॥ राधे राधे ॥

जटायु कृत श्रीरामस्तोत्रम्
जटायु कृत श्रीरामस्तोत्रम् अध्यात्म रामायण के अरण्य कांड के आठवें सर्ग में जटायु द्वारा की गयी भगवान श्री राम की स्तुति है। भगवान श्री राम का यह स्तोत्र सफलता प्रदान करने वाला, सुख-ऐश्वर्य प्रदान करने वाला तथा मोक्ष प्रदान करने वाला है।
अध्यात्म रामायण में यह प्रसंग इस प्रकार दिया गया है –
जब श्रीरघुनाथजी ने जटायु को कण्ठगतप्राण और अति दीन अवस्थामें देखा। तब वे आँखोंमें आँसू भरकर उसपर हाथ फेरते हुए (बोले—) “हे जटायो! कहो। मेरी सुमुखी भार्या सीताजीको कौन ले गया है? (अहो!) तुम मेरे कार्यके लिये मारे गये। अतः अवश्य ही तुम मेरे प्रिय बन्धु हो”॥
जटायुने रक्त वमन करते हुए लड़खड़ाती वाणी में कहा—“हे राम! महापराक्रमी राक्षसराज रावण मिथिलेशनन्दिनी सीताको दक्षिणकी ओर ले गया है और अधिक कहनेकी मुझमें शक्ति नहीं है। मैं अभी आपके सामने ही प्राण छोड़ना चाहता हूँ॥
हे राम! आज बड़े भाग्यसे मैंने मरते समय आपको देख पाया है। हे अनघ! आप मायामानवरूप साक्षात् परमात्मा विष्णु ही हैं॥ हे रघुश्रेष्ठ! वैसे तो अन्त समय आपका दर्शन करने से ही मैं मुक्त हो गया, तथापि आप मुझे अपने कर (कमलों)-से स्पर्श कीजिये। फिर मैं आपके परमपदको जाऊँगा”॥
तब रामचन्द्रजीने मुसकराते हुए ‘बहुत अच्छा’ कह उसका शरीर अपने करकमलोंसे छुआ। तदनन्तर जटायु प्राण छोड़कर पृथिवीपर गिर पड़ा॥ रामचन्द्रजीने नेत्रोंमें जल भरकर उसके लिये अपने स्वजनके समान शोक करते हुए लक्ष्मणसे लकड़ियाँ मँगावाकर उसका दाह-कर्म किया॥
श्रीरघुनाथजी बोले—
जटायो! तुम मेरे परमपदको जाओ और आज सबके देखते-देखते मेरा सारूप्य प्राप्त करो” तदनन्तर वह तुरंत ही सुन्दर दिव्य रूप धारण कर एक सूर्य-सदृश प्रकाशमान विमानपर आरूढ़ हुआ।
उस समय वह सुन्दर पीताम्बर धारण किये शंख, चक्र, गदा, पद्म और किरीट आदि श्रेष्ठ आभूषणोंके सहित अपने प्रकाशसे (सम्पूर्ण दिशाओंको) प्रकाशित कर रहा था। वैसे ही वेश-भूषावाले चार विष्णुपार्षद उसकी पूजा कर रहे थे तथा योगिगण उसकी स्तुति कर रहे थे।
तदनन्तर वह हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीको सम्बोधन कर उनकी स्तुति करने लगा॥
जटायुरुवाच
अगणितगुणमप्रमेयमाद्यं सकलजगत्स्थितिसंयमादिहेतुम् ।
उपरमपरं परात्मभूतं सततमहं प्रणतोऽस्मि रामचन्द्रम् ॥ १ ॥
भावार्थ :-
जटायु बोला—जो अगणित गुणशाली हैं, अप्रमेय हैं, जगत्के आदि-कारण हैं तथा उसकी स्थिति और लय आदिके हेतु हैं उन परम शान्तस्वरूप परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीकी मैं निरन्तर वन्दना करता हूँ ॥ १ ॥
निरवधिसुखमिन्दिराकटाक्षं क्षपितसुरेन्द्रचतुर्मुखादिदुःखम् ।
नरवरमनिशं नतोऽस्मि रामं वरदमहं वरचापबाणहस्तम् ॥ २ ॥
भावार्थ :-
जो असीम आनन्दमय और श्रीकमलादेवीके कटाक्षके आश्रय हैं तथा जो ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवगणोंका दुःख दूर करनेवाले हैं उन धनुष-बाणधारी वरदायक नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥
त्रिभुवनकमनीयरूपमीड्यं रविशतभासुरमीहितप्रदानम् ।
शरणदमनिशं सुरागमूले कृतनिलयं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥ ३ ॥
जो त्रिलोकीमें सबसे अधिक रूपवान् हैं, सबके स्तुत्य हैं, सैकड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी हैं तथा वाञ्छित फल देनेवाले हैं, उन शरणप्रद और रागाश्रित हृदयमें रहनेवाले श्रीरघुनाथजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ३ ॥
भवविपिनदवाग्निनामधेयं भवमुखदैवतदैवतं दयालुम् ।
दनुजपतिसहस्रकोटिनाशं रवितनयासदृशं हरिं प्रपद्ये ॥ ४ ॥
