॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Manusmriti Chapter 2
मनुस्मृति अध्याय 2
मनुस्मृति द्वितीय अध्याय
विद्वद्धिः सेवितः सद्धिर्नित्यमद्वेषरागिभिः ।
हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत ॥ 1 ॥
मनु भगवान महर्षियों से कहते हैं- महर्षियो! धर्मात्माओं (धर्म के ज्ञाता तथा उसका पालन करने वाले) एवं राग-द्वेष से रहित (जिनमें प्रिय जनों के प्रति मोह नहीं और शत्रुओं के प्रति घृणा नहीं है) निर्विकार भाव से जीवन जीने वाले विद्वानों द्वारा सदैव पालन किया जाने वाला और हृदय से भली प्रकार जाना गया जो धर्म है, उसका एकाग्रचित्त होकर श्रवण करो।
आशय यह है कि मनुस्मृति में जिस धर्म का वर्णन किया गया है वह उन महान आत्माओं की अनुभूति का सार है जो वेद विद्या के विद्वान थे और जिनका व्यावहारिक जीवन विश्वबंधुत्व की भावना से ओतप्रोत था। अतः यह सभी प्रकार से आदर्श तथा अनुकरणीय है।
कामात्मता न प्रशस्ता न चैवेहास्त्यकामता ।
काम्यो हि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिकः ॥ 2 ॥
कामना करना अथवा कर्म फल की इच्छा करना श्रेष्ठ नहीं है (इसका कारण यह है कि कामना प्रायः लौकिक विषयों को प्राप्त करने की होती है। इसी प्रकार जो कर्म, फल पाने की इच्छा से किया जाता है वह वांछित फल नहीं मिलने पर दुःख का कारण बनता है।) किन्तु कोई कामना नहीं होना भी उचित नहीं है क्योंकि वेद का ज्ञान और उसके अनुसार कर्म करना भी कामना (इच्छा) से होता है। अतः कामना को पूरी तरह त्याग देना वांछनीय नहीं।
अतः जिन कामनाओं या इच्छाओं का सम्बंध सांसारिक सुख-वैभव प्राप्त करने से है, वे त्यागने योग्य हैं लेकिन जो कामनाएं वेद विद्या को पाने तथा उसे अपने जीवन में लाने के लिए की जाती हैं, वे त्यागने योग्य नहीं हैं। निष्कर्ष यह है कि कामना अपने आपमें न तो बुरी है और न अच्छी। अतः उसको त्यागने की नहीं वरन् उसका लक्ष्य बदलने की आवश्यकता है।
सङ्कल्पमूलः कामो वै यज्ञाः सङ्कल्पसम्भवाः ।
व्रतानि यमधर्माश्च सर्वे सङ्कल्पजाः स्मृताः ।। ३ ।।
कामना से ही कार्य करने की प्रवृत्ति या दृढ़ निश्चय अर्थात् संकल्प का जन्म होता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि कामना का मूल संकल्प है। संकल्प अथवा दृढ़ निश्चय करने से ही यज्ञ पूरे होते हैं। यही नहीं वरन् सभी यम-नियम, व्रत, धार्मिक कार्य आदि संकल्प से ही होते हैं।
अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित्।
यद्यद्धि कुरुते किञ्चित्तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ॥ 4 ॥
सच यह है कि इस जगत में कोई भी ऐसी क्रिया नहीं है जिसके पीछे कोई कामना नहीं हो। इच्छा के बिना किसी मनुष्य को कोई कार्य करते हुए नहीं देखा जाता। मनुष्य जो कुछ भी करता है उसके पीछे कोई न कोई इच्छा या कामना अवश्य होती है। वास्तव में मनुष्य का कर्म उसकी इच्छा की ही चेष्टा है। कामना या इच्छा नहीं होने पर मनुष्य कुछ नहीं कर सकता।
तेषु सम्यग्वर्तमानो हि गच्छत्यमरलोकताम् ।
यथा सङ्कल्पितांश्चेह सर्वान्कामान्समश्नुते ।। 5 ।।
शास्त्रोक्त कर्मों को करने की इच्छा रखने वाला ज्ञानी व्यक्ति इस संसार के सभी मनोवांछित पदार्थों (धन, यश, समृद्धि, सफलता आदि) को प्राप्त करता है। इस जीवन के पश्चात् उसे अमरलोक की प्राप्ति होती है अर्थात् वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचरश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च॥6॥
इस श्लोक में धर्म के प्रमाण बताए गए हैं। एकमात्र वेद ही पूरे धर्म का मुख्य आधार है। दूसरे शब्दों में वेदों में धर्म का पूरा प्रतिपादन किया गया है। इसके अतिरिक्त धर्म के तत्व को जानने वाले शास्त्रों, चरित्र की उत्तमता, महात्माओं के आचरण एवं आत्मा की संतुष्टि (अर्थात् जहां धर्मशास्त्रों में किसी विषय के बारे में कई पक्ष बताए गए हैं, वहां जिस पक्ष के विधान को मानने से आत्मा प्रसन्न तथा संतुष्ट हो) को भी धर्म के तत्व का आधार मानते हैं।
उपर्युक्त का अभिप्राय यह है कि धर्म-अधर्म का निर्णय करने के लिए सबसे पहले वेद को प्रमाण मानना चाहिए। यदि वेद से कहीं संतुष्टि नहीं हो पाती, शास्त्रों के ज्ञान को प्रामाणिक मानना उचित है। यदि किसी तत्व का निर्णय शास्त्रों से भी नहीं हो पाता तो महात्माओं के चरित्र (अर्थात् उन्होंने उस विषय में क्या निर्णय लिया) को पढ़कर निर्णय लेना चाहिए। यदि इससे भी संतुष्टि नहीं मिले तो अपनी आत्मा को जिससे संतुष्टि मिले वही करना चाहिए।
यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः ।
सः सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ 7 ॥
भगवान मनु ने जिन कर्मों का विधान विभिन्न वर्षों के लिए किया है उनका वेद ही आधार है। वे वेद को ही समस्त ज्ञान का मूल स्रोत मानते हैं। वे समस्त वेदों के अर्थ जानने वाले हैं।
कहने का अर्थ यह है कि भगवान मनु ने जो कुछ कहा है वह वेद के अनुसार है। अतः मनुस्मृति एक प्रामाणिक ग्रन्थ है।
सर्वं तु समवेक्ष्येदं निखिलं ज्ञानचक्षुषा ।
श्रुतिप्रामाण्यतो विद्वान् स्वधर्मे निविशेत वै ॥৪॥
भगवान मनु का स्पष्ट निर्देश है कि विद्वान लोग वेदार्थज्ञानोचित सम्पूर्ण शास्त्र समूह को ज्ञान रूपी नेत्रों से सब विचार कर वेद की प्रामाणिकता से जांच कर अपने धर्म को निश्चित कर उसका पालन करें।
मनुजी के कथन से यह अर्थ निकलता है कि मनुस्मृति में दिए गए विषय की जांच-परख करने के लिए व्यक्ति को सबसे पहले यह देखना चाहिए कि इसमें जो उल्लेख किया गया है वह वेद पर आधारित है? यदि वेद पर आधारित है तो वह स्वतः प्रमाण है। ऐसा कहने का उद्देश्य यह हो सकता है कि मनु महाराज का विचार होगा कि यदि कोई दूसरा विद्वान उनके नाम से कोई वेद विरुद्ध ज्ञान मनुस्मृति में मिलाएगा तो भावी विद्वान उसे स्वीकार नहीं करेंगे। दूसरे मनुस्मृति को पढ़ने वाले को चाहिए कि वह इसे ज्ञानपूर्वक पढ़े। इस कथन द्वारा मनुजी ने भावी पीढ़ी को मनुस्मृति की समयानुकूल व्याख्या करने की पर्याप्त स्वतंत्रता दे दी है। यह निश्चय ही उनके महान भविष्यद्रष्टा और पूर्ण ज्ञानवान होने को स्पष्ट दर्शाता है।
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानवः ।
इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥9॥
वेदों तथा स्मृतियों में बताए गए धर्म का पालन करने से मनुष्य इस संसार में और परलोक में सद्कर्मों के फलस्वरूप अति उत्तम सुख को भोगता है।
श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः ।
ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्वभौ ॥ 10 ॥
यहां श्रुति शब्द का अर्थ वेद और स्मृति शब्द (भगवान मनु तथा अन्य महर्षियों द्वारा कथित ज्ञान) का धर्मशास्त्र है। इनके सभी विषय प्रतिकूल तर्क के योग्य नहीं हैं अर्थात वे प्रामाणिक हैं और उनके विरुद्ध कोई तर्क नहीं करना चाहिए। इसका कारण यह है कि इन दोनों से ही धर्म का प्रादुर्भाव हुआ है।
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ 11 ॥
धर्म के चार स्पष्ट लक्षण हैं- 1. वेद द्वारा प्रतिपादित, 2. स्मृतियों (धर्मशास्त्रों) द्वारा अनुमोदित, 3. महर्षियों द्वारा आचारित, 4. जहां किसी विषय के बारे में एक से अधिक पक्ष बताए गए हों, वहां जो धर्म अपनाने वाले व्यक्ति की आत्मा को प्रिय हो। इन कसौटियों पर सच्चा सिद्ध होने वाला तत्व ही प्रामाणिक धर्म है।
अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते।
धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ।। 12 ।।
धर्म का उपदेश देने का विधान उन्हीं लोगों के लिए है जो अर्थ और काम में आसक्त नहीं हैं अर्थात् उन्हीं मनुष्यों को धर्म का उपदेश दिया जाता है जो अधिकाधिक धन कमाने या अधिकाधिक काम सुख पाने में डूबे हुए नहीं हैं। इसका कारण यह है कि जो व्यक्ति धन लोभ या काम सुख में पूरी तरह डूबा है उसकी रुचि धर्म में नहीं रहती। ऐसे लोगों को यदि धर्म का उपदेश दिया जाए तब भी वे उसे अपनी आसक्ति के कारण समझेंगे नहीं। अतः मनु महाराज के अनुसार व्यक्ति को धनार्जन करने और काम सुख लेने में अनासक्त भाव रखना आवश्यक है अन्यथा वे अपने धर्म से पतित हो जाएंगे। धर्म तत्व को जानने के इच्छुक लोगों के लिए वेद ही सर्वोच्च प्रमाण हैं।
श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्यात्तत्र धर्मावुभौस्मृतौ ।
उभावपि हि तौ धर्मों सम्यगुक्तौ मनीषिभिः ॥ 13 ॥
वेदों में जहां दो वचनों में आपस में विरोध हो अर्थात् एक स्थान पर जो कहा गया हो वही दूसरे स्थान पर उसके विपरीत बताया गया हो अथवा अलग-अलग अर्थ लेने के कारण स्वरूप में विपरीतता आ गई हो, वहां मनीषी लोग दोनों को बराबर महत्व देते हुए दोनों को धर्म ही समझते हैं।
उदितेऽनुदिते चैव समयाध्युषिते तथा।
सर्वथा वर्तते यज्ञ इतीयं वैदिकी श्रुतिः ।। 14 ॥
उपर्युक्त श्लोक के कथन को पुष्ट करने के लिए महाराज मनु उदाहरण देकर समझाते हैं। उदाहरणार्थ-वेद में एक स्थान पर यह कहा गया है कि सूर्य जब उदय हो रहा हो तब यज्ञ करना चाहिए, दूसरे स्थान पर बताया गया है कि सूर्योदय होने से पहले यज्ञ करना चाहिए। इसी तरह कहीं सूर्य के अस्त होने से पहले यज्ञ करने के लिए कहा गया है तो कहीं सूर्य अस्त हो जाने के बाद। इन कथनों में कहीं भी आपस में विरोध नहीं समझना चाहिए। इस प्रकार के विकल्प वचन आने पर बताए गए सभी सम्मयों में अग्निहोत्र सम्बंधी यज्ञ करना धर्मानुकूल है।
निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः ।
तस्य शास्त्रेऽधिकारो ऽस्मिञ्ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित् ।। 15 ॥
मनुष्य के जन्म लेने से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों का वर्णन वेद के जिस प्रकरण में है उसी को मनुस्मृति में लिया गया है। हमने उसके अतिरिक्त अपनी ओर से अन्य कुछ नहीं कहा।
श्रुतिं पश्यन्ति मुनयः स्मरन्ति तु यथास्मृतिः ।
तस्मात्प्रमाणं मुनयः प्रमाणं प्रथितं भुवि ॥ 16 ।।
मुनि लोग वेदों का साक्षात्कार (दर्शन) करते हैं और वे ही लोग स्मृतियों को अपने स्मृति पटल पर अंकित कर स्मरण रखते हैं। अतः ऐसी लोक प्रसिद्धि है कि मुनियों का वचन भी प्रामाणिक है।
धर्मव्यतिक्रमो दृष्टः श्रेष्ठानां साहसं तथा।
तदन्वक्ष्य प्रयुञ्जानाः सीदन्त्यपरधर्मजाः ।। 17 ।।
हमने श्रेष्ठ व्यक्तियों को भी धर्म के नियमों का उल्लंघन करने का साहस करते हुए देखा है परन्तु हमारा यह दृढ़ मत है कि धर्म के विपरीत आचरण करने वालों को परिणाम में भारी दुःख उठाना पड़ता है। कहने का आशय यह है कि मुनि गण विवेकशील होते हैं, अतः वे किसी तरह का गलत साहस नहीं करते। अतएव उनके कथन प्रामाणिक ही होते हैं।
सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।
तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्त प्रचक्षते ॥ 18 ।।
ब्रह्मावर्त नामक देश जो स्वयं देवताओं द्वारा निर्मित किया गया है, वह सरस्वती और दृषद्वती नाम की देव नदियों के मध्यवर्ती भूभाग में बसा है।
तस्मिन्देशे य आचारः पारम्पर्यक्रमागतः ।
वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ॥ 19 ॥
उस देश अर्थात् ब्रह्मावर्त में रहने वाले (ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों) चारों वर्णों एवं वर्ण संकरों द्वारा अपनाया गया परम्परागत आचार ही सदाचार (सत्परुषों के द्वारा पालन किया जाने वाला) है जो सदा से चला आ रहा है।
विरुद्धा च विगीता च दृष्टार्थादिष्टकारणे।
स्मृतिर्न श्रुतिमूला स्याद्या चैषासम्भवश्रुतिः ।। 20 ।।
अगर इष्ट कार्यों के करने में सदाचार के विपरीत किसी स्मृति में कोई विवरण आता है, ऐसी स्थिति में उस स्मृति को वेदानुकूल नहीं समझना चाहिए। इसका कारण यह है कि वेद कभी सदाचार के विरुद्ध नहीं होते।
(यह पद्य केवल मेधातिथि द्वारा विहित मनुस्मृति के भाष्य में है अन्य में नहीं।)
कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पञ्चालाः शूरसेनकाः ।
एष ब्रह्मर्षिदेशो वै ब्रह्मावर्तादनन्तरः ।॥ 21 ॥
ब्रह्मर्षियों के निवास अन्य पवित्र देश कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पाञ्चाल तथा शूरसेनक हैं जो ब्रह्मावर्त के निकट स्थित हैं।
इसका अभिप्राय यह है कि सर्वाधिक विशेषता वाला देश ब्रह्मावर्त है। उसके बाद कुरुक्षेत्र आदि अन्य देशों का स्थान है।
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ।। 22 ॥
संसार के समस्त मानव अपने चरित्र और कर्मों के लिए इन देशों (ब्रह्मावर्त, कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पाञ्चाल और शूरसेनक) में जन्मे ब्राह्मण से शिक्षा लें।
कहने का आशय यह है कि इन देशों में रहने वाले ब्राह्मण का जीवन वैदिक शिक्षा के अनुसार पूरी तरह पवित्र एवं आदर्श रूप होता है। इसलिए उनका आचरण विश्व के सभी लोगों के लिए अनुकरण योग्य है।
यह मानव मनोविज्ञान के अनुसार भी स्वाभाविक है क्योंकि समाज जिन व्यक्तियों को श्रेष्ठ समझता है, उनका अनुकरण सामान्य लोगों द्वारा किया जाता है।
हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्ये यत्प्राग्विनशनादपि।
प्रत्यगेव प्रयागाच्च मध्यदेशः प्रकीर्तितः ॥ 23 ।।
हिमालय और विन्ध्याचल के बीच, सरस्वती नदी के पूर्व में तथा प्रयाग के पश्चिम में जो देश स्थित है उसका नाम मध्यदेश है।
आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्राच्च पश्चिमात् ।
तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त विदुर्बुधाः ।। 24 ॥
पूर्वी समुद्र व पश्चिमी समुद्र तक और उन्हीं दोनों पर्वतों हिमालय तथा विन्ध्याचल के मध्य स्थित प्रदेश को विद्वज्जन आर्यावर्त अर्थात आर्यों का आवतं (निवास) कहते हैं।
कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः ।
स ज्ञेयो यज्ञियो देशो म्लेच्छदेशस्त्वतः परः ।। 25 ॥
जहां पर काला मृग (हिरन) अपने स्वभाववश ही स्वच्छन्द विचरण करता रहता है (अर्थात् उसे कहीं से पकड़कर नहीं लाया गया है वरन् वह स्वेच्छा से घूमता रहता है।) वह यज्ञ की पवित्र यज्ञिय भूमि है। इससे आगे की भूमि में म्लेच्छों का निवास है।
(कुछ टीकाकारों ने कृष्णसार (काला) हिरन को ऐसा हिरन बताया है जिसकी चमड़ी अत्यधिक यज्ञों के उठते हुए धुएं के कारण काली हो गई हो।)
एतान् द्विजातयो देशान्संश्रयेरन्प्रयत्नतः ।
