॥ राधाया दर्शनं पुण्यं कृष्णप्राप्तेः कारणम् ॥
Maa Durga - चालीसा
देवी-देवताओं की चालीसा
चालीसा (9)
Maa Chandraghanta Chalisa
chalisaShrijirasik
॥ दोहा ॥
जय माता चंद्रघंटा सुखधाम, पूर्ण कीजो मेरे काम।
चंद्र के समान मुख चमके, दिव्य रूप मन को दमके॥
॥ चौपाई ॥
चंद्रघंटा माता कल्याणी।
ममतामई माता वरदानी।।१॥
गिरजा का ही रूप कहावे।
मैया भक्तों को अति भावे।।२॥
साहस सब में देवी भरती।
संत जनों की रक्षा करती।।३॥
देवों को विपदा से बचाया।
हाथों में था शस्त्र उठाया।।४॥
वाहन सिंह की करे सवारी।
रौद्र रूप की महिमा भारी।।५॥
कर में चक्र सुदर्शन धारी।
पापी रण में सकल पछाड़े।।६॥
दुर्गा का भी रूप कहावे।
भक्तों की रक्षा को आवे।।७॥
रण में भरती मा हुंकारा।
बल जग में है जिसका न्यारा।।८॥
त्रेता में जब संकट छाया।
रौद्र रूप तब तुमने दिखाया।।९॥
इंद्र सिंहासन असुरन छीना।
सोर बहुत सब हीने कीन्हा।।१०॥
महिषासुर दानव एक भारी।
देवों की सेना थी पछाड़ी।।११॥
देवों ने तब ध्यान लगाया।
शिव ने शक्ति पुंज बनाया।।१२॥
गौरा ने तब रूप था धारा।
दुर्गा का कीन्हा विस्तारा।।१३॥
कर में तब घंटी थी सुहाई।
चंद्र घंटा मां तब कहलाई।।१४॥
घंटा रण में मात बजाया।
असुरन को तब मार गिराया।।१५॥
देवी ने हुंकार भरी थी।
साहस की ललकार भरी थी।।१६॥
महिषासुर का मर्दन कीन्हा।
मैया ने संकट हर लीन्हा।।१७॥
धर्म ध्वजा जग में लहरावे।
देवता सार थे हरसावे।।१८॥
चंद्रघंटा देवी थी कहावे।
दुर्गा बनके शक्ति दिखावे।।१९॥
रण में सारे असुर पछाड़े।
अस्त्र शस्त्र से दानव मारे।।२०॥
ग्रंथ कहे ऐसी भी कहानी।
संतो मुनियों ने है जानी।।२१॥
शिव जो हिमालय नगरी आए।
भूत प्रेत और गण भी लाए।।२२॥
अति भयंकर रूप विशाला।
कोई मोटा और कोई काला।।२३॥
देख के मुर्च्छित हो गई मैना।
भय से व्याकुल रोते नैना।।२४॥
देवी को ढंग समझ ना आया।
गौरा धारी थी तब काया।।२५॥
गौरा ने तब शक्ति दिखाई।
चंद्र घंटा तब बनी महामाई।।२६॥
घंटा भारी तब था बजाया।
शिव के गणों को डरा भगाया।।२७॥
शिव ने जब था रूप निहारा।
जाना शक्ति सकल पसारा।।२८॥
तब देवी चंद्रघंटा कहावे।
वार इनका सुहावे।।२९॥
कर में घंटी शोभित इनकी।
रूप पे सब है मोहित जिनकी।।३०॥
सिंह सवारी मात को प्यारी।
शोभित वृषभ की भी है सवारी।।३१॥
तीसरे दिन जो व्रत को धारे।
मैया सारे काज संवारे।।३२॥
देवी दुर्गा मात कहावे।
अभय मुद्रा में बड़ी सुहावे।।३३॥
जन-जन चोला लाल चढ़ावे।
मैया से आशीष भी पावे।।३४॥
फल फूलों से सजता द्वारा।
लगता द्वारा सबसे न्यारा।।३५॥
चंद्र घंटा देवी कल्याणी।
सुख से भरती मां वरदानी।।३६॥
मैया मंगल करने वाली।
सुख से झोली भरने वाली।।३७॥
करती सबकी पूर्ण आशा।
मन में भरती है विश्वासा।।३८॥
चालीसा जो इनका गाता।
वो जन तो भव से तर जाता।।३९॥
देवी सबके दुखड़े हरती।
सुख से सबकी झोलियां भरती।।४०॥
॥ दोहा ॥
नमो नमो चंद्रघंटा, दुख भंजन सुख सार।
भक्ति अपनी दीजिए, करूँ चरण वंदन बार-बार॥
Maa Brahmacharini Chalisa
