॥ नाहं स्मरामि कृष्णं तु राधास्मरणवर्जितम् ॥
Krishna - स्तोत्र
देव स्तोत्र
स्तोत्र (4)
Shri Balmukund ashtakam
stotraShrijirasik
श्रीबालमुकुन्दाष्टकं
वटपत्र के पत्तों पर शयन करते बाल मुकुंद
करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम् ।
वटस्य पत्रस्य पुटेशयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ १ ॥
मैं, कमल जैसे हाथों से, कमल जैसे पैरों के अंगूठे को, कमल जैसे मुख में डालते हुए, वट वृक्ष के पत्ते पर सो रहे बाल मुकुंद (भगवान कृष्ण) का मन से स्मरण करता हूँ।
सर्वकल्याण अवतार
संहृत्य लोकान्वटपत्रमध्ये शयानमाद्यन्तविहीनरूपम् ।
सर्वेश्वरं सर्वहितावतारं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ २ ॥
मैं उस बालक मुकुंद का मन से स्मरण करता हूँ, जो संपूर्ण लोकों को अपने में समेटे हुए, एक वटपत्र पर शयन कर रहे हैं, जो सभी का ईश्वर है, जो सभी के हित के लिए अवतरित हुए हैं और जो अपने आदि-अन्त रहित हैं।
कल्पवृक्ष समान बाल मुकुंद
इन्दीवरश्यामलकोमलाङ्गं इन्द्रादिदेवार्चितपादपद्यम् ।
संतानकल्पद्रुममाश्रितानां बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ ३ ॥
सुंदर, कोमल शरीर वाले बाल कृष्ण जिनका रंग नीले कमल (इंदीवर) जैसा है और जिसके चरण कमलों की पूजा इंद्र और अन्य देवता करते हैं, जो शरण में आने वालों के लिए कल्पवृक्ष के समान हैं। मैं उस बालक मुकुंद का मन से स्मरण करता हूँ।
रूप-लावण्यता
लम्बालकं लम्बितहारयष्टिं शृङ्गारलीलाङ्कितदन्तपङ्क्तिम् ।
बिम्बाधरं चारुविशालनेत्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ ४॥
जिनके घुंघराले और लटकते हुए बाल हैं, एक लंबी माला जो गले में लटक रही है, जो अपनी शरारतों और शृंगार के कारण दांतों की पंक्ति को भी आनंदमय बना देते हैं, जिनके बिम्ब फल के समान लाल और कोमल होंठ हैं, जिनकी आँखें बड़ी प्यारी और सुंदर हैं, मैं मन से उस बाल कृष्ण को स्मरण करता हूँ।
माखनचोर लीला
शिक्ये निधायाद्यपयोदधीनि बहिर्गतायां व्रजनायिकायाम् ।
भुक्त्वा यथेष्टं कपटेन सुप्तं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ ५ ॥
मैं मन से उस बाल मुकुंद का स्मरण करता हूँ, जिसने गोपियों के बाहर जाने पर उनके लटकते हुए शिके (बर्तनों) से तृप्ति भर माखन खाकर ऐसे दिखावा किया मानो वह सो रहा हो ।
नटवर बाल मुकुंद
कलिन्दजान्तस्थितकालियस्य फनाग्ररङ्गे नटनप्रियन्तम् ।
तत्पुच्छहस्तं शरदिन्दुवक्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ ६ ॥
जो कालिन्दी (यमुना नदी) के भीतर स्थित कालिया नाग के फन की नोक पर नृत्य कर रहे हैं और उसके (कालिया के) पूंछ को अपने हाथ में पकड़े हुए हैं, शरद ऋतु के चंद्रमा के समान मुख वाले उन बाल-मुकुंद (बाल कृष्ण) का मैं मन से स्मरण करता हूँ।
उलूखल लीला
उलूखले बद्धमुदारशौर्यं उत्तुङ्गयुग्मार्जुन भङ्गलीलम् ।
उत्फुल्लपद्मायत चारुनेत्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ ७ ॥
जिसने ओखली (अनाज कूटने के लिए एक बड़ा भारी पत्थर का पात्र) से बंधे होने के बावजूद बड़ी वीरता के साथ अर्जुन के दो ऊंचे पेड़ों को तोड़ दिया था, उस पूर्ण खिले हुए कमल के पत्तों के समान सुंदर आंखों वाले बाल मुकुंद का मैं मन से स्मरण करता हूँ।
सच्चिदानंद रूप
आलोक्य मातुर्मुखमादरेण स्तन्यं पिबन्तं सरसीरुहाक्षम् ।
सच्चिन्मयं देवमनन्तरूपं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ ८ ॥
