॥ राधाभावविहीनो यः स भक्तो न कथञ्चन ॥
Maa Durga - स्तोत्र
देव स्तोत्र
स्तोत्र (11)
Shri Durga Kavach In HIndi
stotraShrijirasik
ऋषि मार्कंड़य ने पूछा जभी !
दया करके ब्रह्माजी बोले तभी !!
के जो गुप्त मंत्र है संसार में !
हैं सब शक्तियां जिसके अधिकार में !!
हर इक का कर सकता जो उपकार है !
जिसे जपने से बेडा ही पार है !!
पवित्र कवच दुर्गा बलशाली का !
जो हर काम पूरे करे सवाली का !!
सुनो मार्कंड़य मैं समझाता हूँ !
मैं नवदुर्गा के नाम बतलाता हूँ !!
कवच की मैं सुन्दर चोपाई बना !
जो अत्यंत हैं गुप्त देयुं बता !!
नव दुर्गा का कवच यह, पढे जो मन चित लाये !
उस पे किसी प्रकार का, कभी कष्ट न आये !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
पहली शैलपुत्री कहलावे !
दूसरी ब्रह्मचरिणी मन भावे !!
तीसरी चंद्रघंटा शुभ नाम !
चौथी कुश्मांड़ा सुखधाम !!
पांचवी देवी अस्कंद माता !
छटी कात्यायनी विख्याता !!
सातवी कालरात्रि महामाया !
आठवी महागौरी जग जाया !!
नौवी सिद्धिरात्रि जग जाने !
नव दुर्गा के नाम बखाने !!
महासंकट में बन में रण में !
रुप होई उपजे निज तन में !!
महाविपत्ति में व्योवहार में !
मान चाहे जो राज दरबार में !!
शक्ति कवच को सुने सुनाये !
मन कामना सिद्धी नर पाए !!
चामुंडा है प्रेत पर, वैष्णवी गरुड़ सवार !
बैल चढी महेश्वरी, हाथ लिए हथियार !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
हंस सवारी वारही की !
मोर चढी दुर्गा कुमारी !!
लक्ष्मी देवी कमल असीना !
ब्रह्मी हंस चढी ले वीणा !!
ईश्वरी सदा बैल सवारी !
भक्तन की करती रखवारी !!
शंख चक्र शक्ति त्रिशुला !
हल मूसल कर कमल के फ़ूला !!
दैत्य नाश करने के कारन !
रुप अनेक किन्हें धारण !!
बार बार मैं सीस नवाऊं !
जगदम्बे के गुण को गाऊँ !!
कष्ट निवारण बलशाली माँ !
दुष्ट संहारण महाकाली माँ !!
कोटी कोटी माता प्रणाम !
पूरण की जो मेरे काम !!
दया करो बलशालिनी, दास के कष्ट मिटाओ !
चमन की रक्षा को सदा, सिंह चढी माँ आओ !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
अग्नि से अग्नि देवता !
पूरब दिशा में येंदरी !!
दक्षिण में वाराही मेरी !
नैविधी में खडग धारिणी !!
वायु से माँ मृग वाहिनी !
पश्चिम में देवी वारुणी !!
उत्तर में माँ कौमारी जी!
ईशान में शूल धारिणी !!
ब्रहामानी माता अर्श पर !
माँ वैष्णवी इस फर्श पर !!
चामुंडा दसों दिशाओं में, हर कष्ट तुम मेरा हरो !
संसार में माता मेरी, रक्षा करो रक्षा करो !!
सन्मुख मेरे देवी जया !
पाछे हो माता विजैया !!
अजीता खड़ी बाएं मेरे !
अपराजिता दायें मेरे !!
नवज्योतिनी माँ शिवांगी !
माँ उमा देवी सिर की ही !!
मालाधारी ललाट की, और भ्रुकुटी कि यशर्वथिनी !
भ्रुकुटी के मध्य त्रेनेत्रायम् घंटा दोनो नासिका !!
काली कपोलों की कर्ण, मूलों की माता शंकरी !
नासिका में अंश अपना, माँ सुगंधा तुम धरो !!
संसार में माता मेरी, रक्षा करो रक्षा करो !!
ऊपर वाणी के होठों की !
माँ चन्द्रकी अमृत करी !!
जीभा की माता सरस्वती !
दांतों की कुमारी सती !!
इस कठ की माँ चंदिका !
और चित्रघंटा घंटी की !!
कामाक्षी माँ ढ़ोढ़ी की !
माँ मंगला इस बनी की !!
ग्रीवा की भद्रकाली माँ !
रक्षा करे बलशाली माँ !!
दोनो भुजाओं की मेरे, रक्षा करे धनु धारनी !
दो हाथों के सब अंगों की, रक्षा करे जग तारनी !!
शुलेश्वरी, कुलेश्वरी, महादेवी शोक विनाशानी !
जंघा स्तनों और कन्धों की, रक्षा करे जग वासिनी !!
हृदय उदार और नाभि की, कटी भाग के सब अंग की !
गुम्हेश्वरी माँ पूतना, जग जननी श्यामा रंग की !!
घुटनों जन्घाओं की करे, रक्षा वो विंध्यवासिनी !
टकखनों व पावों की करे, रक्षा वो शिव की दासनी !!
रक्त मांस और हड्डियों से, जो बना शरीर !
आतों और पित वात में, भरा अग्न और नीर !!
बल बुद्धि अंहकार और, प्राण ओ पाप समान !
सत रज तम के गुणों में, फँसी है यह जान !!
धार अनेकों रुप ही, रक्षा करियो आन !
तेरी कृपा से ही माँ, चमन का है कल्याण !!
आयु यश और कीर्ति धन, सम्पति परिवार !
ब्रह्मणी और लक्ष्मी, पार्वती जग तार !!
विद्या दे माँ सरस्वती, सब सुखों की मूल !
दुष्टों से रक्षा करो, हाथ लिए त्रिशूल !!
भैरवी मेरी भार्या की, रक्षा करो हमेश !
मान राज दरबार में, देवें सदा नरेश !!
यात्रा में दुःख कोई न, मेरे सिर पर आये !
कवच तुम्हारा हर जगह, मेरी करे सहाए !!
है जग जननी कर दया, इतना दो वरदान !
लिखा तुम्हारा कवच यह, पढे जो निश्चय मान !!
मन वांछित फल पाए वो, मंगल मोड़ बसाए !
कवच तुम्हारा पढ़ते ही, नवनिधि घर मे आये !!
ब्रह्माजी बोले सुनो मार्कंड़य !
यह दुर्गा कवच मैंने तुमको सुनाया !!
रहा आज तक था गुप्त भेद सारा !
जगत की भलाई को मैंने बताया !!
सभी शक्तियां जग की करके एकत्रित !
है मिट्टी की देह को इसे जो पहनाया !!
चमन जिसने श्रद्धा से इसको पढ़ा जो !
सुना तो भी मुह माँगा वरदान पाया !!
जो संसार में अपने मंगल को चाहे !
तो हरदम कवच यही गाता चला जा !!
बियाबान जंगल दिशाओं दशों में !
तू शक्ति की जय जय मनाता चला जा !!
तू जल में तू थल में तू अग्नि पवन में !
कवच पहन कर मुस्कुराता चला जा !!
निडर हो विचर मन जहाँ तेरा चाहे !
चमन पाव आगे बढ़ता चला जा !!
तेरा मान धन धान्य इससे बढेगा !
तू श्रद्धा से दुर्गा कवच को जो गाए !!
यही मंत्र यन्त्र यही तंत्र तेरा !
यही तेरे सिर से हर संकट हटायें !!
यही भूत और प्रेत के भय का नाशक !
यही कवच श्रद्धा व भक्ति बढ़ाये !!
इसे निसदिन श्रद्धा से पढ़ कर !
जो चाहे तो मुह माँगा वरदान पाए !!
इस स्तुति के पाठ से पहले कवच पढे !
कृपा से आधी भवानी की, बल और बुद्धि बढे !!
श्रद्धा से जपता रहे, जगदम्बे का नाम !
सुख भोगे संसार में, अंत मुक्ति सुखधाम !!
कृपा करो मातेश्वरी, बालक चमन नादाँ !
तेरे दर पर आ गिरा, करो मैया कल्याण !!
!! जय माता दी !!
Devi Kavach Sanskrit
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। अथ देव्याः कवचम् ।
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।
ॐ नमश्चण्डिकायै ॥
। मार्कण्डेय उवाच ।
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥१॥
। ब्रह्मोवाच ।
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् ।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ॥२॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥३॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥४॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥५॥
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे ।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ॥६॥
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे ।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ॥७॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते ।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः ॥८॥
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना ।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ॥९॥
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया ॥१०॥
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ॥११॥
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः ।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥१२॥
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः ।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ॥१३॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च ।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम् ॥१४॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च ।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ॥१५॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे ।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥१६॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि ।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ॥१७॥
दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी ।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी ॥१८॥
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी ।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा ॥१९॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ॥२०॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता ।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता ॥२१॥
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी ।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके ॥२२॥
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी ।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी ॥२३॥
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ॥२४॥
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका ।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥२५॥
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला ।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ॥२६॥
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी ।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी ॥२७॥
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च ।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ॥२८॥
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी ।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ॥२९॥
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥३०॥
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१॥
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी ।
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ॥३२॥
नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी ।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा ॥३३॥
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती ।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी ॥३४॥
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा ।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु ॥३५॥
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा ।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी ॥३६॥
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ॥३७॥
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ॥३८॥
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ॥३९॥
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ॥४०॥
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्ग क्षेमकरी तथा ।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ॥४१॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ॥४२॥
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः ।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति ॥४३॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः ।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ॥४४॥
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः ।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ॥४५॥
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ॥४६॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः ।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ॥४७॥
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ॥४८॥
