॥ राधाया दर्शनं पुण्यं कृष्णप्राप्तेः कारणम् ॥
Bajrangbali - स्तोत्र
देव स्तोत्र
स्तोत्र (4)
Maruti Kavach
stotraShrijirasik
मारुति कवच नारद-पुराण से लिया गया है। इस कवच का पाठ करने से मनुष्य के सभी दु:खों एवं संकटों का नाश होता है। भूत-प्रेत बाधा से रक्षा होती है, शत्रु से उत्पन्न दु:ख का नाश होता है । यह कवच सभी दुर्घटनाओं से साधक की रक्षा करता है। मोह का नाश करने वाले तथा विजय प्रदान करने वाले इस अत्यंत प्रभावशाली और अमोघ स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से करने वाले साधक पर भगवान मारुति शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
सनत्कुमार उवाच्
कार्तवीर्यस्य कवचं कथितं ते मुनीश्वर ।
मोहविध्वंसनं जैत्रं मारुतेः कवचं श्रृणु ॥ १॥
सनत्कुमार जी ने कहा –
मुनीश्वर मैंने तुमसे कार्तवीर्य कवच का वर्णन किया। अब मोहनाशक और विजयप्रद मारूति कवच का वर्णन सुनो ॥ १॥
यस्य सन्धारणात् सद्यः सर्वे नश्यन्त्युपद्रवाः ।
भूतप्रेतारिजं दुःखं नाशमेति न संशयः ॥ २॥
जिसके धारण करने से सभी उपद्रव तत्काल नष्ट हो जाते हैं तथा भूत, प्रेत एवं शत्रु से उत्पन्न दु:ख का भी नाश हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ २॥
एकदाहं गतो द्रष्टुं रामं रमयतां वरम् ।
आनन्दवनिकासंस्थं ध्यायन्तं स्वात्मनः पदम् ॥ ३॥
एक समय की बात है, मैं मन को रमानेवालों में श्रेष्ठ भगवान श्रीराम का दर्शन करने के लिए अयोध्या गया हुआ था। वे आनंदवन में बैठकर अपने ही स्वरुप का ध्यान कर रहे थे ॥ ३॥
तत्र रामं रमानाथं पूजितं त्रिदशेश्वरैः ।
नमस्कृत्य तदादिष्टमासनं स्थितवान् पुरः ॥ ४॥
वहां पहुंचकर देवेश्वरों से पूजित रमानाथ श्रीराम को नमस्कार कर के उन्हीं के आदेश से उनके सामने ही एक आसन पर बैठ गया ॥ ४॥
तत्र सर्वं मया वृत्तं रावणस्य वधान्तकम् ।
पृष्टं प्रोवाच राजेन्द्रः श्रीरामः स्वयमादरात् ॥ ५॥
उस जगह मैंने उनसे आरंभ से लेकर रावण वध तक का सारा वृतांत पूछा। तब राजाधिराज श्रीराम ने बड़े आदर के साथ स्वयं वह सारी कथा कह सुनाई ॥ ५॥
ततः कथान्ते भगवान्मारुतेः कवचं ददौ ।
मह्यं तत्ते प्रवक्ष्यामि न प्रकाश्यं हि कुत्रचित् ॥ ६॥
तत्पश्चात कथा के अंत में भगवान ने मुझे मारुति कवच प्रदान किया, जिसका मैं तुम्हारे समक्ष वर्णन करुंगा। तुम इसे कहीं भी प्रकट न करना ॥ ६॥
भविष्यदेतन्निर्द्दिष्टं बालभावेन नारद ।
श्रीरामेणाञ्जनासूनोर्भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥ ७॥
नारद! श्रीराम ने बालभाव से भविष्य में होने वाला यह सब वृतान्त बताया और अंजनीनंदन हनुमान का कवच भी कह सुनाया, जो भोग और मोक्ष देने वाला है ॥ ७॥
हनुमान् पूर्वतः पातु दक्षिणे पवनात्मजः ।
पातु प्रतीच्यामक्षघ्नः सौम्ये सागरतारकः ॥ ८॥
पूर्व दिशा में श्री हनुमान रक्षा करें, दक्षिण दिशा में पवनपुत्र रक्षा करें। पश्चिम दिशा में रावणपुत्र अक्षयकुमार के विनाशक रक्षा करें तथा उत्तर दिशा में सागरतारक (समुद्र को तैर जाने वाले ) रक्षा करें ॥ ८॥
ऊर्ध्व पातु कपिश्रेष्ठः केसरिप्रियनन्दनः ।
अधस्ताद्विष्णुभक्तस्तु पातु मध्ये च पावनिः ॥ ९॥
