॥ राधाभावविहीनो यः स भक्तो न कथञ्चन ॥
तुलसीदास जी - पद
Tulsidas Ji - Pads
Pads (7)
Aisi mudta ya man ki
padTulsidas Ji
ऐसी मूढ़ता या मन की।
परिहरि राम-भगति-सुरसरिता, आस करत ओसकन की॥
धूम-समूह निरखि चातक ज्यों, तृषित जानि मति घन की।
नहिं तँह सीतलता न बारि, पुनि हानि होति लोचन की॥
ज्यों गच-काँच बिलोकि सेन जड़ छाँह आपने तन की।
टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आनन की॥
कहँ लौं कहौं कुचाल कृपानिधि! जानत हौ गति जन की।
तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दु:ख, करहु लाज निज पन की॥
इस मन की ऐसी मूर्खता है कि यह श्रीराम भक्ति रूपी गंगा जी को छोड़कर ओस की बूँदों से तृप्त होने की आशा करता है। जैसे प्यासा पपीहा धुएँ का गोट देखकर उसे मेघ समझ लेता है, परंतु वहाँ न तो उसे शीतलता मिलती है और न जल मिलता है, धुएँ से आँखें और फूट जाती हैं। यही दशा इस मन की है। जैसे मूर्ख बाज काँच की फ़र्श में अपने ही शरीर की परछाईं देखकर उस पर चोंच मारने से वह टूट जाएगी, इस बात को भूख के मारे भूलकर जल्दी से उस पर टूट पड़ता है (वैसे ही यह मेरा मन भी विषयों पर टूट पड़ता है)। हे कृपा के भंडार! इस कुचाल का मैं कहाँ तक वर्णन करूँ? आप तो दासों की दशा जानते ही हैं। हे स्वामिन्! तुलसीदास का दारुण दुःख हर लीजिए और अपने शरणागत-वत्सलता के प्रण की रक्षा कीजिए।
Kabahunk amb avasar paai
padTulsidas Ji
कबहुँक अंब, अवसर पाइ।
मेरिऔ सुधि द्याइबी, कछु करुन-कथा चलाइ॥
दीन, सब अँगहीन, छीन, मलीन, अघी अघाइ।
नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ॥
बूझिहैं ‘सो है कौन’, कहिबी नाम दसा जनाइ।
सुनत राम कृपालु के मेरी बिगरिऔ बनि जाइ॥
जानकी जगजनिन जनकी किये बचन सहाइ।
तरै तुलसीदास भव भव नाथ-गुन-गन गाइ॥
तुलसीदास सीता से प्रार्थना करते हैं कि हे माता! कभी अवसर हो तो कुछ करुणा की बात छेड़कर श्रीराम जी को मेरी भी याद दिला देना (इसी से मेरा काम बन जाएगा)। यों कहना कि एक अत्यंत दीन, सर्व साधनों से हीन, मन-मलीन, दुर्बल और पूरा पापी मनुष्य आप की दासी का दास कहलाकर और आपका नाम ले-लेकर पेट भरता है। इस पर प्रभु कृपा करके पूछें कि वह कौन है, तो मेरा नाम और मेरी दशा उन्हें बता देना। कृपालु रामचंद्र जी के इतना सुन लेने से ही मेरी सारी बिगड़ी बात बन जाएगी। हे जगजननी जानकी! यदि इस दास की आपने इस प्रकार वचनों से ही सहायता कर दी तो यह तुलसीदास आपके स्वामी की गुणावली गाकर भवसागर से तर जाएगा।
Bhaye pragat krapala
padTulsidas Ji
भए प्रगट कृपाला परम दयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मनहारी अदभुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥
करुना सुखसागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥
ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै॥
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥
माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसु लीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते प परहिं भवकूपा॥
परम दयालु और कौशल्या के हितकारी कृपालु राम प्रकट हुए। मुनियों के मन को हरने वाला उनका अद्भुत रूप देखकर माता आनंदित हो गई। नेत्रों को आनंद देने वाला मेघ की तरह श्याम शरीर, चारों भुजाओं में (शंख, चक्र, गदा, पद्म) शस्त्र धारण किए हुए, गले में पाँव लंबी माला, विशाल नेत्र, शोभा के समुद्र तथा खर राक्षस के शत्रु को देखकर दोनों हाथ जोड़कर माता कहने लगी—हे अनंत! मैं किस तरह तुम्हारी स्तुति करूँ? वेदों और पुराणों ने तुमको माया, गुण और ज्ञान से परे और सीमा रहित बताया है। वेद और संतजन करुणा और सुखों का समुद्र, सब गुणों का धाम बताकर जिनका गान करते हैं, वही भक्तों के प्रेमी, लक्ष्मीकांत मेरे कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं।
वेद जिसके रोम-रोम में माया से निर्मित अनेकों ब्रह्मांड बतलाते हैं, वह मेरे गर्भ में रहे, इस हँसी की बात के सुनने पर धीर पुरुषों की बुद्धि भी स्थिर नहीं रह सकती। जब माता को ज्ञान हुआ, तब प्रभु मुस्कुराए। वह बहुत प्रकार के चरित करना चाहते हैं। अतः उन्होंने पिछले जन्म की सुंदर कथा कहकर समझाया, जिससे वह पुत्र का प्रेम प्राप्त करे।