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ।
भूचरा: खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः ॥४९॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा ।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः ॥५०॥
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥५१॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ॥५२॥
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले ।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ॥५३॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी ॥५४॥
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः ॥५५॥
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ॥ ॐ ॥५६॥
॥ इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम् ॥
Shri Durga Satnam Stotra
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ईश्वर उवाच
शतनाम प्रवक्ष्यामि श्रृणुष्व कमलानने।
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती॥1॥
ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी।
आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी॥2॥
पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः।
मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः॥3॥
सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी।
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः॥4॥
शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी॥5॥
अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।
पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी॥6॥
अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता॥7॥
ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः॥8॥
विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना॥9॥
निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी॥10॥
सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा॥11॥
अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः॥12॥
अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा।
महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला॥13॥
अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी॥14॥
शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।
कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी॥15॥
य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम्।
नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति॥16॥
धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च।
चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम्॥17॥
कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्।
पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम्॥18॥
तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैः सुरवरैरपि।
राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात्॥19॥
गोरोचनालक्तककुङ्कुमेन सिन्दूरकर्पूरमधुत्रयेण।
विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः॥20॥
भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते।
विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम्॥21॥
॥ इति श्रीविश्वसारतन्त्रे दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं समाप्तम् ॥
Sudha Dhara Kali Stotram
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श्रीगुह्यकाल्याः सुधाधारास्तवः
सुधाधाराकाली स्तोत्रम्
॥ श्रीगुह्येश्वर्येनमः ॥
श्रीगुह्येश्वरी देवी को प्रणाम है।
॥ महाकाल उवाच ॥
अचिन्त्यामिताकार शक्ति स्वरूपा
प्रतिव्यक्त्यधिष्ठान सत्त्वैकमूर्तिः ।
निराकार निर्द्वन्द्व बोधैकगम्या
त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ १॥
महाकाल ने कहा-देवि ! आपका आकार, आपकी शक्ति और आपका स्वरूप ऐसा निःसीम (अपार) है कि उसकी कोई कल्पना तक नहीं कर पा सकता । आपकी मूर्ति प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में सत्व (आत्म) रूप से विराजमान है। आप ऐसी अकारहीन और सब प्रकार के द्वन्द्वों (प्रपंचों) से रहित हैं कि केवल ज्ञान से ही आपके स्वरूप का ठीक-ठीक बोध हो पाता है। आप तो परब्रह्म रूप से ही सिद्ध हैं (आप साक्षात् परब्रह्म ही हैं ) ।। १ ।
अगोत्राकृतित्वा दनैकान्तिकत्वा
दलक्ष्यागमत्वा दशेषाकरत्वात् ।
प्रपञ्चाल सत्वा दनारम्भकत्वात्
त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ २॥
आपका न कोई गोत्र है, न आकार है, न आपकी पूर्णता का किसी को ज्ञान है, न आपकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में ही कोई जान पाया है, न आपके सब आकरों (उत्पत्ति स्थानों ) का ही किसी को ज्ञान है, न आप किसी प्रपंच के फेर में पड़ती और न कुछ आरम्भ ही करती हैं क्योंकि आप तो साक्षात् परब्रह्म स्वरूपवाली हैं ॥ २ ॥
असाधारणत्वा दसम्बन्धकत्वात्
दभिन्नाशश्रयत्वा दनाकारकत्वात् ।
अविद्यात्मकत्वा दनाद्यन्तकत्वात्
त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ३॥
आप साधारण (अलौकिक) हैं। आपका किसी से कोई सम्बन्ध नहीं है। आपका सब में आवास हैं (आप सर्वव्यापिनी हैं।) आपका कोई आकार नहीं है। आप सब विद्याओं से परे हैं और आपका कोई आदि और अन्त नहीं है क्योंकि आप तो साक्षात् परब्रह्म ही हैं ।। ३ ।।
यदा नैव धाता न विष्णुर्न रुद्रो
न कालो न वा पञ्चभूतानि चात्मा ।
तदा कारणीभूत सत्त्वैकमूर्तिः
स्त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ४॥
जब न ब्रह्मा थे, न विष्णु थे, न रुद्र थे, न काल था, न पंचभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) थे, न आत्मा था, उस समय सबका कारण बनी हुई (सबको उत्पन्न करनेवाली) एक मात्र आपकी ही सत्य-रूपा मूर्ति थी (केवल आपका ही अस्तित्व था) । ऐसी परब्रह्म रूपा कोई हैं तो एक आप ही हैं ॥ ४ ॥
न मीमांसका नैव काणाद तर्का
न साङ्ख्या न योगा न वेदान्तवेदाः ।
न देवा विदुस्ते निराकार भावं
त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ५॥
देवि ! आपके निराकार भाव (रूप) को मीमांसक, काणाद (वैशेषिक दर्शनवाले), तर्कवादी (न्यायशास्त्रवाले), सांख्यवादी, योगवादी, वेदान्ती, वेद और देवता कोई भी नहीं जान सका क्योंकि आप तो परब्रह्म स्वरूपा हैं॥५॥
न ते नामगोत्रे न ते जन्ममृत्यू
न ते धामचेष्टे न ते दुःखसौख्ये ।
न ते मित्रशत्रू न ते बन्धमोक्षौ
त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ६॥
न आपका कोई नाम या गोत्र है, न आपका कभी जन्म होता न मृत्यु होती, न आपका कोई धाम है न आपकी कोई चेष्टा (क्रिया) ही है, न आपको दुःख होता न सुख, न आपके शत्रु हैं न मित्र और न आपका बन्ध होता न मोक्ष, क्योंकि आप तो एक मात्र परब्रह्म स्वरूपा है ।। ६ ॥
न बाला न च त्वं वयस्का न वृद्धा
न च स्त्री न षण्ढः पुमान्नैव च त्वम् ।
न च त्वं सुरी नासुरी किन्नरी वा
त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ७॥
न आप बाला हैं, न युवती हैं, न वृद्धा हैं, न स्त्री हैं, न नपुंसक हैं, न पुरुष हैं, न देवी हैं, न आसुरी (राक्षसी) हैं और न किन्नरी हैं। आप तो साक्षात् एक मात्र परब्रह्म स्वरूपा हैं ॥ ७ ॥
जले शीतलत्वं शुचौ दाहकत्वं
विधौ निर्मलत्वं रवौ तापकत्वम् ।
त्वमेवाम्बिके यस्य कस्यापि शक्तिः
त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ८॥
अंबिके ! आप ही जल में शीतलता, अग्नि में दाहकता (जलाने की शक्ति), चन्द्रमा में निर्मलता और सूर्य में ताप रूप से हैं। संसार में जिस किसी की जो भी शक्ति है वह सब आप ही हैं क्योंकि आप ही एक मात्र परब्रह्म स्वरूपा हैं ।। ८ ।।
पपौ क्ष्वेडमुग्रं पुरा यन्महेशः
पुनः संहरत्यन्तकाले जगच्च ।
तवैव प्रसादान्न च स्वस्य शक्त्या
त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ९॥
महेश्वर शिव ने जो (समुद्र मन्थन के समय) प्रचंड विष पी डाला था और फिर अन्त में जो शिव सब जगत् का संहार कर डालते हैं वह सब काम वे अपनी शक्ति से नहीं वरन आपके प्रसाद से ही कर पाते हैं क्योंकि एक मात्र परब्रह्म-स्वरूपा यदि कोई हैं तो आप ही हैं ॥ ९ ॥
करालाकृतीन्याननान्या श्रयन्ती
भजन्ती करेष्वस्रबाहुल्यमित्थम् ।
जगत्प्रीणनायासुराणां वधाय
त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ १०॥
आप जो अनेक प्रकार की कराल मुखवाली मूर्तियाँ बना बैठती हैं और हाथ में अनेक अस्त्र उठाए रहती हैं वह आप केवल संसार को प्रसन्न और असुरों का वध करने के लिये ही धारण करती हैं। यों आप तो साक्षात् परब्रह्म-स्वरूपा ही हैं।।१०।।
महाचण्ड - योगेश्वरी गुह्यकाली
कराली महाडामरी चंडहासा ।
जगद्ग्रासिनी चंडकापालिनी च
त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ११॥
यों तो आपके महाचण्ड- योगेश्वरी, गुह्यकाली, कराली, महाडामरी, चंडहासा, जगद्ग्रासिनी, चंडकापालिनी आदि अनेक नाम हैं, पर वास्तव में आप तो एक मात्र परब्रह्म-स्वरूपा ही हैं ।। ११ ।।
रवन्ती शिवाभिर्वहन्ती कपालं
जयन्ती सुरारीन् दमन्ती प्रमत्तान् ।
नटन्ती तपन्ती चलन्ती हसन्ती
त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ १२॥
शिवाओं (शिव की शक्तियों सियारिनों) के साथ चिल्लाती हुई, हाथ में कपाल लिए हुई, देवताओं के शत्रुओं को जीतती हुई, दुष्टों का दमन करती हुई, नाचती हुई, ताप देती हुई, चलती और हँसती हुई भी आप एक मात्र परब्रह्म- स्वरूपा ही हैं ।। १२ ।।
यथा विश्वमेकं वेरम्बरस्थं
प्रतिच्छायया तावदेवोदकेषु ।
समुद्भासतेऽनेकरूपं तथा वै
त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ १३॥
जैसे आकाश में चमकनेवाले सूर्य की प्रतिच्छाया (प्रतिबिम्ब) - से इस एक विश्व के ही अनेक रूप दिखाई देने लगते हैं तथा जल में सूर्य के भी अनेक रूप दिखाई देने लगते हैं (किन्तु सूर्य तो एक ही है) उसी प्रकार आप भी एक मात्र परब्रह्म स्वरूपा ही हैं ।। १३ ।।
अपादापि वाताधिकं धावसि त्वं
श्रुतिभ्यां विहीनाऽपि शब्दं शृणोषि ।
अनासापि जिघ्रस्यनेत्रापि पश्य-
स्यजिह्वाऽपि नानारसस्वाद विज्ञा ॥ १४॥
पैर न होने पर भी आप वायु से भी अधिक तीव्र गति से दौड़ सकती हैं, कान न होने पर भी सभी शब्द सुन सकती हैं, नाक न होने पर भी सब कुछ सूंघ सकती हैं, आँख न होने पर भी सब कुछ देख सकती हैं और जीभ न होने- पर भी सब रसों का स्वाद जान पा सकती हैं क्योंकि आप तो एक मात्र परब्रह्मस्वरूपा है न ॥ १४ ॥
यथा भ्रामयित्वा मृदं चक्रमध्ये
कुलालो विधत्ते शरावं घटं च ।
महायन्त्रमध्ये च भूतान्यदृष्टे
सुरान्मानुषाঁस्त्वं सृजस्यादिसर्गे ॥ १५ ॥
जैसे कुम्हार ने चाकर मिट्टी चढ़ाकर और चाक घुमाकर कसोरे और घड़े बना डालता है वैसे ही आप भी अपने महायन्त्र में सृष्टि के आरम्भ में देवताओं और मनुष्यों की ऐसी रचना किया करती हैं जिसे कोई भी प्राणी देख नहीं पाता ।। १५ ।।
यथा रङ्गरज्वर्क धृष्णिष्वकस्मा-
न्नृणां रौप्यदर्वीकराम्बुभ्रमः स्यात् ।
जगत्यत्र तत्तन्मये तद्वदेव ।
त्वमेकैव तत्तन्निवृत्तौ समस्तम् ॥ १६॥
जैसे राँगे में चाँदी का, रस्सी में साँप का और सूर्य को किरणों में जल (मृगजल) का भ्रम होने लगता है उसी प्रकार संसार में भी लोगों को उस-उस वस्तु का भ्रम होता रहता है किन्तु उन सबकी निवृत्ति होने पर वास्तव में एक आप ही विश्वरूप में शेष रहती हैं ।। १६ ।।
महाज्योतिराकारसिहासनं यत्-
स्वकीयान् सुरान् वाहयस्युग्र मूर्तिः ।
अवष्टभ्य पद्भ्यां शिवं भैरवं च
स्थिता तत्र मध्ये भवस्येव मुख्या ॥ १७ ॥