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॥ दोहा ॥
कोटि कोटि नमन मेरे माता पिता को, जिसने दिया शरीर
बलिहारी जाऊँ गुरू देव ने, दिया हरि भजन में सीर ॥
चौपाई
जय जय जग मात ब्रह्माणी ।
भक्ति मुक्ति विश्व कल्याणी ॥ १ ॥
वीणा पुस्तक कर में सोहे ।
शारदा सब जग सोहे ॥ २ ॥
हँस वाहिनी जय जग माता ।
भक्त जनन की हो सुख दाता ॥ ३ ॥
ब्रह्माणी ब्रह्मा लोक से आई ।
मात लोक की करो सहाई ॥ ४ ॥
क्षीर सिन्धु में प्रकटी जब ही ।
देवों ने जय बोली तब ही ॥ ५ ॥
चतुर्दश रतनों में मानी ।
अद॒भुत माया वेद बखानी ॥ ६ ॥
चार वेद षट शास्त्र कि गाथा ।
शिव ब्रह्मा कोई पार न पाता ॥ ७ ॥
आदि शक्ति अवतार भवानी ।
भक्त जनों की मां कल्याणी ॥ ८ ॥
जब−जब पाप बढे अति भारे ।
माता शस्त्र कर में धारे ॥ ९ ॥
पाप विनाशिनी तू जगदम्बा ।
धर्म हेतु ना करी विलम्बा ॥ १० ॥
नमो नमो ब्रह्मी सुखकारी ।
ब्रह्मा विष्णु शिव तोहे मानी ॥ ११ ॥
तेरी लीला अजब निराली ।
सहाय करो माँ पल्लू वाली ॥ १२ ॥
दुःख चिन्ता सब बाधा हरणी ।
अमंगल में मंगल करणी ॥ १३ ॥
अन्न पूरणा हो अन्न की दाता ।
सब जग पालन करती माता ॥ १४ ॥
सर्व व्यापिनी असंख्या रूपा ।
तो कृपा से टरता भव कूपा ॥ १५ ॥
चंद्र बिंब आनन सुखकारी ।
अक्ष माल युत हंस सवारी ॥ १६ ॥
पवन पुत्र की करी सहाई ।
लंक जार अनल सित लाई ॥ १७ ॥
कोप किया दश कन्ध पे भारी ।
कुटम्ब संहारा सेना भारी ॥ १८ ॥
तु ही मात विधी हरि हर देवा ।
सुर नर मुनी सब करते सेवा ॥ १९ ॥
देव दानव का हुआ सम्वादा ।
मारे पापी मेटी बाधा ॥ २० ॥
श्री नारायण अंग समाई ।
मोहनी रूप धरा तू माई ॥ २१ ॥
देव दैत्यों की पंक्ती बनाई ।
देवों को मां सुधा पिलाई ॥ २२ ॥
चतुराई कर के महा माई ।
असुरों को तू दिया मिटाई ॥ २३ ॥
नौ खण्ङ मांही नेजा फरके ।
भागे दुष्ट अधम जन डर के ॥ २४ ॥
तेरह सौ पेंसठ की साला ।
आस्विन मास पख उजियाला ॥ २५ ॥
रवि सुत बार अष्टमी ज्वाला ।
हंस आरूढ कर लेकर भाला ॥ २६ ॥
नगर कोट से किया पयाना ।
पल्लू कोट भया अस्थाना ॥ २७ ॥
चौसठ योगिनी बावन बीरा ।
संग में ले आई रणधीरा ॥ २८ ॥
बैठ भवन में न्याय चुकाणी ।
द्वार पाल सादुल अगवाणी ॥ २९ ॥
सांझ सवेरे बजे नगारा ।
उठता भक्तों का जयकारा ॥ ३० ॥
मढ़ के बीच खड़ी मां ब्रह्माणी ।
सुन्दर छवि होंठो की लाली ॥ ३१ ॥
पास में बैठी मां वीणा वाली ।
उतरी मढ़ बैठी महा काली ॥ ३२ ॥
लाल ध्वजा तेरे मंदिर फरके ।
मन हर्षाता दर्शन करके ॥ ३३ ॥
चैत आसोज में भरता मेला ।
दूर दूर से आते चेला ॥ ३४ ॥
कोई संग में, कोई अकेला ।
जयकारो का देता हेला ॥ ३५ ॥
कंचन कलश शोभा दे भारी ।
दिव्य पताका चमके न्यारी ॥ ३६ ॥
सीस झुका जन श्रद्धा देते ।
आशीष से झोली भर लेते ॥ ३७ ॥
तीन लोकों की करता भरता ।
नाम लिए सब कारज सरता ॥ ३८ ॥
मुझ बालक पे कृपा की ज्यो ।
भुल चूक सब माफी दीज्यो ॥ ३९ ॥
मन्द मति यह दास तुम्हारा ।
दो मां अपनी भक्ती अपारा ॥ ४० ॥
जब लगि जिऊ दया फल पाऊं ।
तुम्हरो जस मैं सदा ही गाऊं ॥ ४१ ॥
॥ दोहा ॥
