॥ नाहं स्मरामि कृष्णं तु राधास्मरणवर्जितम् ॥
Ram - स्तुति
देवी-देवताओं की स्तुति
स्तुति (3)
Jai Ram Rama Ramnam Samnam
stutiShrijirasik
जय राम रमारमणं समनं | भव ताप भयाकुल पाहि जनं ||
अवधेस सुरेस रमेस विभो | सरनागत मागत पाहि प्रभो ||१||
दस सीस बिनासन बीस भुजा | कृत दूरी महा माहि भूरी रुजा |
रजनीचर बृंद पतंग रहे | सर पावक तेज प्रचंड दहे ||२||
महि मंडल मंडन चारूतरं | धृत सायक चाप निषंग बरं |
मद मोह महा ममता रजनी | तम पुंज दिवाकर तेज अनी ||३||
मनजात किरात निपात किए | मृग लोग कुभोग सरेन हिए |
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे | विषया बन पाँवर भूली परे ||४||
बाहु रोग बियोगन्हि लोग हए |भवदंध्री निरादर के फल ए |
भव सिंधु अगाध परे नर ते | पद पंकज प्रेम न जे करते ||५||
अति दीन मलीन दुखी नितहीँ | जिन्ह के पद पंकज प्रीती नहीं |
अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें | प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें ||६||
नहीं राग न लोभ न मान मदा | तिन्ह कें सम वैभव वा विपदा |
एहि ते तव सेवक होत मुदा | मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ||७||
करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ |पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ |
सम मानी निरादर आदरही | सब संत सुखी बिचरंति महि ||८||
मुनि मानस पंकज भृंग भजे | रघुवीर महा रनधीर अजे |
तव नाम जपामि नमामि हरी | भव रोग महागद मान अरी ||९||
गुन सील कृपा परमायतनं | प्रनमामि निरंतर श्रीरमणं |
रघुनंदन निकंदय द्वन्दधनं | महि पाल बिलोकय दीन जनं ||१०||
दोहा:
बार बार बर मांगऊ हारिशी देहु श्रीरंग |
पदसरोज अनपायनी भागती सदा सतसंग ||
बरनी उमापति राम गुन हरषि गए कैलास |
तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास||
Shri Ram Stuti
stutiShrijirasik
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला,
कौसल्या हितकारी ।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी,
अद्भुत रूप बिचारी ॥
लोचन अभिरामा, तनु घनस्यामा,
निज आयुध भुजचारी ।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला,
सोभासिंधु खरारी ॥कह दुइ कर जोरी, अस्तुति तोरी,
केहि बिधि करूं अनंता ।
माया गुन ग्यानातीत अमाना,
वेद पुरान भनंता ॥
करुना सुख सागर, सब गुन आगर,
जेहि गावहिं श्रुति संता ।
सो मम हित लागी, जन अनुरागी,
भयउ प्रगट श्रीकंता ॥
ब्रह्मांड निकाया, निर्मित माया,
रोम रोम प्रति बेद कहै ।
मम उर सो बासी, यह उपहासी,
सुनत धीर मति थिर न रहै ॥
उपजा जब ग्याना, प्रभु मुसुकाना,
चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै ।
कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई,
जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ॥
माता पुनि बोली, सो मति डोली,
तजहु तात यह रूपा ।
कीजै सिसुलीला, अति प्रियसीला,
यह सुख परम अनूपा ॥
सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना,
होइ बालक सुरभूपा ।
यह चरित जे गावहिं, हरिपद पावहिं,
ते न परहिं भवकूपा ॥
दोहा:
बिप्र धेनु सुर संत हित,
लीन्ह मनुज अवतार ।
निज इच्छा निर्मित तनु,
माया गुन गो पार ॥
Shri Ramchandra Kripalu Bhajman
stutiShrijirasik
श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन
हरण भव भय दारुणम् ।
नवकंजलोचन, कंज-मुख
कर-कंज पद-कंजारुणम् ॥1॥
कंदर्प अगणित अमित छबि,
नवनील-नीरद-सुंदरम् ।
पटपीत मानहु तड़ित रुचि
शुचि नौमि जनक सुता-वरम् ॥2॥
भजु दीनबंधु दिनेश दानव-
दैत्यवंश-निकंदनम् ।
रघुनंद आनंदकंद कोशलचंद
दशरथ-नंदनम् ॥3॥
सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु
उदार अंग विभूषणम् ।
आजानुभुज शर-चाप-धर
संग्राम-जित- खर-दूषणम् ॥4॥
इति वदति तुलसीदास शंकर-
शेष-मुनि-मन-रंजनम् ।
मम हृदय कंज निवास कुरु
कामादि-खल-दल- गंजनम् ॥5॥
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु
सहज सुंदर साँवरो ।
करुना निधान सुजान सीलु
सनेहु जानत रावरो ॥6॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि
सिय सहित हियँ हरषीं अली ।
तुलसी भवानिहि पूजि
पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ॥7॥
सो० – जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि ।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ॥