माता की बुद्धि बदल गई, तब वह फिर बोली—हे पुत्र! यह रूप छोड़कर अत्यंत प्रिय बाल-लीला करो। मेरे लिए यह सुख परम अनुपम है। यह वचन सुनकर देवताओं के स्वामी सुजान राम ने बालक होकर रोना शुरू किया। तुलसीदास कहते हैं जो जन इस चरित्र का गान करते हैं, वे भगवान का पद पाते हैं और फिर संसार-रूपी कूप में नहीं गिरते।
Jaake priya na ram badaihi
padTulsidas Ji
जाके प्रिय न राम-बदैही।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥
तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी॥
नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेब्य कहौं कहाँ लौं।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं॥
तुलसी सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रानते प्यारो।
जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो॥
जिसे श्री राम-जानकी जी प्यारे नहीं, उसे करोड़ों शत्रुओं के समान छोड़ देना चाहिए, चाहे वह अपना अत्यंत ही प्यारा क्यों न हो। प्रह्लाद ने अपने पिता (हिरण्यकशिपु) को, विभीषण ने अपने भाई (रावण) को और ब्रज-गोपियों ने अपने-अपने पतियों को त्याग दिया, परंतु ये सभी आनंद और कल्याण करने वाले हुए। जितने सुहृद् और अच्छी तरह पूजने योग्य लोग हैं, वे सब श्री रघुनाथ जी के ही संबंध और प्रेम से माने जाते हैं, बस अब अधिक क्या कहूँ। जिस अंजन के लगाने से आँखें ही फूट जाएँ, वह अंजन ही किस काम का? तुलसी कहते हैं कि जिसके संग या उपदेश में श्री रामचंद्र जी के चरणों में प्रेम हो, वही सब प्रकार से अपना परम हितकारी, पूजनीय और प्राणों से भी अधिक प्यारा है। हमारा तो यही मत है।
Ab Laun Nasani Ab Na Nasaihaun
padShrijirasik
अब लौं नसानी, अब न नसैहौं ।
राम-कृपा भव-निशा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं ॥
पायो नाम चारु चिंतामणि, उर-करतें न खसैहौं ।
स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहौं ॥
परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन, निज बस है न हँसैहौं ।
मन मधुकर पन करि तुलसी रघुपति पद-कमल बसैहौं ॥
Tumak Chalat Ramchandra
padShrijirasik
ठुमक चलत रामचंद्र, बाजत पैंजनियाँ ।
किलकि किलकि उठत धाय, गिरत भूमि लटपटाय,
धाय मात गोद लेत, दशरथ की रनियाँ ॥
अंचल रज अंग झारि, विविध भांति सो दुलारि,
तन मन धन वारि वारि, कहत मृदु बचनियाँ ॥
विद्रुम से अरुण अधर, बोलत मुख मधुर मधुर,
सुभग नासिका में गजमुक्ता की नथुनियाँ ॥
तुलसीदास अति आनंद, देखि मुखारविंद,
रघुवर की छवि समान, रघुवर की छबनियाँ
ठुमक चलत रामचंद्र, बाजत पैंजनियाँ ॥
Jake Praya Na Ram Baidehi
padShrijirasik
जाके प्रिय न राम-बदैही।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥
तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी॥
नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेब्य कहौं कहाँ लौं।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं॥
तुलसी सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रानते प्यारो।
जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो॥
जिसे श्री राम-जानकी जी प्यारे नहीं, उसे करोड़ों शत्रुओं के समान छोड़ देना चाहिए, चाहे वह अपना अत्यंत ही प्यारा क्यों न हो। प्रह्लाद ने अपने पिता (हिरण्यकशिपु) को, विभीषण ने अपने भाई (रावण) को और ब्रज-गोपियों ने अपने-अपने पतियों को त्याग दिया, परंतु ये सभी आनंद और कल्याण करने वाले हुए। जितने सुहृद् और अच्छी तरह पूजने योग्य लोग हैं, वे सब श्री रघुनाथ जी के ही संबंध और प्रेम से माने जाते हैं, बस अब अधिक क्या कहूँ। जिस अंजन के लगाने से आँखें ही फूट जाएँ, वह अंजन ही किस काम का? तुलसी कहते हैं कि जिसके संग या उपदेश में श्री रामचंद्र जी के चरणों में प्रेम हो, वही सब प्रकार से अपना परम हितकारी, पूजनीय और प्राणों से भी अधिक प्यारा है। हमारा तो यही मत है।
