॥ राधे राधे ॥

ऐसी मूढ़ता या मन की।
परिहरि राम-भगति-सुरसरिता, आस करत ओसकन की॥
धूम-समूह निरखि चातक ज्यों, तृषित जानि मति घन की।
नहिं तँह सीतलता न बारि, पुनि हानि होति लोचन की॥
ज्यों गच-काँच बिलोकि सेन जड़ छाँह आपने तन की।
टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आनन की॥
कहँ लौं कहौं कुचाल कृपानिधि! जानत हौ गति जन की।
तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दु:ख, करहु लाज निज पन की॥
इस मन की ऐसी मूर्खता है कि यह श्रीराम भक्ति रूपी गंगा जी को छोड़कर ओस की बूँदों से तृप्त होने की आशा करता है। जैसे प्यासा पपीहा धुएँ का गोट देखकर उसे मेघ समझ लेता है, परंतु वहाँ न तो उसे शीतलता मिलती है और न जल मिलता है, धुएँ से आँखें और फूट जाती हैं। यही दशा इस मन की है। जैसे मूर्ख बाज काँच की फ़र्श में अपने ही शरीर की परछाईं देखकर उस पर चोंच मारने से वह टूट जाएगी, इस बात को भूख के मारे भूलकर जल्दी से उस पर टूट पड़ता है (वैसे ही यह मेरा मन भी विषयों पर टूट पड़ता है)। हे कृपा के भंडार! इस कुचाल का मैं कहाँ तक वर्णन करूँ? आप तो दासों की दशा जानते ही हैं। हे स्वामिन्! तुलसीदास का दारुण दुःख हर लीजिए और अपने शरणागत-वत्सलता के प्रण की रक्षा कीजिए।
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