राग द्वेष में लिप्त मन, मैं कुटिल बुद्धि अज्ञान ।
भव से पार करो मातेश्वरी, अपना अनुगत जान ॥
Maa Shailputri Chalisa
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॥ दोहा ॥
शैलपुत्री माँ नमो नमः कथा में करूँ बखान।
बुद्धि विवेक बल दीजिए करिए पूरण काम॥
॥ चौपाई ॥
शैलपुत्री सब सुख की दानी।
प्रथमा देवी श्री महारानी॥
नवरात्रि का वार जो आवे।
प्रथम दिवस मैया मन भावे॥२॥
व्रत पूजन धारे नर नारी।
सकल सुमंगल पावे सारी॥
रिद्धि सिद्धि वर देवन वाली।
अष्टभुजी मां अति बलशाली॥४॥
राजा हिमालय सुता कहाई।
तब गिरिजा की काया पाई॥
रूप मनोरम शील सुशीला।
धर्म नीति संग प्रेम था कीन्हा॥६॥
शिव भक्ति में रहे मां लीना।
ध्यान जोग मां गौरा लीन्हा॥
रहती हरदम मात गंभीरा।
रुक जावे बहती समीरा॥८॥
राजा हिमालय देखत जावे।
चिंता ग्लानि बहुत सतावे॥
तब जाकर नारद बुलवाए।
लक्षण सारे तब समझाए॥१०॥
नारद ने सब कथा थी जानी।
अंतर ध्यान से सब पहचानी॥
गिरिजा माता को जब देखा।
भक्तिभाव और ज्ञान को परखा॥१२॥
नारद अद्भुत ज्ञान था पाया।
काल की जानी सारी माया॥
मन में उपजी तब सुमति हे।
जान गए गिरिजा ही सती है॥१४॥
पूर्व जनम में देह त्यागी।
शिव से मिली न नार को भागी॥
नारद ने तब ज्ञान बताया।
गौरा को तब सार बताया॥१६॥
शिव लीला के सार को जाना।
गिरिजा ने शिव को पहचाना॥
शिव के वरण की मन में आयी।
इच्छा बैल ऐसी उपजाई॥१८॥
शिव को पाना नहीं सरल है।
नारद बोले काज विरल है॥
शिव को ऐसी नार वरेगी।
शिव के तेज का पूर्ण सहेगी॥२०॥
ऐसी रची ना कोई माया।
ऐसी बनी न कोई काया॥
शिव के तेज को जो सह पाए।
शिव के वरण को जो मन भाए॥२२॥
शिव के तप को देवी करती।
शिव के नाम को सदा सुमरती॥
देवी तप ने रच दी माया।
गौरा ने तब शिव को पाया॥२४॥
शिव के मन को तब अति भायी।
पटरानी बन संग सुहाई॥
शिव की बन गई प्रिय जो नारी।
शैलपुत्री वो प्रथम कहाई॥२६॥
पहला व्रत उनका ही धारे।
मैया सबके काज संवारे॥
नौ देवी के पूज जो आये।
सब ही गौरा मात मनाए॥२८॥
गौरवर्ण है श्वेत है काया।
माँ का चंचल रूप है भाया॥
वृषभ सवारी मां की सुहावनी।
शंख कमल है कर में साजे॥३०॥
मैया का सुमिरन जो करते।
उनके ना कभी काम बिगड़ते॥
शैलपुत्री मां अभय की दानी।
शक्ति भरी हे अति बलशाली॥३२॥
वरमुद्रा मे सुख से भरती।
अभय मुद्रा मे रक्षा करती॥
ज्योत जगे जिसकी नूरानी।
दुखड़े हरती अम्बे भवानी॥३४॥
नवरात्रों मे ध्यान लगा लो।
गर मुक्ति का मां से पालो॥
मैया की महिमा है निराली।
भंडारे सब भरने वाली॥३६॥
ममतामयी मां रूप विशाला।
सब भक्तन की दीन दयाला॥
वर मुक्ति का देने वाली।
सुख यश वैभव की है दानी॥३८॥
पढ़े जो शैलपुत्री चालीसा।
सकल लोक को उसने जीता॥
मां की अतुलित कृपा पाई।
शैलपुत्री मां है सुखदाई॥४०॥
॥ दोहा ॥
शैलपुत्री महिमा सुनो, करो चालीसा पाठ।
मां की कृपा पाओगे, बनेगी बिगड़ी बात॥
Maa Katyayani Chalisa
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।।दोहा।
जय कात्यायनी माँ,