मां के मुख को देखकर, प्रेमपूर्वक स्तन्यपान करते हुए, कमल के समान नेत्रों वाले, सच्चिदानंद रूप और अनंत रूप वाले बाल मुकुंद का मैं मन से स्मरण करता हूँ।
॥ इति श्री बिल्वमङ्गलठाकुरविरचितम् बालमुकुन्दाष्टकं सम्पूर्णम्॥
इस प्रकार श्री बिल्वमंगल ठाकुर द्वारा रचित बालमुकुन्दाष्टकं पूरा होता है।
Madan Mohan Astak Stotra
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मदनमोहन अष्टक स्तोत्र
जय शङ्खगदाधर नीलकलेवर पीतपटाम्बर देहि पदम् ।
जय चन्दनचर्चित कुण्डलमण्डित कौस्तुभशोभित देहि पदम् ॥१॥
हे शंख और गदा धारण करने वाले, नीले वर्ण वाले, पीले वस्त्र वाले, चंदन से सुशोभित, कानों में कुंडल और कौस्तुभ मणि से सुशोभित, मुझे अपने चरणों में स्थान प्रदान करें।
जय पङ्कजलोचन मारविमोहन पापविखण्डन देहि पदम् ।
जय वेणुनिनादक रासविहारक वङ्किम सुन्दर देहि पदम् ॥२॥
हे कमल-नयन, कामदेव को मोहित करने वाले, पापों के विनाशक, (वेणुवादक) बांसुरी बजाने वाले, रास में विहार करने वाले और सुंदर (टेढ़ी) चाल वाले भगवान श्रीकृष्ण मुझे अपने चरणों का आश्रय प्रदान करें।
जय धीरधुरन्धर अद्भुतसुन्दर दैवतसेवित देहि पदम् ।
जय विश्वविमोहन मानसमोहन संस्थितिकारण देहि पदम् ॥३॥
हे धीरधुरन्धर (धैर्य के स्वामी अथवा धारक), अद्भुत और सुंदर रूपवाले, देवताओं द्वारा पूजे जाने वाले, विश्व को मोहित करने वाले, ब्रह्मांड को धारण करने वाले, मनमोहन मुझे अपने चरणों में स्थान प्रदान करें।
जय भक्तजनाश्रय नित्यसुखालय अन्तिमबान्धव देहि पदम् ।
जय दुर्जनशासन केलिपरायण कालियमर्दन देहि पदम् ॥४॥
हे भक्तों के आश्रय, दुष्टों (अशुभों) का नाश करने वाले, अंधकार को नष्ट करने वाले, कालिय नाग का मर्दन करने वाले, बान्धवप्रिय भगवान मुझे अपने चरणों का शरण प्रदान करें।
जय नित्यनिरामय दीनदयामय चिन्मय माधव देहि पदम् ।
जय पामरपावन धर्मपरायण दानवसूदन देहि पदम् ॥५॥
हे नित्य निरामय, दीनानाथ, ज्ञान के भण्डार, माधव, पतित पावन, धर्म का आचरण करने वाले, राक्षसों का संहार करने वाले, मदन मोहन मुझे अपने चरणों का शरण प्रदान करें।
जय वेदविदांवर गोपवधूप्रिय वृन्दावनधन देहि पदम् ।
जय सत्यसनातन दुर्गतिभञ्जन सज्जनरञ्जन देहि पदम् ॥६॥
हे वेदों के स्वामी, गोपियों के प्रिय, वृन्दावन के धन स्वरूप, सत्य सनातन देव, दुर्गति का नाश करने वाले और सज्जनों को आनंदित करने वाले, भगवान मुझे अपने चरणों का आश्रय प्रदान करें।
जय सेवकवत्सल करुणासागर वाञ्छितपूरक देहि पदम् ।
जय पूतधरातल देवपरात्पर सत्त्वगुणाकर देहि पदम् ॥७॥
हे सेवकों या भक्तों के प्रति प्रेम रखने वाले, करुणा के सागर, इच्छाओं को पूर्ण करने वाले, पृथ्वी के रक्षक, देवों में भी श्रेष्ठ, सत्वगुणों से युक्त भगवान श्रीकृष्ण मुझे अपने चरणों का आश्रय प्रदान करें।
जय गोकुलभूषण कंसनिषूदन सात्वतजीवन देहि पदम् ।
जय योगपरायण संसृतिवारण ब्रह्मनिरञ्जन देहि पदम् ॥८॥
हे गोकुल के आभूषण, कंस के संहारक, सात्विक जीवन देने वाले, योग में लीन रहने वाले, संसार से पार करने वाले, निर्गुण ब्रह्म आपकी जय हो। हे मदन मोहन मुझे अपने चरणों में स्थान प्रदान करें।
॥ इति श्रीमदनमोहनाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
Shri Santan Gopal Sahastranam
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श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम हिंदू धर्म के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पूजनीय ग्रंथ है। इस स्तोत्र की महिमा और प्रभाव को शब्दों में व्यक्त करना कठिन है, क्योंकि यह भगवान श्रीकृष्ण के एक हजार नामों का स्तवन करता है। इसे पढ़ने और मनन करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक शांति, मानसिक स्थिरता और भगवान के प्रति भक्ति की गहन अनुभूति प्राप्त होती है।
