयोग किया जाने वाला दण्ड राजा का कुल सहित विनाश करने के बाद उसके दुर्ग, राष्ट्र, जड़-चेतन संसार, अंतरिक्ष निवासी मुनियों तथा देवताओं को भी पीड़ा देने लगता है।
सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना ।
न शक्तो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेषु च ॥30॥
जो राजा सहायकों से रहित है, मूर्ख, लालची और बुद्धिहीन है एवं जो विषय-वासना में आसक्त है, ऐसे राजा द्वारा दण्ड का न्याय द्वारा उचित उपयोग नहीं किया जा सकता।
शुचिना सत्यसन्धेन यथाशास्त्रानुसारिणा।
प्रणेतुं शक्यते दण्डः सुसहायेन धीमता ।। 31
जिसका पवित्र आचरण हो, जो सत्य तथा शास्त्रों का दृढ़ता से पालन करता हो, जिसके सहायक (मंत्री, सेनापति, अधिकारी, गुप्तचर आदि) अच्छे हों तथा जो स्वयं बुद्धिमान हो, ऐसे राजा द्वारा ही दण्ड का न्यायोचित रूप से उपयोग सम्भव है।
स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सुहृत् स्वजिह्यः स्निग्धेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः ।। 32 ।।
राजा को अपने राज्य की प्रजा को न्यायकारी तथा शत्रुओं को उग्र दण्ड देना चाहिए। उसे मित्रों से सौहार्द्रपूर्ण एवं ब्राह्मणों के प्रति उदारता भरा तथा क्षमापूर्ण व्यवहार करना चाहिए।
एवं वृत्तस्य नृपतेः शिलोछेनापि जीवतः ।
विस्तीर्यते यशो लोके तैल-बिन्दुरिवाम्भसि ।। 33 ।।
राज्य के अभाव तथा गरीबी में जीने पर (शिलोञ्छवृत्ति के लिए अध्याय 4 के 5वें श्लोक को देखें) भी ऊपर लिखी विधि से न्यायोचित दण्ड देने वाले राजा का यश पानी में पड़ी तेल की बूंदों की तरह निरंतर फैलता जाता है।
अतस्तु विपरीतस्य नृपतेरजितात्म्नः ।
संक्षिप्यते यशो लोके घृतबिन्दुरिवाम्भसि ।। 34 ।।
इसके विपरीत दण्ड का अनुचित रीति से उपयोग करने वाले इन्द्रियों का दास बने राजा का यश इस प्रकार घटने लगता है जैसे जल में पड़ी घी की बूंदें सिकुड़ती चली जाती हैं।
स्वे स्वे धर्मे निविष्टानां सर्वेषामनुपूर्वशः ।
वर्णानामाश्रमाणां च राजा सृष्टेऽभिरक्षिताः ॥ 35 ।।
परमात्मा ने राजा को अपने-अपने धर्मों का पालन करने वाले समस्त वर्णों तथा आश्रमों के रक्षक के रूप में जन्म दिया है।
तेन यद्यत्सभृत्येन कर्तव्यं रक्षता प्रजाः ।
तत्तद्वोऽहं प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ 36 ॥
महर्षि भृगु बोले - ऋषियो ! मैं अब प्रजा की रक्षार्थ अमात्यों-सचिवों आदि के साथ राजा द्वारा आचरण योग्य नियमों की जानकारी क्रम से विस्तारपूर्वक देता हूं। ध्यान से सुनिए।
ब्राह्मणान् पर्युपासीत प्रातरुत्थाय पार्थिवः । त्रैविधवृद्धान्विक्षस्तिष्ठेत्तेषां च शासने ॥ 37 11
प्रातःकाल उठकर राजा तीनों वेदों में कुशल वृद्ध विद्वान ब्राह्मणों की सेवा में उपस्थित हो और उनके निर्देशों के अनुसार राज्य का कार्य संचालन करे।
वृद्धांश्च नित्यं सेवेत विप्रान्वेदविदः शुचीन्।
वृद्धसेवी हि सततं रक्षोभिरपि पूज्यते ॥ ३8 ।।
राजा को सदा वेदज्ञाता, पावन आचरण वाले तथा वृद्ध ब्राह्मणों की संगत में रहना तथा उनकी सेवा करनी चाहिए। ज्ञान तथा आयु में बड़े वृद्धों की सेवा करने वाला राजा राक्षसों तक से सम्मानित किया जाता है।
तेभ्योऽधिगच्छेद् विनयं विनीतात्मापि नित्यशः ।
विनीतात्मा हि नृपतिर्न विनश्यति कर्हिचित् ।। 39 ॥
राजा चाहे सुशिक्षित हो तथापि वह प्रतिदिन ज्ञान में वृद्ध (अत्यधिक ज्ञानवान) तथा आयु में बड़े ब्राह्मणों से शिक्षा ले। सुशिक्षित तथा विनम्र राजा का कभी विनास नहीं हो सकता।
बहवोऽविनयान्नष्टा राजानः सपरिच्छदाः ।
वनस्था अपि राज्यानि विनयात्प्रतिपेदिरे ।। 40 ।।
अनेक राजा जो धन-सम्पदा और शक्ति से पूर्ण थे धृष्ट होने के कारण नष्ट हो गए। इसके विपरीत जंगलों में भटकने वाले अनेक साधनहीन राजाओं ने भी स्वतः नष्ट हुए राज्य अपनी विनम्रता के फलस्वरूप पुनः प्राप्त कर लिए।
वेनो विनष्टोऽविनयान्नहुषश्चैव पार्थिवः ।
सुदासो यवनश्चैव सुमुखो निमिरेव च ॥ 41 ॥
पृथुस्तु विनयाद्राज्यं प्राप्तवान् मनुरेव च।
कुबेरश्च धनैश्वर्यं ब्राह्मण्यं चैव गाधिजः ।। 42 ॥
वेन, नहुष, सुदास, यवन, सुमुख तथा निमि आदि राजा अपने अविनय (विनम्रता से रहित या धृष्टता) के कारण नाश को प्राप्त हुए।
इसके विपरीत पृथु तथा मनु को अपनी विनम्रता के फलस्वरूप राज्य की प्राप्ति हुई। कुबेर को धन का अधिपतित्व (स्वामित्व) तथा गाधिपुत्र विश्वामित्र को ब्राह्मणत्व अपनी विनम्रता के कारण प्राप्त हुए।
त्रैविद्येभ्यस्त्रयीं विद्यां दण्ड नीतिं च शाष्वतीम् ।
आन्वीक्षकीं चात्मविद्यां वार्तारम्भाश्च लोकतः ॥ 43 ।।
वेद विद्या के विद्वानों से राजा को वेदों का ज्ञान, दण्ड नीति, तर्कशास्त्र एवं वेदान्त की शिक्षा लेनी चाहिए। सामान्य व्यक्तियों से लोक व्यवहार (अर्थात् किसके साथ कब और कैसा व्यवहार किया जाए) की शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए।
इन्द्रियाणां जये योगं समातिष्ठेद्दिवानिशम् ।
जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापपितुं प्रजाः ।। 44 ।।
जिस राजा ने अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली हो, वही प्रजा को अपने नियंत्रण में रख सकता है। अतः राजा को प्रतिदिन अपनी इन्द्रियों पर विजय पाने का प्रयत्न करते रहना चाहिए।
दश काम समुत्थानि तथाष्टौ क्रोधजानि च।
व्यसनानि दुरन्तानि प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥ 45 ॥
कामवासना से पैदा होने वाले दस तथा क्रोध से पैदा होने वाले आठ, इस प्रकार कुल अठारह दुर्जेय विषयों पर विजय प्राप्त करने तथा उनसे मुक्त रहने का प्रयत्न राजा को करते रहना चाहिए।
कामजेषु प्रसक्तो हि व्यसनेषु महीपतिः ।
वियुज्यतेऽर्थधर्माभ्यां क्रोधजेष्वात्मनैव तु ॥ 46 ।।
काम वासना या काम से पैदा होने वाले दस दोषों में आसक्त रहने वाला राजा धर्म एवं अर्थ से विहीन हो जाता है। इसी तरह क्रोध से पैदा होने वाले आठ व्यसनों में आसक्त अपने तन-मन दोनों को नष्ट कर लेता है।
मृगयाक्षदिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियो मदः।
तौर्यत्रिकं वृथाद्या च कामजो दशको गणः ॥ 47 ॥
दस व्यसन जो काम के कारण जन्म लेते हैं, निम्नलिखित हैं-1. शिकार खेलना (मृगया) 2. जुआ खेलना, 3. दिन में अर्धनिद्रित रहते हुए कपोल कल्पनाएं करना, 4. पर निन्दा करना, 5. नारियों के साथ रहना, 6. शराब या सुरा पीना, 7. नृत्य करना, 8. श्रृंगारिक कविताएं, गीत आदि गाना, 9. वाद्य यंत्र बजाना, 10. बिना किसी उद्देश्य के घूमना।
पैशुन्यं साहसं मोहं ईर्ष्याऽसूयार्थ दूषणम् ।
वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोऽपिगणोऽष्टकः ॥ 48 ।।
आठ व्यसन जो क्रोध से उत्पन्न होते हैं, वे हैं- 1. चुगली करना, 2. साहस, 3. द्रोह, 4. ईर्ष्या करना, 5. दूसरों में दोष देखने की आदत, 6. दूसरों के धन को छीन लेना, 7. गालियां देना, 8. दूसरों से बुरा व्यवहार करना।
द्वयोरप्येतयोर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः ।
तं त्यनेन जयेल्लोभं तज्जावेतावुभौ गणौ ॥ 49 ।।
समस्त विद्वानों का यह मत है कि काम तथा क्रोध से जन्म लेने वाले दोनों तरह के व्यसन लोभ से ही उत्पन्न होते हैं। अतः राजा को अपने लोभ को जीतने अर्थात् उसको वश में रखने के लिए पूर्ण प्रयत्न करने चाहिए।
पानभक्षाः स्त्रियश्चैव मृगया च यथाक्रमम्।
एतत्कष्टतमं विद्याच्चतुष्कं कामजे गणे ॥ 50 ।।
काम से जन्म लेने वाले दोषों में चार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं- सुरापान करना, मांसाहार करना, स्त्री के संग रहना तथा शिकार करना। इन चारों को जीतने का कार्य बहुत ही कष्ट साध्य समझा गया है।
दण्डस्य पातनं चैव वाक्पारुष्यार्थ दूषणे।
क्रोधजेऽपि गणे विद्यात्कष्टमेतत्त्रिकं सदा ।। 51 ॥
क्रोध से पैदा होने वाले दोषों में से भी तीन पर काबू रखना बहुत कठिन है। यह तीन दोष हैं- शारीरिक दण्ड देना, अपनी वाणी द्वारा दूसरों की मानहानि करना एवं धन को छीनना यर्या लूटना।
सप्तकस्यास्य वर्गस्य सर्वत्रैवानुषङ्गिणः ।
पूर्व-पूर्व गुरुतरं विद्याद् व्यसनमात्मवान् ॥ 52 ।।
राजा को ऊपर बताए सात दोषों- काम से जन्म लेने वाले चार तथा क्रोध से पैदा होने वाले तीन व्यसनों में क्रमशः धन छीनने से कठोर वचन, कठोर वचनों से शारीरिक दण्ड इसी तरह शिकार से स्त्री संग, स्त्री संग से मांसाहार करना और उससे भी सुरापान करना (शराब पीना) पर नियंत्रण रखने को कठिन समझना चाहिए।
व्यसनस्य च मृत्योश्च व्यसनं कष्टमुच्यते ।
व्यसन्यधोऽधोव्रजति स्वर्यात्यव्यसनी मृतः ।। 53 ॥
मृत्यु तथा व्यसन में से व्यसन अधिक कष्ट देता है। व्यसन करने वाले व्यक्ति का निरंतर पतन होता जाता है जबकि व्यसन न करने वाला मृत्यु के बाद स्वर्ग प्राप्त करता है।
मौलाञ्छास्त्रविदः शूरांल्लब्धलक्षान् कुलोद्गतान्।
सविचान्सप्त चाष्टौ वा प्रकुर्वीत परीक्षितान् ॥ 54 ।।
राजा को मूल परम्परा से सेवा करते आए ऐसे सात-आठ व्यक्तियों को अपना सचिव बनाना चाहिए जो शास्त्रों का ज्ञान रखते हों. वीर हों, सफल लक्ष्यभेद कर लेते हों और उत्तम कुल में जन्मे हों।
अपि यत्सुकरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् ।
विशेषतोऽसहायेन किन्तु राज्यं महोदयम् ।। 55 ॥
सरल लगने वाला कार्य भी अकेले और असहाय व्यक्ति को कठिन लगता है, फिर राज-काज के महान भार को अकेला राजा कैसे वहन कर सकता है। इसलिए उसे सचिवों की सहायता और सेवा की आवश्यकता पड़ती है।
तैः सार्धं चिन्तयेन्नित्यं सामान्यं सन्धिविग्रहम्।
स्थानं समुदयं गुप्तिं लब्धप्रशमनानि च ॥ 56 ॥
अपने सचिवों के साथ राजा को सामान्यतः युद्ध, संधि, स्थान की उत्पत्ति, धन-सम्पत्ति की बढ़ोत्तरी, जो कुछ प्राप्त हो गया हो उसकी रक्षा तथा वृद्धि आदि पर विचार विनिमय करते रहना चाहिए।
तेषां स्वं स्वमभिप्रायमुपलभ्य पृथक् पृथक् ।
समस्तानां च कार्येषु विदध्याद्धितमात्मनः ।। 57 ।।
अपने मंत्रियों से राजा को ऊपर के श्लोक में बताए विषयों पर अलग-अलग तथा मिले-जुले विचारों को जान कर प्रजा की भलाई हेतु कार्य करने चाहिए।
सर्वेषां तु विशिष्टेन ब्राह्मणेन विपश्चिता।
मन्त्रयेत्परमं मन्त्रं राजा षाड्गुण्यसंयुतम् ॥ 58 ॥
राजा को चाहिए कि उसके मंत्रियों में जो सबसे अधिक बुद्धिमान तथा विशिष्ट ब्राह्मण मंत्री हो। उसके साथ संधि, विग्रह आदि विषयों पर विचार विनिमय करे।
नित्यं तस्मिन् समाश्वस्तः सर्वकार्याणि निक्षिपेत् ।
तेन सार्धं विनिश्चित्य ततः कर्म समारभेत् ।। 59 ।।
ब्राह्मण मंत्री को अपने विश्वास में लेकर और उस पर विश्वास करके राजा सभी कार्यों का भार उसी पर सौंप दे तथा उसके साथ अच्छी तरह विचार विनिमय करके निर्णय ले, तत्पश्चात् कार्य आरम्भ करे।
अन्यानपि प्रकुर्वीत शुचीन्प्राज्ञानवस्थितान्।
सम्यगर्थ समाहतृनमात्यान्सुपरीक्षितान् ।। 60 ॥
राजा को चाहिए कि वह अपने राज्य के अन्य शुद्ध बुद्धि वाले ऐसे लोगों को सचिव पद पर नियुक्त करे जो धनोपार्जन करने के विशेषज्ञ हों और जिनकी भली-भांति परीक्षा ली जा चुकी हो।
निर्वर्तेतास्य यावद्भिरिति कर्तव्यतानृभिः ।
तावतोऽतन्द्रितान्दक्षान् प्रकुर्वीत विचक्षणान् ॥ 61 ॥
राज्य को व्यवस्थित रीति से भली प्रकार चलाने के लिए राजा को जितने भी व्यक्तियों की जरूरत हो उतने ही योग्य, आलस्यहीन तथा कर्तव्य पालन में निपुण व्यक्तियों को सचिव या अमात्य के रूप में नियुक्त करे।
तेषामर्थे नियुञ्जीत शूरान्दक्षान्कुलोद्गतान्।
शुचीनाकरकर्मान्ते भीरूनन्तनिवेशने ।। 62 ॥
राजा को चाहिए कि उसके सचिवों में जो वीर, चतुर तथा ऊंचे कुल के हों उन्हें आर्थिक विषयों का, जो पवित्र आचरण वाले हों उन्हें खनन कार्य (खानों को खुदवाने का काम) का तथा धर्म से डरने वालों को महल की व्यवस्था एवं आवश्यकताओं को पूरा करने का कार्य भार सौंपे।
दूतं चैव प्रकुर्वीत सर्वशास्त्रविशारदम् ।
इङ्गिताकारचेष्टज्ञं शुचिं दक्षं कुलोद्गतम् ॥ 63 ॥
राजा को ऐसे व्यक्ति को अपना दूत नियुक्त करना चाहिए जो सभी शास्त्रों का ज्ञाता हो, जो दूसरों की मुख मुद्राओं, चेष्टाओं तथा संकेतों से उनके आंतरिक भाव समझने में कुशल हो, जो पवित्र अन्तःकरण का चतुर तथा अच्छे कुल का व्यक्ति हो।
अनुरक्तः शुचिर्दक्षः स्मृतिमान् देशकालवित् । वपुष्मान्वीतभीर्वाग्मी दूतो राज्ञः प्रशस्यते ॥ 64 ॥
सफल राजदूत ऐसा व्यक्ति कहा जाता है जो राजा एवं राज्य से प्रेम रखता हो, जो अन्दर तथा बाहर से शुद्ध तथा पवित्र हो, जो राज का कार्य निकालने में चतुर हो, जिसकी स्मरण शक्ति अच्छी हो, जो देश और काल की जानकारी रखता हो, जिसका व्यक्तित्व आकर्षक हो, जो वार्तालाप करने की कला में चतुर तथा साहसी हो।
अमात्ये दण्ड आयत्तो दण्डे वैनयिकी क्रिया।
नृपतौ कोशराष्ट्र च दूते सन्धिविपर्ययौ ॥ 65 ॥
सुशिक्षा दण्ड के अधीन रहती है अर्थात् दण्ड के भय से ही लोग अच्छा आचरण करते हैं। अतः राजा को दण्ड देने का भार किसी योग्य मंत्री को सौंप देना चाहिए। राज्य कोष तथा राजा की रक्षा के काम राजा को अपने पास रखने चाहिए। विदेश विभाग, पड़ोसी राजाओं से सन्धि-विग्रह आदि विषय दूत को सुपुर्द करने चाहिए।
दूत एव हि सन्धत्ते भिन्नत्त्येव च संहतान् ।
दूरस्तत्कुरुते कर्म भिद्यन्ते येन मानवाः ॥ 66 ॥
दूत दूसरे देशों से सम्बन्ध सुधारने या बिगाड़ने के कार्य भी करता है। दूत वह सब कार्य भी करता है जिनसे विरोधी देशों की प्रजा में फूट पड़ जाए।
स विद्यादस्य कृत्येषु निगूढेङ्गितचेष्टितैः ।
आकारमिङ्गितं चेष्टां भृत्येषु च चिकीर्षितम् ॥ 67 ।।
दूत का यह कार्य भी है कि वह राजा के विरोधियों के संकेतों तथा चेष्टाओं से उनके राजद्रोह संबंधी षड्यंत्रों को तथा उनके विश्वसनीय सेवकों की मुख मुद्राओं संकेतों एवं चेष्टाओं से उनके मन की बात जानने की चेष्टा करे।
बुद्धवा च सर्व तत्वेन परराजचिकीर्षितम् ।
तथा प्रयत्नमातिष्ठेद्यथात्मानं न पीडयेत् ॥ 68 ।।
दूत को अपने राजा के विरोधी या शत्रु राजा के मन की सही जानकारी प्राप्त करके पहले से ही ऐसे प्रयत्न करने चाहिए जिससे विरोधी या शत्रु राजा उसके अपने राजा की हानि नहीं कर सके।
जाङ्गलं सस्यसम्पन्नमार्यप्रायमनाविलम् ।
रम्यमानतसामन्तं स्वाजीव्यं देशमावसेत् ।। 69 ॥
ऐसे देश में राजा को रहना चाहिए, जिसके चारों ओर वन हो। जिसकी भूमि पर हरियाली हो, जल की अधिकता हो, धन-धान्य से सम्पन्न हो, वहां के रहने वाले शिष्ट तथा आर्य हों, जहां किसी प्रकार के रोग की सम्भावना नहीं हो तथा जहां जीविका कमाने के अनेक साधन उपलब्ध हों।
धनुर्दुर्गं महीदुर्गमब्दुर्ग वार्क्षमेव वा।
गिरिदुर्गं नृदुर्गं वा समाश्रित्य वसेत्पुरम् ॥ 701
राजा को अपना निवास स्थान किसी दुर्ग के अन्दर बनाना चाहिए, ये दुर्ग धनुषाकार, पृथ्वी के आकार के, जल की आकृति के, वृक्षों की आकृति या पर्वतों के आकार में से किसी एक के आकार के हो सकते हैं।
सर्वेण तु प्रयत्नेन गिरिदुर्गं समाश्रयेत् ।
एषं हि बाहुगुण्येन गिरिदुर्गं विशिष्यते ॥ 71 ॥
(ऊपर के श्लोक में बताए) इन दर्गों में से गिरिदुर्ग अर्थात् पर्वत के आकार का दर्ग (किला) सबसे अधिक सुरक्षित होता है। अतः वही उत्कृष्ट है। अतः गिरिदुर्ग में ही रहने का प्रयत्न राजा को करना चाहिए।
त्रीण्याद्यान्याश्रितास्त्वेषां मृगगर्ताश्रयाऽप्सराः ॥
त्रीण्युत्तराणि क्रमशः प्लवङ्ग मनरामराः ॥ 72 ।।
ऊपर बताए छह तरह के दगों में छह तरह के जीव अपनी रक्षा के लिए रहते हैं। धनुर्दर्ग में हिरण रहते हैं, महीदुर्ग (पृथ्वी के आकार का दुर्ग) में मूसे, जलदुर्ग में जल में रहने वाले जीव, वृक्षदुर्ग में बन्दर, नदर्ग में सामान्य मनुष्य एवं पर्वत जैसे दुर्ग में पर्वत के लोग निवास करते हुए अपनी रक्षा करते हैं।
यथा दुर्गाश्रितानेतान्नोपहिंसन्ति शत्रवः ।
तथारयो न हिंसन्ति नृपं दुर्गं समाश्रितम् ॥ 73॥
जिस तरह छह तरह के दुर्गों में रहने वाले, छह प्रजापतियों के प्राणियों को शत्रु पीड़ा नहीं दे सकते, उसी तरह दुर्ग का आश्रय लेने वाले राजा का वध उसके (शत्रु) बैरी लोग नहीं कर सकते।
एकः शतं योधयति प्रकारस्थो धनुर्धरः ।
शतं दशसहस्त्राणि तस्माद् दुर्गं विधीयते ।। 74 ॥
दुर्ग का निर्माण इसलिए किया जाता है कि उसकी चारदीवारी के अन्दर रहने वाला एक धनुर्धर किले के बाहर रहने वाले सौ योद्धाओं का तथा सौ धनुर्धर बाहर के हजार योद्धाओं का सामना कर सकें।
तत्स्यादायुधसम्पन्नं धनधान्येन वाहनैः ।
ब्राह्मणैः शिल्पभिर्यन्त्रैर्यवसेनोदकेन च ॥ 75॥
उस दुर्ग में अस्त्र-शस्त्रों, घोड़ों-हाथियों एवं वाहनों आदि का बहुत विशाल भण्डार होना चाहिए। दुर्ग में ब्राह्मणों, शिल्पों तथा यन्त्रकारों हेतु निवास भी होने चाहिए।
तस्य मध्ये सुपर्याप्तं कारयेद् गृहमात्मनः ।
गुप्तं सर्वर्तुकं शुभं जलवृक्षसमन्वितम् ।। 76 ।।
उसके बीच में अपने रहने के लिए पर्याप्त विस्तार वाला घर बनाना चाहिए। यह आवास सब प्रकार से गुप्त अर्थात सुरक्षित होना चाहिए। इसे जल तथा वृक्षों से युक्त तथा सभी ऋतुओं के अनुकूल निवास योग्य होना चाहिए।
तदध्यासोद्वहेद् भार्यां सवर्णा लक्षणान्विताम् ।
कुले महति सम्भूतां हृद्यां रूपगुणान्विताम् ॥ 77 ॥
राजा को उसमें निवास करते हुए अपने ही वर्ण की, अच्छे लक्षणों वाली, बड़े कुल वाली, मन को प्रसन्नता देने वाली, रूप तथा गुणों से युक्त सुन्दर नारी से विवाह करना करना चाहिए।
पुराहितं च कुर्वीत वृणुयादेव चत्विजम्।
तेऽस्य गृह्याणि कर्माणि कुर्युर्वैतानिकानि च ।। 78 ॥
पुरोहित, आचार्य एवं ऋत्विज का राजा को वरण करना चाहिए ताकि ये सब राजा के गृह कर्म, अग्निहोत्र आदि को पूरा कर सकें।
यजेत राजा क्रतुभिर्विविधैराप्तदक्षिणैः ।
धर्मार्थं चैव विप्रेभ्यो दद्याद् भोगान्धनानि च ॥ 79॥
वहां (दुर्ग में) रहते हुए राजा को अनेक प्रकार के यज्ञ करने चाहिए और उनमें बड़ी-बड़ी दक्षिणा देनी चाहिए। इसके अलावा राजा को धर्म के लिए ब्राह्मणों को धन एवं मूल्यवान चीजें देते रहना चाहिए।
सांवत्सरिकमाप्तैश्च राष्ट्रादाहारयेद् बलिम्।
स्याच्चाम्नाय परो लोके वर्तेत पितृवन्नृषु ॥ 8० ॥
कृषि कर की उगाही राजा को ऐसे व्यक्तियों द्वारा करवानी चाहिए जिनकी ईमानदारी की पहले से परीक्षा ली जा चुकी हो। राजा को वेद-शास्त्रों द्वारा बताए मार्ग का पालन करना चाहिए तथा प्रजा के साथ अपनी सन्तान की भांति व्यवहार करना चाहिए।
अध्यक्षान्विविधान्कुर्यात्तत्र तत्र विपश्चितः ।
तेऽस्य सर्वाण्यवेक्षेरन्नृणां कार्याणि कुर्वताम् ॥ 81 ॥
प्रजा की भलाई से संबंधित कार्यों को करने वालों पर दृष्टि रखने के लिए राजा को अनेक विद्वानों को अध्यक्ष नियुक्त करना चाहिए तथा उन्हें आदेश देने चाहिए कि वे उन व्यक्तियों के सभी तरह के कामों पर कठोर दृष्टि रखें।
आवृत्तानां गुरुकुलाद्विप्राणां पूजको भवेत् ।
नृपाणामक्षयोोषः निधिर्बाह्योऽभिधीयते ।। 82 ।।
गुरुकुल से लौटे विप्रों की राजा को श्रद्धा सहित सेवा-पूजा करनी चाहिए। स्नातकों को दिया जाने वाला दान राजा का अक्षय ब्राह्यकोष कहलाता है। इसमे उसके यश में वृद्धि होती है।
न तं स्तेनाः न चामित्राः हरन्ति न च नश्यति।
तस्माद्राज्ञा निधातव्यो ब्राह्मणेस्वक्षयो निधिः ।। 83 ।।
राजा द्वारा जो धन दान स्वरूप स्नातकों को दिया जाता है उसे चोर तथा शत्रु नहीं छीन सकते हैं और न ही वह नष्ट होता है। इसलिए राजा को उन ब्राह्मणों के पास अपनी अक्षय निधि का संचय करते रहना चाहिए।
न स्कन्दते न व्यथते न विनश्यति कर्हिचित्।
वरिष्ठमग्निहोत्रेभ्यो ब्राह्मणस्य मुखे हुतम् ॥ 84 ।।
स्नातक ब्राह्मणों को दिया जाने वाला दान तथा भोजन, यज्ञ आदि कराने से कहीं श्रेष्ठ है क्योंकि अग्नि में डाली जाने वाली हवि कभी गिरकर या सूखकर नष्ट हो सकती है पर ब्राह्मण के अग्नि स्वरूप मुख में गया भोजन इन दोषों से मुक्त है।
सममब्राह्मणे दानं द्विगुणं ब्राह्मण ब्रुवे।
प्राधीते शतसाहस्त्रमनन्तं वेदपारगे ।। 85 ॥
स्वयं को ब्राह्मण कहने वाले को दान देने से पदार्थ का दुगुना पुण्य मिलता है परन्तु जो ब्राह्मण सुशिक्षित है उसको जो दान दिया जाता है उसका लाख गुना पुण्य प्राप्त होता है। परन्तु जो दानकर्ता ऐसे ब्राह्मण को दान करता है जो वेद ज्ञान में पारंगत है उसका दानकूर्ता को अनन्त पुण्य लाभ मिलता है।
टिप्पणी स्वयं को ब्राह्मण कहने वाले' से अर्थ ऐसे ब्राह्मण से है जो शिक्षित नहीं है। वह केवल जन्म से ब्राह्मण है।
पात्रस्य हि विशेषेण श्रद्दधान तथैव च।
अल्पं वा बहु वा प्रेत्य दानस्यावाप्यते फलम् ॥ 86 ॥
यजमान जिसको जिस श्रद्धा भाव से दान देता है तथा दान ग्रहण करने वाले में जो पात्रता होती है उसी के अनुसार उसे परलोक में लाभ प्राप्त होता है।
समोत्तमाधमैः राजा त्वाहूतः पालयन्प्रजाः ।
न निवर्तेत संग्रामात् क्षात्रधर्ममनुस्मरन् ॥ 87 ॥
यदि प्रजा पालक राजा को कोई समान, उत्तम या अधिक शक्ति वाला राजा युद्ध के लिए चुनौती देता है तो उसका यह क्षत्रिय धर्म है कि वह उस चुनौती को स्वीकार करे।
संग्रामेस्वनिवर्तित्वं प्रजानां चैव पालनम्।
शुश्रूषा ब्राह्मणानां च राजां श्रेयस्करं परम् ॥ 88 ॥
राजाओं के कल्याणकारी धर्म हैं- युद्ध में पीठ दिखाकर नहीं भागना, प्रजा का पालन करना तथा धन-सम्पत्ति से ब्राह्मणों की सेवा करना।
आहवेषु मिथोऽन्योऽन्यं जिघांसन्तो महीक्षितः ।
युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्ग यान्त्यपराङ्मुखाः ॥ 89 ॥
युद्ध में एक दूसरे की हत्या करने की इच्छा से अपनी पूर्ण शक्ति से युद्ध करने बाले तथा प्राण जाने की सम्भावना होने पर भी पीठ नहीं दिखाने वाले राजा युद्ध में मृत्यु पाने पर स्वर्गलोक के अधिकारी हो जाते हैं।
न कूटैरायुधैर्हन्याद्युध्यमानो रणे रिपून्। न कर्णिभिर्नापिदिग्धैर्नाग्निज्वलिततेजनैः ।। 90 ।।
युद्ध क्षेत्र में शत्रुओं को गुप्त आयुधों से या ऐसे अस्त्रों से जो शरीर में प्रवेश करने के बाद कठिनाई से निकलते हैं अथवा विषाक्त या अग्नि वर्षा करने वाले शस्त्रों से नहीं मारना चाहिए।
न च हन्यात्स्थलारूढं न क्लीबं न कृताञ्जलिम् ।
न मुक्तकेशं नासीनं न तवास्मीति वादिनं ॥ 91 ॥
न सुप्तं न विन्नाहं न नग्नं न निरायुधम्।
नायुध्यमानं पश्यन्तं न परेण समागतम् ।। 92 ।।
वीर क्षत्रिय राजा को ऐसे शत्रु को नहीं मारना चाहिए जो वाहन से उतरकर खड़ा हो जाए, जो नपुंसक हो, जो हाथ जोड़ कर अथवा सिर के बाल खोलकर खड़ा हो, जो धरती पर बैठा हो, जो कहे कि 'मैं तुम्हारी शरण में हूं।' क्षत्रिय राजा को इसी प्रकार सोए हुए, कवच उतारे हुए, नंगे, बिना शस्त्र धारण किए, लड़ने के अनिच्छुक, दूसरे से वार्तालाप करते या लड़ाई देखने वाले शत्रु का वध नहीं करना चाहिए।
नायुध्यव्यसनप्राप्तं नार्तं नातिपरीक्षितम् ।
न भीतं न परावृत्तं सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ 93 ।।
धर्म का पालन करने वाले क्षत्रिय राजा को ऐसे शत्रु को भी नहीं मारना चाहिए जिसके शस्त्र टूट गए हों, जो व्यसन ग्रस्त हो, जिसका इष्ट नाश हो गया हो, जो विपत्ति में पड़ा हो, दखी हो, बहुत अधिक घायल हो या भयभीत हो अथवा युद्ध छोड़कर भाग रहा हो।
यस्तु भीतः परावृत्तः संग्रामे हन्यते परैः।
भर्तुर्यद् दुष्कृतं किञ्चित्तत्सर्वं प्रतिपद्यते ॥ 94 ॥
जो राजा भयभीत या युद्ध से वापस आते शत्रु का वध करता है, उसे मारे गए शत्रु के सभी पापों का दण्ड भोगना पड़ता है।
यच्चास्य सुकृतं किञ्चिदमुत्रार्थमुपार्जितम् ।
भर्त्ता तत्सर्वमादत्ते परावृत्तहतस्य च ॥ 95 ॥
जो पीछे भागने वाले शत्रु की हत्या करता है उसके सभी संचित पुण्य फल मरने वाले को मिल जाते हैं।
रथाश्वं हस्तिनं दक्षं धनं धान्यं पशून् स्त्रियः ।
सर्वद्रव्याणि कुप्यं च यो यञ्जयति तस्य तत् ॥ 96 ।।
राजा युद्ध में शत्रुओं के रथ, घोड़े, हाथी, छत्र, धन-धान्य, पशु, स्त्रियां तथा घी-तेल आदि जो भी जीतता है, वह सब राजा को उसे ही दे देना चाहिए जिसने इन्हें जीता है।
राज्ञश्च दद्युरुद्धारमित्येषा वैदिकी श्रुतिः ।
राज्ञा च सर्वयोधेभ्यो दातव्यमपृथग्जितम् ॥ 97 ।।
वेदों में ऐसा कहा गया है कि योद्धाओं द्वारा लूटा हुआ माल अपने राजा को दे देना चाहिए लेकिन उचित यह है कि राजा यह माल योद्धाओं को ही वापिस कर दे और जिस धन-सम्पत्ति को सबने मिलकर लूटा हो वह सभी योद्धाओं में वितरित कर दे।
एषोऽनुष्कृतः प्रोक्तो योधधर्मः सनातनः ।
अस्माद्धर्मान्न च्यवेत क्षत्रियोऽघ्नन् रणे रिपून ॥ 98 ।।
यही योद्धाओं का प्रारम्भ से चला आया धर्म है। युद्ध में शत्रुओं को संहार करते हुए इस धर्म को तोड़ना नहीं चाहिए।
अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेत्प्रयत्नतः ।
रक्षितं वर्धयेच्चैव वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ 99 ॥
राजा का यह कर्तव्य है कि जो प्राप्त नहीं हो सका है उसको पाने का प्रयत्न करे, जो प्राप्त हो गया है उसकी यत्नपूर्वक रक्षा करे, रक्षा किए गए धन-सम्पत्ति की वृद्धि करे और जितनी धन-सम्पत्ति बढ़ चुकी हो उसको अधिकारियों (सत्पात्रों) में विशेष रूप से वितरित करता रहे।
एतच्चतुर्विधं विद्यात्पुरुषार्थप्रयोजनम् ।
अस्य नित्यमनुष्ठानं सम्यक्कुर्यादतन्द्रितः ।। 100 ।।
राजा को राजा होने का प्रयोजन ऊपर बताए गए चार पुरुषार्थों की सिद्धि करता है। उसे आलस्य रहित होकर सदैव इनका पालन करना चाहिए।
अलब्धमिच्छेद्दण्डेन लब्धं रक्षेदवेक्षया।
रक्षितं वर्द्धयेवृत्त्या वृद्धं दानेन निक्षिपेत् ॥ 101 ।।
अप्राप्त को शक्ति से प्राप्त करने, जो प्राप्त हो गया है, उसकी देखभाल तथा रक्षा करने, रक्षित की निवेश द्वारा वृद्धि करने तथा बढ़ी हुई धन-सम्पत्ति को दान देने में राजा को सदैव तत्पर रहना चाहिए।
नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुषः ।
नित्यं संवृतसर्वार्थो नित्यं छिद्रानुसारी च ॥ 102 ।।
राजा को शक्ति का प्रयोक्ता एवं पुरुषार्थ का प्रकाशक होना चाहिए। उसे अपनी धन-सम्पत्ति को गुह्य रखते हुए शत्रु के अवगुणों पर सदैव दृष्टि रखनी चाहिए।
नित्यमुद्यतदण्डस्यकृत्स्नमुद्विजते जगत् ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि दण्डेनैव प्रसाधयेत् ॥ 103 ।।
ऐसे राजा से सम्पूर्ण संसार डरता है जो सदैव दण्ड देने के लिए उद्यत रहता है। इसलिए राजा को दण्ड द्वारा ही सबको सही मार्ग पर चलाना चाहिए।
अमाययैव वर्तेत न कथञ्चन मायया।
बुध्येतास्प्रयुत्तां च मायां नित्यं स्वसंवृतः ॥ 104 ।।
अपनी प्रजा के साथ राजा को पूरी तरह कपट रहित भाव से व्यवहार करना चाहिए। उसे गुप्त रूप से शत्रुओं के छल-कपट से होशियार रहना चाहिए।
नास्य छिद्रं परोविद्याद् विद्याच्छिद्रं परस्य तु।
गूहेत्कूर्मइवाङ्गानि रक्षेद् विवरमात्मानः ।। 105 ॥
राजा को इस प्रकार व्यवहार करना चाहिए कि उसकी कमजोरियों या दोषों को शत्रु नहीं जान पाए परन्तु वह शत्रु की कमजोरियों को जान ले। राजा को कछुवे की तरह अपने अंगों को गुप्त रखना एवं दोषों को छिपाए रखना चाहिए।
टिप्पणी-राजा की सेना, विशेष प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और उसका राज्यकोश ही उसके अंग माने गए हैं।
वकवच्चिन्तयेदर्थान् सिंहवच्च पराक्रमेत्।
वृकवच्चावलुम्पेत शशवच्च विनिष्पतेत ॥ 106 ।।
राजा को बगुले की भांति धन की चिन्ता, सिंह के समान पराक्रम करने वाला, भेड़िए के समान क्रूर, हत्यारा तथा खरगोश की तरह भागने वाला होना ना चाहिए।
टिप्पणी- राजा को अपने पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए जो राजनीति अपनानी चाहिए उसमें बगुले द्वारा मछलियां पकड़ने में जो एकाग्रता होती है, सिंह में जो पराक्रम होता है, भेड़िए में जो निर्ममता होती है तथा खरगोश में जो तीव्रता होती है, उन्हें अपनाना चाहिए।
एवं विजयमानस्य येऽस्य स्युः परिपन्थिनः ।
तानानयेद्वशं सर्वान्सामादिभिरुपक्रमैः ।। 107 ॥
इस भांति जो राजा विजय की कामना करता है उसे साम-दाम आदि उपायों को अपना कर अपने विरोधियों को वश में बनाए रखना चाहिए।
यदि ते तु न तिष्ठेयुरुपायैः प्रथमैस्त्रिभिः ।
दण्डेनैव प्रसह्येतांश्छन कैर्वशमानयेत् ।। 108 ॥
राजा को चाहिए कि यदि उसके शत्रु साम (समझाना), दाम (धन आदि देना) तथा भेद (शत्रु में फूट डाल देना), इन तीनों उपायों से भी वश में नहीं आए तो धीरे-धीरे दण्ड के प्रयोग से उनको अपने काबू में करे।
सामादीनामुपायानां चतुर्णामपि पण्डिताः।
सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्राभिवृद्धये ॥ 109 ।।
राजनीति के चार उपायों- साम, दाम, भेद तथा दण्ड में विद्वान लोग राष्ट्र की प्रगति के लिए साम एवं दाम के उपयोग का ही अधिक समर्थन करते हैं।
यथोद्धरति निर्दाता कक्षं धान्यं च रक्षति।
तथा रक्षेन्नृपोराष्ट्र हन्याच्च परिपन्थिनः ।। 110 ॥
जिस तरह खेती करने वाला किसान धान्य की रक्षा हेतु खर-पतवार को उखाड़ कर फेंक देता है, उसी तरह राजा को राष्ट्र की रक्षा हेतु विरोधियों का समूल नाश कर देना चाहिए।
मोहाद्राजा स्वराष्ट्र यः कर्षयत्यनवेक्षया।
सोऽचिराद्धृश्यते राज्याज्जीविताच्च सबान्धवः ।। 111 ।।
अज्ञान के वश में होकर अपनी प्रजा को दुख देने वाला राजा विवेकहीन होता है और शीघ्र ही अपने परिवार सहित राज्य तथा अपने जीवन को नष्ट कर लेता है।
शरीरकर्षणात्प्राणाः श्रीयन्ते प्राणिनां यथा।
तथा राज्ञामपि प्राणाः श्रीयन्ते राष्ट्रकर्षणात् ॥ 112 |
जिस तरह शरीर का शोषण करने (भोजन-जल आदि कम देना तथा उससे कार्य ज्यादा से ज्यादा लेना) से जीवों के प्राण कमजोर पड जाते हैं उसी तरह राष्ट्र है (प्रजा) का शोषण करने से राजाओं की प्राणशक्ति भी कमजोर हो जाती है।
राष्ट्रस्य संग्रहे नित्यं विधानमिदमाचरेत् ।
सुसंगृहीतराष्ट्रो हि पार्थिवः सुखमेधते ॥ 113 ॥
राजा को प्रजा की उन्नति तथा समृद्धि के लिए आगे बताए जाने वाले उपायों को अपनाना चाहिए। राष्ट्र (प्रजा) के समृद्ध तथा सन्तुष्ट होने पर ही राजा सुख से रहता तथा उन्नति करता है।
द्वयोस्त्रयाणां पञ्चानां मध्ये गुल्ममधिष्ठितम् ।
तथा ग्रामशतानां च कुर्याद्राष्ट्रस्य संग्रहम् ।। 114 ॥
राज्य की सुव्यवस्थापूर्वक उन्नति करने के लिए राजा को दो-दो, तीन-तीन तथा पांच-पांच गांवों के वर्ग बनाने चाहिए फिर सौ गांवों का एक समुदाय बनाकर विकास की योजना चलानी चाहिए।
ग्रामस्याधिपतिं कुर्याद्दशग्रामपतिं तथा।
विंशतीशं शतेशं च सहस्त्रपतिमेव च ॥ 115 ॥
हरेक गांव की उन्नति को देखने के लिए जैसे एक मुखिया नियुक्त किया जाए वैसे ही दस ग्रामों (गांवों) का, दस-दस ग्रामों को मिलाकर बीस गांवों का तत्पश्चात् बीस-बीस ग्रामों के पांच वर्गों को मिलाकर सौ ग्रामों का तथा सौ-सौ के दस वर्गों से हजार ग्रामों का एक समुदाय बनाए और उसकी देखभाल हेतु एक-एक मुखिया।
ग्राम दोषान्समुत्पन्नान् ग्रामिकः शनकैः स्वयम्।
शंसेत् ग्रामदशेशाय दशेशो विंशतीशिनम् ॥ 116 ॥
विंशतीशस्तु तत्सर्वं शतेशाय निवेदयेत् ।
शंसेन ग्रामशतेशस्तु सहस्त्रपतए स्वयम् ॥ 117 ॥
एक गांव का मुखिया अपने गांव में पैदा होने वाले और सुधारे नहीं जा सकने वाले दोष का प्रतिवेदन (रिपोर्ट) दस गांवों के अधिपति को दे। दस गांवों का स्वामी असमर्थ होने पर उसकी सूचना बीस गांवों के अधिपति को बीस गांवों का अधिपति सौ गांवों के स्वामी को तथा सौ गांवों का स्वामी अपने से उच्च हजार गांवों के स्वामी को अपनी सम्मति सहित सूचना दे।
यानि राज प्रदेयानि प्रत्यहं ग्रामवासिभिः ।
अन्नपानेन्धनादीनि ग्रामिकस्तान्यवाप्नुप्यात् ॥ 118 ।।
गांव के मुखिया का यह कर्तव्य भी है कि वह ग्रामवासियों द्वारा राजा को कर (टैक्स) के रूप में दिए जाने वाले अन्न, पान (जल) तथा ईंधन आदि की उगाही करे।
दशी कुलंतु भुञ्जीत विशी पञ्च कुलानि च।
ग्रामं ग्रामशताध्यक्षः सहस्त्राधिपतिः पुरम् ॥ 119 ॥
दस गांवों के मुखिया को एक कुल (छह-छह बैलों वाले दो हलों से जोती जाने वाली धरती 'कुल' कहलाती है) और बीस गांवों के मुखिया को पांच कुलों की धरती से लगान वसूल करना चाहिए। सौ गांवों के मुखिया को पूरे गांव से तथा हजार गांवों के मुखिया को नगर से कर वसूलने का अधिकार होता है।
तेषां ग्राम्याणि कार्याणि पृथक् कार्याणि चैव हि।
राज्ञोऽन्यः सचिवः स्निग्धस्तानि पश्येदतन्द्रितः ।। 120 ।।
राजा के एक विश्वसनीय सचिव के पास इन सभी गांवों के अधिपतियों के कार्य क्षेत्रों तथा कार्यों की देखभाल की जिम्मेवारी होनी चाहिए। उसे हमेशा आलस्य रहित होकर इन ग्राम अधिपतियों पर दृष्टि रखनी चाहिए।
नगरे नगरे चैकं कुर्यात्सर्वार्थचिन्तकम्।
उच्चैः स्थानं घोररूपं नक्षत्राणामिव ग्रहम् ॥ 121 ॥
हरेक नगर में राजा को सभी नागरिकों के हित की चिन्ता करने वाले, अच्छे कुल के और तेजस्वी पुरुष को नगराधिपति नियुक्त करना चाहिए। यह व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जो शुक्र के समान तेजस्वी तथा किसी से भी भयभीत नहीं होने वाला हो।
स ताननुपरिक्रामेत्सर्वानेव सदा स्वयम् ।
तेषां वृत्तं परिणयेत्सम्यग्राष्ट्रेषु तच्चरैः ।। 122 ।।
नगर के अधिपति को गांवों में जाकर वहां के मुखियाओं के कार्यों का निरीक्षण करना चाहिए। मुखियाओं की सूचनाओं को देने वाले दूतों से भी उन्हें घनिष्ठ सम्पर्क बनाए रखना चाहिए।
राजो हि रक्षाधिकृताः परस्वादायिनः शठाः ।
भृत्याः भवन्ति प्रायेण तेभ्योरक्षेदिमाः प्रजाः ॥ 123 ॥
राजा द्वारा प्रजा की रक्षा हेत जो कर्मचारी नियुक्त किए जाते हैं वे अधिकतर दष्ट प्रकृति के होते हैं और प्रजा से उसके धन का हरण करने लगते हैं। अतः इन राजकर्मचारियों से प्रजा की रक्षा करना राजा का कर्तव्य है।
ये कार्यिकेभ्योऽर्थमेव गृह्णीयुः पापचेतसः ।
तेषां सर्वस्वमादाय राजा कुर्यात्प्रवासनम् ।। 124 ।।
प्रजा के किसी कार्य को करने के बदले घूस (रिश्वत) लेने वाले अपवित्र बुद्धि वाले अधिकारियों की सम्पत्ति छीनकर उन्हें देश निकाला दे देना चाहिए।
राजा कर्मसु युक्तानां स्त्रीणां प्रेष्यजनस्य च।
प्रत्यहं कल्पयेत् वृत्तिं स्थानं कर्मानुरूपतः ।। 125 ।।
भिन्न-भिन्न कार्यों में नियुक्त स्त्रियों तथा पुरुषों के पद एवं कार्य के अनुसार राजा को उनका वेतन निश्चित करना चाहिए तथा समय-समय पर उसकी समीक्षा करते रहना चाहिए।
पणो देयोऽवकृष्टस्य षडुत्कृष्टस्य वेतनम् । षाण्मासिकस्तथाच्छादो धान्यद्रोणस्तु मासिकः ।। 126 ॥
साधारण प्रकार का काम करने वाले कर्मचारी को प्रति माह एक पण वेतन तथा एक द्रोण धान्य एवं छह माह में वर्दी (यूनीफार्म) देनी चाहिए। इसी आधार पर उच्च स्तर का काम करने वाले कर्मचारी को स्थिति के अनुसार छह गुना वेतन देना चाहिए।
क्रयविक्रयमध्वानं भक्तं च सपरिव्ययम् ।
योगक्षेमं च सम्प्रेक्ष्य वणिजो दापयेत् करान् । 127 ।।
राजा को कराधान (टैक्स) निश्चित करते समय व्यापारियों द्वारा माल खरीदने तथा बेचने, परिवहन पर होने वाले खच्चों तथा माल की देखभाल करने पर होने वाले खचौ आदि को ध्यान में रखना चाहिए।
यथा फलेन युज्येत राजा कर्ता च कर्मणाम् ।
तथा वेक्ष्य नृपो राष्ट्र कल्पयेत् सततं करान् ।। 128 ।।
राजा को कर इस प्रकार लगाना चाहिए जिससे राज्य में उद्योगों तथा व्यापार की वद्धि होने के साथ-साथ उसका अर्थात राजा का भी लाभ हो।
यथाल्पाल्पमदन्त्याद्यं वार्यों कोवत्सषट्पदाः ।
तथाल्पाल्यो ग्रहीतव्यो राष्ट्राद्राज्ञाब्दिकः करः ।। 129 ॥
राजा को प्रजा से उसी प्रकार थोडा-थोडा करके वार्षिक कर वसूलना चाहिए जिस प्रकार जोंक, बछड़ा तथा भ्रमर धीरे-धीरे अपना आहार खींचते हैं।
टिप्पणी- कहने का आशय यह कि राजा इस प्रकार टैक्स लगाए और इतना कम लगाए कि प्रजा को जरा भी पीड़ा नहीं हो।
पञ्चाशद्भाग आदेयो राज्ञा पशुहिरण्ययोः ।
धन्यानामष्टमो भागः षष्ठो द्वादश एव च ॥ 130 ॥
राजा को पशुओं और सोने की खरीदारी और बेचने से होने वाले लाभ का दो प्रतिशत, धान्य का छठा, आठवां या बारहवां भाग (भूमि की उर्वरता तथा स्थिति के अनुसार) कर के रूप में वसूल करना चाहिए।
आददीताथ षड्भागं द्रुम-मांस मधु सर्पिषाम् ।
गन्धौषधिरसानां च पुष्पमूलफलस्य च ॥ 131 ॥
पत्रशाकतृणानां च चर्मणां वैदलस्य च।
मृण्मयानां च भाण्डानां सर्वस्याश्ममयस्य च ॥ 132 ॥
पेड़ों, मांस, घी, शहद, सुगन्धित वस्तुओं, दवाओं, रसों, फूलों, कन्द-मूलों तथा फलों पर सोलह प्रतिशत (छठा भाग) कर स्वरूप लेना चाहिए।
इसी तरह पत्तों, शाकों, तृणों, चमड़े, मिट्टी तथा पाषाण (पत्थर) से निर्मित बरतनों और अन्य चीजों के लाभ का छठा भाग (सोलह प्रतिशत) कर स्वरूप लेना चाहिए।
नियमाणोऽप्याददीत न राजा श्रोत्रियात्करम् ।
न च क्षुधाऽस्य संसीदेच्छ्रोत्रियो विषये वसन् ।॥ 133 ॥
मृत्यु की अवस्था में और धन के अभाव में भी राजा किसी वेदज्ञ विद्वान से कर नहीं लै। राजा का यह कर्तव्य है कि वह इसका ध्यान रखे कि उसके राज्य का निवासी कोई ब्राह्मण भूख से पीड़ित न रहे।
यस्य राज्ञस्तु विषये श्रोत्रियः सीदति क्षुधा ।
तस्यापि तत्क्षुधा राष्ट्रमचिरेण सीदति ।। 134।
जिस राज्य में श्रोत्रिय ब्राह्मण भूख से व्याकुल रहता है, वह राज्य थोड़े ही काल में ब्राह्मण की भूख के कारण नष्ट हो जाता है।
श्रुतवृत्ते विदित्वाऽस्य वृत्तिः धर्म्याप्रकल्पयेत् ।
संरक्षेत्पर्वतश्चैनं पिता पुत्रमिवौरसम् ॥ 135 ॥
राजा का यह कर्तव्य है कि वह श्रोत्रिय ब्राह्मण के वेद ज्ञान तथा कर्मानुष्ठान की जानकारी प्राप्त कर उसकी धर्मयुक्त जीविका निश्चित करे। जिस तरह पिता अपने धर्मानुसार जन्मे (औरस) पुत्र की रक्षा करता है उसी तरह राजा को श्रोत्रिय ब्राह्मण की आजीविका का ध्यान रखना चाहिए।
संरक्ष्यमाणो राज्ञाऽयं कुरुते धर्ममन्वहम् ।
तेनायुर्वर्धते राज्ञो द्रविणं राष्ट्रमेव च ॥ 136 ॥
जब राजा द्वारा संरक्षण पाकर श्रोत्रिय ब्राह्मण प्रतिदिन धर्म के अनुष्ठान करता है, तो उसके फलस्वरूप राजा की आयु, धन तथा यश की बढ़ोत्तरी होती है।
यत्किञ्चिदपि वर्षस्य दापयेत्करसंज्ञितम्।
व्यवहारेण जीवन्तं राजा राष्ट्र पृथग्जनम् ॥ 137 ॥
व्यापार तथा उद्योग आदि से राष्ट्र के जो प्रजाजन अपना जीवन चलाते हैं उनसे भिन्न व्यक्तियों (जैसे विदेशी) से भी राजा को थोड़ा कर लेना चाहिए।
कारुकाञ्छिल्पिनश्चैव शूद्रांश्चात्मोपजीविनः ।
एकैकं कारयेत्कर्म मासि मासि महीपतिः ।। 138 ॥
राजा को ऐसे लोगों से जो जीविका के साधन निश्चित नहीं होने के कारण कर देने में असमर्थ हैं, जैसे-बढ़ई, लोहार, राजगीर, मजदूर, शूद्र आदि उनसे महीने-दो महीने काम ले लेना चाहिए।
नोछिन्द्यादात्मनो मूलं परेषां चातितृष्णया ।
उच्छिन्दन्ह्यात्मनो मूलमात्मानं तांश्च पीडयेत् ॥ 139 ।।
लोभ के वश में आकर प्रजा से अधिकाधिक कर लेना प्रजा की जड़ काटना है (जब प्रजा अधिक कर देगी तो अपना जीवन यापन कैसे करेगी। इससे उसमें राजा के प्रति विद्रोह की भावना फैलेगी) तथा प्रजा से अनुराग के वशीभूत होकर कोई कर नहीं लेना राजा के लिए आत्मघात करने के समान है क्योंकि वह अपना और राज्य का कार्य कैसे चलाएगा। अतः राजा को दोनों प्रकार की अतियों से बचना चाहिए।
तीक्ष्णश्चैव मृदुश्च स्यात्कार्यं वीक्ष्य महीपतिः ।
तीक्ष्णश्चैव मदश्चैव राजा भवति सम्मतः ॥ 140 ॥
राजा को अवसर एवं कार्य के अनुसार ही कठोर अथवा कोमल रूप धारण करना चाहिए क्योंकि समयानुकूल चलने वाला राजा ही सबको प्रिय होता है।
अमात्यमुख्यं धर्मज्ञं प्राज्ञं दान्तं कुलोद्भवम् ।
स्थापयेदासने तस्मिन् खिन्नः कार्येक्षणे नृणाम् ॥ 141 ॥
राजा को चाहिए कि अगर रोग आदि किसी भी कारण से वह राज्य के सभी विषयों का निरीक्षण-निर्देशन करने में समर्थ नहीं है तो वह अपनी जगह किसी धर्मात्मा, बुद्धिमान, जितेन्द्रिय तथा कुलीन पुरुष को प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त कर दे।
एवं सर्वं विधायेदमिति कर्तव्यमात्मनः ।
युक्तश्चैवाप्रमत्तश्च परिरक्षेदिमाः प्रजाः ।। 142 ॥
ऊपर बताई विधि से सम्पूर्ण व्यवस्था करके अपने कर्तव्यों का पालन करने वाले राजा को अपनी प्रजा की रक्षा के लिए सदा सावधान तथा संलग्न रहना चाहिए।
विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्राद्धियन्ते दस्युभिः प्रजाः ।
सम्पश्यतः सभृत्यस्य मृतः स न तु जीवति ।। 143 ॥
उस राजा को जीवित रहते हुए भी मृत समझना चाहिए जिस राजा तथा राज्य के अधिकारियों के सामने सहायता के लिए चीखती-चिल्लाती प्रजा डाकुओं द्वारा लूटी जाती है।
क्षत्रियस्य परो धर्मः प्रजानामेव पालनम्।
निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते ॥ 144 ।।
प्रजा का पालन करना ही क्षत्रिय का सबसे महान धर्म है। जो राजा अपने इस धर्म का उचित रूप से पालन करता है वही राज्य के सुखों को भोगने का अधिकारी होता है।
उत्थाय पश्चिमे यामे कृतशौचः समाहितः ।
हुताग्निर्ब्रह्मणांश्चार्च्य प्रविशेत् स शुभां सभाम् ॥ 145 ।।
एक पहर रात्रि के रहते ही राजा को उठ जाना चाहिए फिर शौच आदि से निवृत्त होकर अग्निहोम आदि यज्ञों तथा ब्राह्मणों का पूजन करने के पश्चात् अपनी सुन्दर सभा में प्रवेश करना चाहिए।
तत्र स्थितः प्रजाः सर्वाः प्रतिनिन्द्य विसर्जयेत् ।
विसृज्य च प्रजाः सर्वाः मन्त्रयेत सह मन्त्रिभि ॥ 146 ।।
राजा को सभा में उपस्थित हुए प्रजाजनों के मामले निपटाने चाहिए। इसके बाद सन्तुष्ट प्रजाजनों को विदा देकर अपने मंत्रियों के साथ सलाह करनी चाहिए।
गिरिपृष्ठे समारुह्य प्रासादं वा रहोगतः।
अरण्ये निःशलाके वा मन्त्रयेदविभावतः ।। 147 ।।
राजा को अपने मंत्रियों के साथ किसी ऐसे स्थान पर मन्त्रणा करनी चाहिए जो एकान्त में हो, पर्वत की चोटी पर हो या महल के गुप्त कमरे का कोना हो या पूरी तरह निर्जन वन हो जहां (शत्रुओं के) भेदिए किसी प्रकार पहुंच नहीं सकें।
यस्य मन्त्रं न जानन्ति समागम्य पृथग्जनाः ।
स कृत्स्नां पृथ्वीं भुङ्क्ते कोशहीनोऽपिपार्थिवः ।। 148 ।।
जिस राजा के गोपनीय रहस्यों को शत्रु मिलकर या अलग-अलग रहकर भी नहीं ज्ञात कर पाते, ऐसा राजा कोशहीन होने पर भी सम्पूर्ण पृथ्वी पर शासन करने रकी सामर्थ्य रखता है।
जड मूकान्धबधिरास्तिर्यग्योनान्वयोऽतिगान् । स्त्रीम्लेच्छव्याधितव्यङ्गान्मन्त्रकालेऽपसारयेत् ।। 149 ।।
अपने मंत्रियों के साथ परामर्श करते समय राजा को मूर्ख, अशिक्षित, गूंगे, बहरे, अंधे, लगड़े, बहुत वृद्ध, म्लेच्छ, स्त्री, रोगी, विकृत अंग वाले एवं पालतू पक्षी (जैसे तोता-मैना आदि) को उस स्थान से हटा देना चाहिए क्योंकि ऐसे लोग अपने संकेतों (इशारों) द्वारा राजा की मंत्रणा को प्रकट कर सकते हैं।
भिन्द्यन्त्यवमता मन्त्रं तिर्यग्योनास्तथैव च।
स्त्रियश्चैव विशेषेण तस्मात्तत्रादृतो भवेत् ॥ 150 ॥
मूर्ख, अशिक्षित (जड़ व्यक्ति) गूंगे-बहरे आदि हीन भावना की ग्रंथि से पीड़ित होने के कारण, पक्षी स्वभाव से ही (सुनी बात को रटने वाले) अभ्यस्त होने के कारण मंत्र (मंत्रणा) को प्रकट कर देते हैं। स्त्रियां स्वभाव वश (अस्थिर बुद्धि के कारण) मंत्रणा को प्रकट कर देती हैं। अतः राजा इन सभी को परामर्श स्थल से यत्नपूर्वक हटा दे।
मध्यंदिनेऽर्धरात्रे वा विश्रान्तो विगतक्लमः ।
चिन्तयेद् धर्मकामार्थान् सार्धं तैरेक एव वा ॥ 151 ।।
राजा को शारीरिक और मानसिक थकावट से रहित होकर दिन के मध्य में या अर्धरात्रि में अकेले अथवा मंत्रियों के साथ धर्म, अर्थ तथा काम से सम्बन्धित विषयों पर चिन्तन करना चाहिए।
परस्पर विरुद्धानां तेषां च समुपार्जनम् ।
कन्यानां सम्प्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम् ॥ 152 ॥
यदि मन्त्रियों के धर्म, अर्थ, काम आदि विषयों पर अलग-अलग विचार हों तो राजा को उन विषयों के स्थान पर कन्याओं के विवाह एवं राजकुमारों की सुरक्षा से संबंधित विषयों पर विचार करना चाहिए।
दूतः सम्प्रेषणं चैव कार्यशेषं तथैव च।
अन्तःपुरप्रचारं च प्रणिधीनां च चेष्टितम् ॥ 153 ।।
कृत्स्नं चाष्टविधं कर्म पञ्चवर्गं च तत्त्वतः ।
अनुरागापरागौ च प्रचारं मण्डलस्य च ॥ 154 ।।
राजा को मन्त्रियों के साथ दूसरे राज्यों में दूतों को भेजने, अधूरे कामों को पूरा करने, रनिवास की गतिविधियों, प्रजा के प्रतिनिधियों के व्यवहार तथा मन्त्रिमण्डल के सदस्यों की निष्ठा तथा विरक्ति जैसे आठ प्रकार के कामों तथा तत्व की दृष्टि से पंच वर्गों पर विचार विनिमय करते रहना चाहिए।
टिप्पणी-आठ तथा पांच प्रकृतियों का उल्लेख मनु जी ने नहीं किया है परन्तु अन्यत्र मिलने वाले नाम निम्नलिखित हैं-
आठ कर्म : (1) उपहारों और करों को वसूलना (2) वेतन तथा पुरस्कार
बांटना (3) दुष्टों की संगत छोड़ देना (4) अधिकारियों के मतभेदों को दूर करना (5) किसी प्रकार की बुराई को पनपने से पहले ही नष्ट कर देना। (6) लोकव्यवहार द्वारा जनता के मन को समझना (7) अपराध करने वालों को सजा देना (8) पराजित हो चुके व्यक्तियों, राजाओं, शत्रुओं आदि को प्रायश्चित करने का अवसर देना।
पंच वर्ग (1) कार्य का प्रारम्भ करने का उपाय (2) पुरुष की सम्पत्ति (3) हानि को दूर करना या पूरा करना (4) देश तथा काल का विभाग करना (5) कार्य सिद्ध होना।
मध्यमस्य प्रचारं च विजिगीषोश्च चेष्टितम् ।
उदासीनप्रचारं च शत्रोश्चैव प्रयत्नतः ।। 155 11
एताः प्रकृतयो मूलं मण्डलस्य समासतः ।
अष्टौ चान्याः समाख्याताः द्वादशैव तु ताः स्मृताः ।। 156 ॥
पड़ोसी राजाओं से राजा के चार प्रकार के सम्बन्ध हो सकते हैं-1. अवसरानुकूल व्यवहार करने वाला पड़ोसी राजा अर्थात् मध्यम स्तर के सम्बन्ध 2. मन ही मन विजय की कामना रखने वाला पर ऊपर से मित्र 3. उदासीन अर्थात् न मित्र की तरह व्यवहार करे, न शत्रु की तरह 4. प्रकट रूप से शत्रु जैसा व्यवहार करने वाला पडोसी राजा। मण्डल की ये चार प्रमुख मूल प्रकृतियां हैं। आठ अन्य हैं। राजा का कर्तव्य है कि वह इन पर भी विचार करे।
अमात्य राष्ट्रदगर्थिदण्डाख्याः पञ्चचापराः ।
प्रत्येकं कथितो ह्येता संक्षेपेण द्विसप्ततिः ।। 157 ॥
उपरोक्त के अतिरिक्त पांच प्रकृतियां और हैं- अमात्य (मंत्री या मंत्रिपरिषद), राष्ट्र, दुर्ग, कोश तथा दण्ड। इनमें से हरेक के संक्षेप में 72 उपभेद किए गए हैं।
अनन्तरमरिं विद्यादरिसेविनमेव च।
अरेरनन्तरं मित्रमुदासीनं तयोः परम् ॥ 158 ।।
राजा अपने शत्रु तथा शत्रु के मित्र को सदैव अपने सामने समझते हुए व्यवहार करे। उन्हें अपने से कमजोर अथवा दूर नहीं माने। इसके बाद ही अपने मित्र को अपने निकट समझना चाहिए। इसके पश्चात् उदासीन या तटस्थ (राजा या अधिकारी) को समझना चाहिए।
तान्सर्वानभिसन्दध्यात्सामादिभिरुपक्रमः ।
व्यस्तश्चैव समस्तैश्च पौरुषेण नयेन च ॥ 159 ॥
राजा अपने शत्रु, मित्र और उदासीन आदि को साम-दाम आदि द्वारा वश में करे। राजा को यह स्वतंत्रता है कि वह दूसरों (विरोधियों या शत्रु राजाओं) को अपने नियंत्रण में करने के लिए एक या एक से ज्यादा उपायों का उपयोग करे या नहीं करे।
सन्धिं च विग्रहं चैव यानमासनमेव च।
द्वैधीभावसंश्रयं चैव षड्गुणांश्चिन्तयेत्सदा ॥ 160 ।।
राजा को निम्नलिखित छह गुणों पर सदैव विचार करते रहना चाहिए- (1) दूसरे राजाओं से सन्धि करना (2) विग्रह करना (3) शत्रु पर आक्रमण का अभियान करना। (4) सही समय की प्रतीक्षा में बैठे रहना (5) भीतर से शत्रुता रखते हुए बाहर से मित्रता बनाए रखना। (6) अपने से अधिक शक्तिशाली का सहारा लेकर शत्रु दमन करना।
आसनं चैव यानं च सन्धि विग्रहमेव च।
कार्यंवीक्ष्य प्रयुञ्जीत द्वैधं संश्रयमेव च ॥ 161 ॥
राजा को छह गुणों-आसन, यान, सन्धि, विग्रह, द्वैधीभाव तथा अन्य का सहारा लेना-का उपयोग अवसर के अनुरूप ही करते रहना चाहिए।
सन्धिं तु द्विविधं विद्याद्राजाविग्रहमेव च।
उभे यानासने चैव द्विविधः संश्रयः स्मृतः ।। 162 ।।
सन्धि-विग्रह आदि छह गुणों में द्वैधीभाव को छोड़कर बाकी पांचों के दो-दो भेद किए जाते हैं।
समानयानकर्मा च विपरीतस्तथैव च।
तदा त्वायति संयुक्तः सन्धिर्जेयो द्विलक्षणः ।। 163 ।।
सन्धि के दो भेद हैं-समानयानकर्मा सन्धि तथा असमानयानकर्मा सन्धि। तत्काल लाभ पाने के लिए अथवा भविष्य में लाभ पाने के उद्देश्य से किसी दूसरे राजा से मिलकर यान करना (शत्रु पर आक्रमण करना) समानयानकर्मा सन्धि है। जब दो राजा भिन्न-भिन्न राजाओं पर एक ही समय या आगे-पीछे से आक्रमण करते हैं तो वह असमानयानकर्मा सन्धि कहलाती है।
स्वयंकृतश्च कार्यार्थमकाल काल एव वा ।
मित्रस्य चैवमपकृतं द्विविधो विग्रहः स्मृतः ॥ 164 ॥
विग्रह के दो प्रकार हैं। पहले प्रकार का विग्रह वह है जिसमें अपना प्रतिशोध लेने के लिए शत्रु के व्यसन आदि को जानकर उपयुक्त या अनुपयुक्त काल में युद्ध करना। दूसरे प्रकार का विग्रह वह है जिसमें अपने मित्र के अपमान का बदला लेने के लिए या उसके द्वारा किए गए उपकार को चुकाने के लिए अथवा उस पर हुए आक्रमण से उसकी रक्षा के लिए शत्रु से युद्ध किया जाता है।
एकाकिनश्चात्वयिके कार्ये प्राप्ते यदृच्छया।
संहतस्य च मित्रेण द्विविधं यानमुच्यते ।। 165 ।।
यान (शत्रु पर चढ़ाई करना) के दो भेद हैं। प्रथम, संयोगवश या आवश्यकता के वश अकेले ही शत्रु पर आक्रमण कर देना। द्वितीय, मित्र के साथ मिलकर योजना बनाना और उसके अनुसार शत्रु पर आक्रमण कर देना।
क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम् ॥ 166 ।।
आसन (अर्थात् शांत बैठे रहना) के दो प्रकार हैं। पहला इस जन्म में की गई गलतियों या पूर्व जन्म के पापों के कारण अथवा दुर्भाग्य के कारण शक्ति कमजोर हो जाने से चुप बैठे रहना। द्वितीय, मित्र की बात या वचन का आदर करने के कारण युद्ध न कर शांत रहना।
बलस्य स्वामिनश्चैव स्थितिः कार्यार्थसिद्धये।
द्विविधं कीर्त्यते द्वैधं षाड्गुण्यगुणवेदिभि ।। 167 ॥
राजनीति के विद्वान जो षटगणों के जानकार हैं, द्वैध के दो प्रकार बताते हैं। अपनी कार्य सिद्धि हेत सेना के एक भाग को एक स्थान पर रखना प्रथम दैध तथा शेष सेना के दूसरे भाग के साथ राजा का स्वयं दर्ग में रहना दूसरा द्वैध कहलाता है।
अर्थ सम्पादनार्थं च पीड्यमानस्य शत्रुभिः ।
साधुषुव्यपदेशार्थं द्विविधः संश्रयः स्मृतः ॥ 168 ॥
संश्रय (किसी का आश्रय लेना) दो प्रकार का होता है- (1) शत्रु से पीड़ित राजा द्वारा विशेष प्रयोजन को पूरा करने हेतु किसी बलवान की शरण में जाना। (2) - भविष्य में शत्रु से पीड़ा मिलने की आशंका से आत्मरक्षार्थ बलवान राजा का आश्रय लेना।
यदावगच्छेदायत्यामाधिक्यं ध्रुवमात्मनः ।
तदा त्वेचाल्पिकां पीडां तदा सन्धिं समाश्रयेत् ।। 169 ॥
भविष्य में निश्चित रूप से होने वाली अपनी बढ़ोत्तरी को देख कर वर्तमान में थोड़ी-बहुत पीड़ा सहने पर भी सन्धि कर लेनी चाहिए।
यदा प्रहृष्टा मन्येत सर्वांस्तु प्रकृतीः भृशम् ।
अत्युच्छ्रितं तथात्मानं तदा कुर्वीत विग्रहम् ॥ 170 ।।
राजा अपने अमात्य, कोश एवं प्रजा आदि को सन्तुष्ट तथा पूर्णतः अपने अनुकूल देखने पर तथा सभी प्रकार से अपनी उन्नति को देखने पर ही शत्रु पर आक्रमण करने के लिए चल दे।
यदा मन्येत भावेन हृष्टं पुष्टं बलं स्वकम्।
परस्य विपरीतं च तदा यायाद्रिपुं प्रति ॥ 171 ।।
जब राजा अपनी सेना आदि को बलवती तथा शत्रु की सेना आदि को इसके विपरीत अर्थात् कमजोर समझे तो उस पर चढ़ाई कर दे।
यदा तु स्यात्परिक्षीणो वाहनेन बलेन वा।
तदा सीत्प्रयत्नेन शनकैः सान्त्वयन्नरीन् ॥ 172 ।।
अपनी सेना तथा वाहन को कमजोर अनुभव करने पर राजा को अपने शत्रुओं को बहकाते रहना तथा शांत करते रहना चाहिए और सही अवसर की प्रतीक्षा में शांत बैठे रहना चाहिए।
मन्येतारिं यदा राजा सर्वथा बलवत्तरम्।
तदा द्विधा बलं कृत्वा साधयेत्कार्यमात्मनः ।। 173 ॥
राजा जब शत्रु को अपने से अधिक शक्तिशाली देखे तब द्विधा भाव को अपनाए। अपनी सेना के एक भाग को गुप्त रूप से युद्ध की तैयारियां करने में लगा दे तथा दूसरे भाग को प्रदर्शन हेतु सामान्य कार्यों को करने में लगाए।
यदा परबलानां तु गमनायतमा भवेत् ।
तदा तु संश्रयेत्क्षिप्रं धार्मिकं बलिनं नृपम् ॥ 174 ॥
आक्रमणकारी शत्रु राजा की शक्ति अगर प्रचण्ड तथा दर्जय हो तो उससे भी अधिक शक्तिशाली एवं धर्मात्मा राजा का संश्रय अर्थात आश्रय लेना चाहिए।
निग्रहं प्रकृतानां च कुर्याद्योऽरिबलस्य च।
उपसेवेत तं नित्यं सर्वयत्नैर्गुरुं यथा ॥ 175 ।।
राजा का जो मित्र उसके शत्रु पर अंकुश रखने वाला तथा प्रजा को संतुष्ट करने वाला हो, उसका गुरु के तुल्य आदर-सत्कार करना चाहिए।
यदि तत्रापि सम्पश्येद्दोषं संश्रयकारितम्।
सुयुद्धमेव तत्रापि निर्विशङ्कः समाचरेत् ॥ 176 ।।
यदि आश्रय लेने वाले राजा के मन में दुर्भाव आया देखे तो उसके साथ बिना किसी शंका के युद्ध छेड़ देना चाहिए।
सर्वोपायैस्तथाकुर्यान्नीतिज्ञः पृथिवीपतिः ।
यथास्याभ्यधिकाः न स्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ।। 177 ।।
नीति में निपुण राजा को साम-दाम आदि उपायों का उपयोग इस भांति करना चाहिए कि उसके शत्रु, मित्र तथा उदासीन राजा के प्रभावों में वृद्धि नहीं हो सके।
आयतिं सर्वकार्याणं तदात्व विचारयेत्।
अतीतानां च सर्वेषं गुणदोषाः न तत्त्वतः ।। 178 ॥
भूतकाल में और वर्तमान में किए जाने वाले समस्त कार्यों को तात्विक दृष्टि से देखकर राजा को उनके गुण-दोषों पर विचार करना चाहिए। उसे अपनी असफलता से शिक्षा ग्रहण कर दोषों को दूर करना चाहिए।
आयत्या गुणदोषज्ञास्तदात्वे क्षिप्रनिश्चयः ।
अतीते कार्ये शेषज्ञः शत्रुभिर्नाभिभूयते ।। 179 ॥
जो कुशल राजा भविष्य में किए जाने वाले कार्यों के गुण-दोषों को ज्ञात कर दोषों को दूर करने वाला तथा गुणों को शीघ्र ग्रहण करने का निश्चय करता है और पिछली असफलताओं से शिक्षा लेने वाला होता है वह शत्रुओं से कभी पराजित नहीं होता।
यथैनं नाभिसन्दध्युमित्रोदासीनशत्रवः ।
तथा सर्वं संविदध्या देव सामासिको नृपः ।। 180 ।।
निपुण राजा की राजनीति की सफलता का सार इसी में है कि वह ऐसे काम करे जिससे मित्र, शत्रु तथा उदासीन राजा उसे दबाने में सफल नहीं हों।
यदा तु यानमातिष्ठेदरिराष्ट्र प्रति प्रभुः ।
तदाऽनेन विधानेन यायादरिपुरं शनैः ।। 181 ।।
जो राजा शत्रु राष्ट्र पर आक्रमण करने की कामना रखता है उसे शत्रु के नगर में आगे बताए विधान के अनुसार ही धैर्य धारण कर धीरे-धीरे आगे जाना चाहिए।
मार्गशीर्षे शुभे मासि यायाद्यात्रां महीपतिः ।
फाल्गुनं वाऽथ चैत्रं वा मासो प्रति यथाबलम् ॥ 182 ॥
अगहन, फाल्गुन या चैत्र इन महीनों में से जिस माह अपनी सेना की युद्ध करने की शक्ति बढ़ जाती हो, राजा को उसी माह शुभ मुहूर्त निकलवा कर शत्रु राजा के विरुद्ध अभियान शुरू कर देना चाहिए।
अन्येष्वपि तु कालेषु यदा पश्येद् ध्रुवं जयम् ।
तदा यायाद्विगृहौव व्यसने योत्थिते रिपोः ।। 183 ।।
इन तीन-चार माहों के अलावा भी जिस समय अपनी विजय निश्चित मालूम पड़ती हो या शत्रु द्वारा छेड़खानी की जा रही हो या अपना मन युद्ध के लिए उतावला हो रहा हो तो ऐसी स्थितियों में भी राजा को युद्ध शुरू कर देना चाहिए।
कृत्वा विधान मूले तु यात्रिकं च यथाविधिः ।
उपग्रह्यास्पदं चैव चारान्सम्यग्विधाय च ॥ 184 ॥
संशोध्य त्रिविधं मार्ग षड्विधं च बलं स्वकम् । साम्परायिककल्पेन यायादरिपुरं शनैः ।। 185 ।।
राज्य तथा दुर्ग की रक्षा करने की व्यवस्था करने के बाद राजा को यात्रा की ठीक-ठीक तथा पूरी तैयारी करके अपने दूतों को शत्रुपक्ष की जानकारी के लिए नियुक्त करना चाहिए।
इसके बाद तीनों प्रकार की सेनाओं- जल, स्थल तथा आकाश के मागाँ की सही जानकारी प्राप्त करके अपने छह प्रकार के आगे बताए बलों को लेकर युद्ध करने के लिए (विधि व्यूह आदि की रचना से) शत्रु के नगर की ओर प्रस्थान करना चाहिए।
टिप्पणी-कुछ विद्वानों के अनुसार छह प्रकार के बल निम्नलिखित हैं:-
1. हाथियों की सेना-ऐसी सेना जो हाथियों पर बैठकर युद्ध करती है (गजारोही)।
2. घोड़ों पर बैठकर युद्ध करने वाली सेना (अश्वारोही)।
3. रथों पर बैठकर युद्ध में आगे बढ़कर लड़ने वाली सेना (रथारोही)।
4. पैदल चलकर या दौड़कर युद्ध करने वाली सेना (पदाति)।
5. कोश अर्थात् धन का खजाना जिससे सैनिकों को वेतन, पुरस्कार आदि तथा आवश्यक अस्त्र-शस्त्र खरीदकर तत्काल दिए जा सकें।
6. सेवकों का दल जो आवश्यक सामग्री ले जा सके (सेवक)।
शत्रुसेविनि मित्रे वा गूढे युक्ततरो भवेत्।
गतप्रत्यागते चैव स हि कष्टतरो रिपुः ।। 186 ।।
ऐसे मित्र से जो गुप्त रूप से शत्रु का हित करने के बारे में विचार करता हो तथा ऐसे सेवक या अधिकारी से जिसे एक बार सेवा से निकाल कर पुनः नियुक्त किया हो, बहुत अधिक सावधान रहना चाहिए क्योंकि ये दोनों गुप्त रूप से शत्रु बन जाने पर अत्यधिक हानि करने तथा कष्ट देने वाले होते हैं।
दण्डव्यूहेन तन्मार्ग यायात्तु शकटेन वा।
वाराहमकराभ्यां वा सूच्या वा गरुडेन वा ।। 187 ।।
यतश्च भयमाशङ्केत्ततो विस्तारयेद् बलम् ।
पद्येन चैव व्यूहेन निविशेत सदा स्वयम् ॥ 188 ।।
राजा को युद्ध के लिए जाते समय अपनी सेना को आवश्यकतानुसार दण्ड व्यूह, शकट व्यूह, पद्म व्यूह, वराह व्यूह, मकर व्यूह, सूची व्यूह तथा गरुड़ व्यूह के रूप में बनाकर आगे बढ़ना चाहिए।
जहां से भय की अधिक आशंका हो, उसी ओर ही अपनी सेना को फैला देना चाहिए। अपने को पूर्ण सुरक्षित रखने के लिए राजा सदा पद्म व्यूह में रहे।
टिप्पणी - सेना का संगठन और आकार जिस वस्तु या जीव के आकार का होता है उसी के नाम पर व्यूह का नाम रखा जाता है।
सेनापतिबलाध्यक्षौ सर्वदिक्षु निवेशयेत् ।
यतश्च भयमाशङ्केत प्राचीं तां कल्पयेद् दिशम् ।। 189 ||
राजा को चाहिए कि वह अपने चारों ओर सेनापति और सेना के नायकों को रखे। उसे जिस दिशा से सबसे अधिक भय की आशंका हो, उसे पूर्व दिशा माने।
टिप्पणी-कहने का आशय यह है कि जिस तरह सभी धार्मिक कार्य पूर्व की ओर मुख करके किए जाते हैं, उसी तरह सबसे अधिक डर की शंका जिस दिशा से हो राजा अपना समस्त ध्यान उसी दिशा की ओर केन्द्रित करे।
गुल्मांश्च स्थापयेदाप्तान् कृतसंज्ञान् समन्ततः ।
स्थानेयुद्धे च कुशलानभीरूनऽविकारिणः ।। 190 ।।
राजा को युद्धस्थल में अपने चारों ओर ऐसे सहायकों को नियुक्त करना चाहिए जो सेना के स्तम्भ रूप (सेना के सर्वश्रेष्ठ योद्धा), प्रामाणिक (युद्ध का अनभव रखने वाले), यद्ध में कशल तथा कभी धोखा नहीं देने वाला हो।
संहतान्योधयेदल्पान्कामं विस्तारयेद् बहून् ।
सूच्या वज्रेण चैवैतान् व्यूहेन व्यूह्य योधयेत् ।। 191 ।।
राजा को थोड़ी संख्या के योद्धा सैनिकों को संगठित करके या उन्हें अलग-अलग फैलाकर युद्ध करना चाहिए। इसके अलावा राजा आवश्यकतानुसार सूची (सुई) या वज्र के आकार का व्यूह बनाकर भी सैनिकों से युद्ध करवा सकता है।
स्यन्दनाश्वैः समे युध्येदनूपे नौद्विपैस्तथा।
वृक्षगुल्मावृते चापैरसि-चर्मायुधैः स्थले । 192 ।।
रथों तथा घोड़ों पर सवार होकर समतल धरती पर, जल पर हाथियों तथा नावों पर सवार होकर, पेड़ों तथा लताओं से ढकी धरती पर धनुष बाणों द्वारा एवं कांटों आदि से हीन पृथ्वी पर खङ्गों चमड़ों के शस्त्रों (जैसे चाबक आदि) से युद्ध करना चाहिए।
कुरुक्षेत्रांश्च मत्स्यांश्च पञ्चालान्शूरसेनजान्।
दीर्घाल्लघूंश्चैव नरानग्रनीकेषु योजयेत् ।। 193 ।।
सेना के सामने वाले अर्थात् अग्र भाग में कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पंचाल तथा शूरसेन देशों के सैनिकों तथा आवश्यकता से अधिक लंबे और नाटे सैनिकों को रखना चाहिए ये रण कर्कश वीर होने के कारण शत्रु को पराजित कर सकते हैं।
प्रहर्षयेद् बलं व्यूह्य तांश्चसम्यक् परीक्षयेत्।
चेष्टांश्चैव विजानीयादरीन योधयतामपि ॥ 194 ||
सेना की व्यूह रचना करने के बाद राजा' को उसे खूब उत्साहित करना चाहिए। राजा को चाहिए कि वह सैनिकों के मनोभावों पर तथा शत्रु से लड़ते समय उनकी चेष्टाओं पर पैनी दृष्टि रखे।
उपरुध्यारिमासीत् राष्ट्र चास्योपपीडयेत्।
दूषयेच्चास्य सततं यवसान्नोदकेन्धनम् ।। 195 ॥
भिन्द्याच्चैव तडागानि प्राकारपरिखास्तथा।
समवस्कन्दयेच्चैनं रात्रौ वित्रासयेत्तथा ।। 196 ।।
आक्रमण करने वाले राजा को चाहिए कि वह शत्रु को घेर कर उसके राज्य को नष्ट कर दे और उसके पशुओं के भोजन (घास, भूसा आदि), अन्न-जल तथा ईंधन के स्रोतों को तोड़ दे।
शत्रु राज्य के सरोवरों, दुर्ग की प्राचीरों एवं खाइयों को छिन्न-भिन्न कर दे। शत्रु को रात्रि में ही घेरकर उसे कमजोर करके उसका मनोबल गिरा देना चाहिए।
उपजप्यानुपजपेद् बुध्येतैव च तत्कृतम् ।
युक्ते च दैवे युध्येत जयप्रेप्सुरपीतभीः ।। 197 ।।
शत्रु पक्ष के जो मंत्री आदि फोड़े जा सकते हैं, उन्हें राजा को उनकी दुर्बलताओं का लाभ उठा कर अपनी ओर कर लेना चाहिए और उनके द्वारा शत्रु की योजना का ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए। इसके पश्चात् विजय की कामना से भाग्य को अनुकूल देख युद्ध प्रारम्भ कर देना चाहिए।
साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक् ।
विजेतुः प्रयतेतारीन्न यद्धेन कदाचन ।। 198 ॥
विजय कामना रखने वाले राजा को साम, दाम तथा भेद इन तीनों के द्वारा अथवा इनमें से किसी एक के द्वारा शत्रु को अपने अनुकूल बनाने की चेष्टा करनी चाहिए। इन तीनों के असफल होने पर ही यद्ध करना चाहिए. अचानक नहीं।
अनित्यो विजयो यस्माद् दृश्यते युध्यमानयोः ।
पराजयश्च संग्रामे तस्माद युद्धं विवर्जयेत ।। 199 ।।
युद्ध करने वाले दोनों पक्षों के राजाओं की जीत-हार सदा अनिश्चित तथा अनित्य रहती है। अतः राजा को जहां तक सम्भव हो युद्ध का पूरी तरह त्याग करना चाहिए।
त्रयाणामप्युपायानां पूर्वोक्तानामसम्भवे।
ततो युध्येत सम्पन्नो विजयेत रिपून्यथा ॥ 200 ॥।
पहले बताए तीनों उपायों (साम, दाम तथा भेद) के सफल नहीं होने पर ही राजा को पूरी तैयारी करके शत्रु पर इस तरह आक्रमण करना चाहिए कि उसे निश्चित रूप से विजय प्राप्त हो।
जित्वा सम्पूजयेद्देवान्ब्राह्मणांश्चैव धार्मिकान् ।
प्रदद्यात्परिहारांश्च स्थापयेदभयानि च ।। 201 ।।
राजा द्वारा शत्रु पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद उसे देवताओं तथा धर्मात्मा ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए। युद्ध से प्रजा के जिन लोगों की अन्न-धन एवं जल की हानि हुई हो, उसकी पूर्ति करनी चाहिए तथा प्रजा को अभय का विश्वास देना चाहिए।
सर्वेषां तु विदित्वेषां समासेन चिकीर्षितम् ।
स्थापयेत्तत्र तद् वश्यं कुर्याच्च समयक्रियाम् ।। 202 ।।
विजयी राजा को चाहिए कि वह पराजित राजा तथा उसके मंत्रियों के मनोरथ को जानकर, पराजित हुए राजा या उसके वंश में जन्मे योग्य पुरुष को राजगद्दी पर बैठा दे। वह पराजित राज्य में जो नियम, कानून, निषेध आदि प्रचलित हों उन पर स्वीकृति की घोषणा करवा दे।
प्रमाणानि च कुर्वीत तेषां धर्मान्यथोदितान्।
रत्नैश्च पजयेटेनं प्रधानपरुषैः सह ।। 203 ।।
विजेता राजा को चाहिए कि वह युद्ध में हारे हुए राजा के राज्य में जो धर्माचार प्रचलित हों उनकी मान्यता की घोषणा करवा दे। राजा अपने प्रमुख मंत्रियों के साथ पराजित राजा को राज्य पर अभिषिक्त कर उसे रत्न आदि भेंट में प्रदान करे।
आदानमप्रियकरं दानं च प्रियकारकम् ।
अभीप्सितानामर्थानां काले युक्तं प्रशस्यते ।। 204 ।।
अपनी अभिलाषा के पदार्थों को जब कोई दूसरा व्यक्ति लेता है तो वह अच्छा नहीं लगता जबकि किसी के द्वारा ऐसे पदार्थों का दिया जाना रुचिकर प्रतीत होता है तथापि विशेष अवसर पर प्रिय-अप्रिय के बारे में विचार किए बिना ऐसा लेन-देन करने को विवश होना पड़ता है।
सर्वं कर्म दैवायत्तं विधाने दैव मानुषे।
तयोर्दैवमचिन्त्यं तु मानुषे विद्यते क्रिया ॥ 205 ।।
इस जगत में समस्त कार्य दैव तथा मनुष्य के अधीन हैं। दैव पर किसी का वश नहीं चलता परन्तु मनुष्य तो कर्म करने में स्वतंत्र है।
टिप्पणी- आशय यह है कि मनुष्य को फल की चिन्ता किए बिना अपने विवेक के अनुसार कर्म अवश्य करना चाहिए।
सह वापि व्रजेद्युक्तः सन्धिं कृत्वा प्रयत्नतः ।
मित्रं भूमिं हिरण्यं वा सम्पश्यंस्त्रिविधं फलम् ।। 206 ॥
विजेता राजा को चाहिए कि वह हारे हुए राजा से ऊपरी मित्रता करके या उसके राज्य की कुछ भूमि पर अधिकार करके अथवा उससे सोना आदि मूल्यवान वस्तुएं लेकर उससे सन्धि कर ले और प्रयत्न करके वहां से चल दे क्योंकि शत्रु पर आक्रमण करने के यही तीन लक्ष्य होते हैं।
पाणिग्राहं च सम्प्रेक्ष्य तथाक्रन्दं च मण्डले।
मित्रादथाप्यमित्राद्वा यात्राफलमवाप्नुयात् ।। 207 ॥
रात्रु राजा का जातकर विजेता राजा तथा उसके सहायक को पराजित राजा से यात्रा का फल (मित्रता, सोना, बहुमूल्य वस्तुएं तथा भूमि) प्राप्त करना चाहिए।
हिरण्यभूमिंसम्प्राप्त्या पार्थिवो न तथैधते ।
यथा मित्रं ध्रुवं लब्ध्वा कृशमप्यायाति क्षमम् ।। 208 ।।
किसी से सोना अथवा भूमि लेकर राजा उतना शक्तिशाली नहीं बनता, जितना किसी की मित्रता प्राप्त कर बनता है। दुर्बल राजा भी मित्रता से बलवान बन जाता है।
धर्मज्ञं च कृतज्ञं च तुष्टप्रकृतिमेव च।
अनुरक्तस्थिरारम्भं लघु मित्रं प्रशस्यते ॥ 209 ।।
मित्र वह अच्छा होता है जो धर्मात्मा हो, कृतज्ञता अनुभव करने वाला हो, संतोषी स्वभाव का हो, स्थिर कार्य का आरम्भ करने वाला हो तथा अपने से छोटा हो।
प्राज्ञं कुलीनं शूरं च दक्षं दातारमेव च।
कृतज्ञं धृतिमन्तं च कष्टमाहरि बुधाः ॥ 210 ॥
विद्वान लोगों के अनुसार ऐसे शत्रु पर विजय पाना कठिन होता है जो बुद्धिमान, कुलीन, शूरवीर, चतुर, दान देने वाला, धैर्य रखने वाला तथा कृतज्ञता अनुभव करने वाला हो। आशय यह कि ऐसे शत्रु से मित्रता कर लेनी चाहिए।
आर्यता पुरुषज्ञानं शौर्य करुणवेदिता।
स्थौललक्ष्यं च सततमुदासीन गुणोदयः ।। 211 ॥
उदासीनता के गुण उदय होने के लक्षण हैं- सभ्यता, मनुष्यत्व की पहचान, वीरता, कृपालुता, स्थूल बातों पर ऊपरी रूप से लक्ष्य रखना।
क्षेम्यां सस्यप्रदां नित्यां पशुवृद्धिकरीमपि।
परित्यजेन्नृपो भूमिमात्मार्थमविचारयन् ।। 212 ।।
राजा को आत्मकल्याण के लिए बिना अधिक विचार किए कल्याणकारी, धन-धान्य से संपन्न, हरी-भरी तथा पशुओं की वृद्धि करने वाली भूमि तक त्याग देनी चाहिए।
आपदर्थेधनं रक्षेद्दारान् रक्षेद् धनैरपि।
आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ।। 213 ।।
आपत्ति या संकट से अपनी रक्षा करने के लिए धन का संचय करना चाहिए लेकिन स्त्रियों की रक्षा करने के लिए उस धन का व्यय करने में भी हिचकिचाना नहीं चाहिए लेकिन जब अपने पर संकट या आपत्ति आए तो धन और स्त्रियों दोनों का उपयोग अपनी रक्षा हेतु करना चाहिए।
सह सर्वाः समुत्पन्नाः प्रसभमीक्ष्यापदोभृशम् ।
ससंयुक्तांश्च वियुक्तांश्च सर्वोपायान्सृजेद् बुधः ॥ 214 ॥
एक साथ अनेक आपत्तियों को उत्पन्न देखकर बुद्धिमान राजा को साम, दाम आदि उपायों को अलग-अलग अथवा सभी उपायों का एक साथ उपयोग करना चाहिए।
उपेतारमुपेयं च सर्वेपायांश्च कृत्स्नशः ।
एतत्त्रयं समाश्रित्य प्रयतेतार्थसिद्धये ॥ 215 ॥
राजा को अपने तथा उपाय करने योग्य एवं परिपूर्ण साम-दाम आदि सभी उपायों, इन तीनों का अवलम्बन लेकर प्रयोजन को सिद्ध करने हेतु प्रयास करना चाहिए।
एवं सर्वमिदं राजा सह सम्मन्त्र्य मन्त्रिभिः ।
व्यायामाप्लुतमध्याह्ने भोक्तुमन्तःपुरं विशेत् ॥ 216 ॥
इस तरह मंत्रियों से सभी विषयों पर विचार विनिमय करने के बाद राजा को स्नान करके व्यायाम करना चाहिए तथा मध्याह्न के समय भोजन करने हेतु अन्तःपुर में जाना चाहिए।
तत्रात्मभूतैः कालज्ञैरहार्यैः परिचारकैः । सुपरीक्षितमन्नाद्यमद्यान्मन्त्रैर्विषापहैः II 217 II
राजा को अपने अन्तःपुर (रनिवास) में पूरी तरह विश्वसनीय, समय की जानकारी रखने वाले, पूरी तरह परीक्षा लिए गए (कि वह किसी भी प्रकार राजा के साथ विश्वासघात नहीं करेंगे) सेवकों की उपस्थिति में सभी तरह के विषों का शमन करने वाले मंत्रों से शुद्ध किए हुए भोजन को ग्रहण करना चाहिए।
विषघ्नैरगदैश्चास्य सर्वद्रव्याणि योजयेत्।
विषघ्नानि च रत्नानि नियतो धारयेत्सदा ॥ 218 ।।
विष का नाश करने वाली औषधियों को राजा द्वारा खाए जाने वाले खाद्य पदार्थों में डालते रहना चाहिए। इसके साथ ही राजा को विष का नाश करने वाले रत्नों को भी सावधानीपूर्वक पहने रहना चाहिए।
परीक्षिताः स्त्रियश्चैनं व्यजनोदकधूपनैः ।
वेषाभरणसंशुद्धाः स्पृशेयुः सुसमाहिताः ।। 219 ।।
राजा को अन्तःपुर में पंखा झलने वाली, जल देने वाली तथा धूप-गन्ध आदि देकर सेवा करने वाली स्त्रियां जहां देखने में सुन्दर हों वहीं सुन्दर वेशभूषा वाली, चतुर, ईमानदार तथा भली-भांति परीक्षित होनी चाहिए।
एवं प्रयत्नं कुर्वीत यानशय्यासनाशने।
स्नाने प्रसाधने चैव सर्वालङ्कारकेषु च ॥ 220 ।।
राजा को चाहिए कि वह ऐसी व्यवस्था करे कि उसके द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले यान (सवारी), शय्या, आसन, भोजन, प्रसाधन, अलंकरण अर्थात् उसके द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली समस्त वस्तुएं इसी प्रकार परीक्षित हों। इस कार्य के लिए भी राजा विश्वसनीय तथा भली प्रकार परीक्षित कर्मचारी नियुक्त करे।
भुक्तवान् विहरेच्चैव स्त्रीभिरन्तः पुरे सह।
विहृत्य तु यथाकल्पं पुनः कार्याणि चिन्तयेत् ॥ 221 ।।
भोजन करने के बाद राजा अन्तः पुर में ही विश्वस्त तथा सुन्दर स्त्रियों के साथ विहार (मनोरंजन आदि) करे और पुनः राजसभा में आकर विचार करने योग्य विषयों पर विचार करे।
अलंकृतश्च सम्पश्येदायुधीयं पुनर्जनम् ।
वाहनानि च सर्वाणि शस्त्राण्याभरणानि च ।। 222 ।।
वस्त्रों तथा आभूषणों से सुसज्जित होकर राजा राजसभा आकर शत्रु से जीते गए शस्त्रों, सैनिकों, समस्त वाहनों, अस्त्र-शस्त्रों तथा आभूषणों का निरीक्षण करे।
सन्ध्यां चोपास्य शृणुयादन्तर्वेश्मनि शस्त्रभृत्।
रहस्याख्यायिनां चैव प्रणिधीनां च चेष्टितम् ।। 223 ॥
सायं की संध्योपासना करने के बाद महल के गुप्त कक्ष में शस्त्र धारण किए हुए राजा गुप्तचरों की बातों तथा सूचनाओं आदि को सुने।
गत्वा कक्षान्तरं त्वन्यत्समनुज्ञाय तं जनम्।
प्रविशेद्भोजनार्थं च स्त्रीवृत्तोऽन्तःपुरं पुनः ।। 224 ।।
राजा गुप्तचरों को विदा देकर दूसरे कक्ष (कमरे) में चला जाए तथा वहां से अंतःपुर की स्त्रियों के साथ भोजन करने के लिए अंतःपुर में जाए।
तत्र भुक्त्वा पुनः किञ्चित्तूर्यघोषैः प्रहर्षितः ।
संविशेत्तु यथाकालमुत्तिष्ठेच्च गतक्लमः ।। 225 ।।
अंतःपुर में भोजन ग्रहण करने के पश्चात् कुछ समय गाना-बजाना सुने और फिर थकान दूर कर शयनकक्ष में चला जाए।
एतद् विधानमातिष्ठेदरोगः पृथिवीपतिः ।
अस्वस्थः सर्वमेतत् भत्येषु विनियोजयेत् ॥ 226 ।।
स्वस्थ होने पर राजा को ऊपर बताए सभी कार्य स्वयं करने चाहिए तथा अस्वस्थ होने पर इन कार्यों को विश्वस्त सेवकों से करवाना चाहिए।
॥ मनुस्मृति सप्तम अध्याय सम्पूर्ण॥
Manusmriti Chapter 6
kathaShrijirasik
।।मनुस्मृति षष्ठ अध्याय।।
एवं गृहाश्रमे स्थित्वा विधिवत्स्नातको द्विजः ।
वने वसेत्तु नियतो यथावद्विजितेन्द्रियः ॥ 1 ॥
अपनी विद्या पूरी करके घर लौटने वाले स्नातक द्विज को गृहस्थाश्रम में रहने (25 से 50 वर्ष तक) के बाद वन में जाकर निवास करना चाहिए तथा अपनी इन्द्रियों पर विजय पाने के नियमों का पालन करना चाहिए।
गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वालीपलितमात्मनः ।
अपत्यस्यैव चापत्त्यं तदाऽऽरण्यं समाश्रयेत् ।।
गृहस्थ पुरुष जब अपनी त्वचा को ढीला, बालों को पका हुआ और सफेद देखे तथा अपनी सन्तान की सन्तान को देख ले तब उसे वन में चला जाना चाहिए।
सन्त्यज्य ग्राम्यमाहारं सर्वं चैव परिच्छदम् ।
पुत्रेषु भार्या निक्षिप्य वनं गच्छेत्सहैव वा ॥3॥
ऊपर के श्लोक में बताई गई स्थिति को देखकर गृहस्थ पुरुष को गांव में खाए जाने वाले भोजन (पौष्टिक तथा राजसी भोजन) को, सभी तरह के राजसी वस्त्रों को (घोड़ा, रथ, शय्या, गाय, भैंस आदि) सुविधाप्रद साधनों को त्याग कर तथा अपनी पत्नी को पुत्र को सौंप कर या उसे साथ लेकर वन को चले जाना चाहिए।
अग्निहोत्रं समादायं गृह्यं चाग्निपरिच्छदम् ।
ग्रामादरण्यं निःसृत्य निवसेन्नियतेन्द्रियः ॥4॥
यज्ञ-यागादि के लिए आवश्यक पात्रों को तथा वन के योग्य वस्त्रों को लेकर गांव-नगर से निकल कर जंगल में चले जाना चाहिए तथा वहां अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखते हुए निवास करना चाहिए।
मुन्यन्नैर्विविधैर्मेध्यैः शाकमूलफलेन वा।
एतानेव महायज्ञान्निर्वपेद्विधिपूर्वकम् ॥ 5 ॥
वानप्रस्थ बने व्यक्ति को वन में जाकर ऋषि-मुनियों द्वारा यज्ञ-यागादि में उपयोग किए जाने वाले अनेक प्रकार के अन्नों, शाकों, कन्द-मूल फलों से बडे-बड़े यज्ञों का विधि अनुसार अनुष्ठान करना चाहिए।
वसीत चर्म चीरं वा सायं स्नायात्प्रगे तथा।
जटाश्च बिभृयान्नित्यं श्मश्रुलोम नखानि च ॥6॥
वन में रहने वाले व्यक्ति को हिरण का चर्म या वृक्षों की छाल पहनकर रहना चाहिए। उसे प्रातःकाल तथा सायंकाल स्नान करना चाहिए। उसे अपनी दाढ़ी, मूंछ, बाल तथा नाखून कटवाने नहीं चाहिए।
यद्भक्षः स्यात्ततो दद्याद् बलिंभिक्षां च शक्तितः । अम्मूलफलाभिक्षाभिरर्चयेदाश्रमागतान् ।।7॥
सरलता से प्राप्त भोजन सामग्री में से बलि (गाय, कुत्ता, कौआ आदि पंच वैश्वदेव) और भिखारी को भिक्षा देनी चाहिए। उसे आश्रम में आए अतिथियों का जल, कन्द-मूल फल और भिक्षा में प्राप्त अन्न से स्वागत करना चाहिए।
