॥ राधाया हृदये कृष्णः कृष्णस्य हृदि राधिका ॥
Shri Ram Janma Katha
श्री राम जन्म कथा
भगवान श्री राम का जन्म त्रेतायुग में चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के घर हुआ था।
यह जन्म एक महान पुत्रकामेष्टि यज्ञ के प्रसाद स्वरूप हुआ, जिसके बाद रघुकुल में आनंद और देवताओं द्वारा पुष्प वर्षा की गई। उन्हें भगवान विष्णु का सातवां अवतार माना जाता है।
श्री राम जन्म की विस्तृत कथा इस प्रकार है:
पुत्रकामेष्टि यज्ञ: राजा दशरथ नि:संतान थे, जिसके लिए उन्होंने ऋषि ऋष्यशृंग के नेतृत्व में पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया।
खीर का प्रसाद: यज्ञ के अंत में अग्निदेव ने प्रकट होकर एक दिव्य खीर का पात्र दिया, जिसे राजा दशरथ ने अपनी तीनों पत्नियों- कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी में बांट दिया।
बालक राम का जन्म: खीर ग्रहण करने के बाद, चैत्र शुक्ल नवमी के दिन, रानी कौशल्या के गर्भ से भगवान राम का जन्म हुआ। उसी समय कैकेयी ने भरत को और सुमित्रा ने लक्ष्मण व शत्रुघ्न (जुड़वां) को जन्म दिया।
शुभ नक्षत्र: राम जी का जन्म पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ था, उस समय सूर्य, मंगल, शनि, बृहस्पति और शुक्र उच्च स्थान पर थे और कर्क लग्न का उदय हो रहा था।
उत्सव: अयोध्या में खुशी का माहौल था, गंधर्व गा रहे थे और अप्सराएं नृत्य कर रही थीं। चारों पुत्र तेजस्वी थे।
नामकरण: महर्षि वशिष्ठ ने इन चार भाइयों के नाम राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखे।
भगवान राम अपने धर्मपरायणता, साहस और करुणा के लिए जाने जाते थे, और वे एक महान योद्धा और प्रजा के प्रिय राजकुमार बने।
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