शूद्रस्तु यस्मिन्स्तस्मिन्वा निवसेवृत्तिकर्षितः ।। 26 ।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य (द्विजाति) के लोगों को चाहिए कि वे ब्रह्मावर्त, कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पाञ्चाल, शूरसेनक, मध्य देश, आर्यावर्त, यज्ञिय देश में से किसी भी एक देश में निवास करने का प्रयत्न करें। शूद्रों को जहां भी जीविका के साधन मिलें वहां रहें।
मनु महाराज ने निवास के सम्बंध में द्विज जनों को जो निर्देश दिया है उसके पीछे यह मनोवैज्ञानिक तथ्य छिपा है कि मनुष्य के चरित्र पर उसके वातावरण तथा परिस्थितियों का बहुत प्रभाव पड़ता है। चूंकि ऊपर बताए गए देशों में उस काल में सात्विक वातावरण तथा परिस्थितियां थीं और द्विज जन भी धर्मानुरागी होते थे अतः उनके लिए वे ही प्रदेश निवास हेतु श्रेष्ठ थे।
एषा धर्मस्य वो योनिः समासेन प्रकीर्तिता।
सम्भवश्चास्य सर्वस्य वर्णधर्मान्निबोधत ।। 27 ।।
ऋषियो! मैंने आप लोगों से धर्म के कारण तथा पूरे संसार की उत्पत्ति का विवरण संक्षेप में कहा। अब आप वर्ण धर्मों (1. वर्ण धर्म, 2. आश्रम धर्म, 3. वर्णाश्रम धर्म, 4. गौण धर्म, 5. नैमित्तिक धर्म) को ध्यान से सुनिए।
वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिद्विजन्मनाम् ।
कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ॥28॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य लोगों का शरीर सांसारिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से पवित्र बनाने के लिए वैदिक विधि-विधान से गर्भाधान, जातकर्म तथा नामकरण आदि सभी संस्कार करने चाहिए।
गाभैर्हो मैर्जातकर्मचौडमौञ्जीनिबन्धनैः ।
बैजिकं गर्भिकं चैनो द्विजानामपमुज्यते ।। 29 ।।
मानव शरीर की रचना स्त्री के रज तथा पुरुष के वीर्य के मिश्रण से होती है। उसका विकास स्त्री के गर्भाशय में होता है। द्विजों के वीर्य और गर्भ से उत्पन्न दोषों को गर्भ शुद्धिकारक हवन, चूड़ाकरण (मुण्डन) और यज्ञोपवीत संस्कार नष्ट कर देते हैं।
स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः ।
महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥ 30 ।।
वेदों और उपनिषदों आदि प्रामाणिक धर्मग्रंथों के अध्ययन और सत्य बोलने से, भौतिक पदार्थों का संकलन नहीं करने से, आध्यात्मिक साधना के व्रतों का पालन करने से, नित्य पूजा-अर्चना करने से, पुत्र उत्पन्न करने से (गृहस्थाश्रम का पालन करने हेतु), पर्वों पर किए जाने वाले यज्ञों से तथा विशेष अवसरों पर आयोजित होने वाले बड़े-बड़े यज्ञों (जैसे अश्वमेध, राजसूय आदि महायज्ञ) को करने से यह शरीर ब्रह्म प्राप्ति के योग्य होता है।
इस प्रकार शरीर तथा मनोमस्तिष्क को शुद्ध एवं पवित्र बनाने के लिए दो उपाय बताए गए हैं- 1. वैदिक संस्कार, 2. स्वाध्याय, व्रत, यज्ञादि।
प्राङ्नाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्मविधीयते।
मन्त्रवत्प्राशनं चास्य हिरण्यमधुसर्पिषाम् ॥ 31 ।।
जातक के जन्म लेने पर नाड़ा काटने से पूर्व 'जातकर्म' संस्कार किया जाता है। इसके उपरान्त 'प्राशन' संस्कार किया जाता है। इसमें वेदमंत्रों का उच्चारण करते हुए सोने की सलाई अथवा चम्मच से शिशु को घी और मधु चटाया जाता है।
नामधेयं दशम्यां तु द्वादश्यां वाऽस्य कारयेत् ।
पुण्ये तिथौ मुहूर्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते ॥ 32 ॥
जन्म के दसवें या बारहवें दिवस या उसकी परवर्ती किसी शुभ तिथि में, शुभमुहूर्त में शिशु का नामकरण संस्कार किया जाता है।
कुछ टीकाकारों का मत है कि अगर दसवें या बारहवें दिन शुभ मुहूर्त न आता हो तो ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जिस दिन भी शुभ मुहूर्त निकले उसी दिन नामकरण संस्कार करना उचित है।
माङ्गल्यं ब्राह्मणस्य स्यात्क्षत्रियस्य बलान्वितम् ।
वैश्यस्य धनसंयुक्तं शूद्रस्य तु जुगुप्सितम् ॥ 33 ।।
इस श्लोक में प्रत्येक वर्ण के नामकरण हेतु पृथक-पृथक नियम अपनाने के बारे में बताया गया है। ब्राह्मण का नाम मंगल सूचक शब्द से युक्त होना चाहिए (जैसे- आनन्द प्रकाश, ज्ञान प्रकाश, राम स्वरूप आदि), क्षत्रिय का नाम बलसूचक शब्द से युक्त होना चाहिए (जैसे- अजेय, विजय, शक्तिमान आदि), वैश्य का नाम धन सूचक होना चाहिए (जैसे- लक्ष्मीप्रसाद, धनपति, धनपाल आदि) तथा शूद्र का नाम सेवावृत्ति का सूचक होना चाहिए (जैसे-रामसेवक, कृष्णदास, चन्द्रदास) आदि।
शर्मवद् ब्राह्मणस्य स्याद्राज्ञो रक्षासमन्वितम्।
वैश्यस्य पुष्टिसंयुक्तं शूद्रस्य प्रेष्यसंयुतम् ॥ 34 ॥
भगवान मनु चारों वर्णों के नामों के साथ जोड़े जाने वाले उपनामों के बारे में बताते हैं कि ब्राह्मणों के नाम के साथ 'शर्मा' शब्द, क्षत्रियों के नामों के साथ 'रक्षा' का बोध कराने वाला शब्द, वैश्यों के नामों के साथ 'पुष्टि' का बोध कराने वाला शब्द तथा शूद्रों के नामों के साथ दासता का बोध कराने वाला शब्द जोड़ना चाहिए।
स्त्रीणां सुखोद्यमक्रूरं विस्पष्टार्थं मनोहरम्।
मङ्गल्यं दीर्घवर्णान्तमाशीर्वादाभिधानवत् ॥ 35 ।।
कन्याओं के नामकरण सम्बंधी नियम हैं- 1. नाम का उच्चारण सरलता तथा सुविधापूर्वक हो सके। 2. उसका अर्थ तथा स्वरूप कोमल और मीठा हो। 3. नाम का अर्थ भली प्रकार स्पष्ट हो। 4. नाम मन को प्रिय लगने वाला और शुभ का सूचक हो। 5. नाम का अंतिम स्वर दीर्घ हो जैसे रामा, राधा, शुभ्रा आदि। 6. वह आशीर्वाद की ध्वनि रखने वाला हो जैसे- दिव्या, शारदा, सुषमा आदि।
चतुर्थेमासि कर्तव्यं शिशोर्निष्क्रमणं गृहात् ।
षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि यद्वेष्टं मङ्गलं कुले ॥ 36 ॥
जन्म के चतुर्थ माह में शिशु को घर से बाहर निकालने का और छठे माह में अन्न प्राशन संस्कार करना चाहिए (अन्न प्राशन संस्कार में शिशु को घी, मधु या दूध के साथ अत्यन्त अल्प मात्रा में गेहूं, चावल, दाल आदि अन्न का सेवन कराया जाता है)।
चौथे और छठे महीने का विधान सुविधा की दृष्टि से किया गया है, यदि कुल परम्परा के अनुसार ये मांगलिक संस्कार कुछ समय आगे या पीछे करने का हो तो उसी का पालन करना चाहिए।
चूड़ाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मतः ।
प्रथमेऽब्दे तृतीये वा कर्त्तव्यं श्रुतिनोदनात् ॥ 37 ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अर्थात् द्विजाति के बालकों का जन्म के पहले या तीसरे वर्ष में अपनी सुविधा अनुसार वैदिक विधि से केश-मुण्डन संस्कार होना चाहिए।
इसका आशय यह है कि मुण्डन संस्कार दूसरे वर्ष में नहीं कराना चाहिए।
गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनयनम्।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भातत्तु द्वादशे विशः ॥ 38 ॥
ब्राह्मण बालक का गर्भ से आठवें वर्ष में, क्षत्रिय बालक का ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य के पुत्र का बारहवें वर्ष में यज्ञोपवीत संस्कार कराना चाहिए। इस संस्कार के बाद बालक को विद्या प्राप्ति के लिए गुरुकुल ले जाया जाता है।
ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यों विप्रस्य पञ्चमे।
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे ।। 39 ॥
ब्रह्म तेज को पाने की इच्छा रखने वाले ब्राह्मण के बालक का गर्भ से पांचवें वर्ष में, विशेष बल पाने की कामना वाले क्षत्रिय का छठे वर्ष में और अधिक धन-खेती आदि की इच्छा वाले वैश्य बालक का आठवें वर्ष में यज्ञोपवीत करना चाहिए। आशय यह है कि ऐसे लोगों के बालकों का विद्या अध्ययन अन्यों से पहले करवा देना चाहिए।
आ षोडशाद्ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते।
आ द्वाविंशात्क्षत्रबन्धोराचत्र्विशतेर्विशः ।। 40 ।।
सोलह वर्ष तक ब्राह्मण की, बाईस वर्ष तक क्षत्रिय की और चौबीस वर्ष तक वैश्य की 'सावित्री' का उल्लंघन नहीं होता। अतः इन बालकों का इस आयु से पहले ही यज्ञोपवीत संस्कार हो जाना चाहिए।
यज्ञोपवीत के लिए इस श्लोक में 'सावित्री' (गायत्री) शब्द का प्रयोग किया गया है। यज्ञोपवीत संस्कार के बाद ही व्यक्ति को गायत्री जप का अधिकार प्राप्त होता है।
अत ऊर्ध्वत्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः ।
सावित्रीपतिताः व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः ।॥ 41 ॥
यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य बालकों का क्रमशः सोलह, बाईस और चौबीस वर्ष की उम्र तक यज्ञोपवीत संस्कार नहीं होता तो वे गायत्री मंत्र जप काअधिकार नहीं प्राप्त करते। अतः वे पतित होने के कारण आर्य पुरुषों की दृष्टि। तिरस्कृत बनते हैं और वे 'व्रात्य' कहे जाते हैं।
नैतैरपूतैर्विधिवदापद्यपि हि कर्हिचित् ।
ब्राह्यान्यौनांश्च सम्बन्धान्नाचरेद्ब्राह्मणैः सह ।। 42 ।।
उपर्युक्त श्लोक में कहे गए 'व्रात्यों' (जिन लोगों ने अधिकतम आयु बोन जाने पर भी यज्ञोपवीत संस्काः नहीं किया और न प्रायश्चित करने के बाद किया के साथ संकटकाल में भी खान-पान, विवाह आदि का सम्बंध नहीं करना चाहिए।
काष्र्णरौरववास्तानि चर्माणि ब्रह्मचारिणः ।
वसीरन्नानुपूर्येण शाणक्षौमाविकानि च ॥ 43 ।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों वर्णों के ब्रह्मचारियों के लिए कृष्णमृग, रुरुमृग तथा बकरे के चमड़े को (दुपट्टे की जगह प्रयोग करें), सन (बोरिया बनाने में प्रयोग की जाने वाली सुतली), क्षौम (रेशम) तथा ऊन के बने कपड़े (धोती और कोपीन के स्थान पर) धारण करें।
कुछ टीकाकारों ने क्षौम का अर्थ 'अलसी' बताया है। श्लोक के अर्थ में भी भिन्नता मिलती है। इसका दूसरा अर्थ इस प्रकार है- ब्राह्मण ब्रह्मचारी को कृष्ण मृग के चर्म अथवा सन के, क्षत्रिय ब्रह्मचारी को रुरुमृग के चमड़े या क्षौम (रेशम) के तथा वैश्य ब्रह्मचारी को बकरे (अज) के चमड़े या ऊन के वस्त्र उपयोग करने चाहिए।
मौञ्जी त्रिवृत्समा श्लक्ष्णा कार्या विप्रस्य मेखला।
क्षत्रियस्य तु मौर्वी ज्या वैश्यस्य शणतान्तवी ।। 44 ।।
ब्राह्मण ब्रह्मचारी की कमर में बांधी जाने वाली पेटी या पट्टी सूत से तीन तहो वाली, कोमल, चिकनी और सुखदायक बनानी चाहिए। क्षत्रिय ब्रह्मचारी की मेखला (कमर पट्टी) धनुष की डोरी के रूप में प्रयोग किए जाने वाले मूंज से तथा वैश्य ब्रह्मचारी की कमर पट्टी सन की डोरी से बनानी चाहिए।
मुञ्जलाभे तु कर्त्तव्याः कुशाश्मन्तकबल्वजैः ।
त्रिवत्ता ग्रन्थिनैकेन त्रिभिः पञ्चभिरेव वा ॥ 45 ॥
यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ब्रह्मचारियों की मेखला (कमर पेटी) बनाने के लिए सूत, मूंज और सन आदि नहीं मिल सकें तो इनके लिए क्रमशः कुश अशमन्तक (पथरीली धरती पर उगी घास, तृण) तथा बल्वज (झाड़ियों के पास उगी घास) की तीन लड़ी वाली कमर पट्टी (मेखला) बनानी चाहिए। इनमे आवश्यकतानुसार एक, तीन या पांच गांठें बांधनी चाहिए।
कार्पासमुपवीतं स्याद्विप्रस्योर्ध्ववृतं त्रिवृत् ।
शाणसूत्रमयं राज्ञो वैश्यस्याविकसौत्रिकम् ।। 46 ॥
ब्राह्मण ब्रह्मचारी का जनेऊ (यज्ञोपवीत) कपास की रुई से बने सूत का, क्षत्रिय ब्रह्मचारी का जनेऊ सन से बने धागे का और वैश्य ब्रह्मचारी का जनेऊ भेड के बाल से बने धागे का होना चाहिए। ब्राह्मण के जनेऊ में तीन लड़ियां होनी चाहिए और प्रत्येक में एक गांठ लगी होनी चाहिए।
ब्राह्मणो बैल्वपालाशौ क्षत्रियो वाटखादिरौ।
पैप्लौदुम्बरौ वैश्यौ दण्डानर्हन्ति धर्मतः ।। 47 ॥
ब्राह्मण ब्रह्मचारी को बेल या पलाश पेड़ की लकड़ी की, क्षत्रिय ब्रह्मचारी को बड़ अथवा खादिर पेड़ की लकड़ी की और वैश्य ब्रह्मचारी को पीलू या गूलर की लकड़ी की लाठी (दण्ड) रखनी चाहिए।
केशान्तिको ब्राह्मणस्य दण्डः कार्यः प्रमाणतः ।
ललाटसम्मितो राज्ञः स्यात्तु नासान्तिको विशः ॥ 48 ॥
प्रमाण के अनुसार ब्राह्मण ब्रह्मचारी की लाठी (दण्ड) सिर के बालों तक, क्षत्रिय ब्रह्मचारी की लाठी ललाट तक और वैश्य ब्रह्मचारी की लाठी नाक तक लम्बी होनी चाहिए।
ऋजवस्ते तु सर्वे स्युरव्रणाः सौम्यदर्शनाः ।
अनुद्वेग करा नृणां सत्वचोऽनग्निदूषिताः ।। 49 ।।
उपरोक्त वर्णन के परिणाम अनुसार तीनों वर्षों के ब्रह्मचारियों के दण्ड सीधे, गांठरहित, सुंदर, उद्वेग न उत्पन्न करने वाले, बक्कल सहित एवं आग से न जले हुए होने चाहिए।
प्रतिगृह्येप्सितं दण्डमुपस्थाय च भास्करम्।
प्रदक्षिणं परीत्याग्निं चरेदैशं यथाविधिः ।। 50 ।।
ब्राह्मण आदि (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) ब्रह्मचारियों को जो सुलभ और रुचिकर हो (पहले श्लोक में दिए वर्णन के अनुसार) वह दण्ड लेकर सूर्य नारायण के सामने आकर उनको नमस्कार करें। इसके बाद जलती हुई अग्नि की प्रदक्षिणा करें और तत्पश्चात् भिक्षाटन के लिए जाएं।
भवत्पूर्व चरेद्वैक्षमुपनीतो द्विजोत्तमः ।
भवन्मध्यं तु राजन्यः वैश्यस्त् भवदुत्तरम् ॥ 51 ||
यज्ञोपवीत संस्कार के बाद ब्राह्मण ब्रह्मचारी को 'भवत' शब्द का उपयोग वाक्य के पहले उच्चारण कर भिक्षा की याचना करनी चाहिए। जैसे- भवती भि यच्छतु। इसी क्रम में क्षत्रिय ब्रह्मचारी को 'भवत' शब्द का वाक्य के मध्य में उपयोग कर भिक्षा मांगनी चाहिए, जैसे- भिक्षां भवती यच्छतु । वैश्य ब्रह्मचारी के भवत्' शब्द का वाक्य के अंत में प्रयोग करना चाहिए, जैसे भिक्षां यच्छतु भवतो।
मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनीं निजाम् ।
भिक्षेत भिक्षां प्रथमं या चैनं नावमानयेत् ।। 52 ॥
सबसे पहले ब्रह्मचारी को उस गृहिणी से भिक्षा मांगनी चाहिए जो उसका अपमान नहीं करे और भिक्षा अवश्य दे। इस बारे में मनु महाराज ने सबसे पहले माता, उसके बाद मौसी और उसके पश्चात् अपनी बहन और सबसे अंत में किसी विश्वसनीय सम्बंधिनी का क्रम रखा है।
यह विधान इस दृष्टिकोण से रखा गया है ताकि नए बने ब्रह्मचारी का दूसरे के अपमान से मन दुःखी न हो। दूसरे ब्रह्मचारी स्वयं तथा उसके परिवार की स्त्रियां यह जान लें कि अब उस पर गुरु का पूरा अधिकार होने वाला है।
समाहृत्य तु तद्वैक्ष्यं यावदर्थममायया।
निवेद्य गुरवेऽश्नीयादाचम्य प्राङ्मुखः शुचिः ।। 53 ।।
भिक्षा में प्राप्त अन्न तथा सभी वस्तुओं को बिना किसी दुराव-छिपाव के गुरु के सामने रखना ब्रह्मचारी का कर्तव्य है। गुरु उसमें से अपनी इच्छानुसार लेने के बाद ब्रह्मचारी के लिए जितना छोड़ दे, उसे ही पर्याप्त जानकर वह अपनी भूख शांत करे। भोजन करते समय ब्रह्मचारी को अपना मुख पूर्व की ओर रखकर बैठना उचित है।
आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्ङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः ।
श्रियं प्रत्यङ्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्ङ्क्ते ह्यदङ्मुखः ।। 54 ।।