स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद्दान्तौ मैत्रः समाहितः ।
दाता नित्यमनादाता सर्वभूतानुकम्पकः ॥ 8 ॥
वानप्रस्थ धारण करने वाले व्यक्ति को नित्य स्वाध्याय, इन्द्रिय दमन, दूसरों का उपकार तथा सभी के लिए मित्रता का भाव रखना चाहिए। उसमें दानशीलता, अपरिग्रह तथा सभी जीवों के प्रति दया होनी चाहिए।
वैतानिकं च जुहुयादग्निहोत्रं यथाविधिः ।
दर्शमस्कन्दयन्पर्व पौर्णमासं च योगतः ॥ 9 ॥
वानप्रस्थ को वैतानिक (गार्हपत्य कुण्ड की अग्नि को आवहनीय दक्षिणाग्नि में मिलाने वाला) बन कर विधि अनुसार अग्निहोत्र करना चाहिए तथा समय-समय पर आने वाले दर्श पौर्णमास यज्ञों को करना चाहिए।
दर्शष्ट्याग्रयणं चैव चातुर्मास्यानि चाहरेत् ।
उत्तरायणं च क्रमशो दाक्षस्यायनमेव च ॥ 10 ॥
वानप्रस्थ बने व्यक्ति को विशेष नक्षत्रों से सम्बद्ध, चातुर्मास में किए जाने वाले, उत्तरायण और दक्षिणायन में किए जाने वाले यज्ञों का सम्पादन करना चाहिए।
वासन्तशारदैर्मेध्यैर्मुन्यन्नैः स्वयमाहृतैः ।
पुरोडाशांश्चरूंश्चैव विधिवन्निर्वपेत्पृथक् ॥ 11 ॥
वानप्रस्थ को अपने हाथ से लाए अन्न तथा मुनियों द्वारा सेवन किए जाने वाले अन्नों से पुरोडाश तथा चरु बनाकर उन ऋतुओं में होने वाले यज्ञों का सम्पादन करना चाहिए।
देवताभ्यस्तु तद्भुत्वा वन्यं मेध्यतरं हविः । शेषमात्मनि भुञ्जीत लवणं च स्वयं कृतम् ॥ 12 ।।
वन में पैदा होने वाले अत्यन्त पावन अन्न आदि की देवताओं को हवि देकर शेष अन्न में अपने द्वारा लाया लवण मिलाकर उसका सेवन करना चाहिए।
स्थलजौदकशाकानि पुष्पमूलफलानि च। मेध्यवृक्षोद्भवान्यद्यात्स्नेहांश्च फलसम्भवान् ॥ 13 ॥
धरती तथा सरोवर आदि के जल में उत्पन्न होने वाले शाकों, पावन वृक्षों में लगने वाले फूलों, फलों और कन्द-मूलों से और फलों से निकलने वाले तेलों से वानप्रस्थ को अपना पालन-पोषण करना चाहिए।
वर्जयेन्मधुमांसं च भौमानि कवकानि च।
भूस्तृणं शिग्रुकं चैव श्लेष्मातकफलानि च ॥ 14 ।।
मांस, मदिरा, भूमि पर उत्पन्न होने वाली खुम्बी, भूतृण, सोहांजना और लेसदार फल जैसे लसूड़े आदि वानप्रस्थ को नहीं खाने चाहिए।
त्यजेदाश्वयुजे मासि मुन्यन्नं पूर्वसञ्चितम्।
जीर्णानि चैव वासांसि शाकमूलफलानि च ॥ 15 ॥
आश्विन माह में, पहले से एकत्रित मुनियों के खाने योग्य अन्न को, पुराने कपड़ों को, बासी शाक, कन्द-मूल तथा फल आदि को वानप्रस्थ को त्याग देना चाहिए।
न फालकृष्टमश्नीयादुत्सृष्टमपि केनचित् ।
न ग्रामजातान्यार्त्ताऽपि मूलानि च फलानि च ।। 16 ।।
किसी के द्वारा हल चले खेत में छोड़े गए अन्न को और व्याकुल होने पर भी गांव-नगर में पैदा होने वाले कंद-मूल फलों का सेवन वानप्रस्थ को नहीं करना चाहिए।
अग्निपक्वाशनो वा स्यात्कालपक्वभुगेव वा।
अश्मकुट्टो भवेद्वाऽपि दन्तोलूखलिकोऽपि वा ।। 17 ।।
वानप्रस्थ व्यक्ति को आग में पके हए, उचित समय पर पके हुए, पत्थरों में पिसे हुए तथा दांतों से चबाए हुए पदार्थ ही भोजन के रूप में ग्रहण करने चाहिए।
सद्यः प्रक्षालको वा स्यान्माससञ्चयिकोऽपि वा।
षण्मासनिचयो वा स्यात्समानिचय एव वा ॥18॥
वानप्रस्थ को एक समय का, एक माह का, छह माह का या एक वर्ष का (अन्न) भोजन संग्रह करना चाहिए। इस अवधि से अधिक का भोजन नहीं संग्रह करना चाहिए।
नक्तं चान्नं समश्नीयाद्दिवा वाऽऽहृत्य शक्तितः ।
चतुर्थकालिको वा स्यात्स्याद्वाऽप्यष्टमकालिकः ॥ 19 ॥
वानप्रस्थ यथाशक्ति अन्न को लाकर (सायंकाल) रात में या दिन में अथवा एक दिन पूरा उपवास कर दूसरे दिन सायंकाल या तीन दिन-रात उपवास कर चौथे दिन सायंकाल भोजन करे।
चान्द्रायणविधानैर्वा शुक्लकृष्णे च वर्तयेत् । पक्षान्तयोर्वाऽप्यश्नीयाद्यवागूं क्वथितां सकृत् ॥ 20 ॥
वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाला चाहे तो चान्द्रायण व्रत की विधि के अनुसार शुक्ल पक्ष में भोजन के ग्रासों (कौरों) को घटाए-बढ़ाए या पक्ष के अन्त में अर्थात् पूर्णमासी और अमावस्या को एक बार जौ की लपसी खाएं।
पुष्पमूलफलैर्वाऽपि केवलैर्वर्तयेत्सदा ।
कालपक्वैः स्वयं शीर्णैर्वैखानसमते स्थितः ॥ 21 ॥
वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह समय से पक कर गिरने वाले फलों-फूलों से अपना जीवन यापन करे।
भूमौ विपरिवर्तेत तिष्ठेद्वा प्रपदैर्दिनम् ।
स्थानासनाभ्यां विहरेत्सवनेषूपयन्नपः ।। 22 ।।
वानप्रस्थ या तो भूमि पर बैठा रहे या दिन भर खड़ा रहे। उसे अपने आसन की परिधि में ही टहलना चाहिए तथा दिन में तीन बार, प्रातः, मध्याह्न तथा सायं स्नान करना चाहिए।
ग्रीष्मे पञ्चतपास्तु स्याद्वर्षास्वभावकाशिकः ।
आर्द्रवासास्तु हेमन्ते क्रमशौ वर्धयंस्तपः ॥ 23 ।।
गर्मी की ऋतु में पंचाग्नि साधना करे। वर्षा ऋतु में खुले आकाश के नीचे भीगता रहे और शीतकाल में गीले वस्त्र पहने। इस भांति अपनी सहनशक्ति को विकसित करे।
टिप्पणी- धूप में अपने चारों ओर आग जलाकर उसके बीच में बैठा रहना पंचाग्नि साधना करना कहलाता है।
उस्पृशंस्त्रिषवणः पितृन्देवांश्च तर्पयेत्।
तपश्चरश्चोग्रतरं शोषयेद्देहमात्मनः ।। 24 ।।
वानप्रस्थ को चाहिए कि वह तीनों समय सुबह, दोपहर और शाम स्नान करके पितरों तथा देवों को तर्पण करे। वह कठिन से कठिन साधना करके अपने शरीर को सुखा दे।
अग्नीनात्मनि वैतानान्समारोप्य यथाविधिः ।
अनग्निरनिकेतः स्यान्मुनिर्मूलफलाशनः ।। 25 ॥
वैखानस शास्त्रानुसार वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाला अग्नियों को विधिपूर्वक अपनी आत्मा में समारोपित करके फल-मूल को खाता हुआ अग्नि तथा अपने स्थान को भी पूरी तरह छोड़ दे।
अप्रयत्नः सुखार्थेषु ब्रह्मचारी धराशयः ।
शरणेष्वममश्चैव वृक्षमूल निकेतनः ।। 26 ।।
वानप्रस्थ को सुख देने वाले साधनों को पाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उसे अपनी इन्द्रियों पर पूरा नियंत्रण रखने वाला और शरणस्थलों के प्रति मोह रहित होकर वृक्ष के नीचे अपना निवास रखने वाला होना चाहिए।
तापसेष्वपि विप्रेषु यात्रिकं भैक्षमाहरेत् ।
गृहमेधिषु चान्येषु द्विजेषु वनवासिषु ।। 27 ।।
वानप्रस्थ को तपस्वियों से केवल अपने जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक भिक्षा लेना चाहिए, अधिक नहीं। वन में वास करने वाले तपस्वियों से भिक्षा नहीं मिलने पर वनवासी ब्राह्मणों से या दूसरे गृहस्थों से भिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।
ग्रामादाहृत्य वाश्ऽनीयादष्टौ ग्रासान्वने वसन्।
प्रतिगृह्य पुटेनैव पाणिना शकलेन वा ।। 28॥
वानप्रस्थ ऐसा भी कर सकता है कि गांव से आठ ग्रास भर भिक्षा लाकर किसी पत्ते या कसोरे में रख कर उसी से अपना पेट भर कर जीवन का निर्वाह करे।
एताश्चान्याश्च सेवेत दीक्षाः विप्रो वने वसन्। विविधाश्चौपनिषदीरात्मसंसिद्धये श्रुतिः ।। 29 ॥
ऋषिभिर्ब्रह्मणैश्चैव गृहस्थैरेव सेविताः ।
विद्यातपोविवृद्धयर्थं शरीरस्य च शुद्धये ॥30॥
वानप्रस्थ इस प्रकार की (ऊपर के श्लोकों में बताई) दीक्षाओं का पालन करता हुआ अपने आत्म-कल्याण हेतु अनेक ऋषियों-मुनियों, ब्राह्मणों तथा गृहस्थों द्वारा विद्या तथा तप का विकास करे एवं आत्मशद्धि के लिए उपनिषदों का स्वाध्याय करे।
अपराजितां वाऽऽस्थाय व्रजेद्दिशमजिह्मगः ।
आ निपाताच्छरीरस्य युक्तो वार्यनिलाशनः ॥ 31 ।।
वानप्रस्थाश्रम में रहने वाला देहान्त होने तक जल-वायु का सेवन करे तथा अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर सरल गति से इधर-उधर जाता रहे।
आसां महर्षिचर्याणां त्यक्त्वाऽन्यतमया तनुम् ।
वीतशोकभयो विप्रो ब्रह्मलोके महीयते ।। 32 ॥
महर्षियों द्वारा बताई तथा पालन की गई ऊपर लिखी चर्याओं में से किसी एक चर्या का पालन करता हुआ ब्राह्मण (विप्र) शरीर का त्याग करते समय भय तथा शोक से स्वतंत्र होकर ब्रह्म लोक में जाकर प्रतिष्ठित होता है।
वनेषु च विहृत्यैवं तृतीयं भागमायुषः ।
चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा सङ्गान्परिव्रजेत् ॥ 33 ॥
आयु के तीसरे भाग को (50 वर्ष से 75 वर्ष) वन में रहते हुए व्यतीत करने के बाद चतुर्थ भाग (75 वर्ष से 100 वर्ष) के आते ही सभी तरह के विषयों और व्यक्तियों को छोड़कर संन्यास आश्रम धारण करना चाहिए।
आश्रमादाश्रमं गत्वा हुतहोमो जितेन्द्रियः ।
भिक्षाबलिपरिश्रान्तः प्रव्रजन् प्रेत्य वर्धते ॥ 34 ॥
इस तरह ब्रह्मचर्य आश्रम से गृहस्थाश्रम, गृहस्थ से वानप्रस्थ आश्रम और वानप्रस्थ से संन्यास आश्रम में जाते हुए जीवन भर यज्ञ-होम करने वाला जितेन्द्रिय एवं भिक्षा तथा बलि कर्म से थका हुआ व्यक्ति मृत्यु होने पर मोक्ष का अधिकरी बन जाता है।
ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्।
अनपाकत्य मोक्षं तु सेवमानो व्रजत्यधः ॥ 35 ॥
तीनों ऋणों (पित ऋण, ऋषि ऋण तथा देव ऋण) को चुकाने के बाद ही व्यक्ति को मोक्ष को पाने के प्रयत्नों में लगना चाहिए। इन ऋणों (सन्तानोत्पत्ति, ज्ञान-प्रसार, यज्ञ आदि का अनुष्ठान) से उबरे बिना मोक्ष की इच्छा करने वाले का अधःपतन हो जाता है।
अधीत्य विधिवद्वेदान्पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः।
इष्ट्वा च शक्ति तो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत् ॥ 36 11
विधि-विधान के अनुसार वेदाध्ययन करके, विवाह करके संतान को जन्म देकर और अपनी सामर्थ्यानुसार यज्ञों का संपादन करके अर्थात् तीनों ऋणों से मुक्त होने के बाद ही व्यक्ति को मोक्ष हेतु प्रयत्न करने चाहिए।
अनधीत्य द्विजो वेदाननुत्पाद्य तथा प्रजाम् ।
अनिष्ट्वा चैव यज्ञैश्च मोक्षमिच्छन्व्रजत्यधः ।। 37 ॥
वेदों का अध्ययन किए बिना, संतान को जन्म दिए बिना और ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों को किए बिना मोक्ष पाने का प्रयत्न करने वाले का अधःपतन हो जाता
है।
प्राजापत्यां निरुप्येष्टि सर्ववेदसदक्षिणाम्।
आत्मन्यग्नीन्समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद्गृहात् ॥ 38 ।।
वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाले को अपना सब कुछ दक्षिणा में देने, प्रजापति के परितोषक यज्ञ का अनुष्ठान करके तथा आत्मज्ञान की ज्योति को जलाकर संन्यास आश्रम में जाना चाहिए।
यो दत्वा सर्वभूतेभ्यः प्रव्रजत्यभयं गृहात्।
तस्य तेजोमया लोका भवन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ 39 ॥
समस्त जीवों को अभयदान करके वानप्रस्थ से संन्यास आश्रम में जाने वाले ब्रह्मज्ञानी को तेजपूर्ण लोकों की उपलब्धि होती है।
यस्मादण्वपि भूतानां द्विजान्नोत्पद्यते भयम् ।
तस्य देहाद्विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥ 40॥
जिस द्विज के जीवनकाल में उससे अन्य प्राणियों को अणुभर भी भय नहीं होता अर्थात जो किसी जीव को नहीं सताता, उसकी मृत्यु होने पर उसके लिए इस जगत और मार्ग में किसी तरह का भय नहीं रहता।
आगारादभिनिष्क्रान्तः पवित्रोपचितो मुनिः ।
समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥ 41 ॥
अपना घर त्याग कर निकला पवित्र आचार-विचार का मुनि उत्तम कायों में भी तटस्थता दिखाता हुआ संन्यास ग्रहण करे।
एक एव चरेन्नित्यं सिद्धयर्थमसहायवान्।
सिद्धिमेकस्य सम्पश्यन्न जहाति न हीयते ॥ 42 ॥
किसी से मित्रता की कामना नहीं करे और इस तथ्य को समझे कि जो एकाकी विचरण करता है उसे ही मोक्ष प्राप्त होता है। उसे यह साधना करनी चाहिए कि न वह कुछ छोड़ता है और न उससे कुछ छूटता है।
अनग्निरनिकेतः स्याद्द्याममन्नार्थमाश्रयेत् । उपेक्षकोऽसाञ्चयिको मुनिर्भाव समाहितः ॥ 43 ।।
संन्यासी को घर, अग्नि आदि का त्याग कर भिक्षा के लिए गांव का सहारा लेना चाहिए। उसे सुख-दुख को समान समझते हुए चिन्ताओं से मुक्त होकर मुनियों के धर्म का पालन करना चाहिए।
कपालं वृक्षमूलानि कुचैलमसहायता।
समता चैव सर्वस्मिन्नेतन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ 44 ।।
* मुक्त पुरुष के लक्षण ये हैं- वह खप्पर का उपयोग बर्तन के रूप में करता है, वृक्ष के नीचे ही उसका घर होता है, वस्त्रों के स्थान पर पेड़ों की छाल पहनता है, एकाकी रहते हुए जीवन व्यतीत करता है और समस्त जीवों एवं पदार्थों में समदृष्टि रखता है।
नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देज्जीवनम् ।
कालमेव प्रतीक्षेत निर्देशं भृतको यथा ॥ 45 ।
संन्यासी को न जीवन का अभिनन्दन करना चाहिए, न मृत्यु का। उसे तो मृत्यु की प्रतीक्षा इस तरह करनी चाहिए जैसे कोई सेवक स्वामी के निर्देश की प्रतीक्षा करता है।
दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् ।
सत्यपूतां वदेद्वाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥ 46 ॥
संन्यासी व्यक्ति को देखकर चलना चाहिए (जिससे उसके पैरों के नीचे कोई जीव न कुचल जाए), वस्त्र से छानकर पानी पीना चाहिए, सच बोलना चाहिए और शरीर से ही नहीं वरन् मन से भी पवित्र आचरण करना चाहिए।
अति वादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन।
न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥ 47 ॥
कुद्धयन्तं न प्रतिकृध्येदाक्कृष्टः कुशलं वदेत्।
सप्तद्वारा ऽवकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत् ।। 48 ||
दसरों के कडवे वचनों को भी संन्यासी सहन करे। गाली का उत्तर गाली से न दे और किसी का अपमान नहीं करे। इस नाशवान काया (देह) के लिए संन्यासी किसी से शत्रुता नहीं रखनी चाहिए।
को संन्यासी क्रोध करने वाले के प्रति सहनशील रहते हए क्रोध नहीं करे, निन्दक के प्रति सद्भाव रखे। इन सातों द्वारों में बिखरी वाणी से कभी असत्य नहीं बोलना चाहिए।
अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः ।
आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह ।। 49 ॥
उसे (संन्यासी) अध्यात्म में प्रेम रखने वाला, किसी की अपेक्षा न रखने वाला, शाकाहारी, ऐन्द्रिय विषयों से मुक्त एवं अपनी ही सहायता से आत्मिक कल्याण और आनन्द पाने वाला होकर विचरण करना चाहिए।
न चोत्पातनिमित्ताभ्यां न नक्षत्राङ्गविद्यया।
नानुशासनवादाभ्यां भिक्षां लिप्सेत कर्हिचित् ॥ 50 ॥
संन्यासी को भिक्षा पाने के लिए उत्पातों की पूर्व सूचना देना, ज्योतिष विद्या द्वारा भविष्य कथन करना, उपदेश देना एवं वाद-विवाद करना आदि से बचना चाहिए।
न तापसैर्ब्रह्मणैर्वा वयोभिरपि वा श्वभिः ।
आकीर्णं भिक्षुकैर्वाऽन्यैरागारमुपसंव्रजेत् ।। 51 ॥
तपस्वियों, ब्राह्मणों, वृद्धजनों, पशुओं, पक्षियों और भिक्षुओं से घिरे हुए भवन में संन्यासी को भिक्षा लेने के लिए नहीं जाना चाहिए।
क्लृप्तकेशनखश्मश्रुः पात्री दण्डी कुसुम्भवान् ।
विचरेन्नियतो नित्यं सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ 52 ।।
संन्यासी को अपने बाल, नख और दाढी-मूंछ मुड़वा कर, हाथ में खप्पर तथा दण्ड (डंडा) लेकर, जोगिए रंग के वस्त्र पहन कर, अपनी इन्द्रियों के वश में रखकर एवं किसी भी जीव को दुख नहीं देते हए इधर-उधर विचरते रहना चाहिए।
अतैजसानि पात्राणि तस्य स्युर्निव्रणानि च।
तेषामद्भिः स्मृतं शौचं चमसानामिवाध्वरे ।। 53 ॥
संन्यासी द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले बरतन मूल्यवान धातुओं के नहीं होने चाहिए। वे टूटे-फूटे भी नहीं होने चाहिए। संन्यासी के पात्र (बरतन) यज्ञ के चमसों की भांति जल से धोए जाने पर शुद्ध हो जाते हैं।
अलावसुं दारुपात्रं च मुण्मयं वैदलं तथा।
एतानि यतिपात्राणि मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।। 54 ।।
भृगु जी ने कहा- महर्षियो ! स्वायम्भुव मनु ने बताया है कि संन्यासियों के पास तुम्बी, लकड़ी, बांस या मिट्टी के बरतन होने चाहिए।
एककालं चरेद्भक्षं न प्रसज्जेत विस्तरे ।
भैक्षे प्रसक्तो हि यतिर्विषयेष्वपि सज्जति ।। 55 ॥
एक समय भिक्षा मांग कर संन्यासी को उसी से अपना पालन करना चाहिए। उसे एक से ज्यादा बार भिक्षा मांगने की प्रवृत्ति से दूर रहना चाहिए। एक से अधिक बार भिक्षा मांगने के लोभ में फंसा संन्यासी विषयों में फंसने लगता है।
विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवञ्जने ।
वृत्ते शराव सम्पाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत् ॥ 56 ।।
जहां रसोई का धुआं बुझ चुका हो, उसी घर से संन्यासी को सदैव भिक्षा मांगनी चाहिए। इसके अतिरिक्त उसे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उस घर में कूटने-पीसने के कार्य, पूरे हो चुके हों और खाने-पीने के पात्र धो-पोंछकर रख दिए गए हों।
कहने का आशय यह है कि गृहस्थों के यहां जब भोजन आदि बनाने का कार्य पूरी तरह समाप्त हो जाए तभी संन्यासी को भिक्षार्थ जाना चाहिए।
अलाभे न विषादीस्याल्लाभे चैव न हर्षयेत् ।
प्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रासङ्गादिनिर्गतः ।। 57 ॥
संन्यासी भिक्षा मिलने पर प्रसन्न और न मिलने पर अप्रसन्न न हो। उसे अपना जीवन यापन करने के लिए उदरपूर्ति से सम्बन्ध रखना चाहिए। खाए जाने वाले पदार्थ के रूप, रस तथा गन्ध पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
अभिपूजितलाभांस्तु जुगुप्सेतैव सर्वशः ।
अभिपूजितलाभैश्च यतिर्मुक्तोऽपि बध्यते ॥ 58 ॥
आदर सहित मिलने वाली स्वादिष्ट भिक्षा की संन्यासी को उपेक्षा करनी चाहिए क्योंकि उसके स्वाद में रस नहीं लेने पर भी संन्यासी को वह यजमान के स्नेह-बंधन में जकड़ती है।
अल्पान्नाभ्यवहारेण रहः स्थानासनेन च।
ह्रियमाणानि विषयैरिन्द्रियाणि निवर्तयेत ॥ 59 ॥
संन्यासी को चाहिए कि वह विषयों द्वारा सींची जाने वाली इन्द्रियों को थोड़ा भोजन देकर और जनहीन स्थान पर एकान्त में अपने नियंत्रण में करे।
इन्द्रियाणां निरोधेन रागद्वेषक्षयेण च।
अहिंसया च भूतानाममृतत्त्वाय कल्पते ।। 60 ॥
संन्यासी इन्द्रियों पर संयम रख करके, राग-द्वेष को कम से कम करके तथा जीव हिंसा न करके अपने लिए मोक्ष लाभ का पथ बनाता है।
अवेक्षेत गतीनृणां कर्मदोषसमुद्भवाः।
निरये चैव पतनं यातनाश्च यमक्षये ॥ 61॥
विप्रयोगं प्रियैश्चैव संयोगं च तथाऽप्रियैः।
जरया चाभिभवनं व्याधिभिश्चोपपीडनम् ।। 62 ।।
संन्यासी को कर्मदोषों से मनुष्यों की बुरी दशाओं, नरक में गिरने तथा यमलोक में अनेक प्रकार की कठोर यातनाओं को सहने, प्रियजनों से बिछुड़ने और अप्रिय लोगों से मिलने, वृद्धावस्था के कष्टों, रोगों की पीड़ाओं, देह त्याग के बाद फिर से गर्भ में गिरने और जीवात्मा के करोड़ों योनियों में जन्म लेकर कष्ट सहने आदि पर विचार करना चाहिए।
अधर्मप्रभवं चैव दुःखयोगं शरीरिणाम्।
धर्मार्थप्रभवां चैव सुखसंयोगमक्षयम् ।। 63 ॥
जीवों के सुख का कारण उनके द्वारा किए जाने वाले धार्मिक कर्म होते हैं। इसी प्रकार उनके पाप कर्म उनके दुखों का कारण बनते हैं। अतः सुख पाने के लिए धर्म का पालन करना आवश्यक है।
सूक्ष्मतां चान्ववेक्षेत योगेन परमात्मनः ।
देहेषु च समुत्पत्ति मुत्तमेष्वधमेषु च ॥ 64 ॥
संन्यासी को योग विद्या की साधना कर सूक्ष्म से भी सूक्ष्म परमात्मा का ध्यान करना चाहिए। उसे फल भोग की कामना के कारण निम्र कोटि की योनियों में जीव के जन्म लेने पर विचार करते हुए धार्मिक कर्मों में लगे रहना चाहिए।
दूषितोऽपि चरेद्धर्म यत्रतत्राश्रमे रतः।
समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥ 65 ॥
द्विज चाहे किसी आश्रम में हो उसे सभी प्राणियों को दोष से ग्रस्त होने पर भी समान दृष्टि से देखना चाहिए तथा ऐसा करते हुए अपने धर्म का अनुसरण करना चाहिए। धर्म का आधार शुभ कार्यों को आचरण में लाना है, उसका प्रदर्शन करना नहीं।
फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम् ।
न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति ।। 66 ॥
निर्मली नामक पेड़ का फल निश्चित रूप से जल को शुद्ध करता है परन्तु जिस तरह उसकी जानकारी होने या नाम लेने से जल शुद्ध नहीं हो सकता उसी तरह धर्म की जानकारी से नहीं वरन् आचरण से जीव का कल्याण होता है।
संरक्षणार्थं जन्तूनां रात्रावहनि वा सदा।
शरीरस्यात्यये चैव समीक्ष्य वसुधां चरेत् ॥ 67 ।।
संन्यासी को रात-दिन स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरे प्राणियों की रक्षार्थ धरती पर दृष्टि डालते हुए चलना चाहिए।
अह्ना रात्र्या च याञ्जन्तून्हिनस्त्यज्ञानतो यतिः ।
तेषां स्नात्वा विशुद्धयर्थं प्राणायामान्षडाचरेत् ॥ 68 ॥
दिन या रात में, अनजाने में, अपने द्वारा मारे जाने वाले जीव-जन्तुओं के पाप से मुक्त होने के लिए नहाकर छह प्राणायाम करने चाहिए।
प्राणायामाः ब्राह्मणस्य त्रयोऽपि विधिवत्कृताः ।
व्याहृति प्रणवैर्युक्ताः विज्ञेयं परमं तपः ।। 69।
ब्राह्मण द्वारा प्रणव-ओ३म तथा व्याहृति (भूः भुवः स्वः) के साथ विधि अनुसार किए गए तीन प्राणायामों को भी उसका परम तप मानना चाहिए।
दह्यन्ते ध्यायमानानां धातूनां हि यथा मलाः ।
तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥ 70 ।।
अग्नि में सोना, चांदी आदि धातुओं को डालने से जिस तरह उनकी अशुद्धता दूर हो जाती है, उसी तरह प्राणायाम की साधना करने से इन्द्रियों के समस्त दोष तथा विकार समाप्त हो जाते हैं।
प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्च किल्बिषम्।
प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ।। 71 ।।
अन्य दुर्गुणों से मुक्त हो। ब्राह्मण प्राणायाम साधना द्वारा शारीरिक दोषों पर, धारणाओं द्वारा पापों पर, प्रत्याहार द्वारा साथ में रहने से उत्पन्न होने वाले दोषों पर तथा ध्यान द्वारा मोह तथा
प्राणायाम है। टिप्पणी प्राण की स्वाभाविक गति श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित करना
प्रत्याहार- जब चित्त शांत हो जाता है, मन-बुद्धि भी शांत हो जाते हैं।
फलस्वरूप इंद्रियां अपने आहार रूपी विषयों के साथ सम्बन्ध नहीं जोड पातीं। यही प्रत्याहार है।
धारणा किसी भी आंतरिक या बाह्य विषयों पर चित्त को पूरी तरह एकाग्र कर देना।
ध्यान-जिस विषय में धारणा से चित्त वृत्ति लगाई हो, उस विषय में सजातीय वृत्ति का धारावत अखंडित प्रवाह करना ही ध्यान है।
उच्चावचेषु भूतेषु दुर्जेयामकृतात्मभिः ।
ध्यानयोगेन सम्पश्येद्गतिमस्यान्तरात्मनः ।। 72 ।।
तत्ववेत्ता योगी को ध्यान योग द्वारा प्राणियों को मृत्यु के बाद मिलने वाली उत्तम या अधम योनियों को देखना चाहिए। यह कार्य अज्ञानी पुरुषों के लिए सर्वथा अज्ञात तथा असम्भव है।
सम्यग्दर्शन सम्पन्नः कर्मभिर्न निबध्यते ।
दर्शनेन विहीनस्तु संसारं प्रतिपद्यते ॥ 73 ।।
आत्म साक्षात्कार कर लेने वाला योगी कर्मों के बन्धनों में नहीं पड़ता। जो अहंकार से अच्छे-बुरे कर्मों के ब्रह्म का दर्शन नहीं कर पाता वही कर्तापन के परिणामस्वरूप आवागमन के चक्र में पड़ता है।
अहिंसयेन्द्रियासंगैवैदिकैश्चैव कर्मभिः ।
तपसश्चरणैश्चोग्रैः साधयन्तीह तत्पदम् ।। 74 ॥
अहिंसा, इंद्रिय संयम, विषयों को पूरी तरह त्याग देने, वैदिक कर्मों को करने और कठोर तप से योगी ब्रह्म को प्राप्त कर लेते हैं।
अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् ।
चर्मावनद्धं दुर्गन्धिपूर्ण मूत्रपुरीषयोः ॥ 75 ॥
जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम्। रजस्वलमनित्यञ्चभूतावासमिमं त्यजेत् ॥ 76 ॥
तत्वज्ञानी संन्यासी इस लोक में ऐसे कर्म करे कि अस्थियों का ढांचा बना, स्नायुओं की रस्सियों में से बंधा, रक्त-मांस से सना, त्वचा से मढ़ा, मल-मूत्र मे दर्गन्धित, वृद्धावस्था, शोक तथा रोग का घर, क्षुधा तथा तृष्णा से ग्रस्त, मलिन, नाशवान तथा पंच भूतों का निवास रूपी यह शरीर सदैव के लिए छूट जाए और पुन: जन्म न हो।
टिप्पणी- यह कथन विशेष रूप से संन्यासियों के लिए है।
नदीकूलं यथा वृक्षो वृक्षं वा शकुनिर्यथा।
तथा त्यजन्निमं देहं कूच्छ्राद्ग्राहाद्विमुच्यते ॥ 77 ।।
जिस तरह नदी तट पर खड़ा वृक्ष जैसे ही गिरता है, उस पर बैठा पक्षी उसे छोड़कर उड़ जाता है, उसी तरह संन्यासी मोह रहित भाव से इस शरीर का अंत होते ही इस संसार से मुक्त हो जाता है।
प्रियेषु स्वेषु सुकृतमप्रियेषु च दुष्कृतम्।
विसृज्य ध्यानयोगेने ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥ 78 ॥
संन्यासी अपने प्रियजनों के सद्गुणों और अप्रिय जनों के दुर्गुणों से होने वाले राग-द्वेष से स्वतंत्र होकर ध्यान योग से सदैव रहने वाले परमात्मा को प्राप्त करता है।
यदा भावेन भवति सर्वभावेषु निःस्पृहः ।
तदासुखमवाप्नोति प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥ 79 ॥
जब संन्यासी सभी विषयों से अपनी दोष दृष्टि (अर्थात् संसार के सभी विषय दुख देने वाले हैं यह दृष्टिकोण) के कारण मुक्त हो जाता है तब वह इस संसार और परलोक में वास्तविक और अनश्वर सुख को प्राप्त करता है।
अनेन विधिना सर्वांस्त्यक्त्वा सङ्गान् शनैः शनैः । सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तो ब्रह्मण्येवावतिष्ठते ।। ४० ।।
वह सभी संगों (धन, स्त्री, पुत्र, यश आदि) में अपनी आसक्ति को एक-एक करके धीरे-धीरे त्याग कर समस्त द्वन्द्वों (सुख-दुख, हानि-लाभ आदि) से मुक्त होकर ब्रह्मलीन हो जाता है।
ध्यानिकं सर्वमेवैतद्यदेतदभिशब्दितम् ।
न ह्यनध्यात्मवित्कश्चित्क्रियाफलमुपाश्नुते ॥ 81
संन्यासी मन तथा समग्र भाव से मोह-माया का त्याग करता है। केवल दूसरों को दिखाने के लिए किए गए त्याग से संन्यासी को कोई फल नहीं मिलता।
अधियज्ञं ब्रह्म जपेदाधिदैविकमेव च।
आध्यात्मिकं च सततं वेदान्ताभिहितं च यत् ।। 82 ॥
वेदों के यज्ञ तथा देवपूजन से संबंधित, आत्मा के विषय से संबंधित तथा वेदान्त से सम्बन्धित मंत्रों का संन्यासी को सदैव जाप करते रहना चाहिए।
इदं शरणमज्ञानामिदमेव विजानताम्।
इदमन्विच्छतां स्वर्गमिदमानन्त्यमिच्छताम् ।। 83 ।।
वेद मंत्रों का जाप सभी को अभीष्ट फल प्रदान करता है, चाहे उसे ज्ञानी करे या अज्ञानी, स्वर्ग के सुखों की कामना करने वाला करे अथवा मोक्ष पाने की इच्छा करने वाला करे।
अनेन कर्मयोगेन परिव्रजति यो द्विजः।
स विधूयेह पाप्मानं वरं ब्रह्मधिगच्छति ।। 84 ।।
संन्यास धारण करने वाला द्विज सांसारिक मोह त्याग तथा वेदों का स्वाध्याय करके अपने सभी पापों का नाश कर देता है और परमात्मा को उपलब्ध करता है।
एष धर्मोऽनुशिष्टो वो यतीनां नियतात्मनाम् ।
वेदसंन्यासिकानां तु कर्मयोगं निबोधत् ॥ 85 ॥
भृग जी कहते हैं- ब्राह्मणो! मैंने अब तक आपको आश्रम विधि के अनुसार संन्यास लेने वाले जितेन्द्रिय महात्माओं के धर्म बताए। मैं अब आपको वेद संन्यासियों के धर्म बता रहा हूं।
टिप्पणी - वेद संन्यासी से आशय उन व्यक्तियों से है जो घर में ही वैराग्य धारण करके रहते हैं। वे किसी तरह के संन्यासी के चिह्न नहीं धारण करते।
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा।
एते गृहस्थप्रभवाश्चत्वारः पृथगाश्रमाः ॥ 86 ॥
सर्वेऽपि क्रमशस्त्वेते यथाशास्त्रं निषेविताः ।
यथोक्तकारिणं विप्रं नयन्ति परमां गतिम् ॥ 87 ॥
चारों आश्रम के व्यक्ति गृहस्थ से ही जन्म लेते हैं। इसके साथ ही गृहस्थ भिक्षा देकर तीनों आश्रम में रहने वालों का भरण-पोषण करता है।
शास्त्र द्वारा बताए इन चारों आश्रमों का क्रम से सेवन करने वाला और हरेक आश्रम के धर्म पर चलने वाला (अर्थात जब जिस आश्रम हो तब उसी आश्रम का धर्म पालन करने वाला) ब्राह्मण परमगति को प्राप्त करता है।
सर्वेषामपि चैतेषां वेदस्मृतिविधानतः ।
गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठः स त्रीनेतान्बिभर्ति हि ॥ 88 ॥
यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् ।
तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥ 89 ॥
चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ है। वेद-स्मृति का यही मत है। इसका कारण यह है कि गृहस्थाश्रम में रहने वाला ही अन्य तीन आश्रमों में रहने वालों का पालन करता है।
जिस तरह सभी नदी-नद सागर में मिल कर शांत हो जाते हैं, उसी तरह समस्त आश्रमों में भटकता प्राणी गृहस्थ आश्रम में ही स्थिर होता है।
चतुर्भिरपि चैवैतैर्नित्यमा श्रमिभिर्द्विजैः ।
दशलक्षणको धर्मः सेवितव्यः प्रयत्नतः ॥ १० ॥
दस लक्षणों वाले धर्म के प्रति चारों आश्रमों के द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) को नित्य सावधान होकर उनका विशेष रूप से पालन करना चाहिए।
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ 91 ।।
धर्म के जो दस लक्षण बताए गए हैं, वे इस प्रकार हैं- 1. धीरज रखना 2. क्षमा करना 3. मन पर काबू रखना 4. चोरी नहीं करना 5. मन, वाणी तथा कर्म में शुद्धता रखना 6. ज्ञानेन्द्रियों एवं कमेन्द्रियों अर्थात् सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना 7. शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करना 8. ब्रह्म ज्ञान पाना 9. सत्य बोलना 10. क्रोध नहीं करना (मनुस्मृति की कुछ प्रतियों में 'धी' की जगह 'ह्री' का पाठ है 'ह्री' का अर्थ है- आत्म विज्ञापन नहीं करना या संकोचशील होना) ।
दश लक्षणानि धर्मस्य ये विप्राः समधीयते ।
अधीत्य चानुवर्तन्ते ते यान्ति परमां गतिम् ॥ 92 ॥
जो ब्राह्मण दस लक्षणों वाले धर्म का ज्ञान प्राप्त कर उनका पालन करते हैं, वे परमगति को उपलब्ध होते हैं।
दशलक्षणकं धर्ममनुष्ठिन्समाहितः ।
वेदान्तं विधिवच्छ्रुत्वा संन्यसेदनृणो द्विजः ॥ 93 ॥
दस लक्षणों वाले धर्म का समाहित होकर पालन करते हुए वेदांत को विधिवत् सुनकर ब्राह्मण को संन्यास धारण करना चाहिए।
संन्यस्य सर्वकर्माणि कर्मदोषानपानुदन् ।
नियतो वेदमभ्यस्य पुत्रैश्वर्ये सुखं वसेत् ॥ 94 ॥
वेद संन्यासी (घर में रहते हुए संन्यास धारण करने वाले व्यक्ति) को गृहस्थ के सभी कर्मों को त्याग कर, कर्मों को करते हुए होने वाले पापों को प्राणायाम की साधना द्वारा नष्ट करना चाहिए। उसे वेदों का स्वाध्याय करते हुए अपने पत्र के ऐश्वर्य (पुत्र द्वारा दिए जाने वाले भोजन, वस्त्र आदि का उपयोग करते हुए) को जितेन्द्रिय बन कर भोगना चाहिए।
टिप्पणी-वेद संन्यासी अग्निहोत्र यज्ञ आदि गृहस्थ के कग्ने योग्य कर्मों का त्याग कर देता है। वह घर में रहकर भी माया-मोह से रहित होता है।
संन्यसेत्सर्वकर्माणि वेदं तु न परित्यजेत् ।
परित्यागाद्धि वेदस्य शूद्रतामनुगच्छति ।। 95 ॥
संसार के समस्त कार्यों से वेद संन्यासी को विरक्त हो जाना चाहिए परन्तु उसे वेदों का पाठ करना नहीं त्यागना चाहिए क्योंकि वेदों का त्याग करने से व्यक्ति शूद्र बन जाता है।
एवं संन्यस्य कर्माणि स्वकार्यपरमोऽस्पृहः ।
संन्यासेनापहत्यैनः प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ 96 ॥
इस तरह समस्त गार्हस्थ्य कर्मों का त्याग कर सब प्रकार से निस्पृह बना संन्यासी परम कार्य अर्थात् आत्मसाक्षात्कार द्वारा सभी पापों को पूरी तरह नाश करके परमगति पाता है।
एष वोऽभिहितो धर्मो ब्राह्मणस्य चतुर्विधः ।
पुण्योऽक्षयफलः प्रेत्य राज्ञां धर्म निबोधत ॥ 97 ।।
महर्षि भृगु जी कहते हैं- विप्रो ! मैंने लोक-परलोक में अक्षय पुण्य देने वाले ब्राह्मण के चार आश्रमों के धर्मों की जानकारी आप लोगों को प्रदान की है। अब मैं क्षत्रियों (राजाओं) के द्वारा पालन किए जाने योग्य धर्म बताता हूं।
॥ मनुस्मृति षष्ठ अध्याय सम्पूर्ण ॥
Manusmriti Chapter 5
kathaShrijirasik
।।मनुस्मृति पंचम अध्याय।।
श्रुत्वैतानृषयो धर्मान्स्नातकस्य यथोदितान् । इदमूचुर्महात्मानमनलप्रभवं भृगुम् ॥ 1 ॥
महर्षि भृगु के द्वारा स्नातक के लिए भली-भांति निरूपित आचरण योग्य धर्मों को सुनकर ऋषिगण अग्नि के समान प्रकाशमान महात्मा भृगु से बोले-
एवं यथोक्तं विप्राणां स्वधर्ममनुतिष्ठताम्।
क कथं मृत्युः प्रभवति वेदशास्त्रविदां प्रभो ॥ 2 ॥
भगवन ! हमें आपने जिस तरह ब्राह्मणों के कर्तव्यों के बारे में बताया, उसी तरह यह भी बताने की कृपा करें कि अपने धर्म का पालन करने वाले वेद-शास्त्रों के ज्ञान में निपुण ब्राह्मणों की अकाल मृत्यु किस प्रकार होती है।
स तानुवाच धर्मात्मा महर्षीन्मानवो भृगुः ।
श्रूयतां येन दोषेण मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति ॥ 3 ॥
मनु के वंशज धर्मात्मा महर्षि भृगु ने ऋषियों से कहा- मैं आप लोगों को बताता हूं कि मृत्यु किस दोष के कारण विद्वान तथा आचारनिष्ठ ब्राह्मणों को मारने की इच्छा करती है, सुनिए ।
अनभ्यासेन वेदानामाचारस्य च वर्जनात् ।
आलस्यादन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति ॥ 4 ॥
वेद पाठ का अभ्यास नहीं करना, सदाचार का पालन नहीं करना, आलस्य में पड़े रहना, समय पर जाग्रत नहीं होना, करने योग्य कर्मों को टालना, दूषित अन्न का भक्षण करना, जो खाने योग्य नहीं है, उसे खाना या अन्याय से कमाए धन से जीवन चलाना इन कारणों से मृत्यु असमय ही ब्राह्मणों को अपना शिकार बनाती है।
लशुनं गृञ्जनं चैव पलाण्डु कवकानि च।
अभक्ष्याणि द्विजातीनाममेध्यप्रभवानि च ॥5॥
लहसुन, शलजम, प्याज, कुकरमुत्ता और गन्दे स्थानों में पैदा होने वाले खाद्य पदार्थों के खाने से बुद्धि-भ्रष्ट होती है। अतः यह सब ब्राह्मणों को नहीं खाने चाहिए।
लोहितान् वृक्षनिर्यासान् व्रश्चनप्रभवांस्तथा।
शेलुं गव्यं च पीयूषं प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥6॥
लाल रंग वाले पेड़ों का गोंद, वृक्षों में छेद करने से निकलने वाला रस, लसूड़ा आदि लेसवाले फल और ऐसी गाय के दूध से जिसने बच्चा हाल ही में जना हो, इन सभी का सेवन नहीं करना चाहिए। इनसे अकाल मृत्यु की सम्भावना बढ़ती है।
वृथाकृसरसंयावं पायसायूपमेव च।
अनुपाकृतमांसानि देवान्नानि हवींषि च ॥ 7 ॥
तिल-चावल की दूध में बनी खीर, दूध की रबड़ी, मालपुआ आदि बेकार के पकवान हैं अर्थात् स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। इनका सेवन नहीं करें। इसके अतिरिक्त मांस तथा हवन के पुरोडाश को भी बलि चढ़ाए बिना नहीं खाएं।
अनिर्दशायाः गोः क्षीरमौष्ट्रमैकशफं तथा ।
आविकं सन्धिनीक्षीरं विवत्सायाश्च गोः पयः ॥४॥
प्रसव करने के दिन से जिसको दस दिन व्यतीत नहीं हुए हों ऐसी गाय, ऊंटनी, एक खुर वाले पशु (घोड़ी, गधी आदि) भेड़, गरमाई हुई (गर्भवती होने की इच्छा वाली) तथा ऐसी गाय जिसका बच्चा मर गया हो, इनका दूध नहीं पीना चाहिए।
आरण्यानां च सर्वेषां मृगाणां माहिषं बिना ।
स्त्रीक्षीरं चैव वर्ज्यानि सर्वशुक्तानि चैव हि ॥१॥
भैंस के अतिरिक्त सभी वनैले पशुओं का और अपनी स्त्री का दूध पीने के योग्य नहीं होता। सभी सड़े-गले या बहुत खट्टे पदार्थ खाने के योग्य नहीं होते। इन सभी का त्याग कर देना चाहिए।
दधिभक्ष्यं च शुक्तेषु सर्वं च दधिसम्भवम् ।
यानि चैवाभिषूयन्ते पुष्पमूलफलैः शुभैः ॥ 10 ॥
शुक्तों में दही तथा उससे बनने वाले पदार्थ (मट्ठा, छाछ, तक्र आदि) तथा जो शुभ (नशा नहीं करने वाले) फूल, जड़ तथा फल से निर्मित पदार्थ (अचार, चटनी, मुरब्बा आदि) भक्षण करने योग्य हैं।
टिप्पणी- शुक्तों से आशय कांजीं किसी आदि जैसे पदार्थों से है जो अधिक अधिक समय तक रखे रहने के कारण खट्टे पड जाते हैं। दही भी एक ऐसा पदार्थ है।
क्रव्यादाञ्छकुनान्सर्वांस्तथा ग्रामनिवासिनः । अनिर्दिष्टांश्चैकशफांष्टिट्टिभं च विवर्जयेत् ॥ 11 ॥
कच्चा मांस भक्षण करने वाले सभी जानवरों-पक्षियों, गांव में रहने वाले (मुगों, कबूतर, मैना आदि) पक्षी, नाम से निर्देश नहीं किए गए एक खुर वाले पशु (जैसे गधा आदि) और टिटिहरी का मांस भक्षण नहीं करे।
कलविङ्क प्लवं हंसं चक्राद्धं ग्रामकुक्कुटम्।
सारसं रज्जुदालं च दात्यूहं शुकसारिके ॥ 12 ॥
प्रतुदाञ्जालपादांश्च कोयष्टिनखविष्किरान्।
निमज्जतश्च मत्स्यादान् शौचं बल्लूरमेव च ॥ 13 ॥
बकं चैव बलाकां च काकोलं खञ्जरीटकम्। मत्स्यादान्विडवराहांश्च मत्स्यानेव च सर्वशः ॥ 14 ॥
सेवन योग्य नहीं होने से गौरैया, परेवा, हंस, चकवा, पालतू मुर्गा, सारस, डौम कौआ, जल कौआ, तोता, मैना, चोंच से फाड़कर मांस खाने वाले, पैरों में जाल-सा रखने वाले बाज जैसे जीव-जन्तु, चील, नाखूनों से फाड़कर खाने वाले, पानी में डुबकी लगाकर मछलियों को पकड़कर भक्षण करने वाले जलचर, वध स्थल पर पड़ा सूखा मांस, बगला, बत्तख, करेरुंआ, खञ्जन, मछली खाने वाले जीव, मल आदि खाने वाले शूकर (सूअर) एवं मत्स्य (मछली) नहीं खाने चाहिए।
यो यस्य मांसमश्नाति स तन्मांसाद उच्यते ।
मत्स्यादः सर्वमांसादस्तस्मात्मत्स्यान्विवर्जयेत् ।। 15 ॥
जिस जीव का मांस जो व्यक्ति खाता है वह उस जीव का भक्षक होता है। मछली द्वारा सभी जीवों का मांस खाया जाता है। अतः मछली खाने वाला सर्वभक्षक होता है। सर्वभक्षक बनने के पाप से बचने हेतु मछली नहीं खानी चाहिए।
पाठीनरोहितावाद्यौ नियुक्तौ हव्यकव्ययोः ।
राजीवान्सिंहतुण्डांश्च सशल्काश्चैव सर्वशः ॥ 16 ।।
पाठीन प्रकार की मछलियां हव्य देव यज्ञ में और रोहित किस्म की मछलियां कव्य-पितृ श्राद्ध में स्वीकार की जाती हैं। इसलिए इन दोनों तरह की तथा राजीव और सिंहतुण्डा प्रकार वाली एवं मोटी त्वचा वाली मछलियों का भक्षण करना मना नहीं है।
न भक्षयेदेकचरानज्ञातांश्च मृगद्विजान्।
भक्ष्येष्वपि समुद्दिष्टान् सर्वान्पञ्चनखांस्तथा ।। 17 ||
श्वाविधं शल्यकं गोधां खङ्गकूर्मशशांस्तथा।
भक्ष्यान्पञ्चनखे ष्वाहु रनुष्ठांश्चैक तोदतः ।। 18 ॥
ऐसे जीव जिन्हें भक्षण योग्य कहा गया है लेकिन वे एकाकी ही चरते हैं या रेंगते हैं जैसे सांप आदि, अनजाने पशु-पक्षियों और सिंह, चीता, व्याघ्र जैसे पश जिनके पांच नाखून होते हैं, भक्षण के योग्य नहीं हैं। इसके अतिरिक्त सेह, शल्यक, गोधा, खङ्ग, कछुवा, खरगोश आदि का भक्षण किया जा सकता है।
छत्राकं विड्वराहं च लशुनं ग्रामकुक्कुटम्।
पलाण्डुं गृञ्जनं चैव मत्या जग्ध्वा पतेद् द्विजः ॥ 19 ।।
जानबूझकर कवक-भूकन्द विशेष (छत्राक), गांव के सुअर, गांव के मुर्गे, लहसुन, प्याज और शलजम को खाने वाले व्यक्ति को पतित मानना चाहिए।
अमत्यैतानिषड्जग्ध्वा कृच्छ्रे सान्तपनंचरेत्।
यति चान्द्रायणं वाऽपि शेषेषूपवसेदहः ।। 20 ।।
अनजाने में इन छः वस्तुओं (ऊपर के श्लोक में बताई) को खाने वाले व्यक्ति को सान्तपन या यति चान्द्रायण व्रतों का अनुष्ठान करके आगे बताये गये के अनुसार प्रायश्चित करना चाहिए। इनमें से किसी एक को भी चख लेने भर से एक दिन का उपवास करना आवश्यक है।
संवत्सरस्यैकमपि चरेत्कृच्छ्रं द्विजोत्तमः ।
अज्ञातभुक्तशुद्ध्यर्थं ज्ञातस्य तु विशेषतः ॥ 21 ॥
इस शंका को दूर करने के लिए कि कभी अनजाने में कोई निषिद्ध पदार्थ (मना किया गया पदार्थ) नहीं खा लिया हो, वर्ष में एक बार सामान्य रूप से व्रत कर लेना उचित है। अगर जानते-बूझते हुए भी कोई निषिद्ध पदार्थ खा ले तो फिर विशेष रूप से कुछ व्रत रखे जिससे उसका प्रायश्चित हो जाए।
यज्ञार्थ ब्राह्मणैर्वध्याः प्रशस्ताः मृगपक्षिणः ।
भृत्यानां चैव वृत्त्यर्थमगस्त्यो ह्याचरत्पुरा ।। 22 ।।
ब्राह्मणों को यज्ञ करने और अपने सेवकों का पेट भरने के लिए केवल भक्षण योग्य बताए गए पशु-पक्षियों का ही वध करना चाहिए। प्राचीनकाल से ही महर्षि अगस्त्य ने इस परम्परा का प्रारम्भ किया है।
बभूवुर्हि पुरोडाशाः भक्ष्याणां मृगपक्षिणाम्।
पुराणेष्वृषियज्ञेषु ब्रह्मक्षत्रसवेषु च ।। 23 ।।
प्राचीनकाल में भी मुनियों, ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों के यज्ञों में भक्ष्य पशु-पक्षियों का हविष्य-हव्य (पुरोडाश) बना था।
यत्किञ्चित्स्नेहसंयुक्तं भक्ष्यं भाज्यमगर्हितम्।
तत्पर्युषितमप्याद्यं हविःशेषं च यद्भवेत् ॥ 24 ।।
अन्य भोज्य पदार्थ जो बासी हैं, उन्हें भी घी-तेल से संस्कारयुक्त (शुद्ध कर या घी आदि लगाकर गर्म करके) कर तथा शेष रहे बासी यज्ञ-अन्न को बिना संस्कार किए ही खाना चाहिए।
चिरस्थितमपि त्वाद्यमस्नेहाक्तं द्विजातिभिः ।
यवगोधूमजं सर्वं पयसश्चैव विक्रिया ।। 25 ।।
यदि घी वाली मिठाई, जो जौ-गेहूं आदि को दूध में पकाकर बनाई गई हो, बहुत दिनों की रखी भी हो जाए तो भी ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य को उसे खा लेना चाहिए।
एतदुक्तं द्विजातीनां भक्ष्याभक्ष्यमशेषतः ।
मांसायातः प्रवक्ष्यामि विधिं भक्षणवर्जने ॥ 26 ।।
भृगुजी ने कहा-महर्षियो ! मैंने द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) के लिए समग्र रूप से खाने योग्य तथा न खाने योग्य पदार्थों का वर्णन तो कर दिया। अब मैं मांस खाने और त्याग करने की विधि सुनाता हूं, ध्यान से सुनें।
प्रोक्षितं भक्षयेन्मांसं ब्राह्मणानां च काम्यया।
यथाविधि नियुक्तस्तु प्राणानामेव चात्यये ॥ 27 ।।
यदि ब्राह्मणों को मांस भक्षण करवाने की कामना हो तो यज्ञ में प्रोक्षण विधि से मांस को शुद्ध करके उन्हें परोसे तथा स्वयं भक्षण करे। अगर अपने प्राणों को बचाने के लिए मांसाहार करना पड़े तो विधि तथा नियम का पालन करके ही उसे खाए।
प्राणस्यान्नमिदं सर्वं प्रजापतिरकल्पयत्।
स्थावरं जङ्गमं चैव सर्वं प्राणस्य भोजनम् ॥ 28 |
सभी प्रकार के अन्न प्रजापति ब्रह्मा जी ने प्राणों की रक्षा हेतु ही बनाए हैं। इसलिए इस जगत के समस्त स्थावर तथा जंगम पदार्थों को जीवों का भोजन समझना चाहिए।
चराणामन्नमचरा दंष्ट्रिणामप्यदष्ट्रिणः ।
अहस्ताश्च सहस्तानां शूराणां चैव भीरवः ।। 29 ।।
चर जीवों (अर्थात् चलने वाले जानवर जैसे-गाय, भैंस आदि) के लिए अचर (नहीं चलने वाले जैसे-पेड, घास-फूस आदि), बडे दांत वाले जीवों जैसे-सिंह, व्याघ्र आदि के लिए छोटे-छोटे दांत वाले (जैसे-हिरन आदि), हाथ वाले जीवों के लिए बिना हाथ वाले (जैसे- मछली आदि) तथा साहसी जीवों के लिए कायर जीवों को भोजन के रूप में बनाया गया है।
नात्ता दुष्यत्यदन्नाद्यान्प्राणिनो ऽहन्यहन्यपि ।
धात्रैव सृष्टा ह्यद्याश्च प्राणिनोऽत्तार एव च ।। 30 ॥
भक्षण करने योग्य प्राणियों को प्रतिदिन खाने वाला किसी दोष से ग्रस्त नहीं होता क्योंकि इस लोक में खाने वालों और खाए जाने वालों की रचना ब्रह्मा जी ने ही की है।
यज्ञाय जग्धिर्मांसस्येत्येष दैवो विधिः स्मृतः । अतोऽन्यथाप्रवृत्तिस्तु राक्षसो विधिरुच्यते ॥ 31 ।।
यज्ञ के लिए पशुओं का वध करना तथा उनका मांस भक्षण करना देवोचित कार्य है। यज्ञ के अतिरिक्त केवल मांस भक्षण के हेतु पशु का वध करना राक्षसी कर्म है।
क्रीत्वा स्वयं वाप्युत्पाद्य परोपकृतमेव वा।
देवान्पितूंश्चार्चयित्वा खादन्मांसं न दुष्यति ॥ 32 ।।
क्रय करके लाए, पशु को स्वयं मारकर लाए या किसी दूसरे द्वारा पशु का वध करके लाए मांस से देवताओं एवं पितरों का पूजन करके उसे खाने वाला व्यक्ति दोष से ग्रस्त नहीं होता।
नाद्यादविधिना मांसं विधिज्ञोऽनापदि द्विजः ।
जग्ध्वा ह्यविधिना मांसं प्रेत्य तैरद्यतेऽवशः ॥ 33 ॥
जो ब्राह्मण विधि-विधान को जानता है उसे संकटकाल को छोड़ कर सामान्य परिस्थिति में विधि-विधान का पालन किए बिना मांसाहार नहीं करना चाहिए। ऐसा किए बिना जो मांस भक्षण करता है, उसे अगले जन्म में उसी जीव का शिकार बनने को विवश होना पड़ता है।
न तादृशं भवत्येनो मृगहन्तुर्धनार्थिनः ।
यादृशं भवति प्रेत्य वृथा मांसानि खादतः ॥ 34 ।।
पशु वध करके आजीविका चलाने वाले को उतना पाप नहीं लगता जैसा विधि-विधान का पालन किए बिना मांस भक्षण करने वाले को इस लोक और परलोक में होता है।
नियुक्तस्तु यथान्यायं यो मांसं नात्ति मानवः ।
स प्रेत्य पशुतां याति सम्भवानेकविंशतिम् ॥ 35 ॥
श्राद्ध तथा मधुपर्क में जो व्यक्ति पितरों को विधि अनुसार मांस अर्पण करके स्वयं मांस भक्षण नहीं करता वह मृत्यु के बाद इक्कीस बार पशु योनि में जन्म लेता है।
टिप्पणी-ऐसे व्यक्ति को ही पितरों का श्राद्ध मांस से करना चाहिए जो स्वयं मांस खाता है। उसी पर उपर्युक्त नियम लागू होता है। जो शाकाहारी है उसे पितरों को मांस अर्पण करने की आवश्यकता नहीं।
असंस्कृतान्पशून्मन्त्रैर्नाद्याद्विप्रः कदाचन ।
मन्त्रैस्तु संस्कृतानद्याच्छाश्वतं विधिमास्थितः ॥ 36 ॥
मंत्रों द्वारा पशुओं के मांस को संस्कारित (शुद्ध) किए बिना ब्राह्मण को मांसाहार नहीं करना चाहिए। केवल वेद की सदा से चली आ रही विधि अनुसार पशुओं के मांस को पवित्र करके ही उसे खाना चाहिए।
कुर्याद् घृतपशुं सङ्गे कुर्यात्पिष्टपशुं तथा।
न त्वेव तु वृथा हन्तुं पशुमिच्छेत्कदाचन ॥ 37 ॥
यज्ञ में देवताओं को अर्पित करने के उद्देश्य के अतिरिक्त केवल स्वार्थ के लिए पशु का वध नहीं करना चाहिए। मांस खाने की इच्छा की पूर्ति घी तथा आटे से बनने वाले किसी स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ से कर लेनी चाहिए।
यावन्ति पशुरोमाणि तावत्कृत्वोह मारणम्।
वृथापशुघ्नः प्राप्नोति प्रेत्य जन्मनिजन्मनि ॥ 38 ।
देवताओं के पूजन के उद्देश्य के अतिरिक्त बेकार में पशु का वध करने वाले के शरीर में जितने रोम होते हैं उतने ही जन्मों तक वह उस पशु द्वारा मारा जाता है।
यज्ञार्थं पशवः स्त्रष्टाः स्वयमेव स्वयम्भुवा।
यज्ञोऽस्य भूत्यै सर्वस्य तस्माद्यज्ञे वधोऽवधः ॥ 39 ॥
यज्ञ की सिद्धि के उद्देश्य से ही ब्रह्मा जी ने पशुओं की रचना की है। अतः जो पशु वध यज्ञ की सिद्धि हेतु किया जाता है वह वध नहीं है।
ओषध्यः पशवो वृक्षास्तिर्यञ्चः पक्षिणस्तथा ।
यज्ञार्थं निधनं प्राप्ताः प्राप्नुवन्त्युच्छ्रितीः पुनः ।। 40 ।।
जो औषधियां, पशु, पेड़, कर्म आदि जीव तथा पक्षी यज्ञ की सिद्धि-वृद्धि के लिए उपयोग में लाए जाते या मारे जाते हैं वे अपने वध के बाद उत्तम गति का अधिकार प्राप्त कर लेते हैं।
मधुपकै च यज्ञे च पितृदैवतकर्मणि ।
अत्रैव पशवोहिंस्याः नान्यत्रेत्यब्रवीन्मनुः ।। 41 ।।
मनु महाराज का कहना है कि मधुपर्क, यज्ञ, श्राद्ध एवं देवपूजा, इन चारों में पशुओं का वध करने का विधान है, अन्य अवसर पर नहीं।
एष्वर्थेषु पशून्हिसन्वेदतत्त्वार्थविद्विजः ।
आत्मानं च पशुं चैव गमयत्युत्तमां गतिम् ॥ 42 ॥
वेद के मर्म को समझने वाला ब्राह्मण मधुपर्क, श्राद्ध आदि में पशु वध करके अपने तथा वध किए गए पशु के लिए उत्तम गति पाने का पथ तैयार करता है।
गृहे गुरावरण्ये वा निवसन्नात्मवान्द्विजः ।
नावेदविहितां हिंसामापद्यपि समाचरेत् ॥ 43 ।।
जितेन्द्रिय ब्राह्मण को ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थाश्रम या वानप्रस्थ आश्रम में रहते हुए आपत्ति के समय में भी ऐसी हिंसा नहीं करनी चाहिए जो शास्त्रों के विरुद्ध हो।
या वेदविहिता हिंसा नियताऽस्मिंश्चराचरे।
अहिंसामेव तां विद्याद्वेदाद्धर्मो हि निर्बभौ ।। 44 ।।
वेद ही इस चर-अचर जगत में धर्म-अधर्म का निर्णायक है। अतः वेदों में जिस हिंसा का निरूपण किया गया है उसे अहिंसा ही मानना-समझना चाहिए।
योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छ्या ।
स जीवंश्च मृतश्चैव नक्वचित्सुखमेधते ।। 45 ।।
जो व्यक्ति ऐसे जीवों को अपने सुख के लिए मारता है जो अहिंसक हैं और दूसरों को नहीं सताते हैं वह जीवन में तथा मरने के बाद भी कहीं पर सुखपूर्वक उन्नति नहीं करता।
यो बन्धन्वधक्लेशान्प्राणिनां न चिकीर्षति ।
स सर्वस्य हितप्रेप्सुः सुखमत्यन्तमश्नुते ।। 46 ।।
वह व्यक्ति जो दूसरे प्राणियों को बांधकर नहीं रखता, उनका वध नहीं करता तथा उन्हें कोई पीडा नहीं देता और सबके हित की कामना करता है, वह सदैव सुखी रहता है।
यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।
तद्वाप्नोत्ययत्नेन यो हिनस्ति न किञ्चन ॥ 47 ।।
ऐसा व्यक्ति जो किसी की हिंसा नहीं करता, वह जिसका चिन्तन करता है, जो कर्म करता है तथा जिसमें ध्यान एकाग्र करता है, वह उन सबों को बिना विशेष प्रयत्न किए प्राप्त कर लेता है।
नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित् ।
न च प्राणिवधः स्वर्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत् ।। 48 ॥
मांस की प्राप्ति तभी संभव है जब दूसरे जीवों का वध किया जाए, लेकिन जीव हिंसा करने से स्वर्ग नहीं मिलता। इसलिए सुख तथा स्वर्ग को पाने की कामना रखने वाले द्विज को मांस भक्षण त्याग देना चाहिए।
समुत्पत्तिं च मांसस्य वधबन्धौ च देहिनाम्।
प्रसमीक्ष्य निवर्तेत सर्वमांसस्य भक्षणात् ।। 49 ॥
मांस की उत्पत्ति और जीवों के बन्धन तथा वध को समझकर, सभी प्रकार के मांस भक्षण को छोड़ देना चाहिए।
न भक्षयति यो मांसं विधिं हित्वा पिशाचवत्।
स लोके प्रियतां याति व्याधिभिश्च न पीड्यते ।। 50 ।।
शास्त्रोक्त किए जाने वाले जीव वध के अतिरिक्त जो व्यक्ति जीवन में पिशाचों की तरह मांसाहार नहीं करता वह रोगों से पीड़ित नहीं होता तथा संसार में यश तथा प्रियता को उपलब्ध करता है।
अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी।
संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः ।। 51 ॥
वे सभी जीव वध के लिए समान रूप से दोषी हैं जो जीववध की अनुमति देते हैं, जीव के अंगों को काटकर अलग-अलग करते हैं, उसका वध करते हैं, उसको खरीदते या बेचते हैं, उसको पकाते तथा परोसते हैं।
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति ।
अनभ्यर्च्य पितृन्देवांस्ततो नान्योऽस्त्यपुण्यकृत् ॥ 52 ।।
जो देवता और पितरों को बिना तुप्त किए दूसरे जीवों के मांस को खाकर अपना मांस बढ़ाता है उससे बड़ा कोई पापी व्यक्ति नहीं है।
वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ।
मांसानि च न खादेद्यस्तयोः पुण्यफलं समम् ॥ 53 ॥
सौ वर्षों तक प्रत्येक वर्ष अश्वमेध यज्ञ करने वाले व्यक्ति का तथा जीवन भर मांसाहार नहीं करने वाले का पुण्यफल एक समान होता है।
फलमूलाशनैर्मेध्यैर्मुन्यान्नां च भोजनैः ।
न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्जनात् ।। 54 ।।
मुनियों के बीच रहते हुए उनकी तरह से सात्विक कन्द-मूल तथा फल का सेवन करने से वह पुण्य फल प्राप्त नहीं होता जो फल केवल मांसाहार के त्याग से मिलता है।
मांसं भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम्।
एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः ।। 55 ॥
विद्वानों के अनुसार मांस शब्द 'मां' तथा 'स' शब्दों के योग से बना है, इसका अर्थ होता है कि जिसे मैं इस संसार में खाता हूं वही मुझे परलोक में खाए।
न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ।। 56 ।।
प्राणियों की मांसाहार, मदिरापान तथा मैथुन में स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। अतः इनका सेवन करने में कोई दोष नहीं है परन्तु इनका त्याग करना महान फल प्रदान करने वाला है।
प्रेतशुद्धिं प्रवक्ष्यामि द्रव्यशुद्धिं तथैव च।
चतुर्णामपि वर्णानां यथावदनुपूर्वशः ।। 57 ॥
भृगु महर्षि बोले- ब्राह्मणो! अब मैं आप लोगों को चारों वर्णों की प्रेतशुद्धि और द्रव्यशुद्धि का क्रमानुसार विस्तार से परिचय देता हूं। ध्यानपूर्वक सुनिए।
दन्तजातेऽनुजाते च कृतचूडे च संस्थिते ।
अशुद्धाः बान्धवाः सर्वे सूतके च तथोच्यते ॥ 58 ।।
जातक के दांत निकलते समय अथवा मुण्डन (चूड़ा कर्म) संस्कार हो जाने पर तथा जातक की मृत्यु हो जाने पर सभी बन्धु-बान्धवों को अपवित्रता (सूतक) लगती है।
दशाहं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते।
अर्वाक्सञ्चयनादऽस्थां त्र्यहमेकाहमेव च ॥ 59॥
एक ही रक्त सम्बंध से जुडे व्यक्तियों (भाई-भतीजों आदि) में मृत्यु की अशुद्धि दस दिनों तक रहती है। इस सम्बंध की दृढ़ता के अनुसार किन्हीं भाई-बन्धुओं को मृतक की अस्थियां संचय करने के दिन (चार दिवस) तक का, किन्हीं को तीन दिन तक का तथा किन्हीं को मात्र एक दिन तक का अशौच (अपवित्रता या अशुद्धि) रहता है।
सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते।
समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदने ।। 60 ॥
सामान्य रूप से सात पीढ़ियों के बाद सपिण्डता समाप्त हो जाती है, लेकिन अगर सम्बंधों में दृढ़ता या मधुरता कम हो जाए तो दूसरी-तीसरी पीढ़ी में ही सपिण्डता को समाप्त समझना चाहिए।
यथेदं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते।
जननेऽप्येवमेव स्यान्निपुणं शुद्धिमिच्छताम् ।। 61 ॥
जिस तरह कुटुम्ब में किसी की मृत्यु हो जाने पर सपिण्डों (जाति-बन्धुओं) को अशुद्धि लग जाती है, उसी तरह शुद्धि को महत्वपूर्ण मानने वाले सज्जन कुटुम्ब में नवजात शिशु के जन्म पर भी अशुद्धि मानते हैं।
सर्वेषां शावमाशौचं मातापित्रोस्तु सूतकम् ।
सूतकं मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचिः ।। 62 ।।
मरने वाले का अशौच सभी रक्त सम्बंधियों को होता है परन्तु नवजात शिशु के उत्पन्न होने पर अशुद्धि केवल माता-पिता की होती है। उसमें भी केवल माता को सूतक (10 दिन तक की अशुद्धि) होता है, पिता स्नान कर शुद्ध हो जाता है। टिप्पणी- यहां शुद्धि शब्द से स्पर्श करने योग्य अर्थ लेना अपेक्षित है।
निरस्य तु पुमाञ्छुक्रमुपस्पृश्यैव शुद्ध्यति । वैजिकादभिसम्बन्धादनुरुध्यादघं त्र्यहम् ॥ 63 ॥
पुरुष अपने वीर्य को निकालने (हस्तमैथुन, स्वप्नदोष में) पर स्नान करने भर से शुद्ध हो जाता है परन्तु स्त्री में गर्भाधान करने से तीन दिनों तक अपवित्र रहता है।
अह्ना चैकेन रात्र्या च त्रिरात्रैरेव च त्रिभिः ।
शवस्पृशो विशुध्यन्ति त्र्यहादुदकदायिनः ।। 64 ॥
जिन बन्धुबान्धवों (सपिण्डी) को जल-तर्पण करने का अधिकार है वे शव को छूने से दस दिवसों के बाद, दूसरे लोग सम्बंधों की निकटता के अनुपात से तीन दिन या एक ही दिन बाद शुद्ध हो जाते हैं।
गुरोः प्रेतस्य शिष्यस्तु पितृमेधं समाचरन् ।
प्रेताहारैः समं तत्र दश रात्रेण शुद्ध्यति ॥ 65 ॥
गुरु का स्वर्गवास होने पर उनका अंतिम संस्कार जिस शिष्य ने किया होता है तथा जिन शिष्यों ने शव को कन्धा दिया होता है. वे सभी दस दिनों के बाद शुद्ध होने हैं।
रात्रिभिर्मासतुल्याभिर्गर्भस्त्रावे विशुद्ध्यति ।
रजस्युपरते साध्वी स्नानेन स्त्री रजस्वला ।। 66 ॥
स्त्री का गर्भस्त्राव होने पर, उसे जितने माह का गर्भ रहा हो उतनी संख्या के दिनों के बाद शुद्ध होती है। साध्वी स्त्री रजोनिवृत्ति के दिन ही स्नान करने के बाद शुद्धता प्राप्त कर लेती है।
नृणामकृतचूडानां विशुद्धिनैशिकी स्मृता ।
निर्वृत्तचूडकानां तु त्रिरात्राच्छुद्धिरिष्यते ।। 67 ॥
जिन बालकों का मुण्डन संस्कार नहीं हुआ है, उनकी मृत्यु पर एक दिन में और जिनका मुण्डन हो चुका है पर यज्ञोपवीत संस्कार नहीं हुआ उनके मरने पर तीन दिनों के बाद शुद्धि होती है।
प्राक्संस्कारप्रमीतानां वर्णानामविशेषतः ।
त्रिरात्रात्तु भवेच्छुद्धिः कन्यास्वह्नोर्विधीयते ॥ 68 ।।
चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) के शिशुओं के मुण्डन संस्कार से पहले मरने पर तीन दिनों का और कन्याओं के मरने पर एक दिन की अशुद्धि लगती है।
अदन्तजन्मनः सद्य आचूडान्नैशिकी स्मृता । त्रिरात्रामाव्रतादेशाद्दशरात्रमतः परम् ।। 69 ।।
दांत निकलने से पहले जिस बच्चे की मृत्यु हो जाती है उसकी अशुद्धि तत्काल मिट जाती है, मुण्डन संस्कार हो जाने के बाद जिन बच्चों की मृत्यु होती है, उनकी अशुद्धि (अशौच) एक दिन तक रहती है। जो बच्चे यज्ञोपवीत संस्कार हो जाने के बाद मर जाते हैं उनकी अशुद्धि तीन दिनों तक रहती है।
परपूर्वासु भार्यासु पुत्रेषु प्रकृतेषु च।
मातामहे त्रिरात्रं तु एकाहं त्वसपिण्डतः ।। 70 ॥
जो स्त्री पहले किसी दूसरे की पत्नी थी परन्तु अब अपनी हो गई है, ऐसी स्त्री तथा उसके बच्चों (दूसरे के वीर्य से जन्मे) की मृत्यु पर और नाना के मरने पर तीन दिन का और अपिण्ड गोत्रियों, दर के भाई-भतीजों के मस्ने पर एक दिन का अशौच रहता है।
ऊनद्विवार्षिकं प्रेतं निदध्युर्बान्धवाः बहिः ।
अलंकृत्य शुचौ भूमावस्थिसञ्चयनादृते ॥ 7 ॥
दो साल से कम बच्चे की मृत्यु पर भाई लोग ग्राम के बाहर किसी अच्छी जगह पर जमीन खोद कर उसके शव को दबा दें। उसका दाह कर्म (जलाना) नहीं करना है और न उसकी हड्डियों को चुनना है।
नास्यकार्योऽग्निसंस्कारों न च कार्योदकक्रिया। अरण्येकाष्ठवत्त्यक्त्वा क्षपेयुस्त्र्यहमेव च॥ 72 ।।
दो वर्ष से कम उम्र के बालक की मृत्यु हो जाने के बाद उसका दाह संस्कार नहीं करना है न उसकी अस्थियों को चुनना है। उसे जनहीन वन में ले जाकर लकड़ी की तरह भूमि में दबा देना चाहिए और तीन दिनों तक अशौच रखना चाहिए।
नाऽत्रिवर्षस्य कर्त्तव्या बान्धवैरुदकक्रिया।
जातदन्तस्य वा कुर्युर्नाम्निवापि कृते सति ॥ 73 ।।
कुछ चिन्तकों का पक्ष यह है कि तीन साल तक के लड़के के मरने पर उसका दाहकर्म तथा अस्थिप्रवाह नहीं करे। दूसरे चिन्तकों का मत है कि जिस बच्चे के दांत निकल आए हों या उसका नामकरण हो चुका हो, उस बालक के मरने पर दाह-संस्कार करना चाहिए।
सब्रह्मचारिण्येकाहमतीते क्षपणं स्मृतम्।
जन्मन्येकोदकानां तु त्रिरात्राच्छुद्धिरिष्यते ।। 74 ।।
साथ में पढ़ने वाले की मृत्यु पर एक दिन का अशौच लगता है, सपिण्डियों के यहां बच्चों के जन्म होने पर तीन दिवसों का अशौच लगता है।
स्त्रीणामसंस्कृतानां तु त्र्यहाच्छुद्धयन्ति बान्धवाः ।
यथोक्तेनैव कल्पेन शुद्ध्यन्ति तु सनाभयः ।। 75 ॥
जिन स्त्रियों का विवाह संस्कार नहीं हुआ, उनकी मृत्यु पर सगे-सम्बंधी हो नहीं वरन् नात-रिश्तेदार भी तीन दिनों के बाद शुद्ध हो जाते हैं। इस भांति उनका अशौच तीन दिवसों तक रहता है।
अक्षारलवणान्नाः स्युर्तिमज्जेयुश्च ते त्र्यहम्।
मांसासनं च नाश्नीयुः शयीरंश्च पृथक् क्षितौ ।। 76 ॥
अशौच के तीनों दिवसों की अवधि में क्षार तथा नमक रहित भोजन करना चाहिए। नदी या तालाब आदि में नहाना चाहिए। मांसाहार का त्याग करना तथा पति-पत्नी को भिन्न-भिन्न शय्या पर सोना चाहिए।
सन्निधावेष वैकल्पः शावाशौचस्य कीर्तितः ।
असन्निधावयं ज्ञेयो विधिः सम्बन्धिबान्धवैः ।। 77 ॥
भृगु जी आगे बोले- विप्रो ! पास रहने वाले बन्धुओं के जन्म होने तथा मरने के अवसरों पर बन्धु-बान्धवों को लगने वाले अशौच के बारे में मैंने आपको बताया। मैं अब उन बन्धु-बान्धवों के शौचाशौच के बारे में बताता हूं जो इतने दूर रहते हैं कि आसानी से आना-जाना नहीं हो सकता।
विगतं तु विदेशस्थं शृणुयाद्यो ह्यनिर्दशम् ।
यच्छेषं दशरात्रस्य तावदेवाशुचिर्भवेत् ॥ 78 ॥
जो व्यक्ति विदेश में मरा हो उसके बन्धु-बान्धवों को मृत्यु के दिन से दस दिन तक का अशौच रहता है। मरण तिथि तथा उसका ज्ञान होने की तिथि के बीच के दिन कम कर दिए जाते हैं (उदाहरण के लिए किसी की मृत्यु 2 तारीख को हुई और उसका पता 5 तारीख को लगा तो उसे 12 तारीख तक का अशौच रहेगा)।
अतिक्रान्ते दशाहे च त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।
संवत्सरे व्यतीते तु सपृष्टवैवापो विशुद्धयति ।। 79 ।।
मरने के दस दिनों के बाद सूचना मिलने पर तीन दिन तक का अशौच रखना होता है। एक वर्ष बाद सूचना मिलने पर केवल स्नान करने से अशौच दूर हो जाता है।
निर्दशं ज्ञातिमरणं श्रुत्वा पुत्रस्य जन्म च।
सवासा जलमाप्लुत्य शुद्धो भवति मानवः ॥ 80 ॥
जाति बन्धु की मृत्यु या पुत्र जन्म के दस दिनों के व्यतीत हो जाने के बाद पता लगने पर वस्त्र पहनकर ही स्नान करने से शुद्धि हो जाती है।
बाले देशान्तरस्थे च पृथक् पिण्डे च संस्थिते।
सवासा जलमाप्लुत्य सद्य एव विशुद्धयति ॥ 81 ।।
अपने गोत्र के बालक की तथा दूरदेश या विदेश में रहने वाले अगोत्री बन्धु (मामा, मौसी, फूफा के परिवार से सम्बंधित) के मरण की सूचना सुनकर वस्त्रों सहित स्नान कर लेने से ही शुद्धि हो जाती है।
अन्तर्दशाहे स्यातां चेत्पुनर्मरणजन्मनी।
तावत्स्यादशुचिर्विप्रो यावत्तत्स्यानिर्दशम् ।। 82 ।।
यदि किसी अन्य का जन्म या मरण दस दिनों की अशौच अवधि में हो जाए तो सम्बंधित व्यक्ति आगामी दस दिनों तक अपवित्र रहता है।
त्रिरात्रमाहुराशौचमाचार्ये संस्थिते सति ।
तस्य पुत्रे च पल्यां च दिवारात्रमिति स्थितिः ॥ 83 ॥
आचार्य के स्वर्गवास पर शिष्य के लिए तीन दिनों तक अशौच रहता है। आचार्य की पत्नी या पुत्र के देहान्त होने पर शिष्य के लिए केवल एक दिन का अशौच रहता है।
श्रोत्रिये तूपसम्पन्ने त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।
मातुले पक्षिणीं रात्रिं शिष्यर्विग्बान्धवेषु च ॥ 84 ।।
श्रोत्रिय अथवा वेद पाठ करने वाले ब्राह्मण का स्वर्गवास होने पर यजमान के लिए तीन दिनों का अशौच रहता है। मामा, शिष्य, पुरोहित तथा दूर के सम्बंधी के देहान्त पर भाञ्जा, गुरु, यजमान एवं सम्बंधी एक दिन के लिए सूर्यास्त तक अपवित्र रहते हैं।
प्रेते राजनि सज्योतिर्यस्य स्याद्विषये स्थितः ।
अश्रोत्रिये त्वहः कृत्स्नामनूचाने तथा गुरौ ॥ 85 ।।
ऐसे राजा के मरने पर जिसके राज्य में सुरक्षित रहकर व्यक्ति ने सांसारिक उन्नति और पारलौकिक श्रेय प्राप्त किया हो तथा विद्याहीन ब्राह्मण के देहान्त पर दिन भर का एवं वेद विद्या के विद्वान व गुरु की मृत्यु पर आगे बताए गए श्लोक में वर्णित दिनों का अशौच रहता है।
शुद्धयेद्विप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः ।
वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुद्धयति ॥ 86 ॥
ब्राह्मण दस दिनों में, क्षत्रिय बारह दिनों में, वैश्य पन्द्रह दिनों में तथा शूद्र तीस दिनों में पवित्र होते हैं।
न वर्धयेदघाहानि प्रत्यूहेन्नाग्निषु क्रियाः ।
न च तत्कर्म कुर्वाणः सनाभ्योऽप्यशुचिर्भवेत् ।। 87 ।।
मिलने पर) किसी तरह की कोई वृद्धि नहीं करनी चाहिए तथा अग्निहोत्र आदि किसी का देहान्त हो जाने के कारण अशौच के दिनों में (देर से जानकारी क्रिया का विधान भी नहीं करना चाहिए। कन्या पक्ष के लोग मृतक की दाह क्रिया में शामिल होने पर भी अपवित्र नहीं होते।
दिवाकीर्तिमुदक्यां च पतितं सूतिकां तथा।
शवं तत्स्पृष्टिनं चैव स्पृष्ट्वा स्नानेन शुद्धयति ।। 88 ।।
चाण्डाल, रजस्वला नारी, पापी, प्रसूता स्त्री, शव और शव को छूने वाले व्यक्ति को छूने से जो अशुद्धि होती है वह स्नान करने से दूर हो जाती है।
आचम्य प्रयतो नित्यं जपेदशुचिदर्शने।
सौरान्मन्त्रान्यथोत्साहं पावमानांश्च शक्तितः ।। 89 ॥
जो व्यक्ति आचमन करके शुद्ध हो गया हो, उसे चाण्डाल आदि दिख जाएं तो उसे दोबारा शुद्धि के लिए उत्साह सहित सूर्य देवता तथा पवमान देवता की स्तुति वाले मन्त्रों का जप करना चाहिए।
नारं स्पृष्ट्वाऽस्थि सस्नेहं स्नात्वा विप्रो विशुद्धयति ।
आचम्यैव तु निःस्नेहं गामालभ्यार्कमीक्ष्य च ॥ 90॥
ताजी अस्थि (हड्डी) का स्पर्श करने से ब्राह्मण स्नान करके शुद्ध हो जाता है। सूखी हड्डी का स्पर्श करने पर आचमन द्वारा, भूमि के स्पर्श द्वारा या सूर्य का दर्शन करने से शुद्ध हो जाता है।
आदिष्टी नोदकं कुर्यादाव्रतस्य समापनात्।
समाप्ते तूदकं कृत्वा त्रिरात्रेणैव शुद्धयति ॥ 91 ।।
ब्राह्मण को ब्रह्मचर्य व्रत पूरा हो जाने तक पितरों का प्रेतकर्म एवं तर्पण आदि नहीं करने चाहिए। ब्रह्मचर्य आश्रम से गृहस्थ आश्रम में आने पर वह पितरों के और्ध्वदैहिक कर्म करके तीन दिनों में पवित्र हो जाता है।
वृथासङ्करजातानां प्रव्रज्यासु च तिष्ठताम्।
आत्मसस्त्यागिनां चैव निवर्तेतोदकक्रिया ।। 92 ।।
पाषण्डमाश्रितानां च चरन्तीनां च कामतः ।
गर्भभर्तृगुहां चैव सुरापीनां च योषिताम् ॥ 93 ॥
वर्ण संकर के रूप में उत्पन्न, संन्यासियों, आत्महत्या करने वालों. अपनी इच्छा से व्यभिचार करने वाली नारियों, गर्भपात कराने वाली स्त्रियों, पति हत्यारिणी स्त्रियों और मदिरापान करने वाली स्त्रियों का श्राद्ध एवं जल-तर्पण करना व्यर्थ सेनेता है। अतः ऐसी स्त्री और पुरुषों का श्राद्ध और जल-तर्पण नहीं करें।
आचार्य स्वमुपाध्यायं पितरं मातरं गुरुम्।
निर्हत्य तु व्रती प्रेतान्न व्रतेन वियुज्यते ॥ 94 ॥
अपने आचार्य, उपाध्याय अर्थात् शिक्षक, माता-पिता और गुरु के अंतिम संस्कार करने से ब्रह्मचारी का व्रत टूटता नहीं है।
दक्षिणेन मृतं शूद्रं पुरद्वारेण निर्हरेत् ।
पश्चिमोत्तरपूर्वैस्तु यथायोगं द्विजन्मनः ।॥ 95 ॥
शूद्र के शव को नगर के दक्षिणी द्वार से, वैश्य के शव को नगर के पश्चिमी द्वार से, क्षत्रिय के शव को नगर के उत्तरी द्वार से तथा ब्राह्मण के शव को नगर के पूर्वी द्वार से निकालना चाहिए।
न राज्ञामघदोषोऽस्ति व्रतिनां न च सत्रिणाम्।
ऐन्द्रं स्थानमुपासीना ब्रह्मभूता हि ते सदा ॥ 96 ।।
राजा गण, ब्रह्मचारी लोग, चान्द्रायणादि व्रत करने वाले तथा यज्ञ करने वाले, ये चारों प्रकार के लोग पृथ्वी पर इन्द्र के प्रतिनिधि होने के कारण सब प्रकार से निष्पाप माने जाते हैं, अतः इनके सम्बन्धियों आदि की मृत्यु पर तथा जातक विषयक अशौच नहीं लगता।
राज्ञो माहात्मिके स्थाने सद्यः शौचं विधीयते।
प्रजानां परिरक्षार्थमासनं चात्र कारणम् ॥ 97 ॥
परमात्मा का प्रतिनिधि रूप होने से राजा को उसके सम्बन्धियों एवं आचार्य आदि के जन्म-मरण से लगने वाले अशौच से उसी समय शुद्धि मिल जाती है। इसका कारण यह है कि राजा को प्रजा रक्षा हेतु सदा तत्पर रहना पड़ता है।
डिम्भाहवहतानां च विद्युता पार्थिवेन च।
गोब्राह्मणस्य चौवार्थे यस्य चेच्छति पार्थिवः ।॥ 98 ।।
राजा से रहित युद्ध में मारे गए, बिजली (आकाशीय विद्युत) से मरे हुए, राजा द्वारा मारे गए, गौ तथा ब्राह्मण की रक्षा के लिए मारे गए तथा राजा जिसकी तत्काल शुद्धि चाहता हो, उसकी उसी समय शुद्धि हो जाती है।
सोमाग्न्यर्कानिलेंद्राणां वित्ताप्पत्योर्यमस्य च।
अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः ॥ 99 ।।
चन्द्र, अग्नि, सूर्य, वायु, इन्द्र, कुबेर, वरुण तथा यम इन आठ लोकपालों क प्रतिनिधि राजा ही है। उसमें इन आठ देवताओं के दिव्य गुण रहते हैं।
लोकेशाधिष्ठितो राजा नास्याशौचं विधीयते।
शौचाशौचं तु मर्त्यानां लोकेभ्यः प्रभवोऽप्ययम् ॥ 100 ।।
मनुष्यों के शौच अशौच लोकपालों द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं और राजा इन इन्द्र आदि (पूर्वोक्त श्लोक अनुसार) आठ लोकपालों का प्रतिनिधित्व करता है। अतः वह शौच अशौच से प्रभावित नहीं होता।
उद्यतैराहवे शस्त्रैः क्षत्रधर्म हतस्य च।
सद्यः सन्तिष्ठते यज्ञस्तथाऽऽशौचमिति स्थितिः ।। 101 ॥
क्षत्रिय धर्मानुसार जिस तरह सशस्त्र युद्ध में मृत्यु अथवा विजय प्राप्त करने के रूप में क्षत्रिय का यज्ञ तत्काल सम्पन्न हुआ माना जाता है, उसी तरह उनको पवित्रता-अपवित्रता भी उसी समय समाप्त मानी जाती है।
विप्रः शुद्धयत्यपः स्पृष्ट्वा क्षत्रियो वाहनायुधम्।
वैश्यः प्रतोदं रश्मीन्वा यष्टिं शूद्रः कृतक्रिया ।। 102 ॥
प्रेतक्रिया करने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्रमशः जल, वाहन और शस्त्र, डण्डे, चाबुक तथा लगाम एवं लाठी का स्पर्श करने से पवित्र हो जाते हैं। आशय यह है कि शुद्धि वाले दिन चारों वर्णों के लोगों को उपर्युक्त निर्धारित वस्तुओं का स्पर्श करना चाहिए।
एतद्वोऽभिहितं शौचं सपिण्डेषु द्विजोत्तमाः ।
असपिण्डेषु सर्वेषु प्रेतशुद्धिं निबोधत ॥ 103 ॥।
भृगुजी ने कहा-ऋषियो ! मैंने आप लोगों को अब तक सपिंडियों (घनिष् रक्त सम्बन्धियों) के जन्म-मरण से होने वाली अशुद्धि और शुद्धि के बारे में बताया। मैं अब आप लोगों को दूर के सम्बन्धियों के बारे में प्रेत शुद्धि के विधान का वर्णन करता हूं।
असपिण्डं द्विजं प्रेतं विप्रोनिर्हत्य बन्धुवत् ।
विशुद्धयति त्रिरात्रेण मातुराप्तांश्च बान्धवान् ।। 104 ।।
जो व्यक्ति किसी मृत ब्राह्मण का आदर और स्नेहवश अपने सम्बन्धी की तरह और माता के पक्ष के सम्बन्धियों का श्रद्धा के कारण दाहकर्म करता है तो ऐसा करने वाला व्यक्ति तीन दिनों में शुद्ध हो जाता है।
यद्यन्नमत्ति तेषां तु दशाहेनैव शुद्धयति ।
अनदनन्नमहैव न चेत्तस्मिन्गृहे वसेत् ॥ 105 ।।
दूर के सम्बन्धियों का दाह संस्कार करने वाला व्यक्ति अगर मृतक के सम्बन्धियों के यहां निवास करता तथा खाता-पीता है तो वह दस दिन तक अशुद्ध रहता है लेकिन अगर वह उनके साथ खाता-पीता नहीं और रहता नहीं तो एक दिन में ही शुद्ध हो जाता है।
अनुगम्येच्छ्या प्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेव च।
स्नात्वा सचैलं स्पृष्ट्वाऽग्निं घृतं प्राश्य विशुद्धयति ।। 106 ।।
अपनी या दूसरी जाति के शव के पीछे स्वेच्छा से जाने पर वस्त्रों सहित नहाने, आग को जरा सा छूने और घी को खाने से उसी क्षण शुद्धि हो जाती है।
न विप्रं स्वेष तिष्ठत्सु मृते शूद्रेण नाययेत् ।
अस्वर्या ह्याहुतिः सा स्याच्छूद्रसंस्पर्शदूषिता ॥ 107 ॥
ब्राह्मण की मृत्यु हो जाने पर अगर उसके जाति के लोग न हों तो उसके शव को शूद्र द्वारा नहीं उठवाना चाहिए। शूद्र के छूने से दूषित हुई आहुति ब्राह्मण को स्वर्ग जाने में बाधा डालती है।
ज्ञानं तपोऽग्निराहारो मृन्मनोवायुपाञ्जनम्।
वायुः कर्मार्ककालौ च शुद्धे कर्तृणि देहिनाम् ।। 108 ॥
ज्ञान, तप, आग, आहार, मिट्टी, मन, धरती, यज्ञ, वायु, कर्म, सूर्य तथा समय (काल) मनुष्य को शुद्ध करने वाले हैं।
सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्।
योऽर्थेशुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः ।। 109 ।।
समस्त प्रकार की पवित्रताओं में सर्वाधिक महत्व अर्थ (धन) की पवित्रता का है जो अपनी आजीविका ईमानदारी से कमाता है वह वास्तव में सदा ही पवित्र है। इसके विपरीत अगर धनोपार्जन में पवित्रता नहीं तो मिट्टी, जल आदि से अपने को शुद्ध करना व्यर्थ है।
क्षान्त्या शुद्धयन्ति विद्वांसो दानेनाकार्यकारिणः ।
प्रच्छन्नपापा: जप्येन तपसा वेदवित्तमाः ॥ 110 ||
विद्वानों की शद्धि क्षमा से होती है (अर्थात् जब वे दूसरों की गलतियों को माफ कर देते हैं तो स्वयं उनकी शुद्धि हो जाती है)। यज्ञ आदि न करने वालों की शुद्धि दान से छिपकर पाप करने वालों की शुद्धि जप करने से, वेद-विद्या है पंडितों की शुद्धि तप से होती है।
मृत्तौयैः शुध्यते शोध्यं नदी वेगेन शुध्यति ।
रजसा स्त्री मनोदुष्टा संन्यासेन द्विजोत्तमाः ।। 111॥
गंदी और अशुद्ध चीजें मिट्टी तथा जल से शुद्ध होती हैं, नदी बहते रहने में शुद्ध होती है और दषित नारी रजोधर्म से शुद्ध हो जाती है। ब्राह्मण संन्यास से शुद होता है।
टिप्पणी- यदि स्त्री ने परपुरुष से संभोग किया है और वह दूषित हो गई है तो रजस्वला होने से यह स्पष्ट है कि उसने परपुरुष के वीर्य को धारण नहीं किया है। यही उसकी शुद्धि है।
अद्भिर्गात्राणि शुद्धयन्ति मनः सत्येन शुद्धयति ।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्धयति ।। 112 ।।
मानव काया (तन) पानी से, मन सच बोलने से, जीव आत्मा (सूक्ष्म लिंग शरीर) विद्या तथा तप से और बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है।
एष शौचस्य वः प्रोक्तः शरीरस्य विनिर्णयः ।
नानाविधानां द्रव्याणां शुद्धेः शृणुत निर्णयम् ॥ 113 ॥
महर्षि भृगु ने कहा-तपस्वी विप्रो ! आप लोगों के सामने मैंने शरीर की शुद्धि से सम्बन्ध रखने वाले सभी निर्णयों को बताया। आप अब तरह-तरह के द्रव्यों की शुद्धि से सम्बन्ध रखने वाले निर्णयों को सुनें।
तैजसानां मणीनां च सर्वस्याश्ममयस्य च।
भस्मनाद्भिर्मुदा चैव शुद्धिरुक्ता मनीषिभिः ।। 114 ॥
राख या भस्म, जल तथा मिट्टी द्वारा सोने, हीरे, मणि, रत्न और अन्य सभी चमक वाले पत्थरों की शुद्धि होती है।
निर्लेपं काञ्चनं भाण्डमद्भि रेव विशुद्धयति ।
अब्जमश्ममयं चैव राजतं चानुपस्कृतम् ॥ 115॥
जूठन नहीं लगे सोने के बरतन, जल में उत्पन्न होने वाले शंख, मोती, मूंगा आदि, पत्थर से बने पात्र एवं बिना नक्काशी वाले रजत-पात्र केवल पानी द्वारा धोने से अपनी अशुद्धि से मुक्त हो जाते हैं।
अपामग्नेश्च संयोगाद्वैमं रौप्यं च निर्बभौ ।
तस्मात्तयोः स्वयोन्यैव निर्णेको गुणवत्तरः ॥ 116 ॥
अग्नि और जल के संयोग से सोने और चांदी की उत्पत्ति हई है। अतः इनकी संपूर्ण शुद्धि भी अग्नि तथा जल से होती है।
ताम्रायः कांस्यरैत्यानां त्रपुणः सीसकस्य च।
शौचं यथार्ह कर्तव्यं क्षराम्लोदकवारिभिः ॥ 117 ॥
क्षार, खटाई के पानी या सादे जल से तांबा, लोहा, कांसा, पीतल, लाख और सीसे के बरतनों को शुद्ध करना चाहिए। जल से तांबा आदि धातुओं की भी शुद्धि हो जाती है।
द्रवाणां चैव सर्वेषां शुद्धिराप्लवनं स्मृतम् ।
प्रोक्षणं संहतानां च दारवाणां च तक्षणम् ॥ 118 ॥
जमे हुए पदार्थों को पिघलाकर छान लेने से और लकड़ी के बरतनों या वस्तुओं को छीलने (अथवा रन्दा मारने) से उनकी अशुद्धता दूर हो जाती है।
मार्जनं यज्ञपात्राणां पाणिना यज्ञकर्मणि।
चमसानां ग्रहाणां च शुद्धिः प्रक्षालनेन तु ॥ 119 ॥
जो यज्ञ पात्र यज्ञ कर्म में उपयोग किए जाते हैं उनको धोने तथा हाथ से मलने से एवं चमचों और बर्तनों को पकड़ने वाले उपकरणों (जैसे, चिमटा, संड़ासी आदि) को पानी से धोने से उनकी अशुद्धि दूर हो जाती है।
चरूणां-सुक्नुवाणां च शुद्धिरुष्णेन वारिणा।
स्फ्यशूर्पशकटानां च मुसलोलूखलस्य च ॥ 120 ।।
चरु, स्रुव, सुक, स्फ्य, छलनी, छोटी गाड़ी, मूसल तथा ओखली को गर्म जल से धोने से उनकी शुद्धि हो जाती है।
अद्भिस्तु प्रोक्षणं शौचं बहूनां धान्यवाससाम् ।
प्रक्षालनेन स्वल्पानामद्भिः शौचं विधीयते ॥ 121 ।।