ऊर्ध्व दिशा में केसरी के प्रिय पुत्र कपिश्रेष्ठ रक्षा करें। अधोभाग में विष्णुभक्त रक्षा करें तथा दिशाओं के मध्यभाग में पावनि (पवन पुत्र ) रक्षा करें ॥ ९॥
लङ्काविदाहकः पातु सर्वापद्भ्यो निरन्तरम् ।
सुग्रीवसचिवः पातु मस्तकं वायुनन्दनः ॥ १०॥
भालं पातु महावीरो भ्रुवोर्मध्ये निरन्तरम् ।
नेत्रे छायापहारी च पातु नः प्लवगेश्वरः ॥ ११॥
लंका जलाने वाले हनुमान जी संपूर्ण विपत्तियों से निरंतर हमारा संरक्षण करें। सुग्रीव के मंत्री मस्तक की करें। वायुनंदन हनुमान भालदेश की रक्षा करें। महावीर दोनों भौंहों के मध्यभाग में निरंतर रक्षा करें । छायाग्राहिणी राक्षसी का अपहरण करने वाले तथा वानरों के स्वामी हनुमान जी हमारे दोनों नेत्रों की रक्षा करें ॥ १०-११॥
कपोलौ कर्णमूले च पातु श्रीरामकिङ्करः ।
नासाग्रमञ्जनासूनुः पातु वक्त्रं हरीश्वरः ॥ १२॥
श्रीराम के सेवक दोनों कपोलों तथा कानों के मूलभागों की रक्षा करें, अंजना के पुत्र नासिका के अग्रभाग की तथा बंदरों के स्वामी मुख की रक्षा करें ॥ १२॥
पातु कण्ठे तु दैत्यारिः स्कन्धौ पातु सुरारिजित् ।
भुजौ पातु महातेजाः करौ च चरणायुधः ॥ १३॥
दैत्यों के शत्रु कण्ठ की रक्षा करें, देवशत्रुओं को जीतनेवाले दोनों कंधों की रक्षा करें। महातेजस्वी दोनों भुजाओं और चरणरूपी शस्त्रवाले दोनों हाथों की रक्षा करें ॥ १३॥
नखान् नखायुधः पातु कुक्षौ पातु कपीश्वरः ।
वक्षो मुद्रापहारी च पातु पार्श्वे भुजायुधः ॥ १४॥
नखरुपी शस्त्रवाले नखों की रक्षा करें, कपियों के स्वामी कुक्षिभाग की रक्षा करें। अंगूठी ले जानेवाले वक्षस्थल की तथा भुजारूपी आयुधवाले दोनों पार्श्वभागों की रक्षा करें ॥ १४॥
लङ्कानिभर्जनः पातु पृष्टदेशे निरन्तरम् ।
नाभिं श्रीरामभक्तस्तु कटिं पात्वनिलात्मजः ॥ १५॥
लंका को भूज देने वाले पृष्ठ भाग की निरंतर रक्षा करें। श्रीराम भक्त नाभि की और अनिल (पवन) पुत्र कमर की रक्षा करें ॥ १५॥
गुह्यं पातु महाप्राज्ञः सक्थिनी अतिथिप्रियः ।
ऊरू च जानुनी पातु लङ्काप्रासादभञ्जनः ॥ १६॥
महाप्राज्ञ गुह्यभाग की तथा अतिथिप्रिय जांघों की रक्षा करे। लंका के महलों को नष्ट करने वाले दोनों ऊरुओं तथा घुटनों की रक्षा करें ॥ १६॥
जङ्घे पातु कपिश्रेष्ठो गुल्फौ पातु महाबलः ।
अचलोद्धारकः पातु पादौ भास्करसन्निभः ॥ १७॥
कपिश्रेष्ठ दोनों पिण्डलियों की रक्षा करें। महाबलवान दोनों गुल्फों (टखनों) की रक्षा करें। पर्वत को उठानेवाले एवं सूर्य के समान तेजस्वी हनुमान जी दोनों चरणों की रक्षा करें ॥ १७॥
अङ्गानि पातु सत्त्वाढ्यः पातु पादाङ्गुलीः सदा ।
मुखाङ्गानि महाशूरः पातु रोमाणि चात्मवान् ॥ १८॥
अत्यंत बलशाली हनुमान जी अंगों तथा पैर की अंगुलियों की सदा रक्षा करें। महाशूर मुख आदि अंगों की तथा मन को वश में रखने वाले रोमवलियों की रक्षा करें ॥ १८॥
दिवारात्रौ त्रिलोकेषु सदागतिसुतोऽवतु ।
स्थितं व्रजन्तमासीनं पिबन्तं जक्षतं कपिः ॥ १९॥
वायु-पुत्र कपिश्रेष्ठ हनुमानजी दिन रात तीनों लोकों में खड़े, चलते, बैठे, पीते और खाते समय मेरी रक्षा करें ॥ १९॥
लोकोत्तरगुणः श्रीमान् पातु त्र्यम्बकसम्भवः ।
प्रमत्तमप्रमत्तं वा शयानं गहनेऽम्बुनि ॥ २०॥
मैं सावधान होऊं या असावधान, अथवा गहरे जल में क्यों न सोया होऊं, सब जगह लोकोत्तर गुणशाली शिवपुत्र श्रीमान् हनुमान मेरी रक्षा करें ॥ २०॥
