॥ राधाया दर्शनं पुण्यं कृष्णप्राप्तेः कारणम् ॥
Ram - स्तोत्र
देव स्तोत्र
स्तोत्र (4)
Shri Ram Pratah Smaran Stotra
stotraShrijirasik
श्री राम प्रातः स्मरण स्तोत्र
श्री राम प्रातः स्मरण स्तोत्र प्रातःकाल पढ़ा जाने वाला भगवान श्री राम का मन्त्र है, जिसे अगस्त्य ऋषि द्वारा लिखा गया है। इसमें भगवान श्रीराम के सुन्दर स्वरुप का वर्णन है।
प्रातः काल इसका पाठ करने से शरीर ऊर्जावान रहता है, तथा मन नहीं भटकता। प्रभु श्री राम की कृपा प्राप्ति हेतु इस स्तोत्र का पाठ सुबह उठकर भगवान का ध्यान करते हुए करें।
प्रातःस्मरामि रघुनाथमुखारविन्दं,
मन्दस्मितं मधुरभाषि विशालभालम्।
कर्णावलम्बिचलकुण्डलशोभिगण्डं,
कर्णान्तदीर्घनयनं नयनाभिरामम्॥१॥
भावार्थ –
जो मधुर मुस्कानयुक्त, मधुर भाषी, और विशाल भाल से सुशोभित हैं, कानों मे लटके हुए चंचल कुण्डलों से जिनके दोनों कपोल शोभित हो रहे हैं । तथा जो कर्णपर्यंत विस्तृत बड़े बड़े नेत्रों से शोभायमान और हमारे नेत्रों को आनंद देने वाले हैं । श्री रघुनाथ जी के ऐसे मुखारविंद का मैं प्रातः काल स्मरण करता हूँ ।
प्रातर्भजामि रघुनाथकरारविन्दं
रक्षोगणाय भयदं वरदं निजेभ्यः।
यद्राजसंसदि विभज्य महेशचापं
सीताकरग्रहणमङ्गलमाप सद्यः ॥२॥
मैं प्रातः काल श्री रघुनाथ जी के करकमलों का स्मरण करता हूँ, जो राक्षसों को भए देने वाले और भक्तों को वर देने वाले हैं तथा जिन्होंने राजसभा मे भगवान शंकर का धनुष तोड़कर शीघ्र ही भगवती सीता का मंगलमय पाणिग्रहण किया था ।।
प्रातर्नमामि रघुनाथपदाररविन्दं
वज्राङ्कुशादिशुभरेखि सुखावहं मे।
योगीन्द्रमानसमधुव्रतसेव्यमानं
शापापहं सपदि गौतमधर्मपत्न्याः ॥३॥
मैं प्रातः काल श्री रघुनाथ जी के चरण कमलों को नमस्कार करता हूँ जो वज्र, अंकुश आदि शुभ रेखाओं से युक्त, मेरे लिए सुखदाई, योगियों के मन मधुप द्वारा सेवित तथा गौतम पत्नी अहल्या के शाप को दूर करने वाले हैं ।
प्रातर्वदामि वचसा रघुनाथनाम
वाग्दोषहारि सकलं शमलं निहन्ति।
यत्पार्वती स्वपतिना सह भोक्तुकामा
प्रीत्या सहस्रहरिनामसमं जजाप ॥४॥
मैं प्रातः काल अपनी वाणी से श्री रामचंद्र जी के नाम का जप करता हूँ , जो वाणी के दोषों को नाश करने वाला और सभी पापों को हरने वाला है । तथा जिसे पार्वती जी ने अपने पति भगवान शंकर के साथ भोजन करने कि इच्छा से, भगवान के सहस्त्रनाम के सदृश प्रेमपूर्वक जपा था ।
प्रातः श्रये श्रुतिनुतां रघुनाथमूर्तिं
नीलाम्बुजोत्पलसितेतररत्ननीलाम्।
आमुक्तमौक्तिकविशेषविभूषणाढ्यां
ध्येयां समस्तमुनिभिर्जनमुक्तिहेतुम् ॥५॥
मैं प्रातः काल रघुनाथजी की वेदवंदित मूर्ति का आश्रय लेता हूँ, जो नीलकमल और नीलमणि के समान नीलवर्ण , लटकते हुए मोतियों की माला से विभूषित, समस्त मुनियों की ध्येय, तथा भक्तों को मोक्ष प्रदान करने वाली है ।
यः श्लोकपञ्चकमिदं प्रयतः पठेद्धि
नित्यं प्रभातसमये पुरुषः प्रबुद्धः ।
श्रीरामकिङ्करजनेषु स एव मुख्यो
भूत्वा प्रयाति हरिलोकमनन्यलभ्यम्॥६॥
जो पुरुष प्रातःकाल नींद से जागकर जितेंद्रियभाव से इन पांचों श्लोकों का नित्य पाठ करता है, वह श्री राम जी के सेवकों मे मुख्य होकर श्री हरि के लोक को, जो दूसरों के लिए दुर्लभ है, प्राप्त होता है ।
Shri Ram Shatanama Stotra
stotraShrijirasik
श्रीराम शतनाम स्तोत्र
शम्भुरुवाच :
राघवं करुणाकरं भवनाशनं दुरितापहम् ।
माधवं खगगामिनं जलरूपिणं परमेश्वरम् ॥
पालकं जनतारकं भवहारकं रिपुमारकम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
भूधवं वनमालिनं घनरूपिणं धरणीधरम् ।
श्रीहरिं त्रिगुणात्मकं तुलसीधवं मधुरस्वरम् ॥
श्रीकरं शरणप्रदं मधुमारकं व्रजपालकम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
