॥ नाहं स्मरामि कृष्णं तु राधास्मरणवर्जितम् ॥
Radhe - स्तुति
देवी-देवताओं की स्तुति
स्तुति (4)
Radharani Ki Bhavpurna Prarthana
stutiShrijirasik
राधा रानी से भावपूर्ण प्रार्थना :
वृषभानुनन्दिनी जगत वन्दिनी
वृषभानु नन्दिनी जगत वन्दिनी,
तुम दया की खान हो ।
मम हिय में भर दो प्रेमभक्ति,
तुम तो भक्ति ज्ञान हो ॥
प्रभु भक्ति की तू है मूरत,
तू है माँ ममतामयी ।
कृपा रूपी तू है सागर,
मातु तू करुणामयी ॥
हे राधिके ले श्याम को संग,
मुझे दर्शन दीजिये ।
सब दुर्गुणों से दूर करके,
पार भव से कीजिये ॥
जगत रूपी नाव की,
जननी तुम्हीं पतवार हो ।
कोई न भव से पार करता,
मातु खेवनहार हो ॥
कर कृपा रख हाथ सिर पर,
चरण रज अब दीजिये ।
कान्त है माँ पुत्र तेरा,
शरण इसको लीजिये ॥
दोहा :
है अबोध बालक तेरा,
रखना माता ध्यान ।
ले शरण में कान्त को,
कर दे माँ कल्यान ॥1 ॥
कृपा करो हे राधिके,
भरो प्रेम की रंग ।
एकबार मोहि दरश दे,
श्री मनमोहन के संग ॥2 ॥
Shri Radha Krishan Stuti
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देवों द्वारा किये इस श्रीराधा कृष्ण स्तुति से युगलचरण का ध्यान करने पर नित्य अभ्युदय की प्राप्ति होती है।
श्रीराधाकृष्ण स्तुति
जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि–
अहं प्राणाश्च भक्तानां भक्ताः प्राणा ममापि च ।
ध्यायन्ति ये च मां नित्यं तां स्मरामि दिवानिशम् ।।
मैं भक्तों का प्राण हूँ और भक्त भी मेरे लिए प्राणों के समान हैं। जो नित्य मेरा ध्यान करते हैं, उनका मैं दिन-रात स्मरण करता हूँ। सोलह अरों से युक्त अत्यन्त तीखा सुदर्शन नामक चक्र महान तेजस्वी है। सम्पूर्ण जीवधारियों में जितना भी तेज है, वह सब उस चक्र के तेज के सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं है। उस अभीष्ट चक्र को भक्तों के निकट उनकी रक्षा के लिये नियुक्त करके भी मुझे प्रतीति नहीं होती; इसलिये मैं स्वयं भी उनके पास जाता हूँ। भक्तों का भक्तिपूर्वक दिया हुआ जो द्रव्य है, उसको मैं बड़े प्रेम से ग्रहण करता हूँ, परंतु अभक्तों की दी हुई कोई भी वस्तु मैं नहीं खाता। निश्चय ही उसे राजा बलि ही भोगते हैं।
स्त्रीपुत्रस्वजनांस्त्यक्त्वा ध्यायन्ते मामहर्निशम् ।
युष्मान् विहाय तान् नित्यं स्मराम्यहमहर्निशम् ।।
द्वेष्टारो ये च भक्तानां ब्राह्मणानां गवामपि ।
क्रतूनां देवतानां च हिंसां कुर्वन्ति निश्चितम् ।।
तदाऽचिरं ते नश्यन्ति यथा वह्नौ तृणानि च ।
न कोऽपि रक्षिता तेषां मयि हन्तर्युपस्थिते ।।
जो अपने स्त्री-पुत्र आदि स्वजनों को त्यागकर दिन-रात मुझे ही याद करते हैं, उनका स्मरण मैं भी तुम लोगों को त्यागकर अहर्निश किया करता हूँ। जो लोग भक्तों, ब्राह्मणों तथा गौओं से द्वेष रखते हैं, यज्ञों और देवताओ की हिंसा करते हैं, वे शीघ्र ही उसी तरह नष्ट हो जाते हैं, जैसे प्रज्वलित अग्नि में तिनके। जब मैं उनका घातक बनकर उपस्थित होता हूँ, तब कोई भी उनकी रक्षा नहीं कर पाता।
ब्रह्मोवाच–
तव चरणसरोजे मन्मनश्चञ्चरीको
भ्रमतु सततमीश प्रेमभक्त्या सरोजे।
भवनमरणरोगात् पाहि शान्त्यौषधेन
सुदृढसुपरिपक्वां देहि भक्तिं च दास्यम्।।
ब्रह्माजी बोले– परमेश्वर! मेरा चित्तरूपी चंचरीक (भ्रमर) आपके चरणारविन्दों में निरन्तर प्रेम-भक्तिपूर्वक भ्रमण करता रहे। शान्तिरूपी औषध देकर मेरी जन्म-मरण के रोग से रक्षा कीजिये तथा मुझे सुदृढ़ एवं अत्यन्त परिपक्व भक्ति और दास्यभाव दीजिये।
शंकर उवाच–
भवजलधिनिमग्नश्चित्तमीनो मदीयो
भ्रमति सततमस्मिन् घोरसंसारकूपे।
विषयमतिविनिन्द्यं सृष्टिसंहाररूप–
मपनय तव भक्तिं देहि पादारविन्दे।।
