॥ नाहं स्मरामि कृष्णं तु राधास्मरणवर्जितम् ॥
Maa Durga - चालीसा
देवी-देवताओं की चालीसा
चालीसा (2)
Ma Kamakhya Chalisa
chalisaShrijirasik
दोहा
गुरु गोविंद का आसरा, तात मात सिर नाय ।
कामाख्या मां शारदा, सिद्ध सकल हो जाय ॥
विद्व सिद्ध संतन गुणी, तपसी तारणहार ।
हाथ जोड़ “लहरी" करे, वंदन बारम्बार ॥
चौपाई
गौरी गणपति प्रथम मनाऊं ।
सकल कामना सिद्ध कराऊं ॥
जगजननी कामाख्या माता I
शिवशक्ति मेरी भाग्यविधाता ॥
लगन लगी कुछ भी ना जानूं ।
कैसे तेरा गुणगान बखानूं ॥
दस विद्या का अंश मात्र भी ।
जानूं नहीं ग्रह गौचरात्र भी ॥
शुभ और अशुभ घड़ी तू जाने ।
बैठ गया हूं तुझको रिझाने ॥
बालक बुद्धि जान निहारो ।
सिर पे रख दो हाथ तुम्हारो ॥
परमेश्वरी सम्पूर्ण आराध्या
निकसी अंतस अर्चन आध्या ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव हे माते ।
काम क्षेत्र तेरा ध्यान लगाते ॥
मुनिवर श्रेष्ठ वशिष्ठ सिद्ध हैं ।
भांतिब्रह्म जन जन प्रसिद्ध है ।
हार के आया त्रिपुर भैरवी ।
कौन करे मां मेरी पैरवी ॥
निपट अकेला निपट अनाड़ी ।
चल जाए मेरी भी गाड़ी ॥
एक बार मोहि आन निहारो ।
कामाख्या मेरी मात उबारो ॥
मनो कामना पूरी कर दो । ।
शरण पड़ा हूं माता वर दो ॥
पूरब दिशि मां तारा दर्शन ।
अगनकण षोडशी सुदर्शन ॥
धूमावती दक्षिण में दयाला ।
नैऋत्यां भज भैरवी माला
भुवनेश्वरी पश्चिम करे रक्षा ।
छिन्नमस्ता वायब्य सुरक्षा 11
बगलामुखी उत्तर दिशि शोभा ।
त्रिपुरसुंदरी दे मति बोधा ॥
ऊर्ध्व उज्वला मातंगिनी मां ।
सर्व रक्षिका क्लीं काली मां ॥
दसों दिशा में तेरी ज्योति ।
रोम रोम आराधना होती जय जयकारे नभ गूंजे मां ।
अन धन खुशियां सब लूटे मां ॥ आशा पूरण आज करो मां ।
संकट काटो कष्ट हरो मां ॥
स्वीकारो मेरी मानस पूजा ।
नैम धरम जानूं नहीं दूजा ॥
पावन दिन वैशाख तृतीया ।
जाप करै सम्मुख रख दीया ॥
परम् पिता शिवशंकर कहते ।
निश्छल मन हो आंसू बहते ॥
ऐसी करो पुकार सुने मां ।
जो भी वांछित वर दे दे मां ॥
यही धारणा लेकर बैठा पूजा
प्रार्थना करने बैठा डाकिन,
शाकिन पास ना फटकै ।
प्रेतादिक सबभागे बचकै ।।
निर्भय हो कर तुम्हें मनाऊं ।
नित्य नए गुणगान सुनाऊं ॥
सभी सिद्धियां देने वाली वाली ।
बिगड़े भाग्य बनाने वाली ॥
अखिलाराध्या भीम लोचना ।
दीनन दुःख दारिद्र मोचना ॥
रक्तबीज महिसासुर मर्दिनि
काम रूप मां नित्य वंदिनि ॥
नव ग्रहादि अरु दिग् दिग्पाला ।
क्षेत्रपाल हो सब रखवाला 11
बावन भैरव चौसठ योगिन ।
चले नहीं मां तब आज्ञा बिन ॥
अप्सरायक्ष यक्षिणी शीश नवावै ।
तेरे लाल को नहीं सतावै ॥
ब्रह्मदैत्य वेताल कान भरै ना कोई मंथरा ॥
सत कोटि ब्रह्मांड हैं तेरे । ।
रूप तेरे उनमें बहुतेरे
ममता का आंचल फैलाओ ।।
लाल को अपने गले लगाओ ।
दुर्बल अति कमजोर हूं मैया । ।
बन जाऊं तेरो कुंवरकन्हैया ॥
कठिन कौनसो काम तुझे मां ।
जो ना तुम कर सको उसे मां ॥
" लहरी" लज्जा हाथ तेरे मां ।
निश्चित जागे भाग्य मेरे मां ॥
दोहा
डम डम डम डमरू बजे, अन धन बरसै ठाठ ।
मन वांछित माया मिले, पाठ हों एक सौ आठ ॥
Shri Durga Chalisa
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श्री दुर्गा चालीसा
नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
नमो नमो अंबे दुःख हरनी ॥ 1 ॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।
तिहू लोक फैली उजियारी ॥ 2 ॥
शशि ललाट मुख महाविशाला ।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥ 3 ॥
रूप मातु को अधिक सुहावे ।