स्थलेऽन्तरिक्षे ह्यग्नौ वा पर्वते सागरे द्रुमे ।
सङ्ग्रामे सङ्कटे घोरे विराड्रूपधरोऽवतु ॥ २१॥
स्थल में, आकाश में, अग्नि में, पर्वत पर, समुद्र में, वृक्षपर, युद्ध में अथवा घोर संकट के समय विराटरूपधारी हनुमान जी मेरी रक्षा करें ॥ २१॥
डाकिनीशाकिनीमारीकालरात्रिमरीचिकाः ।
शयानं मां विभुः पातु पिशाचोरगराक्षसीः ॥ २२॥
सोते समय मेरे प्रभु हनुमान जी डाकिनी, शाकिनी, मारी, कालरात्रि, मरीचिका, पिशाच, नाग तथा राक्षसियों को भगाकर मेरी रक्षा करें ॥ २२॥
दिव्यदेहधरो धीमान्सर्वसत्त्वभयङ्करः ।
साधकेन्द्रावनः शश्वत्पातु सर्वत एव माम् ॥ २३॥
संपूर्ण प्राणियों के लिए भयंकर तथा श्रेष्ठ साधकों के रक्षक दिव्यदेहधारी बुद्धिमान हनुमान जी सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें ॥ २३॥
यद्रूपं भीषणं दृष्ट्वा पलायन्ते भयानकाः ।
स सर्वरूपः सर्वज्ञः सृष्टिस्थितिकरोऽवतु ॥ २४॥
जिनके भीषण रूप को देखकर भयानक जंतु भी भाग खड़े होते हैं, वे सृष्टि, पालन और संहार करने वाले सर्वस्वरुप एवं सर्वज्ञ हनुमान मेरी रक्षा करें ॥ २४॥
स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः साक्षाद्देवो महेश्वरः ।
सूर्यमण्डलगः श्रीदः पातु कालत्रयेऽपि माम् ॥ २५॥
जो स्वयं ब्रह्मा, स्वयं विष्णु और स्वयं साक्षात महेश्वर देव हैं, वे सूर्यमण्डल तक पहुंचने वाले लक्ष्मीदाता हनुमान तीनों कालों में मेरी रक्षा करें ॥ २५॥
यस्य शब्दमुपाकर्ण्य दैत्यदानवराक्षसाः ।
देवा मनुष्यास्तिर्यञ्चः स्थावरा जङ्गमास्तथा ॥ २६॥
सभया भयनिर्मुक्ता भवन्ति स्वकृतानुगाः ।
यस्यानेककथाः पुण्याः श्रूयन्ते प्रतिकल्पके ॥ २७॥
सोऽवतात्साधकश्रेष्ठं सदा रामपरायणः ।
जिनके शब्द को सुनकर दैत्य, दानव तथा राक्षस भयभीत हो जाते हैं और देवता, मनुष्य तथा पशु-पक्षी आदि स्थावर-जङ्गम प्राणी भय से छूटकर अपने-अपने कर्मों में लग जाते हैं तथा प्रत्येक कल्प में जिनकी अनेक पुण्य कथाएं सुनी जाती है, वे श्रीरामभक्त हनुमान श्रेष्ठ साधक की रक्षा करें ॥ २६-२७ १/2॥
वैधात्रधातृप्रभृति यत्किञ्चिद्दृश्यतेऽत्यलम् ॥ २८॥
विद्धि व्याप्तं यथा कीशरूपेणानञ्जनेन तत् ।
ब्रह्मा और ब्रह्मा की सृष्टि आदि जो कुछ भी संपूर्ण जगत दृष्टिगोचर होता है, उस सबको निरंजन (निर्मल) वानर हनुमान रूप से व्याप्त समझो ॥ २८ १/२॥
यो विभुः सोऽहमेषोऽहं स्वीयः स्वयमणुर्बृहत् ॥ २९॥
ऋग्यजुःसामरूपश्च प्रणवस्त्रिवृदध्वरः ।
तस्मैस्वस्मै च सर्वस्मै नतोऽस्म्यात्मसमाधिना ॥ ३०॥
जो सर्वव्यापी परमात्मा हैं, वह मैं हूं। यह मैं, मेरा, अपना, मैं स्वयं, अणु, महान ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद सब हनुमानजी के ही रूप हैं। प्रणव तथा त्रिवृत यज्ञ भी वे ही हैं। वे ‘स्व’ रूप तथा ‘सर्व’ रूप हैं। मैं अपने चित को एकाग्र करके उनको नमस्कार करता हूं ॥ २९-३०॥
अनेकानन्तब्रह्माण्डधृते ब्रह्मस्वरूपिणे ।
समीरणात्मने तस्मै नतोऽस्म्यात्मस्वरूपिणे ॥ ३१॥
जो अनेकानेक अनंत ब्रह्माण्ड को धारण करते हैं तथा जो ब्रह्मस्वरुप, वायुपुत्र और आत्मस्वरुप हैं, उन हनुमानजी को मैं नमन करता हूं ॥ ३१॥
नमो हनुमते तस्मै नमो मारुतसूनवे ।
नमः श्रीरामभक्ताय श्यामाय महते नमः ॥ ३२॥