भगवान शंकर ने कहा– प्रभो! भवसागर में डूबा हुआ मेरा चित्तरूपी मत्स्य सदा ही इस घोर संसाररूपी कूप में चक्कर लगाता रहता है। सृष्टि और संहार यही इसका अत्यन्त निन्दनीय विषय है। आप इस विषय को दूर कीजिये और अपने चरणारविन्दों की भक्ति कीजिये।
धर्म उवाच-
तव निजजनसार्द्धं संगमो मे सदैव
भवतु विषयबन्धच्छेदने तीक्ष्णखङ्गः।
तव चरणसरोजे स्थानदानैकहेतु–
र्जनुषि जनुषि भक्तिं देहि पादारविन्दे।।
धर्म बोले– मेरे ईश्वर! आपके आत्मीयजनों (भक्तों)– के साथ मेरा सदा समागम होता रहे, जो विषयरूपी बन्धन को काटने के लिये तीखी तलवार का काम देता है तथा आपके चरणारविन्दों में स्थान दिलाने का एकमात्र हेतु है। आप जन्म-जन्म में मुझे अपने चरणारविन्दों की भक्ति प्रदान कीजिये।
इति श्रीराधा कृष्ण स्तुति।।
Shri Radha Stuti
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नमस्ते परमेशानि रासमण्डलवासिनी।
रासेश्वरि नमस्तेऽस्तु कृष्ण प्राणाधिकप्रिये।।
नमस्त्रैलोक्यजननि प्रसीद करुणार्णवे।
ब्रह्मविष्ण्वादिभिर्देवैर्वन्द्यमान पदाम्बुजे।।
नम: सरस्वतीरूपे नम: सावित्रि शंकरि।
गंगापद्मावनीरूपे षष्ठि मंगलचण्डिके।।
नमस्ते तुलसीरूपे नमो लक्ष्मीस्वरुपिणी।
नमो दुर्गे भगवति नमस्ते सर्वरूपिणी।।
मूलप्रकृतिरूपां त्वां भजाम: करुणार्णवाम्।
संसारसागरादस्मदुद्धराम्ब दयां कुरु।।
भावार्थ – रासमण्डल में निवास करने वाली हे परमेश्वरि ! आपको नमस्कार है। श्री कृष्ण को प्राणों से भी अधिक प्रिय हे रासेश्वरि ! आपको नमस्कार है।
भावार्थ – ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं के द्वारा वन्दनीय चरण कमल वाली हे त्रैलोक्यजननी ! आपको नमस्कार है। हे करुणार्णवे ! आप मुझ पर प्रसन्न होइए।
भावार्थ – हे सरस्वतीरूपे ! आपको नमस्कार है। हे सावित्रि ! हे शंकरि ! हे गंगा-पद्मावतीरूपे ! हे षष्ठि ! हे मंगलचण्डिके ! आपको नमस्कार है।
भावार्थ – हे तुलसीरूपे ! आपको नमस्कार है। हे लक्ष्मीस्वरूपिणि ! आपको नमस्कार है। हे दुर्गे ! हे भगवति ! आपको नमस्कार है। हे सर्वरूपिणि ! आपको नमस्कार है।
भावार्थ – हे अम्ब ! मूलप्रकृतिस्वरूपिणी तथा करुणा सिन्धु हम आपकी की उपासना करते हैं, संसार सागर से हमारा उद्धार कीजिए, दया कीजिए।
Dharo Man Bhanu Lali Ko Dhyan
stutiधरो मन, भानुलली को ध्यान।
जाको ध्यान धरत निशिवासर,
सुंदर श्याम सुजान।
कनक मुकुट सिर चारु चंद्रिका,
तापर लर मुक्तान।
चूनरि जरिन किनार गौर तनु,
नीलांबर परिधान।
श्रुति ताटंक गुंथी वर वेणी,
लजवति भौंह कमान।
नासा भल मुक्ताहल सोहति,
मन मोहति मुसकान।
पग पायल गति अति अभिरामिनि,
लखि मराल सकुचान ।
पाय 'कृपालु' सरस अस स्वामिनि,
चरन न कस लपटान॥
**भावार्थ-** अरे मन! तू निरंतर ही वृषभानुनंदिनी राधिकाजी का ध्यान किया कर। जिनका ध्यान साक्षात् ब्रह्म श्री श्यामसुन्दर भी निरंतर करते रहते हैं। जिनके सिर पर स्वर्ण का मुकुट और मनोहर चंद्रिका तथा उसके ऊपर भी मोतियों की लड़ शोभा दे रही है। जिनकी जरी-किनारे की चुनरी तथा नीले रंग का वस्त्र है और जो स्वयं गौर वर्ण की हैं। जिनके कान में झुमके झुल रहे हैं और अत्यन्त ही सुन्दर रीति से वेणी गुथी हुई है और जिनके भौंहें धनुष को लज्जित कर रही हैं। जिनकी नासिका में सुन्दर मुक्ताहल शोभित हो रहा है और जो मुस्कराती हुई हठात् मन को मोहित कर लेती हैं। जिनके पैरों में पायल हैं तथा जिनकी चाल हंसों को भी लज्जित करने वाली अत्यन्त मतवाली है। 'श्री कृपालु जी महाराज' कहते हैं कि ऐसी परम मधुर स्वामिनी को पाकर भी, अरे मन! तू उनके चरणों में सदा के लिए क्यों नहीं लिपट गया?
**पुस्तक** : प्रेम रस माधुरी (श्री राधा माधुरी)