भिक्षा में मिले अन्न को गुरु को समर्पित करने के बाद, बचे हुए को गुरु का प्रसाद जानकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके ग्रहण करने से ब्रह्मचारी की आयु बढ़ती है। इसका कारण मनु महाराज का यह मानना है कि शरीर का हित करने वाले अन्न को आयु वृद्धि के लिए पूर्व की ओर, यश के लिए दक्षिण की ओर, धन-धान्य के लिए पश्चिम की ओर तथा सत्य की अनुभूति पाने के लिए उत्तर की ओर मुख कर भोजन करना चाहिए।
मनु जी ने ब्रह्मचारी के लिए आयु वृद्धि को सबसे अधिक महत्व दिया है क्योंकि अधिक आयु पाने से व्यक्ति हर प्रकार के सुख-वैभव को भोग सकता है।
सायं प्रातर्द्विजातीनामशनं स्मृतिनोदितम्।
नान्तरे भोजनं कुर्यादग्निहोत्रा समोविधिः ॥ 55 ।
द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) के लिए स्मृतियों में प्रातः और सायं दो बार भोजन करने का विधान है अर्थात् दिन में तीन बार भोजन नहीं करना चाहिए। यह विधि अग्निहोत्र के समान पुण्य देने वाली है।
यह बताकर मनु महाराज यह कहना चाहते हैं कि ब्रह्मचारियों को भी दिन में केवल दो बार भोजन करना चाहिए।
उपस्पृश्य द्विजो नित्यमन्नमद्यात्समाहितः ।
भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः स्वानि च संस्पृशेत् ॥ 56 ॥
द्विजाति के लोग (ब्रह्मचर्य की अवस्था के उपरान्त भी) तीन आचमन कर एकाग्रता के साथ भोजन करना शुरू करें और भोजन करने के बाद भी तीन बार आचमन करें। सभी अंगों (दोनों आंख, कान के दोनों छिद्र, दोनों कान) का गीले हाथों से स्पर्श करें।
भोजन शांतिपूर्वक एकाग्र चित्त से करने तथा आंखों, नाक, कान आदि पर जल का स्पर्श करने से होने वाले लाभों के बारे में अब विज्ञान भी सहमत हो चुका है। मन शांत होने से भोजन सरलता से पचता है। अंगों पर जल का स्पर्श करने से मन शांत हो जाता है और उसे एकाग्र करने में सरलता होती है।
पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन् ।
दृष्ट्वा हृष्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः ॥ 57 ।।
मनुष्य को जैसा भोजन प्राप्त हो उसे देखकर मन में प्रसन्नता अनुभव करे। उसकी बिना निन्दा किए पूरा खा जाए, जूठन नहीं छोड़े। प्राप्त भोजन की प्रशंसा करे तथा मन में किसी तरह की हीन भावना नहीं लाए। मुझे यह अन्न सदा प्राप्त हो, इस प्रकार उसका प्रतिनन्दन करे।
आधुनिक शरीरशास्त्र तथा मनोविज्ञान के अनुसार भी भोजन करते समय क्रोध, चिन्ता, तनाव, भय आदि के विचारों से पीड़ित होने पर वह भली प्रकार नहीं पचता और मनुष्य को भूख भी कम लगती है।
पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्जं च यच्छति।
अपूजितं च तद्भुक्तमुभयं नाशयेदिदम् ॥ 58 ॥
ऊपर के श्लाक में बताई गई ावाध से भोजन करने पर वह बल-वीर्य की वृद्धि करता है। निन्दा करते हुए खाया गया भोजन सामर्थ्य और वीर्य को नष्ट करता है।
नोच्छिष्टं कस्यचिद्दद्यान्नाद्यादेतत्तथान्तरा ।
न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टः क्वचिद् व्रजेत् ।। 59 ।।
मनुष्य को खाने से बचा (जूठन) अन्न कभी किसी को नहीं देना चाहिए। इसी प्रकार उसे स्वयं भी नहीं खाना चाहिए। बीच में भोजन नहीं करें अर्थात् प्रात: और सायं के मध्य भोजन नहीं करना चाहिए। जितनी भूख हो उतना एक बार में ही खा ले और बिना कुल्ला किए कहीं नहीं जाए।
भूख से अधिक भोजन करने से भांति-भांति के रोग उत्पन्न होते हैं और बिना कुल्ला किए बाहर जाने से मुंह से दर्गंध आने लगती है। इन्हीं कारणों से ऐसा विधान किया गया है।
अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्य चातिभोजनम् ।
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ ८० ॥
अपनी भूख से ज्यादा भोजन करने से स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचता है, आयु कम होती है, सुख के बजाय दुःख मिलता है और पुण्य की हानि होती है। यही नहीं वरन् अधिक खाने वाले की दूसरे लोग निन्दा भी करते हैं। अतः उतना ही भोजन करें जितना आवश्यक हो।
चिकित्साशास्त्र के अनुसार भूख से अधिक भोजन करने से अतिसार, अपच, वायुविकार, भूख का न लगना आदि रोग हो जाते हैं। जहां आवश्यक मात्रा में भोजन करने से अच्छी नींद आती है, वहीं अधिक भोजन करने से अनिद्रा, पेट दर्द आदि दुःखों को सहना पड़ता है। शरीर की ऊर्जा को पेट में गए अतिरिक्त भोजन को शरीर से बाहर निकालने (मल-मूत्र, पसीने आदि के रूप में) के लिए आवश्यकता से अधिक श्रम करना पड़ता है जिससे आयु कम होती है।
ब्राह्मेण विप्रस्तीर्थेन नित्यकालमुपस्पृशेत् ।
कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदाचन ।। 61 ।।
ब्राह्मण सदा ब्रह्म तीर्थ या प्रजापति तीर्थ अथवा देव तीर्थ से आचमन करे उसे कभी पितृ तीर्थ से आचमन नहीं करना चाहिए।
अगले श्लोक में यह बताया गया है ये तीर्थ हाथ में कहां होते हैं।
अङ्गुष्ठमूलस्य तले ब्राह्यं तीर्थं प्रचक्षते ।
कायमङ्गुलिमूलेऽग्रे दैवं पित्र्यं तयोरधः ।। 62 ॥
हाथ के अंगूठे के मूल में ब्रह्म तीर्थ, कनिष्ठा उंगली का मूल प्रजापति त (काय तीर्थ), इसी उंगली का आगे वाला भाग देव तीर्थ तथा अंगूठे एवं तज् उंगली के बीच पितृ तीर्थ होता है।
त्रिराचामेदपः पर्व द्वि प्रमृज्यात्ततो मुखम्।
स्वानि चैव स्पृशेदद्भिरात्मनं शिर एव च ॥ 63 ।।
सबसे पहले तीन बार पानी (जल) से आचमन करें। इसके बाद दो बार मुख को धोना चाहिए। तत्पश्चात् जल से आंखें, कान, नाक, हृदय और सिर का स्पर्श करें।
अनुष्णाभिरफेनाभिरद्भिस्तीर्थेन धर्मवित् ।
शौचेप्सुः सर्वदाऽऽचमेदेकान्ते प्रागुदङ्मुखः ।। 64 ।।
पवित्रता का इच्छुक धर्मात्मा व्यक्ति ठंडे और फेन रहित (शुद्ध) जल से ब्रह्म आदि तीर्थों से एकान्त में पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठे हुए आचमन करें। (यह नियम ब्रह्मचर्य आश्रम का त्याग करने के बाद भी पालनीय है। ब्रह्म आदि तीर्थों के बारे में पहले के श्लोक संख्या 62 में बताया जा चुका है।)
हृद्गाभिः पूयते विप्रः कण्ठगाभिस्तु भूमिपः ।
वैश्योऽद्भिः प्राशिताभिस्तु शूद्रः स्पृष्टाभिरन्ततः ।। 65 ॥
आचमन के समय जल (शुद्ध) जब ब्राह्मण के हृदय तक पहुंचता है तभी वह पवित्र होता है। कण्ठ में जल पहुंचने पर क्षत्रिय तथा मुख में जल पहुंचने पर वैश्य पवित्र होता है। शूद्र जल को छूने भर से पवित्र हो जाता है।
उद्धते दक्षिणे पाणावुपवीत्युच्यते द्विजः ।
सव्ये प्राचीन आवीती निवीती कण्ठ सज्जने ।। 66।.
जनेऊ (यज्ञोपवीत) को दाहिने हाथ से निकालकर बाएं हाथ में लेने पर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य (द्विज) 'उपवीती' कहलाते हैं। दाहिने हाथ पर रखने से वह 'आवीती' और उसे (यज्ञोपवीत) गले से लगाने पर 'निवीती' कहलाता है।
मेखलामजिनं दण्डमुपवीतं कमण्डलुम् ।
अप्सु प्रास्य विनष्टानि गृह्णीयादन्य मंत्रवित् ॥ 67 ।।
मेखला (कमर पट्टी), हिरन की खाल [(मृग चर्म) अथवा अन्य पशु की खाल जिसे ब्रह्मचारी उपयोग में ला रहा हो], दण्ड, जनेऊ तथा कमण्डलु के नष्ट होने पर उन्हें जल में छोड़कर मंत्र पाठ द्वारा दूसरा धारण करना चाहिए।
केशान्तः षोडशे वर्षे ब्राह्मणस्य विधीयते।
राजन्यबन्धोर्द्वाविंशे वैश्यस्य द्वयधिके मतः ॥ 68॥
सोलह वर्ष का होने पर ब्राह्मण का, बाईस वर्ष का होने पर क्षत्रिय का, चौबीस वर्ष का होने पर वैश्य का केशान्त (मुण्डन) संस्कार करना चाहिए।
अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणामावृदशेषतः ।
संस्कारार्थं शरीरस्य यथाकालं यथाक्रमम् ॥ 69 ॥
क
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य स्त्रियों के सभी जातकर्म आदि संस्कार उसी आयु में करने चाहिए जिसमें उस वर्ण के पुरुषों के होते हैं परन्तु इन संस्कारों को करते समय वेदमंत्रों का पाठ नहीं करना चाहिए।
वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ।
पतिसेवा गुरौ वासोगृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ।। 70 ।।
वेद में पुरुषों के लिए विवाह संस्कार की जो विधि बताई गई है वही विधि स्त्रियों के लिए भी है। स्त्रियों के लिए विवाह के बाद पति के अधीन रहने का विधान है। लेकिन विवाह से पहले उसे भी गुरुकुल में रहकर विद्या प्राप्त करने तथा प्रातः और सायं होम करने का अधिकार है। इसी तरह महिलाओं के भी पुरुषों के समान गर्भाधान आदि सभी सोलह संस्कार करने चाहिए।
सोलह संस्कारों के विधि निरूपण में महर्षि मनु ने पुंल्लिंग का उपयोग किसी विशेष उद्देश्य से नहीं किया है। जिस तरह 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः' पुंल्लिंग प्रयोग होने पर भी स्त्रियों-पुरुषों सबके लिए समान अर्थ रखता है, इसी प्रकार सोलह संस्कारों के विधि निरूपण में किया गया मनु जी का पुंल्लिंग प्रयोग स्त्री और पुरुष दोनों के लिए है।
एष प्रोक्तो द्विजातीनामौपनायनिको विधिः ।
उत्पत्तिव्यञ्जकः पुण्यः कर्मयोगं निबोधत ॥ 71 ।।
महर्षि मनु कहते हैं- ब्राह्मणो! द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) वर्णों की यज्ञोपवीत (उपनयन) सम्बंधी विधि यही है। यह जन्म की व्यंजक तथा पुण्यवर्धक है। इसे समाप्त कर अब मैं द्विजाति के कर्तव्य कर्म बताता हूं।
उपनीय गुरुः शिष्यं शिक्षयेच्छौचमादितः ।
आचारमग्निकार्यं च सन्ध्योपासनमेव च ॥ 72॥
गुरु अपने शिष्य का यज्ञोपवीत संस्कार करवाने के बाद उसे अपने गुरुकुल में ही रखे, उसे धर्म-सम्बंधी नियमों को बताए तथा उनका पालन करवाए। उसे यज्ञ-हवन तथा सन्ध्या-उपासना आदि करने का यथाविधि प्रशिक्षण दे।
अध्येष्यमाणस्त्वाचान्तो यथाशास्त्रमुदङ्मुखः । ब्रह्माञ्जलिकृतोऽध्याप्यो लघुवासो जितेन्द्रियः ।। 73 ।।
गुरु अपने शिष्य को यह बताए कि वह हल्के वस्त्र पहनकर, अध्ययन शुरू करने से पहले पूर्वोत्तर (पूर्व-उत्तर) की ओर मुख करके सबसे पहले जल से तीन बार आचमन करे। शिष्य अपनी इन्द्रियों को अपने वश में रखे और हाथ जोड कर गुरु से अध्यापन हेतु प्रार्थना करे। शिष्य द्वारा ऐसा करने के उपरान्त ही गुरु उसे शिक्षा देना प्रारम्भ करे क्योंकि ऐसा शिष्य ही पढाने के योग्य होता है।
ब्रह्मारम्भेऽवसाने च पादौ ग्राह्यौ गुरोः सदा।
संहत्य हस्तावध्येयं स हि ब्रह्माञ्जलिः स्मृतः ॥ 74 ।।
वेद अध्ययन के प्रारम्भ में और उसकी समाप्ति पर शिष्य को सदैव गुरु के दोनों चरणों का स्पर्श करना और दोनों हाथ जोड़ कर गुरु को प्रणाम करना चाहिए। यही ब्रह्मांजलि है अर्थात् दोनों हाथों को जोड़ कर प्रणाम करने को ब्रह्मांजलि कहते हैं।
व्यत्यस्तपाणिना कार्यमुपसङ्ग्रहणं गुरोः ।
सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन च दक्षिणः ।। 75 ॥
गुरु से वेद का अध्ययन करने से पहले और अध्ययन के बाद शिष्य का यह कर्तव्य है कि वह ब्रह्माञ्जलि प्रणाम करे और फिर दोनों हाथों से गुरु के चरणों का स्पर्श करे, बाएं हाथ से गुरु के बाएं पैर का और दाहिने हाथ से दाहिने पैर का।
अध्येष्यमाणं तु गुरुर्नित्यकालमतन्द्रितः ।
'अधीष्व भो !' इति ब्रूयाद्विरामोऽस्त्विति चारमेत् ।। 76 ।।
शिष्य को वेदाध्ययन कराते समय गुरु को आलस्य नहीं करना चाहिए, बिना मन के नहीं पढ़ाना चाहिए। उसे अध्यापन से पूर्व शिष्य से कहना चाहिए, 'वत्स आओ! पढ़ो।' इसी तरह अध्ययन समाप्ति पर गुरु को शिष्य से कहना चाहिए, 'वत्स ! अब विश्राम लो।'
ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा।
स्त्रवत्यनोङ्कृतं पूर्वं परस्ताच्च विशीर्यति ॥ 77 ।।
अध्ययन-अध्यापन और अंत में गुरु का यह कर्तव्य है कि शिष्य से 'ओ३म्' कहलावे। ऐसा नहीं करने पर पढ़ा हुआ पाठ सदा स्मरण नहीं रहता। वह धीरे-धीरे स्मृति से पूरी तरह विलीन हो जाता है। इस भांति गुरु-शिष्य दोनों का परिश्रम बेकार हो जाता है।
इसलिए पाठ को स्मरण शक्ति में सदैव बनाए रखने के लिए अध्ययन के प्रारम्भ तथा अंत में सदैव श्रद्धासहित प्रणव का उच्चारण करना आवश्यक है।
प्राक्कूलान्पर्युपासीनः पवित्रैश्चैव पावितः ।
प्राणायामैस्त्रिभिः पूतस्ततः ऊँकारमर्हति ।। 78 ॥
कुश के आसन पर पूर्व की ओर मुख किए हुए बैठा शिष्य दोनों हाथों में ग्रहण की हई पवित्री (अंगूठी के रूप में उंगलियों में पहने हुए गोल आकार जो कुश से ही बनाए जाते हैं।) से अपने ऊपर जल छिडककर अपने को शुद्ध करे। इसके उपरान्त तीन बार प्राणायाम करके आंतरिक शुद्धि करे।
इस भांति अपनी बाह्य और आंतरिक शद्धि के बाद शिष्य 'ओम' के उच्चारण योग्य होता है।
अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः ।
वेदत्रयान्निरदुहद्भूर्भुवः स्वरितीतिच ।। 79 ।।
प्रजापति ब्रह्मा जी ने तीनों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद) से उनके सार तत्व के रूप में निकले क्रमशः अ, उ तथा म् अक्षरों से 'ओम्' शब्द का निर्माण किया है। ये तीनों अक्षर क्रमश भूः, भुवः तथा स्वः लोकों के वाचक हैं। आशय यह है कि ओम् का उच्चारण करने से परमशक्ति परमात्मा का ध्यान हो जाता है।
टिप्पणी - प्रारम्भ में तीन ही वेद थे। तीनों वेदों से अभिचार से सम्बंधित मंत्रों को अलग करके महर्षि अंगिरा ने चतुर्थ वेद के रूप में अथर्ववेद बनाया।
त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादं पादमदूदुहत।
तदित्यृचोऽस्याः सावित्र्याः परमेष्ठी प्रजापतिः ॥ 8० ॥
मनु महाराज कहते हैं कि 'ओम्' की महिमा के उपरान्त ब्रह्मा जी ने तीनों वेदों से एक-एक पद निकालकर गायत्री मंत्र की रचना की है। ये तीन पद निम्रलिखित हैं-
1. तत्सवितुर्वरेण्यं
2. भर्गो देवस्य धीमहि
3. धियो यो नः प्रचोदयात।
एतदक्षरमेतां च जपन् व्याहृतिपूर्विकाम्।
सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ॥ 81 ॥
वेद ज्ञाता ब्राह्मण प्रातः और सायंकाल में ओंकार और व्याहृति-भूः भुवः स्वः को आगे लगाकर गायत्री मंत्र का जप करने से वेदों के पढ़ने के पुण्य को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार बना पूरा गायत्री मंत्र निम्नलिखित है-
'ओ३म् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात।'
सहस्त्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत्त्रिकं द्विजः ।
महतोऽप्येनसो मासात्त्वचेवाऽहिर्विमुच्यते ।। 82 ।।
अपने निवास स्थान से बाहर जाकर, आसन पर बैठकर एक माह तक निरन्तर इन तीनों (1. प्रणव ॐ 2. व्याहृति- भूः, भुः स्वः, 3. सावित्री - तत) का प्रतिदिन एक सहस्त्र बार जप करने वाले द्विज का बड़े से बड़ा पाप भी उसी प्रकार दर हो जाता है जिस प्रकार सांप केंचली से मुक्त हो जाता है।