इस स्तोत्र के प्रत्येक नाम में भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं, गुणों और दिव्य स्वरूपों का वर्णन किया गया है। यह नामावली न केवल भगवान के अनंत रूप की स्तुति करती है, बल्कि यह उनके भक्तों के लिए एक मार्गदर्शक भी है, जो उन्हें धर्म, भक्ति और जीवन के सत्य मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है।
गोपाल, जो कि कृष्ण का एक नाम है, का अर्थ है 'गोपों के पालक'। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बाल्यकाल में गोपाल के रूप में ब्रजभूमि में अनेक लीलाओं की, इस स्तोत्र में विशेष वर्णन मिलता है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भक्तों को भगवान की कृपा प्राप्त होती है और उनके जीवन में सुख-शांति एवं समृद्धि का आगमन होता है।
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम्
अथ ध्यानम्
कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्ष:स्थले कौस्तुभं
नासाग्रे वरमुत्तिकं करतले वेणुं करे कंकणम् ।
सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुल्लितं कण्ठे च मुक्तावली –
गोपश्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणि: ॥१॥
फुल्लेन्दीवरकांतिमिन्दुवदनं बरहावतन्सप्रियं
श्रीवत्साड्कमुदरकौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम ।
गोपीनां नयनोत्पलर्चिततनुं गोगोपसंघावृतं
गोविंदं कलवेणुवदनपरं दिव्याद्गभूषं भजे ॥२॥
इति ध्यानम्
ऊँ क्लीं देव: कामदेव: कामबीजशिरोमणि: ।
श्रीगोपालको महीपाल: सर्ववृदान्तपरग: ॥१॥
धरणीपालको धन्य: पुण्डरीक: सनातन: ।
गोपतिर्भूपति: शास्ता प्रहर्ता विश्वतोमुख: ॥२॥
आदिकर्ता महाकर्ता महाकालः प्रतापवान ।
जगज्जीवो जगद्धाता जगद्भर्ता जगद्वसु: ॥३॥
मत्स्यो भीम: कुहूभर्ता हर्ता वराहमूर्तिमान ।
नारायणो हृषीकेशो गोविंदो गरुड़ध्वजः ॥४॥
गोकुलेन्द्रो महाचन्द्र: शर्वरीप्रियकारक: ।
कमलामुखलोलाक्ष: पुण्डरीक शुभावह: ॥५॥
दुर्वासा: कपीलो भौम: सिन्धुसागरसद्गम: ।
गोविंदो गोपतिगोत्र: कालिन्दीप्रेमपूरक: ॥६॥
गोपस्वामी गोकुलेन्द्रो गोवर्धन्वरप्रद: ।
नन्दादिगोकुलत्राता दाता दारिद्रयभंजन: ॥७॥
सर्वमंगलदाता च सर्वकामप्रदायक: ।
आदिकर्ता महीभर्ता सर्वसागरसिंधुजः ॥८॥
गजगामी गजोद्धारि कामी कामकलानिधि: ।
कलंकाररहितश्चन्द्रो बिम्बस्यो बिम्बसत्तम: ॥९॥
मालाकार: कृपाकार: कोकिलास्वरभूषण: ।
रामो नीलाम्बरो देवो हलि दुर्दममर्दन: ॥१०॥
सहस्राक्षपुरीभेत्तापद्मविनाशन: ।
शिव: शिवतमो भेत्ता बलरातिप्रपूजक: ॥११॥
कुमारीवरदाय च वरेण्यो मीनकेतन: ।
नरो नारायणो धीरोराधापतिरुदारधी: ॥१२॥
श्रीपति: श्रीनिधि: श्रीमान मानक्ति: प्रतिराजा ।
वृन्दापति: कुलग्रामी धामी ब्रह्मसनातन: ॥१३॥
रेवतीरमणो रामाश्चाण्डलश्चारूलोचन: ।
रामायणशरीरोस्यं रामी राम: श्रिय:पति: ॥१४॥
श्रर्व: शर्वरी श्रर्व: सर्वत्रशुभदायक: ।
राधाराधायितो राधी राधाचित्तप्रमोदक: ॥१५॥
राधारतिसुखोपेतो राधामोहनतत्पर: ।
राधावशीकरो राधाह्रदयान्भोजष्टपद: ॥१६॥
राधालिंगनसंमोहो राधानारत्नकौतुक: ।
राधासंजात्सम्प्रीति राधाकामफलप्रद: ॥१७॥
वृन्दापति: कोशनिधिर्लोकशोकविनाशक: ।
चन्द्रापतिश्चन्द्रपतिश्चण्डकोदण्डभंजन: ॥१८॥
रामो दाशरथि रामो भृगुवंशसमुद्भव: ।
आत्मारामो जितक्रोधो मोहो मोहान्धभंजन ॥१९॥