जय महिषासुर मारिणी।
सुर नर मुनि आराधित,
जय मंगल करिणी॥
चौपाई
जय जय अंबे जय कात्यायनी।
जय महिषासुर घातिनी दानी।।
ब्रह्मा, विष्णु, शिव जी ध्यावैं।
शक्ति शक्ति सब जगत बनावैं॥
रक्तदंतिका और अन्नपूर्णा।
माँ कात्यायनी हैं सम्पूर्णा॥
कात्यायन ऋषि मुनि के आश्रय।
कात्यायनी माँ सबके बासय॥
भय, संकट हरिणी तुही माता।
भक्तों के दुःख हरती आपा॥
जो कोई तेरी शरण में आवे।
मनवांछित फल वह नर पावे॥
ध्यान धार जो कोई नारी।
कात्यायनी पूर्ण सुखकारी।।
कुमारी पुजा जो नित ध्यावें।
अविवाहित जीवन न बितावे॥
हर युग में मां तू सहाय।
जो भी भक्त करे मन लाय॥
।।दोहा।
कात्यानी मां तेरी महिमा।
सतयुमग त्रेता हो या द्वापर।।
सिंह सवारी माँभवानी।
जय-जय-जय अम्बे भवानी॥
॥इति श्री कात्यायनी चालीसा सम्पूर्ण॥
Maa Siddhidatri Chalisa
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॥दोहा॥
नवरात्रि में नवमी दिन, जो सिद्धिदात्री की साध।
उनका कार्य सिद्ध हो, मिट जाए सब बाध॥
॥चौपाई॥
जय सिद्धिदात्री जगदंबा, सिद्धि का दान देने वाली।
जो भी करे विनती तेरी, उसकी हर मनोकामना पूरी वाली॥
शक्ति स्वरूपिणी माँ अम्बे, जो भी सुमिरे तुझको।
कष्ट हरती, दीनों पर कृपा करती, तेरी महिमा असीम है माँ॥
चारों दिशाओं में तेरी महिमा, तुझसे बढ़कर कोई नहीं।
त्रिदेव भी तेरे आगे नतमस्तक, तेरा वरदान सभी माँगे॥
जो सच्चे मन से भजे तुझको, उसके संकट दूर हो जाए।
धन-धान्य की हो प्राप्ति, जीवन में मंगल हो जाए॥
सिद्धिदात्री माँ जगदंबे, तेरे चरणों में शीश नवाए।
तू ही शक्ति, तू ही ममता, जग में तेरा ही गुण गाए॥
सिद्धियों की दात्री माँ तू, तुझसे बड़ा कोई नहीं।
तेरी महिमा अपरंपार है, तेरा ही गुणगान सभी करते॥
जो भी करे ध्यान तेरा, वह भवसागर से तर जाए।
तेरा स्मरण करते ही माँ, सब दुःख दर्द दूर हो जाए॥
भक्तों की रक्षा करने वाली, तू है जगत की पालनहार।
तेरी महिमा गाते गाते, हम भी हो जाएँ तुझपर निसार॥
नवदुर्गा में तेरा स्थान, तुझसे ही है सबका उद्धार।
सिद्धिदात्री मां तू है जग की, तेरा ही भजते बारम्बार॥
मां सिद्धिदात्री की महिमा, कोई कह न पाए।
जो भी हो तेरे ध्यान में लीन, वह सब संकट से छूट जाए॥
सर्व सिद्धियों की दात्री मा, तेरे चरणों में शीश नवाए।
जो तेरा स्मरण करते, वे भवसागर से पार हो जाए॥
॥दोहा॥
मां सिद्धिदात्री का जो भी ध्यान करे सुमिरन।
उसके सब कष्ट कट जाएं, हो उसका मंगल सदा॥
Maa Kali Chalisa
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॥दोहा॥
जयकाली कलिमलहरण,
महिमा अगम अपार ।
महिष मर्दिनी कालिका,
देहु अभय अपार ॥
॥ चौपाई ॥
अरि मद मान मिटावन हारी ।
मुण्डमाल गल सोहत प्यारी ॥
अष्टभुजी सुखदायक माता ।
दुष्टदलन जग में विख्याता ॥
भाल विशाल मुकुट छवि छाजै ।
कर में शीश शत्रु का साजै ॥
दूजे हाथ लिए मधु प्याला ।
हाथ तीसरे सोहत भाला ॥4॥
चौथे खप्पर खड्ग कर पांचे ।
छठे त्रिशूल शत्रु बल जांचे ॥
सप्तम करदमकत असि प्यारी ।
शोभा अद्भुत मात तुम्हारी ॥