जल के छींटे देने से अधिक परिमाण के धान्यों की और अल्प परिमाण के धान्यों तथा वस्त्रों की शद्धि उनको जल से धोने से हो जाती है।
चैलवच्चर्मणां शुद्धि वैदलानां तथैव च।
शाकमूलफलानां च धान्यवच्छुद्धिरिष्यते ।। 122 ।।
वस्त्रों की तरह चमडों और चटाइयों की शुद्धि होती है। धान्यों की तरह शाकों, कन्द-मूलों और फलों की शुद्धि होती है।
कौशेयाविकयोरूषैः कुतपानामरिष्टकैः ।
श्रीफलैरंशुपट्टानां क्षौमाणां गौरसर्षपैः ।। 123 ॥
रेह तथा सुनहरी मिट्टी से रेशमी और ऊनी वस्त्रों की शुद्धि होती है। नेपाली कम्बलों की शुद्धि रीठों से, सन से बने कपडों की शुद्धि बेल से तथा पतले कपड़ों की शुद्धि सफेद सरसों से होती है।
क्षौमवच्छंखश्रृंङ्गाणामस्थिदन्तमयस्य च।
शुद्धिर्विजानता कार्या गोमूत्रेणोदकेन च ॥ 124 ॥
शंख, श्रृंग, हड्डी तथा दांत से निर्मित पात्रों की शुद्धि के लिए शुद्धि-शास्त्र के ज्ञाता को छालटी के समान गोमूत्र या जल का उपयोग करना चाहिए।
प्रोक्षणात्तृणकाष्ठं च पलालं चैव शुद्धयति।
मार्जनोपाञ्जनैर्वेश्म पुनः पाकेनमृण्मयम् ।। 125 ।।
पानी के छींटे मारने से घास-फूस और लकड़ी आदि, पानी छिड़कने तथा लीपने से घर एवं मिट्टी का पात्र पुनः अग्नि में रखने से शुद्धता को प्राप्त करता है।
मद्यैर्मूत्रैः पुरीषैर्वाष्ठीवनैः पूयशोणितैः ।
संस्पृष्टं नैव शुद्धयेत पुनः पाकेन मृण्मयम् ।। 126 ।।
मिट्टी से बना जो बर्तन मदिरा, मूत्र, मल, थूक, लार तथा रक्त से दूषित हो जाता है वह पुनः अग्नि में डालने से भी शुद्ध नहीं होता।
सम्मार्जनोपाञ्जनेन सेकेनोल्लेखनेन च।
गवां च परिवासेन भूमिः शुद्धयति पञ्चभिः ।। 127 ।।
भूमि की शुद्धि पांच उपायों- 1. मार्जन अर्थात् साफ करके पानी छिड़कना, 2. लीपना, 3. सींचना-पूरी तरह जल भर देना 4. कुरेदना (खुर्पी या फावड़े से भूमि के ऊपर की परत को कुरेदना) और 5. उस स्थान पर गायों को बांधना-बसाना द्वारा होती है।
पक्षिजग्धं गवा घ्घातमवधूतमवक्षतम् ।
दूषितं केशकीटैश्च मृत्प्रक्षेपेण शुद्धयति ।। 128 ।।
चिड़ियों द्वारा चोंच मारे या खाएं, गऊ द्वारा सूंघे गए, पैरों से कुचले गए, छींकने से नाक द्वारा निकले गंदे पानी से दूषित हुए, कीड़ों और बालों से गन्दे हुए पदार्थ में मिट्टी डालने से उसकी अशुद्धता दूर हो जाती है।
यावन्नापैत्यमेध्याक्ताद्गन्धो लेपश्च तत्कृतः ।
तावन्मृद्वारि चादेयं सर्वासु द्रव्यशुद्धिषु ॥ 129 ।।
जबकि विष्ठा आदि अमेध्य मलों से लिपे द्रव्यों में से मल आदि की बदबू तथा लेप दूर नहीं हो जाते तब तक उन्हें मिट्टी एवं जल से स्वच्छ करते रहना चाहिए।
त्रीणि देवाः पवित्राणि ब्राह्मणानामकल्पयन् ।
अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते ॥ 130 ।।
ब्राह्मणों के लिए तीन पदार्थों को देवताओं ने पवित्र माना है- 1. अदृष्ट-जिसे बनते, पकते हुए नहीं देखा गया अर्थात् जिसकी अशुद्धि आंखों सें नहीं देखी गई। 2. अशुद्धि का सन्देह होने पर उस वस्तु पर पानी छिड़क दिया गया हो। 3. जिसे ब्राह्मणों द्वारा पवित्र कह दिया गया हो।
आपःशुद्धाः भूमिगताः वैतृष्ण्यं यासु गोर्भवेत् । अव्याप्ताश्चेदमेध्येन गन्धवर्णरसान्विताः ॥ 131 ॥
पृथ्वी पर स्वभावतः स्थित ऐसा जल शुद्ध होता है जिससे गौ की प्यास दूर हो जाए, जो किसी गंदी या अपवित्र वस्तु से दूषित न हो तथा जो वर्ण, रस और गन्ध में ठीक हो।
नित्यं शुद्धः कारुहस्तः पण्ये यच्च प्रसारितम् ।
ब्रह्मचारिगतं भैक्ष्यं नित्यं मेध्यमिति स्थितिः ।। 132 ।।
शास्त्र की यह मर्यादा है कि कारीगर का हाथ, बाजार में विक्रय हेतु रखी गड वस्तु तथा ब्रह्मचारी को दी गई भिक्षा सदा शुद्ध हैं।
नित्यमास्यं शुचिः स्त्रीणां शकुनिः फलपातने ।
प्रस्त्रवे च शुचिर्वत्सः श्वा मृगग्रहणे शुचिः ॥ 133 ॥
स्त्रियों का मुख, फल गिराने हेतु प्रयोग में लाया गया पक्षी, दुग्ध दोहन समय बछड़ा, शिकार पकड़ने हेतु उपयोग किया जाने वाला कुत्ता पवित्र हैं, ऐ शास्त्र की मर्यादा है।
श्वभिर्हतस्य यन्मांसं शुचि तन्मनुरब्रवीत् ।
क्रव्यद्भिश्च हतस्यान्यैश्चाण्डालाद्यैश्च दस्युभिः ।। 134 ।।
शिकारियों के लिए महर्षि मनु ने यह विधान बनाया है कि कुत्तों द्वारा मारे पशु का, बाघ, सिंह आदि मांस भक्षी द्वारा मारे गए पालतू पशुओं का, चाण्डालों तथा डाकुओं द्वारा मारे गए पशुओं का मांस शुद्ध होता है।
ऊर्ध्वं नाभेर्यानि खानि तानि मेध्यानि सर्वशः । यान्यधस्तान्यमेध्यानि देहाच्चैव मलाश्च्युताः ।। 135 ॥
हाथ, कान, नाक, आंख तथा जीभ ये इंद्रियां जो नाभि के ऊपर स्थित है, पवित्र हैं। नाभि से नीचे की इन्द्रियां गुदा, लिंग तथा पैर आदि एवं शरीर से निकलने वाले मल-मूत्र, विष्ठा, पसीना, खोट आदि अपवित्र हैं।
मक्षिका विपुषश्छाया गौरश्वः सूर्यरश्मयः ।
रजो भूर्वायुरग्निश्च स्पर्शे मेध्यानि निर्दिशेत् ।। 136 ॥
जिनके छूने से अपवित्रता नहीं लगती है, वे हैं- मक्खी, पानी के छींटे, छाया, गऊ, अश्व, सूर्य की किरणें, धूल, धरती, वायु, अग्नि। इनका स्पर्श पवित्र माना गया है।
विण्मूत्रोत्सर्गशुद्धयर्थं मृद्वार्यादेयमर्थवत् ।
दौहिकानां मलानां च शुद्धिषु द्वादशस्वपि ॥ 137 ॥
मल-मूत्र त्यागने पर और शरीर की नासिका, नेत्र, कान, त्वचा तथा जीभआदि से निकलने वाले बारह तरह के मलों की शुद्धि हेतु आवश्यकता के अनुसार जल का उपयोग करना चाहिए।
वसाशुक्रमसृड्मज्जामूत्रविड्घ्राणकर्णविद् । श्लेष्माश्रुदूषिकास्वेदा द्वादशैते नृणां मलाः ॥ 138 ।।
मनुष्य के बारह प्रकार के मल हैं- 1. चर्बी 2. वीर्य 3. खून 4. मज्जा 5. मूत्र 6. विष्ठा (मल) 7. आंखों का कीचड़, 8. नाक की गंदगी 9. कान का मैल 10. आंसू 11. कफ तथा 12. त्वचा से निकलने वाला पसीना।
एका लिङ्गे गुदे तिस्त्रस्तथैकत्र करे दश।
उभयोः सप्त दातव्याः मृदः शुद्धिमभीप्सता ।। 139 ॥
अपनी शुद्धता की कामना रखने वाले व्यक्ति को मूत्र करने पर लिंग पर एक बार, मल त्याग करने पर गुदा पर तीन बार, (गुदा पर मिट्टी लगाने वाले) बाएं हाथ पर दस बार एवं दोनों हाथों की हथेलियों और उनके पृष्ठ भाग पर सात बार मिट्टी लगाकर उन्हें पानी से धोना चाहिए.।
एतच्छौचं गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम्।
त्रिगुणं स्याद्वनस्थानां यतीनां च चतुर्गणम्॥ 140 ॥
ऊपर बतायी गई विधि केवल गृहस्थाश्रम वालों के लिए है। ब्रह्मचारियों, वानप्रस्थों तथा संन्यासियों को इसकी तुलना में क्रमशः दुगुना, तिगुना और चौगुना करना चाहिए।
कृत्वा मूत्रं पुरीषं वा खान्याचान्त उपस्पृशेत् ।
वेदमध्येष्यमाणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा ॥ 141 ॥
मल-मूत्र का त्याग करने के बाद व्यक्ति को हमेशा हाथ धोने के बाद आचमन करना चाहिए और जल का स्पर्श आंखों पर करना चाहिए। वेद पढने तथा भोजन करने से पहले भी सदैव आचमन करना चाहिए।
त्रिराचामेदपः पूर्वं द्विः प्रमृज्यात्ततो मुखम् ।
शरीरं शौचमिच्छन्हि स्त्री शूद्रस्तु सकृत्सकृत् ।। 142 ।।
व्यक्ति को शरीर की शुद्धि के लिए भोजन से पहले तीन बार आचमन करना चाहिए तथा दो-बार मुंह धोना चाहिए। शूद्र तथा स्त्री को एक बार ही मुंह धोना और आचमन करना चाहिए।
शूद्राणां मासिकं कार्य वपनं न्यायवर्तिनाम् ।
वैश्यवच्छौचमल्पश्च द्विजोच्छिष्टं च भोजनम् ।। 143 ॥
जो शूद्र न्याय का पालन करता हो उसका माह में एक बार मुण्डन कराना चाहिए। उनकी शौच विधि वैश्यों के समान या उनसे कुछ कम है। ब्राह्मणों के खाने
से बचा भोजन ग्रहण करने से भी शूद्रों की शुद्धि हो जाती है।
नोच्छिष्टं कुर्वते मुख्या विप्रुषोऽङ्गे पतन्ति याः।
न श्मश्रूणि गतान्यास्यं यन्ति न दन्तान्तरधिष्ठितम् ॥ 144 ॥
शरीर पर मुख से निकले थूक के छींटे, मूंछों पर लगे तथा दांतों के अंदर घुसे अन्न के कणों के बाहर निकल कर गिरने से शरीर अशुद्ध नहीं होता।
स्पृशन्ति बिन्दवः पादौ यः आचमयतः परान् ।
भौमिकास्ते समाज्ञेयाः न तैरप्रयतो भवेत् ॥ 145 ।।
यदि आचमन करते हुए किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के छींटे पड़ जाएं तो जिस मनुष्य पर वे छींटे पड़े हैं वह अपवित्र नहीं होता। ऐसे जल के छींटों को पृथ्वी के अन्दर रहने वाले जल के समान पवित्र मानना चाहिए।
उच्छिष्टेन तु संस्पृष्टो द्रव्यहस्तः कथञ्चन।
अनिधायैव तद्रव्यमाचान्तः शुचितामियात् ।। 146 ।।
यदि जुठे मुंह वाले व्यक्ति ने हाथ से किसी द्रव्य का स्पर्श कर लिया हो भी उस द्रव्य को हाथ में लिए रहने पर आचमन करने से व्यक्ति की अशुद्धता है हो जाती है।
वान्तो विरिक्तिः स्नात्वा तु घृतप्राशनमाचरेत् । आचामेदेव भुक्त्वाऽन्नं स्नानं मैनिनः स्मृतम्॥ 147
वमन तथा रेचन (दस्त) करने वाला व्यक्ति नहा कर घी खाने से शुद्धता प्रार कर लेता है। भोजन ग्रहण कर वमन (कै) करने वाला आचमन करने से तथा सम्भोग करने वाला स्नान करने से शुद्धता प्राप्त कर लेता है।
सुप्त्वा श्रुत्वा च भुक्त्वा च निष्ठीव्योक्त्वाऽनुतानि च। पीत्वाऽपोऽध्येष्यमाणश्च आचामेत्प्रयतोऽपि सन्।। 148 ॥
सोने के बाद, छींकने के बाद, खाने, थूकने और झूठ बोलने के बाद अपनी शुद्धि जल पीकर करनी चाहिए। इसके पश्चात् भी अध्ययन करने से पहले एक बार फिर आचमन करना चाहिए।
एष शौचविधिः कृत्स्नो द्रव्यशुद्धिस्तथैव च ।
उक्तो वः सर्ववर्णानां स्त्रीणां धर्मान्निबोधत ।। 149 ।।
भृगुजी ने कहा- आप लोगों को मैंने सभी वर्गों के लोगों की, सभी प्रकार को शौच विधि अर्थात् शुद्धता पाने की विधि बता दी है। अब मैं आप लोगों को स्त्रियों के धर्म के सम्बन्ध में बताता हूं। सावधान होकर सुनिए।
बालया वा युवत्या वा वृद्धया वापि योषिता ।
न स्वातन्त्र्येण कर्त्तव्यं किञ्चित्कार्यं गृहेष्वपि ॥ 150 ॥
स्त्री चाहे बालिका हो, युवती हो या वृद्धावस्था में हो, उसे अपने घर में कभी स्वयं कोई कार्य अपनी स्वतंत्र इच्छा से नहीं करना चाहिए।
बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत्पाणिग्राहस्य यौवने।
पुत्राणां भर्तरि प्रेते न भजेत्स्त्री स्वतन्त्रताम् ॥ 151 ।।
स्त्री को बचपन में अपने पिता के अधीन, युवा होने पर हाथ ग्रहण करने वाले अपने पति के अधीन तथा पति की मृत्यु हो जाने के पश्चात् पुत्र के अधीन रहना चाहिए। उसे स्वतंत्र कभी नहीं रहना चाहिए।
पित्रा भर्ना सुतैर्वाऽपि नेच्छेद्विरहमात्मनः ।
एषं हि विरहेण स्त्री गर्हो कुर्यादुभे कुले ॥ 152 ॥
स्त्री को पिता, पति तथा पुत्र से स्वतंत्र होकर कभी नहीं रहना चाहिए। इनसे अलग होकर रहने वाली स्वतंत्र स्त्री अपने दोनों कूलों (पिता एवं पति के कुल) को कलंकित करती हैं।
सदा प्रहृष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया।
सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया ।। 153 ।।
अपने परिवार में स्त्री को हर तरह की स्थिति में खुश रहते हुए घर के कार्यों में कुशलता और सुरुचि दिखानी चाहिए। उसे हर काम सोच-समझ कर करना चाहिए।
यस्मै दद्यात्पितात्वेनां भ्रातावाऽनुमते पितुः ।
तं शुश्रूषेत जीवन्तं संस्थितं च न लङ्घयेत् ॥ 154 ।।
लड़की का यह धर्म है कि उसका पिता या पिता की आज्ञा से भाई जिस भी पुरुष से उसका विवाह करे, वह उसे पति रूप में स्वीकार कर जीवन भर उसकी सेवा करे। पति की मृत्यु हो जाने पर अपने धर्म का पालन करे।
मङ्गलार्थं स्वस्त्ययनं यज्ञश्चासां प्रजापतेः ।
प्रयुज्यते विवाहेषु प्रदानं स्वाम्यकारणम् ॥ 155 ॥
स्त्री के सौभाग्य की कामना के लिए ही विवाह में स्वस्तयन तथा प्राजापत्य हवन किया जाता है। पति को कन्या का स्वामित्व देना ही कन्यादान करने का अर्थ होता है।
अनृतावृतुकाले च मन्त्रसंस्कार कृत्पतिः ।
सुखस्य नित्यं दातेह परलोके च योषितः ।। 156 ।।
पति स्त्री के भरण-पोषण और उसकी सम्मान रक्षा का भार विवाह द्वारा ग्रहण करता है। वह अपनी पत्नी को समय-असमय सुख प्रदान करता है। अतः उस स्त्री को पति सेवा द्वारा ही इस लोक और परलोक में सुख की प्राप्ति होती है।
अशीलः कामवृत्तो वा गुणैर्वा परिवर्जितः ।
उपचर्यः स्त्रिया साध्व्या सततं देववत्पतिः ।। 157 ।।
पतिव्रता नारी को चरित्रहीन, कामी तथा गुणों से रहित पति की भी सेवा करनी चाहिए। उसे अपने पति को देवता के समान मानना चाहिए।
नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतो नाप्युपोषितम् ।
पतिः शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयते ॥ 158 ॥
स्त्रियों के लिए किसी यज्ञ, व्रत तथा उपवास करने का अलग से विधान नहीं है। उसे तो जिस कार्य को करने से पति प्रसन्न हो वही करना चाहिए क्योंकि इसी से उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
पाणिग्राहस्य साध्वी स्त्री जीवतो वा मृतस्य वा। पतिलोकमभीप्सन्ती नाचरेत्किञ्चिदप्रियम् ।। 159 ॥
अगले जन्म में अच्छा पति पाने की इच्छा रखने वाली स्त्री को इस जन्म में विवाहित पति की जीवन-अवधि में अथवा उसकी मृत्यु हो जाने पर उसे बुरा लगने वाला कोई कार्य नहीं करना चाहिए।
- कामं तु क्षपयेद्देहं पुष्पमूलफलैः शुभैः।
न तु नामापि गृह्णीयात्पत्यौ प्रेते परस्य तु ॥ 160 ॥
स्त्री अपने पति की मृत्यु हो जाने के बाद फल-फूल और कन्द-मूल खाकर अपना शरीर चाहे सुखा ले पर भूल कर भी दूसरे पुरुष के संग की इच्छा नहीं करे।
आसीतामरणात्क्षान्ता नियता ब्रह्मचारिणी।
यो धर्मः एक पत्नीनां कांक्षन्ती तमनुत्तमम् ॥ 161 ॥
पतिव्रता स्त्री को पति के मर जाने के बाद पूरा जीवन क्षमा, संयम तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुजारना चाहिए। उसे सदाचारिणी स्त्रियों द्वारा आचरण योग्य उत्तम धर्म का पालन करने पर गर्व करना चाहिए।
अनेकानि सहस्त्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम्।
दिवंगतानि विप्राणामकृत्वा कुलसन्ततिम् ॥ 162 ।।
अगर किसी स्त्री के पति की मृत्यु बिना किसी सन्तान को उत्पन्न किए हो जाए तब भी स्त्री को अपनी सद्गति के लिए दूसरे पुरुष का संग नहीं करना चाहिए। जिस तरह असंख्य ब्राह्मण आजीवन ब्रह्मचारी रह कर स्वर्ग लाभ करते हैं उसी तरह विधवा भी स्वर्ग की अधिकारिणी होती है।
मृते भर्तरि साध्वी स्त्री ब्रह्मचर्ये व्यवस्थिता।
स्वर्गं गच्छत्यपुत्राऽपि यथा ते ब्रह्मचारिणः ।। 163 ।।
सन्तान उत्पन्न नहीं करने वाले ब्रह्मचारियों की तरह पति की मृत्यु के बाद ब्रह्मचर्य पालन करने वाली स्त्री पुत्रवती नहीं होने पर भी स्वर्ग प्राप्त करती है।
अपत्यलोभाद्या स्त्री भर्तारमतिवर्तते ।
सेह निन्दामवाप्नोति पतिलोकाच्च हीयते ॥ 164 ।।
पुत्र पाने की इच्छा से जो स्त्री पतिव्रत धर्म को तोड़ कर दूसरे पुरुष के साथ संभोग करती है उसकी इस संसार में निन्दा होती है तथा परलोक में बुरी गति मिलती है।
नान्योत्पन्ना प्रजाऽस्तीह न चान्यस्य परिग्रहे।
न द्वितीयश्च साध्वीनां क्वचिद्धर्तोपदिश्यते ।। 165 ॥
शास्त्र के अनुसार पराए पुरुष से उत्पन्न सन्तान न तो उस स्त्री की है और न पर-पुरुष की क्योंकि उसने धर्मपूर्वक विवाहिता स्त्री से सन्तान उत्पन्न नहीं की है। इसीलिए पतिव्रता स्त्रियों के लिए दूसरे विवाह का विधान नहीं है।
पतिं हित्वाऽपकृष्टं स्वमुत्कृष्टं या निषेवते ।
निन्द्यैव सा भवेल्लोके परपूर्वेति चोच्यते ॥ 166 ।।
कम गुणों वाले अपने पति का त्याग कर जो स्त्री अधिक गुणों वाले अन्य पुरुष का संग करती है वह इस संसार में निन्दा पाती है और दो पुरुषों की अंकशायिनी बनने का कलंक लगवाती है।
व्यभिचारे तु भर्तुः स्त्री लोके प्राप्तनोति निन्द्यताम् ।
शृगालयोनिं प्राप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते ।। 167 ।।
पति के सिवाय दूसरे पुरुष से सम्भोग करने वाली विवाहित स्त्री इस संसार में निन्दा का पात्र बनती है और मरने के बाद गीदड़ की योनि में जन्म लेती है। वह कोढ़ जैसे अनेक असाध्य रोगों से पीड़ा पाती है।
पतिं या नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता ।
सा भर्तृलोकमवाप्नोति सद्भिः साध्वीतिचोच्यते ।। 168 ।।
जो स्त्री मन, वचन, कर्म से अपने पति को किसी प्रकार का कष्ट नहीं पहुंचाती, उसकी इस संसार में पतिव्रता नारी के रूप में प्रशंसा होती है और मृत्यु के बाद दिव्य लोकों की प्राप्ति होती है।
अनेन नारी वृत्तेन मनोवाग्देह संयता ।
इहाग्रयां कीर्तिमाप्नोति पतिलोकं परत्र च ।। 169 ॥
जो स्त्री मन, वचन और कर्म का पतिव्रत धर्म के अनुसार संयम करती है वह इस संसार में उत्तम कीर्ति तथा परलोक में सद्गति को उपलब्ध होती है।
एवं वृत्तां सवर्णां स्त्रीं द्विजातिः पूर्वमारिणीम् ।
दाहयेदग्निहोत्रेण यज्ञपात्रेश्च धर्मवित् ।। 170 ॥
यदि आदर्श पतिव्रता नारी का स्वर्गवास पति के जीवित रहते ही हो जाए तो शास्त्रों में बताई विधि के अनुसार यज्ञ आदि करके उसका दाह संस्कार करें।
भार्यायै पूर्व मारिण्यै दत्त्वाग्नीनन्त्य कर्मणि।
पुनर्दारक्रियां कुर्यात्पुनराधानमेव च॥ 171 ॥
यदि पुरुष पतिव्रता स्त्री का दाह संस्कार करने के पश्चात् संतान उत्पन्न करने के लिए दूसरा विवाह करता है तो उसे फिर से अग्निहोत्र आदि करना चाहिए।
अनेन विधिना नित्यं पञ्चयज्ञान्न हापयेत्।
द्वितीयमायुषो भागं कृतदारो गृहे वसेत् ॥ 172 ।।
यदि पत्नी का स्वर्गवास बिना संतान को जन्म दिए हो जाए तो पुरुष को संतान उत्पन्न करने की इच्छा से दूसरा विवाह करके गृहस्थाश्रम का शेष भाग (यदि पत्नी की मृत्यु के समय पति की आयु तीस वर्ष हो तो शेष बीस वर्ष गृहस्थाश्रम में ही रहे) घर में रहकर ही व्यतीत करना चाहिए। उसे गृहस्थाश्रम के नियमों का पालन तथा पञ्च महायज्ञों का अनुष्ठान करते रहना चाहिए।
॥ मनुस्मृति पंचम अध्याय सम्पूर्ण ॥
Manusmriti Chapter 4
kathaShrijirasik
।।मनुस्मृति चतुर्थ अध्याय।।
चतुर्थमायुषो भागमुषित्वाऽऽद्यं गुरौ द्विजः ।
द्वितीयमायुषो भागं कृतदारो गृहे वसेत् ॥1॥
द्विज अपनी आयु के पहले भाग को गुरुकुल में रहते हुए विद्या-अध्ययन करने में बिताए और उसके बाद का दूसरा भाग गृहस्थ आश्रम में रहते हुए बिताए।
टिप्पणी- कुछ आचार्य यहां द्विज का अर्थ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के लोगों से लेते हैं और अन्य केवल ब्राह्मणों से। कलियुग में मनुष्य की आयु 100 वर्ष मानी गई है। अतः इसके अनुसार 25 वर्ष (जीवन का प्रथम भाग) ब्रह्मचर्य तथा अध्ययन के लिए है और 26 से 50 वर्ष तक का समय गृहस्थाश्रम हेतु।
अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुनः ।
या वृत्तिस्तां समास्थाय विप्रो जीवेदनापदि ॥ 2 ॥
गृहस्थ आश्रभ में जीवन निर्वाह हेतु द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य) को निरापद अवस्था में ऐसी वृत्ति ग्रहण करनी चाहिए जिससे दूसरे जीवों को किसी प्रकार से पीड़ा नहीं पहुंचे अथवा कम से कम पीड़ा या कष्ट हो।
यात्रामात्रप्रसिद्धयर्थं स्वैः कर्मभिरगर्हितैः ।
अक्लेशेन शरीरस्य कुर्वीत धनसञ्चयम् ॥ ३ ॥
अपने जीवन को चलाने और परिवार का पालन-पोषण करने के लिए द्विज को ऐसे कार्यों से धनार्जन करना चाहिए जो शुभ हों और जिनसे उसके शरीर को कष्ट नहीं पहुंचे।
ऋतामृताभ्यां जीवेत्तु मृतेन प्रमृतेन वा।
सत्यानृताभ्यामपि वा न श्ववृत्त्या कदाचन ॥4॥
ब्राह्मण को ऋत-अमृत अथवा मृत-प्रमृत या सत्य-अनृत द्वारा अपना जीवन यापन कर लेना चाहिए परन्तु कभी भी कत्तों की वृत्ति (श्वान-वृत्ति) का आश्रय नहीं लेना चाहिए।
टिप्पणी - अगले श्लोक में ऋत-अमृत आदि की परिभाषा दी गई है।
ऋतमुञ्छशिलं ज्ञेयममृतं स्यादयाचितम्।
मृतं तु याचितं भैक्षं प्रमृतं कर्षणं स्मृतम् ॥ 5 ॥
उञ्छ और शिल को ऋत कहते हैं। जो कुछ बिना मांगे मिल जाए उसे अमृत कहते हैं। भिक्षा मांगना मृत है और कृषि करना प्रमृत है।
टिप्पणी - कृषक द्वारा खेत में बोए हुए अन्न को काटकर ले जाने के पश्चात् उसके द्वारा छूट गए या गिर गए एक-एक दाने को अंगुलियों से चुनने को उच्छ तथा खेत में पड़े रह गए धान्य-गुच्छों (बालियों) को चुनने को 'शिल' कहते हैं। बिना मांगे दी गई वस्तु अमृत के समान और मांगी गई मृत के समान होती है। खेती करने में अनेक सूक्ष्म जीवों की हत्या होती है, अतः उसे अधिक दुखदायक मृत्यु तुल्य मानने से 'प्रमृत' कहते हैं।
सत्यानृतं तु वाणिज्यं तेन चैवापि जीव्यते।
सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत् ॥6॥
वाणिज्य या व्यापार करने को सत्यानृत कहते हैं और नौकरी करना श्वान-वृत्ति है। ऊपर बताए पांच साधनों- उञ्छ, शिल, अमृत, मृत, कृषि तथा व्यापार में से किसी एक साधन से जीवन-यापन करना चाहिए। सेवावृत्ति अर्थात् किसी की नौकरी कभी नहीं करनी चाहिए।
कुशूलधान्यको वा स्यात्कुम्भीधान्यक एव वा ।
त्र्यहैहिको वाऽपि भवेदश्वस्तनिक एव वा ॥7॥
चतुर्णामपि चैतेषां द्विजानां गृहमेधिनाम् ।
ज्यायान्परः परोज्ञेयो धर्मतो लोकजित्तमः ॥ 8 ॥
अन्न का भण्डार (कई वर्षों तक के लिए) करने वाले, एक-दो सप्ताह (एक मटके की मात्रा भर) तक के लिए अन्न जमा रखने वाले, तीन दिन के लिए अन्न जमा रखने वाले एवं आने वाले कल की चिन्ता किए बिना केवल आज की जरूरत भर अन्न रखने वाले गृहस्थ ब्राह्मणों में से भण्डार करने वाले की अपेक्षा मटका भर अनाज रखने वाले उसकी तुलना में तीन दिन तक के लिए अनाज रखने वाले और उसकी तुलना में कल की चिन्ता न करके केवल आज भर की आवश्यकता का आनाज रखने वाले श्रेष्ठ हैं।
षट्कर्मैको भवत्येषां त्रिभिरन्यः प्रवर्तते।
द्वाभ्यामेकश्चतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रेण जीवति ॥ 9॥
इन ब्राह्मणों (गृहस्थ) में से कुछ षट् कर्मों- (उच्छ-शिल, अयाचित, भैक्ष्य, भिक्षा में प्राप्त, खेती, व्यापार तथा सेवा) वाला होता है। कोई गृहस्थ अध्यापन, यज्ञ तथा दान-दक्षिणा से जीवन यापन करता है, कोई यज्ञ और अध्यापन से जीविका चलाता है एवं कोई केवल एक मात्र अध्यापन करके ही जीविका चलाता है।
वर्तयंश्य शिलोञ्छाभ्यामग्निहोत्रपरायणः ।
इष्टीः पार्वायणान्तीयाः केवला निर्वपेत्सदा ॥ 10 ॥
ब्राह्मण के लिए यही उत्तम है कि वह शिला-उञ्छ से अपनी जीविका यापन करे, प्रतिदिन यज्ञ-हवन आदि करता रहे तथा विशेष पर्वो पर्व तथा अयन के अंत में होने वाले यज्ञों को करे।
टिप्पणी-यहां विशेष पर्वों से आशय अमावस्या, पूर्णिमा आदि तिथियों से है। वर्ष में दो अयन होते हैं। उत्तरायण और दक्षिणायन। सूर्य 14 जनवरी से 13 जुलाई तक उत्तरायण में रहता है और 14 जुलाई से 13 जनवरी तक दक्षिणायन में। हिन्दुओं के धार्मिक अनुष्ठानों में उत्तरायण तथा दक्षिणायन का बहुत महत्व है।
न लोकवृत्तं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथञ्चन।
अजिह्मामशठां शुद्धां जीवेब्राह्मणजीविकाम् ॥ 11 ॥
ब्राह्मण को अपनी जीविका चलाने के लिए संसार के अन्य व्यक्तियों की तरह छल-कपट नहीं करना चाहिए। वह सब प्रकार से पवित्र और शुद्ध जीविकोपार्जन साधन को ही अपनाए।
सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत्।
सन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः ।। 12 ।।
संतोष और संयम से ही स्थायी सुख की प्राप्ति होती है। अतः उसे सदैव संतोष एवं संयम धारण करना चाहिए। उसे यह ज्ञान होना चाहिए कि संतोष ही सुख का मूल है और इसके विपरीत असंतोष दुःख का।
अतोऽन्यतमया वृत्त्या जीवंस्तु स्नातको द्विजः । स्वर्यायुष्ययशस्यानि व्रतानीमानि धारयेत् ॥ 13 ॥
ब्राह्मण गुरुकुल से (शिक्षा पूरी कर) लौटने के बाद ऊपर बताए जीविकोपार्जन के साधनों में से उत्तम साधनों को ही अपनाए और आयु, यश तथा स्वर्ग देने वाले इन व्रतों (जिनको आगे बताया जाएगा) को करे।
वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः ।
तद्धि कुर्वन्यथाशक्ति प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ 14 ।।
ब्राह्मण को सावधानीपूर्वक वेदों में बताए अपने कर्तव्यों का यथाशक्ति पालन करना चाहिए। इसी के द्वारा उसे निश्चित रूप से परम गति अर्थात मोक्ष की प्राप्ति होती है।
टिप्पणी-मोक्ष का अर्थ होता है जीवात्मा का जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाना।
नेहेतार्थान्प्रसङ्गेन न विरुद्धेन कर्मणा।
न विद्यमानेष्वर्थेषु नार्यामपि यतस्ततः ।। 15 ॥
ब्राह्मण को गाने-बजाने में आसक्त होकर एवं शास्त्र विरुद्ध कर्मों के द्वारा धनार्जन नहीं करना चाहिए। सुखद और अनुकूल स्थिति में (धन रहने पर) और आपत्ति पड़ने पर भी पतित साधनों द्वारा धन संग्रह करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए।
इन्द्रियार्थेषु सर्वेषु न प्रसज्येत कामतः ।
अतिप्रसक्तिं चैतेषां मनसा सन्निवर्तयेत् ॥ 16 ।।
रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श जो इन्द्रियों के विषय हैं, उनमें ब्राह्मण को कभी आसक्त नहीं होना चाहिए। विषयों की आसक्ति से बचने के लिए मन को संयमित करना चाहिए।
सर्वान्परित्यजेदर्थान्स्वाध्यायस्य विरोधिनः ।
यथातथाध्यापयंस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥ 17 ॥
अपना तथा परिवार का पालन-पोषण करते हुए स्वाध्याय (वेद, स्मृति) के विरुद्ध या उसमें बाधा बनने वाले कर्मों को त्याग दे। ब्राह्मण को जैसे भी सम्भव हो। सदैव स्वाध्याय में मग्न रहना ही उचित है। इसी में उसके जीवन की सार्थकता है।
वयसः कर्मणोऽर्थस्य श्रुतस्याभिजनस्य च।
वेषवाग्बुद्धि सारूप्यमाचरन्विचरे दिह ।। 18 ॥
ब्राह्मण को अपनी अवस्था (आयु), कर्म, धन, विद्या एवं अपने वंश के अनुसार वस्त्रादि पहनने चाहिए, ज्ञान की चर्चा तथा वाणी का सदुपयोग करते हुए शुद्ध आचरण का पालन करना चाहिए।
बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धान्यानि च हितानि च ।
नित्यं शास्त्राण्यवेक्षेत निगमांश्चैव वैदिकान् ॥ 19 ॥
गुरुकुल से वापस आया ब्राह्मण ऐसे शास्त्रों का अध्ययन नित्य करे जिससे वह वेदों के अर्थों को समझ सके, उसकी बुद्धि का विकास हो. उसके शरीर को सुख मिले तथा वह धन का संग्रह कर सके।
यथायथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति ।
तथातथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते ॥20॥
जैसे-जैसे मनुष्य शास्त्र का अभ्यास करता है, वैसे-वैसे उसे गूढ़ तत्व का ज्ञान होता जाता है और उसकी ज्ञान प्राप्ति में रुचि बढ़ती जाती है।
ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा ।
नृयज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत् ॥ 21 ।।
उसे जहां तक सम्भव हो अर्थात् सर्वदा ऋषि यज्ञ (वेद अध्ययन), देव यज्ञ (पार्षण श्राद्ध आदि), भूत यज्ञ (बलिवैश्वदेव), नृ यज्ञ (अतिथि सत्कार) एवं पितृ यज्ञ (तर्पण-श्राद्ध आदि) के अनुष्ठान करते रहना चाहिए।
एतानेके महायज्ञान्यज्ञशास्त्रविदो जनाः ।
अनीहमानाः सततमिन्द्रियेष्वेव जुह्वति ।। 22 ।।
शास्त्रों को जानने वाले कुछ गृहाश्रमी इन यज्ञों को नहीं करते वरन् पांचों ज्ञानेन्द्रियों में हवन करते हैं।
टिप्पणी कहने का अभिप्राय यह है कि कुछ ज्ञानी जन अपनी पांचों ज्ञानेन्द्रियों (नेत्र, नासिका, जीभ, त्वचा तथा कान) पर सदा संयम रखते हैं। उनके लिए यही पंच यज्ञ है।
वाच्येके जुह्वति प्राणं प्राणे वाचं च सर्वदा।
वाचि प्राणे च पश्यन्तो यज्ञनिवृत्ति मक्षयाम् ।। 23 ।।
कुछ ज्ञानी गृहाश्रमी वचन तथा प्राणों में यज्ञ के अक्षय फल की जानकारी रखते हुए सदा वचन में प्राणों की और प्राणों में वचन की हवि देते हैं।
ज्ञानेनैवापरे विप्राः यजन्ते तैर्मखैः सदा।
ज्ञानमूलां क्रियामेषां पश्यन्तो ज्ञानचक्षुषा ।। 24 ।।
कोई-कोई गृहाश्रमी ब्राह्मण सभी क्रियाओं को अपने ज्ञान नेत्रों से देखते हैं और उन्हें ज्ञान मूलक मानते हैं। इस प्रकार वे अपने ज्ञान द्वारा ही यज्ञानुष्ठान संपन्न करते हैं तथा ज्ञान को ही सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं।
अग्निहोत्रं च जुहुयादाद्यन्ते द्युनिशोः सदा।
दर्शन चार्धमासान्ते पौर्णमासेन चैव हि ॥ 25 ।।
द्विज नित्य दिन और रात्रि के अन्त में अग्निहोत्र हवन करे अमावस्या और पूर्णमासी को भी यज्ञ-होम करे।
सस्यान्ते नवसस्येष्ट्या तथर्वन्ते द्विजोऽध्वरैः ।
पशुना त्वयनान्ते तु समान्ते सौमिकैर्मखैः ।। 26 ।।
नए अन्न के पैदा होने पर नए धान्य से प्रत्येक ऋतु के अन्न में घी से, अयन की शुरुआत में पशु से एवं वर्ष के अंत में सोम से ब्राह्मण यज्ञ करे।
नानिष्ट्वा नवसस्येष्ट्या पशुना नाग्निमान् द्विजः । नवान्नमद्यान्मांसं वा दीर्घमायुर्जिजीविषुः ।। 27 ।।
लम्बी आयु पाने की इच्छा रखने वाले अग्निहोत्र ब्राह्मण को नए धान्य और पशु से यज्ञ किए बिना अन्न तथा मांस को नहीं खाना चाहिए।
नवेनानर्चिता ह्यस्य पशुहव्येन चाग्नयः ।
प्राणानेवाऽऽत्तुमिच्छन्ति नवान्नामिषगर्द्धिनः ।। 28 ।।
होम किए बिना जो ब्राह्मण नए अन्न और मांस को खाता है उसे नए अन्न तथा नए पशु की अतिशय इच्छा रखने वाले अग्निदेव भस्म कर देते हैं अर्थात् उसके प्राणों की आहुति बना लेते हैं। इसलिए नए अन्न एवं मांस का होम किए बिना उसे खाना नहीं चाहिए।
आसनाश,नशय्याभिरद्भिर्मूलफलेन वा।
नास्य कश्चिद्वसेद्गे शक्ति तोऽनर्चितोऽतिथिः ।। 29 ॥
जिस गृहस्थ के घर में बैठने के लिए आसन, भूख मिटाने के लिए भोजन, आराम करने के लिए शय्या, प्यास मिटाने के लिए पानी और फल आदि नहीं मिलते वहां अतिथि के रूप में नहीं जाना चाहिए।
पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडालव्रतिकाञ्छठान् ।
हैतुकान्वकवृत्तींश्च वाड्मात्रेणापि नार्चयेत् ॥ 30 ।।
जो व्यक्ति पाखण्डी हो, दुष्ट कर्मों को करने वाला हो, दूसरों को मूर्ख बनाकर उनका धन लूटने वाला हो, दूसरों को दुःख पहुंचाने वाले स्वभाव का हो, वेदों में श्रद्धा नहीं रखता हो, अंदर से दुष्ट स्वभाव का पर ऊपर से सज्जन दिखाई देता हो, ऐसे व्यक्ति को अतिथि रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए।
कहने का अभिप्राय यह है कि जहां एक ओर अतिथि सेवा धर्म का एक अंग है वहीं ऊपर बताए गए दुर्गुणों वाले व्यक्तियों का वाणी तथा शिष्टाचार द्वारा भी स्वागत नहीं करे।
वेदविद्याव्रतस्नाताञ्छ्रोत्रियान्गृहमेधिनः ।
पूजयेद्धव्यकव्येन विपरीतांश्च वर्जयेत् ॥31॥
गृहस्थ को वेदाध्ययन पूरा कर, गुरुकुल से वापिस आने वालों, वेदों का अध्ययन करने वालों और घर में नित्य यज्ञ-हवन करने वालों के अतिथि बनकर आने पर उनकी पूजा करनी चाहिए लेकिन जिन लोगों में इसके विपरीत लक्षण हों उनको अतिथि रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए।
शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधिना।
संविभागश्च भूतेभ्यः कर्तव्योऽनुपरोधतः ।। 32 ।।
अच्छे गृहस्थ को ब्रह्मचारी और संन्यासी को अपनी सामर्थ्यानुसार भिक्षा दान देना चाहिए तथा अतिथि बनकर आए सभी जीवों को भेद-भाव रहित होकर उनके भाग का पका भोजन या अन्न और जल देना चाहिए।
राजतो धनमन्विच्छेत्संसीदन्स्नातकः क्षुधा। याज्यान्तेवासिनोर्वाऽपि न त्वन्यत इति स्थितिः ॥ 33 ॥
स्नातक को भूख से पीड़ित होने पर राजा से, अपने यजमान तथा शिष्य से अन्न-धन आदि मांगना चाहिए। इन तीनों के अतिरिक्त अन्य से नहीं मांगना चाहिए।
न सीदेत्स्नातको विप्रः क्षुधाशक्तः कथञ्चन ।
न जीर्णमलवद्वासा भवेच्च विभवे सति ।। 34 ॥
स्नातक ब्राह्मण भूखा नहीं रहे और किसी भी तरह दुखी नहीं रहे तथा धन होने पर फटे या मैले वस्त्र नहीं पहने।
क्लृप्तकेशनखश्मश्रुर्दान्तः शुक्लाम्बरः शुचिः ।
स्वाध्याये चैव युक्तः स्यान्नित्यमात्महितेषु च ॥ 35 ।।
स्नातक नाखून, सिर के बाल, दाढ़ी और मूंछ कटवाएं। अपनी इंद्रियों पर संयम रखते हुए पवित्र रहे तथा सफेद वस्त्र पहने। वह नित्य वेद का पाठ करे एवं अपने कल्याण में लगा रहे।
वैणवीं धारयेद्यष्टिं सोदकं च कमण्डलुम्।
यज्ञोपवीतं वेदं च शुभे रौक्मे च कुण्डले ॥36॥
ब्राह्मण गृहस्थ बांस की छड़ी, पानी भरा कमण्डल, यज्ञोपवीत एवं वेद अपने पास रखे तथा सोने के दो सुन्दर कुण्डलों को पहनें।
नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं नास्तं यान्तं कदाचन।
नोपसृष्टं न वारिस्थं न मध्यं नभसो गतम् ॥ 37 ॥
उदय होते और अस्त होते हए, ग्रहण लगे हए, जल में प्रतिबिम्बित (सूर्य की पानी पडती आकृति) और आकाश के मध्य में स्थित सूर्य को कभी नहीं देखे।
उदय और अस्त होते हुए सूर्य को नहीं देखने से अभिप्राय 'उदय होने के बाद टिप्पणा और अस्त होते हुए से 'अस्त होने से कुछ पूर्व' का है क्योंकि उस समय तक सूर्य का प्रकाश इतना तीव्र हो जाता है कि नेत्रों को हानि पहुंचा सकता है।
न लङ्घयेद्वत्सतन्त्रीं न प्रधावेच्च वर्षति।
न चोदके निरीक्षेत स्व-रूपमिति धारणा ॥ 38 ॥
खूंटे से बंधे बछड़े की रस्सी को नहीं लांघे, वर्षा होने पर दौड़े नहीं और जल में अपनी परछाईं नहीं देखें।
टिप्पणी- यह सभी आदेश तत्कालीन परिस्थितियों में व्यक्ति की सुरक्षा को दृष्टि में रख कर दिए गए थे।
मृदं गां दैवतं विप्रं घृतं मधु चतुष्पथम्।
प्रदक्षिणानि कुर्वीत प्रज्ञातांश्च वनस्पतीन् ॥ 39 ।।
कहीं आते या जाते समय मार्ग में मिलने वाले मिट्टी के टीलों, गउओं, ब्राह्मणों, घी और शहद के भण्डारों, नगर के चौराहों तथा परिचित बड़े-बड़े वृक्षों की प्रदक्षिणा (दक्षिण की ओर होकर) करके जाना चाहिए।
टिप्पणी- यहां प्रदक्षिणा से अभिप्राय वर्णन की गई वस्तुओं, वृक्षों, विद्वानों के प्रति आदर भाव प्रकट करने से है।
नोपगच्छेत्प्रमत्तोऽपि स्त्रियमार्तवदर्शने।
समानशयने चैव न शयीय तया सह ॥ 40 ॥
कामवासना से ग्रस्त होने पर भी व्यक्ति रजस्वला नारी के समीप नहीं जाए अर्थात् उससे संभोग नहीं करे। यही नहीं वरन् उसके साथ एक बिस्तर पर शयन भी नहीं करे।
रजसाभिलुप्तां नारीं नरस्य ह्यपगच्छतः ।
प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रहीयते ।। 41 ॥
जो पुरुष रजस्वला स्त्री के साथ संभोग करता है उसका तेज, बल, बुद्धि, दृष्टि और आयु कम और कमजोर हो जाती है।
तां विवर्जयतस्तस्य रजसा समभिप्लुताम्।
प्रज्ञा तेजो बलं चक्षरायश्चैव प्रवर्धते ।। 42 ||
रजस्वला स्त्री के साथ संभोग का त्याग करने वाले पुरुष की बुद्धि, तेज, बल, आंखें एवं आयु में वृद्धि होती है।
नाश्नीयाद्भार्यया सार्द्ध नैनामीक्षेत चाश्नतीम् ।
क्षुवर्ती जृम्भमाणां वान्न चासीनां यथासुखम् ।। 43 ।।
नाञ्जयन्तीं स्वके नेत्रे न चाभ्यक्तामनावृताम्।
न पश्येत्प्रसवन्तीं च तेजस्कामो द्विजोत्तमः ।। 44 ।।
इन श्लोकों में मनु महाराज ने पुरुषों को विशेष रूप से विद्वान ब्राह्मणों को यह निर्देश दिए हैं कि वे स्त्रियों को कुछ विशेष स्थितियों में नहीं देखें तथा उनके साथ भोजन नहीं करें। वास्तव में उस समय के समाज में ब्राह्मण के जीवन का लक्ष्य ब्रह्मज्ञान की उपलब्धि होता था। इसमें काम वासना सबसे बड़ी बाधा है। इस बाधा से दूर रहने के लिए ही यह उपदेश दिए गए थे। अपने तेज की रक्षा की कामना रखने वाला ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ भोजन नहीं करे और न उसे भोजन करते हुए देखे। छींकती, जम्हाई लेती और अपनी सुविधा के अनुसार निश्चिंत बैठी, अपनी आंखों में अंजन लगाती, नग्न होकर अपने शरीर पर तेल मर्दन करती या नग्न स्त्री और बच्चे को जन्म देती स्त्री को कभी नहीं देखे।
नान्नमद्यादेकवासा न नग्नः स्नानमाचरेत् ।
न मूत्रं पथि कुर्वीत न भस्मनि न गोव्रजे ॥ 45 ।।
न फालकृष्टे न जले न चित्यां न च पर्वते।
न जीर्णदेवायतने न वल्मीके कदाचन् ॥ 46 ।।
ब्राह्मण केवल एक वस्त्र धारण कर भोजन नहीं करे (अर्थात् केवल धोती, लंगोट या जांघिया पहनकर भोजन भक्षण नहीं करे) तथा पूर्णतः वस्त्र उतार कर (नग्न होकर) नहाए नहीं। मार्ग में, चिता में, यज्ञशाला में तथा बांबी में मूत्र त्याग नहीं करे।
न ससत्त्वेषु गर्तेषु गच्छन्नपि च स्थितः ।
न नदीतीरमासाद्य न च पर्वतमस्तके ॥ 47 ।।
वाय्वग्निविप्रमादित्यमपः पश्यंस्तथैव गाः।
न कदाचित्कुर्वीत विण्मूत्रस्य विसर्जनम् ॥ 48 ॥
ब्राह्मण को चाहिए कि वह चलते हुए या खड़े होकर, जीव-जंतुओं के रहने वाले बिलों में नदी तट पर, पर्वतों के शिखर पर, वायु, अग्नि, ब्राह्मण, सूर्य और जल को देखते हुए मल-मूत्र का त्याग नहीं करे।
तिरस्कृत्योच्चरेत्काष्ठलोष्ठपत्रतृणादिना ।
नियम्य प्रयतो वाचं संवीताङ्गोऽवगुण्ठितः ।। 49 ।।
मूत्रोच्चारसमुत्सर्गं दिवा कुर्यादुदङ्मुखः ।
दक्षिणाभिमुखो रात्रौ सन्ध्ययोश्च यथा दिवः ॥ 50॥
प्रातःकाल और सायंकाल उत्तर की ओर मुख करके तथा रात के समय (जरूरत पडने पर) दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके मल-मूत्र त्यागना चाहिए मल-मूत्र त्याग करने की जगह को (चारों ओर से) मिट्टी के देले और घास-फूस आदि से छिपा देना चाहिए ताकि मल-मूत्र त्याग करने वाले को कोई देख न सके नहीं हो। मल-मूत्र त्याग की अवधि में चप रहना चाहिए। घुटनों के बल बैठना चाहिए और सिर को कपड़े से ढक लेगा और उसे स्वयं भी लज्जा का अनुभव चाहिए।
छायायामन्धकारे वा रात्रवहनि वा द्विजः ।
यथासुखमुखः कुर्यात्प्राणबाधाभयेषु च ॥ 51 ।।
ब्राह्मण को अंधेरे में या छाया में, रात अथवा दिन में दिशा ज्ञान नहीं होने पर अपनी सुरक्षा तथा सुविधा को ध्यान में रखते हुए जिस दिशा की ओर मुख करके बैठना संभव हो बैठकर मल-मूत्र का त्याग करना चाहिए।
प्रत्यग्नि प्रतिसूर्य च प्रतिसोमोदकद्विजम्।
प्रतिगां प्रतिवातं च प्रज्ञा नश्यति मेहतः ।। 52 ।।
उस व्यक्ति की बुद्धि नष्ट हो जाती है जो आग, सूरज, चांद, पानी, ब्राह्मण, गाय और हवा के सामने मल-मूत्र का त्याग करता है।
नाग्निं मुखेनोपधमेन्नग्नां नेक्षेत च स्त्रियम्।
नामेध्यं प्रक्षिपेदग्नौ न च पादौ प्रतापयेत् ॥ 53 ॥
आग को मुंह से नहीं फूंके और नारी को नग्न अवस्था में नहीं देखे। आग में मल-मूत्र नहीं फेंके तथा आग के सामने पैर रखकर नहीं तापे।
अधस्तान्नोपदध्याच्च न चैनमभिलङ्घयेत।
न चैनं पादतः कुर्यान्न प्राणबाधामाचरेत् ॥ 54 ॥
आग को किसी तरह के सामान (जैसे- मेज, कुर्सी, पलंग आदि) के नीचे नहीं रखे, आग को लांघे नहीं, पैरों को आग पर नहीं रखे और न ही कोई ऐसा कार्य करे जिससे जीवों के प्राण में बाधा पड़े अर्थात् वे मर जाएं।
नाश्नीयात्सन्धिवेलायां न गच्छेन्नापि संविशेत्।
न चैव प्रलिखेद्भूमिं नात्मनोऽपहरेत्त्रजम् ॥ 55 ॥
सन्ध्या में भोजन भक्षण, यात्रा और विश्राम नहीं करें। धरती पर लकीर नहीं खींचें और अपने गले में पहनी हई माला को नहीं उतारें।
नाप्सु मूत्रं पुरीषं वाष्ठीवनं वा समुत्सृजेत्।
अमेध्यमलिप्तमन्यद्वा लोहतं वा विषाणि वा ॥ 56 ।।
पानी में मल-मूत्र, कूड़ा, खून तथा जहर आदि नहीं बहाएं। इससे जल प्रदूषित हो जाता है, पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है तथा मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है।
नैकः शून्यगृहे स्वप्यान्न श्रेयांसं प्रबोधयेत् ।
नोदक्ययाऽभिभाषेत यज्ञं गच्छेन्न चावृतः ॥ 57 ॥
जिस घर में कोई न हो वहां अकेले नहीं सोए, सोते हुए अपने से बड़े हितकारी को जगाए नहीं, रजस्वला स्त्री से बातचीत नहीं करे और बिना आमंत्रण पाए किसी के यज्ञ में शामिल नहीं हो।
अग्न्यगारे गवां गोष्ठे ब्राह्मणानां च सन्निधौ ।
स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् ॥ 58 ॥
अग्निहोत्र में, गौओं के निवास स्थान में, ब्राह्मणों के समीप, वेद-शास्त्र आदि पढ़ते समय और भोजन के समय (आवश्यकता पड़ने पर) अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाएं।
नवारयेद् गां धयन्तीं न चाचक्षीत कस्यचित्।
न दिवीन्द्रायुधं दृष्ट्वा कस्यचिद्दर्शयेद् बुधः ॥ 59 ।।
बुद्धिमान को जल पीती हुई गाय को स्वयं को हांकना नहीं चाहिए और न ही दूसरों से हंकवाना चाहिए। आकाश में इन्द्रधनुष देखकर दूसरों को उसे देखने के लिए नहीं कहना चाहिए।
नाधार्मिके वसेद् ग्रामे न व्याधिबहुले भृशम् ।
नैकः प्रपद्येताध्वानं न चिरं पर्वते वसेत् ॥ 60 ॥
ब्राह्मण को उस गांव में निवास नहीं करना चाहिए जहां धर्म पर अविश्वास करने वाले रहते हों या जहां रोग फैला हो। उसे एकाकी (अकेले) ही यात्रा नहीं करनी चाहिए तथा लंबे समय तक पहाड़ पर नहीं रहना चाहिए।
न शूद्रराज्ये निवसेन्नाधार्मिकजनावृते ।
न पाषण्डिगणाक्रान्ते नोपसृष्टेऽन्त्यजैर्नृभिः ॥ 61 ॥
विद्वान ब्राह्मण शुद्रों के राज्य में धर्म को न मानने वाले लोगों तथा चाण्डालों से भरे प्रदेशों में निवास नहीं करें।
न भुञ्जीतोद्धृतस्नेहं नातिसौहित्यमाचरेत्।
नातिप्रगे नातिसायं न सायं प्रातराशितः ।। 62 ॥
खाए जाने वाले पदार्थ के रस (उसकी चिकनाई, तेल आदि) को निचोड़ कर भोजन नहीं करें, कई बार पेट पूरी तरह भरकर भोजन नहीं करें, बहुत सवेरे अथवा बहुत शाम हो जाने पर भोजन नहीं करें। प्रातःकाल (पूर्वान्ह में) भरपेट भोजन से तृप्त होने के बाद पुनः शाम को भोजन नहीं करें।
टिप्पणी - आशय यह है कि भोजन सदैव रसयुक्त पदार्थों का करे, अपनी भूख से कुछ कम करे और अगर एक बार खूब भर पेट भोजन कर लें तो दूसरी बार भोजन नहीं करें।
न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्यञ्जलिना पिबेत्।
नोत्सङ्गे भक्षयेद् भक्ष्यान्नं जातु स्यात्कुतूहली ।। 63 ।।
जिस कार्य से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में अच्छा फल नहीं मिलता हो, उसकी चेष्ट नहीं करें, अंजलि से जल नहीं पिए, भोजन को गोद में रखकर नहीं खाएं और बिना प्रयोजन का कुतूहल नहीं करें।
न नृत्येन्नैव गायेन वादित्राणि वादयेत्।
नास्फोटयेन्न च वेडेन्न च रक्तो विरोधयेत् ।। 64 ।।
नाचना-गाना, वाद्य यंत्र बजाना (जो शास्त्र विरुद्ध हो), ताल ठोंकना (जैसा पहलवान कुश्ती लड़ते समय करते हैं), दांत पीसकर बोलना और अनुरक्त होकर विपरीत शब्द गधे आदि की तरह रेंकना (जैसे अत्यधिक प्रेम वश हो गाली आदि देना) इन सभी कार्यों को नहीं करें।
न पादौ धावयेत्कांस्ये कदाचिदपि भाजने।
न भिन्नभाण्डे भुञ्जीत न भावप्रतिदूषिते ॥ 65 ।
अपने पैर कभी कांसे की धातु से बने पात्र में धंसाने नहीं चाहिए तथा अपने विरोधी/ शत्रु के घर में भोजन नहीं करना चाहिए।
उपानहौ च वासश्च धूतमन्यैर्न धारयेत् ।
उपवीतमलङ्कारं स्रजं करकमेव च ॥ 66॥
उन पदत्राणों (जूते, चप्पल आदि), वस्त्रों, मालाओं, यज्ञपवीतों, जेवरों, फूल मालाओं और कमण्डलों का उपयोग कभी नहीं करना चाहिए जिन्हें दूसरों द्वारा प्रयोग में लाया जा चुका है।
नाविनीतैर्ब्रजे दुर्यैर्न क्षुधाव्याधिप्रपीडितैः ।
न भिन्नशृङ्गाक्षिखुरैर्न वालधिविरूपितैः ।। 67 ।।
ऐसे वाहनों (जैसे-बैलगाड़ी, घोड़ा गाड़ी, ऊंट या हाथी की गाड़ी) जिनके पशु उद्धत हों, रोग पीड़ित या भूखे हों, कटे सींग वाले हों, जिनकी दृष्टि खराब हो और जिनके खुर टूटे हुए हों पर सवारी नहीं करना चाहिए।
विनीतैस्तु व्रजेन्नित्यमाशुगैर्लक्षणान्वितैः ।
वर्णरूपोपसम्पन्नैः प्रतोदेनाक्षिपन्भृशम् ।। 68 ।।
अच्छी तरह सधाए गए, तीव्रगामी, अच्छे लक्षणों वाले, भले लगने वाले रूप-रंग के वाहनों की सवारी करनी चाहिए। वाहन को स्वच्छ रखना चाहिए ताकि उसमें कीड़े आदि नहीं लगें।
बालातपः प्रेतधूमो वर्ज्य भिन्नं तथाऽऽसनम् । नच्छिन्द्यान्नखरोमणि दन्तैर्नोत्पाटयेन्नखान् ।। 69 ।।
सूर्य के उदय होने के बाद की धूप का, शव की चिता के धुएं का और टूटे आसन (कुर्सी आदि) का उपयोग नहीं करे। अपने नखों और बालों को खींच कर नहीं उखाड़े तथा नाखूनों को दांतों से नहीं काटें।
न मृल्लोष्ठं च मृट्टीयान्न च्छिन्द्यात्करजैस्तृणम् ।
न कर्म निष्फलं कुर्यान्नायत्यामसुखोदयम् ।। 70 ।।
स्वयं के सुख-सौभाग्य की इच्छा रखने वाले को मिट्टी के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए तथा मिट्टी के पात्र को स्वच्छ नहीं करना चाहिए (अर्थात् यदि मिट्टी के पात्र उपयोग करना पड़े तो उसे एक बार उपयोग में लाने के बाद फेंक दें)। नखों (अपने नाखूनों) से घास आदि नहीं काटे और भविष्य में दुःख देने वाले कार्यों को नहीं करें।
लोष्ठमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः।
स विनाशं व्रजत्याशु सूचकोऽशुचिरेव सः ॥ 71 ||
ऐसा व्यक्ति शीघ्र ही अपने नाश को प्राप्त होता है जो मिट्टी के बरतन या मिट्टी के ढेले को साफ करता है, तिनकों को उखाड़ता है, अपने नाखूनों को चबाता है, चुगलखोरी करता है और अपवित्र अर्थात् अस्वच्छ रहता है।
न विगृह्य कथां कुर्याद् बहिर्माल्यं न धारयेत् ।
गवां च यानं पृष्ठेन सर्वथैव विगर्हितम् ।। 72 ॥
उच्छृंखल होकर वार्तालाप करना अर्थात बातचीत करते समय शिष्टाचार तथा मर्यादा का ध्यान नहीं रखना, दसरों को दिखाने के लिए कपडों के बाहर सोने को माला पहनना और बैल की पीठ पर सवारी करना निन्दनीय कार्य है। अत: इन्हें नहीं करे।
अद्वारेण च नातीयाद्यामं वा वेश्म वा वृतम्।
रात्रौ च वृक्षमूलानि दूरतः परिवर्जयेत् ।। 73 ॥
लोगों से घिरे किसी गांव या घर में प्रवेश द्वार के अतिरिक्त किसी अन्य जगह से (जैसे दीवार आदि फांदकर या छत से कूदकर) प्रवेश नहीं करें। रात में पेड के नीचे रहें।
नाक्षैः क्रीडेत् कदाचित्तु स्वयं नोपानहौ हरेत्।
शयनस्थो न भुञ्जीत न पाणिस्थं न चासने ।। 74 ॥
जुआ कभी नहीं खेले और जूते कभी हाथ में उठाकर नहीं चले। बिस्तर पर बैठकर या सोते हुए अथवा हाथ में रखकर भोजन नहीं करें।
सर्वं च तिलसम्बद्धं नाद्यादस्तमिते रवौ।
न च नग्नः शयीतेह न चोच्छिष्टः क्वचिद्वजेत् ।। 75 ॥
सूर्य अस्त होने के बाद तिलयुक्त भोज्य पदार्थ नहीं खाएं, निपट नग्न होकर नहीं सोएं और जूठे मुंह (बिना कुल्ला किए) कहीं बाहर नहीं जाएं।
आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत नार्द्रपादस्तु संविशेत्।
आर्द्रपादस्तु भुञ्जानोः दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥ 76 ।।
पैरों को गीला करके भोजन करे परन्तु गीले पैर करके सोने नहीं जाएं। गीले पैर करके भोजन करने वाला लंबी आयु प्राप्त करता है।
अचक्षुर्विषयं दुर्गं न प्रपद्येत कर्हिचित्।
न विण्मूत्रमुदीक्षेत न बाहुभ्यां नदीं तरेत् ॥ 77 ॥
नहीं दिखने वाले दुर्गम स्थान (ऐसी जगह जो लता आदि या अन्य कारण से स्पष्ट नहीं दिखाई देती) में कभी नहीं जाएं, मल-मूत्र को नहीं देखें और केवल अपने हाथों के भरोसे नदी को तैर कर पार नहीं करें अर्थात् नदी पार करने के लिए नाव आदि का उपयोग करें।
अधितिष्ठेन्न केशांस्तु न भस्मास्थिक पालिकाः।
न कार्पासास्थि न तुषान्दीर्घमायुर्जिजीविषुः ।। 78 ।।
जो व्यक्ति लम्बी आयु पाने की कामना रखता है उसे कभी बालों, भस्म, हड्डी, खप्पर, कपास की गुठली (बिनौला) तथा भूसे के ढेर पर नहीं बैठना चाहिए।
न संवसेच्च पतितैर्न चाण्डालैर्न पुल्कसैः ।
न मूर्खेर्नावलिप्तैश्च नान्त्यैर्नान्त्यावसायिभिः ।। 79 ॥
समाज और जाति द्वारा निष्कासित (पतित) लोगों, शूद्र से ब्राह्मणों में उत्पन्न (चाण्डालों) लोगों, निषादों द्वारा शूद्र स्त्रियों से जन्मे लोगों पुल्कसों, मूर्खजनों, धन या विद्या आदि के घमण्ड से भरे लोगों, अछूतों (अन्त्यजों) एवं चाण्डालों द्वारा निषाद स्त्रियों से जन्मे लोगों (अन्त्यावसायियों) के संग नहीं रहना चाहिए।
न शूद्राय मतिं दद्यान्नोच्छिष्टं न हविष्कृतम्।
न चास्योपदिशेद्धर्म न चास्य व्रतमादिशेत् ॥ 8० ।।
शूद्र को किसी प्रकार की सलाह, यज्ञ होम की बची सामग्री, धर्म का उपदेश तथा किसी प्रकार के व्रत का अनुष्ठान करने का निर्देश नहीं देना चाहिए (अगर शूद्र को किसी तरह का प्रायश्चित करने के लिए बताना हो तो यह कार्य ब्राह्मण द्वारा होना चाहिए)।
यो ह्यस्य धर्ममाचष्टे यश्चैवादिशति व्रतम्।
सोऽसंवृतं नाम तमः सह तेनैव मज्जति ॥ 81 ॥
वह व्यक्ति जो शूद्र को धर्म का उपदेश देता है या किसी व्रत का अनुष्ठान करने का निर्देश देता है, 'असंवृत' नाम के घने अंधेरे से भरे नरक में उस शूद्र के साथ जाता है।
न संहताभ्यां पाणिभ्यां कण्डूयेदात्मनः शिरः ।
न स्पृशेच्चैतदुच्छिष्टो न च स्नायाद्विना ततः ।। 82 ।।
सिर को दोनों जुड़े और जूठे हाथों से स्पर्श नहीं करें और न खुजलाएं। सिर पर जल डाले बिना नहाना नहीं चाहिए।
केशग्रहान्प्रहारांश्च शिरस्येतान्विवर्जयेत् ।
शिरः स्नातश्च तैलेन नाङ्गं किञ्चिदपि स्पृशेत् ॥ 8३ ।।
सिर पर प्रहार नहीं करना चाहिए। सिर के बालों को पकड़ कर खींचना नहीं चाहिए। सिर पर तेल लगाने के बाद शरीर के दूसरे अंगों का स्पर्श नहीं करना चाहिए।
न राज्ञः प्रतिगृह्णीयादराजन्यप्रसूतितः ।
सूनाचक्रध्वजवतां वेशेनैव च जीवताम् ॥ 84 ॥
क्षत्रिय के अतिरिक्त भिन्न वर्ण से जन्मा और राजा बना व्यक्ति अगर दान-दक्षिणा दे तो ब्राह्मण को नहीं लेनी चाहिए। जीवों को मारने वाले, रथ चलाने वाले और सूरा (शराब) बेचकर अपनी जीविका चलाने वाले से भी सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए अर्थात् उनके धर्मानुष्ठान आदि नहीं कराने चाहिए।
दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः ।
दशध्वजसमोवेशो दशवेशसमो नृपः ॥ 85 ॥
दस हिंसकों या कसाई के बराबर एक रथवान है (कुछ अनुवादकों ने रथवान के स्थान पर तेली शब्द का उपयोग किया है)। एक शराब बेचने वाला दस रथवान के बराबर है, एक बहुरूपिया (वेश बदल कर जीविका कमाने वाला या वेश्या का सेवक) दस कसाइयों के बराबर है और एक राजा दस बहुरूपियों के समान है।
कहने का अभिप्राय यह है कि ये सब उत्तरोत्तर एक-दूसरे से निम्न कोटि के हैं। यहां राजा का अर्थ उस राजा से है जो क्षत्रिय नहीं है।
दशसूनासहस्त्राणि यो वाहयति सौनिकः ।
तेन तुल्यः स्मृतो राजा घोरस्तस्य प्रतिग्रहः ।। 86 ॥
अपनी जीविका के लिए दस हजार जीवों की हत्या करने वाले को सौनिक कहते हैं। जो राजा क्षत्रिय नहीं है वह सौनिक के समान ही निम्न कोटि का है। उससे दान लेना घोर पाप कमाने के समान है।
यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति लुब्धस्योच्छास्त्रवर्तिनः ।
सः पर्यायेण यातीमान्नरकानेकविंशतिम् ॥ 87 ॥
लोभ या कंजूसी के कारण ऊपर बताए निम्न कोटि के राजा से दान लेने वाला ब्राह्मण आगे कहे जाने वाले 21 प्रकार के नरकों में क्रमानुसार पतित होता है।
तामिस्त्रमन्धतामिस्त्रं महारौरवरौरवौ।
नरकं कालसूत्रं च महानरकमेव च ॥ 88॥
सञ्जीवनं महावीचिं तपनं सम्प्रतापनम् ।
सङ्घातं च सकाकोलं कुड्मलं प्रतिमूर्तिकम् ॥ 89 ॥
लोहशङ्कुमृजीषं च पन्थानं शाल्मली नदीम् ।
असिपत्रवनं चैव लो हदारकमेव च ॥90॥
ये इक्कीस तरह के नरक हैं- 1. तामिस्त्र 2. अन्धतामिस्त्र 3. महारौरव 4. रौरव 5. नरक 6. कालसूत्र 7. महानरक 8.सञ्जीवन 9. महावीचि 10. तपन 11. सम्प्रतापन 12. सङ्घात 13. सकाकोल 14. कुड्मल 15. प्रतिमर्तिक 16.लोहराडू 17. ऋजीष 18. पन्थान 19. शाल्मली नदी 20. असिपत्रवन 21. लोहदरक।
एतद्विदन्तो विद्वांसो ब्राह्मणाः ब्रह्मवादिनः ।
न राज्ञः प्रतिगृह्णान्ति प्रेत्यश्रेयोऽभिकांक्षिणः ॥ 91 ।।
ऐसे राजा से, जो क्षत्रिय नहीं, ब्रह्मज्ञानी तथा परलोक में सद्गति पाने के इच्छुक ब्राह्मण परिणाम को अच्छी तरह जानने के कारण किसी तरह का दान नहीं लेते।
ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थों चानुचिन्तयेत्।
कायक्लेशांश्च तन्मूलान्वेदतत्त्वार्थमेव च ।। 92 ॥
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः लगभग चार बजे) में उठकर धर्म के अनुष्ठान और धन कमाने के सम्बन्ध में विचार करना चाहिए। इन कार्यों में होने वाले शारीरिक क्लेशों को दूर करने तथा वेदों के तत्व ज्ञान के बारे में भी विचार करना चाहिए ताकि दिन सुखपूर्वक व्यतीत हो।
उत्थायावश्यकं कृत्वा कृतशौचः समाहितः ।
पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत्स्वकाले चापरां चिरम् ॥ 93 ॥
ब्रह्म मुहूर्त में उठने के बाद मल-मूत्र त्याग कर, दांतों को मांज कर और स्नान आदि करके सावधानी और पवित्रता से प्रातः काल की सन्ध्या-पूजा जप आदि करें।
ऋषयो दीर्घसन्ध्यत्वाद्दीर्घमायुरवाप्नुयुः ।
प्रज्ञां यशश्च कीर्ति च ब्रह्मवर्चसमेव च ॥ 94 ॥
महर्षि मनु आगे बताते हैं कि ऋषियों ने लम्बी अवधि तक सन्ध्या-उपासना करके ही दीर्घायु, बुद्धि, यश, कीर्ति तथा ब्रह्मतेज प्राप्त किया।
श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वाऽप्युपाकृत्य यथाविधिः । युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान्विप्रोऽर्धपञ्चमान् ॥ 95 ।।
श्रावण तथा भाद्रपद (सावन-भादों) की पूर्णमासी को उपनयन धारण करके (उपाकर्म) चार माह तक चित्त को एकाग्र करके वेदों का पाठ करना चाहिए।
पुष्ये तु च्छन्दसां कुर्याद्बहिरुत्सर्जनं द्विजः ।
माघशुक्लस्य वा प्राप्ते पूर्वाह्न प्रथमेऽहनि ॥ 96 ॥
माघ माह के प्रथम दिन या पुष्प नक्षत्र वाली पूर्णिमा को पूर्वाह्न के समय गांव के बाहर जाकर वेदपाठ के उपसर्ग की घोषणा करनी चाहिए।
यथाशास्त्रं तु कृत्वैवमुत्सर्ग छन्दसा बहिः ।
विरमेत्यक्षिणीं रात्रिं तदेवैकमहर्निशम् ।। 97 ॥
शास्त्र में बताई विधि से गांव के बाहर जाकर वेदपाठ की समाप्ति की घोषणा के बाद उस रात्रि-दिवस अथवा उस रात्रि को अनध्याय करे।
अत ऊर्ध्वं तु छन्दांसि शुक्लेषु नियतः पठेत् ।
वेदाङ्गानि च सर्वाणि कृष्णपक्षेषु सम्पठेत् ॥ १8 ।।
ब्राह्मण को वेद के उत्सर्ग तथा अनध्याय बाद शुक्ल पक्ष में वेदों के एवं कृष्णया पक्ष में वेदांगों के स्वाध्याय का नियम बना लेना चाहिए।
नाविस्पष्टमधीयीत न शूद्रजनसन्निधौ।
न निशान्ते परिश्रान्तो ब्रह्माधीत्य पुनः स्वपेत् ॥ 99 ॥
ब्राह्मण वेदों को अस्पष्ट रूप में नहीं पढ़े और न ही शूद्र के समीप होने पर पढ़े। प्रभात की वेला में उसे वेद पाठ करने के बाद थका होने पर भी फिर से निद्रा लेनी चाहिए।
यथोदितेन विधिना नित्यं छन्दस्कृतं पठेत्।
ब्रह्मच्छन्दस्कृतं चैव द्विजो युक्तो ह्यनापदि ॥ 100 ।।
ब्राह्मण विधि के अनुसार प्रतिदिन वेदों का पाठ करे। आपत्ति का समय न होने पर अर्थात् सामान्य स्थिति में वह नियमपूर्वक वेदपाठ और गायत्री मंत्र का जाप करे।
इमान्नित्यमनध्यायानधीयानो विवर्जयेत्।
अध्यापनं च कुर्वाणः शिष्याणां विधिपूर्वकम् ॥ 101 ॥
आगे बताए मना किए गए अनध्याय के दिनों में ब्राह्मण वेदों का अध्ययन नहीं करे और न अपने शिष्यों को ऐसा करने की (अर्थात् वेद पाठ करने की) अनुमति दे।
कर्णश्रवेऽनिले रात्रौ दिवा पांसुसमूहने।
एतौ वर्षास्वनध्यायवध्यायज्ञः प्रचक्षते ॥ 102 ।।
बरसात के मौसम में रात में सांय-सांय ध्वनि के द्वारा कानों को पीड़ा देने वाली वायु और दिन में धूल भरी हवा के चलने पर वेदों का पाठ नहीं करे। ये दो अनध्याय कहे गए हैं।
विद्युत्स्तनितवर्षेषु महोल्कानां च सम्प्लवे।
आकालिक मनध्यायमेतेषु मनुरब्रवीत् ।। 103 ॥
उल्का के गिरने के साथ बिजली की चमक और मेघों के गर्जन के साथ यदि वर्षा हो रही हो, तो मनु ने उसे आकालिक (उस समय से लेकर दूसरे दिन तक) और अनध्याय का समय कहा है।
एतांस्त्वभ्युदितान्विद्याद्यदा प्रादुष्कृताग्षुि। तदा विद्यादनध्यायमनृतौ चाभ्रदर्शने ।। 104 ।।
महर्षि मनु ने यह भी कहा है कि वर्षा ऋतु के अलावा किसी अन्य ऋतु में अगर आकाश में बादल दिखाई दें या अग्निहोत्र के समय पानी बरसने की सम्भावना हो तो भी वेदों का अध्ययन नहीं करें। इसे भी अनध्याय काल मानना चाहिए।
निर्घाते भूमिचलने ज्योतिषां चोपसर्जने । एतानाकालिकान्विद्यादनध्यायानृतावपि ।। 105 ।।
अन्य उन ऋतुओं के दिनों में भी वेदपाठ नहीं करना चाहिए जिनमें प्रायः भूकम्प, उल्कापात तथा सूर्य आदि ग्रहों के उपद्रव होते हैं। जैसे- अत्यधिक गर्मी या सर्दी पड़ जाना। इन दिनों को भी अनध्याय काल मानना चाहिए।
प्रादुष्कृतेष्वग्निषु तु विद्युत्स्तनितनिः स्वने।
सज्योतिः स्यादनध्यायः शेषे रात्रौ यथा दिवा ॥ 106 ॥
हवन के लिए आग जलाने के समय अगर आकाश में बिजली चमक रही हो और बादल गरज रहे हों तो दिनभर वेदों का अध्ययन नहीं करना चाहिए। शेष काल में, दिन या रात में समय विशेष तक (अर्थात् जब तक बादल गरज रहे हों और बिजली चमक रही हो या वर्षा हो रही हो) वेद पाठ नहीं करना चाहिए।
नित्यानध्याय एव स्याङ्ग्रामेषु नगरेषु च।
धर्मनैपुण्यकामानां पूतिगन्धे च सर्वदा ॥ 107 ॥
धर्म में निपुणता प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले को गांव या नगर में वेदों का अध्ययन नहीं करना चाहिए। वहां उसके लिए नित्य अनध्याय है। ऐसे व्यक्ति के लिए वन में वेदों का अध्ययन करना ही सर्वोत्तम है। दुर्गन्ध से भरी जगह में कभी स्वाध्याय नहीं करे।
अन्तर्गतशवे ग्रामे वृषलस्य च सन्निधौ।
अनध्यायो रुद्यमाने समवाये जनस्य च ॥ 108 ॥
उन स्थानों पर भी वेदों का अध्ययन नहीं करे जहां गांव में कोई मृतक पड़ा हो. कोई धर्म से भ्रष्ट व्यक्ति पास में हो, जहां लोगों की भीड हो और जहां रुदन या कोहराम मचा हो।
उदके मध्यरात्रौ च विण्मूत्रस्य विसर्जने।
उच्छिष्टः श्राद्धभुक्चैव मनसाऽपि न चिन्तयेत् ॥ 109 ।।
उस समय वेद पाठ करने का मन में विचार तक नहीं करना चाहिए जब व्यक्ति जल में हो, आधी रात हो, मल-मूत्र का त्याग कर रहा हो, जूठे मुंह हो और श्राद्ध भोजन कर रहा हो।
प्रतिगृह्य द्विजो विद्वानेकोद्दिष्टानि केतनम्।
त्र्यहं न कीर्तयेद्ब्रह्म राज्ञो राहोश्च सूतके ॥ 110 ।।
श्राद्ध-निमन्त्रण स्वीकार लेने पर, राजा के घर सन्तान जन्म से होने वाली अपवित्रता (सूतक) होने पर तथा सूर्य या चन्द्र ग्रहण लगने पर तीन दिन तक का अनध्याय रखे।
यावदेकानुदिष्टस्य गन्धलेपश्च तिष्ठति ।
विप्रस्य विदुषो देहे तावद्ब्रह्म न कीर्तयेत् ।। 111 ।।
विद्वान ब्राह्मण के शरीर में जब तक एक जगह यज्ञ-अनुष्ठान कराते समय लगाए गए टीके आदि की सुगंधि रहती हो, तब तक उसे वेद-पाठ नहीं करना चाहिए।
शयानः प्रौढपादश्च कृत्वा चैवावसक्थिकाम् ।
नाधीयीतामिषं जग्ध्वा सूतकान्नाद्यमेव च ॥ 112 ॥
शयन करते समय, पैरों को ऊंचा किए होने पर, बैठने की मुद्रा में, पैरों को अंदर की ओर मोड़े होने पर, मांस भक्षण करने पर और सूतक वालों का अन्न खाने पर वेद पाठ नहीं करें।
टिप्पणी - सूतक वालों से आशय उस घर के लोगों से है जिनके यहां बच्चे का जन्म हुआ हो।
नीहारे बाणशब्दे च सन्ध्ययोरेव चोभयोः ।
अमावस्याचतुर्दश्योः पौर्णमास्यष्टकासु च ॥ 113 ॥
अनध्याय के अन्य दिन हैं- जिस दिन कुहरा छाया हो, ब्राह्मणों से वाद-विवाद का दिन, दोनों सन्ध्या काल, अमावस्या, चतुर्दशी, पूर्णिमा तथा हेमन्त एवं शिशिर ऋतुओं के कृष्ण पक्षों में आने वाली अष्टमी।
अमावस्या गुरुं हन्ति शिष्यं हन्ति चर्दशी।
ब्रह्माष्टकापौर्णमास्यो तस्मात्ताः परिवर्जयेत् ॥ 114 ॥
अमावस्या एवं चतुर्दशी के दिन वेदों का अध्ययन करने से क्रमशः गुरु तथा शिष्य का नाश होता है। अष्टमी तथा पुर्णिमा के दिन वेदों का अध्ययन करने से स्वयं वेद-शास्त्र ज्ञान का नाश होता है।
पांसुवर्षे दिशां दाहे गोमायुविरुते तथा।
श्वखरोष्ट च रुवति पङक्तौ च न पठेत द्विजः ॥ 115 ॥
धूल की वर्षा होने पर, दिशाओं से आग बरसने पर, गीदड, श्वान, गधा तथा ऊंट के रुदन का शब्द होने पर तथा पंक्तियों में बैठने पर ब्राह्मण वेदाध्ययन नहीं करें।
नाधीयीत श्मशानान्ते ग्रामान्ते गोव्रजेऽपि वा।
वासित्वा मैथुनं वासः श्राद्धिकं प्रतिगृह्य च ।। 116 ।।
श्मशान के समीप, गांव के पास, गोशाला में, मैथुन के समय का वस्त्र पहने हुए तथा श्राद्ध के अन्न आदि का दान लेकर वेद-पाठ नहीं करे।
प्राणि वा यदि वाऽप्राणि यत्किञ्चिच्छ्राद्धिकं भवेत्। तदालभ्याप्यनध्यायः पाण्यास्यो हि द्विजः स्मृतः ॥ 117 ॥
ब्राह्मण जिस दिन अपने हाथ से किसी जीव को काटता अथवा वध करता है, उस दिन उसे वेदों का अध्ययन नहीं करना चाहिए, क्योंकि ब्राह्मण पाण्यास्य (हाथ ही है मुख जिसका) कहा गया है।
चौरैरुपप्लुते ग्रामे सम्भ्रमे चाग्निकारिते।
आकालिकमनध्यायं विद्यात्सर्वादभुतेषु च ॥ 118 ॥
ब्राह्मण को चोरों का उपद्रव होने पर, गांव में उथल-पुथल मच जाने पर, मकान में अग्निकाण्ड हो जाने पर तथा सभी प्रकार के आश्चर्यपूर्ण कामों के होने पर अनध्याय करना चाहिए।
उपाकर्मणि चोत्सर्गे त्रिरात्रं क्षेपणं स्मृतम्।
अष्टकासु त्वहोरात्रमत्वन्तसु च रात्रिषु ॥ 119 ॥
श्रावणी कर्म और वेदोत्सर्ग कर्म में (नवीन यज्ञोपवीत को पहनने और पुराने का पूरी तरह त्याग करने पर) तीन दिन-रात्रि, अष्टकाओं में और ऋतु के परिवर्तन होने की रातों में वेदों का अध्ययन नहीं करें।
नाधीयीताश्वमारूढो न वृक्षं न च हस्तिनम्।
न नावं न खरं नोष्ट्र नेरिणस्थो न यानगः ।। 120 ।।
घोडे पर बैठकर, पेड पर चढ़कर, हाथी, नाव, गधे, ऊंट तथा गाड़ी में सवार होकर एवं ऊसर भूमि पर बैठ कर वेदों का पाठ नहीं करे।
न विवादे न कलहे न सेनायां न सङ्गरे।
न भुक्तमात्रे नाजीर्णे न वमित्वा न सूतके ।। 121 ॥
वाद-विवाद होने पर, कलह होने पर, सेना और युद्धभूमि में भोजन कर चुकने के तत्काल बाद, अजीर्ण में उल्टी करके तथा घर में प्रसव (शिशु जन्म) होने पर वेदों का अध्ययन नहीं करें।
अतिथिं चाऽननुज्ञाप्य मारुते वाति वा भृशम् ।
रुधिरे च स्रुते गात्राच्छस्त्रेण च परिक्षते ।। 122 ।।
यदि अतिथि अपनी अनुभूति नहीं दे, वायु तीव्र गति से चल रही हो, शस्त्र से घाव हो जाने के कारण या फोड़े से खून पीप आदि निकल रहा हो तो वेदों का पाठ नहीं करें।
सामध्वनावृग्यजुषी नाधीयीत कदाचन् ।
वेदस्याधीत्य वाप्यन्तमारण्यकमधीत्य च ॥ 123 ॥
ऋग्वेद तथा यजुर्वेद का पाठ सामवेद की ध्वनि सुनाई देने पर कदापि नहीं करे। वेद को समाप्त कर या आरण्यक (वेद का एक विशेष अंश) का पाठ कर तत्काल वेदों का अध्ययन नहीं करें।
ऋग्वेदो देवदैवत्यो यजुर्वेदस्तु मानुषः ।
सामवेदः स्मृतः पित्र्यस्तस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनिः ।। 124 ।।
यजुर्वेद मनुष्यों का, ऋग्वेद देवताओं का तथा सामवेद पितरों का वेद हैं। ऋग्वेद में देवताओं सम्बन्धी, यजुर्वेद में मनुष्यों सम्बन्धी तथा सामवेद में पित सम्बन्धी वर्णन किए गए हैं। इसी कारणवश सामवेद की ध्वनि अपवित्र मानी जाती है।
एतद्विदन्तो विद्वांसस्त्रयीनिष्कर्षमन्वहम् ।
क्रमतः पूर्वमभ्यस्य पश्चाद्वेदमधीयते ।। 125 ।।
ऊपर बताए गए निषेधों के जानकार विद्वान ब्राह्मण प्रतिदिन गायत्री ओंकार व्याहृति और वेदों के सारतत्व के अध्ययन के बाद ही वेदों का पाठ करते अध्ययन करते हैं।
पशुमण्डूकमार्जारश्वसर्पनकुलाखुभिः ।
अन्तरागमने विद्यादनाध्यायमहर्निशम् ।। 126 ।।
यदि गाय, बैल, मेढक, बिल्ली, श्वान, सर्प, नेवला तथा चूहा आदि जीव गुरु एवं शिष्य के मध्य से निकल जाएं और उस समय गुरु शिष्य को पढ़ा रहा हो तो उस दिन अनध्याय करें।
द्वावेव वर्णयेन्नित्यमनध्यायो प्रयत्नतः । स्वाध्यायभूमिंचाशुद्धामात्मानं चाशुचिंद्विजः ।। 127 1
पहला, अध्ययन के स्थान का पवित्र नहीं होना और दूसरा, अध्ययन करने वालों का शुद्ध एवं पवित्र न होना, वास्तव में यही दो अनध्याय हैं। अतः शुद्ध स्थान पर बैठकर तथा पवित्र होकर ही द्विज को वेद का पाठ करना चाहिए।
अमावस्यामष्टमीं च पौर्णमासीं चतुर्दशीम् ।
ब्रह्मचारी भवेन्नित्यमप्यृतौ स्नातको द्विजः ।। 128 ।।
विवाह करने के पश्चात् भी स्नातक द्विज को अमावस्या, अष्टमी, पूर्णिमा एवं चतुर्दशी की तिथियों को स्त्री के ऋतुकाल में होने पर भी उससे संभोग नहीं करें।
न स्नानमाचरेद्भुत्वा नातुरो न महानिशि।
न वासोभिः सहाजस्त्रं नाऽविज्ञाते जलाशये ।। 129 ।।
भोजन करने के बाद, रोग होने पर, आधी रात में, कपड़े पहन कर, गहरे पानी में और अनजाने सरोवर (जिसकी गहराई, जल की गुणवत्ता, जलजन्तु आदि के बारे में ज्ञान नहीं हो) में स्नान नहीं करें।
देवतानां गुरोः राज्ञः स्नातकाचार्ययोस्तथा ।
नाक्रामेत्कामतश्छायां बभ्रुणो दीक्षितस्य च ॥ 130 ।।
देवताओं (देव प्रतिमाओं), गुरु, राजा, स्नातक, आचार्य, कपिल वर्ण वाले और यज्ञ में दीक्षित मनुष्यों की छाया का इच्छापूर्वक उल्लंघन नहीं करें।
मध्यंदिनेऽर्धरात्रे श्राद्धं भुक्तं च सामिषम् ।
सन्ध्ययोरुभयोश्चैव न सेवेत चतुष्पथम् ॥ 131 ।।
दोपहर में, आधी रात और दोनों सन्ध्याओं के समय एवं श्राद्ध में मांस भोजन करके बाजार के चौराहे पर अधिक समय तक नहीं घूमे-फिरें।
टिप्पणी - विद्वानों के अनुसार श्लोक संख्या प्रक्षिप्त है।
उद्वर्तनमपस्नानं विण्मूत्रे रक्तमेव च।
श्लेष्मनिष्ठयूतवान्तानि नाधितिष्ठेत्तु कामतः ।। 132 ।।
ऐसे स्थानों पर रुकना या ठहरना नहीं चाहिए जो उबटन के मैल वाले स्नान के जल से. मल-मूत्र से, कफ, पीक तथा वमन जैसे घृणा या घिन पैदा करने वाले पदार्थों से भरे हों।
वैरिणं नोपसेवेत सहायं चैव वैरिणः ।
अधार्मिकं तस्करं च परस्यैव च योषितम् ॥ 133 ॥
वैरी या शत्रु तथा उसकी सहायता-सेवा करने वाले, धर्म विरुद्ध आचरण करने वाले पुरुष एवं चोर से और पराई नारी से मिलना-जुलना नहीं बढ़ाएं।
टिप्पणी-ऐसे मेल-जोल से व्यक्ति को हानि पहुंच सकती है अथवा उसका नाश तक हो सकता है। इसलिए यह निर्देश दिया गया है।
न हीदृशमनायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते।
यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ।। 134 ।।
इस लोक में पराई नारी से संभोग सुख पाने जैसा आयु को कम करने वाला कोई नीच कर्म नहीं। इसलिए इससे सदैव दूर रहना चाहिए।
क्षत्रियं चैव सर्प च ब्राह्मणं च बहुश्रुतम्।
नावमन्येत वै भूष्णुः कृशानपि कदाचन ॥ 135 ।।
अपने को सुखी, स्वस्थ और समृद्धिशाली बनाने की कामना करने वाले को क्षत्रिय, सांप और सुशिक्षित न होने वाले ब्राह्मण के कमजोर होने पर भी उन्हें सताना नहीं चाहिए।
एतत्त्रयं हि पुरुषं निर्दहेदवमानितम् ।
तस्मादेतत्त्रयं नित्यं नावमन्येत बुद्धिमान् ।। 136 ।।
ये तीनों (क्षत्रिय, सांप तथा ब्राह्मण) अपनी मानहानि होने पर अपमान करने वाले को (मौका मिलते ही) भस्म कर देते हैं। अतः बुद्धिमान पुरुष को इनकी कभी बेइज्जती नहीं करनी चाहिए।
नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः ।
आमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम् ॥ 137 1
प्रयत्न करने के बाद भी अगर समृद्धि नहीं मिलती तो अपने को भाग्यहीन समझ कर अपना अपमान नहीं करे। प्रयत्न करते रहना मानव का धर्म है और यह अंतिम सांस तक करता रहे। सम्भव है कि कभी भाग्य साथ दे जाए और अभिलषित धन प्राप्त हो जाए।
सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम् ।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ।। 138 ।।
सनातन धर्म यही है कि व्यक्ति को सदा प्रिय सत्य बोलना चाहिए। अप्रिय सत्य तथा प्रिय असत्य कभी नहीं बोलना चाहिए।
भद्रं भद्रमिति ब्रूयाद् भद्रमित्येव वा वदेत्।
शुष्कवैरं विवादं च न कुर्यात्केनचित्सह ।। 139 ।।
व्यक्ति को दूसरों के व्यवहार को प्रथम तो 'बहुत अच्छा' कहकर प्रशंसा करनी चाहिए तथा 'बहुत' शब्द का प्रयोग अनुचित लगने पर 'अच्छा है' तो अवश्य कहना चाहिए। किसी से भी बेकार में या अकारण वैर या विरोध नहीं बढ़ाना चाहिए।
नातिकल्पं नातिसायं नातिमध्यन्दिने स्थिते।
नाऽज्ञातेन समं गच्छेन्नैको न वृषलैः सह ।। 140 ।।
बहुत सुबह अर्थात् अंधकार युक्त प्रभात में और शाम को अंधेरे में तथा दोपहर (गर्मियों में) के समय अनजाने व्यक्ति के साथ एवं दुष्ट स्वभाव के शूद्र के साथ अकेले मार्ग में नहीं जाना चाहिए।
हीनाङ्गानतिरिक्ताङ्गान्विद्याहीनान्वयोऽधिकान् । रूपद्रव्यविहीनांश्च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत् । 141 ।।
ऐसे व्यक्तियों पर कभी व्यंग्य नहीं करें जो हीन अंग वाले हों (अंधे, काने, लूले-लंगड़े आदि), अधिक अंग वाले हों (जैसे पांच से अधिक अंगुलियों वाले), शिक्षा प्राप्त न हों, आयु में बड़े हों, कुरूप, निर्धन अथवा छोटी जाति के हों।
न स्पृशेत्पाणिनोच्छिष्टो विप्रो गोब्राह्मणानलान् ।
न चापि पश्येदशुचिः स्वस्थो ज्योतिर्गणान्दिवि ।। 142 ।।॥
गऊ, ब्राह्मण तथा अग्नि को जूठे हाथों से नहीं छुए। स्वस्थ अवस्था में अपवित्र होने पर आकाश के सूर्य-चन्द्र आदि ग्रहों को नहीं देखे।
स्पृष्टवैतानशुचिर्नित्यमद्भिः प्राणानुपस्पृशेत् ।
गात्राणि चैव सर्वाणि नाभिं पाणितलेन तु ॥ 143 ।।
अगर अपवित्र होने पर अनजाने गऊ, ब्राह्मण तथा अग्नि का स्पर्श हो जाए तो व्यक्ति को अपने शरीर के समस्त अंगों पर जल छिडकना चाहिए. आचमन करना चाहिए और एक हथेली में जल लेकर अंगुली से सभी अंगों एवं नाभि का स्पर्श करना चाहिए।
अनातुरः स्वानि गात्राणि न स्पृशेदनिमित्ततः ।
रोमाणि च रहस्यानि सर्वाण्येव विवर्जयेत् ।। 144 ।।
स्वस्थ व्यक्ति को अकारण इन्द्रियों तथा गुप्त अंगों (बगलों और गुप्तांगों के रोमों) के रोमों का स्पर्श नहीं करना चाहिए।
मङ्गलाचारयुक्तः स्यात्प्रयतात्माजितेन्द्रियः ।
जपेच्च जुहुयाच्चैव नित्यमग्निमतन्द्रितः ।। 145 ।।
व्यक्ति को सदा शुभ कर्मों में लगा रहना चाहिए, अपने शरीर को स्वच्छ तथा हृदय को पवित्र रखना चाहिए (अर्थात् राग-द्वेष आदि का त्याग करना चाहिए) तथा आलस छोड़कर प्रतिदिन जप तथा होम करना चाहिए।
मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यं च प्रयतात्मनाम्।
जपतां जुह्वतां चैव विनिपातो न विद्यते ।। 146 ।।
शुभ कर्मों को करने वाले, नित्य बाह्य तथा आंतरिक शुद्धि रखने वाले एवं नित्य 'जप-होम करने वाले को दैहिक रोग, भौतिक बाधा अथवा दैविक उत्पात नहीं सताते।
वेदमेवजपेन्नित्यं यथाकालमतन्द्रितः ।
तं ह्यस्याहुः परंधर्ममुपधर्मोऽन्य उच्यते ।। 147 ।।
आलस त्याग कर यथा समय सदैव वेद का ही अभ्यास करें। वेदों का अध्ययन ही श्रेष्ठ धर्म है, अन्य धर्म उपधर्म हैं।
वेदाभ्यासेन सततं शौचेन तपसैव च।
अद्रोहेण च भूतानां जातिं स्मरति पौर्विकीम् ॥ 148 ।।
सर्वदा वेदों का अध्ययन करने से, पवित्र आचरण रखने से, तप-अनुष्ठान करने से और दूसरे जीवों के साथ मैत्री भाव रखने से पूर्वजन्म का ज्ञान हो जाता है।
पौर्विकीं संस्मरञ्जातिं ब्रह्मैवाभ्यसते पुनः ।
ब्रह्माभ्यासेन चाजस्त्रमनन्तं सुखमश्नुते ।। 149 ॥
पूर्व जन्म की स्मृति से मनुष्य की रुचि वेदों का अध्ययन करने में होती है। वेदों के अभ्यास द्वारा व्यक्ति को शाश्वत तथा अनन्त सुख प्राप्त होता है अर्थात वह आवागमन के बन्धन से मुक्त होकर मोक्ष लाभ प्राप्त करता है।
सावित्राञ्छान्ति होमांश्य कुर्यात्पर्वसु नित्यशः । पितृश्चैवाष्टकास्वर्चयेन्नित्यमन्वष्टकासु च ।। 150 ॥
अमावस्या, पूर्णमासी आदि पर्वों पर विशेष रूप से गायत्री मंत्र और शान्ति मंत्रों द्वारा यज्ञ-होम करें। इसी तरह (हेमन्त और शिशिर ऋतुओं की) अष्टमी एवं नवमी को पितरों का श्राद्ध-तर्पण करें।
दूरादावसथान्सूत्रं दूरात्पादावसेचनम् ।
उच्छिष्टान्न निषेकं च दूरादेव समाचरेत् ॥ 151 ।।
अपने घर से दूर जाकर ही, मल-मूत्र का त्याग, चरणों को धोना और जूठन को फेंकना चाहिए।
मैत्रं प्रसाधनं स्नानं दन्तधावनमञ्जनम्।
पूर्वाह्न एव कुर्वीत देवतानां च पूजनम् ॥ 152 ।।
दिन के पूर्वाह्न (प्रथम प्रहर) में ही मल-मूत्र का त्याग, दंत प्रक्षालन (दांत सफाई), स्नान, आंखों में अंजन लगाना तथा देवता का पूजन आदि कर्म करने चाहिए।
दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द्विजोत्तमान् ।
ईश्वरं चैव रक्षार्थं गुरूनेव व पर्वसु ॥ 153 ।।
अपनी रक्षा एवं कल्याण हेतु अमावस्या तथा पूर्णिमा आदि पर्वों पर देवताओं (यज्ञशालाओं), गुरुओं, धार्मिक पुरुषों, श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा परमात्मा की सेवा में (मन्दिरों आदि में) उपस्थित होना चाहिए।
अभिवादयेद्वृद्धांश्च दद्याच्चैवासनं स्वकम् ।
कृताञ्जलिरुपासीत गच्छतः पृष्ठतोऽन्वियात् ।। 154 ।।
वृद्धजनों (ज्ञान, आयु, पद तथा प्रतिष्ठा में अपने से बड़े लोगों) के आने पर, उठकर उनका अभिवादन करते हए प्रणाम करें, उनके बैठने के लिए अपना आसन प्रस्तुत करें। हाथ जोडकर उनके सम्मुख खडे रहें और उनके जाने पर कुछ दूर तक उनके साथ जाएं।
श्रुतिस्मृत्युदितं सम्यन्निबद्धं स्वेषु कर्मसु। धर्ममूलं निषेवेत सदाचारमतन्द्रितः ।। 155 ॥
सदैव आलस्य त्याग कर वेद-शास्त्र में निरूपित किए गए, नियमों में आबद्ध तथा धर्म के मूल सदाचार का पालन करें।
आचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः । आचाराद्धनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम् ।। 156 ॥
सदाचार को अपने प्रतिदिन के जीवन में अपनाने से लम्बी आयु, पुत्र और पौत्र आदि तथा अक्षय धन-संपत्ति की प्राप्ति होती है एवं अशुभ लक्षणों का अंत होता है।
दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः ।
दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ।। 157 ।।
दुराचारी पुरुष एक ओर इस संसार में सदैव निन्दा का पात्र बनता है तथा दूसरी ओर वह सदा दुख पाता है, रोग पीड़ित तथा कम आयु का होता है।
सर्वलक्षण हिनापि सदाचारवान्नरः ।
पि श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ 158 ।।
सदाचार का पालन करने वाला, सज्जन पुरुषों के अनुसार आचरण करने वाला, वेद-शास्त्रों में श्रद्धा रखने वाला तथा ईर्ष्या-द्वेष से रहित पुरुष (सामुद्रिक शास्त्र जैसे हस्तरेखा शास्त्र आदि के अनुसार) शुभ लक्षणों से हीन होने पर भी शत आयु प्राप्त करता है।
यद्यत्परवशं कर्म तत्तद्यत्लेन वर्जयेत्।
यद्यदात्मवशं तु स्यात्तत्तत्सेवेत यत्नतः ।। 159 ॥
जो कार्य दूसरों के अधीन रह कर ही किए जा सकते हैं, उनको पूरी तरह त्याग दे तथा अपने अधीन सभी कार्यों का अनुष्ठान पूरे प्रयत्न से करे।
सर्व परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् ।
एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥ 160 ॥
जो कुछ दूसरे के अधीन है वह सब दुख है और जो कुछ अपने अधीन है वह सब सुख है। यही सुख-दुःख का लक्षण है।
यत्कर्मकुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः ।
तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत् ॥ 161 ॥
जिस कार्य से मन की शांति तथा अन्तरात्मा को खुशी मिले, उसे करने का पूरा प्रयत्न करें परन्तु जिस कर्म को करने से मन को शांति नहीं मिले उसे छोड दें।
प्राचार्य च प्रवक्तारं पितरं मातरं गुरुम्।
न हिंस्याद् ब्राह्मणान् गाश्च सर्वांश्चैव तपस्विनः ।। 162 ।।
आचार्य, वेदों के व्याख्याता, माता-पिता, गुरु, ब्राह्मण, गाय तथा समस्त तपस्वियों को, उनके द्वारा अपराध हो जाने पर भी मृत्युदण्ड नहीं दे।
नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम्।
द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं च वर्जयेत् ॥ 163 ॥
परमात्मा की सत्ता में विश्वास नहीं करना, वेदों की निन्दा करना, देवताओं की अवज्ञा, शत्रुता-विरोध, पाखण्ड, अहंकार, क्रोध करना तथा उग्रता होना त्याग करने योग्य दोष हैं।
परस्य दण्डं नोद्यच्छेत्कुद्धोनैनं निपातयेत् ।
अन्यत्र पुत्राच्छिष्याद्वा शिष्ट्यर्थं ताडयेत्तु तौ ।। 164 ।।
किसी के द्वारा गलती हो जाने पर गुस्सा आने पर उसे पीटने के लिए हाथ में डण्डा नहीं लेना चाहिए। व्यक्ति को केवल अपने पुत्र या शिष्य को शिक्षित करने की जिम्मेवारी निभाने के लिए पीटने का अधिकार है।
ब्राह्मणायावगुर्यैव द्विजातिर्वधकाम्यया ।
शतंवर्षाणि तामिस्त्रे नरके परिवर्तते ।। 165 ॥
वह व्यक्ति जो ब्राह्मण अथवा गुरु के वध हेतु हाथ में डण्डा लेता है, उसे सौ वर्षों तक तामिस्त्र नाम के नरक में घुमाया जाता है।
ताडयित्वा तृणेनापि संरम्भान्मतिपूर्वकम् ।
एकविंशतिमाजातोः पापयोनिषु जायते ॥ 166 ॥
अपनी सचेत अवस्था में जो व्यक्ति आचार्य ब्राह्मण को तिनके तक से पीटता है, वह इक्कीस बार पाप योनियों में जन्म लेता है।
अभिप्राय यह है कि आचार्य ब्राह्मण को मारने-पीटने का विचार तक मन में नहीं लाए क्योंकि लाठी-डंडे का प्रश्न तो दूर अगर इसे एक तिनका से भी मार दिया तो मारने वाले को इक्कीस बार नीच योनियों में जन्म लेना पड़ता है।
अयुध्यमानस्योत्पाद्य ब्राह्मणस्यासृगङ्गतः ।
दुःखं सुमहदाप्नोति प्रेत्याऽप्राज्ञतया नरः ॥ 167 ॥
जो व्यक्ति युद्ध न करने वाले ब्राह्मण के शरीर पर कोई ऐसा आघात करता है जिससे उसके शरीर से खून बहने लगता है तो ऐसा करने वाला व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद घोर दुःख भोगता है।
शोणितं यावतः पांसून् तं गृह्णाति महीतलात् । तावतोऽब्दानमुत्रान्यैः शोधितोत्पादको ऽद्यते ।। 168 ।।
धरती की मिट्टी के जितने कण ब्राह्मण के शरीर से गिरते खून को सोखते हैं, ब्राह्मण को चोट पहुंचाने वाले व्यक्ति को अपनी मृत्यु के उपरान्त परलोक में उतने ही वर्षों तक अपने शरीर से खून निकलवाना पड़ता है।
न कदाचिद्विजे तस्माद्विद्वानवगुरेदपि ।
न ताडयेत्तृणेनापि न गात्रात्त्रांवयेदसृक् ॥ 169 ॥
ब्राह्मण पर न कभी लाठी उठानी चाहिए और न ही उसे तिनके तक से मारना चाहिए और न ही उसके शरीर से खून निकालना चाहिए।
अधार्मिको नरो यो हि यस्य चाप्यनृतं धनम् ।
हिंसारतिश्च यो नित्यं नेहाऽसौ सुखमेधते ।। 170 ।।
धर्म पालन न करने वाले, झूठ को अपनाने वाले और नित्य हिंसा करने वाले व्यक्ति न इस जगत में सुख पाते हैं और न ही किसी प्रकार की उन्नति करते हैं।
न सीदन्नपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत् ।
अधार्मिकाणां पापनामाशुः पश्यन्विपर्ययम् ।। 171 ।।
धर्म का आचरण करने पर भी दुःख उठाने वाले व्यक्ति को यह देखकर कि अधार्मिक व्यक्तियों को शीघ्र ही अपने कुकर्मों का फल भोगना पड़ रहा है, अधर्म पर चलने का विचार नहीं करना चाहिए।
नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव ।
शनैरावर्त्यमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ॥ 172 ।।
पापी व्यक्ति द्वारा किया गया पाप धरती में बोए गए बीज की तरह उसी समय अंकुरित-विकसित नहीं होता परन्तु समय आने पर वह इस भांति फलता-फूलता है कि पापी को उसकी जड़ सहित उखाड़ कर फेंक देता है।
यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत्पौत्रेषु नप्तृषु।
न त्वेव न कृतोऽधर्मः कर्तुर्भवति निष्फलः ।। 173 ।
अगर पापी को किसी कारण से अपने पाप का फल नहीं मिल पाता तो वह उसके बेटों को मिलता है। अगर पुत्रों को नहीं मिल पाता तो पौत्रों को मिलता है। उन्हें भी न मिलने पर पौत्रों के पुत्रों (धेवतों) को मिलता है। इस तरह दुष्कर्मों का बुरा नतीजा (परिणाम) अवश्य मिलता है चाहे वह कुछ समय बाद मिले।
अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति।
ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ।। 174 ॥
पापी व्यक्ति अपने अधार्मिक कर्मों से प्रारम्भ में उन्नति करता है, सुखों को भोगता है और ऐसा दिखाई देता है कि वह अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर रहा है लेकिन कुछ समय बाद वह (पापी) स्वयं जड़सहित समाप्त हो जाता है।
सत्यधर्मार्यवृत्तेषु शौचे चैवारमेत्सदा।
शिष्यांश्च शिष्याद्धर्मेण वाग्बाहूदरसंयतः ।। 175 ।।
सत्य का पालन करना, दूसरों को कष्ट नहीं देना तथा न्याय युक्त साधनों द्वारा धन कमा कर अपनी जीविका चलाना, इन सबको विशेष महत्व देना चाहिए और जीवन में अपनाना चाहिए। अपने शिष्यों को वाणी, भुजाओं के बल (शक्ति प्रयोग) तथा खान-पान (उदर) पर संयम रखने की शिक्षा देनी चाहिए।
परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ ।
धर्म चाप्यसुखोदकै लोकसंक्रष्टमेव च ।। 176 ॥
अधार्मिक साधनों द्वारा पाए गए धन तथा काम सुख को पूरी तरह छोड़ दे। वृद्ध हो जाने पर ऐसा धार्मिक कृत्य भी नहीं करे जिससे परिवार को कष्ट पहुंचे।
न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलोऽनृजुः ।
न स्याद्वाक्चपलश्चैव न परद्रोहकर्मधीः ।। 177 ।।
अकारण हाथ-पैर नहीं हिलाएं और न नेत्रों या शरीर को मटकाएं। स्वभाव से कुटिल, दूसरों की निन्दा करने वाला तथा बकवास करने वाला नहीं बनना चाहिए।
येनास्य पितरो याताः येन याताः पितामहाः ।
तेन यायात्सतां मार्ग तेन गच्छन्न रिष्यति ।। 178 ।।
जिस पवित्र तथा पुण्य पथ पर व्यक्ति के पिता-पितामह, पूर्वज चलते रहे हों उसी पर उसे भी चलना चाहिए। उस मार्ग का अनुसरण करने से व्यक्ति की हानि नहीं होती।
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः । बालवृद्धातुरैर्वैद्यैर्जातिसम्बन्धिबान्धवैः ।। 179 ॥
मातापितृभ्यां यामीभिर्भात्रा पुत्रेण भार्यया।
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत् ॥ 180 ।।
यज्ञ करने वालों, पुरोहितों, आचार्यों, अतिथियों, माता-पिता, मामा आदि सम्बन्धियों, भाई-बहन, पुत्र-पुत्री, पत्नी-पुत्रवधू, दामाद तथा गृह सेवकों से बेकार में वाद-विवाद नहीं करें।
एतैर्विवादान्संत्यज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते।
एतैर्जितैश्चजयति सर्वांल्लोकानिमान्गृही ।। 181 ।।
ऊपर बताए गए लोगों के साथ विवाद नहीं करने वाला गृहस्थ सभी पापों से छुटकारा पा जाता है। जो इन लोगों को अपने वश में कर लेता है वह समस्त धरती पर रहने वालों को जीत लेता है।
आचार्यः ब्रह्मलोकेशः प्राजापत्ये पिता प्रभुः । अतिथिस्त्विन्द्रलोकेशो देवलोकस्य चर्विजः ।। 182 ।।
ब्रह्म लोक का स्वामी आचार्य है। प्रजापति लोक का आचार्य पिता है। इन्द्र लोक का स्वामी अतिथि और देव लोक का स्वामी ऋत्विज है। आचार्य के प्रसन्न होने से वेदों का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। पिता, अतिथि, तथा ऋत्विज की प्रसन्नता द्वारा क्रमशः प्रजापति लोक, इन्द्र लोक और देव लोक में सरलता से गमन हो जाता है।
जामयोऽप्सरसां लोके वैश्वदेवस्य बान्धवाः । सम्बन्धिनोह्यपांलोके पृथिव्यां मातृमातुलौ ॥ 183 ।।
अप्सरा लोक की बहन और पुत्रवधू, वैश्वदेव लोक के बन्धु-बान्धव, जल लोक के सम्बन्धी एवं मां तथा मामा पृथ्वी लोक के स्वामी हैं। बहन तथा पुत्रवधू को प्रसन्न करने से वैश्वदेव लोक, सम्बन्धियों को प्रसन्न करने से जल लोक, मां तथा मामा को प्रसन्न करने से पृथ्वी लोक में गति हो जाती है।
आकाशेशास्तु विज्ञेयाः बालवृद्धकृशातुराः ।
भ्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्रः स्वका तनुः ॥ 184 ।।
बालक, बूढ़े, कमजोर और आतुर जन आकाश लोक के स्वामी हैं। अभिप्राय यह है कि इन लोगों का कोई आश्रय नहीं है, अतः इनका पालन-पोषण करना धर्म है। बड़ा भाई अपने पिता के समान तथा पत्नी एवं पुत्र अपने शरीर के समान हैं। इनके साथ किसी तरह का विवाद करना व्यर्थ है।
छाया स्वो दासवर्गश्च दुहिताकृपणं परम्।
तस्मादेतैरधिक्षिप्त सहेताऽसंज्वरः सदा ।। 185 ।।
सेवा करने वाला (दास) अपनी छाया की भांति है अर्थात् उसे अपने से अलग नहीं किया जा सकता। बेटी अत्यधिक कृपा का पात्र है। इसलिए अगर सेवक तथा पुत्री क्रोध के आवेश में आकर कभी कुछ (आलोचना, निन्दा आदि) कह भी दें, उसको सहन कर ले।
प्रतिग्रहसमर्थोऽपि प्रसङ्गं तत्र वर्जयेत्।
प्रतिग्रहेण ह्यस्याशु ब्राह्यं तेजः प्रशाम्यति ॥ 186 ॥
पुरोहित, आचार्य एवं माता-पिता से प्रतिग्रह अर्थात् सेवा के बदले में लिया जाने वाला दान पाने में समर्थ होने पर भी ब्राह्मण उसे लेने का प्रयत्न नहीं करें, क्योंकि वापसी दान लेने से उसका ब्रह्मतेज (ब्रह्मज्ञान उपलब्ध होने से उत्पन्न तेज) शीघ्र नष्ट हो जाता है।
न द्रव्याणामविज्ञाय विधिधर्म्य प्रतिग्रहेत् ।
प्राज्ञः प्रतिग्रहं कुर्यादवसीदन्नपि क्षुधा । 187 ।।
भूख से बेचैन होने पर भी विवेकशील व्यक्ति प्रतिग्रह को धर्म एवं न्याय के विरुद्ध जानकार तथा प्रतिग्रह से मिलने वाली वस्तुओं के गुणों की जानकारी होने पर भी उसके लिए प्रयत्न नहीं करते।
हिरण्यं भूमिमश्वं गामन्नं वासस्तिलान्धृतम्।
प्रतिगृह्णन्नविद्वांस्तु भस्मीभवति दारुवत् ॥ 188 ।।
जिस प्रकार अग्नि से लकड़ी जल कर राख हो जाती है, उसी प्रकार मूर्ख ब्राह्मण स्वर्ण, भूमि, घोड़ा, गौ, अन्न, वस्त्र, तिल और घी का दान ग्रहण करने से नष्ट हो जाता है।
टिप्पणी- अभिप्राय यह है कि मूर्ख व्यक्ति को चाहे वह ब्राह्मण हो क्यों न हो दान नहीं देना चाहिए।
हिरण्यमायुरन्नं च भूगौश्चाप्योषतस्तनुम् ।
अश्वश्चक्षुस्त्वचं वासो घृतं तेजस्तिलाः प्रजा ।। 189 ।।
स्वर्ण तथा अन्न दान लेने वाले मूर्ख की आयु को कम करते हैं, दान में ली गयी गाय तथा पृथ्वी उसके शरीर को सुखा देते हैं, अश्व उसके नेत्रों को, वस्त्र उसकी त्वचा को, घी उसके तेज को तथा तिल सन्तान को नष्ट कर देते हैं।
अतपास्त्वनधीयानः प्रतिग्रहरुचिर्द्विजः ।
अम्भस्यश्मप्लवेनैव सह तेनैव मज्जति ।। 190 ॥
जो ब्राह्मण तपस्या तथा विद्या से हीन है परन्तु फिर भी दान लेता है तो वह उससे इस तरह नरक में डूबता है जैसे पत्थर की नाव पर चढने वाला व्यक्ति उसके साथ जल में डूब जाता है।
तस्मादविद्वान्बिभियाद्यस्मात्तस्मात्प्रतिग्रहात् । स्वल्पकेनाप्यविद्वान्हि पङ्के गौरिव सीदति ।। 191 ।।
इस कारण मूर्ख ब्राह्मण किसी भी वस्तु का दान लेने से डरे क्योंकि थोड़ा सा भी दान लेने से वह मूर्ख ब्राह्मण कीचड़ में फंसी गाय के समान दुख उठाता है।
न वार्यपि प्रयच्छेत्तु बैडालव्रतिके द्विजे ।
न बकव्रतिके विप्रे नावेदविदि धर्मवित् ।। 192 ॥
धर्मज्ञाता व्यक्ति को ऐसे ब्राह्मणों को पानी तक नहीं पिलाना चाहिए जो दूसरों को मूर्ख बना कर लूटते हैं या जो ऊपर से साधु दिखते हैं पर अन्दर से दुष्ट होते हैं, तथा जो वेद का ज्ञान नहीं रखते।
त्रिष्वप्येतेषु दत्तं हि विधिनाऽप्यर्जितं धनम् ।
दातुर्भवत्यनर्थाय परत्रादातुरेव च।॥ 193 ॥
इन तीनों तरह के लोगों (बिडाल वृत्ति वाले अर्थात् दूसरों को मूर्ख बनाका लूटने वाले, बक वृत्ति वाले अर्थात् जो ऊपर से साधु पर अन्दर से दुष्ट, वेद ज्ञान से रहित व्यक्ति) को न्याय तथा धर्म. से कमाया धन भी दोनों (दान देने और लेने वाले) को परलोक में नरकगामी बनाता है।
यथा प्लवेनौपलेन निमज्जत्युदके तरन् ।
तथा निमज्जतोऽधस्तादज्ञो दातृप्रतीच्छकौ ।। 194 ॥
जिस तरह जल में पत्थर की नाव पर सवार व्यक्ति नाव के साथ पानी में डूब जाता है उसी तरह दान लेने वाला मूर्ख तथा उसे दान देने वाला दोनों नरक में डूब जाते हैं।
धर्मध्वजी सदा लुब्धश्छाद्मि को लोकदम्भका।
बैडालवृत्तिको ज्ञेयो हिंस्त्रः सर्वाभिसन्धकः ।। 195 ॥
अपनी प्रसिद्धि और दिखावे के लिए धर्म का आचरण करने वाला, दूसरों के धन को छीनने की इच्छा करने वाला, लोगों से ढोंग रचने वाला कपटी, हिंसक स्वभाव का तथा दूसरों को भडकाने वाला व्यक्ति 'बिडाल वृत्ति' का कहा जाता है।
अधोदृष्टिनैष्कृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः ।
शठो मिथ्याविनीतश्च बकव्रतचरो द्विजः ।। 196 ॥
उस ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य को बक वृत्ति का समझना चाहिए जिसकी नजर हमेशा दूसरों की धन-संपत्ति पर लगी रहे. जो हमेशा बरे कर्म करे, कभी अपने कल्याण के कार्य में नहीं लगे, जो हमेशा अपनी ही भलाई करने में लगा रहे, जो झूठा तथा अविनीत हो।
ये बकव्रतिनो विप्राः ये च मार्जारलिङ्गिनः ।
ते पतन्त्यन्धतामिस्त्रे तेन पापेन कर्मणा । 197 ॥
बिडाल तथा बक वृत्ति वाले लोग अपने पाप कर्मों के कारण 'अन्धतामित्र' नाम के नरक में गिर कर यातनाएं पाते हैं।
न धर्मस्यापदेशेन पापं कृत्वा व्रतं चरेत्।
व्रतेन पापं प्रच्छाद्य कुर्वन् स्त्री शूद्रदम्भनम् ।। 198 ।।
पहले पाप करना फिर उसे छिपाने के लिए व्रत-उपवास आदि करना बेकार है। इस तरह के व्रतों से स्त्री तथा शूद्रों जैसे लोगों को बहकाया जा सकता है किन्तु बुद्धिमान लोग उनकी सच्चाई को देर-सबेर समझ ही जाते हैं।
प्रत्येह चेदृशाः विप्राः गर्हान्ते ब्रह्मवादिभिः ।
छद्मना चरितं यच्च व्रतं रक्षांसि गच्छति ।। 199 ।।
बिडाल वृत्ति के लोगों की ब्रह्मवादी विद्वान इस लोक तथा परलोक में निन्दा करते हैं। कपटपूर्वक किया गया व्रत या धर्मानुष्ठान राक्षसों को चला जाता है। अतः वह फलहीन होता है।
अलिङ्गी लिङ्गिवेषेण यो वृत्तिमुपजीवति ।
सः लिङ्गीनां हरत्येनस्तिर्यग्योनौ च जायते ॥ 200 ।।
संन्यासी या ब्रह्मचारी नहीं होकर भी जो उनका वेश पहनकर अपनी जीविका चलाता है वह ब्रह्मचारी आदि के पापों को अपने ऊपर लेता है। वह मरने के बाद पक्षियों की योनि में पैदा होता है।
परकीयनिपानेषु न स्नायाद्धि कदाचन।
निपानकर्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते ॥ 201 ।।
दूसरों के द्वारा निर्मित किए गए स्नानगृहों, सरोवरों, पोखरों और कुओं आदि में स्नान नहीं करें। ऐसा करने वाला स्नानागारों को बनाने वालों के पापों का भागीदार हो जाता है। इसलिए हर उस व्यक्ति को जिसमें सामर्थ्य है स्नान के लिए अलग से तालाब, पोखरे आदि निर्मित करवाने चाहिए।
यानाशय्यासनान्यस्य कूपोद्यान गृहाणि च।
अदत्तान्युपयुञ्जानः एनसः स्यात्तुरीयभाक् ।। 202 ।।
वाहन, बिस्तर, आसन, कुआं, बाग और आवास आदि का दान किए बिना अकेले ही उपभोग करने वाला व्यक्ति घोर पाप में पड़ता है।
नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरःसु च।
स्नानं समाचरेन्नित्यं गर्त्तप्रस्त्रवणेषु च ।। 203 ।।
सरिताओं, प्राकृतिक सरोवरों तथा मनुष्य द्वारा बनाए गए तालाबों, पोखरों, गड्डों आदि में व्यक्ति को सदैव स्नान करना चाहिए।
यमान्सेवेत सततं न नित्यं नियमान्बुधः ।
यमान्यतत्यकुर्वाणो नियमान्केवलान्भजन् ।। 204 ॥
व्यक्ति को नियमों की अपेक्षा यमों का पालन करना उचित है (नियमों के अंतर्गत शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा प्रणिधान आते हैं। यमों के अन्तर्गत अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह आते हैं) जो व्यक्ति यमों की ओर ध्यान नहीं देकर केवल नियमों को अपनाता है उसका पतन शीघ्र हो जाता है।
नाश्रोत्रियतते यज्ञे ग्रामयाजिकृते तथा।
स्त्रिया क्लीबेन चहुते भुञ्जीत ब्राह्मणः क्वचित् ॥ 205 ।।
पुरोहित जिस यज्ञ का वेदपाठी नहीं हो, यजमान कोई एक विशेष व्यक्ति नहीं परन्तु सारे गांववासी हों, जहां स्त्री या नपुंसक हो, ऐसे यज्ञ में ब्राह्मण भोजन नहीं करे।
अश्लीलमेतत्साधूनां यत्र जुह्वत्यमी हविः ।
प्रतीपमेतद्देवानां तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ।। 206 ।।
स्त्री, नपुंसक और बहुयाजक आदि जिस यज्ञ में हवन करते हैं वह यज्ञ-कर्म अश्लील होता है, सज्जनों की श्री का नाश करने वाला तथा देवताओं के विरुद्ध होता है। अतः उसका त्याग कर देना चाहिए।
मत्तकुद्धातुराणां च न भुञ्जीत कदाचन।
केशकीटावपन्नं च पदा स्पृष्टं च कामतः ।। 207 ॥
भ्रूणघ्नावेक्षितं चैव संस्पृष्टं चाप्युदक्यया।
पतत्रिणाऽवलीढं च शुना संस्पृष्टमेव च ।। 208 ॥
ऐसे अन्न को नहीं खाना चाहिए जो पागल, क्रोधी और रोगी व्यक्ति का हो, जो बालों और कीड़े-मकोड़ों के पड़ जाने से दूषित हो गया हो, खाने के अयोग्य मानकर फेंकने के लिए रखा गया हो, भ्रूण हत्यारों द्वारा देखा गया हो, रजस्वला स्त्री द्वारा स्पर्श किया गया हो अथवा जो कौवे जैसे पक्षियों द्वारा खाया या चाटा गया हो या जिस पर कुत्ते ने मुंह लगा दिया हो।
गवा चान्नमुपाघ्नातं घुष्टान्नं च विशेषतः ।
गणान्नं गणिकान्नं च विदुषा च जुगुप्सितम् ।। 209 ।।
स्तेनगायनयोश्चान्नं तक्ष्णोर्वाधुषिकस्य च।
दीक्षितस्य कदर्यस्य बद्धस्य निगडस्य च ।। 210 ॥
गाय द्वारा जूठा किए, विशेष घोषणा करके खिलाए जाने वाले, दान आदि द्वारा जुटाए गए वेश्या समुदाय का अन्न नहीं खाना चाहिए।
चोर, गायक, बढ़ई, ब्याजखोर, यज्ञ में दीक्षित (अग्निसोमीय से पूर्व), कंजूस और लोहे की जंजीर से बंधे हुए के अन्न को नहीं खाए।
अभिशप्तस्य षण्ढस्य पुंश्चल्याः दाम्भिकस्य च ।
शुक्तं पर्युषितं चैव शूद्रस्योच्छिष्टमेव च ॥ 211 ।।
चिकित्सकस्य मृगयोः क्रूरस्योच्छिष्टभोजिनः ।
उग्रान्नं सूतिकान्नं च पर्याचान्तमनिर्दशम् ।। 212 ।।
शापग्रस्त या महापातक आदि दोषों से लांच्छित या नपुंसक व्यक्तियों का, व्यभिचारिणी स्त्री का, ढोंग करने वाले व्यक्ति का, स्वाद में खट्टा, खमीर वाला, बासी, शूद्र का जूठा, वैद्य, शिकारी, क्रूर व्यक्ति का, दूसरों की जूठन खाने वाले का, उग्र स्वभाव के व्यक्ति का और सूतक के अन्न (भोजन) को नहीं खाएं।
अनर्चितं वृथा मांसमवीरायाश्च योषितः ।
द्विषदन्नं नगर्यन्नं पतितान्नमवक्षुतम् ॥ 213 ।।
पिशुनानृतिनोश्चान्नं क्रतुविक्रयिणस्तथा।
शैलूषतुन्नवायान्नं कृतघ्नस्यान्नमेव च ।। 214 ।।
आदर भाव के बिना दिया गया अन्न और बेकार समझा गया मांस नहीं खाए। पति और पुत्र से हीन नारी का, दुश्मन का, गांव के अधिपति का, जाति से निकाले गए व्यक्ति का, चुगली करने वाले व्यक्ति का, झूठी गवाही देने वाले का, यज्ञ बेचने वाले का, शूद्र तथा दर्जी का एवं कृतघ्न व्यक्ति का अन्न नहीं खाना चाहिए।
कर्मारस्य निषादस्य रङ्गावतरकस्य च।
सुवर्णकर्तुर्वैणस्य शस्त्रविक्रयिणस्तस्था ।। 215 ॥
श्ववतां शौण्डिकानां च चैलनिर्णेजकस्य च।
रजकस्य नृशंसस्य यस्य चोपपतिगृहे ।। 216 ॥
लोहे का काम करने वाले, भील, मदारी (खेल दिखाने वाले), सुनार, बांस का काम करने वाले, शस्त्र बेचने वाले, कुत्तों को पालने वाले, शराब बनाने-बेचने वाले, धोबी, कपड़े रंगने वाले, दयाहीन तथा अपने घर में ही अपने जार (प्रेमी) को रखने वाली स्त्री के अन्न को ग्रहण नहीं करें।
मृष्यन्ति चे चोपपतिं स्त्रीजितानां च सर्वशः ।
अनिर्दशं च प्रेतान्नमतुष्टिकरमेव च ॥ 217 ।।
अपने ही घर में अपनी स्त्री के उपपति (जार) के रहने को भी सहन करने वाले के, स्त्री के अधीन रहने वाले के, परिवार में किसी की मौत के दस दिन व्यतीत होने से पहले ही भोजन परोसने वाले के और पितरों का श्राद्ध नहीं करने वाले के अन्न को स्वीकार नहीं करें।
राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम्।
आयुः सुवर्णकारान्नं यशश्चर्मावकर्तिनः ।। 218 ।।
राजा का अन्न खाने से तेज, शूद्र का अन्न खाने से विद्या, सुनार का अन खाने से आयु तथा चमार का अन्न खाने से यश की हानि होती है।
कारुकान्नं प्रजां हन्ति बलं निर्णेजकस्य च।
गणान्नं गणिकान्नं च लोकेभ्यः परिकृन्तति ।। 219 ॥
चिकित्सक के अन्न को पीक की तरह, व्यभिचारिणी के अन्न को वीर्य की तरह, ब्याज का काम करने वाले के अन्न को विष्ठा की तरह और शस्त्र बेचने वाले के अन्न को मल की तरह समझना चाहिए।
पूर्य चिकित्सकस्यान्नं पुंश्चल्यास्त्वन्नमिन्द्रियम् । विष्ठावार्थुषिकस्यान्नं शस्त्रविक्रयिणो मलम् ॥ 220 ॥।
पहले बताए गए (ऊपर लिखे) समस्त प्रकार के अन्न भक्षण योग्य नहीं हैं। मनीषी लोग इन लोगों के भोजन (अन्न) को चमड़ी, हड्डी और बालों की तरह मान कर इनको पूरी तरह छोड़ दें।
य एतेऽन्ये त्वभोज्यान्नाः क्रमशः परिकीर्तिताः ।
तेषां त्वगस्थिरोमाणि वदन्त्यन्नं मनीषिणः ॥ 221 ॥
यदि अनजाने में ऊपर बताए व्यक्तियों के त्यागने योग्य अन्न का भक्षण कर लें तो शुद्धि करने के लिए तीन दिन-रात उपवास करें। जानकारी होते हुए भी मना किए गए अन्न को खा लेना वीर्य तथा मल-मूत्र को ग्रहण करने की भांति है। इनसे निवृत्ति के लिए कुछ व्रतों के अनुष्ठान आवश्यक हैं।
भुक्त्वाऽतोऽन्यतमस्यान्नममत्या क्षपणं त्र्यहम्।
मत्या भुक्त्वाऽऽचरेत्कृच्छ्रं रेतोविण्मूत्रमेव च ।। 222 ।।
ऊपर बताए गए त्याज्य व्यक्तियों के अन्न को अनजाने में खा लेने पर तीन दिन-रात का उपवास करने से शुद्धि होती है। किन्तु जान-बूझकर इनका सेवन करना वीर्य, विष्ठा एवं मूत्र के सदृश है। इसकी निवृत्ति के लिए कुछ व्रतों का अनुष्ठान करना चाहिए।
अमृतं ब्राह्मणस्यान्नं क्षत्रियान्नं पयः स्मृतम् ।
वैश्यान्नमन्नमित्याहुः शूद्रस्य रुधिरं स्मृतम् ।। 223 ।।
ब्राह्मण का अन्न अमृत के समान, क्षत्रिय का दूध के समान, वैश्य का अन्न समान एवं शूद्र का रक्त के समान है।
नाद्याच्छूद्रस्य पक्वान्नं विद्वानश्राद्धिनो द्विजः । आददीताममेवास्मादवृत्तावेकरात्रिकम् II 224 II
जो शूद्र श्रद्धाहीन है उसके पके अन्न को ब्राह्मण स्वीकार नहीं करे। अगर भूख को तृप्त किए बिना रहना सम्भव न हो तो शूद्र से केवल एक रात के भोजन योग्य कच्ची सामग्री ले लेवे।
श्रोत्रियस्य कदर्यस्य वदान्यस्य च वार्थुषः ।
मीमांसित्वोभयं देवाः सममन्नमकल्पयन् ॥ 225 ।।
देवताओं ने कंजूस ब्राह्मण तथा सूद खाने वाले वैश्य के अन्नों का गुण-दोष परीक्षण करने के बाद दानों के अन्नों का समान रूप से ग्रहण करने के अयोग्य बताया है।
चन्द्रसूर्यग्रहे नाद्यादद्यात्स्नात्वा तु मुक्तयोः । अमुक्तयोरगतयोरद्याच्चैव परेऽहनि ।। 226 ।।
सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण की अवधि में भोजन नहीं करें। जब ग्रहण पूरी तरह समाप्त हो जाए तब स्नान आदि करने के बाद भोजन करें। अगर ग्रहण समाप्त न हो और सूर्य या चन्द्र छिप जाएं तो दूसरे दिन स्नान आदि करने के पश्चात् भोजन करें।
तान्प्रजापतिराहैत्य मा कृद्धं विषमं समम् ।
श्रद्धापूतं वदान्यस्य हतमश्रद्धयेतरत् ॥ 227 11
ब्रह्मा जी ने सम तथा विषम में विवेक का उपयोग करने की सलाह दी है। दान देने में सर्वाधिक महत्व दान देने वाले की श्रद्धा का है। सूद से जीविका चलाने वाले वैश्य द्वारा श्रद्धासहित दिया गया दान पवित्र है। इसके विपरीत कंजूस ब्राह्मण द्वारा श्रद्धा के बिना दिया जाने वाला दान अपवित्र है। वास्तव में श्रद्धा से ही दान पवित्र बनता है।
श्रद्धयेष्टं च पूर्त च नित्यं कुर्यादतन्द्रितः ।
श्रद्धाकृते ह्यक्षये ते भवतः स्वागतैर्धनैः ।। 228 1
व्यक्ति को हमेशा बिना आलस्य किए श्रद्धा सहित यज्ञ करने तथा कुएं-तालाब आदि को बनाने या बनवाने के कार्य में लगना चाहिए। न्याय द्वारा उचित माने गए उपायों द्वारा कमाया गया धन जब श्रद्धासहित अच्छे कर्मों में लगाया जाता है तो उससे मिलने वाले फल का कभी क्षय नहीं होता।
दानधर्म निषेवेत नित्यमैष्टिक पौर्तिकम् ।
परितुष्टेन भावेन पात्रमासाद्य शक्तितः ।। 229 ।।
व्यक्ति को नित्य ही दान, धर्म और यज्ञ आदि कराने के ऐष्टिक कर्मों में एवं कुएं-तालाब आदि बनाने के पूर्तिक कर्मों में लगा रहना चाहिए।
अधिकारी व्यक्ति के मिलने पर अपनी शक्ति के अनुसार खुश होकर श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिए। इसी से व्यक्ति का कल्याण होता है।
टिप्पणी यहां अधिकारी व्यक्ति से आशय उस व्यक्ति से है जो विद्वान और सचरित्र वाला है।
यत्किञ्चिदपि दातव्यं याचितेनानुसूयया।
उत्पत्स्यते हि तत्पात्रं यत्तारयति सर्वतः ।। 230 ।।
अगर दान मांगने वाला दान का उचित पात्र नहीं मालूम होता फिर भी उसे बिना किसी कड़वाहट के कुछ दान दे देना उचित है क्योंकि देने की प्रवृत्ति बनाने से ही कभी दान पाने का योग्य पात्र मिलेगा जो दाता का पूर्ण उद्धार कर देगा।
वारिदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षयमन्नदः ।
तिलप्रदः प्रजामिष्टां दीपदश्चक्षुरुत्तमम् ।। 231 ।।
भूमिदो भूमिमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः ।
गृहदोऽग्रयाणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम् ।। 232 ।।
जो प्यासे को जल पिलाता है, उसे तृप्ति मिलती है अर्थात् उसको अपने जीवन में पूर्ण सन्तोष प्राप्त होता है। अन्न का दान करने वाले को क्षय नहीं होने वाला सुख, तिल का दान करने वाले को प्रिय सन्तान, दीपक का दान करने वाले को उत्तम नेत्र दृष्टि, भूमि का दान करने वाले को धरती, सोने का दान करने वाले को दीर्घ जीवन, मकान दान करने वाले को सुन्दर महल एवं चांदी (रजत) दान करने वाले को सौम्य रूप की प्राप्ति होती है।
वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्विसालोक्यमश्वदः ।
अनडुहः श्रियं पुष्टां गोदो ब्रध्नस्य विष्टपम् ।। 233 ।।
भार्यामैश्वर्यमभयप्रदः । यानशय्याप्रदो
धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्मसाष्टिताम् ।। 234 ।।
वस्त्र-दान करने वाला चन्द्रमा के समान चन्द्र लोक में निवास को, घोड़े का दान करने वाला अश्वनीकुमारों के लोक को, बैल का दान करने वाला स्थिर धन को, गाय का दान करने वाला सूर्य के समान तेज को, रथ आदि सवारी तथा शय्या का दान करने वाला सुन्दर स्त्री को, अभयदान करने वाला राज्य को, धान्य (जौ, धान, चावल, गेहूं, चना आदि) का दान करने वाला स्थायी सुख को तथा वेदों का ज्ञान दूसरों का देने वाला ब्रह्म लोक को प्राप्त करता है।
सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते । वार्यन्नगोमहीवासस्तिलकाञ्चनसर्पिषाम् ।। 235 ।।
जल, अन्न, गऊ, भूमि, वस्त्र, तिल, सोना, घी आदि समस्त प्रकार के दानों से वेद विद्या का दान सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
येन येन तु भावेन सद्यद्दानं प्रयच्छति।
तत्तत्तेनैव भावेन प्राप्नोति प्रतिपूजितः ।। 236 ।।
दान देने वाला जिस भाव से जो कुछ दान देता है, उसी भाव से उसका फल उसे मिलता है।
योऽर्चितम् प्रतिगृह्णाति ददात्यर्चितमेव च।
तावुभौ गच्छतः स्वर्ग नरकं तु विपर्यये ॥ 237 ॥
जो व्यक्ति आदर-सत्कार सहित दान करता है तथा जो दान देने वाले से सत्कारपूर्वक ही दान लेता है, वे दोनों ही स्वर्ग प्राप्त करते हैं। श्रद्धा रहित होकर दान देने और लेने से दोनों ही नरक को जाते हैं।
न विस्मयेत तपसा वदेदिष्ट्वा च नानृतम्। नार्त्ताऽप्यपवदेद्विप्रान्नदत्त्वा परिकीर्तयेत् ।। 238 ॥
तप की महिमा का पार नहीं है, इसलिए उससे मिलने वाले फल पर आश्चर्य नहीं करें। यज्ञ करके झूठ नहीं बोलें अन्यथा यज्ञ फल नष्ट हो जाता है। दुख मिलने पर भी ब्राह्मणों से न तो कडवे बोल कहें और न अपशब्द का प्रयोग करें। दान देका यश पाने के लिए उसकी चर्चा नहीं करते रहना चाहिए।
यज्ञोऽनृतेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात्।
आयुर्विप्रापवादेन दानं च परिकीर्तनात् ।। 239 ॥
असत्य बोलने से यज्ञ का फल नष्ट हो जाता है। अविश्वास से तप का फल समाप्त हो जाता है। ब्राह्मणों की बुराई करने से उम्र कम हो जाती है और अपने दान का बखान करने से दान का फल नष्ट हो जाता है।
धर्म शनैः सञ्चिनुयाद्वल्मीकमिव पुत्तिकाः ।
परलोक सहायार्थं सर्वभूतान्यपीडयन् ।। 240 ।।
दीमक जिस तरह धीमे-धीमे अपने रहने के लिए बांबी बनाती है उसी तरह परलोक के सुधार हेतु किसी भी प्राणी को पीड़ा न पहुंचाते हुए धीरे-धीरे ही धर्म का संग्रह करें।
नामुत्र हि सहायार्थं पिता माता च तिष्ठतः ।
न पुत्रदारं न ज्ञातिर्धर्मस्तिष्ठति केवलः ।। 241 ।।
जीव को परलोक में केवल उसका धर्म ही सहायता पहुंचा कर साथ निभाता है। मां, पिता, पत्नी तथा पुत्र आदि केवल इस लोक में ही सहायता देते हैं। आशय यह है कि मनुष्य को सदैव धर्म का पालन करना चाहिए चाहे माता-पिता तथा अन्य निकटवर्ती सम्बन्धियों को नाराज भी क्यों न करना पड़े।
एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते।
एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम् ।। 242 ।।
इस संसार में जीव अकेला ही पैदा होता है तथा अकेला ही मरता है। उसे अपने अच्छे बरे कर्मों का फल भी अकेला ही भुगतना पड़ता है। यह अकाट्य सत्य है।
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ।
विमुखाः बान्धवाः यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति ।। 243 ।।
मरे हुए व्यक्ति के शरीर को बेकार मिट्टी का ढेला या लकड़ी समझकर उसके बन्धु-बान्धव उसे धरती में गाड़कर या जलाकर चले जाते हैं। उस समय धर्म ही जीव का अनुगमन करता है अर्थात् उसके साथ जाता है।
तस्माद्धर्म सहायार्थं नित्यं सञ्चिनुयाच्छनैः ।
धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ।। 244 ।।
शरीर को त्यागने के बाद धर्म ही अकेला सहायक होता है। अतः आत्मा के कल्याण हेतु थोड़ा-थोड़ा करके धर्म का संग्रह करें। परलोक के घोर अन्धकार से भरे मार्ग को जीव संचित धर्म की सहायता से ही पार करता है।
धर्मप्रधानं पुरुषं तपसा हतकिल्विषम् ।
परलोकं नयत्याशु भास्वन्तं स्वशरीरिणम् ।। 245 ।।
पापों को तप द्वारा नष्ट करके, जीवन में धर्म को प्रमुख स्थान देकर तथा श्रेष्ठ आचरण करके धर्मप्रधान जब शरीर त्याग करते हैं तो धर्म उन्हें शीघ्र मोक्ष प्रदान करता है।
उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं निनीषुः सम्बन्धानाचरेत्सह । कुलमुत्कर्षमधमानधर्मास्त्यजेत् ।। 246 ।।
मनुष्य को अपने कुल की सुरक्षा तथा प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए अच्छे परिवारों के साथ अपनी कन्या और पुत्र के विवाह सम्बन्ध बनाने चाहिए। उसे नीच तथा धर्म विरोधी पुरुषों के परिवारों से किसी तरह के सम्बन्ध नहीं जोड़ने चाहिए।
उत्तमानुत्तमान्गच्छन्हीनान्हीनाश्च वर्जयन् ।
ब्राह्मणः श्रेष्ठतामेति प्रत्यवायेन शूद्रताम् ॥ 247 ॥
श्रेष्ठ पुरुषों से सम्बन्ध जोड़ने और नीच या अधम पुरुषों के साथ सम्बन्ध नहीं रखने से ब्राह्मण की प्रतिष्ठा में वृद्धि हो जाती है। इसके विपरीत श्रेष्ठों के बजाय नीच लोगों से सम्बन्ध बनाने से ब्राह्मण पर कलंक लग जाता है।
दृढकारी मृदुर्दान्तः क्रूराचारैरसंवसन् ।
अहिंस्त्रो दमदानाभ्यां जयेत्स्वर्गं तथाव्रतः ।। 248 ।।
दृढ़ निश्चयी, स्वभाव से दयालु तथा अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाला, क्रूरता से रहित, अहिंसक, संयमी तथा दानशील ब्राह्मण स्वर्ग का अधिकारी बन जाता है अर्थात् इस लोक में उसकी कीर्ति मरने के बाद भी बनी रहती है और मरकर वह स्वर्ग जाता है।
एधोदकं मूलफलमन्नमभ्युद्यतं च यत्।
सर्वतः प्रतिगृह्णीयान्मध्वथाऽभयदक्षिणाम् ।। 249 ।।
यदि बिना मांगे ईंधन, जल, फल, कन्द-मूल, अन्न, अभय तथा दक्षिणा आदि मिल जाए तो किसी से भी ले लेना चाहिए। आशय यह है कि यदि कोई व्यक्ति बिना मांगे उपरोक्त वस्तुएं दे तो देने वाले की आयु, वर्ण, योग्यता आदि का विचार नहीं करना चाहिए।
आहृताभ्युद्यतां भिक्षां पुरस्तादप्रचोदिताम् ।
मेने प्रजापतिर्ग्रह्यामपि दुष्कृतकर्मणः ।। 250 ।।
घर आए हुए व्यक्ति द्वारा कोई वस्तु आदि न मांगने पर भी अगर गृहस्थ अपने आप भिक्षा लाता है तो आने वाले व्यक्ति को उस भिक्षा को स्वीकार कर लेना चाहिए चाहे वह गृहस्थ पापी ही क्यों न हो। यह प्रजापति ब्रह्मा जी का मत है।
नाश्नन्ति पितरस्तस्य दशवर्षाणि पञ्च च।
न च हव्यं वहत्यग्निर्यस्तामभ्यवमन्यते ।। 251 ॥
जो व्यक्ति दूसरों द्वारा अपने आप दी जाने वाली भिक्षा या दान का अपमान करता है, उसके पितर उसके श्राद्ध में पन्द्रह वर्ष तक भोजन नहीं करते और अग्नि देवता भी उसकी हवि को स्वीकार नहीं करते।
शय्यां गृहान्कुशान्गन्धानपः पुष्पं मणीन्दधि ।
धानान्मत्स्यान्पयो मांसं शाकं चैव न निणुदेत् ॥ 252 ।।
भिक्षा के रूप में अपने आप दी जाने वाली वस्तुएं जैसे शय्या, घर, सुगन्धित द्रव्य, पानी, फूल, मणि, दही, धान्य, मछली, दूध, मांस एवं शाक को वापिस नहीं लौटाएं। देने वाले के बारे में कोई तर्क किए बिना उन्हें ग्रहण कर लें।
गुरून्भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन्नर्चिष्यन्देवतातिथीन् ।
सर्वतः प्रतिगृह्णीयान्न तु तृप्येत्स्वयं ततः ॥ 253 ।।
गुरुजनों तथा सेवा करने वालों की भूख को शांत करने के लिए और देवताओं एवं अतिथियों की पूजा-अर्चना करने हेतु किसी से भी भिक्षा ग्रहण करना उचित है। यदि दाता की पात्रता के बारे में मन में शंका उठे तो चाहे वह भिक्षा स्वयं ग्रहण नहीं करें परन्तु दूसरों को भूखा नहीं रखें।
गुरुषुत्वभ्यतीतेषु विना वा तैगृहे वसन्।
आत्मनो वृत्तिमन्विच्छन्गृह्णीयात्साधुतः सदा ।। 254 ।।
माता-पिता का स्वर्गवास हो जाने पर तथा घर में अकेले रहने पर अपना पेट भरने के लिए केवल सदाचार का पालन करने वाले से ही भिक्षा लेनी चाहिए।
आर्थिकः कुलमित्रं च गोपालोदासीननापितौ।
एते शूद्रेषु भोज्यान्नाः यश्चात्मानां निवेदयेत् ॥ 255 ॥
साझे में कृषि करने वाले, कुल के मित्र, ऐसे सेवक जो कुल परम्परा के अनुसार मित्र का स्तर पा गए हैं, संसार-त्यागी और नापित जैसे व्यक्तियों का अन्न शूद्रों के भक्षण योग्य होता है। अगर इन लोगों द्वारा अन्न भेंट किया जाए तो उसे ग्रहण नहीं करें।
टिप्पणी-मनु महाराज ने भृगु जी के मुख से सामान्य तथा संकटकालीन परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न प्रकार के आचरण योग्य कर्तव्यों पर प्रकाश डाला है। अतः कहीं भी परस्पर विरोधी दिखने वाले वचनों को इसी आधार पर उनके अर्थों को ग्रहण करना चाहिए।
यादृशोऽस्य भवेदात्मा यादृशं च चिकीर्षितम् ।
यथा चोपचरेदेनं तथाऽऽत्मानं निवेदयेत् ।। 256 ।।
जिसके मन का जैसा भाव हो, जैसा करने की इच्छा हो तथा जैसी सेवा की जा रही हो, वैसा ही उसके प्रति व्यवहार करना चाहिए तथा उसके स्थान पर रुकने या न रुकने का निर्णय लेना चाहिए।
योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा सत्सु भाषते।
स पापकृत्तको लोकस्तेन आत्मापहारकः ।। 257 ।।
जो व्यक्ति संतों के सम्मुख अपने को कुछ बताता है और होता कुछ है, जैसे- वास्तव में वह दुर्जन है पर अपने को सज्जन दिखलाता है, उसे पापी, चोर तथा स्वयं की आत्मा को धोखा देने वाला समझना चाहिए।
वाच्यार्था नियताः सर्वे वाङ्मूलाः वाग्विनिःसृताः ।
तां तु यः स्तेनयेद्वाचं सः सर्वस्तेयकृन्नरः ।। 258 ॥
शब्द (वचन) से ही सभी अर्थ निश्चित होते हैं। वचन से ही सबका ज्ञान होता है। समस्त शास्त्रों का जन्म शब्द (वचन) से हुआ है इस भांति सबका मूलाधार वचन या शब्द ही है। अतः अपने वचन या शब्द की चोरी करने वाला (अर्थात् झूठ बोलने वाला) सबसे बड़ा चोर है।
महर्षिपितृदेवानां गत्वाऽऽनृण्यं यथाविधिः ।
पुत्रे सर्वं समासज्य वसेन्माध्यस्थ्यमास्थितः ।। 259 ॥
देव, ऋषि तथा पित ऋणों को विधिपूर्वक चुका कर (ब्रह्मचर्य और गृहस्थाश्रम के कर्तव्यों को पूरा कर) मनुष्य को गृह कार्य भार पुत्र को देकर तटस्थ भाव धारण कर रहना चाहिए।
एकाकी चिन्तयेन्नित्यं विविक्ते हितमात्मनि।
एकाकी चिन्त्यमानो हि परं श्रेयोऽधिगच्छति ॥ 260 ॥
मनुष्य को वन में एकान्तवास करते हुए अकेले ही आत्मा का चिन्तन करना चाहिए। ऐसे एकाकी भाव से आत्म-चिन्तन करने वाला ही मोक्ष को प्राप्त करता है।
एषोदिता गृहस्थस्य वृत्तिर्विप्रस्य शाश्वती।
स्नातकव्रतकल्पश्च सत्त्ववृद्धिकरः शुभः ।। 261 ।।
महर्षि मनु ने कहा, "मैंने आप लोगों को उत्तम ब्राह्मण द्वारा स्नातक हो जाने के बाद गृहस्थाश्रम में पालन करने योग्य धर्म के बारे में बताया है। इस धर्म का भलो प्रकार पालन करने से मनुष्य का शुभ होता है।"
अनेन विप्रो वृत्तेन वर्तयन्वेदशास्त्रवित् ।
व्यपेतकल्मषो नित्यं ब्रह्मलोके महीयते ।। 262 ।।
वेद-शास्त्र का ज्ञाता ब्राह्मण इस गृहस्थ धर्म का विधिपूर्वक पालन करने से पूरी तरह पाप रहित होकर ब्रह्म लोक को प्राप्त करता है।
॥ मनुस्मृति चतुर्थ अध्याय सम्पूर्ण ॥
Manusmriti Chapter 3
kathaShrijirasik
(मनुस्मृति तृतीय अध्याय)
षट्त्रिंशदाब्दिकं चर्यं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम् ।
तदधिकं पादिकं वा ग्रहणान्तिकमेव वा ॥1॥
गुरुकुल में ब्रह्मचारी को छत्तीस वर्ष तक निवास करके तीनों वेदों का पूर्ण अध्ययन करना चाहिए। छत्तीस वर्ष तक सम्भव न होने पर अट्ठारह वर्ष तक और उतना भी सम्भव न होने पर उसके आधे अर्थात् नौ वर्ष तक अथवा उतने काल तक जितने में वेदों में निपुणता प्राप्त हो सके रहना चाहिए।
वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वाऽपि यथाक्रमम् ।
अविप्लुतब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममावसेत् ।। 2 ।।
ब्रह्मचारी को चाहिए कि अखण्डित ब्रह्मचर्य तथा अपनी कुल परम्परा का पालन करते हुए तीनों वेदों अथवा दो वेदों या एक वेद (अपने-अपने वेद की शाखाओं सहित) का पूर्ण अध्ययन समाप्त कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे।
तं प्रतीतं स्वधर्मेण ब्रह्मदायहरं पितुः ।
स्त्रग्विणं तल्प आसीनमर्हयेत्प्रथमं गवा ॥ ३॥
पुत्र के गुरुकुल से वापस आने पर पिता उसे अपने दाय भाग का धर्मानुसार अधिकारी मानते हुए श्रेष्ठ आसन पर बैठाए, पुष्प माला पहना कर उसका स्वागत करे और उपहार स्वरूप गाय प्रदान करे।
गुरुणाऽनुमतः स्नात्वा समावृत्तो यथाविधिः ।
उद्वहेत द्विजो भार्यां सवर्णां लक्षणान्विताम् ।। 4 ।।
ब्रह्मचारी गुरु से आज्ञा लेकर विधि अनुसार स्नान कर अपने घर वापस आ जाए। इसके बाद वह शुभ लक्षणों वाली अपने समान वर्ण वाली सुन्दर कन्या से विवाह करे।
असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः । सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ॥5॥
विवाह एवं सम्भोग के लिए वही युवती उपयुक्त है जो माता या पिता की सात पीढ़ियों तक की नहीं हो तथा पिता के गोत्र की न हो। ऐसी ही युवती, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जाति के ब्रह्मचारी के लिए श्रेष्ठ होती है।
महान्त्यपि समृद्धानि गोऽजाविधनधान्यतः । स्त्रीसम्बन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत् ॥ 6 ॥
निम्नलिखित (अगले श्लोक में वर्णित) प्रकार के दस कुलों की कन्या से ब्रह्मचारी को विवाह सम्बन्ध नहीं करना चाहिए, चाहे उसके माता-पिता गो धन, बकरी धन, मेष धन, कृषि धन से अत्यन्त सम्पन्न हों। कहने का आशय यह है कि कन्या के माता-पिता दहेज में बहुत कुछ देना चाहें परन्तु इन कुलों की कन्या से विवाह नहीं करे।
हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शसम् । क्षय्यामयाव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठिकुलानि च॥ 7 ॥
त्यागने योग्य से दस कुल हैं: (1) जात-कर्म आदि संस्कार से हीन, (2) जिस कुल में सदा कन्या ही जन्म लेती हो। (3) जो वेद पाठ नहीं करता हो। (4) जिस कुल के पुरुषों के शरीर पर अत्यधिक बाल हों। (5) बवासीर रोग से ग्रस्त परिवार (6) जिस कुल में राजयक्ष्मा (टी. बी.) हो। (7) मन्दाग्नि रोग हो। (8) मूर्छा अर्थात् मृगी रोग हो। (9) श्वेत कुष्ठ रोग हो। (10) गलित कुष्ठ रोग हो।
नोद्वहेत्कपिलां कन्यां नाधिकाङ्गीं न रोगिणीम्।
नालोमिकां नातिलोमां न वाचालां न पिङ्गलाम् ॥ 8॥
नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम् ।
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम् ॥ 9॥
यस्यास्तु न भवेद्भाता न विज्ञायेत वा पिता ।
नोपयच्छेत तां प्राज्ञः पुत्रिकाधर्मशङ्कया ॥ 10 ॥
ज्ञानवान व्यक्ति को निम्न प्रकार की युवती से भी विवाह नहीं करना चाहिए-(1) कपिल अर्थात् भूरे वर्ण (रंग) वाली। (2) अधिक अंगों वाली (जैसे हाथ या पैर में छह अंगुलियां होना।) (3) नित्य रोग ग्रस्त रहने वाली। (4) बिना केशों वाली (जिसके सिर पर बाल नहीं उगते हों।) (5) बहुत अधिक रोमों वाली। (6) अधिक और कठोर बोलने वाली। (7) पीले रंग वाली। (8) वृक्ष, नदी, नक्षत्र, पर्वत, वर्गान्त, पक्षी, शूद्र तथा भयंकर नाम वाली (9) जिसका कोई सगा भाई नहीं हो। (10) जिसके पिता के सम्बन्ध में सही जानकारी नहीं हो।
अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम्।
तनुलोमकेशदशनां मृद्वङ्गमुद्वहेत्स्त्रियम् ।। 11 ।।
निम्रोक्त लक्षणों वाली युवती से ब्रह्मचारी को विवाह नहीं करना चाहिए-
(1) सुन्दर अंगों वाली (2) मधुर एवं प्रिय नाम वाली (3) हंस या हाथी जैसी चाल वाली, (4) पतले रोमों से युक्त, (5) सुन्दर और चमकीले बालों वाली, (6) उज्ज्वल दांतों वाली, (7) कोमल शरीर वाली।
शूद्रैव भार्या शूद्रस्य सा च स्वा च विशः स्मृते।
ते च स्वा चैव राज्ञश्च ताश्च स्वा चाऽग्रजन्मनः ।॥ 12 ॥
ब्राह्मण को अपनी ब्राह्मण जाति (वर्ण) के अलावा क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्ण की कन्याओं से भी विवाह करने का अधिकार है। क्षत्रिय को अपने क्षत्रिय वर्ण के अलावा वैश्य तथा शूद्र वर्ण की कन्या से भी विवाह करने का अधिकार है। वैश्य को अपनी जाति (वर्ण) की कन्या के अतिरिक्त शूद्र वर्ण की कन्या से भी शादी करने का अधिकार है। परन्तु शूद्र को केवल शूद्र कन्या से ही शादी करने का अधिकार है।
सवर्णाग्रे द्विजातीनां प्रशस्ता दारकर्मणि।
कामतस्तु प्रवृत्तानामिमाः स्युः क्रमशोऽवराः ॥ 13 ॥
वास्तव में द्विज के लिए अपने-अपने वर्ण की युवती से विवाह करना ही श्रेष्ठ है। परन्तु कामवासना की अतृप्ति या किसी युवती से मोहग्रस्त होने पर, यह अच्छा है कि अपने वर्ण से एक चरण नीचे की युवती का वरण करे। उदाहरण के लिए उपर्युक्त परिस्थितियों में ब्राह्मण को क्षत्रिय से, क्षत्रिय को वैश्य से तथा वैश्य को शूद्र से परिणय सम्बन्ध जोड़ने की अनुमति है। परन्तु एक चरण से नीचे नहीं उतरना चाहिए (जैसे-ब्राह्मण को वैश्य या शूद्र की कन्या से विवाह नहीं करना चाहिए)।
न ब्राह्मणक्षत्रिययोरापद्यपि हि तिष्ठतोः ।
कश्मिंश्चिदपि वृत्तान्ते शूद्रा भार्योपदिश्यते ॥ 14 ।।
यद्यपि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को अपने-अपने वर्ण के अलावा अपने से निम्न वर्णों की युवतियों से विवाह करने की अनुमति दी गई है। परन्तु संकट काल में भी शूद्र युवती से विवाह नहीं करना चाहिए।
हीनजातिस्त्रियं मोहदुद्वहन्तो द्विजातयः ।
कुलान्येव नयन्त्याशु ससन्तानानि शूद्रताम् ॥ 15 ।।
यदि निम्न वर्ण (शूद्र जाति) की कन्या के रूप और सौंदर्य पर मोहित होका कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य वर्ण का व्यक्ति उससे विवाह कर लेता है तो उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली सन्तान और उससे आगे बढ़ने वाली कुल परंपरा में शूद्रता के गुण आ जाते हैं।
शूद्रावेदी पतत्यत्रेरुतथ्यतनयस्य च।
शौनकस्य सुतोत्पत्त्या तदपत्यतया भृगोः ।। 16 ॥
महर्षि भृगु के मतानुसार उपर्युक्त श्लोक में बताए अनुसार शूद्र कन्या से विवाह करने तथा उससे पुत्र उत्पन्न करने से नहीं वरन् उस पुत्र को अपना मानकर उससे कुल परम्परा चलाने से ही द्विजाति का व्यक्ति पतित होता है। महर्षि शौनक के मत से केवल विवाह द्वारा यौन भोग से नहीं वरन् उसे अपनी धर्मपत्नी मानकर उससे पुत्र उत्पन्न करने पर ही द्विजाति का व्यक्ति पतित हो जाता है। अत्रि तथा उतथ्य का मत है कि द्विजाति का व्यक्ति शूद्र स्त्री से शादी करते ही पतित हो जाता है।
शूद्रां शयनमारोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् ।
जनयित्वा सुतं तस्यां ब्राह्मयादेव हीयते ।। 17 ॥
महर्षि मनु कहते हैं कि जो ब्राह्मण अपनी शय्या पर शूद्र स्त्री को सुलाता है, वह नीच गति को प्राप्त होता है अर्थात् उसका पतन हो जाता है। शूद्र स्त्री से अपनी सन्तान उत्पन्न करने वाला ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व को समाप्त कर देता है क्षौर वह ब्राह्मण कहलवाने का अधिकार खो देता है।
दैवपित्र्यातिथेयानि तत्प्रधानानि यस्य तु।
नाश्नन्ति पितृदेवास्तन्न च स्वर्गं स गच्छति ॥ 18 ॥
ऐसे ब्राह्मण के अन्न तथा हव्य को देवता तथा पितर नहीं स्वीकार करते जो शूद्र स्त्री से विवाह करके यज्ञ, होम, श्राद्ध तथा अतिथि सेवा करता है। ऐसे ब्राह्मण को स्वर्ग की भी प्राप्ति नहीं होती।
वृषलीफेनपीतस्य निःश्वासोपहतस्य च।
तस्यां चैव प्रसूतस्य निष्कृतिर्न विधीयते ॥ 19 ॥
शूद्र स्त्री के मुख को चूमने वाले तथा उसके मुख की श्वास को अपने मुख में ग्रहण करने वाले ब्राह्मण तथा उससे जन्मी संतान की शुद्धि नहीं होती।
चतुर्णामपि वर्णानां प्रेत्य चेह हिताऽहितान् ।
अष्टाविमान्समासेन स्त्रीविवाहान्निबोधत् ॥ 20 ।।
चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) के लिए इस संसार तथा परलोक हित-अहित करने वाले आठ प्रकार के विवाहों को आप लोग सुनें।
ब्राह्यो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथाऽऽसुरः ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ 21 ॥
ये विवाह हैं- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और आठवां बहुत तुच्छ पैशाच। इसमें पैशाच विवाह को सबसे निम्न कोटि का बताया गया है।
यो यस्य धर्मो वर्णस्य गुणदोषौ च यस्य यौ।
तद्वः सर्वं प्रवक्ष्यामि प्रसवे च गुणागुणान् ।। 22 ।।
महर्षि मनु आगे बोले- ब्राह्मणो! अब मैं चारों वर्णों के लिए जो विवाह धर्मयुक्त है, आठों प्रकार के विवाहों के जो गुण-दोष हैं और आठों प्रकार के विवाहों से जन्म लेने वाली संतान के गुण-दोषों को आप लोगों से कहूंगा।
षडानुपूर्व्या विप्रस्य क्षत्रस्य चतुरोऽवरान्।
विट्शूद्रयोस्तु तानेव विद्याद्धर्यान्नराक्षसान् ॥ 23 ।।
ब्राह्मण के लिए प्रथम छह प्रकार के विवाह धर्म के अनुकूल हैं (ये छह हैं-
1. ब्राह्म, 2. दैव, 3. आर्ष, 4. प्राजापत्य, 5. आसुर, 6 गान्धर्व)। क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के लिए चार- 1. आर्ष, 2. प्राजापत्य 3. आसुर 4. गान्धर्व प्रकार के विवाह अनुकूल हैं। राक्षस तथा पैशाच विवाह किसी के लिए भी ठीक नहीं हैं।
चतुरो ब्राह्मणस्याद्यान्प्रशस्तान्कवयो विदुः ।
राक्षसं क्षत्रियस्यैकमासुरं वैश्यशूद्रयोः ।। 24 ।।
प्राचीन ऋषियों के अनुसार ब्राह्मण के लिए पहले चार प्रकार के विवाह (ब्राह्म, दैव, आर्ष तथा प्राजापत्य) को ही उत्तम कहा गया है और क्षत्रिय के लिए राक्षस विवाह तथा वैश्य और शूद्र के लिए असुर विवाह को उत्तम बताया गया है।
पंचानां तु त्रयो धर्माः द्वावधम्र्यौ स्मृताविह।
पैशाचश्चासुरश्चैव न कर्तव्यौ कदाचन ।। 25 ॥
विवाह के पहले पांच प्रकारों में प्रथम तीन (ब्राह्म, दैव, आर्ष) धर्मानुकूल हैं तथा पिछले दो (प्राजापत्य तथा आसुर) धर्मानुकूल नहीं हैं। राक्षस एवं पिशा विवाह कभी नहीं करने चाहिए।
पृथक्पृथग्वा मिश्रौ वा विवाहौ पूर्वचोदितौ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैवधम्यौं क्षत्रस्य तौ स्मृतौ ।। 26 1
पहले कहे गए और पृथक या मिश्रित रूप में वर्णन किए गए आठ प्रकार के विवाहों में क्षत्रिय के लिए गान्धर्व तथा राक्षस विवाह भी धर्मानुकूल माने जाते हैं।
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम्।
आहूय दानं कन्यायाः ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः ।। 27 ।।
वेद पढ़े हुए विद्वान तथा सच्चरित्रवान युवक को आमंत्रित करके उसको सम्मानपूर्वक वस्त्र और आभूषण आदि से सजी कन्या देना (कन्या दान करना) 'ब्राह्म विवाह' कहलाता है।
यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते।
अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्म प्रचक्षते ॥ 28 ।।
यज्ञ-यागादि विधिवत् करवाने वाले ऋत्विज्ञ का वरण करके उसे वस्त्र तथा आभूषणों से अलंकृत कन्या दान करना 'दैव विवाह' कहा जाता है।
एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः ।
कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः स उच्चते ।। 29 ।।
वरण किए जाने वाले युवक से गाय और बैल दोनों अथवा दोनों में से कोई एक-एक या दो-दो लेकर विधि-विधान पूर्वक उसे कन्या देना 'आर्ष विवाह' कहलाता है।
सहोभौ चरतां धर्ममिति वाचानुभाष्य च।
कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्राजापत्यो विधि स्मृतः ॥ ३० ॥
'प्राजापत्य विवाह' उसे कहते हैं जिसमें 'तुम दोनों साथ में धर्माचरण करो' इस शुभ कामना के साथ वर को आदरपूर्वक वस्त्र और अलंकारों से सज्जित कन्या प्रदान की जाती है।
ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा कन्यायै चैव शक्तितः ।
कन्याप्रदानं स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म उच्यते ॥ 31 ॥
कन्या के माता-पिता, चाचा जाति वालों आदि को तथा स्वयं कन्या के लिए यथाशक्ति धन देकर अपनी इच्छा से वर द्वारा कन्या को स्वीकार करना 'आसूर विवाह' कहा गया है।
इच्छयाऽन्योन्यसंयोगः कन्यायाश्च वरस्य च।
गान्धर्वः स तु विज्ञेयो मैथुन्यः कामसम्भवः ।। 32 ।।
'गान्धर्व विवाह' उसे कहते हैं जिसमें कन्या तथा वर स्वेच्छा से एक-दूसरे को पसन्द करके विवाह बंधन में बंध जाते हैं। इस तरह का विवाह कामजन्य वासना पर आधारित होता है।
हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च क्रोशन्तीं रुदतीं गृहात् ।
प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते ।। 33 ।।
कन्या पक्ष वालों की हत्या कर अथवा उनके हाथ-पांव का छेदन कर तथा घर-द्वार आदि तोड़ कर रोती या गाली देती हुई कन्या का बल से हरण कर अपने अधिकार में करना 'राक्षस विवाह' कहा जाता है।
सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति।
स पापिष्ठो विवाहानां पैशाचः प्रथितोऽधमः ।। 34 ॥
निद्रा मग्न, नशे आदि के सेवन से अर्ध मूर्छित अथवा अपने शील की रक्षा में प्रमादग्रस्त किसी कन्या के साथ मैथुन करके उसे विवाह करने को मजबूर कर देना 'पैशाच विवाह' कहा गया है, जो अत्यन्त निन्दित है।
अद्भिरेव द्विजाग्रयाणां कन्यादानं विशिष्यते ।
इतरेषां तु वर्णानामितरेतरकाम्यया ।। 35 ॥
ब्राह्मण का विवाह (कन्या का हाथ ग्रहण कर पिता आदि के द्वारा हाथ में जल लेकर कन्यादान का संकल्प करके) जलदान करने से होता है। दूसरे वर्णों के लिए विवाह पारस्परिक इच्छा द्वारा केवल वचन मात्र से भी हो सकता है। वर तथा कन्या पक्ष के लोग जिस विधि-विधान को मानना चाहें वही ठीक है।
यो यस्यैषां विवाहानां मनुना कीर्तितो गुणः ।
सर्वं शृणुत तं विप्राः सर्वं कीर्तयतो मम ॥ 36 ।।
भृगु महर्षि कहते हैं, हे ब्राह्मणा! मनु महाराज ने सभी आठ प्रकार के विवाहों के जो गुण बताए हैं उन्हें आप लोग मुझसे सुनिए।
दश पूर्वान्परान्वंश्यानात्मानं चैकविंशकम् ।
ब्राह्मीपुत्रः सुकृतकृन्मोचयत्येनसः पितृन् ।॥ 37 ॥
ब्राह्म विवाह द्वारा जन्मा पुत्र पुण्यात्मा तथा सदाचारी होने पर अपनी पीढ़ी तथा दस आगे और दस पीछे की पीढ़ियों के वंशजों को पाप से मुक्त कर देता है। इस प्रकार वह कुल मिलाकर इक्कीस पीढ़ियों को पाप मुक्त करता है।
दैवोढाजः सुतश्चैव सप्त-सप्त परावरान्।
आर्षांढाजः सुतस्त्रींस्त्रीन्षट्क्षट् कायोढजः सुतः ।। 38 ॥
दैव विवाह से जन्मा पुत्र सात आगे की पीढ़ियों तथा सात पिछली पीढ़ियों के वंशजों का तथा अपनी पीढ़ी का (कुल पन्द्रह पीढ़ियों का) उद्धार करने की सामर्थ्य रखता है। प्राजापत्य विवाह से जन्मा सदाचारी पुत्र पीछे की छह तथा आगे की छह पीढ़ियों तथा एक अपनी पीढ़ी (कुल तेरह पीढ़ियों) के वंशजों का उद्धार करता है। आर्ष विवाह से जन्मा सदाचारी पुत्र आगे की तीन तथा पीछे की तीन पीढ़ियों तथा एक अपनी (कुल सात पीढ़ियों) को पापों से मुक्त करता है।
ब्राह्मादिषु विवाहेषु चतुष्वैवानुपूर्वशः ।
ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्राः जायन्ते शिष्टसम्मताः ॥ 39 ।।
रूपसत्त्वगुणोपेता धनवन्तो यशस्विनः ।
पर्याप्त भोगा धर्मिष्ठा जीवन्ति च शतं समाः ॥ 40 ॥
ब्राह्म आदि पहले चार प्रकार के विवाहों के फलस्वरूप जन्म लेने वाला ब्रह्म तेज से पूर्ण पुत्र अपने आचरण के लिए श्रेष्ठ जनों द्वारा प्रशंसा पाता है, वह रूप-सौन्दर्य, शक्ति, धैर्य, उदारता आदि गुणों से युक्त होता है। वह धनवान, यशवान अत्यधिक भोग भोगने वाला तथा धर्मात्मा भी होता है, वह सौ वर्ष की आयु वाला होता है।
इतरेषु तु शिष्टेषु नृशंसानृतवादिनः ।
जायन्ते दुर्विवाहेषु ब्रह्मधर्मद्विषः सुताः ।। 41 ॥
शेष चार प्रकार के विवाहों (आसुर, गान्धर्व, राक्षस तथा पैशाच) से जन्म लेने वाले पुत्र क्रूर, झूठ बोलने वाले, ब्राह्मण विरोधी, धर्म से द्वेष रखने वाले तथा लज्जाहीन प्रकृति के होते हैं।
अनिन्दितैः स्त्रीविवाहैरनिन्द्या भवति प्रजा।
निन्दितैर्निन्दिताः नृणां तस्मान्निन्द्यान्विवर्जयेत् ।। 42 ।।
अनिन्दित स्त्री विवाहों से जन्म लेने वाली सन्तान अनिन्दित तथा निन्दित स्त्री विवाहों से जन्मी सन्तान निन्दित होती है। अतः निन्दित स्त्री विवाह पूरी तरह त्यागने योग्य है।
अभिप्राय यह है कि सदाचारी एवं सफल सन्तान पाने के लिए विवाह की श्रेष्ठ विधियां अपनानी चाहिए तथा निन्दित विवाहों की विधियों का पूर्ण त्याग करना चाहिए।
पाणिग्रहणसंस्कारः सवर्णासूपदिश्यते ।
असवर्णास्वयं ज्ञेयो विधिरुद्वाहकर्मणि ।। 43 ।।
उपर्युक्त श्लोकों में पाणिग्रहण संस्कार (विवाह) के बारे में जिस विधि-विधान का वर्णन किया है। वह सब सवर्ण स्त्रियों (अपने-अपने वर्ण की जैसे-ब्राह्मण कन्या का विवाह ब्राह्मण से, क्षत्रिय कन्या का क्षत्रिय वर से, वैश्य कन्या का वैश्य वर से) के बारे में है। अब हम असवर्ण विवाह सम्बन्ध (जिनमें वर तथा वधू का वर्ण भिन्न हो) की विधि बताते हैं।
शरःक्षत्रियया ग्राह्यः प्रतोदो वैश्यकन्यया।
वसनस्य दशा ग्राह्या शूद्रयोत्कृष्टवेदने ।। 44 ।।
अगर ब्राह्मण जाति का पुरुष क्षत्रिय वर्ण की कन्या से विवाह करता है तो क्षत्रिय कन्या को ब्राह्मण के हाथ में ग्रहण किए हुए वाण के एक सिरे को पकड़ना चाहिए। यदि ब्राह्मण या क्षत्रिय पुरुष वैश्य वर्ण की कन्या के साथ विवाह करता है तो वैश्य कन्या को वर के हाथ में ग्रहण किए हुए चाबुक (सांटे) के एक सिरे को पकड़ना चाहिए। ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर के साथ विवाह करने वाली शूद्र वर्ण की कन्या वर के कंपड़े का एक सिरा पकड़े।
ऋतुकालाभिगामी स्यात्स्वदारनिरतः सदा।
पर्ववर्ज व्रजेच्चैनां तव्रतो रतिकाम्यया । 45 ॥
पुरुष (पति) को पत्नी के साथ केवल उसके रज के स्त्राव के परवर्ती काल (ऋतुकाल) में ही सम्भोग करना चाहिए। सम्भोग (मैथुन) में, रति भोग की इच्छा होने पर भी अमावस्या, एकादशी, संक्रान्ति तथा पूर्णिमा आदि दिवसों पर मैथुन नहीं करना चाहिए।
ऋतुः स्वाभाविकः स्त्रीणां रात्रयः षोडश स्मृताः ।
चतुर्भिरितरैः सार्धमहोभिः सद्विगर्हितैः ।। 46 ।।
स्त्रियों के ऋतुकाल में उनके साथ मैथुन करने की 16 रातें स्वाभाविक हैं। इनमें वे चार रातें भी शामिल हैं, जिन्हें निन्दनीय माना गया है और उनमें मैथुन करना मना है।
तासामाद्याश्चतस्त्रस्तु निन्दितैकादशी च या।
त्रयोदशी च शेषास्तु प्रशस्ता दश रात्रयः ।। 47 ॥
ऋतुकाल की पहली चार रातों के अलावा एकादशी और त्रयोदशी के दिनों में मैथुन करना मना है। इन दिनों (तिथियों) को छोडकर शेष दस रातें सम्भोग करने के लिए सब प्रकार से योग्य मानी गयी हैं।
युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु । तस्माद्युग्मासुपुत्रार्थी संविशेदार्तवे स्त्रियम् ॥ 48 ।।
ऋतुकाल की छठी, आठवीं, दसवीं और बारहवीं रातों में गर्भाधान से पुत्रों का और ऋतुमती होने की सातवीं, नौवीं तथा तेरहवीं रातों में गर्भाधान होने से पुत्रियों का जन्म होता है। इसलिए पुत्र पाने की कामना वाले पुरुष को युग्म रातों (ऋतुकाल की 6, 8, 10, 12 रातों) में ही सम्भोग करना चाहिए।
पुमान्पुंसोऽधिके शुक्रे स्त्री भवत्यधिके स्त्रियाः । समेऽपुमान्पुंस्त्रियौ व क्षीणेऽल्पे च विपर्ययः ।। 49 ॥
पुरुष के शुक्र (वीर्य) की अधिकता होने से पुत्र का और स्त्री के रज की अधिकता होने से पुत्री का जन्म होता है। पुरुष के वीर्य (शुक्राणु) और स्त्री बीज के समान होने पर एक पुत्र तथा एक पुत्री की अथवा नपुंसक की उत्पत्ति होती है। पुरुष के शुक्राणु के कम मात्रा में या कमजोर होने पर गर्भ ही नहीं ठहरता।
निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन् ।
ब्रह्मचार्येव भवति यत्र तत्राश्रमे वसन् । 50 ॥
पुरुष किसी भी आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ आदि) से संबंधित क्यों न हो यदि वह निन्दित आठ (ऋतुकाल होने पर पहली चार, पूर्णिमा और अमावस्या की दो तथा एकादशी और त्रयोदशी की दो रात्रियां) रात्रियों को छोड़कर शेष रात्रियों में स्त्री से मैथुन करता है तो वह ब्रह्मचारी कहलाता है।
न कन्यायाः पिता विद्वानगृह्णीयाच्छुल्कमण्वपि।
गृह्णञ्छुल्कं हि लोभेन स्यान्नरोऽपत्यविक्रयी ।। 51 ॥
बुद्धिमान पिता को अपनी कन्या को दान देने के बदले में अल्प से अल्प मात्रा में भी कोई शुल्क नहीं लेना चाहिए, क्योंकि शुल्क लेने वाला पिता अपनी संतान को बेचने वाला माना जाता है।
स्त्रीधनानि तु ये मोहादुपजीवन्ति बान्धवाः ।
नारीयानानि वस्त्रं वा ते पापाः यान्त्यधोगतिम् ।। 52 ।।
पति द्वारा छोड़ दिए जाने या उसकी मृत्यु हो जाने पर यदि पति के सम्बन्धी स्त्री को उसके पति या पति के सम्बन्धियों द्वारा दी गई धन, संपत्ति, वाहन, मूल्यवान वस्त्रों पर अपना अधिकार कर लेते हैं तो ऐसे लोगों को निश्चित रूप से अधोगति प्राप्त होती है।
अभिप्राय यह है कि विवाह में वधू को मिली धन-संपत्ति, वाहन-वस्त्र, आभूषण आदि 'स्त्री धन' कहलाते हैं। इन पर उसके अतिरिक्त किसी का अधिकार नहीं होता।
आर्षे गोमिथुनं शुल्कं केचिदाहुर्मुषैव तत्।
अल्पोऽप्येवं महान्वाऽपि तावानेव स विक्रयः ।। 53 ॥
आर्ष विवाह के अन्तर्गत वधू के पिता द्वारा जामाता (दामाद) से गाय आदि लेने का विधान है, परन्तु मनु महाराज के अनुसार यह उचित नहीं है, क्योंकि कन्या के विनिमय में चाहे थोड़ा लिया जाए अथवा अधिक इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता है और उसे बेचना ही समझा जाता है। सिद्धान्त के अनुसार जामाता से कुछ भी ग्रहण करना पाप है।
यासां नाददते शुल्कं ज्ञातयो न स विक्रयः ।
अर्हणं तत्कुमारीणामानृशंस्यं च केवलम् ॥ 54 ।।
जातिबन्धु या पिता अपनी जिन कन्याओं के विवाह के अवसर पर विनिमय के रूप में कोई मूल्य या शुल्क नहीं लेते, उन कन्याओं का विवाह एक तरह की पूजा और मानवता के प्रति दया भाव माना जाता है।
पितृभिर्भातृभिश्चैता पतिभिर्देवरैस्तथा ।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः ।। 55 ॥
विवाहित होने वाली कन्या को वस्त्राभूषण आदि से सजाना उसकी पूजा करना कहलाता है। इस पूजा में अपनी कल्याण कामना रखने वाले पिता के अतिरिक्त, भाई, पति तथा देवर भी सम्मिलित हो सकते हैं।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥ 56 ॥
जहां स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवता रमण करते हैं। कहने का आशय यह है कि जिस घर में स्त्रियों को पूरा आदर-सम्मान दिया जाता है और उनकी आवश्यकताओं का पूरा ध्यान रखा जाता है, वहां सभी तरह की सुख-शांति रहती है लेकिन इसके विपरीत जहां स्त्रियों की पूजा नहीं होती वहां सभी प्रकार के शुभऔर पवित्र कर्म भी कोई सुखद फल नहीं देते।
शोचन्ति जामयो यत्र विनशत्याशु तत्कुलम् ।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ॥ 57 ।।
उस परिवार का नाश शीघ्र हो जाता है जिसकी स्त्रियां दुख या अभाव के फलस्वरूप रोती-कलपती रहती हैं लेकिन जिस परिवार की नारियां सुखी तथा संतुष्ट रहती हैं। उसकी निरन्तर वृद्धि होती जाती है।
जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रति पूजिताः ।
तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्वतः ।। 58 ॥
जिस घर को ये जामियां अर्थात् पत्नी, पुत्रवधू, बहन, कन्या आदि अनादर होने से शाप देती हैं। वह घर कृत्या (अभिचार कर्म, जैसे- मारण, मोहन, उच्चाटन आदि) से अभिशापित घर की तरह नष्ट हो जाता है।
तस्मादेताः सदा पूज्याः भूषणाच्छादनाशनैः ।
भूतिकामैर्नरैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च ॥ 59 ।।
इसलिए अपने परिवार की उन्नति चाहने वाले पुरुषों को यज्ञोपवीत, विवाह आदि अवसरों पर स्त्रियों को स्वादिष्ट उत्तम भोजन तथा वस्त्राभूषण आदि आदर सहित देने के रूप में उनकी पूजा करनी चाहिए।
सन्तुष्टोभार्यया भर्त्ता भर्त्रा भार्या तथैव च।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वैध्रुवम् ॥ 60 ॥
जिस परिवार में पत्नी अपने पति से तथा पति अपनी पत्नी से सन्तुष्ट रहते हैं। उन परिवारों में निश्चित रूप से सदैव सुख और शांति का निवास रहता है।
यदि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत्।
अप्रमोदात्पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्तते ॥ 61 ॥
अगर स्त्री प्रसन्न नहीं होती तो वह अपने पति के साथ भोग-विलास करने को उद्यत नहीं होती। इससे पति को सुख प्राप्त नहीं होता और संभोग आदि नहीं करने से संतान नहीं होती जिससे पति की कुल परंपरा आगे नहीं बढ़ती।
अतः स्त्री को सदैव उत्तम भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि देकर प्रसन्न रखना चाहिए।
स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद्रोचते कुलम् ।
तस्यां त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते ॥ 62 ।।
वस्तुतः जब स्त्री भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि प्राप्त कर प्रसन्न होती है तो वह पूरे कुल की शोभा बन जाती है। परन्तु स्त्री के साज-श्रृंगार न करने और खुश न रहने पर सारा कुल मलिन हो जाता है।
कुविवाहैः क्रियालोपैर्वेदानध्ययनेन च।
कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च ॥ 63 ।।
प्रतिष्ठित कुल भी निन्दित विवाह विधियों को अपनाने से, यज्ञ-हवन आदि अनुष्ठानों का त्याग कर देने से, वेदों का अध्ययन करने की उपेक्षा कर देने से तथा ब्राह्मणों का आदर नहीं करने से नीच बन जाते हैं।
शिल्पेन व्यवहारेण शूद्रापत्यैश्च केवलैः।
गोभिरश्वैश्च यानैश्च कृष्या राजोपसेवया ।। 64 ।।
अयाज्ययाजनैश्चैव नास्तिक्येन च कर्मणाम्।
कुलान्याशु विनश्यन्ति यानि हीनानि मन्त्रतः ।। 65 ।।
यदि कोई उच्च ब्राह्मण परिवार अपने कर्तव्य कर्मों से विमुख होकर निम्न निकृष्ट कर्मों को अपनाता है तो पतित हो जाता है। जैसे- 1. शिल्पकला, 2. व्यापार, 3. शूद्र वर्ण की स्त्रियों से संतानोत्पति, 4. गाय, अश्व तथा रथ आदि को आजीविका का साधन बनाना, 5. कृषि, 6. राजसेवा, 7. चाण्डालों आदि का यज्ञ कराना, 8. वेदों में आस्था न रखना तथा 9. वेद-मंत्रों का ज्ञान न होना आदि कर्म ब्राह्मणों के लिए वर्जित हैं।
टिप्पणी - ब्राह्मण के लिए ये सब कर्म निषिद्ध हैं। अतः इनका व्यवहार करने वाला ब्राह्मण निन्दा का पात्र बनता है।
मन्त्रतस्तु समृद्धानि कुलान्यल्पधनान्यपि।
कुलसंख्यां च गच्छन्ति कर्षन्ति च महायशः ।। 66 ।।
वेद ज्ञान से संपन्न परिवार निर्धन होने पर भी धनवान, यशवान और ऊंचे बन कर समाज में प्रतिष्ठा बढ़ाते हैं।
वैवाहिकऽग्नौ कुर्वीत गृह्यं कर्म यथाविधिः ।
पञ्चयज्ञविधानं च पंक्तिं चान्वाहिकीं गृही ।। 67 ॥
एक गृहस्थ व्यक्ति को चाहिए कि वह विवाह की अग्नि में विधिवत् गृहस्थ धर्म के लिए बताए गए कर्मों (जैसे- प्रातः सायं यज्ञ-होम आदि करना) को करें। इसके साथ ही वह प्रतिदिन उसी अग्नि से बलिवैश्वदेव आदि पंच यज्ञ तथा पाक-यज्ञ आदि भी संपन्न करें।
पञ्चसूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः ।
कण्डनी चोदकुम्भश्च वध्यते यस्तु वाहयन् ॥ 68 ॥
गृहस्थ के लिए पांच चीजों (चूल्हा, चक्की, झाड़, ऊखल-मूसल तथा जल कलश) का उपयोग सूक्ष्म जीवों के वध का कारण बनता है और इनका उपयोग करने वाला पाप का भागीदार बानता है।
तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थं महर्षिभिः ।
पञ्चक्लृप्ता महायज्ञा प्रत्यहं गृहमेधिनाम् ।। 69 ॥
उपर्युक्त श्लोक में बताए गए पंच पापों से बचने के लिए महा ऋषियों ने गृहस्थाश्रम के लोगों के लिए पंच महायज्ञ करने का विधान बतलाया है।
टिप्पणी-यह कितने सुखद आश्चर्य का विषय है कि भारतीय महर्षियों को आज से हजारों वर्ष पूर्व इस वैज्ञानिक सत्य का ज्ञान था कि संसार में सैकड़ों प्रकार के ऐसे सूक्ष्म जीव (बैक्टीरिया, जीवाणु आदि) हैं जो चूल्हा, चक्की, झाडू, ऊंखल-मूसल और जल कलश द्वारा नष्ट हो जाते हैं। यह जीव केवल सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा ही देखे जा सकते हैं। विज्ञान को इस सत्य की जानकारी सन् 1876 में ए.वी. लीयूवेनहोएक नामक व्यक्ति ने सूक्ष्मदर्शी यंत्र बनाकर दी।
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् ।
होमो दैवो बलिर्भोतोनृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ॥ 70 ।।
इन पांचों महायज्ञों के बारे में बताते हुए महर्षि मनु कहते हैं, वेदों का अध्ययन करना और कराना ब्रह्म यज्ञ है। अपने पितरों (स्वर्गीय पूर्वजों) का श्राद्ध-तर्पण कराना पितृ यज्ञ है। हवन करना देव यज्ञ है। बलिवैश्वदेव करना 'भूत यज्ञ' है। अतिथियों का सत्कार करना और उन्हें भोजन कराना 'नृयज्ञ' है। नृयज्ञ अर्थात् मनुष्य यज्ञ।
पञ्चैतान्यो महायज्ञान्न हापयति शक्तितः ।
स गृहेऽपि वसन्नित्यं सनादोषैर्न लिप्यते ।। 71 ।।
अपनी सामर्थ्य भर इन पांच महायज्ञों को करने वाला व्यक्ति गृहस्थाश्रम में ऊपर बताए गए पांच पापों के दोषों का भागीदार नहीं होता।
देवतातिथिभृत्यानां पितृणामात्मनश्च यः ।
न निर्वपति पञ्चानामुच्छ्वसन्न स जीवति ।। 72 ।।
गृहस्थाश्रम में रहने वाला जो व्यक्ति देवताओं, अतिथियों और अपने आश्रितों, पितरों (माता-पिता तथा गुरु आदि) तथा स्वयं के लिए भोजन का प्रबन्ध नहीं कर सकता वह सांस लेते हुए (जीते हुए) भी मरे हुए के समान है।
अहुतं च हुतं चैव तथा प्रहुतमेव च।
ब्राह्मयं हुतं प्राशितं च पंचयज्ञान्प्रचक्षते ॥ 73 ।।
अन्य मुनियों ने जो पञ्च महायज्ञ बताए हैं, वे हैं- अहुत, हुत, प्रहुत, ब्राह्महुत तथा प्राशित ।
जपोऽहुतो हुतो होमः प्रहुतो भौतिको बलिः ।
ब्राह्मयं हुतं द्विजाग्रयार्चा प्राशितं पितृतर्पणम् ॥ 74 ॥
जप करना 'अहुत' यज्ञ है। हवन करना 'हुत यज्ञ' है। भूत बलि देना 'प्रहुत', ब्राह्मण की पूजा करना, 'ब्राह्महुत' तथा जीवित पितरों की सेवा और मृत पितरों का तर्पण करना, 'प्राशित' यज्ञ है।
स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यादैवे चैवेह कर्मणि ।
देवकर्मणि युक्तो हि बिभर्तीमं चराचरम् ॥ 75 ॥
गृहस्थाश्रम में रहने वाले को नित्य यज्ञ-हवन आदि करना चाहिए। वास्तव में यज्ञ-हवन आदि करने से इस जगत के समस्त जड़-चेतन का पालन तथा विकास होता है।
टिप्पणी-यज्ञ हवन आदि करने से वायुमण्डल-स्वच्छ तथा पवित्र बनता है। यज्ञ करने से मेघों की उत्पत्ति होती है। मेघों द्वारा वर्षा होती है, जिससे अन्न की उत्पत्ति होती है। जीव-जगत को जीवन रूपी जल मिलता है। जल से वृक्ष-पौधों आदि का विकास होता है। इस प्रकार यज्ञ-हवन आदि अन्न और जल प्रदान कर सबका पालन और विकास करते हैं।
अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते ।
आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥ 76 ।।
अग्नि में डाली जाने वाली आहुति सूर्य के पास पहुंचती है। सूर्य ही वर्षा का कारण है, वर्षा पाकर ही खेतों में अन्न पैदा होता है। इसी अन्न से प्रजा का पालन होता है।
यथा वायुं समाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः ।
तथा गृहस्थामाश्रित्य वर्तन्ते इतराश्रमाः ॥ 77 ।।
सभी आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) उसी प्रकार गृहस्थ पर आधारित हैं जिस प्रकार संसार का सम्पूर्ण जीवन वायु पर आधारित है। वायु नहीं मिलने पर कोई जीवधारी जीवित नहीं रह सकता। वायु नहीं मिलने पर सभी जीव मर जाएंगे क्योंकि सभी को सांस के रूप में वायु चाहिए। इसी तरह यदि गृहस्थ अन्य आश्रम में रहने वाले लोगों को दान नहीं दे तो वे भी समाप्त हो जाएंगे।
यस्मात्त्रयोऽप्याश्रमिणो ज्ञानेनान्नेन चान्वहम् ।
गृहस्थेनैवधार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृहम् ॥ 78 ।।
तीनों आश्रम के लोग (ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासी) बिना किसी चिन्ता के जिस ज्ञान का लाभ प्राप्त करते हैं, उसका पूरा श्रेय गृहस्थाश्रम को जाता है, क्योंकि इसी आश्रम के लोग उनका पालन-पोषण करते हैं। अतः गृहस्थ ही सब आश्रमों में श्रेष्ठ है।
सः सन्धार्यः प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता।
सुखं चेहेच्छताऽत्यन्तं योऽधार्यो दुर्बलेन्द्रियैः ।। 79 ॥
जीवन में इस संसार के सुखों और मृत्यु के बाद स्वर्ग के सुखों की कामना रखने वाले पुरुष को प्रयत्नपूर्वक इस आश्रम को निबाहना चाहिए। इस आश्रम का निर्वाह कमजोर इन्द्रिय वाले व्यक्तियों द्वारा नहीं हो सकता।
ऋषयः पितरो देवाः भूतान्यतिथयस्तथा।
आशासते कुटुम्बिभ्यस्तेभ्यः कार्यं विजानता ।। 8० ।।
ऋषि-मुनि, पितर, देवता, अतिथि और अन्य सभी जीव गृहस्थ से ही कुछ पाने की आशा करते हैं। इसलिए गृहस्थ को प्रति दिन पांचों यज्ञों को अवश्य पूरा करना चाहिए।
स्वाध्यायेनार्चयेतर्षीन्होमैर्देवान्यथाविधि ।
पितृछ्राद्धैश्च नृनन्नैर्भूतानि बलिकर्मणा ॥ 81 ।।
ऋषियों का सत्कार तथा पूजा वेदपाठ से, विधिपूर्वक हवन करके देवताओं की पूजा, श्राद्धों से पितरों की पूजा, अन्न देकर अतिथियों की पूजा और बलिकर्म से भूतों की पूजा (संतुष्टि) करनी चाहिए।
कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा।
पयोमूलफलैर्वाऽपि पितृभ्यः प्रीतिमावहन् ॥ 82 11
गृहस्थ को पितरों का आशीर्वाद पाने हेतु प्रतिदिन अन्न, जल, दूध, कन्द-मूल तथा फल से पितरों का श्राद्ध करते रहना चाहिए।
एकमप्याशयेद्विप्रं पित्रर्थं पाञ्चयाज्ञिके। न चैवात्राशयेत्किञ्चिद्वैश्वदेवं प्रतिद्विजम् ॥ 8३ ॥
पंच महायज्ञों के अन्तर्गत पितृ यज्ञ के लिए, पिता के जीवित नहीं होने पर 'पिता' की संज्ञा धारण करने वाले (यहां 'पिता' से आशय उस व्यक्ति से है जिसने 24 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन किया हो। ऐसे ब्रह्मचारी को 'पिता की संज्ञा दी गई है।) एक ब्राह्मण ब्रह्मचारी को भोजन करा देना चाहिए। यह विधान केवल पितृयज्ञ हेतु है अन्य यज्ञ के लिए नहीं।
वैश्वदेवस्य सिद्धस्य गृह्येऽग्नौ विधिपूर्वकम् । आभ्यः कुर्याद्देवताभ्यो ब्राह्मणो होममन्वहम् ॥ 84 ॥
ब्राह्मण को चाहिए कि वह अपने घर में स्थापित अग्नि में सिद्ध वैश्वदेव के नाम से देवों को हवि अर्पित करने के रूप में होम करे।
अग्ने सोमस्य चैवादौ तयोश्चैव समस्तयोः ।
विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो धन्वन्तराय एव च ॥ 85 ॥
अग्नि, सोम, विश्वेदेव और फिर धन्वन्तरि देव को हवि अर्पित करते हुए निम्न मंत्रों को उच्चारण करे-
अग्नये स्वाहा ! (अग्नि के लिए)
सोमाय स्वाहा ! (सोम के लिए)
अग्नि सोमाभ्यां स्वाहा ! (अग्नि और सोम दोनों के लिए)
धन्वंतरये स्वाहा! (रोग निवारक देवता धन्वन्तरि के लिए)
कुद्वै चैवानुमत्यै च प्रजापतय एव च।
सह द्यावापृथिव्योश्च तथा स्विष्टकृतेऽन्ततः ॥ 86 ।।
फिर क्रमशः कुह्न (अमावस्या का दिन), अनुमति (पूर्णिमा का दिन), प्रजापति (ब्रह्मा) तथा द्यावा पृथ्वी के उद्देश्य से और सबसे अंत में स्विष्टकृत् के उद्देश्य से हवन करे।
मन्त्रोच्चार इस क्रम में होगा-
कुट्टै स्वाहा !
