॥ नाहं स्मरामि कृष्णं तु राधास्मरणवर्जितम् ॥
Bajrangbali - चालीसा
देवी-देवताओं की चालीसा
चालीसा (2)
Shri Hanuman Pachasa
chalisaShrijirasik
॥श्री हनुमान पचासा ॥
राम लखन वैदेही सुमिरि, तुलसी शीश नवाय।
गाऊँ गुण हनुमान के, जो सब काज बनाय॥
बुद्धि हीन तनु जानिके, गहौं शरण तब आय।
शब्द-सुमन अर्पण करूँ, स्वीकारो रघुराय॥
प्रथमहिं गुरु पद कमल मनाऊँ।
जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ॥
पुनि सुमिरौं शारदा भवानी।
सत्य करहु मम रसना बानी॥
चैत मास पूरन शशि आया।
केसरी गृह आनंद छाया॥
अंजनी गर्भ प्रकटे हनुमाना।
रुद्र रूप धरि परम सुजाना॥
बाल चरित अति अगम अपारा।
देखि चकित भयो जगत संसारा॥
उदय भानु को फल तुम जाना।
कूदि गगन गहेउ विधि नाना॥
वज्र आघात हनु टूटत भयऊ।
तब ते नाम हनुमान कहयऊ॥
सूरज सो सब विद्या पाई।
ज्ञानी सम कोउ नाहि भाई॥
राम काज हित जनम तिहारा।
वानर तन धरि देव पधारा॥
कानन मिले राम रघुराई।
लखि स्वरूप सुधि बुधि बिसराई॥
विप्र रूप तजि निज रूप दीन्हा।
चरण पखारि वंदन कीन्हा॥
ऋष्यमूक पर्वत ले आये।
सखा सुग्रीव से मेल कराये॥
बालि वध प्रभु हाथ करावा।
कपिन राज सुग्रीवहिं पावा॥
सिया खोज दिशि दक्षिण धाये।
अतुलित बल पौरुष दिखलाये॥
सागर तीर बिचार बिचारा।
कूदउँ पार सिंधु विस्तारा॥
पर्वत चढ़ि जब कीन्ह उडाना।
काँप उठीं सब दिशा महान॥
नाक कान लंकिनी के तोरे।
देखे कपि लंका के छोरे॥
जानकी चरणन शीश नवायो।
कर जोड़ि प्रभु संदेश सुनायो॥
अशोक वाटिका विध्वंस कीन्हा।
असुरन मारि परम सुख लीन्हा॥
लागी आग लंक जब भारी।
त्राहि त्राहि बोले नर-नारी॥
राख बनाय नगर सब जारा।
सिंधु महँ कूदि बुझावत बारा॥
मातु चूड़ामणि हर्षित लाये।
राम चरण धरि कंठ लगाये॥
नल-नीलहिं रचि सेतु अपारा।
उतरी फौज सिंधु के पारा॥
रणभेरी बाजी अति घोरा।
राक्षस दल महँ मच्यो शोरा॥
लखन लाल जब मूर्छित भये।
द्रोणागिरि लेवन तुम गये॥
कालनेमि कपटी मग रोका।
बुद्धि बल ते पठयो यम लोका॥
पर्वत हाथ उठाय उड़ि आये।
प्राण जीवन लखन के पाये॥
अहिरावण छल कीन्हा भारी।
देवी भवन ले गयो चोरी॥
प्रकटे तहाँ कपि विकराला।
दुष्टन मारि कियो बेहाला॥
राम विजय करि अवध सिधारे।
संग सोहते पवन दुलारे॥
लाल लंगोट लाल तन सोहे।
मूरति देखि सकल जग मोहे॥
गदा हाथ में सोहत भारी।
दानव दल के प्रबल संहारी॥
रोम रोम में राम समाये।
छाती फाड़ जगत दिखलाये॥
राम चरण नित सेवत रहियो।
दास भाव उर दृढ़ करि गहियो॥
दैत्य दानव सब थर-थर काँपे।
कपि की गर्जन सुनि जब हाँफे॥
वज्र देह तुम परम विशाला।
काटत भक्तन के भ्रम जाला॥
जहँ जहँ राम कीर्तन होई।
तहँ रहत तुम जोरी कर दोई॥
ज्ञान विवेक भरे भंडारा।
करहु कृपा अब खोलो द्वारा॥
तुम बिन कोउ न हितू हमारा।
तुम ही बंधु तुम ही रखवारा॥
शिव शंकर के अंश कहावो।
भक्त जनन के कष्ट मिटावो॥
दीन दयाल दया अब कीजै।
भक्ति दान मोहि अद्भुत दीजै॥
राम नाम निशि दिन जो गावे।
सो नर तुमरे मन को भावे॥
व्याधि मिटै औ मिटै कलेशा।
व्यापत नहिं दुख कोउ लवलेशा॥
जय कपीश जय पवन कुमारा।
तारो प्रभु यह दास तिहारा॥
शरण पड़े की लाज बचावो।
कृपा दृष्टि प्रभु आप दिखावो॥
आवो कपि अब देर न कीजै।
दर्शन मोहि निज अद्भुत दीजै॥
बांह गहे की लाज निभाना।
मैं बालक तुम पिता समाना॥
विनती सुनहु अंजनी लाला।
मेटहु सकल जगत जंजाला॥
तुलसी नित चरण मनावे।
राम रूप उर भीतर लावे॥
बार-बार कर जोरि मनाऊँ।
भक्ति-मुक्ति तव शरण ही पाऊँ॥
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
यही पचासा नित पढै, धरि धीरज विश्वास।
तेहि के उर महँ बसत हैं, रघुवर सहित सुदास॥