वृषभानुर्भवो भाव: कश्यपि: करुणानिधि: ।
कोलाहलो हाली हाली हेली हलधरप्रिय: ॥२०॥
राधामुखाब्जमार्तण्डो भास्करो विरजो विधु: ।
विधिर्विधाता वरुणो वरुणो वरुणीप्रियः ॥२१॥
रोहिणीह्रदयानन्दि वसुदेवात्मजो बलि: ।
नीलाम्बरो रौहिणेयो जरासन्धवधोस्मल: ॥२२॥
नागो नवाम्होविरुदो विरहा वरदो बलि ।
गोपथो विजयी विद्वान् शिपिविष्ट: सनातन: ॥२३॥
परशुरामवचोग्राही वरग्राही श्रृगालहा ।
दमघोषोपदेशता च रथग्राही सुदर्शन: ॥२४॥
वीरपत्नीयशस्रता जराव्याधिविघातक: ।
द्वारकावासतत्त्वज्ञो हुताशनवरप्रद: ॥२५॥
यमुनावेगसंहारी नीलाम्बरधर: प्रभु: ।
विभु: शरसनो धन्वी गणेशो गणनायक: ॥२६॥
लक्ष्मणो लक्षणो लक्ष्यो रक्षोवंशविनाश: ।
वामनो वामनीभूतो बलिजिद्विक्रमत्रयः ॥२७॥
यशोदानन्दन: कर्ता यमलार्जुनमुक्तिद:
उलूखली महामानी दंबद्धाह्वयी शमी ॥२८॥
भक्तानुकारी भगवान केशवोश्चालधारक: ।
केशिहा मधुहा मोहि वृषासुरविघातक: ॥२९॥
अघासुरविनाशी च पूतनामोक्षस्वदायक: ।
कुब्जविनोदी भगवान कंसमृत्युर्महामखी ॥३०॥
अश्वमेधो वाजप्यो गोमेधो नर्रेधवान ।
कन्दर्पकोटिलावण्यश्चन्द्रकोटिसुषीतल: ॥३१॥
रविकोटिप्रतीकाशो वायुकोटिमहाबल: ।
ब्रह्मा ब्रह्माण्डकर्ता च कमलावांछितप्रद: ॥३२॥
कमली कमलाक्षश्च कमलामुखलोलुप: ।
कमलाव्रतधारी च कमलाभ: पुरन्दर: ॥३३॥
सौभाग्यचित्तोस्यं महामायी महोत्कट: ।
तारकारि: सुरत्राता मारीचक्षोभकारक: ॥३४॥
विश्वामित्रप्रियो दन्तो रामो राजीवलोचन: ।
लंकाधिपकुलध्वंसि विभिषणवरप्रद: ॥३५॥
सीतानन्दकरो रामो वीरो वारिधिबन्धन: ।
खरदूषणसंहारी साकेतपुर्वासन: ॥३६॥
चन्द्रावलीपति: कूल: केशी कंसवधोस्मर: ।
माधवी मधुहा माधवी माधवीको माधवो मधु: ॥३७॥
मुंजतवीगाहमानो धेनुकारिर्धरात्मज: ।
वंशी वटबिहारी च गोवर्धनवनाश्रय: ॥३८॥
तथा तलवनोद्देशी भाण्डीरवनशंखहा ।
तृणावर्तकथाकारी वृषभानुसुतापति: ॥३९॥
राधाप्राणसमो राधावदनाब्जमधुव्रत: ।
गोपीरंजनदैवज्ञो लीलाकमलपूजित: ॥४०॥
क्रीडाकमलसन्दोहो गोपिकाप्रीतिरंजन: ।
रंजको रंजो रड़्गो रड़्गी रंगमहीरुह ॥४१॥
काम: कामारिभक्तोसंयं पुराणपुरुष: कवि: ।
नारदो देवलो भीमो बालो बालमुखम्बुज: ॥४२॥
अम्बुजो ब्रह्मसाक्षी च योगीदत्तवरो मुनि: ।
ऋषभ: पर्वतो ग्रामो नदीपावनवल्लभ: ॥४३॥
पद्मनाभ: सुरज्येष्ठो ब्रह्मा रुद्रोषिभूषित: ।
गणानां त्राणकर्ता च गणेशो ग्रहिलो ग्रही ॥४४॥
गणाश्रयो गणाध्यक्ष: क्रोडीकृतजगत्रय: ।
यादवेन्द्रो द्वारकेन्द्रो मथुरावल्लभो ध्रुव ॥४५॥
भ्रमर: कुन्तली कुन्तीसुतरक्षी महामखी ।
यमुनावरदाता च कश्यपस्य वरप्रद: ॥४६॥
शड़्खचूडवधोद्दामो गोपीरक्षणतत्पर: ।
पांचजन्यकरो रामि त्रिरमि वनजो जय: ॥४७॥
फाल्गुन: फाल्गुनसखो विराधवधकारक: ।
रुक्मिणीप्राणनाथश्च सत्यभामाप्रियंकर: ॥४८॥
कल्पवृक्षो महावृक्षो दानवृक्षो महाफल: ।
कर्बो भूसुरो भामो भामको चतुरो हरिः ॥४९॥
सरल: शाश्वत: वीरो यदुवंशी शिवात्मक: ।
प्रद्युम्नबलकर्ता च प्रहरता दैत्यहा प्रभु: ॥५०॥
महाधनो महावीरो वनमालाविभूषण: ।
तुलसीदामशोभाध्यो जालन्धरविनाशन: ॥५१॥
शूर: सूर्यो मृकण्डश्च भास्करो विश्वपूजित: ।
रविस्तमोहा वह्निश्च वाडवो वडवानल: ॥५२॥
दैत्यदर्पविनाशी च गरुड़ो गरुड़ाग्रज: ।
गोपीनाथोमाँथो वृन्दानाथोस्वरोधक: ॥५३॥
प्रपंची पंचरूपश्च लतागुल्मश्च गोपति: ।
गंगा च यमुनारूपो गोदा वेत्रवती तथा ॥५४॥
कावेरी नर्मदा तापी गंधकी सरयूस्तथा ।
राजसस्तामस: सत्त्वी सर्वांगी सर्वलोचन: ॥५५॥
सुधामयोस्मृतमयो योगिनीवल्लभ: शिव: ।
बुद्धिमो बुद्धिमतां श्रेष्ठोविष्णुर्जिष्णु: शचीपति: ॥५६॥
वंशी वंशधरो लोको विलोको मोहनाशन: ।
