॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Manusmriti Chapter 6
मनुस्मृति षष्ठम अध्याय
।।मनुस्मृति षष्ठ अध्याय।।
एवं गृहाश्रमे स्थित्वा विधिवत्स्नातको द्विजः ।
वने वसेत्तु नियतो यथावद्विजितेन्द्रियः ॥ 1 ॥
अपनी विद्या पूरी करके घर लौटने वाले स्नातक द्विज को गृहस्थाश्रम में रहने (25 से 50 वर्ष तक) के बाद वन में जाकर निवास करना चाहिए तथा अपनी इन्द्रियों पर विजय पाने के नियमों का पालन करना चाहिए।
गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वालीपलितमात्मनः ।
अपत्यस्यैव चापत्त्यं तदाऽऽरण्यं समाश्रयेत् ।।
गृहस्थ पुरुष जब अपनी त्वचा को ढीला, बालों को पका हुआ और सफेद देखे तथा अपनी सन्तान की सन्तान को देख ले तब उसे वन में चला जाना चाहिए।
सन्त्यज्य ग्राम्यमाहारं सर्वं चैव परिच्छदम् ।
पुत्रेषु भार्या निक्षिप्य वनं गच्छेत्सहैव वा ॥3॥
ऊपर के श्लोक में बताई गई स्थिति को देखकर गृहस्थ पुरुष को गांव में खाए जाने वाले भोजन (पौष्टिक तथा राजसी भोजन) को, सभी तरह के राजसी वस्त्रों को (घोड़ा, रथ, शय्या, गाय, भैंस आदि) सुविधाप्रद साधनों को त्याग कर तथा अपनी पत्नी को पुत्र को सौंप कर या उसे साथ लेकर वन को चले जाना चाहिए।
अग्निहोत्रं समादायं गृह्यं चाग्निपरिच्छदम् ।
ग्रामादरण्यं निःसृत्य निवसेन्नियतेन्द्रियः ॥4॥
यज्ञ-यागादि के लिए आवश्यक पात्रों को तथा वन के योग्य वस्त्रों को लेकर गांव-नगर से निकल कर जंगल में चले जाना चाहिए तथा वहां अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखते हुए निवास करना चाहिए।
मुन्यन्नैर्विविधैर्मेध्यैः शाकमूलफलेन वा।
एतानेव महायज्ञान्निर्वपेद्विधिपूर्वकम् ॥ 5 ॥
वानप्रस्थ बने व्यक्ति को वन में जाकर ऋषि-मुनियों द्वारा यज्ञ-यागादि में उपयोग किए जाने वाले अनेक प्रकार के अन्नों, शाकों, कन्द-मूल फलों से बडे-बड़े यज्ञों का विधि अनुसार अनुष्ठान करना चाहिए।
वसीत चर्म चीरं वा सायं स्नायात्प्रगे तथा।
जटाश्च बिभृयान्नित्यं श्मश्रुलोम नखानि च ॥6॥
वन में रहने वाले व्यक्ति को हिरण का चर्म या वृक्षों की छाल पहनकर रहना चाहिए। उसे प्रातःकाल तथा सायंकाल स्नान करना चाहिए। उसे अपनी दाढ़ी, मूंछ, बाल तथा नाखून कटवाने नहीं चाहिए।
यद्भक्षः स्यात्ततो दद्याद् बलिंभिक्षां च शक्तितः । अम्मूलफलाभिक्षाभिरर्चयेदाश्रमागतान् ।।7॥
सरलता से प्राप्त भोजन सामग्री में से बलि (गाय, कुत्ता, कौआ आदि पंच वैश्वदेव) और भिखारी को भिक्षा देनी चाहिए। उसे आश्रम में आए अतिथियों का जल, कन्द-मूल फल और भिक्षा में प्राप्त अन्न से स्वागत करना चाहिए।
स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद्दान्तौ मैत्रः समाहितः ।
दाता नित्यमनादाता सर्वभूतानुकम्पकः ॥ 8 ॥
वानप्रस्थ धारण करने वाले व्यक्ति को नित्य स्वाध्याय, इन्द्रिय दमन, दूसरों का उपकार तथा सभी के लिए मित्रता का भाव रखना चाहिए। उसमें दानशीलता, अपरिग्रह तथा सभी जीवों के प्रति दया होनी चाहिए।
वैतानिकं च जुहुयादग्निहोत्रं यथाविधिः ।
दर्शमस्कन्दयन्पर्व पौर्णमासं च योगतः ॥ 9 ॥
वानप्रस्थ को वैतानिक (गार्हपत्य कुण्ड की अग्नि को आवहनीय दक्षिणाग्नि में मिलाने वाला) बन कर विधि अनुसार अग्निहोत्र करना चाहिए तथा समय-समय पर आने वाले दर्श पौर्णमास यज्ञों को करना चाहिए।
दर्शष्ट्याग्रयणं चैव चातुर्मास्यानि चाहरेत् ।
उत्तरायणं च क्रमशो दाक्षस्यायनमेव च ॥ 10 ॥
वानप्रस्थ बने व्यक्ति को विशेष नक्षत्रों से सम्बद्ध, चातुर्मास में किए जाने वाले, उत्तरायण और दक्षिणायन में किए जाने वाले यज्ञों का सम्पादन करना चाहिए।
वासन्तशारदैर्मेध्यैर्मुन्यन्नैः स्वयमाहृतैः ।
पुरोडाशांश्चरूंश्चैव विधिवन्निर्वपेत्पृथक् ॥ 11 ॥
वानप्रस्थ को अपने हाथ से लाए अन्न तथा मुनियों द्वारा सेवन किए जाने वाले अन्नों से पुरोडाश तथा चरु बनाकर उन ऋतुओं में होने वाले यज्ञों का सम्पादन करना चाहिए।
देवताभ्यस्तु तद्भुत्वा वन्यं मेध्यतरं हविः । शेषमात्मनि भुञ्जीत लवणं च स्वयं कृतम् ॥ 12 ।।
वन में पैदा होने वाले अत्यन्त पावन अन्न आदि की देवताओं को हवि देकर शेष अन्न में अपने द्वारा लाया लवण मिलाकर उसका सेवन करना चाहिए।