उन हनुमान जी को नमस्कार है, वायुपुत्र को नमस्कार है, श्रीरामभक्त को नमस्कार है तथा महान श्यामस्वरुप को नमस्कार है॥ ३२॥
नमो वानरवीराय सुग्रीवसख्यकारिणे ।
लङ्काविदहनायाथ महासागरतारिणे ॥ ३३॥
जो सुग्रीव की श्रीराम के साथ मैत्री कराने वाले, लंकापुरी को दग्ध करने वाले तथा महासागर को लांघ जाने वाले हैं. उन वानरवीर को नमस्कार है ॥ ३३॥
सीताशोकविनाशाय राममुद्राधराय च ।
रावणान्तनिदानाय नमः सर्वोत्तरात्मने ॥ ३४॥
जो सीता जी के शोक का विनाश करने वाले, श्रीराम की दी हुई मुद्रिका को धारण करने वाले तथा रावण के विनाश के आदि कारण हैं, उन सर्वोत्तरात्मा (लोकोत्तर वीर) श्री हनुमान जी को नमस्कार है ॥ ३४॥
मेघनादमखध्वंसकारणाय नमो नमः ।
अशोकवनविध्वंसकारिणे जयदायिने ॥ ३५॥
मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस करने वाले, अशोक वाटिका को नष्ट-भ्रष्ट कर देने वाले तथा विजयप्रदाता हनुमानजी को बारंबार नमस्कार है ॥ ३५॥
वायुपुत्राय वीराय आकाशोदरगामिने ।
वनपालशिरश्छेत्रे लङ्काप्रासादभञ्जिने ॥ ३६॥
ज्वलत्काञ्चनवर्णाय दीर्घलाङ्गूलधारिणे ।
सौमित्रिजयदात्रे च रामदूताय ते नमः ॥ ३७॥
जो आकाश के भीतर चलने वाले, (अशोक) वनरक्षकों के मस्तक का छेदन और लंका के महलों का भंजन करने वाले, तपाये हुए सुवर्ण के समान कांतिमान, लंबी लांगूल धारण करनेवाले तथा सुमित्राकुमार को विजय दिलाने वाले हैं, उन वीरवर वायुपुत्र श्रीरामदूत को नमस्कार है।
अक्षस्य वधकर्त्रे च ब्रह्मशस्त्रनिवारिणे ।
लक्ष्मणाङ्गमहाशक्तिजातक्षतविनाशिने ॥ ३८॥
रक्षोघ्नाय रिपुघ्नाय भूतघ्नाय नमो नमः ।
ऋक्षवानरवीरौघप्रासादाय नमो नमः ॥ ३९॥
जो रावण कुमार अक्षय का वध करनेवाले, मेघनाद के ब्रह्मास्त्र का निवारण कर देने वाले, लक्ष्मण के शरीर में महाशक्तिजनित घाव का विनाश करने वाले, राक्षसों के हंता, शत्रुओं के नाशक और भूतों के विघातक तथा रीछों और वानरवीरों के समुदाय को प्रसन्न करनेवाले हैं, उन पवननंदन को बारंबार नमस्कार है ॥ ३८-३९॥
परसैन्यबलघ्नाय शस्त्रास्त्रघ्नाय ते नमः ।
विषघ्नाय द्विषघ्नाय भयघ्नाय नमो नमः ॥ ४०॥
शत्रु सैन्य-बल के नाशक और शस्त्र तथा अस्त्रों के विनाशक आपको नमस्कार है। विष-नाशक, शत्रु-नाशक और भय-नाशक आपको बारंबार नमस्कार है ॥ ४०॥
महीरिपुभयघ्नाय भक्तत्राणैककारिण ।
परप्रेरितमन्त्राणां यन्त्राणां स्तम्भकारिणे ॥ ४१॥
पयः पाषाणतरणकारणाय नमो नमः ।
बालार्कमण्डलग्रासकारिणे दुःखहारिणे ॥ ४२॥
आप बड़े-बड़े शत्रुओं के भय को मिटाने वाले तथा भक्तों के एकमात्र रक्षक हैं। शत्रुओं द्वारा प्रयुक्त यंत्र-मंत्रों का स्तम्भन (रुकावट) करने वाले, पानी पर पत्थर को तैरानेवाले, प्रात:कालीन बाल-सूर्य के मण्डल को अपना ग्रास बनानेवाले तथा सबके दु:ख हर लेने वाले आप हनुमान को बारंबार नमस्कार है ॥ ४१-४२॥
नखायुधाय भीमाय दन्तायुधधराय च ।
विहङ्गमाय शवाय वज्रदेहाय ते नमः ॥ ४३॥
नख ही आपके आयुध हैं। आप देखने में भयंकर तथा दांतों को भी आयुध के रूप में धारण करते हैं। आप आकाशचारी, शिवस्वरुप तथा व्रजदेहधारी हैं। आपको नमस्कार है ॥ ४३॥
प्रतिग्रामस्थितायाथ भूतप्रेतवधार्थिने ।
करस्थशैलशस्त्राय रामशस्त्राय ते नमः ॥ ४४॥
