॥ राधे राधे ॥
श्रीललिताकवचम्
Lalita kavach
ललिता अथवा नित्या अथवा नवरतात्मक कवच
श्रीललिता देवी कवचं
ललिताकवचस्तोत्रम्
सनत्कुमार उवाच-
अथ ते कवचं देव्या वक्ष्ये नवरतात्मकम् ।
येन देवासुरनरजयी स्यात्साधकः सदा ॥ १॥
सनत्कुमार बोले- इसके उपरान्त देवी के नवरतात्मक कवच को बता रहा हूँ। जिसके पाठ से साधक देवताओं, असुरों, तथा मनूजों पर सदा विजय प्राप्त करता है।
ललिता कवच
सर्वतः सर्वदाऽऽत्मानं ललिता पातु सर्वगा ।
कामेशी पुरतः पातु भगमाली त्वनन्तरम् ॥ २॥
दिशं पातु तथा दक्षपार्श्वं मे पातु सर्वदा ।
नित्यक्लिन्नाथ भेरुण्डा दिशं मे पातु कौणपीम् ॥ ३॥
तथैव पश्चिमं भागं रक्षताद्वह्निवासिनी ।
सर्वत्र गमन करने वाली ललितादेवी सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें। कामेशी अग्रभाग से और भगमाली पृष्ठ भाग से रक्षा करे। नित्यक्लिन्ना मेरे दक्षिण पार्श्व तथा पूर्व दिशा की रक्षा करें। भेरुंडा उत्तर दिशा और बह्निवासिनी पश्चिम दिशा की रक्षा करें।
महावज्रेश्वरी नित्या वायव्ये मां सदावतु ॥ ४॥
वामपार्श्वं सदा पातु इतीमेलरिता ततः ।
माहेश्वरी दिशं पातु त्वरितं सिद्धदायिनी ॥ ५॥
महाव्रजेश्वरी दक्षिण दिशा की रक्षा करें। ललितादेवी सदा मेरे वामपार्श्व की रक्षा करें। सिद्धिदायिनी माहेश्वरी समस्त दिशाओं में मेरी रक्षा करें।
पातु मामूर्ध्वतः शश्वद्देवता कुलसुन्दरी ।
अधो नीलपताकाख्या विजया सर्वतश्च माम् ॥ ६॥
कुलसुन्दरी सदा ऊपर से और नीलपताका नीचे से रक्षा करें।विजयादेवी सब ओर से मेरी रक्षा करें।
करोतु मे मङ्गलानि सर्वदा सर्वमङ्गला ।
देहेन्द्रियमनःप्राणाञ्ज्वालामालिनिविग्रहा ॥ ७॥
सर्व मंगला सदा मेरा कल्याण करें। ज्वाला- मालिनी देह, इंद्रिय, मन तथा प्राणों की रक्षा करें ।
पालयत्वनिशं चित्ता चित्तं मे सर्वदावतु ।
कामात्क्रोधात्तथा लोभान्मोहान्मानान्मदादपि ॥ ८॥
पापान्मां सर्वतः शोकात्सङ्क्षयात्सर्वतः सदा ।
असत्यात्क्रूरचिन्तातो हिंसातश्चौरतस्तथा ।
स्तैमित्याच्च सदा पातु प्रेरयन्त्यः शुभं प्रति ॥ ९॥
नित्याः षोडश मां पातु गजारूढाः स्वशक्तिभिः ।
चित्ता सदा मेरे चित्त की रक्षा करें। अपनी शक्तियों समेत गजों पर आरूढ सोलह नित्यादेवियां रक्षा करें। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान, मद, पाप, शोक, क्षय, असत्य, क्रूर चिंता, हिंसा, स्तेय, तथा जड़ता से मुझे बचायें और शुभ कर्मों की प्रेरणा दें।
तथा हयसमारूढाः पातु मां सर्वतः सदा ॥ १०॥
सिंहारूढास्तथा पातु पातु ऋक्षगता अपि ।
रथारूढाश्च मां पातु सर्वतः सर्वदा रणे ॥ ११॥
तार्क्ष्यारूढाश्च मां पातु तथा व्योमगताश्च ताः ।
अश्वों पर आरूढ देवियाँ, सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें। सिंहारूढ, ऋक्षारूढ, तथा रथारूढ देवियां सदा मेरी रक्षा करें। गरुड़ पर आसीन देवियाँ सदा मेरी रक्षा करें।
भूतगाः सर्वगाः पातु पातु देव्यश्च सर्वदा ॥ १२॥
भूतप्रेतपिशाचाश्च परकृत्यादिकान् गदान् ।
द्रावयन्तु स्वशक्तीनां भूषणैरायुधैर्मम ॥ १३॥
गजाश्वद्वीपिपञ्चास्यतार्क्ष्यारूढाखिलायुधाः ।
असङ्ख्याः शक्तयो देव्यः पातु मां सर्वतः सदा ॥ १४॥
आकाशगामिनी, भूतगामिनी तथा सर्वगामिनी देवियां सर्वदा मेरी रक्षा करें तथा अपनी शक्तियों के आयुधों से भूत, प्रेत, पिशाच, कृत्या आदिकों का संहार करें। गज, अश्व, व्याघ्र, सिंह तथा गरुड़ पर आरूढ एवम् अखिल आयुधों से युक्त असंख्य शक्ति देवियाँ सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें ।
श्रीललिता कवच महात्म्यम्
सायं प्रातर्जपन्नित्याकवचं सर्वरक्षकम् ।
कदाचिन्नाशुभं पश्येत्सर्वदानन्दमास्थितः ॥ १५॥
इत्येतत्कवचं प्रोक्तं ललितायाः शुभावहम् ।
यस्य सन्धारणान्मर्त्यो निर्भयो विजयी सुखी ॥ १६॥
जो मानव प्रातःकाल तथा सायंकाल इस सर्वरक्षक नित्या कवच का पाठ करता है, वह सर्वदा आनंद को प्राप्त करता है, अशुभ को तो कभी देखता ही नहीं। यह ललिता का सुख दायक कवच मैंने तुम्हे सुना दिया। जो मनुष्य इसको धारण करेगा, वह निर्भय, विजयी तथा सुखी होगा ।
॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे तृतीयपादे बृहदुपाख्याने श्रीललिता कवचं सम्पूर्णम् अध्यायः ८९॥