महाज्योति के समान प्रकाशमान जो छाप का सिंहासन है उसे आप उग्रमूर्ति बनकर अपने देवताओं से ढुवाती हो और शिव तथा भैरव को पैरों तले दबाकर उस सिंहासन के बीच प्रधान
बनकर विराजमान हो जाती हो ॥ १७ ॥
क्व योगासनं योगमुद्रादिनीतिः
क्व गोमायुपोतः क्व कालानलश्च ।
जगन्मातरीदॄक् तवापूर्वलीला
कथं कारमस्मद्विधैर्देवि गम्या ॥ १८ ॥
कहाँ तो योगासन लगाकर योगमुद्रा आदि धारण करके आपको प्राप्त करने का कठिन प्रयास और कहाँ उस कालानल (प्रलयाग्नि) के सम्मुख सियार का बच्चा । उसी प्रकार हे जगन्माता ! हमारे जैसे लोग आपकी पूर्व लीला को कैसे समझ पा सकते हैं ।। १८ ।।
विशुद्धा परा चिन्मयी स्वप्रकाशा-
मृतानन्दरूपा जगद्व्यापिका च ।
तवेदॄग्विधा या निराकारमूर्तेः
किमस्माभिरन्तर्हृदि ध्यायितव्यम् ॥ १९॥
माता ! आप तो विशुद्धा, परा, चिन्मयी, अपने ही प्रकाश से प्रकाशित, अमृता, (मोक्षदायिनी) आनन्दरूपा और संसार में व्याप्त हैं। ऐसी निराकार मूर्तिवाली आपका ध्यान भला हम जैसे लोग अपने हृदय के भीतर कैसे कर पा सकते हैं ।। १९ ।।
महाघोरकालानल ज्वालजाला-
हिता व्यक्तवासा महाट्टाट्टहासा ।
जटाभारकाला महामुण्डमाला
विशाला त्वमीदृङ्मया ध्यायसेऽम्ब ॥ २०॥
माता! आप प्रलय की महाघोर अग्नि की लपटों से घिरी रहती हैं, नग्न रहती हैं, प्रचंड अट्टाहास करती रहती हैं, आपके सिर पर विशाल जटाओं का जूड़ा है और आपके गले में विशाल नरमुंड माला पड़ी है। आपके ऐसे (भयंकर) रूप का भला हमसे कैसे ध्यान किया जा सकेगा ॥ २० ॥
तपो नैव कुर्वन् वपुः खेदयामि
व्रजन्नापि तीर्थं पदे खञ्जयामि ।
पठन्नापि वेदं जनिं पावयामि
त्वदङ्घ्रिद्वये मङ्गलं साधयामि ॥ २१॥
मैं न तो तप करके अपना शरीर सुखाता हूँ, न तीर्थों में घूमकर अपने पैर ही थकाता हूँ और न वेद पढ़कर अपना जीवन ही पवित्र किया करता हूँ। मैं तो बस आपके चरण-कमलों में ही अपना मंगल (कल्याण) साधे चला जा रहा हूँ ।। २१ ।।
तिरस्कुर्वतोऽन्यामरोपासनां वै
परित्यक्तधर्माध्वरस्यास्य जन्तोः ।
त्वदाराधने न्यस्तचित्तस्य किं मे
करिष्यन्त्यमी धर्मराजस्य दूताः ॥ २२॥
मैंने अन्य सब देवताओं की उपासना दूर कर छोड़ी है, धर्म-यज्ञों को भी कभी से छोड़ चुका हूँ, मैं तो बस आपकी आराधना ही चित्त एकाग्र किए बैठा हूँ, तब भला यम के दूत मेरा क्या कर लेंगे ।। २२ ।।
नमस्ये हरिं नैव धातारमीशं
न वह्निं न चार्कं न चेन्द्रादिदेवान् ।
शिवोदीरितानेकवाक्यप्रबन्धैः
स्त्वदर्चाविधिं केवलं किन्तु मन्ये ॥ २३ ॥
मैं विष्णु, ब्रह्मा, शिव, अग्नि, सूर्य, इन्द्र आदि किसी भी देवता के आगे नहीं हूँ। मैं तो बस शिव के बताए हुए अनेक वाक्यों के द्वारा जो आपकी अर्चना की विधि है केवल उसी को मानता हूँ ।। २३ ।।
न वा मां विनिन्दन्तु निन्दन्तु नाम
त्यजन्त्वम्ब वा ज्ञातयो मां त्यजन्तु ।
यमीया भटा नारके पातयन्तु
त्वमेका गतिर्मे त्वमेका गतिर्मे ॥ २४॥
माता ! चाहे कोई मेरी प्रशंसा करे या निन्दा, मेरी जातिवाले भी मुझे छोड़ना चाहें तो भले छोड़ दे और यम के दूत भी चाहे मुझे नरक में ही क्यों न ले जा पटके पर मेरी तो एक मात्र गति (सहायिका ) आप ही हैं, आप ही हैं ।। २४ ।।
महाकालरुद्रोदितं स्तोत्रमेतत्
सदा भक्तिभावेन योऽध्येति भक्तः ।
न चापन्न रोगो न शोको न मृत्यु
र्भवेत् सिद्धिरन्ते च कैवल्यलाभः ॥ २५॥
जो भक्त अत्यन्त भक्तिभाव से इस महाकालरुद्र के बनाए हुए स्तोत्र का सदा पाठ करता रहेगा, उस पर न कोई आपत्ति आवेगी, न उसे कोई कभी रोग होगा, न शोक होगा और न उसको मृत्यु-कष्ट होगा । अन्त में उसे सिद्धि प्राप्त हो जायगी और वह मुक्त हो जायगा ।। २५ ।।
इति ते कथितो दिव्यः सुधाधाराह्वयः स्तवः ।
एतस्य सतताभ्यासात् सिद्धिः करतले स्थिता ॥ २६ ॥
यह जो सुधाधार नाम का दिव्य स्तोत्र कह सुनाया गया है इसका निरन्तर अभ्यास करते रहने से (पढ़ते रहने से) सारी सिद्धियां हाथ में आ जाती हैं ॥ २६ ॥
॥ इत्यादिनाथविरचितायां महाकालसंहितायां श्रीगुह्यकाल्याः सुधाधाराह्वयः स्तवः सम्पूर्णः ॥
गुह्यकाली मन्त्र
विश्वसारतन्त्र में गुह्यकाली की उपासना की कथा, दीक्षा-प्रणाली और मन्त्रोद्धार का विस्तार से विवरण दिया हुआ है। उनमें बताया गया है कि इनकी उपासना के लिये जप का यह मन्त्र दिया गया है-
ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हुं हुं ह्रीं गुह्ये कालिके ।'
विश्वसारतन्त्र में ही लिखा है कि यह मन्त्र किसी तान्त्रिक गुरु से लेना चाहिए। जो आठ बार शिष्य के कान में यह मन्त्र कह दे । यदि काशी आदि क्षेत्रों में, शिवालय में तीर्थ में अथवा ग्रहण काल में इस मन्त्र की दीक्षा ली जाय तो किसी प्रकार की पूजा आदि की आवश्यकता नहीं होती, केवल आठ बार मन्त्र सुनाना ही पर्याप्त होता है। इन सिद्ध देवी के लिये ही यह सुधाधारास्तव लिखा गया है जिसका पाठ करनेवाले का निश्चय ही कल्याण होगा ।
॥ आदिनाथ द्वारा विरचित महाकाल- संहिता में गुह्यकाली का सुधाधारा
Uddhatan Kavach Stotram
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उद्घाटनकवचस्तोत्र
अनुष्ठान की पद्धति के अनुसार स्नान, पूजा से निवृत्त होकर आसन पर बैठैं । आसन शुद्धि करें । शिखा बन्धन करें। आत्म शुद्धि करें, आचमन करें । फिर रुद्रसूक्त पढ़ें, सङ्कल्प ग्रहण करें । भूमि, वाराह, शेष, कूर्म का पञ्चोपचार से पूजन करें । क्रमानुसार फिर कलश की सङ्क्षिप्त पूजा करके जल को अभिमन्त्रित कर आत्मप्रोक्षण पूजा सामग्री का प्रोक्षण करें । पञ्चगव्य प्राशन कर लें । उचित समझें तो सर्वप्रथम दशविध स्नान भी करें । दीपक का पूजन करें। दिग्रक्षा का विधान करें तथा गणपति के पूजन, अभिषेक, आरती व पुष्पाञ्जलि से निवृत्त होकर षोडशमातृका पूजन, नवग्रह पूजन, कलश पूजन, ब्राह्मण-वरण (११ ब्राह्मणों की आवश्यकता होगी) पुण्याहवाचन तथा प्रधान-देवता शिव का षोडशोपचार से पूजन करें । ब्राह्मणों को यथा-योग्य वरण- साहित्य प्रदान करें । ध्यान से लेकर पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पञ्चामृत-स्नान, शुद्धस्नान, वस्त्र, उपवस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, अक्षत, पुष्प, दूर्वा, शमीपत्र, बिल्वपत्र, अबीर, गुलाल, परिमल द्रव्य, धूप, दीपक, नैवेद्य, ऋतुफल, आचमन, अखण्ड ऋतुफल, पान, सुपारी, लवङ्ग, इलायची, कर्पूर (नागवल्ली-वीटिका) व द्रव्यदक्षिणा समर्पण करें । तदनन्तर मूर्ति (लिङ्ग) के आकार की विशालता या लघुता का ध्यान रखकर साफ चावलों को शुद्ध जल से धोकर शुद्ध जल में पकावें ।
मननाद् विश्वविज्ञानं त्राणं संसार-बन्धनात् ।
यतः करोति संसिद्धिं ``मन्त्र'' इत्युच्यते बुधैः ॥
मन्त्र के स्थूल एवं सूक्ष्म रूप से पुनः दो अङ्ग माने गये हैं जिनमें स्थूल रूप में-प्रणव, बीज, कूट, अक्षर तथा इनके विशिष्ट संयोजन से सम्बद्ध मन्त्र के पल्लवादि-विधान आते हैं; किन्तु सूक्ष्म रूप में उनके स्वरूप, ध्यान, शक्ति, गति, क्रियाकारित्व आदि का समावेश होता है । इन में भी सर्वाधिक महत्त्व कुण्डलिनी-जागरण का है और यह कार्य शरीरस्थ मूलाधारादि चक्रों के उन्मीलन की अपेक्षा रखता है । चक्रों के उन्मीलन का प्रकार जप एवं ध्यान से सम्भव है । तत्तत् चक्रों की अधिष्ठात्री देवता जब तक प्रसन्न नहीं होती, तब तक इस कार्य में भी बाधाएं आती हैं । ये बाधाएं केवल इसी जन्म से सम्बद्ध न होकर अपर जन्म में भी बाधक बनती हैं । सम्भवतः इसी दृष्टि से ``रुद्रयामल'' में शक्ति-उपासकों के लिए एक ``उद्घाटन कवच'' स्तोत्र दिया है, जिसका भक्तिपूर्वक अजपा जप के पश्चात् पाठ करना अत्यन्त लाभप्रद माना गया है । यह कवच इस प्रकार है-
उद्घाटन कवच स्तोत्रम्
मूलाधारे स्थिता देवि, त्रिपुरा चक्रनायिका ।
नृजन्मभीति-नाशार्थं, सावधाना सदाऽस्तु मे ॥ १॥
स्वाधिष्ठानाख्यचक्रस्था, देवी श्रीत्रिपुरेशिनी ।
पशुबुद्धिं नाशयित्वा, सर्वैश्वर्यप्रदाऽस्तु मे ॥ २॥
मणिपूरे स्थिता देवी, त्रिपुरेशीति विश्रुता ।
स्त्रीजन्म-भीतिनाशार्थं, सावधाना सदाऽस्तु मे ॥ ३॥
स्वस्तिके संस्थिता देवी, श्रीमत् त्रिपुरसुन्दरी ।
शोकभीति-परित्रस्तं, पातु मामनघं सदा ॥ ४॥
अनाहताख्य-निलया, श्रीमत् त्रिपुरवासिनी ।
अज्ञानभीतितो रक्षां, विदधातु सदा मम ॥ ५॥
त्रिपुराश्रीरिति ख्याता, विशुद्धाख्य-स्थलस्थिता ।
जरोद्भव-भयात् पातु, पावनी परमेश्वरी ॥ ६॥
आज्ञाचक्रस्थिता देवी त्रिपुरामालिनी तु या ।
सा मृत्युभीतितो रक्षां, विदधातु सदा मम ॥ ७॥
ललाट-पद्म-संस्थाना, सिद्धा या त्रिपुरादिका ।
सा पातु पुण्यसम्भूतिर्भीति-सङ्घात् सुरेश्वरी ॥ ८॥
त्रिपुराम्बेति विख्याता, शिरःपद्मे सुसंस्थिता ।
सा पापभीतितो रक्षां, विदधातु सदा मम ॥ ९॥
ये पराम्बापदस्थान-गमने विघ्न-सञ्चयाः ।
तेभ्यो रक्षतु योगेशी, सुन्दरी सकलार्तिहा ॥ १०॥
उपर्युक्त स्तोत्र में भगवती के श्रीचक्र में विराजमान आवरण- गत प्रमुख देवियों से प्रार्थना की गई है जो कि चक्र नायिकाएं हैं । यहां नव आवरण रूप नौ शरीरगत चक्र एवं हृदय में विराजमान देवियों से जिन-जिन भयों से रक्षा की प्रार्थना की गई है उनकी तालिका इस प्रकार है-
चक्र चक्र नायिका भय
१. मूलाधार त्रिपुरा नृजन्म
२. स्वाधिष्ठान त्रिपुरेशिनी पशुबुद्धि
३. मणिपूर त्रिपुरेशी स्त्रीजन्म
४. स्वस्तिक त्रिपुरसुन्दरी शोक
५. अनाहत त्रिपुरवासिनी अज्ञान
६. विशुद्ध त्रिपुराश्री जरा
७. आज्ञा त्रिपुरामालिनी मृत्यु
८. ललाटपद्म त्रिपुरा सिद्धा भीतिसङ्घ
९. सहस्रार त्रिपुराम्बा पाप
१०. बिन्दु सुन्दरी योगेशी विघ्न
इन सब भयों से निवृत्ति की याचना करते हुए इसमें पराम्बा के चरणों में शरण-प्राप्ति की कामना की गई है जो उचित ही है । ऐसे ही अन्तर्याग के लिए अन्य उपयोगी विधान श्री रुद्रयामल में वर्णित हैं । उपर्युक्त चक्रों में ही प्रत्येक आवरण देवी के मन्त्र का जप किया जाता है । जैसे-जैसे साधना क्रम आगे बढ़ता है उसमें और भी विशिष्ट अवकाशानुसार सहस्रनामार्चनादि भी किये जाते हैं । महानैवेद्य, आरती, पुष्पाञ्जलि, प्रदक्षिणा, कामकलाध्यान, बलिदान, जप, पुष्पाञ्जलिस्तोत्र, कल्याणवृष्टिस्तोत्र, सर्वसिद्धिकृतस्तोत्र और क्षमा-प्रार्थना, गुरुस्तोत्रादि का पाठ करके सुवासिनीपूजन, तत्त्वशोधन, पूजासमर्पण देवतोद्वासन शान्तिस्तव पाठ के साथ अर्चनविधि पूर्ण होती है ।
इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे उद्घाटनकवचस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
Bala Tripur Sundari Stuti
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त्रिपुरसुन्दरी स्तुति
त्रिपुरा स्तुति
बाला त्रिपुरसुन्दरी स्तुति
जय श्रीत्रिपुरे मातर्जय बालाम्बिके परे ।
जय भक्तप्रिये नित्यं जय कारुण्य विग्रहे ॥ ६१॥
हे श्रीत्रिपुरे! मातः आपकी जय हो, हे बालाम्बिके ! हे परे ! आप की जय हो । हे नित्य भक्तों के प्रिय करने वाली आपकी जय हो, हे करुणा से शरीर धारण करने वाली आपकी जय हो ।
लोके त्रिविक्रमोल्लासिवस्तुपृवस्थितिर्यतः ।
त्रिपुरेति ततः प्रोक्ता ब्रह्मादीनां पराश्रया ॥६२॥
महिम्नस्ते लेशं हरिहरभवाद्या अपि परं,
न वक्तुं ज्ञातुं वा प्रभव इह देवादिमुखः ।
तथाभूता देवी क इह भुवनेषु स्तुतिपथं,
समीहेदारोढुं तव चरणसेवाविरहितः ॥६३॥
जहां से त्रिविक्रम स्थूल सूक्ष्म एवं तुरीय, प्राण मन और वाणी सत्त्व, रज और तम ऋक् साम एवं यजु से व्याप्त इसलिये ब्रह्मादिकों को परम आश्रय देने वाली आप त्रिपुरा कही गई हैं। इस संसार में आपकी लेशमात्र महिमा को हरिहर शिवादिक तथा देवादि गुरुजन भी वर्णन करने के लिये तथा जानने के लिये समर्थ नहीं हो सकेगें ऐसी सामर्थ्यमयी आप हैं आपकी चरणसेवा से विमुख कौन व्यक्ति इस संसार में स्तुति मार्ग पर चढने के लिये समर्थ हो सकता है ?