आप प्रत्येक ग्राम में स्थित हैं, भूतों और प्रेतों का वध करे के लिए उद्यत रहते हैं। आपके एक हाथ में शस्त्र रूप में पर्वत है तथा आप श्रीराम के वाण हैं। आपको नमस्कार है॥ ४४॥
कौपीनवाससे तुभ्यं रामभक्तिरताय च ।
दक्षिणाशाभास्कराय सतां चन्द्रोदयात्मने ॥ ४५॥
कृत्याक्षतव्यथाघ्नाय सर्वक्लेशहराय च ।
स्वाम्याज्ञापार्थसङ्ग्रामसख्यसञ्जयकारिणे ॥ ४६॥
भक्तानां दिव्यवादेषु सङ्ग्रामे जयकारिणे ।
किल्किलाबुबुकाराय घोरशब्दकराय च ॥ ४७॥
सर्वाग्निव्याधिसंस्तम्भकारिणे भयहारिणे ।
सदा वनफलाहारसन्तृप्ताय विशेषतः ॥ ४८॥
महार्णवशिलाबद्धसेतुबन्धाय ते नमः ।
आप कौपीन वस्त्रधारी तथा श्रीराम भक्ति में तत्पर रहने वाले हैं। आप दक्षिण दिशा के सूर्य तथा सत्पुरुषों के लिए चंद्रोदय रूप हैं। आप कृत्याजनित क्षति एवं व्यथा के नाशक तथा संपूर्ण क्लेशों का हरण करले वाले हैं। स्वामी की आज्ञा से पृथापुत्र अर्जुन को महाभारत युद्ध में सहायता देने एवं विजय दिलाने वाले हैं। आप दिव्य वादों तथा संग्राम में भक्तों को विजय दिलाने वाले, किलकिला एवं बुबुकार करने वाले तथा भयंकर सिंहनाद करने वाले हैं। आप संपूर्ण अग्नि एवं व्याधियों का स्तंभन करने वाले तथा भय हरने वाले हैं। विशेषत: आप सदा वन्य फलों के आहार से ही पूर्णत: तृप्त रहते हैं। महासागर में पत्थरों का सेतु बांधनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ४५-४८ १/२ ॥
इत्येतत्कथितं विप्र मारुतेः कवचं शिवम् ॥ ४९॥
यस्मै कस्मै न दातव्यं रक्षणीयं प्रयत्नतः ।
ब्रह्मन! यह मैंने कल्याणमय मारुति-कवच का वर्णन किया है। जिस किसी को भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिए। प्रयत्नपूर्वक इसकी रक्षा करनी चाहिए ॥ ४९ १/२॥
अष्टगन्धैर्विलिख्याथ कवचं धारयेत्तु यः ॥ ५०॥
कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ जयस्तस्य पदे पदे ।
जो इस कवच को अष्टगंध से लिखकर कण्ठ अथवा दाहिनी बांह में धारण करता है, उसे पद-पद पर विजय प्राप्त होती है ॥ ५० १/२॥
किं पुनर्बहुनोक्तेन साधितं लक्षमादरात् ॥ ५१॥
प्रजप्तमेतत्कवचमसाध्यं चापि साधयेत् ॥ ५२॥
बहुत कहने से क्या लाभ। यदि आदरपूर्वक लाख बार पाठ करके इसको सिद्ध कर लिया जाय तो इस कवच का जप असाध्य कार्य को भी सिद्ध कर सकता है ॥ ५१-५२ ॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे हनुमत्कवचनिरूपणं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥
Vibhishankrit Hanuman Stotra
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नमो हनुमते तुभ्यं नमो मारुतसूनवे।
नमः श्रीरामभक्ताय श्यामास्याय च ते नमः।। (१)
हे हनुमान जी! आपको नमस्कार है। मारुतनन्दन! आपको प्रणाम है। श्री राम भक्त! आपको अभिवादन है। आपके मुख का वर्ण श्याम है, आपको नमस्कार है ।
नमो वानरवीराय सुग्रीवसख्यकारिणे।
लङ्काविदाहनार्थाय हेलासागरतारिणे।। (२)
आप सुग्रीव के साथ (भगवान श्री राम की) मैत्री कराने वाले और लंका को भस्म कर देने के अभिप्राय से खेल-खेल में ही महासागर को लांघ जाने वाले हैं, आप वानर-वीर को नमस्कार है।
सीताशोकविनाशाय राममुद्राधराय च।
रावणान्तकुलच्छेदकारिणे ते नमो नमः।। (३)
