॥ राधे राधे ॥
॥श्री हनुमान पचासा ॥
राम लखन वैदेही सुमिरि, तुलसी शीश नवाय।
गाऊँ गुण हनुमान के, जो सब काज बनाय॥
बुद्धि हीन तनु जानिके, गहौं शरण तब आय।
शब्द-सुमन अर्पण करूँ, स्वीकारो रघुराय॥
प्रथमहिं गुरु पद कमल मनाऊँ।
जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ॥
पुनि सुमिरौं शारदा भवानी।
सत्य करहु मम रसना बानी॥
चैत मास पूरन शशि आया।
केसरी गृह आनंद छाया॥
अंजनी गर्भ प्रकटे हनुमाना।
रुद्र रूप धरि परम सुजाना॥
बाल चरित अति अगम अपारा।
देखि चकित भयो जगत संसारा॥
उदय भानु को फल तुम जाना।
कूदि गगन गहेउ विधि नाना॥
वज्र आघात हनु टूटत भयऊ।
तब ते नाम हनुमान कहयऊ॥
सूरज सो सब विद्या पाई।
ज्ञानी सम कोउ नाहि भाई॥
राम काज हित जनम तिहारा।
वानर तन धरि देव पधारा॥
कानन मिले राम रघुराई।
लखि स्वरूप सुधि बुधि बिसराई॥
विप्र रूप तजि निज रूप दीन्हा।
चरण पखारि वंदन कीन्हा॥
ऋष्यमूक पर्वत ले आये।
सखा सुग्रीव से मेल कराये॥
बालि वध प्रभु हाथ करावा।
कपिन राज सुग्रीवहिं पावा॥
सिया खोज दिशि दक्षिण धाये।
अतुलित बल पौरुष दिखलाये॥
सागर तीर बिचार बिचारा।
कूदउँ पार सिंधु विस्तारा॥
पर्वत चढ़ि जब कीन्ह उडाना।
काँप उठीं सब दिशा महान॥
नाक कान लंकिनी के तोरे।
देखे कपि लंका के छोरे॥
जानकी चरणन शीश नवायो।
कर जोड़ि प्रभु संदेश सुनायो॥
अशोक वाटिका विध्वंस कीन्हा।
असुरन मारि परम सुख लीन्हा॥
लागी आग लंक जब भारी।
त्राहि त्राहि बोले नर-नारी॥
राख बनाय नगर सब जारा।
सिंधु महँ कूदि बुझावत बारा॥
मातु चूड़ामणि हर्षित लाये।
राम चरण धरि कंठ लगाये॥
नल-नीलहिं रचि सेतु अपारा।
उतरी फौज सिंधु के पारा॥
रणभेरी बाजी अति घोरा।
राक्षस दल महँ मच्यो शोरा॥
लखन लाल जब मूर्छित भये।
द्रोणागिरि लेवन तुम गये॥
कालनेमि कपटी मग रोका।
बुद्धि बल ते पठयो यम लोका॥
पर्वत हाथ उठाय उड़ि आये।
प्राण जीवन लखन के पाये॥
अहिरावण छल कीन्हा भारी।
देवी भवन ले गयो चोरी॥
प्रकटे तहाँ कपि विकराला।
दुष्टन मारि कियो बेहाला॥
राम विजय करि अवध सिधारे।
संग सोहते पवन दुलारे॥
लाल लंगोट लाल तन सोहे।
मूरति देखि सकल जग मोहे॥
गदा हाथ में सोहत भारी।
दानव दल के प्रबल संहारी॥
रोम रोम में राम समाये।
छाती फाड़ जगत दिखलाये॥
राम चरण नित सेवत रहियो।
दास भाव उर दृढ़ करि गहियो॥
दैत्य दानव सब थर-थर काँपे।
कपि की गर्जन सुनि जब हाँफे॥
वज्र देह तुम परम विशाला।
काटत भक्तन के भ्रम जाला॥
जहँ जहँ राम कीर्तन होई।
तहँ रहत तुम जोरी कर दोई॥
ज्ञान विवेक भरे भंडारा।
करहु कृपा अब खोलो द्वारा॥
तुम बिन कोउ न हितू हमारा।
तुम ही बंधु तुम ही रखवारा॥
शिव शंकर के अंश कहावो।
भक्त जनन के कष्ट मिटावो॥
दीन दयाल दया अब कीजै।
भक्ति दान मोहि अद्भुत दीजै॥
राम नाम निशि दिन जो गावे।
सो नर तुमरे मन को भावे॥
व्याधि मिटै औ मिटै कलेशा।
व्यापत नहिं दुख कोउ लवलेशा॥
जय कपीश जय पवन कुमारा।
तारो प्रभु यह दास तिहारा॥
शरण पड़े की लाज बचावो।
कृपा दृष्टि प्रभु आप दिखावो॥
आवो कपि अब देर न कीजै।
दर्शन मोहि निज अद्भुत दीजै॥
बांह गहे की लाज निभाना।
मैं बालक तुम पिता समाना॥
विनती सुनहु अंजनी लाला।
मेटहु सकल जगत जंजाला॥
तुलसी नित चरण मनावे।
राम रूप उर भीतर लावे॥
बार-बार कर जोरि मनाऊँ।
भक्ति-मुक्ति तव शरण ही पाऊँ॥
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
यही पचासा नित पढै, धरि धीरज विश्वास।
तेहि के उर महँ बसत हैं, रघुवर सहित सुदास॥
बोलिए सियावर रामचंद्र की जय
पवनसुत हनुमान की जय
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