पदाम्भोजे भक्तिस्तव भवतिचिन्तामणिगणो,
नतच्चित्रं देवि ! प्रभवति समीहाधिकफलम् ।
अतस्त्वत्पादाब्जप्रणिहितसमस्तेन्द्रियवतां,
फलं न प्राप्यं किंवद परशिवे सुन्दरि परे ॥६४॥
हे देवि ! परशिवे ! हे सुन्दरि ! हे परे ! आपके चरणकमल में भक्ति चिन्तामणि रूप होती है और चेष्टा से भी अधिक फलवाली होती है इसमें कोई विचित्रता नहीं इसलिये आपके चरण कमलों में समर्पित समस्त इन्द्रिय वालों को क्या फल प्राप्त नहीं होगा ? सो कहो ।
त्वमेवादौ सृष्टः सहजमुखपीयूष जलधिर्नितान्तं,
विश्रान्ता वपुषि विमले निश्चलतरे ।
न खं वायुस्तेजः सलिलमपि भूमिर्घटपटौ,
न चज्ञानाज्ञाने वचनविषयो वा स्थितमभूत् ॥६५॥
आप ही आदि में सम्पूर्ण सृष्टि के नित्य आनन्दरूपी अमृत के सर्वथा विश्राम स्थान हैं जब निश्चलतर शरीर विमल शरीर रूप में आप प्रत्यक्ष हो जाती हैं न तो आकाश, न वायु, न तेज, न जल, और न पृथ्वी न घट पट ही, न ज्ञान और न अज्ञान उस संवित् प्राप्त की स्थिति में वैखरी वाणी में कहे जाते हैं परावाक् ही उसका गन्तव्य हो जाता है।
त्वमेवैका सेयं निरवधिमहाशक्तिभरिता,
स्थिता संविद्र पा सकलजगतामादिसमये ।
जगन्माला जालाङ्कुरगणसुबीजैकवपुषा,
परानन्दाकारा परमशिवजीवस्थितिकरी ॥६६॥
आप एकाकी ही निःसीम महाशक्ति से भरी हुई सम्पूर्ण जगत् के आदिकाल से संविद रूप में स्थित रहती है। जगत् के सम्पूर्ण क्रियाकलापों के मायाजाल के अङ्कुर गुणों के सुन्दर बीज को अपने में समाकर परम आनंद स्वरूप परमात्मतत्त्व भगवान् शङ्कर के उन्मेष का कारण बनती हैं ।
ततः संविद्र पातव सकलमेतद्विलसितं,
विभातं सद्र पं तदितरवपुश्चापि सहसा ।
यथाम्भोधौ भङ्गा घटकलशकुण्डा इव मृदि,
प्रभा भानोर्यद्वत्कनकशकलं भूषणगणाः ॥ ६७॥
तदनन्तर संविद् रूप आप ही यह सारा संसारजाल जगचित्र के विलास रूप में आपसे इतर आकार धारण किया हुआ भी अकस्मात् सद्रूपा प्रकट होती है । जैसे समुद्र में उसकी वीची (तरंगे ) सागर रूप ही रहती हैं; जैसे मिट्टी में घड़ा, कलस, कुण्डा, शराव आदि नाना प्रकार से कहे जाते हैं। जिस प्रकार सूर्य की भास्वर ज्योति का किरण - स्वर्ण जाल सूर्य के अतिरिक्त कुछ नहीं और सम्पूर्ण आभूषणों का सोने के नाना आकारों में विशेष व्यवहारोपयोगी रूप के अतिरिक्त कुछ नहीं, वैसे ही सारा जगत् आपका संवित् रूप ही है ।
अतस्त्वद्र पान्नो पृथगिह भवेत्किञ्चिदपि वा,
सदा सर्वात्मत्वाद्विलससि महाकाशवपुषा ।
तथाभूतायास्ते परिमितकराङ्घ्यादिवपुषा,
विलासो भक्तषु प्रभवति कृपायन्त्रणवशात् ॥ ६८ ॥
तवाप्येतद्रूपं शिवगुरुपदाम्भोजविलसत्,
सुभक्तिप्रोन्मीलद्विमलनयनानां विधिवशात् ।
शक्तिपात कदाचित्केषाञ्चिद्भवति पुरतो भाग्यवशतः
परं यत्तद्रूपं कथमिह भवेदम्ब सुलभम् ॥६९॥
अतः आपके रूप से पृथक् चाहे जो कुछ भी हो उसमें आप ही सदा महाकाश के आकार में सर्वात्मभाव में विलास करती हैं; ऐसी महामहिमामयी आपकी सगुण परिच्छिन्न मूर्ति जो हाथ पैर और मुख आदि देहधारी रूप से भक्तों के ऊपर कृपा करने के लिये ही विलासमात्र है । हे मातः ! आपका यह अतीव दिव्यस्वरूप श्री शिव सद्गुरु के चरण कमल में अधिकाधिक भक्ति के संरम्भ से खुल गये हैं ज्ञान नेत्र जिनके ऐसे महाभाग्यशाली किन्हीं पुण्य पुञ्जवाले पुरुषों के विधिवश से और उनके महाभागवन्त होने के कारण कभी ही साक्षात्कार में आता है। भला बताइये तो सही उस अलौकिक भास्वद रूप की आभा की झलक किस प्रकार हमारे जैसे व्यक्तियों को अनायास सुलभ हो ?
नमस्ते बालाम्ब त्रिपुरहर सौभाग्यनिलये,
नमस्ते भक्तेहासमधिकफलोत्पादचतुरे ।
नमस्ते दैन्याद्रिप्रविदलनवज्रायितकृपे,
नमस्ते मोहाम्भोनिधिकवलनागस्त्यचरणे ॥७०॥
हे बालाग्ब ! (आत्मरूप से संवित् प्रकाशात्मक आपका उन्मेषनिमेष ही सदा एकरस रहता है यहां बालाम्ब अन्वर्थ नाम है ) हे शंकरसौख्यआगरी ! मेरा आपको नमस्कार है, हे भक्त के अभीष्ट से भी बहुत अधिक फलों के उत्पन्न करने में चतुर भगवती ! आपको नमस्कार है, हे दीनतारूपी विशाल पर्वत के दलन करने में वज्र से भी कठोर रूप से चूर्णकर कृपा करने वाली आपको नमस्कार है, हे मोह रूपी समुद्र की चुल्लू करने में अगस्त्य को अपना अनुचर बनानेवाली महाविभूति सम्पन्ने ! आपको पुनः पुनः सादर नति है ।
इति श्रीत्रिपुरारहस्य संहितायां त्रिपुरा स्तुति: नाम प्रथमोऽध्यायः ॥
Matraka stotram
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श्रीत्रिपुरसुन्दरी के इस द्वादशश्लोकी स्तुति जिसे नित्या अथवा ललिता अथवा मातृका स्तोत्र भी कहा जाता है,इसके पाठ करने से सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती है।
मातृका स्तोत्रं
श्रीत्रिपुरसुन्दर्याद्वादशश्लोकीस्तुतिः
गणेशग्रहनक्षत्रयोगिनीराशिरूपिणीम् ।
देवीं मन्त्रमयीं नौमि मातृकापीठरूपिणीम् ॥ १॥
गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी, राशि तथा मातृका पीठ रूपिणी एवम् मंत्रमयी देवी को नमस्कार करता हूँ ।
प्रणमामि महादेवीं मातृकां परमेश्वरीम् ।
कालहृल्लोहलोल्लोहकलानाशनकारिणीम् ॥ २॥
परमेश्वरी, मातृका तथा समयापहारी लोह-कला का नाश न करने वाली महादेवी को नमस्कार करता हूँ ।
यदक्षरैकमात्रेऽपि संसिद्धे स्पर्द्धते नरः ।
रविताक्ष्येन्दुकन्दर्पैः शङ्करानलविष्णुभिः ॥ ३॥
यदक्षरशशिज्योत्स्नामण्डितं भुवनत्रयम् ।
वन्दे सर्वेश्वरीं देवीं महाश्रीसिद्धमातृकाम् ॥ ४॥
जिन देवी के मंत्र के एक अक्षर भी सिद्ध हो जाने पर मनुष्य सूर्य, चन्द्रमा, कन्दर्प, शंकर, अग्नि तथा विष्णु से प्रतिस्पर्धा करता है तथा जिनके अक्षर से तीनों लोक व्याप्त हैं उन महाश्री, सिद्धि तथा मातृका रूप सर्वेश्वरी देवी की वंदना करता हूँ ।
यदक्षरमहासूत्रप्रोतमेतज्जगत्त्रयम् ।
ब्रह्माण्डादिकटाहान्तं तां वन्दे सिद्धमातृकाम् ॥ ५॥
जिनके अक्षर रूप महासूत्र में ब्रह्माण्ड से लेकर कटाह पर्यन्त तीनों जगत् ओत-प्रोत हैं, उन सिद्धमातृका को प्रणाम करता हूँ ।
यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयोद्भवम् ।
ब्रह्माण्डादिकटाहान्तं जगदद्यापि दृश्यते ॥ ६॥
ब्रह्माण्डादि कटाह पर्यन्त जगत् जिनके त्रिकोणोत्पन्न एकादश आधार बीज में समाविष्ट होते हुए आज भी दीखता है, उन देवी की मैं वंदना करता हूँ ।
अकचादिटतोन्नद्धपयशाक्षरवर्गिणीम् ।
ज्येष्ठाङ्गबाहुहृत्कण्ठकटिपादनिवासिनीम् ॥ ७॥
अ, क, च, ट, प, य तथा श अक्षरों में और शिर, बाहु, हृदय, कंठ तथा चरणों मैं निवास करनेवाली देवी को मैं नमस्कार करता हूँ ।
नौमीकाराक्षरोद्धारां सारात्सारां परात्पराम् ।
प्रणमामि महादेवीं परमानन्दरूपिणीम् ॥ ८॥
इकार अक्षर का उद्धार करनेवाली, सार से भी सार श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ, परमानन्द रूपिणी महादेवी को प्रणाम करता हूँ ।
अथापि यस्या जानन्ति न मनागपि देवताः ।
केयं कस्मात्क्व केनेति सरूपारूपभावनाम् ॥ ९॥
वन्दे तामहमक्षय्यां क्षकाराक्षररूपिणीम् ।
देवीं कुलकलोल्लोलप्रोल्लसन्तीं शिवां पराम् ॥ १०॥
देवगण जिनके विषय में कुछ भी नहीं जानते हैं अर्थात् वे कौन हैं ? किससे हुई ? कहाँ हुई ? क्यों हुई ? इस मूर्तीमूर्त भावना को बिलकुल नहीं जानते उन क्षकाराक्षर रूप वाली, कभी नष्ट न होने वाली, वाम मार्ग के नाद से चंचल तथा शोभित होने वाली श्रेष्ठ शिवा देवी को प्रणाम करता हूँ ।
वर्गानुक्रमयोगेन यस्याख्योमाष्टकं स्थितम् ।
वन्दे तामष्टवर्गोत्थमहासिद्ध्यादिकेश्वरीम् ॥ ११॥
वर्गों के अनुक्रम योग से जिनके नाम पर उमाष्टक बना है, उन अष्ट वर्ग से उद्भूत महासिद्धि आदि की स्वामिनी की मैं वन्दना करता हूँ।
कामपूर्णजकाराख्यसुपीठान्तर्न्निवासिनीम् ।
चतुराज्ञाकोशभूतां नौमि श्रीत्रिपुरामहम् ॥ १२॥
कामपूर्ण जकार संज्ञक सुन्दर पीठ के भीतर निवास करने वाली और चार आज्ञाकोशों से युक्त श्री त्रिपुरा को नमस्कार करता हूँ ।
श्रीत्रिपुरसुन्दर्या द्वादशश्लोकी स्तुतिः महात्म्य
इति द्वादशभी श्लोकैः स्तवनं सर्वसिद्धिकृत् ।
देव्यास्त्वखण्डरूपायाः स्तवनं तव तद्यतः ॥ १३॥
देवी की स्तुति की यह द्वादश श्लोकि देवी के अखंड और सर्वव्यापी स्वरूप का स्तुति-गान सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करता है।
एतत्स्तोत्रं तु नित्यानां यः पठेत्सुसमाहितः ।
पूजादौ तस्य सर्वाता वरदाः स्युर्न संशयः ।। १४ ।।
पूजा के आरम्भ में जो व्यक्ति अत्यन्त सावधानी से नित्याओं के इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसे सकल देवियों का वरदान मिलेगा, इसमें संशय नहीं ।
इति त्रिपुरसुन्दर्याद्वादशश्लोकीस्तुतिः समाप्ता ।
Lalita kavach
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श्रीललिताकवचम्
Lalita kavach
ललिता अथवा नित्या अथवा नवरतात्मक कवच
श्रीललिता देवी कवचं
ललिताकवचस्तोत्रम्
सनत्कुमार उवाच-
अथ ते कवचं देव्या वक्ष्ये नवरतात्मकम् ।
येन देवासुरनरजयी स्यात्साधकः सदा ॥ १॥
सनत्कुमार बोले- इसके उपरान्त देवी के नवरतात्मक कवच को बता रहा हूँ। जिसके पाठ से साधक देवताओं, असुरों, तथा मनूजों पर सदा विजय प्राप्त करता है।
ललिता कवच
सर्वतः सर्वदाऽऽत्मानं ललिता पातु सर्वगा ।
कामेशी पुरतः पातु भगमाली त्वनन्तरम् ॥ २॥
दिशं पातु तथा दक्षपार्श्वं मे पातु सर्वदा ।
नित्यक्लिन्नाथ भेरुण्डा दिशं मे पातु कौणपीम् ॥ ३॥
तथैव पश्चिमं भागं रक्षताद्वह्निवासिनी ।
सर्वत्र गमन करने वाली ललितादेवी सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें। कामेशी अग्रभाग से और भगमाली पृष्ठ भाग से रक्षा करे। नित्यक्लिन्ना मेरे दक्षिण पार्श्व तथा पूर्व दिशा की रक्षा करें। भेरुंडा उत्तर दिशा और बह्निवासिनी पश्चिम दिशा की रक्षा करें।
महावज्रेश्वरी नित्या वायव्ये मां सदावतु ॥ ४॥