एतयर्चा विसंयुक्तः काले च क्रियया स्वया। ब्रह्मक्षत्रियविड्योनिर्गर्हणां यानि साधुषु ॥ 8३ ॥
वेद पाठ का अधिकार रखने वाला द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) का जो व्यक्ति त्रिक, प्रणव, व्याहृति और गायत्री का जप नित्य नहीं करता, प्रातः और संध्याकाल में सन्ध्या-वन्दन नहीं करता, वह साधु समाज में सबकी निन्दा का पात्र बनता है।
ओङ्कारपूर्विकास्तिस्त्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः ।
त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ॥ 4 ॥
ओंकार के बाद कही जाने वाली तीन महाव्याहृतियां नाश रहित हैं और इनके बाद बोला जाने वाला गायत्री मंत्र (इसे सावित्री भी कहते हैं) प्रजापति ब्रह्मा का मुख अथवा ब्रह्म प्राप्ति का द्वार है।
योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः ।
स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान् ॥ 85 ।।
आलस्य को छोड़कर जो व्यक्ति तीन वर्षों तक ओंकार तथा तीन व्याहृतियों सहित तीन चरणों वाले गायत्री मंत्र का जप करता है, वह परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। उसकी गति वायु के समान स्वतंत्र हो जाती है और वह कहीं भी आ-जा सकता है। वह शरीर की सीमा से परे जाकर आकाश के समान असीम रूप प्राप्त कर लेता है।
एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परं तपः ।
सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते ।। 86 ।।
ओंकार केवल एक अक्षर (ॐ) ही परमात्मा की प्राप्ति का साधन होने से सर्वश्रेष्ठ है, प्राणायाम परम तप है अर्थात् इससे बड़ा कोई तप नहीं, गायत्री (सावित्री) से श्रेष्ठ कोई मंत्र नहीं और मौन की तुलना में सत्य बोलना श्रेष्ठ है।
क्षरन्ति सर्वाः वैदिक्यो जुहोतियजति क्रियाः ।
अक्षरं त्वक्षरं ज्ञेयं ब्रह्म चैव प्रजापतिः ॥ 87 ।।
वेदों में बताई गई हवन-यज्ञ आदि सभी क्रियाएं अपना-अपना फल प्रदान कर समाप्त हो जाती हैं परन्तु प्रजापति ब्रह्मा का प्रतिपादक एक मात्र अक्षर 'ओम्' (ॐ) का ब्रह्म के समान ही कभी नाश नहीं होता।
इस श्लोक में मनु महिर्ष ने ओंकार के जप को वेदों में बताई सभी क्रियाओं से अधिक महत्व दिया है। यज्ञ-हवन आदि के मंत्रों के प्रारम्भ में भी ॐ का उच्चारण उसके इसी सर्वोच्च महत्व के कारण किया जाता है।
विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः ।
उपांशुः स्याच्छतगुणः साहस्त्रो मानसः स्मृतः ।। 88 ।।
जप यज्ञ विधि रूप में निरूपित अनुष्ठेय यज्ञों से दस गुना श्रेष्ठ है। उपांशु जप श्रेष्ठता की दृष्टि से जप यज्ञ से सौ गुना श्रेष्ठ है। मानस जप, उपांशु जप से हजार गुना श्रेष्ठ है।
टिप्पणी-जप यज्ञ तीन प्रकार के होते हैं-
वाचिक जप यज्ञ : इसमें साधक स्पष्ट स्वरों से, पदों एवं वर्णों से मंत्र का
जप करता है।
उपांशु जप यज्ञ: इसमें जप आदि का धीरे-धीरे उच्चारण करने से जिह्वा तथा ओठों में कंपन होता है।
3. मानस जप यज्ञ : इसमें साधक मन ही मन पद, वर्ण आदि का विचार कर, अर्थ का ज्ञान रखते हुए मंत्र या बीजाक्षर का जप करता है।
ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः ।
सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ 89 ॥
अमावस्या तथा पूर्णिमा को किए जाने वाले विधि यज्ञों के सहित, पांच महायज्ञों के अंतर्गत जो चार पाक-यज्ञ हैं (वैश्वदेव, बलिकर्म, नित्य श्राद्ध तथा अतिथि सेवा) वे भी जप यज्ञ के सोलहवें भाग बराबर भी महत्व नहीं रखते।
जप्येनैव तु संसिध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः ।
कुर्यादन्यन्नवा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ १० ॥
इसमें कोई संदेह नहीं कि जप यज्ञ से ब्राह्मण को सिद्धि लाभ होता है। ऐसा यज्ञ करने वाला ब्राह्मण अन्य यज्ञों आदि को न करने पर भी जप यज्ञ की महिमा के फलस्वरूप संसार में सम्मानित होता है।
इन्द्रियाणां विचरतां विषयेस्वपहारिषु ।
संयमे यत्नमातिष्ठेद्विद्वान्यन्तेव वाजिनाम् ॥ 91 ॥।
एक कुशल सारथी जिस तरह अपने घोडों पर नियंत्रण रखने के लिए सदैव चेष्टा करता रहता है, उसी तरह विद्वान व्यक्ति को भी चित्त को आकर्षित करने वाले विषयों में भ्रमण करने वाली इंद्रियों को वश में रखने का प्रयत्न करना चाहिए।
एकादशेन्द्रियाण्याहुर्यानि पूर्वे मनीषिणः ।
तानि सम्यक्प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ।॥ 92 ।।
महाराज मनु महर्षियों से कहते हैं- पहले के विद्वानों ने जिन ग्यारह इंद्रियों के बारे में बताया है, उन्हें मैं भली प्रकार क्रम में बताता हूं।
श्रोत्रंत्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी।
पायूपस्थं हस्तपादं वाक्चैव दशमी स्मृता ॥ १३ ॥
कान (कर्ण), त्वचा, चक्षु (नेत्र), जिह्वा, नाक, गुदा, लिंग, हाथ, पैर और वाणी ये दस इन्द्रियां बताई गई हैं।
बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैषां श्रोत्रादीन्यनुपूर्वशः ।
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैषां पाय्वादीनि प्रचक्षते ॥ 94 ॥
ऊपर के श्लोक में बताई इन्द्रियों में से पांच (कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, नासिका) इन्द्रियां ज्ञानेन्द्रियां हैं और पांच इन्द्रियां (गुदा, लिंग, हाथ, पैर तथा वाणी) कर्मेन्द्रियां हैं।
अभिप्राय यह है कि कानों से सुनकर, त्वचा से स्पर्श द्वारा, आंखों से देखकर, जीभ (जिह्वा) से चखकर, नासिका से सूंघ कर हमें बाहरी जगत का ज्ञान होता है। अतः इन्हें ज्ञानेन्द्रियां कहा है। गुदा, शिश्न, हाथ, पैर, वाणी का उपयोग कर हम अपने कर्म करते हैं। अतः इन्हें कर्मेन्द्रियां कहा गया है।
एकादशं मनो ज्ञेयं स्वगुणेनोभयात्मकम् ।
यस्मिन् जिते जितावेतौ भवतः पञ्चकौ गणो ॥ 95 ॥
मन ग्यारहवीं इन्द्रिय है। इसमें ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों दोनों के गुण हैं (इसका कारण यह है कि मन के माध्यम से ही सभी इन्द्रियां कार्य करती हैं)। इस मन को जीत लेने पर पांचों ज्ञानेन्द्रियों और पांचों कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण हो जाता है।
इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयम् ।
सन्नियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं निगच्छति ॥ 96 ॥
इस जगत में जीव इन्द्रियों के विषयों (शब्द, रूप, रस, स्पर्श तथा गन्ध) में आसक्त होकर दोष का भागी होता है अर्थात इन्द्रियों में आसक्त होने से कोई न कोई दोष अवश्य आता है। इसके विपरीत इन्हीं इंद्रियों पर नियंत्रण रखने से सिद्धि को प्राप्त करता है।
कहने का आशय यह है कि जो व्यक्ति दोषों से बचना और सिद्धि प्राप्त करना चाहता है उसे इंद्रियों का स्वामी होना चाहिए, दास नहीं।
न जातु कामा कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवत्र्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ 97 ।।
इस श्लोक में महाराज मनु ने विषयों का उपभोग करने से इच्छा की पूर्ति नहीं होने का उदाहरण दिया है। यह एक सच है कि एक इच्छा की पूर्ति हो जाने पर मनुष्य में दूसरी इच्छा उत्पन्न होती है तथा उसकी पूर्ति होने पर तीसरी। इच्छाओं को तृप्ति होने के बजाय वे इस प्रकार बढ़ती हैं जैसे अग्नि में घी डालने पर उसको ज्वाला और भड़क उठती है।
यश्चैतान्प्राप्नु यात्सर्वान्यश्चैतान्केवलांस्त्यजेत् । प्रापणात्सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ।। १8 ॥
एक व्यक्ति जो सब विषयों को प्राप्त कर ले और दूसरा सब विषयों का त्याग कर दे, उन दोनों में विषयों का त्याग करने वाला श्रेष्ठ है। इसका कारण यह कि जिस व्यक्ति को विषयों से सम्बंधित सामग्री उपलब्ध है, वह उनका दास बन जाएगा और इसके फलस्वरूप उसका तन-मन क्षीण हो जाएगा। यह भी सम्भव है कि व्यक्ति विषयों को प्राप्त करने के बाद भी शारीरिक रूप से उनको भोगने की सामथ्यं नहीं रखता हो। इसके विपरीत जिस व्यक्ति ने सब विषयों का त्याग कर दिया है वह सभी प्रकार से बलशाली और संतुष्ट होता है।
न तथैतानि शक्यन्ते सन्नियन्तुमसेवया।
विषयेषु प्रजुष्टानि यथा ज्ञानेन नित्यशः ॥ 99 ॥
इन्द्रियों की विषयों में स्वाभाविक आसक्ति होती है, अतः उन्हें इनका सेवन करने से रोकना अर्थात् उन्हें जीतना सरल नहीं है। इसके लिए विषयों में जो बुराइयां या हानियां छिपी हैं उन्हें जानना आवश्यक है। किस-किस विषय में कौन-कौन सा दोष है इस बारे में व्यक्ति को भली प्रकार पता होना चाहिए। विषयों का केवल बाहरी और प्रारंभिक रूप ही आकर्षक तथा भोग के योग्य होता है, इसके अतिरिक्त विषयों का भोग बहुत दुःखदायक है। इस ज्ञान का अनुभव करने के बाद ही व्यक्ति अपनी इन्द्रियों पर संयम रख पाता है।
वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च।
न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित् ॥ 100 ।
दुष्ट भाव रखने वाला व्यक्ति इंद्रियों का दास बनकर विषयों में प्रवृत्त रहता है। अतः वह वेद अध्ययन, त्याग, बलिदान, यज्ञानुष्ठान, नियम पालन तथा तप आदि नहीं कर पाता। इसके परिणामस्वरूप उसे कुछ सिद्ध नहीं हो पाता।
श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा च यो नरः।
न हृष्यति ग्लायनि वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः ॥ 101 ।।
ऐसे ही व्यक्ति को जितेन्द्रिय समझना चाहिए जिसे अपनी प्रशंसा-निन्दा, प्रिय या अप्रिय वचन सुनने से, सुन्दर और बदसूरत को देखने से, कोमल-कठोर के छूने से, अच्छे-बुरे स्वाद वाली वस्तुएं खाने से, अच्छी-बुरी गन्ध सूंघने से किसी तरह की खुशी या दुःख नहीं होता। कहने का आशय यह कि जिस व्यक्ति ने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है वह हर अवस्था में शांत तथा संतुलित रहता है।
इन्द्रियाणां तु सर्वेषां यद्येकं क्षरतीन्द्रियम्।
तेनास्य क्षरति प्रज्ञा दृतेः पात्रादिवोदकम् ।। 102 ।।
पांच ज्ञानेन्द्रियों तथा पांच कर्मेन्द्रियों में से किसी भी एक इन्द्रिय के विषयों में रुचि होने से वह उसमें प्रवृत्त होने लगती है, इससे तत्वज्ञानी व्यक्ति का सारा विवेक एवं चेतना धीरे-धीरे उसी प्रकार नष्ट हो जाती है जैसे एक छोटा-सा छेद होने पर भरे हुए चर्म-पात्र का सारा जल शनैः शनैः बह जाता है और पात्र रिक्त रह जाता है।
वशे कृत्वेन्द्रियग्रामं संयम्य च मनस्तथा। सर्वान्संसाधयेदर्थानक्षिण्वन् योगतस्तनुम् ।। 103 ।।
इस श्लोक में इन्द्रियों के संयम द्वारा सभी प्रकार के पुरुषार्थों को प्राप्त करने के बारे में बताया गया है। मनुष्य के लिए यही उचित है कि वह बाहरी इंद्रियों के समूह और मन को अपने वशीभूत करके ऐसे उपाय करे जिससे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थों को सिद्ध किया जा सके और शरीर को किसी तरह का कष्ट नहीं हो। टिप्पणी-उपर्युक्त श्लोक में शरीर को किसी प्रकार का कष्ट न होने से आशय शरीर को साधने से है। जैसे योग साधना द्वारा योगी अपने शरीर, उसकी पूरी इन्द्रियों और मन पर धीरे-धीरे इतना नियंत्रण प्राप्त कर लेता है कि उसे विषयों को त्यागने अथवा उनको भोगने में कोई कष्ट नहीं होता।
पूर्वी सन्ध्यांजपंस्तिष्ठेत्सावित्रीमाऽर्क दर्शनात् ।
पश्चिमां तु समाऽऽसीत सम्यगृक्षविभावनात् ॥ 104 ।।
प्रातःकाल की संध्योपासना में एक आसन में खड़ा होकर उषा काल से लेकर सूर्योदय तक गायत्री मंत्र का जप करता रहे। इसी तरह सायंकाल की सन्ध्या वेला में सूर्यास्त के प्रारम्भ से लेकर तारों के दिखाई देने तक गायत्री मंत्र का जप करता रहे।
पूर्वी सन्ध्या जपंस्तिष्ठन्नैशमेनो व्यपोहति ।
पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ।। 105 ।।
प्रातः की गई सन्ध्या में गायत्री मंत्र का जप करने से रात भर के पाप नष्ट हो जाते हैं। सायं सन्ध्या में गायत्री मंत्र का जप करने से दिन भर के पाप नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार दोनों समय की गई सन्ध्या से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
उसकी बुरी वासनाएं समाप्त हो जाती हैं और उसकी बुद्धि शुद्ध हो जाती है।
न तिष्ठति तु यः पूर्वा नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् ।
सः शूद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ॥ 106 ।।
जो द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) प्रातःकाल एवं सायंकाल सन्ध्योपासना नहीं करता, वह शूद्र की तरह सभी प्रकार के द्विज कर्मों से बहिष्कृत किए जाने योग्य है।
अपां समीपे नियतो नैत्यकं विधिमास्थितः ।
सावित्रीमप्यधीयीत गत्वाऽरण्यं समाहितः ।। 107 ॥
प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकाल वन (फुलवाड़ी, बाग-बगीचा आदि एकान्त स्थान) में जाकर (नदी, सरोवर, झील आदि के) जल के पास एकान्त में एकाग्रचित्त होकर सन्ध्या वन्दनादि नित्य कर्म के साथ द्विज गायत्री का जप करें। आशय यह है कि द्विज के लिए सन्ध्या वन्दना आदि के साथ-साथ नियमित रूप से गायत्री का जप करना आवश्यक है।
वेदोपकरणे चैव स्वाध्याये चैव नैत्यके ।
नानुरोधोऽस्त्यनध्याये होममन्त्रेषु चैव हि ॥ 108 ।।
अनध्याय के दिनों में भी गुरु से शिक्षा ग्रहण करने, यज्ञ-मंत्रों के उच्चारण करने तथा दैनिक स्वाध्याय करने का कोई निषेध नहीं है।
टिप्पणी - शास्त्रों में सूतक, पातक आदि शौच ग्रस्त होने के, श्रावणी आदि कुछ पर्वों के एवं आकाश में बादल घिरे होने के दिनों में स्वाध्याय करने की मनाही (निषेध) है। इन्हें ही उपर्युक्त श्लोक में अनध्याय के दिन कहा गया है।
नैत्यके नास्त्यनध्यायो ब्रह्मसत्रं हि तत्स्मृतम्।
ब्रह्माहुतिहुतं पुण्यमनध्यायवषट्कृतम् ॥ 109 ॥
पूर्वोक्त नित्य कर्म ब्रह्मयज्ञ का ही एक रूप है। अतः उसे करने में अनध्याय किसी तरह से बाधा डालने वाला नहीं है। अनध्याय दिनों में इस ब्रह्मयज्ञ में ब्रह्म आहतियों द्वारा होम होता है और हरेक आहति के अंत में 'वषट्' शब्द बोला जाता है।
यः स्वाध्यायमधीतेऽब्दं विधिना नियतः शुचिः ।
तस्य नित्यं क्षरत्येष पयो दधि घृतं मधु॥ 110 ।।
जो एक वर्ष तक श्रद्धा सहित नित्य पावन भाव से विधि अनुसार (वन में जल के समीप एकान्त में पूरी एकाग्रता से) सन्ध्यावन्दना, गायत्री जप तथा वेद पाठ करता है, उसके यहां दूध, दही, घी और शहद की वर्षा होती है अर्थात् ऐसा व्यक्ति हर तरह से धनवान और संपत्तिशाली बन जाता है।
अग्नीन्धनं भैक्षचर्यामधःशय्यां गुरोर्हितम् ।
आ समावर्तनात्कुर्यात्कृतोपनयनो द्विजः ॥ 111 ॥