आप श्रीराम कि मुद्रिका को धारण करने वाले, सीताजी के शोक के निवारक और रावण के कुल के संहारकर्ता हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है।
मेघनादमखध्वंसकारिणे ते नमो नमः।
अशोकवनविध्वंसकारिणे भयहारिणे।। (४)
आप अशोक वन को नष्ट भ्रष्ट कर देने वाले और मेघनाथ के यज्ञ के विध्वंसकर्ता हैं, आप भयहारी को बारम्बार नमस्कार है।
वायुपुत्राय वीराय आकाशोदरगामिने।
वनपालशिरश्छेदलङ्काप्रासादभन्जिने ।। (५)
ज्वल्तकनकवर्णाय दीर्घलाङ्गूलधारिणे।
सौमित्रिजयदात्रे च रामदूताय ते नमः।। (६)
आप वायु के पुत्र, सबसे अधिक वीर, आकाश के मध्य विचरण करनेवाले और अशोक वन के रक्षकों का शिरश्छेदन करके लंका कि अट्टालिकाओं को तोड़-फोड़ डालने वाले हैं।
आपकी शरीर-कान्ति प्रतप्त सुवर्ण कि भांति है, आपकी पूंछ लंबी है और आप सुमित्रा नंदन लक्ष्मण के विजय-प्रदाता हैं, आप श्रीराम दूत को प्रणाम है।
अक्षस्य वधकर्त्रे च ब्रह्मपाशनिवारिणे।
लक्ष्मणाङ्गमहाशक्तिघातक्षतविनाशने।। (७)
रक्षोघ्नाय रिपुघ्नाय भूतघ्नाय च ते नमः।
ऋक्षवानरवीरौघप्राणदाय नमो नमः।।(८)
आप अक्षकुमार के वधकर्ता, ब्रम्हपाश के निवारक, लक्ष्मण जी के शरीर मे महाशक्ति के आघात से उत्पन्न हुए घाव के विनाशक, राक्षस, शत्रु एवं भूतों के संहारकर्ता और वानर-वीरों के समुदाय के लिए जीवन-दाता हैं, आपको बारम्बार प्रणाम है।
परसैन्यबलघ्नाय शस्त्रास्त्रघ्नाय ते नमः।
विषघ्नाय द्विषघ्नाय ज्वरघ्नाय च ते नमः।। (९)
आप अस्त्र-शस्त्र के विनाशक तथा शत्रुओं के सैन्य-बल का मर्दन करने वाले हैं। आपको नमस्कार है। विष, शत्रु और ज्वर के नाशक आपको प्रणाम है।
महाभयरिपुघ्नाय भक्तत्राणैककारिणे।
परप्रेरितमन्त्राणां यन्त्राणां स्तंभकारिणे।। (१०)
पयःपाषाणतरणकारणाय नमो नमः।
आप महान भयंकर शत्रुओं के संहारक, भक्तों के एकमात्र रक्षक, दूसरों द्वारा प्रेरित मंत्र-यंत्रों को स्तंभित कर देने वाले तथा समुद्र-जल पर शिला-खंडों के तैरने में कारण स्वरूप हैं, हे हनुमान जी आपको बारम्बार नमस्कार है।
बालार्कमण्डलग्रासकारिणे भवतारिणे।। (११)
नखायुधाय भीमाय दन्तायुधधराय च।
रिपुमायाविनाशाय रामाज्ञालोकरक्षिणे।। (१२)
प्रतिग्रामस्थितायाथ रक्षोभूतवधार्थिने ।
करालशैलशस्त्राय द्रुमशस्त्राय ते नमः।। (१३)
आप बाल-सूर्य-मण्डल के ग्रास-कर्ता और भवसागर से तारने वाले हैं। आपका स्वरूप महा भयंकर है।
आप नख और दांतों को ही आयुधरूप मे धारण करते हैं तथा शत्रुओं की माया के विनाशक और श्रीराम की आज्ञा से लोगों के पालनकर्ता हैं, राक्षसों एवं भूतों का वध करना ही आपका प्रयोजन है।
प्रत्येक ग्राम में आप मूर्तरूप में स्थित हैं, विशाल पर्वत और वृक्ष ही आपके शस्त्र हैं, आपको नमस्कार है।
बालैकब्रम्हचर्याय रुद्रमूर्तिधराय च।
विहंगमाय सर्वाय वज्रदेहाय ते नमः।। (१४)
आप एकमात्र बाल-ब्रम्हचारी, रुद्ररूप में अवतरित और आकाशचारी हैं, आपका शरीर वज्र के समान कठोर है, आप सर्वस्वरूप को प्रणाम है।
कौपीनवाससे तुभ्यं रामभक्तिरताय च।
दक्षिणाशाभास्कराय शतचन्द्रोदयात्मने।। (१५)
कृत्याक्षतव्यथाघ्नाय सर्वक्लेशहराय च।
स्वाम्याज्ञापार्थसंग्रामसंख्ये संजयधारिणे।। (१६)
भक्तान्तदिव्यवादेषु संग्रामे जयदायिने।
किल्किलाबुबुकोच्चारघोरशब्दकराय च।। (१७)
सर्पाग्निव्याधिसंस्तम्भकारिणे वनचारिणे।