वामपार्श्वं सदा पातु इतीमेलरिता ततः ।
माहेश्वरी दिशं पातु त्वरितं सिद्धदायिनी ॥ ५॥
महाव्रजेश्वरी दक्षिण दिशा की रक्षा करें। ललितादेवी सदा मेरे वामपार्श्व की रक्षा करें। सिद्धिदायिनी माहेश्वरी समस्त दिशाओं में मेरी रक्षा करें।
पातु मामूर्ध्वतः शश्वद्देवता कुलसुन्दरी ।
अधो नीलपताकाख्या विजया सर्वतश्च माम् ॥ ६॥
कुलसुन्दरी सदा ऊपर से और नीलपताका नीचे से रक्षा करें।विजयादेवी सब ओर से मेरी रक्षा करें।
करोतु मे मङ्गलानि सर्वदा सर्वमङ्गला ।
देहेन्द्रियमनःप्राणाञ्ज्वालामालिनिविग्रहा ॥ ७॥
सर्व मंगला सदा मेरा कल्याण करें। ज्वाला- मालिनी देह, इंद्रिय, मन तथा प्राणों की रक्षा करें ।
पालयत्वनिशं चित्ता चित्तं मे सर्वदावतु ।
कामात्क्रोधात्तथा लोभान्मोहान्मानान्मदादपि ॥ ८॥
पापान्मां सर्वतः शोकात्सङ्क्षयात्सर्वतः सदा ।
असत्यात्क्रूरचिन्तातो हिंसातश्चौरतस्तथा ।
स्तैमित्याच्च सदा पातु प्रेरयन्त्यः शुभं प्रति ॥ ९॥
नित्याः षोडश मां पातु गजारूढाः स्वशक्तिभिः ।
चित्ता सदा मेरे चित्त की रक्षा करें। अपनी शक्तियों समेत गजों पर आरूढ सोलह नित्यादेवियां रक्षा करें। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान, मद, पाप, शोक, क्षय, असत्य, क्रूर चिंता, हिंसा, स्तेय, तथा जड़ता से मुझे बचायें और शुभ कर्मों की प्रेरणा दें।
तथा हयसमारूढाः पातु मां सर्वतः सदा ॥ १०॥
सिंहारूढास्तथा पातु पातु ऋक्षगता अपि ।
रथारूढाश्च मां पातु सर्वतः सर्वदा रणे ॥ ११॥
तार्क्ष्यारूढाश्च मां पातु तथा व्योमगताश्च ताः ।
अश्वों पर आरूढ देवियाँ, सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें। सिंहारूढ, ऋक्षारूढ, तथा रथारूढ देवियां सदा मेरी रक्षा करें। गरुड़ पर आसीन देवियाँ सदा मेरी रक्षा करें।
भूतगाः सर्वगाः पातु पातु देव्यश्च सर्वदा ॥ १२॥
भूतप्रेतपिशाचाश्च परकृत्यादिकान् गदान् ।
द्रावयन्तु स्वशक्तीनां भूषणैरायुधैर्मम ॥ १३॥
गजाश्वद्वीपिपञ्चास्यतार्क्ष्यारूढाखिलायुधाः ।
असङ्ख्याः शक्तयो देव्यः पातु मां सर्वतः सदा ॥ १४॥
आकाशगामिनी, भूतगामिनी तथा सर्वगामिनी देवियां सर्वदा मेरी रक्षा करें तथा अपनी शक्तियों के आयुधों से भूत, प्रेत, पिशाच, कृत्या आदिकों का संहार करें। गज, अश्व, व्याघ्र, सिंह तथा गरुड़ पर आरूढ एवम् अखिल आयुधों से युक्त असंख्य शक्ति देवियाँ सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें ।
श्रीललिता कवच महात्म्यम्
सायं प्रातर्जपन्नित्याकवचं सर्वरक्षकम् ।
कदाचिन्नाशुभं पश्येत्सर्वदानन्दमास्थितः ॥ १५॥
इत्येतत्कवचं प्रोक्तं ललितायाः शुभावहम् ।
यस्य सन्धारणान्मर्त्यो निर्भयो विजयी सुखी ॥ १६॥
जो मानव प्रातःकाल तथा सायंकाल इस सर्वरक्षक नित्या कवच का पाठ करता है, वह सर्वदा आनंद को प्राप्त करता है, अशुभ को तो कभी देखता ही नहीं। यह ललिता का सुख दायक कवच मैंने तुम्हे सुना दिया। जो मनुष्य इसको धारण करेगा, वह निर्भय, विजयी तथा सुखी होगा ।
॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे तृतीयपादे बृहदुपाख्याने श्रीललिता कवचं सम्पूर्णम् अध्यायः ८९॥
Bhadrakali Astkam
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भद्रकाली अष्टकम्
भद्रकाली अष्टक हिन्दी अर्थ सहित
श्रीमच्छङ्करपाणिपल्लवकिरल्लोलंबमालोल्लस-
नमाललोलकलापकालकबरीभारावलीभासूरीम् ।
करुणामृत्वारिराशिलहरीपीयूषवर्षावलिं
बालांबां ललितालकामनुदिनं श्रीभद्रकाली भजे ॥१॥
जिनकी जटाएं भगवान शंकर के हस्तकमलों से छूकर लहराती हुई दिव्य मालाओं से सुशोभित हैं। जिनकी घुंघराली और गहरी काली अलकें उनके सौंदर्य को और भी दैवी बना रही हैं। जो करुणा और अमृतमय शांति की तरंगों के समान मधुर एवं कल्याणकारी हैं। मैं नित्य उस भद्रकाली की वंदना करता हूँ।
हेलादारितदारिकासुरशिरःश्रीवीरपाणोम्मद-
श्रेणीशोणितशोणिमाधरपुती वीतिर्सास्वादिनीम् ।
पाटीरादिसुगन्धिचूचुकतीं शाटीकुटीरस्तनीं
घोटीवृन्दसमानधातियुधीं श्रीभद्रकाली भजे ॥ २ ॥
जिन्होंने खेल-खेल में ही दारिका नामक असुर का सिर काट दिया, जिनके हाथों में असुरों के रक्त से रंजित अस्त्र सुशोभित हैं। जिनके होंठ रक्त जैसे लाल हैं और जो युद्ध की ललकार का रस लेती हैं। जिनके स्तन सुगंधित वृक्ष की तरह सुगंधित हैं और जो रेशमी वस्त्र से ढँके हैं। जो घोड़े के समान वेगवती सेना का नेतृत्व करती हैं। मैं नित्य उस भद्रकाली की वंदना करता हूँ।
बालार्कायुतकोटिभासुरकिरीटामुक्तमुग्धालक-
श्रेणीनिन्दितवासिकामरुसरोजकाञ्चलोरुश्रियम् ।
वीणावादनकौशलशयशयशःश्र्यानन्दसन्दायिनी-
मम्बमम्बुजलोचननामनुदिनं श्रीभद्रकाली भजे ॥ ३ ॥
जिनके मुकुट से बाल सूर्य के करोड़ों प्रकाश झलकते हैं, जिनकी लहराती अलकों की शोभा वासंती कामवायु और कमल की भी सुगंध को मात देती है। जिनकी जंघाएं (जांघें) सोने के कमल जैसी चमकती हैं। जो वीणा-वादन में निपुण हैं, यश एवं आनंद की साक्षात स्रोत हैं। जिनकी नेत्र कमल जैसे हैं और जिनका नाम स्मरण करने मात्र से आनंद प्राप्त होता है। मैं नित्य उस भद्रकाली की वंदना करता हूँ।
मातङ्गश्रुतिभूषिणीं मधुधरीवाणीसुधामोषिणीं
भ्रुविक्षेपकटाक्षवीक्षणविसर्गक्षेमसंहारिणीम् ।
मातङ्गीं महिषासुरप्रमथिनीं माधुर्यधुर्याकर-
श्रीकारोत्तपाणिपङ्कजपुतीं श्रीभद्रकाली भजे ॥ ४ ॥
जो मातंग शास्त्रों की भव्यता से विभूषित हैं, जिनकी वाणी से अमृत-मधु बरसता है। जिनकी भौंहों के उठने, कटाक्ष और दृष्टि की लहर से ही संसार की रक्षा और संहार होता है। जो महिषासुर का वध करने वाली मातंगी देवी हैं। जिनके करकमलों से माधुर्य (माधुर्य भाव) और श्री (सौभाग्य) की धारा बहती है। मैं उस भद्रकाली माता की वंदना करता हूँ।
मातङ्गननभद्रलेयजननीं मातङ्गसंगामिनीं
चेतोहरितनुच्छवीं शफरिकाचक्षुष्मतीमम्बिकाम् ।
जृंभत्प्रौढिनीशुंभशुंभमथिनीमंभोजभूपूजितां
सम्पत्सन्नत्तिदायिनीं हृदि सदा श्रीभद्रकाली भजे ॥ ५ ॥
जो मातंग कन्या, भद्र वंश की जननी और मातंग नामक योद्धा की संगिनी हैं, जिनकी कांति हृदय को मोहित कर लेती है, जिनकी आँखें शफरी (छोटी मछली) की तरह चंचल और चमकती हैं। जिन्होंने अपने प्रचंड रूप से शुंभ-निशुंभ जैसे राक्षसों का संहार किया। जो कमलवर्णी राजाओं (भक्तों) द्वारा पूजित हैं, और जो ऐश्वर्य व समृद्धि प्रदान करती हैं। मैं उस भद्रकाली माता की वंदना करता हूँ।
आनन्दाकतरङ्गिणीममलहृन्नालीकहंसीमणीं
पीनोत्तुङ्गघनस्तनां घनलसत्पाटीरपङ्कोज्ज्वलाम् ।
क्षौमावीतनितंबबिम्बरशनासुतक्वणत्किङ्किणीं
एनाङ्कांबुजभासुरस्यान्यानां श्रीभद्रकाली भजे ॥ ६ ॥
जो आनंद की लहरों की तरह चंचला, निर्मल हृदयवाली, कमलपुष्प पर बैठी हंसिनी के समान पवित्र और तेजस्वी है। जिनके स्तन उन्नत, भारी और सुंदर हैं, जिनका शरीर पाटीर पुष्पों की भांति दमकता है। जिनकी कटि रेशमी वस्त्र से आवृत्त है, कमर में स्वर्ण कंबंध और घंटिकाएं (किंकिणियाँ) झंकार करती हैं जिनकी कान्ति चंद्रमा को भी मात देती है और जो समस्त योगियों की चेतना में विराजमान हैं। मैं उस माँ भद्रकाली की भजन करता हूँ।
कालांभोदकलायकोमलतनुच्छयाशीतिभूतिमत्-
संख्याननान्तरितस्तननान्तरलसन्मालाकिलन्मौक्तिकाम् ।
नाभीकूपसरोजनालविलसच्छातोदरीशापदीं
दूरंकुर्वयि देवि, घोरदुरितं श्रीभद्रकालीं भजे ॥ ७ ॥
जिनकी देह नीले कमल की भाँति कोमल और गहरे वर्षा-घन (मेघ) के समान श्यामवर्णी है। जिनकी छाती के मध्य में विशाल स्तनों के बीच एक रत्नमाला दमकती है, जिसकी नाभि में कमल का आधार है और पेट सुडौल, जल तरंगों की तरह लहराता है। हे देवी! आप मेरी समस्त घोर बाधाओं और पापों को दूर करें। मैं उस श्रीभद्रकाली को भजता हूँ।
आत्मीयस्तनकुंभकुङकुमारजःपङ्कारुणालंकृत-
श्रीकण्ठौरसभूरिभूतिममरीकोटिर्हीरायिताम् ।
वीणापाणिसनन्दनन्दितपदमेणीविशालेक्षणां
वेणीह्रीणितकालमेघपटलीं श्रीभद्रकाली भजे ॥ ८ ॥
जिनका वक्षस्थल अपने ही स्तनों से छलके हुए कुंकुम की लाली से सुशोभित है, गर्दन पर अमरत्व की रेखाएँ चमकती हैं और शरीर की आभा देवताओं के लिए भी वरेण्य है। जिनके करकमलों में वीणा, चरण-स्पर्श से आनंद की तरंगें उठती हैं, जिनकी आँखें विशाल और करुणापूर्ण, वेणी काले बादलों को भी लज्जित करती है। मैं उन भद्रकाली देवी का ध्यान करता हूँ।
श्रीभद्रकाल्यष्टकं फलश्रुति:
देवीपादपयोजपूजनमिति श्रीभद्रकाल्यष्टकं
रोगौघाघघ्ननिलयातिमिदं प्रातः प्रगेयं पठेत् ।
श्रेयः श्रीशिवकीर्तिसम्पदमलं सम्प्राप्य सम्पन्मयीं
श्रीदेवीमनपायिनीं गतिमयन् सोऽयं सुखी वर्तते ॥ ९ ॥
जो भक्त इस श्रीभद्रकाल्यष्टक का पवित्र भाव से नित्य प्रातःकाल पाठ करता है, उसे समस्त रोगों से मुक्ति, जीवन में उत्तम सुख, शिव-पद की महिमा, कीर्ति और समृद्धि प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति भगवती की कृपा से नित्य सुखद मार्ग पर चलता है और परम शांति को प्राप्त करता है।
श्रीनारायणगुरुविरचितं श्रीभद्रकाल्यष्टकं सम्पूर्णम् ।
Shri Lalita Sahastranam
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ललिता सहस्रनाम क्या है?
ललिता आत्मा की उल्लासपूर्ण, क्रियाशील और प्रकाशमय अभिव्यक्ति है। मुक्त चेतना जिसमें कोई राग द्वेष नहीं, जो आत्मस्थित है वह स्वतः ही उल्लासपूर्ण, उत्साह से भरी, खिली हुई होती है। यह ललिताकाश है।
ललिता सहस्रनाम में हम देवी माँ के एक हजार नाम जपते हैं। नाम का अपना एक महत्त्व होता है। यदि हम चन्दन के पेड़ को याद करते हैं तो हम उसके इत्र की स्मृति को साथ ले जाते हैं। सहस्रनाम में देवी के प्रत्येक नाम से देवी का कोई गुण या विशेषता बताई जाती है।
ललिता सहस्रनाम के पाठ से क्या लाभ होता है?