स्थलजौदकशाकानि पुष्पमूलफलानि च। मेध्यवृक्षोद्भवान्यद्यात्स्नेहांश्च फलसम्भवान् ॥ 13 ॥
धरती तथा सरोवर आदि के जल में उत्पन्न होने वाले शाकों, पावन वृक्षों में लगने वाले फूलों, फलों और कन्द-मूलों से और फलों से निकलने वाले तेलों से वानप्रस्थ को अपना पालन-पोषण करना चाहिए।
वर्जयेन्मधुमांसं च भौमानि कवकानि च।
भूस्तृणं शिग्रुकं चैव श्लेष्मातकफलानि च ॥ 14 ।।
मांस, मदिरा, भूमि पर उत्पन्न होने वाली खुम्बी, भूतृण, सोहांजना और लेसदार फल जैसे लसूड़े आदि वानप्रस्थ को नहीं खाने चाहिए।
त्यजेदाश्वयुजे मासि मुन्यन्नं पूर्वसञ्चितम्।
जीर्णानि चैव वासांसि शाकमूलफलानि च ॥ 15 ॥
आश्विन माह में, पहले से एकत्रित मुनियों के खाने योग्य अन्न को, पुराने कपड़ों को, बासी शाक, कन्द-मूल तथा फल आदि को वानप्रस्थ को त्याग देना चाहिए।
न फालकृष्टमश्नीयादुत्सृष्टमपि केनचित् ।
न ग्रामजातान्यार्त्ताऽपि मूलानि च फलानि च ।। 16 ।।
किसी के द्वारा हल चले खेत में छोड़े गए अन्न को और व्याकुल होने पर भी गांव-नगर में पैदा होने वाले कंद-मूल फलों का सेवन वानप्रस्थ को नहीं करना चाहिए।
अग्निपक्वाशनो वा स्यात्कालपक्वभुगेव वा।
अश्मकुट्टो भवेद्वाऽपि दन्तोलूखलिकोऽपि वा ।। 17 ।।
वानप्रस्थ व्यक्ति को आग में पके हए, उचित समय पर पके हुए, पत्थरों में पिसे हुए तथा दांतों से चबाए हुए पदार्थ ही भोजन के रूप में ग्रहण करने चाहिए।
सद्यः प्रक्षालको वा स्यान्माससञ्चयिकोऽपि वा।
षण्मासनिचयो वा स्यात्समानिचय एव वा ॥18॥
वानप्रस्थ को एक समय का, एक माह का, छह माह का या एक वर्ष का (अन्न) भोजन संग्रह करना चाहिए। इस अवधि से अधिक का भोजन नहीं संग्रह करना चाहिए।
नक्तं चान्नं समश्नीयाद्दिवा वाऽऽहृत्य शक्तितः ।
चतुर्थकालिको वा स्यात्स्याद्वाऽप्यष्टमकालिकः ॥ 19 ॥
वानप्रस्थ यथाशक्ति अन्न को लाकर (सायंकाल) रात में या दिन में अथवा एक दिन पूरा उपवास कर दूसरे दिन सायंकाल या तीन दिन-रात उपवास कर चौथे दिन सायंकाल भोजन करे।
चान्द्रायणविधानैर्वा शुक्लकृष्णे च वर्तयेत् । पक्षान्तयोर्वाऽप्यश्नीयाद्यवागूं क्वथितां सकृत् ॥ 20 ॥
वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाला चाहे तो चान्द्रायण व्रत की विधि के अनुसार शुक्ल पक्ष में भोजन के ग्रासों (कौरों) को घटाए-बढ़ाए या पक्ष के अन्त में अर्थात् पूर्णमासी और अमावस्या को एक बार जौ की लपसी खाएं।
पुष्पमूलफलैर्वाऽपि केवलैर्वर्तयेत्सदा ।
कालपक्वैः स्वयं शीर्णैर्वैखानसमते स्थितः ॥ 21 ॥
वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह समय से पक कर गिरने वाले फलों-फूलों से अपना जीवन यापन करे।
भूमौ विपरिवर्तेत तिष्ठेद्वा प्रपदैर्दिनम् ।
स्थानासनाभ्यां विहरेत्सवनेषूपयन्नपः ।। 22 ।।
वानप्रस्थ या तो भूमि पर बैठा रहे या दिन भर खड़ा रहे। उसे अपने आसन की परिधि में ही टहलना चाहिए तथा दिन में तीन बार, प्रातः, मध्याह्न तथा सायं स्नान करना चाहिए।
ग्रीष्मे पञ्चतपास्तु स्याद्वर्षास्वभावकाशिकः ।
आर्द्रवासास्तु हेमन्ते क्रमशौ वर्धयंस्तपः ॥ 23 ।।
गर्मी की ऋतु में पंचाग्नि साधना करे। वर्षा ऋतु में खुले आकाश के नीचे भीगता रहे और शीतकाल में गीले वस्त्र पहने। इस भांति अपनी सहनशक्ति को विकसित करे।
टिप्पणी- धूप में अपने चारों ओर आग जलाकर उसके बीच में बैठा रहना पंचाग्नि साधना करना कहलाता है।
उस्पृशंस्त्रिषवणः पितृन्देवांश्च तर्पयेत्।
तपश्चरश्चोग्रतरं शोषयेद्देहमात्मनः ।। 24 ।।
वानप्रस्थ को चाहिए कि वह तीनों समय सुबह, दोपहर और शाम स्नान करके पितरों तथा देवों को तर्पण करे। वह कठिन से कठिन साधना करके अपने शरीर को सुखा दे।
अग्नीनात्मनि वैतानान्समारोप्य यथाविधिः ।
अनग्निरनिकेतः स्यान्मुनिर्मूलफलाशनः ।। 25 ॥
वैखानस शास्त्रानुसार वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाला अग्नियों को विधिपूर्वक अपनी आत्मा में समारोपित करके फल-मूल को खाता हुआ अग्नि तथा अपने स्थान को भी पूरी तरह छोड़ दे।
अप्रयत्नः सुखार्थेषु ब्रह्मचारी धराशयः ।
शरणेष्वममश्चैव वृक्षमूल निकेतनः ।। 26 ।।
वानप्रस्थ को सुख देने वाले साधनों को पाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उसे अपनी इन्द्रियों पर पूरा नियंत्रण रखने वाला और शरणस्थलों के प्रति मोह रहित होकर वृक्ष के नीचे अपना निवास रखने वाला होना चाहिए।