अष्टम कर भक्तन वर दाता ।
जग मनहरण रूप ये माता ॥
भक्तन में अनुरक्त भवानी ।
निशदिन रटें ॠषी-मुनि ज्ञानी ॥
महशक्ति अति प्रबल पुनीता ।
तू ही काली तू ही सीता ॥
पतित तारिणी हे जग पालक ।
कल्याणी पापी कुल घालक ॥
शेष सुरेश न पावत पारा ।
गौरी रूप धर्यो इक बारा ॥
तुम समान दाता नहिं दूजा ।
विधिवत करें भक्तजन पूजा ॥
रूप भयंकर जब तुम धारा ।
दुष्टदलन कीन्हेहु संहारा ॥
नाम अनेकन मात तुम्हारे ।
भक्तजनों के संकट टारे ॥
कलि के कष्ट कलेशन हरनी ।
भव भय मोचन मंगल करनी ॥
महिमा अगम वेद यश गावैं ।
नारद शारद पार न पावैं ॥
भू पर भार बढ्यौ जब भारी ।
तब तब तुम प्रकटीं महतारी ॥
आदि अनादि अभय वरदाता ।
विश्वविदित भव संकट त्राता ॥
कुसमय नाम तुम्हारौ लीन्हा ।
उसको सदा अभय वर दीन्हा ॥
ध्यान धरें श्रुति शेष सुरेशा ।
काल रूप लखि तुमरो भेषा ॥
कलुआ भैंरों संग तुम्हारे ।
अरि हित रूप भयानक धारे ॥
सेवक लांगुर रहत अगारी ।
चौसठ जोगन आज्ञाकारी ॥
त्रेता में रघुवर हित आई ।
दशकंधर की सैन नसाई ॥
खेला रण का खेल निराला ।
भरा मांस-मज्जा से प्याला ॥
रौद्र रूप लखि दानव भागे ।
कियौ गवन भवन निज त्यागे ॥
तब ऐसौ तामस चढ़ आयो ।
स्वजन विजन को भेद भुलायो ॥
ये बालक लखि शंकर आए ।
राह रोक चरनन में धाए ॥
तब मुख जीभ निकर जो आई ।
यही रूप प्रचलित है माई ॥
बाढ्यो महिषासुर मद भारी ।
पीड़ित किए सकल नर-नारी ॥
करूण पुकार सुनी भक्तन की ।
पीर मिटावन हित जन-जन की ॥
तब प्रगटी निज सैन समेता ।
नाम पड़ा मां महिष विजेता ॥
शुंभ निशुंभ हने छन माहीं ।
तुम सम जग दूसर कोउ नाहीं ॥
मान मथनहारी खल दल के ।
सदा सहायक भक्त विकल के ॥
दीन विहीन करैं नित सेवा ।
पावैं मनवांछित फल मेवा ॥
संकट में जो सुमिरन करहीं ।
उनके कष्ट मातु तुम हरहीं ॥
प्रेम सहित जो कीरति गावैं ।
भव बन्धन सों मुक्ती पावैं ॥
काली चालीसा जो पढ़हीं ।
स्वर्गलोक बिनु बंधन चढ़हीं ॥
दया दृष्टि हेरौ जगदम्बा ।
केहि कारण मां कियौ विलम्बा ॥
करहु मातु भक्तन रखवाली ।
जयति जयति काली कंकाली ॥
सेवक दीन अनाथ अनारी ।
भक्तिभाव युति शरण तुम्हारी ॥
॥दोहा॥
प्रेम सहित जो करे,
काली चालीसा पाठ ।
तिनकी पूरन कामना,
होय सकल जग ठाठ ॥
Maa Gauri Chalisa
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।। दोहा ।।
मन मन्दिर मेरे इन बसों,
आरंभ करूं गुणगान।
गौरी माँ मातेश्वरी,
दो चरणों का ध्यान।
पूजन विधि ना जानती,
पर श्रद्धा है अपार,
प्रणाम मेरा स्वीकारिये ,
माँ प्राण आधार।।
।। चौपाई ।।
नमो नमो हे गौरी माता।
आप हो मेरी भाग्य विधाता।।
शरनागत न कभी घबराता।
गौरी उमा शंकरी माता।।
आपका प्रिय है आदर पाता।
जय हो कार्तिकेय गणेश की माता।।
महादेव गणपति संग आओ।
मेरे सकल क्लेश मिटाओ।।
सार्थक हो जाए जग में जीना।
सद्कर्मों से कभी हटूं ना।।
सकल मनोरथ पूर्ण कीजो।
सुख सुविधा वरदान में दीजो।।
हे माँ भाग्य रेखा जगा दो।
मन भावन संयोग मिला दो।।
मन को भाये वोह वर चाहूँ।