जिसका यज्ञोपवीत संस्कार हो चुका हो, ऐसा द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) समावर्तन संस्कार (वेदों का अध्ययन पूरा कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के पूर्व काल की अवधि) तक प्रातः तथा सायं हवन, भिक्षा मांगना, पृथ्वी पर सोना और गुरु हित कार्य को करते रहना चाहिए।
कहने का आशय यह है शिक्षा समाप्त हो जाने लेकिन समावर्तन संस्कार नहीं होने तक द्विज को ब्रह्मचर्य के नियमों का पहले की तरह पालन करते रहना चाहिए।
आचार्यपुत्रः शुश्रूषुर्ज्ञानदो धार्मिकः शुचिः ।
आप्तःशक्तोऽर्थदः साधुः स्वाऽध्याप्योदश धर्मतः ॥ 112 ॥
गुरु के अनुसार दस श्रेणी के व्यक्ति धर्म-शिक्षा देने योग्य होते हैं- 1. आचार्य पुत्र, 2. सेवा करने वाला अर्थात् पुराना सेवक, 3. ज्ञान देने वाला अध्यापक, 4. आचारवान और धर्मात्मा व्यक्ति, 5. पवित्र आचरण करने वाला, 6. सत्य बोलने वाला, 7. समर्थ पुरुष, 8. धन या आजीविका देने वाला, 9. परोपकार करने वाला, 10. भलाई चाहने वाला स्वजातीय।
नापृष्टः कस्यचिद्रूयान्नचाऽन्यायेन पृच्छतः ।
जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत् ।। 113 ।।
विद्वान व्यक्ति बिना पूछे तत्वज्ञान को नहीं बतलाए। इसके अतिरिक्त अगर कोई यत्नपूर्वक कुछ कहने के लिए विवश करे तो भी कुछ बोलना नहीं चाहिए। अभिप्राय यह है कि जब तक दूसरा आग्रहपूर्वक सम्मति प्रकट करने के लिए अनुरोध नहीं करे अथवा श्रद्धा भाव से तत्वज्ञान की बात नहीं पूछे, बुद्धिमान व्यक्ति को सब कुछ जानते हुए भी अनजान (जड) की तरह व्यवहार करना चाहिए।
अधर्मेण च यः प्राह यश्चाधर्मेण पृच्छति।
तथोरन्यतरः प्रैति विद्वेषं वाधिगच्छति ।। 114 ॥
अधर्म से पछने पर जो उसका उत्तर देता है अथवा अधर्म से जो प्रश्न करता है. उनमें आपस में वैर हो जाता है अथवा उन दोनों में से एक की (व्यतिक्रम करने वाले की) मृत्यु हो जाती है।
यहां मनु महाराज का आशय यह है कि न तो कभी किसी से अनुचित प्रश्न करना चाहिए और न किसी को अनुचित रीति से जवाब देना चाहिए। ऐसा करने से दोनों के बीच शत्रुता उत्पन्न हो सकती है जो किसी की मृत्यु तक का कारण बन सकती है।
धर्मार्थों यत्र न स्यातां शुश्रूषा वाऽपि तद्विधा ।
तत्र विद्या न वक्तव्या शुभं बीजमिवोषरे ।। 115 ।।
ऐसे शिष्य को विद्या दान नहीं करे जिसके पास धर्म और अर्थ नहीं हो तथा शिष्य में शिक्षा के अनुरूप सेवा (गुरु-सेवा) करने की भावना न हो। जिस प्रकार ऊसर में बीज बोने से बीज नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार गुरु के प्रति श्रद्धा नहीं रखने वाले को विद्या देने से वह नष्ट हो जाती है।
टिप्पणी- यहां, उपर्युक्त श्लोक में जिस शिष्य के पास धर्म न हो, का अर्थ ऐसे शिष्य से है जो धर्म के नियमों का पालन नहीं करता हो।
विद्ययैव समं कामं मर्तव्यं ब्रह्मवादिना।
आपद्यपि हि घोरायां न त्वेनामिरिणे वपेत् ।। 116 ।।
वेदों का ज्ञान रखने वाला विद्वान चाहे अपनी विद्या किसी को बिना दिए ही मर जाए परन्तु घोर संकट आने पर भी उसे (अपना ज्ञान) अपात्र या अयोग्य शिष्य को नहीं दे।
विद्या ब्राह्मणमेत्याह शेवधिष्टेऽस्मि रक्ष माम् ।
असूयकाय मां मा दास्तथा म्यां वीर्यवत्तमा ।। 117 ॥
विद्या की देवी (सरस्वती) ने विद्वान ब्राह्मण के पास आकर कहा, 'मैं तुम्हारी निधि (कोश) हूं, मेरी रक्षा करो। ऐसे व्यक्ति को मत दो अर्थात् ऐसे व्यक्ति को विद्या मत दो जो मेरी शक्ति को कमजोर कर दे। मुझे सत्पात्र को ही दो जो मेरा सदुपयोग करे जिससे मैं शक्तिशालिनी बनी रहूं।'
कहने का आशय यह है कि विद्वान व्यक्ति को अपनी विद्या सत्पात्र को देना चाहिए ताकि वह उसका सदपयोग कर अपनी तथा समाज की उन्नति करे. जिसके फलस्वरूप विद्या का गौरव बढे। ईर्ष्या-द्वेष से ग्रस्त रहने वाले व्यक्ति को विद्या देने से वह उसका दुरुपयोग करेगा जिससे उसकी महिमा कम होगी।
यमेव तु शुचिं विद्यान्नियतं ब्रह्मचारिणम्।
तस्मै मां ब्रूहि विप्राय निधिपायाऽप्रमादिने ।। 118 ।।
जिस शिष्य को गुरु पवित्र, जितेन्द्रिय और ब्रह्मचारी समझे, जो विद्या रूपी कोश की रक्षा करने योग्य हो तथा जो आलस्य रहित हो उसे ही मुझे (विद्या) दे (पढ़ाये)।
ब्रह्म यस्त्वनुज्ञातमधीयानादवाप्नुयात्।
स ब्रह्मस्तेयसंयुक्तो नरकं प्रतिपद्यते ॥ 119 ॥
अगर कोई गुरु से श्रद्धापूर्वक विद्या नहीं ग्रहण करता वरन् जब गुरु दूसरे को पढ़ा रहा है तब चुपचाप चोरी से सुनकर उसे सीख लेता है, ऐसा व्यक्ति ब्रह्म की चोरी करने का अपराध करने के कारण नरक को जाता है।
आशय यह है कि विद्या गुरु मुख से ही श्रद्धापूर्वक ग्रहण करना उचित है। गुरु आज्ञा बिना चोरी से विद्या सीखना एक अपराध है। कारण यह है कि कुपात्र विद्या सीखकर अपना अहित कर सकता है अतः गुरु आज्ञा आवश्यक है।
लौकिकं वैदिकं वाऽपि तथाऽऽध्यात्मिकमेव च।
आददीत यतो ज्ञानं तं पूर्वमभिवादयेत् ।। 120 ।।
शिष्य का यह कर्तव्य है कि वह जब माननीय व्यक्तियों के मध्य बैठे तब जिस गुरु से उसने लौकिक विद्या (आजीविका कमाने के योग्य बनाने वाली), वैदिक विद्या (वेद विषय से सम्बंधित) और आध्यात्मिक विद्या (ब्रह्म विषयक)
प्राप्त की हो उसे सर्वप्रथम प्रणाम करे।
टिप्पणी - यदि तीनों विद्याएं भिन्न-भिन्न गुरुओं से प्राप्त की हैं तो सर्वप्रथम आध्यात्मिक गुरु, द्वितीय वेदज्ञान देने वाले गुरु तथा अंत में लौकिक विद्या के गुरु को प्रणाम करना उचित है।
सावित्रीमात्रसारोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः ।
नायन्त्रितस्त्रिवेदोऽपि सर्वाशी सर्वविक्रयः ।। 121 ।।
केवल एक मात्र गायत्री मंत्र का ज्ञाता ब्राह्मण अगर जितेन्द्रिय है तो उसे शिष्ट समाज में सम्मान मिलना चाहिए। इसके विपरीत वेदों का ज्ञाता ब्राह्मण भी अगर जितेन्द्रिय नहीं और निषिद्ध अन्न को खाने वाला है तथा सब कुछ बेचने वाला है तो उसको शिष्ट समाज में मान-सम्मान नहीं देना चाहिए।
सारांश यह कि विद्या से हीन पर अच्छे चरित्र वाला व्यक्ति उस व्यक्ति मे कहीं श्रेष्ठ है जो विद्वान तो है परन्तु उसका चरित्र अच्छा नहीं है।
शय्यासनेऽध्याचरिते श्रेयसा न समाविशेत् । शय्यासनस्थश्चैवैनं प्रत्युत्थायाभिवादयेत् ।। 122 ।।
पूज्य जनों (माता-पिता, गुरु और अपने से बड़ों) की शय्या (चारपाई, गद्दी आदि) तथा आसन (कुर्सी, स्टूल, चटाई आदि) पर स्वयं नहीं बैठें और यदि शिष्य शय्या, आसन आदि पर बैठा हो तो पुज्य जनों के आने पर उनके स्वागत में खडा होकर उन्हें प्रणाम करे।
ऊर्ध्वं प्राणा ह्यत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आयति। प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान्प्रतिपद्यते ।। 123 ।।
महर्षि मनु शिष्य को उठकर पूज्य जनों को प्रणाम करने का सूक्ष्म कारण बताते हुए कहते हैं कि युवा जनों के प्राण वृद्ध लोगों के आने पर ऊपर को उछलते हैं, अतः उनके खड़े होकर प्रणाम करने से प्राण (शक्ति) अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ जाते हैं जिससे वे अपने को संतुलित तथा स्वस्थ अनुभव करने लगते हैं।
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलम् ॥ 124 ॥
अपने से आयु, विद्या, शक्ति आदि में बड़े पुरुषों की प्रतिदिन सेवा करने और उन्हें प्रणाम करने का स्वभाव रखने वाले व्यक्ति की आयु, ज्ञान और यश बढ़ते हैं।
इसका कारण वह है कि वृद्ध लोग या पूज्य जन सेवा तथा सम्मान से प्रसन्न हो जो आशीर्वाद देते हैं उससे आयु बढ़ती है। वे लोग अपने जो अनुभव सुनाते हैं उससे ज्ञान में वृद्धि होती है। पूज्य जन जब छोटों की दूसरी जगह, जाकर प्रशंसा करते हैं उससे उनका यश बढ़ता है।
अभिवादात्परः विप्रो ज्यायांसमभिवादयन्।
असौ नामाहमस्मीति स्वं नाम परिकीर्तयेत ।। 125 ।।
गुरु और अपने से बड़ों के आने पर उठकर इस तरह कहना चाहिए, 'मैं अमुक नाम वाला आपको प्रणाम करता हूं।' इस तरह अपने नाम, गोत्र आदि को स्पष्ट रूप से कहना चाहिए।
नामधेयस्य ये केचिदभिवादं न जानते।
तान्प्रज्ञोऽहमिति ब्रूयात् स्त्रियः सर्वास्तथैव च ।। 126 ।।
बुद्धिमान व्यक्ति जिन वृद्ध व्यक्तियों को नाम-गोत्र सहित प्रणाम करना आवश्यक नहीं समझे उन्हें 'मैं प्रणाम करता है।' यह कहकर अभिवादन करें। माननीया स्त्रियों को भी इसी विधि से प्रणाम करना चाहिए अर्थात् उन्हें भी अपना नाम-गोत्र बताना आवश्यक नहीं।
भोः शब्दं कीर्तयेदन्ते स्वस्य नाम्नोऽभिवादने।
नाम्नां स्वरूपभावो हि भोभाव ऋषिभिः स्मृतः ।। 127 ॥
जिन बड़े लोगों को नमस्कार किया जाए उनको नाम नहीं लेना चाहिए, अभिवादन में अपने नाम के बाद 'भोः' शब्द का उच्चारण करना चाहिए। ऋषियों ने 'भोः' शब्द को नामों का स्वरूप कहा है।
आयुष्मान्भव सौम्येति वाच्यो विप्रोऽभिवादने।
अकारश्चास्य नाम्नोऽन्ते वाच्यः पूर्वाक्षरः प्लुतः ।। 128 ।।
गुरु आदि श्रेष्ठ लोगों को अपने अभिवादन के उत्तर में ब्राह्मण से- 'सौम्य आयुष्मान भव' कहना चाहिए। अगर 'सौम्य' कहने के स्थान पर अभिवादन करने वाले का नाम लिया जाए तो उसके नाम के अंतिम व्यञ्जन के स्वर को प्लुत (तीन मात्राओं वाला) कर देना चाहिए। इससे उस व्यक्ति के प्रति आदर भाव की अभिव्यक्ति होती है (जैसे- आयुष्मान भव शर्माऽऽऽ)।
यो न वेत्त्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम्।
नाभिवाद्यः स विदुषा यथा शूद्रस्तथैव सः ।। 129 ।।
जो ब्राह्मण यह भी नहीं जानता कि अभिवादन के उत्तर में किस तरह का आशीर्वाद देना चाहिए, उसे प्रणाम या नमस्कार आदि नहीं करना चाहिए क्योंकि वह नमस्कार के अयोग्य और शूद्र है।
ब्राह्मण कुशलं पृच्छेत्क्षत्रबन्धु मनामयम् ।
वैश्यं क्षेमं समागम्य शूद्रमारोग्यमेव च ॥ 130 ।।
मिलने के लिए आए ब्राह्मण से अभिवादन तथा आशीर्वाद के विनिमय के बाद ब्राह्मण से उसकी कुशलता, क्षत्रिय से उसकी नीरोगता (अनामय), वैश्य से उसका क्षेम तथा शूद्र से उसके स्वास्थ्य के बारे में पूछना चाहिए।
अवाच्यो दीक्षितो नाम्ना यवीयानपि यो भवेत्।
भोभवत्पूर्वकं त्वेनमभिभाषेत धर्मवित् ॥ 131 ।।
धर्म को जानने वाले ज्ञानवान पुरुष को चाहिए कि दीक्षित व्यक्ति चाहे उसकी आयु से छोटा क्यों न हो लेकिन वह उसका नाम लेकर कभी नहीं बुलाए। उसे सदैव 'भो' या 'भवत' शब्द से ही सम्बोधित करे।
परपत्नी तु या स्त्री स्यादसम्बद्धा च योनितः ।
तां ब्रूयाद्भवतीत्येवं सुभगे भगिनीति च ॥ 132 1
जो दूसरे की पत्नी हो तथा जिससे अपना किसी प्रकार से योनि सम्बंध (रक्त सम्बंध) नहीं हो (अर्थात् जो बहन आदि नहीं हो), उससे वार्तालाप करते समय 'भवति, सुन्दरि, भगिनी' आदि कहें।
मातुलांश्च पितृव्यांश्च श्वशुरानृत्विजो गुरून् ।
असावहमिति ब्रूयात्प्रत्युत्थाय यवीयसः ।। 133 ।।
गुरुजन, पूज्य पुरुष तथा मामा, चाचा, श्वसुर, यज्ञ कराने वाला कभी अपनी आयु से छोटे हों तब भी मिलने पर खड़े होकर उनका अभिवादन करना चाहिए तथा-यह मैं हूं- (मैं अमुक नाम वाला हूं।) कहकर अपना नाम-गोत्र आदि बताना चाहिए।
मातृष्वसा मातुलानी श्वश्रूरथ पितृष्वसा ।
सम्पूज्य गुरुपत्नीवत्समास्ताः गुरुभार्यया ।। 134 ।।
मां की बहन (मौसी), मामी, पत्नी की मां (सास), पिता की बहन (बुआ), ये चारों (मौसी, मामी, सास एवं बुआ) गुरु की पत्नी के समान पूज्य हैं।
भ्रातुर्भार्योपसङ्ग्राह्या सवर्णाऽहन्यहन्यपि ।
विप्रोष्य तूपसङ्ग्राह्या ज्ञातिसम्बन्धियोषितः ।। 135 ।।
अपने बड़े भाई की सवर्णा पत्नी (ब्राह्मण पुरुष द्वारा ब्राह्मण स्त्री से विवाह करने पर उसकी पत्नी सवर्णा कही जाती है।) को प्रतिदिन ही अभिवादन करना चाहिए। जाति वालों तथा सम्बंधियों की स्त्रियों को परदेश से जाने पर (या उनके परदेश से घर आने पर) प्रणाम करना चाहिए।
पितुर्भगिन्यां मातुश्च ज्यायस्यां च स्वसर्यपि। मातृववृत्तिमातिष्ठेन्माता ताभ्यो गरीयसी ।। 136 ।।
मां की बहन (मौसी), पिता की बहन (बुआ/ फूफी) तथा अपनी ज्येष्ठ बहन, तीनों को अपनी माता के समान आदर-सम्मान प्रदान करना चाहिए। यद्यपि यह निश्चित है कि इन तीनों से माता का पद उच्च है।
दशाब्दाख्यं पौरसख्यं पञ्चाब्दाख्यं कलाभृताम् ।
त्र्यब्दपूर्व श्रोत्रियाणां स्वल्पेनापि स्वयोनिषु ।। 137 ॥
एक ही नगरवासियों के साथ लगातार दस वर्ष तक रहने से, कलाकारों के साथ पांच वर्षों तक रहने से, वेदज्ञ ब्राह्मणों के साथ तीन वर्ष तक रहने से तथा अपने जाति के बन्धुबान्धवों के साथ कुछ दिनों तक रहने से मित्रता हो जाती है।
ब्राह्मणं दशवर्ष तु शतवर्ष तु भूमिपम्।
पितापुत्रौ विजानीयाद्ब्राह्मणस्तु तयोः पिता ।। 138 ।।
क्षत्रिय सौ वर्ष का वृद्ध हो और ब्राह्मण दस वर्ष का बालक हो तो भी उन दोनों में ब्राह्मण को पिता के समान और क्षत्रिय को पुत्र के समान समझना चाहिए। वास्तव में किसी भी आयु का ब्राह्मण पिता तुल्य होता है।
वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या भवति पञ्चमी।
एतानि मानस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम् ॥ 139 ।।
न्याय से अर्जित धन (चाचा, मामा आदि) जाति बन्धु, वेदों के अनुसार कार्य करने वाला आचारशील व्यक्ति, आयु में अपने से बड़ा और विद्या से युक्त पुरुष ये पांच आदर योग्य (मान्यता के) स्थान हैं अर्थात् इन पांचों को महत्व देना चाहिए। इनमें भी धन की तुलना में सम्बंध का, सम्बंध की अपेक्षा आचार का, आचार की तुलना में आयु का तथा आयु से विद्वता का अधिक महत्व है।
पञ्चानां त्रिषु वर्णेषु भूयांसि गुणवन्ति च।
यत्र स्युः सोऽत्रमानार्हः शूद्रोऽपि दशमीं गतः ।। 140 ।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य तीनों वर्णों के जिस व्यक्ति में उपर्युक्त श्लोक (श्लोक संख्या 139) में बताए गए पांचों गुणों में जितने ज्यादा गुण हों, उसे उतना अधिक आदरणीय मानना चाहिए। यदि शूद्र व्यक्ति भी सौ वर्ष की आयु का हो जाता है तो उसे भी आदरणीय मानना चाहिए क्योंकि आचारवान, बुद्धिमान और संयमी व्यक्ति ही उतनी आयु प्राप्त कर सकता है (अपने जीवन के दीर्घ अनुभव के कारण वह आदरणीय स्थान प्राप्त कर लेता है और उसके अनुभव से लाभ लेने में ही बुद्धिमानी है। इसी कारण मनु महाराज ने उसे आदरणीय माना है)।
चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः ।
स्नातकस्य च राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च ॥ 141 ।।
चक्र (पहिये) वाले रथ पर सवार व्यक्ति, नब्बे से अधिक उम्र वाले व्यक्ति, रोगी, बोझा उठाए हुए व्यक्ति, स्त्री, स्नातक, राजा तथा वर (दूल्हा) इन आठों को आगे जाने का मार्ग देना चाहिए और स्वयं एक ओर हट जाना चाहिए।
तेषां तु समवेतानां मान्यो स्नातकपार्थिवी।
राजस्नातकयोश्चैव स्नातको नृपमानभाक् ।। 142 ।।