दरश करत जन अति सुख पावे ॥ 4 ॥
तुम संसार शक्ति लय कीना ।
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥ 5 ॥
अन्नपूर्णा हुयि जग पाला ।
तुम ही आदि सुंदरी बाला ॥ 6 ॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी ।
तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥ 7 ॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावेम् ।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावेम् ॥ 8 ॥
रूप सरस्वती का तुम धारा ।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥ 9 ॥
धरा रूप नरसिंह को अंबा ।
परगट भयि फाड के खंबा ॥ 10 ॥
रक्षा कर प्रह्लाद बचायो ।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥ 11 ॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीम् ।
श्री नारायण अंग समाहीम् ॥ 12 ॥
क्षीरसिंधु में करत विलासा ।
दयासिंधु दीजै मन आसा ॥ 13 ॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
महिमा अमित न जात बखानी ॥ 14 ॥
मातंगी धूमावति माता ।
भुवनेश्वरी बगला सुखदाता ॥ 15 ॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी ।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥ 16 ॥
केहरि वाहन सोह भवानी ।
लांगुर वीर चलत अगवानी ॥ 17 ॥
कर में खप्पर खडग विराजे ।
जाको देख काल डर भाजे ॥ 18 ॥
तोहे कर में अस्त्र त्रिशूला ।
जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥ 19 ॥
नगरकोटि में तुम्हीं विराजत ।
तिहुँ लोक में डंका बाजत ॥ 20 ॥
शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे ।
रक्तबीज शंखन संहारे ॥ 21 ॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी ।
जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥ 22 ॥
रूप कराल कालिका धारा ।
सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥ 23 ॥
पडी भीढ संतन पर जब जब ।
भयि सहाय मातु तुम तब तब ॥ 24 ॥
अमरपुरी अरु बासव लोका ।
तब महिमा सब कहें अशोका ॥ 25 ॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
तुम्हें सदा पूजें नर नारी ॥ 26 ॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावेम् ।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवेम् ॥ 27 ॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लायि ।
जन्म मरण ते सौं छुट जायि ॥ 28 ॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।
योग न होयि बिन शक्ति तुम्हारी ॥ 29 ॥
शंकर आचारज तप कीनो ।
काम अरु क्रोध जीत सब लीनो ॥ 30 ॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥ 31 ॥
शक्ति रूप को मरम न पायो ।
शक्ति गयी तब मन पछतायो ॥ 32 ॥
शरणागत हुयि कीर्ति बखानी ।
जय जय जय जगदंब भवानी ॥ 33 ॥
भयि प्रसन्न आदि जगदंबा ।
दयि शक्ति नहिं कीन विलंबा ॥ 34 ॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो ।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥ 35 ॥
आशा तृष्णा निपट सतावेम् ।
रिपु मूरख मॊहि अति दर पावैम् ॥ 36 ॥
शत्रु नाश कीजै महारानी ।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥ 37 ॥
करो कृपा हे मातु दयाला ।
ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला । 38 ॥
जब लगि जियू दया फल पावू ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनावू ॥ 39 ॥
दुर्गा चालीसा जो गावै ।
सब सुख भोग परमपद पावै ॥ 40 ॥
देवीदास शरण निज जानी ।
करहु कृपा जगदंब भवानी ॥