विट्ठलं मथुरास्थितं रजकान्तकं गजमारकम् ।
सस्तुतं बकमारकं वृषघातकं तुरगार्दनम् ॥
नन्दजं वसुदेवजं बलियज्ञगं सुरपालकम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
केशवं कपिवेष्टितं कपिमारकं मृगमर्दनम् ।
सुन्दरं द्विजपालकं दितिजादनं दनुजार्दनम् ॥
बालकं खरमर्दनं ऋषिप्रपूजितं मुनिचिन्तितम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
शंकरं जलशायिनं कुशबालकं रथवाहनम् ।
सरयूनतं प्रियपुष्पकं प्रियभूसुरं लवबालकम् ॥
श्रीधरं मधुसूदनं भरताग्रजं गरुडध्वजम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
गोप्रियं गुरुपुत्रदं वदतां वरं करुणानिधिम् ।
भक्तपं जनतोषदं सुरपूजितं श्रुतिभिः स्तुतम् ॥
भुक्तिदं जनमुक्तिदं जनरञ्जनं नृपनन्दनम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
चिह्नदं चिरजीविनं मणिमालिनं वरदोन्मुखम् ।
श्रीधरं धृतिदायकं बलवर्धनं गतिदायकम् ॥
शान्तिदं जनतारकं शरधारिणं गजगामिनम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
शार्ङ्गिणं कमलाननं कमलादृशं पदपङ्कजम् ।
श्यामलम् रविभासुरं शशिसौख्यदं करुणार्णवम् ॥
सत्पतिं नृपपालकं नृपवन्दितं नृपतिप्रियम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
निर्गुणं सगुणात्मकं नृपमण्डनं मतिवर्धनम् ।
अच्युतं पुरुषोत्तमं परमेष्ठिनं स्मितभाषिणम् ॥
ईश्वरं हनुमच्छ्रुतं कमलाधिपं जनसाक्षिणम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
ईश्वरोदितमेतदुत्तममादराच्छतनामकम ।
यः पठेद् भुवि मानवस्तव भक्तिमांस्तपनोदये ॥
त्वत्पदं निजबन्धुदारसुतैर्यतैर्यश्चिरमेत्य नः ।
सोऽस्तु ते पदसेवने बहुतत्परो मम वाक्यतः ॥
(आनन्दरामायण, पूर्णकाण्ड ६।३२—५१)
श्रीराम शतनाम स्तोत्र का अर्थ:-
श्रीशिवजी कहते हैं—
जो रघुवंशमें उत्पन्न, करुणाकी खान, आवागमनके विनाशक, पापापहारी, लक्ष्मीके पति, पक्षिराज गरुडपर सवार होनेवाले, जलरूपमें स्थित, परमेश्वर (जगत्के) पालक, भक्तजनोंका उद्धार करनेवाले, भव-बाधाके नाशक, शत्रुओंका संहार करनेवाले, नररूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो पृथिवीके पति, वनमाला-धारी, नील मेघ-सदृश श्यामकाय, पृथिवीको धारण करनेवाले, श्रीहरि, सत्त्व, रजस्, तमस्— इन तीनों गुणोंसे समन्वित, तुलसीके पति, मधुर स्वरसे सम्पन्न, शोभाका विस्तार करनेवाले, शरणदाता, मधु नामक दैत्यका वध करनेवाले, व्रजके रक्षक, नररूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो विट्ठलरूपसे मथुरामें स्थित, रजकके संहारक, गजको मारनेवाले, सत्पुरुषोंद्वारा संस्तुत, बकासुर, वृषासुर और अश्वरूपी केशी नामक राक्षसका वध करनेवाले, नन्दकुमार, वसुदेवके पुत्र, बलिके यज्ञमें गमन करनेवाले, देवताओंके रक्षक, मानवरूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो केशव, वानरोंद्वारा आवेष्टित, (वाली नामक) वानरका वध करनेवाले, मृगरूपी राक्षस मारीचके संहारक, शोभाशाली, ब्राह्मणोंके रक्षक, दैत्यों और दानवोंके वधकर्ता, बालरूपधारी, खर नामक राक्षसका वध करनेवाले, ऋषियोंद्वारा पूजित, मुनियोंद्वारा चिन्तित, नररूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो कल्याणकारी तथा जलमें शयन करनेवाले हैं, कुश जिनके बालक (पुत्र) हैं, रथ जिनका वाहन है, जो सरयूद्वारा नमस्कृत, पुष्पक विमानके प्रेमी और ब्राह्मणोंको प्रिय हैं, लव जिनका बालक (पुत्र) है, जो (वक्षःस्थलपर) लक्ष्मीको धारण करनेवाले, मधु नामक राक्षसके संहारक और भरतके ज्येष्ठ भ्राता हैं, जिनकी ध्वजापर गरुडका चिह्न वर्तमान रहता है, जो मानवरूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो गौओंके प्रेमी, यमलोकसे गुरुपुत्रको लाकर गुरुको प्रदान करनेवाले, वक्ताओंमें श्रेष्ठ, दयानिधान, भक्तोंके रक्षक, स्वजनोंके लिये सन्तोषदाता, देवताओंद्वारा पूजित, श्रुतियोंद्वारा संस्तुत, भोगदाता, स्वजनोंके लिये मुक्तिदायक, जनताको प्रसन्न करनेवाले, राजकुमार, मनुष्यरूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो चिद्धनस्वरूप, चिरजीवी, मणियोंकी माला धारण करनेवाले, वर प्रदान करनेके लिये उद्यत, सौन्दर्यशाली, धैर्य प्रदान करनेवाले, बलवर्धक, मोक्षदाता, शान्तिदायक, भक्तोंको तारनेवाले, बाणधारी, हाथीकी-सी चालसे चलनेवाले (अथवा हाथीकी सवारी करनेवाले), नररूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले हैं; जिनके चरण और मुख कमल-सरीखे हैं, जो लक्ष्मीकी ओर निहारते रहते हैं, जिनके शरीरका रंग श्याम है, जो सूर्यके समान देदीप्यमान, चन्द्रमा-सरीखे सुखदाता, दयासागर, श्रेष्ठ स्वामी, राजाओंके रक्षक, राजाओंद्वारा वन्दित, राजाओंके लिये प्रिय, मानवरूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो निर्गुण एवं सगुणस्वरूप, राजाओंमें भूषणरूप, बुद्धिवर्धक, अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले, पुरुषोंमें श्रेष्ठ, ब्रह्मस्वरूप, मुसकराते हुए बोलनेवाले, ऐश्वर्यशाली, हनुमान्द्वारा संस्तुत, लक्ष्मीके अधीश्वर, लोकसाक्षी, नररूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो मनुष्य भूतलपर सूर्योदयकालमें शिवजीद्वारा कथित इस उत्तम शतनाम नामक स्तोत्रका आदरपूर्वक पाठ करेगा, उसकी आपके चरणोंमें भक्ति हो जायगी तथा वह मेरे कथनानुसार अपने बन्धु, स्त्री और पुत्रोंके साथ मेरे लोकमें आकर चिरकालतक आपके चरणोंकी सेवामें दृढ़तापूर्वक तत्पर हो जायगा।
Jatayu Krit Shri Ram Stotram
stotraजटायु कृत श्रीरामस्तोत्रम्
जटायु कृत श्रीरामस्तोत्रम् अध्यात्म रामायण के अरण्य कांड के आठवें सर्ग में जटायु द्वारा की गयी भगवान श्री राम की स्तुति है। भगवान श्री राम का यह स्तोत्र सफलता प्रदान करने वाला, सुख-ऐश्वर्य प्रदान करने वाला तथा मोक्ष प्रदान करने वाला है।
अध्यात्म रामायण में यह प्रसंग इस प्रकार दिया गया है –
जब श्रीरघुनाथजी ने जटायु को कण्ठगतप्राण और अति दीन अवस्थामें देखा। तब वे आँखोंमें आँसू भरकर उसपर हाथ फेरते हुए (बोले—) “हे जटायो! कहो। मेरी सुमुखी भार्या सीताजीको कौन ले गया है? (अहो!) तुम मेरे कार्यके लिये मारे गये। अतः अवश्य ही तुम मेरे प्रिय बन्धु हो”॥
जटायुने रक्त वमन करते हुए लड़खड़ाती वाणी में कहा—“हे राम! महापराक्रमी राक्षसराज रावण मिथिलेशनन्दिनी सीताको दक्षिणकी ओर ले गया है और अधिक कहनेकी मुझमें शक्ति नहीं है। मैं अभी आपके सामने ही प्राण छोड़ना चाहता हूँ॥
हे राम! आज बड़े भाग्यसे मैंने मरते समय आपको देख पाया है। हे अनघ! आप मायामानवरूप साक्षात् परमात्मा विष्णु ही हैं॥ हे रघुश्रेष्ठ! वैसे तो अन्त समय आपका दर्शन करने से ही मैं मुक्त हो गया, तथापि आप मुझे अपने कर (कमलों)-से स्पर्श कीजिये। फिर मैं आपके परमपदको जाऊँगा”॥
तब रामचन्द्रजीने मुसकराते हुए ‘बहुत अच्छा’ कह उसका शरीर अपने करकमलोंसे छुआ। तदनन्तर जटायु प्राण छोड़कर पृथिवीपर गिर पड़ा॥ रामचन्द्रजीने नेत्रोंमें जल भरकर उसके लिये अपने स्वजनके समान शोक करते हुए लक्ष्मणसे लकड़ियाँ मँगावाकर उसका दाह-कर्म किया॥
श्रीरघुनाथजी बोले—
जटायो! तुम मेरे परमपदको जाओ और आज सबके देखते-देखते मेरा सारूप्य प्राप्त करो” तदनन्तर वह तुरंत ही सुन्दर दिव्य रूप धारण कर एक सूर्य-सदृश प्रकाशमान विमानपर आरूढ़ हुआ।
