॥ नाहं स्मरामि कृष्णं तु राधास्मरणवर्जितम् ॥
Krishna - स्तुति
देवी-देवताओं की स्तुति
स्तुति (3)
Shri Radha Krishan Stuti
stutiShrijirasik
देवों द्वारा किये इस श्रीराधा कृष्ण स्तुति से युगलचरण का ध्यान करने पर नित्य अभ्युदय की प्राप्ति होती है।
श्रीराधाकृष्ण स्तुति
जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि–
अहं प्राणाश्च भक्तानां भक्ताः प्राणा ममापि च ।
ध्यायन्ति ये च मां नित्यं तां स्मरामि दिवानिशम् ।।
मैं भक्तों का प्राण हूँ और भक्त भी मेरे लिए प्राणों के समान हैं। जो नित्य मेरा ध्यान करते हैं, उनका मैं दिन-रात स्मरण करता हूँ। सोलह अरों से युक्त अत्यन्त तीखा सुदर्शन नामक चक्र महान तेजस्वी है। सम्पूर्ण जीवधारियों में जितना भी तेज है, वह सब उस चक्र के तेज के सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं है। उस अभीष्ट चक्र को भक्तों के निकट उनकी रक्षा के लिये नियुक्त करके भी मुझे प्रतीति नहीं होती; इसलिये मैं स्वयं भी उनके पास जाता हूँ। भक्तों का भक्तिपूर्वक दिया हुआ जो द्रव्य है, उसको मैं बड़े प्रेम से ग्रहण करता हूँ, परंतु अभक्तों की दी हुई कोई भी वस्तु मैं नहीं खाता। निश्चय ही उसे राजा बलि ही भोगते हैं।
स्त्रीपुत्रस्वजनांस्त्यक्त्वा ध्यायन्ते मामहर्निशम् ।
युष्मान् विहाय तान् नित्यं स्मराम्यहमहर्निशम् ।।
द्वेष्टारो ये च भक्तानां ब्राह्मणानां गवामपि ।
क्रतूनां देवतानां च हिंसां कुर्वन्ति निश्चितम् ।।
तदाऽचिरं ते नश्यन्ति यथा वह्नौ तृणानि च ।
न कोऽपि रक्षिता तेषां मयि हन्तर्युपस्थिते ।।
जो अपने स्त्री-पुत्र आदि स्वजनों को त्यागकर दिन-रात मुझे ही याद करते हैं, उनका स्मरण मैं भी तुम लोगों को त्यागकर अहर्निश किया करता हूँ। जो लोग भक्तों, ब्राह्मणों तथा गौओं से द्वेष रखते हैं, यज्ञों और देवताओ की हिंसा करते हैं, वे शीघ्र ही उसी तरह नष्ट हो जाते हैं, जैसे प्रज्वलित अग्नि में तिनके। जब मैं उनका घातक बनकर उपस्थित होता हूँ, तब कोई भी उनकी रक्षा नहीं कर पाता।
ब्रह्मोवाच–
तव चरणसरोजे मन्मनश्चञ्चरीको
भ्रमतु सततमीश प्रेमभक्त्या सरोजे।
भवनमरणरोगात् पाहि शान्त्यौषधेन
सुदृढसुपरिपक्वां देहि भक्तिं च दास्यम्।।
ब्रह्माजी बोले– परमेश्वर! मेरा चित्तरूपी चंचरीक (भ्रमर) आपके चरणारविन्दों में निरन्तर प्रेम-भक्तिपूर्वक भ्रमण करता रहे। शान्तिरूपी औषध देकर मेरी जन्म-मरण के रोग से रक्षा कीजिये तथा मुझे सुदृढ़ एवं अत्यन्त परिपक्व भक्ति और दास्यभाव दीजिये।
शंकर उवाच–
भवजलधिनिमग्नश्चित्तमीनो मदीयो
भ्रमति सततमस्मिन् घोरसंसारकूपे।
विषयमतिविनिन्द्यं सृष्टिसंहाररूप–
मपनय तव भक्तिं देहि पादारविन्दे।।
भगवान शंकर ने कहा– प्रभो! भवसागर में डूबा हुआ मेरा चित्तरूपी मत्स्य सदा ही इस घोर संसाररूपी कूप में चक्कर लगाता रहता है। सृष्टि और संहार यही इसका अत्यन्त निन्दनीय विषय है। आप इस विषय को दूर कीजिये और अपने चरणारविन्दों की भक्ति कीजिये।
धर्म उवाच-
तव निजजनसार्द्धं संगमो मे सदैव
भवतु विषयबन्धच्छेदने तीक्ष्णखङ्गः।
तव चरणसरोजे स्थानदानैकहेतु–
र्जनुषि जनुषि भक्तिं देहि पादारविन्दे।।
धर्म बोले– मेरे ईश्वर! आपके आत्मीयजनों (भक्तों)– के साथ मेरा सदा समागम होता रहे, जो विषयरूपी बन्धन को काटने के लिये तीखी तलवार का काम देता है तथा आपके चरणारविन्दों में स्थान दिलाने का एकमात्र हेतु है। आप जन्म-जन्म में मुझे अपने चरणारविन्दों की भक्ति प्रदान कीजिये।
इति श्रीराधा कृष्ण स्तुति।।
Murli Pani Chakra Pani Hey Natanagar
stutiमुरली पाणि, चक्र पाणि, हे नटनागर!