जिनका नाम संसाररूप वनके लिये दावानलके समान है, जो महादेव आदि देवताओंके भी पूज्य देव हैं तथा जो सहस्रों करोड़ दानवेन्द्रोंका दलन करनेवाले और श्रीयमुनाजीके समान श्यामवर्ण हैं उन दयामय श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४ ॥
अविरतभवभावनातिदूरं भवविमुखैर्मुनिभिः सदैव दृश्यम् ।
भवजलधिसुतारणाङ्घ्रिपोतं शरणमहं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥ ५ ॥
जो संसारमें निरन्तर वासना रखनेवालोंसे अत्यन्त दूर हैं और संसारसे उपराम मुनिजनोंके सदैव दृष्टिगोचर रहते हैं तथा जिनके चरणरूप पोत (जहाज) संसारसागरसे पार करनेवाले हैं उन रघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ५ ॥
गिरिशगिरिसुतामनोनिवासं गिरिवरधारिणमीहिताभिरामम् ।
सुरवरदनुजेन्द्रसेविताङ्घ्रिं सुरवरदं रघुनायकं प्रपद्ये ॥ ६ ॥
जो श्रीमहादेव और पार्वतीजीके मन-मन्दिरमें निवास करते हैं, जिनकी लीलाएँ अति मनोहारिणी हैं तथा देव और असुरपतिगण जिनके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं उन गिरिवरधारी सुखदायक रघुनायककी मैं शरण लेता हूँ ॥ ६ ॥
परधनपरदारवर्जितानां परगुणभूतिषु तुष्टमानसानाम् ।
परहितनिरतात्मनां सुसेव्यं रघुवरमम्बुजलोचनं प्रपद्ये ॥ ७ ॥
जो परधन और परस्त्रीसे सदा दूर रहते हैं तथा पराये गुण और परायी विभूतिको देखकर प्रसन्न होते हैं उन निरन्तर परोपकारपरायण महात्माओंसे सुसेवित कमलनयन श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ७ ॥
स्मितरुचिरविकासिताननाब्जमतिसुलभं सुरराजनीलनीलम् ।
सितजलरुहचारुनेत्रशोभं रघुपतिमीशगुरोर्गुरुं प्रपद्ये ॥ ८ ॥
जिनका मुखकमल मनोहर मुसकानसे विकसित हो रहा है, जो भक्तोंके लिये अति सुलभ हैं, जिनके शरीरकी कान्ति इन्द्रनीलमणिके समान सुन्दर नीलवर्ण है तथा जिनके मनोहर नेत्र श्वेत कमलकी-सी शोभावाले हैं उन श्रीगुरु महादेवजीके परम गुरु श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ८ ॥
हरिकमलजशम्भुरूपभेदात्त्वमिह विभासि गुणत्रयानुवृत्तः ।
रविरिव जलपूरितोदपात्रेष्वमरपतिस्तुतिपात्रमीशमीडे ॥ ९ ॥
हे प्रभो! जलसे भरे हुए पात्रोंमें जैसे एक ही सूर्य प्रतिबिम्बित होता है वैसे ही सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंकी वृत्तिके कारण आप ही विष्णु, ब्रह्मा और महादेवरूपसे भासित होते हैं। हे ईश! आप देवराज इन्द्रकी भी स्तुतिके पात्र हैं, मैं आपकी स्तुति करता हूँ ॥ ९ ॥
रतिपतिशतकोटिसुन्दराङ्गं शतपथगोचरभावनाविदूरम् ।
यतिपतिहृदये सदा विभातं रघुपतिमार्तिहरं प्रभुं प्रपद्ये ॥ १० ॥
आपका दिव्य शरीर सैकड़ों करोड़ कामदेवोंसे भी सुन्दर है, सैकड़ों मार्गोंमें फँसे हुए लोगोंसे आप अत्यन्त दूर हैं और यतीश्वरोंके हृदयमें आप सदा ही भासमान हैं। ऐसे आप आर्तिहर प्रभु रघुपतिकी मैं शरण लेता हूँ ॥ १० ॥
इत्येवं स्तुवतस्तस्य प्रसन्नोऽभूद्रघूत्तमः ।
उवाच गच्छ भद्रं ते मम विष्णोः परं पदम् ॥ ११ ॥
जटायुके इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीरघुनाथजी उसपर प्रसन्न होकर बोले
‘जटायो! तुम्हारा कल्याण हो, तुम मेरे परमधाम विष्णुलोकको जाओ’ ॥ ११ ॥
शृणोति य इदं स्तोत्रं लिखेद्वा नियतः पठेत् ।
स याति मम सारूप्यं मरणे मत्स्मृतिं लभेत् ॥ १२ ॥
जो पुरुष मेरे इस स्तोत्रको एकाग्रचित्तसे सुने, लिखे अथवा पढ़े वह मेरा सारूप्य-पद प्राप्त करता है और मरते समय उसे मेरा स्मरण होगा ॥ १२ ॥
इति राघवभाषितं तदा श्रुत्वान् हर्षसमाकुलो द्विजः ।
रघुनन्दनसाम्यमास्थितः प्रययौ ब्रह्मसुपूजितं पदम् ॥ १३ ॥
पक्षिराज जटायुने रघुनाथजीका यह कथन बड़े हर्षसे सुना और उन्हींके समान रूप धारणकर ब्रह्मा आदि लोकपालोंसे पूजित परमधामको चला गया ॥ १३ ॥
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