उस समय वह सुन्दर पीताम्बर धारण किये शंख, चक्र, गदा, पद्म और किरीट आदि श्रेष्ठ आभूषणोंके सहित अपने प्रकाशसे (सम्पूर्ण दिशाओंको) प्रकाशित कर रहा था। वैसे ही वेश-भूषावाले चार विष्णुपार्षद उसकी पूजा कर रहे थे तथा योगिगण उसकी स्तुति कर रहे थे।
तदनन्तर वह हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीको सम्बोधन कर उनकी स्तुति करने लगा॥
जटायुरुवाच
अगणितगुणमप्रमेयमाद्यं सकलजगत्स्थितिसंयमादिहेतुम् ।
उपरमपरं परात्मभूतं सततमहं प्रणतोऽस्मि रामचन्द्रम् ॥ १ ॥
भावार्थ :-
जटायु बोला—जो अगणित गुणशाली हैं, अप्रमेय हैं, जगत्के आदि-कारण हैं तथा उसकी स्थिति और लय आदिके हेतु हैं उन परम शान्तस्वरूप परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीकी मैं निरन्तर वन्दना करता हूँ ॥ १ ॥
निरवधिसुखमिन्दिराकटाक्षं क्षपितसुरेन्द्रचतुर्मुखादिदुःखम् ।
नरवरमनिशं नतोऽस्मि रामं वरदमहं वरचापबाणहस्तम् ॥ २ ॥
भावार्थ :-
जो असीम आनन्दमय और श्रीकमलादेवीके कटाक्षके आश्रय हैं तथा जो ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवगणोंका दुःख दूर करनेवाले हैं उन धनुष-बाणधारी वरदायक नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥
त्रिभुवनकमनीयरूपमीड्यं रविशतभासुरमीहितप्रदानम् ।
शरणदमनिशं सुरागमूले कृतनिलयं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥ ३ ॥
जो त्रिलोकीमें सबसे अधिक रूपवान् हैं, सबके स्तुत्य हैं, सैकड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी हैं तथा वाञ्छित फल देनेवाले हैं, उन शरणप्रद और रागाश्रित हृदयमें रहनेवाले श्रीरघुनाथजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ३ ॥
भवविपिनदवाग्निनामधेयं भवमुखदैवतदैवतं दयालुम् ।
दनुजपतिसहस्रकोटिनाशं रवितनयासदृशं हरिं प्रपद्ये ॥ ४ ॥
जिनका नाम संसाररूप वनके लिये दावानलके समान है, जो महादेव आदि देवताओंके भी पूज्य देव हैं तथा जो सहस्रों करोड़ दानवेन्द्रोंका दलन करनेवाले और श्रीयमुनाजीके समान श्यामवर्ण हैं उन दयामय श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४ ॥
अविरतभवभावनातिदूरं भवविमुखैर्मुनिभिः सदैव दृश्यम् ।
भवजलधिसुतारणाङ्घ्रिपोतं शरणमहं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥ ५ ॥
जो संसारमें निरन्तर वासना रखनेवालोंसे अत्यन्त दूर हैं और संसारसे उपराम मुनिजनोंके सदैव दृष्टिगोचर रहते हैं तथा जिनके चरणरूप पोत (जहाज) संसारसागरसे पार करनेवाले हैं उन रघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ५ ॥
गिरिशगिरिसुतामनोनिवासं गिरिवरधारिणमीहिताभिरामम् ।
सुरवरदनुजेन्द्रसेविताङ्घ्रिं सुरवरदं रघुनायकं प्रपद्ये ॥ ६ ॥
जो श्रीमहादेव और पार्वतीजीके मन-मन्दिरमें निवास करते हैं, जिनकी लीलाएँ अति मनोहारिणी हैं तथा देव और असुरपतिगण जिनके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं उन गिरिवरधारी सुखदायक रघुनायककी मैं शरण लेता हूँ ॥ ६ ॥
परधनपरदारवर्जितानां परगुणभूतिषु तुष्टमानसानाम् ।
परहितनिरतात्मनां सुसेव्यं रघुवरमम्बुजलोचनं प्रपद्ये ॥ ७ ॥
जो परधन और परस्त्रीसे सदा दूर रहते हैं तथा पराये गुण और परायी विभूतिको देखकर प्रसन्न होते हैं उन निरन्तर परोपकारपरायण महात्माओंसे सुसेवित कमलनयन श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ७ ॥
स्मितरुचिरविकासिताननाब्जमतिसुलभं सुरराजनीलनीलम् ।
सितजलरुहचारुनेत्रशोभं रघुपतिमीशगुरोर्गुरुं प्रपद्ये ॥ ८ ॥
जिनका मुखकमल मनोहर मुसकानसे विकसित हो रहा है, जो भक्तोंके लिये अति सुलभ हैं, जिनके शरीरकी कान्ति इन्द्रनीलमणिके समान सुन्दर नीलवर्ण है तथा जिनके मनोहर नेत्र श्वेत कमलकी-सी शोभावाले हैं उन श्रीगुरु महादेवजीके परम गुरु श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ८ ॥