अनुमत्यै स्वाहा !
प्रजापत्ये स्वाहा !
द्यावा पृथ्वीभ्याम स्वाहा !
अंत में अग्नि के लिए स्विष्टकृते स्वाहा !
एवं सम्यग्घविहुत्वा सर्वदिक्षु प्रदक्षिणम् ।
इन्द्रान्तकाप्पतीन्दुभ्यः सानुगेभ्यो बलिं हरेत् ॥ 87 1
ऊपर बताई विधि से होम करने के बाद पूर्व, पश्चिम, दक्षिण तथा उत्तर चारों दिशाओं में अनुग सहित क्रमशः इन्द्र, वरुण, यम एवं सोम को बलि देनी चाहिए
मरुद्भ्य इति तु द्वारि क्षिपेदप्स्वद्भ्य इत्यपि।
वनस्पतिभ्य इत्येवं मुसलोलूखले हरेत् ।। 88 ।।
घर के द्वार पर 'मरुदभ्य स्वाहा' (वायु के लिए), जल में 'अद्भ्य स्वाहा' कह कर तथा 'वनस्पतिभ्यः स्वाहा' कहकर ऊखल और मूसल पर बलि देनी चाहिए।
उच्छीर्षके श्रियै कुर्याद्भद्रकाल्यै तु पादतः ।
ब्रह्मावास्तोष्पतिभ्यां तु वास्तुमध्ये बलिं हरेत् ।। 89 ॥
वास्तुपुरुष के मस्तक पर उत्तर-पूर्व कोण में श्री के लिए, उसी वास्तुपुरुष के चरणों की ओर दक्षिण-पश्चिम कोण में भद्रकाली के लिए, वास्तुपुरुष के मध्य में ब्रह्मा एवं वास्तोष्पति के हेतु बलि विसर्जन करे।
टिप्पणी-यहां वास्तुपुरुष के मस्तक से आशय भवन की छत से है। 'श्री' का अर्थ धन-संपत्ति, यशदात्री लक्ष्मी जी से है। भद्रकाली का सम्बन्ध धरती माता से है।
विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो बलिमाकाश उत्क्षिपेत् ।
दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नक्तञ्चारिभ्य एव च ॥ १० ॥
'विश्वदेवेभ्यः स्वाहा' कहते हुए दिन में तथा रात्रि में विचरण करने वाले जीवों के लिए 'दिवाचरेभ्यो निशाचरेभ्यः भूतेभ्यः स्वाहा' कहते हुए आकाश में बलि फेंकनी चाहिए।
पृष्ठवास्तुनि कुर्वीत बलिं सर्वात्मभूतये।
पितृभ्यो बलिशेषं तु सर्वं दक्षिणतो हरेत् ॥ 91 ॥
सर्वात्म भूतों के लिए भवन के पीछे 'सर्वात्मभूतये स्वाहा' कहकर घर के पीछे तथा बची हुई बलि 'पितृभ्यः स्वाहा' कहकर शेष बलि पितरों के हेतु दक्षिण दिशा में डाल देनी चाहिए।
टिप्पणी-इन्द्र का पूर्व दिशा से, यम का पश्चिम दिशा से, श्री का छत से तथा भद्रकाली का भूमि से सम्बन्ध वेदों में भी बताया गया है। बलि का अर्थ अन्न आदि से है।
शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम्।
वायसानां कृमीणां च शनकैर्निर्वपेद्भुवि ॥ 92 ॥
कुत्तों, पतित लोगों, चाण्डालों, पाप रोगियों, कौओं एवं कीट-पतंगों हेतु जो बलि रखी जाए उसे भूमि पर सहेज कर रखना चाहिए। जिससे वह मिट्टी, धूल, गंदगी आदि से दूषित नहीं हो।
टिप्पणी- यहां बलि का अर्थ भोजन तथा कीट-पतंगों द्वारा खाए जाने वाले अन्न के दानों, जल आदि से है। पाप-रोगों का आशय कुष्ठ, यक्ष्मा आदि रोगों से है। ऐसा भोजन किसी पत्ते या दोनों में पूरी सफाई के साथ रखने का निर्देश है।
एवं यः सर्वभूतानि ब्राह्मणो नित्यमर्चति ।
स गच्छति परं स्थानं तेजोमूर्तिः पथर्जुना ।। 93 ।।
जो ब्राह्मण सभी देवों, पितरों, भूतों और कीड़े-मकोड़ों को बलि देकर नित्य उनकी पूजा करता है वह आलोकमय ब्रह्म पद को सीधे पथ से जाता है।
कृत्वैतद्बलिक मैंवमतिथिं पूर्वमाशयेत् ।
भिक्षां च भिक्षवे दद्याद्विधिवद् ब्रह्मचारिणे ।। 94 ।।
ऊपर बताई विधि अनुसार बलि देने के बाद गृहस्थ को चाहिए कि यदि कोई अतिथि आया हो तो उसे भोजन करवाए और भिक्षा लेने आए ब्रह्मचारी, संन्यासी तथा भिक्षुक को भिज्ञा दे।
यत्पुण्यफलमाप्नोति गां दत्त्वा विधिवद्गुरोः ।
तत्पुण्यफलमाप्नोति भिक्षां दत्त्वा द्विजो गृही ॥ 95 ॥
मनु महाराज भिक्षा देने का महत्व बताते हुए कहते हैं कि एक गृहस्थ को ब्रह्मचारी आदि को भिक्षा देकर वही पुण्य लाभ प्राप्त होता है जो एक शिष्य द्वारा गुरु को श्रद्धापूर्वक गाय देने (गऊदान) से मिलता है।
अभिप्राय यह है कि भिक्षा मांगने आए ब्रह्मचारी, संन्यासी, भिक्षुक आदि को श्रद्धापूर्वक भिक्षा देने से गृहस्थ को अत्यधिक पुण्य मिलता है।
भिक्षामप्युदपात्रं वा सत्कृत्य विधिपूर्वकम्।
वेदतत्त्वार्थविदुषे ब्राह्मणायोपपादयेत् ।। 96 ॥
यदि अन्न पर्याप्त मात्रा में न हो तो ग्रास भर भिक्षा को भी स्वादिष्ट बना कर और अगर उतना भी न हो तो जल से पूर्ण पात्र को ही फल-फूल आदि से सजाकर वेद के तत्त्व और अर्थ को जानने वाले ब्राह्मण को आदरपूर्वक देना चाहिए। इससे भी गृहस्थ को पुण्य की उपलब्धि होती है।
नश्यन्ति हव्यकव्यानि नराणामविजानताम् ।
भस्मीभूतेषु विप्रेषु मोहाद्दत्तानि दातृभिः ॥ 97 ।।
ज्ञानहीन व्यक्ति द्वारा वेद ज्ञान से रहित तथा शुद्ध आचार से हीन ब्राह्मण को दान देने से उसके हव्य-कव्य आदि समस्त पुण्यकर्म नष्ट हो जाते हैं।
टिप्पणी-इस श्लोक में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण तथ्य पर प्रकाश डाला गया है कि दान भी सुपात्र तथा आचारवान व्यक्ति को ही देने से पुण्य मिलता है। अज्ञानी, आलसी तथा भोग विलासी, नशेबाज आदि को दान देने से पुण्य के बजाय पाप ही मिलता है।
विद्यातपः समृद्धेषु हुतं विप्रमुखाग्निषु।
निस्तारयति दुर्गाच्च महतश्चैवकिल्बिषात् ॥ १8 ।।
गृहस्थ द्वारा विद्या और तप से विकसित हुए ब्राह्मण के मुख रूपी अग्नि में हवन किया हुआ अन्न आदि उसे (गृहस्थ को) कठिन से कठिन रोगों, राजभय, शत्रुभय आदि के पाप से मुक्त कर देता है।
टिप्पणी-उपरोक्त का आशय यह है कि तपस्वी तथा विद्वान ब्राह्मण को अवश्य सम्मान सहित भोजन कराना चाहिए। यह उतना ही पुण्यदायक है जितना हवन करना।
सम्प्राप्ताय त्वतिथये प्रदद्यादासनोदके।
अन्नं चैव यथाशक्ति संस्कृत्य विधिपूर्वकम् ॥ ११ ॥
संयोग से आए हुए अतिथि का गृहस्थ द्वारा स्वागत सत्कार किया जाना चाहिए तथा उसे (अतिथि को) आसन, भोजन-जल आदि देना चाहिए।
शिलानप्युञ्छतो नित्यं पञ्चाग्नीनपि जुह्वतः ।
सर्वं सुकृतमादत्ते ब्राह्मणेऽनर्चितो वसन् ॥ 100 ॥
नित्य किसान द्वारा बोए-काटे अनाज को उठा ले जाने के बाद खेत तथा मार्ग पर जो अनाज के दाने पड़े रहते हैं। उनको खोजकर चुनना और उसी से अपना पेट पालना तथा नित्य पंञ्चाग्नि होम करना। इन त्यागपूर्ण कर्मों को करने वाले ब्राह्मण के घर से भी अगर अतिथि बिना सन्तुष्ट हुए लौट जाता है तो ऐसे ब्राह्मण के भी सारे पुण्य समाप्त हो जाते हैं।
तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी सूनृता ।
एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन ।। 101 ।।
एक सज्जन व्यक्ति के घर से घास से बना आसन, बैठने या विश्राम हेतु भूमि, जल तथा मधुरवाणी ये चारों कभी दूर नहीं रहते अर्थात् सदैव रहते हैं। अतः अतिथि की अगर अन्न, फल-फूल, दूध आदि से सेवा करना सम्भव नहीं हो तो उसे उचित जगह आसन पर आदर सहित बैठा कर जल देकर और मधुर वाणी बोल कर संतुष्ट करना चाहिए।
एकरात्रं तु निवसन्नतिथिर्ब्रह्मणः स्मृतः ।
अनिन्यं हि स्थितो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ।। 102 ।।
एक रात्रि गृहस्थ के घर ठहरने वाला ब्राह्मण ही अतिथि कहा गया है क्योंकि उसके आने की कोई तिथि निश्चित नहीं। अतः एक रात से अधिक ठहरने वाला ब्राह्मण अतिथि नहीं है।
टिप्पणी-इस श्लोक का सही अर्थ निकालने के लिए विद्वानों का कथन है कि 'एक रात्रि' से आशय पूरे एक दिन से है। यहां ब्राह्मण का आशय भी ब्राह्मण वर्ण के व्यक्ति से न होकर सज्जन व्यक्ति से है।
नैकग्रामीणमतिथिं विप्रं साङ्गतिकं तथा।
उपस्थितं गृहे विद्याद्भार्या यत्राग्नयोऽपि वा ॥ 103 ॥
अगर एक गांव का आदमी दूसरे गांव या नगर में जाकर बस जाता है तथा उसके गांव का कोई व्यक्ति उसके घर आकर ठहरता है या रोजी-रोटी कमाने के लिए दूसरे गांव गया व्यक्ति अपने गांव वापस आता है तो उसे 'अतिथि' नहीं कहा जाता। इसी प्रकार मित्र, साथ में पढ़ने वाला व्यक्ति या यज्ञ आदि करवाने के लिए घर आया ब्राह्मण भी अतिथि नहीं कहे जाते।
उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः ।
तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नादिदायिनः ।। 104 ।।
जो मन्द बुद्धि गृहस्थ अतिथि सत्कार करवाने के लालच में दूसरे गांव में जाकर दूसरे व्यक्ति के यहां भोजन आदि करता है। वह मरने के बाद भोजन करवाने वाले के यहां पशु बनता है।
अप्रणोद्योऽतिथिः सायं सूर्योढो गृहमेधिना।
काले प्राप्तस्त्वकाले व नास्यानश्नन्गृहे वसेत् ॥ 105 ॥
सूर्य अस्त हो जाने के बाद, असमय आने वाले अतिथि को भी घर से बिना भोजन करवाए वापस भेजना उचित नहीं माना गया है। अतिथि चाहे समय पर आए अथवा असमय उसे भोजन कराना ही गृहस्थ का धर्म है।
न वै स्वयं तदश्नीयादतिथिं यन्न भोजयेत् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वग्र्यं वाऽतिथिपूजनम् ॥ 106 ॥
जो खाद्य पदार्थ आदि अतिथि के आगे नहीं परोसे गए हों, उन्हें गृहस्थ स्वयं भी नहीं खाए । अतिथि का भोजन आदि से आदर सत्कार करने से धन, आयु, यश एवं स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
आसनावसथौ शय्यामनुव्रज्यामुपासनम् ।
उत्तमेषूत्तमं कुर्याद्धीने हीनं समे समम् ॥ 107 ।।
एक साथ अनेक अतिथियों के आ जाने पर आसन, विश्राम हेतु स्थान, शय्या पीछे-पीछे चलना तथा सेवा-सत्कार करना, यह सब अतिथियों के (आध्यात्मिक मानसिक, शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक आदि) स्तर के अनुसार होने चाहिए।
वैश्वदेवे तु निर्वृत्ते यद्यन्योऽतिथिराव्रजेत् ।
तस्याप्यन्नं यथाशक्ति प्रदद्यान्न बलिं हरेत् ॥ 108 ।।
यदि संयोग से बलिवैश्वदेव यज्ञ के पूरा हो जाने के बाद कोई दूसरा अतिथि आ जाए तो भले ही गृहस्थ फिर से यज्ञ आदि नहीं करे परन्तु अतिथि को अपनी सामर्थ्यानुसार भोजन अवश्य कराए।
न भोजनार्थं स्वे विप्रः कुलगोत्रे निवेदयेत्।
भोजनार्थे हि ते शंसन्वान्ताशीत्युच्यते बुधैः ।। 109 ।।
ब्राह्मण को भोजन प्राप्त करने के लिए अपने कुल एवं गोत्र का आश्रय नहीं लेना चाहिए। भोजन हेतु अपने पूर्वजों के यश का सहारा लेने वाला दूसरों के द्वारा वमन (उगले) किए गए भोजन को ग्रहण करने वाला होता है, ऐसा विद्वानों का मत है।
न ब्राह्मणस्य त्वतिथिगृहे राजन्य उच्यते।
वैश्यशूद्रौ सखा चैव ज्ञातयो गुरुरेव च ॥ 110 ।।
क्षत्रिय जब ब्राह्मण के घर जाता है तो वह ब्राह्मण का अतिथि नहीं कहा जाता। इसी तरह ब्राह्मण के घर आए गुरु, जाति बन्धु, मित्र, वैश्य, शूद्र आदि अतिथि नहीं कहे जाते ।
यदि त्वतिथिधर्मेण क्षत्रियो गृहमाव्रजेत्।
युक्तवत्सु च विप्रेषु कामं तमपि भोजयेत् ॥ 111 ॥
अगर कोई क्षत्रिय ब्राह्मण के घर अतिथि बन कर आ जाए तो ब्राह्मण को उस क्षत्रिय को भी भोजन करा देना चाहिए।
वैश्यशूद्रावपि प्राप्तो कुटुम्बेऽतिथिधर्मिणौ ।
भोजयेत्सह भृत्यैस्तावानृशंस्यं प्रयोजयन् ॥ 112 ॥
इसी तरह वैश्य और शूद्र भी ब्राह्मण के घर अतिथि बन कर आ जाएं तो ब्राह्मण का कर्तव्य है कि वह अपने परिवार के सेवकों के रूप में उन्हें भोजन देने की दया करे।
इतरानपि सख्यादीन्सम्प्रीत्या गृहमागतान्।
प्रकृत्यान्नं यथाशक्ति भोजयेत्सह भार्यया ।। 113 ॥
क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों के अलावा ब्राह्मण के घर उसके अपने मित्र आ जाएं तो उसे (ब्राह्मण) चाहिए कि उनका सत्कार करे और पत्नी के साथ मिलकर उन्हें भोजन प्रदान करे।
सुवासिनीः कुमारीश्चः रोगिणीः गर्भिणीः स्त्रियः ।
अतिथिभ्यो ऽन्वगेवैतान् भोजयेदविचारयन् ।। 114 ॥
विवाह योग्य युवती, छोटी आयु की कन्या, कुमारी, रुग्ण एवं गर्भवती स्त्रियों को बिना कोई संकोच किए अतिथियों से पहले भोजन करा देना चाहिए।
अदत्त्वा तु य एतेभ्यः पूर्व भुंक्तेऽविचक्षणः ।
स भुञ्जानो न जानाति श्वगृधैर्जग्धिमात्मनः ।। 115 ॥
जो मूर्ख गृहस्थ ऊपर के श्लोक में बताई स्त्रियों, अतिथि, ब्राह्मण और सेवकों को भोजन कराने से पहले स्वयं भोजन कर लेता है उसे यह ज्ञान नहीं है कि वह इस दोष के कारण मरने के बाद कुत्तों तथा गीधों के द्वारा खाया जाएगा।
भुक्तवत्स्वथ विप्रेषु स्वेषु भृत्येषु चैव हि।
भुञ्जीयातां ततः पश्चादवशिष्टं तु दम्पती ।। 116 ।।
गृहस्थ पति-पत्नी, ब्राह्मणों, माता-पिता, परिजनों और अपने पर आश्रित लोगों को भोजन से तृप्त करने के बाद शेष भोजन स्वयं करें।
देवानृषीन्मनुष्यांश्च पितृन्गृह्याश्च देवताः ।
पूजयित्वा ततः पश्चाद्गृहस्थः शेषभुग्भवेत् ॥ 117 ।।
गृहस्थ का यह कर्तव्य है कि पहले वह देवों, ऋषियों, पितरों, गृहदेवों, परिजनों एवं आश्रितों को भोजन कराए और उसके बाद ही शेष रहा भोजन ग्रहण करे।
अघं सः केवलं भुङ्क्ते यः पचत्यात्मकारणात्।
यज्ञशिष्टाशनं होतत्सतामन्नं विधीयते ।। 118 ॥
जो गृहस्थ देवों-अतिथियों आदि को भोजन न देकर केवल अपने लिए भोजन पका कर खाता है, वह केवल पाप को भोगता है, क्योंकि (पञ्च) यज्ञ से बचा भोजन ही सज्जनों का भोजन (अन्न) कहा गया है।
राजत्विक्स्नातकगुरून्द्रियश्वसुरमातुलान् ।
अर्चयेन्मधुपर्केण परिसंवत्सरात्पुनः ।। 119 ।।
यदि राजा, यज्ञ करवाने वाला, स्नातक, गुरु, प्रिय मित्र, श्वसुर तथा मामा एक वर्ष बाद घर पर आएं तो उनको मधुपर्क अर्पित करें तथा उनका पूजन करें।
राजा च श्रोत्रियश्चैव यज्ञकर्मण्युपस्थितौ ।
मधुपर्केण सम्पूज्यौ न त्वयज्ञ इति स्थितिः ।। 120 ।।
अगर यज्ञ में राजा तथा वेदपाठी ब्राह्मण आ जाए तो उनका भी मधुपर्क अर्पित करके पूजन करना चाहिए। ऐसा नहीं करने पर यज्ञ सफल नहीं होता।
सायं त्वन्नस्य सिद्धस्य पल्यमन्त्रं बलिं हरेत् ।
वैश्वदेवं हि नामैतत्सायंप्रातर्विधीयते ।। 121 ॥
स्त्री सायंकाल पके हुए भोजन को बिना मन्त्रों का उच्चारण किए ही बलि दे। प्रातःकाल तथा सायंकाल बलिवैश्वदेव यज्ञ करने का यह शास्त्रों में बताया गया विधान है।
पितृयज्ञं तु निर्वर्त्य विप्रश्चन्द्रक्षयेऽग्निमान्।
पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं कुर्यान्मासानुमासिकम् ।। 122 ।।
अमावस्या की तिथि को पितृ श्राद्ध करके प्रतिमाह 'पिण्डावाहार्यकं' श्राद्ध करना एक अग्निहोत्री गृहस्थ ब्राह्मण का कर्तव्य है।
न निर्वपति यः श्राद्धं प्रमीतपितृको द्विजः ।
इन्द्रक्षये मासि मासि प्रायश्चित्ती भवेत्तु सः ।। 123 ।।
वह द्विज (अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) जो प्रत्येक अमावस्या को
अपने स्वर्गीय पितरों का श्राद्ध कर्म नहीं करता, घोर पाप का भागी होता है। उस पाप
से मुक्त होने के लिए प्रायश्चित करना आवश्यक होता है।
पितृणां मासिकं श्राद्धमन्वाहार्यं विदुर्बुधाः ।
तच्चामिषेण कर्तव्यं प्रशस्तेन प्रयत्नतः ॥ 124 ॥
प्रत्येक माह किया जाने वाला पितरों का श्राद्ध 'अन्वाहार्य' कहा जाता है। उत्तम भोज्य पदार्थों से पितृ श्राद्ध करना ही बुद्धिमान गृहस्थ का कर्तव्य है।
तत्र ये भोजनीयाः स्युर्ये च वर्ज्याः द्विजोत्तमाः ।
यावन्तश्चैव यैश्चान्नैस्तान्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ।। 125 ।।
महर्षि मनु कहते हैं- इस पितृ श्राद्ध में जो श्रेष्ठ ब्राह्मण भोजन करने के अधिकारी हैं और जो अनधिकारी हैं तथा जितनी संख्या में एवं जिन खाद्यान्नों से भोजन कराने के योग्य हैं, उन सबके बारे में आगे कहूंगा।
द्वौ दैवे पितृकृत्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि न प्रवर्तेत विस्तरे ।। 126 ॥
गृहस्थ पितृ श्राद्ध में तीन ब्राह्मणों को तथा देव श्राद्ध में दो ब्राह्मणों को भोजन कराए। इन दोनों श्राद्धों में केवल एक-एक ब्राह्मण को भी आमंत्रित किया जा सकता है। धनवान व्यक्ति को भी इन यज्ञों में अधिक ब्राह्मणों को आमंत्रित नहीं करना चाहिए।
सत्क्रियां देशकालौ च शौचं ब्राह्मणसम्पदः ।
पञ्चैतान्विस्तरो हन्ति तरमान्नेहेत विस्तरम् ।। 127 ।।
श्राद्ध में अधिक संख्या में उत्तम ब्राह्मणों को आमंत्रित करने से पूजा की उचित विधि, देश और काल एवं पवित्रता ये सब नष्ट हो जाती हैं। अतः ब्राह्मणों को अधिक संख्या में निमंत्रित नहीं करना चाहिए।
टिप्पणी - कहने का आशय यह है ब्राह्मणों की संख्या बढ़ाने से अनेक
समस्याएं उत्पन्न हो जाएंगी। ये समस्याएं श्राद्ध के लक्ष्य को ही नष्ट कर देंगी। ये समस्याएं निम्न प्रकार की हो सकती हैं- 1. आमंत्रित ब्राह्मण क्या श्राद्ध में भोजन करने योग्य है ? 2. सभी आमंत्रित ब्राह्मणों की विधिवत् पूजा में लगने वाला धन, समय आदि। 3. अधिक मात्रा में भोजन तथा जल का प्रबन्ध करने से उसकी शुद्धता रखना कठिन होगा। 4. काल का प्रवाह सतत परिवर्तनशील है। इसके अनुसार ही देश की सांस्कृतिक परंपराएं भी परिवर्तित होती रहती हैं लेकिन छोटे रूप या संख्या में किया गया कार्य समय के प्रवाह को भी झेल लेता है। 5. एकत्रित विद्वानों की संख्या जितनी अधिक होगी उतने ही विवाद बढ़ेंगे।
इन सभी उपर्युक्त कारणों से ही महान चिंतक और सब लोगों द्वारा पूज्य भगवान मनु श्राद्ध में कम ब्राह्मणों को आमंत्रित करने की सलाह देते हैं।
प्रथिता प्रेतकृत्यैषा पित्र्यं नाम विधुक्षये।
तस्मिन्युक्तस्यैति नित्यं प्रेत्कृत्यैव लौकिकी ।। 128 ।।
अमावस्या की तिथि पर प्रेतकृत्य करने वाला व्यक्ति प्रतिदिन किए जाने वाले लौकिक श्राद्ध के फल का भी भागीदार बन जाता है। प्रेतकृत्य को ही श्राद्ध अथवा पितृकर्म कहते हैं।
श्रोत्रियायैव देयानि हव्यकव्यानि दातृभिः ।
अर्हत्तमाय विप्राय तस्मै दत्तं महाफलम् ।। 129 ॥
दाता गृहस्थ हव्य अर्थात देव बलि के उद्देश्य से दिया गया अन्न और पित बलि हेतु दिया गया अन्न वेद के ज्ञाता ब्राह्मण को ही दें। यह दान जितने श्रेष्ठ ब्राह्मण को दिया जाएगा उसका उतना ही श्रेष्ठ फल होगा।
एकैकमपि विद्वांसं दैवे पित्र्यै च भोजयेत्।
पुष्कलं फलमाप्नोति नामन्त्रज्ञान्बहूनपि ।। 130 ।।
अनेक मूर्ख ब्राह्मणों को दान देने तथा उनकी पूजा करने से वह पुण्य लाभनहीं प्राप्त होता जो देव यज्ञ और पितृ यज्ञ में एक वेद ज्ञाता ब्राह्मण को देने से मिलता है। आशय यह है कि मूर्ख ब्राह्मण को दान देना व्यर्थ है।
दूरादेव परीक्षेत् ब्राह्मणं वेदपारगम् ।
तीर्थं तद्धव्यकव्यानां प्रदाने सोऽतिथि स्मृतः ।। 131 ।।
पहले से ही पूछताछ तथा परीक्षा करके वेद ज्ञान में निपुण ब्राह्मण का पता लगा लेना चाहिए। उसे तभी आमंत्रित करें जब स्वयं संतुष्ट हो जाएं। देव बलि तथा पितृ बलि पाने का वास्तविक अधिकारी केवल ऐसा विद्वान ब्राह्मण ही है, वही अतिथि भी है।
सहस्त्रं हि सहस्त्राणामनृचां यत्र भुञ्जते।
एकस्तान्मन्त्रवित्प्रीतः सर्वानर्हति धर्मतः ।। 132 ॥
चाहे लाखों ब्राह्मणों को भोजनादि करा दिया जाए लेकिन अगर वे मूर्ख हैं तो श्राद्ध सफल नहीं होता है लेकिन एक ही वेद ज्ञाता विद्वान ब्राह्मण को भोजनादि से सन्तुष्ट करने पर श्राद्ध सफल हो जाता है।
ज्ञानोत्कृष्टाय देयानि कव्यानि च हवींषि च ।
न हि हस्तावसृग्दिग्धौ रुधिरेणैव शुध्यतः ।। 133 ।।
ज्ञान में श्रेष्ठ ब्राह्मण को ही श्राद्ध तथा यज्ञ में भोजन कराना तथा दान देना चाहिए, मूर्ख को नहीं, क्योंकि जैसे खून से सने हाथ खून से नहीं, वरन् जल से शुद्ध होते हैं वैसे ही श्रेष्ठ ब्राह्मण की संतुष्टि से ही श्राद्ध सफल होता है।
यावतो ग्रसते ग्रासान्हव्यकव्येष्वमन्त्रवित् ।
तावतो ग्रसते प्रेतो दीप्तशूलानयोगुडान् ।। 134 ।।
अपने पितरों का श्राद्ध करने वाला मूर्ख ब्राह्मण को भोजन के जितने ग्रास (कौर) खिलाता है उसे मरने के बाद उतने ही गरम-गरम शूलष्टि (दो धारों वाला एक विशेष अस्त्र) और लौह पिण्ड खाने पड़ते हैं। अतः भूलकर भी अज्ञानी तथा मूर्ख ब्राह्मण को हव्य-कव्य समर्पित नहीं करने चाहिए।
ज्ञाननिष्ठा द्विजाः केचित्तपोनिष्ठास्तथाऽपरे।
तपः स्वाध्यायनिष्ठाश्च कर्मनिष्ठास्तथापरे ।। 135 ॥
कुछ ब्राह्मण ज्ञाननिष्ठ अर्थात् आत्मज्ञानी होते हैं, कुछ तप में मग्न रहते हैं, कुछ तप तथा स्वाध्याय (वेद पाठ) में आसक्त रहते हैं और कुछ कर्मनिष्ठ होते हैं।
ज्ञाननिष्ठेषु कव्यानि प्रतिष्ठाप्यानि यत्नतः ।
हव्यानि तु यथान्यायं सर्वेष्वेव चतुर्व्वपि ॥ 136 ॥
केवल ज्ञाननिष्ठ अर्थात् आत्मज्ञानी ब्राह्मणों को ही श्राद्धों में भोजन कराना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्यान्य यज्ञों में ज्ञाननिष्ठ, तपोनिष्ठ, स्वाध्याय करने वाले तथा कर्मनिष्ठ ब्राह्मणों को आमंत्रित किया जा सकता है।
अक्षोत्रियः पिता यस्य पुत्रः स्याद्वेदपारगः ।
अश्रोत्रियो वा पुत्रः स्यात्पिता स्याद्वेदपारगः ।। 137 ।।
ज्यायांसमनयोर्विद्याद्यस्यस्याच्छ्रोत्रियः पिता ।
मन्त्रसम्पूजनार्थं तु सत्कारमितरोऽर्हति ।। 138 ॥
पुत्र वेद ज्ञाता है परन्तु पिता नहीं है अथवा पिता वेद ज्ञाता है पर उसका पुत्र वेद ज्ञाता नहीं है। इन दोनों में से जिसका पिता वेद ज्ञाता है और पुत्र भी वेद ज्ञाता है वही श्रेष्ठ है।
आशय यह है कि उस ब्राह्मण को हव्य-कव्य देना तथा उसकी पूजा करना सर्वश्रेष्ठ है जिसका पिता भी वेद ज्ञाता है और वह स्वयं भी वेदज्ञ हो।
न श्राद्धे भोजयेन्मित्रं धनैः कार्योऽस्य सङ्ग्रहः ।
नाऽरि न मित्रं यं विद्यात्तं श्राद्धे भोजयेद्विजम् ।। 139 ।।
श्राद्ध में मित्र को भोजन नहीं कराना चाहिए। मित्र की धनादि से सहायता तथा उसका सत्कार किया जा सकता है। उस ब्राह्मण को श्राद्ध में निमन्त्रित नहीं करना चाहिए जिससे किसी प्रकार की दोस्ती या दुश्मनी हो।
यस्य मित्रप्रधानानि श्रद्धानि च हवींषि च।
तस्य प्रेत्य फलं नास्ति श्राद्धेषु च हविःषु च ।। 140 ।।
जिस श्राद्ध में मुख्य रूप से मित्रों को भोजन कराया जाता है उस कव्य और हव्य का परलोक में कोई पुण्य नहीं मिलता।
यः सङ्गतानि कुरुते मोहाच्छ्राद्धे मानवः ।
स स्वर्गाच्च्यवते लोकाच्छ्राद्धमित्रो द्विजाधमः ।। 141 ।।
जो ज्ञानहीन व्यक्ति श्राद्ध को मित्रता बनाने या अपने सम्बन्धों को दृढ़ करने का साधन बनाता है, उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति नहीं होती।
सम्भोजनीयाभिहिता पैशाची दक्षिणा द्विजैः ।
इहैवास्ते तु सा लोके गौरन्धेवैकवेश्मनि ।। 142 ॥
जिस तरह एक अंधी गाय अपने अंधेपन के कारण कहीं आती-जाती नहीं और एक घर में ही खड़ी रहती है, उसी तरह मित्रों को श्राद्ध में भोजन कराना केवल इसी लोक में फलदायक होता है, परलोक में नहीं। ऐसे श्राद्ध को पैशाचिक कृत्य कहा गया है।
यथेरिणे बीजमुप्त्वा न वप्ता लभते फलम्।
तथाऽनृचे हविर्दत्त्वा न दाता लभते फलम् ।। 143 ।।
ऊसर धरती में बीज बोने वाला जिस प्रकार फल प्राप्त नहीं करता, क्योंकि बीज से पौधा ही नहीं उगता उसी प्रकार वेद ज्ञान से हीन ब्राह्मण को श्राद्ध में भोजन कराने वाला कोई फल नहीं प्राप्त करता।
दातृन्प्रतिगृहीतूंश्च कुरुते फलभागिनः ।
विदुषेदक्षिणां दत्त्वा विधिवत्प्रेत्य चेह च ।। 144 ।।
जो यजमान विद्वान ब्राह्मण से विधि अनुसार दान कराता तथा उसे दक्षिणा अर्पित करता है, उसको तथा विद्वान ब्राह्मण दोनों को लोक एवं परलोक में पुण्य की उपलब्धि होती है।
कामंश्राद्धेऽर्चयेन्मित्रं नाभिरूपमपि त्वरिम् ।
द्विषता हि हविर्भुक्तं भवति प्रेत्य निष्फलम् ।। 145 ।।
श्राद्ध में (विद्वान ब्राह्मण के न मिलने पर) भले ही मित्र को भोजन करा दे परन्तु शत्रु चाहे विद्वान क्यों न हो, उसे भोजन नहीं कराए क्योंकि द्वेष भाव से कराया और खाया गया भोजन इस लोक और परलोक दोनों में फलहीन होता है।
यत्नेन भोजयेच्छ्राद्धे बह्वचं वेदपारगम्।
शाखान्तगमथाध्वर्यु छन्दोगं तु समाप्तिकम् ॥ 146 ॥
ऋऋग्वेद में निपुण ब्राह्मण को तथा सम्पूर्ण सामवेद में कुशल ब्राह्मण को अत्यन्त आदरपूर्वक भोजन करवाना चाहिए। कहने का आशय यह है कि जो वेद ज्ञान में विशेष योग्यता रखते हैं, ऐसे विद्वान ब्राह्मणों को बड़े आदर-सत्कार तथा सावधानी के साथ भोजन कराना चाहिए।
एषामन्यतमो यस्य भुञ्जीत श्राद्धमर्चितः ।
पितृणां तस्य तृप्तिः स्याच्छाश्वती साप्तपौरुषी ।। 147 ।।
उस यजमान की सात पीढ़ी तक के पितरों की तृप्ति हो जाती है जिसके यहां ऋग्वेद, यजुर्वेद या सामवेद का विद्वान श्राद्ध में मिले आदर-सत्कार तथा भोजन से सन्तुष्ट होता है।
एष वै प्रथमः कल्पः प्रदान हव्यकव्ययोः ।
अनुकल्पस्त्वयं ज्ञेयः सदा सद्भिरनुष्ठितः ।। 148 ।।
मनु महाराज ऋषियों से कहते हैं- अभी तक मैंने हव्य-कव्य से सम्बन्धित प्रथम मुख्य कल्प के बारे में बताया है। अब मैं सज्जन व्यक्तियों द्वारा आचरण किए जाने वाले अनुष्ठान के बारे में बताता हूं, यह अनुकल्प इस प्रकार है-
मातामहं मातुलं च स्वस्त्रीयं श्वसुरं गुरुम्।
दैहित्रं विट्पतिं बन्धुमृत्विग्याज्यो च भोजयेत् ।। 149 ।।
अनुकल्प में इन लोगों को भोजन अवश्य कराएं- नाना, मामा, बहिन का पुत्र, ससुर, गुरु, पुत्री का लड़का, जामाता, सगा भाई तथा ममेरा, चचेरा, मौसेरा, फुफेरा भाई-बन्धु, ऋत्विक और आने वाला यज्ञ कर्ता ब्राह्मण।
न ब्राह्मणं परीक्षेत दैवे कर्माणि धर्मवित् ।
पित्र्ये कर्मणि तू प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः ॥ 150 ।।
धर्म का पालन करने वाला पुरुष चाहे यज्ञ कर्म कराने वाले ब्राह्मण की परीक्षा नहीं करे परन्तु श्राद्धकर्म में उसकी भली-भांति परीक्षा करने के बाद ही आमंत्रित करे।
ये स्तेनपतितक्लीवाः ये च नास्तिकवृत्तयः ।
तान् हव्यकव्ययोर्विप्रानर्हान्मनुरब्रवीत् ।। 151 ।।
महर्षि मनु के अनुसार हव्य-कव्य के लिए चोर, महापापी, नपुंसक तथा नास्तिक वृत्ति वाले ब्राह्मण पूरी तरह अनधिकृत हैं। इन्हें श्राद्ध में कभी निमंत्रित नहीं करें।
जटिलं चानधीयानं दुर्बलं कितवं तथा।
याजयन्ति च ये पुगांस्तांश्च श्राद्धे न भोजयेत् ॥ 152 ॥
श्राद्ध कर्म में ऐसे ब्राह्मण को भी आमंत्रित नहीं करें जो जटाएं रखता है। स्वाध्याय नहीं करता हो, कमजोर शरीर का हो, जुआ खेलता हो, (आवश्यकता से) अधिक व्रत रखता हो और उनका उद्यापन करता हो।
चिकित्सकान्देवलकान्मांसविक्रयिणस्तथा ।
विपणेन च जीवन्तो वर्ज्याः स्युर्हव्यकव्ययोः ।। 153 ।।
चिकित्सा करने वाले, मन्दिर में पूजा करने वाले, मांस बेचने वाले औ व्यापार से जीविका चलाने वाले ब्राह्मण को भी श्राद्ध एवं देवयज्ञ में आमंत्रित नह करते।'
प्रेष्योग्रामस्य राज्ञश्च कुनखी श्यावदन्तकः ।
प्रतिरोद्धा गुरोश्चैव त्यक्ताग्निर्वाधुषिस्तथा ।। 154 ।।
यक्ष्मी च पशुपालश्च परिवेत्ता निराकृतिः ।
ब्रह्मद्विट् परिवित्तिश्च गणाभ्यन्तर एव च ।। 155 ॥
ऐसे ब्राह्मण को हव्य अर्थात् देव यज्ञ और कव्य अर्थात् पितृ श्राद्ध में आमंत्रित नहीं करना चाहिए जो राजा या ग्राम द्वारा सन्देशवाहक के रूप में नियुक्त हो जिसके नाखून गंदे हों, जिसके दांत मैले या काले हों, जो गुरु की आज्ञा के विरुद्ध कार्य करता हो, जो अग्निहोत्र का परित्याग करने वाला हो, ब्याज से जीवन चलाता हो, क्षय का रोगी हो, पशु पालन कर जीवन चलाता हो, कन्या बचेने वाला हो, नित्य किए जाने वाले अनुष्ठानों की उपेक्षा करता हो, ब्राह्मणों से द्वेष रखता हो, कुल धर्म को तोड़ने वाला हो और समाज के धन का अपने हित में खर्च करने वाला हो।
कुशीलवोऽवकीर्णी च वृषलीपतिरेव च।
पौनर्भवश्च काणश्च यस्य चोपपतिगृहे ।। 156 ।।
भृतकाध्यापको यश्च भृतकाध्यापितस्तथा ।
शूद्रशिष्यो गुरुश्चैव वाग्दुष्टः कुण्डगोलकौ ।। 157 ॥
उपर्युक्त की तरह ऐसे ब्राह्मण को भी देव यज्ञ तथा पितृ श्राद्ध में आमंत्रित नहीं करना चाहिए जो नर्तक हो, जिसका ब्रह्मचर्य खंडित हो गया हो, शूद्र स्त्री का पति हो, जिसका दूसरे विवाह से जन्म हुआ हो, एक आंख वाला हो, जिसके घर में ही उसकी पत्नी का प्रेमी रहता है, जो वेतन देकर पढ़ता हो या वेतन लेकर पढ़ाता हो, शूद्र से शिक्षा ग्रहण करता हो। कटु बोलने वाला हो, जो जार से जन्मा सधवा नारी का पुत्र हो (कुण्ड हो) या जार से जन्मा विधवा का पुत्र (गोलक) हो।
अकारणेपरित्यक्ता मातापित्रोर्गुरोस्तथा ।
ब्राह्मर्योनैश्च सम्बन्धैः संयोगं पतितैर्गतः ।। 158 ।।
अगारदाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रयी।
समुद्रयायी बन्दी च तैलिकः कूटकारकः ।। 1591
यज्ञ तथा श्राद्धकर्म में ऐसे ब्राह्मण भी आमंत्रित होने के अधिकारी नहीं हैं जो गुरु एवं माता-पिता का बिना कारण त्याग करने वाला हो, पतितों के साथ वेदादि का अध्ययन करने वाला हो अथवा उनके साथ यौन सम्बन्ध रखने वाला हो, घर में आग लगाने वाला, जहर देने वाला, कुण्ड का अन्न खाने वाला हो, सोमरस बेचने वाला हो, समुद्र के पार जाने वाला हो, भाटों की तरह स्तुति-प्रशंसा करने वाला हो, तेल व्यापारी हो तथा झूठी गवाही देने वाला हो।
पित्रा विवदमानश्च कितवो मद्यपस्तथा ।
पापरोग्यभिशस्तश्च दाम्भिको रसविक्रयी ।। 160 ॥
धनुःशराणां कर्त्ता च यश्चाग्रेदिधिषूपतिः ।
मित्रधुग्धूतवृत्तिश्च पुत्राचार्यस्तथैव च ॥ 161 ॥
इसी प्रकार पिता के साथ निरर्थक झगड़ा करने वाला, धूर्त, शराबी, कोढ़ी, समाज में कलंकित, दम्भी, रस बेचने वाला, धनुष-बाण निर्माता, ऐसी स्त्री (जिसकी बड़ी बहन कुंआरी हो) का पति, मित्र से द्वेष करने वाला, जुआ घर खोलकर जीविका चलाने वाला तथा पुत्र से पढ़ने वाला ब्राह्मण भी देव यज्ञ एवं श्राद्ध में निमंत्रण पाने के अधिकारी नहीं हैं।
भ्रामरी गण्डमाली च श्वित्र्यऽथो पिशुनस्तथा।
उन्मत्तोऽन्धश्च वर्ज्याः स्युर्वेदनिन्दक एव च ॥ 162 ॥
ऐसे ब्राह्मण को भी हव्य-कव्य हेतु आमंत्रित नहीं करे जो मिरगी का रोगी हो, गण्डमाला रोग से पीड़ित हो, चुगलखोर हो, उन्माद से ग्रस्त हो, दृष्टिहीन हो और वेदों की निन्दा करने वाला हो।
हस्तिगोश्वोष्ट्रदमको नक्षत्रैर्यश्च जीवति ।
पक्षिणां पोषको यश्च युद्धाचार्यस्तथैव च ॥ 163 ।।
स्त्रोतसां भेदको यश्च तेषां चावरणे रतः।
गृहसंवेशको दूतो वृक्षारोपक एव च॥ 164 ।।
इसी प्रकार उन ब्राह्मणों को भी हव्य-कव्य हेतु आमंत्रित नहीं करे जो हाथी, बैल, अश्व तथा ऊटों को प्रशिक्षण देते हैं। ज्योतिष का व्यापार करते हों, युद्ध विद्या सिखाते हों. नदियों के तटबन्धों को तोडने वाले हों, नदियों के बहाव को मोड़ने वाले हों, वास्तुकला से जीविका चलाते हों, दूत कर्म करते हों तथा वृक्षों को आरोपण करने वाले हों।
श्वक्रीडी श्येनजीवी च कन्यादूषक एव च।
हिंस्त्रोवृषलवृत्तिश्च गणानां चैव याजकः ।। 165 ॥
आचारहीनः क्लीवश्चनित्यं याचनकस्तथा ।
कृषीजीवी श्लीपदी च सद्भिर्निन्दित एव च ।। 166 ॥
ता हो, श्राद्ध कर्म और यज्ञ में उस ब्राह्मण को भी पुरोहित नहीं बनाना चाहिए जो कुत्तों से खेलने और उनसे मनोरंजन करने वाला हो, बाजों को खरीदता-बेचता जीवों की हत्या करने वाला हो, शूद्रों का कार्य करके जीविका चलाता हो, गण-यज (विनायक शान्ति) कराने वाला हो, आचरण भ्रष्ट हो, नपुंसक हो, सदा भिक्षा मांगता हो, खेती करने वाला हो, पीलिया रोग से ग्रस्त हो अपने दुष्कर्मों के लिए समाज द्वारा निन्दित हो।
औरनिको माहिषिकः परपूर्वापतिस्तथा ।
प्रेतनिर्यातकश्चैव वर्जनीयाः प्रयत्नतः ॥ 167 ॥
श्राद्ध कर्म हेतु वह ब्राह्मण भी आमंत्रित करने योग्य नहीं है जो भैंसे तथा मेढ़े से अपनी जीविता चलाता हो, जिसने किसी विवाहिता से पुनर्विवाह किया हो अथवा प्रेत कर्म से धन लेता हो।
एतान्विगर्हिताचारानपाड्ङ्क्त्येयन्द्विजाधमान् ।
द्विजातिप्रवरो विद्वानुभयत्र विवर्जयेत् ॥ 168 1
ऊपर बताए गए निन्दित, अपनी पंक्ति को दूषित करने वाले और द्विजों में नीच ब्राह्मणों को देव यज्ञ तथा पितृ श्राद्ध में विद्वान मनुष्य आमंत्रित नहीं करे।
ब्राह्मणस्त्वनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति ।
तस्मै हव्यं न दातव्यं न हि भस्मनि हूयते ॥ 169 ॥
जिस तरह फूस की आग हवन सामग्री (हविष्य) डालने पर बुझ जाती है, वैसे ही जो ब्राह्मण वेदाध्ययन नहीं करता उसे देवता को दी जाने वाली हवि अर्पित नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हवन राख में नहीं, जलती अग्नि में किया जाता है।
टिप्पणी - यहां वेदाध्ययन करना या वेद पाठ करना हवन की अग्नि के समान माना गया है। उसे ज्ञानाग्नि की उपमा दी गई है। इस ज्ञानाग्नि से हीन ब्राह्मण मूर्ख के समान है। अतः उसे पितृ यज्ञ अथवा देव यज्ञ में निमंत्रित करना व्यर्थ तथा फलहीन है।
अपङ्क्त्यदाने यो दातुर्भवत्यूर्ध्वं फलोदयः ।
दैवे कर्मणि पित्र्ये वा तत्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ 170 ।।
महाराज मनु कहते हैं कि पहले बताए गए प्रकार के पंक्ति बाह्य ब्राह्मणों को हव्य एवं कव्य के लिए आमंत्रित करने पर जो दोष यजमान पर लगता है, उसे मैं आगे बताता हूं।
अन्नतैर्यद्विजैर्भुक्तं परिवेत्रादिभिस्तथा।
अपाङ्तैयैर्यदन्यैश्च तद्वै रक्षांसि भुञ्जते ॥ 171 ॥
वेदों में बताए नियमों को तोड़ने वाले, चोरी करके धन कमाने वाले और समाज द्वारा निकाल दिए जाने वाले लोगों के घर में किया गया भोजन 'राक्षस भोजन' कहा जाता है।
दाराग्निहोत्रसंयोगं कुरुते योऽग्रजे स्थिते। परिवेत्ता स विज्ञेयः परिवित्तिस्तु पूर्वजः ।। 172 ।।
अगर छोटा भाई अपने सगे बड़े भाई से पहले ही अग्निहोम तथा विवाह आदि करता है तो ऐसा छोटा भाई 'परिवेत्ता' और 'परिवित्त' कहा जाता है।
परिवित्तिः परीवेत्ता यया च परिविद्यते ।
सर्वे ते नरकं यान्ति दातृयाजक पञ्चमाः ।। 173 ।।
ऐसा बड़ा भाई जो छोटे भाई से पहले विवाह नहीं करता (परिवित्त), बड़े भाई से पहले विवाह कर लेने वाला (परिवेत्ता), छोटे भाई से विवाह करने वाली कन्या, उसे दान करने वाला पिता तथा ऐसे वर-वधू का विवाह कराने वाला पुरोहित पांचों को नरक मिलता है।
भ्रातुर्मतस्य भार्यायां योऽनुरज्य कामतः ।
धर्मेणापि नियुक्तायां स ज्ञेयो दिधिषूपतिः ।। 174 ।।
स्वर्गीय भाई की पत्नी से काम के वशीभूत होकर प्रेम करने वाला पुरुष, उससे नियोग करने पर भी धर्म के अनुसार 'दिधिषूपति' कहा जाता है।
परदारेषु जायेते द्वौ सुतौ कुण्डगोलकौ।
पत्यौ जीवति कुण्डः स्यान्मृते भर्तरि गोलकः ॥ 175 ।।
यदि किसी पुरुष द्वारा परायी पत्नी से संभोग के फलस्वरूप पुत्र उत्पन्न होते हैं तो उन्हें 'कुण्ड' तथा 'गोलक' कहते हैं। पति के जीते रहने पर सधवा से जार उपपति के द्वारा उत्पन्न पुत्र 'कुण्ड' और विधवा से जार के द्वारा उत्पन्न पुत्र 'गोलक' कहा जाता है।
तौ तु जातौ परक्षेत्रे प्राणिनौ प्रेत्य चेह च।
दत्तानि हव्यकव्यानि नाशयेते प्रदायिनाम् ॥ 176 ॥
परायी पत्नी (स्त्री) से पैदा हए दोनों प्रकार के बालक 'कुण्ड' तथा 'गोलक' जिस देवता को हव्य तथा पितर को कव्य अर्पित करते हैं, उसके लोक एवं परलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं। कहने का आशय यह है 'कुण्ड' और 'गोलक' को श्राद्ध करने का अधिकार नहीं है। इसके बावजूद भी अगर वे श्राद्ध करते हैं तो उससे उनके पितरों को पाप का ही भागी होना पड़ेगा।
अपङ्क्त्यो यावतः पङ्क्त्यान् भुञ्जानाननुपश्यति ।
तावतां न फलं तत्र दाता प्राप्नोति बालिशः ।। 177 ।।
परायी नारी से जन्मा पुत्र (कुण्ड या गोलक) के आमंत्रण को पाकर उसके यहां भोजन करने के लिए जाने वाला ब्राह्मण पंक्ति में बैठने का अधिकार खो देता है। इसके अतिरिक्त वह मूर्ख पुत्र (कुण्ड अथवा गोलक) किसी भी तरह का पुण्य पाने से वंचित हो जाता है।
अभिप्राय यह है कि जो ब्राह्मण ऐसे निमन्त्रण पर भोजन करने जाता है उसे अन्य ब्राह्मण अपने साथ नहीं बैठाते हैं और न उसके साथ बैठते हैं। इस प्रकार उस ब्राह्मण का जाति बहिष्कार हो जाता है।
वीक्ष्यान्धो नवतेः काणः षष्टेः श्वित्री शतस्य तु।
पापरोगी सहस्त्रस्य दातुर्नाशयते फलम् ॥ 178 ।।
जो ब्राह्मण इस सत्य का ज्ञान होने के बाद भी कुण्ड अथवा गोलक पुत्र के यहां निमंत्रण पाकर भोजन करता है वह (ब्राह्मण) भले ही अंधा, काना, कोढ़ी या पापी न हो क्रमशः अस्सी, नब्बे, सौ और एक हजार वेदपाठ करने वाले ब्राह्मणों को भोजन कराने के पुण्य फल को समाप्त कर देता है।
यावतः संस्पृशेदङ्गैर्बाह्मणाञ्छूद्रयाजकः ।
तावतां न भवेद्दातुः फलं दानस्य पौर्तिकम् ॥ 179 ॥
कुण्ड या गोलक पुत्र (शूद्र याज्ञिक) चाहे कितने ही ब्राह्मणों के पैरों को धोएं और कितनों को ही भोजन एवं दान-दक्षिणा देकर संतुष्ट करे परन्तु उसे दान देने से कोई पुण्य लाभ नहीं मिलता।
विदविच्चापि विप्रोऽस्य लोभात्कृत्वा प्रतिग्रहम्।
विनाशं व्रजति क्षिप्रमामपात्रमिवाम्भसि ।। 180 ॥
कुण्ड अथवा गोलक पुत्र के निमंत्रण को अगर कोई ब्राह्मण स्वीकार कर लेता है तो वह इस प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे पानी में पड़ा कच्ची मिट्टी का बर्तन नष्ट हो जाता है।
सोमविक्रयिणे विष्टा भिषजे पूयशोणितम् ।
नष्टं देवलके दत्तमप्रतिष्ठं तु वार्धषौ ।। 1811
कुण्ड या गोलक पुत्र द्वारा जो दान सोम विक्रेता, ब्राह्मण को दिया जाता है, वह विष्ठा के समान होता है, वैद्य ब्राह्मण को दिया दान पीप और खून के समान होता है, मंदिर के पुजारी को दिया दान नष्ट हुई वस्तु के समान होता है। ब्याज से जीविका चलाने वाले ब्राह्मण को दिया दान उसकी प्रतिष्ठा को नष्ट कर देता है।
यत्तु वाणिजके दत्तं नेह नामुत्रतद्भवेत् ।
भस्मनीव हुतं हव्यं तथा पौनर्भवे द्विजे ॥ 182 ।।
दोबारा विवाह करने के फलस्वरूप जन्मे पुत्र द्वारा दान कराना और बनिए (वणिक) जैसी मानसिक वृत्ति वाले ब्राह्मण द्वारा दान स्वीकार करना दोनों के लिए ही यह कार्य (दान देना-लेना) राख में घी की आहुति देने की तरह अर्थहीन है अर्थात् बेकार है।
इतरेषु त्वपङ्क्त्येषु यथोद्दिष्टेष्वसाधुषु ।
मेदोऽसृङ्मांसमज्जास्थि वदन्त्यन्नं मनीषिणः ।। 183 ॥
जो खाद्यान्न जाति से भ्रष्ट हुए और दुष्ट प्रवृत्ति वाले ब्राह्मण को दिया जाता है वह मांस, रक्त, मज्जा, हड्डियों की तरह होता है अर्थात् खाने योग्य नहीं होता। आशय यह है कि जाति से निकाले हुए ब्राह्मण को भोजन कराना पुण्य रहित है।
अपङ्क्त्योपहता पङ्क्तिः पाव्यते यैर्द्विजोत्तमैः ।
तान्निबोधत कारत्स्न्यैन द्विजाग्र्यान्पङ्क्तिपावनान् ।। 184 ।।
महाराज मनु कहते हैं-जिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों के द्वारा जाति से बहिष्कृत एवं असज्जन प्रकृति के ब्राह्मण शुद्ध, पवित्र होकर पुनः अपनी जाति की पंक्ति में बैठने के अधिकारी हो जाते हैं (अर्थात् पुनः जाति में मिला लिए जाते हैं) पंक्ति को पवित्र करने वाले श्रेष्ठ ब्राह्मणों के लक्षणों को ध्यानपूर्वक सुनो।
अग्र्याः सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च।
श्रोत्रियान्वयजाश्चैव विज्ञेयाः पङक्तिपावनाः ॥ 185 ।।
ऐसे ब्राह्मणों को ही पंक्ति पावन समझना चाहिए जिनके कुलों में परम्परा से वेदों का अध्ययन-अध्यापन तथा प्रवचन होता आया है और जो अपनी वंश परम्परा के अनुसार श्रोत्रिय (वेद विद्या विशारद) हैं।
त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णः षडङ्गवित्।
ब्रह्मदेवात्मसन्तानो ज्येष्ठसामग एव च।॥ 186 ॥
वही ब्राह्मण पंक्ति पावन होता है अर्थात जाति बहिष्कृत ब्राह्मण को पवित्र कर पुनः जाति की पंक्ति में बैठाने वाला होता है जो पंचाग्नि का सेवन करता हो, कठोपनिषद में बताए व्रत को धारण करने वाला हो. ऋग्वेद में बताए ब्राह्म विवाह वाले दम्पति से जन्मा हो तथा सामवेद के आरण्यक का गान करने वाला हो।
वेदार्थवित्प्रवक्ता च ब्रह्मचारी सहस्त्रदः ।
शतायुश्चैवविज्ञेयाः ब्राह्मणाः पङ्क्तिपावनाः ॥ 187 ।।
वह ब्राह्मण भी जाति से बाहर निकाले गए (पंक्ति बहिष्कृत) ब्राह्मण को शुद्ध करने में समर्थ होता है जो सौ वर्ष की आयु का हो, हजारों गायें दान कर चुका हो और वेद के रहस्यमय अर्थ को समझने तथा समझाने वाला हो।
टिप्पणी - पंक्ति बहिष्कृत ब्राह्मण वह ब्राह्मण होता है जो किन्हीं विशेष कायों में दूसरे के समान अधिकार नहीं रखता। परन्तु उसकी जाति ब्राह्मण ही मानी जाती है। इसके विपरीत जाति से बहिष्कृत या बाहर निकाला गया ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व के सभी अधिकार खो देता है। दोनों में साधारण सा पर महत्वपूर्ण अन्तर है।
पूर्वेद्युरपरेद्युर्वा श्राद्धकर्मण्युपस्थिते ।
निमन्त्रयीत त्र्यवरान्सम्यग्विप्रान्यथोदितान् ।। 188 ॥
श्राद्ध कर्म करने वाले व्यक्ति को चाहिए कि श्राद्ध करने से पहले एक, दो या तीन ऐसे ब्राह्मणों को आदर सहित आमंत्रित करे जो शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध कर्म कराने के अधिकारी तथा गुण सम्पन्न हों।
निमन्त्रितो द्विजः पित्र्ये नियतात्मा भवेत्सदा ।
न च छन्दांस्यधीयीत यस्य श्राद्धं च तद्भवेत् ।। 189 ।।
जिस ब्राह्मण को श्राद्ध के लिए निमंत्रित किया जाए वह उस रात (श्राद्ध करवाने के दिन से पूर्व की रात) ब्रह्मचर्य आदि नियमों का दृढ़तापूर्वक पालन करे। श्राद्ध के दिन श्राद्ध करने तथा कराने वाले के लिए वेदों का अध्ययन करना मना है।
टिप्पणी - वेदाध्ययन का निषेध इस उद्देश्य से किया गया है ताकि श्राद्ध कर्म में पूरी तन्मयता लायी जा सके।
निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान्द्विजान् । वायुवच्चानुगच्छन्ति तथासीनानुपासते ।। 190 ॥
पितर श्राद्ध हेतु आमंत्रित ब्राह्मणों के पास आ जाते हैं और वायु की तरह उनका अनुगमन करते हैं तथा उनके आसन पर बैठने के साथ उनके पास बैठ जाते हैं।
केतितस्यु यथान्यायं हव्यकव्ये द्विजोत्तमा। कथञ्चिदप्यतिक्रामन्पापः सूकरतां व्रजेत् ॥ 191 ।।
कुछ विद्वानों का कहना है जो ब्राह्मण किसी के द्वारा दिया गया श्राद्ध का आमंत्रण स्वीकार करने के बाद भी किसी कारण से श्राद्ध का भोजन नहीं करता तो उसे पाप लगता है और वह अगले जन्म में सुअर की योनि में उत्पन्न होता है।
आमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे वृषल्या सह मोदते।
दातुर्यदुष्कृतं किञ्चित्तत्सर्वं प्रतिपद्यते ॥ 192 ।।
श्राद्ध कर्म के लिए निमंत्रित ब्राह्मण अगर शूद्र स्त्री के साथ संभोग करता है तो वह यजमान के सभी पापों के कुफल पाता है।
अक्रोधनाः शौचपराः सततं ब्रह्मचारिणः ।
न्यस्तशस्त्राः महाभागाः पितरः पूर्वदेवताः ।। 193 ॥
मनु महर्षि कहते हैं- भीतर तथा बाहर से पावन, क्रोधहीन, इन्द्रियों को जीत लेने वाला, हिंसा से मुक्त, दया, उदारता आदि उच्च गुणों से युक्त, देवता से तुलना करने योग्य पुरुष ही पितर है।
यस्मादुत्पत्तिरेतेषां सर्वेषामप्यशेषतः ।
ये च यैरुपचर्याः स्युर्नियमैस्तान्निबोधत ।। 194 ।।
महाराज मनु कहते हैं कि अब मैं आप लोगों को उन नियमों के बारे में बताता हूं जिनसे पितरों की उत्पत्ति होती है तथा जिन नियमों से वे पूजित होते हैं।
मनोहिरण्यगर्भस्य ये मरीच्यादयः सुताः ।
तेषामृषीणां सर्वेषां पुत्राः पितृगणाः स्मृताः ॥ 195 ।।
मरीचि आदि स्वायुम्भव मनु के पुत्र हैं और मरीचि आदि सभी ऋषियों के पुत्र ही पितर हैं।
विराट्सुताः सोमसदः साध्यानां पितरः स्मृताः ।
अग्निष्वात्ताश्च देवानां मारीचाः लोकविश्रुताः ।। 196 ।।
प्रजापति विराट के पुत्र सोमसद साध्यों के पितर हैं तथा प्रजापति मरीचि के जगत प्रसिद्ध पुत्र अग्निष्वात्त देवों के पितर हैं।
दैत्यदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्।
सपर्णकिन्नराणां च स्मृता बर्हिषदोऽत्रिजाः ।। 197 ।।
दैत्य, दानव, यक्ष, गन्धर्व, सर्प, नाग, राक्षस, सुवर्ण तथा किन्नरों के पितर अत्रि के पुत्र बर्हिषद हैं।
सोमपा नाम विप्राणां क्षत्रियाणां हविर्भुजः ।
वैयानामाज्यपा नाम शूद्राणां तु सुकालिनः ।। 198 ॥
सोमपा, हविर्भुज, आज्यपा तथा सुकालिन क्रमशः ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के पितरों के नाम हैं।
सोमपास्तु कवेः पुत्राः हविष्मतोऽङ्गिरस्सुताः ।
पुलस्त्यस्याज्यपाः पुत्राः वसिष्ठस्य सुकालिनः ॥ 199 ।।
सोमपा भृगु (कवि) के पुत्र हैं, हविर्भुज अङ्गिरस के पुत्र हैं, आज्यपा पुलस्त्य के पुत्र हैं, सुकालिन वसिष्ठ के पुत्र हैं।
अनग्निदग्धानग्निदग्धान्काव्यान्बर्हिषदस्तथा ।
अग्निष्वात्तांश्च सौम्यांश्च विप्राणामेव निर्दिशेत् ।। 200 ।।
ब्राह्मणों के पितर हैं- अग्निदग्ध, अनग्निदग्ध, काव्य, बर्हिषद, अग्निष्वात तथा सौम्य। काव्य को शुक्राचार्य भी कहा जाता है।
य एते तु गणाः मुख्याः पितृणां परिकीर्तिताः ।
तेषामपीह विज्ञेयं पत्रपौत्रमनन्तकम् ।। 201 ।।
मनु महाराज कहते हैं- 'ऋषियो! मैंने आप लोगों को अब तक पितरों के मुख्य-मुख्य गणों के बारे में बताया है। इनके इस संसार में असंख्य पुत्र-पौत्र जन्मे हैं जिनकी गिनती करना असम्भव है।
ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितृभ्योदेव मानवाः ।
देवेभ्यस्त जगत्सर्वम् चरस्थाण्वनुपूर्वशः ।। 202 ।।
ऋषियों से पितरों का, पितरों से देवताओं का और देवताओं से मानवों का जन्म हुआ। देवताओं द्वारा ही संसार के समस्त जड़-चेतन का जन्म हुआ। इस भांति यह जगत देवताओं से व्याप्त है।
राजतैर्भाजनैरेषामथो वा रजतान्वितैः ।
वार्यपि श्रद्धया दत्तमक्षयायोपकल्पते ।। 203 ।।
जल भरे चांदी की परत से मढ़े अथवा चांदी (रजत) से निर्मित पात्रों द्वारा केवल श्रद्धापूर्वक जल देने के रूप में श्राद्ध-तर्पण करने से असीम सुख की उपलब्धि होती है।
दैवकार्याद्विजातीनां पितृकार्यं विशिष्यते।
दैवं हि पितृकार्यस्य पूर्वमाप्यायनं स्मृतम् ।। 204 ।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के पुरुषों के लिए देवकार्य (यज्ञ-हवन आदि) की तुलना में श्राद्ध-तर्पण आदि करना अधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि पहले के ऋषियों ने भी बताया है कि देवकार्य श्राद्ध-तर्पण (पितृकार्य) का पूर्व रूप है।
तेषामारक्षभूतं तु पूर्व दैवं नियोजयेत् ।
रक्षांसि विप्रलुम्पन्ति श्राद्धमारक्षवर्जितम् ।। 205 ।।
पितृ कार्य में सबसे पहले पितरों की रक्षा करने वाले देवताओं की स्थापना करनी चाहिए अन्यथा रक्षकों की अनुपस्थिति से राक्षस श्राद्ध को नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं।
दैवाद्यन्तं तदीहेत पित्राद्यन्तं न तद्भवेत।
पित्राद्यन्तं त्वीहमानः क्षिप्रं नश्यति सान्वयः ।। 206 ।।
पितृ कार्य के आदि एवं अन्त में देवकार्य अवश्य करना चाहिए अन्यथा श्राद्ध-तर्पण करने वाला सन्तान सहित नष्ट हो जाता है।
शुचिं देशं विविक्तं च गोमयेनोपलेपयेत् ।
दक्षिणाप्रवणं चैव प्रयत्नेनोपपादयेत् ।। 207 ।।
पितृ श्राद्ध हेतु एकान्त और पवित्र स्थल को गोबर से लीपना चाहिए। उस जगह को दक्षिण दिशा की ओर ढालू रखे और वहां एक वेदी बनाएं।
अवकाशेषु चोक्षेषु नदीतीरेषु चैव हि।
विविक्तेषु च तुष्यन्ति दत्तेन पितरः सदा ॥ 208 ।।
प्राकृतिक स्वभाव से ही पवित्र वन आदि की भूमि, नदी तट और एकान्त स्थान में किए गए श्राद्ध आदि करने से पितर सदा सन्तुष्ट होते हैं।
आसनेषूपक्लृप्तेषु बर्हिष्मत्सु पृथक् पृथक् । उपस्पृष्टोदकान्सम्यग्विप्रांस्तानुपवेशयेत् ।। 209 ।।
पूर्वोक्त श्लोक में बताए गए स्थानों पर अलग-अलग सुन्दर कुशों का आसन बिछाकर आमंत्रित ब्राह्मणों को आदर सहित उन पर बैठाए।
उपवेश्य तु तान्विप्रानासनेष्वजुगुप्सितान् ।
गन्धमाल्यैः सुरभिभिरर्चयेदैव पूर्वकम् ॥ 210 ॥
तत्पश्चात् पित स्थानीय ब्राह्मणों का सुगन्ध, माला आदि पदार्थों से सादर पूजन करें श्राद्ध हेतु निमंत्रित ब्राह्मणों को आसन पर बैठाने के बाद, पहले देवस्थानीय
तेषामुदकमानीय सपवित्रांस्तिलानपि।
अग्नौ कुर्यादनुज्ञातो ब्राह्मणो ब्राह्मणैः सह ।। 211 ।।
उन ब्राह्मणों के अर्घ्य में तिल तथा जल का मिश्रण करे और उनसे आज्ञा लेकर उनके साथ अग्नि में होम करें।
अग्नेः सोमयमाभ्यां च कृत्वाऽऽऽप्यायनमादितः ।
हविर्दानेन विधिवत्पश्चात्सर्न्तपयेत्पितृन् ।। 212 ॥
अग्नि में होम करने के बाद अग्नि, सोम तथा यम देवों को विधिपूर्वक हविष्य के हवन से संतुष्ट कर बाद में पितरों को हवि देकर विधिपूर्वक तर्पण करे।
अग्न्यभावे तु विप्रस्य पाणावेवोपपादयेत् ।
यो ह्यग्निः स द्विजो विप्रैर्मन्त्रदर्शिभिरुच्यते ।। 213 ॥
अग्नि के अभाव में ब्राह्मणों के हाथ पर ही श्राद्ध करने वाले को तीन आहुतियां देनी चाहिए क्योंकि मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने कहा है कि जो अग्नि है वही ब्राह्मण है।
अक्रोधनान्सुप्रसादान्वदन्त्येतान् पुरातनाः ।
लोकस्याप्यायने युक्तान् श्राद्धेदेवान् द्विजोत्तमान् ।। 214 ॥
वही ब्राह्मण श्राद्ध-तर्पण कर्म में आमंत्रित करने योग्य हैं जो क्रोध से रहित हैं, सर्वथा प्रसन्न चित्त रहते हैं, ज्ञानी एवं वृद्ध हैं और लोक कल्याण में लगे रहते हैं।
अपसव्यमग्नौ कृत्वा सर्वमावृत्परिक्रमम् ।
अपसव्येन हस्तेन निर्वपेदकं भुवि ।। 215 ॥
अपने दाहिने हाथ से आग में होम करके यज्ञ वेदी को ढक दें और फिर दाहिने हाथ से वेदी के चारों ओर धरती पर पानी डाल कर उसे गीला कर दें जिससे वायु द्वारा अग्नि की चिन्गारी उड़कर कुछ जला नहीं सके।
त्रींस्तु तस्माद्ध विःशेषात्पिण्डान्कृत्वा समाहितः ।
औदकेनैव विधिना निर्वपेद्दक्षिणामुखः ।। 216 ।।
हवन से बचे हुए अन्न से तीन पिण्ड बनाकर, चित्त को एकाग्र कर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके उन कुशाओं पर पिण्डों को रखें।
न्युप्य पिण्डांस्ततस्तांस्तु प्रयतो विधिपूर्वकम् । तेषु दर्भेषु तं हस्तं निर्मृज्याल्लेपभागिनाम् ।। 217
विधिपूर्वक उन (तीनों) पिण्डों को कुशाओं पर स्थापित कर, उन कुशाओं की जड़ में लेपभागी (अर्थात् वृद्ध प्रपितामह आदि) पितरों की तृप्ति हेतु हाथ को रगड़ना-पोंछना चाहिए।
आचम्योदक्परावृत्य त्रिरायम्य शनैरसून् । षड्ऋतूंश्च नमस्कुर्यात्पितृनेव च मन्त्रवित् ॥ 218 ॥
उत्तर दिशा की ओर मुख करके मंत्र ज्ञाता पुरुष धीरे-धीरे आचमन करे तथा तीन बार प्राणायाम करके पितरों और उनके ही समान छह ऋतुओं को श्रद्धापूर्वक नमस्कार करे।
उदकं निनयेच्छेषं शनैः पिण्डान्तिके पुनः । अवजिघ्नेच्च तान्पिण्डान्यथान्युप्तान्समाहितः ।। 219 ।।
शेष जल को धीरे-धीरे पिण्डों के पास छोड़ना चाहिए तथा उसके बाद उसी क्रम में (जिस क्रम में उन्हें पहले रखा गया था) उन पिण्डों को सूंघना चाहिए।
पिडेभ्यः स्वल्पिकां मात्रां समादायानुपूर्वशः । तानेवविप्रानासीनान्विधिवत् पूर्वमाशयेत् ।। 220 ।।
तीनों पिण्डों से सावधानी सहित क्रमशः थोड़ा-थोड़ा अंश लेकर ब्राह्मणों को भोजन के समय सर्वप्रथम खाने के लिए देना चाहिए।
प्रियमाणे तु पितरि पूर्वेषामेव निर्वपेत् ।
विप्रवद्वाऽपि तं श्राद्धं स्वकं पितरमाशयेत् ।। 221 ।।
पिता के जीवित होने पर उसे ब्राह्मण के समान ही सादर भोजन कराएं और बाबा (दादा), परबाबा आदि का श्राद्ध करें।
पिता यस्य तु वृत्तः स्याज्जीवेच्चापि पितामहः ।
पितुः स नाम सङ्कीर्त्य कीर्तयेत्प्रपितामहम् ।। 222 ।।
अगर पिता का स्वर्गवास हो चुका हो तथा बाबा (दादा-पिता का पिता) जीवित हो तो पिता का नाम लेने के बाद (परदादा-दादा का पिता) का नाम लें और बाबा को आदरपूर्वक ब्राह्मण की तरह भोजन कराएं।
पितामहो वा तच्छ्राद्धं भुञ्जीतेत्यब्रवीन्मनुः ।
कामं वा समनुज्ञातः स्वयमेव समाचरेत् ।। 223 ।।
मनु महाराज का कहना है कि अगर (दादा) बाबा जीवित हों तो उन्हें श्राद्ध का भोजन आदरपूर्वक कराएं। यदि वह इसके लिए सहमत न हों तो वे जैस आज्ञा दें, पौत्र को उसका पालन करना चाहिए।
तेषां दत्त्वा तु हस्तेषु सपवित्रं तिलोदकम्।
तत्पिण्डाग्रं प्रयच्छेत्तु स्वधैषामस्त्विति ब्रुवन् ।। 224 ।।
श्राद्ध में आमंत्रित ब्राह्मणों के हाथों में कुशा के साथ तिल तथा पानी देकर अमुकाय स्वधा, पितरे स्वधा आदि कहते हुए पिण्ड का थोडा सा भाग उन्हें प्रदार करें।
पाणिभ्यां तूपसंगृह्य स्वयमन्नस्य वर्द्धितम्।
विप्रान्तिके पितृन्ध्यायन् शनकैरूपनिक्षिपेत ।। 225 ।।
पके हुए खाद्यान्न से भरे बरतनों को अपने हाथों में लेकर 'मे वृद्धिः अस्तु' कहते हुए पितरों को याद करते हुए खाद्यान्न पात्रों को धीमे से ब्राह्मण जनों के पास रख दें।
उभयोर्हस्तयोर्मुक्तं यदन्नमुपनीयते ।
तद्विप्रलुम्पन्त्यसुराः सहसा दुष्टचेतसः ।। 226 ।।
अगर खाद्यान्न से पूर्ण पात्रों को श्रद्धा सहित दोनों हाथों से पकड़ कर ब्राह्मणों के पास नहीं रखा जाता तो दुष्ट बुद्धि वाले असुर उन्हें छीन लेते हैं।
गुणांश्च सूपशाकाद्यान् पयो दधि घृतं मधु।
विन्यसेत्प्रयतः पूर्व भूमावेव समाहितः ।। 227 ।।
निमन्त्रित ब्राह्मणों को दान में देने हेतु, यजमान साग, दाल, घी (घृत), दधि (दही), दुग्ध तथा मधु आदि से पूर्ण पात्रों को सावधानीपूर्वक धरती पर रखे।
भक्ष्यं भोज्यं च विविधं मूलानि च फलानि च।
हृद्यानि चैव मांसानि पानानि सुरभीणि च ।। 228।।
उपनीय तु तत्सर्वं शनकैः सुसमाहितः ।
परिवेषयेत् प्रयतो गुणान्सर्वान्प्रचोदयान् ।। 229 ।।
तरह-तरह की खाने योग्य वस्तुओं से, कंदमूल और फलों से, मनोहर मांस, सुगंधित पीने योग्य शरबत आदि से भरे पात्रों को ब्राह्मणों के पास लाकर धीरे से संयत और सावधान होकर उन पदार्थों के गुणों का बखान करते हुए श्राद्ध करने वाले को चाहिए कि वह उन्हें यथाक्रम परोसे।
नाश्रुमापातयेज्जातु न कुप्येन्नानृतं वदेत्।
न पादेन स्पृशेदन्नं न चैतदवधूनयेत् ।। 230 ॥
रुदन करने, क्रोध करने और असत्य बोलने का श्राद्ध के दिन निषेध है। श्राद्ध करने वाले को अन्न को (या उससे भरे पात्र को) पैर नहीं लगाना चाहिए न उसे फेंकना चाहिए।
अश्रुं गमयति प्रेतान्कोपोऽरीननृतं शुनः ।
पादस्पर्शस्तु रक्षांसि दुष्कृतीनवधूननम् ।। 231 ।।
श्राद्ध के दिन रुदन करने से श्राद्ध का अन्न प्रेतों को, क्रोध करने से शत्रुओं को, झूठ बोलने से कुत्तों को, पैर लगाने से राक्षसों को तथा फेंकने से वह पापी जीवों को मिलता है।
टिप्पणी- ब्राह्मण श्राद्ध में मिलने वाले स्वादिष्ट भोजन, मांस, पकवानों आदि को प्रसन्नता तथा शांतिपूर्वक खा-पी सके इसलिए उस दिन रोने, क्रोध करने और झूठ बोलने की मनाही की गई है।
यद्यद्रोचते विप्रेभ्यस्तत्तद्दद्यादमत्सरः ।
ब्रह्मोद्याश्च कथाः कुर्यात्पितृणामेतदीप्सितम् ।। 232 ।।
श्राद्ध-तर्पण के दिन ईर्ष्या-द्वेष से रहित होकर श्रद्धावान यजमान को निमंत्रित ब्राह्मणों को उनकी रुचि के अनुसार ही भोजन बनाकर उनके सम्मुख प्रस्तुत करना चाहिए। इस अवसर पर परमात्मा के बारे में चर्चा करनी चाहिए। सभी पितरों को यही अनुकूल तथा प्रिय होता है।
स्वाध्यायं श्रावयेत्पित्र्ये धर्मशास्त्राणि चैव हि। आख्यानानीतिहासांश्च पुराणान्यखिलानि च ॥ 233 ॥
पितरों की प्रसन्नता के लिए श्राद्ध के दिन यजमान को वेद, धर्म शास्त्र, रामायण, महाभारत एवं पुराणों की कथाएं सुननी चाहिए।
कहने का अभिप्राय यह है कि श्राद्ध के दिन लौकिक चर्चा को छोड़कर आध्यात्मिक जगत में विचरण करना चाहिए।
हर्षयेद्ब्राह्मणांस्तुष्टो भोजयेच्च शनैः शनैः । अन्नाद्येन्नासकृच्चैतान्गुणैश्च परिचोदयेत् ।। 234 ।।
यजमान को स्वयं प्रसन्न रहते हुए ऐसा व्यवहार करना चाहिए जिससे ब्राह्मण लोग प्रसन्न हों। उन्हें भोजन कराने में जल्दबाजी नहीं करना चाहिए वरन् धीरे-धीरे खिलाना चाहिए। भोजन और मिठाई आदि के गुणों का बखान करते हुए ब्राह्मण को और अधिक खाने के लिए प्रेरित करें।
व्रतस्थमपि दौहित्रं श्राद्धे यत्नेन भोजयेत्।
कुतपं चासनं दद्यात्तिलैश्च विकिरेन्महीम् ।। 235 ॥
श्राद्ध पर पुत्री का ब्रह्मचारी पुत्र (दौहित्र) आया हो तो उसे भोजन कराना चाहिए और इसके लिए उससे प्रेमपूर्वक अनुरोध करना चाहिए। उसे बैठने के लिए उच्च कोटि का कम्बल देना चाहिए तथा श्राद्ध की जगह तिल डालने चाहिए।
त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः ।
त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ॥ 236 ।।
श्राद्ध में पुत्री का पुत्र, नेपाली कम्बल तथा तिल इन तीनों को पवित्र माना गया है। श्राद्ध में क्रोध नहीं करना, जल्दबाजी नहीं करना तथा पवित्रता रखना इनको मन्वादि ऋषि द्वारा प्रशंसा की गई है।
अत्युष्णं सर्वमन्नं स्याद्भुञ्जीरंस्ते च वाग्यताः ।
न च द्विजातयो ब्रूयुर्दात्रा पृष्ठाः हर्विर्गुणान् ।। 237 ॥
समस्त भोज्य पदार्थ जो ब्राह्मणों को परोसे जाते हैं वे भली प्रकार गर्म होने चाहिए। ब्राह्मण मौन रहकर भोजन करे और श्राद्ध करने वाले अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा भोज्य पदार्थों के गुणों के बारे में पूछे जाने पर वाणी या संकेत से कोई उत्तर नहीं दे।
टिप्पणी मनु महाराज ने ऐसा निर्देश इसलिए दिया है ताकि भोजन के मध्य वार्तालाप शुरू नहीं हो सके और ब्राह्मण शांतिपूर्वक भोजन का रसास्वादन ले सकें।
यावदुष्णं भवत्यन्नं यावदश्नन्ति वाग्यताः ।
पितरस्तावदश्नन्ति यावन्नोक्ताः हविर्गुणाः ।। 238 ॥
जब तक भोजन गर्म रहता है, ब्राह्मण चुपचाप भोजन करते रहते हैं और भोज्य पदार्थों की प्रशंसा नहीं होती तब तक पितर भोजन करते रहते हैं। इन तीनों के नहीं होने पर पितर भोजन छोड़कर चले जाते हैं।
यद्वेष्टितशिरा भुङ्क्ते यद्भुङ्क्ते दक्षिणाभिमुखः ।
सोपानत्कश्च यद्भुङ्क्ते तद्वै रक्षांसि भुञ्जते ॥ 239 ॥
सिर पर वस्त्र डाल कर, दक्षिण की ओर मुख करके या जूता पहनकर जो व्यक्ति भोजन करता है उसके द्वारा ग्रहण किए भोजन को पितर स्वीकार नहीं करते। ऐसा भोजन राक्षसों द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है।
चण्डालश्च वराहश्च कुक्कुटः श्वा तथैव च।
रजस्वला च षण्ढश्च नेक्षेरन्नश्नतो द्विजान् ।। 240 ।।
श्राद्ध का भोजन करने वाले ब्राह्मणों पर चाण्डाल, सुअर, मुर्गा, कुत्ता, मासिक धर्म वाली स्त्री और नपुंसक की दृष्टि नहीं पड़नी चाहिए।
(अतः इन सभी को उस स्थान से दूर रखें जहां ब्राह्मण श्राद्ध का भोजन कर रहे हों।)
होमे प्रदाने भोज्ये च यदेभिरभिवीक्ष्यते ।
दैवेकर्मणि पित्र्ये वा तद्गच्छत्ययथातथम् ।। 241 ।।
यदि देवपूजन, पितृ-तर्पण (श्राद्ध कर्म) अग्नि होम आदि पवित्र अनुष्ठानों पर चाण्डाल, सुअर, मुर्गा, कुत्ता, मासिक धर्म वाली स्त्री अथवा नपुंसक की दृष्टि पड़ जाती है तो समस्त कर्म कोई फल प्रदान नहीं करते।
घ्राणेन शूकरो हन्ति पक्षवातेन कुक्कुटः ।
श्वा तु दृष्टिनिपातेन स्पर्शेनावरवर्णजः ।। 242 ।।
सूंघने से सुअर, अपने पंखों की हवा से मुर्गा, देखने से कुत्ता और भोजन का स्पर्श करने से शूद्र उसे अशुद्ध कर देते हैं जिससे श्राद्ध कर्म निष्फल हो जाता है। अतः इन सभी को श्राद्ध स्थल से दूर रखें।
खञ्जो वा यदि वा काणो दातुः प्रेष्योऽपि वा भवेत् । हीनातिरिक्तगात्रो वा तमप्यपनयेत्पुनः ।। 243 ।।
श्राद्ध करने वाला लंगड़े, काने, अपने सन्देशवाहक, किसी अंग से हीन या अधिक अंग वाले व्यक्ति को श्राद्ध-स्थान में आने पर वहां से हटा दे ताकि इन्हें देखकर ब्राह्मणों के मन में किसी प्रकार का खेदजनक विचार आने पर भोजन में अरुचि उत्पन्न नहीं हो।
ब्राह्मणं भिक्षुकं वापि भोजनार्थमुपस्थितम् ।
ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञातः शक्तितः प्रतिपूजयेत् ।। 244 ।।
अगर कोई ब्राह्मण या भिक्षुक भोजन करने की इच्छा से उस समय आ जाए जब निमंत्रित ब्राह्मण श्राद्ध-भोज कर रहे हों तो यजमान को चाहिए कि वहां उपस्थित ब्राह्मणों से आज्ञा लेकर उनका भी उचित स्वागत सत्कार करे।
सार्ववर्णिकमनाद्यं सन्नीयाप्लाव्य वारिणा। समुत्सृजेद्भक्तवतामग्रतो विकिरन्भूवि | 245 |
बाकी बचे सभी प्रकार के भोज्य पदार्थों को एकत्रित करके उन पर जल के छींटे मारने चाहिए तत्पश्चात् कृशाएं फैलाकर उन पर भोज्य पदार्थों (अन्नों) को बिखेर कर रख दें।
असंस्कृतप्रमीतानां त्यागिनां कुलयोषिताम्।
उच्छिष्टं भागधेयं स्याद्दर्भेषु विकिरश्चयः ।। 246 ॥
ऊपर के श्लोक में विकिर शब्द का उपयोग किया गया है। इसका अर्थ होता है. बिखेरना। मनु महाराज बताते हैं कि संस्कार के अयोग्य बालकों, संसार त्यागी पुरुषों तथा कुल की नारियों का कुशाओं पर गिरी जूठन विकिर कहलाता है।
उच्छेषणं भूमिगतमजिह्यस्याशठस्य च।
दासवर्गस्य तत्पित्र्ये भागधेयं प्रचक्षते ।। 247 ।।
श्राद्ध में गिरी जूठन और कुशाओं पर गिरा सभी अन्न या भोज्य पदार्थ दासे को दिया जाना चाहिए परंतु ये दास ऐसे होने चाहिए जो पूरी तरह सरल स्वभाव के हों।
आसपिण्डक्रियाकर्म द्विजातेः संस्थितस्य तु ।
अदैवं भोजयेच्छ्राद्धं पिण्डमेकं तु निर्वपेत् ।। 248 ।।
सपिण्डन श्राद्ध तक कुछ समय पहले मरे हुए द्विजाति का (विश्वेदेव) ब्राह्मण भोजन से रहित श्राद्ध करे तथा एक ब्राह्मण को श्राद्धान्न का भोजन कराए और एक पिण्ड प्रदान करे।
सहपिण्डक्रियायां तु कृतायामस्य धर्मतः ।
अनयैवावृता कार्य पिण्डनिर्वपणं सुतैः ।। 249 ॥
धर्म के अनुसार सपिण्डन के पश्चात् इसी पार्वण श्राद्ध की विधि द्वारा पिण्ड दान करना चाहिए।
श्राद्धं भुक्त्वा यः उच्छिष्टं वृषलाय प्रयच्छति।
स मूढो नरकं याति कालसूत्रमवाक् शिराः ।। 250 ॥
श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन करने के उपरान्त जो मूर्ख अपना जूठा शूद्र को देता है वह काल सूत्र नाम के नरक में जाता है। भोजन या जूठन
श्राद्धभुग्वृषलीतल्पं तदहर्योऽधिगच्छति ।
तस्याः पुरीषे तं मासं पिरस्तस्य शेरते ॥ 251 ।।
श्राद्ध भोजन करने के बाद उसी दिन मैथुन इच्छा रखने वाली स्त्री से रतिकर्म करने वाले मुर्ख व्यक्ति के पितर पूरे महीने उस स्त्री के मल-मूत्र में रहते हैं।
पृष्ट्वा स्वादतमित्येवं तृप्तानाचामयेत सः। आचान्तांश्चानुजानीयादभितो रम्यतामिति ।। 252 ॥
ब्राह्मणों द्वारा भोजन कर लेने के बाद यजमान को पूछना चाहिए, "आप लोगों ने भोजन कर लिया ? ब्राह्मणों द्वारा 'हां' कहने पर यजमान को उन्हें आचमन कराना चाहिए।"
स्वधास्त्वित्येवं तं ब्रूयुर्बाह्मणास्तदनन्तरम्।
स्वधाकारः परं ह्याशीः सर्वेषु पितृकर्मसु ।। 253 ।।
भोजनादि से संतुष्ट हो जाने के बाद ब्राह्मणों को आशीर्वाद देना चाहिए और आशीर्वाद में 'तुभ्यं स्वधा अस्तु' कहना चाहिए। समस्त श्राद्ध कर्मों में 'स्वधा' शब्द को आशीर्वादात्मक माना गया है।
ततो भुक्तवतां तेषामन्नशेषं निवेदयेत् ।
यथा ब्रूयुस्तथा कुर्यादनुज्ञातस्ततो द्विजैः ।। 254 ।।
भोजन से तृप्त ब्राह्मणों को अवशिष्ट अन्न के बारे में आदरपूर्वक बताते हुए निर्दोश लेना चाहिए कि उसका क्या किया जाए। वे जैसा निर्देश दें उसका पूरी तरह पालन करना चाहिए।
पित्र्ये स्वदितमित्येव वाच्यं गोष्ठे तु सुघुतम् ।
सम्पन्नमित्यभ्युदये दैवे रुचितमित्यपि ।। 255 ॥
श्राद्ध-तर्पण आदि में स्वदितम् (भोजन अत्यन्त स्वादिष्ट बना) शब्द का, गोष्ठ कर्म में 'सुश्रुतम्' शब्द का अभ्युदयमूलक अनुष्ठानों में 'सम्पन्नम्' शब्द का तथा देवकर्म में 'रुचितम्' शब्द का उपयोग करें।
अपराह्नस्तथा दर्भः वास्तुसम्पादनं तिलाः । सृष्टिर्मुष्टिर्द्विजाश्चाग्र्याः श्राद्धकर्मसु सम्पदः ।। 256 ।।
श्राद्ध कर्म में सात बातें सम्पत्ति रूप हैं, ये हैं, 1. अपराह्न (दोपहर) का समय, 2. कुश, 3. गोबर से लीपा हुआ स्थान, 4. तिल, 5. उदारता से दिया गया अन्न का दान, 6. अन्न का संस्कार, 7. पवित्र ब्राह्मण।
दर्भाः पवित्रं पूर्वाह्नो हविष्याणि च सर्वशः ।
पवित्रं यच्च पूर्वोक्तं विज्ञेया हव्यसम्पदः ॥ 257 ।।
कुश, मन्त्र, पूर्वाह्न (दोपहर के पहले का समय), पवित्री (कुश से बनी अंगूठियां) मुनियों के लिए समस्त प्रकार के अन्न, गोबर आदि से लीप कर पवित्र किया हुआ स्थान आदि जो पूर्वोक्त श्लोक में कहे गए हैं, वे सब हविष्य (यज हवन, देवश्राद्ध आदि) की सम्पत्तियां हैं।
मुन्यन्नानि पयः सोमो मांसं यच्चानुपस्कृतम् ।
अक्षारलवणं चैव प्रकृत्या हविरुच्यते ।। 258 ।।
अन्न, दूध, सोमरस, दर्गन्ध और विकार रहित मांस और सैन्धव नमक जो मुनियों को प्रिय हो, उसे सब प्रकार से मान्य हवि माना गया है।
विसर्ज्य ब्राह्मणांस्तांस्तु प्रयतो विधिपूर्वकम्।
दक्षिणां दिशमाकांक्षन्याचेतेमान्वरान्पितृन् ।। 259 ।।
निमन्त्रित ब्राह्मणों को सब प्रकार से संतुष्ट करने के पश्चात् उन्हें विदाई देकर, एकाग्र मन और पावन भाव से मौन रह कर दक्षिण दिशा में देखते हुए पितरों से अपनी इच्छानुसार वर मांगें।
दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः सन्ततिरेव च।
श्रद्धा च नो मा व्यगमद्बहुदेयं च नोऽस्त्विति ।। 260 ॥
हे पितृगण ! हमारे कुल में दाताओं (दानी पुरुषों), वेदों (ज्ञान-संपन्नता) एवं सन्तति अर्थात् पुत्र, पौत्रादि की बढ़ोत्तरी हो। श्रद्धा का भाव सदैव बना रहे तथा सभी तरह का धन-धन्यादि इतना हो कि दान दिया जा सके।
एवं निर्वपणं कृत्वा पिण्डांस्तांस्तदनन्तरम् ।
गां विप्रमजमग्निं वाप्राशयेदप्सु वा क्षिपेत् ॥ 261 ।।
ऊपर लिखे श्लोक में बताई विधि से पिण्ड दान करके उन्हें ब्राह्मणों को अथवा बकरे को खिला दें या अग्नि अथवा जल में फेंक दें।
पिण्डनिर्वपणं केचित्पुरस्तादेव कुर्वते।
वयोभिः खादयन्त्यन्ये प्रक्षिपन्त्यनलेऽप्सुवा ।। 262 ।।
कुछ ब्राह्मण भोजन के बाद पिण्ड को फेंक देने के लिए कहते हैं, कोई आचार्य उसे पक्षियों को खिलवाने के लिए कहते हैं तथा अन्य उसे आग तथा पानी में छोड़ने के लिए कहते हैं।
पतिव्रता धर्मपत्नी पितृपूजनतत्परा ।
मध्यमंतु ततः पिण्डमद्यात्सम्यक् सुतार्थिनी ।। 263 ।।
पतिव्रता धर्मपत्नी जो श्राद्धकर्म में विश्वास रखने वाली हो तथा जिसे पुत्र प्राप्ति की इच्छा हो, उसे चाहिए कि उन पिण्डों में से बीच का (पितामह से संबंधित) पिण्ड खा ले।
आयुष्मन्तं सुतं सूते यशोमेधासमन्वितम् ।
धनवन्तं प्रजावन्तं सात्त्विकं धार्मिकं तथा ॥ 264 ।।
उस बीच के पितामह सम्बन्धी पिंड को खाने से श्राद्ध करने वाले की पत्नी दीर्घ आयु वाले, यशस्वी, बुद्धिमान, धनी, वंश को बढ़ाने वाले सत्व गुण वाले और धार्मिक वृत्ति के पुत्र को उत्पन्न करती है।
प्रक्षाल्य हस्तावाचम्य ज्ञातिप्रायं प्रकल्पयेत् ।
ज्ञातिभ्यः सत्कृतं दत्त्वा बान्धवानपि भोजयेत् ।। 265 ॥
अपनी जाति वालों एवं बन्धु-बान्धवों को ब्राह्मणों के चले जाने के उपरान्त हाथ धोकर तथा आचमन करके भोजन कराना चाहिए।
उच्छेषणं तु तत्तिष्ठेद्यावद्विप्राः विसर्जिताः ।
ततो गृहबलिं कुर्यादिति धर्मो व्यवस्थितः ।। 266 ।।
ब्राह्मणों के चले जाने तक उनके भोजन से बचा अन्न घर में रखना चाहिए। इसके बाद उसे विश्वेदेवों को बलि दे देना चाहिए। इस सम्बन्ध में यही धर्म की व्याख्या है।
हविर्यच्चिररात्राय यच्चानन्त्याय कल्पते।
पितृभ्यो विधिवद्दतं तत्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ।। 267 ।।
पितरों को दी महर्षि मनु कहते हैं- ब्राह्मणो! मैं आप लोगों को विधि अनुसार गई जो हवि बहुत काल तक उन्हें तृप्ति देती है उसके बारे में समग्र रूप से बताता हूं।
तिलैर्वीहियवैर्माषैरद्भिर्मूलफलेन वा।
दत्तेन मासं तृप्यन्ति विधिवत्पितरो नृणाम् ॥ 268 ।।
मनुष्यों के पितर विधि अनुसार दिए गए तिल, चावल, जौ, उड़द, जल, फल, कन्दमूल से एक माह तक तृप्त रहते हैं।
द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन्मासान् हारिणेन तु ।
औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनाथ पञ्च वै । 269 ॥ षण्मासांश्छागमांसेन पार्षतेन च सप्त वै।
अष्टावैणेस्यमांसेन रौरवेण नवैव तु ॥ 270 ।।
दशमासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः ।
शशकूर्मयोस्तु मांसेन मासानेकादशैव तु ॥ 271 ॥
विधि अनुसार दिए गए मछली के मांस से दो माह, हिरन के मांस से तीन माह, मेढे के पास से चार माह, पक्षी, बकरे, चित्रमुग, ऐणमृग, रुरुमृग, सुअर, भैंसे खरगोश और कछवे के मांस से क्रमश: 5, 6, 7, 8, 9, 10 और 11 माह तक मनुष्यों के पितर तृप्त रहते हैं।
संवत्सरे तु गव्येन पयसा पायसेन च।
वार्धीणस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी ।। 272 ।।
कालशाकं महाशल्काः खङ्गलोहामिषं मधु ।
आनन्त्यायैव कल्प्यन्ते मुन्यन्नानि च सर्वशः ।। 273 ।।
विधिवत् समर्पित गऊ दुग्ध या उसकी खीर से और लम्बे कानों वाले बको के मांस से बारह वर्षों तक, कालशाक तथा महाशल्क नाम की मछलियों के मांस से, गैंडे या लाल बकरे के मांस से, शहद से तथा मुनियों द्वारा खाए जाने वाले अन्न से अनन्त काल तक पितरों को तृप्ति रहती है।
यत्किञ्चिन्मधुना मिश्रं प्रदद्यात्तु त्रयोदशीम् ।
तदप्यक्षयमेव स्याद्वर्षासु च मघासु च ॥ 274 ।।
ब्राह्मण को वर्षा ऋतु में मघा नक्षत्र वाली त्रयोदशी को पितरों के लिए दिया जाने वाला शहद से युक्त पदार्थ उन्हें सदा रहने वाली तृप्ति देता है।
अपि न स कुले भूयाद्यो नो दद्यात्त्रयोदशीम् ।
पायसं मधुसर्पिभ्यां प्राक्छाये कुञ्जरस्य च ।। 275 ।।
पितरों की यह इच्छा रहती है कि हमारे वंश में ऐसा योग्य पुत्र जन्म ले जो त्रयोदशी के दिन हमें शहद तथा घी मिश्रित खीर अर्पित करे एवं सूर्य के उदय होने से पहले ही हमारे लिए हाथी का दान करे।
यद्यद्ददाति विधिवत्सम्यक् श्रद्धासमन्वितः ।
तत्तत्पितृणां भवति परत्रानन्तमक्षयम् ।। 276 ॥
ब्राह्मण को श्रद्धा सहित तथा विधि अनुसार जो कुछ भी पितरों के लिए दिया जाता है उससे परलोक में पितरों को अन्त न होने वाली तथा सदा रहने वाली तृति प्राप्त होती है।
कृष्णपक्षे दशम्यादौ वर्जयित्वा चतुर्दशीम्।
श्राद्धे प्रशस्तास्तिथयो यथैता न तथेतराः ।। 277 ।।
कृष्ण पक्ष में पहली दशमी तथा फिर चतुर्दशी को छोडकर बाकी सभी तिथियां, प्रतिपदा से नवमी तक, एकादशी, द्वादशी. त्रयोदशी एवं अमावस्या श्राद्ध हेत सभी प्रकार से प्रशस्त और उपयुक्त हैं।
युक्षु कुर्वन् दिनक्षेषु सर्वान्कामान्समश्नुते।
अयुक्षु तु पितृन्सर्वान्प्रजां प्राप्नोति पुष्कलाम् ॥ 278 ॥
जिस दिन एक साथ दो तिथियां, प्रथमा और द्वितीय तथा दो नक्षत्र अश्वनी और भरणी पड़ रहे हों, में श्राद्ध करने से समस्त अभिलाषाओं की तथा अयुग्म तिथियों तथा नक्षत्रों में (जब एक ही तिथि तथा एक ही नक्षत्र पड़ रहे हों) श्राद्ध करने से उच्च कोटि की सन्तान उपलब्ध होती है।
यथा चैवापरः पक्षः पूर्वपक्षाद्विशिष्यते।
तथा श्राद्धस्य पूर्वाह्लादपराह्नो विशिष्यते ।। 279 ।।
जिस तरह पितृ श्राद्ध हेतु शुक्ल पक्ष की तुलना में कृष्ण पक्ष का अधिक महत्व माना जाता है उसी प्रकार दोपहर से पहले की तुलना में अपराह्न अधिक अच्छा समय माना गया है। कहने का आशय यह है कि कृष्ण पक्ष के दूसरे प्रहर में श्राद्ध करने का ज्यादा महत्व है।
प्राचीनावीतिना सम्यगपसव्यमतन्द्रिणा।
पित्र्यमा निधनात्कार्यं विधिवद्दर्भपाणिना ।। 280 ।।
पुत्र को जीवन भर श्राद्ध-तर्पण आदि कर्म करने चाहिए। उसे इसके लिए हमेशा दाहिने कंधे पर यज्ञोपवीत (जनेऊ) रख कर, आलस्य रहित होकर, हाथ में कुशाएं लेकर तथा बायीं ओर होकर श्रद्धा के साथ शास्त्र विधि का अनुसरण करना चाहिए।
रात्रौ श्राद्धं न कुर्वीत राक्षसी कीर्तिता हि सा।
सन्ध्ययोरुभयोश्चैव सूर्ये चैवाचिरोदिते ।। 281 ।।
श्राद्ध रात में नहीं करें। रात में किया जाने वाला श्राद्ध राक्षस कर्म माना जाता है। संध्याओं के समय और दोपहर बीतने के बाद भी श्राद्ध कर्म करना अनुचित है।
अनेन विधिना श्राद्धं त्रिरब्दस्येह निर्वपेत्।
हेमन्तग्रीष्मवर्षासु पाञ्चयज्ञिकमन्वहम् ।। 282 ।।
वर्ष में इस प्रकार, इस विधि से हेमन्त ऋतु में, ग्रीष्म ऋतु में तथा वर्षा ऋतु में, तीन बार श्राद्ध करना चाहिए। प्रति दिन पञ्चयज्ञ के अन्तर्गत किया जाने वाला श्राद्ध तो करना ही चाहिए।
न पैतृयज्ञियो होमो लौकिकेऽग्नौ विधीयते।
न दर्शन बिना श्रद्ध माहिवाग्नेर्द्धिजन्मनः ।। 283 ।।
लौकिक अग्नि में पितृ श्राद्धमूल के यज्ञ को नहीं करें। इसी तरह यज्ञ हेतु अग्नि की स्थापना करने वाले ब्राह्मण को अमावस्या के अतिरिक्त किसी और तिथि में श्राद्ध नहीं करना चाहिए।
यदेव तर्पयत्यद्भिः पितृन्स्नात्वा द्विजोत्तमः ।
तेनैव कृत्स्नमाप्नोति पितृ यज्ञ क्रियाफलम् ।। 284 ।।
जो द्विज प्रत्येक दिन स्नान करने के बाद जल से पितरों का तर्पण करता है, वह उससे श्राद्ध के पूर्ण फल को प्राप्त करता है।
वसून्वदन्ति तु पितृन् रुद्रांश्चैव पितामहान् । प्रपितामहांस्तथादित्यान् श्रुतिरेषा सनातनी ।। 285 ।।
पितरों, पितामहों तथा प्रपितामहों को प्राचीन ग्रंथों में क्रमशः वसु, रुद्र और आदित्य कहा गया है। इस प्रकार पितर वसु रूप हैं, पितामह रुद्र रूप हैं तथा प्रपितामह आदित्य रूप हैं।
विघासाशीः भवेन्नित्यं नित्यं वामृतभोजनः ।
विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथाऽमृतम् ।। 286 ।।
ब्राह्मणों को श्राद्ध भोज कराने के बाद बचे भोजन को 'विघस' और यज्ञ से बचे को 'अमृत' कहा जाता है। द्विजाति के लोगों को हमेशा 'विघस' एवं 'अमृत' का ही सेवन करने वाला होना चाहिए।
एतद्वोऽभिहितं सर्वं विधानं पाञ्चयाज्ञिकम् । द्विजातिमुख्यवृत्तीनां विधानं श्रूयतामिति ।। 287 ।।
मनु महाराज कहते हैं- "महर्षियो! मैंने पञ्च यज्ञों के अनुष्ठान करने की पूरी विधि आप लोगों को संक्षेप में सुनाई है। आप लोगों को अब मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य में मुख्य ब्राह्मण की वृत्तियों के बारे में बताऊंगा। आप ध्यान से सुने।"
॥ मनुस्मृति तृतीय अध्याय सम्पूर्ण ॥
Manusmriti Chapter 2
kathaShrijirasik
मनुस्मृति द्वितीय अध्याय
विद्वद्धिः सेवितः सद्धिर्नित्यमद्वेषरागिभिः ।
हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत ॥ 1 ॥
मनु भगवान महर्षियों से कहते हैं- महर्षियो! धर्मात्माओं (धर्म के ज्ञाता तथा उसका पालन करने वाले) एवं राग-द्वेष से रहित (जिनमें प्रिय जनों के प्रति मोह नहीं और शत्रुओं के प्रति घृणा नहीं है) निर्विकार भाव से जीवन जीने वाले विद्वानों द्वारा सदैव पालन किया जाने वाला और हृदय से भली प्रकार जाना गया जो धर्म है, उसका एकाग्रचित्त होकर श्रवण करो।
आशय यह है कि मनुस्मृति में जिस धर्म का वर्णन किया गया है वह उन महान आत्माओं की अनुभूति का सार है जो वेद विद्या के विद्वान थे और जिनका व्यावहारिक जीवन विश्वबंधुत्व की भावना से ओतप्रोत था। अतः यह सभी प्रकार से आदर्श तथा अनुकरणीय है।
कामात्मता न प्रशस्ता न चैवेहास्त्यकामता ।
काम्यो हि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिकः ॥ 2 ॥
कामना करना अथवा कर्म फल की इच्छा करना श्रेष्ठ नहीं है (इसका कारण यह है कि कामना प्रायः लौकिक विषयों को प्राप्त करने की होती है। इसी प्रकार जो कर्म, फल पाने की इच्छा से किया जाता है वह वांछित फल नहीं मिलने पर दुःख का कारण बनता है।) किन्तु कोई कामना नहीं होना भी उचित नहीं है क्योंकि वेद का ज्ञान और उसके अनुसार कर्म करना भी कामना (इच्छा) से होता है। अतः कामना को पूरी तरह त्याग देना वांछनीय नहीं।
अतः जिन कामनाओं या इच्छाओं का सम्बंध सांसारिक सुख-वैभव प्राप्त करने से है, वे त्यागने योग्य हैं लेकिन जो कामनाएं वेद विद्या को पाने तथा उसे अपने जीवन में लाने के लिए की जाती हैं, वे त्यागने योग्य नहीं हैं। निष्कर्ष यह है कि कामना अपने आपमें न तो बुरी है और न अच्छी। अतः उसको त्यागने की नहीं वरन् उसका लक्ष्य बदलने की आवश्यकता है।
सङ्कल्पमूलः कामो वै यज्ञाः सङ्कल्पसम्भवाः ।
व्रतानि यमधर्माश्च सर्वे सङ्कल्पजाः स्मृताः ।। ३ ।।
कामना से ही कार्य करने की प्रवृत्ति या दृढ़ निश्चय अर्थात् संकल्प का जन्म होता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि कामना का मूल संकल्प है। संकल्प अथवा दृढ़ निश्चय करने से ही यज्ञ पूरे होते हैं। यही नहीं वरन् सभी यम-नियम, व्रत, धार्मिक कार्य आदि संकल्प से ही होते हैं।
अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित्।
यद्यद्धि कुरुते किञ्चित्तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ॥ 4 ॥
सच यह है कि इस जगत में कोई भी ऐसी क्रिया नहीं है जिसके पीछे कोई कामना नहीं हो। इच्छा के बिना किसी मनुष्य को कोई कार्य करते हुए नहीं देखा जाता। मनुष्य जो कुछ भी करता है उसके पीछे कोई न कोई इच्छा या कामना अवश्य होती है। वास्तव में मनुष्य का कर्म उसकी इच्छा की ही चेष्टा है। कामना या इच्छा नहीं होने पर मनुष्य कुछ नहीं कर सकता।
तेषु सम्यग्वर्तमानो हि गच्छत्यमरलोकताम् ।
यथा सङ्कल्पितांश्चेह सर्वान्कामान्समश्नुते ।। 5 ।।
शास्त्रोक्त कर्मों को करने की इच्छा रखने वाला ज्ञानी व्यक्ति इस संसार के सभी मनोवांछित पदार्थों (धन, यश, समृद्धि, सफलता आदि) को प्राप्त करता है। इस जीवन के पश्चात् उसे अमरलोक की प्राप्ति होती है अर्थात् वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचरश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च॥6॥
इस श्लोक में धर्म के प्रमाण बताए गए हैं। एकमात्र वेद ही पूरे धर्म का मुख्य आधार है। दूसरे शब्दों में वेदों में धर्म का पूरा प्रतिपादन किया गया है। इसके अतिरिक्त धर्म के तत्व को जानने वाले शास्त्रों, चरित्र की उत्तमता, महात्माओं के आचरण एवं आत्मा की संतुष्टि (अर्थात् जहां धर्मशास्त्रों में किसी विषय के बारे में कई पक्ष बताए गए हैं, वहां जिस पक्ष के विधान को मानने से आत्मा प्रसन्न तथा संतुष्ट हो) को भी धर्म के तत्व का आधार मानते हैं।
उपर्युक्त का अभिप्राय यह है कि धर्म-अधर्म का निर्णय करने के लिए सबसे पहले वेद को प्रमाण मानना चाहिए। यदि वेद से कहीं संतुष्टि नहीं हो पाती, शास्त्रों के ज्ञान को प्रामाणिक मानना उचित है। यदि किसी तत्व का निर्णय शास्त्रों से भी नहीं हो पाता तो महात्माओं के चरित्र (अर्थात् उन्होंने उस विषय में क्या निर्णय लिया) को पढ़कर निर्णय लेना चाहिए। यदि इससे भी संतुष्टि नहीं मिले तो अपनी आत्मा को जिससे संतुष्टि मिले वही करना चाहिए।
यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः ।
सः सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ 7 ॥
भगवान मनु ने जिन कर्मों का विधान विभिन्न वर्षों के लिए किया है उनका वेद ही आधार है। वे वेद को ही समस्त ज्ञान का मूल स्रोत मानते हैं। वे समस्त वेदों के अर्थ जानने वाले हैं।
कहने का अर्थ यह है कि भगवान मनु ने जो कुछ कहा है वह वेद के अनुसार है। अतः मनुस्मृति एक प्रामाणिक ग्रन्थ है।
सर्वं तु समवेक्ष्येदं निखिलं ज्ञानचक्षुषा ।
श्रुतिप्रामाण्यतो विद्वान् स्वधर्मे निविशेत वै ॥৪॥
भगवान मनु का स्पष्ट निर्देश है कि विद्वान लोग वेदार्थज्ञानोचित सम्पूर्ण शास्त्र समूह को ज्ञान रूपी नेत्रों से सब विचार कर वेद की प्रामाणिकता से जांच कर अपने धर्म को निश्चित कर उसका पालन करें।
मनुजी के कथन से यह अर्थ निकलता है कि मनुस्मृति में दिए गए विषय की जांच-परख करने के लिए व्यक्ति को सबसे पहले यह देखना चाहिए कि इसमें जो उल्लेख किया गया है वह वेद पर आधारित है? यदि वेद पर आधारित है तो वह स्वतः प्रमाण है। ऐसा कहने का उद्देश्य यह हो सकता है कि मनु महाराज का विचार होगा कि यदि कोई दूसरा विद्वान उनके नाम से कोई वेद विरुद्ध ज्ञान मनुस्मृति में मिलाएगा तो भावी विद्वान उसे स्वीकार नहीं करेंगे। दूसरे मनुस्मृति को पढ़ने वाले को चाहिए कि वह इसे ज्ञानपूर्वक पढ़े। इस कथन द्वारा मनुजी ने भावी पीढ़ी को मनुस्मृति की समयानुकूल व्याख्या करने की पर्याप्त स्वतंत्रता दे दी है। यह निश्चय ही उनके महान भविष्यद्रष्टा और पूर्ण ज्ञानवान होने को स्पष्ट दर्शाता है।
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानवः ।
इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥9॥
वेदों तथा स्मृतियों में बताए गए धर्म का पालन करने से मनुष्य इस संसार में और परलोक में सद्कर्मों के फलस्वरूप अति उत्तम सुख को भोगता है।
श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः ।
ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्वभौ ॥ 10 ॥
यहां श्रुति शब्द का अर्थ वेद और स्मृति शब्द (भगवान मनु तथा अन्य महर्षियों द्वारा कथित ज्ञान) का धर्मशास्त्र है। इनके सभी विषय प्रतिकूल तर्क के योग्य नहीं हैं अर्थात वे प्रामाणिक हैं और उनके विरुद्ध कोई तर्क नहीं करना चाहिए। इसका कारण यह है कि इन दोनों से ही धर्म का प्रादुर्भाव हुआ है।
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ 11 ॥
धर्म के चार स्पष्ट लक्षण हैं- 1. वेद द्वारा प्रतिपादित, 2. स्मृतियों (धर्मशास्त्रों) द्वारा अनुमोदित, 3. महर्षियों द्वारा आचारित, 4. जहां किसी विषय के बारे में एक से अधिक पक्ष बताए गए हों, वहां जो धर्म अपनाने वाले व्यक्ति की आत्मा को प्रिय हो। इन कसौटियों पर सच्चा सिद्ध होने वाला तत्व ही प्रामाणिक धर्म है।
अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते।
धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ।। 12 ।।
धर्म का उपदेश देने का विधान उन्हीं लोगों के लिए है जो अर्थ और काम में आसक्त नहीं हैं अर्थात् उन्हीं मनुष्यों को धर्म का उपदेश दिया जाता है जो अधिकाधिक धन कमाने या अधिकाधिक काम सुख पाने में डूबे हुए नहीं हैं। इसका कारण यह है कि जो व्यक्ति धन लोभ या काम सुख में पूरी तरह डूबा है उसकी रुचि धर्म में नहीं रहती। ऐसे लोगों को यदि धर्म का उपदेश दिया जाए तब भी वे उसे अपनी आसक्ति के कारण समझेंगे नहीं। अतः मनु महाराज के अनुसार व्यक्ति को धनार्जन करने और काम सुख लेने में अनासक्त भाव रखना आवश्यक है अन्यथा वे अपने धर्म से पतित हो जाएंगे। धर्म तत्व को जानने के इच्छुक लोगों के लिए वेद ही सर्वोच्च प्रमाण हैं।
श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्यात्तत्र धर्मावुभौस्मृतौ ।
उभावपि हि तौ धर्मों सम्यगुक्तौ मनीषिभिः ॥ 13 ॥
वेदों में जहां दो वचनों में आपस में विरोध हो अर्थात् एक स्थान पर जो कहा गया हो वही दूसरे स्थान पर उसके विपरीत बताया गया हो अथवा अलग-अलग अर्थ लेने के कारण स्वरूप में विपरीतता आ गई हो, वहां मनीषी लोग दोनों को बराबर महत्व देते हुए दोनों को धर्म ही समझते हैं।
उदितेऽनुदिते चैव समयाध्युषिते तथा।
सर्वथा वर्तते यज्ञ इतीयं वैदिकी श्रुतिः ।। 14 ॥
उपर्युक्त श्लोक के कथन को पुष्ट करने के लिए महाराज मनु उदाहरण देकर समझाते हैं। उदाहरणार्थ-वेद में एक स्थान पर यह कहा गया है कि सूर्य जब उदय हो रहा हो तब यज्ञ करना चाहिए, दूसरे स्थान पर बताया गया है कि सूर्योदय होने से पहले यज्ञ करना चाहिए। इसी तरह कहीं सूर्य के अस्त होने से पहले यज्ञ करने के लिए कहा गया है तो कहीं सूर्य अस्त हो जाने के बाद। इन कथनों में कहीं भी आपस में विरोध नहीं समझना चाहिए। इस प्रकार के विकल्प वचन आने पर बताए गए सभी सम्मयों में अग्निहोत्र सम्बंधी यज्ञ करना धर्मानुकूल है।
निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः ।
तस्य शास्त्रेऽधिकारो ऽस्मिञ्ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित् ।। 15 ॥
मनुष्य के जन्म लेने से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों का वर्णन वेद के जिस प्रकरण में है उसी को मनुस्मृति में लिया गया है। हमने उसके अतिरिक्त अपनी ओर से अन्य कुछ नहीं कहा।
श्रुतिं पश्यन्ति मुनयः स्मरन्ति तु यथास्मृतिः ।
तस्मात्प्रमाणं मुनयः प्रमाणं प्रथितं भुवि ॥ 16 ।।
मुनि लोग वेदों का साक्षात्कार (दर्शन) करते हैं और वे ही लोग स्मृतियों को अपने स्मृति पटल पर अंकित कर स्मरण रखते हैं। अतः ऐसी लोक प्रसिद्धि है कि मुनियों का वचन भी प्रामाणिक है।
धर्मव्यतिक्रमो दृष्टः श्रेष्ठानां साहसं तथा।
तदन्वक्ष्य प्रयुञ्जानाः सीदन्त्यपरधर्मजाः ।। 17 ।।
हमने श्रेष्ठ व्यक्तियों को भी धर्म के नियमों का उल्लंघन करने का साहस करते हुए देखा है परन्तु हमारा यह दृढ़ मत है कि धर्म के विपरीत आचरण करने वालों को परिणाम में भारी दुःख उठाना पड़ता है। कहने का आशय यह है कि मुनि गण विवेकशील होते हैं, अतः वे किसी तरह का गलत साहस नहीं करते। अतएव उनके कथन प्रामाणिक ही होते हैं।
सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।
तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्त प्रचक्षते ॥ 18 ।।
ब्रह्मावर्त नामक देश जो स्वयं देवताओं द्वारा निर्मित किया गया है, वह सरस्वती और दृषद्वती नाम की देव नदियों के मध्यवर्ती भूभाग में बसा है।
तस्मिन्देशे य आचारः पारम्पर्यक्रमागतः ।
वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ॥ 19 ॥
उस देश अर्थात् ब्रह्मावर्त में रहने वाले (ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों) चारों वर्णों एवं वर्ण संकरों द्वारा अपनाया गया परम्परागत आचार ही सदाचार (सत्परुषों के द्वारा पालन किया जाने वाला) है जो सदा से चला आ रहा है।
विरुद्धा च विगीता च दृष्टार्थादिष्टकारणे।
स्मृतिर्न श्रुतिमूला स्याद्या चैषासम्भवश्रुतिः ।। 20 ।।
अगर इष्ट कार्यों के करने में सदाचार के विपरीत किसी स्मृति में कोई विवरण आता है, ऐसी स्थिति में उस स्मृति को वेदानुकूल नहीं समझना चाहिए। इसका कारण यह है कि वेद कभी सदाचार के विरुद्ध नहीं होते।
(यह पद्य केवल मेधातिथि द्वारा विहित मनुस्मृति के भाष्य में है अन्य में नहीं।)
कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पञ्चालाः शूरसेनकाः ।
एष ब्रह्मर्षिदेशो वै ब्रह्मावर्तादनन्तरः ।॥ 21 ॥
ब्रह्मर्षियों के निवास अन्य पवित्र देश कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पाञ्चाल तथा शूरसेनक हैं जो ब्रह्मावर्त के निकट स्थित हैं।
इसका अभिप्राय यह है कि सर्वाधिक विशेषता वाला देश ब्रह्मावर्त है। उसके बाद कुरुक्षेत्र आदि अन्य देशों का स्थान है।
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ।। 22 ॥
संसार के समस्त मानव अपने चरित्र और कर्मों के लिए इन देशों (ब्रह्मावर्त, कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पाञ्चाल और शूरसेनक) में जन्मे ब्राह्मण से शिक्षा लें।
कहने का आशय यह है कि इन देशों में रहने वाले ब्राह्मण का जीवन वैदिक शिक्षा के अनुसार पूरी तरह पवित्र एवं आदर्श रूप होता है। इसलिए उनका आचरण विश्व के सभी लोगों के लिए अनुकरण योग्य है।
यह मानव मनोविज्ञान के अनुसार भी स्वाभाविक है क्योंकि समाज जिन व्यक्तियों को श्रेष्ठ समझता है, उनका अनुकरण सामान्य लोगों द्वारा किया जाता है।
हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्ये यत्प्राग्विनशनादपि।
प्रत्यगेव प्रयागाच्च मध्यदेशः प्रकीर्तितः ॥ 23 ।।
हिमालय और विन्ध्याचल के बीच, सरस्वती नदी के पूर्व में तथा प्रयाग के पश्चिम में जो देश स्थित है उसका नाम मध्यदेश है।
आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्राच्च पश्चिमात् ।
तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त विदुर्बुधाः ।। 24 ॥
पूर्वी समुद्र व पश्चिमी समुद्र तक और उन्हीं दोनों पर्वतों हिमालय तथा विन्ध्याचल के मध्य स्थित प्रदेश को विद्वज्जन आर्यावर्त अर्थात आर्यों का आवतं (निवास) कहते हैं।
कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः ।
स ज्ञेयो यज्ञियो देशो म्लेच्छदेशस्त्वतः परः ।। 25 ॥
जहां पर काला मृग (हिरन) अपने स्वभाववश ही स्वच्छन्द विचरण करता रहता है (अर्थात् उसे कहीं से पकड़कर नहीं लाया गया है वरन् वह स्वेच्छा से घूमता रहता है।) वह यज्ञ की पवित्र यज्ञिय भूमि है। इससे आगे की भूमि में म्लेच्छों का निवास है।
(कुछ टीकाकारों ने कृष्णसार (काला) हिरन को ऐसा हिरन बताया है जिसकी चमड़ी अत्यधिक यज्ञों के उठते हुए धुएं के कारण काली हो गई हो।)
एतान् द्विजातयो देशान्संश्रयेरन्प्रयत्नतः ।
शूद्रस्तु यस्मिन्स्तस्मिन्वा निवसेवृत्तिकर्षितः ।। 26 ।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य (द्विजाति) के लोगों को चाहिए कि वे ब्रह्मावर्त, कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पाञ्चाल, शूरसेनक, मध्य देश, आर्यावर्त, यज्ञिय देश में से किसी भी एक देश में निवास करने का प्रयत्न करें। शूद्रों को जहां भी जीविका के साधन मिलें वहां रहें।
मनु महाराज ने निवास के सम्बंध में द्विज जनों को जो निर्देश दिया है उसके पीछे यह मनोवैज्ञानिक तथ्य छिपा है कि मनुष्य के चरित्र पर उसके वातावरण तथा परिस्थितियों का बहुत प्रभाव पड़ता है। चूंकि ऊपर बताए गए देशों में उस काल में सात्विक वातावरण तथा परिस्थितियां थीं और द्विज जन भी धर्मानुरागी होते थे अतः उनके लिए वे ही प्रदेश निवास हेतु श्रेष्ठ थे।
एषा धर्मस्य वो योनिः समासेन प्रकीर्तिता।
सम्भवश्चास्य सर्वस्य वर्णधर्मान्निबोधत ।। 27 ।।
ऋषियो! मैंने आप लोगों से धर्म के कारण तथा पूरे संसार की उत्पत्ति का विवरण संक्षेप में कहा। अब आप वर्ण धर्मों (1. वर्ण धर्म, 2. आश्रम धर्म, 3. वर्णाश्रम धर्म, 4. गौण धर्म, 5. नैमित्तिक धर्म) को ध्यान से सुनिए।
वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिद्विजन्मनाम् ।
कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ॥28॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य लोगों का शरीर सांसारिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से पवित्र बनाने के लिए वैदिक विधि-विधान से गर्भाधान, जातकर्म तथा नामकरण आदि सभी संस्कार करने चाहिए।
गाभैर्हो मैर्जातकर्मचौडमौञ्जीनिबन्धनैः ।
बैजिकं गर्भिकं चैनो द्विजानामपमुज्यते ।। 29 ।।
मानव शरीर की रचना स्त्री के रज तथा पुरुष के वीर्य के मिश्रण से होती है। उसका विकास स्त्री के गर्भाशय में होता है। द्विजों के वीर्य और गर्भ से उत्पन्न दोषों को गर्भ शुद्धिकारक हवन, चूड़ाकरण (मुण्डन) और यज्ञोपवीत संस्कार नष्ट कर देते हैं।
स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः ।
महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥ 30 ।।
वेदों और उपनिषदों आदि प्रामाणिक धर्मग्रंथों के अध्ययन और सत्य बोलने से, भौतिक पदार्थों का संकलन नहीं करने से, आध्यात्मिक साधना के व्रतों का पालन करने से, नित्य पूजा-अर्चना करने से, पुत्र उत्पन्न करने से (गृहस्थाश्रम का पालन करने हेतु), पर्वों पर किए जाने वाले यज्ञों से तथा विशेष अवसरों पर आयोजित होने वाले बड़े-बड़े यज्ञों (जैसे अश्वमेध, राजसूय आदि महायज्ञ) को करने से यह शरीर ब्रह्म प्राप्ति के योग्य होता है।
इस प्रकार शरीर तथा मनोमस्तिष्क को शुद्ध एवं पवित्र बनाने के लिए दो उपाय बताए गए हैं- 1. वैदिक संस्कार, 2. स्वाध्याय, व्रत, यज्ञादि।
प्राङ्नाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्मविधीयते।
मन्त्रवत्प्राशनं चास्य हिरण्यमधुसर्पिषाम् ॥ 31 ।।
जातक के जन्म लेने पर नाड़ा काटने से पूर्व 'जातकर्म' संस्कार किया जाता है। इसके उपरान्त 'प्राशन' संस्कार किया जाता है। इसमें वेदमंत्रों का उच्चारण करते हुए सोने की सलाई अथवा चम्मच से शिशु को घी और मधु चटाया जाता है।
नामधेयं दशम्यां तु द्वादश्यां वाऽस्य कारयेत् ।
पुण्ये तिथौ मुहूर्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते ॥ 32 ॥
जन्म के दसवें या बारहवें दिवस या उसकी परवर्ती किसी शुभ तिथि में, शुभमुहूर्त में शिशु का नामकरण संस्कार किया जाता है।
कुछ टीकाकारों का मत है कि अगर दसवें या बारहवें दिन शुभ मुहूर्त न आता हो तो ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जिस दिन भी शुभ मुहूर्त निकले उसी दिन नामकरण संस्कार करना उचित है।
माङ्गल्यं ब्राह्मणस्य स्यात्क्षत्रियस्य बलान्वितम् ।
वैश्यस्य धनसंयुक्तं शूद्रस्य तु जुगुप्सितम् ॥ 33 ।।
इस श्लोक में प्रत्येक वर्ण के नामकरण हेतु पृथक-पृथक नियम अपनाने के बारे में बताया गया है। ब्राह्मण का नाम मंगल सूचक शब्द से युक्त होना चाहिए (जैसे- आनन्द प्रकाश, ज्ञान प्रकाश, राम स्वरूप आदि), क्षत्रिय का नाम बलसूचक शब्द से युक्त होना चाहिए (जैसे- अजेय, विजय, शक्तिमान आदि), वैश्य का नाम धन सूचक होना चाहिए (जैसे- लक्ष्मीप्रसाद, धनपति, धनपाल आदि) तथा शूद्र का नाम सेवावृत्ति का सूचक होना चाहिए (जैसे-रामसेवक, कृष्णदास, चन्द्रदास) आदि।
शर्मवद् ब्राह्मणस्य स्याद्राज्ञो रक्षासमन्वितम्।
वैश्यस्य पुष्टिसंयुक्तं शूद्रस्य प्रेष्यसंयुतम् ॥ 34 ॥
भगवान मनु चारों वर्णों के नामों के साथ जोड़े जाने वाले उपनामों के बारे में बताते हैं कि ब्राह्मणों के नाम के साथ 'शर्मा' शब्द, क्षत्रियों के नामों के साथ 'रक्षा' का बोध कराने वाला शब्द, वैश्यों के नामों के साथ 'पुष्टि' का बोध कराने वाला शब्द तथा शूद्रों के नामों के साथ दासता का बोध कराने वाला शब्द जोड़ना चाहिए।
स्त्रीणां सुखोद्यमक्रूरं विस्पष्टार्थं मनोहरम्।
मङ्गल्यं दीर्घवर्णान्तमाशीर्वादाभिधानवत् ॥ 35 ।।
कन्याओं के नामकरण सम्बंधी नियम हैं- 1. नाम का उच्चारण सरलता तथा सुविधापूर्वक हो सके। 2. उसका अर्थ तथा स्वरूप कोमल और मीठा हो। 3. नाम का अर्थ भली प्रकार स्पष्ट हो। 4. नाम मन को प्रिय लगने वाला और शुभ का सूचक हो। 5. नाम का अंतिम स्वर दीर्घ हो जैसे रामा, राधा, शुभ्रा आदि। 6. वह आशीर्वाद की ध्वनि रखने वाला हो जैसे- दिव्या, शारदा, सुषमा आदि।
चतुर्थेमासि कर्तव्यं शिशोर्निष्क्रमणं गृहात् ।
षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि यद्वेष्टं मङ्गलं कुले ॥ 36 ॥
जन्म के चतुर्थ माह में शिशु को घर से बाहर निकालने का और छठे माह में अन्न प्राशन संस्कार करना चाहिए (अन्न प्राशन संस्कार में शिशु को घी, मधु या दूध के साथ अत्यन्त अल्प मात्रा में गेहूं, चावल, दाल आदि अन्न का सेवन कराया जाता है)।
चौथे और छठे महीने का विधान सुविधा की दृष्टि से किया गया है, यदि कुल परम्परा के अनुसार ये मांगलिक संस्कार कुछ समय आगे या पीछे करने का हो तो उसी का पालन करना चाहिए।
चूड़ाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मतः ।
प्रथमेऽब्दे तृतीये वा कर्त्तव्यं श्रुतिनोदनात् ॥ 37 ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अर्थात् द्विजाति के बालकों का जन्म के पहले या तीसरे वर्ष में अपनी सुविधा अनुसार वैदिक विधि से केश-मुण्डन संस्कार होना चाहिए।
इसका आशय यह है कि मुण्डन संस्कार दूसरे वर्ष में नहीं कराना चाहिए।
गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनयनम्।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भातत्तु द्वादशे विशः ॥ 38 ॥
ब्राह्मण बालक का गर्भ से आठवें वर्ष में, क्षत्रिय बालक का ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य के पुत्र का बारहवें वर्ष में यज्ञोपवीत संस्कार कराना चाहिए। इस संस्कार के बाद बालक को विद्या प्राप्ति के लिए गुरुकुल ले जाया जाता है।
ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यों विप्रस्य पञ्चमे।
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे ।। 39 ॥
ब्रह्म तेज को पाने की इच्छा रखने वाले ब्राह्मण के बालक का गर्भ से पांचवें वर्ष में, विशेष बल पाने की कामना वाले क्षत्रिय का छठे वर्ष में और अधिक धन-खेती आदि की इच्छा वाले वैश्य बालक का आठवें वर्ष में यज्ञोपवीत करना चाहिए। आशय यह है कि ऐसे लोगों के बालकों का विद्या अध्ययन अन्यों से पहले करवा देना चाहिए।
आ षोडशाद्ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते।
आ द्वाविंशात्क्षत्रबन्धोराचत्र्विशतेर्विशः ।। 40 ।।
सोलह वर्ष तक ब्राह्मण की, बाईस वर्ष तक क्षत्रिय की और चौबीस वर्ष तक वैश्य की 'सावित्री' का उल्लंघन नहीं होता। अतः इन बालकों का इस आयु से पहले ही यज्ञोपवीत संस्कार हो जाना चाहिए।
यज्ञोपवीत के लिए इस श्लोक में 'सावित्री' (गायत्री) शब्द का प्रयोग किया गया है। यज्ञोपवीत संस्कार के बाद ही व्यक्ति को गायत्री जप का अधिकार प्राप्त होता है।
अत ऊर्ध्वत्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः ।
सावित्रीपतिताः व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः ।॥ 41 ॥
यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य बालकों का क्रमशः सोलह, बाईस और चौबीस वर्ष की उम्र तक यज्ञोपवीत संस्कार नहीं होता तो वे गायत्री मंत्र जप काअधिकार नहीं प्राप्त करते। अतः वे पतित होने के कारण आर्य पुरुषों की दृष्टि। तिरस्कृत बनते हैं और वे 'व्रात्य' कहे जाते हैं।
नैतैरपूतैर्विधिवदापद्यपि हि कर्हिचित् ।
ब्राह्यान्यौनांश्च सम्बन्धान्नाचरेद्ब्राह्मणैः सह ।। 42 ।।
उपर्युक्त श्लोक में कहे गए 'व्रात्यों' (जिन लोगों ने अधिकतम आयु बोन जाने पर भी यज्ञोपवीत संस्काः नहीं किया और न प्रायश्चित करने के बाद किया के साथ संकटकाल में भी खान-पान, विवाह आदि का सम्बंध नहीं करना चाहिए।
काष्र्णरौरववास्तानि चर्माणि ब्रह्मचारिणः ।
वसीरन्नानुपूर्येण शाणक्षौमाविकानि च ॥ 43 ।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों वर्णों के ब्रह्मचारियों के लिए कृष्णमृग, रुरुमृग तथा बकरे के चमड़े को (दुपट्टे की जगह प्रयोग करें), सन (बोरिया बनाने में प्रयोग की जाने वाली सुतली), क्षौम (रेशम) तथा ऊन के बने कपड़े (धोती और कोपीन के स्थान पर) धारण करें।
कुछ टीकाकारों ने क्षौम का अर्थ 'अलसी' बताया है। श्लोक के अर्थ में भी भिन्नता मिलती है। इसका दूसरा अर्थ इस प्रकार है- ब्राह्मण ब्रह्मचारी को कृष्ण मृग के चर्म अथवा सन के, क्षत्रिय ब्रह्मचारी को रुरुमृग के चमड़े या क्षौम (रेशम) के तथा वैश्य ब्रह्मचारी को बकरे (अज) के चमड़े या ऊन के वस्त्र उपयोग करने चाहिए।
मौञ्जी त्रिवृत्समा श्लक्ष्णा कार्या विप्रस्य मेखला।
क्षत्रियस्य तु मौर्वी ज्या वैश्यस्य शणतान्तवी ।। 44 ।।
ब्राह्मण ब्रह्मचारी की कमर में बांधी जाने वाली पेटी या पट्टी सूत से तीन तहो वाली, कोमल, चिकनी और सुखदायक बनानी चाहिए। क्षत्रिय ब्रह्मचारी की मेखला (कमर पट्टी) धनुष की डोरी के रूप में प्रयोग किए जाने वाले मूंज से तथा वैश्य ब्रह्मचारी की कमर पट्टी सन की डोरी से बनानी चाहिए।
मुञ्जलाभे तु कर्त्तव्याः कुशाश्मन्तकबल्वजैः ।
त्रिवत्ता ग्रन्थिनैकेन त्रिभिः पञ्चभिरेव वा ॥ 45 ॥
यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ब्रह्मचारियों की मेखला (कमर पेटी) बनाने के लिए सूत, मूंज और सन आदि नहीं मिल सकें तो इनके लिए क्रमशः कुश अशमन्तक (पथरीली धरती पर उगी घास, तृण) तथा बल्वज (झाड़ियों के पास उगी घास) की तीन लड़ी वाली कमर पट्टी (मेखला) बनानी चाहिए। इनमे आवश्यकतानुसार एक, तीन या पांच गांठें बांधनी चाहिए।
कार्पासमुपवीतं स्याद्विप्रस्योर्ध्ववृतं त्रिवृत् ।
शाणसूत्रमयं राज्ञो वैश्यस्याविकसौत्रिकम् ।। 46 ॥
ब्राह्मण ब्रह्मचारी का जनेऊ (यज्ञोपवीत) कपास की रुई से बने सूत का, क्षत्रिय ब्रह्मचारी का जनेऊ सन से बने धागे का और वैश्य ब्रह्मचारी का जनेऊ भेड के बाल से बने धागे का होना चाहिए। ब्राह्मण के जनेऊ में तीन लड़ियां होनी चाहिए और प्रत्येक में एक गांठ लगी होनी चाहिए।
ब्राह्मणो बैल्वपालाशौ क्षत्रियो वाटखादिरौ।
पैप्लौदुम्बरौ वैश्यौ दण्डानर्हन्ति धर्मतः ।। 47 ॥
ब्राह्मण ब्रह्मचारी को बेल या पलाश पेड़ की लकड़ी की, क्षत्रिय ब्रह्मचारी को बड़ अथवा खादिर पेड़ की लकड़ी की और वैश्य ब्रह्मचारी को पीलू या गूलर की लकड़ी की लाठी (दण्ड) रखनी चाहिए।
केशान्तिको ब्राह्मणस्य दण्डः कार्यः प्रमाणतः ।
ललाटसम्मितो राज्ञः स्यात्तु नासान्तिको विशः ॥ 48 ॥
प्रमाण के अनुसार ब्राह्मण ब्रह्मचारी की लाठी (दण्ड) सिर के बालों तक, क्षत्रिय ब्रह्मचारी की लाठी ललाट तक और वैश्य ब्रह्मचारी की लाठी नाक तक लम्बी होनी चाहिए।
ऋजवस्ते तु सर्वे स्युरव्रणाः सौम्यदर्शनाः ।
अनुद्वेग करा नृणां सत्वचोऽनग्निदूषिताः ।। 49 ।।
उपरोक्त वर्णन के परिणाम अनुसार तीनों वर्षों के ब्रह्मचारियों के दण्ड सीधे, गांठरहित, सुंदर, उद्वेग न उत्पन्न करने वाले, बक्कल सहित एवं आग से न जले हुए होने चाहिए।
प्रतिगृह्येप्सितं दण्डमुपस्थाय च भास्करम्।
प्रदक्षिणं परीत्याग्निं चरेदैशं यथाविधिः ।। 50 ।।
ब्राह्मण आदि (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) ब्रह्मचारियों को जो सुलभ और रुचिकर हो (पहले श्लोक में दिए वर्णन के अनुसार) वह दण्ड लेकर सूर्य नारायण के सामने आकर उनको नमस्कार करें। इसके बाद जलती हुई अग्नि की प्रदक्षिणा करें और तत्पश्चात् भिक्षाटन के लिए जाएं।
भवत्पूर्व चरेद्वैक्षमुपनीतो द्विजोत्तमः ।
भवन्मध्यं तु राजन्यः वैश्यस्त् भवदुत्तरम् ॥ 51 ||
यज्ञोपवीत संस्कार के बाद ब्राह्मण ब्रह्मचारी को 'भवत' शब्द का उपयोग वाक्य के पहले उच्चारण कर भिक्षा की याचना करनी चाहिए। जैसे- भवती भि यच्छतु। इसी क्रम में क्षत्रिय ब्रह्मचारी को 'भवत' शब्द का वाक्य के मध्य में उपयोग कर भिक्षा मांगनी चाहिए, जैसे- भिक्षां भवती यच्छतु । वैश्य ब्रह्मचारी के भवत्' शब्द का वाक्य के अंत में प्रयोग करना चाहिए, जैसे भिक्षां यच्छतु भवतो।
मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनीं निजाम् ।
भिक्षेत भिक्षां प्रथमं या चैनं नावमानयेत् ।। 52 ॥
सबसे पहले ब्रह्मचारी को उस गृहिणी से भिक्षा मांगनी चाहिए जो उसका अपमान नहीं करे और भिक्षा अवश्य दे। इस बारे में मनु महाराज ने सबसे पहले माता, उसके बाद मौसी और उसके पश्चात् अपनी बहन और सबसे अंत में किसी विश्वसनीय सम्बंधिनी का क्रम रखा है।
यह विधान इस दृष्टिकोण से रखा गया है ताकि नए बने ब्रह्मचारी का दूसरे के अपमान से मन दुःखी न हो। दूसरे ब्रह्मचारी स्वयं तथा उसके परिवार की स्त्रियां यह जान लें कि अब उस पर गुरु का पूरा अधिकार होने वाला है।
समाहृत्य तु तद्वैक्ष्यं यावदर्थममायया।
निवेद्य गुरवेऽश्नीयादाचम्य प्राङ्मुखः शुचिः ।। 53 ।।
भिक्षा में प्राप्त अन्न तथा सभी वस्तुओं को बिना किसी दुराव-छिपाव के गुरु के सामने रखना ब्रह्मचारी का कर्तव्य है। गुरु उसमें से अपनी इच्छानुसार लेने के बाद ब्रह्मचारी के लिए जितना छोड़ दे, उसे ही पर्याप्त जानकर वह अपनी भूख शांत करे। भोजन करते समय ब्रह्मचारी को अपना मुख पूर्व की ओर रखकर बैठना उचित है।
आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्ङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः ।
श्रियं प्रत्यङ्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्ङ्क्ते ह्यदङ्मुखः ।। 54 ।।
भिक्षा में मिले अन्न को गुरु को समर्पित करने के बाद, बचे हुए को गुरु का प्रसाद जानकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके ग्रहण करने से ब्रह्मचारी की आयु बढ़ती है। इसका कारण मनु महाराज का यह मानना है कि शरीर का हित करने वाले अन्न को आयु वृद्धि के लिए पूर्व की ओर, यश के लिए दक्षिण की ओर, धन-धान्य के लिए पश्चिम की ओर तथा सत्य की अनुभूति पाने के लिए उत्तर की ओर मुख कर भोजन करना चाहिए।
मनु जी ने ब्रह्मचारी के लिए आयु वृद्धि को सबसे अधिक महत्व दिया है क्योंकि अधिक आयु पाने से व्यक्ति हर प्रकार के सुख-वैभव को भोग सकता है।
सायं प्रातर्द्विजातीनामशनं स्मृतिनोदितम्।
नान्तरे भोजनं कुर्यादग्निहोत्रा समोविधिः ॥ 55 ।
द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) के लिए स्मृतियों में प्रातः और सायं दो बार भोजन करने का विधान है अर्थात् दिन में तीन बार भोजन नहीं करना चाहिए। यह विधि अग्निहोत्र के समान पुण्य देने वाली है।
यह बताकर मनु महाराज यह कहना चाहते हैं कि ब्रह्मचारियों को भी दिन में केवल दो बार भोजन करना चाहिए।
उपस्पृश्य द्विजो नित्यमन्नमद्यात्समाहितः ।
भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः स्वानि च संस्पृशेत् ॥ 56 ॥
द्विजाति के लोग (ब्रह्मचर्य की अवस्था के उपरान्त भी) तीन आचमन कर एकाग्रता के साथ भोजन करना शुरू करें और भोजन करने के बाद भी तीन बार आचमन करें। सभी अंगों (दोनों आंख, कान के दोनों छिद्र, दोनों कान) का गीले हाथों से स्पर्श करें।
भोजन शांतिपूर्वक एकाग्र चित्त से करने तथा आंखों, नाक, कान आदि पर जल का स्पर्श करने से होने वाले लाभों के बारे में अब विज्ञान भी सहमत हो चुका है। मन शांत होने से भोजन सरलता से पचता है। अंगों पर जल का स्पर्श करने से मन शांत हो जाता है और उसे एकाग्र करने में सरलता होती है।
पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन् ।
दृष्ट्वा हृष्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः ॥ 57 ।।
मनुष्य को जैसा भोजन प्राप्त हो उसे देखकर मन में प्रसन्नता अनुभव करे। उसकी बिना निन्दा किए पूरा खा जाए, जूठन नहीं छोड़े। प्राप्त भोजन की प्रशंसा करे तथा मन में किसी तरह की हीन भावना नहीं लाए। मुझे यह अन्न सदा प्राप्त हो, इस प्रकार उसका प्रतिनन्दन करे।
आधुनिक शरीरशास्त्र तथा मनोविज्ञान के अनुसार भी भोजन करते समय क्रोध, चिन्ता, तनाव, भय आदि के विचारों से पीड़ित होने पर वह भली प्रकार नहीं पचता और मनुष्य को भूख भी कम लगती है।
पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्जं च यच्छति।
अपूजितं च तद्भुक्तमुभयं नाशयेदिदम् ॥ 58 ॥
ऊपर के श्लाक में बताई गई ावाध से भोजन करने पर वह बल-वीर्य की वृद्धि करता है। निन्दा करते हुए खाया गया भोजन सामर्थ्य और वीर्य को नष्ट करता है।
नोच्छिष्टं कस्यचिद्दद्यान्नाद्यादेतत्तथान्तरा ।
न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टः क्वचिद् व्रजेत् ।। 59 ।।
मनुष्य को खाने से बचा (जूठन) अन्न कभी किसी को नहीं देना चाहिए। इसी प्रकार उसे स्वयं भी नहीं खाना चाहिए। बीच में भोजन नहीं करें अर्थात् प्रात: और सायं के मध्य भोजन नहीं करना चाहिए। जितनी भूख हो उतना एक बार में ही खा ले और बिना कुल्ला किए कहीं नहीं जाए।
भूख से अधिक भोजन करने से भांति-भांति के रोग उत्पन्न होते हैं और बिना कुल्ला किए बाहर जाने से मुंह से दर्गंध आने लगती है। इन्हीं कारणों से ऐसा विधान किया गया है।
अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्य चातिभोजनम् ।
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ ८० ॥
अपनी भूख से ज्यादा भोजन करने से स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचता है, आयु कम होती है, सुख के बजाय दुःख मिलता है और पुण्य की हानि होती है। यही नहीं वरन् अधिक खाने वाले की दूसरे लोग निन्दा भी करते हैं। अतः उतना ही भोजन करें जितना आवश्यक हो।
चिकित्साशास्त्र के अनुसार भूख से अधिक भोजन करने से अतिसार, अपच, वायुविकार, भूख का न लगना आदि रोग हो जाते हैं। जहां आवश्यक मात्रा में भोजन करने से अच्छी नींद आती है, वहीं अधिक भोजन करने से अनिद्रा, पेट दर्द आदि दुःखों को सहना पड़ता है। शरीर की ऊर्जा को पेट में गए अतिरिक्त भोजन को शरीर से बाहर निकालने (मल-मूत्र, पसीने आदि के रूप में) के लिए आवश्यकता से अधिक श्रम करना पड़ता है जिससे आयु कम होती है।
ब्राह्मेण विप्रस्तीर्थेन नित्यकालमुपस्पृशेत् ।
कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदाचन ।। 61 ।।
ब्राह्मण सदा ब्रह्म तीर्थ या प्रजापति तीर्थ अथवा देव तीर्थ से आचमन करे उसे कभी पितृ तीर्थ से आचमन नहीं करना चाहिए।
अगले श्लोक में यह बताया गया है ये तीर्थ हाथ में कहां होते हैं।
अङ्गुष्ठमूलस्य तले ब्राह्यं तीर्थं प्रचक्षते ।
कायमङ्गुलिमूलेऽग्रे दैवं पित्र्यं तयोरधः ।। 62 ॥
हाथ के अंगूठे के मूल में ब्रह्म तीर्थ, कनिष्ठा उंगली का मूल प्रजापति त (काय तीर्थ), इसी उंगली का आगे वाला भाग देव तीर्थ तथा अंगूठे एवं तज् उंगली के बीच पितृ तीर्थ होता है।
त्रिराचामेदपः पर्व द्वि प्रमृज्यात्ततो मुखम्।
स्वानि चैव स्पृशेदद्भिरात्मनं शिर एव च ॥ 63 ।।
सबसे पहले तीन बार पानी (जल) से आचमन करें। इसके बाद दो बार मुख को धोना चाहिए। तत्पश्चात् जल से आंखें, कान, नाक, हृदय और सिर का स्पर्श करें।
अनुष्णाभिरफेनाभिरद्भिस्तीर्थेन धर्मवित् ।
शौचेप्सुः सर्वदाऽऽचमेदेकान्ते प्रागुदङ्मुखः ।। 64 ।।
पवित्रता का इच्छुक धर्मात्मा व्यक्ति ठंडे और फेन रहित (शुद्ध) जल से ब्रह्म आदि तीर्थों से एकान्त में पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठे हुए आचमन करें। (यह नियम ब्रह्मचर्य आश्रम का त्याग करने के बाद भी पालनीय है। ब्रह्म आदि तीर्थों के बारे में पहले के श्लोक संख्या 62 में बताया जा चुका है।)
हृद्गाभिः पूयते विप्रः कण्ठगाभिस्तु भूमिपः ।
वैश्योऽद्भिः प्राशिताभिस्तु शूद्रः स्पृष्टाभिरन्ततः ।। 65 ॥
आचमन के समय जल (शुद्ध) जब ब्राह्मण के हृदय तक पहुंचता है तभी वह पवित्र होता है। कण्ठ में जल पहुंचने पर क्षत्रिय तथा मुख में जल पहुंचने पर वैश्य पवित्र होता है। शूद्र जल को छूने भर से पवित्र हो जाता है।
उद्धते दक्षिणे पाणावुपवीत्युच्यते द्विजः ।
सव्ये प्राचीन आवीती निवीती कण्ठ सज्जने ।। 66।.
जनेऊ (यज्ञोपवीत) को दाहिने हाथ से निकालकर बाएं हाथ में लेने पर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य (द्विज) 'उपवीती' कहलाते हैं। दाहिने हाथ पर रखने से वह 'आवीती' और उसे (यज्ञोपवीत) गले से लगाने पर 'निवीती' कहलाता है।
मेखलामजिनं दण्डमुपवीतं कमण्डलुम् ।
अप्सु प्रास्य विनष्टानि गृह्णीयादन्य मंत्रवित् ॥ 67 ।।
मेखला (कमर पट्टी), हिरन की खाल [(मृग चर्म) अथवा अन्य पशु की खाल जिसे ब्रह्मचारी उपयोग में ला रहा हो], दण्ड, जनेऊ तथा कमण्डलु के नष्ट होने पर उन्हें जल में छोड़कर मंत्र पाठ द्वारा दूसरा धारण करना चाहिए।
केशान्तः षोडशे वर्षे ब्राह्मणस्य विधीयते।
राजन्यबन्धोर्द्वाविंशे वैश्यस्य द्वयधिके मतः ॥ 68॥
सोलह वर्ष का होने पर ब्राह्मण का, बाईस वर्ष का होने पर क्षत्रिय का, चौबीस वर्ष का होने पर वैश्य का केशान्त (मुण्डन) संस्कार करना चाहिए।
अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणामावृदशेषतः ।
संस्कारार्थं शरीरस्य यथाकालं यथाक्रमम् ॥ 69 ॥
क
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य स्त्रियों के सभी जातकर्म आदि संस्कार उसी आयु में करने चाहिए जिसमें उस वर्ण के पुरुषों के होते हैं परन्तु इन संस्कारों को करते समय वेदमंत्रों का पाठ नहीं करना चाहिए।
वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ।
पतिसेवा गुरौ वासोगृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ।। 70 ।।
वेद में पुरुषों के लिए विवाह संस्कार की जो विधि बताई गई है वही विधि स्त्रियों के लिए भी है। स्त्रियों के लिए विवाह के बाद पति के अधीन रहने का विधान है। लेकिन विवाह से पहले उसे भी गुरुकुल में रहकर विद्या प्राप्त करने तथा प्रातः और सायं होम करने का अधिकार है। इसी तरह महिलाओं के भी पुरुषों के समान गर्भाधान आदि सभी सोलह संस्कार करने चाहिए।
सोलह संस्कारों के विधि निरूपण में महर्षि मनु ने पुंल्लिंग का उपयोग किसी विशेष उद्देश्य से नहीं किया है। जिस तरह 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः' पुंल्लिंग प्रयोग होने पर भी स्त्रियों-पुरुषों सबके लिए समान अर्थ रखता है, इसी प्रकार सोलह संस्कारों के विधि निरूपण में किया गया मनु जी का पुंल्लिंग प्रयोग स्त्री और पुरुष दोनों के लिए है।
एष प्रोक्तो द्विजातीनामौपनायनिको विधिः ।
उत्पत्तिव्यञ्जकः पुण्यः कर्मयोगं निबोधत ॥ 71 ।।
महर्षि मनु कहते हैं- ब्राह्मणो! द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) वर्णों की यज्ञोपवीत (उपनयन) सम्बंधी विधि यही है। यह जन्म की व्यंजक तथा पुण्यवर्धक है। इसे समाप्त कर अब मैं द्विजाति के कर्तव्य कर्म बताता हूं।
उपनीय गुरुः शिष्यं शिक्षयेच्छौचमादितः ।
आचारमग्निकार्यं च सन्ध्योपासनमेव च ॥ 72॥
गुरु अपने शिष्य का यज्ञोपवीत संस्कार करवाने के बाद उसे अपने गुरुकुल में ही रखे, उसे धर्म-सम्बंधी नियमों को बताए तथा उनका पालन करवाए। उसे यज्ञ-हवन तथा सन्ध्या-उपासना आदि करने का यथाविधि प्रशिक्षण दे।
अध्येष्यमाणस्त्वाचान्तो यथाशास्त्रमुदङ्मुखः । ब्रह्माञ्जलिकृतोऽध्याप्यो लघुवासो जितेन्द्रियः ।। 73 ।।
गुरु अपने शिष्य को यह बताए कि वह हल्के वस्त्र पहनकर, अध्ययन शुरू करने से पहले पूर्वोत्तर (पूर्व-उत्तर) की ओर मुख करके सबसे पहले जल से तीन बार आचमन करे। शिष्य अपनी इन्द्रियों को अपने वश में रखे और हाथ जोड कर गुरु से अध्यापन हेतु प्रार्थना करे। शिष्य द्वारा ऐसा करने के उपरान्त ही गुरु उसे शिक्षा देना प्रारम्भ करे क्योंकि ऐसा शिष्य ही पढाने के योग्य होता है।
ब्रह्मारम्भेऽवसाने च पादौ ग्राह्यौ गुरोः सदा।
संहत्य हस्तावध्येयं स हि ब्रह्माञ्जलिः स्मृतः ॥ 74 ।।
वेद अध्ययन के प्रारम्भ में और उसकी समाप्ति पर शिष्य को सदैव गुरु के दोनों चरणों का स्पर्श करना और दोनों हाथ जोड़ कर गुरु को प्रणाम करना चाहिए। यही ब्रह्मांजलि है अर्थात् दोनों हाथों को जोड़ कर प्रणाम करने को ब्रह्मांजलि कहते हैं।
व्यत्यस्तपाणिना कार्यमुपसङ्ग्रहणं गुरोः ।
सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन च दक्षिणः ।। 75 ॥
गुरु से वेद का अध्ययन करने से पहले और अध्ययन के बाद शिष्य का यह कर्तव्य है कि वह ब्रह्माञ्जलि प्रणाम करे और फिर दोनों हाथों से गुरु के चरणों का स्पर्श करे, बाएं हाथ से गुरु के बाएं पैर का और दाहिने हाथ से दाहिने पैर का।
अध्येष्यमाणं तु गुरुर्नित्यकालमतन्द्रितः ।
'अधीष्व भो !' इति ब्रूयाद्विरामोऽस्त्विति चारमेत् ।। 76 ।।
शिष्य को वेदाध्ययन कराते समय गुरु को आलस्य नहीं करना चाहिए, बिना मन के नहीं पढ़ाना चाहिए। उसे अध्यापन से पूर्व शिष्य से कहना चाहिए, 'वत्स आओ! पढ़ो।' इसी तरह अध्ययन समाप्ति पर गुरु को शिष्य से कहना चाहिए, 'वत्स ! अब विश्राम लो।'
ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा।
स्त्रवत्यनोङ्कृतं पूर्वं परस्ताच्च विशीर्यति ॥ 77 ।।
अध्ययन-अध्यापन और अंत में गुरु का यह कर्तव्य है कि शिष्य से 'ओ३म्' कहलावे। ऐसा नहीं करने पर पढ़ा हुआ पाठ सदा स्मरण नहीं रहता। वह धीरे-धीरे स्मृति से पूरी तरह विलीन हो जाता है। इस भांति गुरु-शिष्य दोनों का परिश्रम बेकार हो जाता है।
इसलिए पाठ को स्मरण शक्ति में सदैव बनाए रखने के लिए अध्ययन के प्रारम्भ तथा अंत में सदैव श्रद्धासहित प्रणव का उच्चारण करना आवश्यक है।
प्राक्कूलान्पर्युपासीनः पवित्रैश्चैव पावितः ।
प्राणायामैस्त्रिभिः पूतस्ततः ऊँकारमर्हति ।। 78 ॥
कुश के आसन पर पूर्व की ओर मुख किए हुए बैठा शिष्य दोनों हाथों में ग्रहण की हई पवित्री (अंगूठी के रूप में उंगलियों में पहने हुए गोल आकार जो कुश से ही बनाए जाते हैं।) से अपने ऊपर जल छिडककर अपने को शुद्ध करे। इसके उपरान्त तीन बार प्राणायाम करके आंतरिक शुद्धि करे।
इस भांति अपनी बाह्य और आंतरिक शद्धि के बाद शिष्य 'ओम' के उच्चारण योग्य होता है।
अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः ।
वेदत्रयान्निरदुहद्भूर्भुवः स्वरितीतिच ।। 79 ।।
प्रजापति ब्रह्मा जी ने तीनों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद) से उनके सार तत्व के रूप में निकले क्रमशः अ, उ तथा म् अक्षरों से 'ओम्' शब्द का निर्माण किया है। ये तीनों अक्षर क्रमश भूः, भुवः तथा स्वः लोकों के वाचक हैं। आशय यह है कि ओम् का उच्चारण करने से परमशक्ति परमात्मा का ध्यान हो जाता है।
टिप्पणी - प्रारम्भ में तीन ही वेद थे। तीनों वेदों से अभिचार से सम्बंधित मंत्रों को अलग करके महर्षि अंगिरा ने चतुर्थ वेद के रूप में अथर्ववेद बनाया।
त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादं पादमदूदुहत।
तदित्यृचोऽस्याः सावित्र्याः परमेष्ठी प्रजापतिः ॥ 8० ॥
मनु महाराज कहते हैं कि 'ओम्' की महिमा के उपरान्त ब्रह्मा जी ने तीनों वेदों से एक-एक पद निकालकर गायत्री मंत्र की रचना की है। ये तीन पद निम्रलिखित हैं-
1. तत्सवितुर्वरेण्यं
2. भर्गो देवस्य धीमहि
3. धियो यो नः प्रचोदयात।
एतदक्षरमेतां च जपन् व्याहृतिपूर्विकाम्।
सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ॥ 81 ॥
वेद ज्ञाता ब्राह्मण प्रातः और सायंकाल में ओंकार और व्याहृति-भूः भुवः स्वः को आगे लगाकर गायत्री मंत्र का जप करने से वेदों के पढ़ने के पुण्य को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार बना पूरा गायत्री मंत्र निम्नलिखित है-
'ओ३म् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात।'
सहस्त्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत्त्रिकं द्विजः ।
महतोऽप्येनसो मासात्त्वचेवाऽहिर्विमुच्यते ।। 82 ।।
अपने निवास स्थान से बाहर जाकर, आसन पर बैठकर एक माह तक निरन्तर इन तीनों (1. प्रणव ॐ 2. व्याहृति- भूः, भुः स्वः, 3. सावित्री - तत) का प्रतिदिन एक सहस्त्र बार जप करने वाले द्विज का बड़े से बड़ा पाप भी उसी प्रकार दर हो जाता है जिस प्रकार सांप केंचली से मुक्त हो जाता है।
एतयर्चा विसंयुक्तः काले च क्रियया स्वया। ब्रह्मक्षत्रियविड्योनिर्गर्हणां यानि साधुषु ॥ 8३ ॥
वेद पाठ का अधिकार रखने वाला द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) का जो व्यक्ति त्रिक, प्रणव, व्याहृति और गायत्री का जप नित्य नहीं करता, प्रातः और संध्याकाल में सन्ध्या-वन्दन नहीं करता, वह साधु समाज में सबकी निन्दा का पात्र बनता है।
ओङ्कारपूर्विकास्तिस्त्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः ।
त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ॥ 4 ॥
ओंकार के बाद कही जाने वाली तीन महाव्याहृतियां नाश रहित हैं और इनके बाद बोला जाने वाला गायत्री मंत्र (इसे सावित्री भी कहते हैं) प्रजापति ब्रह्मा का मुख अथवा ब्रह्म प्राप्ति का द्वार है।
योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः ।
स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान् ॥ 85 ।।
आलस्य को छोड़कर जो व्यक्ति तीन वर्षों तक ओंकार तथा तीन व्याहृतियों सहित तीन चरणों वाले गायत्री मंत्र का जप करता है, वह परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। उसकी गति वायु के समान स्वतंत्र हो जाती है और वह कहीं भी आ-जा सकता है। वह शरीर की सीमा से परे जाकर आकाश के समान असीम रूप प्राप्त कर लेता है।
एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परं तपः ।
सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते ।। 86 ।।
ओंकार केवल एक अक्षर (ॐ) ही परमात्मा की प्राप्ति का साधन होने से सर्वश्रेष्ठ है, प्राणायाम परम तप है अर्थात् इससे बड़ा कोई तप नहीं, गायत्री (सावित्री) से श्रेष्ठ कोई मंत्र नहीं और मौन की तुलना में सत्य बोलना श्रेष्ठ है।
क्षरन्ति सर्वाः वैदिक्यो जुहोतियजति क्रियाः ।
अक्षरं त्वक्षरं ज्ञेयं ब्रह्म चैव प्रजापतिः ॥ 87 ।।
वेदों में बताई गई हवन-यज्ञ आदि सभी क्रियाएं अपना-अपना फल प्रदान कर समाप्त हो जाती हैं परन्तु प्रजापति ब्रह्मा का प्रतिपादक एक मात्र अक्षर 'ओम्' (ॐ) का ब्रह्म के समान ही कभी नाश नहीं होता।
इस श्लोक में मनु महिर्ष ने ओंकार के जप को वेदों में बताई सभी क्रियाओं से अधिक महत्व दिया है। यज्ञ-हवन आदि के मंत्रों के प्रारम्भ में भी ॐ का उच्चारण उसके इसी सर्वोच्च महत्व के कारण किया जाता है।
विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः ।
उपांशुः स्याच्छतगुणः साहस्त्रो मानसः स्मृतः ।। 88 ।।
जप यज्ञ विधि रूप में निरूपित अनुष्ठेय यज्ञों से दस गुना श्रेष्ठ है। उपांशु जप श्रेष्ठता की दृष्टि से जप यज्ञ से सौ गुना श्रेष्ठ है। मानस जप, उपांशु जप से हजार गुना श्रेष्ठ है।
टिप्पणी-जप यज्ञ तीन प्रकार के होते हैं-
वाचिक जप यज्ञ : इसमें साधक स्पष्ट स्वरों से, पदों एवं वर्णों से मंत्र का
जप करता है।
उपांशु जप यज्ञ: इसमें जप आदि का धीरे-धीरे उच्चारण करने से जिह्वा तथा ओठों में कंपन होता है।
3. मानस जप यज्ञ : इसमें साधक मन ही मन पद, वर्ण आदि का विचार कर, अर्थ का ज्ञान रखते हुए मंत्र या बीजाक्षर का जप करता है।
ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः ।
सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ 89 ॥
अमावस्या तथा पूर्णिमा को किए जाने वाले विधि यज्ञों के सहित, पांच महायज्ञों के अंतर्गत जो चार पाक-यज्ञ हैं (वैश्वदेव, बलिकर्म, नित्य श्राद्ध तथा अतिथि सेवा) वे भी जप यज्ञ के सोलहवें भाग बराबर भी महत्व नहीं रखते।
जप्येनैव तु संसिध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः ।
कुर्यादन्यन्नवा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ १० ॥
इसमें कोई संदेह नहीं कि जप यज्ञ से ब्राह्मण को सिद्धि लाभ होता है। ऐसा यज्ञ करने वाला ब्राह्मण अन्य यज्ञों आदि को न करने पर भी जप यज्ञ की महिमा के फलस्वरूप संसार में सम्मानित होता है।
इन्द्रियाणां विचरतां विषयेस्वपहारिषु ।
संयमे यत्नमातिष्ठेद्विद्वान्यन्तेव वाजिनाम् ॥ 91 ॥।
एक कुशल सारथी जिस तरह अपने घोडों पर नियंत्रण रखने के लिए सदैव चेष्टा करता रहता है, उसी तरह विद्वान व्यक्ति को भी चित्त को आकर्षित करने वाले विषयों में भ्रमण करने वाली इंद्रियों को वश में रखने का प्रयत्न करना चाहिए।
एकादशेन्द्रियाण्याहुर्यानि पूर्वे मनीषिणः ।
तानि सम्यक्प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ।॥ 92 ।।
महाराज मनु महर्षियों से कहते हैं- पहले के विद्वानों ने जिन ग्यारह इंद्रियों के बारे में बताया है, उन्हें मैं भली प्रकार क्रम में बताता हूं।
श्रोत्रंत्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी।
पायूपस्थं हस्तपादं वाक्चैव दशमी स्मृता ॥ १३ ॥
कान (कर्ण), त्वचा, चक्षु (नेत्र), जिह्वा, नाक, गुदा, लिंग, हाथ, पैर और वाणी ये दस इन्द्रियां बताई गई हैं।
बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैषां श्रोत्रादीन्यनुपूर्वशः ।
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैषां पाय्वादीनि प्रचक्षते ॥ 94 ॥
ऊपर के श्लोक में बताई इन्द्रियों में से पांच (कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, नासिका) इन्द्रियां ज्ञानेन्द्रियां हैं और पांच इन्द्रियां (गुदा, लिंग, हाथ, पैर तथा वाणी) कर्मेन्द्रियां हैं।
अभिप्राय यह है कि कानों से सुनकर, त्वचा से स्पर्श द्वारा, आंखों से देखकर, जीभ (जिह्वा) से चखकर, नासिका से सूंघ कर हमें बाहरी जगत का ज्ञान होता है। अतः इन्हें ज्ञानेन्द्रियां कहा है। गुदा, शिश्न, हाथ, पैर, वाणी का उपयोग कर हम अपने कर्म करते हैं। अतः इन्हें कर्मेन्द्रियां कहा गया है।
एकादशं मनो ज्ञेयं स्वगुणेनोभयात्मकम् ।
यस्मिन् जिते जितावेतौ भवतः पञ्चकौ गणो ॥ 95 ॥
मन ग्यारहवीं इन्द्रिय है। इसमें ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों दोनों के गुण हैं (इसका कारण यह है कि मन के माध्यम से ही सभी इन्द्रियां कार्य करती हैं)। इस मन को जीत लेने पर पांचों ज्ञानेन्द्रियों और पांचों कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण हो जाता है।
इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयम् ।
सन्नियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं निगच्छति ॥ 96 ॥
इस जगत में जीव इन्द्रियों के विषयों (शब्द, रूप, रस, स्पर्श तथा गन्ध) में आसक्त होकर दोष का भागी होता है अर्थात इन्द्रियों में आसक्त होने से कोई न कोई दोष अवश्य आता है। इसके विपरीत इन्हीं इंद्रियों पर नियंत्रण रखने से सिद्धि को प्राप्त करता है।
कहने का आशय यह है कि जो व्यक्ति दोषों से बचना और सिद्धि प्राप्त करना चाहता है उसे इंद्रियों का स्वामी होना चाहिए, दास नहीं।
न जातु कामा कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवत्र्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ 97 ।।
इस श्लोक में महाराज मनु ने विषयों का उपभोग करने से इच्छा की पूर्ति नहीं होने का उदाहरण दिया है। यह एक सच है कि एक इच्छा की पूर्ति हो जाने पर मनुष्य में दूसरी इच्छा उत्पन्न होती है तथा उसकी पूर्ति होने पर तीसरी। इच्छाओं को तृप्ति होने के बजाय वे इस प्रकार बढ़ती हैं जैसे अग्नि में घी डालने पर उसको ज्वाला और भड़क उठती है।
यश्चैतान्प्राप्नु यात्सर्वान्यश्चैतान्केवलांस्त्यजेत् । प्रापणात्सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ।। १8 ॥
एक व्यक्ति जो सब विषयों को प्राप्त कर ले और दूसरा सब विषयों का त्याग कर दे, उन दोनों में विषयों का त्याग करने वाला श्रेष्ठ है। इसका कारण यह कि जिस व्यक्ति को विषयों से सम्बंधित सामग्री उपलब्ध है, वह उनका दास बन जाएगा और इसके फलस्वरूप उसका तन-मन क्षीण हो जाएगा। यह भी सम्भव है कि व्यक्ति विषयों को प्राप्त करने के बाद भी शारीरिक रूप से उनको भोगने की सामथ्यं नहीं रखता हो। इसके विपरीत जिस व्यक्ति ने सब विषयों का त्याग कर दिया है वह सभी प्रकार से बलशाली और संतुष्ट होता है।
न तथैतानि शक्यन्ते सन्नियन्तुमसेवया।
विषयेषु प्रजुष्टानि यथा ज्ञानेन नित्यशः ॥ 99 ॥
इन्द्रियों की विषयों में स्वाभाविक आसक्ति होती है, अतः उन्हें इनका सेवन करने से रोकना अर्थात् उन्हें जीतना सरल नहीं है। इसके लिए विषयों में जो बुराइयां या हानियां छिपी हैं उन्हें जानना आवश्यक है। किस-किस विषय में कौन-कौन सा दोष है इस बारे में व्यक्ति को भली प्रकार पता होना चाहिए। विषयों का केवल बाहरी और प्रारंभिक रूप ही आकर्षक तथा भोग के योग्य होता है, इसके अतिरिक्त विषयों का भोग बहुत दुःखदायक है। इस ज्ञान का अनुभव करने के बाद ही व्यक्ति अपनी इन्द्रियों पर संयम रख पाता है।
वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च।
न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित् ॥ 100 ।
दुष्ट भाव रखने वाला व्यक्ति इंद्रियों का दास बनकर विषयों में प्रवृत्त रहता है। अतः वह वेद अध्ययन, त्याग, बलिदान, यज्ञानुष्ठान, नियम पालन तथा तप आदि नहीं कर पाता। इसके परिणामस्वरूप उसे कुछ सिद्ध नहीं हो पाता।
श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा च यो नरः।
न हृष्यति ग्लायनि वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः ॥ 101 ।।
ऐसे ही व्यक्ति को जितेन्द्रिय समझना चाहिए जिसे अपनी प्रशंसा-निन्दा, प्रिय या अप्रिय वचन सुनने से, सुन्दर और बदसूरत को देखने से, कोमल-कठोर के छूने से, अच्छे-बुरे स्वाद वाली वस्तुएं खाने से, अच्छी-बुरी गन्ध सूंघने से किसी तरह की खुशी या दुःख नहीं होता। कहने का आशय यह कि जिस व्यक्ति ने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है वह हर अवस्था में शांत तथा संतुलित रहता है।
इन्द्रियाणां तु सर्वेषां यद्येकं क्षरतीन्द्रियम्।
तेनास्य क्षरति प्रज्ञा दृतेः पात्रादिवोदकम् ।। 102 ।।
पांच ज्ञानेन्द्रियों तथा पांच कर्मेन्द्रियों में से किसी भी एक इन्द्रिय के विषयों में रुचि होने से वह उसमें प्रवृत्त होने लगती है, इससे तत्वज्ञानी व्यक्ति का सारा विवेक एवं चेतना धीरे-धीरे उसी प्रकार नष्ट हो जाती है जैसे एक छोटा-सा छेद होने पर भरे हुए चर्म-पात्र का सारा जल शनैः शनैः बह जाता है और पात्र रिक्त रह जाता है।
वशे कृत्वेन्द्रियग्रामं संयम्य च मनस्तथा। सर्वान्संसाधयेदर्थानक्षिण्वन् योगतस्तनुम् ।। 103 ।।
इस श्लोक में इन्द्रियों के संयम द्वारा सभी प्रकार के पुरुषार्थों को प्राप्त करने के बारे में बताया गया है। मनुष्य के लिए यही उचित है कि वह बाहरी इंद्रियों के समूह और मन को अपने वशीभूत करके ऐसे उपाय करे जिससे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थों को सिद्ध किया जा सके और शरीर को किसी तरह का कष्ट नहीं हो। टिप्पणी-उपर्युक्त श्लोक में शरीर को किसी प्रकार का कष्ट न होने से आशय शरीर को साधने से है। जैसे योग साधना द्वारा योगी अपने शरीर, उसकी पूरी इन्द्रियों और मन पर धीरे-धीरे इतना नियंत्रण प्राप्त कर लेता है कि उसे विषयों को त्यागने अथवा उनको भोगने में कोई कष्ट नहीं होता।
पूर्वी सन्ध्यांजपंस्तिष्ठेत्सावित्रीमाऽर्क दर्शनात् ।
पश्चिमां तु समाऽऽसीत सम्यगृक्षविभावनात् ॥ 104 ।।
प्रातःकाल की संध्योपासना में एक आसन में खड़ा होकर उषा काल से लेकर सूर्योदय तक गायत्री मंत्र का जप करता रहे। इसी तरह सायंकाल की सन्ध्या वेला में सूर्यास्त के प्रारम्भ से लेकर तारों के दिखाई देने तक गायत्री मंत्र का जप करता रहे।
पूर्वी सन्ध्या जपंस्तिष्ठन्नैशमेनो व्यपोहति ।
पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ।। 105 ।।
प्रातः की गई सन्ध्या में गायत्री मंत्र का जप करने से रात भर के पाप नष्ट हो जाते हैं। सायं सन्ध्या में गायत्री मंत्र का जप करने से दिन भर के पाप नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार दोनों समय की गई सन्ध्या से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
उसकी बुरी वासनाएं समाप्त हो जाती हैं और उसकी बुद्धि शुद्ध हो जाती है।
न तिष्ठति तु यः पूर्वा नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् ।
सः शूद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ॥ 106 ।।
जो द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) प्रातःकाल एवं सायंकाल सन्ध्योपासना नहीं करता, वह शूद्र की तरह सभी प्रकार के द्विज कर्मों से बहिष्कृत किए जाने योग्य है।
अपां समीपे नियतो नैत्यकं विधिमास्थितः ।
सावित्रीमप्यधीयीत गत्वाऽरण्यं समाहितः ।। 107 ॥
प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकाल वन (फुलवाड़ी, बाग-बगीचा आदि एकान्त स्थान) में जाकर (नदी, सरोवर, झील आदि के) जल के पास एकान्त में एकाग्रचित्त होकर सन्ध्या वन्दनादि नित्य कर्म के साथ द्विज गायत्री का जप करें। आशय यह है कि द्विज के लिए सन्ध्या वन्दना आदि के साथ-साथ नियमित रूप से गायत्री का जप करना आवश्यक है।
वेदोपकरणे चैव स्वाध्याये चैव नैत्यके ।
नानुरोधोऽस्त्यनध्याये होममन्त्रेषु चैव हि ॥ 108 ।।
अनध्याय के दिनों में भी गुरु से शिक्षा ग्रहण करने, यज्ञ-मंत्रों के उच्चारण करने तथा दैनिक स्वाध्याय करने का कोई निषेध नहीं है।
टिप्पणी - शास्त्रों में सूतक, पातक आदि शौच ग्रस्त होने के, श्रावणी आदि कुछ पर्वों के एवं आकाश में बादल घिरे होने के दिनों में स्वाध्याय करने की मनाही (निषेध) है। इन्हें ही उपर्युक्त श्लोक में अनध्याय के दिन कहा गया है।
नैत्यके नास्त्यनध्यायो ब्रह्मसत्रं हि तत्स्मृतम्।
ब्रह्माहुतिहुतं पुण्यमनध्यायवषट्कृतम् ॥ 109 ॥
पूर्वोक्त नित्य कर्म ब्रह्मयज्ञ का ही एक रूप है। अतः उसे करने में अनध्याय किसी तरह से बाधा डालने वाला नहीं है। अनध्याय दिनों में इस ब्रह्मयज्ञ में ब्रह्म आहतियों द्वारा होम होता है और हरेक आहति के अंत में 'वषट्' शब्द बोला जाता है।
यः स्वाध्यायमधीतेऽब्दं विधिना नियतः शुचिः ।
तस्य नित्यं क्षरत्येष पयो दधि घृतं मधु॥ 110 ।।
जो एक वर्ष तक श्रद्धा सहित नित्य पावन भाव से विधि अनुसार (वन में जल के समीप एकान्त में पूरी एकाग्रता से) सन्ध्यावन्दना, गायत्री जप तथा वेद पाठ करता है, उसके यहां दूध, दही, घी और शहद की वर्षा होती है अर्थात् ऐसा व्यक्ति हर तरह से धनवान और संपत्तिशाली बन जाता है।
अग्नीन्धनं भैक्षचर्यामधःशय्यां गुरोर्हितम् ।
आ समावर्तनात्कुर्यात्कृतोपनयनो द्विजः ॥ 111 ॥
जिसका यज्ञोपवीत संस्कार हो चुका हो, ऐसा द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) समावर्तन संस्कार (वेदों का अध्ययन पूरा कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के पूर्व काल की अवधि) तक प्रातः तथा सायं हवन, भिक्षा मांगना, पृथ्वी पर सोना और गुरु हित कार्य को करते रहना चाहिए।
कहने का आशय यह है शिक्षा समाप्त हो जाने लेकिन समावर्तन संस्कार नहीं होने तक द्विज को ब्रह्मचर्य के नियमों का पहले की तरह पालन करते रहना चाहिए।
आचार्यपुत्रः शुश्रूषुर्ज्ञानदो धार्मिकः शुचिः ।
आप्तःशक्तोऽर्थदः साधुः स्वाऽध्याप्योदश धर्मतः ॥ 112 ॥
गुरु के अनुसार दस श्रेणी के व्यक्ति धर्म-शिक्षा देने योग्य होते हैं- 1. आचार्य पुत्र, 2. सेवा करने वाला अर्थात् पुराना सेवक, 3. ज्ञान देने वाला अध्यापक, 4. आचारवान और धर्मात्मा व्यक्ति, 5. पवित्र आचरण करने वाला, 6. सत्य बोलने वाला, 7. समर्थ पुरुष, 8. धन या आजीविका देने वाला, 9. परोपकार करने वाला, 10. भलाई चाहने वाला स्वजातीय।
नापृष्टः कस्यचिद्रूयान्नचाऽन्यायेन पृच्छतः ।
जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत् ।। 113 ।।
विद्वान व्यक्ति बिना पूछे तत्वज्ञान को नहीं बतलाए। इसके अतिरिक्त अगर कोई यत्नपूर्वक कुछ कहने के लिए विवश करे तो भी कुछ बोलना नहीं चाहिए। अभिप्राय यह है कि जब तक दूसरा आग्रहपूर्वक सम्मति प्रकट करने के लिए अनुरोध नहीं करे अथवा श्रद्धा भाव से तत्वज्ञान की बात नहीं पूछे, बुद्धिमान व्यक्ति को सब कुछ जानते हुए भी अनजान (जड) की तरह व्यवहार करना चाहिए।
अधर्मेण च यः प्राह यश्चाधर्मेण पृच्छति।
तथोरन्यतरः प्रैति विद्वेषं वाधिगच्छति ।। 114 ॥
अधर्म से पछने पर जो उसका उत्तर देता है अथवा अधर्म से जो प्रश्न करता है. उनमें आपस में वैर हो जाता है अथवा उन दोनों में से एक की (व्यतिक्रम करने वाले की) मृत्यु हो जाती है।
यहां मनु महाराज का आशय यह है कि न तो कभी किसी से अनुचित प्रश्न करना चाहिए और न किसी को अनुचित रीति से जवाब देना चाहिए। ऐसा करने से दोनों के बीच शत्रुता उत्पन्न हो सकती है जो किसी की मृत्यु तक का कारण बन सकती है।
धर्मार्थों यत्र न स्यातां शुश्रूषा वाऽपि तद्विधा ।
तत्र विद्या न वक्तव्या शुभं बीजमिवोषरे ।। 115 ।।
ऐसे शिष्य को विद्या दान नहीं करे जिसके पास धर्म और अर्थ नहीं हो तथा शिष्य में शिक्षा के अनुरूप सेवा (गुरु-सेवा) करने की भावना न हो। जिस प्रकार ऊसर में बीज बोने से बीज नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार गुरु के प्रति श्रद्धा नहीं रखने वाले को विद्या देने से वह नष्ट हो जाती है।
टिप्पणी- यहां, उपर्युक्त श्लोक में जिस शिष्य के पास धर्म न हो, का अर्थ ऐसे शिष्य से है जो धर्म के नियमों का पालन नहीं करता हो।
विद्ययैव समं कामं मर्तव्यं ब्रह्मवादिना।
आपद्यपि हि घोरायां न त्वेनामिरिणे वपेत् ।। 116 ।।
वेदों का ज्ञान रखने वाला विद्वान चाहे अपनी विद्या किसी को बिना दिए ही मर जाए परन्तु घोर संकट आने पर भी उसे (अपना ज्ञान) अपात्र या अयोग्य शिष्य को नहीं दे।
विद्या ब्राह्मणमेत्याह शेवधिष्टेऽस्मि रक्ष माम् ।
असूयकाय मां मा दास्तथा म्यां वीर्यवत्तमा ।। 117 ॥
विद्या की देवी (सरस्वती) ने विद्वान ब्राह्मण के पास आकर कहा, 'मैं तुम्हारी निधि (कोश) हूं, मेरी रक्षा करो। ऐसे व्यक्ति को मत दो अर्थात् ऐसे व्यक्ति को विद्या मत दो जो मेरी शक्ति को कमजोर कर दे। मुझे सत्पात्र को ही दो जो मेरा सदुपयोग करे जिससे मैं शक्तिशालिनी बनी रहूं।'
कहने का आशय यह है कि विद्वान व्यक्ति को अपनी विद्या सत्पात्र को देना चाहिए ताकि वह उसका सदपयोग कर अपनी तथा समाज की उन्नति करे. जिसके फलस्वरूप विद्या का गौरव बढे। ईर्ष्या-द्वेष से ग्रस्त रहने वाले व्यक्ति को विद्या देने से वह उसका दुरुपयोग करेगा जिससे उसकी महिमा कम होगी।
यमेव तु शुचिं विद्यान्नियतं ब्रह्मचारिणम्।
तस्मै मां ब्रूहि विप्राय निधिपायाऽप्रमादिने ।। 118 ।।
जिस शिष्य को गुरु पवित्र, जितेन्द्रिय और ब्रह्मचारी समझे, जो विद्या रूपी कोश की रक्षा करने योग्य हो तथा जो आलस्य रहित हो उसे ही मुझे (विद्या) दे (पढ़ाये)।
ब्रह्म यस्त्वनुज्ञातमधीयानादवाप्नुयात्।
स ब्रह्मस्तेयसंयुक्तो नरकं प्रतिपद्यते ॥ 119 ॥
अगर कोई गुरु से श्रद्धापूर्वक विद्या नहीं ग्रहण करता वरन् जब गुरु दूसरे को पढ़ा रहा है तब चुपचाप चोरी से सुनकर उसे सीख लेता है, ऐसा व्यक्ति ब्रह्म की चोरी करने का अपराध करने के कारण नरक को जाता है।
आशय यह है कि विद्या गुरु मुख से ही श्रद्धापूर्वक ग्रहण करना उचित है। गुरु आज्ञा बिना चोरी से विद्या सीखना एक अपराध है। कारण यह है कि कुपात्र विद्या सीखकर अपना अहित कर सकता है अतः गुरु आज्ञा आवश्यक है।
लौकिकं वैदिकं वाऽपि तथाऽऽध्यात्मिकमेव च।
आददीत यतो ज्ञानं तं पूर्वमभिवादयेत् ।। 120 ।।
शिष्य का यह कर्तव्य है कि वह जब माननीय व्यक्तियों के मध्य बैठे तब जिस गुरु से उसने लौकिक विद्या (आजीविका कमाने के योग्य बनाने वाली), वैदिक विद्या (वेद विषय से सम्बंधित) और आध्यात्मिक विद्या (ब्रह्म विषयक)
प्राप्त की हो उसे सर्वप्रथम प्रणाम करे।
टिप्पणी - यदि तीनों विद्याएं भिन्न-भिन्न गुरुओं से प्राप्त की हैं तो सर्वप्रथम आध्यात्मिक गुरु, द्वितीय वेदज्ञान देने वाले गुरु तथा अंत में लौकिक विद्या के गुरु को प्रणाम करना उचित है।
सावित्रीमात्रसारोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः ।
नायन्त्रितस्त्रिवेदोऽपि सर्वाशी सर्वविक्रयः ।। 121 ।।
केवल एक मात्र गायत्री मंत्र का ज्ञाता ब्राह्मण अगर जितेन्द्रिय है तो उसे शिष्ट समाज में सम्मान मिलना चाहिए। इसके विपरीत वेदों का ज्ञाता ब्राह्मण भी अगर जितेन्द्रिय नहीं और निषिद्ध अन्न को खाने वाला है तथा सब कुछ बेचने वाला है तो उसको शिष्ट समाज में मान-सम्मान नहीं देना चाहिए।
सारांश यह कि विद्या से हीन पर अच्छे चरित्र वाला व्यक्ति उस व्यक्ति मे कहीं श्रेष्ठ है जो विद्वान तो है परन्तु उसका चरित्र अच्छा नहीं है।
शय्यासनेऽध्याचरिते श्रेयसा न समाविशेत् । शय्यासनस्थश्चैवैनं प्रत्युत्थायाभिवादयेत् ।। 122 ।।
पूज्य जनों (माता-पिता, गुरु और अपने से बड़ों) की शय्या (चारपाई, गद्दी आदि) तथा आसन (कुर्सी, स्टूल, चटाई आदि) पर स्वयं नहीं बैठें और यदि शिष्य शय्या, आसन आदि पर बैठा हो तो पुज्य जनों के आने पर उनके स्वागत में खडा होकर उन्हें प्रणाम करे।
ऊर्ध्वं प्राणा ह्यत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आयति। प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान्प्रतिपद्यते ।। 123 ।।
महर्षि मनु शिष्य को उठकर पूज्य जनों को प्रणाम करने का सूक्ष्म कारण बताते हुए कहते हैं कि युवा जनों के प्राण वृद्ध लोगों के आने पर ऊपर को उछलते हैं, अतः उनके खड़े होकर प्रणाम करने से प्राण (शक्ति) अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ जाते हैं जिससे वे अपने को संतुलित तथा स्वस्थ अनुभव करने लगते हैं।
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलम् ॥ 124 ॥
अपने से आयु, विद्या, शक्ति आदि में बड़े पुरुषों की प्रतिदिन सेवा करने और उन्हें प्रणाम करने का स्वभाव रखने वाले व्यक्ति की आयु, ज्ञान और यश बढ़ते हैं।
इसका कारण वह है कि वृद्ध लोग या पूज्य जन सेवा तथा सम्मान से प्रसन्न हो जो आशीर्वाद देते हैं उससे आयु बढ़ती है। वे लोग अपने जो अनुभव सुनाते हैं उससे ज्ञान में वृद्धि होती है। पूज्य जन जब छोटों की दूसरी जगह, जाकर प्रशंसा करते हैं उससे उनका यश बढ़ता है।
अभिवादात्परः विप्रो ज्यायांसमभिवादयन्।
असौ नामाहमस्मीति स्वं नाम परिकीर्तयेत ।। 125 ।।
गुरु और अपने से बड़ों के आने पर उठकर इस तरह कहना चाहिए, 'मैं अमुक नाम वाला आपको प्रणाम करता हूं।' इस तरह अपने नाम, गोत्र आदि को स्पष्ट रूप से कहना चाहिए।
नामधेयस्य ये केचिदभिवादं न जानते।
तान्प्रज्ञोऽहमिति ब्रूयात् स्त्रियः सर्वास्तथैव च ।। 126 ।।
बुद्धिमान व्यक्ति जिन वृद्ध व्यक्तियों को नाम-गोत्र सहित प्रणाम करना आवश्यक नहीं समझे उन्हें 'मैं प्रणाम करता है।' यह कहकर अभिवादन करें। माननीया स्त्रियों को भी इसी विधि से प्रणाम करना चाहिए अर्थात् उन्हें भी अपना नाम-गोत्र बताना आवश्यक नहीं।
भोः शब्दं कीर्तयेदन्ते स्वस्य नाम्नोऽभिवादने।
नाम्नां स्वरूपभावो हि भोभाव ऋषिभिः स्मृतः ।। 127 ॥
जिन बड़े लोगों को नमस्कार किया जाए उनको नाम नहीं लेना चाहिए, अभिवादन में अपने नाम के बाद 'भोः' शब्द का उच्चारण करना चाहिए। ऋषियों ने 'भोः' शब्द को नामों का स्वरूप कहा है।
आयुष्मान्भव सौम्येति वाच्यो विप्रोऽभिवादने।
अकारश्चास्य नाम्नोऽन्ते वाच्यः पूर्वाक्षरः प्लुतः ।। 128 ।।
गुरु आदि श्रेष्ठ लोगों को अपने अभिवादन के उत्तर में ब्राह्मण से- 'सौम्य आयुष्मान भव' कहना चाहिए। अगर 'सौम्य' कहने के स्थान पर अभिवादन करने वाले का नाम लिया जाए तो उसके नाम के अंतिम व्यञ्जन के स्वर को प्लुत (तीन मात्राओं वाला) कर देना चाहिए। इससे उस व्यक्ति के प्रति आदर भाव की अभिव्यक्ति होती है (जैसे- आयुष्मान भव शर्माऽऽऽ)।
यो न वेत्त्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम्।
नाभिवाद्यः स विदुषा यथा शूद्रस्तथैव सः ।। 129 ।।
जो ब्राह्मण यह भी नहीं जानता कि अभिवादन के उत्तर में किस तरह का आशीर्वाद देना चाहिए, उसे प्रणाम या नमस्कार आदि नहीं करना चाहिए क्योंकि वह नमस्कार के अयोग्य और शूद्र है।
ब्राह्मण कुशलं पृच्छेत्क्षत्रबन्धु मनामयम् ।
वैश्यं क्षेमं समागम्य शूद्रमारोग्यमेव च ॥ 130 ।।
मिलने के लिए आए ब्राह्मण से अभिवादन तथा आशीर्वाद के विनिमय के बाद ब्राह्मण से उसकी कुशलता, क्षत्रिय से उसकी नीरोगता (अनामय), वैश्य से उसका क्षेम तथा शूद्र से उसके स्वास्थ्य के बारे में पूछना चाहिए।
अवाच्यो दीक्षितो नाम्ना यवीयानपि यो भवेत्।
भोभवत्पूर्वकं त्वेनमभिभाषेत धर्मवित् ॥ 131 ।।
धर्म को जानने वाले ज्ञानवान पुरुष को चाहिए कि दीक्षित व्यक्ति चाहे उसकी आयु से छोटा क्यों न हो लेकिन वह उसका नाम लेकर कभी नहीं बुलाए। उसे सदैव 'भो' या 'भवत' शब्द से ही सम्बोधित करे।
परपत्नी तु या स्त्री स्यादसम्बद्धा च योनितः ।
तां ब्रूयाद्भवतीत्येवं सुभगे भगिनीति च ॥ 132 1
जो दूसरे की पत्नी हो तथा जिससे अपना किसी प्रकार से योनि सम्बंध (रक्त सम्बंध) नहीं हो (अर्थात् जो बहन आदि नहीं हो), उससे वार्तालाप करते समय 'भवति, सुन्दरि, भगिनी' आदि कहें।
मातुलांश्च पितृव्यांश्च श्वशुरानृत्विजो गुरून् ।
असावहमिति ब्रूयात्प्रत्युत्थाय यवीयसः ।। 133 ।।
गुरुजन, पूज्य पुरुष तथा मामा, चाचा, श्वसुर, यज्ञ कराने वाला कभी अपनी आयु से छोटे हों तब भी मिलने पर खड़े होकर उनका अभिवादन करना चाहिए तथा-यह मैं हूं- (मैं अमुक नाम वाला हूं।) कहकर अपना नाम-गोत्र आदि बताना चाहिए।
मातृष्वसा मातुलानी श्वश्रूरथ पितृष्वसा ।
सम्पूज्य गुरुपत्नीवत्समास्ताः गुरुभार्यया ।। 134 ।।
मां की बहन (मौसी), मामी, पत्नी की मां (सास), पिता की बहन (बुआ), ये चारों (मौसी, मामी, सास एवं बुआ) गुरु की पत्नी के समान पूज्य हैं।
भ्रातुर्भार्योपसङ्ग्राह्या सवर्णाऽहन्यहन्यपि ।
विप्रोष्य तूपसङ्ग्राह्या ज्ञातिसम्बन्धियोषितः ।। 135 ।।
अपने बड़े भाई की सवर्णा पत्नी (ब्राह्मण पुरुष द्वारा ब्राह्मण स्त्री से विवाह करने पर उसकी पत्नी सवर्णा कही जाती है।) को प्रतिदिन ही अभिवादन करना चाहिए। जाति वालों तथा सम्बंधियों की स्त्रियों को परदेश से जाने पर (या उनके परदेश से घर आने पर) प्रणाम करना चाहिए।
पितुर्भगिन्यां मातुश्च ज्यायस्यां च स्वसर्यपि। मातृववृत्तिमातिष्ठेन्माता ताभ्यो गरीयसी ।। 136 ।।
मां की बहन (मौसी), पिता की बहन (बुआ/ फूफी) तथा अपनी ज्येष्ठ बहन, तीनों को अपनी माता के समान आदर-सम्मान प्रदान करना चाहिए। यद्यपि यह निश्चित है कि इन तीनों से माता का पद उच्च है।
दशाब्दाख्यं पौरसख्यं पञ्चाब्दाख्यं कलाभृताम् ।
त्र्यब्दपूर्व श्रोत्रियाणां स्वल्पेनापि स्वयोनिषु ।। 137 ॥
एक ही नगरवासियों के साथ लगातार दस वर्ष तक रहने से, कलाकारों के साथ पांच वर्षों तक रहने से, वेदज्ञ ब्राह्मणों के साथ तीन वर्ष तक रहने से तथा अपने जाति के बन्धुबान्धवों के साथ कुछ दिनों तक रहने से मित्रता हो जाती है।
ब्राह्मणं दशवर्ष तु शतवर्ष तु भूमिपम्।
पितापुत्रौ विजानीयाद्ब्राह्मणस्तु तयोः पिता ।। 138 ।।
क्षत्रिय सौ वर्ष का वृद्ध हो और ब्राह्मण दस वर्ष का बालक हो तो भी उन दोनों में ब्राह्मण को पिता के समान और क्षत्रिय को पुत्र के समान समझना चाहिए। वास्तव में किसी भी आयु का ब्राह्मण पिता तुल्य होता है।
वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या भवति पञ्चमी।
एतानि मानस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम् ॥ 139 ।।
न्याय से अर्जित धन (चाचा, मामा आदि) जाति बन्धु, वेदों के अनुसार कार्य करने वाला आचारशील व्यक्ति, आयु में अपने से बड़ा और विद्या से युक्त पुरुष ये पांच आदर योग्य (मान्यता के) स्थान हैं अर्थात् इन पांचों को महत्व देना चाहिए। इनमें भी धन की तुलना में सम्बंध का, सम्बंध की अपेक्षा आचार का, आचार की तुलना में आयु का तथा आयु से विद्वता का अधिक महत्व है।
पञ्चानां त्रिषु वर्णेषु भूयांसि गुणवन्ति च।
यत्र स्युः सोऽत्रमानार्हः शूद्रोऽपि दशमीं गतः ।। 140 ।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य तीनों वर्णों के जिस व्यक्ति में उपर्युक्त श्लोक (श्लोक संख्या 139) में बताए गए पांचों गुणों में जितने ज्यादा गुण हों, उसे उतना अधिक आदरणीय मानना चाहिए। यदि शूद्र व्यक्ति भी सौ वर्ष की आयु का हो जाता है तो उसे भी आदरणीय मानना चाहिए क्योंकि आचारवान, बुद्धिमान और संयमी व्यक्ति ही उतनी आयु प्राप्त कर सकता है (अपने जीवन के दीर्घ अनुभव के कारण वह आदरणीय स्थान प्राप्त कर लेता है और उसके अनुभव से लाभ लेने में ही बुद्धिमानी है। इसी कारण मनु महाराज ने उसे आदरणीय माना है)।
चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः ।
स्नातकस्य च राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च ॥ 141 ।।
चक्र (पहिये) वाले रथ पर सवार व्यक्ति, नब्बे से अधिक उम्र वाले व्यक्ति, रोगी, बोझा उठाए हुए व्यक्ति, स्त्री, स्नातक, राजा तथा वर (दूल्हा) इन आठों को आगे जाने का मार्ग देना चाहिए और स्वयं एक ओर हट जाना चाहिए।
तेषां तु समवेतानां मान्यो स्नातकपार्थिवी।
राजस्नातकयोश्चैव स्नातको नृपमानभाक् ।। 142 ।।
उपर्युक्त श्लोक में बताए लोग अगर कहीं एक साथ एकत्रित हों तो उनमें सबसे अधिक महत्व उस व्यक्ति को देना चाहिए जो स्नातक है और उसके बाद राजा को महत्व देना चाहिए अर्थात इन दोनों को पहले मार्ग देना चाहिए। राजा और स्नातक अगर दोनों एक-दूसरे के सामने आ जाएं तो राजा के लिए यही उचित है कि वह स्नातक के लिए मार्ग छोड़ दे क्योंकि राजा के लिए स्नातक का सम्मान करना उपयोगी है।
उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद् द्विजः ।
संकल्पं सरहस्यं च तमाचार्य प्रचक्षते ।। 143 ।।
'आचार्य' उस ब्राह्मण को कहते हैं जो शिष्य का उपनयन संस्कार करके उसे अपने पास रखकर वेद का ज्ञान तथा यज्ञ-यागादि करने की विधि पढ़ाता तथा सिखाता है।
एकदेशं तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुनः ।
योऽध्यापयति वृत्त्यर्थमुपाध्यायः स उच्यते ।। 144 ॥
'उपाध्याय' वह ब्राह्मण कहलाता है जो अपनी आजीविका के साधन रूप में एक वेद या वेद के कुछ अंश अथवा वेदों के किन्हीं अंगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छन्द तथा ज्योतिष) के बारे में शिष्य को पढ़ाता है।
निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधिः ।
सम्भावयति चान्नेन सः विप्रो गुरुरुच्यते ।। 145 ।।
'गुरु' वह ब्राह्मण कहा जाता है जो अपने शिष्य के गर्भाधान आदि संस्कार कराता तथा अन्न से उसका पालन-पोषण करता है।
अग्न्याधेयं पाकयज्ञानग्निष्टोमादिकान्मखान् ।
यः करोति वृतो यस्य स तस्यत्र्विगिहोच्यते ।। 146 ।।
'ऋत्विक' उस ब्राह्मण को कहते हैं जो यज्ञकर्म के लिए अग्नि का आह्वान करके उसे उत्पन्न करता है, पाक यज्ञ, बलिवैश्वदेव आदि तथा अग्निष्टोम आदि यज्ञों को पूरा करने के लिए उसे वरण किया जाता है।
य आवृणोत्यवितथं ब्रह्मणा श्रवणावुभौ ।
स माता स पिता ज्ञेयस्तं न द्रुह्येत्कदाचन ।। 147 ।।
वह ब्राह्मण माता-पिता के तुल्य सम्माननीय होता है जो वेद विद्या को पढ़ाकर अपने शिष्य के दोनों कानों को पवित्र करता है।
उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता ।
सहस्त्रं तु पितृन्माता गौरवेणातिरिच्यते ।। 148 ।।
एक आचार्य का सौ उपाध्यायों से. पिता का सौ आचार्यों से और माता का एक हजार पिताओं से भी अधिक गौरव है।
उत्पादकब्रह्मदात्रोर्गरीयान् ब्रह्मदः पिता ।
ब्रह्मजन्म हि विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ।। 149 ।।
जन्म देने वाले और वेद विद्या पढ़ाने वाले दोनों ही व्यक्ति पिता कहलाते हैं, परन्तु वेद विद्या के ज्ञान से शिष्य का यह लौकिक जीवन और परलोक दोनों ही सुधरते हैं। अतः वेद विद्या का ज्ञान देने वाले का महत्व अधिक है।
कामान्माता पिता चैनं यदुत्पादयतो मिथः ।
सम्भूतिं तस्य तां विद्याद्यद्योनावभिजायते ।। 150 ।।
काम के वश में आकर माता-पिता जब संभोग करते हैं और उसके फलस्वरूप मां के गर्भवती हो जाने से बालक का जन्म होता है। इस प्रकार माता-पिता द्वारा संतान को जन्म देना एक संयोग मात्र है। संतान प्राप्ति की इच्छा से माता-पिता द्वारा संभोग किए जाने पर भी उन्हें काम तृप्ति मिलती है।
आचार्यस्त्वस्य यां जातिं विधिवद्वेदपारगः ।
उत्पादयति सावित्र्या सा सत्या साऽजरामरा ।। 151 ।।
उपर्युक्त श्लोक में बताई पिता की स्थिति के विपरीत वेद ज्ञाता ब्राह्मण अपने शिष्य को गायत्री उपदेश देकर उसे दूसरा जन्म देता है, तभी शिष्य द्विज कहलाता है। इस भांति वेदज्ञ ब्राह्मण द्वारा दिया गया दूसरा जन्म सत्य, अजर तथा अमर है। ब्रह्म ज्ञान पाने से द्विज अपने सच्चे तथा अमृतत्व रूप को पहचानता है। अतः आचार्य का महत्व पिता से अधिक है। पिता उसे शूद्र रूप में उत्पन्न करता है पर आचार्य उसे 'द्विज' के उच्च आध्यात्मिक वर्ग में लाता है।
अल्पं वा बहु वा यस्य श्रुतस्योपकरोति यः ।
तमपीह गुरुं विद्याच्छुतोपक्रियया तया ।। 152 ॥
ब्रह्मचारी को चाहिए कि वह वेद का आंशिक ज्ञान कराने वाले उपाध्याय को भी इस उपकार के फलस्वरूप गुरु के रूप में माने। वास्तव में वेद का ज्ञान रूपी प्रकाश सर्वश्रेष्ठ उपकार है जिसका प्रतिदान करना असम्भव है।
ब्राह्मस्य जन्मनः कर्त्ता स्वधर्मस्य च शासिता ।
बालोऽपि विप्रो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः ।। 153 ।।
वेद सुनने योग्य जन्म करने वाला अर्थात् शूद्र से द्विज बनाने वाला और अपने धर्म का उपदेश देने वाला ब्राह्मण चाहे बालक हो वह धर्म के अनुसार वृद्ध व्यक्ति के लिए भी पिता के समान आदरणीय होता है।
अध्यापयामास पितृन् शिशुरङ्गिरसः कविः ।
पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्य तान् ॥ 154 ॥
अङ्गिरस के वेदज्ञ पुत्र ने अपनी आयु से भी बड़े चाचा, मामा आदि को वेद विद्या का ज्ञान दिया और उन्हें 'हे पत्रों' कहकर सम्बोधित किया क्योंकि वह ज्ञान के क्षेत्र में उनसे बड़ा था।
ते तमर्थमपृच्छन्त देवानागतमन्यवः ।
देवाश्चैतान्समेत्यो चुर्याय्यं वः शिशुरुक्तवान् । 155 ।।
इस पर अङ्गिरस के बड़ी आयु के पितृव्यों ने क्रोधित होकर देवताओं से पूछा कि 'हे पुत्र' का क्या अर्थ होता है। देवताओं ने उन्हें समझाया और एकमत से बताया कि अङ्गिरस ने आप लोगों को जो 'हे पुत्र' कहा है, वह न्यायोचित है। ज्ञान युक्त बालक भी अज्ञानी वृद्धों के लिए माननीय होता है।
अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः ।
अज्ञं हि बाल इत्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ॥ 156 ।।
जो ज्ञानरहित है वही बालक है और उसे वेद मंत्र पढ़ाने वाला ही उसका पिता है। अतः शिक्षा और ज्ञान देने वाला पिता तुल्य है। कहने का तात्पर्य यह कि व्यवित की आयु नहीं वरन् उसकी ज्ञानोपलब्धि महत्वपूर्ण होती है।
न हायनैर्न पलितैर्न वित्ते न बन्धुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्म योऽनूचानः स नो महान् ॥ 157 ।।
ज्ञान और आचरण का आयु, बालों की सफेदी, धन एवं उच्च कुल आदि से अधिक महत्व है। आशय यह है कि जो व्यक्ति ज्ञानवान तथा उच्च आचरण वाला है वह अपने से बड़ी आयु के लोगों, वृद्धजनों, धनवानों और ऊंचे कुल में जन्म लेने वालों की अपेक्षा समाज के लिए अधिक उपयोगी है, अतः अधिक महत्वपूर्ण भी।
विप्राणां ज्ञानतो ज्येष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः ।
वैश्यानां धान्यधनतः शूद्राणामेव जन्मतः ।। 158 ॥
ब्राह्मण के सम्मान का आधार उसका ज्ञान है. क्षत्रिय के सम्मान का आधार उसकी वीरता-पराक्रम है, वैश्य का सम्मान उसकी धन-सम्पत्ति पर आधारित रहता है। शूद्रों का सम्मान अपने वर्णानुसार स्वाभाविक कर्मों को करने से होता है।
न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः।
यो वै युवाऽप्यधीयानस्तं देवाःस्थविरं विदुः ।। 159 ।।
व्यक्ति के बाल सफेद होने से वह बड़ा नहीं होता अर्थात् आदरणीय नहीं हो जाता। युवा व्यक्ति भी ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद, बुद्धिमान लोगों की दृष्टि में सम्मान योग्य हो जाता है।
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः ।
यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति ॥ 160 ॥
शिक्षा हीन ब्राह्मण काष्ठ (लकड़ी) के हाथी और चमड़े के हिरन के समान निरर्थक है। इन तीनों का कोई महत्व नहीं है क्योंकि वे नाम के लिए ही ब्राह्मण, हाथी या हिरन हैं, सचमुच में नहीं।
यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौर्गवि चाफला।
यथा चाऽज्ञेऽफलं दानं तथा विप्रोऽनृचोऽफलः ।। 161 ॥
जैसे नपुंसक व्यक्ति स्त्रियों को काम सुख देने में अयोग्य होने के कारण उनके लिए निष्फल है, जैसे गायों में गाव (जिसका अण्डकोश निकाल दिया जाता है ताकि वह मैथुन और गर्भाधान नहीं कर सके) निष्फल है तथा जैसे अज्ञानी को दान देने से वह निष्फल हो जाता है, उसी प्रकार वेद ज्ञान से रहित ब्राह्मण निरर्थक है।
अहिंसयैव भूतानां कार्य श्रेयोऽनुशासनम् ।
वाक् चैव मधुरा श्लक्ष्णा प्रयोज्या धर्ममिच्छता ।। 162 ।।
धर्मात्मा व्यक्ति (जैसे आचार्य, गुरु, प्रवचन कर्ता आदि) को अपनी शिक्षा देने का कार्य अहिंसा द्वारा करना चाहिए अर्थात् उसे शारीरिक या मानसिक दण्ड देने के बजाय समझाने-बुझाने का उपाय अपनाना चाहिए। उसे प्राणियों को उपदेश देने के लिए प्रिय एवं मधुर वाणी का ही उपयोग करना चाहिए।
यस्य वाङ्मनसी शुद्धे सम्यग्गुप्ते च सर्वदा।
स वै सर्वमवाप्नोति वेदान्तोपगतं फलम् ॥ 163 ॥
जिसका मन तथा वाणी सब प्रकार से शुद्ध हैं और उसके वश में हैं, ऐसा ही प्राणी वेदान्त के सभी फलों को प्राप्त कर लेता है।
नारुन्तुदः स्यादात्तोंऽपि न परद्रोहकर्मधीः ।
यथाऽस्योद्विजते वाचा नालोक्यां तामुदीरयेत् ।। 164 ॥
स्वयं दुःखी होने पर भी किसी दूसरे व्यक्ति को दुःख नहीं दे, दूसरे को हानि पहुंचाने का विचार तक नहीं करे तथा जिस वचन से कोई दुःखी हो सकता है, ऐसा स्वर्ग पाने में बाधा डालने वाला वचन नहीं कहे।
सम्मानाद्ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव ।
अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा ।। 165 ।।
ब्राह्मण को सम्मान पाने से सदा बचने का प्रयत्न करना चाहिए और उसे विषतुल्य समझना चाहिए। इसके विपरीत अपमान की सदैव इच्छा करे और अपमान करने वाले को क्षमा कर दे। इस श्लोक में ब्राह्मण को सामाजिक मान-अपमान से ऊपर उठकर जीवन जीने की प्रेरणा दी गई है, ताकि वह अपने तटस्थ दृष्टिकोण के कारण समाज को लाभ पहुंचा सके।
सुखं ह्यवमतः शेते सुखं च प्रतिबुध्यते।
सुखं चरति लोकेऽस्मिन्नवमन्ता विनश्यति ।। 166 ॥
दूसरों द्वारा अपमान किए जाने पर भी क्षमा कर देने वाला मनुष्य सुख से सोता है, सुख सहित जागता है तथा सुखपूर्वक ही इस संसार में विहार करता है परन्तु अपमान करने वाला मनुष्य अपने द्वारा किए गए पाप से नष्ट हो जाता है।
अनेन क्रमयोगेन संस्कृतात्मा द्विजः शनैः ।
गुरौ वसन् सञ्चिनुयाद्ब्रह्माधिगमिकं तपः ।। 167 ।।
जात कर्म से लेकर उपनयन तक संस्कार प्राप्त द्विज गुरुकुल में रहता हुआ वेद ज्ञान प्राप्त करने के लिए आगे बताए जाने वाले तप का संग्रह करें।
तपोविशेषैर्विविधैर्ब्रतैश्च विधिचोदितैः ।
वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना ।। 168 ।।
द्विज को शास्त्रों में बताए गए अनेक तरह के विशेष तपों (जैसे-यम-नियम, गुरु सेवा, सत्य पालन, शाकाहार आदि) को करते हुए उपनिषदों एवं पूरी वेद विद्या को ग्रहण करना चाहिए।
वेदमेव सदाभ्यस्येत्तपस्तप्स्यन् द्विजोत्तमः ।
वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते ॥ 169 ।।
इस जगत में वेदों की शिक्षानुसार अपने जीवन को व्यतीत करने से बड़ा कोई तप नहीं है। अतः अगर श्रेष्ठ ब्राह्मण वास्तव में तप करना चाहता है तो उसे वेदों का अध्ययन करना चाहिए।
आ हैव स नखाग्रेभ्यः परमं तप्यते तपः ।
यः स्त्रग्व्यपिद्विजोऽधीते स्वाध्यायं शक्तितोऽन्वहम् ।। 170 ।।
वह ब्राह्मण सिर से लेकर पैर के नाखून तक कठोर तपस्या करता है जो गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट होने के बाद भी प्रतिदिन अपनी सामर्थ्यानुसार वेदों का स्वाध्याय करता है। आशय यह है कि वेदाध्ययन करना तपस्या करने के समान है।
योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ।। 171 ।।
जो ब्राह्मण अन्यान्य कार्यों (यज्ञ, जप आदि) में प्रवृत्त होकर वेदों का स्वाध्याय करना छोड़ देता है, वह जीते हुए भी अपने वंशसहित शूद्र बन जाता है। कहने का आशय यह है कि ब्राह्मण का प्रमुख कर्तव्य वेदों का अध्ययन करना है।
मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जिबन्धने।
तृतीयं यज्ञदीक्षायां द्विजस्य श्रुतिचोदनात् ॥ 172 ।।
वेद वाक्यानुसार ब्राह्मण का तीन बार जन्म होता है- प्रथम मातृगर्भ से, द्वितीय यज्ञोपवीत संस्कार द्वारा, तृतीय यज्ञ दीक्षा द्वारा।
तत्र यद् ब्रह्मजन्मास्य मौञ्जीबन्धनचिह्नितम् ।
तत्रास्य माता सावित्री पितात्वाचार्य उच्यते ।। 173 ।।
पूर्व श्लोक में वर्णित तीन जन्मों में द्विज का यज्ञोपवीत संस्कार रूपी जो दूसरा जन्म होता है उसमें बालक की माता गायत्री (सावित्री) और पिता (यज्ञोपवीत कराने वाला) आचार्य होते हैं।
वेद प्रदानादाचार्यं पितरं परिचक्षते ।
न ह्यस्मिन् युज्यते कर्म किञ्चिदामौञ्जिबन्धनात् ॥ 174 ॥
ब्राह्मण को उपनयन संस्कार (मौञ्जीबन्धन) से पहले वेद में बताए किसी कर्म को करने का अधिकार नहीं। वह वेद में बताए यज्ञ आदि करने तथा वेद विद्या का अध्ययन करने का अधिकार मौञ्जीबन्धन के बाद ही प्राप्त करता है। इसीलिए वेद-विद्या को देने वाला आचार्य पिता कहलाता है।
नाभिव्याहरयेद् ब्रह्म स्वधानिनयनादृते ।
शूद्रेण हि समस्तास्तावद्यावद्वेदे न जायते ।। 175
बालक का उपनयन संस्कार जब तक न हो जाए उससे वेद मंत्रों का उच्चारण नहीं कराना चाहिए। वास्तव में उस समय तक वह शुद्र कहलाता है और शुद्र को वेद मंत्रों का जप करना मना है। बालक के पिता आदि का स्वर्गवास हो जाने पर उससे वेदमंत्रों का उच्चारण करवाया जा सकता है।
कृतोपनयनस्यास्य व्रतादेशनमिष्यते ।
ब्रह्मणो ग्रहणं चैव क्रमेण विधिपूर्वकम् ॥ 176 ।।
यज्ञोपवीत संस्कार होने पर व्रतों (हवन के लिए समिधा का लाना, दिन में निद्रा नहीं लेना) का पालन तथा वेद का उपदेश और ग्रहण क्रमशः विधिपूर्वक करना चाहिए लेकिन यह यज्ञोपवीत से पहले करना मना है।
यद्यस्य विहितं चर्म यत्सूत्रं या च मेखला।
यो दण्डो यच्च वसनं तत्तदस्य व्रतेष्वपि ॥ 177 ।।
उपनयन संस्कार में जिस वर्ण के बालक हेतु जिस प्रकार का चर्म, सूत्र, मेखला तथा दण्ड धारण करने का निर्देश किया गया है, अन्य समस्त प्रकार के व्रतों में उन्हीं वस्तुओं को धारण करने का विधान समझना चाहिए।
सेवेतेमांस्तु नियमान् ब्रह्मचारी गुरौ वसन्।
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं तपोवृद्धयर्थमात्मनः ।। 178 ।।
ब्रह्मचारी गुरु के पास रहते हुए अपनी सभी इन्द्रियों पर पूरा नियंत्रण रखे। आगे बताए गए नियमों का अपने तप की सिद्धि के लिए दृढ़ता से पालन करे।
नित्यं स्नात्वा शुचिः कुर्याद्देवर्षिपितृतर्पणम् ।
देवताभ्यर्चनं चैव समिदाधानमेव च ॥ 179 ॥
ब्रह्मचारी को नित्य स्नान करने के बाद पवित्र होकर देवताओं, ऋषियों एवं पितरों का जल द्वारा तर्पण करना चाहिए। समिधाओं को लेकर यज्ञ-हवन द्वारा देवताओं का पूजन करना चाहिए।
वर्जयेन्मधु मांसं च गन्धं माल्यं रसान् स्त्रियः ।
शुक्तानि यानि सर्वाणि प्राणिनां चैव हिंसनम्॥ 180 ।।
ब्रह्मचारी को निम्नलिखित वस्तुओं को पूरी तरह त्याग देना चाहिए-मधु (शहद), मांस, सुगन्धित द्रव्य, पुष्पहार, खट्टी-मीठी चटपटी चीजें, स्त्रियों की संगत, सड़े पदार्थ (जैसे मदिरा, सिरका आदि) तथा जीव हिंसा।
अभ्यङ्गमञ्जनं चाक्ष्णोरुपानच्छत्रधारणम् ।
कामं क्रोधं च लोभं च नर्तनं गीतवादनम् ॥ 181 ॥
ब्रह्मचारी को मनोविकार उत्पन्न करने वाले निम्नलिखित कार्य नहीं करने बाहिए- शरीर में तेल-घृत मलना, उबटन लगाना, आंखों में अंजन या काजल लगाना, पैरों में जूता पहनना, सिर पर छाता लगाना, काम, क्रोध, लोभ करना, नाचना गाना या संगीत वाद्य बजाना।
द्यूतं च जनवादं च परिवादं तथाऽनृतम्।
स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भावुपघातं परस्य च ॥ 182 ।।
जुआ खेलने में, लोगों के साथ झगड़ा करने में, दूसरों की बुराई या निन्दा करने में, झूठ बोलने में, स्त्रियों को देखने और उनके साथ हंसी-मजाक करने में, दूसरों को चोट मारने या उनका वध करने में कभी प्रवृत्त नहीं होना चाहिए।
एकः शयीत सर्वत्र न रेतः स्कन्दयेत्क्वचित्।
कामाद्धि स्कन्दयन् रेतो हिनस्ति व्रतमात्मनः ।। 183 ।।
ब्रह्मचारी को हमेशा अकेला सोना चाहिए और कामवासना में न तो प्रवृत्त होना चाहिए और न कामुक चिन्तन करना चाहिए। उसे अपना वीर्यपात नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे उसके ब्रह्मचर्य व्रत का नाश होता है।
स्वप्ने सिक्त्वा ब्रह्मचारी द्विजः शुक्रमकामतः । स्नात्वाऽर्कमर्चयित्वा त्रिः पुनर्मामित्यूचं जपेत् ।। 184 ।।
यदि ब्रह्मचारी को सोते हुए स्वप्न दोष हो जाता है और उसका वीर्यपात हो जाता है तो उसे स्नान करने के बाद सूर्य का पूजन तथा तीन बार 'पुनर्मामित्वेन्द्रियम...' मंत्र का जप करना चाहिए।
उदक्कुम्भं सुमनसो गोशकृन्मृत्तिकाकुशान् ।
आहरेद्यावदर्थानि भैक्षं चाहरहश्चरेत् ।। 185 ।।
ब्रह्मचारी आवश्यकता के अनुसार प्रतिदिन पानी का घड़ा, फूल, गोबर, मिट्टी और कुश लाए। कहने का आशय यह है कि प्रतिदिन गुरु, गुरुकुल और व्यक्तिगत आवश्यकतानुसार ये वस्तुएं लाए, उनका संग्रह नहीं करे। वह प्रतिदिन भोजन के लिए भिक्षा मांगकर लाए।
वेदयज्ञैरहीनानां प्रशस्तानां स्वकर्मसु ।
ब्रह्मचार्याहरे ट्रैक्षं गृहेभ्यः प्रयतोऽन्वहम् ।। 186 ॥
होता है। उसे ब्रह्मचारी को प्रत्येक दिन नियम के अनुसार ऐसे घरों से भीख मांग कर लानी चाहिए जहां यज्ञों का आयोजन किया जाता है एवं वेदों का अध्ययन। ऐसे घरों से भिक्षा लानी चाहिए जो धार्मिक नित्य कर्मों के कारण समाज में भली
प्रकार प्रतिष्ठित है। जिन घरों में वेदों का स्वाध्याय नहीं होता और यज्ञों का अनुष्ठान नहीं किया जाता वहां से भिक्षा नहीं लेनी चाहिए।
गुरोः कुले न भिक्षेत न ज्ञातिकुलबन्धुषु ।
अलाभे त्वन्यगेहानां पूर्व पूर्व विवर्जयेत् ।। 187 ।।
अपने गुरु, अपनी जाति तथा वंश वालों एवं बन्धु-बान्धवों के घरों से ब्रह्मचारी को भीख नहीं मांगनी चाहिए। अगर कभी दूसरों के घरों से भीख नहीं मिले तो पहले बन्धु-बांधवों के घरों से, वहां से नहीं प्राप्त होने पर कुलजनों से, वहां से भी न प्राप्त होने पर अपनी जाति वालों से और वहां से भी निराश होने पर गुरु के घर में भिक्षा मांगनी चाहिए।
सर्वं वाऽपि चरेद् ग्रामं पूर्वोक्तानामसम्भवे।
नियम्य प्रयतो वाचमभिशस्तांस्तु वर्जयेत् ॥ 188 ॥
पूर्वोक्त श्लोकों में बताए योग्य गृहों से भिक्षा नहीं मिलने पर अथवा ऐसे घरों के न होने पर ब्रह्मचारी को गांव के किसी भी घर से भिक्षा ग्रहण कर लेनी चाहिए। परन्तु उसे भिक्षा के लिए वाणी का दुरुपयोग (जैसे गिड़गिड़ाना या अपने को हीन बताना) नहीं करना चाहिए और न ही महापापी लोगों के घरों से भिक्षा ले।
दूरादाहृत्य समिधः सन्निदध्याद्विहायसि ।
सायंप्रातश्च जुहुयात्ताभिरग्निमतन्द्रितः ।। 189 ।।
दूर से समिधा लाकर अर्थात् जहां से वे मिल जाएं, वहां से लाकर किसी ऊंची जगह पर उन्हें रख दे, तत्पश्चात् उन समिधाओं से प्रातःकाल और सायंकाल हवन करे।
अकृत्वा भैक्षचरणमसमिध्य च पावकम् ।
अनातुरः सप्तरात्रमवकीर्णिव्रतं चरेत् ॥ 190 ।।
अगर स्वस्थ रहते हुए भी कोई ब्रह्मचारी सात दिन तक बिना भिक्षा याचना किए तथा बिना हवन किए रहता है तो उसे प्रायश्चित करने हेतु 'अवकीर्णि' नामक व्रत करना चाहिए।
भैक्षेण वर्त्तयेन्नित्यं नैकान्नादी भवेद्वती।
भैक्षेण व्रतिनो वृत्तिरुपवाससमा स्मृता ।। 191 ।।
ब्रह्मचारी को अनेक घरों से भिक्षा याचना करके अपनी क्षुधा पूर्ति करनी चाहिए, कभी किसी एक ही घर से भिक्षा लेकर क्षुधा पूर्ति नहीं करनी चाहिए।
महर्षियों के अनुसार भिक्षा में मिले भोजन को ग्रहण करने से ब्रह्मचारी की वृत्ति उपवास के समान हो जाती है।
व्रतवद्देवदैवत्ये पित्र्ये कर्मण्यथर्षिवत् । काममभ्यर्थितोऽश्नीयाद्वतमस्य न लुप्यते ।। 192 ॥
अगर किसी ब्रह्मचारी को ऋषि के रूप में देवयज्ञ और पितृकर्म (श्राद्ध) आदि से सम्बंधित ब्रह्म भोज में बुलाया जाता है तो उस दिन केवल एक घर के भोजन द्वारा क्षुधा शांत करने पर भी वह अपने व्रत में ही स्थित रहता है।
ब्राह्मणस्यैव कर्मैतदुपदिष्टं मनीषिभिः ।
राजन्यवैश्ययोस्त्वेवं नैतत्कर्म विधीयते ॥ 193 ।
पूर्वोक्त श्लोक में वर्णित कर्म केवल ब्राह्मण ब्रह्मचारी के लिए है, क्षत्रिय अथवा वैश्य ब्रह्मचारी के लिए यह विधान नहीं है।
चोदितो गुरुणा नित्यमप्रचोदित एव वा।
कुर्यादध्ययने यत्नमाचार्यस्य हितेषु च ॥ 194 ।।
आचार्य आज्ञा दे या नहीं दे, ब्रह्मचारी का यह कर्तव्य है कि वह प्रतिदिन यत्न सहित अध्ययन करे और आचार्य की सेवा करने में लगा रहे। प्रतिदिन आचार्य के निर्देश की प्रतीक्षा नहीं करे वरन् एक बार वह जो आज्ञा दे उसे भली प्रकार समझकर नित्य उसका पालन करे।
शरीरं चैव वाचं च बुद्धीन्द्रियमनांसि च।
नियम्य प्रञ्जलिस्तिष्ठेद्वीक्षमाणो गुरोर्मुखम् ॥ 195 ।।
ब्रह्मचारी को अपने तन-मन, बुद्धि, वाणी और सभी इन्द्रियों पर संयम रखकर हाथ जोड़कर और नम्रता भरे भाव से गुरु के सामने रहना और आदेश पाने के लिए उनका मुख देखते रहना चाहिए।
नित्यमुद्धृतपाणिः स्यात्साध्वाचारः सुसंवृतः ।
आस्यतामिति चोक्तः सन्नासीताभिमुखं गुरोः ॥ 196 ॥
ब्रह्मचारी को गुरु के द्वारा अनुमति मिलने पर कि वह बैठ जाए, बैठना चाहिए। जब तक गुरु अनुमति नहीं दे उनके सम्मुख करबद्ध और विनम्र भाव से खड़ा रहे। ब्रह्मचारी को ऐसे समय अपना दाहिना हाथ सदैव अपनी चादर (ओढ़ने के वस्त्र) से बाहर निकालकर रखना चाहिए।
हीनान्नवस्त्रवेशः स्यात्सर्वदा गुरुसन्निधौ ।
उत्तिष्ठेत्प्रथमं चास्य नग्यं नैन संविशेत् ॥ 197 ।।
तथा सादा खान-पान अपनाना चाहिए। उसे हमेशा गुरु के सोने के बाद सोना और गुरु के सान्निध्य में (समीप) रहते हुए ब्रह्मचारी को सदैव सादी वेशभूषा गुरु के जाग्रत होने से पूर्व जाग जाने का अभ्यास करना चाहिए।
प्रतिश्रवणसम्भाषे शयानो न समाचरेत् ।
नासीनो न च भुञ्जानो न तिष्ठन्न पराङ्मुखः ।। 198 ।।
गुरु से वार्तालाप करते समय ब्रह्मचारी को सोते हुए सा नहीं रहना चाहिए अर्थात पूर्णतः जागरूक रहना चाहिए। उसे लेटे या बैठे हुए भी नहीं रहना चाहिए तथा गुरु को पीठ नहीं दिखानी चाहिए।
आसीनस्य स्थितः कुर्यादभिगच्छंस्तु तिष्ठतः ।
प्रत्युद्गम्य त्वाव्रजतः पश्चाद्धावस्तु धावतः ।। 199 ॥
यदि आचार्य आसन पर बैठे हुए शिष्य को आज्ञा देते हों, उसे उनके सामने खड़े होकर सुनना चाहिए। अगर गुरु खड़े हों तो शिष्य को उनके निकट पहुंच जाना चाहिए। अगर शिष्य को गुरु या आचार्य उसकी ओर आते दिखाई दें, उसे दौड़ कर उनके पास जाना चाहिए। यदि आचार्य चलते-चलते बोल रहे हों, शिष्य को चाहिए कि वह उनके पीछे चलते हुए बात करे।
पराङ्मुखस्याभिमुखो दूरस्थस्यैत्य चान्तिकम् ।
प्रणम्य तु शयानस्य निदेशे चैव तिष्ठतः ।। 200 ।।
शिष्य का यह कर्तव्य है कि अगर आचार्य/ गुरु आज्ञा देते हुए अथवा अपने पीछे आते हुए दिखाई दें तो वह उनके सम्मुख जाकर खड़ा हो जाए। अगर वह दूर हों तो दौड़कर उनके पास पहुंच जाए और यदि वे शयन कर रहे हों तो उन्हें प्रणाम करके उनकी आज्ञा ध्यान से सुने। गुरु के साथ सिर झुकाकर बातचीत करे।
नीचं शय्यासनं चास्य नित्यं स्याद् गुरुसन्निधौ।
गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टासनो भवेत् ।। 201 ।।
ब्रह्मचारी के लिए यह बात ध्यान रखने योग्य है कि आचार्य की शय्या से उसकी शय्या नीची होनी चाहिए। उसे आचार्य (गुरु) के सम्मुख उनके आसन से ऊंचे आसन पर नहीं बैठना चाहिए। इसी तरह गुरु के सम्मुख यथाविधि आदरपूर्वक बैठना उचित है, मनमाने ढंग से नहीं।
नोदाहरेदस्य नाम परोक्षमपि केवलम् ।
न चैवास्यानुकुर्वीत गतिभाषितचेष्टितम् ।। 202 ।।
ब्रह्मचारी को गुरु की अनुपस्थिति में भी उनका नाम नहीं बोलना चाहिए और न उनके सम्मुख (उनका नाम) बोलना चाहिए। उसे भूलकर भी अपने गुरु की चाल-ढाल या बोलने की रीति की नकल नहीं करनी चाहिए।
परोक्षं सत्कृपापूर्वं प्रत्यक्षं न कथञ्चन।
दुष्टानुचारी न गुरोरिह वाऽयुत्र चैत्यधः ।। 203 ।।
गुरु के पीठ पीछे आदरपूर्वक उनके नाम का उच्चारण करे अर्थात् उनके नाम से पूर्व 'परम आदरणीय' या 'श्रीयुत परमपूज्य' आदि विशेषण लगाए। गुरु के सामने किसी भी प्रकार उनके नाम का उच्चारण नहीं करे। गुरु के साथ दुष्ट आचरण करने वाला शिष्य इस लोक तथा परलोक में अधोगति पाता है।
गुरोर्यत्र परिवादो निन्दा वापि प्रवर्तते।
कर्णों तत्र पिधातव्यौ गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः ।। 204 ।।
शिष्य को चाहिए कि जहां गुरु की बुराई या निन्दा की जा रही हो वह वहां से उठकर चला जाए या अपने कान बंद कर ले। कान बंद करने का आशय यह है कि गुरु निन्दा करने वाले से स्पष्ट कह दे कि वह उसकी बात सुनना नहीं चाहता।
मनु जी ने शिष्य को गुरु निन्दक से बहस करने अथवा उससे लड़ने की सलाह नहीं दी क्योंकि दोनों ही स्थितियों में बात का बतंगड़ बनने की अधिक संभावना होती है। चुप रहने, कान में उंगली डाल लेने या निन्दा को सुनने से मना कर देने पर गुरु निन्दा करने वाले के पास चुप रह जाने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं रहता। गुरु की निन्दा नहीं सुनने के फलस्वरूप शिष्य के मन में गुरु के प्रति कोई संदेह नहीं जन्म लेता।
परिवादात्खरो भवति श्वा वै भवति निन्दकः ।
परिभोक्ता कृमिर्भवति कीटो भवति मत्सरीः ।। 205 ।।
शिष्य द्वारा गुरु की बुराई करने पर वह मरने के बाद गधे की योनि में, गुरु के ऊपर झूठा दोष लगाने वाला कुत्ते की योनि में, गुरु के धन का भोग करने वाला कीट योनि में तथा गुरु से ईर्ष्या रखने वाला मकोड़े (मकोट) की योनि में जन्म लेता है।
दूरस्थो नार्चयेदेनं न कुद्धो नान्तिके स्त्रियाः ।
यानासनस्थ श्चैवैनमवरुह्याभिवादयेत् ।। 206 ॥
शिष्य को चाहिए कि वह कभी दूर से गुरु की पूजा नहीं करे वरन् उनके पास जाकर पूजा करे। गुरु की पूजा करते समय सदैव शांत मुद्रा में रहे, क्रोध की मुद्रा में की गई पूजा विपरीत फल देती है। शिष्य को उस समय भी गुरु की पूजा नहीं करनी चाहिए जब वे अपनी स्त्री के साथ हों।
अगर शिष्य किसी वाहन पर सवार हो अथवा आसन पर बैठा हो तो उससे उतर कर गुरु को नमस्कार करे।
अ स
प्रतिवातेऽनुवाते च नासीत गुरुणा सह।
असंनवे चैव गुरोर्न किञ्चिदपि कीर्तयेत् ॥ 207 11
प्रतिवात उस वायु को कहते हैं जो शिष्य की ओर से गुरु जहां उपस्थित हैं उस दिशा की ओर जाती है। अनुवात उस वायु को कहते हैं जो गुरु की ओर से शिष्य जिस दिशा में बैठा है उस तरफ जाती है। इन दोनों ही स्थितियों या जगहों पर शिष्य, गुरु के साथ नहीं बैठे। यदि वातावरण या स्थिति ऐसी हो कि गुरु शिष्य की बात नहीं सुन पाते हों अथवा वे स्वयं सुनना नहीं चाहते हों तो शिष्य कुछ नहीं बोले।
T
गोऽश्वोष्ट्रयानप्रासादप्रस्तरेषु कटेषु च।
आसीत् गुरुणा सार्द्ध शिलाफलकनौषु च ॥ 208 11
महाराज मनु के विचारानुसार शिष्य गुरु के साथ बैल (भैंसा), घोड़ा, ऊंट आदि से जुड़ी गाड़ियों (बैल गाड़ी, भैंसा गाड़ी, घोड़ा गाड़ी, ऊंट गाड़ी) में बैठ सकता है। इसके अतिरिक्त मकान की छत पर, पाषाण शिला पर, चटाई पर, लकड़ी या पत्थर की चौकी पर भी वह गुरु के साथ बैठ सकता है।
गुरोर्गुरौ सन्निहिते गुरुववृत्तिमाचरेत्।
न चानिसृष्टो गुरुणा स्वान्गुरूनभिवादयेत् ।। 209 ।।
शिष्य को अपने गुरु के भी गुरु के साथ वैसा ही सम्मानपूर्ण आचरण रखना चाहिए जैसा कि वह गुरु के साथ रखता है। गुरु के पास (गुरुकुल में) रहता हुआ शिष्य गुरु से अनुमति लिए बिना वहां आए अपने माता-पिता, चाचा आदि का भी अभिवादन नहीं करे।
विद्यागुरुष्वेवमेव नित्या वृत्तिः स्वयोनिषु।
प्रतिषेधत्सु चाधर्माद्धितं चोपदिशत्स्वपि ॥ 210 ।।
ब्रह्मचारी को चाहिए कि वह विद्या-गुरुओं के समान ही पिता, चाचा, मामा आदि तथा अधर्म से दूर रहने की प्रेरणा देने वालों एवं सद्मार्ग दिखलाने वालों का आदर-सम्मान करे।
श्रेयस्सु गुरुववृत्तिं नित्यमेव समाचरेत् ।
गुरुपुत्रे तथाऽऽचार्ये गुरोश्चैव स्वबन्धुषु ॥ 211 ॥
ब्रह्मचारी उन व्यक्तियों का, जो उसकी अपेक्षा विद्या तथा तप में श्रेष्ठ हैं, अवस्था में अपने से बडे गुरु पुत्र का और गुरु के बन्धुबान्धवों का अपने गुरु के समान ही आदर तथा सत्कार करे।
बालः समानजन्मा वा शिष्यो वा यजकर्मणि ।
अध्यापयन् गुरुसुतो गुरुवन्मानमर्हति ।। 212 ।।
गुरु पुत्र आयु में अपने से छोटा हो, समान आयु का हो, अध्ययन या अध्यापन कार्य करता हो, यज्ञ कर्म में ऋत्विक हो अथवा केवल यज्ञ दर्शन हेतु आया हो, वह गुरु के समान पूजनीय है।
उत्सादनं च गात्राणां स्नापनोच्छिष्ट भोजने। न कुर्याद्गुरुपुत्रस्य पादयोश्चावनेजनम् ॥ 213 ।।
शिष्य को चाहिए कि यद्यपि वह गुरु पुत्र का गुरु के समान ही आदर-सत्कार करे परन्तु गुरु पुत्र के शरीर में उबटन लगाने, उसे स्नान कराने, उसका जूठा भोजन करने तथा उसके पैर धोने के कार्यों को नहीं करे।
गुरुवत्प्रतिपूज्याः स्युः सवर्णाः गुरुयोषितः ।
असवर्णास्तु सम्पूज्याः प्रत्युत्थानाभिवादनैः ।। 214 ।।
गुरु की सवर्णा स्त्रियां (पत्नियां) गुरु के समान पूज्य हैं और गुरु की असवर्णा स्त्रियों (पत्नियों) को खड़े होकर नमस्कार करना चाहिए।
गुरु के समान आदर करने से आशय यह है कि शिष्य को गुरु की सवर्णा पत्नियों (ब्राह्मण गुरु की ब्राह्मण कुल में उत्पन्न पत्नी) के आने पर उन्हें पाद्य, अर्घ्य तथा आचमन आदि देना चाहिए पर असवर्णा पत्नियों (ब्राह्मण गुरु की अन्य वर्णों जैसे-क्षत्रिय और वैश्य कुल में जन्मी पत्नी) को केवल खड़े होकर प्रणाम करना उचित है।
अभ्यञ्जनं स्नापनं च गात्रोत्सादनमेव च।
गुरुपल्याः न कार्याणि केशानां च प्रसाधनम् ।। 215 ।।
शिष्य इन कर्मों को नहीं करे जैसे गुरुपत्नी के शरीर पर उबटन लगाना, उसे नहलाना, उसके शरीर को दबाना, उसके बालों को संवारना या उसका श्रृंगार करना।
गुरुपत्नी तु युवतिर्नाभिवाद्येह पादयोः ।
पूर्णविंशतिवर्षेण गुणदोषौ विजानता ।। 216 ॥
बीस वर्षीय ब्रह्मचारी जिसे गुण-दोष का ज्ञान हो जाता है, उसे चाहिए कि गुरु की युवा पत्नी के चरणों का स्पर्श नहीं करे वरन् दूर से ही धरती का स्पर्श कर ले।
स्वभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम्।
अतोऽर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपश्चितः ।। 217 ।।
महाराज मनु युवा ब्रह्मचारी का युवती गुरुपत्नी से दूर रहने का कारण बताते हुए कहते हैं कि यह स्त्रियों का स्वभाव है कि वे पुरुषों को अपनी श्रृंगार चेष्टाओं द्वारा मोहित कर उनमें दूषण उत्पन्न कर देती हैं। अतः विद्वान पुरुष स्त्रियों के सम्बंध में असावधान नहीं रहते और उनसे दूर रहते हैं।
अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुनः ।
प्रमदा ह्युत्पथं नेतुं कामक्रोधवशानुगम् ।। 218 ।।
स्त्रियां काम एवं क्रोध के वश में हुए मूर्ख अथवा विद्वान पुरुष को बुरे मार्ग पर ले जाने में समर्थ होती हैं। अतः काम और क्रोध के वश में होते ही बुद्धिमान व्यक्ति भी अपना ज्ञान खो देता है।
मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत्। बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ।। 219 ।।
इन्द्रियां बहुत ही बलवान होती हैं। ये इन्द्रियां मूर्ख व्यक्ति को ही नहीं वरन् ज्ञानवान व्यक्ति को भी अपने वश में कर लेती हैं। अतः पुरुष युवा माता, बहन तथा पुत्री के साथ भी अधिक समय तक एकान्त में नहीं रहे।
कामं तु गुरुपत्नीनां युवतीनां युवा भुवि।
विधिवद्वन्दनं कुर्यादसावहमिति ब्रुवन् ।। 220 ।।
युवा शिष्य को चाहिए कि वह युवती गुरु पत्नी को बिना पृथ्वी का स्पर्श किए ही 'अमुक गोत्र और नाम वाला मैं आपको प्रणाम करता हूं' कहकर अभिवादन करे।
विप्रोष्य पादग्रहणमन्वहं चाभिवादनम् ।
गुरुदारेषु कुर्वीत सतां धर्ममनुस्मरन् ।। 221 ।।
युवा शिष्य प्रवास से लौटकर आने के पश्चात् पूज्य पुरुषों का चरण स्पर्श कर उन्हें प्रणाम करे और युवा गुरु पत्नियों को बिना चरण स्पर्श किए ही दूर से प्रणाम कर उनका अभिवादन करें।
यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति।
तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ।। 222 ।।
जिस प्रकार खनित्र (जमीन खोदने का यंत्र कुदाल) से धरती को खोदता हुआ मनुष्य पानी को प्राप्त कर लेता है अर्थात् जमीन को नीचे खोदते चले जाने से मनुष्य जिस तरह जल को पा लेता है उसी प्रकार गुरु की सेवा करते रहने से शिष्य गुरु की विद्या को प्राप्त कर लेता है।
मुण्डो वा जटिलो वा स्यादथवा स्याच्छिखाजटः ।
नैनं ग्रामेऽभिनिम्लोचेत्सूर्यो नाभ्युदयात् क्वचित् ।। 223 ।।
ब्रह्मचारी अपनी इच्छानुसार सिर पर जटा रख सकता है या सिर पूरी तरह मंडवा सकता है अथवा केवल शिखा (चोटी) मात्र रख सकता है। हां, ब्रह्मचारी को यह ध्यान रखना चाहिए उसे सूर्य उदय होते समय और सूर्यास्त के बाद किसी भी ग्राम में नहीं रहना है।
कहने का अभिप्राय यह है कि अगर ब्रह्मचारी किसी गांव में है तो सूर्य अस्त होने से पहले ही उसे अपने आश्रम में पहुंच जाना चाहिए तथा सूर्योदय से पहले अपने नित्यकर्म (सन्ध्या-वन्दना, हवन आदि) पूरे करके ही आश्रम से बाहर जाना चाहिए।
तं चेदभ्युदयात्सूर्यः शयानं कामचारतः । निम्लोचेद्वाऽप्यविज्ञानाज्जपन्नुपवसेद्दिनम् ।। 224 ।।
ब्रह्मचारी को हमेशा सूर्य के उदय होने से पहले जाग जाना चाहिए और सूर्य के अस्त हो जाने के बाद सोना चाहिए। अगर कभी वह इच्छापूर्वक सूर्योदय के बाद भी सोता रह जाए (बीमार या किसी कारणवण अस्वस्थ होने के कारण नहीं।) या सूर्यास्त से पूर्व सो जाए तो उसे पूरे दिन उपवास रखते हुए गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए।
सूर्येण ह्यभिनिम्लुक्तः शयानोऽभ्युदितश्च यः ।
प्रायश्चित्तमकुर्वाणः युक्तः स्यान्महतैनसा ।। 225 ।।॥
सूर्य के उदय होते समय तथा सूर्य के अस्त होते समय सोता रहने वाला और इसके लिए किसी तरह का प्रायश्चित नहीं करने वाला ब्रह्मचारी महापाप का भागी होता है।
आचम्य प्रयतो नित्यमुभे सन्ध्ये समाहितः ।
शुचौ देशे जपञ्जप्यमुपासीत यथाविधिः ।। 226 ।।
प्रतिदिन दोनों सन्ध्याओं (रात्रि और दिन की सांध्य वेला) में ब्रह्मचारी किसी पवित्र स्थान में बैठकर विधिपूर्वक सन्ध्या का अनुष्ठान करे।
यदि स्त्री यद्यवरजः श्रेयः किञ्चित्समाचरेत् ।
तत्सर्वमाचरेद्युक्तो यत्र चास्य रमेन्मनः ।। 227 ।।
स्त्री एवं शूद्र का शास्त्रानुकूल जिस विधान के अनुष्ठान में मन लगता हो अथवा परम्परा के अनुसार वे जो धर्मानुकूल नियमों का पालन करते हों, उन्हें वैसा ही करने देना उचित है।
धर्मार्थावुच्यते श्रेयः कामार्थों धर्म एव च।
अर्थ एवेह वा श्रेयस्त्रिवर्ग इति तु स्थितिः ।। 228 ।।
कोई आचार्य धर्म तथा धन को प्राप्त करने योग्य एवं कल्याणकारी मानते हैं।
दूसरे प्रकार के आचार्य काम तथा धन को ही मानव जीवन का लक्ष्य मानते हैं।
परन्तु मनु महर्षि के अनुसार पुरुषार्थता के कारण धर्म, अर्थ और काम तीनों हो मानव के लिए उपयोगी हैं, अतः प्राप्त करने योग्य हैं।
टिप्पणी यहां मनु महाराज ने संसार का भोग करने की इच्छा रखने वाले के लिए उपदेश दिया है। मोक्ष की अभिलाषा रखने वालों के लिए आगे कहा है।
आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः ।
माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता स्वो मूर्तिरात्मनः ।। 229 ।।
आचार्य ब्रह्म का रूप है, पिता प्रजापति का, माता पृथ्वी की और सहोदर भ्राता अपनी आत्मा का। इसका आशय यह है कि इसी रूप में आदर करना उचित है।
आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः ।
नार्त्तनाप्यवमन्तव्याः ब्राह्मणेन विशेषतः ।। 230 ॥
आचार्य, पिता, मां, सहोदर बड़े भाई का स्वयं कष्ट उठाकर भी कभी अपमान नहीं करे (द्विजाति के लोगों को इसका ध्यान रखना चाहिए विशेष रूप से ब्राह्मणों को)।
यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम्।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ।। 231 ।।
माता-पिता को मनुष्यों को जन्म देने तथा उनका पालन-पोषण करने में
जितने कष्ट होते हैं, उससे उऋण होने में कोई उनकी सौ वर्ष तक सेवा करता रहे फिर भी नहीं हो सकता।
तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा।
तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते ॥ 232 ।।
अतः माता-पिता तथा आचार्य को जो कार्य प्रिय हो तथा उन्हें संतोष देने वाले हो वही नित्य करे। इन तीनों के प्रसन्न होने पर सभी व्रतों का फल अपने आप मिल जाता है।
तेषां त्रयाणां शुश्रूषा परमं तप उच्यते।
न तैरनभ्यनुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत् ।। 233 ।।
उन तीनों अर्थात माता-पिता और आचार्य की सेवा-सुश्रूषा करना सर्वश्रेष्ठ तप है। इनके आदेश बिना व्यक्ति को कोई धार्मिक अनुष्ठान आदि नहीं करने चाहिए।
त एव हि त्रयो लोकास्त एव त्रय आश्रमाः ।
त एव हि त्रयो वेदास्त एवोक्तास्त्रयोऽग्नयः ।। 234 ।।
पुत्र तथा शिष्य के लिए माता-पिता एवं गुरु ही तीनों लोक (पृथ्वी, पाताल और अंतरिक्ष) हैं, वे ही तीनों आश्रम (ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थ) हैं, वे ही तीनों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद) हैं, वे ही तीनों अग्नि (गार्हपत्याग्नि, दक्षिणाग्नि तथा आहवनीयाग्नि) हैं।
टिप्पणी - महर्षि अंगिरा ने चौथा अथर्ववेद बनाया, उससे पहले तीन ही वेद माने जाते थे।
पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताऽग्निर्दक्षिणः स्मृतः ।
गुरुरावहनीयस्तु साऽग्नित्रेता गरीयसी ।। 235 ।।
माता दक्षिण नाम की, पिता गार्हपत्य नाम की और गुरु (आचार्य) आवहनीय नाम की अग्नि हैं। यह तीनों अग्नियां लोक प्रसिद्ध तीनों अग्नियों में श्रेष्ठ हैं।
त्रिष्वप्रमाद्यस्तेषु त्रीन्लोकान्विजयेद्गृही।
दीप्यमानः स्ववपुषा देववद्दिवि मोदते ।। 236 ।।
प्रमाद रहित होकर जो इन तीनों (माता-पिता एवं गुरु) की सेवा में संलग्न रहता है वह त्रिलोक विजेता होता है तथा अपने शरीर से प्रकाशमान होता हुआ देवताओं के समान सुखों को प्राप्त करता है।
इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्या तु मध्यमम् ।
गुरुशुश्रूषया त्वेवं ब्रह्मलोकं समश्नुते ।। 237 ।।
पुत्र मातृ भक्ति द्वारा इस लोक को, पितृ भक्ति से अंतरिक्ष लोक को और गुरु सेवा से ब्रह्म लोक को प्राप्त करता है।
सर्वे तस्यादृताः धर्मा यस्यैते त्रय आदृताः ।
अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याऽफलाः क्रियाः ।। 238 ।।
जिसने माता, पिता एवं गुरु इन तीनों की सेवा की और उनका सम्मान किया उसने सब धर्मों का सम्मान किया अर्थात सभी धर्म उसको फल देने वाले होते हैं। जिसने इन तीनों का अनादर किया. उसे किसी भी धार्मिक अनुष्ठान का फल नहीं मिलता।
यावत्त्रयस्ते जीवेयुस्तावन्नान्यं समाचरेत्।
तेष्वेव नित्यं शुश्रूषां कुर्यात्प्रियहिते रतः ।। 239 ।।
जब तक वे तीनों (माता-पिता एवं गुरु) जीवित रहें तब तक (उनकी आजा लिए बिना) अन्य धर्म को अपनी इच्छा से नहीं करे वरन् उन्हीं के हित में तथा उन्हें जो प्रिय हो वही करता रहे।
तेषामनुपरोधेन पारत्र्यं यद्यदाचरेत् ।
तत्तन्निवेदयेत्तेभ्यो मनोवचनकर्मभिः ।। 240 ।।
परलोक की सिद्धि के लिए माता-पिता एवं गुरु की आज्ञा से जो भी कार्य को उन्हें मन-वचन तथा कर्म से उन्हीं (माता, पिता तथा गुरु) को अर्पित कर दे।
त्रिष्वेतेष्विति कृत्यं हि पुरुषस्य समाप्यते।
एष धर्मः परः साक्षादुपधर्मोऽन्य उच्यते ।। 241 ।।
मनुष्य का सर्वोत्तम तथा परम धर्म माता-पिता तथा गुरु की सेवा करना ही है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी धर्म गौण हैं अर्थात् उनका इस धर्म के सामने कोई महत्व नहीं।
श्रद्दधानः शुभां विद्यामाददीतावरादपि ।
अन्त्यादपि परं धर्म स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ।। 242 ।।
श्रद्धा सहित अपनी तुलना में नीच व्यक्ति से भी श्रेष्ठ विद्या को सीख लेना चाहिए। चाण्डाल से भी उत्कृष्ट धर्म को प्राप्त करना चाहिए तथा नीच कुल से भी शुभ लक्षणों वाली कन्या रत्न को विवाह हेतु ग्रहण कर लेना चाहिए।
विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम्।
अमित्रादपि सवृत्तम्मेध्यादपि काञ्चनम् ।। 243 ।।
विवेकशील व्यक्ति विष में से भी अमृत निकाल लेता है, एक बालक से भी कल्याण करने वाला कथन ग्रहण कर लेता है, शत्रु से भी श्रेष्ठ आचरण सीख लेता है और गंदे या अपावन स्थान से भी सोना प्राप्त कर लेता है। कहने का तात्पर्य यह है कि बुद्धिमान व्यक्ति को गुण तथा वस्तु को महत्व देना चाहिए व्यक्ति या स्थान को नहीं।
स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम्।
विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥ 244 ॥
जहां कहीं या जिस किसी से (उच्च या नीच व्यक्ति, अच्छे अथवा बुरे स्थान आदि पर ध्यान दिए बिना) धर्म, रत्न, विद्या, पवित्रता, सुन्दर स्त्रियां, उपदेश तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के शिल्प मिलते हों, उन्हें बिना किसी संकोच के प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।
अब्राह्मणादध्ययनमापत्काले विधीयते।
अनुव्रज्या च शुश्रूषा यावदध्ययनं गुरोः ॥ 245 ।।
आपातकाल में, ब्राह्मण से अलग वर्ण (क्षत्रिय, वैश्य) के व्यक्ति से भी विद्या अध्ययन करने का विधान किया गया है। जब तक विद्या अध्ययन चलता रहे तब तक ब्राह्मण से भी इतर वर्ग के गुरु की भी सेवा करते रहना चाहिए।
नाऽब्राह्मणे गुरौ शिष्यो वासमात्यन्तिकं वसेत्।
ब्राह्मणे वाननूचाने काङ्क्षन्गतिमनुत्तमाम् ।। 246 ।।
गुरु अगर ब्राह्मण से भिन्न वर्ण का हो तो विद्या अध्ययन काल में शिष्य का गुरुकुल में निवास करना जरूरी नहीं है। इसी भांति अगर ब्राह्मण गुरु वेद-वेदाङ्ग के ज्ञान में कुशल नहीं हो तो यह शिष्य पर निर्भर है कि वह चाहे तो गुरुकुल में निवास करे अथवा नहीं करे।
यदि त्वात्यन्तिकं वासः रोचयेत गुरोः कुले।
युक्तः परिचरेदेनमाशरीरविमोक्षणात् ॥ 247 ॥
अगर शिष्य (जीवन भर ब्रह्मचारी रहकर) गुरुकुल में ही रहना चाहता हो तो उसे मृत्यु तक सावधानीपूर्वक गुरु की सेवा करनी चाहिए।
आसमाप्तेः शरीरस्य यस्तु शुश्रूषते गुरुम् ।
सः गच्छत्यञ्जसा विप्रो ब्रह्मणः सद्यः शाश्वतम् ।। 248 ।।
जो ब्रह्मचारी अपनी मृत्यु तक गुरु सेवा करता है, वह ब्राह्मण ब्रह्मचारी विनाश रहित ब्रह्म लोक को पाता है।
न पूर्व गुरवे किञ्चिदुपकुर्वीत धर्मवित्।
स्नास्यंस्तु गुरुणाऽऽज्ञप्तः शक्त्या गुर्वर्थमाहरेत् ।। 249 ॥
गुरु की अनुमति बिना और उनसे पहले स्नान को छोड़कर धर्माचरण के ज्ञाता ब्रह्मचारी को कोई दूसरा कार्य नहीं करना चाहिए। स्नान के बाद शिष्य को गुरु के स्नान हेतु जल लाना चाहिए।
क्षेत्रं हिरण्यं गामश्वं छत्रोपानहमासनम् ।
धान्यं शाकं च वासांसि गुरवे प्रीतिमावहेत् ॥ 250 ।।
शिष्य द्वारा गुरु को अत्यधिक प्रेम सहित ही भूमि, सोना, गाय, घोड़ा, छाता जूता, अनाज, शाक तथा वस्त्र आदि दिए जाने चाहिए।
आचार्ये तु खलु प्रेते गुरुपुत्रे गुणान्विते।
गुरुदारे सपिण्डे वा गुरुववृत्तिमाचरेत् ।। 251 ॥
गुरु के स्वर्गवासी होने पर शिष्य को गुरु के गुणवान पुत्र में, उसके नहीं होने पर गुरु पत्नी में, उसके भी अभाव में गुरु के सहोदर भाई में गुरुत्व रखना चाहिए।
एतेष्वविद्यमानेषु स्नानासनविहारवान् ।
प्रयुञ्जानोऽग्निशुश्रूषां साधयेद्देहमात्मनः ।। 252 ।।
गुरु, गुरु के पुत्र, गुरु की पत्नी तथा गुरु के सपिण्डी भाई आदि के नहीं रहने पर शिष्य को स्नान तथा होत्र आदि से अपने शरीर की साधना करते हुए अपने आपको ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बनाना चाहिए।
एवं चरित यो विप्रो ब्रह्मचर्यमविप्लुतः ।
स गच्छत्युत्तमस्थानं न चेह जायते पुनः ।। 253 ।।
इस तरह ऊपर बताई विधि से ब्रह्मचर्य आश्रम के नियमों का अनुसरण करने वाला ब्राह्मण ब्रह्म को उपलब्ध कर लेता है। वह इस पृथ्वी पर दोबारा जन्म नहीं लेता है। उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
॥ मनुस्मृति द्वितीय अध्याय सम्पूर्ण ॥
Shri Brihaspatidev Ji Vrat Katha
kathaShrijirasik
श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा
भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा राज्य करता था। वह नित्य गरीबों और ब्राह्मणों की सहायता करता था। यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही गरीबों को दान देती, न ही भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी दान देने से मना किया करती थी।
एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे, तो रानी महल में अकेली थी। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा माँगी रानी ने भिक्षा देने से इन्कार किया और कहा: हे साधु महाराज मैं तो दान पुण्य से तंग आ गई हूँ। मेरा पति सारा धन लुटाते रहिते हैं। मेरी इच्छा है कि हमारा धन नष्ट हो जाए फिर न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।
साधु ने कहा: देवी तुम तो बड़ी विचित्र हो। धन, सन्तान तो सभी चाहते हैं। पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर भी होने चाहिए। यदि तुम्हारे पास अधिक धन है तो भूखों को भोजन दो, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाओ, मुसाफिरों के लिए धर्मशालाएं खुलवाओ। जो निर्धन अपनी कुंवारी कन्याओं का विवाह नहीं कर सकते उनका विवाह करा दो। ऐसे और कई काम हैं जिनके करने से तुम्हारा यश लोक-परलोक में फैलेगा।
परन्तु रानी पर उपदेश का कोई प्रभाव न पड़ा। वह बोली: महाराज आप मुझे कुछ न समझाएं। मैं ऐसा धन नहीं चाहती जो हर जगह बाँटती फिरूं।
साधु ने उत्तर दिया यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तथास्तु! तुम ऐसा करना कि बृहस्पतिवार को घर लीपकर पीली मिट्टी से अपना सिर धोकर स्नान करना, भट्टी चढ़ाकर कपड़े धोना, ऐसा करने से आपका सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर वह साधु महाराज वहाँ से आलोप हो गये।
साधु के अनुसार कही बातों को पूरा करते हुए रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे, कि उसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई। भोजन के लिए राजा का परिवार तरसने लगा।
तब एक दिन राजा ने रानी से बोला कि हे रानी, तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूँ, क्योंकि यहाँ पर सभी लोग मुझे जानते हैं। इसलिए मैं कोई छोटा कार्य नहीं कर सकता। ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया। वहाँ वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा। इधर, राजा के परदेश जाते ही रानी और दासी दुःखी रहने लगी।
एक बार जब रानी और दासी को सात दिन तक बिना भोजन के रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी दासी से कहा: हे दासी! पास ही के नगर में मेरी बहिन रहती है। वह बड़ी धनवान है। तू उसके पास जा और कुछ ले आ, ताकि थोड़ी-बहुत गुजर-बसर हो जाए। दासी रानी की बहिन के पास गई।
उस दिन गुरुवार था और रानी की बहिन उस समय बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुन रही थी। दासी ने रानी की बहिन को अपनी रानी का संदेश दिया, लेकिन रानी की बड़ी बहिन ने कोई उत्तर नहीं दिया। जब दासी को रानी की बहिन से कोई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुःखी हुई और उसे क्रोध भी आया। दासी ने वापस आकर रानी को सारी बात बता दी। सुनकर रानी ने अपने भाग्य को कोसा।
उधर, रानी की बहिन ने सोचा कि मेरी बहिन की दासी आई थी, परंतु मैं उससे नहीं बोली, इससे वह बहुत दुःखी हुई होगी।
कथा सुनकर और पूजन समाप्त करके वह अपनी बहिन के घर आई और कहने लगी: हे बहिन! मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी। तुम्हारी दासी मेरे घर आई थी परंतु जब तक कथा होती है, तब तक न तो उठते हैं और न ही बोलते हैं, इसलिए मैं नहीं बोली। कहो दासी क्यों गई थी?