रावरावो रावो रावो बालो बालबलाहाक: ॥५७॥
शिवो रुद्रो नलो नीलो लांगुली लांगुलाश्रय: ।
पारद: पावनो हंसो हंसारूढ़ो जगत्पति: ॥५८॥
मोहिनीमोहनो मायि महामायो महामखी ।
वृषो वृषाकपि: काल: कालीदमनकारक: ॥५९॥
कुब्जभाग्यप्रदो वीरो राजकाक्षयकारक: ।
कोमलो वरुणो राज जलदो जलधारी: ॥६०॥
हारक: सर्वपापघ्न: परमेष्ठी पितामह: ।
खड्गधारी कृपाकारी राधारमणसुन्दर: ॥६१॥
द्वादशारण्यसम्भोगी शेषनागफनालय: ।
कामश्याम: सुख: श्रीद: श्रीपति: श्रीनिधि: कृति: ॥६२॥
हरिर्हरो नरो नरो नरो नरोत्तम इषुप्रिय: ।
गोपालोचित्तहर्ता च कर्ता संसारतारक: ॥६३॥
आदिदेवो महादेवो गौरीगुरुर्णाश्रय: ।
साधुर्मधुर्विधुर्धाता भ्रातास्क्रूरपरायण: ॥६४॥
रोलम्बि च हयग्रीवो वानररिर्वनाश्रय: ।
वनं वाणी वन्दियोरो महाबन्धो महामुनिः ॥६५॥
स्यमन्तकमणिप्राज्ञो विज्ञो विघ्नविघातक: ।
गोवर्धनो वर्धनीयो वर्धनी वर्धनप्रिय: ॥६६॥
वर्धन्यो वर्धनो वर्धि वर्धिन्य: सुमुखप्रिय: ।
कृपण वृद्धको वृद्धो वृन्दार्कजनप्रियः ॥६७॥
गोपालरमणीभर्ता संबुकुष्ठविनाशन: ।
रुक्मिणीहरण: प्रेमप्रेमी चन्द्रावलीपति: ॥६८॥
श्रीकर्ता विश्वभर्ता च नारायणनरो बली ।
गणो गणपतिश्चैव दत्तात्रेयो महामुनिः ॥६९॥
व्याससो नारायणो दिव्यो भव्यो भावपूर्ण धारी: ।
स्वः श्रेयसं शिवं भद्रं भावुकं भाविकं शुभम् ॥७०॥
शुभात्मक: शुभ: शास्ता परका मेघनादहा ।
ब्रह्मण्यदेवो दीनानामुद्धारकरणक्षम: ॥७१॥
कृष्ण: कमलपत्राक्ष: कृष्ण: कमललोचन: ।
कृष्ण: कामी सदा कृष्ण: समस्तप्रियकारक: ॥७२॥
नन्दो नन्दी महानन्दी मादी मदनक: किली ।
मिली हिली गिली गोली गोलो गोलायी गुली ॥७३॥
गुग्गुली मारकी शाखी वट: पिप्पलक: कृति ।
म्लेक्षहा कालहर्ता च यशोदयाश एव च ॥७४॥
अच्युत: केशवो विष्णुर्हरि: सत्यो जनार्दन: ।
हंसो नारायणो लीलो नीलो भक्तिपरायण: ॥७५॥
जानकीवल्लभो रामो विरामो विघ्ननाशन: ।
सहस्रांशुर्महाभानुर्वीरभद्रर्महोदधिः ॥७६॥
समुद्रोस्ब्धिरकूपार: परावार: सरित्पति: ।
गोकुलानन्दकारी च बुद्धिपरिपालक: ॥७७॥
सदाराम: कृपारामो महारामो धनुर्धर: ।
पर्वत: पर्वतकारो गयो गयो द्विजप्रिय: ॥७८॥
कमलाश्वतरो रामो रामायणप्रवर्तक: ।
द्यौदिवौ दिनो दिव्यो भव्यो भविभयापः ॥७९॥
पार्वतीभाग्यसहितो भ्राता लक्ष्मीविलास्वान् ।
विलासी साहसी सर्व गर्वी गर्वितलोचन: ॥८०॥
मुरारिर्लोकधर्मज्ञो जीवनो जीवनान्तक: ।
यमो यमादिर्यमनो यामी यामविधायक: ॥८१॥
वसुली पंसुली पंसुपाण्डुरर्जुनवल्लभ: ।
ललिताचन्द्रिकामाली माली मालाम्बुजाश्रय: ॥८२॥
अम्बुजाक्षो महायज्ञो दक्षश्चिन्तामणिप्रभु: ।
मणिर्दिन्मनिश्चैव केदारो बद्रीश्रयः ॥८३॥
बद्रीवनसंप्रीतो व्यास: सत्यवतीसुत: ।
अमरारिनिहन्ता च सुधासिन्धुर्विधूदयः ॥८४॥
चन्द्रो रवि: शिव: शूली चक्री चैव गदाधर: ।
श्रीकर्ता श्रीपति: श्रीद: श्रीदेवो देवकीसुत: ॥८५॥
श्रीपति: पुण्डरीकाक्ष: पद्मनाभो जगत्पति: ।
वासुदेवोप्रमेयात्मा केशवो गरुड़ध्वज: ॥८६॥
नारायण: परं धाम देवदेवो महेश्वर: ।
चक्रपाणि: कलापूर्णो वेदवेद्यो दयानिधि: ॥८७॥
भगवान सर्वभूतेषो गोपाल: सर्वपालक: ।
अनन्तो निर्गुणोष्णन्तो निर्विकल्पो निरंजन: ॥८८॥
निराधारो निराकारो निराभासो निराश्रय: ।
पुरुष: प्रणवातीतो मुकुन्द: परमेश्वर: ॥८९॥
क्षणावनि: सर्वभौमो वैकुंठो भक्तवत्सल: ।
विष्णुर्दामोदर: कृष्णो माधवो मथुरापति: ॥९०॥
देवकीगर्भसम्भूत्यशोदावत्सलो हरि: ।
शिव: संकर्षण: शंभुर्भूतनाथो दिवस्पति: ॥९१॥
अव्यय: सर्वधर्मज्ञो निर्मलो निरुपद्रव: ।
निर्वाणनायको नित्योस्निलजीमूत्सन्निभ: ॥९२॥
कालाक्षयश्च सर्वज्ञ: कमलारूपतत्पर: ।
हृषीकेश: पीतवासा वासुदेवप्रियात्मज: ॥९३॥