नमो नमो, नमो नमो।
शीश मोर, पीत छोर, हे मनमोहन!
नमो नमो, नमो नमो।।
तुम राम हो, तुम श्याम हो,
तुम ही तो शिव का नाम हो।
तुम भक्ति हो, तुम शक्ति हो,
तुम मुक्ति का आधार हो।।
रोम-रोम, ओम-ओम, हे नटनागर!
नमो नमो, नमो नमो।
अधर धर, मुरली धर, हे मनमोहन!
नमो नमो, नमो नमो।।
तुम प्रेम रूप, अनूप हो,
तुम सकल जग के भूप हो।
ब्रज चंद हो, भगवंत हो,
हे नाथ! सबके संग हो।।
शीश मोर, पीत छोर, हे नटनागर!
नमो नमो, नमो नमो।
अधर धर, मुरली धर, हे मनमोहन!
नमो नमो, नमो नमो।।
तुम आदि देव, अनादि हो,
तुम अंतहीन, अनंत हो।
तुम वेदों का सब सार हो,
तुम सृष्टि के आधार हो।।
ब्रज चंद हो, भगवंत हो, हे नटनागर!
नमो नमो, नमो नमो।
अधर धर, मुरली धर, हे मनमोहन!
नमो नमो, नमो नमो।।
तुम गोपाल हो, कृपाल हो,
तुम भक्तों के प्रतिपाल हो।
करुणा के पावन धाम हो,
भक्तों के तुम विश्वास हो।।
ब्रज चंद हो, भगवंत हो, हे नटनागर!
नमो नमो, नमो नमो।
अधर धर, मुरली धर, हे मनमोहन!
नमो नमो, नमो नमो।।
Shree Bhishm Stuti
stutiइति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वतपुङ्गवे विभूम्नि । स्वसुखमुपगते क्वचिद्विहर्तुं प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाहः ॥ १ ॥
त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं रविकरगौरवराम्बरं दधाने । वपुरलककुलावृताननाब्जं विजयसखे रतिरस्तुमेऽनवद्या ॥ २ ॥
युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्-कचलुलितश्रमवार्यलङ्कृतास्ये । मम निशितशरैर्विभिध्यमान-त्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ॥ ३ ॥
सपदि सखि वचो निशम्य मध्ये निजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य । स्थितवति परसैनिकायुरक्ष्णा हृतवति पार्थसखे रतिर्ममास्तु ॥ ४ ॥
व्यवहितपृतनामुखं निरीक्ष्य स्वजनवधाद्विमुखस्य दोषबुद्ध्या । कुमतिमहरदात्मविद्यया यः चरणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु ॥ ५ ॥
स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञा-मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः । धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्गु-र्हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥ ६ ॥
शितविशिखहतो विशीर्णदंशः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे । प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् गतिर्मुकुन्दः ॥ ७ ॥
ललितगतिविलासवल्गुहास-प्रणयनिरीक्षणकल्पितोरुमानाः । कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धाः प्रकृतिमगन्किल यस्य गोपवध्वः ॥ ८ ॥
मुनिगणनृपवर्यसङ्कुलेऽन्तः-सदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम् । अर्हणमुपपेद ईक्षणीयो मम दृशिगोचर एष आविरात्मा ॥ ९ ॥
तमिममहमजं शरीरभाजां हृदि हृदि धिष्ठितमात्मकल्पितानाम् । प्रतिदृशमिव नैकधार्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूत भेदमोहः ॥ १० ॥