तापसेष्वपि विप्रेषु यात्रिकं भैक्षमाहरेत् ।
गृहमेधिषु चान्येषु द्विजेषु वनवासिषु ।। 27 ।।
वानप्रस्थ को तपस्वियों से केवल अपने जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक भिक्षा लेना चाहिए, अधिक नहीं। वन में वास करने वाले तपस्वियों से भिक्षा नहीं मिलने पर वनवासी ब्राह्मणों से या दूसरे गृहस्थों से भिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।
ग्रामादाहृत्य वाश्ऽनीयादष्टौ ग्रासान्वने वसन्।
प्रतिगृह्य पुटेनैव पाणिना शकलेन वा ।। 28॥
वानप्रस्थ ऐसा भी कर सकता है कि गांव से आठ ग्रास भर भिक्षा लाकर किसी पत्ते या कसोरे में रख कर उसी से अपना पेट भर कर जीवन का निर्वाह करे।
एताश्चान्याश्च सेवेत दीक्षाः विप्रो वने वसन्। विविधाश्चौपनिषदीरात्मसंसिद्धये श्रुतिः ।। 29 ॥
ऋषिभिर्ब्रह्मणैश्चैव गृहस्थैरेव सेविताः ।
विद्यातपोविवृद्धयर्थं शरीरस्य च शुद्धये ॥30॥
वानप्रस्थ इस प्रकार की (ऊपर के श्लोकों में बताई) दीक्षाओं का पालन करता हुआ अपने आत्म-कल्याण हेतु अनेक ऋषियों-मुनियों, ब्राह्मणों तथा गृहस्थों द्वारा विद्या तथा तप का विकास करे एवं आत्मशद्धि के लिए उपनिषदों का स्वाध्याय करे।
अपराजितां वाऽऽस्थाय व्रजेद्दिशमजिह्मगः ।
आ निपाताच्छरीरस्य युक्तो वार्यनिलाशनः ॥ 31 ।।
वानप्रस्थाश्रम में रहने वाला देहान्त होने तक जल-वायु का सेवन करे तथा अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर सरल गति से इधर-उधर जाता रहे।
आसां महर्षिचर्याणां त्यक्त्वाऽन्यतमया तनुम् ।
वीतशोकभयो विप्रो ब्रह्मलोके महीयते ।। 32 ॥
महर्षियों द्वारा बताई तथा पालन की गई ऊपर लिखी चर्याओं में से किसी एक चर्या का पालन करता हुआ ब्राह्मण (विप्र) शरीर का त्याग करते समय भय तथा शोक से स्वतंत्र होकर ब्रह्म लोक में जाकर प्रतिष्ठित होता है।
वनेषु च विहृत्यैवं तृतीयं भागमायुषः ।
चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा सङ्गान्परिव्रजेत् ॥ 33 ॥
आयु के तीसरे भाग को (50 वर्ष से 75 वर्ष) वन में रहते हुए व्यतीत करने के बाद चतुर्थ भाग (75 वर्ष से 100 वर्ष) के आते ही सभी तरह के विषयों और व्यक्तियों को छोड़कर संन्यास आश्रम धारण करना चाहिए।
आश्रमादाश्रमं गत्वा हुतहोमो जितेन्द्रियः ।
भिक्षाबलिपरिश्रान्तः प्रव्रजन् प्रेत्य वर्धते ॥ 34 ॥
इस तरह ब्रह्मचर्य आश्रम से गृहस्थाश्रम, गृहस्थ से वानप्रस्थ आश्रम और वानप्रस्थ से संन्यास आश्रम में जाते हुए जीवन भर यज्ञ-होम करने वाला जितेन्द्रिय एवं भिक्षा तथा बलि कर्म से थका हुआ व्यक्ति मृत्यु होने पर मोक्ष का अधिकरी बन जाता है।
ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्।
अनपाकत्य मोक्षं तु सेवमानो व्रजत्यधः ॥ 35 ॥
तीनों ऋणों (पित ऋण, ऋषि ऋण तथा देव ऋण) को चुकाने के बाद ही व्यक्ति को मोक्ष को पाने के प्रयत्नों में लगना चाहिए। इन ऋणों (सन्तानोत्पत्ति, ज्ञान-प्रसार, यज्ञ आदि का अनुष्ठान) से उबरे बिना मोक्ष की इच्छा करने वाले का अधःपतन हो जाता है।
अधीत्य विधिवद्वेदान्पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः।
इष्ट्वा च शक्ति तो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत् ॥ 36 11
विधि-विधान के अनुसार वेदाध्ययन करके, विवाह करके संतान को जन्म देकर और अपनी सामर्थ्यानुसार यज्ञों का संपादन करके अर्थात् तीनों ऋणों से मुक्त होने के बाद ही व्यक्ति को मोक्ष हेतु प्रयत्न करने चाहिए।
अनधीत्य द्विजो वेदाननुत्पाद्य तथा प्रजाम् ।
अनिष्ट्वा चैव यज्ञैश्च मोक्षमिच्छन्व्रजत्यधः ।। 37 ॥
वेदों का अध्ययन किए बिना, संतान को जन्म दिए बिना और ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों को किए बिना मोक्ष पाने का प्रयत्न करने वाले का अधःपतन हो जाता
है।
प्राजापत्यां निरुप्येष्टि सर्ववेदसदक्षिणाम्।
आत्मन्यग्नीन्समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद्गृहात् ॥ 38 ।।
वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाले को अपना सब कुछ दक्षिणा में देने, प्रजापति के परितोषक यज्ञ का अनुष्ठान करके तथा आत्मज्ञान की ज्योति को जलाकर संन्यास आश्रम में जाना चाहिए।