नन्दगोपकुमारारियो नवनीताशन: प्रभु: ।
पूरणपुरुष: श्रेष्ठ शंखपाणि: सुविक्रम: ॥९४॥
अनिरुद्धश्वक्ररथ: शार्द्गपाणिश्चतुर्भुज: ।
गदाधर: सुरतिघ्नो गोविंदो नन्दकायुध: ॥९५॥
वृन्दावनचर: सौर्यिर्वेणुवाद्यविशारद: ।
तृणावर्तान्तको भीमसासहसो बहुविक्रम: ॥९६॥
सक्तसुरसंहारी बकासुरविनाशन: ।
धेनुकासुरसड़घाट: पूतनारिर्नृकेसरी ॥९७॥
पितामहो गुरु:साक्षी प्रत्यगात्मा सदाशिव: ।
अप्रमेय: प्रभु: प्राज्ञोसप्रतर्क्य: स्वप्नवर्धन: ॥९८॥
धन्यो मान्यो भवो भावो धीर: शान्तो जगद्गुरु: ।
अन्तर्यामीश्वरो दिव्यो दैवज्ञो देवता गुरुः ॥९९॥
क्षीराब्धिशयनो धाता लक्ष्मीवाँललक्ष्मणाग्रज: ।
धात्रिपतिरमेयात्मा चन्द्रशेखरपूजितः ॥१००॥
लोकसाक्षी जगच्चक्षु: पुण्यःचारित्रकीर्तन: ।
कोटिमन्मथसौन्दर्यो जगन्मोहनविग्रहः ॥१०१॥
मन्दस्मितातमो गोपो गोपिका परिवेष्टित: ।
फुल्लरविन्दनयनश्चाणूरन्ध्रनिषूदन: ॥१०२॥
इंडीवरदलश्यामो बर्हिबर्हावतंसक: ।
मुरलीनीनदह्लादो दिव्यमाल्यो वरश्रय: ॥१०३॥
सुकपोलयुग: सुभ्रुयुगल: सुल्लाटक: ।
कम्बुग्रीवो विशालाक्षो लक्ष्मीवान शुभलक्षण: ॥१०४॥
पीनवक्षाश्चतुर्बाहुश्चतुर्मूर्तिस्त्रिविक्रम: ।
कलंकरहित: शुद्धो दुष्टशत्रुनिबर्हण: ॥१०५॥
किरीटकुण्डलधर: कटकाड्गदमंडित: ।
मुद्राराभरणोपेत: कटिसूत्रविराजित: ॥१०६॥
मञ्जीरंजितपद: सर्वाभरणभूषित: ।
विनयस्तपादयुगलो दिव्यमंगलविग्रह: ॥१०७॥
गोपिकनयनानंद: पूर्णश्चन्द्रनिभानन: ।
समस्तजगदानन्दसुन्दरो लोकनन्दन: ॥१०८॥
यधार्मातिरसंचरी राधामन्मथवैभव: ।
गोपनारीप्रियो दन्तो गोपीवस्त्रापहारक: ॥१०९॥
श्रृंगारमूर्ति: श्रीधाम तारको मूलकरणम् ।
सृष्टिसंरक्षणोपाय: क्रूरासुरविभंजन ॥११०॥
नरकासुरहरि च मुरारिर्वैरिमर्दन: ।
आदित्येयप्रियो दैत्यभिकरश्चेन्दुशेखर: ॥१११॥
जरासन्धकुलध्वंसि कंसराति: सुविक्रम: ।
पुण्यश्लोक: कीर्तनियो यादवेन्द्रो जगन्नुत: ॥११२॥
रुक्मिणीरमण: सत्यभामाजाम्बवतीप्रिय: ।
मित्रविन्दनाग्निजतिलक्ष्मणासमुपासित: ॥११३॥
सुधाकरकुले जातोष्णनन्तप्रबलविक्रम: ।
सर्वसौभाग्यसम्पन्नो द्वारकायामुपस्थितः ॥११४॥
भद्रसूर्यसुतानाथो लीलामानुषविग्रह: ।
सहस्रषोड़शस्त्रीशो भोगमोक्षैक्दयालु: ॥११५॥
वेदान्तवेद्य: संवेद्योवैलम्बनब्रह्माण्डनायक: ।
गोवर्धनधरो नाथ: सर्वजीवदयापर: ॥११६॥
मूर्तिमान सर्वभूतात्मा आर्तत्राणपरायण: ।
सर्वज्ञ: सर्वसुलभ: सर्वशास्त्रविशारद: ॥११७॥
षड्गुणाश्चर्यसम्पन्न: पूर्णकामो धुरन्धर: ।
महानुभाव: कैवल्यदैत्यरो लोकनायक: ॥११८॥
आदिमध्यान्तररहित: शुद्धसात्त्विकविग्रह: ।
आकाशसमस्तात्मा शरणागतवत्सल: ॥११९॥
उत्पत्तिस्थितिसंहारकारणं सर्वकारणम् ।
गंभीर: सर्वभावज्ञ: सच्चिदानन्दविग्रह: ॥१२०॥
विश्वक्सेन: सत्यसन्ध: सत्यवान्सत्यविक्रम: ।
सत्यव्रत: सत्यसंज्ञ सर्वधर्मपरायण: ॥१२१॥
आपन्नार्तिप्रशमनो द्रौपदीमानरक्षक: ।
कन्दर्पजनक: प्राज्ञो जगन्नाटकवैभव: ॥१२२॥
भक्तिवश्यो गुणातीत: सर्वैश्वर्यप्रदायक: ।
दमघोषसुतद्वेषी बाण्बाहुविखण्डन: ॥१२३॥
भीष्मभक्तिप्रदो दिव्य: कौरवान्वयनाशन: ।
कौन्तेयप्रियबन्धुश्च पार्थस्यन्दनसारथिः ॥१२४॥
नारसिंहो महावीरस्तम्भजातो महाबल: ।
प्रह्लादवरद: सत्यो देवपूज्यो भयंकर: ॥१२५॥
उपेन्द्र: इन्द्रवरजो वामनो बलिबन्धन: ।
गजेन्द्रवरद: स्वामी सर्वदेवनमस्सकृत: ॥१२६॥
शेषपर्यड्कशयनो वैनतेयरथो जयी ।
अव्याहतबलैश्वर्यसम्पन्न: पूर्णमानस: ॥१२७॥
योगेश्वरेश्वर:साक्षी क्षेत्रज्ञो ज्ञानदायी: ।
योगिह्रत्पाद्कजावासो योगमायासमन्वित: ॥१२८॥
नादबिन्दुकलातीतश्चतुर्वर्गफलप्रद: ।
सुषुम्नामार्गसंचारी सन्देहस्यन्तरस्थितः ॥१२९॥