ससुराल पक्ष का स्नेह मैं पाऊँ।।
परम आराध्या आप हो मेरी।
फ़िर क्यों वर मे इतनी देरी।।
हमरे काज सम्पूर्ण कीजो।
थोडे़ में बरकत भर दीजो।।
अपनी दया बनाए रखना।
भक्ति भाव जगाये रखना।।
गौरी माता अंगसंग रहना।
कभी न खोऊं मन का चैना।।
देव मुनि सब सीस निवाते।
सुख सुविधा को वर में पाते।।
श्रद्धा भाव जो लेकर आया।
बिन मांगे भी सब कुछ पाया।।
हर संकट से उसे उबारा।
आगे बढ़ के दिया सहारा।।
जबहिं आप माँ स्नेह दिखलावें।
निराश मन मे आस जगावें।।
शिव भी आपका कहा ना टालें ।
दया दृष्टि हम पे डालें।।
जो जन करता आपका ध्यान।
जग में पाये मान सम्मान।।
सच्चे मन जो सिमरण करती।
उसके सुहाग की रक्षा करती।।
दया दृष्टि जब माँ डारें।
भवसागर से पार उतारें।।
जपे जो ॐ नमः शिवाय।
शिव परिवार का स्नेह वो पाय।।
जिस पे आप दया दिखावें।
दुष्ट आत्मा नहीं सतावें।।
सद्गुण की हो दाता आप।
हर इक मन की ज्ञाता आप।।
काटो हमरे सकल क्लेश।
निरोग रहे परिवार हमेश।।
दुख संताप मिटा देना माँ।
मेघ दया के बरसा देना माँ।।
जबहिं आप मौज में आए।
हठ जाए माँ सब विपदायें।।
जिसपे दयाल हों माता आप।
उसका बढ़ता पुण्य प्रताप।।
फल-फूल मैं दुग्ध चढ़ाऊं।
श्रद्धाभाव से आपको ध्याऊं।।
अवगुण मेरे ढक देना माँ।
ममता आंचल कर देना माँ।।
कठिन नहीं कुछ आपको माता।
जग ठुकराया दया को पाता।।
गिन पाऊं न गुन माँ तेरे।
नाम धाम स्वरूप बहूतेरे।।
जितने आपके पावन धाम।
सब धामों को माँ प्राणम।।
आपकी दया का है ना पार।
तभी तो पूजे कुल संसार।।
निर्मल मन जो शरण में आता।
मुक्ति की वोह युक्ति पाता।।
संतोष धन से दामन भर दो।
असंभव को माँ संभव कर दो।।
आपकी दया के भारे भण्डार।
सुखी वसे मेरा परिवार।।
आपकी महिमा अति निराली।
भक्तों के दुःख हरने वाली।।
मनोकामना पूर्ण करती।
मन की दुविधा पल मे हरती।।
चालीसा जो भी पढे सुनाय।
सुयोग्य वर वरदान मे पाय।।
आशा पूर्ण कर देना माँ।
सुमंगल साखी वर देना माँ।।
।। दोहा ।।
गौरी माँ विनती करूँ,
आना आपके द्वार।
ऐसी माँ कृपा किजिये,
हो जाए उद्धार।।
दीन-हीन हूँ शरण में,
दो चरणों का ध्यान ।
ऐसी कृपा कीजिये,
पाऊँ मान सम्मान।।
Maa Kamakhya Chalisa
chalisaShrijirasik
दोहा
गुरु गोविंद का आसरा, तात मात सिर नाय ।
कामाख्या मां शारदा, सिद्ध सकल हो जाय ॥
विद्व सिद्ध संतन गुणी, तपसी तारणहार ।
हाथ जोड़ “लहरी" करे, वंदन बारम्बार ॥
चौपाई
गौरी गणपति प्रथम मनाऊं ।
सकल कामना सिद्ध कराऊं ॥
जगजननी कामाख्या माता I
शिवशक्ति मेरी भाग्यविधाता ॥
लगन लगी कुछ भी ना जानूं ।
कैसे तेरा गुणगान बखानूं ॥
दस विद्या का अंश मात्र भी ।
जानूं नहीं ग्रह गौचरात्र भी ॥
शुभ और अशुभ घड़ी तू जाने ।
बैठ गया हूं तुझको रिझाने ॥
बालक बुद्धि जान निहारो ।
सिर पे रख दो हाथ तुम्हारो ॥
परमेश्वरी सम्पूर्ण आराध्या
निकसी अंतस अर्चन आध्या ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव हे माते ।
काम क्षेत्र तेरा ध्यान लगाते ॥
मुनिवर श्रेष्ठ वशिष्ठ सिद्ध हैं ।