यो दत्वा सर्वभूतेभ्यः प्रव्रजत्यभयं गृहात्।
तस्य तेजोमया लोका भवन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ 39 ॥
समस्त जीवों को अभयदान करके वानप्रस्थ से संन्यास आश्रम में जाने वाले ब्रह्मज्ञानी को तेजपूर्ण लोकों की उपलब्धि होती है।
यस्मादण्वपि भूतानां द्विजान्नोत्पद्यते भयम् ।
तस्य देहाद्विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥ 40॥
जिस द्विज के जीवनकाल में उससे अन्य प्राणियों को अणुभर भी भय नहीं होता अर्थात जो किसी जीव को नहीं सताता, उसकी मृत्यु होने पर उसके लिए इस जगत और मार्ग में किसी तरह का भय नहीं रहता।
आगारादभिनिष्क्रान्तः पवित्रोपचितो मुनिः ।
समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥ 41 ॥
अपना घर त्याग कर निकला पवित्र आचार-विचार का मुनि उत्तम कायों में भी तटस्थता दिखाता हुआ संन्यास ग्रहण करे।
एक एव चरेन्नित्यं सिद्धयर्थमसहायवान्।
सिद्धिमेकस्य सम्पश्यन्न जहाति न हीयते ॥ 42 ॥
किसी से मित्रता की कामना नहीं करे और इस तथ्य को समझे कि जो एकाकी विचरण करता है उसे ही मोक्ष प्राप्त होता है। उसे यह साधना करनी चाहिए कि न वह कुछ छोड़ता है और न उससे कुछ छूटता है।
अनग्निरनिकेतः स्याद्द्याममन्नार्थमाश्रयेत् । उपेक्षकोऽसाञ्चयिको मुनिर्भाव समाहितः ॥ 43 ।।
संन्यासी को घर, अग्नि आदि का त्याग कर भिक्षा के लिए गांव का सहारा लेना चाहिए। उसे सुख-दुख को समान समझते हुए चिन्ताओं से मुक्त होकर मुनियों के धर्म का पालन करना चाहिए।
कपालं वृक्षमूलानि कुचैलमसहायता।
समता चैव सर्वस्मिन्नेतन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ 44 ।।
* मुक्त पुरुष के लक्षण ये हैं- वह खप्पर का उपयोग बर्तन के रूप में करता है, वृक्ष के नीचे ही उसका घर होता है, वस्त्रों के स्थान पर पेड़ों की छाल पहनता है, एकाकी रहते हुए जीवन व्यतीत करता है और समस्त जीवों एवं पदार्थों में समदृष्टि रखता है।
नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देज्जीवनम् ।
कालमेव प्रतीक्षेत निर्देशं भृतको यथा ॥ 45 ।
संन्यासी को न जीवन का अभिनन्दन करना चाहिए, न मृत्यु का। उसे तो मृत्यु की प्रतीक्षा इस तरह करनी चाहिए जैसे कोई सेवक स्वामी के निर्देश की प्रतीक्षा करता है।
दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् ।
सत्यपूतां वदेद्वाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥ 46 ॥
संन्यासी व्यक्ति को देखकर चलना चाहिए (जिससे उसके पैरों के नीचे कोई जीव न कुचल जाए), वस्त्र से छानकर पानी पीना चाहिए, सच बोलना चाहिए और शरीर से ही नहीं वरन् मन से भी पवित्र आचरण करना चाहिए।
अति वादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन।
न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥ 47 ॥
कुद्धयन्तं न प्रतिकृध्येदाक्कृष्टः कुशलं वदेत्।
सप्तद्वारा ऽवकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत् ।। 48 ||
दसरों के कडवे वचनों को भी संन्यासी सहन करे। गाली का उत्तर गाली से न दे और किसी का अपमान नहीं करे। इस नाशवान काया (देह) के लिए संन्यासी किसी से शत्रुता नहीं रखनी चाहिए।
को संन्यासी क्रोध करने वाले के प्रति सहनशील रहते हए क्रोध नहीं करे, निन्दक के प्रति सद्भाव रखे। इन सातों द्वारों में बिखरी वाणी से कभी असत्य नहीं बोलना चाहिए।
अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः ।
आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह ।। 49 ॥
उसे (संन्यासी) अध्यात्म में प्रेम रखने वाला, किसी की अपेक्षा न रखने वाला, शाकाहारी, ऐन्द्रिय विषयों से मुक्त एवं अपनी ही सहायता से आत्मिक कल्याण और आनन्द पाने वाला होकर विचरण करना चाहिए।
न चोत्पातनिमित्ताभ्यां न नक्षत्राङ्गविद्यया।
नानुशासनवादाभ्यां भिक्षां लिप्सेत कर्हिचित् ॥ 50 ॥
संन्यासी को भिक्षा पाने के लिए उत्पातों की पूर्व सूचना देना, ज्योतिष विद्या द्वारा भविष्य कथन करना, उपदेश देना एवं वाद-विवाद करना आदि से बचना चाहिए।
न तापसैर्ब्रह्मणैर्वा वयोभिरपि वा श्वभिः ।