सदा वनफलाहारसंतृप्ताय विशेषतः।। (१८)
महार्णवशिलाबद्धसेतुबन्धाय ते नमः।
कौपीन ही आपका वस्त्र है, आप निरंतर श्रीराम भक्ति मे निरत रहते हैं, दक्षिण दिशा को प्रकाशित करने के लिए आप सूर्य सदृश्य हैं, सैकड़ों चंद्रोदय-की सी आपकी कान्ति है।
आप कृत्या द्वारा किए गए आघात की व्यथा के नाशक, सम्पूर्ण कष्टों के निवारक, स्वामी कि आज्ञा से पृथा-पुत्र अर्जुन के संग्राम में मैत्री भाव के संस्थापक, विजयशाली, भक्तों के अंतिम दिव्य वाद-विवाद तथा संग्राम में विजय-प्रदाता, ‘किलकिला’ एवं ‘बुबुक’ के उच्चारणपूर्वक भीषणशब्द करने वाले, सर्प, अग्नि, और व्याधि के स्तंभक, वनचारी, सदा जंगली फलों के आहार से विशेषरूप से संतुष्ट और महा-सागर पर शिलाखंडों द्वारा सेतु के निर्माण कर्ता हैं, आपको नमस्कार है।
वादे विवादे संग्रामे भये घोरे महावने।। (१९)
सिंहव्याघ्नादिचौरेभ्य: स्तोत्रपाठाद् भयं न हि।
इस स्तोत्र का पाठ करने से वाद-विवाद, संग्राम, घोर भय एवं महावन में सिंह-व्याघ्र आदि हिंसक जंतुओं तथा चोरों से भय नहीं होता।
दिव्ये भूतभये व्याधौ विषे स्थावरजङ्गमे।। (२०)
राजशस्त्रभये चोग्रे तथा ग्रहभयेषु च।
जले सर्वे महावृष्टौ दुर्भिक्षे प्राणसंप्लवे।। (२१)
पठेत् स्तोत्रं प्रमुच्येत भयेभ्यः सर्वतो नरः।
तस्य क्वापि भयं नास्ति हनुमत्स्तवपाठतः।। (२२)
यदि मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करे तो वह दैविक तथा भौतिक भय, व्याधि, स्थावर-जंगम संबंधी विष, राजा का भयंकर शस्त्र-भय, ग्रहों का भय, जल, सर्प, महावृष्टि, दुर्भिक्ष तथा प्राण-संकट आदि सभी प्रकार के भयों से मुक्त हो जाता है। इस हनुमत्स्तोत्र के पाठ से उसे कहीं भी भय की प्राप्ति नहीं होती।
सर्वदा वै त्रिकालं च पठनीयमिदं स्तवम्।
सर्वान् कामानवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा।। (२३)
नित्यप्रति तीनों समय (प्रातः, मध्यान्ह, संध्या) इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से सम्पूर्ण कामनाओं की प्राप्ति हो जाती है। इस विषय में अन्यथा विचार करने कि आवश्यकता नहीं है।
विभीषणकृतं स्तोत्रं ताक्ष्र्येण समुदीरितम्।
ये पठिष्यन्ति भक्त्या वै सिद्ध्यस्तत्करे स्थिता:।। (२४)
विभीषण द्वारा किए गए इस स्तोत्र का गरुड ने सम्यक प्रकार से पाठ किया था । जो मनुष्य भक्ति पूर्वक इसका पाठ करेंगे, समस्त सिद्धियाँ उनके अधीन हो जाएंगी।
इति श्रीसुदर्शनसंहितायां विभीषणगरुणसंवादे विभीषणकृतं हनुमत्स्तोत्रं संपूर्णम्।।
इस प्रकार श्री सुदर्शन-संहिता में विभीषणद्वारा किया हुआ हनुमत्स्तोत्र पूर्ण हुआ।।
Shri Maruti Stotra
stotraShrijirasik
भीमरूपी महारुद्र वज्रहनुमान मारुति |
वानरि अंजनिसुता रामदूत प्रभंजना || 1 ||
महाबली प्राणदाता सकला उठवी बाले |
सौख्यकारी दुःख हरि धूर्त वैष्णवगायक || 2 ||
दीन-नाथ हरिरूप सुंदर जगदंत्र |
पातालदेवताहंता भव्य सिन्दूर लेपना || 3 ||
लोकनाथ जगन्नाथ प्राणनाथ पुराणा |
पुण्यवंता पुण्यशिला पावना परितोषिका || 4 ||
ध्वजांगे उचली बहो आवेशे लोटला पुधे |
कालाग्नि कालरुद्राग्नि देखत कपति भये || 5 ||
ब्रह्माण्डी माईली नेनो आवले दन्तपंगति |
नेत्रग्नि चालिल्य ज्वाला भ्रुकुटि तथिल्या बलेन || 6 ||