हरिकमलजशम्भुरूपभेदात्त्वमिह विभासि गुणत्रयानुवृत्तः ।
रविरिव जलपूरितोदपात्रेष्वमरपतिस्तुतिपात्रमीशमीडे ॥ ९ ॥
हे प्रभो! जलसे भरे हुए पात्रोंमें जैसे एक ही सूर्य प्रतिबिम्बित होता है वैसे ही सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंकी वृत्तिके कारण आप ही विष्णु, ब्रह्मा और महादेवरूपसे भासित होते हैं। हे ईश! आप देवराज इन्द्रकी भी स्तुतिके पात्र हैं, मैं आपकी स्तुति करता हूँ ॥ ९ ॥
रतिपतिशतकोटिसुन्दराङ्गं शतपथगोचरभावनाविदूरम् ।
यतिपतिहृदये सदा विभातं रघुपतिमार्तिहरं प्रभुं प्रपद्ये ॥ १० ॥
आपका दिव्य शरीर सैकड़ों करोड़ कामदेवोंसे भी सुन्दर है, सैकड़ों मार्गोंमें फँसे हुए लोगोंसे आप अत्यन्त दूर हैं और यतीश्वरोंके हृदयमें आप सदा ही भासमान हैं। ऐसे आप आर्तिहर प्रभु रघुपतिकी मैं शरण लेता हूँ ॥ १० ॥
इत्येवं स्तुवतस्तस्य प्रसन्नोऽभूद्रघूत्तमः ।
उवाच गच्छ भद्रं ते मम विष्णोः परं पदम् ॥ ११ ॥
जटायुके इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीरघुनाथजी उसपर प्रसन्न होकर बोले
‘जटायो! तुम्हारा कल्याण हो, तुम मेरे परमधाम विष्णुलोकको जाओ’ ॥ ११ ॥
शृणोति य इदं स्तोत्रं लिखेद्वा नियतः पठेत् ।
स याति मम सारूप्यं मरणे मत्स्मृतिं लभेत् ॥ १२ ॥
जो पुरुष मेरे इस स्तोत्रको एकाग्रचित्तसे सुने, लिखे अथवा पढ़े वह मेरा सारूप्य-पद प्राप्त करता है और मरते समय उसे मेरा स्मरण होगा ॥ १२ ॥
इति राघवभाषितं तदा श्रुत्वान् हर्षसमाकुलो द्विजः ।
रघुनन्दनसाम्यमास्थितः प्रययौ ब्रह्मसुपूजितं पदम् ॥ १३ ॥
पक्षिराज जटायुने रघुनाथजीका यह कथन बड़े हर्षसे सुना और उन्हींके समान रूप धारणकर ब्रह्मा आदि लोकपालोंसे पूजित परमधामको चला गया ॥ १३ ॥
Shri Ramraksha Stotram
stotraShrijirasik
श्रीरामरक्षास्तोत्रम् ॥
॥ श्रीगणेशायनम: ॥
॥ विनियोग ॥
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य। बुधकौशिक ऋषि:। श्रीसीतारामचंद्रोदेवता। अनुष्टुप् छन्द:। सीता शक्ति:। श्रीमद्हनुमान् कीलकम्। श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥
अर्थ: — इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्रके रचयिता बुधकौशिक ऋषि हैं, सीता और रामचंद्र देवता हैं, अनुष्टुप छंद हैं, सीता शक्ति हैं, हनुमानजी कीलक है तथा श्रीरामचंद्रजीकी प्रसन्नताके लिए राम रक्षा स्तोत्रके जपमें विनियोग किया जाता हैं।
॥ अथ ध्यानम् ॥
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं।
पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ॥
वामांकारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं।
नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचंद्रम् ॥
ध्यान धरिए — जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं, बद्ध पद्मासनकी मुद्रामें विराजमान हैं और पीतांबर पहने हुए हैं, जिनके आलोकित नेत्र नए कमल दलके समान स्पर्धा करते हैं, जो बायें ओर स्थित सीताजीके मुख कमलसे मिले हुए हैं- उन आजानु बाहु, मेघश्याम, विभिन्न अलंकारोंसे विभूषित तथा जटाधारी श्रीरामका ध्यान करें।
॥ स्तोत्रम॥
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥१॥
श्री रघुनाथजीका चरित्र सौ कोटि विस्तारवाला हैं। उसका एक-एक अक्षर महापातकोंको नष्ट करनेवाला है।
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥२॥
नीले कमलके श्याम वर्णवाले, कमलनेत्रवाले , जटाओंके मुकुटसे सुशोभित, जानकी तथा लक्ष्मण सहित ऐसे भगवान् श्रीरामका स्मरण कर,