रानी बोली: बहिन, तुमसे क्या छिपाऊं, हमारे घर में खाने तक को अनाज नहीं था। ऐसा कहते-कहते रानी की आंखें भर आई। उसने दासी समेत पिछले सात दिनों से भूखे रहने तक की बात अपनी बहिन को विस्तार पूर्वक सुना दी।
रानी की बहिन बोली: देखो बहिन! भगवान बृहस्पतिदेव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं। देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो।
पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ पर बहिन के आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अंदर भेजा तो उसे सचमुच अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया। यह देखकर दासी को बड़ी हैरानी हुई।
दासी रानी से कहने लगी: हे रानी! जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, ताकि हम भी व्रत कर सकें। तब रानी ने अपनी बहिन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा।
उसकी बहिन ने बताया, बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं, व्रत कथा सुनें और पीला भोजन ही करें। इससे बृहस्पतिदेव प्रसन्न होते हैं। व्रत और पूजन विधि बताकर रानी की बहिन अपने घर को लौट गई।
सात दिन के बाद जब गुरुवार आया, तो रानी और दासी ने व्रत रखा। घुड़साल में जाकर चना और गुड़ लेकर आईं। फिर उससे केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया। अब पीला भोजन कहाँ से आए इस बात को लेकर दोनों बहुत दुःखी थे। चूंकि उन्होंने व्रत रखा था, इसलिए बृहस्पतिदेव उनसे प्रसन्न थे। इसलिए वे एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर दो थालों में सुन्दर पीला भोजन दासी को दे गए। भोजन पाकर दासी प्रसन्न हुई और फिर रानी के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया।
उसके बाद वे सभी गुरुवार को व्रत और पूजन करने लगी। बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास फिर से धन-संपत्ति आ गई, परंतु रानी फिर से पहले की तरह आलस्य करने लगी।
तब दासी बोली: देखो रानी! तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया और अब जब भगवान बृहस्पति की कृपा से धन मिला है तो तुम्हें फिर से आलस्य होता है।
रानी को समझाते हुए दासी कहती है कि बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए, भूखे मनुष्यों को भोजन कराना चाहिए, और धन को शुभ कार्यों में खर्च करना चाहिए, जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़ेगा, स्वर्ग की प्राप्ति होगी और पित्र प्रसन्न होंगे। दासी की बात मानकर रानी अपना धन शुभ कार्यों में खर्च करने लगी, जिससे पूरे नगर में उसका यश फैलने लगा।
बृहस्पतिवार व्रत कथा के बाद श्रद्धा के साथ आरती की जानी चाहिए। इसके बाद प्रसाद बांटकर उसे ग्रहण करना चाहिए।
एक दिन राजा दुःखी होकर जंगल में एक पेड़ के नीचे आसन जमाकर बैठ गया। वह अपनी दशा को याद करके व्याकुल होने लगा। बृहस्पतिवार का दिन था, एकाएक उसने देखा कि निर्जन वन में एक साधु प्रकट हुए। वह साधु वेष में स्वयं बृहस्पति देवता थे।
लकड़हारे के सामने आकर बोले: हे लकड़हारे! इस सुनसान जंगल में तू चिन्ता मग्न क्यों बैठा है?
लकड़हारे ने दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और उत्तर दिया: महात्मा जी! आप सब कुछ जानते हैं, मैं क्या कहूँ। यह कहकर रोने लगा और साधु को अपनी आत्मकथा सुनाई।
महात्मा जी ने कहा: तुम्हारी स्त्री ने बृहस्पति के दिन बृहस्पति भगवान का निरादर किया है जिसके कारण रुष्ट होकर उन्होंने तुम्हारी यह दशा कर दी। अब तुम चिन्ता को दूर करके मेरे कहने पर चलो तो तुम्हारे सब कष्ट दूर हो जायेंगे और भगवान पहले से भी अधिक सम्पत्ति देंगे। तुम बृहस्पति के दिन कथा किया करो। दो पैसे के चने मुनक्का लाकर उसका प्रसाद बनाओ और शुद्ध जल से लोटे में शक्कर मिलाकर अमृत तैयार करो। कथा के पश्चात अपने सारे परिवार और सुनने वाले प्रेमियों में अमृत व प्रसाद बांटकर आप भी ग्रहण करो। ऐसा करने से भगवान तुम्हारी सब मनोकामनाएँ पूरी करेंगे।
साधु के ऐसे वचन सुनकर लकड़हारा बोला: हे प्रभो! मुझे लकड़ी बेचकर इतना पैसा नहीं मिलता, जिससे भोजन के उपरान्त कुछ बचा सकूं। मैंने रात्रि में अपनी स्त्री को व्याकुल देखा है। मेरे पास कुछ भी नहीं जिससे मैं उसकी खबर मंगा सकूं।
साधु ने कहा: हे लकड़हारे! तुम किसी बात की चिन्ता मत करो। बृहस्पति के दिन तुम रोजाना की तरह लकड़ियाँ लेकर शहर को जाओ। तुमको रोज से दुगुना धन प्राप्त होगा, जिससे तुम भली-भांति भोजन कर लोगे तथा बृहस्पतिदेव की पूजा का सामान भी आ जायेगा।
इतना कहकर साधु अन्तर्ध्यान हो गए। धीरे-धीरे समय व्यतीत होने पर फिर वही बृहस्पतिवार का दिन आया। लकड़हारा जंगल से लकड़ी काटकर किसी शहर में बेचने गया, उसे उस दिन और दिन से अधिक पैसा मिला। राजा ने चना गुड आदि लाकर गुरुवार का व्रत किया। उस दिन से उसके सभी क्लेश दूर हुए, परन्तु जब दुबारा गुरुवार का दिन आया तो बृहस्पतिवार का व्रत करना भूल गया। इस कारण बृहस्पति भगवान नाराज हो गए।
उस दिन उस नगर के राजा ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया तथा शहर में यह घोषणा करा दी कि कोई भी मनुष्य अपने घर में भोजन न बनावे न आग जलावे समस्त जनता मेरे यहाँ भोजन करने आवे। इस आज्ञा को जो न मानेगा उसे फाँसी की सजा दी जाएगी। इस तरह की घोषणा सम्पूर्ण नगर में करवा दी गई।
राजा की आज्ञानुसार शहर के सभी लोग भोजन करने गए। लेकिन लकड़हारा कुछ देर से पहुँचा इसलिए राजा उसको अपने साथ घर लिवा ले गए और ले जाकर भोजन करा रहे थे तो रानी की दृष्टि उस खूंटी पर पड़ी जिस पर उसका हार लटका हुआ था। वह वहाँ पर दिखाई नहीं दिया। रानी ने निश्चय किया कि मेरा हार इस मनुष्य ने चुरा लिया है। उसी समय सिपाहियों को बुलाकर उसको कारागार में डलवा दिया।
जब लकड़हारा कारागार में पड़ गया और बहुत दुःखी होकर विचार करने लगा कि न जाने कौन से पूर्व जन्म के कर्म से मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ है, और उसी साधु को याद करने लगा जो कि जंगल में मिला था।
उसी समय तत्काल बृहस्पतिदेव साधु के रूप में प्रकट हुए और उसकी दशा को देखकर कहने लगे: अरे मूर्ख! तूने बृहस्पतिदेव की कथा नहीं करी इस कारण तुझे दुःख प्राप्त हुआ है। अब चिन्ता मत कर बृहस्पतिवार के दिन कारागार के दरवाजे पर चार पैसे पड़े मिलेंगे। उनसे तू बृहस्पतिदेव की पूजा करना तेरे सभी कष्ट दूर हो जायेंगे।
बृहस्पति के दिन उसे चार पैसे मिले। लकड़हारे ने कथा कही उसी रात्रि को बृहस्पतिदेव ने उस नगर के राजा को स्वप्न में कहा: हे राजा! तूमने जिस आदमी को कारागार में बन्द कर दिया है वह निर्दोष है। वह राजा है उसे छोड़ देना। रानी का हार उसी खूंटी पर लटका है। अगर तू ऐसा नही करेगा तो मैं तेरे राज्य को नष्ट कर दूंगा।
इस तरह रात्रि के स्वप्न को देखकर राजा प्रातःकाल उठा और खूंटी पर हार देखकर लकड़हारे को बुलाकर क्षमा मांगी तथा लकड़हारे को योग्य सुन्दर वस्त्र-आभूषण देकर विदा कर दिया। बृहस्पतिदेव की आज्ञानुसार लकड़हारा अपने नगर को चल दिया।
राजा जब अपने नगर के निकट पहुँचा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। नगर में पहले से अधिक बाग, तालाब, कुएं तथा बहुत सी धर्मशाला मन्दिर आदि बन गई हैं। राजा ने पूछा यह किसका बाग और धर्मशाला हैं, तब नगर के सब लोग कहने लगे यह सब रानी और बांदी के हैं। तो राजा को आश्चर्य हुआ और गुस्सा भी आया।
जब रानी ने यह खबर सुनी कि राजा आरहे हैं, तो उन्होंने बाँदी से कहा कि: हे दासी! देख राजा हमको कितनी बुरी हालत में छोड़ गए थे। हमारी ऐसी हालत देखकर वह लौट न जायें, इसलिए तू दरवाजे पर खड़ी होजा। आज्ञानुसार दासी दरवाजे पर खड़ी हो गई। राजा आए तो उन्हें अपने साथ लिवा लाई। तब राजा ने क्रोध करके अपनी रानी से पूछा कि यह धन तुम्हें कैसे प्राप्त हुआ है, तब उन्होंने कहा: हमें यह सब धन बृहस्पतिदेव के इस व्रत के प्रभाव से प्राप्त हुआ है।
राजा ने निश्चय किया कि सात रोज बाद तो सभी बृहस्पतिदेव का पूजन करते हैं परन्तु मैं प्रतिदिन दिन में तीन बार कहानी तथा रोज व्रत किया करूँगा। अब हर समय राजा के दुपट्टे में चने की दाल बँधी रहती तथा दिन में तीन बार कहानी कहता।
एक रोज राजा ने विचार किया कि चलो अपनी बहिन के यहाँ हो आवें। इस तरह निश्चय कर राजा घोड़े पर सवार हो अपनी बहिन के यहाँ को चलने लगा। मार्ग में उसने देखा कि कुछ आदमी एक मुर्दे को लिए जा रहे हैं, उन्हें रोककर राजा कहने लगा: अरे भाइयों! मेरी बृहस्पतिदेव की कथा सुन लो।
वे बोले: लो! हमारा तो आदमी मर गया है, इसको अपनी कथा की पड़ी है। परन्तु कुछ आदमी बोले: अच्छा कहो हम तुम्हारी कथा भी सुनेंगे। राजा ने दाल निकाली और जब कथा आधी हुई थी कि मुर्दा हिलने लग गया और जब कथा समाप्त हो गई तो राम-राम करके मनुष्य उठकर खड़ा हो गया।
आगे मार्ग में उसे एक किसान खेत में हल चलाता मिला। राजा ने उसे देख और उससे बोले: अरे भईया! तुम मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन लो। किसान बोला जब तक मैं तेरी कथा सुनूंगा तब तक चार हरैया जोत लूंगा। जा अपनी कथा किसी और को सुनाना। इस तरह राजा आगे चलने लगा। राजा के हटते ही बैल पछाड़ खाकर गिर गए तथा किसान के पेट में बड़ी जोर का दर्द होने लगा।
उस समय उसकी माँ रोटी लेकर आई, उसने जब यह देखा तो अपने पुत्र से सब हाल पूछा और बेटे ने सभी हाल कह दिया तो बुढ़िया दौड़ी-दौड़ी उस घुड़सवार के पास गई और उससे बोली कि मैं तेरी कथा सुनूंगी तू अपनी कथा मेरे खेत पर चलकर ही कहना। राजा ने बुढ़िया के खेत पर जाकर कथा कही, जिसके सुनते ही वह बैल उठ खड़ हुए तथा किसान के पेट का दर्द भी बन्द हो गया।
राजा अपनी बहिन के घर पहुँचा। बहिन ने भाई की खूब मेहमानी की। दूसरे रोज प्रातःकाल राजा जगा तो वह देखने लगा कि सब लोग भोजन कर रहे हैं।
राजा ने अपनी बहिन से कहा: ऐसा कोई मनुष्य है जिसने भोजन नहीं किया हो, मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन ले।
बहिन बोली: हे भैया! यह देश ऐसा ही है कि पहले यहाँ लोग भोजन करते हैं, बाद में अन्य काम करते हैं। अगर कोई पड़ोस में हो तो देख आउं।
वह ऐसा कहकर देखने चली गई परन्तु उसे कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसने भोजन न किया हो अतः वह एक कुम्हार के घर गई जिसका लड़का बीमार था। उसे मालूम हुआ कि उनके यहाँ तीन रोज से किसी ने भोजन नहीं किया है। रानी ने अपने भाई की कथा सुनने के लिए कुम्हार से कहा वह तैयार हो गया। राजा ने जाकर बृहस्पतिवार की कथा कही जिसको सुनकर उसका लड़का ठीक होगया, अब तो राजा की प्रशंसा होने लगी।
एक रोज राजा ने अपनी बहिन से कहा कि हे बहिन! हम अपने घर को जायेंगे। तुम भी तैयार हो जाओ। राजा की बहिन ने अपनी सास से कहा। सास ने कहा हाँ चली जा। परन्तु अपने लड़कों को मत ले जाना क्योंकि तेरे भाई के कोई औलाद नहीं है।
बहिन ने अपने भईया से कहा: हे भईया! मैं तो चलूंगी पर कोई बालक नहीं जाएगा।
राजा बोला: जब कोई बालक नहीं चलेगा, तब तुम ही क्या करोगी।
बड़े दुःखी मन से राजा अपने नगर को लौट आया।
राजा ने अपनी रानी से कहा: हम निरवंशी हैं। हमारा मुंह देखने का धर्म नहीं है और कुछ भोजन आदि नहीं किया।
रानी बोली: हे प्रभो! बृहस्पतिदेव ने हमें सब कुछ दिया है, वह हमें औलाद अवश्य देंगे।
उसी रात को बृहस्पतिदेव ने राजा से स्वप्न में कहा: हे राजा उठ। सभी सोच त्याग दे, तेरी रानी गर्भ से है। राजा की यह बात सुनकर बड़ी खुशी हुई।
नवें महीने में उसके गर्भ से एक सुन्दर पुत्र पैदा हुआ। तब राजा बोला: हे रानी! स्त्री बिना भोजन के रह सकती है, पर बिना कहे नहीं रह सकती। जब मेरी बहिन आवे तुम उससे कुछ कहना मत। रानी ने सुनकर हाँ कर दिया।
जब राजा की बहिन ने यह शुभ समाचार सुना तो वह बहुत खुश हुई तथा बधाई लेकर अपने भाई के यहाँ आई, तभी रानी ने कहा: घोड़ा चढ़कर तो नहीं आई, गधा चढ़ी आई।
राजा की बहिन बोली: भाभी मैं इस प्रकार न कहती तो तुम्हें औलाद कैसे मिलती।
बृहस्पतिदेव ऐसे ही हैं, जैसी जिसके मन में कामनाएँ हैं, सभी को पूर्ण करते हैं, जो सदभावनापूर्वक बृहस्पतिवार का व्रत करता है एवं कथा पढता है, अथवा सुनता है, दूसरो को सुनाता है, बृहस्पतिदेव उसकी सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं।
Papmochani Ekadashi Vrat Katha
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पापमोचनी एकादशी का महत्त्व:
अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से कहा: हे मधुसूदन! आपने फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी अर्थात आमलकी एकादशी के बारे मे विस्तार पूर्वक बतलाया। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष मे आने वाली एकादशी का क्या नाम है? तथा उसकी विधि क्या है? कृपा करके आप मेरी बढ़ती हुई जिज्ञासा को शांत करें।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: हे अर्जुन! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। एक बार की बात है, पृथ्वीपति राजा मान्धाता ने लोमश ऋषि से यही प्रश्न किया था, जो तुमने मुझसे किया है। अतः जो कुछ भी ऋषि लोमश ने राजा मान्धाता को बतलाया, वही मैं तुमसे कह रहा हूँ।
राजा मान्धाता ने धर्म के गुह्यतम रहस्यों के ज्ञाता महर्षि लोमश से पूछा: हे ऋषिश्रेष्ठ! मनुष्य के पापों का मोचन किस प्रकार सम्भव है? कृपा कर कोई ऐसा सरल उपाय बतायें, जिससे सभी को सहज ही पापों से छुटकारा मिल जाए।
पापमोचनी एकादशी व्रत कथा!
महर्षि लोमश ने कहा: हे नृपति! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम पापमोचिनी एकादशी है। उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं। मैं तुम्हें इस व्रत की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो।
प्राचीन समय में चैत्ररथ नामक एक वन था। उसमें अप्सराएँ किन्नरों के साथ विहार किया करती थीं। वहाँ सदैव वसन्त का मौसम रहता था, अर्थात उस जगह सदा नाना प्रकार के पुष्प खिले रहते थे। कभी गन्धर्व कन्याएँ विहार किया करती थीं, कभी देवेन्द्र अन्य देवताओं के साथ क्रीड़ा किया करते थे।
उसी वन में मेधावी नाम के एक ऋषि भी तपस्या में लीन रहते थे। वे शिवभक्त थे। एक दिन मञ्जुघोषा नामक एक अप्सरा ने उनको मोहित कर उनकी निकटता का लाभ उठाने की चेष्टा की, इसलिए वह कुछ दूरी पर बैठ वीणा बजाकर मधुर स्वर में गाने लगी।
उसी समय शिव भक्त महर्षि मेधावी को कामदेव भी जीतने का प्रयास करने लगे। कामदेव ने उस सुन्दर अप्सरा के भ्रू का धनुष बनाया। कटाक्ष को उसकी प्रत्यन्चा बनाई और उसके नेत्रों को मञ्जुघोषा अप्सरा का सेनापति बनाया। इस तरह कामदेव अपने शत्रुभक्त को जीतने को तैयार हुआ।
उस समय महर्षि मेधावी भी युवावस्था में थे और काफी हृष्ट-पुष्ट थे। उन्होंने यज्ञोपवीत तथा दण्ड धारण कर रखा था। वे दूसरे कामदेव के समान प्रतीत हो रहे थे। उस मुनि को देखकर कामदेव के वश में हुई मञ्जुघोषा ने धीरे-धीरे मधुर वाणी से वीणा पर गायन शुरू किया तो महर्षि मेधावी भी मञ्जुघोषा के मधुर गाने पर तथा उसके सौन्दर्य पर मोहित हो गए। वह अप्सरा मेधावी मुनि को कामदेव से पीड़ित जानकर उनसे आलिङ्गन करने लगी।
महर्षि मेधावी उसके सौन्दर्य पर मोहित होकर शिव रहस्य को भूल गए और काम के वशीभूत होकर उसके साथ रमण करने लगे।
काम के वशीभूत होने के कारण मुनि को उस समय दिन-रात का कुछ भी ज्ञान न रहा और काफी समय तक वे रमण करते रहे। तदुपरान्त मञ्जुघोषा उस मुनि से बोली: हे ऋषिवर! अब मुझे बहुत समय हो गया है, अतः स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।
अप्सरा की बात सुनकर ऋषि ने कहा: हे मोहिनी! सन्ध्या को तो आयी हो, प्रातःकाल होने पर चली जाना।
ऋषि के ऐसे वचनों को सुनकर अप्सरा उनके साथ रमण करने लगी। इसी प्रकार दोनों ने साथ-साथ बहुत समय बिताया।
मञ्जुघोषा ने एक दिन ऋषि से कहा: हे विप्र! अब आप मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।
मुनि ने इस बार भी वही कहा: हे रूपसी! अभी ज्यादा समय व्यतीत नहीं हुआ है, कुछ समय और ठहरो।
मुनि की बात सुन अप्सरा ने कहा: हे ऋषिवर! आपकी रात तो बहुत लम्बी है। आप स्वयं ही सोचिये कि मुझे आपके पास आये कितना समय हो गया। अब और ज्यादा समय तक ठहरना क्या उचित है?
अप्सरा की बात सुन मुनि को समय का बोध हुआ और वह गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगे। जब उन्हें समय का ज्ञान हुआ कि उन्हें रमण करते सत्तावन (57) वर्ष व्यतीत हो चुके हैं तो उस अप्सरा को वह काल का रूप समझने लगे।
इतना ज्यादा समय भोग-विलास में व्यर्थ चला जाने पर उन्हें बड़ा क्रोध आया। अब वह भयंकर क्रोध में जलते हुए उस तप नाश करने वाली अप्सरा की तरफ भृकुटी तानकर देखने लगे। क्रोध से उनके अधर काँपने लगे और इन्द्रियाँ बेकाबू होने लगीं।
क्रोध से थरथराते स्वर में मुनि ने उस अप्सरा से कहा: मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा! तू महा पापिन और बहुत ही दुराचारिणी है, तुझ पर धिक्कार है। अब तू मेरे श्राप से पिशाचिनी बन जा।
मुनि के क्रोधयुक्त श्राप से वह अप्सरा पिशाचिनी बन गई। यह देख वह व्यथित होकर बोली: हे ऋषिवर! अब मुझ पर क्रोध त्यागकर प्रसन्न होइए और कृपा करके बताइये कि इस शाप का निवारण किस प्रकार होगा? विद्वानों ने कहा है, साधुओं की सङ्गत अच्छा फल देने वाली होती है और आपके साथ तो मेरे बहुत वर्ष व्यतीत हुए हैं, अतः अब आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए, अन्यथा लोग कहेंगे कि एक पुण्य आत्मा के साथ रहने पर मञ्जुघोषा को पिशाचिनी बनना पड़ा।
मञ्जुघोषा की बात सुनकर मुनि को अपने क्रोध पर अत्यन्त ग्लानि हुई साथ ही अपनी अपकीर्ति का भय भी हुआ, अतः पिशाचिनी बनी मञ्जुघोषा से मुनि ने कहा: तूने मेरा बड़ा बुरा किया है, किन्तु फिर भी मैं तुझे इस श्राप से मुक्ति का उपाय बतलाता हूँ। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी है, उसका नाम पापमोचिनी है। उस एकादशी का उपवास करने से तेरी पिशाचिनी की देह से मुक्ति हो जाएगी।
ऐसा कहकर मुनि ने उसको व्रत का सब विधान समझा दिया। फिर अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए वे अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गये।
च्यवन ऋषि ने अपने पुत्र मेधावी को देखकर कहा: हे पुत्र! ऐसा क्या किया है तूने कि तेरे सभी तप नष्ट हो गए हैं? जिससे तुम्हारा समस्त तेज मलिन हो गया है?
मेधावी मुनि ने लज्जा से अपना सिर झुकाकर कहा: पिताश्री! मैंने एक अप्सरा से रमण करके बहुत बड़ा पाप किया है। इसी पाप के कारण सम्भवतः मेरा सारा तेज और मेरे तप नष्ट हो गए हैं। कृपा करके आप इस पाप से छूटने का उपाय बतलाइये।
ऋषि ने कहा: हे पुत्र! तुम चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी का विधि तथा भक्तिपूर्वक उपवास करो, इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।
अपने पिता च्यवन ऋषि के वचनों को सुनकर मेधावी मुनि ने पापमोचिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। उसके प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए।
मञ्जुघोषा अप्सरा भी पापमोचिनी एकादशी का उपवास करने से पिशाचिनी की देह से छूट गई और पुनः अपना सुन्दर रूप धारण कर स्वर्गलोक चली गई।
लोमश मुनि ने कहा: हे राजन! इस पापमोचिनी एकादशी के प्रभाव से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवण व पठन से एक हजार गौदान करने का फल प्राप्त होता है। इस उपवास के करने से ब्रह्म हत्या करने वाले, स्वर्ण चुराने वाले, मद्यपान करने वाले, अगम्या गमन करने वाले आदि भयंकर पाप भी नष्ट हो जाते हैं और अन्त में स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।
Amalaki Ekadashi Vrat Katha
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आमलकी एकादशी व्रत कथा
आमलकी एकादशी का महत्त्व:
धर्मराज युधिष्ठिर बोले: हे जनार्दन! आपने फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का सुंदर वर्णन करते हुए सुनाया। अब आप फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? तथा उसकी विधि क्या है? कृपा करके आप मुझे बताइए।
श्री भगवान बोले: हे राजन्, फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम आमलकी एकादशी है। इस व्रत के करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, तथा इसके प्रभाव से एक हजार गौ दान का फल प्राप्त होता है। इस व्रत के करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। हे राजन्, अब मैं आपको महर्षि वशिष्ठ जी द्वारा राजा मांधाता को सुनाई पौराणिक कथा के बारे मैं बताता हूँ, आप इसे ध्यानपूर्वक सुनें।
आमलकी एकादशी व्रत कथा!
राजा मांधाता बोले कि हे वशिष्ठजी! यदि आप मुझ पर कृपा करें तो किसी ऐसे व्रत की कथा कहिए, जिससे मेरा कल्याण हो। महर्षि वशिष्ठ बोले कि हे राजन्, सब व्रतों से उत्तम और अंत में मोक्ष देने वाले आमलकी एकादशी के व्रत का मैं वर्णन करता हूं। यह एकादशी फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में होती है।
एक वैदिश नाम का नगर था जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्ण आनंद सहित रहते थे। उस नगर में सदैव वेद ध्वनि गूंजा करती थी तथा पापी, दुराचारी तथा नास्तिक उस नगर में कोई नहीं था। उस नगर में चैतरथ नाम का चन्द्रवंशी राजा राज्य करता था। वह अत्यंत विद्वान तथा धर्मी था। उस नगर में कोई भी व्यक्ति दरिद्र व कंजूस नहीं था। सभी नगरवासी विष्णु भक्त थे और बाल-वृद्ध स्त्री-पुरुष एकादशी का व्रत किया करते थे।
एक समय फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आई। उस दिन राजा, प्रजा तथा बाल-वृद्ध सबने हर्षपूर्वक व्रत किया। राजा अपनी प्रजा के साथ मंदिर में जाकर पूर्ण कुंभ स्थापित करके धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न आदि से धात्री / आंवले का पूजन करने लगे और इस प्रकार स्तुति करने लगे..
हे धात्री! तुम ब्रह्मस्वरूप हो, तुम ब्रह्माजी द्वारा उत्पन्न हुए हो और समस्त पापों का नाश करने वाले हो, तुमको नमस्कार है। अब तुम मेरा अर्घ्य स्वीकार करो। तुम श्रीराम चन्द्रजी द्वारा सम्मानित हो, मैं आपकी प्रार्थना करता हूं, अत: आप मेरे समस्त पापों का नाश करो। उस मंदिर में सब ने रात्रि को जागरण किया।
रात के समय वहां एक बहेलिया आया, जो अत्यंत पापी और दुराचारी था। वह अपने कुटुम्ब का पालन जीव-हत्या करके किया करता था। भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल वह बहेलिया इस जागरण को देखने के लिए मंदिर के एक कोने में बैठ गया और विष्णु भगवान तथा एकादशी माहात्म्य की कथा सुनने लगा। इस प्रकार अन्य मनुष्यों की भांति उसने भी सारी रात जागकर बिता दी।
प्रात:काल होते ही सब लोग अपने घर चले गए तो बहेलिया भी अपने घर चला गया। घर जाकर उसने भोजन किया। कुछ समय बीतने के पश्चात उस बहेलिए की मृत्यु हो गई।
मगर उस आमलकी एकादशी के व्रत तथा जागरण से उसने राजा विदूरथ के घर जन्म लिया और उसका नाम वसुरथ रखा गया। युवा होने पर वह चतुरंगिनी सेना के सहित तथा धन-धान्य से युक्त होकर 10 हजार ग्रामों का पालन करने लगा।
वह तेज में सूर्य के समान, कांति में चन्द्रमा के समान, वीरता में भगवान विष्णु के समान और क्षमा में पृथ्वी के समान था। वह अत्यंत धार्मिक, सत्यवादी, कर्मवीर और विष्णु भक्त था। वह प्रजा का समान भाव से पालन करता था। दान देना उसका नित्य कर्तव्य था।
एक दिन राजा शिकार खेलने के लिए गया। दैवयोग से वह मार्ग भूल गया और दिशा ज्ञान न रहने के कारण उसी वन में एक वृक्ष के नीचे सो गया। थोड़ी देर बाद पहाड़ी म्लेच्छ वहां पर आ गए और राजा को अकेला देखकर मारो, मारो शब्द करते हुए राजा की ओर दौड़े। म्लेच्छ कहने लगे कि इसी दुष्ट राजा ने हमारे माता, पिता, पुत्र, पौत्र आदि अनेक संबंधियों को मारा है तथा देश से निकाल दिया है अत: इसको अवश्य मारना चाहिए।
ऐसा कहकर वे म्लेच्छ उस राजा को मारने दौड़े और अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र उसके ऊपर फेंके। वे सब अस्त्र-शस्त्र राजा के शरीर पर गिरते ही नष्ट हो जाते और उनका वार पुष्प के समान प्रतीत होता। अब उन म्लेच्छों के अस्त्र-शस्त्र उलटा उन्हीं पर प्रहार करने लगे जिससे वे मूर्छित होकर गिरने लगे। उसी समय राजा के शरीर से एक दिव्य स्त्री उत्पन्न हुई। वह स्त्री अत्यंत सुंदर होते हुए भी उसकी भृकुटी टेढ़ी थी, उसकी आंखों से लाल-लाल अग्नि निकल रही थी जिससे वह दूसरे काल के समान प्रतीत होती थी।
वह स्त्री म्लेच्छों को मारने दौड़ी और थोड़ी ही देर में उसने सब म्लेच्छों को काल के गाल में पहुंचा दिया। जब राजा सोकर उठा तो उसने म्लेच्छों को मरा हुआ देखकर कहा कि इन शत्रुओं को किसने मारा है? इस वन में मेरा कौन हितैषी रहता है? वह ऐसा विचार कर ही रहा था कि आकाशवाणी हुई: हे राजा! इस संसार में विष्णु भगवान के अतिरिक्त कौन तेरी सहायता कर सकता है। इस आकाशवाणी को सुनकर राजा अपने राज्य में आ गया और सुखपूर्वक राज्य करने लगा।
महर्षि वशिष्ठ बोले कि हे राजन्! यह आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव था। जो मनुष्य इस आमलकी एकादशी का व्रत करते हैं, वे प्रत्येक कार्य में सफल होते हैं और अंत में विष्णुलोक को जाते हैं।
रोचक तथ्य:
आमलकी एकादशी को बृज मे रंगभरनी एकादशी, श्रीनाथद्वारा मे कुंज एकादशी तथा खाटू नगरी मे खाटू एकादशी भी कहा जाता है। इस एकादशी मे आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है।
Gajendra Moksha Katha
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गजेंद्र और ग्राह मुक्ति कथा
वैकुण्ठ के द्वारपाल जय और विजय पूर्व जन्म में कौन थे?
क्षीरसागर में एक त्रिकूट नामक एक प्रसिद्ध एवं श्रेष्ठ पर्वत था। उसकी ऊँचाई आसमान छूती थी। उसकी लम्बाई-चौड़ाई भी चारों ओर काफी विस्तृत थी। उसके तीन शिखर थे, पहला सोने का, दूसरा चाँदी का तीसरा लोहे का। इनकी चमक से समुद्र, आकाश और दिशाएँ जगमगाती रहती थीं।
इनके अलावा उसकी और कई छोटी चोटियाँ थीं जो रत्नों और कीमती धातुओं से बनी हुई थीं। सब ओर से समुद्र की लहरें आकर इस पर्वत के निचले भाग से टकरातीं जिससे प्रतीत होता कि समुद्र इनके पाँव पखार रहा था।
पर्वत की तलहटी में तरह-तरह के जंगली जानवर बसेरा बनाए हुए थे। इसके ऊपर बहुत सी नदियाँ और सरोवर भी थे।
इस पर्वतराज त्रिकूट की तराई में एक तपस्वी महात्मा रहते थे जिनका नाम वरुण था। महात्मा वरुण ने एक अत्यन्त सुन्दर उद्यान में अपनी कुटी बनाई थी। इस उद्यान का नाम ऋतुमान था। इसमें सब ओर अत्यन्त ही दिव्य वृक्ष शोभा पा रहे थे, जो सदा फलों-फूलों से लदे रहते थे।
इस उद्यान में एक बड़ा-सा सरोवर भी था जिसमें सुनहले कमल भी खिले रहते थे तथा विविध जाति के कुमुद, उत्पल, शतदल कमल अपनी अनूठी छटा बिखराते थे। हंस, चक्रवाक और सारस आदि पक्षी झुण्ड के झुण्ड भरे हुए थे। मछली और कछुवों के खिलवाड़ से कमल के फूल जो हिलते थे उससे उसका पराग झड़कर सरोवर जल को अत्यन्त सुगन्धित कर देता था।
कदम्ब, नरकुल, बेंत, बेन आदि वृक्षों से यह घिरा रहता था। कुन्द कुरबक, अशोक, सिरस, वनमल्लिका, सोनजूही, नाग, हरसिंहार, मल्लिका शतपत्र, माधवी और मोगरा आदि सुन्दर-सुन्दर पुष्प वृक्षों से प्रत्येक ऋतु में यह महात्मा वरुण का सरोवर शोभायमान रहता था।
क्षीरसागर से त्रिकूट पर्वत पर सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा था। एक बार एक दर्दनाक घटना घट गई। इस पर्वत के घोर जंगल में एक विशाल मतवाला हाथी रहता था। वह कई शक्तिशाली हाथियों का सरदार था। उसके पीछे बड़े-बड़े हाथियों के झुण्ड के झुण्ड चलते थे।
इस गजराज से, उसके महान् बल के कारण बड़े से बड़े हिंसक जानवर भी डरते थे किन्तु एक बात यह भी थी कि उसकी कृपा से लंगूर, भैंसे, भेड़िए, हिरण, रीछ, वनैले कुत्ते, खरगोश आदि छोटे जीव निर्भय होकर घूमा करते थे क्योंकि उसके रहते कोई भी हिंसक जानवर उस पर आक्रमण करने का साहस नहीं कर सकता था।
गजराज मदमस्त था। उसके सिर के पास से टपकते मद का पान करने के लिए भँवरे उसके साथ गूँजते जाते थे।
एक दिन बड़े जोर की धूप थी। वह प्यास से व्याकुल हो गया। अपने झुण्ड के साथ वह उसी सरोवर में उतर पड़ा जो त्रिकूट की तराई में स्थित था। जल उस समय अत्यन्त शीतल एवं अमृत के समान मधुर था। पहले तो उस गजराज ने अपनी सूँड़ से उठा-उठा जी भरकर इस अमृत-सदृश्य जल का पान किया। फिर उसमें स्नान करके अपनी थकान मिटाई।
इसके पश्चात उसका ध्यान जलक्रीड़ा की ओर गया। वह सूँड़ से पानी भर-भर अन्य हाथियों पर फेंकने लगा और दूसरे भी वही करने लगे। मदमस्त गजराज सबकुछ भूलकर जल क्रीड़ा का आनन्द उठाता रहा। उसे पता नहीं था कि उस सरोवर में एक बहुत बलवान ग्राह भी रहता था।
उस ग्राह ने क्रोधित होकर उस गजराज के पैर को जोरों से पकड़ लिया और उसे खींचकर सरोवर के अन्दर ले जाने लगे। उसके पैने दातों के गड़ने से गजराज के पैर से रक्त का प्रवाह निकल पड़ा जिससे वहाँ का पानी लाल हो आया।
उसके साथ के हाथियों और हथिनियों को गजराज की इस स्थिति पर बहुत चिंता हुई। उन्होंने एक साथ मिलकर गजराज को जल के बाहर खींचने का प्रयास किया किंतु वे इसमें सफल नहीं हुए। वे घबराकर ज़ोर-ज़ोर से चिंघाड़ने लगे। इस पर दूर-दूर से आकर हाथियों के कई झुण्डों ने गजराज के झुण्डों से मिलकर उसे बाहर खींचना चाहा किन्तु यह सम्मिलित प्रयास भी विफल रहा।
सभी हाथी शान्त होकर अलग हो गए। अब ग्राह और गजराज में घोर युद्ध चलने लगा दोनों अपने रूप में काफी बलशाली थे और हार मानने वाले नहीं थे।
कभी गजराज ग्राह को खींचकर पानी से बाहर लाता तो कभी ग्राह गजराज को खींचकर पानी के अन्दर ले जाता किन्तु गजराज का पैर किसी तरह ग्राह के मुँह से नहीं छूट रहा था बल्कि उसके दाँत गजराज के पैर में और गड़ते ही जा रहे थे और सरोवर का पानी जैसे पूरी तरह लाल हो आया था।
गज और ग्राह के बीच युद्ध कई दिनों तक चला। अन्त में अधिक रक्त बह जाने के कारण गजराज शिथिल पड़ने लगा। उसे लगा कि अब वह ग्राह के हाथों परास्त हो जाएगा।
उसको इस समय कोई उपाय नहीं सूझा और अपनी मृत्यु को समीप पाकर उसे भगवान नारायण की याद आयी। पूर्व जन्म की निरंतर भगवद आराधना के फलस्वरूप उसे भगवत्स्मृति हो आई।
उसने निश्चय किया कि मैं कराल काल के भय से चराचर प्राणियों के शरण्य सर्वसमर्थ प्रभु की शरण ग्रहण करता हूँ। इस निश्चय के साथ गजेन्द्र मन को एकाग्र कर पूर्वजन्म में सीखे श्रेष्ठ स्त्रोत द्वारा गजेंद्र मोक्ष स्तुति करने लगा।
उसने एक कमल का फूल तोड़ा और उसे आसमान की ओर इस तरह उठाया जैसे वह उसे भगवान को अर्पित कर रहा हो। अब तक वह ग्राह द्वारा खींचे जाने से सरोवर के मध्य गहरे जल में चला गया था और उसकी सूड़ का मात्र वह भाग ही ऊपर बचा था जिसमें उसने लाल कमल-पुष्प पकड़ रखा था।
उसने अपनी शक्ति को पूरी तरह से भूलकर और अपने को पूरी तरह असहाय घोषित कर नारायण को पुकारा। भगवान समझ गए कि इसे अपनी शक्ति का मद जाता रहा और वह पूरी तरह से मेरा शरणागत है।
जब नारायण ने देखा कि मेरे अतिरिक्त यह किसी को अपना पक्षक नहीं मानता तो नारायण के `ना` के उच्चारण के साथ ही वह गरुण पर सवार होकर चक्र धारण किए हुए सरोवर के किनारे पहुँच गए। उन्होंने देखा कि गजेन्द्र डूबने ही वाला है। वह शीघ्रता से गरुण से कूद पड़े।
इस समय तक बहुत से देवी-देवता भी भगवान के आगमन को समझकर वहाँ उपस्थित हो गए थे। सभी के देखते ही देखते भगवान ने गजराज और गजेन्द्र को एक क्षण में सरोवर से खींचकर बाहर निकाला। देवताओं ने आश्चर्य से देखा, उन्होंने सुदर्शन से इस तरह ग्राह का मुँह फाड़ दिया कि गजराज के पैर को कोई क्षति नहीं पहुँची।
ग्राह देखते-देखते तड़प कर मर गया और गजराज भगवान की कृपा-दृष्टि से पहले की तरह स्वस्थ हो गया।
ब्रह्मादि देवगण श्री हरि की प्रशंसा करते हुए उनके ऊपर स्वर्गिक सुमनों की वृष्टि करने लगे। सिद्ध और ऋषि-महर्षि परब्रह्म भगवान विष्णु का गुणगान करने लगे।
ग्राह दिव्य शरीर-धारी हो गया। उसने भगवान विष्णु के चरणो में सिर रखकर प्रणाम किया और भगवान विष्णु के गुणों की प्रशंसा करने लगा।
भगवान विष्णु के मंगलमय वरद हस्त के स्पर्श से पाप मुक्त होकर अभिशप्त गन्धर्व ने प्रभु की परिक्रमा की और उनके त्रेलोक्य वन्दित चरण-कमलों में प्रणाम कर अपने लोक चला गया।
भगवान विष्णु ने गजेन्द्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया। गन्धर्व, सिद्ध और देवगण उनकी लीला का गान करने लगे।
गजेन्द्र की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने सबके समक्ष कहा: प्यारे गजेन्द्र ! जो लोग ब्रह्म मुहूर्त में उठकर तुम्हारी की हुई स्तुति से मेरा स्तवन करेंगे, उन्हें मैं मृत्यु के समय निर्मल बुद्धि का दान करूँगा।
यह कहकर भगवान विष्णु ने पार्षद रूप में गजेन्द्र को साथ लिया और गरुडारुड़ होकर अपने दिव्य धाम को चले गए।
गज-ग्राह दोनों की अगले जन्मो की कहानी?
गज-ग्राह को अपनी भक्ति और विष्णु के हाथों मुक्ति के चलते वैकुण्ठ में स्थान मिला दोनों इस लोक में द्वारपाल हुए जिनका ही नाम जय और विजय हुआ। आगे सनत कुमारो के श्राप के चलते दोनों हिरण्याक्ष - हिरण्यकश्यपु, रावण - कुम्भकर्ण और शिशुपाल - दन्तवक्र हुए थे।
गज-ग्राह दोनों की पूर्व जन्मो की कहानी?
ऋषि कपिल का नाम तो सबने सुन ही रखा है जिनके वंशज ऋषभ देव से जैन धर्म का प्रादुर्भाव हुआ था, वो कपिल मुनि महर्षि कर्दम के पुत्र थे। कर्दम ऋषि की पत्नी का नाम देवहुति था, उन्ही के गर्भ से कपिल मुनि जन्मे थे लेकिन उन्ही देवहुति को कर्दम जी से पहले और भी संताने थी।
उन्ही कर्दम और देवहुति के कपिल मुनि से दो बड़े पुत्र और थे जो कि वेदज्ञ थे, एक बार एक राजा के यहाँ यज्ञ संपन्न कर आये दोनों को जब धन मिला तो उसके लिए विवाद हो गया था। तब दोनों ने एक दूसरे को ग्राह और गज होने का श्राप दे दिया, दोनों विष्णु भक्त थे और दोनों की बात सच भी हुई।
लेकिन मौत से पहले उन्होंने तपस्या कर विष्णु जी को प्रसन्न कर लिया और वरदान में मुक्ति माँग ली और इसीलिए अगले जन्म में उन्हें पूर्व जन्म का स्मरण था और दोनों ने भगवान विष्णु के हाथो मुक्ति पाई।
॥ जय श्री विष्णु हरि ॥
Manusmrati Adhyay 1 Arthasahit
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मनुस्मृति अध्याय १
मनुस्मृति अध्याय १ - मनुस्मृति हिन्दू धर्म व मानवजाति का एक प्राचीन धर्मशास्त्र व प्रथम संविधान (स्मृति) है। मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय हैं जिनमें 2684 श्लोक हैं। कुछ संस्करणों में श्लोकों की संख्या 2964 है।
मनुस्मृति ॥
मनुस्मृति प्रथमोऽध्यायः
॥ अथ प्रथमोऽध्यायः पहला अध्याय ॥
मनुमेकाग्रमासीनमभिगम्य महर्षयः ।
प्रतिपूज्य यथान्यायमिदं वचनमब्रुवन् ॥१॥
भगवन् सर्ववर्णानां यथावदनुपूर्वशः ।
अन्तरप्रभवानां च धर्मान्नो वक्तुमर्हसि ॥२॥
त्वमेको ह्यस्य सर्वस्य विधानस्य स्वयंभुवः ।
अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य कार्यतत्त्वार्थवित् प्रभो ॥३॥
महर्षियों ने एकाग्रचित्त बैठे हुए मनु महाराज के पास जाकर और उनका पूजन करके, विधिपूर्वक यह प्रश्न किया - हे भगवन्! आप सभी ब्राह्मण आदि वर्गों के और सङ्कीर्ण जातियों के वर्णाश्रम धर्म क्रम से कहने में समर्थ हैं, अतः हमें आप उपदेश कीजिये क्योंकि केवल आप समस्त वैदिक, श्रौतस्मार्त कर्मों के अगाध और अनन्त विषय को जानने वाले हैं । ॥१-३॥
स तैः पृष्टस्तथा सम्यगमितोजा महात्मभिः ।
प्रत्युवाचार्च्य तान् सर्वान् महर्षीश्रूयतामिति ॥४॥
इस प्रकार महर्षियों के विनयपूर्वक प्रश्नों को सुनकर, महात्मा मनु ने, सबका आदर करके कहा - अच्छा सुनो। ॥४॥
मनुस्मृति अध्याय १- जगत् की सृष्टि का विषय
आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ ॥५॥
ततः स्वयंभूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् ।
महाभूतादि वृत्तोजाः प्रादुरासीत् तमोनुदः ॥ ॥६॥
योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः ।
सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एव स्वयमुद्बभौ ॥ ॥७॥
सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ।
अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत् ॥ ॥८॥
यह संसार अपनी उत्पत्ति के पूर्व अन्धकारमय था, अज्ञात था, इसका कोई लक्षण नहीं था। किसी भी अनुमान से यह जानने योग्य नहीं था। चारों ओर से मानो सोया हुआ था। इस महाप्रलय स्थिति के अनन्तर, सृष्टि के प्रारम्भ में, पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश आदि विश्व को सूक्ष्म एवं स्थूल रूप में प्रकट करने की इच्छा से अतीन्द्रिय, महासूक्ष्म, नित्य, विश्वव्यापक, अचिन्त्य परमात्मा ने अपने आप को प्रकट किया अर्थात् महत्तत्त्व आदि की उत्पत्ति द्वारा अपनी शक्ति को संसार में प्रकट किया। उसके पाश्चात्य अनेक प्रकार की प्रजा सृष्टि की इच्छा से जल वृष्टि करके उसमें अपना शक्ति रूप बीज स्थापित किया । ॥ ५८॥
तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् ।
तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥ ॥९॥
वह बीज ईश्वर की इच्छा से सूर्य के समान चमकीला स्वर्ण के रंग का गोला बन गया। उसमें से संपूर्ण विश्व के पितामह स्वयं ब्रह्माजी का प्रादुर्भाव हुआ ॥९॥
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।
ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ ॥ १० ॥
यत् तत् कारणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् ।
तद्विसृष्टः स पुरुषो लोके ब्रह्मेति कीर्त्यते ॥ ॥११॥
तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् ।
स्वयमेवात्मनो ध्यानात् तदण्डमकरोद् द्विधा ॥ ॥१२॥
ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं च निर्ममे ।
मध्ये व्योम दिशश्चाष्टावपां स्थानं च शाश्वतम् ॥ ॥ १३ ॥
जल को नार कहते हैं क्योंकि जल की उत्पत्ति नर नामक परमात्मा से हुई है। जल में ही परमात्मा ने ब्रह्मरूप से पहले स्थिति की है। इसलिये परमात्मा को नारायण कहते हैं। जो सारे जगत् की उत्पात्ति का कारण है, अप्रकट है, सनातन है, सत्-असत् पदार्थों का प्रकृतिभूत है, उसी से उत्पन्न वह पुरुष संसार में ब्रह्मा नाम से जाना जाता है। ब्रह्मा ने उस अंड में एक वर्ष ब्राह्ममान रहकर, अपनी इच्छा से उसके दो टुकड़े कर दिए। उस अंड के ऊपरी भाग से स्वर्गलोक, नीचे के भाग से भूलोक और दोनों के बीच आकाश बनाकर आठों दिशाओं और जल के स्थिर स्थान - समुद्र का निर्माण किया ॥ १०-१३ ॥
मनुस्मृति अध्याय १- मनुस्मृति सृष्टि की उत्पत्ति
उद्वबर्हात्मनश्चैव मनः सदसदात्मकम् ।
मनसश्चाप्यहङ्कारमभिमन्तारमीश्वरम् ॥ ॥१४॥
महान्तमेव चात्मानं सर्वाणि त्रिगुणानि च ।
विषयाणां ग्रहीतृणि शनैः पञ्चैन्द्रियाणि च ॥ ॥१५॥
तेषां त्ववयवान् सूक्ष्मान् षण्णामप्यमितौजसाम् ।
सनिवेश्यात्ममात्रासु सर्वभूतानि निर्ममे ॥ ॥ १६ ॥
यन् मूर्त्यवयवाः सूक्ष्मास्तानीमान्याश्रयन्ति षट् ।
तस्माच्छरीरमित्याहुस्तस्य मूर्तिं मनीषिणः ॥ ॥ १७ ॥
ब्रह्मा ने उस परमात्मा रूप प्रकृति से मन उत्पन्न किया, फिर मन से अहंकार, अहंकार से महत्तत्व, सत्त्व, रज, तम, तीनों गुण और शब्द, स्पर्श, रूप आदि विषयों के विषय रूप पांच ज्ञानेन्द्रिय और अहंङ्कार इन छ के सूक्ष्म अवयवों को अपनी अपनी मात्राओं में अर्थात् शब्द, स्पर्शादि में मिलाकर समस्त चल अचल रूप विश्व की रचना की। शरीर के सूक्ष्म, छह हिस्सों अर्थात् अहंङ्कार और पञ्च महाभूत आदि समस्त कार्यों के आश्रय होने से उस ब्रह्मा की मूर्ति को शरीर कहते हैं ॥१४- १७ ॥
तदाविशन्ति भूतानि महान्ति सह कर्मभिः ।
मनश्चावयवैः सूक्ष्मैः सर्वभूतकृदव्ययम् ॥ ॥ १८ ॥
तेषामिदं तु सप्तानां पुरुषाणां महौजसाम् ।
सूक्ष्माभ्यो मूर्तिमात्राभ्यः संभवत्यव्ययाद् व्ययम् ॥ ॥ १६ ॥
आद्याद्यस्य गुणं त्वेषामवाप्नोति परः परः ।
यअ यो यावतिथश्चैषां स स तावद् गुणः स्मृतः ॥ ॥ २० ॥
सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् ।
वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥ २१ ॥
पञ्चमहाभूत और मन अपने कार्यों और सूक्ष्म अंगों के द्वारा समस्त प्राणियों की उत्पत्ति के लिये अविनाश ब्रह्म अर्थात शरीर में प्रविष्ट होते हैं। उन सात प्रकृतियों अर्थात् महत्तत्व, अहङ्कार और पञ्चमहाभूत की सूक्ष्म मात्रा से, पञ्चतन्मात्रा से, अविनाशी परमात्मा नाशवान् जगत् को उत्पन्न करते हैं। इन पञ्चमहाभूतों में पहले का गुण अगला पाता है। जैसे आकाश का गुण शब्द आगे के वायु में व्याप्त हुआ। वायु का गुण स्पर्श अग्नि में, अग्नि का रूप जल में स्थापित हुआ इत्यादि। इनमें से जिसमें जितने गुण हैं वह उतने गुणों वाला गुणवाला है। जैसे आकाश में एक गुण शब्द है। वायु में शब्द और स्पर्श दो गुण हैं, इसलिये आकाश एक गुण वाला और वायु दो गुणवाला कहलाया । इसी प्रकार अन्य गुणों के विषय में भी जानना चाहिए। परमात्मा ने वेदानुसार ही सबके नाम और कर्म अलग अलग बांट दिये हैं, जैसा गौ जाति का नाम गो, अश्वजाति का अश्व और कर्म जैसे ब्राह्मणों का वेदाध्ययन आदि, क्षत्रियों को प्रजारक्षा आदि जैसा पूर्वकल्प में था वैसा ही रचा गया है ॥ १८-२१ ॥
कर्मात्मनां च देवानां सोऽसृजत् प्राणिनां प्रभुः ।
साध्यानां च गणं सूक्ष्मं यज्ञं चैव सनातनम् ॥ ॥ २२ ॥
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम् ।
दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थं ऋच् । यजुस् । सामलक्षणम् ॥ ॥ २३ ॥
कालं कालविभक्तीश्च नक्षत्राणि ग्रहांस्तथा ।
सरितः सागरान् शैलान् समानि विषमानि च ॥ ॥२४॥
फिर परमात्मा ने, यज्ञादि में जिनको भाग दिया जाता है ऐसे प्राणवाले इन्द्रादि देवता; वनस्पति आदि के स्वामी देवता, साध्य नामक सूक्ष्म देवगण और यज्ञों की रचना की। अग्नि, वायु और सूर्य इन तीनों में क्रम से यज्ञ, कर्म, संपादन के लिये, ऋक, यजु, साम इस त्रयी विद्या* को उत्पन्न किया। काल और काल का विभाग वर्ष, मास, पक्ष, तिथि, प्रहर, घटिका, पल, विपल आदि नक्षत्र, ग्रह, नदी, समुद्र, पर्वत और ऊंचीं, नीची भूमि की सृष्टि हुई। ॥ २२-२४ ॥
अग्नि, वायु और सूर्य से वेदों की उत्पत्ति होने के कारण ही ऋग्वेद का पहला मन्त्र अग्नि स्तुति का, यजुर्वेद का पहला मन्त्र वायु स्तुति का तथा सामवेद का पहला मन्त्र सूर्य स्तुति का है।
तपो वाचं रतिं चैव कामं च क्रोधमेव च ।
सृष्टिं ससर्ज चैवेमां स्रष्टुमिच्छन्निमाः प्रजाः ॥ ॥ २५ ॥
कर्मणां च विवेकार्थं धर्माधर्मौ व्यवेचयत् ।
द्वन्द्वैरयोजयच्चैमाः सुखदुःखादिभिः प्रजाः ॥ ॥ २६ ॥
अण्व्यो मात्रा विनाशिन्यो दशार्धानां तु याः स्मृताः ।
ताभिः सार्धमिदं सर्वं संभवत्यनुपूर्वशः ॥ ॥ २७ ॥
यं तु कर्मणि यस्मिन् स न्ययुङ्क्त प्रथमं प्रभुः ।
स तदेव स्वयं भेजे सृज्यमानः पुनः पुनः ॥ ॥ २८ ॥
हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते ।
यद् यस्य सोऽदधात् सर्गे तत् तस्य स्वयमाविशत् ॥ ॥ २९ ॥
सृष्टि की रचना करने की इच्छा से ब्रह्मा ने तप, वाणी, रति, काम और क्रोध को उत्पन्न किया। भले और बुरे कर्मों के विचार के लिये धर्म और अधर्म का निर्णय किया। सुख, दुःख, काम, क्रोध आदि द्वन्द्व धर्मों के अधीन संसार के प्राणियों को उत्पन्न किया । पञ्चमहाभूतों की सूक्ष्स मात्रा, पञ्चतन्मात्राओं के साथ यह सारी सृष्टि क्रम से उत्पन्न हुई। सृष्टि के आदि में इस प्रभु ने, जिस स्वाभाविक कर्म में जिसकी उत्पत्ति की, उसी कर्म को उसने ग्रहण किया। हिंसक कर्म- अहिंसक कर्म, मृदु-दया, क्रूर-कठोरता, धर्म-ब्रह्मचर्य, गुरुसेवा, अधर्म- झूठ बोलना आदि जो पूर्वकल्प में जिसका था वही सृष्टि के समय उसमें प्रविष्ट हो गया । ॥ २५-२९ ॥
यथर्तुलिङ्गान्यर्तवः स्वयमेवर्तुपर्यये ।
स्वानि स्वान्यभिपद्यन्ते तथा कर्माणि देहिनः ॥३०॥
लोकानां तु विवृद्ध्यर्थं मुखबाहूरुपादतः ।
ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत् ॥ ॥३१॥
द्विधा कृत्वाऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् ।
अर्धेन नारी तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः ॥ ॥३२॥
तपस्तप्त्वाऽसृजद् यं तु स स्वयं पुरुषो विराट् ।
तं मां वित्तास्य सर्वस्य स्रष्टारं द्विजसत्तमाः ॥३३ ॥
अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् ।
तीन् प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश ॥ ॥३४॥
मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।
प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च ॥ ॥३५॥
जिस प्रकार वसन्त आदि ऋतु अपने स्वाभाविक चिह्न को धारण करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य अपने अपने पूर्व कर्मों को प्राप्त होते हैं। परमात्मा ने लोक की वृद्धि के लिये, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों को पैदा किया। इनमें विराट रूप परमात्मा के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, ऊरु से वैश्य और पैर से शूद्र उत्पन्न हुए । परमात्मा ने इस संसार को दो भागों में विभक्त करके एक को पुरुष तथा दूसरे को स्त्री बनाया और स्त्रीभाग से विराट पुरुष को उत्पन्न किया। उस विराटपुरुष रूप प्रजापति ने तप करके जिस पुरुष को उत्पन्न किया वही मैं, सारे विश्व को उत्पन्न करने वाला हूँ – ऐसा आपलोग जानिये। मैंने प्रजा सृष्टि की इच्छा से कठिन तप करके पहले दस महाऋषियों को उत्पन्न किया। उनके नाम इस प्रकार हैं-
मरीचि, अत्रि, अङ्गिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेतस, वशिष्ठ, भृगु और नारद ॥ ३०-३५ ॥
एते मनूंस्तु सप्तान् यानसृजन् भूरितेजसः।
देवान् देवनिकायांश्च महर्षीश्चामितोजसः ॥३६॥
यक्षरक्षः पिशाचांश्च गन्धर्वाप्सरसोऽसुरान् ।
नागान् सर्पान् सुपर्णांश्च पितृणांश्च पृथग्गणम् ॥ ॥३७॥
विद्युतोऽशनिमेघांश्च रोहितैन्द्रधनूंषि च ।
उल्कानिर्घातकेतूंश्च ज्योतींष्युच्चावचानि च ॥ ॥३८॥
किन्नरान् वानरान् मत्स्यान् विविधांश्च विहङ्गमान् ।
पशून् मृगान् मनुष्यांश्च व्यालांश्चोभयतोदतः ॥ ॥ ३९ ॥
कृमिकीटपतङ्गांश्च यूकामक्षिकमत्कुणम् ।
सर्वं च दंशमशकं स्थावरं च पृथग्विधम् ॥ ॥४०॥
एवमेतैरिदं सर्वं मन्नियोगान् महात्मभिः।
यथाकर्म तपोयोगात् सृष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥ ॥४१॥
इन दस प्रजापतियों ने दूसरे प्रकाशमान सात मनुओं को, देवता और उनके निवास स्थानों को, ब्रह्मऋषियों को उत्पन्न किया और यक्ष, राक्षस, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरा, असुर, नाग, सर्प, सुपर्ण गरुडादि, और पितरों को उत्पन्न किया । विद्युत्-बिजली, अशनि*, मेघ, रोहित*, इन्द्रधनुष, उल्का*, निर्घात*, केतु*, और अनेकों प्रकार की ज्योति, ध्रुव अगस्त्य आदि को उत्पन्न किया। किन्नर, अश्वमुख, नरदेह, वानर, मत्स्य, तरह तरह के पक्षिगण, पशु, मृग, मनुष्य, सर्प, ऊपर-नीचे दांतवाले जीव, कृमि, कीट, पतङ्ग, जूं मक्खी, खटमल और संपूर्ण काटनेवाले छोटे जीव मच्छर आदि, मेरी आज्ञा और अपनी तपस्या से मरीचि आदि महात्माओं ने इस स्थावर, जङ्गम विश्व को कर्मानुसार रचा है ॥३६-४१॥
*1 एक तरह की बिजली
* 2 एक विचित्र वर्ण दण्डाकार आकाश का चिह्न
*3 जो आकाश से रेखाकार ज्योति गिरती है।
*4 उत्पात शब्द
*5 पूंछदार तारा
येषां तु यादृशं कर्म भूतानामिह कीर्तितम् ।
तत् तथा वोऽभिधास्यामि क्रमयोगं च जन्मनि ॥ ॥४२॥
पशवश्च मृगाश्चैव व्यालाश्चोभयतोदतः ।
रक्षांसि च पिशाचाश्च मनुष्याश्च जरायुजाः ॥ ॥४३॥
अण्डजाः पक्षिणः सर्पा नक्रा मत्स्याश्च कच्छपाः ।
यानि चैवं । प्रकाराणि स्थलजान्यौदकानि च ॥ ॥४४॥
स्वेदजं दंशमशकं यूकामक्षिकमत्कुणम् ।
ऊष्मणश्चोपजायन्ते यच्चान्यत् किं चिदीदृशम् ॥ ॥४५॥
उद्भिज्जाः स्थावराः सर्वे बीजकाण्डप्ररोहिणः ।
ओषध्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगाः ॥ ॥४६॥
अपुष्पाः फलवन्तो ये ते वनस्पतयः स्मृताः ।
पुष्पिणः फलिनश्चैव वृक्षास्तूभयतः स्मृताः ॥ ॥४७॥
गुच्छ गुल्मं तु विविधं तथैव तृणजातयः ।
काण्डरुहाण्येव प्रताना वल्ल्य एव च ॥ ॥४८॥
इस जगत् में जिन प्राणियों का जो कर्म कहा है वैसा ही हम कहेंगे और उनके जन्म के क्रम का भी वर्णन करेंगे। सृष्टि चार प्रकार की है, उनको क्रम से कहते हैं- पशु, सिंह, ऊपर नीचे दाँतवाले, सभी राक्षस, पिशाच और मनुष्य यह सभी 'जरायुज' कहलाते हैं। पक्षी, साँप, नाक, मछली, कछुआ और जो भी इसी प्रकार भूमि या जल में पैदा होनेवाले जीव हैं वह सभी 'अण्डज' कहलाते हैं। मच्छर, दंश, जूँ मक्खी, खटमल आदि पसीने की गर्मी से पैदा होनेवाले 'स्वदेज' होते हैं । वृक्ष आदि को 'उद्भिज्ज' कहते हैं। यह दो तरह के हैं, बीज से पैदा होनेवाले और शाखा से पैदा होनेवालें । जो वृक्ष फलों के पक जाने पर सूख जाते हैं और जो बहुत फल, फूलवाले होते हैं उनको 'औषधि' कहते हैं। जिनमें फल आतें हैं परन्तु फूल नहीं आते उनको 'वनस्पति' कहते हैं। और जो फल, फूलवाले हैं वह 'वृक्ष' कहे जाते हैं। जिनमें जड़ से ही लता का मूल हो, शाखा न हो उसको 'गुच्छ' कहते हैं । गुल्म-ईख वगैरह, तृणजाति कई भांति के बीज और शाखा से पैदा होनेवाले, प्रतान- जिस में सूत सा निकले और वल्ली गुर्च आदि सब 'उद्भिज्ज' हैं। ॥४२-४८॥
तमसा बहुरूपेण वेष्टिताः कर्महेतुना ।
अन्तस्संज्ञा भवन्त्येते सुखदुःखसमन्विताः ॥ ॥४९॥
एतदन्तास्तु गतयो ब्रह्माद्याः समुदाहृताः ।
घोरेऽस्मिन् भूतसंसारे नित्यं सततयायिनि ॥ ॥५०॥
एवं सर्वं ससृष्द्वैदं मां चाचिन्त्यपराक्रमः ।
आत्मन्यन्तर्दधे भूयः कालं कालेन पीडयन् ॥ ॥५१॥
यदा स देवो जागर्ति तदेवं चेष्टते जगत् ।
यदा स्वपिति शान्तात्मा तदा सर्वं निमीलति ॥ ॥५२॥
तस्मिन् स्वपिति तु स्वस्थे कर्मात्मानः शरीरिणः ।
स्वकर्मभ्यो निवर्तन्ते मनश्च ग्लानिमृच्छति ॥ ॥५३॥
युगपत् तु प्रलीयन्ते यदा तस्मिन् महात्मनि ।
तदाऽयं सर्वभूतात्मा सुखं स्वपिति निर्वृतः ॥ ॥५४॥
यह सभी वृक्ष अज्ञानवश अपने पूर्व जन्म के बुरे कर्मों से घिरे हुए हैं। इनके भीतर छिपा हुआ ज्ञान है और इनको सुख-दुःख भी होता हैं। इस नाशवान् संसार में ब्रह्मा से लेकर स्थावर तक यही उत्पत्ति का नियम कहा गया है। उस अचिन्त्य प्रभावशाली परमात्मा ने यह विश्व और मुझे उत्पन्न करके सृष्टिकाल को प्रलयकाल में मिलाकर अपने में लीन कर लिया। अर्थात् प्राणियों के कर्मवश बार बार सृष्टि और प्रलय किया करता है । जब परमात्मा जागता हैं अर्थात् सृष्टि की इच्छा करता है उस समय यह सारा जगत् चेष्टा युक्त हो जाता है और जब सोता है यानि प्रलय की इच्छा करता है, तब विश्व का अंत हो जाता है । यही परमात्मा का जागना और सोना है। जब वह सोता है, निर्व्यापार रहता है तब कर्मात्मा प्राण अपने अपने कर्मों से निवृत्त हो जाते हैं और मन भी सभी इन्द्रियों सहित शान्त भाव को प्राप्त कर लेता है। एक ही काल में, जब समस्त प्राणी परमात्मा में लय को प्राप्त कर लेते हैं, तब यह सुख से शयन करता हुआ कहा जाता है ॥४६-५४॥
तमोऽयं तु समाश्रित्य चिरं तिष्ठति सैन्द्रियः ।
न च स्वं कुरुते कर्म तदोत्क्रामति मूर्तितः ॥ ॥५५॥
मात्रिको भूत्वा बीजं स्थाणु चरिष्णु च ।
समाविशति संसृष्टस्तदा मूर्ति विमुञ्चति ॥ ॥ ५६ ॥
एवं स जाग्रत्स्वप्नाभ्यामिदं सर्वं चराचरम् ।
सञ्जीवयति चाजस्रं प्रमापयति चाव्ययः ॥ ॥ ५७ ॥
शरीर बनने की आठ सामग्री हैं-जीव, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, वासना, कर्म, वायु, अविद्या-इन को शास्त्र में 'पुर्यष्टक' कहते हैं।
इदं शास्त्रं तु कृत्वाऽसौ मामेव स्वयमादितः ।
विधिवद् ग्राहयामास मरीच्यादींस्त्वहं मुनीन् ॥ ॥ ५८ ॥
एतद् वोऽयं भृगुः शास्त्रं श्रावयिष्यत्यशेषतः ।
एतद् हि मत्तोऽधिजगे सर्वमेषोऽखिलं मुनिः ॥ ॥ ५९ ॥
ततस्तथा सतेनोक्तो महर्षिमनुना भृगुः ।
तानब्रवीद् ऋषीन् सर्वान् प्रीतात्मा श्रूयतामिति ॥ ॥६०॥
मनु जी कहते हैं- प्रजापति ने सृष्टि के पूर्व इस धर्मशास्त्र को बनाकर मुझे उपदेश दिया। फिर इसका उपदेश मैंने मरीचि आदि अन्य ऋषियों को दिया। इस समस्त शास्त्र का उपदेश भृगु आपको करेंगे, जो कि मुझसे सम्पूर्ण प्राप्त किया गया है। उसके बाद मनु की आज्ञा पाकर महर्षि भृगु ने सब ऋषियों को कहा कि सुनो ॥ ५८-६० ॥
स्वायंभुवस्यास्य मनोः षड्वंश्या मनवोऽपरे ।
सृष्टवन्तः प्रजाः स्वा स्वा महात्मानो महौजसः ॥ ॥६१ ॥
स्वारोचिषश्चोत्तमश्च तामसो रैवतस्तथा ।
चाक्षुषश्च महातेजा विवस्वत्सुत एव च ॥ ॥ ६२ ॥
स्वायम्भुव मनु के वंश में, छः मनु और हैं। उन्होंने अपने अपने काल में प्रजा की सृष्टि, पालन आदि किया है। उनका नाम- स्वारोचिष, औत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष और वैवस्वत है | ॥६१-६२॥
मनुस्मृति अध्याय १- मन्वन्तर आदि काल का मान
स्वायंभुवाद्याः सप्तैते मनवो भूरितेजसः ।
स्वे स्वेऽन्तरे सर्वमिदमुत्पाद्यापुश्चराचरम् ॥ ॥६३॥
निमेषा दश चाष्टौ च काष्ठा त्रिंशत् तु ताः कला ।
त्रिंशत् कला मुहूर्तः स्यादहोरात्रं तु तावतः ॥ ॥६४॥
अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषदैविके ।
रात्रिः स्वप्राय भूतानां चेष्टायै कर्मणामहः ॥ ॥६५॥
पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तु पक्षयोः ।
कर्मचेष्टास्वहः कृष्णः शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी ॥ ॥६६॥
अब मन्वन्तर आदि काल का मान कहते हैं- आँख की पलक गिरने का समय निमेष कहलाता हैं, १८ निमेष की एक काष्ठा नामक काल होता है, ३० काष्ठा की एक कला, ३० कला का एक मुहूर्त, ३० मुहूर्त का एक अहोरात्र होता है।
मनुष्य और देव अहोरात्र - दिन, रात का विभाग सूर्य करता है । उसमें प्राणियों के सोने के लिए रात और कर्म करने के लिए दिन होता है। मनुष्यों के एक मास का पितरों का एक अहोरात्र होता है। उसमें कृष्णपक्ष का दिन कर्म करने और शुक्लपक्ष की रात्रि शयन करने के लिए होता है ।। ६३-६६।
दैवे रात्र्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः ।
अहस्तत्रोदगयनं रात्रिः स्याद् दक्षिणायनम् ॥ ॥६७॥
ब्राह्मस्य तु क्षपाहस्य यत् प्रमाणं समासतः ।
एकैकशो युगानां तु क्रमशस्तन्निबोधत ॥ ॥६८॥
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत् कृतं युगम् ।
तस्य तावत्शती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ॥ ॥ ६९ ॥
इतरेषु ससंध्येषु ससंध्यांशेषु च त्रिषु ।
एकापायेन वर्तन्ते सहस्राणि शतानि च ॥ ॥७०॥
यदेतत् परिसङ्ख्यातमादावेव चतुर्युगम् ।
एतद् द्वादशसाहस्रं देवानां युगमुच्यते ॥ ॥ ७१ ॥
दैविकानां युगानां तु सहस्रं परिसङ्ख्यया ।
ब्राह्ममेकमहर्ज्ञेयं तावतीं रात्रिमेव च ॥ ॥७२॥
मनुष्य के एक वर्ष में देवताओं का अहोरात्र होता है। उसमें उत्तरायण दिन और दक्षिणायन रात है । ब्राह्म अहोरात्र और चारों युगों का प्रमाण इस प्रकार है - मनुष्यों के तीन सौ साठ (३६०) वर्ष का एक (१) दैव वर्ष होता है। ऐसे चार हजार (४०००) वर्षों को कृतयुग कहते हैं और उसकी संध्या (युग का आरम्भकाल) और सन्ध्यांश (युग का अन्तकाल ) दोनों चार सौं (४००) वर्ष का है। इस तरह सन्ध्या और सन्ध्यांश मिलकर चार हजार दो सौ (४२००) दैववर्ष का कृतयुग होता है अर्थात् ४०० x ३६० = १७२८००० (सत्रह लाख अट्ठाइस हजार) वर्ष उसका मान है। बाकी त्रेता, द्वापर और कलि इन तीनों के सन्ध्या और सन्ध्यांश के साथ जो संख्या होती है, उस में हजार में सैकड़े की और सैकड़े में की एक एक संख्या घटाने से तीनों की संख्या पूरी होती हैं। इस प्रकार त्रेतायुग ३६०० = १२६६००० (बारह लाख छियासठ हजार) । द्वापर २४०० = ६६३००० (छियासठ लाख तीन हज़ार) और कलि १२०० = ४३२००० (तिरालिस लाख दो हज़ार ) मान होते हैं। यह जो पहले चारों युगों की बारह हजार १२००० दैववर्ष संख्या कही है, यह एक, दैवयुग का मान है। ऐसे हजार दैवयुगों का ब्रह्मा का १ दिन और उतनी ही रात होती है। अर्थात् दो हजार दैववर्षों का ब्रह्मा का अहोरात्र होता है । १२००० दैववर्ष का एक १ युग, इसको १००० गुणा करने से १,२०,००,००० (एक करोड़ बीस लाख) देव वर्षों का ब्राह्मदिन और इतनी ही रात्रि हुई। इसे ३६० से गुणा करने से ४,३२,००,००,००० (चार करोड़ बत्तीस लाख) मनुष्य वर्षों का ब्राह्मदिन और उतनी ही रात्रि होती है ॥६७-७२ ॥
तद्वै युगसहस्रान्तं ब्राह्मं पुण्यमहर्विदुः ।
रात्रिं च तावतीमेव तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ ॥ ७३ ॥
तस्य सोऽहर्निशस्यान्ते प्रसुप्तः प्रतिबुध्यते ।
प्रतिबुद्धश्च सृजति मनः सदसदात्मकम् ॥ ॥७४॥
मनः सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानं सिसृक्षया ।
आकाशं जायते तस्मात् तस्य शब्दं गुणं विदुः ॥ ॥७५॥
आकाशात् तु विकुर्वाणात् सर्वगन्धवहः शुचिः ।
बलवाञ्जायते वायुः स वै स्पर्शगुणो मतः ॥ ॥७६॥
वायोरपि विकुर्वाणाद् विरोचिष्णु तमोनुदम् ।
ज्योतिरुत्पद्यते भास्वत् तद् रूपगुणमुच्यते ॥ ॥७७॥
ज्योतिषश्च विकुर्वाणादापो रसगुणाः स्मृताः ।
गन्धगुणा भूमिरित्येषा सृष्टिरादितः ॥ ॥७८॥
एक हजार युग का ब्रह्मा का पुण्यदिन और उतनी ही रात्रि है। उस रात्रि के अन्त में ब्रह्मा सोकर जागता है और अपने मन को सृष्टि में प्रेरित करता है। परमात्मा की इच्छा से प्रेरित मन सृष्टि को विकृत करता है । मनसतत्व से आकाश पैदा होता हैं जिस का गुण शब्द है । आकाश के विकार से, गन्ध को धारण करनेवाला, पवित्र वायु उत्पन्न हुआ है, उसका स्पर्शगुण है। वायु के विकार से, अन्धकार नष्ट करनेवाला, प्रकाशमान अग्नि पैदा हुआ है, उसका गुण रूप है। अग्नि से जल उत्पन्न होता है, जिसका गुण रस है और जल से पृथिवी उत्पन्न होती है, जिसका गुण गन्ध है। यही आदि से सृष्टि की उत्पत्ति का क्रम है ॥ ७३-७८॥
यद् प्राग् द्वादशसाहस्रमुदितं दैविकं युगम् ।
तदेकसप्ततिगुणं मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ ॥ ७९ ॥
मन्वन्तराण्यसङ्ख्यानि सर्गः संहार एव च ।
क्रीडन्निवैतत् कुरुते परमेष्ठी पुनः पुनः ॥ ॥ ८० ॥
चतुष्पात् सकलो धर्मः सत्यं चैव कृते युगे ।
नाधर्मेणागमः कश्चिन् मनुष्यान् प्रति वर्तते ॥ ॥८१॥
इतरेष्वागमाद् धर्मः पादशस्त्ववरोपितः
चौरिकानृतमायाभिर्धर्मश्चापैति पादशः ॥ ॥८२॥
अरोगाः सर्वसिद्धार्थाश्चतुर्वर्षशतायुषः ।
कृते त्रेतादिषु ह्येषामायुर्हसति पादशः ॥ ॥ ८३ ॥
वेदोक्तमायुर्मर्त्यानामाशिषश्चैव कर्मणाम् ।
फलन्त्यनुयुगं लोके प्रभावश्च शरीरिणाम् ॥ ॥ ८४ ॥
अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां द्वापरेऽपरे ।
अन्ये कलियुगे नृणां युगहासानुरूपतः ॥ ॥८५॥
पूर्व जो बारह हजार वर्ष का एक दैवयुग कहा है, ऐसे ७१ युग का एक मन्वन्तरकाल होता है। मन्वन्तर असंख्य हैं, सृष्टि और संहार भी असंख्य हैं। परमात्मा यह सब क्रीडाव्रत अर्थात बिना श्रम के खेल खेल में ही किया करते हैं कृतयुग में धर्म पूरा, चार पैर का और सत्यमय होता है क्योंकि उस समय में अधर्म से मनुष्यों की कोई कार्य नहीं बनता था। दूसरे युगों में धर्म क्रम से चोरी, झूठ, माया इन सभी से चौथाई-चौथाई घटता है। सत्ययुग में सब रोग रहित होते हैं। सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ४०० वर्ष की आयु होती है। आगे त्रेता आदि में चतुर्थांश घटती जाती है । मनुष्यों को, वेदानुसार आयु, कर्मों के फल और देह का प्रभाव, सब युगानुसार फल देते हैं युगों के अनुसार धर्म का स्वरुप बदलता रहता है, सतयुग में धर्म का स्वरुप कुछ और होता है, त्रेता में कुछ और, द्वापर में उससे अलग, कलि में कुछ दूसरे ही प्रकार का बन जाता है, इस तरह चारों युगों में धर्म का स्वरूप आपस में विलक्षण होता हैं ॥ ७९-८५ ॥
तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते ।
द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे ॥ ॥८६॥
सर्वस्यास्य तु सर्गस्य गुप्त्यर्थं स महाद्युतिः।
मुखबाहूरुपज्जानां पृथक्कर्माण्यकल्पयत् ॥ ॥ ८७ ॥
अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा ।
दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥ ॥८८॥
प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च ।
विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः ॥ ॥ ८९ ॥
पशूनां रक्षणं दानमिज्याऽध्ययनमेव च ।
वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च ॥ ॥ ९० ॥
एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् ।
एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया ॥ ॥ ९१ ॥
सतयुग में तप मुख्य धर्म है, त्रेतायुग में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ और कलियुग में एक मात्र दान देना मुख्य धर्म है। परमात्मा ने, संसार की रक्षा के लिये ब्राह्मण आदि चारों वर्णों के काम, अलग अलग नियत किये। पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, दान लेना, यह छः कर्म ब्राह्मणों के हैं। प्रजा की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, पढ़ना और इन्द्रियों के विषयों में न फंसना, यह क्षत्रियों के कर्म हैं। पशुओं को पालना, दान देना, यज्ञ कराना, व्यापार करना, ब्याज लेना और खेती करना, यह सभी कर्म वैश्यों के हैं। परमात्मा ने शूद्रों का एक ही काम बतलाया है भक्ति से इन सभी वर्णों की सेवा कार्य में संलग्न होना ॥ ८६- ९१ ।।
ऊर्ध्वं नाभेर्मेध्यतरः पुरुषः परिकीर्तितः ।
तस्मान् मेध्यतमं त्वस्य मुखमुक्तं स्वयंभुवा ॥ ॥९२॥
उत्तमाङ्गोद्भवाज् ज्येष्ठयाद् ब्रह्मणश्चैव धारणात् ।
सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः ॥ ॥ ९३ ॥
पुरुष नाभि के ऊपर पवित्र माना गया है। उससे भी उस का मुख अतिपवित्र है । परमात्मा के मुखतुल्य होने से, चारों वर्णों में बड़ा होने से, और वेद पढ़ाने से, ब्राह्मण सारे जगत् का प्रभु है ॥९२-९३ ॥
तं हि स्वयंभूः स्वादास्यात् तपस्तप्त्वाऽदितोऽसृजत् ।
हव्यकव्याभिवाह्याय सर्वस्यास्य च गुप्तये ॥ ॥ ९४ ॥
यस्यास्येन सदाऽश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकसः ।
कव्यानि चैव पितरः किं भूतमधिकं ततः ॥ ॥ ९५ ॥
भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः ।
बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः ॥ ॥९६॥
ब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुद्धयः ।
कृतबुद्धिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवेदिनः ॥ ॥९७॥
उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिर्धर्मस्य शाश्वती ।
स हि धर्मार्थमुत्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ॥९८ ॥
ब्रह्मा ने अपने मुख से दैव और पितृकार्य संपादनार्थ और लोक की भलाई के लिए, ब्राह्मण को उत्पन्न किया है। जिसके मुख द्वारा देवगण हव्य और पितृगण कव्य (श्राद्धादि में) को ग्रहण करते हैं उससे श्रेष्ठ कौन है? भूत (स्थावर, जङ्गम) में प्राणी (कीटदि ) श्रेष्ठ हैं। इनमें भी बुद्धिजीवी (पशु आदि) इनसे भी मनुष्य श्रेष्ठ है उनमें भी ब्राह्मण अधिक श्रेष्ठ है। और ब्राह्मणों में विद्वान्, विद्वानों में कर्म जाननेवाले, उनमें कर्म करनेवाले और उनमें से भी ब्रह्मज्ञानी श्रेष्ठ होता है। ब्राह्मण का शरीर ही धर्म की अविनाशी मूर्ति है। क्योंकि, वह धर्म द्वारा मोक्ष को प्राप्त होता है ।। ९४-९८ ॥
ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यामधिजायते ।
ईश्वरः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये ॥ ॥ ९९ ॥
सर्वं स्वं ब्राह्मणस्येदं यत् किं चित्जगतीगतम् ।
श्रेष्ठ्येनाभिजनेनेदं सर्वं वै ब्राह्मणोऽर्हति ॥ ॥ १०० ॥
ब्राह्मण का उत्पन्न होना पृथिवीं में सबसे उत्तम है। क्योंकि सब जीवों के धर्मरूपी संचित धनराशि की रक्षार्थ वह समर्थ है अर्थात ब्राह्मण ही धर्म की रक्षा के लिए उपदेश देने में समर्थ है। जो कुछ जगत् के पदार्थ हैं वह सभी ब्राह्मणों के हैं। ब्रह्ममुख से उत्पन्न होने के कारण ब्राह्मण, सब ग्रहण करने योग्य है ॥ ९९-१००॥
स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च ।
आनृशंस्याद् ब्राह्मणस्य भुञ्जते हीतरे जनाः ॥ ॥१०१॥
तस्य कर्मविवेकार्थं शेषाणामनुपूर्वशः ।
स्वायंभुवो मनुर्धीमानिदं शास्त्रमकल्पयत् ॥ ॥ १०२ ॥
विदुषा ब्राह्मणेनैदमध्येतव्यं प्रयत्नतः ।
शिश्येभ्यश्च प्रवक्तव्यं सम्यग् नान्येन केन चित् ॥ ॥ १०३ ॥
इदं शास्त्रमधीयानो ब्राह्मणः शंसितव्रतः ।
मनोवाक्देहजैर्नित्यं कर्मदोषैर्न लिप्यते ॥ ॥ १०४ ॥
पुनाति पङ्क्तिं वंश्यांश्च सप्तसप्त परावरान् ।
पृथिवीमपि चैवेमां कृत्स्नामेकोऽपि सोऽर्हति ॥ ॥ १०५ ॥
ब्राह्मण, यदि दूसरे का दिया अन्न भोजन करे, या वस्त्र पहने, या दान दे, तब भी वह सब ब्राह्मण का अपना ही है। अन्य सभी तो ब्राह्मणों की कृपा से भोजन पाते हैं। ब्राह्मण और क्षत्रियों के कर्म विवेक के लिये स्वायम्भुव मनु ने यह धर्मशास्त्र बनाया है। विद्वान् ब्राह्मण को यह धर्मशास्त्र पढ़ना और शिष्यों को पढ़ाना चाहिये और शिष्यों के अतिरिक्त अन्य किसी को इसका उपदेश नहीं करना चाहिये । नियमनिष्ठ ब्राह्मण जो इस शास्त्र का अध्ययन करता है वह मन, वाणी, देह के पापों से लिप्त नहीं होता। धर्मशास्त्रविशारद ब्राह्मण अपने अपवित्र स्वजनों को पवित्र कर देता है और अपने वंश के सात पिता, पितामह आदि और पुत्र, पौत्र आदि को पवित्र कर देता है और समस्त पृथिवी को भी वह प्राप्त करने योग्य है ॥ १०१-१०५ ॥
इदं स्वस्त्ययनं श्रेष्ठमिदं बुद्धिविवर्धनम् ।
इदं यशस्यमायुष्यं इदं निःश्रेयसं परम् ॥ ॥ १०६ ॥
अस्मिन् धर्मेऽखिलेनोक्तौ गुणदोषौ च कर्मणाम् ।
चतुर्णामपि वर्णानामाचारश्चैव शाश्वतः ॥ ॥ १०७॥
आचारः परमो धर्मः श्रुत्योक्तः स्मार्त एव च ।
तस्मादस्मिन् सदा युक्तो नित्यं स्यादात्मवान् द्विजः ॥ ॥ १०८ ॥
यह शास्त्र, कल्याणदायक, बुद्धिवर्धक, यशदायक, आयुवर्धक और मोक्ष का सहायक है। इस स्मृति में सारे धर्म कहे कहे हैं। कर्मों के गुणदोष भी कहे हैं और चारों वर्णों का शाश्वत अर्थात परंपरा से प्राप्त आचार कथन भी किया गया है। श्रुति और स्मृति में कहा आधार परधर्म है, इसलिए इसमें ब्राह्मणों को सदा तत्पर रहना चाहिए ॥१०६ - १०८ ॥
आचाराद् विच्युतो विप्रो न वेदफलमश्रुते ।
आचारेण तु संयुक्तः सम्पूर्णफलभाग्भवेत् ॥ ॥ १०९ ॥
एवमाचारतो दृष्ट्वा धर्मस्य मुनयो गतिम् ।
सर्वस्य तपसो मूलमाचारं जगृहुः परम् ॥ ॥११०॥
अपने आचार से हीन ब्राह्मण वेदफल को नहीं पाता और जो आचार युक्त है वह फलभागी होता है। इस प्रकार मुनियों ने, आचार से धर्म प्राप्ति देखकर, धर्म के परममूल आचार को ग्रहण किया है ॥ १०६- ११० ॥
जगतश्च समुत्पत्तिं संस्कारविधिमेव च ।
व्रतचर्योपचारं च स्नानस्य च परं विधिम् ॥ ॥ १११ ॥
दाराधिगमनं चैव विवाहानां च लक्षणम् ।
महायज्ञविधानं च श्राद्धकल्पं च शाश्वतम् ॥ ॥ ११२ ॥
वृत्तीनां लक्षणं चैव स्नातकस्य व्रतानि च ।
भक्ष्याभक्ष्यं च शौचं च द्रव्याणां शुद्धिमेव च ॥ ॥ ११३ ॥
स्त्रीधर्मयोगं तापस्य मोक्षं संन्यासमेव च ।
राज्ञश्च धर्ममखिलं कार्याणां च विनिर्णयम् ॥ ॥ ११४ ॥
साक्षिप्रश्नविधानं च धर्मं स्त्रीपुंसयोरपि ।
विभागधर्मं द्यूतं च कण्टकानां च शोधनम् ॥ ॥ ११५ ॥
अब इस धर्मशास्त्र में मनु ने, किन किन विषयों को कहे हैं, उसकी संख्या बतलाते हैं-जगत् की उत्पत्ति, संस्कारों की विधि, ब्रह्मचारियों के व्रताचरण, गुरुवन्दन, उपासना आदि स्नानविधि, स्त्रीगमन, विवाहों की लक्षण, महायज्ञ - वैश्वदेवादि श्राद्धाविधि, जीवनोपाय, गृहस्थ के व्रतनियम, भक्ष्य - अभक्ष्य का विचार, आशौचनिर्णय, द्रव्यशुद्धि, स्त्रियों के धर्मोपाय, वानप्रस्थ आदि तपों के धर्म, मोक्ष और संन्यासधर्म, राजाओं के संपूर्ण धर्म, कार्यों का निर्णय-साखी - गवाहियों से प्रश्नविधि, स्त्री-पुरुषों के धर्म, हिस्सा-बाँट और जुआरी, चोरों का शुद्धिकरण कहा गया है ॥१११-११५ ॥
वैश्यशूद्रोपचारं च सङ्कीर्णानां च संभवम् ।
आपद्धर्मं च वर्णानां प्रायश्चित्तविधिं तथा ॥ ॥ ११६ ॥
संसारगमनं चैव त्रिविधं कर्मसंभवम् ।
निःश्रेयसं कर्मणां च गुणदोषपरीक्षणम् ॥ ॥ ११७ ॥
देशधर्मान्जातिधर्मान् कुलधर्मांश्च शाश्वतान् ।
पाषण्डगणधर्मांश्च शास्त्रेऽस्मिन्नुक्तवान् मनुः ॥ ॥ ११८ ॥
वैश्य और शूद्रों के धर्मानुष्ठान का प्रकार, वर्णसङ्करों की उत्पत्ति, वर्णों का आपद्धर्म और प्रायश्चित्तविधि, उत्तम, मध्यम, अधम इन तीन प्रकार के कर्मों से देहगति का निर्णय, मोक्ष का स्वरूप, और कर्मों के गुण दोष की परीक्षा, देश धर्म, जाति का धर्म, कुल का धर्म जो परंपरा से चला आता हैं। पाखण्डियों के कर्म, गण-वैश्य आदि धर्म इस शास्त्र में भगवान् मनु ने कहा है | ११६-१८ ।।
यथैदमुक्तवांशास्त्रं पुरा पृष्टो मनुर्मया ।
तथैदं यूयमप्यद्य मत्सकाशान्निबोधत ॥ ॥ ११९ ॥
जिस प्रकार, मनु से पूर्वकाल में मैंने पूछा, तब उन्होंने इस शास्त्र उपदेश किया था। उसी प्रकार अब आप मुझसे सुनिये ॥११९ ॥
॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां स्मृतौ प्रथमोऽध्यायः समाप्तः॥१॥
॥ महर्षि भृगु द्वारा प्रवचित मानव धर्म शास्त्र स्मृति का पहला अध्याय समाप्त ॥