उपर्युक्त श्लोक में बताए लोग अगर कहीं एक साथ एकत्रित हों तो उनमें सबसे अधिक महत्व उस व्यक्ति को देना चाहिए जो स्नातक है और उसके बाद राजा को महत्व देना चाहिए अर्थात इन दोनों को पहले मार्ग देना चाहिए। राजा और स्नातक अगर दोनों एक-दूसरे के सामने आ जाएं तो राजा के लिए यही उचित है कि वह स्नातक के लिए मार्ग छोड़ दे क्योंकि राजा के लिए स्नातक का सम्मान करना उपयोगी है।
उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद् द्विजः ।
संकल्पं सरहस्यं च तमाचार्य प्रचक्षते ।। 143 ।।
'आचार्य' उस ब्राह्मण को कहते हैं जो शिष्य का उपनयन संस्कार करके उसे अपने पास रखकर वेद का ज्ञान तथा यज्ञ-यागादि करने की विधि पढ़ाता तथा सिखाता है।
एकदेशं तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुनः ।
योऽध्यापयति वृत्त्यर्थमुपाध्यायः स उच्यते ।। 144 ॥
'उपाध्याय' वह ब्राह्मण कहलाता है जो अपनी आजीविका के साधन रूप में एक वेद या वेद के कुछ अंश अथवा वेदों के किन्हीं अंगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छन्द तथा ज्योतिष) के बारे में शिष्य को पढ़ाता है।
निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधिः ।
सम्भावयति चान्नेन सः विप्रो गुरुरुच्यते ।। 145 ।।
'गुरु' वह ब्राह्मण कहा जाता है जो अपने शिष्य के गर्भाधान आदि संस्कार कराता तथा अन्न से उसका पालन-पोषण करता है।
अग्न्याधेयं पाकयज्ञानग्निष्टोमादिकान्मखान् ।
यः करोति वृतो यस्य स तस्यत्र्विगिहोच्यते ।। 146 ।।
'ऋत्विक' उस ब्राह्मण को कहते हैं जो यज्ञकर्म के लिए अग्नि का आह्वान करके उसे उत्पन्न करता है, पाक यज्ञ, बलिवैश्वदेव आदि तथा अग्निष्टोम आदि यज्ञों को पूरा करने के लिए उसे वरण किया जाता है।
य आवृणोत्यवितथं ब्रह्मणा श्रवणावुभौ ।
स माता स पिता ज्ञेयस्तं न द्रुह्येत्कदाचन ।। 147 ।।
वह ब्राह्मण माता-पिता के तुल्य सम्माननीय होता है जो वेद विद्या को पढ़ाकर अपने शिष्य के दोनों कानों को पवित्र करता है।
उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता ।
सहस्त्रं तु पितृन्माता गौरवेणातिरिच्यते ।। 148 ।।
एक आचार्य का सौ उपाध्यायों से. पिता का सौ आचार्यों से और माता का एक हजार पिताओं से भी अधिक गौरव है।
उत्पादकब्रह्मदात्रोर्गरीयान् ब्रह्मदः पिता ।
ब्रह्मजन्म हि विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ।। 149 ।।
जन्म देने वाले और वेद विद्या पढ़ाने वाले दोनों ही व्यक्ति पिता कहलाते हैं, परन्तु वेद विद्या के ज्ञान से शिष्य का यह लौकिक जीवन और परलोक दोनों ही सुधरते हैं। अतः वेद विद्या का ज्ञान देने वाले का महत्व अधिक है।
कामान्माता पिता चैनं यदुत्पादयतो मिथः ।
सम्भूतिं तस्य तां विद्याद्यद्योनावभिजायते ।। 150 ।।
काम के वश में आकर माता-पिता जब संभोग करते हैं और उसके फलस्वरूप मां के गर्भवती हो जाने से बालक का जन्म होता है। इस प्रकार माता-पिता द्वारा संतान को जन्म देना एक संयोग मात्र है। संतान प्राप्ति की इच्छा से माता-पिता द्वारा संभोग किए जाने पर भी उन्हें काम तृप्ति मिलती है।
आचार्यस्त्वस्य यां जातिं विधिवद्वेदपारगः ।
उत्पादयति सावित्र्या सा सत्या साऽजरामरा ।। 151 ।।
उपर्युक्त श्लोक में बताई पिता की स्थिति के विपरीत वेद ज्ञाता ब्राह्मण अपने शिष्य को गायत्री उपदेश देकर उसे दूसरा जन्म देता है, तभी शिष्य द्विज कहलाता है। इस भांति वेदज्ञ ब्राह्मण द्वारा दिया गया दूसरा जन्म सत्य, अजर तथा अमर है। ब्रह्म ज्ञान पाने से द्विज अपने सच्चे तथा अमृतत्व रूप को पहचानता है। अतः आचार्य का महत्व पिता से अधिक है। पिता उसे शूद्र रूप में उत्पन्न करता है पर आचार्य उसे 'द्विज' के उच्च आध्यात्मिक वर्ग में लाता है।
अल्पं वा बहु वा यस्य श्रुतस्योपकरोति यः ।
तमपीह गुरुं विद्याच्छुतोपक्रियया तया ।। 152 ॥
ब्रह्मचारी को चाहिए कि वह वेद का आंशिक ज्ञान कराने वाले उपाध्याय को भी इस उपकार के फलस्वरूप गुरु के रूप में माने। वास्तव में वेद का ज्ञान रूपी प्रकाश सर्वश्रेष्ठ उपकार है जिसका प्रतिदान करना असम्भव है।
ब्राह्मस्य जन्मनः कर्त्ता स्वधर्मस्य च शासिता ।
बालोऽपि विप्रो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः ।। 153 ।।
वेद सुनने योग्य जन्म करने वाला अर्थात् शूद्र से द्विज बनाने वाला और अपने धर्म का उपदेश देने वाला ब्राह्मण चाहे बालक हो वह धर्म के अनुसार वृद्ध व्यक्ति के लिए भी पिता के समान आदरणीय होता है।
अध्यापयामास पितृन् शिशुरङ्गिरसः कविः ।
पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्य तान् ॥ 154 ॥
अङ्गिरस के वेदज्ञ पुत्र ने अपनी आयु से भी बड़े चाचा, मामा आदि को वेद विद्या का ज्ञान दिया और उन्हें 'हे पत्रों' कहकर सम्बोधित किया क्योंकि वह ज्ञान के क्षेत्र में उनसे बड़ा था।
ते तमर्थमपृच्छन्त देवानागतमन्यवः ।
देवाश्चैतान्समेत्यो चुर्याय्यं वः शिशुरुक्तवान् । 155 ।।
इस पर अङ्गिरस के बड़ी आयु के पितृव्यों ने क्रोधित होकर देवताओं से पूछा कि 'हे पुत्र' का क्या अर्थ होता है। देवताओं ने उन्हें समझाया और एकमत से बताया कि अङ्गिरस ने आप लोगों को जो 'हे पुत्र' कहा है, वह न्यायोचित है। ज्ञान युक्त बालक भी अज्ञानी वृद्धों के लिए माननीय होता है।
अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः ।
अज्ञं हि बाल इत्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ॥ 156 ।।
जो ज्ञानरहित है वही बालक है और उसे वेद मंत्र पढ़ाने वाला ही उसका पिता है। अतः शिक्षा और ज्ञान देने वाला पिता तुल्य है। कहने का तात्पर्य यह कि व्यवित की आयु नहीं वरन् उसकी ज्ञानोपलब्धि महत्वपूर्ण होती है।
न हायनैर्न पलितैर्न वित्ते न बन्धुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्म योऽनूचानः स नो महान् ॥ 157 ।।
ज्ञान और आचरण का आयु, बालों की सफेदी, धन एवं उच्च कुल आदि से अधिक महत्व है। आशय यह है कि जो व्यक्ति ज्ञानवान तथा उच्च आचरण वाला है वह अपने से बड़ी आयु के लोगों, वृद्धजनों, धनवानों और ऊंचे कुल में जन्म लेने वालों की अपेक्षा समाज के लिए अधिक उपयोगी है, अतः अधिक महत्वपूर्ण भी।
विप्राणां ज्ञानतो ज्येष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः ।
वैश्यानां धान्यधनतः शूद्राणामेव जन्मतः ।। 158 ॥
ब्राह्मण के सम्मान का आधार उसका ज्ञान है. क्षत्रिय के सम्मान का आधार उसकी वीरता-पराक्रम है, वैश्य का सम्मान उसकी धन-सम्पत्ति पर आधारित रहता है। शूद्रों का सम्मान अपने वर्णानुसार स्वाभाविक कर्मों को करने से होता है।
न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः।
यो वै युवाऽप्यधीयानस्तं देवाःस्थविरं विदुः ।। 159 ।।
व्यक्ति के बाल सफेद होने से वह बड़ा नहीं होता अर्थात् आदरणीय नहीं हो जाता। युवा व्यक्ति भी ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद, बुद्धिमान लोगों की दृष्टि में सम्मान योग्य हो जाता है।
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः ।
यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति ॥ 160 ॥
शिक्षा हीन ब्राह्मण काष्ठ (लकड़ी) के हाथी और चमड़े के हिरन के समान निरर्थक है। इन तीनों का कोई महत्व नहीं है क्योंकि वे नाम के लिए ही ब्राह्मण, हाथी या हिरन हैं, सचमुच में नहीं।
यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौर्गवि चाफला।
यथा चाऽज्ञेऽफलं दानं तथा विप्रोऽनृचोऽफलः ।। 161 ॥
जैसे नपुंसक व्यक्ति स्त्रियों को काम सुख देने में अयोग्य होने के कारण उनके लिए निष्फल है, जैसे गायों में गाव (जिसका अण्डकोश निकाल दिया जाता है ताकि वह मैथुन और गर्भाधान नहीं कर सके) निष्फल है तथा जैसे अज्ञानी को दान देने से वह निष्फल हो जाता है, उसी प्रकार वेद ज्ञान से रहित ब्राह्मण निरर्थक है।
अहिंसयैव भूतानां कार्य श्रेयोऽनुशासनम् ।
वाक् चैव मधुरा श्लक्ष्णा प्रयोज्या धर्ममिच्छता ।। 162 ।।
धर्मात्मा व्यक्ति (जैसे आचार्य, गुरु, प्रवचन कर्ता आदि) को अपनी शिक्षा देने का कार्य अहिंसा द्वारा करना चाहिए अर्थात् उसे शारीरिक या मानसिक दण्ड देने के बजाय समझाने-बुझाने का उपाय अपनाना चाहिए। उसे प्राणियों को उपदेश देने के लिए प्रिय एवं मधुर वाणी का ही उपयोग करना चाहिए।
यस्य वाङ्मनसी शुद्धे सम्यग्गुप्ते च सर्वदा।
स वै सर्वमवाप्नोति वेदान्तोपगतं फलम् ॥ 163 ॥
जिसका मन तथा वाणी सब प्रकार से शुद्ध हैं और उसके वश में हैं, ऐसा ही प्राणी वेदान्त के सभी फलों को प्राप्त कर लेता है।
नारुन्तुदः स्यादात्तोंऽपि न परद्रोहकर्मधीः ।
यथाऽस्योद्विजते वाचा नालोक्यां तामुदीरयेत् ।। 164 ॥
स्वयं दुःखी होने पर भी किसी दूसरे व्यक्ति को दुःख नहीं दे, दूसरे को हानि पहुंचाने का विचार तक नहीं करे तथा जिस वचन से कोई दुःखी हो सकता है, ऐसा स्वर्ग पाने में बाधा डालने वाला वचन नहीं कहे।
सम्मानाद्ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव ।
अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा ।। 165 ।।
ब्राह्मण को सम्मान पाने से सदा बचने का प्रयत्न करना चाहिए और उसे विषतुल्य समझना चाहिए। इसके विपरीत अपमान की सदैव इच्छा करे और अपमान करने वाले को क्षमा कर दे। इस श्लोक में ब्राह्मण को सामाजिक मान-अपमान से ऊपर उठकर जीवन जीने की प्रेरणा दी गई है, ताकि वह अपने तटस्थ दृष्टिकोण के कारण समाज को लाभ पहुंचा सके।
सुखं ह्यवमतः शेते सुखं च प्रतिबुध्यते।
सुखं चरति लोकेऽस्मिन्नवमन्ता विनश्यति ।। 166 ॥
दूसरों द्वारा अपमान किए जाने पर भी क्षमा कर देने वाला मनुष्य सुख से सोता है, सुख सहित जागता है तथा सुखपूर्वक ही इस संसार में विहार करता है परन्तु अपमान करने वाला मनुष्य अपने द्वारा किए गए पाप से नष्ट हो जाता है।
अनेन क्रमयोगेन संस्कृतात्मा द्विजः शनैः ।
गुरौ वसन् सञ्चिनुयाद्ब्रह्माधिगमिकं तपः ।। 167 ।।
जात कर्म से लेकर उपनयन तक संस्कार प्राप्त द्विज गुरुकुल में रहता हुआ वेद ज्ञान प्राप्त करने के लिए आगे बताए जाने वाले तप का संग्रह करें।
तपोविशेषैर्विविधैर्ब्रतैश्च विधिचोदितैः ।
वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना ।। 168 ।।
द्विज को शास्त्रों में बताए गए अनेक तरह के विशेष तपों (जैसे-यम-नियम, गुरु सेवा, सत्य पालन, शाकाहार आदि) को करते हुए उपनिषदों एवं पूरी वेद विद्या को ग्रहण करना चाहिए।
वेदमेव सदाभ्यस्येत्तपस्तप्स्यन् द्विजोत्तमः ।
वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते ॥ 169 ।।
इस जगत में वेदों की शिक्षानुसार अपने जीवन को व्यतीत करने से बड़ा कोई तप नहीं है। अतः अगर श्रेष्ठ ब्राह्मण वास्तव में तप करना चाहता है तो उसे वेदों का अध्ययन करना चाहिए।
आ हैव स नखाग्रेभ्यः परमं तप्यते तपः ।
यः स्त्रग्व्यपिद्विजोऽधीते स्वाध्यायं शक्तितोऽन्वहम् ।। 170 ।।
वह ब्राह्मण सिर से लेकर पैर के नाखून तक कठोर तपस्या करता है जो गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट होने के बाद भी प्रतिदिन अपनी सामर्थ्यानुसार वेदों का स्वाध्याय करता है। आशय यह है कि वेदाध्ययन करना तपस्या करने के समान है।
योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ।। 171 ।।
जो ब्राह्मण अन्यान्य कार्यों (यज्ञ, जप आदि) में प्रवृत्त होकर वेदों का स्वाध्याय करना छोड़ देता है, वह जीते हुए भी अपने वंशसहित शूद्र बन जाता है। कहने का आशय यह है कि ब्राह्मण का प्रमुख कर्तव्य वेदों का अध्ययन करना है।
मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जिबन्धने।
तृतीयं यज्ञदीक्षायां द्विजस्य श्रुतिचोदनात् ॥ 172 ।।
वेद वाक्यानुसार ब्राह्मण का तीन बार जन्म होता है- प्रथम मातृगर्भ से, द्वितीय यज्ञोपवीत संस्कार द्वारा, तृतीय यज्ञ दीक्षा द्वारा।
तत्र यद् ब्रह्मजन्मास्य मौञ्जीबन्धनचिह्नितम् ।
तत्रास्य माता सावित्री पितात्वाचार्य उच्यते ।। 173 ।।
पूर्व श्लोक में वर्णित तीन जन्मों में द्विज का यज्ञोपवीत संस्कार रूपी जो दूसरा जन्म होता है उसमें बालक की माता गायत्री (सावित्री) और पिता (यज्ञोपवीत कराने वाला) आचार्य होते हैं।
वेद प्रदानादाचार्यं पितरं परिचक्षते ।
न ह्यस्मिन् युज्यते कर्म किञ्चिदामौञ्जिबन्धनात् ॥ 174 ॥
ब्राह्मण को उपनयन संस्कार (मौञ्जीबन्धन) से पहले वेद में बताए किसी कर्म को करने का अधिकार नहीं। वह वेद में बताए यज्ञ आदि करने तथा वेद विद्या का अध्ययन करने का अधिकार मौञ्जीबन्धन के बाद ही प्राप्त करता है। इसीलिए वेद-विद्या को देने वाला आचार्य पिता कहलाता है।
नाभिव्याहरयेद् ब्रह्म स्वधानिनयनादृते ।
शूद्रेण हि समस्तास्तावद्यावद्वेदे न जायते ।। 175
बालक का उपनयन संस्कार जब तक न हो जाए उससे वेद मंत्रों का उच्चारण नहीं कराना चाहिए। वास्तव में उस समय तक वह शुद्र कहलाता है और शुद्र को वेद मंत्रों का जप करना मना है। बालक के पिता आदि का स्वर्गवास हो जाने पर उससे वेदमंत्रों का उच्चारण करवाया जा सकता है।
कृतोपनयनस्यास्य व्रतादेशनमिष्यते ।
ब्रह्मणो ग्रहणं चैव क्रमेण विधिपूर्वकम् ॥ 176 ।।
यज्ञोपवीत संस्कार होने पर व्रतों (हवन के लिए समिधा का लाना, दिन में निद्रा नहीं लेना) का पालन तथा वेद का उपदेश और ग्रहण क्रमशः विधिपूर्वक करना चाहिए लेकिन यह यज्ञोपवीत से पहले करना मना है।
यद्यस्य विहितं चर्म यत्सूत्रं या च मेखला।
यो दण्डो यच्च वसनं तत्तदस्य व्रतेष्वपि ॥ 177 ।।
उपनयन संस्कार में जिस वर्ण के बालक हेतु जिस प्रकार का चर्म, सूत्र, मेखला तथा दण्ड धारण करने का निर्देश किया गया है, अन्य समस्त प्रकार के व्रतों में उन्हीं वस्तुओं को धारण करने का विधान समझना चाहिए।
सेवेतेमांस्तु नियमान् ब्रह्मचारी गुरौ वसन्।
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं तपोवृद्धयर्थमात्मनः ।। 178 ।।
ब्रह्मचारी गुरु के पास रहते हुए अपनी सभी इन्द्रियों पर पूरा नियंत्रण रखे। आगे बताए गए नियमों का अपने तप की सिद्धि के लिए दृढ़ता से पालन करे।
नित्यं स्नात्वा शुचिः कुर्याद्देवर्षिपितृतर्पणम् ।
देवताभ्यर्चनं चैव समिदाधानमेव च ॥ 179 ॥
ब्रह्मचारी को नित्य स्नान करने के बाद पवित्र होकर देवताओं, ऋषियों एवं पितरों का जल द्वारा तर्पण करना चाहिए। समिधाओं को लेकर यज्ञ-हवन द्वारा देवताओं का पूजन करना चाहिए।
वर्जयेन्मधु मांसं च गन्धं माल्यं रसान् स्त्रियः ।
शुक्तानि यानि सर्वाणि प्राणिनां चैव हिंसनम्॥ 180 ।।