देहेन्द्रियमन: प्राणसाक्षी चेत:प्रसादक: ।
सूक्ष्म: सर्वगतो देहीज्ञानदर्पणगोचर: ॥१३०॥
तत्त्वत्रयात्मकोसव्यक्त: कुण्डलीसमुपाश्रित: ।
ब्राह्मण्य: सर्वधर्मज्ञ: शान्तो दन्तो गतक्लम: ॥१३१॥
श्रीनिवास: सदानन्दि विश्वमूर्तिर्म्हाप्रभु: ।
सहस्त्रशीर्षा पुरुष: सहस्त्राक्ष: सहस्त्रपात: ॥१३२॥
समस्तभुवनाधार: समस्तप्राणरक्षक: ।
समस्तसर्वभावज्ञो गोपिकाप्राणरक्षक: ॥१३३॥
नित्योत्सवो नित्यसौख्यो नित्यश्रीर्नित्यमंगल: ।
व्यूहार्चितो जगन्नाथ: श्रीवैकुण्ठपुराधिप: ॥१३४॥
पूर्णानन्दघनिभूतो गोपवेषधरो हरि: ।
कलापाकुसुमश्याम: कोमल: शान्तविग्रह: ॥१३५॥
गोपाड्गनावृतोष्णनन्तो वृन्दावनसमाश्रय: ।
वेणुवद्रथ: श्रेष्ठो देवानां हितकारक: ॥१३६॥
बालक्रीडासमासक्तो नवनीतस्यं संकट: ।
गोपालकामिनिजारशोरजारशिखामणि: ॥१३७॥
परंज्योति: प्रकाश: परवास: परिस्फुट: ।
अष्टादशाक्षरोमंत्रो व्यापको लोकपावन: ॥१३८॥
सप्तकोटिमहामंत्रशेखरो देवशेखर: ।
विज्ञानज्ञानसन्धानस्तेजोराशिर्जगतपति: ॥१३९॥
भक्तलोकप्रसन्नात्मा भक्तमन्दरविग्रह: ।
भक्तदारिद्रयदमनो भक्तानां प्रीतिदायक: ॥१४०॥
भक्तान्निध्यमना: पूज्यो भक्तलोकशिवंकर: ।
भक्ताभीष्टप्रद: सर्वभक्ताघौघनिकृन्तन: ॥१४१॥
अपारकरुणासिन्धुर्भगवान भक्तत्पर: ॥१४२॥
इति श्रीराधिकानाथसहस्त्रं नाम कीर्तितम ।
स्मरणात्पापराशीनां खण्डानं मृत्युनाशनम् ॥१४३॥
पूर्ण।
वैष्णवानां प्रियकरं महारोगनिवारणम् ।
ब्रह्महत्यासुरपानं परस्त्रीगमनं तथा ॥१४४॥
परद्रव्यापहरणं परद्वेषसमन्वितम् ।
मानसं वाचिकं कायं यत्पापं पापसंभवम् ॥१४५॥
सहस्त्रनामपठनात्सर्व नश्यति तत्क्षणात् ।
महादारिद्र्ययुक्तो यो वैष्णवो विष्णुभक्तिमान ॥१४६॥
कार्तिक्यां सम्पठेद्रात्रौ शतमष्टोत्तो क्रमात् ।
पीताम्बरधरो श्यामसुगन्धिपुष्पचन्दनै: ॥१४७॥
पुस्तकं पूजयित्वा तु नैवेद्यादिभिरेव च ।
राधाध्यानाडीकतो धीरो वनमालाविभूषित: ॥१४८॥
शतमष्टोत्तं देवि पठेन्नामसहस्त्रकाम् ।
चैत्रशुक्ल च कृष्णे च कुहूसंक्रांतिवासरे ॥१४९॥
पथित्व्यं प्रयत्नेन त्रौलोक्यं मोहयेत्क्षणात् ।
तुलसीमालया युक्तो वैष्णवो भक्तित्पर: ॥१५०॥
रविवारे च शुक्रे च द्वादश्यां श्राद्धवासरे ।
ब्राह्मणं पूजयित्वा च भोज्यित्वा विधानत: ॥१५१॥
पथेन्नामसहस्त्रं च तत: सिद्धि: प्रजायते ।
महानिशायां सततं वैष्णवो यः पठेत्सदा ॥१५२॥
देशान्तरगता लक्ष्मी: समायातिं न संशय: ।
त्रैलोक्ये च महादेवी सुन्दर्य: काममोहिता: ॥१५३॥
मुग्धा: स्वयं समायन्ति वैष्णवं च भजन्ति ता: ।
रोगी रोगात्प्रमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥१५४॥
गुरविनि जनयेत्पुत्रं कन्या विन्दति सत्पतिम् ।
राजानो वश्यतां यान्ति किं पुन: क्षुद्रमाणवा: ॥१५५॥
सहस्त्रनामश्रवणात्पठनात्पूजात्प्रिये ।
धारणात्सर्वमाप्नोति वैष्णवो नात्र संशयः ॥१५६॥
वंशीतते चान्यवते तथा पिप्पलकेस्थवा ।
कदम्बपादपतले गोपालमूर्तिसन्निधौ ॥१५७॥
यः पठेद्वैष्णवो नित्यं स याति हरिमन्दिरम् ।
कृष्णेणोक्तं राधिकाये मया प्रोक्तं पुराशिवे ॥१५८॥
नारदाय मया प्रोक्तं नारदेन प्रकाशितम् ।
मया त्वयि वरारोहे प्रोक्तमेतत्सुदुर्लभम् ॥१५९॥
प्रमाणितं प्रयत्नेन् न प्रकाश्यं कथंचन ।
शठाय पापिने चैव लम्पटाय विशेषः ॥१६०॥
न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचन ।
देयं शिष्याय शान्ताय विष्णुभक्तिरताय च ॥१६१॥
गोदानब्रह्मयज्ञदेर्वाज्पेयशस्य च ।
अश्वमेधसहस्त्रस्य फलं पाठे भवेदध्रुवम् ॥१६२॥
मोहनं स्तम्भनं चैव मारणोच्चतनादिकम ।
यद्यद्वांछतिचित्तेन तत्तत्प्राप्नोति वैष्णव: ॥१६३॥