हमारे जीवन के विभिन्न पड़ावों में, बालपन से किशोरावस्था, किशोरावस्था से युवावस्था – हमारी आवश्यकताएँ और इच्छाएँ बदलती रहती हैं। इस सब के साथ हमारी चेतना की अवस्था में भी महती बदलाव होते हैं। जब हम प्रत्येक नाम का पाठ करते हैं, तब वे गुण हमारी चेतना में जागृत होते हैं और जीवन में आवश्यकतानुसार प्रकट होते हैं।
देवी माँ के नाम पाठ से हम अपने भीतर विभिन्न गुणों को जागृत करके उन गुणों को अपने चारों ओर के संसार में प्रकट होते देख, और समझ पाने की शक्ति भी पाते हैं। हम सभी अपने प्राचीन ऋषियों के आभारी हैं जिन्होंने दिव्यता की आराधना उसके संपूर्ण वैविध्य गुणों के साथ की जिसने हमारे लिए जीवन को पूर्णता से जीने का मार्ग प्रशस्त किया।
सहस्रनाम का पाठ अपने में ही एक पूजा विधि है। यह मन को शुद्ध करके चेतना का उत्थान करता है। इस जप से हमारा चंचल मन शांत होता है। भले ही आधे घंटे के लिए सही, मन ईश्वर से एक रूप और उनके गुणों के प्रति एकाग्र होता है और भटकना रुक जाता है। यह विश्राम का सामान्य रूप है।
ललिता सहस्रनाम की भाषा में क्या विशेष है?
सहस्रनाम में भाषा का सौंदर्य अद्भुत है। भाषा बहुत मोहक है और सामान्य व गहरे अर्थ दोनों ही चित्ताकर्षक हैं। उदहारण के लिए कमलनयन का अर्थ सुन्दर और पवित्र दृष्टि है। कमल कीचड़ में खिलता है। फिर भी यह सुन्दर और पवित्र रहता है। कमलनयन व्यक्ति इस संसार में रहता है और सभी परिस्थितियों में इसकी सुंदरता और पवित्रता को देखता है।
ललिता, पाठक को सहस्रनाम में वर्णित विभिन्न गुणों से पहचान कराकर उनके दोनों प्रकार के (गूढ़ और सामान्य) अर्थों की झलक भी देने के उद्देश्य को पूरा करती है। किसी विशिष्ट गुण के विभिन्न संदर्भों को बहुत सुंदर तरीके से पिरोया गया है, जो साथ ही एक ही गुण के विभिन्न आयाम प्रस्तुत कर देती है।
हमें यह जानना चाहिए कि हम इस धरा पर एक बहुत ही सुंदर और महान लक्ष्य के लिए आए हैं। जब श्रद्धा और जाग्रति के साथ पाठ किया जाता है, ललिता हमारी चेतना में शुध्दि लाकर हमें सकारात्मकता, क्रियाशीलता और उल्लास का भंडार बना देती है। इसलिए आइए, आनंदमय हों और संसार के लिए उल्लास रूप हो
॥ श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रम् ॥
॥ न्यासः ॥
अस्य श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रमाला मन्त्रस्य । वशिन्यादिवाग्देवता ऋषयः । अनुष्टुप् छन्दः ।
श्रीललितापरमेश्वरी देवता । श्रीमद्वाग्भवकूटेति बीजम् । मध्यकूटेति शक्तिः । शक्तिकूटेति कीलकम् ।
श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरी-प्रसादसिद्धिद्वारा चिन्तितफलावाप्त्यर्थे जपे विनियोगः ।
॥
॥ ध्यानम् ॥
सिन्दूरारुण विग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलि स्फुरत्
तारा नायक शेखरां स्मितमुखी मापीन वक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्ण रत्न चषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं
सौम्यां रत्न घटस्थ रक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम् ॥
अरुणां करुणा तरङ्गिताक्षीं
धृत पाशाङ्कुश पुष्प बाणचापाम् ।
अणिमादिभि रावृतां मयूखै-
रहमित्येव विभावये भवानीम् ॥
ध्यायेत् पद्मासनस्थां विकसितवदनां पद्मपत्रायताक्षीं
हेमाभां पीतवस्त्रां करकलितलसद्धेमपद्मां वराङ्गीम् ।
सर्वालङ्कार युक्तां सतत मभयदां भक्तनम्रां भवानीं
श्रीविद्यां शान्त मूर्तिं सकल सुरनुतां सर्व सम्पत्प्रदात्रीम् ॥
सकुङ्कुम विलेपनामलिकचुम्बि कस्तूरिकां
समन्द हसितेक्षणां सशर चाप पाशाङ्कुशाम् ।
अशेषजन मोहिनीं अरुण माल्य भूषाम्बरां
जपाकुसुम भासुरां जपविधौ स्मरे दम्बिकाम् ॥
॥ अथ श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रम् ॥
ॐ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्-सिंहासनेश्वरी ।
चिदग्नि-कुण्ड-सम्भूता देवकार्य-समुद्यता ॥ १॥
उद्यद्भानु-सहस्राभा चतुर्बाहु-समन्विता ।
रागस्वरूप-पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला ॥ २॥
मनोरूपेक्षु-कोदण्डा पञ्चतन्मात्र-सायका ।
निजारुण-प्रभापूर-मज्जद्ब्रह्माण्ड-मण्डला ॥ ३॥
चम्पकाशोक-पुन्नाग-सौगन्धिक-लसत्कचा ।
कुरुविन्दमणि-श्रेणी-कनत्कोटीर-मण्डिता ॥ ४॥
अष्टमीचन्द्र-विभ्राज-दलिकस्थल-शोभिता ।
मुखचन्द्र-कलङ्काभ-मृगनाभि-विशेषका ॥ ५॥
वदनस्मर-माङ्गल्य-गृहतोरण-चिल्लिका ।
वक्त्रलक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना ॥ ६॥
नवचम्पक-पुष्पाभ-नासादण्ड-विराजिता ।
ताराकान्ति-तिरस्कारि-नासाभरण-भासुरा ॥ ७॥
कदम्बमञ्जरी-कॢप्त-कर्णपूर-मनोहरा ।
ताटङ्क-युगली-भूत-तपनोडुप-मण्डला ॥ ८॥
पद्मराग-शिलादर्श-परिभावि-कपोलभूः ।
नवविद्रुम-बिम्बश्री-न्यक्कारि-रदनच्छदा ॥ ९॥
शुद्ध-विद्याङ्कुराकार-द्विजपङ्क्ति-द्वयोज्ज्वला ।
कर्पूर-वीटिकामोद-समाकर्षि-दिगन्तरा ॥ १०॥
निज-सल्लाप-माधुर्य-विनिर्भर्त्सित-कच्छपी ।
मन्दस्मित-प्रभापूर-मज्जत्कामेश-मानसा ॥ ११॥
अनाकलित-सादृश्य-चिबुकश्री-विराजिता ।
कामेश-बद्ध-माङ्गल्य-सूत्र-शोभित-कन्धरा ॥ १२॥
कनकाङ्गद-केयूर-कमनीय-भुजान्विता ।
रत्नग्रैवेय-चिन्ताक-लोल-मुक्ता-फलान्विता ॥ १३॥
कामेश्वर-प्रेमरत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी ।
नाभ्यालवाल-रोमालि-लता-फल-कुचद्वयी ॥ १४॥
लक्ष्यरोम-लताधारता-समुन्नेय-मध्यमा ।
स्तनभार-दलन्मध्य-पट्टबन्ध-वलित्रया ॥ १५॥
अरुणारुण-कौसुम्भ-वस्त्र-भास्वत्-कटीतटी ।
रत्न-किङ्किणिका-रम्य-रशना-दाम-भूषिता ॥ १६॥
कामेश-ज्ञात-सौभाग्य-मार्दवोरु-द्वयान्विता ।
माणिक्य-मुकुटाकार-जानुद्वय-विराजिता ॥ १७॥
इन्द्रगोप-परिक्षिप्त-स्मरतूणाभ-जङ्घिका ।
गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठ-जयिष्णु-प्रपदान्विता ॥ १८॥
नख-दीधिति-संछन्न-नमज्जन-तमोगुणा ।
पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहा ॥ १९॥
सिञ्जान-मणिमञ्जीर-मण्डित-श्री-पदाम्बुजा ।
मराली-मन्दगमना महालावण्य-शेवधिः ॥ २०॥
सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरण-भूषिता ।
शिव-कामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीन-वल्लभा ॥ २१॥
सुमेरु-मध्य-शृङ्गस्था श्रीमन्नगर-नायिका ।
चिन्तामणि-गृहान्तस्था पञ्च-ब्रह्मासन-स्थिता ॥ २२॥
महापद्माटवी-संस्था कदम्बवन-वासिनी ।
सुधासागर-मध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ॥ २३॥
देवर्षि-गण-संघात-स्तूयमानात्म-वैभवा ।
भण्डासुर-वधोद्युक्त-शक्तिसेना-समन्विता ॥ २४॥
सम्पत्करी-समारूढ-सिन्धुर-व्रज-सेविता ।
अश्वारूढाधिष्ठिताश्व-कोटि-कोटिभिरावृता ॥ २५॥
चक्रराज-रथारूढ-सर्वायुध-परिष्कृता ।
गेयचक्र-रथारूढ-मन्त्रिणी-परिसेविता ॥ २६॥
किरिचक्र-रथारूढ-दण्डनाथा-पुरस्कृता ।
ज्वाला-मालिनिकाक्षिप्त-वह्निप्राकार-मध्यगा ॥ २७॥
भण्डसैन्य-वधोद्युक्त-शक्ति-विक्रम-हर्षिता ।
नित्या-पराक्रमाटोप-निरीक्षण-समुत्सुका ॥ २८॥
भण्डपुत्र-वधोद्युक्त-बाला-विक्रम-नन्दिता ।
मन्त्रिण्यम्बा-विरचित-विषङ्ग-वध-तोषिता ॥ २९॥
विशुक्र-प्राणहरण-वाराही-वीर्य-नन्दिता ।
कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा ॥ ३०॥
महागणेश-निर्भिन्न-विघ्नयन्त्र-प्रहर्षिता ।
भण्डासुरेन्द्र-निर्मुक्त-शस्त्र-प्रत्यस्त्र-वर्षिणी ॥ ३१॥
कराङ्गुलि-नखोत्पन्न-नारायण-दशाकृतिः ।
महा-पाशुपतास्त्राग्नि-निर्दग्धासुर-सैनिका ॥ ३२॥
कामेश्वरास्त्र-निर्दग्ध-सभण्डासुर-शून्यका ।
ब्रह्मोपेन्द्र-महेन्द्रादि-देव-संस्तुत-वैभवा ॥ ३३॥
हर-नेत्राग्नि-संदग्ध-काम-सञ्जीवनौषधिः ।
श्रीमद्वाग्भव-कूटैक-स्वरूप-मुख-पङ्कजा ॥ ३४॥
कण्ठाधः-कटि-पर्यन्त-मध्यकूट-स्वरूपिणी ।
शक्ति-कूटैकतापन्न-कट्यधोभाग-धारिणी ॥ ३५॥
मूल-मन्त्रात्मिका मूलकूटत्रय-कलेवरा ।
कुलामृतैक-रसिका कुलसंकेत-पालिनी ॥ ३६॥
कुलाङ्गना कुलान्तस्था कौलिनी कुलयोगिनी ।
अकुला समयान्तस्था समयाचार-तत्परा ॥ ३७॥
मूलाधारैक-निलया ब्रह्मग्रन्थि-विभेदिनी ।
मणि-पूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी ॥ ३८॥
आज्ञा-चक्रान्तरालस्था रुद्रग्रन्थि-विभेदिनी ।
सहस्राराम्बुजारूढा सुधा-साराभिवर्षिणी ॥ ३९॥
तडिल्लता-समरुचिः षट्चक्रोपरि-संस्थिता ।
महासक्तिः कुण्डलिनी बिसतन्तु-तनीयसी ॥ ४०॥
भवानी भावनागम्या भवारण्य-कुठारिका ।
भद्रप्रिया भद्रमूर्तिर् भक्त-सौभाग्यदायिनी ॥ ४१॥
भक्तिप्रिया भक्तिगम्या भक्तिवश्या भयापहा ।
शाम्भवी शारदाराध्या शर्वाणी शर्मदायिनी ॥ ४२॥
शाङ्करी श्रीकरी साध्वी शरच्चन्द्र-निभानना ।
शातोदरी शान्तिमती निराधारा निरञ्जना ॥ ४३॥
निर्लेपा निर्मला नित्या निराकारा निराकुला ।
निर्गुणा निष्कला शान्ता निष्कामा निरुपप्लवा ॥ ४४॥
नित्यमुक्ता निर्विकारा निष्प्रपञ्चा निराश्रया ।
नित्यशुद्धा नित्यबुद्धा निरवद्या निरन्तरा ॥ ४५॥
निष्कारणा निष्कलङ्का निरुपाधिर् निरीश्वरा ।
नीरागा रागमथनी निर्मदा मदनाशिनी ॥ ४६॥
निश्चिन्ता निरहंकारा निर्मोहा मोहनाशिनी ।