भांतिब्रह्म जन जन प्रसिद्ध है ।
हार के आया त्रिपुर भैरवी ।
कौन करे मां मेरी पैरवी ॥
निपट अकेला निपट अनाड़ी ।
चल जाए मेरी भी गाड़ी ॥
एक बार मोहि आन निहारो ।
कामाख्या मेरी मात उबारो ॥
मनो कामना पूरी कर दो । ।
शरण पड़ा हूं माता वर दो ॥
पूरब दिशि मां तारा दर्शन ।
अगनकण षोडशी सुदर्शन ॥
धूमावती दक्षिण में दयाला ।
नैऋत्यां भज भैरवी माला
भुवनेश्वरी पश्चिम करे रक्षा ।
छिन्नमस्ता वायब्य सुरक्षा 11
बगलामुखी उत्तर दिशि शोभा ।
त्रिपुरसुंदरी दे मति बोधा ॥
ऊर्ध्व उज्वला मातंगिनी मां ।
सर्व रक्षिका क्लीं काली मां ॥
दसों दिशा में तेरी ज्योति ।
रोम रोम आराधना होती जय जयकारे नभ गूंजे मां ।
अन धन खुशियां सब लूटे मां ॥ आशा पूरण आज करो मां ।
संकट काटो कष्ट हरो मां ॥
स्वीकारो मेरी मानस पूजा ।
नैम धरम जानूं नहीं दूजा ॥
पावन दिन वैशाख तृतीया ।
जाप करै सम्मुख रख दीया ॥
परम् पिता शिवशंकर कहते ।
निश्छल मन हो आंसू बहते ॥
ऐसी करो पुकार सुने मां ।
जो भी वांछित वर दे दे मां ॥
यही धारणा लेकर बैठा पूजा
प्रार्थना करने बैठा डाकिन,
शाकिन पास ना फटकै ।
प्रेतादिक सबभागे बचकै ।।
निर्भय हो कर तुम्हें मनाऊं ।
नित्य नए गुणगान सुनाऊं ॥
सभी सिद्धियां देने वाली वाली ।
बिगड़े भाग्य बनाने वाली ॥
अखिलाराध्या भीम लोचना ।
दीनन दुःख दारिद्र मोचना ॥
रक्तबीज महिसासुर मर्दिनि
काम रूप मां नित्य वंदिनि ॥
नव ग्रहादि अरु दिग् दिग्पाला ।
क्षेत्रपाल हो सब रखवाला 11
बावन भैरव चौसठ योगिन ।
चले नहीं मां तब आज्ञा बिन ॥
अप्सरायक्ष यक्षिणी शीश नवावै ।
तेरे लाल को नहीं सतावै ॥
ब्रह्मदैत्य वेताल कान भरै ना कोई मंथरा ॥
सत कोटि ब्रह्मांड हैं तेरे । ।
रूप तेरे उनमें बहुतेरे
ममता का आंचल फैलाओ ।।
लाल को अपने गले लगाओ ।
दुर्बल अति कमजोर हूं मैया । ।
बन जाऊं तेरो कुंवरकन्हैया ॥
कठिन कौनसो काम तुझे मां ।
जो ना तुम कर सको उसे मां ॥
" लहरी" लज्जा हाथ तेरे मां ।
निश्चित जागे भाग्य मेरे मां ॥
दोहा
डम डम डम डमरू बजे, अन धन बरसै ठाठ ।
मन वांछित माया मिले, पाठ हों एक सौ आठ ॥
Shri Durga Chalisa
chalisaShrijirasik
श्री दुर्गा चालीसा
नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
नमो नमो अंबे दुःख हरनी ॥ 1 ॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।
तिहू लोक फैली उजियारी ॥ 2 ॥
शशि ललाट मुख महाविशाला ।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥ 3 ॥
रूप मातु को अधिक सुहावे ।
दरश करत जन अति सुख पावे ॥ 4 ॥
तुम संसार शक्ति लय कीना ।
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥ 5 ॥
अन्नपूर्णा हुयि जग पाला ।
तुम ही आदि सुंदरी बाला ॥ 6 ॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी ।
तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥ 7 ॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावेम् ।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावेम् ॥ 8 ॥