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥३॥
जो अजन्मा एवं सर्वव्यापक, हाथोंमें खड्ग, तुणीर, धनुष-बाण धारण किए राक्षसोंके संहार तथा अपनी लीलाओंसे जगत रक्षा हेतु अवतीर्ण श्रीरामका स्मरण कर,
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्।
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥
मैं सर्वकामप्रद और पापोंको नष्ट करनेवाले राम रक्षा स्तोत्रका पाठ करता हूं । राघव मेरे सिरकी और दशरथके पुत्र मेरे ललाटकी रक्षा करें।
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥
कौशल्या नंदन मेरे नेत्रोंकी, विश्वामित्रके प्रिय मेरे कानोंकी, यज्ञरक्षक मेरे घ्राणकी और सुमित्राके वत्सल मेरे मुखकी रक्षा करें।
जिह्वां विद्यानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित:।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥
विद्यानिधि मेरी जिह्वाकी रक्षा करें, कंठकी भरत-वंदित, कंधोंकी दिव्यायुध और भुजाओंकी महादेवजीका धनुष तोडनेवाले भगवान् श्रीराम रक्षा करें।
करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥
मेरे हाथोंकी सीता पति श्रीराम रक्षा करें, हृदयकी जमदग्नि ऋषिके पुत्रको (परशुराम) जीतनेवाले, मध्य भागकी खरके (नामक राक्षस) वधकर्ता और नाभिकी जांबवानके आश्रयदाता रक्षा करें।
सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु:।
ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत् ॥८॥
मेरे कमरकी सुग्रीवके स्वामी, हडियोंकी हनुमानके प्रभु और रानोंकी राक्षस कुलका विनाश करनेवाले रघुकुलश्रेष्ठ रक्षा करें।
जानुनी सेतुकृत्पातु जंघे दशमुखान्तक:।
पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोऽखिलं वपु: ॥९॥
मेरे जानुओंकी सेतुकृत, जंघाओकी दशानन वधकर्ता, चरणोंकी विभीषणको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले और सम्पूर्ण शरीरकी श्रीराम रक्षा करें।
एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठेत्।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥१०॥
शुभ कार्य करनेवाला जो भक्त भक्ति एवं श्रद्धाके साथ रामबलसे संयुक्त होकर इस स्तोत्रका पाठ करता हैं, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनयशील हो जाता हैं।
पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्मचारिण:।
न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥
जो जीव पाताल, पृथ्वी और आकाशमें विचरते रहते हैं अथवा छद्दम वेशमें घूमते रहते हैं , वे राम नामोंसे सुरक्षित मनुष्यको देख भी नहीं पाते ।
रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्।
नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥
राम, रामभद्र तथा रामचंद्र आदि नामोंका स्मरण करनेवाला रामभक्त पापों से लिप्त नहीं होता, इतना ही नहीं, वह अवश्य ही भोग और मोक्ष दोनोंको प्राप्त करता है।
जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्धय: ॥१३॥
जो संसारपर विजय करनेवाले मंत्र राम-नाम से सुरक्षित इस स्तोत्र को कंठस्थ कर लेता हैं, उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं।
वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥१४॥
जो मनुष्य वज्रपंजर नामक इस राम कवचका स्मरण करता हैं, उसकी आज्ञाका कहीं भी उल्लंघन नहीं होता तथा उसे सदैव विजय और मंगलकी ही प्राप्ति होती हैं।
आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर:।
तथा लिखितवान् प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥
भगवान् शंकरने स्वप्नमें इस रामरक्षा स्तोत्रका आदेश बुध कौशिक ऋषिको दिया था, उन्होंने प्रातः काल जागनेपर उसे वैसा ही लिख दिया।
आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान् स न: प्रभु: ॥१६॥
जो कल्प वृक्षोंके बागके समान विश्राम देने वाले हैं, जो समस्त विपत्तियोंको दूर करनेवाले हैं और जो तीनो लोकों में सुंदर हैं, वही श्रीमान राम हमारे प्रभु हैं।
तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥
जो युवा, सुन्दर, सुकुमार, महाबली और कमलके (पुण्डरीक) समान विशाल नेत्रों वाले हैं, मुनियोंकी समान वस्त्र एवं काले मृगका चर्म धारण करते हैं।
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥
जो फल और कंदका आहार ग्रहण करते हैं, जो संयमी , तपस्वी एवं ब्रह्रमचारी हैं , वे दशरथके पुत्र राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें।
शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्।
रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥१९॥
ऐसे महाबली – रघुश्रेष्ठ मर्यादा पुरूषोतम समस्त प्राणियोंके शरणदाता, सभी धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ और राक्षसोंके कुलोंका समूल नाश करनेमें समर्थ हमारा रक्षण करें।
आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षयाशुगनिषंग सङ्गिनौ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रत: पथि सदैव गच्छताम् ॥२०॥
संघान किए धनुष धारण किए, बाणका स्पर्श कर रहे, अक्षय बाणोसे युक्त तुणीर लिए हुए राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करनेके लिए मेरे आगे चलें ।
संनद्ध: कवची खड्गी चापबाणधरो युवा।
गच्छन्मनोरथोऽस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥
हमेशा तत्पर, कवचधारी, हाथमें खडग, धनुष-बाण तथा युवावस्थावाले भगवान् राम लक्ष्मण सहित आगे-आगे चलकर हमारी रक्षा करें।
रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघूत्तम: ॥२२॥
भगवानका कथन है कि श्रीराम, दाशरथी, शूर, लक्ष्मनाचुर, बली, काकुत्स्थ , पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघुतम,
वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम:।
जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥
वेदान्त्वेघ, यज्ञेश, पुराण पुरूषोतम , जानकी वल्लभ, श्रीमान और अप्रमेय पराक्रम आदि नामों का
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्भक्त: श्रद्धयान्वित:।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥
नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक जप करनेवालेको निश्चित रूपसे अश्वमेध यज्ञसे भी अधिक फल प्राप्त होता हैं।
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥
दूर्वादलके समान श्याम वर्ण, कमल-नयन एवं पीतांबरधारी श्रीरामकी उपरोक्त दिव्य नामोंसे स्तुति करनेवाला संसारचक्रमें नहीं पड़ता ।
रामं लक्ष्मण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्।
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥२६॥
लक्ष्मण जीके पूर्वज , सीताजीके पति, काकुत्स्थ, कुल-नंदन, करुणाके सागर , गुण-निधान , विप्र भक्त, परम धार्मिक , राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथके पुत्र, श्याम और शांत मूर्ति, सम्पूर्ण लोकोंमें सुन्दर, रघुकुल तिलक , राघव एवं रावणके शत्रु भगवान् रामकी मैं वंदना करता हूं ।
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे।
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥
राम, रामभद्र, रामचंद्र, विधात स्वरूप , रघुनाथ, प्रभु एवं सीताजीके स्वामीकी मैं वंदना करता हूं ।