आकीर्णं भिक्षुकैर्वाऽन्यैरागारमुपसंव्रजेत् ।। 51 ॥
तपस्वियों, ब्राह्मणों, वृद्धजनों, पशुओं, पक्षियों और भिक्षुओं से घिरे हुए भवन में संन्यासी को भिक्षा लेने के लिए नहीं जाना चाहिए।
क्लृप्तकेशनखश्मश्रुः पात्री दण्डी कुसुम्भवान् ।
विचरेन्नियतो नित्यं सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ 52 ।।
संन्यासी को अपने बाल, नख और दाढी-मूंछ मुड़वा कर, हाथ में खप्पर तथा दण्ड (डंडा) लेकर, जोगिए रंग के वस्त्र पहन कर, अपनी इन्द्रियों के वश में रखकर एवं किसी भी जीव को दुख नहीं देते हए इधर-उधर विचरते रहना चाहिए।
अतैजसानि पात्राणि तस्य स्युर्निव्रणानि च।
तेषामद्भिः स्मृतं शौचं चमसानामिवाध्वरे ।। 53 ॥
संन्यासी द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले बरतन मूल्यवान धातुओं के नहीं होने चाहिए। वे टूटे-फूटे भी नहीं होने चाहिए। संन्यासी के पात्र (बरतन) यज्ञ के चमसों की भांति जल से धोए जाने पर शुद्ध हो जाते हैं।
अलावसुं दारुपात्रं च मुण्मयं वैदलं तथा।
एतानि यतिपात्राणि मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।। 54 ।।
भृगु जी ने कहा- महर्षियो ! स्वायम्भुव मनु ने बताया है कि संन्यासियों के पास तुम्बी, लकड़ी, बांस या मिट्टी के बरतन होने चाहिए।
एककालं चरेद्भक्षं न प्रसज्जेत विस्तरे ।
भैक्षे प्रसक्तो हि यतिर्विषयेष्वपि सज्जति ।। 55 ॥
एक समय भिक्षा मांग कर संन्यासी को उसी से अपना पालन करना चाहिए। उसे एक से ज्यादा बार भिक्षा मांगने की प्रवृत्ति से दूर रहना चाहिए। एक से अधिक बार भिक्षा मांगने के लोभ में फंसा संन्यासी विषयों में फंसने लगता है।
विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवञ्जने ।
वृत्ते शराव सम्पाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत् ॥ 56 ।।
जहां रसोई का धुआं बुझ चुका हो, उसी घर से संन्यासी को सदैव भिक्षा मांगनी चाहिए। इसके अतिरिक्त उसे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उस घर में कूटने-पीसने के कार्य, पूरे हो चुके हों और खाने-पीने के पात्र धो-पोंछकर रख दिए गए हों।
कहने का आशय यह है कि गृहस्थों के यहां जब भोजन आदि बनाने का कार्य पूरी तरह समाप्त हो जाए तभी संन्यासी को भिक्षार्थ जाना चाहिए।
अलाभे न विषादीस्याल्लाभे चैव न हर्षयेत् ।
प्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रासङ्गादिनिर्गतः ।। 57 ॥
संन्यासी भिक्षा मिलने पर प्रसन्न और न मिलने पर अप्रसन्न न हो। उसे अपना जीवन यापन करने के लिए उदरपूर्ति से सम्बन्ध रखना चाहिए। खाए जाने वाले पदार्थ के रूप, रस तथा गन्ध पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
अभिपूजितलाभांस्तु जुगुप्सेतैव सर्वशः ।
अभिपूजितलाभैश्च यतिर्मुक्तोऽपि बध्यते ॥ 58 ॥
आदर सहित मिलने वाली स्वादिष्ट भिक्षा की संन्यासी को उपेक्षा करनी चाहिए क्योंकि उसके स्वाद में रस नहीं लेने पर भी संन्यासी को वह यजमान के स्नेह-बंधन में जकड़ती है।
अल्पान्नाभ्यवहारेण रहः स्थानासनेन च।
ह्रियमाणानि विषयैरिन्द्रियाणि निवर्तयेत ॥ 59 ॥
संन्यासी को चाहिए कि वह विषयों द्वारा सींची जाने वाली इन्द्रियों को थोड़ा भोजन देकर और जनहीन स्थान पर एकान्त में अपने नियंत्रण में करे।
इन्द्रियाणां निरोधेन रागद्वेषक्षयेण च।
अहिंसया च भूतानाममृतत्त्वाय कल्पते ।। 60 ॥
संन्यासी इन्द्रियों पर संयम रख करके, राग-द्वेष को कम से कम करके तथा जीव हिंसा न करके अपने लिए मोक्ष लाभ का पथ बनाता है।
अवेक्षेत गतीनृणां कर्मदोषसमुद्भवाः।
निरये चैव पतनं यातनाश्च यमक्षये ॥ 61॥
विप्रयोगं प्रियैश्चैव संयोगं च तथाऽप्रियैः।
जरया चाभिभवनं व्याधिभिश्चोपपीडनम् ।। 62 ।।
संन्यासी को कर्मदोषों से मनुष्यों की बुरी दशाओं, नरक में गिरने तथा यमलोक में अनेक प्रकार की कठोर यातनाओं को सहने, प्रियजनों से बिछुड़ने और अप्रिय लोगों से मिलने, वृद्धावस्था के कष्टों, रोगों की पीड़ाओं, देह त्याग के बाद फिर से गर्भ में गिरने और जीवात्मा के करोड़ों योनियों में जन्म लेकर कष्ट सहने आदि पर विचार करना चाहिए।
अधर्मप्रभवं चैव दुःखयोगं शरीरिणाम्।
धर्मार्थप्रभवां चैव सुखसंयोगमक्षयम् ।। 63 ॥
जीवों के सुख का कारण उनके द्वारा किए जाने वाले धार्मिक कर्म होते हैं। इसी प्रकार उनके पाप कर्म उनके दुखों का कारण बनते हैं। अतः सुख पाने के लिए धर्म का पालन करना आवश्यक है।
सूक्ष्मतां चान्ववेक्षेत योगेन परमात्मनः ।
देहेषु च समुत्पत्ति मुत्तमेष्वधमेषु च ॥ 64 ॥
संन्यासी को योग विद्या की साधना कर सूक्ष्म से भी सूक्ष्म परमात्मा का ध्यान करना चाहिए। उसे फल भोग की कामना के कारण निम्र कोटि की योनियों में जीव के जन्म लेने पर विचार करते हुए धार्मिक कर्मों में लगे रहना चाहिए।
दूषितोऽपि चरेद्धर्म यत्रतत्राश्रमे रतः।
समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥ 65 ॥
द्विज चाहे किसी आश्रम में हो उसे सभी प्राणियों को दोष से ग्रस्त होने पर भी समान दृष्टि से देखना चाहिए तथा ऐसा करते हुए अपने धर्म का अनुसरण करना चाहिए। धर्म का आधार शुभ कार्यों को आचरण में लाना है, उसका प्रदर्शन करना नहीं।
फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम् ।
न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति ।। 66 ॥
निर्मली नामक पेड़ का फल निश्चित रूप से जल को शुद्ध करता है परन्तु जिस तरह उसकी जानकारी होने या नाम लेने से जल शुद्ध नहीं हो सकता उसी तरह धर्म की जानकारी से नहीं वरन् आचरण से जीव का कल्याण होता है।
संरक्षणार्थं जन्तूनां रात्रावहनि वा सदा।
शरीरस्यात्यये चैव समीक्ष्य वसुधां चरेत् ॥ 67 ।।
संन्यासी को रात-दिन स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरे प्राणियों की रक्षार्थ धरती पर दृष्टि डालते हुए चलना चाहिए।
अह्ना रात्र्या च याञ्जन्तून्हिनस्त्यज्ञानतो यतिः ।
तेषां स्नात्वा विशुद्धयर्थं प्राणायामान्षडाचरेत् ॥ 68 ॥
दिन या रात में, अनजाने में, अपने द्वारा मारे जाने वाले जीव-जन्तुओं के पाप से मुक्त होने के लिए नहाकर छह प्राणायाम करने चाहिए।
प्राणायामाः ब्राह्मणस्य त्रयोऽपि विधिवत्कृताः ।
व्याहृति प्रणवैर्युक्ताः विज्ञेयं परमं तपः ।। 69।
ब्राह्मण द्वारा प्रणव-ओ३म तथा व्याहृति (भूः भुवः स्वः) के साथ विधि अनुसार किए गए तीन प्राणायामों को भी उसका परम तप मानना चाहिए।
दह्यन्ते ध्यायमानानां धातूनां हि यथा मलाः ।
तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥ 70 ।।
अग्नि में सोना, चांदी आदि धातुओं को डालने से जिस तरह उनकी अशुद्धता दूर हो जाती है, उसी तरह प्राणायाम की साधना करने से इन्द्रियों के समस्त दोष तथा विकार समाप्त हो जाते हैं।
प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्च किल्बिषम्।
प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ।। 71 ।।
अन्य दुर्गुणों से मुक्त हो। ब्राह्मण प्राणायाम साधना द्वारा शारीरिक दोषों पर, धारणाओं द्वारा पापों पर, प्रत्याहार द्वारा साथ में रहने से उत्पन्न होने वाले दोषों पर तथा ध्यान द्वारा मोह तथा
प्राणायाम है। टिप्पणी प्राण की स्वाभाविक गति श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित करना
प्रत्याहार- जब चित्त शांत हो जाता है, मन-बुद्धि भी शांत हो जाते हैं।
फलस्वरूप इंद्रियां अपने आहार रूपी विषयों के साथ सम्बन्ध नहीं जोड पातीं। यही प्रत्याहार है।
धारणा किसी भी आंतरिक या बाह्य विषयों पर चित्त को पूरी तरह एकाग्र कर देना।
ध्यान-जिस विषय में धारणा से चित्त वृत्ति लगाई हो, उस विषय में सजातीय वृत्ति का धारावत अखंडित प्रवाह करना ही ध्यान है।
उच्चावचेषु भूतेषु दुर्जेयामकृतात्मभिः ।
ध्यानयोगेन सम्पश्येद्गतिमस्यान्तरात्मनः ।। 72 ।।
तत्ववेत्ता योगी को ध्यान योग द्वारा प्राणियों को मृत्यु के बाद मिलने वाली उत्तम या अधम योनियों को देखना चाहिए। यह कार्य अज्ञानी पुरुषों के लिए सर्वथा अज्ञात तथा असम्भव है।
सम्यग्दर्शन सम्पन्नः कर्मभिर्न निबध्यते ।
दर्शनेन विहीनस्तु संसारं प्रतिपद्यते ॥ 73 ।।
आत्म साक्षात्कार कर लेने वाला योगी कर्मों के बन्धनों में नहीं पड़ता। जो अहंकार से अच्छे-बुरे कर्मों के ब्रह्म का दर्शन नहीं कर पाता वही कर्तापन के परिणामस्वरूप आवागमन के चक्र में पड़ता है।
अहिंसयेन्द्रियासंगैवैदिकैश्चैव कर्मभिः ।
तपसश्चरणैश्चोग्रैः साधयन्तीह तत्पदम् ।। 74 ॥