ब्रह्मचारी को निम्नलिखित वस्तुओं को पूरी तरह त्याग देना चाहिए-मधु (शहद), मांस, सुगन्धित द्रव्य, पुष्पहार, खट्टी-मीठी चटपटी चीजें, स्त्रियों की संगत, सड़े पदार्थ (जैसे मदिरा, सिरका आदि) तथा जीव हिंसा।
अभ्यङ्गमञ्जनं चाक्ष्णोरुपानच्छत्रधारणम् ।
कामं क्रोधं च लोभं च नर्तनं गीतवादनम् ॥ 181 ॥
ब्रह्मचारी को मनोविकार उत्पन्न करने वाले निम्नलिखित कार्य नहीं करने बाहिए- शरीर में तेल-घृत मलना, उबटन लगाना, आंखों में अंजन या काजल लगाना, पैरों में जूता पहनना, सिर पर छाता लगाना, काम, क्रोध, लोभ करना, नाचना गाना या संगीत वाद्य बजाना।
द्यूतं च जनवादं च परिवादं तथाऽनृतम्।
स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भावुपघातं परस्य च ॥ 182 ।।
जुआ खेलने में, लोगों के साथ झगड़ा करने में, दूसरों की बुराई या निन्दा करने में, झूठ बोलने में, स्त्रियों को देखने और उनके साथ हंसी-मजाक करने में, दूसरों को चोट मारने या उनका वध करने में कभी प्रवृत्त नहीं होना चाहिए।
एकः शयीत सर्वत्र न रेतः स्कन्दयेत्क्वचित्।
कामाद्धि स्कन्दयन् रेतो हिनस्ति व्रतमात्मनः ।। 183 ।।
ब्रह्मचारी को हमेशा अकेला सोना चाहिए और कामवासना में न तो प्रवृत्त होना चाहिए और न कामुक चिन्तन करना चाहिए। उसे अपना वीर्यपात नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे उसके ब्रह्मचर्य व्रत का नाश होता है।
स्वप्ने सिक्त्वा ब्रह्मचारी द्विजः शुक्रमकामतः । स्नात्वाऽर्कमर्चयित्वा त्रिः पुनर्मामित्यूचं जपेत् ।। 184 ।।
यदि ब्रह्मचारी को सोते हुए स्वप्न दोष हो जाता है और उसका वीर्यपात हो जाता है तो उसे स्नान करने के बाद सूर्य का पूजन तथा तीन बार 'पुनर्मामित्वेन्द्रियम...' मंत्र का जप करना चाहिए।
उदक्कुम्भं सुमनसो गोशकृन्मृत्तिकाकुशान् ।
आहरेद्यावदर्थानि भैक्षं चाहरहश्चरेत् ।। 185 ।।
ब्रह्मचारी आवश्यकता के अनुसार प्रतिदिन पानी का घड़ा, फूल, गोबर, मिट्टी और कुश लाए। कहने का आशय यह है कि प्रतिदिन गुरु, गुरुकुल और व्यक्तिगत आवश्यकतानुसार ये वस्तुएं लाए, उनका संग्रह नहीं करे। वह प्रतिदिन भोजन के लिए भिक्षा मांगकर लाए।
वेदयज्ञैरहीनानां प्रशस्तानां स्वकर्मसु ।
ब्रह्मचार्याहरे ट्रैक्षं गृहेभ्यः प्रयतोऽन्वहम् ।। 186 ॥
होता है। उसे ब्रह्मचारी को प्रत्येक दिन नियम के अनुसार ऐसे घरों से भीख मांग कर लानी चाहिए जहां यज्ञों का आयोजन किया जाता है एवं वेदों का अध्ययन। ऐसे घरों से भिक्षा लानी चाहिए जो धार्मिक नित्य कर्मों के कारण समाज में भली
प्रकार प्रतिष्ठित है। जिन घरों में वेदों का स्वाध्याय नहीं होता और यज्ञों का अनुष्ठान नहीं किया जाता वहां से भिक्षा नहीं लेनी चाहिए।
गुरोः कुले न भिक्षेत न ज्ञातिकुलबन्धुषु ।
अलाभे त्वन्यगेहानां पूर्व पूर्व विवर्जयेत् ।। 187 ।।
अपने गुरु, अपनी जाति तथा वंश वालों एवं बन्धु-बान्धवों के घरों से ब्रह्मचारी को भीख नहीं मांगनी चाहिए। अगर कभी दूसरों के घरों से भीख नहीं मिले तो पहले बन्धु-बांधवों के घरों से, वहां से नहीं प्राप्त होने पर कुलजनों से, वहां से भी न प्राप्त होने पर अपनी जाति वालों से और वहां से भी निराश होने पर गुरु के घर में भिक्षा मांगनी चाहिए।
सर्वं वाऽपि चरेद् ग्रामं पूर्वोक्तानामसम्भवे।
नियम्य प्रयतो वाचमभिशस्तांस्तु वर्जयेत् ॥ 188 ॥
पूर्वोक्त श्लोकों में बताए योग्य गृहों से भिक्षा नहीं मिलने पर अथवा ऐसे घरों के न होने पर ब्रह्मचारी को गांव के किसी भी घर से भिक्षा ग्रहण कर लेनी चाहिए। परन्तु उसे भिक्षा के लिए वाणी का दुरुपयोग (जैसे गिड़गिड़ाना या अपने को हीन बताना) नहीं करना चाहिए और न ही महापापी लोगों के घरों से भिक्षा ले।
दूरादाहृत्य समिधः सन्निदध्याद्विहायसि ।
सायंप्रातश्च जुहुयात्ताभिरग्निमतन्द्रितः ।। 189 ।।
दूर से समिधा लाकर अर्थात् जहां से वे मिल जाएं, वहां से लाकर किसी ऊंची जगह पर उन्हें रख दे, तत्पश्चात् उन समिधाओं से प्रातःकाल और सायंकाल हवन करे।
अकृत्वा भैक्षचरणमसमिध्य च पावकम् ।
अनातुरः सप्तरात्रमवकीर्णिव्रतं चरेत् ॥ 190 ।।
अगर स्वस्थ रहते हुए भी कोई ब्रह्मचारी सात दिन तक बिना भिक्षा याचना किए तथा बिना हवन किए रहता है तो उसे प्रायश्चित करने हेतु 'अवकीर्णि' नामक व्रत करना चाहिए।
भैक्षेण वर्त्तयेन्नित्यं नैकान्नादी भवेद्वती।
भैक्षेण व्रतिनो वृत्तिरुपवाससमा स्मृता ।। 191 ।।
ब्रह्मचारी को अनेक घरों से भिक्षा याचना करके अपनी क्षुधा पूर्ति करनी चाहिए, कभी किसी एक ही घर से भिक्षा लेकर क्षुधा पूर्ति नहीं करनी चाहिए।
महर्षियों के अनुसार भिक्षा में मिले भोजन को ग्रहण करने से ब्रह्मचारी की वृत्ति उपवास के समान हो जाती है।
व्रतवद्देवदैवत्ये पित्र्ये कर्मण्यथर्षिवत् । काममभ्यर्थितोऽश्नीयाद्वतमस्य न लुप्यते ।। 192 ॥
अगर किसी ब्रह्मचारी को ऋषि के रूप में देवयज्ञ और पितृकर्म (श्राद्ध) आदि से सम्बंधित ब्रह्म भोज में बुलाया जाता है तो उस दिन केवल एक घर के भोजन द्वारा क्षुधा शांत करने पर भी वह अपने व्रत में ही स्थित रहता है।
ब्राह्मणस्यैव कर्मैतदुपदिष्टं मनीषिभिः ।
राजन्यवैश्ययोस्त्वेवं नैतत्कर्म विधीयते ॥ 193 ।
पूर्वोक्त श्लोक में वर्णित कर्म केवल ब्राह्मण ब्रह्मचारी के लिए है, क्षत्रिय अथवा वैश्य ब्रह्मचारी के लिए यह विधान नहीं है।
चोदितो गुरुणा नित्यमप्रचोदित एव वा।
कुर्यादध्ययने यत्नमाचार्यस्य हितेषु च ॥ 194 ।।
आचार्य आज्ञा दे या नहीं दे, ब्रह्मचारी का यह कर्तव्य है कि वह प्रतिदिन यत्न सहित अध्ययन करे और आचार्य की सेवा करने में लगा रहे। प्रतिदिन आचार्य के निर्देश की प्रतीक्षा नहीं करे वरन् एक बार वह जो आज्ञा दे उसे भली प्रकार समझकर नित्य उसका पालन करे।
शरीरं चैव वाचं च बुद्धीन्द्रियमनांसि च।
नियम्य प्रञ्जलिस्तिष्ठेद्वीक्षमाणो गुरोर्मुखम् ॥ 195 ।।
ब्रह्मचारी को अपने तन-मन, बुद्धि, वाणी और सभी इन्द्रियों पर संयम रखकर हाथ जोड़कर और नम्रता भरे भाव से गुरु के सामने रहना और आदेश पाने के लिए उनका मुख देखते रहना चाहिए।
नित्यमुद्धृतपाणिः स्यात्साध्वाचारः सुसंवृतः ।
आस्यतामिति चोक्तः सन्नासीताभिमुखं गुरोः ॥ 196 ॥
ब्रह्मचारी को गुरु के द्वारा अनुमति मिलने पर कि वह बैठ जाए, बैठना चाहिए। जब तक गुरु अनुमति नहीं दे उनके सम्मुख करबद्ध और विनम्र भाव से खड़ा रहे। ब्रह्मचारी को ऐसे समय अपना दाहिना हाथ सदैव अपनी चादर (ओढ़ने के वस्त्र) से बाहर निकालकर रखना चाहिए।
हीनान्नवस्त्रवेशः स्यात्सर्वदा गुरुसन्निधौ ।
उत्तिष्ठेत्प्रथमं चास्य नग्यं नैन संविशेत् ॥ 197 ।।
तथा सादा खान-पान अपनाना चाहिए। उसे हमेशा गुरु के सोने के बाद सोना और गुरु के सान्निध्य में (समीप) रहते हुए ब्रह्मचारी को सदैव सादी वेशभूषा गुरु के जाग्रत होने से पूर्व जाग जाने का अभ्यास करना चाहिए।
प्रतिश्रवणसम्भाषे शयानो न समाचरेत् ।
नासीनो न च भुञ्जानो न तिष्ठन्न पराङ्मुखः ।। 198 ।।
गुरु से वार्तालाप करते समय ब्रह्मचारी को सोते हुए सा नहीं रहना चाहिए अर्थात पूर्णतः जागरूक रहना चाहिए। उसे लेटे या बैठे हुए भी नहीं रहना चाहिए तथा गुरु को पीठ नहीं दिखानी चाहिए।
आसीनस्य स्थितः कुर्यादभिगच्छंस्तु तिष्ठतः ।
प्रत्युद्गम्य त्वाव्रजतः पश्चाद्धावस्तु धावतः ।। 199 ॥
यदि आचार्य आसन पर बैठे हुए शिष्य को आज्ञा देते हों, उसे उनके सामने खड़े होकर सुनना चाहिए। अगर गुरु खड़े हों तो शिष्य को उनके निकट पहुंच जाना चाहिए। अगर शिष्य को गुरु या आचार्य उसकी ओर आते दिखाई दें, उसे दौड़ कर उनके पास जाना चाहिए। यदि आचार्य चलते-चलते बोल रहे हों, शिष्य को चाहिए कि वह उनके पीछे चलते हुए बात करे।
पराङ्मुखस्याभिमुखो दूरस्थस्यैत्य चान्तिकम् ।
प्रणम्य तु शयानस्य निदेशे चैव तिष्ठतः ।। 200 ।।
शिष्य का यह कर्तव्य है कि अगर आचार्य/ गुरु आज्ञा देते हुए अथवा अपने पीछे आते हुए दिखाई दें तो वह उनके सम्मुख जाकर खड़ा हो जाए। अगर वह दूर हों तो दौड़कर उनके पास पहुंच जाए और यदि वे शयन कर रहे हों तो उन्हें प्रणाम करके उनकी आज्ञा ध्यान से सुने। गुरु के साथ सिर झुकाकर बातचीत करे।
नीचं शय्यासनं चास्य नित्यं स्याद् गुरुसन्निधौ।
गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टासनो भवेत् ।। 201 ।।
ब्रह्मचारी के लिए यह बात ध्यान रखने योग्य है कि आचार्य की शय्या से उसकी शय्या नीची होनी चाहिए। उसे आचार्य (गुरु) के सम्मुख उनके आसन से ऊंचे आसन पर नहीं बैठना चाहिए। इसी तरह गुरु के सम्मुख यथाविधि आदरपूर्वक बैठना उचित है, मनमाने ढंग से नहीं।
नोदाहरेदस्य नाम परोक्षमपि केवलम् ।
न चैवास्यानुकुर्वीत गतिभाषितचेष्टितम् ।। 202 ।।
ब्रह्मचारी को गुरु की अनुपस्थिति में भी उनका नाम नहीं बोलना चाहिए और न उनके सम्मुख (उनका नाम) बोलना चाहिए। उसे भूलकर भी अपने गुरु की चाल-ढाल या बोलने की रीति की नकल नहीं करनी चाहिए।
परोक्षं सत्कृपापूर्वं प्रत्यक्षं न कथञ्चन।
दुष्टानुचारी न गुरोरिह वाऽयुत्र चैत्यधः ।। 203 ।।
गुरु के पीठ पीछे आदरपूर्वक उनके नाम का उच्चारण करे अर्थात् उनके नाम से पूर्व 'परम आदरणीय' या 'श्रीयुत परमपूज्य' आदि विशेषण लगाए। गुरु के सामने किसी भी प्रकार उनके नाम का उच्चारण नहीं करे। गुरु के साथ दुष्ट आचरण करने वाला शिष्य इस लोक तथा परलोक में अधोगति पाता है।
गुरोर्यत्र परिवादो निन्दा वापि प्रवर्तते।
कर्णों तत्र पिधातव्यौ गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः ।। 204 ।।
शिष्य को चाहिए कि जहां गुरु की बुराई या निन्दा की जा रही हो वह वहां से उठकर चला जाए या अपने कान बंद कर ले। कान बंद करने का आशय यह है कि गुरु निन्दा करने वाले से स्पष्ट कह दे कि वह उसकी बात सुनना नहीं चाहता।
मनु जी ने शिष्य को गुरु निन्दक से बहस करने अथवा उससे लड़ने की सलाह नहीं दी क्योंकि दोनों ही स्थितियों में बात का बतंगड़ बनने की अधिक संभावना होती है। चुप रहने, कान में उंगली डाल लेने या निन्दा को सुनने से मना कर देने पर गुरु निन्दा करने वाले के पास चुप रह जाने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं रहता। गुरु की निन्दा नहीं सुनने के फलस्वरूप शिष्य के मन में गुरु के प्रति कोई संदेह नहीं जन्म लेता।
परिवादात्खरो भवति श्वा वै भवति निन्दकः ।
परिभोक्ता कृमिर्भवति कीटो भवति मत्सरीः ।। 205 ।।
शिष्य द्वारा गुरु की बुराई करने पर वह मरने के बाद गधे की योनि में, गुरु के ऊपर झूठा दोष लगाने वाला कुत्ते की योनि में, गुरु के धन का भोग करने वाला कीट योनि में तथा गुरु से ईर्ष्या रखने वाला मकोड़े (मकोट) की योनि में जन्म लेता है।
दूरस्थो नार्चयेदेनं न कुद्धो नान्तिके स्त्रियाः ।
यानासनस्थ श्चैवैनमवरुह्याभिवादयेत् ।। 206 ॥
शिष्य को चाहिए कि वह कभी दूर से गुरु की पूजा नहीं करे वरन् उनके पास जाकर पूजा करे। गुरु की पूजा करते समय सदैव शांत मुद्रा में रहे, क्रोध की मुद्रा में की गई पूजा विपरीत फल देती है। शिष्य को उस समय भी गुरु की पूजा नहीं करनी चाहिए जब वे अपनी स्त्री के साथ हों।
अगर शिष्य किसी वाहन पर सवार हो अथवा आसन पर बैठा हो तो उससे उतर कर गुरु को नमस्कार करे।
अ स
प्रतिवातेऽनुवाते च नासीत गुरुणा सह।
असंनवे चैव गुरोर्न किञ्चिदपि कीर्तयेत् ॥ 207 11
प्रतिवात उस वायु को कहते हैं जो शिष्य की ओर से गुरु जहां उपस्थित हैं उस दिशा की ओर जाती है। अनुवात उस वायु को कहते हैं जो गुरु की ओर से शिष्य जिस दिशा में बैठा है उस तरफ जाती है। इन दोनों ही स्थितियों या जगहों पर शिष्य, गुरु के साथ नहीं बैठे। यदि वातावरण या स्थिति ऐसी हो कि गुरु शिष्य की बात नहीं सुन पाते हों अथवा वे स्वयं सुनना नहीं चाहते हों तो शिष्य कुछ नहीं बोले।
T
गोऽश्वोष्ट्रयानप्रासादप्रस्तरेषु कटेषु च।
आसीत् गुरुणा सार्द्ध शिलाफलकनौषु च ॥ 208 11
महाराज मनु के विचारानुसार शिष्य गुरु के साथ बैल (भैंसा), घोड़ा, ऊंट आदि से जुड़ी गाड़ियों (बैल गाड़ी, भैंसा गाड़ी, घोड़ा गाड़ी, ऊंट गाड़ी) में बैठ सकता है। इसके अतिरिक्त मकान की छत पर, पाषाण शिला पर, चटाई पर, लकड़ी या पत्थर की चौकी पर भी वह गुरु के साथ बैठ सकता है।
गुरोर्गुरौ सन्निहिते गुरुववृत्तिमाचरेत्।
न चानिसृष्टो गुरुणा स्वान्गुरूनभिवादयेत् ।। 209 ।।
शिष्य को अपने गुरु के भी गुरु के साथ वैसा ही सम्मानपूर्ण आचरण रखना चाहिए जैसा कि वह गुरु के साथ रखता है। गुरु के पास (गुरुकुल में) रहता हुआ शिष्य गुरु से अनुमति लिए बिना वहां आए अपने माता-पिता, चाचा आदि का भी अभिवादन नहीं करे।
विद्यागुरुष्वेवमेव नित्या वृत्तिः स्वयोनिषु।
प्रतिषेधत्सु चाधर्माद्धितं चोपदिशत्स्वपि ॥ 210 ।।
ब्रह्मचारी को चाहिए कि वह विद्या-गुरुओं के समान ही पिता, चाचा, मामा आदि तथा अधर्म से दूर रहने की प्रेरणा देने वालों एवं सद्मार्ग दिखलाने वालों का आदर-सम्मान करे।
श्रेयस्सु गुरुववृत्तिं नित्यमेव समाचरेत् ।
गुरुपुत्रे तथाऽऽचार्ये गुरोश्चैव स्वबन्धुषु ॥ 211 ॥
ब्रह्मचारी उन व्यक्तियों का, जो उसकी अपेक्षा विद्या तथा तप में श्रेष्ठ हैं, अवस्था में अपने से बडे गुरु पुत्र का और गुरु के बन्धुबान्धवों का अपने गुरु के समान ही आदर तथा सत्कार करे।
बालः समानजन्मा वा शिष्यो वा यजकर्मणि ।
अध्यापयन् गुरुसुतो गुरुवन्मानमर्हति ।। 212 ।।
गुरु पुत्र आयु में अपने से छोटा हो, समान आयु का हो, अध्ययन या अध्यापन कार्य करता हो, यज्ञ कर्म में ऋत्विक हो अथवा केवल यज्ञ दर्शन हेतु आया हो, वह गुरु के समान पूजनीय है।
उत्सादनं च गात्राणां स्नापनोच्छिष्ट भोजने। न कुर्याद्गुरुपुत्रस्य पादयोश्चावनेजनम् ॥ 213 ।।
शिष्य को चाहिए कि यद्यपि वह गुरु पुत्र का गुरु के समान ही आदर-सत्कार करे परन्तु गुरु पुत्र के शरीर में उबटन लगाने, उसे स्नान कराने, उसका जूठा भोजन करने तथा उसके पैर धोने के कार्यों को नहीं करे।
गुरुवत्प्रतिपूज्याः स्युः सवर्णाः गुरुयोषितः ।
असवर्णास्तु सम्पूज्याः प्रत्युत्थानाभिवादनैः ।। 214 ।।
गुरु की सवर्णा स्त्रियां (पत्नियां) गुरु के समान पूज्य हैं और गुरु की असवर्णा स्त्रियों (पत्नियों) को खड़े होकर नमस्कार करना चाहिए।
गुरु के समान आदर करने से आशय यह है कि शिष्य को गुरु की सवर्णा पत्नियों (ब्राह्मण गुरु की ब्राह्मण कुल में उत्पन्न पत्नी) के आने पर उन्हें पाद्य, अर्घ्य तथा आचमन आदि देना चाहिए पर असवर्णा पत्नियों (ब्राह्मण गुरु की अन्य वर्णों जैसे-क्षत्रिय और वैश्य कुल में जन्मी पत्नी) को केवल खड़े होकर प्रणाम करना उचित है।
अभ्यञ्जनं स्नापनं च गात्रोत्सादनमेव च।