बोलिए सियावर रामचंद्र की जय
पवनसुत हनुमान की जय
Hanuman Chalisa
chalisaShrijirasik
श्री हनुमान चालीसा
दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार ।
बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार ॥
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥
राम दूत अतुलित बल धामा ।
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी ।
कुमति निवार सुमति के संगी ॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुंडल कुँचित केसा ॥
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजे ।
काँधे मूँज जनेऊ साजे ॥
शंकर सुवन केसरी नंदन ।
तेज प्रताप महा जगवंदन ॥
विद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मनबसिया ॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा ।
विकट रूप धरि लंक जरावा ॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचंद्र के काज सवाँरे ॥
लाय सजीवन लखन जियाए ।
श्री रघुबीर हरषि उर लाए ॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरत-हि सम भाई ॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावै ।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावै ॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहीसा ॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते ॥
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा ।
राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना ।
लंकेश्वर भये सब जग जाना ॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू ।
लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू ॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही ।
जलधि लाँघि गए अचरज नाही ॥
दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥
राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत ना आज्ञा बिनु पैसारे ॥
सब सुख लहैं तुम्हारी सरना ।
तुम रक्षक काहु को डरना ॥
आपन तेज सम्हारो आपै ।
तीनों लोक हाँक तै कापै ॥
भूत पिशाच निकट नहि आवै ।
महावीर जब नाम सुनावै ॥
नासै रोग हरे सब पीरा ।
जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥
संकट तै हनुमान छुडावै ।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै ॥
सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिनके काज सकल तुम साजा ॥
और मनोरथ जो कोई लावै ।
सोई अमित जीवन फल पावै ॥
चारों जुग परताप तुम्हारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥
साधु संत के तुम रखवारे ।
असुर निकंदन राम दुलारे ॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ॥
राम रसायन तुम्हरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा ॥
तुम्हरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥
अंतकाल रघुवरपुर जाई ।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥
और देवता चित्त ना धरई ।
हनुमत सेई सर्व सुख करई ॥
संकट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥
जै जै जै हनुमान गुसाईँ ।
कृपा करहु गुरु देव की नाई ॥
जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बंदि महा सुख होई ॥
जो यह पढ़े हनुमान चालीसा ।
होय सिद्ध साखी गौरीसा ॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय मह डेरा ॥
दोहा
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥
॥ सियावर रामचन्द्र की जय ॥
॥ पवनसुत हनुमान की जय ॥
॥ उमापति महादेव की जय ॥
॥ बोलो रे भई सब सन्तन की जय ॥