अहिंसा, इंद्रिय संयम, विषयों को पूरी तरह त्याग देने, वैदिक कर्मों को करने और कठोर तप से योगी ब्रह्म को प्राप्त कर लेते हैं।
अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् ।
चर्मावनद्धं दुर्गन्धिपूर्ण मूत्रपुरीषयोः ॥ 75 ॥
जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम्। रजस्वलमनित्यञ्चभूतावासमिमं त्यजेत् ॥ 76 ॥
तत्वज्ञानी संन्यासी इस लोक में ऐसे कर्म करे कि अस्थियों का ढांचा बना, स्नायुओं की रस्सियों में से बंधा, रक्त-मांस से सना, त्वचा से मढ़ा, मल-मूत्र मे दर्गन्धित, वृद्धावस्था, शोक तथा रोग का घर, क्षुधा तथा तृष्णा से ग्रस्त, मलिन, नाशवान तथा पंच भूतों का निवास रूपी यह शरीर सदैव के लिए छूट जाए और पुन: जन्म न हो।
टिप्पणी- यह कथन विशेष रूप से संन्यासियों के लिए है।
नदीकूलं यथा वृक्षो वृक्षं वा शकुनिर्यथा।
तथा त्यजन्निमं देहं कूच्छ्राद्ग्राहाद्विमुच्यते ॥ 77 ।।
जिस तरह नदी तट पर खड़ा वृक्ष जैसे ही गिरता है, उस पर बैठा पक्षी उसे छोड़कर उड़ जाता है, उसी तरह संन्यासी मोह रहित भाव से इस शरीर का अंत होते ही इस संसार से मुक्त हो जाता है।
प्रियेषु स्वेषु सुकृतमप्रियेषु च दुष्कृतम्।
विसृज्य ध्यानयोगेने ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥ 78 ॥
संन्यासी अपने प्रियजनों के सद्गुणों और अप्रिय जनों के दुर्गुणों से होने वाले राग-द्वेष से स्वतंत्र होकर ध्यान योग से सदैव रहने वाले परमात्मा को प्राप्त करता है।
यदा भावेन भवति सर्वभावेषु निःस्पृहः ।
तदासुखमवाप्नोति प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥ 79 ॥
जब संन्यासी सभी विषयों से अपनी दोष दृष्टि (अर्थात् संसार के सभी विषय दुख देने वाले हैं यह दृष्टिकोण) के कारण मुक्त हो जाता है तब वह इस संसार और परलोक में वास्तविक और अनश्वर सुख को प्राप्त करता है।
अनेन विधिना सर्वांस्त्यक्त्वा सङ्गान् शनैः शनैः । सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तो ब्रह्मण्येवावतिष्ठते ।। ४० ।।
वह सभी संगों (धन, स्त्री, पुत्र, यश आदि) में अपनी आसक्ति को एक-एक करके धीरे-धीरे त्याग कर समस्त द्वन्द्वों (सुख-दुख, हानि-लाभ आदि) से मुक्त होकर ब्रह्मलीन हो जाता है।
ध्यानिकं सर्वमेवैतद्यदेतदभिशब्दितम् ।
न ह्यनध्यात्मवित्कश्चित्क्रियाफलमुपाश्नुते ॥ 81
संन्यासी मन तथा समग्र भाव से मोह-माया का त्याग करता है। केवल दूसरों को दिखाने के लिए किए गए त्याग से संन्यासी को कोई फल नहीं मिलता।
अधियज्ञं ब्रह्म जपेदाधिदैविकमेव च।
आध्यात्मिकं च सततं वेदान्ताभिहितं च यत् ।। 82 ॥
वेदों के यज्ञ तथा देवपूजन से संबंधित, आत्मा के विषय से संबंधित तथा वेदान्त से सम्बन्धित मंत्रों का संन्यासी को सदैव जाप करते रहना चाहिए।
इदं शरणमज्ञानामिदमेव विजानताम्।
इदमन्विच्छतां स्वर्गमिदमानन्त्यमिच्छताम् ।। 83 ।।
वेद मंत्रों का जाप सभी को अभीष्ट फल प्रदान करता है, चाहे उसे ज्ञानी करे या अज्ञानी, स्वर्ग के सुखों की कामना करने वाला करे अथवा मोक्ष पाने की इच्छा करने वाला करे।
अनेन कर्मयोगेन परिव्रजति यो द्विजः।
स विधूयेह पाप्मानं वरं ब्रह्मधिगच्छति ।। 84 ।।
संन्यास धारण करने वाला द्विज सांसारिक मोह त्याग तथा वेदों का स्वाध्याय करके अपने सभी पापों का नाश कर देता है और परमात्मा को उपलब्ध करता है।
एष धर्मोऽनुशिष्टो वो यतीनां नियतात्मनाम् ।
वेदसंन्यासिकानां तु कर्मयोगं निबोधत् ॥ 85 ॥
भृग जी कहते हैं- ब्राह्मणो! मैंने अब तक आपको आश्रम विधि के अनुसार संन्यास लेने वाले जितेन्द्रिय महात्माओं के धर्म बताए। मैं अब आपको वेद संन्यासियों के धर्म बता रहा हूं।
टिप्पणी - वेद संन्यासी से आशय उन व्यक्तियों से है जो घर में ही वैराग्य धारण करके रहते हैं। वे किसी तरह के संन्यासी के चिह्न नहीं धारण करते।
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा।
एते गृहस्थप्रभवाश्चत्वारः पृथगाश्रमाः ॥ 86 ॥
सर्वेऽपि क्रमशस्त्वेते यथाशास्त्रं निषेविताः ।
यथोक्तकारिणं विप्रं नयन्ति परमां गतिम् ॥ 87 ॥
चारों आश्रम के व्यक्ति गृहस्थ से ही जन्म लेते हैं। इसके साथ ही गृहस्थ भिक्षा देकर तीनों आश्रम में रहने वालों का भरण-पोषण करता है।