निर्ममा ममताहन्त्री निष्पापा पापनाशिनी ॥ ४७॥
निष्क्रोधा क्रोधशमनी निर्लोभा लोभनाशिनी ।
निःसंशया संशयघ्नी निर्भवा भवनाशिनी ॥ ४८॥
निर्विकल्पा निराबाधा निर्भेदा भेदनाशिनी ।
निर्नाशा मृत्युमथनी निष्क्रिया निष्परिग्रहा ॥ ४९॥
निस्तुला नीलचिकुरा निरपाया निरत्यया ।
दुर्लभा दुर्गमा दुर्गा दुःखहन्त्री सुखप्रदा ॥ ५०॥
दुष्टदूरा दुराचार-शमनी दोषवर्जिता ।
सर्वज्ञा सान्द्रकरुणा समानाधिक-वर्जिता ॥ ५१॥
सर्वशक्तिमयी सर्व-मङ्गला सद्गतिप्रदा ।
सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्र-स्वरूपिणी ॥ ५२॥
सर्व-यन्त्रात्मिका सर्व-तन्त्ररूपा मनोन्मनी ।
माहेश्वरी महादेवी महालक्ष्मीर् मृडप्रिया ॥ ५३॥
महारूपा महापूज्या महापातक-नाशिनी ।
महामाया महासत्त्वा महाशक्तिर् महारतिः ॥ ५४॥
महाभोगा महैश्वर्या महावीर्या महाबला ।
महाबुद्धिर् महासिद्धिर् महायोगेश्वरेश्वरी ॥ ५५॥
महातन्त्रा महामन्त्रा महायन्त्रा महासना ।
महायाग-क्रमाराध्या महाभैरव-पूजिता ॥ ५६॥
महेश्वर-महाकल्प-महाताण्डव-साक्षिणी ।
महाकामेश-महिषी महात्रिपुर-सुन्दरी ॥ ५७॥
चतुःषष्ट्युपचाराढ्या चतुःषष्टिकलामयी ।
महाचतुः-षष्टिकोटि-योगिनी-गणसेविता ॥ ५८॥
मनुविद्या चन्द्रविद्या चन्द्रमण्डल-मध्यगा ।
चारुरूपा चारुहासा चारुचन्द्र-कलाधरा ॥ ५९॥
चराचर-जगन्नाथा चक्रराज-निकेतना ।
पार्वती पद्मनयना पद्मराग-समप्रभा ॥ ६०॥
पञ्च-प्रेतासनासीना पञ्चब्रह्म-स्वरूपिणी ।
चिन्मयी परमानन्दा विज्ञान-घनरूपिणी ॥ ६१॥
ध्यान-ध्यातृ-ध्येयरूपा धर्माधर्म-विवर्जिता ।
विश्वरूपा जागरिणी स्वपन्ती तैजसात्मिका ॥ ६२॥
सुप्ता प्राज्ञात्मिका तुर्या सर्वावस्था-विवर्जिता ।
सृष्टिकर्त्री ब्रह्मरूपा गोप्त्री गोविन्दरूपिणी ॥ ६३॥
संहारिणी रुद्ररूपा तिरोधान-करीश्वरी ।
सदाशिवाऽनुग्रहदा पञ्चकृत्य-परायणा ॥ ६४॥
भानुमण्डल-मध्यस्था भैरवी भगमालिनी ।
पद्मासना भगवती पद्मनाभ-सहोदरी ॥ ६५॥
उन्मेष-निमिषोत्पन्न-विपन्न-भुवनावली ।
सहस्र-शीर्षवदना सहस्राक्षी सहस्रपात् ॥ ६६॥
आब्रह्म-कीट-जननी वर्णाश्रम-विधायिनी ।
निजाज्ञारूप-निगमा पुण्यापुण्य-फलप्रदा ॥ ६७॥
श्रुति-सीमन्त-सिन्दूरी-कृत-पादाब्ज-धूलिका ।
सकलागम-सन्दोह-शुक्ति-सम्पुट-मौक्तिका ॥ ६८॥
पुरुषार्थप्रदा पूर्णा भोगिनी भुवनेश्वरी ।
अम्बिकाऽनादि-निधना हरिब्रह्मेन्द्र-सेविता ॥ ६९॥
नारायणी नादरूपा नामरूप-विवर्जिता ।
ह्रींकारी ह्रीमती हृद्या हेयोपादेय-वर्जिता ॥ ७०॥
राजराजार्चिता राज्ञी रम्या राजीवलोचना ।
रञ्जनी रमणी रस्या रणत्किङ्किणि-मेखला ॥ ७१॥
रमा राकेन्दुवदना रतिरूपा रतिप्रिया ।
रक्षाकरी राक्षसघ्नी रामा रमणलम्पटा ॥ ७२॥
काम्या कामकलारूपा कदम्ब-कुसुम-प्रिया ।
कल्याणी जगतीकन्दा करुणा-रस-सागरा ॥ ७३॥
कलावती कलालापा कान्ता कादम्बरीप्रिया ।
वरदा वामनयना वारुणी-मद-विह्वला ॥ ७४॥
विश्वाधिका वेदवेद्या विन्ध्याचल-निवासिनी ।
विधात्री वेदजननी विष्णुमाया विलासिनी ॥ ७५॥
क्षेत्रस्वरूपा क्षेत्रेशी क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-पालिनी ।
क्षयवृद्धि-विनिर्मुक्ता क्षेत्रपाल-समर्चिता ॥ ७६॥
विजया विमला वन्द्या वन्दारु-जन-वत्सला ।
वाग्वादिनी वामकेशी वह्निमण्डल-वासिनी ॥ ७७॥
भक्तिमत्-कल्पलतिका पशुपाश-विमोचिनी ।
संहृताशेष-पाषण्डा सदाचार-प्रवर्तिका ॥ ७८॥
तापत्रयाग्नि-सन्तप्त-समाह्लादन-चन्द्रिका ।
तरुणी तापसाराध्या तनुमध्या तमोऽपहा ॥ ७९॥
चितिस्तत्पद-लक्ष्यार्था चिदेकरस-रूपिणी ।
स्वात्मानन्द-लवीभूत-ब्रह्माद्यानन्द-सन्ततिः ॥ ८०॥
परा प्रत्यक्चितीरूपा पश्यन्ती परदेवता ।
मध्यमा वैखरीरूपा भक्त-मानस-हंसिका ॥ ८१॥
कामेश्वर-प्राणनाडी कृतज्ञा कामपूजिता ।
शृङ्गार-रस-सम्पूर्णा जया जालन्धर-स्थिता ॥ ८२॥
ओड्याणपीठ-निलया बिन्दु-मण्डलवासिनी ।
रहोयाग-क्रमाराध्या रहस्तर्पण-तर्पिता ॥ ८३॥
सद्यःप्रसादिनी विश्व-साक्षिणी साक्षिवर्जिता ।
षडङ्गदेवता-युक्ता षाड्गुण्य-परिपूरिता ॥ ८४॥
नित्यक्लिन्ना निरुपमा निर्वाण-सुख-दायिनी ।
नित्या-षोडशिका-रूपा श्रीकण्ठार्ध-शरीरिणी ॥ ८५॥
प्रभावती प्रभारूपा प्रसिद्धा परमेश्वरी ।
मूलप्रकृतिर् अव्यक्ता व्यक्ताव्यक्त-स्वरूपिणी ॥ ८६॥
व्यापिनी विविधाकारा विद्याविद्या-स्वरूपिणी ।
महाकामेश-नयन-कुमुदाह्लाद-कौमुदी ॥ ८७॥
भक्त-हार्द-तमोभेद-भानुमद्भानु-सन्ततिः ।
शिवदूती शिवाराध्या शिवमूर्तिः शिवङ्करी ॥ ८८॥
शिवप्रिया शिवपरा शिष्टेष्टा शिष्टपूजिता ।
अप्रमेया स्वप्रकाशा मनोवाचामगोचरा ॥ ८९॥
चिच्छक्तिश् चेतनारूपा जडशक्तिर् जडात्मिका ।
गायत्री व्याहृतिः सन्ध्या द्विजवृन्द-निषेविता ॥ ९०॥
तत्त्वासना तत्त्वमयी पञ्च-कोशान्तर-स्थिता ।
निःसीम-महिमा नित्य-यौवना मदशालिनी ॥ ९१॥
मदघूर्णित-रक्ताक्षी मदपाटल-गण्डभूः ।
चन्दन-द्रव-दिग्धाङ्गी चाम्पेय-कुसुम-प्रिया ॥ ९२॥
कुशला कोमलाकारा कुरुकुल्ला कुलेश्वरी ।
कुलकुण्डालया कौल-मार्ग-तत्पर-सेविता ॥ ९३॥
कुमार-गणनाथाम्बा तुष्टिः पुष्टिर् मतिर् धृतिः ।
शान्तिः स्वस्तिमती कान्तिर् नन्दिनी विघ्ननाशिनी ॥ ९४॥
तेजोवती त्रिनयना लोलाक्षी-कामरूपिणी ।
मालिनी हंसिनी माता मलयाचल-वासिनी ॥ ९५॥
सुमुखी नलिनी सुभ्रूः शोभना सुरनायिका ।
कालकण्ठी कान्तिमती क्षोभिणी सूक्ष्मरूपिणी ॥ ९६॥
वज्रेश्वरी वामदेवी वयोऽवस्था-विवर्जिता ।
सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या सिद्धमाता यशस्विनी ॥ ९७॥
विशुद्धिचक्र-निलयाऽऽरक्तवर्णा त्रिलोचना ।
खट्वाङ्गादि-प्रहरणा वदनैक-समन्विता ॥ ९८॥
पायसान्नप्रिया त्वक्स्था पशुलोक-भयङ्करी ।
अमृतादि-महाशक्ति-संवृता डाकिनीश्वरी ॥ ९९॥
अनाहताब्ज-निलया श्यामाभा वदनद्वया ।
दंष्ट्रोज्ज्वलाऽक्ष-मालादि-धरा रुधिरसंस्थिता ॥ १००॥
कालरात्र्यादि-शक्त्यौघ-वृता स्निग्धौदनप्रिया ।
महावीरेन्द्र-वरदा राकिण्यम्बा-स्वरूपिणी ॥ १०१॥
मणिपूराब्ज-निलया वदनत्रय-संयुता ।
वज्रादिकायुधोपेता डामर्यादिभिरावृता ॥ १०२॥
रक्तवर्णा मांसनिष्ठा गुडान्न-प्रीत-मानसा ।
समस्तभक्त-सुखदा लाकिन्यम्बा-स्वरूपिणी ॥ १०३॥
स्वाधिष्ठानाम्बुज-गता चतुर्वक्त्र-मनोहरा ।
शूलाद्यायुध-सम्पन्ना पीतवर्णाऽतिगर्विता ॥ १०४॥
मेदोनिष्ठा मधुप्रीता बन्धिन्यादि-समन्विता ।
दध्यन्नासक्त-हृदया काकिनी-रूप-धारिणी ॥ १०५॥
मूलाधाराम्बुजारूढा पञ्च-वक्त्राऽस्थि-संस्थिता ।
अङ्कुशादि-प्रहरणा वरदादि-निषेविता ॥ १०६॥
मुद्गौदनासक्त-चित्ता साकिन्यम्बा-स्वरूपिणी ।
आज्ञा-चक्राब्ज-निलया शुक्लवर्णा षडानना ॥ १०७॥
मज्जासंस्था हंसवती-मुख्य-शक्ति-समन्विता ।
हरिद्रान्नैक-रसिका हाकिनी-रूप-धारिणी ॥ १०८॥
सहस्रदल-पद्मस्था सर्व-वर्णोप-शोभिता ।
सर्वायुधधरा शुक्ल-संस्थिता सर्वतोमुखी ॥ १०९॥
सर्वौदन-प्रीतचित्ता याकिन्यम्बा-स्वरूपिणी ।
स्वाहा स्वधाऽमतिर् मेधा श्रुतिः स्मृतिर् अनुत्तमा ॥ ११०॥
पुण्यकीर्तिः पुण्यलभ्या पुण्यश्रवण-कीर्तना ।
पुलोमजार्चिता बन्ध-मोचनी बन्धुरालका ॥ १११॥
विमर्शरूपिणी विद्या वियदादि-जगत्प्रसूः ।
सर्वव्याधि-प्रशमनी सर्वमृत्यु-निवारिणी ॥ ११२॥
अग्रगण्याऽचिन्त्यरूपा कलिकल्मष-नाशिनी ।
कात्यायनी कालहन्त्री कमलाक्ष-निषेविता ॥ ११३॥
ताम्बूल-पूरित-मुखी दाडिमी-कुसुम-प्रभा ।
मृगाक्षी मोहिनी मुख्या मृडानी मित्ररूपिणी ॥ ११४॥
नित्यतृप्ता भक्तनिधिर् नियन्त्री निखिलेश्वरी ।
मैत्र्यादि-वासनालभ्या महाप्रलय-साक्षिणी ॥ ११५॥
परा शक्तिः परा निष्ठा प्रज्ञानघन-रूपिणी ।
माध्वीपानालसा मत्ता मातृका-वर्ण-रूपिणी ॥ ११६॥
महाकैलास-निलया मृणाल-मृदु-दोर्लता ।
महनीया दयामूर्तिर् महासाम्राज्य-शालिनी ॥ ११७॥
आत्मविद्या महाविद्या श्रीविद्या कामसेविता ।
श्री-षोडशाक्षरी-विद्या त्रिकूटा कामकोटिका ॥ ११८॥
कटाक्ष-किङ्करी-भूत-कमला-कोटि-सेविता ।
शिरःस्थिता चन्द्रनिभा भालस्थेन्द्र-धनुःप्रभा ॥ ११९॥
हृदयस्था रविप्रख्या त्रिकोणान्तर-दीपिका ।
दाक्षायणी दैत्यहन्त्री दक्षयज्ञ-विनाशिनी ॥ १२०॥
दरान्दोलित-दीर्घाक्षी दर-हासोज्ज्वलन्-मुखी ।
गुरुमूर्तिर् गुणनिधिर् गोमाता गुहजन्मभूः ॥ १२१॥
देवेशी दण्डनीतिस्था दहराकाश-रूपिणी ।
प्रतिपन्मुख्य-राकान्त-तिथि-मण्डल-पूजिता ॥ १२२॥
कलात्मिका कलानाथा काव्यालाप-विनोदिनी ।
सचामर-रमा-वाणी-सव्य-दक्षिण-सेविता ॥ १२३॥
आदिशक्तिर् अमेयाऽऽत्मा परमा पावनाकृतिः ।
अनेककोटि-ब्रह्माण्ड-जननी दिव्यविग्रहा ॥ १२४॥
क्लींकारी केवला गुह्या कैवल्य-पददायिनी ।
त्रिपुरा त्रिजगद्वन्द्या त्रिमूर्तिस् त्रिदशेश्वरी ॥ १२५॥
त्र्यक्षरी दिव्य-गन्धाढ्या सिन्दूर-तिलकाञ्चिता ।
उमा शैलेन्द्रतनया गौरी गन्धर्व-सेविता ॥ १२६॥
विश्वगर्भा स्वर्णगर्भाऽवरदा वागधीश्वरी ।
ध्यानगम्याऽपरिच्छेद्या ज्ञानदा ज्ञानविग्रहा ॥ १२७॥
सर्ववेदान्त-संवेद्या सत्यानन्द-स्वरूपिणी ।
लोपामुद्रार्चिता लीला-कॢप्त-ब्रह्माण्ड-मण्डला ॥ १२८॥
अदृश्या दृश्यरहिता विज्ञात्री वेद्यवर्जिता ।
योगिनी योगदा योग्या योगानन्दा युगन्धरा ॥ १२९॥
इच्छाशक्ति-ज्ञानशक्ति-क्रियाशक्ति-स्वरूपिणी ।
सर्वाधारा सुप्रतिष्ठा सदसद्रूप-धारिणी ॥ १३०॥