रूप सरस्वती का तुम धारा ।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥ 9 ॥
धरा रूप नरसिंह को अंबा ।
परगट भयि फाड के खंबा ॥ 10 ॥
रक्षा कर प्रह्लाद बचायो ।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥ 11 ॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीम् ।
श्री नारायण अंग समाहीम् ॥ 12 ॥
क्षीरसिंधु में करत विलासा ।
दयासिंधु दीजै मन आसा ॥ 13 ॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
महिमा अमित न जात बखानी ॥ 14 ॥
मातंगी धूमावति माता ।
भुवनेश्वरी बगला सुखदाता ॥ 15 ॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी ।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥ 16 ॥
केहरि वाहन सोह भवानी ।
लांगुर वीर चलत अगवानी ॥ 17 ॥
कर में खप्पर खडग विराजे ।
जाको देख काल डर भाजे ॥ 18 ॥
तोहे कर में अस्त्र त्रिशूला ।
जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥ 19 ॥
नगरकोटि में तुम्हीं विराजत ।
तिहुँ लोक में डंका बाजत ॥ 20 ॥
शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे ।
रक्तबीज शंखन संहारे ॥ 21 ॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी ।
जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥ 22 ॥
रूप कराल कालिका धारा ।
सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥ 23 ॥
पडी भीढ संतन पर जब जब ।
भयि सहाय मातु तुम तब तब ॥ 24 ॥
अमरपुरी अरु बासव लोका ।
तब महिमा सब कहें अशोका ॥ 25 ॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
तुम्हें सदा पूजें नर नारी ॥ 26 ॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावेम् ।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवेम् ॥ 27 ॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लायि ।
जन्म मरण ते सौं छुट जायि ॥ 28 ॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।
योग न होयि बिन शक्ति तुम्हारी ॥ 29 ॥
शंकर आचारज तप कीनो ।
काम अरु क्रोध जीत सब लीनो ॥ 30 ॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥ 31 ॥
शक्ति रूप को मरम न पायो ।
शक्ति गयी तब मन पछतायो ॥ 32 ॥
शरणागत हुयि कीर्ति बखानी ।
जय जय जय जगदंब भवानी ॥ 33 ॥
भयि प्रसन्न आदि जगदंबा ।
दयि शक्ति नहिं कीन विलंबा ॥ 34 ॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो ।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥ 35 ॥
आशा तृष्णा निपट सतावेम् ।
रिपु मूरख मॊहि अति दर पावैम् ॥ 36 ॥
शत्रु नाश कीजै महारानी ।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥ 37 ॥
करो कृपा हे मातु दयाला ।
ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला । 38 ॥
जब लगि जियू दया फल पावू ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनावू ॥ 39 ॥
दुर्गा चालीसा जो गावै ।
सब सुख भोग परमपद पावै ॥ 40 ॥
देवीदास शरण निज जानी ।
करहु कृपा जगदंब भवानी ॥