शास्त्र द्वारा बताए इन चारों आश्रमों का क्रम से सेवन करने वाला और हरेक आश्रम के धर्म पर चलने वाला (अर्थात जब जिस आश्रम हो तब उसी आश्रम का धर्म पालन करने वाला) ब्राह्मण परमगति को प्राप्त करता है।
सर्वेषामपि चैतेषां वेदस्मृतिविधानतः ।
गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठः स त्रीनेतान्बिभर्ति हि ॥ 88 ॥
यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् ।
तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥ 89 ॥
चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ है। वेद-स्मृति का यही मत है। इसका कारण यह है कि गृहस्थाश्रम में रहने वाला ही अन्य तीन आश्रमों में रहने वालों का पालन करता है।
जिस तरह सभी नदी-नद सागर में मिल कर शांत हो जाते हैं, उसी तरह समस्त आश्रमों में भटकता प्राणी गृहस्थ आश्रम में ही स्थिर होता है।
चतुर्भिरपि चैवैतैर्नित्यमा श्रमिभिर्द्विजैः ।
दशलक्षणको धर्मः सेवितव्यः प्रयत्नतः ॥ १० ॥
दस लक्षणों वाले धर्म के प्रति चारों आश्रमों के द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) को नित्य सावधान होकर उनका विशेष रूप से पालन करना चाहिए।
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ 91 ।।
धर्म के जो दस लक्षण बताए गए हैं, वे इस प्रकार हैं- 1. धीरज रखना 2. क्षमा करना 3. मन पर काबू रखना 4. चोरी नहीं करना 5. मन, वाणी तथा कर्म में शुद्धता रखना 6. ज्ञानेन्द्रियों एवं कमेन्द्रियों अर्थात् सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना 7. शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करना 8. ब्रह्म ज्ञान पाना 9. सत्य बोलना 10. क्रोध नहीं करना (मनुस्मृति की कुछ प्रतियों में 'धी' की जगह 'ह्री' का पाठ है 'ह्री' का अर्थ है- आत्म विज्ञापन नहीं करना या संकोचशील होना) ।
दश लक्षणानि धर्मस्य ये विप्राः समधीयते ।
अधीत्य चानुवर्तन्ते ते यान्ति परमां गतिम् ॥ 92 ॥
जो ब्राह्मण दस लक्षणों वाले धर्म का ज्ञान प्राप्त कर उनका पालन करते हैं, वे परमगति को उपलब्ध होते हैं।
दशलक्षणकं धर्ममनुष्ठिन्समाहितः ।
वेदान्तं विधिवच्छ्रुत्वा संन्यसेदनृणो द्विजः ॥ 93 ॥
दस लक्षणों वाले धर्म का समाहित होकर पालन करते हुए वेदांत को विधिवत् सुनकर ब्राह्मण को संन्यास धारण करना चाहिए।
संन्यस्य सर्वकर्माणि कर्मदोषानपानुदन् ।
नियतो वेदमभ्यस्य पुत्रैश्वर्ये सुखं वसेत् ॥ 94 ॥
वेद संन्यासी (घर में रहते हुए संन्यास धारण करने वाले व्यक्ति) को गृहस्थ के सभी कर्मों को त्याग कर, कर्मों को करते हुए होने वाले पापों को प्राणायाम की साधना द्वारा नष्ट करना चाहिए। उसे वेदों का स्वाध्याय करते हुए अपने पत्र के ऐश्वर्य (पुत्र द्वारा दिए जाने वाले भोजन, वस्त्र आदि का उपयोग करते हुए) को जितेन्द्रिय बन कर भोगना चाहिए।
टिप्पणी-वेद संन्यासी अग्निहोत्र यज्ञ आदि गृहस्थ के कग्ने योग्य कर्मों का त्याग कर देता है। वह घर में रहकर भी माया-मोह से रहित होता है।
संन्यसेत्सर्वकर्माणि वेदं तु न परित्यजेत् ।
परित्यागाद्धि वेदस्य शूद्रतामनुगच्छति ।। 95 ॥
संसार के समस्त कार्यों से वेद संन्यासी को विरक्त हो जाना चाहिए परन्तु उसे वेदों का पाठ करना नहीं त्यागना चाहिए क्योंकि वेदों का त्याग करने से व्यक्ति शूद्र बन जाता है।
एवं संन्यस्य कर्माणि स्वकार्यपरमोऽस्पृहः ।
संन्यासेनापहत्यैनः प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ 96 ॥
इस तरह समस्त गार्हस्थ्य कर्मों का त्याग कर सब प्रकार से निस्पृह बना संन्यासी परम कार्य अर्थात् आत्मसाक्षात्कार द्वारा सभी पापों को पूरी तरह नाश करके परमगति पाता है।
एष वोऽभिहितो धर्मो ब्राह्मणस्य चतुर्विधः ।
पुण्योऽक्षयफलः प्रेत्य राज्ञां धर्म निबोधत ॥ 97 ।।
महर्षि भृगु जी कहते हैं- विप्रो ! मैंने लोक-परलोक में अक्षय पुण्य देने वाले ब्राह्मण के चार आश्रमों के धर्मों की जानकारी आप लोगों को प्रदान की है। अब मैं क्षत्रियों (राजाओं) के द्वारा पालन किए जाने योग्य धर्म बताता हूं।
॥ मनुस्मृति षष्ठ अध्याय सम्पूर्ण ॥
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