अष्टमूर्तिर् अजाजैत्री लोकयात्रा-विधायिनी ।
एकाकिनी भूमरूपा निर्द्वैता द्वैतवर्जिता ॥ १३१॥
अन्नदा वसुदा वृद्धा ब्रह्मात्मैक्य-स्वरूपिणी ।
बृहती ब्राह्मणी ब्राह्मी ब्रह्मानन्दा बलिप्रिया ॥ १३२॥
भाषारूपा बृहत्सेना भावाभाव-विवर्जिता ।
सुखाराध्या शुभकरी शोभना सुलभा गतिः ॥ १३३॥
राज-राजेश्वरी राज्य-दायिनी राज्य-वल्लभा ।
राजत्कृपा राजपीठ-निवेशित-निजाश्रिता ॥ १३४॥
राज्यलक्ष्मीः कोशनाथा चतुरङ्ग-बलेश्वरी ।
साम्राज्य-दायिनी सत्यसन्धा सागरमेखला ॥ १३५॥
दीक्षिता दैत्यशमनी सर्वलोक-वशङ्करी ।
सर्वार्थदात्री सावित्री सच्चिदानन्द-रूपिणी ॥ १३६॥
देश-कालापरिच्छिन्ना सर्वगा सर्वमोहिनी ।
सरस्वती शास्त्रमयी गुहाम्बा गुह्यरूपिणी ॥ १३७॥
सर्वोपाधि-विनिर्मुक्ता सदाशिव-पतिव्रता ।
सम्प्रदायेश्वरी साध्वी गुरुमण्डल-रूपिणी ॥ १३८॥
कुलोत्तीर्णा भगाराध्या माया मधुमती मही ।
गणाम्बा गुह्यकाराध्या कोमलाङ्गी गुरुप्रिया ॥ १३९॥
स्वतन्त्रा सर्वतन्त्रेशी दक्षिणामूर्ति-रूपिणी ।
सनकादि-समाराध्या शिवज्ञान-प्रदायिनी ॥ १४०॥
चित्कलाऽऽनन्द-कलिका प्रेमरूपा प्रियङ्करी ।
नामपारायण-प्रीता नन्दिविद्या नटेश्वरी ॥ १४१॥
मिथ्या-जगदधिष्ठाना मुक्तिदा मुक्तिरूपिणी ।
लास्यप्रिया लयकरी लज्जा रम्भादिवन्दिता ॥ १४२॥
भवदाव-सुधावृष्टिः पापारण्य-दवानला ।
दौर्भाग्य-तूलवातूला जराध्वान्त-रविप्रभा ॥ १४३॥
भाग्याब्धि-चन्द्रिका भक्त-चित्तकेकि-घनाघना ।
रोगपर्वत-दम्भोलिर् मृत्युदारु-कुठारिका ॥ १४४॥
महेश्वरी महाकाली महाग्रासा महाशना ।
अपर्णा चण्डिका चण्डमुण्डासुर-निषूदिनी ॥ १४५॥
क्षराक्षरात्मिका सर्व-लोकेशी विश्वधारिणी ।
त्रिवर्गदात्री सुभगा त्र्यम्बका त्रिगुणात्मिका ॥ १४६॥
स्वर्गापवर्गदा शुद्धा जपापुष्प-निभाकृतिः ।
ओजोवती द्युतिधरा यज्ञरूपा प्रियव्रता ॥ १४७॥
दुराराध्या दुराधर्षा पाटली-कुसुम-प्रिया ।
महती मेरुनिलया मन्दार-कुसुम-प्रिया ॥ १४८॥
वीराराध्या विराड्रूपा विरजा विश्वतोमुखी ।
प्रत्यग्रूपा पराकाशा प्राणदा प्राणरूपिणी ॥ १४९॥
मार्ताण्ड-भैरवाराध्या मन्त्रिणीन्यस्त-राज्यधूः ।
त्रिपुरेशी जयत्सेना निस्त्रैगुण्या परापरा ॥ १५०॥
सत्य-ज्ञानानन्द-रूपा सामरस्य-परायणा ।
कपर्दिनी कलामाला कामधुक् कामरूपिणी ॥ १५१॥
कलानिधिः काव्यकला रसज्ञा रसशेवधिः ।
पुष्टा पुरातना पूज्या पुष्करा पुष्करेक्षणा ॥ १५२॥
परंज्योतिः परंधाम परमाणुः परात्परा ।
पाशहस्ता पाशहन्त्री परमन्त्र-विभेदिनी ॥ १५३॥
मूर्ताऽमूर्ताऽनित्यतृप्ता मुनिमानस-हंसिका ।
सत्यव्रता सत्यरूपा सर्वान्तर्यामिनी सती ॥ १५४॥
ब्रह्माणी ब्रह्मजननी बहुरूपा बुधार्चिता ।
प्रसवित्री प्रचण्डाऽऽज्ञा प्रतिष्ठा प्रकटाकृतिः ॥ १५५॥
प्राणेश्वरी प्राणदात्री पञ्चाशत्पीठ-रूपिणी ।
विशृङ्खला विविक्तस्था वीरमाता वियत्प्रसूः ॥ १५६॥
मुकुन्दा मुक्तिनिलया मूलविग्रह-रूपिणी ।
भावज्ञा भवरोगघ्नी भवचक्र-प्रवर्तिनी ॥ १५७॥
छन्दःसारा शास्त्रसारा मन्त्रसारा तलोदरी ।
उदारकीर्तिर् उद्दामवैभवा वर्णरूपिणी ॥ १५८॥
जन्ममृत्यु-जरातप्त-जनविश्रान्ति-दायिनी ।
सर्वोपनिष-दुद्-घुष्टा शान्त्यतीत-कलात्मिका ॥ १५९॥
गम्भीरा गगनान्तस्था गर्विता गानलोलुपा ।
कल्पना-रहिता काष्ठाऽकान्ता कान्तार्ध-विग्रहा ॥ १६०॥
कार्यकारण-निर्मुक्ता कामकेलि-तरङ्गिता ।
कनत्कनकता-टङ्का लीला-विग्रह-धारिणी ॥ १६१॥
अजा क्षयविनिर्मुक्ता मुग्धा क्षिप्र-प्रसादिनी ।
अन्तर्मुख-समाराध्या बहिर्मुख-सुदुर्लभा ॥ १६२॥
त्रयी त्रिवर्गनिलया त्रिस्था त्रिपुरमालिनी ।
निरामया निरालम्बा स्वात्मारामा सुधासृतिः ॥ १६३॥
संसारपङ्क-निर्मग्न-समुद्धरण-पण्डिता ।
यज्ञप्रिया यज्ञकर्त्री यजमान-स्वरूपिणी ॥ १६४॥
धर्माधारा धनाध्यक्षा धनधान्य-विवर्धिनी ।
विप्रप्रिया विप्ररूपा विश्वभ्रमण-कारिणी ॥ १६५॥
विश्वग्रासा विद्रुमाभा वैष्णवी विष्णुरूपिणी ।
अयोनिर् योनिनिलया कूटस्था कुलरूपिणी ॥ १६६॥
वीरगोष्ठीप्रिया वीरा नैष्कर्म्या नादरूपिणी ।
विज्ञानकलना कल्या विदग्धा बैन्दवासना ॥ १६७॥
तत्त्वाधिका तत्त्वमयी तत्त्वमर्थ-स्वरूपिणी ।
सामगानप्रिया सौम्या सदाशिव-कुटुम्बिनी ॥ १६८॥
सव्यापसव्य-मार्गस्था सर्वापद्विनिवारिणी ।
स्वस्था स्वभावमधुरा धीरा धीरसमर्चिता ॥ १६९॥
चैतन्यार्घ्य-समाराध्या चैतन्य-कुसुमप्रिया ।
सदोदिता सदातुष्टा तरुणादित्य-पाटला ॥ १७०॥
दक्षिणा-दक्षिणाराध्या दरस्मेर-मुखाम्बुजा ।
कौलिनी-केवलाऽनर्घ्य-कैवल्य-पददायिनी ॥ १७१॥
स्तोत्रप्रिया स्तुतिमती श्रुति-संस्तुत-वैभवा ।
मनस्विनी मानवती महेशी मङ्गलाकृतिः ॥ १७२॥
विश्वमाता जगद्धात्री विशालाक्षी विरागिणी ।
प्रगल्भा परमोदारा परामोदा मनोमयी ॥ १७३॥
व्योमकेशी विमानस्था वज्रिणी वामकेश्वरी ।
पञ्चयज्ञ-प्रिया पञ्च-प्रेत-मञ्चाधिशायिनी ॥ १७४॥
पञ्चमी पञ्चभूतेशी पञ्च-संख्योपचारिणी ।
शाश्वती शाश्वतैश्वर्या शर्मदा शम्भुमोहिनी ॥ १७५॥
धराधरसुता धन्या धर्मिणी धर्मवर्धिनी ।
लोकातीता गुणातीता सर्वातीता शमात्मिका ॥ १७६॥
बन्धूक-कुसुमप्रख्या बाला लीलाविनोदिनी ।
सुमङ्गली सुखकरी सुवेषाढ्या सुवासिनी ॥ १७७॥
सुवासिन्यर्चन-प्रीताऽऽशोभना शुद्धमानसा ।
बिन्दु-तर्पण-सन्तुष्टा पूर्वजा त्रिपुराम्बिका ॥ १७८॥
दशमुद्रा-समाराध्या त्रिपुराश्री-वशङ्करी ।
ज्ञानमुद्रा ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेय-स्वरूपिणी ॥ १७९॥
योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिगुणाम्बा त्रिकोणगा ।
अनघाऽद्भुत-चारित्रा वाञ्छितार्थ-प्रदायिनी ॥ १८०॥
अभ्यासातिशय-ज्ञाता षडध्वातीत-रूपिणी ।
अव्याज-करुणा-मूर्तिर् अज्ञान-ध्वान्त-दीपिका ॥ १८१॥
आबाल-गोप-विदिता सर्वानुल्लङ्घ्य-शासना ।
श्रीचक्रराज-निलया श्रीमत्-त्रिपुरसुन्दरी ॥ १८२॥
श्रीशिवा शिव-शक्त्यैक्य-रूपिणी ललिताम्बिका ।
एवं श्रीललिता देव्या नाम्नां साहस्रकं जगुः ॥
॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे उत्तरखण्डे श्रीहयग्रीवागस्त्यसंवादे
श्रीललिता सहस्रनाम स्तोत्र कथनं सम्पूर्णम् ॥
Annapurna Stotram Sanskrit
stotraShrijirasik
अन्नपूर्णास्तोत्रम्
नित्यानन्दकरी वराभयकरी निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रालेयाचलवंशपावनकरी सौन्दर्यरत्नाकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी।
काशीपुराधीश्वरी मातान्नपूर्णेश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी ॥ १ ॥
नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी मुक्ताहारविलम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी ।
काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिरे काशीपुराधीश्वरी ॥ भिक्षां देहि० ॥ २ ॥
योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरी चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी।
सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरी ॥ भिक्षां देहि० ॥ ३ ॥
कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करी कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओंकारबीजाक्षरी।
मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी॥ भिक्षां देहि० ॥ ४॥
दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी।
श्रीविश्वेशमनः प्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी ॥ भिक्षां देहि० ॥ ५॥
उर्वीसर्वजनेश्वरी भगवती मातान्नपूर्णेश्वरी वेणीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी।
सर्वानन्दकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी ॥ भिक्षां देहि० ॥ ६ ॥
आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी काश्मीरात्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी।
कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी ॥ भिक्षां देहि० ॥ ७॥
देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी वामं स्वादु पयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी।
भक्ताभीष्टकरी सदाशुभकरी काशीपुराधीश्वरी ॥ भिक्षां देहि० ॥ ८ ॥
चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी चन्द्रार्काग्निसमानकुन्तलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी।
मालापुस्तकपाशसाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी ॥ भिक्षां देहि० ॥ ९ ॥
क्षत्रत्राणकरी महाऽभवकरी माता कृपासागरी साक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरश्रीधरी ।
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी ॥ भिक्षां देहि० ॥ १० ॥
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे ।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥ ११ ॥
माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः ।
बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥ १२ ॥
॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ अन्नपूर्णास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