गुरुपल्याः न कार्याणि केशानां च प्रसाधनम् ।। 215 ।।
शिष्य इन कर्मों को नहीं करे जैसे गुरुपत्नी के शरीर पर उबटन लगाना, उसे नहलाना, उसके शरीर को दबाना, उसके बालों को संवारना या उसका श्रृंगार करना।
गुरुपत्नी तु युवतिर्नाभिवाद्येह पादयोः ।
पूर्णविंशतिवर्षेण गुणदोषौ विजानता ।। 216 ॥
बीस वर्षीय ब्रह्मचारी जिसे गुण-दोष का ज्ञान हो जाता है, उसे चाहिए कि गुरु की युवा पत्नी के चरणों का स्पर्श नहीं करे वरन् दूर से ही धरती का स्पर्श कर ले।
स्वभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम्।
अतोऽर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपश्चितः ।। 217 ।।
महाराज मनु युवा ब्रह्मचारी का युवती गुरुपत्नी से दूर रहने का कारण बताते हुए कहते हैं कि यह स्त्रियों का स्वभाव है कि वे पुरुषों को अपनी श्रृंगार चेष्टाओं द्वारा मोहित कर उनमें दूषण उत्पन्न कर देती हैं। अतः विद्वान पुरुष स्त्रियों के सम्बंध में असावधान नहीं रहते और उनसे दूर रहते हैं।
अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुनः ।
प्रमदा ह्युत्पथं नेतुं कामक्रोधवशानुगम् ।। 218 ।।
स्त्रियां काम एवं क्रोध के वश में हुए मूर्ख अथवा विद्वान पुरुष को बुरे मार्ग पर ले जाने में समर्थ होती हैं। अतः काम और क्रोध के वश में होते ही बुद्धिमान व्यक्ति भी अपना ज्ञान खो देता है।
मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत्। बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ।। 219 ।।
इन्द्रियां बहुत ही बलवान होती हैं। ये इन्द्रियां मूर्ख व्यक्ति को ही नहीं वरन् ज्ञानवान व्यक्ति को भी अपने वश में कर लेती हैं। अतः पुरुष युवा माता, बहन तथा पुत्री के साथ भी अधिक समय तक एकान्त में नहीं रहे।
कामं तु गुरुपत्नीनां युवतीनां युवा भुवि।
विधिवद्वन्दनं कुर्यादसावहमिति ब्रुवन् ।। 220 ।।
युवा शिष्य को चाहिए कि वह युवती गुरु पत्नी को बिना पृथ्वी का स्पर्श किए ही 'अमुक गोत्र और नाम वाला मैं आपको प्रणाम करता हूं' कहकर अभिवादन करे।
विप्रोष्य पादग्रहणमन्वहं चाभिवादनम् ।
गुरुदारेषु कुर्वीत सतां धर्ममनुस्मरन् ।। 221 ।।
युवा शिष्य प्रवास से लौटकर आने के पश्चात् पूज्य पुरुषों का चरण स्पर्श कर उन्हें प्रणाम करे और युवा गुरु पत्नियों को बिना चरण स्पर्श किए ही दूर से प्रणाम कर उनका अभिवादन करें।
यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति।
तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ।। 222 ।।
जिस प्रकार खनित्र (जमीन खोदने का यंत्र कुदाल) से धरती को खोदता हुआ मनुष्य पानी को प्राप्त कर लेता है अर्थात् जमीन को नीचे खोदते चले जाने से मनुष्य जिस तरह जल को पा लेता है उसी प्रकार गुरु की सेवा करते रहने से शिष्य गुरु की विद्या को प्राप्त कर लेता है।
मुण्डो वा जटिलो वा स्यादथवा स्याच्छिखाजटः ।
नैनं ग्रामेऽभिनिम्लोचेत्सूर्यो नाभ्युदयात् क्वचित् ।। 223 ।।
ब्रह्मचारी अपनी इच्छानुसार सिर पर जटा रख सकता है या सिर पूरी तरह मंडवा सकता है अथवा केवल शिखा (चोटी) मात्र रख सकता है। हां, ब्रह्मचारी को यह ध्यान रखना चाहिए उसे सूर्य उदय होते समय और सूर्यास्त के बाद किसी भी ग्राम में नहीं रहना है।
कहने का अभिप्राय यह है कि अगर ब्रह्मचारी किसी गांव में है तो सूर्य अस्त होने से पहले ही उसे अपने आश्रम में पहुंच जाना चाहिए तथा सूर्योदय से पहले अपने नित्यकर्म (सन्ध्या-वन्दना, हवन आदि) पूरे करके ही आश्रम से बाहर जाना चाहिए।
तं चेदभ्युदयात्सूर्यः शयानं कामचारतः । निम्लोचेद्वाऽप्यविज्ञानाज्जपन्नुपवसेद्दिनम् ।। 224 ।।
ब्रह्मचारी को हमेशा सूर्य के उदय होने से पहले जाग जाना चाहिए और सूर्य के अस्त हो जाने के बाद सोना चाहिए। अगर कभी वह इच्छापूर्वक सूर्योदय के बाद भी सोता रह जाए (बीमार या किसी कारणवण अस्वस्थ होने के कारण नहीं।) या सूर्यास्त से पूर्व सो जाए तो उसे पूरे दिन उपवास रखते हुए गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए।
सूर्येण ह्यभिनिम्लुक्तः शयानोऽभ्युदितश्च यः ।
प्रायश्चित्तमकुर्वाणः युक्तः स्यान्महतैनसा ।। 225 ।।॥
सूर्य के उदय होते समय तथा सूर्य के अस्त होते समय सोता रहने वाला और इसके लिए किसी तरह का प्रायश्चित नहीं करने वाला ब्रह्मचारी महापाप का भागी होता है।
आचम्य प्रयतो नित्यमुभे सन्ध्ये समाहितः ।
शुचौ देशे जपञ्जप्यमुपासीत यथाविधिः ।। 226 ।।
प्रतिदिन दोनों सन्ध्याओं (रात्रि और दिन की सांध्य वेला) में ब्रह्मचारी किसी पवित्र स्थान में बैठकर विधिपूर्वक सन्ध्या का अनुष्ठान करे।
यदि स्त्री यद्यवरजः श्रेयः किञ्चित्समाचरेत् ।
तत्सर्वमाचरेद्युक्तो यत्र चास्य रमेन्मनः ।। 227 ।।
स्त्री एवं शूद्र का शास्त्रानुकूल जिस विधान के अनुष्ठान में मन लगता हो अथवा परम्परा के अनुसार वे जो धर्मानुकूल नियमों का पालन करते हों, उन्हें वैसा ही करने देना उचित है।
धर्मार्थावुच्यते श्रेयः कामार्थों धर्म एव च।
अर्थ एवेह वा श्रेयस्त्रिवर्ग इति तु स्थितिः ।। 228 ।।
कोई आचार्य धर्म तथा धन को प्राप्त करने योग्य एवं कल्याणकारी मानते हैं।
दूसरे प्रकार के आचार्य काम तथा धन को ही मानव जीवन का लक्ष्य मानते हैं।
परन्तु मनु महर्षि के अनुसार पुरुषार्थता के कारण धर्म, अर्थ और काम तीनों हो मानव के लिए उपयोगी हैं, अतः प्राप्त करने योग्य हैं।
टिप्पणी यहां मनु महाराज ने संसार का भोग करने की इच्छा रखने वाले के लिए उपदेश दिया है। मोक्ष की अभिलाषा रखने वालों के लिए आगे कहा है।
आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः ।
माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता स्वो मूर्तिरात्मनः ।। 229 ।।
आचार्य ब्रह्म का रूप है, पिता प्रजापति का, माता पृथ्वी की और सहोदर भ्राता अपनी आत्मा का। इसका आशय यह है कि इसी रूप में आदर करना उचित है।
आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः ।
नार्त्तनाप्यवमन्तव्याः ब्राह्मणेन विशेषतः ।। 230 ॥
आचार्य, पिता, मां, सहोदर बड़े भाई का स्वयं कष्ट उठाकर भी कभी अपमान नहीं करे (द्विजाति के लोगों को इसका ध्यान रखना चाहिए विशेष रूप से ब्राह्मणों को)।
यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम्।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ।। 231 ।।
माता-पिता को मनुष्यों को जन्म देने तथा उनका पालन-पोषण करने में
जितने कष्ट होते हैं, उससे उऋण होने में कोई उनकी सौ वर्ष तक सेवा करता रहे फिर भी नहीं हो सकता।
तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा।
तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते ॥ 232 ।।
अतः माता-पिता तथा आचार्य को जो कार्य प्रिय हो तथा उन्हें संतोष देने वाले हो वही नित्य करे। इन तीनों के प्रसन्न होने पर सभी व्रतों का फल अपने आप मिल जाता है।
तेषां त्रयाणां शुश्रूषा परमं तप उच्यते।
न तैरनभ्यनुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत् ।। 233 ।।
उन तीनों अर्थात माता-पिता और आचार्य की सेवा-सुश्रूषा करना सर्वश्रेष्ठ तप है। इनके आदेश बिना व्यक्ति को कोई धार्मिक अनुष्ठान आदि नहीं करने चाहिए।
त एव हि त्रयो लोकास्त एव त्रय आश्रमाः ।
त एव हि त्रयो वेदास्त एवोक्तास्त्रयोऽग्नयः ।। 234 ।।
पुत्र तथा शिष्य के लिए माता-पिता एवं गुरु ही तीनों लोक (पृथ्वी, पाताल और अंतरिक्ष) हैं, वे ही तीनों आश्रम (ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थ) हैं, वे ही तीनों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद) हैं, वे ही तीनों अग्नि (गार्हपत्याग्नि, दक्षिणाग्नि तथा आहवनीयाग्नि) हैं।
टिप्पणी - महर्षि अंगिरा ने चौथा अथर्ववेद बनाया, उससे पहले तीन ही वेद माने जाते थे।
पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताऽग्निर्दक्षिणः स्मृतः ।
गुरुरावहनीयस्तु साऽग्नित्रेता गरीयसी ।। 235 ।।
माता दक्षिण नाम की, पिता गार्हपत्य नाम की और गुरु (आचार्य) आवहनीय नाम की अग्नि हैं। यह तीनों अग्नियां लोक प्रसिद्ध तीनों अग्नियों में श्रेष्ठ हैं।
त्रिष्वप्रमाद्यस्तेषु त्रीन्लोकान्विजयेद्गृही।
दीप्यमानः स्ववपुषा देववद्दिवि मोदते ।। 236 ।।
प्रमाद रहित होकर जो इन तीनों (माता-पिता एवं गुरु) की सेवा में संलग्न रहता है वह त्रिलोक विजेता होता है तथा अपने शरीर से प्रकाशमान होता हुआ देवताओं के समान सुखों को प्राप्त करता है।
इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्या तु मध्यमम् ।
गुरुशुश्रूषया त्वेवं ब्रह्मलोकं समश्नुते ।। 237 ।।
पुत्र मातृ भक्ति द्वारा इस लोक को, पितृ भक्ति से अंतरिक्ष लोक को और गुरु सेवा से ब्रह्म लोक को प्राप्त करता है।
सर्वे तस्यादृताः धर्मा यस्यैते त्रय आदृताः ।
अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याऽफलाः क्रियाः ।। 238 ।।
जिसने माता, पिता एवं गुरु इन तीनों की सेवा की और उनका सम्मान किया उसने सब धर्मों का सम्मान किया अर्थात सभी धर्म उसको फल देने वाले होते हैं। जिसने इन तीनों का अनादर किया. उसे किसी भी धार्मिक अनुष्ठान का फल नहीं मिलता।
यावत्त्रयस्ते जीवेयुस्तावन्नान्यं समाचरेत्।
तेष्वेव नित्यं शुश्रूषां कुर्यात्प्रियहिते रतः ।। 239 ।।
जब तक वे तीनों (माता-पिता एवं गुरु) जीवित रहें तब तक (उनकी आजा लिए बिना) अन्य धर्म को अपनी इच्छा से नहीं करे वरन् उन्हीं के हित में तथा उन्हें जो प्रिय हो वही करता रहे।
तेषामनुपरोधेन पारत्र्यं यद्यदाचरेत् ।
तत्तन्निवेदयेत्तेभ्यो मनोवचनकर्मभिः ।। 240 ।।
परलोक की सिद्धि के लिए माता-पिता एवं गुरु की आज्ञा से जो भी कार्य को उन्हें मन-वचन तथा कर्म से उन्हीं (माता, पिता तथा गुरु) को अर्पित कर दे।
त्रिष्वेतेष्विति कृत्यं हि पुरुषस्य समाप्यते।
एष धर्मः परः साक्षादुपधर्मोऽन्य उच्यते ।। 241 ।।
मनुष्य का सर्वोत्तम तथा परम धर्म माता-पिता तथा गुरु की सेवा करना ही है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी धर्म गौण हैं अर्थात् उनका इस धर्म के सामने कोई महत्व नहीं।
श्रद्दधानः शुभां विद्यामाददीतावरादपि ।
अन्त्यादपि परं धर्म स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ।। 242 ।।
श्रद्धा सहित अपनी तुलना में नीच व्यक्ति से भी श्रेष्ठ विद्या को सीख लेना चाहिए। चाण्डाल से भी उत्कृष्ट धर्म को प्राप्त करना चाहिए तथा नीच कुल से भी शुभ लक्षणों वाली कन्या रत्न को विवाह हेतु ग्रहण कर लेना चाहिए।
विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम्।
अमित्रादपि सवृत्तम्मेध्यादपि काञ्चनम् ।। 243 ।।
विवेकशील व्यक्ति विष में से भी अमृत निकाल लेता है, एक बालक से भी कल्याण करने वाला कथन ग्रहण कर लेता है, शत्रु से भी श्रेष्ठ आचरण सीख लेता है और गंदे या अपावन स्थान से भी सोना प्राप्त कर लेता है। कहने का तात्पर्य यह है कि बुद्धिमान व्यक्ति को गुण तथा वस्तु को महत्व देना चाहिए व्यक्ति या स्थान को नहीं।
स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम्।
विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥ 244 ॥
जहां कहीं या जिस किसी से (उच्च या नीच व्यक्ति, अच्छे अथवा बुरे स्थान आदि पर ध्यान दिए बिना) धर्म, रत्न, विद्या, पवित्रता, सुन्दर स्त्रियां, उपदेश तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के शिल्प मिलते हों, उन्हें बिना किसी संकोच के प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।
अब्राह्मणादध्ययनमापत्काले विधीयते।
अनुव्रज्या च शुश्रूषा यावदध्ययनं गुरोः ॥ 245 ।।
आपातकाल में, ब्राह्मण से अलग वर्ण (क्षत्रिय, वैश्य) के व्यक्ति से भी विद्या अध्ययन करने का विधान किया गया है। जब तक विद्या अध्ययन चलता रहे तब तक ब्राह्मण से भी इतर वर्ग के गुरु की भी सेवा करते रहना चाहिए।
नाऽब्राह्मणे गुरौ शिष्यो वासमात्यन्तिकं वसेत्।
ब्राह्मणे वाननूचाने काङ्क्षन्गतिमनुत्तमाम् ।। 246 ।।
गुरु अगर ब्राह्मण से भिन्न वर्ण का हो तो विद्या अध्ययन काल में शिष्य का गुरुकुल में निवास करना जरूरी नहीं है। इसी भांति अगर ब्राह्मण गुरु वेद-वेदाङ्ग के ज्ञान में कुशल नहीं हो तो यह शिष्य पर निर्भर है कि वह चाहे तो गुरुकुल में निवास करे अथवा नहीं करे।
यदि त्वात्यन्तिकं वासः रोचयेत गुरोः कुले।
युक्तः परिचरेदेनमाशरीरविमोक्षणात् ॥ 247 ॥
अगर शिष्य (जीवन भर ब्रह्मचारी रहकर) गुरुकुल में ही रहना चाहता हो तो उसे मृत्यु तक सावधानीपूर्वक गुरु की सेवा करनी चाहिए।
आसमाप्तेः शरीरस्य यस्तु शुश्रूषते गुरुम् ।
सः गच्छत्यञ्जसा विप्रो ब्रह्मणः सद्यः शाश्वतम् ।। 248 ।।
जो ब्रह्मचारी अपनी मृत्यु तक गुरु सेवा करता है, वह ब्राह्मण ब्रह्मचारी विनाश रहित ब्रह्म लोक को पाता है।
न पूर्व गुरवे किञ्चिदुपकुर्वीत धर्मवित्।
स्नास्यंस्तु गुरुणाऽऽज्ञप्तः शक्त्या गुर्वर्थमाहरेत् ।। 249 ॥
गुरु की अनुमति बिना और उनसे पहले स्नान को छोड़कर धर्माचरण के ज्ञाता ब्रह्मचारी को कोई दूसरा कार्य नहीं करना चाहिए। स्नान के बाद शिष्य को गुरु के स्नान हेतु जल लाना चाहिए।
क्षेत्रं हिरण्यं गामश्वं छत्रोपानहमासनम् ।
धान्यं शाकं च वासांसि गुरवे प्रीतिमावहेत् ॥ 250 ।।
शिष्य द्वारा गुरु को अत्यधिक प्रेम सहित ही भूमि, सोना, गाय, घोड़ा, छाता जूता, अनाज, शाक तथा वस्त्र आदि दिए जाने चाहिए।
आचार्ये तु खलु प्रेते गुरुपुत्रे गुणान्विते।
गुरुदारे सपिण्डे वा गुरुववृत्तिमाचरेत् ।। 251 ॥
गुरु के स्वर्गवासी होने पर शिष्य को गुरु के गुणवान पुत्र में, उसके नहीं होने पर गुरु पत्नी में, उसके भी अभाव में गुरु के सहोदर भाई में गुरुत्व रखना चाहिए।
एतेष्वविद्यमानेषु स्नानासनविहारवान् ।
प्रयुञ्जानोऽग्निशुश्रूषां साधयेद्देहमात्मनः ।। 252 ।।
गुरु, गुरु के पुत्र, गुरु की पत्नी तथा गुरु के सपिण्डी भाई आदि के नहीं रहने पर शिष्य को स्नान तथा होत्र आदि से अपने शरीर की साधना करते हुए अपने आपको ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बनाना चाहिए।
एवं चरित यो विप्रो ब्रह्मचर्यमविप्लुतः ।
स गच्छत्युत्तमस्थानं न चेह जायते पुनः ।। 253 ।।
इस तरह ऊपर बताई विधि से ब्रह्मचर्य आश्रम के नियमों का अनुसरण करने वाला ब्राह्मण ब्रह्म को उपलब्ध कर लेता है। वह इस पृथ्वी पर दोबारा जन्म नहीं लेता है। उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
॥ मनुस्मृति द्वितीय अध्याय सम्पूर्ण ॥
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