एकादश्यां नर:स्नात्वा सुगन्धिद्रव्यतैलकै: ।
आहारं ब्राह्मणे दत्त्वा दक्षिणां स्वर्णभूषणम् ॥१६४॥
तत् आरम्भकर्तासौ सर्व प्राप्नोति मानव: ।
शतावृत्तं सहस्त्रं च य: पठेद्वैष्णवो जन: ॥१६५॥
श्रीवृन्दावनचन्द्रस्य प्रसादात्सर्वमाप्नुयात् ।
यदगृहे पुस्तकं देवीपूजितं चैव तिष्ठति ॥१६६॥
न मारी न च दुर्भिक्षं नोपसर्गभ्यं क्वचित ।
सर्पादि भूत्यक्षाद्या नश्यन्ति नात्र संशयः ॥१६७॥
श्रीगोपालो महादेवी वसेत्तस्य गृहे सदा ।
गृहे यत्र सहस्त्रं च नाम्नां तिष्ठति पूजितम् ॥१६८॥
निष्कर्ष
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ न केवल आध्यात्मिक लाभ प्रदान करता है, बल्कि यह हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं में भी संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा लाता है। भगवान श्रीकृष्ण के एक हजार नामों को याद करते समय हम उनके दिव्य स्वरूप और अनंत गुणों को साकार करते हैं, जो हमारे मन, शरीर और आत्मा को शुद्ध और शक्तिशाली बनाते हैं।
इस स्तोत्र के माध्यम से हम भगवान की कृपा और उनके दिव्य प्रेम का अनुभव कर सकते हैं। यह हमें सिखाता है कि भगवान की भक्ति में ही सच्चा सुख और शांति है।
नियमित रूप से श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ करने से न केवल हमें आध्यात्मिक विकास प्राप्त होता है, बल्कि हमारे जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यह स्तोत्र हमें यह स्मरणीय है कि भगवान श्रीकृष्ण हमारे सच्चे मित्र, मार्गदर्शक और संरक्षक हैं। उनके भक्तों का सुमिरन हमारे जीवन को सार्थक और आनंदमय बनाता है।
इस प्रकार, श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का महात्त्व विशाल है और इसका पाठ हमें भगवान के निकट ले जाता है, जिससे हमारा जीवन हर दृष्टि से समृद्ध और सुखमय होता है।
Shri Krishnashtakam
stotraShrijirasik
श्रीकृष्णाष्टकम्
श्रियाश्लिष्टो विष्णुः स्थिरचरवपुर्वेदविषयो धियां साक्षी शुद्धो हरिरसुरहन्ताब्जनयनः । गदी शङ्खी चक्री विमलवनमाली स्थिररुचिः शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ १ ॥
यतः सर्वं जातं वियदनिलमुख्यं जगदिदं स्थितौ निःशेषं योऽवति निजसुखांशेन मधुहा। लये सर्वं स्वस्मिन् हरति कलया यस्तु स विभुः । शरण्यो० ॥ २ ॥
असूनायम्यादौ यमनियममुख्यैः सुकरणै-र्निरुध्येदं चित्तं हृदि विलयमानीय सकलम्। यमीड्यं पश्यन्ति प्रवरमतयो मायिनमसौ। शरण्यो० ॥ ३ ॥
पृथिव्यां तिष्ठन् यो यमयति महीं वेद न धरा यमित्यादौ वेदो वदति जगतामीशममलम् । नियन्तारं ध्येयं मुनिसुरनृणां मोक्षदमसौ। शरण्यो० ॥ ४॥
महेन्द्रादिर्दैवो जयति दितिजान् यस्य न कस्य स्वातन्त्र्यं क्वचिदपि कृतौ यत्कृतिमृते । कवित्वादेर्गर्वं परिहरति योऽसौ विजयिनः । शरण्यो० ॥ ५ ॥ बलतो
विना यस्य ध्यानं व्रजति पशुतां सूकरमुखां विना यस्य ज्ञानं जनिमृतिभयं याति जनता। विना यस्य स्मृत्या कृमिशतजनिं याति स विभुः । शरण्यो० ॥ ६।।
नरातङ्कोत्तङ्कः घनश्यामः वामो शरणशरणो भ्रान्तिहरणो व्रजशिशुवयस्योऽर्जुनसखः । स्वयम्भूर्भूतानां जनक उचिताचारसुखदः । शरण्यो० ॥ ७॥
यदा तदा धर्मग्लानिर्भवति जगतां क्षोभकरणी लोकस्वामी प्रकटितवपुः सेतुधृगजः । सतां धाता स्वच्छो निगमगणगीतो व्रजपतिः । शरण्यो० ॥ ८ ॥
इति हरिरखिलात्माराधितः श्रुतिविशदगुणोऽसौ शंकरेण मातृमोक्षार्थमाद्यः ।
यतिवरनिकटे श्रीयुक्त स्वगुणवृत उदारः आविर्बभूव शङ्खचक्राब्जहस्तः ॥ ९ ॥
॥ श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं कृष्णाष्टकं सम्पूर्णम् ॥