पुछ ते मुरदिले मंथा किरीटी कुंडले बाड़ी |
सुवर्ण कटि कसोति घंटा किंकिणी नागरा || 7 ||
ठाकरे पर्वत ऐसा नेटका सदपतलु |
चपलंग पहता मोठे महाविद्द्युल्लातेपरी || 8 ||
कोटिच्या कोटि उद्दाने जेपवे उत्तरेकडे |
मंदराद्रिसरिखा द्रोणु क्रोधे उत्पतिला बलेन || 9 ||
आनिला मगुति नेला आला गेला मनोगति |
मनासी तकिले मागे गतिसी तुलना नासे || 10 ||
अनु पसोनि ब्रह्माण्ड एवधा होत जातसे |
तैसी तुलना कोठे मेरुमंदर धाकुटे || 11 ||
ब्रह्माण्ड भोवते वेधे वज्र पुच्छ करु शेक |
तयसि तुलना कैची ब्रह्माण्डि पहता नसे || 12 ||
अरक्त देखिले डोला ग्रसीले सूर्यमंडला |
वधाता वधाता वधे भेदिले शुन्यमण्डला || 13 ||
धन-धान्य पशुवृद्धि पुत्रपौत्र समस्तः |
पावति रूपविद्यादि स्तोत्रपथे करिणिया || 14 ||
भूत प्रेत समन्धादि रोगव्याधि समस्तः |
नासति तुतति चिंता आनन्दे भीमदर्शने || 15 ||
हे धरा पंधारा श्लोकी लभाली शोभली भाली |
द्रुधदेहों निसंदेहो सांख्य चंद्रकलागुणे || 16 ||
रामदासि अग्रगण्यु कपि कुलसि मंदनु |
रामरूपी अंतरात्मा दर्शने दोष नास्ति || 17 ||
इति श्री रामदासकृतं संकटनिरसनम् श्री मारुतीस्तोत्रम सम्पूर्णम् ||
Shri Hanuman Tandav Stotra
stotraShrijirasik
।। श्रीहनुमत्ताण्डवस्तोत्रम् ।।
वन्दे सिन्दूरवर्णाभं लोहिताम्बरभूषितम्,।
रक्ताङ्गरागशोभाढ्यं शोणापुच्छं कपीश्वरम्।।
भजे समीरनन्दनं, सुभक्तचित्तरञ्जनं,।
दिनेशरूपभक्षकं, समस्तभक्तरक्षकम्।।
सुकण्ठकार्यसाधकं, विपक्षपक्षबाधकं,।
समुद्रपारगामिनं, नमामि सिद्धकामिनम्।।
सुशङ्कितं सुकण्ठभुक्तवान् हि यो ।
हितं वचस्त्वमाशु धैर्य्यमाश्रयात्र वो भयं कदापि न।।
इति प्लवङ्गनाथभाषितं निशम्य ।
वानराऽधिनाथ आप शं तदा, स रामदूत आश्रयः।।
सुदीर्घबाहुलोचनेन, पुच्छगुच्छशोभिना,।
भुजद्वयेन सोदरीं निजांसयुग्ममास्थितौ।।
कृतौ हि कोसलाधिपौ, कपीशराजसन्निधौ,।
विदहजेशलक्ष्मणौ, स मे शिवं करोत्वरम्।।
सुशब्दशास्त्रपारगं, विलोक्य रामचन्द्रमाः,।
कपीश नाथसेवकं, समस्तनीतिमार्गगम्।।
प्रशस्य लक्ष्मणं प्रति, प्रलम्बबाहुभूषितः ।
कपीन्द्रसख्यमाकरोत्, स्वकार्यसाधकः प्रभुः।।
प्रचण्डवेगधारिणं, नगेन्द्रगर्वहारिणं,।
फणीशमातृगर्वहृद्दृशास्यवासनाशकृत् ।।
विभीषणेन सख्यकृद्विदेह जातितापहृत्,।
सुकण्ठकार्यसाधकं, नमामि यातुधतकम्।।
नमामि पुष्पमौलिनं, सुवर्णवर्णधारिणं।
गदायुधेन भूषितं, किरीटकुण्डलान्वितम्।।
सुपुच्छगुच्छतुच्छलङ्कदाहकं सुनायकं ।
विपक्षपक्षराक्षसेन्द्र-सर्ववंशनाशकम्।।
रघूत्तमस्य सेवकं नमामि लक्ष्मणप्रियं ।
दिनेशवंशभूषणस्य मुद्रीकाप्रदर्शकम्।।
विदेहजातिशोकतापहारिणम् प्रहारिणम्।
सुसूक्ष्मरूपधारिणं नमामि दीर्घरूपिणम्।।
नभस्वदात्मजेन भास्वता त्वया कृता महासहा ।
यता यया द्वयोर्हितं ह्यभूत्स्वकृत्यतः।।
सुकण्ठ आप तारकां रघूत्तमो विदेहजां।
निपात्य वालिनं प्रभुस्ततो दशाननं खलम्।।
इमं स्तवं कुजेऽह्नि यः पठेत्सुचेतसा नरः ।
कपीशनाथसेवको भुनक्तिसर्वसम्पदः।।
प्लवङ्गराजसत्कृपाकताक्षभाजनस्सदा।
न शत्रुतो भयं भवेत्कदापि तस्य नुस्त्विह।।
नेत्राङ्गनन्दधरणीवत्सरेऽनङ्गवासरे,
लोकेश्वराख्यभट्टेन हनुमत्ताण्डवं कृतम्।।
।।इति श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम्।।