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥
हे रघुनन्दन श्रीराम ! हे भरतके अग्रज भगवान् राम! हे रणधीर, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ! आप मुझे शरण दीजिए ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥
मैं एकाग्र मनसे श्रीरामचंद्रजीके चरणोंका स्मरण और वाणीसे गुणगान करता हूं, वाणी द्धारा और पूरी श्रद्धाके साथ भगवान् रामचन्द्रके चरणोंको प्रणाम करता हुआ मैं उनके चरणोंकी शरण लेता हूँ।
माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र:।
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र:।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर् ।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥
श्रीराम मेरे माता, मेरे पिता , मेरे स्वामी और मेरे सखा हैं। इस प्रकार दयालु श्रीराम मेरे सर्वस्व हैं, उनके सिवा मैं किसी दूसरे को नहीं जानता ।
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम् ॥३१॥
जिनके दाईं और लक्ष्मणजी, बाईं और जानकीजी और सामने हनुमान ही विराजमान हैं, मैं उन्ही रघुनाथजीकी वंदना करता हूं ।
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥
मैं सम्पूर्ण लोकोंमें सुन्दर तथा रणक्रीडामें धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणाकी मूर्ति और करुणाके भण्डार रुपी श्रीरामकी शरण में हूँ ।
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥
जिनकी गति मनके समान और वेग वायुके समान (अत्यंत तेज) है, जो परम जितेन्द्रिय एवं बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं, मैं उन पवन-नंदन वानारग्रगण्य श्रीराम दूतकी शरण लेता हूं ।
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥३४॥
मैं कवितामयी डालीपर बैठकर, मधुर अक्षरोंवाले ‘राम-राम’ के मधुर नामको कूजते हुए वाल्मीकि रुपी कोयलकी वंदना करता हूं ।
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥३५॥
मैं इस संसारके प्रिय एवं सुन्दर , उन भगवान् रामको बार-बार नमन करता हूं, जो सभी आपदाओंको दूर करनेवाले तथा सुख-सम्पति प्रदान करनेवाले हैं।
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥३६॥
‘राम-राम’ का जप करनेसे मनुष्यके सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं। वह समस्त सुख-सम्पति तथा ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता हैं। राम-रामकी गर्जनासे यमदूत सदा भयभीत रहते हैं।
रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम:।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम्।
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥
राजाओंमें श्रेष्ठ श्रीराम सदा विजयको प्राप्त करते हैं। मैं लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामका भजन करता हूं । सम्पूर्ण राक्षस सेनाका नाश करनेवाले श्रीरामको मैं नमस्कार करता हूं । श्रीरामके समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं। मैं उन शरणागत वत्सलका दास हूँ । मैं सद्सिव श्रीराममें ही लीन रहूं । हे श्रीराम! आप मेरा (इस संसार सागर से) उद्धार करें।
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥
(शिव पार्वती से बोले –) हे सुमुखी ! राम- नाम ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ के समान हैं। मैं सदा रामका स्तवन करता हूं और राम-नाममें ही रमण करता हूं ।
इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम् ॥
इस प्रकार बुधकौशिकद्वारा रचित श्रीराम रक्षा स्तोत्र सम्पूर्ण होता है।
॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥
